Showing posts with label युवा. Show all posts
Showing posts with label युवा. Show all posts

Saturday, June 20, 2026

अनाम संगी साथियों के नाम

अबाल-युवाओं की संगत में पता चलता है कि ट्रेंड क्या चल रहा है, वे ‘खुद की, जग की‘ क्या सोच रहे हैं, अपडेट करने का अवसर मुझे अक्सर मिलता रहता है। मध्यम शहरों के उच्च-मध्यम और बड़े शहरों के मध्यम वर्ग के युवाओं के व्यक्तिगत जीवन में, जिसे वे अब आसानी से शेयर कर लेते हैं, फ्रेंड, ब्रेक-अप, लिव इन, एकल जीवन, शादी/बच्चे करें या न करें, जैसे सवाल अहम होते गए हैं। वे अपने सिस्टम पर बैठे ग्लोबल दुनिया के सदस्य है, जिन पर राजेन्द्र गौतम की पंक्तियां हैं-
"हमने शब्द लिखा था- ‘रिश्ते‘/ अर्थ हुआ बाज़ार
‘कविता‘ के माने ख़बरें हैं/ ‘सम्वेदन‘ व्यापार
भटकन की उँगली थामे हम/ विश्वग्राम तक आए।"
सोमवार से शुक्रवार की शाम तक ताबड़तोड़ काम, फिर वीक-एंड पर बस चिल, कहे तो वर्क-अल-कोहलिक डूड।

दूसरी तरफ मेरी नजर मुझसे बेहतर-युवा विकल्पों की ओर रहती है। मैंने पाया है कि आप अपनी जगह पर स्थापित रहें और सोचते रहें कि आगे क्या होगा?, आप सचमुच ऐसा सोच रहे हों तो अपनी जगह खाली कर दीजिए, देखिएगा कि उस खाली स्थान की पूर्ति के लिए जल्द ही एकाधिक विकल्प सामने आ जाएंगे, और इस बात की पूरी संभावना होगी कि समय के साथ वे आपसे बेहतर साबित होंगे। कहा-सुना और मान लिया जाता है कि युवा पीढ़ी एकदम डब्बा है, पढ़ती-लिखती नहीं। मुझे अधिकतर इससे विपरीत मिला। मैंने पाया कि युवाओं में बहुत अच्छी समझ के साथ पढ़ने वाले और शुरुआती दौर में ही स्तरीय लिखने वाले अनेक हैं। ऐसा लगता है कि सिर्फ अपना लिखा पढ़ाने को और अपनी बात सुनाने को व्यग्र हों तो आपके लिए पाठक-श्रोताओं का टोटा है मगर आप नई चीज सुनने और पढ़ने को तैयार, बल्कि उत्सुक हैं फिर देखिए, आप पाएंगे कि भविष्य की रचनात्मकता को ले कर आपकी सारी निराशा दूर हो जाएगी। ‘कल और आएंगे..., मुझसे बेहतर कहने वाले, तुमसे बेहतर सुनने वाले।‘ इस पर कुछ रुक कर ...

इन गरमी की छुट्टियों में या ‘टीनोन्मुखी‘, ‘टीन‘ और इसके मुहाने बाहर निकलने ‘टीनातुर‘ आयु, मुझ वानप्रस्थ आयु वाले के लिए, 'बाल'-मित्र मिले, बने। हॉबी क्लासेस, गायन-वादन, नृत्य, चित्रकारी, खेलकूद ... कला-कौशल निपुण। उनकी कुछ जिज्ञासा, कई प्रश्न मुखर होते, कुछ मौन। अब याद कर रहा हूं कि उनसे जो कुछ कहना रह गया, वह अब यहां-

... जो बात हो रही थी उसे इस तरह समझो- कलाएं दो तरह की होती है क्रिएटिव और परफार्मिंग। इसमें चित्रकारी आदि क्रिएटिव है और नृत्य, गायन, वादन परफार्मिंग। इन दोनों का फर्क स्पष्ट है क्रिएटिव अपनी साधना, जैसा है, जो लोगों के सामने पूरा हो जाने पर आता है और आपके बिना भी किसी के सामने रखा जा सकता है जबकि परफार्मिंग, उतने समय तक ही लोगों के सामने होता है, जब तक आप परफार्म करते रहते हैं। इस फर्क के साथ यह ध्यान रखना चाहिए कि आपका अभ्यास, रियाज, प्रैक्टिस मुख्यतः अपने लिए होता है, जबकि मंच या खेल के मैदान में प्रस्तुति, जो लोगों के सामने होती है वह मुख्यतः दूसरों के लिए होती है। इसलिए जरूरी होता है कि आप अपनी साधना, अभ्यास नियमित करते रहें, यह रोज कमाने, रोज खाने जैसा है, या कहें कि नियमित जीवन-चर्या रूटीन लाइफ स्टाइल में आ जाना चाहिए। और बीच-बीच में उपयुक्त अवसर मिलने पर प्रस्तुति भी देते रहें, प्रतियोगिता में भाग लेते रहें। जब तक अपनी पसंद का वांछित काम करने की स्थिति न बने, तब तक जो काम कर रहे हों, उसी में अपनी रुचि का अंश तलाशने का प्रयास करें। फिर अपनी रुचि की ओर बढ़ने की कोशिश करें अपनी रुचि का काम करते हुए आप संतुष्ट होते हैं और धैर्य के साथ लंबे समय तक वह करते रह सकते हैं और ऐसा करते हुए वांछित परिणाम जरूर आता है।

आप समूह में बैठे हों, वहां अधिकतर आपसे बड़े लोग हैं और आपको लगता है कि जो बातें हो रही हैं, वे अनावश्यक निरर्थक हैं, छोटे होने के कारण आप बीच में बोल-टोक नहीं पाते और न चाहते हुए भी चुप रह कर सुनते रहते हैं, ऐसी स्थिति में बातों का सिलसिला आपके अनुसार हो (यह एक नेतृत्व-कौशल भी है) तो बातों के बीच, उससे जुड़ी अपनी जिज्ञासा, प्रश्न या विनम्र असहमति-आपत्ति रखें, इससे बड़ों को बुरा नहीं लगेगा, वे मानेंगे कि तुम्हें नहीं आता, तुम उनसे पूछ रहे हो, समझना चाहते हो और फिर उनकी बातचीत की दिशा उस ओर मुड़ जाती है, जैसा आप चाहते हैं। साथ ही यह भी याद करने की कोशिश करें कि जब बातचीत में मुख्य भूमिका आपकी होती है, बातचीत की कमान आपके हाथों होती है, तब हम किस तरह के विषयों पर क्या बात करते हैं। तब हमारी बातचीत का मुख्य विषय क्या होता है हम स्वयं, आसपास के लोग, (अपनी प्रशंसा, दूसरों की बुराई?) नई-पुरानी घटनाएं या कोई विचार। ध्यान रखें कि बातचीत, व्याख्यान-प्रवचन की तरह न हो। वाद-विवाद में आरोप-प्रत्यारोप भी हो, मगर स्वस्थ यानी, जिसमें व्यक्तिगत टिप्पणी न हो।

ध्यान देने की एक और बात है कि हमें किस काम में और कब उपकरणों, सहायक सामग्री, सहयोगी व्यक्ति की जरूरत होती है और कहां इसकी जरूरत नहीं होती। इसके लिए खेलों में ट्रेक एंड फील्ड है, जिसमें दूसरे प्रतिद्वंद्वी की भी जरूरत नहीं। इसी तरह गायन या नृत्य, जिसमें अभ्यास में किसी और सामग्री की जरूरत नहीं होती। इसीलिए इस संदर्भ में याद कर सकते हैं- न चौर्यहार्यं न राजहार्यं न भातृभाज्यं न च भारकारि। अपने शरीर और अपनी बुद्धि की कमाई और कौशल हमेशा सिर्फ आपके साथ रहता है, उस पर आपका पूरा अधिकार होता है, उसका उपयोग आप अपनी पसंद और आवश्यकता अनुसार कभी भी कर सकते हैं, इसलिए उसे श्रेष्ठ माना गया है। यह भी ध्यान रहे- ‘शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्‘ यानी शरीर ही सभी धर्मों (कर्तव्यों) की पूर्ति का साधन है।

ईश्वर या संयोग आप जिसे भी मानते हैं, जिसके चलते आपने खाते-पीते परिवार में जन्म लिया है, सभी अंग सामान्य हैं, फिर आपकी जिम्मेदारी है, आप पर निर्भर है कि आप क्या कर सकते हैं। सबसे पहले स्वयं अपने लिए, उसके बाद परिवार-मित्रों के लिए और फिर समाज के लिए क्या और कितना अच्छा कर सकते हैं, ध्यान रहे कि आपकी प्राथमिकता आप स्वयं हैं, यह स्वार्थी होना कतई नहीं, कहा गया है, ‘आप भला तो जग भला।‘ और यह भी कि ‘न वा अरे सर्वस्य कामाय सर्वं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति।‘ सबकी कामना के लिए सब प्रिय नहीं होते, अपने ही प्रयोजन के लिए सबसे प्रिय होते हैं।

अपनी परिस्थितियों के बावजूद भी जो हासिल कर ले, वही वास्तविक उपलब्धि है। सारी परिस्थितियां अनुकूल हों, तब तो कोई भी आगे बढ़ जाता है, जैसे ढाल पर बिना पैडल मारे सायकिल, मगर इसमें कोई आनंद, सुख नहीं। अपनी मेहनत और उद्यम से हासिल का ही असल आनंद होता है। दुनिया में जड़-चेतन, जो कुछ भी है, आपके भाव से अनुप्राणित ही साकार-सार्थक होता है- न देवो विद्यते काष्ठे न पाषाणे न मृण्मये। भावे तु विद्यते देवस्तस्माद् भावो हि कारणम्।। तात्पर्य कि देवता न काठ में रहते हैं, न पत्थर में, न मिट्टी में। वे तो भाव में रहते हैं। भाव ही किसी को देवता बनाने में कारण होता है।

टाल्सटाय ने कहा है- 'ल्योबुश्का, तुम पढ़ते बिल्कुल नहीं हो, यह बहुत बुरी बात है। यह इस बात का सबूत है कि तुम अहंकार के शिकार हो। तुम्हारे विपरीत गोर्की बहुत ज्यादा पढ़ता है, यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि इससे आद‌मी में आत्मविश्वास की कमी का पता चलता है। मैं लिखता बहुत ज्यादा हूं, यह भी अच्छी बात नहीं है, क्योंकि इससे लगता है कि एक बूढ़ा आद‌मी सभी को अपने विचारों से प्रभावित करना चाहता है।'

000

वापस अबाल-युवाओं पर, जिनसे बातचीत में कुछ ऐसे भी होते हैं, जो जीवन का उद्देश्य, सृष्टि का रहस्य और स्वयं के अस्तित्व पर जिज्ञासु, चर्चा-उत्सुक होते हैं। ऐसे ही शाश्वत प्रश्न हैं, जिनका समाधान नहीं हो पाया है, मगर विचार-चिंतन सभी ने किया है तब यहीं से धर्म-अध्यात्म और दर्शन विकसित होता है। इन पर विचार करते-करते अधिकांश इससे भटक-भूल जाते हैं और कुछ विचारक-दार्शनिक हो जाते हैं, उनकी बातों ऐसा लगता है कि ‘चलो, कुछ तो मिला‘ या मन बहल जाता है कि इसे भी कुछ नहीं मिला, बस बात बनाई है। और कभी यह मान कर कि ‘मुझे भी कुछ-कुछ ऐसा ही लगता है‘, उसके अनुयायी से ले कर अंध-भक्त बनने वाले भी कम नहीं। यों कहा जाता है कि ‘दर्शन, अंधेरे कमरे में अंधे व्यक्ति द्वारा ऐसी काली बिल्ली को खोजने का प्रयास है, जो वहां नहीं है।

खलील जिब्रान ने मौज-सी लेते कहा है-
सभ्यता उस समय शुरु हुई, जब मनुष्य ने पहले पहल धरती को खोदा और उसमें बीज बोये,
धर्म उस समय शुरु हुआ, जब मनुष्य ने धरती में बोये हुए अपने बीजों पर सूर्य की दया दृष्टि देखी, 
कला उस समय शुरू हुई, जब मनुष्य ने सूरज के प्रति आभार प्रकट करते हुए स्तुति गान किया,
दर्शन शास्त्र उस समय शुरु हुआ, जब मनुष्य ने धरती की पैदावार खाई और बदहजमी की पीड़ा अनुभव की।

हजारी प्रसाद द्विवेदी, समस्त भारतीय धर्म-साधना के तीन पक्षों को रेखांकित करते हैं- उसके पीछे काम करनेवाली तत्त्व-मीमांसा (दर्शन), उसको सरस रूप में उपस्थित करनेवाला वाङ्मय (काव्य) और उसे जीवन के व्यवहार के क्षेत्र में ले आने के लिए तत्त्वानुयायी कर्मकाण्ड (क्रिया)। ये तीनों ज्ञान, इच्छा और क्रिया के प्रतिपादक होते हैं। धर्म-साधना में इन तीनों का अन्तर्भाव होता है।

फिर ऐसे साथियों को याद दिलाना होता है, उपनिषद-पुराणों में प्रश्न आए हैं, वे कुछ इस तरह हैं-
उत्पत्तिः यह संसार किससे उत्पन्न होता है?
लयः अंत में यह किसमें लीन हो जाता है?
आधारः यह संसार किसमें स्थित है (किसके सहारे टिका है)?
मायाः वह क्या है जो काले सर्प की भांति सभी प्राणियों को ग्रसता है?
जीव की गतिः आत्मा का अंतिम लक्ष्य क्या है?
कर्मः कर्मों का असली रहस्य क्या है?

वैसे ही अव्याकृत कहे जाने वाले प्रश्न, बुद्ध जिनका जवाब नहीं देते थे, मुस्कुरा देते थे, कुछ इसी तरह के हैं-
# जगत शाश्वत है या नहीं? या दोनों है? या दोनों नहीं?
# जगत नाशवान (सीमित) है या असीमित है? या दोनों है? या दोनों नहीं?
# आत्मा और शरीर एक ही हैं? या अलग-अलग?
# मृत्यु के बाद अस्तित्व रहता है या नहीं? या दोनों? या दोनों नहीं?
इसी का परवर्ती स्वरूप ज़ेन परंपरा का ‘मु‘ है, जिसका शाब्दिक अर्थ ‘नहीं‘, ‘कुछ नहीं‘, बल्कि ‘शून्यता‘ आशय का है। जो वैचारिक सीमाओं और प्रश्नाकुलता से परे निर्द्वंद्व अवस्था है।

टाल्स्टाय कहते हैं- ‘अगर जिंदगी का कोई मकसद नहीं, अगर जिंदगी खुद ही अपने में मकसद, तब तो जीने का कोई मतलब नहीं। अगर यह बात सच है तब शॉपनहावर, हार्तमान और बौद्धों के विचार भी बिल्कुल सही हैं। लेकिन अगर जिंदगी का कोई मकसद है तो यह जाहिर है कि जब वह मकसद पूरा हो जाए तभी जिंदगी को खत्म हो जाना चाहिए।‘

लाओत्से कहते हैं- ‘जीवन निरुद्देश्य है और सही आदमी सिर्फ वह है, जो जीवन को उसकी निरुद्देश्यता में जीने की कला को जान ले, जिसने भी जिंदगी में उद्देश्य खोजा, वह जिंदा रहने के रस से तो गया ही, उद्देश्य पाने के फितूर से भी मारा जाता है।‘

सालिम अली ने अपनी आत्मकथा में महमूद उज़ ज़फ़र खान को उद्धृत किया है- ‘जीवन न केवल विषय-वासनामय है और न केवल वैराग्यमय, परंतु बहुवर्णी और क्षणभंगुर। इसका आनंद लेने के लिए योग्य शरीर चाहिए, समझने के लिए सामान्य बोध। धर्म तथा दर्शन, अतएव, न तो आवश्यक हैं और न व्यावहारिकः तथापि विरोधाभास ही है कि, वे जमे हुए हैं।‘

बादल सरकार ने ‘एवम् इन्द्रजित्‘ नाटक में लिखा है- तीर्थ नहीं है केवल यात्रा। लक्ष्य नहीं, है केवल पथ ही। इसी तीर्थ पथ पर है चलना। इष्ट यही, गन्तव्य यही है।

महेश अनघ के ग़ज़ल की पंक्ति है-
जिंदगी जैसे बने जीना जीना हकीकत है। और बाकी सब किताबों की नसीहत है।

सुरेन्द्र मोहन पाठक सरलता से कह देते हैं- ‘जिंदगी को एक सिग्रेट की तरह एंजाय करो वरना सुलग तो रही ही है, एक दिन वैसे ही खत्म हो जानी है।‘

जिसे इस तरह भी कहा जाता है कि जीवन को रीझ कर स्वीकार करें या खीझ कर, उसे स्वीकार करना ही होगा।

जीवन की सार्थकता का सवाल- शांत और स्थिर का संतोष, उस समरस का अपना आनंद होता है। वह सार्थक और निरर्थक के द्वंद्व से ऊपर हो जाता है।

Tuesday, March 29, 2022

युवा मीत - YuMetta

अपनी बातचीत में युवा पीढ़ी के प्रति न सिर्फ आश्वस्ति, बल्कि बेहतर भविष्य की संभावना व्यक्त करता रहता हूं। यह कोरा आशावाद नहीं है। ऐसा संयोग लगभग लगातार रहता है कि मेरा संपर्क ऐसे युवाओं से होता है।

पिछले सप्ताह युवाओं से बातचीत के एक कार्यक्रम में गया। YuMetta Foundation संस्था के Go To The People Camp CHHATTISGARH में Journey Outwards के अंतर्गत मेरे लिए Understanding-accepting-editing system of relationships पर बात करना निर्धारित किया गया था। बताया गया कि प्रतिभागियों के लिए एक कैम्प Journey Inwards हो चुका है।


सत्र में लगभग 30 युवा और 10 आयोजक सदस्य थे। मेरे लिए उपलब्धि की तरह था कि परिचय आदि के बाद सुबह 10 बजे से शाम 6 बजे तक लगातार प्रतिभागियों का साथ रहा। भोजन और चाय अंतराल के दौरान भी सत्र से जुड़ी अनौपचारिक चर्चा होती रही। आठ घंटे लगातार एकल वक्ता की भूमिका में, आयोजक सदस्यों के सहयोग से, सत्र पूरा करना सहज संभव इसलिए हुआ कि प्रतिभागी पूरे मन से जुड़े रहे। सवाल, जिज्ञासा, संदेह, आपत्ति करते रहे और मेरी बातों के साथ इत्तिफाक-नाइत्तिफाकी रखते पूरक जानकारी जोड़ते रहे।

सत्र में मैंने मुख्यतः जो बातें कहीं-


* पहले कैम्प में आप अंतर्मुख यात्रा का कठिन रास्ता तय कर चुके हैं, आगे बहिर्मुख यात्रा का रास्ता उसकी तुलना में आसान है, मगर उसमें आने वाली कठिनाइयों को नजरअंदाज नहीं करना है, उन्हें तलाशना है, जिसमें स्थिति के साथ निदानात्मक सामंजस्य बना सकने का आत्मविश्वास हो, उसके लिए कठिनाई को देख पाना और उसे सुलझाने की नीयत और तैयारी के साथ निर्वाह संभव होता है।कहा गया है, दूसरों को समझ लेना ज्ञानी का काम है। स्वयं को समझना प्रदीप्त होना है।

* ध्यान रहे नायक, अगुवा वही होता है, जो पहल करता है और समावेशी होता है। Leadership> initiation+inclusion.

* अपनी पहचान, अपने अभ्यस्त संदर्भों से अलग हटकर संभव है तो अपने परिवेश की पहचान अपने आसपास के सभी संदर्भों के अवलोकन से।

* ‘बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो, बुरा मत कहो‘ का पालन करें, मगर तटस्थ अवलोकन के बाद बुरा-भला तय करें, सिर्फ इसलिए कि बुरा है मान कर आंख, कान, मुंह न बंद कर लें। न ही अच्छा है तय कर आकर्षण में पड़े।

* खुद को पसंद करना और खुद पर भरोसा जरूरी है, मगर आत्म-मुग्ध हो कर आत्मकेंद्रित होने से बचें।

* आप खुद को पसंद करते हैं, मां के हाथ बना खाना पसंद है। अपना परिवार, रिश्तेदार, मित्र प्रिय है तो आप में पसंदगी का गुण है फिर आप परिवेश की निर्जीव वस्तुओं, सजीव वस्तुओं- पेड़-पौधे, जीव-जंतु/ गांव, समाज, इर्द-गिर्द घटित हो रहे से ले कर देश-दुनिया और उसके आगे की भी हलचल पर नजर रखते अपनी पसंद विस्तारित कर सकते हैं।

* स्वभाव (nature) से कोई सही-गलत, अच्छा-बुरा नहीं होता, उसे बदलने की न सोचें, न प्रयास करें। प्रत्येक व्यक्ति अपने मूल स्वभाव के अनुरूप समाज में संतुलित व्यवहार करते हुए उपयोगी और आवश्यक है। व्यवहार (behaviour) भी सही या गलत नहीं होता, बदलता रहता है और परिस्थितियों के संदर्भ में उपयुक्त या अनुपयुक्त हो सकता है, अतएव लचीला हो।

*मन तो अंतरा ही होता है, उसे बार-बार स्थायी पर लाना होता है। अंतरा, मन के भाव हैं और स्थायी, आचरण। अंतरा, जिसमें आचरण से अलग अंतरंग मन की झलक हो।

* अपनी खुशी के मालिक आप स्वयं बने। व्यक्ति में हंसने और रोने की क्षमता है, परिस्थिति के अनुरूप दोनों आवश्यक भी है। परिस्थितियों पर अवसर अनुरूप किंतु स्थायी निर्भरता अपनी क्षमता पर हो। दिव्यांग, अपने वांछित लक्ष्य प्राप्त कर सकता है फिर सर्वांग क्यों नहीं!

* आंख और कान, अक्रिय और सक्रिय अवलोकन के लिए मुख्य ज्ञानेन्द्रियां हैं। हमारी शारीरिक अनिवार्यता हमारी अनैच्छिक मांसपंशियों के जिम्मे है और ढेर सारी प्रतिक्रियाएं प्रत्युत्पन्न। ज्ञानेन्द्रियों से एकत्र सूचना, मन-मस्तिष्क-विवेक से कर्मेंन्द्रियों को संचालित करती है।

* लक्ष्य-सोच, अपने परिवेश से आरंभ कर समाज के अंतिम व्यक्ति तक। जिस परिवेश-समाज के हम सदस्य हैं, वहां की विसंगति-समस्या, वहां जो कमजोर-लाचार है, वह हमारी प्राथमिकता है।

* तात्कालिक प्रतिक्रिया और निष्कर्ष, आवश्यक हो तभी अन्यथा स्थिति का आकलन - मूल कारण - तात्कालिक कारण तथा उसका तात्कालिक - दीर्घकालिक परिणाम का विचार करें।

* प्राकृतिक विज्ञान में कार्य-कारण संबंध होते हैं, मगर सामाजिक विज्ञान में स्थिति के विभिन्न कारक होते हैं। कई बार मुख्य कारक ओझल से होते हैं और गौण कारण उभरे दिखाई पड़ते हैं, उन्हें ठीक ठीक पहचानने का प्रयास होना चाहिए।

* सामान्यतः भूत कारक, भूगोल और इतिहास की पृष्ठभूमि में होते हैं। वर्तमान कारक, आर्थिक, राजनैतिक और सामाजिक होते हैं तथा भविष्यत कारक वैचारिक, धार्मिक, नैतिक, आस्था और विश्वासगत होते हैं।

* व्यक्ति-स्थिति के नकारात्मक को, स्थिति की समस्या को पहचानना, नकारात्मक दृष्टिकोण मान कर उपेक्षणीय नहीं, बल्कि आवश्यक है किन्तु सकारात्मक अंश को रेखांकित कर उभारने, सक्रिय करने का प्रयास श्रेयस्कर और आवश्यक होता है।

* प्राथमिकताओं का निर्धारण और निराकरण, सामाजिक व्यवस्थागत विसंगतियां। समस्या के लिए पूर्वानुमान, सावधानी, आवश्यक संसाधनों का आकलन, उपलब्धता तथा समस्या के निदान, उपचार और स्थायी निराकरण की समग्र दृष्टि आवश्यक है।

* ऐसी कई बातों की चर्चा के साथ छत्तीसगढ़ को उदाहरण बना कर, उसका इस समग्रता की दृष्टि से परिचय कि किस प्रकार किसी अंचल का भूगोल, मानविकी, शासन व्यवस्था, अर्थशास्त्र, राजनीति, प्रशासन और उसके भविष्य के स्वरूप को निर्धारित करने वाले कारक होते हैं।


सत्र के दौरान मैंने महसूस किया कि वर्तमान और भविष्य की चिंता इन युवाओं को हमसे अधिक है, लेकिन उसमें निदान और निराकरण की संभावना देखने और उद्यम कर सकने का सामर्थ्य है। वे अपने भविष्य/कैरियर की वैकल्पिक संभावना के लिए भी तैयार हैं। हमें तब तक परेशान होने की जरूरत नहीं है, जब तक हम उनके साथ हैं, वे हमारे साथ हैं और हम भी उनकी तरह, उनके नजरिए से समाज और दुनिया की हर ऐसी कमी और जरूरत को देख पा रहे हैं, जिससे मुकाबिल होने का उत्साह उनमें है साथ ही दुनिया को बेहतर कर सकने का जज्बा भी।