Thursday, June 11, 2026

कुबेर

आवेदन-पत्र में खाने बने होते हैं- पहला नाम, दूसरा नाम और तीसरा-अंतिम नाम। उपनाम, तखल्लुस या साहित्यिक नाम, इस सबके बाद जोड़ा जाता है और कई बार वही व्यक्ति का पर्याय बन जाता है। प्रसंग यह कि जिन्हें कुबेर सिंह साहू के नाम से जाना था और उनकी कुछ रचनाओं से परिचित और प्रभावित था। फोन पर संपर्क बना। उनकी कुछ किताबों के साथ उन्हें करीब से देख रहा हूं। इन किताबों पर उनका सिर्फ पहला नाम 'कुबेर' है। दो अन्य नाम- भोड़िया और ढोढ़िया, कुबेर के परिचय के साथ आता है जो क्रमशः उनके ग्राम और पोस्ट का नाम है। आपस में मिलते-जुलते लेकिन कुछ अलग से इन नामों पर बरबस ध्यान जाता है। आगे बढ़ने से पहले क्यों न कुछ देर इन पर ठहर लें।

ग्राम-भोड़िया, पोस्ट-ढोढ़िया। जाने क्यों गांवों के ऐसे अजीब नाम प्रचलन में आए होंगे। वैसे अजीब तो वही लगता है, जिससे अपनापा या कम से कम थोड़ा बहुत परिचय न हो। तो आइए, कुबेर के पहले इनसे थोड़ी भेंट-घांट, जान-पहचान का उद्यम करें। भोड़िया, शब्द को तोड़ें तो पहला हिस्सा होगा भोड़, बस इतना करते ही वह छेद, ‘पीप होल‘, दरार बन जाएगी, जहां से भोड़िया का अर्थ खुलते देखा जा सकता है। याद करें छत्तीसगढ़ी का शब्द, भोंड़ा या भोंड़ू, यादि छिद्र। यही ‘भ‘, जो भोंकने-भोंगने यानी छेद करने में है, वह भुलका से भोंगरा हो जाता है। यहां तक पहुंचकर मुझे ‘ताला‘ उत्खनन के दिनों की याद आती है। हम बिल्हा ब्लाक के धौंराभांठा गांव हो कर गुजरते थे और नाम सुनते थे ‘भुलकहा‘। अनुमान किया कि तुर्री नाम वाले गांवों, तुरतुरा या तुरतुरिया की तरह यहां भी जल-सोते का प्रवाह होगा और मौके पर ऐसा ही पाया। इस छोटे से विराम में भटक कर ठहर सकते हैं कि भोड़िया, किसी जल-सोते से जुड़ा नाम होगा। यों भी ग्राम-नाम अधिकतर भू-संरचना, भौगोलिक विशिष्टता, जल, जीव-जंतु और वनस्पति से जुड़ कर बनते हैं।

अब ढोंढ़िया। इस नाम के के साथ सबसे पहले ध्यान जाता है ढोंढ़, ढोंड़ या दोंद पर, जिसका आशय मोटा पाइप है। छत्तीसगढ़ के कई इलाकों में पानी के प्राकृतिक सोते के लिए ढ़ोंढ़ी या झोड़ी शब्द प्रचलन में है, जिसे बांध कर छोटे कुएं का रूप दे दिया जाता है और ओवर-फ्लो पानी रिस कर बाहर बहता रहता है। इसी के पास का शब्द है डोंढ़िया या ढोंढ़िया, ‘पानी वाला सांप‘- ‘डुण्डुभ‘। डोंढ़िया है तो सांप, मगर सीध-साधा, शरीफ, बेचारा-सा। काटे नहीं, काट लिया तो जहरीला नहीं, मेरे बचपन के बड़े साथी कहते थे, ‘डोंढ़िया के चाबे, एक फूंक गांजा बरोबर‘। इसके साथ जिस दूसरे का नाम लिया जाता है, वह है पिटपिटी, नाम से ही पिटा-पिटाया सा।

बरास्ते कुबेर वापस आते हुए, भोड़िया-ढोंढ़िया ग्रामवासियों के समक्ष सादर आग्रह- अपने ग्राम नाम के पीछे आपलोगों की कोई मान्यता हो, बड़े-बुजुर्गों से कुछ सुना हो, आप लोगों ने कुछ सोचा हो तो अवगत कराइएगा, अन्यथा विनम्र प्रस्ताव कि अपने ग्राम नाम और पता-पोस्ट के नाम भोड़िया-ढोंढ़िया के लिए सुझाए उक्त अर्थ को मान्य करने पर विचार कीजिएगा, मेरे लिए आप सब की पहचान पानीदार इलाके के निवासी वाली है।

विश्व कथा-साहित्य में उनकी दिलचस्पी है। उनकी किताब ‘ढाई आखर प्रेम के‘ अंगरेजी की ग्यारह कहानियों का अनुवाद-उल्था है, जिसमें आस्कर वाइल्ड और ओ. हेनरी जैसे ख्यातनाम हैं, तो कम चर्चित कोलिन होवार्ड भी शामिल हैं, मगर न जाने क्यों, बिना परिचय के, जबकि अन्य सभी छह कहानीकारों के साथ उनका परिचय भी है। इनमें भारतीय अंगरेजी कहानीकार- खुशवंत सिंह, आर.के. नारायण, रस्किन बांड हैं, जिन्हें होना ही चाहिए फिर यहां भी आम पाठक के लिए एक कम जाना नाम- ‘चमन नहल‘, जिनकी कहानी शामिल है। वे अपने चेखव की कहानियों के छत्तीसगढ़ी अनुवाद संग्रह ‘चेखव की दुनिया‘ के कारण अधिक जाने गए हैं। मगर उनका अन्य अवदान भी उल्लेखनीय और महत्वपूर्ण है।

कुबेर ने छत्तीसगढ़ी में अनुवाद के अलावा, मौलिक कहानी लेखन किया है, छत्तीसगढ़ी लोक कथाओं का संग्रह, निबंध, आलेख और संस्मरण भी किया है। हिंदी में उनकी कविताओं, कहानी, व्यंग्य संग्रह भी प्रकाशित हैं। उनकी संपादित पुस्तक संगीतकार खुमान साव पर केंद्रित- ‘स्मृतियों के सुवासित पुष्प‘ है। खुमान साव की स्मृतियों को इस तरह संजोना छत्तीसगढ़ की लोक-संस्कृति और संगीत के लिए आवश्यक और महत्वपूर्ण कार्य है। इसी तरह पं सुंदरलाल शर्मा कृत ‘छत्तीसगढ़ी दानलीला‘ की टीका उनके द्वारा की गई है।

खुमान साव, रामचंद्र देशमुख वाले ‘चंदैनी गोंदा‘ के आधार-स्तंभों में से एक थे। देशमुख जी के न रहने पर इस नाम को उन्होंने पूरी गरिमा के साथ जीवन्त रखा। कला-संगीत में अनुशासन और मर्यादा का निर्वाह करते उसे छत्तीसगढ़ की सबसे लोकप्रिय कला-मंडली में से एक बनाए रखा। इसी तरह, पं सुंदरलाल शर्मा कृत ‘छत्तीसगढ़ी दानलीला‘ के कई संस्करण और अनुवाद-टीकाएं प्रकाशित हैं फिर भी इस कृति की टीका-संभावना बनी हुई है। इस बात का ध्यान रखते ‘छत्तीसगढ़ी दानलीला‘ की टीका की गई है। टीका में यथास्थान अलंकार का उल्लेख किया गया है किंतु पदों के अनुवाद या हिंदी अर्थ को भावार्थ कहे जाने का आग्रह-औचित्य, संभवतः यही है कि इसे हिंदी अनुवाद के बजाय टीका कहा गया है। यहां इस बिंदु की ओर ध्यानाकर्षण आवश्यक है, बेहतर होता इस कृति पर अब तक हुए प्रमुख कामों का उल्लेख कर दिया जाता। इसी तरह एक अन्य बिंदु का उल्लेख कि प्राक्कथन में इस खंडकाव्य का रचना काल 1907 ई. बताया गया है। जबकि टीका के अंत में स्पष्ट किया गया है कि द्वितीय संस्करण में 21 जून 1907 का हवाला है। इससे स्पष्ट है कि द्वितीय संस्करण इस तिथि के बाद छपा और प्रथम संस्करण इसके पहले। यह असावधानी अखरने वाली है।

उनके छत्तीसगढ़ी संग्रहों ‘कहा नहीं‘ और ‘भोलापुर के कहानी‘ की कहानियों में लोक-छत्तीसगढ़ की वही सुवास प्रस्फुटित है, जो लेखक के मन में रची-बसी है। इनसे गुजरते हुए उनके अन्य दो संग्रह ‘छत्तीसगढ़ी-कथाकंथली‘ और ‘सुरति अउ सुरता‘ के प्रति मेरी उत्कंठा और बढ़ गई है। उनकी कृतियों से जान पड़ता है कि वे भाषा और भाव में समरस होने वाले, उसे समरस कर देने के उद्यम वाले रचनाकार हैं। उन्हें अपने पठन-पाठन के दौरान रचनाओं से बने मनोभावों को कभी अपनी भाषा तो कभी अपनी भाषा को इतर भाषा में ले जाने का प्रयास होता है। ऐसा अक्सर तब होता है, जब पाठक भाषा की सघनता को तरल करते भाव के रूप में आत्मसात कर पाता है। इस तरह मेरी दृष्टि में कुबेर के रचनाकार में भाव-भाषा के द्वंद्व का समाहार है।

अंत में उल्लेख कि ‘स्मृतियों के सुवासित पुष्प‘ और पं सुंदरलाल शर्मा कृत ‘छत्तीसगढ़ी दानलीला' की उनके द्वारा की गई टीका, इन दोनों पुस्तकों में उन्होंने मुझे भी शामिल करने योग्य माना, एतदर्थ उनके प्रति इस प्रकार अपना आभार भी व्यक्त कर रहा हूं।

Saturday, June 6, 2026

सौंदर्य का राज

‘पुष्पा हंस‘ नाम कभी बचपन में सुना था, माना लिया था कि काल्पनिक होगा, अब खोजबीन में पता लगा कि पिछली सदी के पांचवें-छठें दशक की गायिका-अदाकारा थीं। इतनी नामचीन, कि लक्स के विज्ञापन में भी आती थीं। 

जी हां, लगभग 35-40 साल का दौर ऐसा था कि अभिनेत्री, तब तक टॉप की नहीं मानी जाती थी, जब तक विज्ञापन कर वह यह खुलासा न कर दे कि उसके सौंदर्य का राज ‘लक्स‘ है, जो सौंदर्य और त्वचा की रक्षा करता है। इतने के बाद स्वाभाविक कि ‘लक्स‘ द्वारा खुद से खुद को, चित्र तारिकाओं का सौंदर्य साबुन कहा गया। पुराने जमाने में वे इससे ‘अपनी त्वचा की रक्षा करती‘ और उत्कृष्ट बताई जाती थीं, यह साबुन सौंदर्य रक्षक होता था, सुरैया जैसी गायिका-नायिका आभार व्यक्त करती थीं। लक्स विज्ञापन वाले हेमामालिनी और माधुरी दीक्षित तक के चित्र जेहन में अब भी हैं। हां, तब लक्स टॉयलेट साबुन होता था, यानि कपड़ा धोने से अलग, नहाने का साबुन। अब तो टॉयलेट ‘छिः छिः‘ हो गया है। 

बहरहाल, ‘आदमी वो है, जो मुसीबत से परेशां न हो‘, ‘चांद-सूरज को भी लग जाता है इक बार ग्रहण‘ और ‘ये है दुनिया, यहां दिन ढलता है शाम आती है, सुबह हर रोज नया नया ले के पयाम आती है‘ जैसी पंक्ति वाला, 1950 की सोहराब मोदी की फिल्म ‘शीश महल‘ में पुष्पा हंस का गाया गीत यू-टयूब पर जा कर सुन सकते हैं।

Thursday, June 4, 2026

मन की बात - मल्हार

माननीय प्रधानमंत्री जी ने 31 मई 2026 को मल्हार का नाम लेकर, मानों हम सबके मन की बात कह दी। मल्हार, सदियों-पीढ़ियों से हम छत्तीसगढ़ियों के मन में जो बसा है। माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने कहा- ‘‘हमारी सरकार भारत की ऐसी अमूल्य धरोहरों के संरक्षण के लिए लगातार प्रयास कर रही है। इसी क्रम में ‘ज्ञान भारतम् अभियान‘ के तहत छत्तीसगढ़ के मल्हार में भी एक महत्वपूर्ण खोज हुई है। यहां तीन दुर्लभ ताम्र पट्टिकाएं मिली हैं। ये पांडुवंशी राजवंश के महर्षि बालार्जुन के शासनकाल से जुड़ी मानी जा रही हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि ये inscriptions छठी-सातवीं सदी के हैं यानि चौदह-सौ, पंद्रह-सौ साल पुराने ये ताम्र पट्टिकाएं प्राचीन ब्राह्मी लिपि और पाली भाषा में लिखी गई हैं। इनसे उस समय की शासन-व्यवस्था, धर्म और संस्कृति के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है।‘‘ निसंदेह ‘ज्ञान भारतम्‘ अभियान अमूल्य धरोहरों के संरक्षण की अहम् योजना है। इसी प्रकार इसमें भी कोई संदेह नहीं कि मल्हार के पुरावशेष-ताम्रपत्रों से प्राचीन शासन-व्यवस्था, धर्म और संस्कृति के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है।

इस संदर्भ में मेरा ध्यान इससे मेल खाते उस ताम्रलेख की ओर गया, जो मध्यप्रदेश शासन के आयुक्त, पुरातत्व एवं संग्रहालय की शोध-पत्रिका ‘पुरातन‘ अंक-9, 1994, ‘Art of Chhattisgarh, Spacial Issue‘ में प्रकाशित हुआ है। इसका अध्ययन-प्रकाशन जी.एल. रायकवार तथा राहुल कुमार सिंह यानी मेरे द्वारा किया गया है, अतः स्वाभाविक ही हम उत्साहित हैं, और यह शोधपत्र-लेख प्रस्तुत किया जा रहा है-

महाशिवगुप्त बालार्जुन का 57 वें राज्य वर्ष का जुनवानी (मल्हार) ताम्रलेख
जी.एल. रायकवार 
राहुल कुमार सिंह 

बिलासपुर जिले के प्रसिद्ध पुरातत्वीय स्थल मल्हार ग्राम सीमा के निकट जुनवानी ग्राम स्थित है। प्राचीनता और पुरावशेषों की दृष्टि से जुनवानी मल्हार से अभिन्न ही है। प्राचीनकाल में निश्चय ही निकटवर्ती अन्य ग्रामों बूढ़ीखार, जैतपुर, चकरबेड़ा आदि की भांति जुनवानी भी मल्हार की सीमा में सन्निहित था। ‘जुनवानी‘ शब्द से प्राचीन बसावट का अर्थ ध्वनित होता है। अरपा तथा लीलागर नदी के तटवर्ती भू भाग में स्थित मल्हार ग्राम तथा चतुर्दिक क्षेत्र अत्यंत उर्वर है। इतिहास के आरंभिक काल के अवशेष, यथा- आवासीय संरचना, मृण्मयी सामग्री तथा कलाकृतियाँ इस क्षेत्र से प्राप्त हुई हैं और ईस्वी पूर्व लगभग दूसरी-तीसरी सदी से यह निरंतर राजनैतिक, धार्मिक तथा व्यापारिक गतिविधियों का केन्द्र रहा है। 11-12वीं सदी ई. में कलचुरियों की राजधानी रतनपुर में स्थापित हो जाने के बाद भी मल्हार में तत्कालीन सक्रियता और गतिशीलता के प्रचुर प्रमाण उपलब्ध हैं मल्हार क्षेत्र में मिट्टी का परकोटा युक्त गढ़, अभिलेख, सिक्के, मृण्मयी सामग्री, पात्र व खिलौने, मुहर, लघु फलक, पाषाण प्रतिमाओं तथा मंदिर आदि स्थापत्य संरचनाओं के विविध अवशेष मुख्य हैं। इन प्राचीन अवशेषों में धर्म सहिष्णु स्थिति का बोध, शैव, वैष्णव, बौद्ध जैन, शाक्त धर्म से संबंधित पुरावशेषों से प्रकाशित होता है।

मल्हार क्षेत्र से प्राप्त आरंभिक अभिलेख ब्राह्मी लिपि का प्रतिमा लेख है, जो विष्णु प्रतिमा पर दान के उल्लेख युक्त उत्कीर्ण है, इस काल के अन्य लेख स्मृतिपरक हैं। परवर्ती काल के मेकल के सोमवंशी, शरभपुरीय, कलचुरी आदि राजवंशों के अभिलेख भी यहाँ प्राप्त हुए हैं। श्रीपुर के सोम-पाण्डुवंशी शासकों के अभिलेख तथा महाशिवगुप्त बालार्जुन के ताम्रलेख व शिलालेख भी प्रकाश में आए हैं इस प्रकार यह प्राचीन स्थल पुरावशेषों की प्रप्ति की दृष्टि से अग्रगण्य हैं।

विवरणाधीन यह ताम्रलेख राजमुद्रा व छल्ले में गुंथे तीन पत्र, सन् 1987 के अंत में ग्राम जुनवानी अथवा मल्हार सीमा में कृषकों को प्राप्त हुआ था। जुनवानी के डा. अहमद हसन खान ने इसे कृषकों से प्राप्त कर 18 जनवरी 1988 को मल्हार निवासी, राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित शिक्षक श्री रघुनंदन प्रसाद पाण्डेय को दिया, इसके पश्चात् श्री पाण्डेय द्वारा यह ताम्रलेख रजिस्ट्रीकरण अधिकारी कार्यालय, बिलासपुर में पंजीयन हेतु प्रस्तुत किया गया। स्थानीय पुरातत्व विभाग के अधिकारियों द्वारा आरंभिक उपचार व अध्ययन कर लेख का प्रथम वाचन श्री पाण्डेय को सौंपा गया। यह ताम्रपत्र लेख अब उनकी सहमति से प्रथमतः पूर्ण पाठ सहित सम्पादित किया जाकर प्रकाशित हो रहा है। 

तीन ताम्रपत्रों पर उत्कीर्ण यह लेख राज मुद्रांकित छल्ले में गुँथा है। समान आकार के तीनों पत्रों में प्रत्येक की चौड़ाई 21 से. मी. और ऊँचाई 14.5 से. मी. है। राजमुद्रा का व्यास 9 से. मी. तथा संपूर्ण ताम्रपत्र का मुद्रा सहित भार 2900 ग्राम है। ताम्रपात्र के दायें हाशिये में छिद्र है, जिसमें गुँथे छल्ले के दोनों छोर मुद्रा से जुड़े हैं। मुद्रा के उपरी भाग में त्रिशूल और कमण्डलु के मध्य बैठे हुए नन्दी की आकृति है, इसके नीचे दो पंक्तियों का लेख है। सबसे नीचे पूर्ण विकसित पद्म है।

तीन पत्रों वाले इस लेख में कुल 41 पंक्तियाँ उत्कीर्ण हैं। प्रथम पत्र के बाह्य पार्श्व के मध्य में मात्र एक पंक्ति में तिथि अंकित है। शेष पाँच पृष्ठों पर आठ-आठ पंक्तियाँ उत्कीर्ण हैं, इस दृष्टि से यह लेख महाशिवगुप्त बालार्जुन के अब तक ज्ञात ताम्रपत्र लेखों में सर्वाधिक लम्बा है, साथ ही 57वें राज्य वर्ष के फाल्गुन मास का होने के कारण अद्यतन ज्ञात अंतिम लेख भी है। पेटिकाशीर्ष ब्राह्मी लिपि वाले लेख की भाषा संस्कृत है। अक्षर सुडौल तथा गहराई से खुदे हैं। श्लोकों तथा मुद्रालेख के अतिरिक्त शेष लेख गद्य में हैं। लिपि और अक्षर उत्कीर्णन की परिपाटी महाशिवगुप्त के पूर्व में प्राप्त ताम्रलेखों की भाँति है। लेख का उद्देश्य धार्मिक दान है। इस लेख के स्थान तथा व्यक्ति नाम एवं दान में दी गई भूमि की माप विशिष्ट एवं महत्वपूर्ण है।

लेख में आए स्थान नामों में उणिभोग, शिवगुप्त के पूर्व ताम्रपत्रों में ज्ञात है। कुरपद्रक का अभिज्ञान भी पूर्व के निकट स्थित ग्राम को कोलपदर से किया गया है। पाशिपद्र, सिरपुर के निकट स्थित पासिद है। सकुरपद्रक, इस क्षेत्र (सिरपुर के चतुर्दिक) के सांकरा आदि ग्राम नाम साम्य के आधार पर अनुमानित हैं। बालेश्वर भट्टारक तपोवन, सिरपुर के ही निकट स्थित भालेसर पहाड़ अथवा भालेसर ग्राम है। तुलपद्रक अनिश्चित है।

लेख में शैव धर्म की सोम परंपरा के गुरु-शिष्यों की श्रृंखला पर प्रकाश पड़ता है, जो अत्यंत महत्वपूर्ण है, संभवतः इस राजवंश का ‘पाण्डुकुल‘ नाम सोम दीक्षित होने के पश्चात् ही ‘सोमवंश‘ हुआ होगा। 

ऐसा प्रतीत होता है कि इस लेख द्वारा दान में दी गई भूमि तत्कालीन व्यस्त क्षेत्र में रही होगी, अतः विवाद की संभावना होने से भूमि का माप स्पष्ट किया गया है, जिसके अनुसार पूर्व में नदी (महानदी) के आधे भाग से उत्तर-दक्षिण 7350 हाथ, दक्षिण में पूर्व-पश्चिम 6150 हाथ, पश्चिम में दक्षिण-उत्तर 7000 हाथ, तथा उत्तर में पश्चिम-पूर्व 6350 हाथ भूमि दान दी गई, जिसमें हाथ का मान 24 अंगुल के बराबर स्पष्ट किया गया है, इस प्रकार के उल्लेख के कारण यह लेख अत्धिक महत्वपूर्ण है।
 
दान की तिथि, सम्वत् 57 (राज्यवर्ष) के फाल्गुन मास, कृष्ण पक्ष का द्वादश दिन है। 

मूल पाठ 
           

टीप -

0 इस ताम्रपत्र की जानकारी संस्कृति विभाग, छत्तीसगढ़ शासन द्वारा 2005 में प्रकाशित परिवर्धित ‘उत्कीर्ण लेख‘ में भी शामिल है। साथ ही इन ताम्रपत्रों पर अन्य पुराविदों ने भी अपने महत्वपूर्ण शोध-लेख प्रकाशित किए हैं। जिनमें मुख्य डॉ. सुस्मिता बोस मजुमदार का शोधपत्र है, जो 'KALHAR' (White Water-Lily) STUDIES IN ART, ICONOGRAPHY, ARCHITECTURE AND ARCHAEOLOGY OF INDIA AND BANGLADESH (Professor Enamul Haque Felicitation Volume - 2007) में 'Re-editing the Junwani Copper Plate Inscription of Mahasivagupta Balarjuna, Regnal Year 57' शीर्षक से प्रकाशित हुआ है। इस लेख में हमारे पाठ में कुछ संशोधन सुझाए गए हैं, जो हमें स्वीकार हैं, यद्यपि इस लेख में उनके द्वारा सिरपुर लक्ष्मण मंदिर शिलालेख को Sirpur plates लिखा जाना त्रुटिपूर्ण है। इस लेख में विवेच्य ताम्रपत्र पर पुरालेखों के मूर्धन्य विद्वान डॉ. अजय मित्र शास्त्री के शोधपत्र का हवाला देते यथास्थान उनके द्वारा की गई टिप्पणियां भी महत्वपूर्ण हैं।

0 माननीय प्रधानमंत्री जी के ‘मन की बात‘ के कुछ तथ्य भिन्न हैं, इस संबंध में पुष्टि नहीं हो सकी है कि क्या वहां किसी अन्य ताम्रपत्रलेख की चर्चा है, मगर स्थानीय समाचार-पत्रों में प्रकाशित खबरों के आधार पर अनुमान होता है कि आंशिक भिन्नता के बावजूद ‘मन की बात‘ का ताम्रपत्र, जुनवानी (मल्हार) का उक्त ताम्रपत्र ही है।

0 आवश्यक संदर्भ की दृष्टि से उक्त ताम्रपत्र के पाठ का चित्र ‘उत्कीर्ण लेख‘ के संबंधित पेज से लिया गया है। ध्यातव्य कि प्राचीन अभिलेखों का पाठ, संपादन तथा उसका प्रकाशन दुरूह कार्य है और इसमें पाठ-भेद, अशुद्धियां संभव होती हैं।

0 उक्त ताम्रपत्रों के वर्तमान संधारक श्री संजीव पांडेय (श्री रघुनंदन प्रसाद पाण्डेय के पुत्र) के संग्रह में एक अन्य प्राचीन ताम्रपत्र भी है, जो अन्य प्राप्तियों के आधार पर मेकल के पाण्डुवंशी शासकों के तीन पत्रों के सेट का बिचला पत्र अनुमानित है। नवभारत समाचार पत्र के चित्र में श्री संजीव के साथ बांयें हाथ में विवेच्य ताम्रपत्र और पीछे दाहिने हाथ में वह अकड़ा ताम्रपत्र, जिसका चित्र इस समाचार के साथ अलग से भी है, दिखाई दे रहा है। यह इस आधार पर कह सकता हूं कि ये वही ताम्रपत्र हैं, जिनका अवलोकन श्री रघुनंदन प्रसाद जी ने हमें कराया था।

0 प्रसंगवश सामान्यतः प्राचीन अभिलेखों में शिलालेख निर्माण आदि की सूचना-प्रशस्तियां होते हैं और ताम्रपत्रलेख, जिन्हें ताम्र-शासन भी कहा जाता है, दान के अधिकार पत्र होते हैं। छत्तीसगढ़ में अधिकतर ताम्रपत्रों का काल पांचवीं-छठीं सदी से बारहवीं-तेरहवीं सदी तक का है। इनमें सामान्यतः आरंभिक काल के ताम्र-शासन, शरभपुरीय और पांडु-सोमवंशी शासकों के हैं, तीन पत्रों का सेट होता है, जिसके पहले और तीसरे पत्र का बाहिरी हिस्सा बिना लिखावट का होता है। बीच के प्लेट के दोनों ओर तथा पहले और तीसरे पत्र के भीतरी पार्श्व में लिखावट उत्कीर्णन होता है। परवर्ती काल के कलचुरि ताम्रपत्र, दो पत्रों का सेट होता है, जिसके भीतरी भाग पर लिखावट होती है, ऐसा उत्कीर्ण किए गए अक्षरों को घिसने से बचाने के लिए होता है। ये ताम्रपत्र राजकीय मुद्रा वाले छल्ले से बंधे होते हैं। 

0 ‘ज्ञान भारतम्‘ अभियान के दायरे में मेरी जानकारी में सामान्यतः प्राचीन इस जैसी पुरा-सामग्री, ताम्र-शासन शामिल नही की जाती है। इस ताम्रपत्र की प्रविष्टि सत्यापित है अथवा अस्वीकृत, इसकी जानकारी अब तक के प्रयास में मुझे नहीं मिल सकी है।

0 ‘मन की बात‘ पर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री जी का ‘X‘ पर संदेश 


0 आंचलिक समाचार-पत्र दैनिक भास्कर के संबंधित क्लिप

0 उल्लेखनीय है कि मल्हार पूर्व में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के हैदराबाद सर्किल, विशाखापट्टनम सब-सर्किल में था। सारा कारोबार अंग्रेजी में होता था। तब श्री रघुनंदन प्रसाद पाण्डेय के पिता श्री छेदीलाल पाण्डेय, शिक्षक उस अंचल में ऐसे व्यक्ति थे, जिन्हें अंग्रेजी का अच्छा अभ्यास था। विभागीय अधिकारी-कर्मचारियों के मल्हार आने पर अधिकतर वे ही उनसे वार्तालाप करते थे और मल्हार के पुरावशेषों की सुरक्षा, संरक्षण आदि के लिए संबंधित विभागों, अधिकारियों को अंग्रेजी में लिखा पोस्टकार्ड भेजा करते थे, इस अवसर पर उनके स्तुत्य प्रयास स्मरणीय हैं। जैसा वे बताया करते थे, उन्हीं के प्रयासों से लगभग सन 1936 में पं. लोचन प्रसाद पांडेय जी ने मल्हार मुकाम किया था। तब पातालेश्वर मंदिर टीले में दबा था, मंदिर के प्रवेश-द्वार की नदी-देवियों की पूजा महामाया के रूप में की जाती थी। ग्रामवासियों के श्रमदान से टीले की खुदाई लोचन प्रसाद जी के मार्गदर्शन में कराई गई, जिसके फलस्वरूप वर्तमान पातालेश्वर मंदिर उजागर हुआ। फिर यही परिसर अन्य प्रतिमाओं से संग्रह का स्थल बना। इसी तरह पुरातत्व के लिए ठाकुर गुलाब सिंह, नगर विकास की दृष्टि से ‘मल्हार महोत्सव‘ के आयोजक पं. शंकर चौबे और संगीत-साहित्य के क्षेत्र में रामप्रताप सिंह ‘विमल‘ गुरुजी को नहीं भुलाया जा सकता।

Monday, June 1, 2026

सिरपुर अवलोकितेश्वर

पिछले दिनों ‘हिन्दुस्तान टाइम्स‘ के पेज पर 30 अप्रैल 2026 को शुभम पांडे के अंग्रेजी समाचार का आशय है कि- 20 लाख डॉलर मूल्य की अवलोकितेश्वर की कांस्य प्रतिमा 1939 में लक्ष्मण मंदिर के पास मिले कांस्य की विशाल धरोहरों में से एक इस प्रतिमा को रायपुर के महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय में रखा गया था। यह प्रतिमा संग्रहालय से चोरी हो गई और 1982 तक अमेरिका में तस्करी करके ले जाई गई, और अंततः 2014 तक न्यूयॉर्क में एक निजी संग्रह में पहुंच गई। यही समाचार ‘अमर उजाला‘ के पेज पर ललित कुमार सिंह ने 01 मई 2026 को लिखा कि- अमेरिका ने लौटाई छत्तीसगढ़, रायपुर से चुराई गई कुल कीमत 20 लाख डालर की बेशकीमती ‘अवलोकितेश्वर‘ कांस्य प्रतिमा।

इसी दौरान मई पहले-दूसरे सप्ताह में संग्रहालय के पुरावशेषों के मूल दस्तावेज ‘अवाप्ति पंजियों‘ का दीमक के कारण नष्ट हो जाने की जानकारी भी आई। ऐसी स्थिति में संग्रहालय के पुरावशेषों के मिलान के लिए अवाप्ति पंजी की अन्य प्रति, पुराविदों द्वारा इस संग्रहालय के पुरावशेषों संबंधी शोधपत्र, संग्रहालय के पूर्व प्रकाशनों, लेख, समाचार तथा अन्य संबंधित कार्यालयीन अभिलेख सहायक हो सकते हैं। उक्त अवलोकितेश्वर प्रतिमा, जो रायपुर से चुराई गई बताई जा रही है, के संबंध में जानकारी कि वह कब चोरी हुई थी? चोरी की रिपोर्ट लिखाई गई थी? खोज-बीन के क्या प्रयास हुए थे आदि की जानकारी मुझे अब तक नहीं मिली है। मगर एक स्रोत जिसका हवाला नीचे दिया जा रहा है, सिरपुर की ‘अवलोकितेश्वर पद्मपाणि‘ का उल्लेख तथा चित्र उपलब्ध हुआ है, यदि यह वही प्रतिमा है तो इसका अवाप्ति पंजी क्रमांक-17, दर्शाया गया है।

महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय, रायपुर के पुरावशेषों संबंधी आधारभूत काम यहां सहायक संग्रहाध्यक्ष रहे बालचन्द्र जैन जी ने किया है। उन्होंने 1960 में संग्रहालय के पुरातत्व उपविभाग में संग्रहीत वस्तुओं का सूचीपत्र प्रकाशित कराया था, जिसका भाग 3, धातु-प्रतिमाएं हैं। 

उक्त सूचीपत्र-पुस्तिका में बताया गया है कि रायपुर स्थित महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय में संग्रहीत पुरातत्त्व सामग्री के विवरणात्मक सूचीपत्र प्रकाशित करने की योजना के अनुसार (१) प्रागैतिहासिक वस्तुओं, (२) पाषाण प्रतिमाओं, (३) धातु प्रतिमाओं, (४) मृण्मूतियों, (५) सिक्कों, (६) उत्कीर्ण लेखों, (७) हस्तलिखित पोथियों और (८) शस्त्रास्त्र तथा अन्य फुटकर सामग्री के अलग अलग सूचीपत्र तैयार किये जा रहे हैं जिन में यथोक्त प्रकार की कला सामग्री के विषय में विस्तार से विवरण दिये जायंगे। प्रस्तुत सूचीपत्र इस माला का तीसरा ग्रन्थ है। इस में संग्रहालय के संग्रह की समस्त धातु प्रतिमाओं को सम्मिलित किया गया है। माला का दूसरा ग्रन्थ जिस में पाषाण प्रतिमाओं का विवरण है, इसके साथ ही अलग से प्रकाशित हो रहा है। अन्य सूचीपत्र यथासमय प्रकाशित होंगे। 

पुस्तिका की विषय सूची क्रम में- 

एक - बौद्ध प्रतिमाएं, जिसके अंतर्गत सभी 11 सिरपुर से प्राप्त 1. तथा 2. भूमिस्पर्शमुद्रा में बुद्ध 3. वरदमुद्रा में बुद्ध 4. अवलोकितेश्वर पद्मपाणि 5., 6. तथा 7. पद्मपाणि 8. वज्रपाणि 9. तथा 10. मंजुश्री 11. तारा का विवरण, प्रकाशन संदर्भ सहित दिया गया है।
दो - वैष्णव प्रतिमाएं, जिसके अंतर्गत 12. स्थानक विष्णु, फुसेरा। 
तीन - शैव प्रतिमाएं, जिसके अंतर्गत 13. गौरी, सलखन 14. गणेश नन्दौर खुर्द। 
चार - विविध, जिसके अंतर्गत 15. घण्टा का विवरण है। 
परिशिष्ट - 
(क) सिरपुर से प्राप्त अन्य धातु प्रतिमाएं अंतर्गत जानकारी दी गई है। 
(ख) सलखन से प्राप्त अन्य धातु प्रतिमाएं अंतर्गत जानकारी दी गई है। 
(ग) सिरपुर की धातु प्रतिमाओं की प्रदर्शिनी अंतर्गत 1952 में जबलपुर, 1954 तथा 1956 में नागपुर, 1956-57 में दिल्ली, पटना, वाराणसी, मद्रास, बैंगलोर, बम्बई, बौद्ध कला प्रदर्शिनी, 1957 में इन्दौर, 1958 में रायपुर तथा 1959 में विल्ला ह्यूगेल और जूरिच, सूचीबद्ध है। 

साथ ही निर्देश ग्रंथ, शीर्षक के अंतर्गत कला-प्रतिमाशास्त्र के दस प्रमुख ग्रंथों की सूची है। 

पुस्तिका में दस चित्र फलक भी प्रकाशित हैं। 

इस संदर्भ के साथ विचारणीय, अवलोकितेश्वर प्रतिमा की अमरीका से वापसी की खबरों में- 

# जारी किया जा रहा अवलोकितेश्वर का चित्र, इस सूत्रीपत्र के ‘अवलोकितेश्वर पद्मपाणि‘ चित्र से मेल नहीं खाता! 

# प्रतिमा का मूल्य 19 या 20 करोड़ डालर बताया जा रहा है, इस मूल्यांकन का आधार क्या है? क्या सह मूल्य किसी अधिकृत स्रोत की जानकारी के आधार पर बताया जा रहा है, स्पष्ट नहीं है! 

# रायपुर के महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय से प्रतिमा की चोरी का वर्ष 1982 बताया जा रहा है, जबकि 1982 के दौरान ऐसी कोई घटना, पुरातत्व विभाग में इस अंचल में पदस्थ अधिकारियों अथवा पुराविदों की स्मृति में नहीं हुई थी, यह भी उल्लेखनीय है कि गत माह संग्रहालय की अवाप्ति पंजी के दीमक द्वारा नष्ट किए जाने की जानकारी भी सार्वजनिक हुई है, क्या संग्रहालय के अभिलेखों में इस चोरी-गुमशुदगी का विवरण है? क्या तब कोई प्राथमिकी, आपराधिक प्रकरण बना था, उप पर किसी प्रकार की कार्यवाही की जानकारी मिलती है?

इस प्रकार अवलोकितेश्वर प्रतिमा की वापसी अपने साथ ऐसे कई अनुत्तरित प्रश्न भी साथ ला रही है।

पुनश्च-

# श्री मुनि कान्तिसागर की 1953 में प्रकाशित पुस्तक ‘खण्डहरोंका वैभव‘ में सिरपुर के कांस्य प्रतिमाओं की प्राप्ति तथा 16 सितंबर 1945 को इन्हें देखने का उल्लेख किया है।

# मोरेश्वर जी. दीक्षित ने ‘बुलेटिन आफ द प्रिंस आफ वेल्स म्यूजियम आफ वेस्टर्न इंडिया‘ नं.-5, 1955-57 में ‘सम बुद्धिस्ट ब्रांजेस फ्राम सिरपुर, मध्यप्रदेश‘ लेख में चार अवलोकितेश्वर का उल्लेख करते हुए नीचे दिखाए गए चित्र प्रकाशित कराया, जिसमें 3ए कुमारदेव अभिलिखित, रायपुर संग्रहालय की, 3बी को उत्कृष्ट, 4ए द्रोणादित्य अभिलिखित तथा 4बी को भी रायपुर संग्रहालय की बताया है।


# महेशचन्द्र श्रीवास्तव, रायपुर संग्रहालय के प्रभारी रहे हैं, उन्होंने एम.जी. दीक्षित द्वारा कराए गए सिरपुर उत्खनन प्रतिवेदन के आधार पर पुस्तक ‘सिरपुर‘ लिखी, जो 1984 में मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रन्थ अकादमी से प्रकाशित हुई है। सिरपुर की धातु प्रतिमाओं और इनका संग्रहालय के लिए अवाप्त किया जाना के साथ चोरी की जानकारी वाला इस पुस्तक अंश नीचे दिया जा रहा है-

ऐसा कहा जाता है कि 1939 में लक्ष्मण मन्दिर के समीप पत्थर खोदते समय श्रमिकों को अचानक इन मूतियों का एक विशाल संग्रह प्राप्त हो गया। ये मूर्तियाँ लगभग 60 थीं और लगभग 6 वर्ष तक ये भीखम बाबा नामक पुजारी के पास पड़ी रही और तत्पश्चात् वे 1945 में स्थानीय मालगुजार श्री श्याम सुन्दरलाल के अधिकार में आ गई। उनमें से जो मूर्तियाँ गन्धेश्वर मन्दिर के तत्कालीन पुजारी श्री मंगल गिरि गोस्वामी को दे दी जो बाद में मुनि कान्ति सागर को प्राप्त हो गई। इन मूर्तियों संबंधी विवरण श्री मुनि कान्ति सागर ने अपनी पुस्तक "खंडहरों का वैभव" में प्रकाशित करवाया है। इन मूर्तियों में से तीन मूर्तियां श्री मुनि कान्ति सागर को प्राप्त हुयी थीं जिसमें से एक उन्होंने भारतीय विद्याभवन बम्बई भेज दी थी।

इसके पश्चात् दो मूर्तियाँ नागपुर के संग्रहालय में तथा और चार रायपुर संग्रहालय में अवाप्त हुयीं। सिरपुर में प्राप्त उक्त विशाल संग्रह की प्रतिमायें अन्य व्यक्तियों के अधिकार में चली गई। 1956 में डा. एम. जी. दीक्षित ने पुनः कुछ व्यक्तियों से पाँच प्रतिमायें प्राप्त की जो रायपुर संग्रहालय में भेज दी गई। कुछ प्रतिमायें डा. दीक्षित को सिरपुर के उत्खनन में भी प्राप्त हुयीं।
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इन मूर्तियों में से निम्नलिखित ग्यारह मूर्तियां रायपुर संग्रहालय की हैं।

1-2. भूमि स्पर्श मुद्रा में बुद्ध, 3. वरद मुद्रा में बुद्ध, 4. अवलोकितेश्वर पद्मपाणि, 5-6-7. पद्मपाणि, 8. वज्रपाणि, 9-10. मंजुश्री, 11. तारा

इसके अतिरिक्त स्थानक विष्णु, जो कि सिरपुर के समीप जंगल से प्राप्त हुए हैं, भी रायपुर संग्रहालय में संग्रहीत हैं। परन्तु खेद का विषय है कि इन प्रतिमाओं में से पाँच प्रतिमायें संग्रहालय से चोरी चली गई हैं।

निष्कर्ष-

‘बुलेटिन आफ द प्रिंस आफ वेल्स म्यूजियम आफ वेस्टर्न इंडिया‘ में आई जानकारी के आधार पर स्पष्ट होता है कि उक्त में से चित्र 4ए द्रोणादित्य अभिलिखित कांस्य प्रतिमा, इसके प्रकाशन 1955-57 तक रायपुर संग्रहालय में रही है। 1960 में प्रकाशित सूचीपत्र में सिरपुर की 11 धातु प्रतिमाओं की जानकारी है, इसका तात्पर्य कि वे सभी इस समय तक भी संग्रहालय में थीं। 1984 में प्रकाशित ‘सिरपुर‘ की जानकारी के अनुसार इन 11 में से पांच प्रतिमाएं चोरी चली गईं, अर्थात् विवेच्य प्रतिमा की चोरी 1960 से 1984 के बीच हुई होगी और इसके पश्चाात संग्रहालय में सिरपुर कांस्य प्रतिमाओं में से शेष 6 सुरक्षित होंगी। अब जो चित्र समाचारों के साथ आए हैं, वे 1960 में प्रकाशित सूचीपत्र के सरल क्रमांक ६ पद्मपाणि, चित्र फलक - चार (क)(अवाप्ति पंजी क्रमांक 3768) से मेल खाते हैं, इससे प्रतीत होता है कि संख्या और नामकरण में एकाधिक- अवलोकितेश्वर/अवलोकितेश्वर पद्मपाणि/पद्मपाणि के कारण विवेच्य प्रतिमा के साथ भ्रम की स्थिति बन रही है।

Sunday, May 31, 2026

पुरातत्व-प्रजागरण

0 हमारे लिए यह गौरव का विषय है कि 1875 में स्थापित रायपुर का महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय, देश के सबसे पुराने दस संग्रहालयों में से एक है। साथ ही यह निजी भागीदारी से बना देश का पहला संग्रहालय है। अब इसकी स्थापना का डेढ़ सौ वर्ष पूरा हो गया है। मगर संग्रहालय का मूल ‘अष्टकोणीय भवन‘ निजी आधिपत्य में फंसा है।

0 इस संग्रहालय में पंद्रह हजार से भी अधिक पुरावशेष संग्रहित हैं, जिनमें बड़ी संख्या में सोने, चांदी और विभिन्न धातुओं के सिक्के हैं। प्राचीन प्रतिमाओं के साथ-साथ, प्राचीन ताम्रपत्रों, शिलालेखों और सिरपुर से प्राप्त विश्वप्रसिद्ध कांस्य प्रतिमाओं का उल्लेखनीय संग्रह है। डेढ़ सौ वर्षें पूरे होने के बावजूद यह संग्रहालय अब तक ‘इंटरनेशनल काउंसिल आफ म्यूजियम्स’ या ‘म्यूजियम एसोसिएशन आफ इंडिया‘ का भी सदस्य नहीं बन पाया है।

0 अप्रैल-मई 2026 में राष्ट्रीय समाचार पत्रों में खबर छपी कि- अमेरिका ने लौटाई छत्तीसगढ़, रायपुर से चुराई गई कुल कीमत 20 लाख डालर की बेशकीमती ‘अवलोकितेश्वर‘ कांस्य प्रतिमा। ... 20 लाख डॉलर मूल्य की अवलोकितेश्वर की कांस्य प्रतिमा 1939 में लक्ष्मण मंदिर के पास मिले कांस्य की विशाल धरोहरों में से एक इस प्रतिमा को रायपुर के महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय में रखा गया था। यह प्रतिमा संग्रहालय से चोरी हो गई और 1982 तक अमेरिका में तस्करी करके ले जाई गई, और अंततः 2014 तक न्यूयॉर्क में एक निजी संग्रह में पहुंच गई।

0 जरूरी प्राथमिक काम, प्रभारी अधिकारी द्वारा पुरावशेषों का भौतिक सत्यापन और पुरावशेषों के चार्ज आदान-प्रदान होना अत्यावश्यक है, जबकि इन कामों से जुड़े अधिकारी की सेवानिवृत्त हो चुके हैं, या निकट भविष्य में होने वाले हैं। पुरावशेषों का प्रभार पिछले बीस साल से एक ही अधिकारी के पास है। मगर पुरावशेषों का मिलान-जांच उनके द्वारा नहीं किया गया है। 06 मई 2026 को प्रभारी अधिकारी द्वारा बताया गया कि संग्रहालय के पुरावशेषों के रिकार्ड पांच अवाप्ति पंजी को दीमक खा गए।

संक्षेप में-
0 राष्ट्रीय स्तर का यह संग्रहालय राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय संगठनों की सदस्यता लेगा?
0 संग्रहालय का मूल शासकीय अष्टकोणीय भवन बेजा-कब्जा मुक्त होगा?
0 अलोकितेश्वर प्रतिमा पर दावा के लिए हमारे पास क्या रिकार्ड है?
0 संग्रहालय के पुरावशेषों का मिलान-सत्यापन पिछले वर्षों में क्यों नहीं किया गया, जबकि पुरावशेषों के प्रभारी अधिकारी स्वयं लिखते रहे हैं कि पुरावशेष लापता हुए हैं और अब उनकी ओर से लिखा गया कि रिकार्ड्स को दीमक खा गया, यह किसकी लापरवाही/जिम्मेदारी है? किसी पर कोई कार्यवाही अब तक हुई है? और अब ऐसी स्थिति में पुरावशेषों को किस तरह बचाया जा सकता है।

उपरोक्त अद्यतन स्थिति की पृष्ठभूमि के लिए नीचे एक टीप दी जा रही है, इस टीप का आधार उल्लिखित बैठक में मेरे द्वारा कही गई बातें हैं, ऐसी बैठकों में कही गई बातें आई-गई हो जाती हैं, मिनिट्स नहीं आते या आते भी हैं तो आयोजकों की अनुकूलता अनुरूप। इसलिए अपनी बात मैंने रिकार्ड की और उसके आधार पर वस्तुस्थिति, समस्या, सुझाव लिखित रूप में प्रेषित किया, वही टीप यहां प्रस्तुत है, जिसका आशय-विवरण स्वयं स्पष्ट है, इस टीप के साथ आडियो का लिंक यहां है, जिसमें मेरे साथ श्री विनोद वर्मा और श्री विवेक आचार्य की आवाज है-

‘कला, पर्यटन, पुरातत्व और संस्कृति संवर्धन‘ टास्क फोर्स के लिए टीप 

विषय-‘कला, पर्यटन, पुरातत्व और संस्कृति संवर्धन‘ टास्क फोर्स की बैठक श्री विनोद वर्मा की अध्यक्षता तथा विभागाध्यक्ष संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग श्री विवेक आचार्य के संयोजकत्व में दिनांक 14 जुलाई 2021 को आयोजित हुई। बैठक में मेरे द्वारा दिए गए सुझाव तथा संबंधित बिंदुओं पर टास्क फोर्स के प्रतिवेदन के लिए टीप। 

प्रस्तावना- राज्य योजना आयोग के अंतर्गत ‘कला, पर्यटन, पुरातत्व और संस्कृति संवर्धन‘ के संबंध में गठित टास्क फोर्स के आदेश दिनांक 01.06.2021 तथा टास्क फोर्स की आंतरिक बैठक दिनांक 28 जून 2021 के प्रपत्र में पुरातत्व संबंधी बिंदु मुख्यतः इस प्रकार हैं-

छत्तीसगढ़ के पुरातत्व व संस्कृति के संरक्षण, परिरक्षण एवं विकास हेतु सुझाव। पुरातात्विक महत्व के स्थलों एवं वस्तुओं/मूर्तियों आदि की सूची तैयार करना। प्रत्येक जिले के वैशिष्ट्य को दर्शाने वाले संग्रहालय। संग्रहालय से लोगों को जोड़े जाने के उपाय आदि। 

वर्तमान स्थिति- छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के 21 वर्ष हो गए हैं। राज्य की ‘कला, पर्यटन, पुरातत्व और संस्कृति संवर्धन‘ का पुनरीक्षण करते हुए भविष्य की योजनाएं, जिनका क्रियान्वयन आसानी से हो सके, पर विचार किया जाना आवश्यक है। वर्तमान में संस्कृति एवं पुरातत्व संबंधी कार्यों का संपादन विभागीय स्तर पर मुख्यतः एक संचालनालय / मुख्यालय तथा जगदलपुर एवं बिलासपुर संग्रहाध्यक्ष कार्यालय के माध्यम से होता है। 

पृष्ठभूमि- अविभाजित मध्यप्रदेश में संस्कृति से संबंधित कार्य-गतिविधियां संस्कृति विभाग के अंतर्गत स्थापित विभिन्न परिषद, अकादमियों, केंद्र/पीठ के माध्यम से होती थीं। विभाजन में इसमें से छत्तीसगढ़, भिलाई में स्थापित पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी सृजन पीठ तथा संस्कृति-गजेटियर का सीमित स्टाफ, छत्तीसगढ़ के हिस्से आया। छत्तीसगढ़ में संस्कृति और पुरातत्व (आरंभ में पर्यटन भी) का एक ही संचालनालय गठित हुआ और इस संबंधी समस्त कार्यों-गतिविधियों का संपादन संस्कृति के सीमित स्टाफ और पुरातत्व के मूलतः संग्रहाध्यक्ष, पुनः उपसंचालक कार्यालय, जो महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय में स्थापित था, तदर्थ रूप से संचालनालय, विभागाध्यक्ष कार्यालय बना कर किया जाने लगा। इस क्रम मंे पुरातत्व के स्टाफ पर भी अधिकतर संस्कृति के कार्यों की जिम्मेदारी बनी रही। राज्य गठन के पश्चात संस्कृति और पुरातत्व के क्षेत्र में उपलब्धियों के समानांतर यह तदर्थ व्यवस्था अब भी है।

कार्य-योजना- दीर्घकालीन योजनाओं, नीतिगत निर्णय, विशाल निर्माण की प्रतीक्षा के बजाय उपलब्ध संसाधनों की सीमा के अनुरूप ही कार्य-गतिविधियां शीघ्र आरंभ किया जाना आवश्यक है। 

0 देश के सबसे पुराने संग्रहालयों में से एक रायपुर के महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय के लिए इंटरनेशनल कौंसिल आफ म्यूजियम्स, इंडिया ‘आइकाम‘ की सदस्यता ली जाय। इससे राज्य के पुरातत्व और प्राचीन कला-संस्कृति के अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नियमित उपस्थिति प्रभावी होगी। तथा जिसके अभाव में अत्यंत महत्वपूर्ण और पुरानी संस्था होने के बावजूद भी यह संग्रहालय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान में पिछड़ जाता है। आइकाम, इंडिया की सदस्यता, संक्षिप्त कागजी औपचारिक कार्यवाही से ली जा सकती है।

0 रायपुर संग्रहालय के पुरावशेषों का पिछले कई वर्षों से लंबित वार्षिक भौतिक सत्यापन, पंजियों-नस्तियों के आधार पर कराया जाना अत्यावश्यक है, जो संग्रहालय प्रबंधन की बुनियादी आवश्यकता है। राज्य के 150 वर्ष पुराने इस संग्रहालय से वस्तुएं गुम होने की शिकायत हुई है, इसके बावजूद भी भौतिक सत्यापन नहीं कराया जा सका है। उल्लेखनीय है कि संग्रहालयों की अवाप्ति पंजी सबसे महत्वपूर्ण अभिलेख होता है, जिसकी दो प्रतियों में से एक प्रति संग्रहालय कार्यालय में और दूसरी प्रति विभागाध्यक्ष कार्यालय में रखी जाती है, इसमंे किसी भी प्रविष्टि की जानकारी शासन को भी दी जानी चाहिए, अथवा वार्षिक भौतिक सत्यापन प्रमाण-पत्र शासन को प्रेषित किया जाना चाहिए।

0 विभागीय संग्रहालय बिलासपुर और जगदलपुर के संग्रहाध्यक्षों द्वारा गत 5 वर्षों में किए गए कार्यों की जानकारी लेते हुए नियमानुसार भौतिक सत्यापन प्रतिवर्ष कराया जाना सुनिश्चित किया जाए। यह व्यवस्था जिला पुरातत्व संघ के संग्रहालयों के लिए भी हो। उल्लेखनीय है कि लगभग 40 वर्ष पुराने बिलासपुर संग्रहालय का अब तक कोई विभागीय भवन नहीं है।

0 सक्षम-सक्रिय क्षेत्रीय पुरातत्व कार्यालय विकसित किया जाना आवश्यक है। वर्तमान रायपुर मुख्यालय और बिलासपुर, जगदलपुर कार्यालय के साथ अंबिकापुर, रायगढ़ और राजनांदगांव में सक्षम कार्यालय स्थापित-विकसित करना प्राथमिक आवश्यकता है। इन तीनों स्थानों में वर्तमान में विभाग/जिला पुरातत्व संघ के भवन उपलब्ध हैं।

0 राज्य में लगभग डेढ़-पौने दो हजार पुरावशेष निजी आधिपत्य में तथा विभाग द्वारा पंजीकृत हैं। इनसे संबंधित दस्तावेज व्यवस्थित, सुरक्षित रखना, सार्वजनिक करना तथा पुरावशेषों का भौतिक सत्यापन आवश्यक है। 

0 अध्येताओं, शोधार्थियों, विशेषज्ञों के लिए उनकी वरिष्ठता, प्रतिष्ठा और परियोजना के अनुरूप संग्रहालय के पुरावशेषों के अवलोकन की व्यवस्था, पुरावशेषों से संबंधित जानकारी, फोटोग्राफ आदि उपलब्ध कराया जाना सुनिश्चित किया जाय। (परिशिष्ट ‘अ‘ एवं ‘ब‘) 

0 संग्रहालय में पुरातत्व संबंधी विशेष व्याख्यान का आयोजन साथ ही इस माह के प्रादर्श जैसे शीर्षक से प्रति माह/त्रैमासिक विशेष प्रदर्शनी का आयोजन किया जाय, जिसमें सिरपुर कांस्य प्रतिमाएं, सिक्के, अभिलेख, अन्य विशिष्ट पुरावशेष आदि का प्रदर्शन विशेष गाइड सुविधा सहित हो। इसका कैलेंडर बनाकर उसका प्रचार-प्रसार राष्ट््रीय स्तर पर किया जाए, जो छत्तीसगढ़ के पुरातात्विक कलात्मक वैभव की छवि स्थापित करने, निखारने में सहायक होगा। पुरातत्व संबंधी वृत्तचित्र प्रदर्शन, संगोष्ठी का आयोजन तथा विभागीय उत्खनन-सर्वेक्षण के नियमित कार्यों और उनके स्वतंत्र प्रकाशन के साथ-साथ विभागीय शोध पत्रिका ‘कोसल‘ का नियमित प्रकाशन एवं विभागीय वेबसाइट पर शोध, उपयुक्त सूचनाओं का उपलब्ध कराया जाना। उल्लेखनीय है कि ‘कोसल‘ के कुशल-सक्षम संपादन और प्रयासों से वह यूजीसी केयर सूची में शामिल था, जो निरंतर नहीं रह पाया, और अब यह स्थिति है कि इसका प्रकाशन समय से नहीं हो पा रहा है।

0 संरक्षित स्मारकों पर अनिवार्यतः पर्यटकों की जानकारी दर्ज की जाए, किंतु स्मारक के महत्व का आंकलन पर्यटकों की संख्या के आधार पर नहीं, बल्कि उसकी प्रावीनता, कला-इतिहास में उसके महत्व के आधार पर निर्धारित किया जाय। पर्यटक-सुविधाओं की आवश्यकता और उससे संबंधित कार्य, अनिवार्यतः पुरातत्वीय मानकों के अनुरूप हो। 

0 संरक्षित स्मारकों और उसके आसपास के आधुनिकीकरण, सौंदर्यीकरण, पर्यटक सुविधा जैसे कार्यों की अपेक्षा स्मारकों की सुरक्षा और संरक्षण प्राथमिकता है। अन्य सभी कार्य पुरातत्चीय मानकों के अनुरूप किया जाना चाहिए। कार्य बैठक में हुई चर्चा अनुरूप, स्मारकों पर व्यय राशि का उक्त दृष्टिकोण से आनुपातिक संतुलन रखा जाना अत्यावश्यक है। यह ध्यान रहे कि पुरातत्व का क्षेत्र मूलतः विकास-निर्माण का नहीं मुख्यतः खोज, शोध, सहेजने-संभालने वाला होता है। स्मारक और पुरावशेष अपनी आवश्यकता खुद नहीं बता सकते, न ही शिकायत कर सकते इसलिए इस क्षेत्र में विचार और कार्य के लिए अतिरिक्त संवेदनशीलता आवश्यक होती है। संरक्षित स्मारक परिसर की स्मारक से पृथक पुरावशेषों की सूची और उनका नियमित प्रतिवेदन- सत्यापन भी आवश्यक है।

0 ऐसे प्राचीन स्मारक, स्थल, जो संरक्षित घोषित नहीं है, किंतु संरक्षण हेतु विचाराधीन हैं अथवा उल्लेखनीय हैं, उनकी देखरेख के लिए जिला पुरातत्व संघ और संबंधित ग्राम पंचायत को उत्तरदायित्व दिया जाना चाहिए। वन क्षेत्रों में स्थित स्मारक-स्थलों के लिए वन विभाग का सहयोग लिया जाना चाहिए। संरक्षित/उल्लेखनीय स्मारक-स्थलों की सूची जिले के पुलिस अधिकारी के पास होनी चाहिए तथा संबंधित थाने में प्रदर्शित होनी चाहिए। 

0 पुरावशेष, स्मारक आदि से संबंधित पाक्षिक, मासिक, त्रैमासिक और वार्षिक प्रतिवेदन अनिवार्यतः मंगाए जाने चाहिए ताकि मुख्यालय में अद्यतन जानकारी हो और प्रशासनिक नियंत्रण, अनुशासन बना रहे। लोकहित और जन-सामान्य से संबंधित जानकारियां, जो सूचना के अधिकार अधिनियम के अंतर्गत दी जा सकती है, वेबसाइट पर सार्वजनिक की जानी चाहिए।

0 पुरातत्व को संस्कृति से अभिन्न देखने के लिए ग्रामवार, लोक में प्रचलित वाचिक परंपरा, मौखिक इतिहास, ग्राम गौरव, ग्राम धरोहर को महत्व दिया जाना आवश्यक है। ध्यातव्य है कि प्रत्येक ग्राम की भौगोलिक, जीवशास्त्रीय विशिष्टता (जंगल, पहाड़, नदी, नाला, तालाब, पेड़-पौधे, जीव-जंतु, खनिज), ग्राम के बसाहट का इतिहास होता है। ग्राम के देवस्थलों के साथ आस्था-परंपराएं संबद्ध होती हैं। अधिकतर देवस्थानों पर ही प्राचीन अवशेष एकत्र कर रखे जाते हैं। साथ ही स्थानीय, क्षेत्रीय ऐतिहासिक महत्व के व्यक्ति ग्राम से संबद्ध होते हैं, विभिन्न क्षेत्रों में विशिष्ट प्रतिभा, योग्यता के धनी लोग निवास करते हैं। वर्तमान में प्रचलित परंपराएं, उत्सव, पारंपरिेक आयोजन भी होते हैं। इन्हें स्थानीय ग्राम-अस्मिता के रूप में रेखांकित कराया जाना चाहिए। यह कार्य स्वयं ग्रामवासियों द्वारा किया जा सकता है तथा इसे ग्राम पंचायत विकास योजना (जीपीडीपी) के अंतर्गत शामिल करने की संभावना देखी जा सकती है। स्कूल और महाविद्यालयों को इस दिशा में सक्रिय किया जा सकता है। 

निष्कर्ष- संदर्भित आदेश के अन्य शर्तों में अतिरिक्त विशेषज्ञ, छोटे-छोटे वर्किंग सलाहकार का उल्लेख किया गया है। इस संबंध में टीप कि ऐसा किया जाना, समय और शासकीय राशि का अपव्यय हो सकता है। शासन-विभाग द्वारा उक्तानुसार बिंदुओं पर कार्य आरंभ करने के लिए, अमले की कमी को देखते हुए वरिष्ठ अनुभवी अधिकारियों और पुरातत्व विशेषज्ञों की सेवा ली जानी चाहिए। विषय विशेषज्ञ, तकनीकी अधिकारियों को यथासंभव नियमित विभागीय कार्यों जैसे- विधानसभा, निर्वाचन, न्यायालयीन प्रकरण, सूचना का अधिकार आदि से मुक्त रखा जाना होगा। इसी प्रकार जिलों में पुरातत्वीय कार्यालय न होने के बावजूद पुरातत्वीय कार्य अबाधित रहें इस दृष्टि से प्रत्येक जिले में कलेक्टर की अध्यक्षता में जिला पुरातत्व संघ गठन का प्रावधान है, इसे सक्रिय कर मजबूत करना आवश्यक है।

सबले बढ़िया छत्तीसगढ़िया, सोचते-कहते खुद को काव्यात्मक भुलावे में रखने के बजाय गढ़बो नवा छत्तीसगढ़ की महत्वाकांक्षी मंजिल के लिए, छोटे कदमों से ही सही, अविलंब कार्यवाही आवश्यक है। 

(संलग्न परिशिष्ट ‘अ‘ एवं ‘ब‘ उपरोक्त यथास्थान उल्लेख अनुरूप तथा ‘स‘ पर पर्यटन ‘द‘ पर कला-संस्कृति के साथ ‘इ‘ पर ‘छत्तीसगढ़ समग्र वेब‘ संबंधी टीप दृष्टव्य)

(राहुल कुमार सिंह) 
पुरातत्व एवं संस्कृति अध्येता, रायपुर 
सदस्य, ‘कला, पर्यटन, पुरातत्व और संस्कृति संवर्धन‘ टास्क फोर्स

परिशिष्ट-

(अ) उल्लेखनीय है कि बस्तर अंचल के एक दुर्लभ और महत्वपूर्ण अभिलेख के अध्ययन के लिए मेरे द्वारा लिखित आवेदन तथा व्यक्तिगत स्तर पर निवेदन किया (जो बस्तर की छवि सुधारने में मददगार हो सकती है), जिसकी चर्चा बैठक के दौरान भी की गई, किंतु अनुमति अथवा इस संबंध में कोई जानकारी प्राप्त नहीं हुई है। संग्रहालय में संग्रहित धरोहर के महत्व को उजागर करने और प्रसारित-प्रतिष्ठित करने की दिशा में यह एक गंभीर बाधा है, जिसका निराकरण सामान्य से प्रशासनिक निर्णय से किया जा सकता है। 

(ब) रायपुर संग्रहालय की सिरपुर से प्राप्त मंजुश्री कांस्य प्रतिमा अन्य देशों में आयोजित भारत महोत्सव में प्रदर्शित की जा चुकी है, इसी प्रकार सिरपुर से प्राप्त अन्य कांस्य प्रतिमाओं और स्वर्ण एवं अन्य धातुओं के सिक्कों का अमूल्य संग्रह संग्रहालय में है, किंतु इस दिशा में उदासीनता चिंताजनक है। ऐसे पुरावशेष जन-सामान्य तो क्या, विशेषज्ञों और राज्य की कला-संस्कृति-पुरातत्व से जुड़े गणमान्य इससे लगभग अनभिज्ञ हैं, तथा उनके लिए भी सहज उपलब्ध नहीं है। उल्लेखनीय है कि हार्वर्ड विश्वविद्यालय के भारतीय कला के मर्मज्ञ प्रोफेसर प्रमोदचंद्र ने मंजुश्री प्रतिमा को छत्तीसगढ़ की प्राचीन कला का सक्षम प्रतिनिधि उदाहरण माना था। इसके पश्चात 1987 में देश के महान कलाविद और संग्रहालय विज्ञानी राय कृष्णदास के पुत्र आनंद कृष्ण रायपुर पधारे और तत्कालीन प्रभारी श्री वी.पी. नगायच से विनम्रतापूर्वक सिरपुर की कांस्य प्रतिमाओं को देखने का यह कहते हुए आग्रह किया कि उनके बारे में बस पढ़ा है, चित्र देखे हैं। इन प्रतिमाओं को एक-एक कर हाथ में लेते हुए भावुक हो गए, नजर भर कर देखते और माथे से लगाते गए।

(स) पर्यटन के क्षेत्र में ’चित्रकूट, डोंगरगढ़, सिरपुर, रतनपुर, चंपारण, रामगढ़-डीपाडीह जैसे केन्द्रों के साथ मार्ग के अन्य स्थलों को जोड़ कर एक/दो/तीन दिवसीय पर्यटन परिपथ तथा सरगुजा दर्शन, बस्तर दर्शन, छत्तीसगढ़ दर्शन जैसे परिपथ की योजना पर विचार किया जाना चाहिए। छत्तीसगढ़ में विदेश और अन्य राज्यों, मुख्यतः गुजरात से चंपारण आने वाले पर्यटक सीमावर्ती उड़ीसा के पर्यटन केंद्रों पर जाते हैं वैसे ही सीमावर्ती अमरकंटक, कान्हा जैसे पर्यटन केंद्रों के साथ छत्तीसगढ़ के स्थलों को जोड़ने का प्रयास किया जाना चाहिए। राज्य के भिलाई और कोरबा जैसे औद्योगिक केंद्रों पर विभिन्न राज्यों के व्यक्ति निवास करते हैं तथा अन्य राज्यों से लोगों का आवागमन होता रहता है, इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए ऐसे केंद्रों पर पर्यटन, संस्कृति विकास की संभावना के अनुरूप कार्य किया जाना उपयुक्त होगा, इसके लिए इन नगरों के औद्योगिक संस्थानों को प्रोत्साहित किया जा सकता है। पर्यटन मंडल के वर्तमान में लंबे समय से अनुपयोगी जर्जर हो रहे मोटल, अनुपयोगी छूटे रहने के बजाय उन्हें उपयोग हेतु ग्राम पंचायतो/अन्य शासकीय, अर्द्धशासकीय संस्थाओं को सौंप देना चाहिए। प्राकृतिक सौंदर्य के स्थलों, पुरातत्वीय स्थलों आदि पर अनियंत्रित निर्माण पर रोक लगाया जाना आवश्यक है।

(द) कला-संस्कृति के क्षेत्र में मध्यप्रदेश के सफल आयोजन और गतिविधियों का अनुकरण किया जाना चाहिए, जिनमें से उल्लेखनीय संभागीय उत्सव, दुर्लभ वाद्ययंत्र, विधाओं आदि का आयोजन है। कला-प्रदर्शनियों और कार्यशालाओं के आयोजन, प्रोत्साहन के लिए इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ का सहयोग लिया जा सकता है। शिल्प, चित्र, फोटोग्राफ, दस्तावेज आदि के प्रदर्शन हेतु महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय में स्थित कलादीर्घा को सक्रिय किया जा सकता है। कला-संस्कृति संबंधी प्रकाशन पुनर्प्रकाशन, उसे इंटरनेट पर सार्वजनिक उपलब्ध कराया जाना चाहिए। भोपाल के मध्यप्रदेश माध्यम, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय जैसे अन्य केद्रों तथा देश में अन्यत्र उपलब्ध छत्तीसगढ़ की सामग्री/प्रतिलिपि प्राप्त करना चाहिए। सांस्कृतिक प्रस्तुतियां जीवन-चर्या का अभिन्न हिस्सा हैं यह ध्यान रखते हुए सांस्कृतिक कार्यक्रम को मात्र मनोरंजन, मंचीय प्रस्तुति, शोकेस किया जाना, लोकप्रियता से अलग देखना आवश्यक है। स्वस्फूर्त और पारंपरिक आयोजन, गतिविधियों, प्रचलित विधाओं के संरक्षण और प्रोत्साहन को प्राथमिकता होनी चाहिए। यह ध्यान रखना आवश्यक है कि सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन में होने वाले व्यय में कलाकारों को दिये जाने वाले मानदेय की राशि तथा ध्वनि-प्रकाश-टेंट आदि व्यवस्था संबंधी व्यय का अनुपात संतुलित हो।

(इ) ‘छत्तीसगढ़ समग्र वेब‘, सामान्य प्रशासन विभाग के अंतर्गत विकसित किया जाना चाहिए, जिसमें अभिलेखागार के नियमित दस्तावेजों के अलावा, राजपत्र, छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण संबंधी कागजात का चयन-वर्गीकरण और अपलोडिंग प्राथमिकता से शीघ्र आरंभ किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त जिला कार्यालयों के दस्तावेज, समकालीन दस्तावेजों को भी संयोजित किया जाना चाहिए। राज्य में निजी संस्थाओं, विशेषज्ञों द्वारा विभिन्न शोध-सर्वेक्षण के कार्य जिला-प्रशासन, जनसंपर्क, पंचायत, शिक्षा, स्वास्थ्य, संस्कृति, आदिम जाति जनजाति आदि विभागों के अंतर्गत अथवा सहयोग से होते हैं उनकी जानकारी भी इसी प्लेटफार्म पर संयोजित किया जाना आवश्यक है। योजना, सांख्यिकी व अन्य विभागों के वार्षिक सर्वेक्षण, प्रशासकीय प्रतिवेदन, शासकीय विभागों के अन्य प्रकाशन, संवाद द्वारा प्रकाशित सामग्री, विश्वविद्यालयों में हो रहे शोध आदि का भी संयोजन आवश्यक है।

(राहुल कुमार सिंह)

Thursday, May 21, 2026

जन-नागर गीता

हरिवंशराय बच्चन की ‘भगवद्गीता‘, काव्यमय भावानुवाद मूल संस्कृत श्लोकों सहित, के 2013 संस्करण में उल्लेख है कि इस पुस्तक का पहला संस्करण ‘नागर गीता‘ नाम से 1966 में प्रकाशित हुआ था। इसके भी पहले 1958 में ‘जन गीता‘ प्रकाशित हुई थी। अप्रैल 1966 में ‘सम्बोधन‘ शीर्षक, भूमिका इस 2013 संस्करण में भी है, जिसमें बच्चन ने लिखा है कि इसे देखकर उनके एक अन्य अनुवाद ‘जन गीता‘ की याद आना स्वाभाविक है। वह अवधी में था, यह खड़ी बाली में है। ‘जन गीता‘ में वे अपने को ‘प्रतिध्वनिकार‘ और यहां ‘नागर गीता‘ में ‘रूपांतरकार‘ कहते हैं। उसके आमुख को ‘मंगलाचरण‘ कहा था, इसे ‘सम्बोधन‘। इस सम्बोधन का यह अंश उल्लेखनीय है- ‘मुझ साधारण का ‘स्व‘ ऐसा नहीं हो सकता कि किसी भी ‘पर‘ से मेल न खाए। फिर भी आपके स्वागत, उपेक्षा दोनों के लिए ये तैयार है; यानी, दोनों के प्रति उदासीन।‘ इससे लगता है कि कृतिकार गीतामय है, उसने कर्म किया है, कर्मफल के प्रति तटस्थ-अनासक्त है, निरपेक्ष है। 

‘सम्बोधन‘ में यह भी लिखते हैं- 'जन और नागर' शब्दों के समाज पक्ष की ओर भी आपका ध्यान जाना स्वाभाविक है। ग्राम और नगरों में बँटा यह महादेश क्या हृदय और बुद्धि में ही बँटा नहीं है? शायद मेरी अवचेतना ने सकारण ही जनगण और नागरिकों के लिए दो विभिन्न माध्यमों से एक ही कृति प्रस्तुत की है। बुद्धि और हृदय का ऐसा विभाजन स्वस्थ और हितकर नहीं। स्वस्थ और हितकर तो यह होगा कि नागरिकों के पास ग्रामीणों का थोड़ा हृदय आए, ग्रामीणों के पास नागरिकों की थोड़ी बुद्धि जाए। प्रतीक रूप से 'जन गीता' नगरों में भी प्रतिध्वनित हो; 'नागर गीता' के दर्शन ग्रामों में भी हों। हृदय और बुद्धि में संतुलन रखना गीता के समत्व योग के अंतर्गत ही आएगा।

जन गीता के ‘मंगलाचरण‘ पर नई दिल्ली, 12-5-58 दर्शित है। यह मंगलाचरण, काष्ठमौनी स्वामीजी महाराज के प्रति विनय भी है। पुस्तक में बताया गया है कि ‘जन गीता का सर्वप्रथम सस्वर संपूर्ण पाठ श्री स्वामी जी महाराज के समक्ष अठारह मई उन्नीस सौ अट्ठावन को किया गया।‘ अन्यत्र जानकारी मिलती है कि काष्ठमौनी स्वामीजी महाराज, राधा बाबा - चक्रधर मिश्र (1913-1992) हैं, स्वाधीनता संग्राम में जेल भी गए। 1936 में संन्यास ले लिया और 1956 की शरद पूर्णिमा पर काष्ठमौन व्रत लिया।

यहां गीता के अपनी पसंद के कुछ श्लोक चुने गए हैं, जिसमें इस बात का ध्यान रखा गया है कि आमतौर पर लोगों की जुबान पर आने वाले पद शामिल हों। आरंभ में अध्याय/श्लोक संख्या, मूल संस्कृत श्लोक, बच्चन जी की उक्त कृतियों में किया गया खड़ी बोली अनुवाद और फिर अवधी अनुवाद है- 

1/1 - धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः। मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय।।
# संजय से धृतराष्ट्र ने कहा, धर्मक्षेत्र में, कुरुक्षेत्र में, समरेच्छा से हुए इकट्ठे, मेरे और पांडुपुत्रों ने जो कुछ किया, बताओ, संजय। 
# धर्मखेत, कुरुखेत, कहावा, जहँ कौरव-पांडव-दलु आवा; काह करहिं तहँ दोउ समुदाई? संजय, मोहिं कहहु समुझाई।

1/47 - एवमुक्त्वार्जुनः संख्ये रथोपस्थ उपाविशत्। विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः।
# ऐसा कहकर, धनुष-बाण तज, रण-स्यंदन के पृष्ठ भाग में शोक-विकल अर्जुन जा बैठे।
# अरजुन कहि अस कृष्न सन, सोक-बिकल, धुनि माथ, सर-धनु तजि, रथ-पृष्ठ महुँ बैठेउ, कुरु-कुल-नाथ।

2/22-23 - वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि। तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही।। नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः। न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः।। 
# जीर्ण वसन तज कर जैसे नए वस्त्र धारण करता है, जीर्ण देह तज कर वैसे ही देही नव तन धारण करता। शस्त्र नहीं छेदन कर सकते इस देही का, पावक इसको जला न सकता, पानी इसको भिगा न सकता, मारुत इसको सुखा न सकता।
# नर, परिहरि जिमि जून पट, पहिरहिं नव परिधान, जीव धरइ तिमि नवल तन, त्यागि सरीर पुरान। जीव न पावक जारि सक, भेइ सकइ नहिं नीर, सोखि न सकइ समीर तेहि, छेदि सकइ नहिं तीर।

2/47 - कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।।
# कर्मों पर अधिकार तुझे है, कभी न फल पर; तू न कर्मफल अनुरागी बन, और न कर्मों से विरक्त हो।
# करमहि पर बस तोर बसाऊ, फल पर तोहि अधिकार न काऊ; छोरु कर्म-फल-मोह, सुकर्मा, छोरु न कर्म, न छोरु स्वधर्मा।

4/7-8 - यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।। परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे।।
# भारत, जब-जब ग्लानि धर्म की औ‘ अधर्म का अभ्युत्थान हुआ करता है, कगार तब-तब मैं अपने को सृजता। साधुजनों के परित्राण के औ‘ असाधुओं के विनाश के और धर्म संस्थापन के हित युग-युग, भारत, मैं अवतार लिया करता हूँ।
# जब जब धर्म रसातल जाई, रहइ अधर्म धरा पर छाई, तब-तब, मोर नियम, कपिकेतू, देह धरउँ जग मंगल हेतू। करउँ कुकर्मिन्ह कर संघारा, करउँ सुकर्मिन्ह कर उद्धारा; नीति मोरि जुग जुग चलि आई, थापउँ धर्म, अधर्म हटाई।

9/22 - अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते। तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्।
# जो अनन्य-मन हो मेरा चिन्तन करते, मुझको भजते हैं, नित्ययुक्त उन भक्तजनों का योगक्षेम वहन करता मैं 
# जे अनन्य मन सुमिरहिं मोहीं, जे मोहि सन छन दूरि न होहीं, जे नित निज चित मोसन बाँधे, तिल्हकर जोग-छेम मम काँधे।

10/35 - बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम्। मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः।।
# बृहत्साम सामों में, गायत्री छन्दों में, मार्गशीर्ष मासों में, ऋतुओं में वसन्त मैं।। 
# बृहत्साम मोहि, मंत्रन्ह माहीं, गायत्री मोहि, छंदन्ह माहीं। माघ समुझु मोहि मासन्ह माझा; समुझु रितुन्ह महुँ मोहि रितुराजा;

15/1 - ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्यं प्राहुरव्ययम्। छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्।। 
# कहा कृष्ण ने, ‘ऊर्ध्व मूल औ‘ अधः डाल का जो अव्यय अश्वत्थ, वेद के पत्तों वाला, कहा गया है, जो उसको जानता वही वेदों का ज्ञाता। 
# अच्छय बिरिछ जाइ एक भाषा, जो उर्ध्वग-जरि, निम्नग-साखा; जामहुँ बेद लगहिं जिमि पाता; जो जानइ तेहि, सो बड़ ग्याता।

18/66 - सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।
# सब धर्मों का परित्याग कर, मेरी एक शरण में आ तू, शोक न कर, मैं तुझे, परंतप, सब पापों से मुक्त करूँगा।
# कुंति-सुवन सब धर्म बिहाई, गहु मम एक सरन, सिरु नाई; मैं तोहि, सब अघ-ओघ नसाई, देहउ मुकुति परम सुखदाई।

18/78 - यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः। तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्भुवा नीतिर्मतिर्मम।।
# जहाँ कृष्ण योगेश्वर, पार्थ धनुर्धर, नरवर, वहाँ विजय है, श्री, विभूति है, अडिग नीति है, मेरा मत है। 
# जहँ कृष्न जोगेस्वर, जहाँ धनु साजि अरजुन राजहीं, तहँ रहइ श्री, बैभव, बिजय, ध्रुव नीति, मम संमति सही।

गीता-भाव के लिए उक्त दोनों के अतिरिक्त,
गीता-पठन में अद्वैत आश्रम वाली ‘सरल गीता‘,
स्वामी अपूर्वानन्द की रामकृष्ण मठ वाली और
गीता प्रेस वाला संक्षिप्त संस्करण,
के साथ शुरूआत आसान होता है।

टीप-
‘जन गीता‘ की प्रति हमारे स्कूल के पुस्तकालय से मिली। पुस्तक के साथ सहेजे कार्ड में दर्ज है कि 1963 से 1968 के बीच इस पुस्तक को कक्षा 7 से कक्षा 11 तक के 12 विद्यार्थियों ने जारी कराया था।

Wednesday, May 13, 2026

गुरुदेव काश्यप

छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता पर ‘छत्तीसगढ़‘ सांध्य दैनिक के सुनील कुमार से मुलाकात में बात चली, तृप्ति सोनी की किताब ‘छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता, चार पीढ़ियों की स्याही की विरासत‘ की और पहुंची, गुरुदेव काश्यप तक। मैं उनसे और उनके पत्रकार-संपादक होने से परिचित रहा हूं, मगर उनकी कविताई से बहुत कम। सुनील कुमार जी ने उनकी किताब ‘धूप का एक दिन‘ (1972) पढ़ने को दे दी। यह जानकारी न होने से अपनी चिढ़ का बदला खुद से लेने के लिए आते ही काम में लगा, पूरे संग्रह की वर्ड फाइल तैयार कर ली और ललित कुमार के ‘कविता कोश‘ में भेज दिया।

गुरुदेव काश्यप जी के साथ रायगढ़ के उन दिनों से ले कर अब तक को याद करता रहा जब सर्व माननीय किशोरी मोहन त्रिपाठी, बारेन दा, अनुपम दासगुुप्ता, प्रभात त्रिपाठी, देवेंद्र प्रताप सिंह, हरिहर सिंह, अतुल श्रीवास्तव, हरकिशोर दास, रवि मिश्रा, विनोद पांडेय, रमेश शर्मा, स्वराज करुण, शिव राजपूत, राजू और हेमचंद्र पांडेय, बिहारीलाल साहू, डॉ. बल्देव, बसंत राघव, अशोक अग्रवाल, अनिल रतेरिया, प्रमोद ब्रह्मभट्ट, गोपाल पटेल, राकेश शर्मा, अजय अटापट्टू, चंडीप्रसाद गुप्ता, अंबिका वर्मा, राजेश डेनियल, अबरार हुसैन ..., बहरहाल वापस गुरुदेव काश्यप की कविता। उनकी कविताएं पढ़ते हुए तात्कालिक पाठकीय प्रतिक्रिया बनी-

वे रविशंकर विश्वविद्यालय के मानवशास्त्र के संभवतः पहले बैच के विद्यार्थी थे छुईखदान वाले राघवेंद्र त्रिपाठी, बाद में इसी विभाग में सेवाएं देने वाले सरोज बाजपेयी भी संभवतः इस बैच में थे। उन्होंने भाषा की भी पढ़ाई की। यायावरी- गुरुदेव काश्यप की कविताओं में झलकती है मगर उनके संग्रह ‘धूप का एक दिन‘ का लगभग सारा लेखन अखबार-समाचार के बीच पनपा है, जिसमें शहर का माहौल-पर्यावरण, देश की दशा और संविधान तथा वैश्विक परिस्थितियां, अमरीका हावी है। देखा जा सकता है कि समाचार-सूचना के संवेदनशील प्रस्तोता को उस माध्यम की सीमा बेचैन करती है, तथ्यों के साथ विचार और भावनाओं के बिंब-प्रतिबिंब के लिए वहां जगह नहीं होती, वह समाचार-गद्य में लिख-चुक जाता है लेकिन शुष्क, असम्बद्ध-सी घटना और परिस्थिति के समाचारों के पीछे मानवीय रिश्ता तो महसूस होता ही है। इसलिए ऐसे गद्य-अभिलेखन समाचारों के अंदर सहज कविता प्रवाहित होती रहती है, संवेदनशील मन उसे महसूस करता सुन लेता है और भाषा-कलम पर अधिकार हो तो अभिव्यक्त कर पाता है, ऐसी ही है इस पुस्तक की कविताएं, जिसकी पहली कविता का शीर्षक है ‘भूमिका: हम ऋग्वेदपदी‘, जिससे समझा जा सकता है कि यह कवि समष्टि से एकाकार हो कर रचना कर रहा है। उनकी कुछ कविताएं-


भूमिका: हम ऋग्वेदपदी 

आहुति दो पितरों, देवताओं को। 
हे पवित्राप्रद अग्नियो, 
स्तवन करो 

हम ऋग्वेदपदी सौ हेमन्तों को लांघते 
बांहों में समेट आत्मजों को 
ऋषि-आयु भोगेंगे। 

वरणीय पृथिवी का आलिंगन करें 
स्वागत करें 
अंतरिक्ष से उभरते सूर्य का 
यह सोमधारी 
प्रजाओं के लिये 
अमृत किरणें उछालता आया है। 

आयुष्मान् बंधु, 
दाब दो किसी पत्थर के नीचे 
अपनी अकारथ मृत्यु को 

धूप का एक दिन 

धूप है-सीपी है 
सूरज एक मोती है 
कानों के रिंग में बड़ा भला लगता है 
(क्या करें, कीमती है) 

धूप है-लहरें हैं 
दिन एक समुन्दर है 
नारियल की छांव में 
नाव बने लेटे हैं 
(पाल है, मछलियां हैं, लंगर है) 

धूप है-चुम्बन है 
फेनदार किरने हैं 
लथपथ हैं ओंठ 
पैर डगमग हैं 
(शाम के कंधे हैं, शिथिल-शिथिल झरने हैं) 

सुबह की बौछार 

सुबह-सुबह 
मुक्तक-सा बरस गया पानी। 

भीग गए अधजागे फूल-पत्र 
भीग गए छत-छज्जे, गलियारे 
बिजली की कुमकुम, 
तांबे के तार, नरम अंधियारे 

पुल की वह रेलिंग भी भीग गई 
भीग गई नहर, मुरम भीग गई 
खिड़की का कासनी परदा कुछ सिमट गया 
सन्नाटा चौक के पास कहीं ठिठक गया। 

सुगबुग दरवाजे की 
कड़ी-कड़ी जगती है 
टिक कर दीवारों से 
धूप खड़ी होती है 
धुले-धुले गागर में 
सूर्य समा जाता है 
ईंधन के बोझ लिए 
दिवस चला आता है 

रात का अनबोला आंगन में सोया है 
पास का गजरा भी दबे-दबे रोया है 
दुखा गया जी को यह ऐसा अभिमानी है 
सुबह-सुबह मुक्तक-सा बरसा जो पानी है। 

दिन 

नंगे पांव फुटपाथ पर दौड़ता 
मूंगफली के छिलके बटोरता 
आहिस्ता कुछ सोच कर 
पार्क के चकेदार दरवाजे पर झूलता 
म्यूजियम की मुंडेर से झाँकता 
सिनेमा घर के सामने 
कागज के रंगीन टुकड़े बटोरता 
कभी किसी रंगीन बोर्ड को खुरचता 
फव्वारे पर 
पानी के छींटे बिखेरता 

दोपहर- 
किसी बबूल की टहनी से 
धूप की उलझी हुई पतंग को निकालता 
फेरी वालों के पीछे भागता 
रेल की पाँतों को पार करता 
नदी की रेत को रौंदता 
किसी हरवाहे की पगड़ी उछालता 
कभी दो बूढ़े बैलों को पुचकारता 

शाम- 
किसी खोमचे के नजदीक 
उदास मुंह लिये 
खाली जेबें टटोलता 
सूरज डूबे 
इसी गली की मोड़ पर 
हर रोज घेर कर 
मुझे आखरी सलाम करता 

बस यूं ही हाथ पीछे बाँधे 
अकेले किसी कोने में 
दुबक कर बैठ जाता 
उदास मन, खिन्न: 
सोचता हूं- 
किस विधवा का बेटा है 
आवारा-आवारा सा 
नाबालिग दिन। 

शाम 

जी चाहता है- 
बादलों की ऐंठी हुई पगड़ी में 
सूरज का एक दूध-मोंगरा 
खोंप दूं। 

धरती के भरे-भरे गालों से 
छाछ सी धूप छितर जाती है 
घूंघट में छांव नई ब्याही-सी 
आंगन के बाहर जो 
नजर नहीं आती है। 

पिंजड़े में सुग्गे सी 
शाम फुदक जाती है 
नई-नई बछिया सी 
हवा बिदक जाती है। 

रात की मचिया पर 
चांद बैठ जाता है 
बूंद-बूंद अमरस-सी 
चांदनी टपक गई 
कांस की कटोरी-सा 
पोखर भर जाता है 
भरे-भरे महुए से 
तारे टपका किए 
पगडंडी बैठी है 
खाली डलिया लिए। 

पुस्तक के फ्लैप पर परिचय, जो संभवतः स्वयं उन्होंने लिखा है, इस प्रकार है- 

जीवन को प्रथम तिथि पंक्ति, रायगढ़ दिनांक 15 अगस्त 1935। एक निम्न मध्यमवर्गीय संयुक्त परिवार के सारे अभिशापों को वर्षों तक झेलने की विवशता। वह त्रासदायी परिवेश जो शैशव में हो रीढ़ की हड्डियों को प्रौढ़ बना जाता है। शिक्षा- एम. ए., मानव शास्त्र और भाषा विज्ञान में डिप्लोमा। व्यवसाय- पत्रकारिता। विगत 20 वर्षों में अनेक क्षेत्रीय पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन एव सम्पादन। पिछले कुछ वर्षों में दैनिक ‘महाकोशल‘ रायपुर के संपादक। अभिरुचि क्रमांक 1- यायावरीः डोनापाल से डीफू तक। ‘भटक चुके आगे और भटकेगे।‘ क्र. 2- असफल प्रकाशनों के लिए सफल योजनायें तैयार कर उन्हें क्षेत्रीय प्रतिभाओं के बीच खपाना। सन 1958 से 1966 के बीच अनेक पुस्तकों का प्रकाशन, संपादन। सहयोगी काव्य संग्रह नये स्वर-3, छत्तीसगढ़ का प्रथम कहानी संग्रह, ‘मीठे कनेर का दरख्त‘, काव्य संग्रह ‘नैवेद्य‘, ब्लादीमीर नाबोकोव के चर्चित उपन्यास ‘लोलिता‘ का अनुवाद और हिन्दी मे वियतनाम संबंधी प्रथम काव्य संग्रह ‘आहत सूर्य देश में‘। उपलब्धि- मित्रों का स्नेह, नवागतुकों की श्रद्धा और यह अटूट विश्वास कि समूचे भविष्य पर अधिकार हमारा है। मध्यप्रदेश में नई कविता का सूत्रपात करने वाले प्रथम सहयोगी काव्य संकलन नये स्वर-1 (1956) के सहयोगी कवि। प्रचार प्रसार के मंच पर उपस्थित होने से सदैव भयभीत। 22 वर्षों के रचना-काल में अंततः यह प्रथम व्यक्तिगत काव्य संग्रह ‘धूप का एक दिन‘। आगामी अभिशप्त उत्कल।

Wednesday, May 6, 2026

हमारा छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद कक्षा 3 से कक्षा 8 तक के ‘सहायक वाचन‘ के लिए 'हमारा छत्तीसगढ़' पुस्तके तैयार कराई गई थीं। इन पुस्तकों में पाठ-विषय का चयन-निर्धारण स्तरीय था किंतु इन पुस्तकों के प्रकाशन होने पर तथ्यों और प्रस्तुति संबंधी विभिन्न आपत्तियां और विवाद उभरने लगे। इस पर शासन के स्कूल शिक्षा विभाग अंतर्गत तत्कालीन प्रभारी अधिकारी श्री सुनील कुजूर, आइएएस द्वारा बैठक आहूत हुई। सामान्यतः ऐसी बैठकों में चर्चा आई-गई हो जाती है, यह ध्यान रखते हुए समिति के सदस्य के रूप में डॉ. लक्ष्मी शंकर निगम और राहुल कुमार सिंह द्वारा संयुक्त रूप से लिखित प्रतिवेदन सहित विभिन्न बिंदुओं पर चर्चा-टिप्पणी की गई थी। उन पुस्तकों और बैठक का परिणाम क्या हुआ, अवगत नहीं कराया गया, न ही उसका कोई परिणाम जानने को मिला। अब उन पुस्तकों की भी जानकारी नहीं मिलती, किंतु यह एक सार्थक प्रयास था, इस दृष्टि से हमारा उक्त प्रतिवेदन यहां प्रस्तुत है-

हमारा छत्तीसगढ़ 
प्रतिवेदन - एल.एस. निगम एवं राहुल कुमार सिंह 

संबंधित पाठ- 
कक्षा-3         1, 3 एवं 7 
कक्षा-4         1, 3 एवं 7 
कक्षा-5         1, 2 एवं 3 
कक्षा-6         1, 3, 8 एवं (10) 
कक्षा-7         1 एवं 8 
कक्षा-8         1, 11 एवं 15 

सामान्य अभ्युक्ति- 
1. ‘हमारा छत्तीसगढ़’ पुस्तकमाला की सामान्य अवधारणा, विषय-वस्तु और सामग्री-चयन, सामान्यतः प्रशंसनीय और स्वागतेय है। 
2. प्राथमिक और पूर्व-माध्यमिक कक्षाओं के पाठ्यक्रम में बच्चों की पीठ पर बढ़ते बस्ते के बोझ की चिन्ता सदैव की जाती है। इस दृष्टि से अत्यावश्यक माने जाने वाले क्षेत्रों के लिए पृथक-पृथक पाठ्य-पुस्तकों के बजाय नियमित पाठ्यक्रम के ‘भाषा’, ‘सामाजिक अध्ययन’ और ‘विज्ञान’ विषयों के साथ क्रमशः सहायक-वाचन (आंचलिक विशिष्टता और गौरव), पर्यावरण तथा सूचना-प्रौद्योगिकी के पाठ जोड़ा जाना उपयुक्त होगा। इससे बस्ते के बोझ के साथ-साथ अभिभावकों पर पड़ने वाला आर्थिक बोझ भी कम होगा। 
3. पाठ तैयार करने में यह ध्यान रखना अत्यावश्यक है कि पाठ्य-सामग्री का गहन और सूक्ष्म निरीक्षण, विषय-विशेषज्ञों, भाषा-विशेषज्ञों तथा बाल-शिक्षा मनोविज्ञानियों द्वारा किया जाए। 
4. हमारा छत्तीसगढ़ पुस्तकमाला के अधिकतर पाठों के लेखक और सम्पादक डा. श्याम सुंदर त्रिपाठी यदि एक ही व्यक्ति हैं, तो यह स्थिति उचित नहीं है, क्योंकि इससे पाठों में आवश्यक संशोधन प्रभावित होने की संभावना बनी रहती है। 
5. पाठ को ‘किरण’ कहने पर पुनर्विचार किया जा सकता है। 

कक्षा और पाठवार टिप्पणी/संशोधन सुझाव 
कक्षा-3 पाठ 1, 3 एवं 7 
पृष्ठ-2 नक्शे में सभी जिले दर्शित हैं, अतः प्रमुख शब्द अनावश्यक है। 
पृष्ठ-4 प्राचीनता के क्रम में ‘है’ के स्थान पर ‘माना जाता है’, उपयुक्त होगा। 
पृष्ठ-10 ‘देवलदेव’ के स्थान पर ‘भांडदेवल’ होना चाहिए। 
पृष्ठ-11 ‘शिवरीनारायण’ के बाद जांजगीर-चांपा जिले के चन्द्रपुर की चन्द्रहासिनी देवी का तत्पश्चात्, रायगढ़ जिले का उल्लेख, उचित होगा। 
पृष्ठ-12 कविता की पंक्तियों का पुनः मिलान उचित होगा। 
पृष्ठ-33 दूरी, वृक्षों के नाम, पुनः मिलान करना उचित होगा। सतयुग के साथ शायद शब्द का प्रयोग उपयुक्त नहीं है। 
पृष्ठ-34 ‘पागल जैसे हो गए’ को अन्य प्रकार से लिखा जाना उचित होगा। 
पृष्ठ-37 वाद्यों के नामों को पुनः जांच लेना आवश्यक है। 

कक्षा-4 पाठ 1, 3 व 7 
पृष्ठ-1 ‘कौशल’ और ‘विनताश्व’ शब्दों की वर्तनी जांचना आवश्यक है। 
पृष्ठ-2 ‘दहेज में उत्तर कौशल’ वाक्य की जांच आवश्यक है। ‘वाल्मिकी’ और ‘राम’ के साथ ‘श्री’ आवश्यक नहीं है। ‘वृह्दबल’ की वर्तनी जांचना आवश्यक है। ‘बुन्देलखण्ड के शहडोल’ के औचित्य पर विचार करना उचित होगा। 
पृष्ठ-3 ‘कान्तर’ के स्थान पर ‘कान्तार’ होना चाहिए और विदर्भ के साथ बरार का उल्लेख भी उचित होगा। पैरा 2 व 3 का पुनर्लेखन उपयुक्त होगा, जिसमें विद्वानों के मतभेद के बजाय अधिकतर मान्य तथ्य उल्लिखित होे। 
पृष्ठ-4/5 गढ़ स्थान नामों को पुनः जांचना आवश्यक है। 
पृष्ठ-6 गढ़ों का प्रशासनिक केन्द्र होना और भौतिक स्वरूप वाले गढ़ का अन्तर स्पष्ट करना चाहिए। ‘राष्ट्रगीत’ और ‘राष्ट्रगान’ 
पृष्ठ-14 कोशला ग्राम का उल्लेख भ्रामक है। ‘श्री’ अनावश्यक है। ‘रानकावति’ वर्तनी की जांच आवश्यक है। पृष्ठ-17 राजिम तेलिन, जगतपाल, भगवान विष्णु, चौदहवीं शताब्दी- इन उल्लेखों में तथ्य और मान्यता का घालमेल है। ‘बड़े मंदिर’ शब्द उपयुक्त नहीं है। 
पृष्ठ-18 ‘स्कन्ध’ के स्थान पर ‘स्कन्द’ शब्द होना चाहिए। 
पृष्ठ-19 ‘धौम्य’ की वर्तनी जांचनी है। ‘ऋषियों के आश्रम आज भी’ उपयुक्त नहीं है। मन्दिरों की संख्या ‘बाइस’ की जांच आवश्यक है। 
पृष्ठ-37 ‘मन्दाकिनी’ नाम के समीकरण की जांच आवश्यक है। 
पृष्ठ-39 श्लोक का पुनः मिलान उचित होगा। ‘थुआमाल’ की वर्तनी की जांच आवश्यक है। ‘मील’, ‘किमी’ के बजाय ‘किलोमीटर’ लिखना व माप का उल्लेख उपयुक्त होगा। ‘चन्द्रमा की आकृति’ अथवा ‘अर्द्धचन्द्राकार’ जांच आवश्यक है। 
पृष्ठ-40 ‘कालीदास’ अथवा ‘कालिदास’ वर्तनी के साथ संदर्भ की जांच आवश्यक है। ‘रावा घाट’ वर्तनी/उच्चारण की जांच आवश्यक है। 
पृष्ठ-41 ‘मैय्या’ के बजाय ‘मैया’ होना चाहिए। ‘पुस्तक माला के भाग एक’ उल्लेख उचित नहीं है। 
पृष्ठ-42 जगदलपुर के दंतेश्वरी मंदिर का दन्तेवाड़ा से अलग होना, स्पष्ट करना चाहिए। ‘नारायण पाल’ और ‘नाग कालीन’ मिलाकर लिखना उपयुक्त होगा। 

कक्षा-5 पाठ 1, 2 व 3 
पृष्ठ-1 ‘छत्तीसगढ़ की काशी’ रतनपुर के लिए पूर्व प्रचलित है। 
पृष्ठ-5 ‘सूर्य वर्मा’ के बजाय ‘सूर्यवर्मा’ उचित होगा। ‘स्वास्तिक’ के बजाय ‘स्वस्तिक’ होना चाहिए, जो बौद्ध विहार है। अन्य बौद्ध विहार का नाम आनन्दप्रभ कुटी विहार है। 
पृष्ठ-6 ‘महात्मा बुद्ध के प्रिय शिष्य’ उल्लेख उचित नहीं है। ‘आनन्द प्रभु’ की वर्तनी उपरोक्तानुसार होगी। 
पृष्ठ-8 पाठ ‘कथा श्रृंगी ऋषि की’ के औचित्य पर पुनर्विचार आवश्यक है। 
पृष्ठ-15 ‘मध्यप्रदेश’ के स्थान पर ‘मध्यप्रान्त’ होना चाहिए। ‘चौहान वंशीय’ के स्थान पर ‘चौहानवंशी’ होना चाहिए। पृष्ठ-17 ‘हजारी बाग’ के स्थान पर ‘हजारीबाग’ होना चाहिए। 

कक्षा-6 पाठ 1, 3, 8 व (10), 
कक्षा-7 पाठ 1, व 8, 
कक्षा-8 पाठ 1, 11, व 15 
पर चर्चा के दौरान प्रतिवेदकों द्वारा टिप्पणियां की गईं।

Saturday, April 25, 2026

पलाश की तलाश - बेरास्ते एआइ

पलाश पर लिखना है। पहली चुनौती है कि न जाने कब से ‘पलाश‘ पर लिखा जाता रहा है, उस पर अब क्या ही लिखा जा सकता है, जो उस सबसे चाहे बेहतर न हो मगर कुछ अलग-सा तो हो। यों परंपरा भी रही है कि कुछ लिखने-करने के पहले मंगलाचरण हो, देव-पूर्वजों, पूर्वाचार्यों का स्मरण कर लेना चाहिए। यह शायद इसलिए कि आप जो कहने जा रहे हैं, पहले कहे जा चुके से कुछ अलग और आगे की बात कहें, ‘वही ढाक के तीन पात‘ न हो, और अनूठा कहने के चक्कर में बेढंगा न हो जाए, कुछ सार्थक भी हो। इसके लिए पहले जरूरी है कि कब-किसने क्या-क्या कहा है, पता कर लें, मुश्किल यहीं से शुरू होती है। इस पर याद आया कि यह भी तो कहा गया है कि मुश्किल जहां से पैदा हो, हल भी वहीं से निकलता है, तो ...

असमंजस है, मंगलाचरण क्या हो, कैसे करें? कालिदास के ‘कुमारसंभवम्‘ का आरंभ होता है- ‘अस्त्युत्तरस्यां दिशि ...‘ इसमें कहां है मंगलाचरण। संस्कृत पंडितों की बात निराली। सवाल किया जाता है कि क्या मंगलाचरण के बिना भी महाकाव्य आरंभ किया जा सकता है? क्या कालिदास से चूक हुई? पंडित हल भी सुझा देते हैं- यहां एकशब्दीय ‘अस्ति‘ ही मंगलाचरण है। अस्ति यानी ईश्वर, क्योंकि ईश्वर के बाहर सब कुछ नास्ति है। और बात पलाश की, तो इस महाकाव्य में उन्हें पलाश, बालचंद्र के समान वक्र और अतिलोहित लाल दिखता है। फिर हमारा मंगलाचरण? क्या परवाह, यह तो फुटकर लिखावट है, कोई उदार समीक्षक भूले-भटके इसे ही ‘ललित निबंध‘ ठहरा दे तो उसकी जै-जै। फिर भी आग्रह हो, कोई ढूंढने पर ही उतारू हो जाए तो पंडितों पर भरोसा कि पलाश भी एकशब्दीय मंगलाचरण साबित हो सकता है।

सोचा, पता करूं, वेदों में ‘पलाश‘ पर क्या कहा गया है? लेकिन क्या वेदों में पलाश शब्द आया होगा। वैदिक कवि इस शब्द से, इस पेड़ और फूल से परिचित थे? ऐसा तो नहीं कि वे इसे ‘किं-शुक‘ कहते रहे हों। ढाक या टेसू, जैसा देशज तो नहीं कहते रहे होंगे। ढाक, सुनते ही लगता है कि पलाश को इस नाम से जानने-पुकारने वाले ने या तो इसके पेड़ को देखा है या फल को और ‘वही ढाक के तीन पात‘ कहते उसका ध्यान गया है पत्तों पर। उसने फूल खिला पलाश देखा होता तो ‘टेसू‘ जैसा ही कुछ नाम देता। मगर फूल तो मौसमी है- ‘कूलन में केलिन में..‘ बसंत हमेशा तो नहीं बगरा रहता। ढाक और टेसू शब्द कहां से आते हैं, तलाश के लिए सूत्र पकड़ कर आगे बढ़ सकते हैं कि दोनों शब्दों में ‘ट‘ वर्ग है, लेकिन बस अटकना है। बहकना-भटकना, जहां-तहां मुंह मारना और बात-बेबात सिर घुसेड़ना समीचीन नहीं, अस्तु ...

पूर्ववर्तियों को याद करता चलूं, शायद कोई बात बने। पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, न कि ‘पद्मलाल-पन्नालाल‘, उन्होंने अपने इस तरह नाम पर भी निबंध लिखा है। हमने स्कूल के दिनों में उनका निबंध पढ़ा था- ‘क्या लिखूं?‘। मन ही मन मदद की गुहार, वह याद करता हूं। निबंध आरंभ होता है- ‘मुझे आज लिखना ही पड़ेगा ...‘ कहते हुए बताते हैं कि ‘दूर के ढोल सुहावने‘ और ‘समाज सुधार‘ पर निबंध लिखना है ... उनकी बात यहां से शुरू हो कर, आगे ‘क्या खूब‘ होते कहां से कहां पहुंच जाती है। अब सोचता हूं कि क्या उन्होंने इस निबंध में यह भी कहना चाहा है कि समाज-सुधार पर बात दूर के ढोल की तरह हैं, इसे अपनी ढपली अपना राग की तरह गाने-बजाने से काम नहीं बनता, इसके लिए कुछ सकारात्मक-सार्थक करना होता है। तो ऐसा न हो कि पलाश पर साहित्य रच, प्रकृति-प्रेम यहीं तक सिमट कर रह जाए।

कबीर कहते हैं- ‘मसि कागद छुयौ नहीं, कलम गह्यौ नहीं हाथ‘, अब कौन मसि-कागद-कलम छूता है, अब ‘कलम के सिपाही‘, कम से कम शाब्दिक रूप में तो अप्रासंगिक ही हो गए। टच-स्क्रीन मोबाइल और ‘स्पीच टू टेक्स्ट‘ के बाद यों की-बोर्ड भी, बीती बात हो रहा है। दूसरी तरफ कुछ सोचने-याद करने या किताबें पलटने के पहले एआइ-एलएलएम ललचा रहा है, ‘मैं हूं ना‘ की तरह हर मौके पर साथ देने को तैयार, मगर डिस्क्लेमर के साथ कि ‘एआई गलत जानकारी दे सकता है, इसलिए, इसके जवाबों की दोबारा जांच कर लें‘। अब कुछ लिखना हो तो यह भी ध्यान रखना होता है कि ऐसा क्या लिखे जो एआइ के लिए संभव न हो। चोर-मन, एआइ की याद दिलाता रहता है। इस पर सोचा कि उसे कमांड क्या दूंगा- शायद यह कि ‘मुझे पलाश पर लेख लिखना है, इसके समानार्थी शब्द बता दो, वे शब्द मुख्यतः कहां-कहां इस्तेमाल हुए हैं, यह भी बता दो और यह भी बता दो कि सर्च के लिए इसके अलावा ‘की-वर्ड‘ क्या होगा, यानि यह भी बता दो कि मैं क्या पूछूं‘। अनुमान कर रहा हूं कि ‘वाल्मीकि, व्यास, कालिदास, भारवि ...‘ आदि तो बता ही देगा। फिलहाल, अपनी यादों की उधेड़बुन के सहारे ...

कबीर-पलाश के साथ हजारी प्रसाद द्विवेदी के ललित निबंधों की युति स्वाभाविक है। रामचंद्र शुक्ल के तुलसी तो हजारी प्रसाद द्विवेदी के कबीर। द्विवेदीजी की ललित लेखनी, आम-अशोक से ले कर कुटज पर तक चली है, फिर क्या पलाश उनसे छूटा रह गया। छूटा तो नहीं, मगर वे पलाश के लिए कबीराना हो गए। उन्हें ‘शिरीष के फूल‘ के साथ पलाश और उससे जुड़ कर कबीर-वाणी याद आ जाती है- ‘दिन दस फूला फूलि के, खंखड़ भया पलास‘। फिर ‘बसन्त आ गया है‘ में मानो सांत्वना देते कहते हैं ‘पलाश ऐसा फूला है कि ईर्ष्या होती है।‘ सोचता हूं कि ऐसी क्या बात है कि वसंत-वनशोभा वाले इस वृक्ष का दंड ब्रह्मचारी धारण करते हैं। अब इन सब से बचते-बचाते आगे बढ़ना है। ध्यान रखना है कि अप्रासंगिक-सा होने लगे तो ललित निबंध बता देने पर बात बन सकती है, बशर्ते कुछ लालित्य हो, ललित के नाम पर ‘गलित-पलित‘ न हो।

कभी बड़ौदा गया था, वहां जिन सज्जन से मेरी पहली मुलाकात हुई, उन्हें मैंने अपना नाम-परिचय बताया, ‘राहुल‘, वे गर्मजोश मुस्कान सहित हाथ मिलाते हुए बोले- ‘आई एम केतुल, वेलकम!‘, कुछ खिसियानी कुछ मुस्कानी, मैंने पूछा आप कवि हैं?, तुक अच्छा मिला लेते हैं, राहुल-केतुल। बातचीत होने लगी, पता लगा कि यह नाम गुजरात में आम है, मैंने यह नाम पहली बार सुना था। वे पंडित निकले, राहु-केतु पर बात होने लगी। उन्होंने पूछा, आप पुरातत्व, मूर्तिविज्ञान से जुड़े हैं, आप ‘पलाशपुष्पसंकाशं‘ से परिचित नहीं हैं? प्रसिद्ध नवग्रह स्तोत्र में केतु का रंग, पलाश पुष्प जैसी कांति वाला, लाल कहा गया है। मैंने अपनी नासमझी पर परदा डालने मौका निकाला कि मंदिरों के प्रवेश-द्वार में सिरदल के नवग्रह पट्ट पर राहु-केतु को तो देखा है, किंतु पाषाण-कृति होने के कारण मेरा ध्यान उनके अंग-लक्षण, आकार-बनावट तक सीमित रहा। फिर पलाश के लाल को लाल कहना भी कोई कहना हुआ! बानगी स्वरूप पेश, कुन्तक (वक्रोक्तिजीवित में) अपने प्रयत्न की उपादेयता प्रतिपादित करते हुए कहते हैं- ‘यथातत्त्वं विवेच्यन्ते भावास्त्रैलोक्यवर्तिनः। यदि तन्नाद्भुतं नाम दैवरक्ता हि किशुकाः।।‘ त्रिलोकी में स्थित पदार्थों का यदि यथातथ्य रूप में विवेचन किया जाता है तो उसमे अद्भुतता नहीं होगी क्योकि किंशुक तो स्वभावतः लाल हुआ ही करता है (अतः यदि कवि यह वर्णन करे कि किंशुक लाल होता है तो उसे हम अ‌द्भुत न होने के कारण साहित्य या काव्य नहीं कहेंगे)।

पलाश/पलास, टेसू या रक्तपुष्प, इस पेड़ और फूल दोनों के लिए कहा जाता है पर किंजुल, किंशुक, केसू सामान्यतः फूल को कहा जाता है, इसी तरह पेड़ के लिए नाम मिलता है- काष्ठद्रु, ढाक, छिवला, त्रिपर्ण, ब्रह्मद्रुम और यूप्य। रोचक कि पत्र-पत्ता यानी ‘पर्ण‘ शब्द भी पलाश का समानार्थी है। इसके वनस्पति वैज्ञानिक नाम ‘ब्यूटिआ मोनोस्पर्मा‘ नाम में मोनोस्पर्मा तो समझ में आता था कि इसकी फली एकल-बीजी है, लेकिन ब्यूटिआ को ब्यूटी, सुंदर ही मानता था। पता चला कि यह अंगरेज वनस्पति विज्ञानी, जॉन स्टुअर्ट, अर्ल द ब्यूट से आया है, एकबारगी मन उदास हुआ, कुछ अपनी नासमझी, गलतफहमी पर और उससे कुछ अधिक यह जान कर कि ब्यूटिआ, ब्यूटी नहीं ब्यूट है, फिर याद कर लिया कि नाम में क्या रखा है, नाम-रूप से गुण-भाव तो नहीं बदल जाते। और क्या नाम भी नहीं बदल जाते, बातचीत में एक साथी आपत्ति कर रहे हैं ‘ब्यूटिआ मोनोस्पर्मा‘ नहीं ‘ब्यूटिआ फ्रोंडोसा‘। बस यह ध्यान रहे कि पलाश ‘फारेस्ट फायर‘ नहीं है, ‘फ्लेम ऑफ द फारेस्ट‘ है, पंचतत्व, महाभूतों में से एक। कवि नरेन्द्र शर्मा फागुनी-बसंती हो, लिखते हैं- ‘लग गयी आग; बन में पलाश, नभ में पलाश, भू पर पलाश। लो, चली फाग; हो गयी हवा भी रंगभरी छू कर पलाश।‘ अज्ञेय का ‘टेसू‘ भी कहता है- ‘इस वनखंडी में आग लगा दूं।‘ 

कभी बांग्ला गीत सुना था, जिसमें सीधे कमलनयन या पद्मलोचन के बजाय कहा गया है- ‘दाओ दरशन पद्म-पलाश लोचन‘। पलाश-लोचन यानि?, सोच में पड़ गया हूं- आंखें, मृगनयनी, खंजन-नयन या जैसा किसी ताम्रपत्र उत्कीर्ण लेख में आता है- ‘चकोरनयनं लिखितं सुवाक्यैः‘, और आंखें सिर्फ नेत्र-गोलक ही तो नहीं हैं, नीली, फीरोजी, बिल्लौरी, कजरारी आंखों के साथ भौंह/पलक, बरौनी!, किसे जोड़ कर कहा गया होगा पलाश-लोचन!, भेद नहीं पाता तब ‘संवेदनात्मक ज्ञान‘ से ‘ज्ञानात्मक संवेदना‘ की ओर बढ़, भाव में उतर गुनगुना सकते हैं?- ‘हमको तो जान से प्यारी हैं पलाशी आंखें!‘ बुद्धि तो काव्य-रस में बाधक हो जाती है- किसी कवि ने पलाश को मानों गुलाब के टक्कर में खड़ा कर रहा हो, कहता है- ‘जब जब मेरे घर आना तुम, फूल पलाश के ले आना तुम‘। ओ कवि! ऐसा कह कर तो तुम रास्ता ही बंद कर दे रहे हो, पलाश तो ‘दिन दस फूला ...‘ है।

रामविलास शर्मा नाम से आगरा वाले आलोचक पर ही ध्यान जाता है, उन्होंने कविताएं भी लिखीं, ‘तार सप्तक‘ के कवि हैं, यद्यपि उन्होंने कहा था- ‘पता नहीं कविता पढ़ कर अपरिचित मित्र मेरे बारे में किस तरह की कल्पना करेंगे। मैं उन्हें एक बात का आश्वासन देना चाहता हूं,- जैसे वे मेरी कविताओं के बारे में ‘सीरियस‘ नहीं हैं, वैसे मैं भी नहीं हूं।‘ फिर इसी नाम के साथ कभी दो कविता, ‘छत्तीसगढ़ की शाम‘ मिली थीं, उसी के साथ एक कविता ‘टेसू फूले भी थी। अनुमान हुआ यह कोई अन्य रामविलास शर्मा, प्रकृति का चितेरा कवि है। उनकी खोज-खबर मिली कि शायद मालवा निवासी थे, स्टेट ट्रांसपोर्ट वाले। लाल बस, स्टेट ट्रांसपोर्ट के कुछ बुजुर्ग परिचित बताने लगे कि 1963 में सड़क परिवहन के राष्ट्रीयकरण से मध्यप्रदेश राज्य परिवहन निगम बना, जो पूर्ववर्ती ‘मध्यभारत रोडवेज‘ और ‘सीपी ट्रांसपोर्ट सर्विसेज‘ के एकीकरण का परिणाम था। ये रामविलास मध्यभारत रोडवेज होते मध्यप्रदेश राज्य परिवहन निगम में आए, डिपो मैनेजर रहे। वे छत्तीसगढ़ में रहे या आना-जाना रहा। पिछली सदी के सातवें-आठवें दशक के भोपाल के साहित्यिक-सांस्कृतिक माहौल के लिए विश्वसनीय स्रोत डॉ. सुशील त्रिवेदी हैं, उन्होंने याद किया कि ये रामविलास शरद जोशी के करीबी थे, भगवत रावत, सोमदत्त गर्ग और घनश्याम ‘मधुप‘ के साथ होते थे। उनका संग्रह ‘कविता में सुबह‘ 1978 में साहित्य परिषद भोपाल से छपा था, तब चर्चित था, अब शायद ही कोई याद करता है। नाम पर अटक-भटक कर फिर पलाश पर आएं, उनकी कविता ‘टेसू फूले‘ की पंक्ति है- ‘अंग अंग में टेसू फूले, आँखों में रंगीन सपन‘। मित्र महेश भोपाल के दिनों को याद करते रहते हैं। वे ‘प्राच्य निकेतन‘, बिरला मंदिर के सहपाठी, वहां तब पर्यटन की भी पढ़ाई होती थी। इसी क्रम में बात निकली मध्यप्रदेश पर्यटन के होटल ‘पलाश‘ की। मैंने पर्यटन मंडल के अधिकारी से पूछ लिया था, कि क्या ऐसे पर्यटक-सैलानी भी आते हैं, जो पूछते हों कि ‘पलाश‘ क्या होता है। वे मुस्कुराए, होटल आने का न्योता दिया और पहुंचने पर होटल के सामने, परिसर में लगा पलाश का पेड़ दिखाया। कहा, सिर्फ नाम का नहीं, यहां सचमुच पलाश है और अंदर फागुनी-बासंती माहौल भी।

1757 वाली प्लासी की लड़ाईं के साथ देश का इतिहास तो बदला ही, पश्चिम बंगाल के पलाश-बहुल स्थान के नाम ‘पलाशी/पलासी‘ को भी बदल कर प्लासी हो गया। अब शेखर बंद्योपाध्याय की किताब के अंग्रेजी मूल में शीर्षक Plassey है, मगर उसके हिंदी अनुवाद ‘पलासी से विभाजन तक‘ में वह वापस आया है। छत्तीसगढ़ में पचासों गांव होंगे, जिन्हें पलाश/परसा से नाम मिला है। सिर्फ ‘परसा‘ नामधारी गांव तो हैं ही, परसाही, परसहा, परसदा भी कई-कई हैं। इसके अलावा परसा के साथ पानी, मुड़ा, बुड़ा, पारा, टोला, पाली, गुड़ी, डीह, खोर, खोल, खोला, भांठा, कांपा जैसे प्रत्यय जुड़ कर गांवों के नाम बने हैं। इनमें एक नाम परसाभदार भी है। गांव न बस पाया हो, गांवों के साथ जुड़ा ‘परसाभदेर‘ भूखंड अब भी सुनने मिल जाता है।

छत्तीसगढ़ में भदार/भदेर, परसा के समूह वाले इलाके के लिए कहा जाता है, ज्यों आम की अमरइया, महुआ की मउहारी, बांस की बंसवार, कउहा का रवार या बोइर का खोर। मेरे गांव का दक्षिणी भाग, जो सीमेंट फैक्ट्री आ जाने के कारण सीसीआइ भांठा कहलाने लगा, परसाभदेर था। भरकहा-भांठा, जहां परसा बहुतायत में, कहीं-कहीं बनबोइर और मकोइया। आजादी के बाद तक यहां कृष्णसार मृग होते थे, और आसपास हुम्मा यानी ग्रेट इंडियन बस्टर्ड भी। तीतुर, भठतीतुर, लमहा और कभी-कभी बरहा अब भी दिख जाते हैं। औषधीय उपयोग और उसके लाभ से कोई भी वनस्पति अछूती नहीं, फिर पलाश की क्या बात। औषधि रूप में प्रयोग और उससे लाभ-हानि का जिम्मा लेने से बचते, इसे गूगल के मत्थे छोड़ आगे बढ़ें। एक तरफ यज्ञ के लिए हवन-श्रुवा तो गंवई जीवन में दोना-पत्तल बनाने के लिए परसा के पत्ते और चूना-पोताई के लिए परसा-जरी की कूंची काम आती रही। पलाश की जड़ से निकाली रस्सी- ‘बांख‘, हल-नांगर का नहना-जोता के अलावा सुहाई, सींका के भी काम आती थी। और होली के लिए टेसू-फूलों से रंग बनाने का उद्यम, मेरे हमउम्र बचपन में अधिकतर ने किया है।

आधी सदी पुराने दिन। जांजगीर निवासी ख्यातनाम अधिवक्ता विजय कुमार दुबे जी ने हमें स्कूल में विज्ञान पढ़ाया, उनका स्नेह यथावत है। फोन पर प्रणाम कर लेता हूं। सुयोग बना है उनसे आशीर्वाद लेने का। उनका ललित निबंध संग्रह ‘पलाश‘ (सन 1993) है। पर्यावरण से प्रेरित इस संग्रह में विद्यानिवास मिश्र, प्रधान सम्पादकः नवभारत टाइम्स का संदेश प्रकाशित है, जिसमें वे लिखते हैं कि ‘... हर निबंध को सहज प्रकृति के सौंदर्य और उस सौंदर्य के मनुष्य मन पर पड़ते प्रभाव इसमें ऐसा अंकित है कि प्रकृति मनुष्य से अलग दिखाई नहीं पड़ती।‘ संग्रह में ‘टप टप टपके महुआ, मेरी धरती कहां गई, यह धरती कितना देती है, बह रहे जहां उन्चास पवन, माटी कहे कुम्हार से‘ जैसे पर्यावरण पर आधारित निबंध हैं। रचनाकार ने इन निबंधों के लिए कहा है कि ‘... पलाश के इन अनिंद्य पुष्पों को लोक-मानस की पूजा में समर्पित ...‘ मानों प्रकृति और पर्यावरण पर आधारित सारे निबंधों के लिए एक शब्द में पर्याय ‘पलाश‘ ही हो सकता है।

‘धर्मयुग‘ 19 मार्च 1978 के अंक में कैलाश गौतम की कविता ‘फागुनी दोहे‘ छपी, हमलोगों ने पढ़ी और रट ली। इसके दसेक साल बाद वे मल्हार आए, अपने मित्र रामप्रताप सिंह ‘विमल‘ जी के बुलावे पर, तब यह उनसे प्रत्यक्ष सुनी, इन दोहों में आम के बौर, कचनार, गुलमोहर, महुआ तो है, पलाश नहीं। मगर उनकी एक अन्य कविता में पलाशी फगुनाहट इस तरह है- ‘भीतर से खिड़कियाँ खुलेंगी, बौर आम के महकेंगे/ आंच पलाशों पर आयेगी, सुलगेंगे कुछ दहकेंगे/ घर का महुआ रंग लाएगा, चूना जैसे पान में। ‘कैलाश गौतम के ‘फागुनी दोहे‘ का पहला दोहा है- ‘लगे फूंकने आम के बौर गुलाबी शंख, कैसे रहें किताब में हम मयूर के पंख‘। ऐसी ही बात कही जाती है- ‘अबकी बिछड़े तो मुमकिन है ख्वाबों में मिलें, जैसे सूखे हुए कुछ फूल किताबों में मिले‘ इसी तर्ज पर अपनी पत्र-डायरी में पुराने मगर अब भी ताजा कुछ पलाश-स्मृतियां जतनी हुई हैं- 

दिनांक 23-2-1988 - ताला में धीरे-धीरे पलाश फूलने लगे हैं, दोपहर की चुभती धूप में नदी की ओर पहुंच जाने पर खिलते जा रहे पलाश और नदी में बनती उनकी परछाईं देखकर धूप की तेजी महसूस नहीं होती और पूरे वातावरण में भोर की खिलती धूप जैसी लालिमा बिखरती दिखाई देती है - होली की शुभकामनाएं।

दिनांक 3-3-1988 - ताला का नजारा अब कुछ तेजी से बदलने लगा है। पलाश खिलने में भी तेजी आ गई है, चारों ओर खुशी की लाली छाने लगी है। रास्ते में सेमल के सूखे बेजान से पेड़ों पर बड़े-बड़े लाल फूल लगे हैं और कुछ नीचे भी टपकने लगे हैं, जो हमसे जल्दी संवेदना ग्रहण कर बता रहे हैं कि वातावरण में गरमी घुलने लगी है। आम के बौर का तो हाल ही मत पूछो। महुआ के भी फूल आ गए हैं और हवा में इनकी गंध भी घुल गई है।

दिनांक 17-3-1988 - लगभग दस दिन पहले बिलासपुर से अम्बिकापुर के रास्ते में और अम्बिकापुर से यहाँ (डीपाडीह) आते हुए रास्ते में सेमल के पेड़ों को देख रहा था। लकादक फूलों से भरे पेड़। 7-8 फुट से 40-50 फुट तक के पेड़। सभी पर मस्ती का वही आलम। सेमल का पेड़ ध्यान से देखा है? बिना पत्तों के कांटेदार तो कभी उबड़-खाबड़ तनों वाले लम्बे-ऊंचे पेड़। एकदम सूने-सूने से, पर मनहूस नहीं और इनके फूलों को देखकर लगता था कि यह ला‌ली पूरे पेड़ की, साल भर की शुष्कता को अचानक प्रकट करने लगी हो, लगने लगता कि सेमल सिर्फ पेड़ ही नहीं पूरा का पूरा जिन्दा चरित्र है। अपने इस कमरे से साइट तक जाते हुए भी रास्ते में सेमल का एक ऊँचा पेड़ है, पर अब उसके सब फूल झड़ गये हैं, सेमल ने जैसे फिर से मानो मौन धारण कर लिया हो। यह मंभीरता उसके फलों के कारण भी हो सकती है, फल या सृजन के संग गंभीरता तो आती ही है। (दहकते दोपहर का फ्लेम आफ द फारेस्ट- ‘किं शुक?’ शुक जैसा। मगर इस मौसम में सेमल पर भी शबाब है और उसके फूल झड़ने के बाद हरे तोते की तरह फल लटकने लगते हैं, जो गरमी बढ़ने पर बिखर, फाहे बन उड़न-छू हो लेंगे।)

दिनांक 30-3-1988 - कल (बिलासपुर से डीपाडीह) रास्ते में आते हुए खूब पलाश के फूल दिखे। अभी बेतहाशा खिले हैं और नीचे झड़ने भी लगे हैं। जादुई चांदनी रात, जंगल के बीच में इनकी लाली देख कर लगता है कि जैसे पूरे जंगल पर सुहाग बगर गया हो - वनश्री सुहागन हो गई हो ... नटखट बसंत ने मांग भरते सिंदूर बिखरा दिया हो ... मंगलमय सुंदरता का झीना आवरण।

हाजिर नाजिर, ‘अकलम-खुद‘ यह लेखन, स्मृति-जन्य विभिन्न संदर्भों युक्त मौलिक, एआई मुक्त है। यह अवश्य संभव है कि इस लेख के ऑनलाइन होने के बाद यह एलएलएम-कंटेट बन कर, एआइ को समृद्ध करे। तो जैसी परंपरा मंगलाचरण की है, वैसी ही समापन पर कामना- ‘बेबी बूमर्स‘ पीढ़ी के इस अकलतरावासी, इन दिनों ‘प्रमुख, धरोहर परियोजना, बायोडायवर्सिटी एक्सप्लोरेशन एंड रिसर्च सेंटर‘ की ओर से- ‘जा एआइ, पलाश तेरी वंश-वृद्धि में सहायक हो, बाल-बच्चे सुखी रहें, तूने जेन-जी की सोच बदली, वे तेरी हैसियत बदल कर अल्फा-बीटा पैदा कर रहे हैं, गामा, डेल्टा, पाई होते ओमेगा से भी आगे निकल जाएं, एल्फाबेट, अलिफ-बे और अपना ककहरा भी जानें। पलाश की आवाजाही बरास्ते मन, साहित्य में, रन-बन में भी बनी रहे। स्क्रीन से बाहर मौसम न हो तो भी चित्त में पलाश की लहक-बहक रहे।
-राहुल कुमार सिंह

पुनश्च- 

आदरणीय सतीश जायसवाल जी का संदेश तथा प्रत्यक्ष में हुई चर्चा के तारतम्य में यह लेख लिखा गया है। सतीश जी का संदेश इस प्रकार था- 

पलाश : दृश्य में, संवेदनाओं में! एक गद्य संचयन की योजना ... 

पलाश अदम्य जिजीविषा का ग्रीष्मकालीन फूल है। धूप जितनी प्रखर होती है पलाश उतना ही दमकता है। सूर्य को चुनौती देता है। यह जितना जंगली है उतना ही घरेलू भी है। घर के आंगन तक चला आता है। पलाश पेंटिंग्स में मिलता है, फोटोग्राफी में मिलता है। इसके पौराणिक संदर्भ हैं। तो इससे जुड़ी कथा, किंवदंतियां भी जनजातीय समाज में व्याप्त हैं। औषधीय गुणों के साथ साथ लोक व्यवहार में भी पलाश के उपयोग बताए जाते हैं। 

पलाश को कविता में अच्छा विस्तार मिला है लेकिन गद्य में इसकी जरूरत है। एक सुगठित कथेतर में इस जरूरत के अनुकूल होगा। इसे ध्यान में रखकर एक संचयन की योजना आपके सामने रख रहा हूं। आपसे एक आलेख का आग्रह है। सामान्य तौर पर अढ़ाई, तीन हजार शब्दों को एक आलेख के लिए आदर्श माना जाता है। लेकिन "पलाश" की अपनी जरूरत और आपके मन का फैलाव शायद इस सीमा के बाहर भी जा सकता है। अलबत्ता हमारे पास समय की थोड़ी बंदिश होगी। ... 

इस पर मेरी अपनी मौज- हजारी प्रसाद द्विवेदी कहते हैं- जो कोई भी लिखता-पढ़ता है वह कर्मणा ब्राह्मण है। यहां सतीश जी ने लिखने को कहा है, लिख कर कर्मणा ब्राह्मण बनने का अवसर दिया है। आगे वे यह भी कह देते हैं कि दूसरे के इशारे पर कलम घसीटते हैं वे ‘शूद्र‘-ब्राह्मण हैं और खुद को इसी श्रेणी में रखते हैं। सतीश जी के इशारे पर लिखना और पंडित जी का फैसला, एक तरफ ब्राह्मण बनने का मौका दूसरी तरफ शूद्र ही सही, पंडितजी की जमात में शामिल, कौन शिरोधार्य न कर लेगा।