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Monday, September 20, 2021

हरि-रामकथा

राम के नाम पर कुछ ऐसे भी काम हुए हैं, होते रहे हैं, जिनके महत्व के अनुरूप चर्चा नहीं होती, इसका एक कारण ऐसी जानकारी का सार्वजनिक, सहज उपलब्ध न होना है। राम वनगमन पथ की योजना मूर्त रूप ले रही है, तो हमारे सामूहिक-चेतना में बसे राम का स्मरण भी आवश्यक है। इस दृष्टि से छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के आरंभिक दिनों तक स्वधारित उत्तरदायित्व वहन करने वाले मनीषी हरि ठाकुर जी का यह लेख और सूची, उनके पुत्र आशीष सिंह जी की अनुमति से प्रस्तुत है-

छत्तीसगढ़ में रामकथा का विकास
- हरि ठाकुर

छत्तीसगढ़ में रामकथा का विकास अत्यंत प्राचीन काल से हो रहा है। रामकथा के रचयिता आदिकवि महर्षि वाल्मीकि का आश्रम तुरतुरिया में था, ऐसा उल्लेख रायपुर जिला गजेटियर तथा अन्य ग्रंथों में है। कुश तथा लव का जन्म स्थान तुरतुरिया को ही माना जाता है। इसी आश्रम में रामकथा का भी जन्म हुआ, ऐसा मानना अनुचित नहीं होगा। वाल्मीकि रामायण के उत्तरकाण्ड में एक प्रसंग का उल्लेख है। भगवान श्रीराम द्वारा आयोजित राजसूय यज्ञ में वाल्मीकि भी आमंत्रित थे। वाल्मीकि सीताजी के साथ कुश तथा लव को भी अपने साथ अयोध्या ले गये थे। वहां कुशल तथा लव ने वाल्मीकि के आदेश पर रामकथा का गायन किया था। भगवान श्रीराम ने इस कथा गायन की भूरि-भूरि प्रशंसा की थी। वाल्मीकि रामायण के उत्तर काण्ड में ही इस बात के भी संकेत हैं कि इस क्षेत्र में राम कथा की एक लोक शैली भी प्रचलित थी। तात्पर्य यह कि छत्तीसगढ़ ही रामकथा की जन्मभूमि है। रामकथा का विकास यहीं से प्रारंभ होता है। इस तथ्य की पुष्टि में म.प्र. संस्कृत अकादमी के सचिव डा. भागचन्द्र जैन भागेन्दु का यह कथन अत्यंत महत्वपूर्ण है - सम्पूर्ण रामायण वाड.मय का अधिकांश छत्तीसगढ़ केन्द्रित है। रायपुर में वाल्मीकि समारोह आयोजित करने के उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा - रायपुर में आयोजन का ध्येय वाल्मीकि की छत्तीसगढ़ से जुड़ी यादों को पुनस्थापित करना था।

प्रसिद्ध इतिहासकार पार्जीटर, राधाकमल मुकर्जी, पं. लोचन प्रसाद पाण्डेय, ठाकुर जगमोहन सिंह, प्रो. के.डी. बाजपेयी, पं. सुंदरलाल त्रिपाठी, डा. हीरालाल शुक्ल, डा. श्याम कुमार पाण्डेय आदि ने इस तथ्य का समर्थन किया है कि भगवान श्रीराम अपने वनवास काल में एक लम्बे समय तक इस क्षेत्र में रहे और यहीं से होते हुए वे आगे दण्डकारण्य गये। वैसे भी भगवान श्रीराम का इस क्षेत्र से रागात्मक संबंध था। उनकी माता महारानी कौशल्या का जन्म छत्तीसगढ़ में ही हुआ था। छत्तीसगढ़ भगवान श्रीराम का मामा घर है।
राम के महतारी कौसिल्या इहें के राजा के बिटिया।
हमर भाग कइसन हे बढ़िया इहें राम के ममिआरो॥

इस छत्तीसगढ़ी गीत में छत्तीसगढ़ के लोगों के पुरातन लोक-विश्वास की अभिव्यक्ति है। वास्तव में भगवान श्रीराम छत्तीसगढ़ की जनता को राक्षसों के उपद्रव और आतंक से मुक्त कराने आये थे। यही कारण है कि उनके जीवन काल में ही श्री राम छत्तीसगढ़ के लोगों के लिये जन-नायक बन गये थे। अपने मुक्तिदाता का चरित गान करना मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है। निश्चय ही यह चरित गान लोक भाषा में मौखिक रूप से प्रचलित रहा होगा। महर्षि वाल्मीकि ने प्रथम बार इस चरित गायन को संस्कृत भाषा में छन्दोबद्ध किया। इसी ग्रंथ के माध्यम से रामकथा का प्रचार उत्तर भारत में हुआ। छत्तीसगढ़ में रामकथा का लोकभाषा में प्रारंभिक स्वरूप क्या था यह कहना कठिन है। ग्यारहवीं शताब्दी में सारंगढ़ से 35 कि.मी. दूर स्थित पुजारीपाली के एक प्राचीन मंदिर में एक शिलालेख प्राप्त हुआ है। इस लेख के रचयिता महाकवि नारायण थे। इस लेख में महाकवि नारायण द्वारा रचित रामाभ्युदय महाकाव्य की सूचना है। इस महाकाव्य की रचना संस्कृत में हुई थी। इस महाकाव्य के विषय में लिखा गया है कि यह काव्य अत्यंत रसमय और भव्य है। इस काव्य रचना से वाग्देवी इतनी प्रसन्न हो उठी कि वे वीणा बन गयी। दुर्भाग्यवश अभी तक न तो रामाभ्युदय महाकाव्य की पाण्डुलिपि प्राप्त हुई है और महाकवि नारायण के विषय में कोई जानकारी प्राप्त है। पं. लोचन प्रसाद पाण्डेय ने संभावना व्यक्त की है - “This Narayan is stated to be the great-grand father of Vishwanath, the author of Santyadarshan."(कोसल कौमुद्री पृ. 332) तोसगांव (सराईपाली) निवासी गजाधर सतपथी द्वारा महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय को प्रदत्त हस्तलिखित ताड़पत्र पर रामायण ग्रंथ के अंश हैं। यह कितना प्राचीन है, यह अभी निश्चित नहीं किया गया है।

ग्यारहवीं शताब्दी के पश्चात् छत्तीसगढ़ में रामकथा पर आधारित किसी ग्रंथ का उल्लेख नहीं मिलता। लिखा भी गया होगा तो उसकी पाण्डुलिपि उपलब्ध नहीं है। किन्तु, छत्तीसगढ़ में गांव-गांव में रामायण मण्डलियों की स्थापना और रामकथा के गायन की परम्परा निर्बाध रूप से चली आ रही है।

सत्रहवीं शताब्दी में रतनपुर के राजा राजसिंह के आश्रित महाकवि गोपाल ने चार महाकाव्यों की रचना की थी। उनमें से एक महाकाव्य राम प्रताप श्रीराम के चरित पर केन्द्रित है। महाकवि गोपाल की गणना आचार्य कवियों की श्रेणी में की जा सकती है। राम प्रताप महाकाव्य कवि के जीवन काल के अंतिम वर्षों की रचना है। ग्रंथ को पूर्ण करने के पहले ही उनका स्वर्गवास हो गया। उसे उनके सुयोग्य पुत्र कवि माखन ने इस खूबी से पूरा किया कि पता ही नहीं चलता कि इस ग्रंथ का प्रणयन दो कवियों ने मिलकर किया है। इस ग्रंथ में 60 प्रकार के छंदों का प्रयोग किया गया है जो गोपाल महाकवि को आचार्य केशवदास के समकक्ष प्रमाणित करता है।

भारतेन्दु युग के पूर्व छत्तीसगढ़ में आचार्य कवि रघुवर दयाल के तीन ग्रंथों का उल्लेख प्राप्त होता है- 1. राम विनोद 2. रामस्तव 3. रामलीलामृत । रामस्तव ग्रंथ में तीन छंद संस्कृत में तथा हिन्दी के दोहा, सांगृत, कवित्त, सवैया, कुंडलिया, झूलना तथा छप्पय छंदों का प्रयोग किया गया था। सुप्रसिद्ध साहित्यकार बाबू पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी के पितामह उमराव बख्शी द्वारा रचित रामकथा पर आधारित चार ग्रंथ -1. कवित्त रामायण 2. रामायण नाटक 3. जानकी पंचाशिका 4. हनुमन्नाटक उल्लेखनीय है। इसी युग के रतनपुर के महाकवि बाबू रेवाराम ने 1. रामाश्वमेध 2. सार रामायण दीपिका का प्रणयन किया। उनका यह दूसरा ग्रंथ संस्कृत में है। गोविद लाल साव (ग्राम सरिया सारंगढ़) ने सन 1867 में रामचरित मानस का उड़िया भाषा में अनुवाद किया था।

भारतेन्दु युग में ठाकुर भोला सिंह बघेल द्वारा रचित सचित्र ताश रामायण तथा तत्व ज्ञान रामायण उल्लेखनीय हैं। सचित्र ताश रामायण की मूल पाण्डुलिपि मैंने देखी थी। ठाकुर जगमोहन सिंह के प्रिय शिष्य पं. मालिकराम त्रिवेदी (भोगहा) शबरीनारायण निवासी थे। उन्होंने राम वियोग नाटक की रचना की थी महापहोपाध्याय बाबू जगन्नाथप्रसाद भानु का तो रामकथा पर अद्भुत अधिकार था। उन्होंने रामायण प्रश्नोत्तरी, श्रीरामायण वर्णमाला. तथा नवपंचामृत रामायण नामक ग्रंथों की रचना की। उनके दो ग्रंथ तुलसी तत्व प्रकाश तथा तुलसी भाव प्रकाश भी रामचरित मानस पर आधारित हैं। रनतपुर निवासी पं. तेजनाथ शास्त्री ने सन 1895 में संस्कृत में रामायण सार संग्रह नामक ग्रंथ का प्रणयन किया।

द्विवेदी युग तथा उसके बाद राम कथा पर आधारित कई ग्रंथों का उल्लेख मिलता है। पं. शिवशंकर दीक्षित, बिलासपुर ने सन 1914 में कौसल किशोर नामक ग्रंथ की रचना की। डा. बलदेव प्रसाद मिश्र द्वारा रचित तीन ग्रंथ कोशल किशोर, साकेत संत, तथा रामराज्य पर्याप्त प्रसिद्ध हुए। उल्लेखनीय है कि तुलसी दर्शन पर डी. लिट. की उपाधि प्राप्त करने वाले डा. बलदेव प्रसाद मिश्र प्रथम व्यक्ति हैं। पं. शुकलाल प्रसाद पाण्डेय का ग्रंथ मैथिली मंगल, कपिल नाथ कश्यप का वैदेही विछोह तथा पं. सरयू प्रसाद त्रिपाठी मधुकर का सीता अन्वेषण विशेष उल्लेखनीय है। पं. सुंदरलाल शर्मा ने भी छत्तीसगढ़ी में रामायण की रचना की थी, ऐसा सुनने में आया है। दुर्ग के उदय प्रसाद उदय ने छत्तीसगढ़ी में रामचरित नाटक की रचना की है। कपिलनाथ कश्यप ने सम्पूर्ण रामकथा पर छत्तीसगढ़ी में प्रबंध काव्य की रचना की है। इस ग्रंथ के प्रमुख अंशों को छत्तीसगढ़ी हिन्दी साहित्य सम्मेलन ने प्रकाशित किया था। उदयप्रसाद 'उदय' ने रामायण-रश्मि नामक ग्रंथ का भी प्रणयन किया है, जो हाल ही में प्रकाशित हुआ है। छुईखदान के धानूलाल श्रीवास्तव ने रामचरित मानस का छत्तीसगढ़ी में अनुवाद किया है। राजनांदगांव के कविराज शीतल प्रसाद का राम रसामृत तथा यहीं के बाबू बसंत लाल का बसंत रामायण भी उल्लेखनीय है। लक्ष्मीनारायण प्रेस से प्रकाशित एक, छत्तीसगढ़ी रामायण की भी सूचना मिलती है। इनके अतिरिक्त कुंवर दलपत सिंह द्वारा रचित रामयश मनरंजन दो खण्डों में है, ध्रुवराम वर्मा द्वारा अलकरहा रामायण, गजराज बाबू द्वारा रामायणाष्टक, दुर्ग के राधिका रमण दुबे द्वारा शबरी वृत्ति, बालमुकुंद द्वारा सीता स्वयंवर, शिव प्रसाद पाण्डेय द्वारा भक्त निषाद, शंकर प्रसाद अकलतरा द्वारा सार रामायण, श्यामलाल पोतदार, रायगढ़ द्वारा बालकाण्ड का नया जन्म, शुकलाल प्रसाद पाण्डेय द्वारा केवट विनय पं. द्वारिका प्रसाद तिवारी 'विप्र' द्वारा राम-केवट संवाद, श्यामलाल चतुर्वेदी द्वारा राम वनवास ग्रंथ रामकथा पर ही आधारित है। ग्राम सावनी, जिला दुर्ग के लक्ष्मण प्रसाद यादव रचित विचित्र रामायण की सूचना भी प्राप्त होती है। यमुना प्रसाद यादव ने भी छत्तीसगढ़ी में रामायण की रचना की। पं. चन्द्रकांत पाठक का रामभक्ति प्रकाश नामक ग्रंथ प्रकाशित है। उन्होंने संस्कृत में रामचरित महाकाव्यम् नामक ग्रंथ की रचना भी की है किन्तु वह अप्रकाशित ही रह गया। हेमनाथ यदु ने रामचरित मानस पर आधारित छत्तीसगढ़ी में सुन्दरकाण्ड तथा किष्किंधा काण्ड की सुंदर रचना की है। गिरधारी लाल श्रीवास्तव ने भी छत्तीसगढ़ी में रामायण की रचना की है। रामकथा (कुडुख), रामनापिटो (मुरिया) रामना बेसोड़ (दण्डामी मारिया) ग्रंथ मानस प्रकाशन, भोपाल द्वारा प्रकाशित हैं । ये रामकथाएं बस्तर के आदिवासियों में प्रचलित हैं। इसके कुछ अंश छत्तीसढ़ सेवक के गणतंत्र अंक सन् 92 में प्रकाशित हैं। श्री पंचराम सोनी ने छत्तीसगढ़ी में रामकथासार लिखा है। यह अप्रकाशित है।

रामकथा पर आधारित और भी ग्रंथ हो सकते हैं जिनकी सूचना हमें नहीं है। उन्हें भी सूचीबद्ध करने का प्रयास किया जाना चाहिए। ऊपर लगभग 40 ग्रंथों का उल्लेख किया गया है। उनके अतिरिक्त छत्तीसगढ़ी में गाये जाने वाले लोक गाथाओं का भी पता चलता है। ऐसी तीन लोक गाथाओं की चर्चा डा. हीरालाल शुक्ल ने रायपुर में म.प्र. संस्कृत अकादमी द्वारा आयोजित वाल्मीकि समारोह में किया था। हलबी में भी राम कथा पर आधारित एक ग्रंथ का पता चला है। शोध करने पर और भी अधिक ग्रंथों का पता चल सकता है।

रामकथा को लेकर इस क्षेत्र में कुछ महत्वपूर्ण शोधकार्य भी हुए है। डा. बलदेव प्रसाद मिश्र का उल्लेख पहले ही किया जा चुका है। श्रीमती डा. शारदा चंदेल (भिलाई) ने रामचरित मानस तथा अध्यात्म रामायण का तुलनात्मक अध्ययन नामक शोध, प्रबंध पर पी.एच.डी. की उपाधि अर्जित की है। डा. रविशंकर व्यास ने रामकथा में हनुमान जी की भूमि का पर शोध प्रबंध लिखा है। डा. हीरालाल शुक्ल ने अपने महत्वपूर्ण ग्रंथ लंका की खोज में भगवान श्रीराम के इस क्षेत्र में वनवास कालीन प्रवास का विस्तारपूर्वक वर्णन किया है। पं. लोचन प्रसाद पाण्डेय ने महाकवि कालिदास के रघुवंश का हिन्दी में सार प्रस्तुत किया है। पद्मश्री मुकुटधर पाण्डेय ने रामकथा पर आधारित छत्तीसगढ़ी में काव्य प्रस्तुत करने का प्रयास अंतिम वर्षों में किया था। उसका एक अंश राष्ट्र बन्धु साप्ताहिक के सन 1977 के एक अंक में प्रकाशित हुआ था किन्तु, अस्वस्थता के कारण उनका प्रयास अधूरा रह गया। रामकथा भारतीय संस्कृति का आधार प्रस्तुत करती है। रामकथा का प्रचार भारतीय संस्कृति और मानवीय मूल्यों का प्रचार है। रामकथा आज भी हमारे लिये अत्यंत प्रासंगिक हैं।

छत्तीसगढ़ में रामकथा का विकास
रामाभ्युदय महाकाव्य- महाकवि नारायण
१. राम प्रताप- महाकवि गोपाल
२. तास रामायण- ठाकुर भोला सिंह बघेल
३. छत्तीसगढ़ी रामचरितनाटक- उदयराम
४. मैथिली मंगल- शुकलाल प्रसाद पाण्डेय
५. कोशल किशोर- डा. बलदेव प्रसाद मिश्र
६. छत्तीसगढ़ी रामायण- पं. सुन्दरलाल शर्मा
७. वैदेही-विछोह- कपिलनाथ कश्यप
८. राम विवाह- टीकाराम स्वर्णकार
९. राम केंवट संवाद- पं. द्वारिका प्रसाद तिवारी विप्र
१०. राम बनवास- श्यामलाल चतुर्वेदी
११. रामकथा- कपिलनाथ कश्यप
१२. सुन्दर काण्ड- हेमनाथ यदु
१३. किष्किंधा काण्ड- हेमनाय यदु
१४. सीता अन्वेषण- सरयू प्रसाद त्रिपाठी मधुकर
१५. राम वियोग- मालिक राम त्रिवेदी
१६. रामस्तव- रघुबर दयाल
१७. रामविनोद- रघुबर दयाल
१८. रामायण नाटक- उमराव बख्शी
१९. लंका की खोज- डा. हीरालाल शुक्ल
२०. छत्तीसगढ़ी रामायण- लक्ष्मीनारायण प्रेस
२१. रामयश मनरंजन- बैजनाथ प्रसाद
२२. सार रामायण दीपिका- रेवाराम बाबू
२३. रामाश्वमेध- बाबू रेवाराम
२४. केंवट विनय- शुकलाल प्रसाद पाण्डेय
२५. अलकरहा रमायन- ध्रुवराम वर्मा
२६. कवित्त रामायण- उमराव बख्शी
२७. श्री रामायण वर्ण माला- जगन्नाथ प्र. भानु
२८. रामायण प्रश्नोत्तरी - ,, ,, ,,
२९. सीता स्वयंर- बाल मुकुन्द
३०. रघुवंशसार- पं. लोचन प्रसाद पाण्डेय
३१. रामायणाष्टक- गजराज बाबू
३२. साकेत संत- डा. बलदेव प्रसाद मिश्र
३३. रामराज्य
३४ रामायण रश्मि- उदय प्रसाद उदय
३५ भक्त निषाद- शिवप्रसाद काशीनाथ पाण्डेय
३६. राम रसामृत- कविराज- शीतल प्रसाद राजनांदगांव
३७. वसंत रामायण- बसंत लाल बाबू ,, ,,
३८. रामचरित मानस छत्तीसगढ़ी अनुवाद (अप्रकाशित)- धानूलाल श्रीवास्तव छुईखदान
३९. सार रामायण- शंकरप्रसाद अकलतरा
४०. बालकाण्ड का नया जन्म- श्यामलाल पोतदार-रायगढ़
४१. शबरी वृत्ति- राधिका रमण दुबे, दुर्ग
४२. विचित्र रामायण- लक्ष्मण प्रसाद यादव सावनी, दुर्ग
४३. उत्तर रामचरित नाटक (गद्य-पद्य)- उदय प्रसाद उदय
४४. वाल्मीकि रामायण (हिन्दी-बालकाण्ड तथा अयोध्याकाण्ड)
४५. वाल्मीकि रामायण की पुष्पांजलि
४६. पं. चन्द्रकांत पाठक काव्यतीर्थ
४७. रामकथा सार- पंचराम सोनी (पाण्डुलिपि)

इन 47 पुस्तकों की सूची 1990 की डायरी में दर्ज की गई है। डॉ. पंचराम सोनी जी की यहां (पाण्डुलिपि) उल्लेख वाली पुस्तक ‘राम कथा सार‘ शीर्षक से वर्ष 2007 में प्रकाशित हुई। इस पुस्तक भूमिका हरि ठाकुर जी ने 19.12.1995 को लिखी थी। इससे अनुमान होता है कि यह सूची और संभवतः लेख भी 1990-95 के बीच का है।

इस सूची में सरगुजा की एक रामायण पुस्तक और बस्तर की तीन रामकथा पुस्तकें जुड़ती हैं। सन 1992-93 में ‘छत्तीसगढ़ी सरगुजिया गीत नृत्य रामायण‘ प्रकाशित हुई, जिसके संगृहिता लेखक समर बहादुर सिंह देव जी हैं, इस पुस्तक की पहली प्रति तत्कालीन राष्ट्पति शंकरदयाल शर्मा जी को प्रेषित की गई थी, जिसकी प्रतिक्रिया में उन्होंने इस संग्रह को महत्वपूर्ण मानते हुए इसकी प्रशंसा की थी। अंबिकापुर के ही रामप्यारे ‘रसिक‘ की पुस्तिका सरगुजिहा रामायण है। इसी प्रकार सन 1998 में बस्तर की रामकथा के तीन ग्रंथों, हलबी रामकथा, माड़िया रामकथा और मुरिया रामकथा का प्रकाशन मध्यप्रदेश के जनसम्पर्क विभाग से हुआ, जिसके सम्पादक प्रोफेसर हीरालाल शुक्ल हैं तथा हलबी रामायण में उनके नाम के साथ संग्राहक और अनुवादक भी उल्लिखित है। इसके अतिरिक्त छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के पश्चात डॉ. मन्नूलाल यदु जी ने रामकथा पर कई छोटी-बड़ी पुस्तकों का प्रकाशन कराया। श्री प्रहलाद विशाल वैष्णव ‘अचिन्त‘ का तीन भागों में ‘रमाएन‘ क्रमशः 2013, 2015 तथा 2016 में प्रकाशित हुआ है, पुस्तक के शीर्षक के साथ जिसे ‘श्रीराम कहानी छत्तीसगढ़ी पद‘ कहा गया है।

Tuesday, April 12, 2011

बस्‍तर में रामकथा

सन 1998 में रामकथा के तीन ग्रंथों का प्रकाशन मध्यप्रदेश के जनसम्पर्क विभाग से हुआ। क्रम से नाम लें तो हलबी रामकथा, माड़िया रामकथा और मुरिया रामकथा। ग्रंथों के सम्पादक प्रोफेसर हीरालाल शुक्ल हैं तथा हलबी रामायण में उनके नाम के साथ संग्राहक और अनुवादक भी उल्लिखित है। ग्रंथ में छपा है मूल्य : आदिवासियों में निर्मूल्य वितरण। वैसे तो सेंटीमीटर और ग्राम में माप-तौल भी हो सकती है, लेकिन किसी ग्रंथ का ऐसा तथ्‍य-आग्रही मूल्य-महत्व बताना वाजिब नहीं, सो भारी-भरकम इन ग्रंथों का आकार कल्याण के विशेषांक जैसा और पृष्ठ संख्‍या क्रमशः 688, 454 और 644 है।
प्रथम खण्ड माड़िया रामकथा (कोयामाटते रामना पाटा-वेसोड़) लिंगो ना वेहले पाटा (गोंडी रामकथा मंजूषा) के लिए कहा गया है कि यह ''रामकथा'' बस्तर की माड़िया-जनजातियों की वाचिक परम्परा की पुनर्रचना है। यह भी बताया गया है कि बस्तर की माड़िया जनजाति दो वर्गों में विभाजित है- अबुझमाड़ की अबुझमाड़िया, तथा दक्षिण बस्तर की दंडामी माड़िया।

अबुझमाड़िया तथा दंडामी माड़िया यद्यपि जातीय नाम से समान हैं, किन्तु इनकी बोलियां आपस में दुर्बोध हैं। अबुझमाड़िया मुरिया के बहुत अधिक निकट है। कोई भी मुरिया अबुझमाड़िया को आसानी से समझ सकता है, किन्तु किसी दंडामी माड़िया के लिए अबुझमाड़िया एक अबूझ पहेली है।

प्रो. हीरालाल शुक्ल
संपादक ने स्पष्ट किया है कि- ''रामकथा की पुनर्रचना के लिए सबसे पहले मैंने इनके मौखिक साहित्य में व्याप्त रामकथा के संदर्भों का संकलन किया था और तदुपरांत टूटी हुई कड़ियों का तुलसीदास के रामचरितमानस के प्रसंग में ढालने का प्रयास किया।''

ग्रंथ की भूमिका में यह उपयोगी और रोचक स्पष्टीकरण है कि गोंडी की सभी बोलियों में लोकगीत के लिए पाटा शब्द समान रूप से प्रचलित है। लोककथाओं के यहां तीन रूप मिलते हैं-
(क) सामान्य कथा के लिए अबुझमाड़िया में पिटो, दंडामी माड़िया में वेसोड़, तथा दोर्ली में शास्त्रम शब्द प्रचलित है। 
(ख) पौराणिक और धार्मिक कथाओं के लिए दंडामी माड़िया तथा दोर्ली में पुरवान शब्द प्रचलित है, जो पुराण का ही अपभ्रंश प्रतीत होता है।
(ग) दंडामी माड़िया में वेसोड़ किसी कथा का वाचक है, जबकि दोर्ली में यह गीतकथा का उपलक्षक है। दंडामी माड़िया में गीतकथा के लिए पाटा-वेसोड़ शब्द प्रचलित है।

द्वितीय खण्ड मुरिया-रामचरितमानस लिंगोना वेहले पाटा (गोंडी रामकथा मंजूषा) में संपादक के अनुसार वे लगभग तीन दशकों तक मुरिया समाज में रामचरितमानस के गोंडी प्रारूप पर घोटुल के युवक-युवतियों के साथ बैठकर 'पाटा' बनाते रहे। उन्हीं के शब्दों में ''मैं इन युवक-युवतियों को मुरिया गोंडी में रामचरितमानस का अर्थ समझाता और अपने आशु कवित्व के कारण ये शीघ्र पाटा पारने लगते। दो दशक के बाद समूचे रामचरितमानस का इसीलिए (सन 1977 में) मुरिया में अनुवाद संभव हो सका।'' इसके साथ मुरिया रामकथा के 36 लोक-गायकों और 4 गायिकाओं की सूची दी गई है।

हलबी रामकथा की भूमिका में संपादक का कथन है- ''1962 से 1992 के मध्य तीन दशकों तक मेरे द्वारा सम्पादित प्रेरित या लिखित अब तक दर्जनों ग्रंथ प्रकाशित हो चुके हैं, जिनमें रामकथा, गुंसाई-तुलसीदास तथा हलबी-रामचरित मानस (अक्षरशः सम्पूर्ण अनुवाद) उल्लेखनीय है। प्रस्तुत ''हलबी-रामकथा-मंजूषा'' में अब तक अप्रकाशित शेष रचनाओं का संग्रह है।

हलबी रामकथा के संपादकीय का अंश है-
''रामचरितमानस'' भारतीय-साहित्यचो अनुपम गंगा आय। एचो अमरुतचो सुआदके सियान-सजन, माई-पीला पातो एसत। एचो थाहा पाउक नी होय। एचो खोलने, गड़ेयाने डुबकी मारुन गियानचो रतन पाउन-पाउन कितरोय लोग सवकार होते एसत।

ए बड़े हरिकचो गोठ आय कि हलबी 'रामचरित' असन मौंकाने मुर होयसे, जे मौंकाने आमचो देश आजादी चो '50वीं बरिसगांठ' मनाएसे। 'रामचरितमानस' चो लिखलो 500 बरख पूरली।

मके बिसवास आसे कि ए किताबचो अदिक चलन होयदे। बस्तरचो बनवासी-रयतचो सांस्कृतिक भूक बुतातो उवाटने ए पोथी खिंडिक बले साहा होली जाले, आजादीचो 50वीं बरिसगांठ चो भाइग होली समझा।

पश्‍च-लेखः

ऊपर का लगभग पूरा हिस्सा इन ग्रंथों से लिया गया है। अब कुछ अपनी बात। वैसे तो थोड़ा कान खुला रखने वाले हिंदीभाषी के लिए समझना मुश्किल नहीं, फिर भी हलबी वाले पहले पैरा का अनुवाद इस तरह होगा-

रामचरितमानस भारतीय साहित्य की अनुपम गंगा है। इसके अमृत का स्वाद बड़े-बुजुर्ग, अबाल-वृद्ध पाते रहते हैं। इसकी थाह पाई नहीं जाती। इसकी गहराई में उतर कर, डुबकी मार के (लगाकर), ज्ञान का रत्न पा-पाकर कितने ही लोग साहूकार (सम्पन्न) होते रहते हैं।

भाषाई दृष्टि से अर्द्ध-मागधी या पूर्वी हिंदी की एक जबान (यहां तकनीकी-पारिभाषिक प्रयोजन न होने के कारण भाषा, बोली, उपभाषा के बजाय 'जबान' से काम चलाने का प्रयास है) छत्तीसगढ़ी है। छत्तीसगढ़ में छत्तीसगढ़ी के साथ उत्तरी भाग में सरगुजिया और दक्षिण में हलबी स्वरूप, व्यापक और लगभग संपूर्ण संपर्क माध्यम है। पेवर छत्तीसगढ़ी (ठेठ-खांटी छत्तीसगढ़ी में शुद्ध के लिए शायद अंगरेजी 'प्योर' का अपभ्रंश पेवर शब्द प्रचलित है) या मध्य मैदानी छत्तीसगढ़ की जबान में भोजपुरी-मगही स्वाद लिए सरगुजिया (सादों या सादरी सहित) और मराठी महक व उड़िया छौंक वाली हलबी की भाषाशास्त्रीय विविधता रोचक है ही, इनकी वाचिक परम्परा के रस से थोड़ा परिचित होते ही, अरसिक भी इनमें ऊभ-चूभ होने लगता है। अपनी कहूं तो पहली जबान छत्तीसगढ़ी के बाद दोनों मौसियों सरगुजिया और हलबी से परिचित होने पर मुझे मातृभूमि पर सकारण गर्व होने लगा और भारतमाता के समग्र सांस्कृतिक रूप का कुछ अनुमान हो पाया।

त्वरित संदर्भ के लिए यह कि बस्तर अंचल पौराणिक-ऐतिहासिक दण्डकारण्य और महाकान्तार के नाम से जाना जाता था। पूर्व रियासत बस्तर का मुख्‍यालय आज की तरह ही जगदलपुर रहा, वैसे पुरातात्विक प्रमाणयुक्त बस्तर नाम का एक छोटा गांव भी जगदलपुर के पास ही है। रियासत के बाद बस्तर जिला, फिर संभाग बना। फिर उत्तरी बस्तर कांकेर जिला बना और दक्षिणी हिस्सा दंतेवाड़ा। सन 2007 से बीजापुर और नारायणपुर जिलों के गठन के बाद, अब 18 जिलों और 4 संभाग वाले छत्तीसगढ़ राज्य के रायपुर संभाग में 6, सरगुजा में 4, बिलासपुर में 3 तथा बस्तर संभाग में 5 जिले हैं।

कुछेक विद्वान रावण की लंका को बस्तर में ही मानते हैं। बस्तर के भाषाई-सांस्कृतिक सेतु स्वरूप इस ग्रंथ की तैयारी और प्रकाशन के दौरान न सिर्फ इसकी खोज-खबर रही, बल्कि एकाध अवसर पर मैंने सेतुबंध की गिलहरी-सा उत्साह भी महसूस किया था, वह आज रामनवमी पर याद कर रोमांचित हूं।

श्री हरिहर वैष्‍णव द्वारा ई-मेल से बस्‍तर में रामकथा पर प्राप्‍त महत्‍वपूर्ण सूचना (टिप्‍पणी के रूप में प्रकाशित) तथा दो छायाचित्र नीचे लगाए गए हैं -