Showing posts with label रतनपुर. Show all posts
Showing posts with label रतनपुर. Show all posts

Saturday, October 14, 2023

जाना-अनजाना रायपुर

खारुन के मंथर प्रवाह के साथ मानव सभ्यता को कई ठौर ठिकाने मिले- कउही, परसुलीडीह, तरीघाट, खट्टी, खुड़मुड़ी, उफरा और जमरांव में सदियों की बसाहट के प्रमाण हैं। यह क्रम नदी के दाहिने तट पर मानों ठिठक गया, महादेव घाट-रायपुरा पहुंचते। हजार साल से भी अधिक पुराने अवशेष इतिहास को रोशन करते हैं। बसाहट को आकर्षित किया पूर्वी जल-थल ने। सपाट ठोस-मजबूत थल और उसके बीच जगह-जगह पर भरी-पूरी जलराशि। यही बसाहट- रायपुर, तीन सौ तालाबों का शहर बना।

मैदानी-मध्य छत्तीसगढ़, लगभग बीचों-बीच शिवनाथ से दो हिस्सों में बंटता है। छत्तीस गढ़ों के लिए कहा गया है, शिवनाथ नदी के उत्तर में अठारह और शिवनाथ नदी के दक्षिण में अठारह। ये सभी गढ़ राजस्व-प्रशासनिक केंद्र थे। कलचुरि शासकों के इन सभी छत्तीस गढ़ों का मुख्यालय रतनपुर था, किंतु अनुमान होता है कि शिवनाथ नदी के कारण और दक्षिणी अठारह गढ़ों की सीमा नागवंशियों से जुड़ी होने के कारण, इस अंचल में एक अन्य मुख्यालय आवश्यक हो गया।

कलचुरि शासक ब्रह्मदेव के दो शिलालेख पंद्रहवीं सदी के आरंभिक वर्षों के हैं, जिनसे ब्रह्मदेव के वंश में उसके पिता रामचंद्र के क्रम में सिंहण और लक्ष्मीदेव की जानकारी मिलती है। लक्ष्मीदेव को रायपुर शुभस्थान का राजा बताया गया है। शिलालेख से सिंहण द्वारा अठारह गढ़ जीतने और फिर उसके पुत्र रामदेव/रामचंद्र द्वारा नागवंशियों को आहत करने की जानकारी मिलती है। शिलालेख में रोचक उल्लेख है कि ‘नायक हाजिराजदेव ने हट्टकेश्वर मंदिर बनवाया ... रायपुर में रहने वाली सुंदर स्त्रियां जो कामदेव को जीवित करने के लिए स्वयं संजीवनी औषधियां हैं, यहां के सुखों के कारण कुबेर की नगरी को मन में तुच्छ समझती हैं।‘ कलचुरि शासकों के पुराने केंद्र रतनपुर की बुढ़ाती जड़ों के समानांतर रायपुर शाखा की नई पौध-रोपनी ताकतवर होती गई, और सन 1818 में छत्तीसगढ़ का मुख्यालय रतनपुर से रायपुर स्थानांतरित हो गया।

उन्नीसवीं सदी पूर्वार्द्ध के बाबू रेवाराम की पंक्तियां हैं-
मोहम भये सुत जिनके, सूरदे नृप नायक तिनके।
ब्रह्मदेव तिनके अनुज, मति गुण रूप विशाल। 
दायभाग लै रायपुर, विरच्यो बूढ़ा ताल।

मुख्य सड़क से जुड़े होने के कारण अब बूढ़ा तालाब और तेलीबांधा सामान्यतः जाने-पहचाने जाते हैं, मगर इनके साथ आमा तालाब, राजा तालाब, कंकाली तालाब, महाराजबंद सहित मठपारा के तालाब आदि कई जलाशयों का अस्तित्व अभी बचा हुआ है, जबकि पंडरीतरई, रजबंधा का नाम ही रह गया है और लेंडी तालाब अब शास्त्री बाजार है।

उन्नीसवीं सदी में रायपुर के विकास के कुछ मुख्य कार्यों की जानकारी मिलती है, जिनमें 1804 में भोसलों और अंग्रेजों के मध्य संधि के फलस्वरूप डाक सेवा का आरंभ हुआ। 1820-25 के दौरान रायपुर-नागपुर सड़क निर्माण कराया गया। राजकुमार कालेज परिसर का लैंप पोस्ट, जिस पर ‘नागपुर 180 मील‘ अंकित है, अब भी सुरक्षित है। 1825 में सदर बाजार मार्ग निर्माण हुआ। 1825-30 के बीच मिडिल तथा नार्मल स्कूल और दो अस्पतालों का निर्माण हुआ। बाबू साधुचरणप्रसाद ने ‘भारत-भ्रमण में लिखा है- ‘सन 1830 में रायपुर का वर्तमान कसबा बसा। पुराना कसबा इससे दक्षिण और पश्चिम था।‘ 1860 में रायपुर से बिलासपुर और रायपुर से धमतरी के लिए सड़क बनी। रायपुर में म्युनिसिपल कमेटी का गठन 1867 में हुआ। 1868 में केंद्रीय जेल भवन, गोल बाजार तथा दो सार्वजनिक उद्यानों का निर्माण हुआ। 1875 में राजनांदगांव के महंत घासीदास के दान से संग्रहालय का निर्माण हुआ, जो जनभागीदारी से बना देश का पहला संग्रहालय है।

1887 में टाउन हॉल, सर्किट हाउस, अस्पताल भवन बना तथा इसी दौरान लेडी डफरिन जनाना अस्पताल भी खुला। 1888 में रायपुर तक आई रेल की बड़ी लाइन, आगे खड़गपुर होते 1900 में कलकत्ता से जुड़ गई। 1890 में रायपुर-कलकत्ता सड़क, रायपुर-बलौदा बाजार सड़क और धमतरी रेल लाइन बनी। 1892 में ‘बलरामदास वाटर वर्क्स‘ नाम से खारुन से जल-प्रदाय आरंभ हुआ। सरकारी मिडिल स्कूल 1887 में गवर्नमेंट हाई स्कूल का दरजा पा गया, तब यह कलकत्ता विश्वविद्यालय से फिर 1894 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से संबद्ध हुआ। 1894 में राजकुमार कॉलेज जबलपुर से रायपुर आ गया, 1939 तक यहां सिर्फ राजकुमारों को प्रवेश दिया जाता था। महाविद्यालयीन शिक्षा के लिए 1938 में दाऊ कामता प्रसाद के दान, शिक्षाशास्त्री जे. योगानंदम की इच्छा-शक्ति और तत्कालीन नगर पालिका अध्यक्ष ठाकुर प्यारेलाल सिंह के सद्प्रयासों से रायपुर में छत्तीसगढ़ कॉलेज की स्थापना हुई।

1867 में म्युनिसिपल बना, जिसकी सीमा में रायपुर के साथ चिरहुलडीह, डंगनिया और गभरापारा बस्ती शामिल थी। टिकरापारा से संलग्न गभरापारा लगभग भुला दिया गया नाम हैै। गभरा शब्द भी सामान्य प्रचलन में अब नहीं है। टिकरा-गभरा जोड़े के साथ ध्यान रहे कि गभरा या गभार, टिकरा की तरह कृषि भूमि का एक प्रकार है, जिसका आशय गहरी उपजाऊ भूमि होता है। रायपुर की शान रहे, रजवाड़ों और जमींदारों के बाड़े- खैरागढ़, रायगढ़, खरियार, छुईखदान, छुरा, कवर्धा, फिंगेश्वर, बस्तर, कोमाखान आदि अधिकतर अब स्मृति-लोप हो रहे हैं। और बीसवीं सदी के आरंभ में सिंचाई विभाग की स्थापना और नहर निर्माण के साथ महानदी का पानी खेतों तक पहुंचने लगा। तब तक रायपुर की जनसंख्या 30000 पार कर चुकी थी।

सबसे पुरानी कामर्शियल बैंक, 1912 में स्थापित इलाहाबाद बैंक है। को-ऑपरेटिव बैंक 1913 में और इंपीरियल बैंक 1925 में स्थापित हुआ। बिजली अक्टूबर 1928 में आई, मगर व्यवस्थित होने में समय लगा, जब 1939 में 240 किलोवॉट का पावर हाउस स्थापित हो गया। 1950-51 में ईस्टर्न ग्रिड सिस्टम के अंतर्गत रायपुर पायलट स्टेशन बना, तब रायपुर पावर हाउस का काम शासकीय विद्युत विभाग द्वारा किया जाने लगा।

पुराने रायपुर को इन शब्द-दृश्यों में देखना रोचक है- 1790 में आए अंग्रेज यात्री डेनियल रॉबिन्सन लेकी बताते हैं- यहां बड़ी संख्या में व्यापारी और धनाढ्य लोग निवास करते हैं। यहां किला है, जिसके परकोटे का निचला भाग पत्थरों का और ऊपरी हिस्सा मिट्टी का है। किले में पांच प्रवेश द्वार हैं। पास ही रमणीय सरोवर है। पांच साल बाद आए कैप्टन जेम्स टी. ब्लंट, गिनती बताते हैं कि नगर में 3000 मकान थे। नगर के उत्तर-पूर्व में बहुत बड़ा किला है, जो ढहने की स्थिति में है।

सन 1893 का विवरण यायावर बाबू साधुचरण ने दिया है, जिसके अनुसार रेलवे स्टेशन से एक मील दूर पुरानी धर्मशाला से दक्षिण गोल नामक चौक (गोल बाजार) में छोटी-छोटी दुकानों के चार चौखूटे बाजार हैं। गोल चौक से दक्षिण दो मील लंबी एक पक्की सड़क है। जिसके बगलों में बहुतेरे बड़े मकान और कपड़े, बर्तन इत्यादि की दुकानें बनीं हैं। ... प्रधान सड़कों पर रात्रि में लालटेने जलती हैं। ... एक पुराना जर्जर किला देख पड़ता है, जिसको सन् 1460 ई. में राजा भुवनेश्वर देव ने बनवाया था। ... किले के दक्षिण आधा वर्ग मील में फैला महाराज तालाब है। तालाब के बांध के निकट श्रीरामचंद्र का मंदिर (दूधाधारी) खड़ा है। जिसको सन् 1775 में रायपुर के राजा भीमाजी (बिंबाजी) भोंसला ने बनवाया।‘ इस विवरण में कंकाली तालाब, आमा तालाब, तेलीबांधा, राजा तालाब का भी उल्लेख है। कोको तालाब के लिए बताया गया है कि इसमें गणेश चौथ के अंत में गणपति जी की मूर्तियां विसर्जित होती हैं, (ध्यान देने वाली बात कि इसी विवरण-वर्ष यानि 1893 में तिलक ने गणेशोत्सव को सार्वजनिक उत्सव का स्वरूप दिया था।) व्यापार संबंधी जानकारी आई है कि गल्ले, कपास, लाह (लाख) और दूसरी पैदावार की सौदागरी बढ़ती पर है। साथ ही यह भी बताया गया है कि वर्तमान कस्बे के दक्षिण और पश्चिम छोटी नदी के किनारे महादेव घाट तक रायपुर का पुराना कस्बा बसा था।

रायपुर की जनांकिकी की दृष्टि से 2011 की जनगणना में 10 लाख आबादी का आंकड़ा पार यह बसाहट, यही कोई 500 साल बीते, खारुन नदी के किनारे का रायपुरा फैलकर पुरानी बस्ती के साथ रायपुर बनने लगा। कलचुरी आए और राजधानी की नींव पड़ी। अब तक सरयूपारी ब्राह्मण आ चुके थे। राजपूत, पहले कलचुरियों के साथ और बाद में गदर के आगे-पीछे आए। वैश्य, यहां रहते छत्तीसगढ़िया दाऊ बन चुके थे। राजधानी ने अन्य को भी आकर्षित किया। मठपारा, कुम्हारपारा, बढ़ईपारा, अवधियापारा, कायस्थपारा, ढीमरपारा, मौदहापारा, यादवपारा, सोनकर बाड़ा, गॉस मेमोरियल, बूढ़ा तालाब, तेलीबांधा वाले इस शहर में चौबे कालोनी, शंकर नगर, सुंदर नगर और विवेकानंद नगर भी बसा। रजबंधा का शहीद स्मारक, प्रेस काम्प्लेक्स तक सफर तो पूरा अध्याय है।

इसी दौरान अठारहवीं सदी के मध्य में भोंसलों के साथ मराठी परिवार आ गए। अन्य में मोटे तौर पर डॉक्टर, वकील पेशे में और रेलवे के काम में बंगाली आए। रेलवे ठेकेदारी, तेंदू पत्ते और लकड़ी के व्यवसाय के लिए गुजराती आए। बुंदेलखंडी जैनों की बड़ी खेप की आमद मारवाड़ियों के बाद हुई। स्वाधीनता-विभाजन के दौर में सिंधी, पंजाबी आए। रोटी, कपड़ा और मकान के मारे, इन्हीं का व्यवसाय यानि गल्ला-राशन, होटल-रेस्टोरेंट, कपड़े की दूकान और बिल्डर-रियल स्टेट का काम करते, दूसरों को मुहैया कराते, अपने लिए इसका पर्याप्त इंतजाम कर लिया। इस क्रम में टुरी हटरी पर गोल बाजार और सदर फिर इन सब पर मॉल हावी हो गया। शहर अब नवा रायपुर तक फैल कर अटलनगर अभिहित है। उसके आर्थिक परिदृश्य में, व्यवसायिक प्रभुत्व सिंधी-पंजाबी और जैनों का है तो कामगारों में उड़िया और तेलुगू पैठ न सिर्फ नगर, बल्कि घर-घर में बन गई है। नगर में सामान्यतः आपसी भाईचारा बना रहा है, छत्तीसगढ़ी सहज स्वीकार्यता का यह सबल उदाहरण है और इस दृष्टि से रायपुर, राज्य की राजधानी के साथ अपने स्वाभाविक औदार्य में छत्तीसगढ़ का प्रतिनिधि शहर भी है।

पुनश्च- दैनिक भास्कर, रायपुर के 35 स्थापना दिवस पर रायपुर के लिए लिखना था। रायपुर के इतिहास से वर्तमान तक का सफर सीमित शब्दों में लिखना चुनौती जैसा था, यह भी कि अब तक जो लिखा जाता रहा है, उससे अलग और क्या हो सकता है। फिर भी प्रयास किया कि नये-पुराने रायपुर के लिए अपनी समझ को झकझोर कर देखा जाए कि क्या निकलता है, जो बना वह ऊपर है, जो समाचार पत्र में आया, वह आगे है-
(यहां आए पुराने तथ्यों को एकाधिक और यथासंभव मूल-स्रोतों से लिया गया है।डॉ. लक्ष्मीशंकर निगम जी ने उनके लेखन में आई जानकारियों के उपयोग की अनुमति दी तथा हरि ठाकुर जी की सामग्री से कुछ महत्वपूर्ण दुर्लभ जानकारियां, उनके पुत्र आशीष सिंह जी के माध्यम से मिलीं।अपने दौर की जानकारी और उनकी व्याख्या मेरी है।) 


Sunday, July 9, 2023

कंठी देवल बनाम मुकरबा

अगस्त-सितंबर 1990 में बिलासपुर के समाचार पत्रों में खास खबर होती थी, इन समाचार कतरनों के संदर्भ में स्पष्ट करना आवश्यक है कि तब राज्य शासन के बिलासपुर पुरातत्व कार्यालय में श्री जी. एल. रायकवार और राहुल कुमार सिंह यानि मैं पदस्थ थे। स्वाभाविक ही मीडिया के लिए इस ‘ऐतिहासिक सनसनी‘ के साथ पत्रकार बंधुओं का हमारे कार्यालय में लगातार आना-जाना हुआ। खबरों की भाषा-सामग्री और शिलालेख का पठन-व्याख्या से हमारे कार्यालय की भूमिका को आसानी से समझा जा सकता है। शिलालेख का पाठ नीचे के समाचार के साथ आया है। वस्तुतः (संशोधन संभव) पाठ होगा- ऊ नमः सिवाय। महंत? द/सोवाय श्री भगवानां भी-/सन्यासी संतोसगीरि के करनी करता- देव स्(थ)/लः सुभःमस्तु समप...। इसी तारतम्य में मुकरबा-मकबरा, छतरी और समाधि पर कुछ बातें, तीन समाचार कतरन के बाद यहां लेख की गई हैं।

छत्तीसगढ़ के अनमोल धरोहर की दुर्दशा खुले आसमान के नीचे बिखरी पड़ी है रतनपुर की संस्कृति 
कण्ठीदेवल मंदिर में समाधिस्थ अवस्था में मानव हड्डियाँ मिली ...

बिलासपुर ऐतिहासिक नगरी रतनपुर के कण्ठीदेवल मंदिर के गर्भगृह की खुदाई के दौरान मानव हड्डियां मिलने से इस बाात की संभावना बलवती हो गर्ह है कि वास्तव में यह शिवमंदिर न होकर वहां के शासक या किसी महन्त की समाधि है। यह मंदिर महामाया कुण्ड के सामने अवस्थित था, जो कि वर्तमान में विद्यमान नहीं है। भारतीय पुरातत्व विभाग ने पुनर्निमाण के नाम से इसे पूरी तरह तोड़ दिया है। पन्द्रहवीं शताब्दी के आसपास निर्मित कण्ठीदेवल मंदिर इसलिए भी महत्व है, चूंकि मराठाकाल की स्थापत्य शैली का पंचकोणीय गुम्बद वाला, मुगलिया शैली का सम्भवतः प्रथम दुमंजिला मंदिर है। जिस ढंग से, इसका निर्माण कार्य चल रहा है, लगता है कि भारतीय पुरातत्व विभाग, ऐतिहासिक दस्तावेज के रूप में विद्यमान छत्तीसगढ़ के इस अनमोल धरोहर के साक्ष्य मिटा कर रख देगा।

कण्ठीदेवल मंदिर के गर्भगृह में स्थापित शिवलिंग के नीचे, खुदाई करने पर मात्र दो मीटर चालीस सेन्टीमीटर नीचे मानब हड्डियाँ उर्ध्वाधर समाधिस्थ अवस्था में प्राप्त हुई है। वैसे भी महामाया मंदिर को प्राचीन तांत्रिक सिद्ध शक्ति पीठ माना जाता है। शैव सम्प्रदाय के अन्तर्गत कौल कापालिक भी तंत्र मार्ग का अनुसरण करते है। अतः एक सम्भावना यह भी सम्भावित है, कि भैरव उपासकों के द्वारा इस स्थल का उपयोग तंत्रमंत्र साधना के लिए किया जाता हो। मानव हड्डियाँ जिस स्थान में समाधिस्थ अवस्था में मिली है, वहां शव के पास, सिंदूर, बंदन, अक्षत या सिक्के वगैरह नहीं मिले है, इससे स्पष्ट होता है कि वास्तव में वह किसी महान व्यक्ति की समाधि है। कण्ठी देवल का प्रचीन संस्कृत साहित्य के शाब्दिक अर्थ के अनुसार देवकुल होता है। देवकुल के बारे में यह बात पुरातत्व सर्वेक्षण में आती है, कि पूर्व में मृत राजाओं की पाषाण प्रतिमाओं को पूर्वजों को देखने के लिए प्रदर्शित किया जाता था। वास्तव में कण्ठी देवल मंदिर कोई मंदिर नहीं अपितु शासनाधिपति की याद के लिए इस तरह के स्मारक का निर्माण कराया गया था। इस बात का प्रमाण टीकमगढ़ जिले के ओरछा में बेतवा नदी के किनारे (देवकुल) परिपाटी के मंदिर में राजारानी की प्रतिमाएं स्थापित है।

रतनपुर का कण्ठीदेवल मंदिर चार पांच सौ साल पुराना बताया जाता है। मराठा काल के मंदिर के बारे में पुरातत्वविद् यह मानते हैं, कि यह मंदिर प्राचीन भग्न मंदिरों से प्राप्त स्थापत्य खण्डों से निर्मित है। चूंकि पूर्व में मंदिरों की दीवारों में प्रस्तर की प्राचीन प्रतिमाएं जड़ी हुई थीं। इन प्रतिमाओं में शिशु सहित मातृत्व भाव महिला की बच्चे को स्तनपान कराते दिखाया गया है। इस मूर्ति के दोनो तरफ सिंह का किर्तीमुख बना है। दूसरी प्रस्तर की शालभंजिका की प्रतिमा है, जबकि तीसरी प्रतिमा लिगोद्भव शिव की तथा एक अन्य प्रस्तर की आसनस्थ कलचुरी शासक की प्रतिमा उत्किर्णीत है। जिसके कारण यह मान जाता है, कि यह मंदिर बाद में काल में निर्मात कराया गया है। कण्ठीदेवल मंदिर के समीप अनेक चौरानुमा, समाधियां है जो छोटे महन्त शिष्यों राज्य परिवार के शासको तथा सती नारी की भी हो सकती है। सम्भावना है चूंकि रतनपुर के समीप कोई नदी न होने के कारण, इसी स्थान में राजकुल का श्मशान था।

मराठा काल के स्थापत्य कला एवं मुगलिया शैली का प्राचीन कण्ठीदेवल मंदिर वर्गाकार बूतरे पर निर्मित था। इस मंदिर के सम्मुख में प्रारंभ में मण्डप रहा होगा। तथापि अब निर्माण के कारण ४.७६ मीटर लम्बा ४.७६ मीटर चौडा चालीस फिट की ऊंचाई वाला मंदिर को तोड़ दिया गया है। नये निर्माण के कारण नीव की खुदाई कर, सीमेटकार्य पूर्ण कर लिया गया है। दूर से देखने पर इस समय सपाट मैदान दिखाई पड़ला है। मंदिर के पत्थरों को बाजू की जमीन में नम्बर डालकर रख दिया गया है, जिसे देखने पर एकबारगी ऐसा लगता है कि मानो पत्थरों के कब्रस्तान में पहुंच गये हो। एकदम खुले आसमान के नीचे रखे इन पत्थरों पर बारिश ठण्ड और कड़ी धूप की सीधी मार पड़ रही है। भारतीय पुरातत्व विभाग ने सन् ८७ मे कण्ठीदेवल मंदिर को इसलिए तोड़ दिया चूंकि गिर रहा था। ऐतिहासिक महत्व के इस मंदिर को गिरने से बचाना जरूरी भी था अतएव भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के छत्तीसगढ़ जोन के भुवनेश्वर मुख्यालय ने तोड़ने का आदेश दे दिया। बिलासपुर में भारतीय पुरातत्व विभाग का उप मण्डल छोटा सा कार्यालय है, जिसके अन्तर्गत सम्भाग के बीस पच्चीस पुराने और महत्वपूर्ण स्मारक संरक्षित है। इसका एक दुःखद पहलू यह है, कि चूंकि यहां न तो कोई योग्य अधिकारी नियुक्त है और न ही इस कार्यालय के पास पर्याप्त अधिकार ही है। इसलिए छोटे मोटे काम के लिए उड़ीसा के भुवनेश्वर कार्यालय का मुंह ताकना पड़ता है।

आधा तीतर आधा बटेर:- आश्चर्यजनक बात है, कि भुवनेश्वर (उड़ीसा) से संचालित, छतीसगढ़ के पुरातात्विक वैभव के बारे में कितना विरोधाभास है कि कुछ बड़े अधिकारियों को जिन्हें न तो छत्तीसगढ़ से मतलब है न तो यहां के पुराने स्मारको से भावनात्मक ढंग से जुड़े हैं न तो ठीक ढंग से हिन्दी जानते, और यहां के छोटे कर्मचारी जिन्हें उनकी भाषा समझ में नहीं आती, कुल मिलाकर आधा अधूरा, आधा तीतर आधा बटेर समझने वाले कुछ अधिकारी पुरातत्व सम्पदा को तुड़वाकर भुनेश्वर में बैठे हैं। पुरातत्व अधिकारी यदाकदा कुछ आते हैं, देख कर औपचारिकता निभाकर वापस चले जाते हैं।

क्या ऐतिहासिक मंदिर पहले जैसे बनेगा:- पुरातत्वविदों का कथन है, कि कण्ठीदेवल मंदिर का हश्र, मल्हार के उस मंदिर की भांति होगा जो आठवीं शताब्दी का था। उस मंदिर को इसी तरह खो दिया है। आज के हालत यह है कि सन् ८० मे पुननिर्मित इस मंदिर के जो कागजात है, उनका संदिग्ध ढंग से गुम होना शुरू हो गया है। इसके बारे में यह भी कहा जा रहा है, कि वर्तमान में श्री एम. आर. चतुर्वेदी (संरक्षक सहायक) और बी.बी. सुखदेव फोरमेन काफी उत्साही है परन्तु यहां अभी किसी काफी बुजुर्ग और जानकार वरिष्ठ अधिकारी की आवश्यकता है ताकि पुराने स्मारक की रक्षा हो सके। नहीं तो बाद में बड़े अधिकारी अपनी गर्दन बचाने के लिए यहां से कागजात गुम करना शुरू कर देंगे।

प्रस्तरखण्डों की चोरी- कण्ठीदेवल मंदिर की हिफजात के लिए हालांकि वहां तीन व्यक्ति रहते है, परन्तु इसके बावजूद मंदिर से प्रस्तर खण्डो को निकाल कर खुले मैदान में नम्बर डालकर रखे गये प्रस्तर खण्डों की चोरी जाने की जानकारियां मिल रही है।
राजूतिवारी
*    *    * 
रतनपुर का ऐतिहासिक दस्तावेज कण्ठीदेवल 
अवशेष सहित नरकंकाल की सुरक्षा आवश्यक 

(कार्यालय प्रतिनिधि द्वारा) 

बिलासपुर. ऐतिहासिक नगरी रतनपुर स्थित कण्ठी देवल मंदिर के गर्भगृह की खुदाई के दौरान मिली मानव हड्डियों की सुरक्षा आवश्यक हो गई है। मराठा काल की मुगलिया शैली का पंचकोणीय गुम्बद वाले इस मंदिर को भारतीय पुरातत्व विभाग ने पुनर्निर्माण के नाम तुड़वा दिया है। मंदिर के पत्थर खुले आसमान नीचे तथा मंदिर के भीतर और बाहर पत्थरों में उत्कीर्णित कलापूर्ण प्राचीन मूर्तियां एक साधारण झोपड़ी में पड़ी हुई है।

मराठा स्थापत्य काल की मुगलिया शैली का पंचकोणीय गुम्बद वाले मंदिर को भारतीय पुरातत्व विभाग ने पुनर्निर्माण के नाम से तुड़वा दिया है। मानव हड्डियों के मिलने से पुरातत्व विभाग के अधिकारियों का मानना है, कि उपरोक्त मानव कंकाल और कण्ठी देवल मंदिर का निर्माण वर्ष एक समय का है। अब पुरातत्व विभाग का सिरदर्द है, कि वह हड्डियों का परीक्षण करा कर मंदिर के निर्माण कर्ता का पता लगाये। वैसे इस मंदिर के बारे में पुरातत्वविदों का मानना है कि रतनपुर कलचुरियों के काल से ही राजधानी रही है। साथ ही वहां की भौगोलिक परिस्थितियां, मंदिर निर्माण तथा ऐतिहासिक संम्भावनाओं के आधार पर यह भी कहा जाता है कि छत्तीसगढ़ की राजधानी के अलावा भी यह स्थान तीर्थस्थल के रूप में मल्हार, खरौद, शिवरीनारायण के समकक्ष सम्भवतः विख्यात रहा होगा। ऐसा समझा जा रहा है कि पातालेश्वर, लक्ष्मणेश्वर के समान यह मंदिर नील कण्ठेश्वर के नाम से कलचुरि काल में प्रसिद्ध रहा होगा। चूंकि ख्याति प्राप्त होने के कारण भग्नोपरांत मराठा शासकों ने धरोहर को सुरक्षित रखने के लिये मुगल शैली में इसका निर्माण करा दिया होगा। 

बाद में कलचुरियों एवं मराठा शासकों के पतन के पश्चात् रत्नपुर श्रीहीन हो गया और जनमानस में यह मंदिर केवल, कण्ठी देवल मंदिर भर रह गया। नर कंकाल के मिलने से लोगों में काफी उत्सुकता बढ़ गई है और इस बात की चर्चा सरगर्म हो गई है कि वास्तव में नरकंककाल की आयु क्या होगी? वैसे पुरातत्व विभाग के द्वारा खुदाई के दौरान मिलने वाले नर कंकाल पांच हजार तक सुरक्षित प्राप्त भी हुए हैं। भोपाल से लगभग तीस किलोमीटर दूर भीमबैठका शैलाश्रय में डा. वाकणकर एवं सागर विश्वविद्यालय के सहयोग से की गई खुदाई के दौरान मानव नर कंकाल प्राप्त हुआ जो कि सम्भवतः तीन से पांच हजार वर्ष प्राचीन है।

कण्ठीदेवल मंदिर में प्राप्त पत्थर की शिशु सहित मातृका की ग्यारही एवं बारहवीं शताब्दी इस्वी की प्रतिमा है, जिसमें शिल्प खण्ड पर प्रकोष्ठ के मध्य गोद में, शिशु को दुलारते हुए माता का भावपूर्ण अंकन किया गया है। इसी प्रकार मंदिर में आठवीं नवीं सदी इस्वी की शालभंजिका मिली है। पाषाण में उत्कीर्णित यह प्रतिमा नारी सौंदर्य तथा अलंकरण में अद्वितीय है। उसके विविध आभूषण केश विन्यास तथा परिधान में सूक्ष्म अलंकरण तथा मौलिकता स्पंदित है। शालभंजिका के अतिरिक्त वृक्ष में फल खाते तथा उछलते कूदते वानर सहित फूल जुगते हुए पारम्परिक पक्षियों का भी अंकन है।

इसी प्रकार कण्ठी देवल मंदिर के भिती में जड़ी शिल्प खण्ड में शिव की सर्वाेच्च सत्ता का मूर्तिमान किया गया है। लिंगोद्भव की यह कथा, शिवपुराण, वायु पुराण तथा शिल्प संहिताओं मे उपलब्ध है। कथा के अनुसार ब्रह्मा तथा विष्णु के बीच सर्वाेच्चता सिद्ध करने के लिये विवाद होने लगा। 

इसी बीच उनके मध्य एक ज्योतिर्यम स्तम्भ प्रकट हुआ जिसका आदि और अन्त का पता लगाने में दोनों देव असफल हुये। अन्त में दोनों हारकर विनम्र स्तुति करने लगे। इससे यह सिद्ध हुआ कि सभी देवताओं में शिव ही सर्वश्रेष्ठ है। चित्र में ज्योति स्तम्ब विवादरत ब्रह्मा, विष्णु तथा अन्त में आराधना करते विष्णु दृष्टव्य है। 
*    *    *
रतनपुर के ऐतिहासिक स्मारक की टूटी कड़ी का महत्वपूर्ण सूत्र मिला
कण्ठीदेवल मंदिर का मानव कंकाल संतोष गिरि सन्यासी का ...

बिलासपुर. रतनपुर स्थित कण्ठीदेवल मंदिर में समाधिस्थ कंकाल श्री संतोष गिरी नामक किसी सन्यासी की है। यह बात, कंठी देवल मंदिर की पुर्नसंरचना के लिए, शिलाखण्डों को उपर से उतारते समय, पश्चिम दिशा में जंघा भाग पर प्राप्त एक शिलालेख से मालूम होती है। इस शिलालेख में, देवनागरी लिपि में कुल पांच पंक्तियां है। शिलालेख का आकार ५२ बाई २७ बाई १३ सेन्टीमीटर है।

शिलालेख में मिले पांच पंक्तियों के देवनागरी में अनुवाद किया गया है, उसका शब्दशः इस प्रकार है। प्रथम पंक्ति - नमोः शिवाय द्वितीय पंक्ति - श्री भगवानाः। तीसरी पंक्ति - सन्यासी संतोष गिरि चौथी पंक्ति - करनी अंतिम पांचवीं पंक्ति - लः सुभःमस्तु सम।

शिलालेख के बारे में ऐसा समझा जाता है, कि इसमें अधिक पंक्तियां रही होंगी जो प्रस्तर के घिसने से मिट गई होंगी या खोदी नहीं जा सकी होंगी। वैसे, शिलालेख का शुभारंभ स्तुतिमान से होता है। इस शिलालेख में, सन्यासी संतोष गिरी का नाम उल्लेखित है। लेख के आधार पर यह अधिकतम दो सौ वर्ष प्राचीन है। शिलालेख मिलने के पश्चात् इस बात की सम्भावना बलवती हो गई है मंदिर से प्राप्त अस्थि कंकाल, संन्यासी संतोष गिरी की है। सूत्रों का इस महत्वपूर्ण उपलब्धि के बारे में मानना है कि चूंकि अस्थी कंकाल मूलतः सवाधान के रखा गया था तथा मृतक का सिर उत्तर में और पैर दक्षिण की ओर था। चूंकि खुदाई के दौरान अस्थियों के टुकड़ों में जबड़ा, बांह, पैर, घुटने तथा खोपड़ी आदि मिले है।

मृत सन्यासी का आयु पैतालीस वर्ष से साठ वर्ष के बीचः:- प्राप्त अस्थि कंकाल के अवलोकन करने से एक बात यह भी सामने आयी है, कि चूंकि कंकाल के मिले जबड़े में पूरे दांत उपस्थित है, जिससे यह अनुमान लगाया जा सकता है, कि मृतक सन्यासी की उम्र पैतालीस से लेकर साठ वर्ष के बीच की रही होगी। 

अस्थियां क्षरित होने के बावजूद सुरक्षित:- सन्यासी संतोष गिरी की अस्थियों के बारे में विशेषज्ञों का कथन है कि हालांकि समय की मार से, समाधिस्थ हड्डियां क्षरित हो चुकी है परन्तु इसके बावजूद हड्डियाँ सुरक्षित है। वैसे छानबीन में एक बात यह भी आयी है, कि प्राप्त अस्थि कंकाल कण्ठीदेवल, मंदिर के गर्भगृह के नीचे केन्द्र से दो तीन फिट हट कर है।

मंदिर निर्माण अनुमान:- रतनपुर के ऐतिहासिक कंठीदेवल मंदिर के बारे में पुरातत्वविदों का मानना है कि इस मंदिर में विभिन्न काल की कला शैली एवं धर्म सम्प्रदाय की प्रतिमाएं तथा स्थापत्य खण्ड सहज उपलब्धता की दृष्टि से इकत्रित कर उन्हें मंदिर में जड़ दिया गया जिससे यह पता लगाना उस समय तक कठिन काम है जब तक की किसी शिलालेख में इसका उद्धरण न हो। वैसे कण्ठी देवल मंदिर के पूर्व की ओर निर्मित इस मंदिर के बाजू में ईंट निर्मित स्मारक भी किसी महन्त या राजपरिवार की समाधि होने की आशंका व्याप्त की गयी है।

भारतीय पुरातत्व विभाग की लापरवाही:- पुरातत्व विभाग का मुख्य मण्डल कार्यालय भुवनेश्वर में स्थित है। बिलासपुर में संरक्षण सहायक और पुरातत्व विभाग ने एक फोरमेन की नियुक्ति की है। जानकारी के अनुसार भारतीय पुरातत्व के बिलासपुर शाखा में अब कंठीदेवल मंदिर में पुनर्निमाण के लिए शिलाखण्डों को उतारा गया उस समय सर्किल कार्यालय भुवनेश्वर से सभी लोग उपस्थित थे। सभी कोनो से शिला उतारे गये, किन्तु जब इसका निर्माण प्रारंभ हुआ तब, इसका सारा सिर दर्द बिलासपुर कार्यालय पर थोप दिया गया और बलि का बकरा बनाने के लिए दोनों स्थानीय अधिकारियों पर ऐसी जिम्मेदारी सौप दी गई, जो साधनहीन है। जबकि जानकार अधिकारियों मानना है कि मंदिर का पुननिर्माण दुरुह कार्य है जबकि इसके लिए भारतीय पुरातत्व विभाग का भुवनेश्वर कार्यालय इसे एक अभियान के रूप में यहां स्थापत्य इंजीनियर, पुरातत्व मानचित्रकार, वरिष्ठ तकनिकी दल एवं रसायनिक परीक्षण विभाग का होना आवश्यक है।

आश्चर्य की बात तो यह है कि बिलासपुर स्थित भारतीय पुरातत्व कार्यालय के अन्तर्गत २०-२५ महत्वपूर्ण पुरातत्व इमारत है परन्तु इन दो कनिष्ठ अधिकारियों के पास काम का इतना अधिक बोझ है कि सालों में बड़ी मुश्किल से दूर के स्मारको को देख पाते हैं।
*    *    *
इस परिप्रेक्ष में ऐसी संरचना और छत्तीसगढ़ की परंपरा पर कुछ बातें। रतनपुर थाना के पास कुंवरपार तालाब पर गोसाईपारा है, किंतु यहां अब गोसाई-गोस्वामी परिवार नहीं हैं, बल्कि करइहापारा में गोसाईं परिवार हैं, जिनका सौ वर्षों से अधिक का ज्ञात इतिहास है और परंपरानुसार इन परिवारों की जड़े और गहरी हैं। करइहापारा निवासी 55 वर्षीय सोमेश्वर गिरि गोस्वामी जी बताते हैं कि यहां नागा साधुओं का डेरा रहता था और भोग-भंडारा के लिए कड़ाहा (करइहा) चढ़ता था, इसी से इस पारा का नाम पड़ा। संभव है कि कंठी देउल मंदिर से प्राप्त शिलालेख से इसके सूत्र जुड़ते हों।
संवत 1941 यानि सन 1884 की नागपुर से
जिला बिलासपुर, रतनपुर के करैहापारा में भेजी गई डाक,
 जिस पर ‘गुलाबगीर‘ और ‘गोसंई‘ लिखे होने का अनुमान होता है।

लीलागर नदी के दाहिने तट पर बलौदा-महुदा के देवरहा में भी इसी तरह का एक स्मारक मोतिया-कुकुरदेव मंदिर है, लीलागर नदी के बायें तट पर स्थित इस स्मारक के दूसरी ओर ग्राम कुगदा है, जहां पृथ्वीदेव द्वितीय का खंडित शिलालेख, कलचुरि संवत 893 (सन 1141-42) प्राप्त हुआ है, इसके पास ही बछौदगढ़ स्थित है। मोतिया मंदिर में कलचुरिकालीन शिलालेख के टुकड़े भी हैं, जो संभव है कि नदी के दूसरे तट के कुगदा शिलालेख से संबंधित हों। इस स्मारक के साथ नायक-बंजारा की कथा जुड़ी है। यों छत्तीसगढ़ में शवाधान के महापाषाणीय स्मारकों से ले कर बस्तर के उरसकल-उरसगट्टा तक की परंपरा है। दुर्ग जिले के छातागढ़, बिलासपुर जिले के मल्हार और कांकेर जिले के आतुरगांव से ईस्वी की आरंभिक सदी काल के स्मारक शिलालेख भी उल्लेखनीय हैं।

बैरागी और कबीरपंथी जैसे समुदायों में मृतक संस्कार के साथ कब्र बनाने का प्रचलन है। कंठी देवल से प्राप्त शिलालेख के बाद कोई संदेह नहीं रहा कि यह समाधि स्थल-स्मारक है। संतोष नाम के साथ गिरि से यह अनुमान होता है कि वे दशनामी शैव संन्यासी संप्रदाय से संबंधित है। इस आधार पर कंठी देवल नाम को भी समझना आसान हो जाता है, देवल या देउल देवालय है और कंठी, बैरागियों द्वारा गले में धारण किये जाने वाली माला का परिचायक है। कई ऐसे हैं, जिनका निर्माण प्राचीन मंदिरों की प्रतिमाओं, स्थापत्य खंडों का इस्तेमाल कर बनाए गए हैं, जिनमें से एक यह कंठी देउल है।

जानकारी मिलती है कि रायपुर के कंकाली तालाब को 17वीं शताब्दी में महंत कृपाल गिरी ने बनवाया था। इस परंपरा में क्रमशः रामगिरि, सुजानगिरि, अयोध्यागिरि, सुभानगिरि के बाद संतोषगिरि का नाम मिलता है। आगे इस क्रम में शंकरगिरि, सोमारगिरि, शंभुगिरि, रामेश्वरगिरि के बाद वर्तमान महंत हरभूषणगिरि गोस्वामी हैं। इनमें प्रत्येक की महंती का औसत काल 30-35 वर्ष मानें और कंकाली मठ के महंतों की सूची वाले और कंठी देवल वाले संतोषगिरि, एक ही हैं तो उनका काल उन्नीसवीं सदी का पहला चतुर्थांश निर्धारित किया जा सकता है। आसानी से माना जा सकता है कि ‘गिरी‘ और ‘कंकाली‘ मात्र संयोग नहीं। रायपुर के इसी कंकाली मठ में ‘जीवित समाधि‘ स्थल हैं, जिन पर शिवलिंग स्थापित किया गया है।
कंठीदेवल वर्तमान स्वरूप और सूचना फलक

गुम्बद, मुस्लिम स्थापत्य से जुड़ा है। भारत में चौदहवीं से सोलहवीं सदी तक गुम्बददार इमारतें बनती रहीं, जिनमें मकबरे भी थे। सत्रहवीं सदी में बना आगरा का ताजमहल, दिल्ली का जामा मस्जिद और बीजापुर का गोल गुम्बद, स्थापत्य के खास नमूने हैं। इसके साथ ही गुम्बद, गैर-मुस्लिम भारतीय संरचनाओं में भी अपना लिया गया। गुम्बद वाले मंदिर भी बनने लगे। इनमें विशिष्ट है मुकरबे, यानि मकबरे, जो मुसलमानों के अलावा भारतीय-हिंदू मान्यताओं वाली संरचनाओं के लिए भी अपना लिए गए। मेरी देखी ऐसी संरचनाओं में से एक, प्राचीन सामग्री का इस्तेमाल कर निर्मित अत्यंत भव्य स्मारक, शहडोल के निकट स्थित पंचमठा है।

समाधियों, मृतक स्मारक-संरचनाओं के लिए छतरी और मुकरबा, शब्द अपना लिया गया। संभवतः मात्र संयोग मगर, गुम्बद का आकार, बौद्ध अवशेष को जतन से रखने के लिए बनाई जाने वाली संरचना, स्तूप से मिलता-जुलता है। महाभारत, वनपर्व 190/67 में संभवतः बौद्ध स्तूपों और मृतक-समाधियों के लिए कहा गया है कि युगांतकाल में देवस्थानों, चैत्यों और नागस्थानों में हड्डी जड़ी दीवारों के चिह्न होंगे ...‘। दिल्ली, मध्य भारत, बुंदेलखंड, बघेलखंड में मुकरबे देखे-सुने जाते हैं। ग्वालियर, इंदौर की छतरियां प्रसिद्ध हैं। शिवपुरी में सिंधिया परिवार की और ओरछा में बुंदेलों की छतरियां-समाधि स्थल दर्शनीय है। ऐसी संरचनाओं के साथ मंदिर वाली आस्था और उसकी पवित्रता का भाव भी जुड़ जाता है, जैसा कंठी देउल के साथ रहा है। इसके पूजित होने की जानकारी नहीं मिलती, किंतु गर्भगृह में शिवलिंग की स्थापना रही है। यहां गुलेरी जी के लेख ‘देवकुल‘ का अंश प्रासंगिक होगा, जिसमें बताया गया है कि- ‘मंदिर को राजपूताने में ‘देवल‘ कहते हैं। ... ‘देवकुल पद देवमंदिर का वाचक भी है, तथा मनुष्यों के स्मारक चिह्न का भी।‘ ...‘रजवाड़ों में राजाओं की छतरियां या समाधि-स्मारक बनते हैं। ... कहीं-कहीं उनमें शिवलिंग स्थापन कर दिया जाता है, ... परंतु कई यों ही छोड़ दी जाती हैं।‘  

 एक अन्य ‘मंदिर‘- 
‘अंगरेज का मंदिर‘ कही जाने वाली अलेक्जेंडर कैनिनमंड इलियट की समाधि, ग्राम सेमरापाली, सारंगढ़। इतिहास में प्रथम दर्ज छत्तीसगढ़ आया अंगरेज यात्री, जिसकी मृत्यु कलकत्ता से नागपुर जाते हुए, 23 वर्ष की आयु में 12 सितंबर 1778 को हुई।

Friday, October 29, 2021

सतरंगी रतनपुर

तुमान खोल की प्राकृतिक सुरक्षा सीमा पहाड़ियों से परिवेष्टित राजसत्ता का विस्तार जब रतनपुर में आता है तो उसका मैदानी खुलेपन की दिशा में आकर्षण दिखाई पड़ता है। सत्ता संघर्ष के जंगल कानून और गुरिल्ला छापामारी का युग समाप्त होकर मैदानी साहचर्य और विकसित सभ्यता की शुरूआत का, भू-व्यवस्थापन और कर-लगान की नई प्रणाली का, राजसत्ता में जनता की महत्वपूर्ण भागीदारी का सूत्रपात रतनपुर में होता है।

महिष्मति के कलचुरियों की पौराणिक पृष्ठभूमि से विकसित इतिहास ने त्रिपुरी में अगर दिशा पाई तो दक्षिण कोसल आकर उसे ठोस विस्तार मिला। दसवीं शताब्दी के अंतिम चरण में तुमानखोल के सुरक्षित घेरे में त्रिपुरी कलचुरियों की एक शाखा ने अपनी स्वतंत्र सता घोषित की जो इतिहास में कलचुरियों की रतनपुर शाखा के रूप में जानी गई । इस नई शाखा की स्थापना और इनका लगभग साढ़े सात सौ वर्षों का अद्वितीय राज्यकाल कलचुरी, आदि हैहयवंशियों को इतिहास पुराण का सर्वाधिक दीर्घकाल तक शासन करने वाले वंश के रूप में स्थापित करता है।

रतनपुर में महाप्रतापी कलचुरी शासकों रत्नदेव, पृथ्वीदेव और जाजल्लदेव, प्रतापमल्ल, बाहरसाय और कल्याणसाय जैसे इतिहास प्रमाणित शासकों का स्वर्णयुग देखा वहीं मोरध्वज और चतुर्युगों मेें राजधानी का गौरव प्राप्त कर पुराण कथाओं से महिमा-मंडित भी हुआ है।

रतनपुर के कलचुरिकालीन पुरावशेषों का झलक और कला का अद्भुत सम्मोहक संसार अब बिखर सा गया है लेकिन उनकी झांकी रायपुर व बिलासपुर संग्रहालय, रतनपुर के प्राचीन किले, महामाया मंदिर, कंठी देऊल, जूनाशहर का सतखंडा महल, बावली, बीस दुअरिया, आठ बीसा, बादल महल, कर्णाजुनी तालाब, बैराग बन, भैैरव बाबा, रामटेकरी और लखनी देवी मंदिर में देखी जा सकती है।

महामाया मंदिर को प्रतिष्ठा सिद्ध आदि शक्ति के रूप में मान्य हुई है। प्रवेश-द्वार के सामने स्तंभों पर शिलालेख है। संलग्न तालाब और प्रतिमाओं, स्थापत्य अवशेषों के सांध्य आरती का वातावरण मानो कि काल विस्तार को लांघकर दर्शनार्थी को उसी स्थिति में ला देता है। जैसा रत्नदेव ने विलक्षण अनुभव यहां प्राप्त किया था। रायपुर संग्रहालय की दो महत्वपूर्ण प्रविष्टियां रतनपुर से प्राप्त हैं, जिनमें से एक शिव-पार्वती परिणय का कल्याण सुन्दर विग्रह है, इस प्रतिमा में सोमवंशी और कलचुरि कला के संधि-स्पर्श का सौन्दर्य अत्यन्त सजीव और मनोरम है।

ऐसी ही कलात्मक मूल्य की एक अन्य प्रतिमा शालभंजिका नायिका कठी देऊल मंदिर में है जिसके आभूषण अलंकरण और समानुपातिक शारीरिक सौन्दर्य में प्राकृतिक वृक्ष और जीव-जंतुओं को संघटित किया गया है। नायिका के संग दिखाया गया विदूषक प्रदर्शित है। रायपुर संग्रहालय में रखी काले पत्थर की चतुर्भुज विष्णु प्रतिमा इस क्षेत्र में प्राप्त ग्रेनाइट की सर्वाधिक बड़े आकार की प्रतिमा है। चंवरधारिणी परिचारिकाओं सहित सम्पूर्ण देवमण्डल का परिकर है तथा उपासकों में प्रतिमा निर्माण हेतु दान के इतिहास को उद्धाटित करने वाले रतनपुर से प्राप्त शिलालेख भी सुरक्षित है।

कठीदेउल मंदिर वस्तुतः विभिन्न कार्यों की सामग्रियों से संयोजित पुनः संरचना है और संभवतः मंदिर में उत्कीर्ण संतोषगिरि नामक गोसाई का समाधिस्थल है। पुरातत्व अधिकारी एवं अध्येता राहुल कुमार सिंह का इस पक्ष में प्रबल तर्क है कि इस मंदिर के नामकरण का आधार भी यही रहा होगा साथ ही इस मंदिर की गोसाई परम्परा के लिए ग्राम छतौना लगाया गया था, जो इस मान्यता की पुष्टि करता है। कंठी देऊल मंदिर की संरक्षण प्रक्रिया में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने इसे पत्थर दर पत्थर अलग कर पुनः खड़ा किया है।

कंठी देऊल मंदिर में ही काले ग्रेनाइट पत्थर की लिंग पीठिका के साथ-साथ ब्रह्मा और विष्णु के बीच ज्योतिर्लिंग के समक्ष हुई प्रतियोगिता का शिल्पांकन भी अत्यन्त रोचक और महत्वपूर्ण है। इस स्मारक में कलचुरिकालीन राजपुरूष व कलचुरि मंदिरों के गजपीठ आदि स्थापत्य खंड भी जुड़े हुए है। यह दोमंजिली इमारत युगल शैली के प्रभाव का भी आभास कराती कलचुरिकालीन प्रतिमाओं का रतनपुर से संग्रह बिलासपुर संग्रहालय में किया गया है। बिलासपुर में संग्रहित प्रतिमाएं कलचुरि शासकों में संग्रहित प्रतिमाएं कलचुरि शासकों के धार्मिक सद्भाव पर प्रकाश डालती है। जैन धर्म के विभिन्न तीर्थकरों की पद्मासन व कार्योत्सर्ग मुद्रा की प्रतिमाओं में कला प्रतिमान के दर्शन तो होते ही हैं, यह भी स्पष्ट होता है कि तत्कालीन रतनपुर राज्य क्षेत्र में जैन धर्मावलंबियों को विशेष महत्व तथा उनकी धार्मिक भावनाओं को सम्मान दिया गया था। नगर प्रवेश में भैरव बाबा स्मारक है।

रतनपुर के इतिहास का एक अन्य महत्वपूर्ण भाग कल्याण साय के साथ जुड़ा हुआ है। जिसकी राजस्व डायरी में अंग्रेजी प्रशासनिक अधिकारियों ने इस पूरे क्षेत्र की जमाबंदी का परम्परागत आधार पाया था। यही वह काल था जब इस क्षेत्र की जमाबंदी का परम्परागत आधार पाया था। यही वह काल था जब इस क्षेत्र ने छत्तीसगढ़ की संज्ञा धारण कर अपनी सांस्कृतिक विशिष्टता की पहचान बनाई।

अठारहवीं शताब्दी का उत्तरार्ध मराठा शासकों के साथ जुड़ा इतिहास काल है जब बैराग वन की प्रतिष्ठा कर्णार्जुनी की महत्ता फिर से पहचानी गई और रामटेकरी, मूसे खां की दरगाह, बिठोबा मंदिर, लखनी देवी, आठबीसा, बादलमहल और जूना शहर का सतखंडा महल, बीस दुअरिया और बावली की रचना हुई ।

रतनपुर के रचनाकारों, स्थपतियों, राजपुरूषों और अनाम श्रमजीवी शिल्पियों का स्मरण कला समर्पित उस युग का स्मरण है जहां धर्म, अध्यात्म और उच्चतर सांस्कृतिक मूल्यों से यह सारा अंचल सराबोर था किन्तु इसी क्रम में उन नामों का उल्लेख भी आवश्यक है जिन्होंने इतिहास के इस गौरवशाली अध्याय को पुनः सभी के सम्मुख लाने में योगदान दिया है। बाबू रेवाराम, पं. शिवदत्त शास्त्री, चीजम और नेल्सन जैसे अंग्रेज अधिकारी, वी.वी मिराशी, हीरालाल, बालचंद जैन, लोचन प्रसाद पांडेय और प्यारेलाल गुप्त, डॉ. माखन झा इन सभी विद्वानों के गंभीर शोध अध्ययन को यदि किसी ने लोकरंगों से रंगकर सहज ग्राह्य बनाया है तो वे है जनश्रुतियों और परम्पराओं के कारण कवि देवार जिनके गीतों ने इतिहास के परम्परागत अध्ययन को सदैव दिशा और गति दी है।

भाई अशोक अग्रवाल उन दिनों पत्रकारिता में सक्रिय थे। रायगढ़ उनका डेरा होता था। 'अकलतरा के असल नवरत्न, अकलतरा में स्थापित रहते हैं', :)इसलिए अब स्थायी डेरा-बासा अकलतरा। पिछले दिनों (चित्र)याद ताजा करते हुए, कि उस दौरान वे अकलतरा आते तो मौज में उनसे हुई बातों को लेख का स्वरूप मिल जाता। ऐसी ही एक चर्चा को उन्होंने इस तरह कलमबद्ध किया था।

Sunday, October 3, 2021

महामाया मंदिर शिलालेख

रतनपुर, जिला- बिलासपुर के मां महामाया मंदिर के प्रवेश द्वार के सामने दोनों स्तंभों पर शिलालेख हैं। जन-सामान्य की जिज्ञासा-पूर्ति के लिए इनकी जानकारी मंदिर परिसर में लगाई जाए, इसके लिए समय-समय पर पं. राजेन्द्र प्रसाद शुक्ल जी, ठाकुर बलराम सिंह जी, मधुकर गोरख जी और सुनील सोन्थलिया जी से चर्चा होती रही, यह अब तैयार कर पाया। यहां प्रस्तुत जानकारी मुख्यतः, पद्मभूषण महामहोपाध्याय वासुदेव विष्णु मिराशी के पाठ के आधार पर है। इन शिलालेखों की लिपि नागरी और भाषा संस्कृत है।

प्रथम शिला
1. श्री मद्रत्नपुरं पुरंदरपुरं देवैर्नरैर्दुर्लभं तत्रास्ति क्षितिपालनैकनृपतिः श्री
2. वाहरेंद्रः स्वयम्। तत्तत्रैव गजेंद्रषष्टि गुडितमेकं सहस्त्रं हयानाम् संग्रामे रि-
3. पुमर्दनं नरीविषमं वह्नेश्च तेजाजोधिकम् ।।1।। श्रीमान्वाहररायस्य सर्वकार्ये-
4. षु सेवकः। तत्ऱास्ति(?) नाम्ना गोविदों रत्नपुर प्रजाधिपः ।।2।। सर्वजीवदयापालः सा
5. मिती राजभारकः। कार्याकार्यसमर्थोयं गोविंदो नाम विश्रुतः।।3।।

अनुवाद
1. पुरंदरों की नगरी रत्नपुर, देवताओं और मनुष्यों के लिए भी दुर्गम है। पृथ्वी की रक्षा में अप्रतिम राजा वाहरेन्द्र वहां स्वयं निवास करते हैं। इसी स्थान पर 1000 अश्व के साथ 60 गज भी हैं, जो अग्नि से भी अधिक तेजस्वी और युद्ध में शत्रुओं के विनाशक हैं।
2. यहां गोविन्द नामक रत्नपुर के नगरपति हैं, जो राजा वाहर के प्रत्येक कार्यों में सेवक हैं।
3. अपनी सहृदयता के लिए ज्ञात गोविन्द सभी जीवों के रक्षक हें तथा अपने स्वामी के राज्य के सभी दायित्वों के भारसाधक हैं और जो निष्पादन या निरूद्ध के क्षमतावान हैं।

Translation
Verse 1- The famous Ratnapura the city of Purandara, inaccessible for gods and men. There resides Vahrendra himself, a unique king in respect of protection of the earth. At the same place there are a thousand horses together with sixty elephants, more lustrous than fire and destructive of foes in battle.
Verse 2- There is named Govind, the Mayor of Ratnapur and the servant of the king Vahara in all affairs.
Verse 3- Govinda is well known as a kind, who protects all creatures, who bears the burden of the kingdom of his lord, has power to do or to desist from doing.

द्वितीय शिला
1. ओम्। श्रीविश्वकर्मणे नमः।। हृदयं च दयाधर्म्मः।। कोकासवंशदीपकः।। शिल्पशास्त्रेषु
2. विख्यातः।। छीतकुः सूत्रधारिणाम्।।1।। देवगुरूप्रसादेन।। पंचविद्यामहोदधिः।। रेखना
3. रायणो वापि।। गुणवान्सत्यवाक्तथा।।2।। काष्ठपाषाणके चैव।। कनकेपि च ली
4. लया।। यंत्रविद्या महाविद्या।। छीतकोः सूत्रधारिणः।।3।। वंकत्रीवंकवादनं(?)।।
5. वल्लीपत्रादिकैः नरै?।। त्रिताल सप्ततालं च।। छीतकु सूत्रधारिणः।।4।। विद्
6. पतिश्च गभीरः।। हृदयं केशवे वसेत्। मन्मथः सुतः कर्ता च।। छीतकुः सूत्रधारकः
7. ।।5।। उपांगरूपवादी च।। काम सारगृहे सदा।। शास्त्रजपी त्रिभक्तश्च।। मांडनो
8. लघुबांधवः।।6।। ब्रह्मभक्तः सर्वगुणः।। ज्योति शास्त्रसमन्वितः।। विश्वकर्म्म
9. प्रमादेन।। मांडने हि मिलिष्यते।।7।। दित्यनो रूपकारश्च? विद्यासर्वगुणे
10. षु च।। भ्रातृभक्तः सुशीलश्च।। लेखदासः प्रषस्यते।।8।। शुभमस्तु सर्वदा।
11. श्री संवत् 1552 समये।।

अनुवाद
ओम! श्री विश्वकर्मा को नमस्कार!
1. सूत्रधारों में कोकास कुलदीपक छीतकु शिल्पशास्त्र के लिए ज्ञात है तथा जिनका हृदय दया से परिपूर्ण है।
2. देवताओं और गुरूओं के प्रसाद से वह पंचविद्याओं का सागर, रेखाशास्त्र का ज्ञाता, गुणवान और सत्यवादी है।
3. काष्ठ, पाषाण और सुवर्ण शिल्प भी सूत्रधार छीतकु के लिए कार्य-सुगम है। विज्ञानों में विज्ञान, यांत्रिकी विद्या का वह धारक है।
4. सूत्रधार छीतकु वंक और त्रिवंक, लता पत्रादि तथा त्रिताल-सप्तताल का भी ज्ञाता है।
5. मन्मथ का सुपुत्र सूत्रधार छीतकु विज्ञानों का आदर्श ज्ञाता है, जिसका चित्त केशव में रमता है।
6. त्रयी के प्रति समर्पित उसका छोटा भाई मांडन शास्त्रों का अध्येता है।
7. ब्राह्मणों के प्रति जिसके मन में भक्ति-भाव है। ज्योतिर्विद्या के साथ विश्वकर्मा की कृपा से मांडन सर्वगुण सम्पन्न है।
8. अपने भाई के प्रति समर्पित व सुशील, उत्कीर्णक रूपकर्मी दित्यन विज्ञान व गुणों के लिए प्रशंसित है।
सदा शुभ हो
श्री संवत् 1552

Translation
Om! Adoration to the illustrious Vishvakarman!
Verse 1- Among sutradharas chhitaku, the light of kokasa family, is well-known for shilpashastras the virture of ompassion in heart.
Verse 2- By the favour of gods and preceptors, is the ocean of five sciences, Narayan is respect of draftmanship-meritorious and truthful.
Verse 3- The Sutradhara chhitaku can work on wood and stone and also on gold with ease. He possesses the great science, the science of machinery.
Verse 4- The Sutradhara chhitaku knows vanka and trivanka creepers and leaves. Also the tri-tala and sapta-tala.
Verse 5- The Sutradhara Chhitaku, the able son of Manmatha, is a perfect master of sciences has fixed his heart on Keshawa.
Verse 6- His younger brother is Mandana, devoted to three and a reader of scriptures.
Verse 7- He is devoted to Brahmanas. All merits together with the knowledge of astronomy will be found in Mandana by the fever of Vishvakarman.
Verse 8- The writer is Dityana, the sculptor, well conducted and devoted to his brother, and is praised for sciences and all merits.
May there be always bliss!
in the memorable year 1552.

Tuesday, November 6, 2012

मौन रतनपुर

इतिहास का रास्ता भूल-भुलैया का होता है और किसी ऐसे स्थल से संबंधित इतिहास, जो सुदीर्घ अवधि तक राजसत्ता का मुख्‍य केन्द्र, प्रशासनिक मुख्‍यालय के साथ-साथ धार्मिक तीर्थस्थल भी हो तो वहां इतिहास-मार्ग और भी दुर्गम हो जाता है, रतनपुर की कहानी भी कुछ इसी तरह की है।

चतुर्युगों में राजधानी के गौरव से महिमामण्डित मान्यता, मूरतध्वज की नगरी और भगवान कृष्ण की पौराणिक कथाओं से रतनपुर को सम्बद्ध कर देखा गया। महामाया, भैरव और महादेव की उपासना का केन्द्र बना और शासकों की पीढ़ियां रतनपुर के अंक में पली-बढ़ी। कहा जाता है कि इतिहास घटित होते हुए उसकी रचना नहीं हो पाती और अगर होती भी है तो वह विषयगत हो जाती है। इतिहास संयोजन का आग्रह तभी तीव्र होता है जब वह मुट्ठी की रेत जैसा छीजता जा रहा हो। शायद उन्हीं स्थितियों में बाबू रेवाराम, पं. शिवदत्त शास्त्री ने उन बिखरते वैभव को कण-कण समेटने की कोशिश की। इस क्रम का अंतिम प्रयास, विक्रम संवत 2000 समाप्‍त होने के उपलक्ष में नियोजित श्री विष्णु महायज्ञ (रतनपुर) स्मारक ग्रंथ तथा यज्ञ आयोजन की प्रेरणा में देखा जा सकता है। इसके साथ गौरव गाथा गायक देवारों का स्मरण तो अपरिहार्य है ही।

तुमान खोल के प्राकृतिक सुरक्षा आवरण से सभ्यता के मैदानी विस्तार में आने की आकुलता का परिणाम रतनपुर है, जो आज लाचार सा इतिहास-पुरातत्व के अध्ययन के लिए विषय-वस्तु बना, निरपेक्ष सा है। घटनापूर्ण और सक्रिय आठ सौ सालों का लेखा, उसकी झलकियां मात्र हो सकती हैं, लेकिन रतनपुर की ऐसी एक झलक भी चकाचौंध कराने के लिए पर्याप्त है।

कहावत यह भी है कि जिस दिन पहला पेड़ कटा होगा सभ्यता का आरंभ उसी दिन हुआ होगा। मूरतध्वज और ब्राह्मण वेशधारी ईश्वर की कथा-भूमि मान कर इस क्षेत्र में आरे का प्रयोग निषिद्ध माना जाता है। इस पौराणिक कथा में तथ्य ढूंढना निरर्थक है, लेकिन उसकी सार्थकता इस दृष्टि से अवश्य है कि आरे का निषेध वन-पर्यावरण की रक्षा का सर्वप्रमुख कारण होता है। टंगिया और बसूले से दैनंदिन आवश्यकता-पूर्ति हो जाती है, लेकिन आरा वनों के व्यावसायिक दोहन का साधन बनता है। मुझे इस कथा में पर्यावरण चेतना के बीज दिखाई देते हैं।

रतनपुर राज की जमाबंदी, भू-व्यवस्थापन कलचुरि राजा कल्याणसाय के हवाले से ज्ञात होता है। मुगलकाल में राजा टोडरमल का भू-राजस्व व्यवस्थापन आरंभिक माना जाता है, लेकिन तत्कालीन छत्तीसगढ़ का खालसा हिस्सा दाऊ-दीवान-गौंटिया, मालगुजारी और रैयतवारी में विभाजित ऐसा व्यवस्थित प्रबंधन था, जिसे अंगरेज अधिकारियों ने लगभग यथावत स्वीकार कर उसी आधार पर राजस्व व्यवस्थापन पूर्ण किया।
1995/1998? में प्रकाशित पुस्‍तक
(चित्र पुस्‍तक के चौथे संस्‍करण के मुखपृष्‍ठ का है)
के प्राक्‍कथन में 'रतनपुर का गहराता मौन'
शीर्षक से मेरी यह टिप्‍पणी है.

रतनपुर, जो कभी दरबार हुआ करता था, आज मूक साक्षी है, उन ऐतिहासिक घटनाओं का। रतनपुर किसी अदालत में जा नहीं सकता और कोई सहृदय मजिस्ट्रेट उसकी गवाही नहीं लेता, इसलिए रतनपुर का मौन गहराता जा रहा है। उसके सन्नाटे के पहले, चुप्पी तोड़ने का कोई भी संवेदनशील प्रयास इतिहास-यज्ञ ही है, जिसमें यह पूरे मन से मेरी कामनाओं के लिए आहुति है, यज्ञ-फल शुभ होगा, अपनी कामनाओं पर विश्वास है।

आज भारत के राष्‍ट्रपति जी छत्‍तीसगढ़ में नया रायपुर के मंत्रालय भवन 'महानदी' का लोकार्पण करेंगे।

रायपुर से प्रकाशित पत्रिका 'दशहरा' के अक्‍टूबर 2012 अंक में भी प्रकाशित।

Wednesday, October 31, 2012

राजधानी रतनपुर

इतिहास में राजधानी-नगरों की कहानी बड़ी अजीब होती है, कहीं तो उनका वैभव धुंधला जाता है और कभी-कभी उनकी पहचान खो जाती है। छत्तीसगढ़ या प्राचीन दक्षिण कोसल के दो प्रमुख नगरों- राजधानियों शरभपुर और प्रसन्नपुर की पहचान अभी तक सुनिश्चित नहीं की जा सकी है। शरभपुर का समीकरण सिरपुर, मल्हार, सारंगढ़ तथा उड़ीसा के कुछ स्थलों से जोड़ा गया, किन्तु प्रसन्नपुर की चर्चा भी नहीं होती। इसी प्रकार इस अंचल में कोसल नगर और 'गामस कोसलीय' नाम के ऐतिहासिक प्रमाण मिलते हैं, किंतु यह स्‍थान 'कोसल' राजधानी था अथवा नहीं; या कहां स्थित था, निश्चित तौर पर यह भी नहीं तय किया जा सका है। अंचल के सर्वाधिक अवशेष सम्पन्न पुरातात्विक स्थल मल्हार का राजनैतिक केन्द्र या राजधानी होना, अभी तक अनिश्चित है।

छत्तीसगढ़ की ऐतिहासिक राजधानी रतनपुर के संबंध में ऐसा कोई सन्देह नहीं है, किन्तु जैसा कि प्रत्येक राजधानी के साथ होता है, राजनैतिक आपाधापी और उलट-फेर में राजधानी-नगरों का वास्तविक सांस्कृतिक वैभव धुंधलाने लगता है। पौराणिक मान्यता है कि रतनपुर चतुर्युगों में राजधानी रहा है और लगभग हजार वर्ष का इतिहास तो ठोस प्रमाण-सम्मत है। एक हजार वर्ष की सुदीर्घ काल अवधि में कुछ घटनाओं के संकेत मिलते हैं, जिनमें चैतुरगढ़-लाफा, कोसगईं आदि स्थान भी राजसत्ता के केन्द्र बने और रतनपुर राज पर जनजातीय आक्रमणों का संकट पड़ा, किन्तु अट्ठारहवीं सदी के मध्य में मराठों के आगमन के पश्चात्‌ घटनाक्रम तेजी से बदलने लगा, फलस्वरूप एक सहस्राब्दी के सम्पन्न वैभव की झांकी, आज रतनपुर में न हो, लेकिन उसका स्पन्दन वहां अवश्य महसूस किया जा सकता है।

कलचुरियों की आंचलिक प्रथम राजधानी तुम्माण के रतनपुर स्थानान्तरण को इस दृष्टिकोण से देखा जाना भी समीचीन होगा, कि यह काल कबीलाई छापामारी से विकसित होकर खुले मैदान में विस्तृत हो जाने का था और इतिहास गवाह है कि इसी के पश्चात पूरे दक्षिण कोसल क्षेत्र का पहली बार नियमित व्यवस्थापन रतनपुर राजधानी से हुआ। छत्तीस गढ़ यानि छत्तीस प्रशासनिक केन्द्रों में क्षेत्र को बांट कर राजस्व इतिहास में पहली जमाबंदी रतनपुर केन्द्र से की गई। शासन और शासित के संबंधों का निरूपण, कर वसूलने वाले और करदाता के रूप में किया जाता है, छत्‍तीसगढ़ में इस नियमित व्यवस्था की शुरुआत रतनपुर से हुई, जिसका अनुसरण बाद में अंगरेज प्रशासनिकों ने किया।

रतनपुर के वैभव और इतिहास को उजागर करने का पुनीत कार्य बाबू रेवाराम, पं. शिवदत्त शास्त्री गौरहा, अंगरेज अधिकारीगण, पं. लोचन प्रसाद पाण्डेय, राय बहादुर हीरालाल, महामहोपाध्याय वा.वि. मिराशी, डॉ. सुधाकर पाण्डेय, डॉ. विष्णु सिंह ठाकुर, डॉ. लक्ष्मीशंकर निगम, श्री प्यारेलाल गुप्त प्रभृत विद्वानों ने किया है लेकिन जिनका नामोल्लेख यहां नहीं है उनके प्रति और विशेषकर देवार जाति के अनाम कवि गायकों के प्रति भी श्रद्धावनत हूं, जिन्होंने परम्परागत रतनपुर राजधानी, गोपल्ला वीर, घुग्घुस राजा, रत्नदेव और बिलासा केंवटिन जैसे कितने ही पात्रों और घटनाओं को निरपेक्ष रहकर जीवन्त रखा है, जिनका उपयुक्त हवाला इतिहास में नहीं मिलता।

सन्‌ 1999 में प्रकाशित पुस्‍तक में
'सम्‍मति' शीर्षक से मेरी टिप्‍पणी से.

अतः और अंततः धन्य है ऐसा प्रत्येक व्यक्ति जो इतिहास में झांककर समाज के उज्जवल भविष्य की रूपरेखा बनाता है, निर्जीव इतिहास से जीवन में प्रेरक आशा का उत्साह संचारित कराता है, इसलिए किसी व्यक्ति विशेष का नाम नहीं बल्कि इस विशेष भाव का उल्लेख यहां अधिक प्रासंगिक मानता हूं। ब्रजेश श्रीवास्तव की प्रस्तुत कृति 'रतनपुर दर्शन' यहां के प्राचीन वैभव को उद्‌घाटित करने में सफल होगा, ऐसा मेरा पूरा विश्वास है।

हार्दिक शुभकामनाओं सहित...

Sunday, October 28, 2012

लहुरी काशी रतनपुर

बाबू रेवाराम से गौरवान्वित लहुरी काशी रतनपुर के काशीराम साहू (लहुरे) के माध्यम से यहां की पूरी सांस्कृतिक परम्परा सम्मानित हुई, जब इसी माह 9 तारीख को छत्तीसगढ़ के लोक नाट्‌य के लिए उन्हें संगीत नाटक अकादेमी पुरस्कार-2011 मिला।
आठ सौ साल तक दक्षिण कोसल यानि प्राचीन छत्तीसगढ़ की राजधानी का गौरव रतनपुर के नाम रहा। इस दौरान राजवंशों की वंशावली के साथ यहां कला-स्थापत्य के नमूनों ने आकार लिया। अब यह कस्बा महामाया सिद्ध शक्तिपीठ के लिए जाना जाता है। कभी इसकी प्रतिष्ठा लहुरी काशी की थी।

तासु मध्य छत्तिसगढ़ पावन। पुण्य भूमि सुर मुनि मन भावन॥
रत्नपुरी तिनमें है नायक। कांसी सम सब विधि सुखदायक॥
जोजन पांच तासु ते छाजै। अमर कंठ रेवा तहं राजै॥

राजधानी वैभव के अंतिम चरण में उपरोक्त पंक्तियों के रचयिता और सांस्कृतिक गौरव के प्रतीक बाबू रेवाराम का जन्म अनुमानतः संवत 1870, यानि उन्नीसवीं सदी के दूसरे दशक में हुआ। लगभग 60 वर्षों के जीवन काल में उनके रचित 13 ग्रंथों में एक 'कृष्ण लीला के गीत' है। इस ग्रंथ की हस्तलिखित प्रतियों पर श्री कृष्ण लीला भजनावली, रत्नपुरी चाल (संग्रहीत) और रासलीला गुटका भी लिखा गया है। गुटके की प्रतियों में उल्लेख मिलता है- 'कृष्ण चरित यह मह है जोई। भाषित रेवाराम की सोई॥' वैसे तो छत्तीसगढ़ में प्रचलित रहंस या रास और नाचा-गम्मत, इस गुटका से अलग अलग दो अन्य विधाएं हैं, लेकिन रतनपुर में कहीं घुल-मिल सी जाती हैं। बोलचाल में रतनपुरिया भजन, भादों गम्मत या सिर्फ गुटका कह दिये जाने का आशय सामान्यतः बाबू रेवाराम की उक्त परम्परा से संबंधित होता है, जो रहंस और नाचा-गम्मत से कहीं अलग है।
बाबू रेवाराम की परम्परा वाले गुटका यानि कृष्ण लीला भजनावली में वंदना, आरती, ब्यारी, गारी, जन्म लीला, पालना लीला, पूतना वध, श्रीधर लीला, गर्ग लीला, कागासुर लीला, विप्र लीला, मृत्तिका लीला, मथन लीला, दधि चोरी लीला, यमलार्जुन लीला, वच्छ चरावन लीला, वच्छ हरण लीला, गेंदलीला नागलीला, जल+पनघट+गगरी लीला, जादू लीला, वस्त्र हरण लीला, वंशी लीला, दधि-दान लीला, ओरहन लीला, मान लीला, महारास, अन्तर्ध्यान, विरह-भजन, कृष्ण मिलन, मंगल आरती जैसे तीस भागों में ढाई सौ पद-श्लोक हैं। रतनपुर में अब भी गणेश चतुर्थी और शरद पूर्णिमा के अवसर पर गम्मत आयोजित होते है, बाबूहाट, करैहापारा में 2007 में भादों गम्मत आयोजन का 127 वां वर्ष था।
रतनपुर में लीला संस्कारित पीढ़ी अभी भी जीवंत है। नवरात्रि पर देवी भजन गुटका के माता सेवा के गीत और होली के दौर में फागुन गुटका का फाग भजन-गीत होता है। यहां परम्परा का असर दिनचर्या में, आचरण-व्यवहार में, पूजा-पाठ, पीताम्बर धारण करना, यों कहें- पूरी जीवनचर्या की अन्तर्धारा में लीला आज भी विद्यमान है। आसपास मदनपुर, खैरा, रानीगांव, भरारी, मेलनाडीह, पोंड़ी, बापापूती, चपोरा, सरवन देवरी और कर्रा जैसे कई गांवों में यह धारा प्रवाहित है। रतनपुरिया भजन से संबंधित कुछ ऐसे लोगों के चित्र, जिनमें निहित लीला-विस्तार को सुन-देख कर समझने का प्रयास करता रहा-

भंगीलाल तिवारी - काशीराम साहू (लहुरे) - दाऊ लक्ष्मीनारायण

दुर्गाशंकर कश्यप - दाऊ बद्री विशाल - बलदेव प्रसाद मिश्र

शिव प्रसाद तंबोली - ईश्वरगिर गोस्वामी - रामकुमार तिवारी

हरिराम साहू - रामकृष्ण पांडेय - काशीराम साहू (जेठे)

रामकिशोर देवांगन - रामप्रसाद साहू - किशन तंबोली
रहंस में पूरा गांव लीला-भूमि और लीला के आयोजन में गांव का गांव कैसे इसका अभिन्‍न हिस्‍सा हो जाता है यह कुछ हद तक कैमरा ही देख सकता है, व्यक्ति के लिए सिर्फ दर्शक बना रहना संभव नहीं हो पाता, दृश्‍य घुल कर कैसे रस बन जाते हैं, तभी पता लगता है, जब लीला पूरी हो जाती है। ''श्रीधरं माधवं गोपिका वल्लभं, जानकी नायकं रामचंद्रं भजे। बोलो श्री राधाकृष्ण की जै। श्री वृन्दावन बिहारी की जै।'' इन अंतिम पंक्तियों के बाद लेकिन, असर बच जाता है- लीला अपरम्पार।