Showing posts with label खारुन. Show all posts
Showing posts with label खारुन. Show all posts

Saturday, October 14, 2023

जाना-अनजाना रायपुर

खारुन के मंथर प्रवाह के साथ मानव सभ्यता को कई ठौर ठिकाने मिले- कउही, परसुलीडीह, तरीघाट, खट्टी, खुड़मुड़ी, उफरा और जमरांव में सदियों की बसाहट के प्रमाण हैं। यह क्रम नदी के दाहिने तट पर मानों ठिठक गया, महादेव घाट-रायपुरा पहुंचते। हजार साल से भी अधिक पुराने अवशेष इतिहास को रोशन करते हैं। बसाहट को आकर्षित किया पूर्वी जल-थल ने। सपाट ठोस-मजबूत थल और उसके बीच जगह-जगह पर भरी-पूरी जलराशि। यही बसाहट- रायपुर, तीन सौ तालाबों का शहर बना।

मैदानी-मध्य छत्तीसगढ़, लगभग बीचों-बीच शिवनाथ से दो हिस्सों में बंटता है। छत्तीस गढ़ों के लिए कहा गया है, शिवनाथ नदी के उत्तर में अठारह और शिवनाथ नदी के दक्षिण में अठारह। ये सभी गढ़ राजस्व-प्रशासनिक केंद्र थे। कलचुरि शासकों के इन सभी छत्तीस गढ़ों का मुख्यालय रतनपुर था, किंतु अनुमान होता है कि शिवनाथ नदी के कारण और दक्षिणी अठारह गढ़ों की सीमा नागवंशियों से जुड़ी होने के कारण, इस अंचल में एक अन्य मुख्यालय आवश्यक हो गया।

कलचुरि शासक ब्रह्मदेव के दो शिलालेख पंद्रहवीं सदी के आरंभिक वर्षों के हैं, जिनसे ब्रह्मदेव के वंश में उसके पिता रामचंद्र के क्रम में सिंहण और लक्ष्मीदेव की जानकारी मिलती है। लक्ष्मीदेव को रायपुर शुभस्थान का राजा बताया गया है। शिलालेख से सिंहण द्वारा अठारह गढ़ जीतने और फिर उसके पुत्र रामदेव/रामचंद्र द्वारा नागवंशियों को आहत करने की जानकारी मिलती है। शिलालेख में रोचक उल्लेख है कि ‘नायक हाजिराजदेव ने हट्टकेश्वर मंदिर बनवाया ... रायपुर में रहने वाली सुंदर स्त्रियां जो कामदेव को जीवित करने के लिए स्वयं संजीवनी औषधियां हैं, यहां के सुखों के कारण कुबेर की नगरी को मन में तुच्छ समझती हैं।‘ कलचुरि शासकों के पुराने केंद्र रतनपुर की बुढ़ाती जड़ों के समानांतर रायपुर शाखा की नई पौध-रोपनी ताकतवर होती गई, और सन 1818 में छत्तीसगढ़ का मुख्यालय रतनपुर से रायपुर स्थानांतरित हो गया।

उन्नीसवीं सदी पूर्वार्द्ध के बाबू रेवाराम की पंक्तियां हैं-
मोहम भये सुत जिनके, सूरदे नृप नायक तिनके।
ब्रह्मदेव तिनके अनुज, मति गुण रूप विशाल। 
दायभाग लै रायपुर, विरच्यो बूढ़ा ताल।

मुख्य सड़क से जुड़े होने के कारण अब बूढ़ा तालाब और तेलीबांधा सामान्यतः जाने-पहचाने जाते हैं, मगर इनके साथ आमा तालाब, राजा तालाब, कंकाली तालाब, महाराजबंद सहित मठपारा के तालाब आदि कई जलाशयों का अस्तित्व अभी बचा हुआ है, जबकि पंडरीतरई, रजबंधा का नाम ही रह गया है और लेंडी तालाब अब शास्त्री बाजार है।

उन्नीसवीं सदी में रायपुर के विकास के कुछ मुख्य कार्यों की जानकारी मिलती है, जिनमें 1804 में भोसलों और अंग्रेजों के मध्य संधि के फलस्वरूप डाक सेवा का आरंभ हुआ। 1820-25 के दौरान रायपुर-नागपुर सड़क निर्माण कराया गया। राजकुमार कालेज परिसर का लैंप पोस्ट, जिस पर ‘नागपुर 180 मील‘ अंकित है, अब भी सुरक्षित है। 1825 में सदर बाजार मार्ग निर्माण हुआ। 1825-30 के बीच मिडिल तथा नार्मल स्कूल और दो अस्पतालों का निर्माण हुआ। बाबू साधुचरणप्रसाद ने ‘भारत-भ्रमण में लिखा है- ‘सन 1830 में रायपुर का वर्तमान कसबा बसा। पुराना कसबा इससे दक्षिण और पश्चिम था।‘ 1860 में रायपुर से बिलासपुर और रायपुर से धमतरी के लिए सड़क बनी। रायपुर में म्युनिसिपल कमेटी का गठन 1867 में हुआ। 1868 में केंद्रीय जेल भवन, गोल बाजार तथा दो सार्वजनिक उद्यानों का निर्माण हुआ। 1875 में राजनांदगांव के महंत घासीदास के दान से संग्रहालय का निर्माण हुआ, जो जनभागीदारी से बना देश का पहला संग्रहालय है।

1887 में टाउन हॉल, सर्किट हाउस, अस्पताल भवन बना तथा इसी दौरान लेडी डफरिन जनाना अस्पताल भी खुला। 1888 में रायपुर तक आई रेल की बड़ी लाइन, आगे खड़गपुर होते 1900 में कलकत्ता से जुड़ गई। 1890 में रायपुर-कलकत्ता सड़क, रायपुर-बलौदा बाजार सड़क और धमतरी रेल लाइन बनी। 1892 में ‘बलरामदास वाटर वर्क्स‘ नाम से खारुन से जल-प्रदाय आरंभ हुआ। सरकारी मिडिल स्कूल 1887 में गवर्नमेंट हाई स्कूल का दरजा पा गया, तब यह कलकत्ता विश्वविद्यालय से फिर 1894 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से संबद्ध हुआ। 1894 में राजकुमार कॉलेज जबलपुर से रायपुर आ गया, 1939 तक यहां सिर्फ राजकुमारों को प्रवेश दिया जाता था। महाविद्यालयीन शिक्षा के लिए 1938 में दाऊ कामता प्रसाद के दान, शिक्षाशास्त्री जे. योगानंदम की इच्छा-शक्ति और तत्कालीन नगर पालिका अध्यक्ष ठाकुर प्यारेलाल सिंह के सद्प्रयासों से रायपुर में छत्तीसगढ़ कॉलेज की स्थापना हुई।

1867 में म्युनिसिपल बना, जिसकी सीमा में रायपुर के साथ चिरहुलडीह, डंगनिया और गभरापारा बस्ती शामिल थी। टिकरापारा से संलग्न गभरापारा लगभग भुला दिया गया नाम हैै। गभरा शब्द भी सामान्य प्रचलन में अब नहीं है। टिकरा-गभरा जोड़े के साथ ध्यान रहे कि गभरा या गभार, टिकरा की तरह कृषि भूमि का एक प्रकार है, जिसका आशय गहरी उपजाऊ भूमि होता है। रायपुर की शान रहे, रजवाड़ों और जमींदारों के बाड़े- खैरागढ़, रायगढ़, खरियार, छुईखदान, छुरा, कवर्धा, फिंगेश्वर, बस्तर, कोमाखान आदि अधिकतर अब स्मृति-लोप हो रहे हैं। और बीसवीं सदी के आरंभ में सिंचाई विभाग की स्थापना और नहर निर्माण के साथ महानदी का पानी खेतों तक पहुंचने लगा। तब तक रायपुर की जनसंख्या 30000 पार कर चुकी थी।

सबसे पुरानी कामर्शियल बैंक, 1912 में स्थापित इलाहाबाद बैंक है। को-ऑपरेटिव बैंक 1913 में और इंपीरियल बैंक 1925 में स्थापित हुआ। बिजली अक्टूबर 1928 में आई, मगर व्यवस्थित होने में समय लगा, जब 1939 में 240 किलोवॉट का पावर हाउस स्थापित हो गया। 1950-51 में ईस्टर्न ग्रिड सिस्टम के अंतर्गत रायपुर पायलट स्टेशन बना, तब रायपुर पावर हाउस का काम शासकीय विद्युत विभाग द्वारा किया जाने लगा।

पुराने रायपुर को इन शब्द-दृश्यों में देखना रोचक है- 1790 में आए अंग्रेज यात्री डेनियल रॉबिन्सन लेकी बताते हैं- यहां बड़ी संख्या में व्यापारी और धनाढ्य लोग निवास करते हैं। यहां किला है, जिसके परकोटे का निचला भाग पत्थरों का और ऊपरी हिस्सा मिट्टी का है। किले में पांच प्रवेश द्वार हैं। पास ही रमणीय सरोवर है। पांच साल बाद आए कैप्टन जेम्स टी. ब्लंट, गिनती बताते हैं कि नगर में 3000 मकान थे। नगर के उत्तर-पूर्व में बहुत बड़ा किला है, जो ढहने की स्थिति में है।

सन 1893 का विवरण यायावर बाबू साधुचरण ने दिया है, जिसके अनुसार रेलवे स्टेशन से एक मील दूर पुरानी धर्मशाला से दक्षिण गोल नामक चौक (गोल बाजार) में छोटी-छोटी दुकानों के चार चौखूटे बाजार हैं। गोल चौक से दक्षिण दो मील लंबी एक पक्की सड़क है। जिसके बगलों में बहुतेरे बड़े मकान और कपड़े, बर्तन इत्यादि की दुकानें बनीं हैं। ... प्रधान सड़कों पर रात्रि में लालटेने जलती हैं। ... एक पुराना जर्जर किला देख पड़ता है, जिसको सन् 1460 ई. में राजा भुवनेश्वर देव ने बनवाया था। ... किले के दक्षिण आधा वर्ग मील में फैला महाराज तालाब है। तालाब के बांध के निकट श्रीरामचंद्र का मंदिर (दूधाधारी) खड़ा है। जिसको सन् 1775 में रायपुर के राजा भीमाजी (बिंबाजी) भोंसला ने बनवाया।‘ इस विवरण में कंकाली तालाब, आमा तालाब, तेलीबांधा, राजा तालाब का भी उल्लेख है। कोको तालाब के लिए बताया गया है कि इसमें गणेश चौथ के अंत में गणपति जी की मूर्तियां विसर्जित होती हैं, (ध्यान देने वाली बात कि इसी विवरण-वर्ष यानि 1893 में तिलक ने गणेशोत्सव को सार्वजनिक उत्सव का स्वरूप दिया था।) व्यापार संबंधी जानकारी आई है कि गल्ले, कपास, लाह (लाख) और दूसरी पैदावार की सौदागरी बढ़ती पर है। साथ ही यह भी बताया गया है कि वर्तमान कस्बे के दक्षिण और पश्चिम छोटी नदी के किनारे महादेव घाट तक रायपुर का पुराना कस्बा बसा था।

रायपुर की जनांकिकी की दृष्टि से 2011 की जनगणना में 10 लाख आबादी का आंकड़ा पार यह बसाहट, यही कोई 500 साल बीते, खारुन नदी के किनारे का रायपुरा फैलकर पुरानी बस्ती के साथ रायपुर बनने लगा। कलचुरी आए और राजधानी की नींव पड़ी। अब तक सरयूपारी ब्राह्मण आ चुके थे। राजपूत, पहले कलचुरियों के साथ और बाद में गदर के आगे-पीछे आए। वैश्य, यहां रहते छत्तीसगढ़िया दाऊ बन चुके थे। राजधानी ने अन्य को भी आकर्षित किया। मठपारा, कुम्हारपारा, बढ़ईपारा, अवधियापारा, कायस्थपारा, ढीमरपारा, मौदहापारा, यादवपारा, सोनकर बाड़ा, गॉस मेमोरियल, बूढ़ा तालाब, तेलीबांधा वाले इस शहर में चौबे कालोनी, शंकर नगर, सुंदर नगर और विवेकानंद नगर भी बसा। रजबंधा का शहीद स्मारक, प्रेस काम्प्लेक्स तक सफर तो पूरा अध्याय है।

इसी दौरान अठारहवीं सदी के मध्य में भोंसलों के साथ मराठी परिवार आ गए। अन्य में मोटे तौर पर डॉक्टर, वकील पेशे में और रेलवे के काम में बंगाली आए। रेलवे ठेकेदारी, तेंदू पत्ते और लकड़ी के व्यवसाय के लिए गुजराती आए। बुंदेलखंडी जैनों की बड़ी खेप की आमद मारवाड़ियों के बाद हुई। स्वाधीनता-विभाजन के दौर में सिंधी, पंजाबी आए। रोटी, कपड़ा और मकान के मारे, इन्हीं का व्यवसाय यानि गल्ला-राशन, होटल-रेस्टोरेंट, कपड़े की दूकान और बिल्डर-रियल स्टेट का काम करते, दूसरों को मुहैया कराते, अपने लिए इसका पर्याप्त इंतजाम कर लिया। इस क्रम में टुरी हटरी पर गोल बाजार और सदर फिर इन सब पर मॉल हावी हो गया। शहर अब नवा रायपुर तक फैल कर अटलनगर अभिहित है। उसके आर्थिक परिदृश्य में, व्यवसायिक प्रभुत्व सिंधी-पंजाबी और जैनों का है तो कामगारों में उड़िया और तेलुगू पैठ न सिर्फ नगर, बल्कि घर-घर में बन गई है। नगर में सामान्यतः आपसी भाईचारा बना रहा है, छत्तीसगढ़ी सहज स्वीकार्यता का यह सबल उदाहरण है और इस दृष्टि से रायपुर, राज्य की राजधानी के साथ अपने स्वाभाविक औदार्य में छत्तीसगढ़ का प्रतिनिधि शहर भी है।

पुनश्च- दैनिक भास्कर, रायपुर के 35 स्थापना दिवस पर रायपुर के लिए लिखना था। रायपुर के इतिहास से वर्तमान तक का सफर सीमित शब्दों में लिखना चुनौती जैसा था, यह भी कि अब तक जो लिखा जाता रहा है, उससे अलग और क्या हो सकता है। फिर भी प्रयास किया कि नये-पुराने रायपुर के लिए अपनी समझ को झकझोर कर देखा जाए कि क्या निकलता है, जो बना वह ऊपर है, जो समाचार पत्र में आया, वह आगे है-
(यहां आए पुराने तथ्यों को एकाधिक और यथासंभव मूल-स्रोतों से लिया गया है।डॉ. लक्ष्मीशंकर निगम जी ने उनके लेखन में आई जानकारियों के उपयोग की अनुमति दी तथा हरि ठाकुर जी की सामग्री से कुछ महत्वपूर्ण दुर्लभ जानकारियां, उनके पुत्र आशीष सिंह जी के माध्यम से मिलीं।अपने दौर की जानकारी और उनकी व्याख्या मेरी है।) 


Friday, February 18, 2022

भरदाः एक गांव

16 फरवरी 2022, ग्राम- भरदा, तहसील- बेरला, जिला- बेमेतरा, सहयात्री- श्री वृत्तांत गर्ग

भरदा, खारुन नदी के बांयें तट पर स्थित है। गांव के हाई स्कूल में पर्यावरण और उसमें विशेष रूप से पक्षियों पर चर्चा के लिए सभा का आयोजन किया गया। शाला में दो कक्षाएं नवमी और दसवीं हैं, जिसमें लगभग 80 दर्ज संख्या है। इनमें बालिकाओं की संख्या अधिक है। भवन, फर्नीचर, साफ-सफाई आदि अन्य व्यवस्था अच्छी है। आयोजन के सूत्रधार शाला के शिक्षक श्री विकेश यादव थे। गांव के वरिष्ठ, प्रतिष्ठित नागरिक श्री परगनिहा भी शामिल हुए। प्रधान अध्यापक बैठक में अन्यत्र गए थे। अन्य स्टाफ सर्व सुश्री मिश्रा, यादव, वर्मा की सक्रिय उपस्थिति थी। शाला के विद्यार्थियों के अलावा शाला के पूर्व छात्र और ग्राम के ही माध्यमिक शाला के आठवीं कक्षा के विद्यार्थी भी शामिल हुए।

श्री विकेश ने आयोजन और अतिथियों, अर्थात् श्री वृत्तांत गर्ग और राहुल कुमार सिंह का रोचक ढंग से परिचय दिया। उन्होंने गांव के पर्यावरण और जीव-जंतुओं के बारे में बात करते हुए विशेष रूप से उल्लेख किया कि गांव में कछुए आमतौर पर दिख जाते हैं। इस प्रकार आयोजन की भूमिका के रूप में गांव के पर्यावरण, जीव-जगत की उनकी बातों को विद्याार्थियों ने रुचिपूर्वक सुना। श्री वृत्तांत ने पर्यावरण के महत्व की संक्षिप्त भूमिका के साथ आगामी दिनों में बैकयार्ड बर्ड काउंट के बारे में बताया कि यह किस प्रकार उपयोगी और आवश्यक है साथ ही स्पष्ट किया कि इस दौरान अवलोकन पर ध्यान दें और अपनी जानकारी संभव हो तो फोटो, अन्यथा विवरण तैयार कर लें। मैंने ग्राम के नाम भरदा, साथ के गांव लवातरा की चर्चा के साथ बात आरंभ की, जो दोनों या अन्य भरर, भरुही जैसे नाम लार्क पक्षियों से संबंधित हैं और इन्हें नाइट जार से भी जोड़ा जाता है। पक्षियों के चित्र वाले, पिक्चर पोस्ट कार्ड विद्यार्थियों ने रुचि ली और पक्षियों के पहचान, स्थानीय नाम आदि सभी चर्चाओं में उत्साहपूर्वक भाग लिया। श्री परगनिहा ने गांव और जीव-जंतुओं, पक्षियों की चर्चा की। स्थानीय नाम, उनकी पहचान, आवास, स्वभाव को रोचक ढंग से बताया, जिससे स्पष्ट हुआ कि वे कितनी बारीकी और सजगता से अपने पर्यावरण पर नजर और समझ रखते हैं।

पूरे कार्यक्रम के दौरान विद्यार्थी अनुशासित रहे। उनमें कुछ संकोच अवश्य था, किंतु उत्सुक और सजग थे, ध्यान से सभी बातें सुनते रहे और बातचीत में हिस्सा भी लिया। विकेश यादव जी जैसे सक्रिय और उत्साही व्यक्ति शिक्षक के रूप में किस तरह विद्यार्थियों को पाठ्यक्रम की शिक्षा के साथ जानकारी और ज्ञान के सभी पक्षों के लिए प्रोत्साहित करते हैं, यह उल्लेखनीय है। परगनिहा जी स्कूल, ग्राम विकास, शिक्षा, समाज कल्याण के साथ पर्यावरण के प्रति उत्तरदायित्व महसूस करने वालों में से हैं। वृत्तांत जी शालीन और समझदार हैं, अपनी बात जिम्मेदारी सहित, स्पष्ट रूप से दूसरों के सामने सहज रूप से रखते हैं।

पुल, नदी के दोनों किनारों को जोड़ता है
और कभी इस तरह बांटता भी है.

विभाजक नदी के कारण रायपुर से करीब होने के बावजूद भी यह गांव, पहले दुर्ग जिले में था, अब बेमेतरा में है। जिला मुख्यालय से दूरी, गांव वालों के लिए अड़चन की बात है। अब पुल बन जाने से रायपुर आवागमन आसान हो गया है। कुछ और बातें रोचक मिलीं, जैसे गांव अनंदगांव, आनंद ग्राम। भेरवा ग्राम में भाट चितेरों की चित्रकारी का नमूना, जिनकी परंपरा क्षीण हो रही है और उनकी ओर ध्यान नहीं जाता और भी ऐसी कई बातें। रास्ते में ऐसे बहुत से खेत मिले, जिनमें हरियाली थी। खेतों में पम्प से पानी आ रहा था, कुछ खेतों में नमी थी, तो कई में पानी भरा हुआ था। संभवतः नदी पास होने के कारण भूमिगत जल पर्याप्त है। ऐसे सभी खेत तार घेराबंदी किए हुए थे। यह मवेशियों के प्रबंधन की स्थिति बदल जाने के कारण आवश्यक हो गया है, इस बदली हुई परिस्थिति में रोका-छेंका और गौठान आवश्यक हो गया है। इससे यह स्पष्ट हुआ कि इस क्षेत्र में उद्यमशील और सक्षम किसान हैं, जिसके कारण क्षेत्र धन-धन्य वाला होगा। रास्ते में खारुन नदी के पुल के पहले दाहिनी ओर विस्तृत क्षेत्र में बबूल के पेड़ फैले हुए हैं। नदी का किनारा, थोड़ी नमी और कुछ छाया है और चिड़ियों के लिए कीड़े-मकोड़ों का भरपूर चारा होने के कारण, यह स्थान उनको प्रिय है। दोपहरी धूप और गर्मी के बावजूद यहां लार्क, पिपिट, प्रीनिया, बुश चैट, हुप्पू, कोकल, कौआ, पंडुक, नीलकंठ, ड्रोंगो जैसी चिड़िया सक्रिय थीं और तीतर की पुकार लगातार सुनाई पड़ रही थी।

निषादराज बेनीराम भाट,
जजमान के घर की दीवार पर
चित्र बना कर चले गए हैं,
वापसी में यथामति-यथाशक्ति विदाई स्वीकार करेंगे.

ग्यारहवीं और बारहवीं की पढ़ाई के लिए बच्चे पास के एक बड़े गांव में जाते हैं, उस गांव का नाम है अनंदगांव। हमने जानना चाहा कि यह तो बड़ा सुंदर नाम है, किसने यह नाम रखा, यह कितना पुराना है। बताया गया कि यह नाम पुराना ही है, बल्कि मूल नाम आनंदग्राम था। हमें आश्चर्य हुआ, कि ऐसे नाम का कोई खास कारण? तब बताया गया कि वहां के लोग नैतिक, धर्मप्राण हैं, कथा-वार्ता का आयोजन होता रहता है। सभी जाति के लोग हैं, मिंझरा आबादी, लेकिन भेद-भाव नहीं, आपसी सौहार्द है। झगड़ा-झांसा नहीं होता, कोई मन‘मुटाव हो तो आपस में सुलझा लिया जाता है। बड़े-बुजुर्ग फैसला कर देते थे, वह सब लोग मानते थे। अभी भी वहां लोग अच्छे हैं।

सत्र के दौरान मेरे लिए कई रोचक और मजेदार अवसर बने। इनमें से उदाहरण के लिए एक- पक्षियों के चित्र दिखाते हुए उनकी पहचान, स्थानीय और अंग्रेजी नाम, उनके स्वभाव की बात हो रही थी, विद्यार्थी उत्साह से भाग ले रहे थे। आधे से अधिक कार्ड दिखाए जा चुके थे, तब ब्लैक ड्रोंगो के चित्र वाला कार्ड आया। इस पर जोर दिया कि इसका नाम विद्यार्थियों को बताना है। कोई जवाब नहीं आया। इस पर पूछा कि किसने-किसने यह देखा है साथ ही हम बताने लगे कि अभी आपके गांव आते-आते इन्हें तार पर बैठे देखा है। कई बच्चों सकारात्मक प्रतिक्रिया दे रहे थे, कि वे इससे परिचित हैं, इसे देखा है, मगर नाम नहीं बता पा रहे थे। तब हमने कहा कि इसका नाम तो आपलोगों को ही बताना है, चाहे गलत नाम बताओ, और कि फिर यहां गलत नाम बताने पर नंबर तो कटेंगे नहीं। फिर हमने कहा कि अगर इसका नाम आपलोगों ने नहीं बताया तो आगे कार्ड नहीं दिखाएंगे, दूसरी कोई बात करेंगे, जबकि अभी कई अच्छे सुंदर पक्षियों के कार्ड और हैं। विकेश जी ने भी प्रोत्साहित किया। एक किनारे से खुसफुसाहट हुई और कुछ बच्चे हंसने लगे। हमने कहा कि क्यों हंस रहे हो?, कोई हंसी की बात है तो हम सब लोग हंसेंगे, हमें भी बताओ। तब किसी ने कहा कि ये नाम बता रही है ‘करोना‘। हमने पूछा कि किसने यह बोला, उससे पूछा तो उसने धीमी आवाज में सही स्थानीय नाम बताया, हमने उसे शाबासी दी और अन्य बच्चों को बताया कि वह ठीक बता रही है, इस चिड़िया का नाम कर्राैआं है। इसे कोतवाल भी कहते हैं और फिर कोतवाल चिड़िया की खासियत बताई। सभी बच्चों ने इसका बहुत आनंद लिया।

विद्यार्थियों से पूछने पर कि जिस तरह तुम्हारे गांव कर नाम चिड़िया वाला है, आसपास और कौन सा गांव है, जो किसी जीव-जंतु पर है, एक बालिका ने तुरंत ही जवाब दिया 'भैंसबोड़'। हम भरदा जाते हुए कुछ दूर रास्ता भटककर भैंसबोड़ पहुंच गए थे और इस गांव का नाम हमारे ध्यान में था। जीव जगत के अन्य सदस्यों के आंचलिक-छत्तीसगढ़ी नाम, हिन्दी, अंग्रेजी और वैज्ञानिक नामों की बात होने लगी। हमने बच्चों से यह स्पष्ट करने के लिए उदाहरण लिया मेढक का, बच्चों ने तुरंत बता दिया राना टिग्रीना। यह उदाहरण लेने का एक कारण यह था कि शाला भवन के प्रवेश द्वार के दाहिनी ओर विद्यार्थियों द्वारा बनाए गए चार्ट थे, जिनमें एक चार्ट वैज्ञानिक नामों का था तथा इस चार्ट में सबसे ऊपर यही यानि मेढक-राना टिग्रीना था। ऐसे चार्ट की उपयोगिता रेखांकित हुई। बात आगे बढ़ी। हमलोगों के स्वागत में फूलों का गुलदस्ता था, उनकी ओर ध्यान दिला कर गुड़हल पूछा, जिसे छत्तीसगढ़ी में मंदार भी कहा जाता है, बच्चे नहीं बता पाए, उन्हें बताया गया हिबिस्कस रोजा। फिर गुलदस्ते से ही बात आगे बढ़ी। गुलदस्ते के बोगन वेलिया का फूल दिखा कर उसका नाम पूछने पर कई बच्चों ने एक साथ जवाब दिया- कागज फूल। हमने बोगन वेलिया नाम बताया, इससे कम ही बच्चे परिचित थे। फिर हमने कहा कि विज्ञान मैडम से पूछना कि यह कैसा फूल है? फूल है भी या नहीं, और इसकी खासियत क्या है। इस पर वर्मा मैडम ने अपनी ओर से रोचक सवाल किया कि हम मानव का वैज्ञानिक नाम क्या है? कईयों ने एक साथ जवाब दिया होमो सेपियन। बच्चों से उदाहरण पूछने पर उन्होंने गौरैया, बाम्हन चिराई और स्पैरो तुरंत रच लिया।

सभा के पहले शाला की कक्षाओं का अवलोकन करते हुए हमने ई-क्लास रूम देखा। यहां इतिहास विषय की मिश्रा मैडम क्लास में लैपटाप, मोबाइल और प्रोजेक्शन के माध्यम से बच्चों से रूबरू थीं। कक्षा की बैठक व्यवस्था पारंपरिक कतारवार के बजाय समूहवार थी, ई-क्लास और बैठक व्यवस्था के बारे में उन्होंने हमें बताया। यादव मैडम पूरे आयोजन की पृष्ठभूमि में व्यवस्थाओं में लगी थीं। विद्यार्थी उत्साहित थे, और संवाद-उत्सुक भी। सभी अपनी-अपनी भूमिका अनुरूप सक्रिय रहे।

ई-क्लास रूम और पाठ,
अब बच्चों के लिए अजूबा नहीं रहा.

स्पष्ट हुआ, ऐसा नहीं कि कमियां नहीं हैं, लेकिन नजरिया कि कमियां हमेशा बुराई नहीं होतीं, वे कई बार नई पैदा हुई और कभी समय के साथ बदली परिस्थितियों के कारण बनी आवश्यकताएं होती हैं, इसलिए कमियों को नकारात्मक मानते हुए उनकी उपेक्षा या बचने का नहीं बल्कि इस दृष्टि से उनके प्रति, परिवर्तन या पूर्ति का प्रयास ही श्रेयस्कर है। जिनसे भी मिले, सम-विषम परिस्थितियों के बावजूद वे अपनी भूमिका में सकारात्मक और उद्यमशील थे। हम वापस लौटते हुए अवचेतन में समृद्ध महसूस कर रहे थे, उसके पीछे ऐसी क्या बातें थीं, सोचते हुए अभिव्यक्ति का यह एक प्रयास।

सिंहावलोकन‘ में चिड़ियों पर अन्य पोस्ट के लिंक-