पलाश पर लिखना है। पहली चुनौती है कि न जाने कब से ‘पलाश‘ पर लिखा जाता रहा है, उस पर अब क्या ही लिखा जा सकता है, जो उस सबसे चाहे बेहतर न हो मगर कुछ अलग-सा तो हो। यों परंपरा भी रही है कि कुछ लिखने-करने के पहले मंगलाचरण हो, देव-पूर्वजों, पूर्वाचार्यों का स्मरण कर लेना चाहिए। यह शायद इसलिए कि आप जो कहने जा रहे हैं, पहले कहे जा चुके से कुछ अलग और आगे की बात कहें, ‘वही ढाक के तीन पात‘ न हो, और अनूठा कहने के चक्कर में बेढंगा न हो जाए, कुछ सार्थक भी हो। इसके लिए पहले जरूरी है कि कब-किसने क्या-क्या कहा है, पता कर लें, मुश्किल यहीं से शुरू होती है। इस पर याद आया कि यह भी तो कहा गया है कि मुश्किल जहां से पैदा हो, हल भी वहीं से निकलता है, तो ...
असमंजस है, मंगलाचरण क्या हो, कैसे करें? कालिदास के ‘कुमारसंभवम्‘ का आरंभ होता है- ‘अस्त्युत्तरस्यां दिशि ...‘ इसमें कहां है मंगलाचरण। संस्कृत पंडितों की बात निराली। सवाल किया जाता है कि क्या मंगलाचरण के बिना भी महाकाव्य आरंभ किया जा सकता है? क्या कालिदास से चूक हुई? पंडित हल भी सुझा देते हैं- यहां एकशब्दीय ‘अस्ति‘ ही मंगलाचरण है। अस्ति यानी ईश्वर, क्योंकि ईश्वर के बाहर सब कुछ नास्ति है। और बात पलाश की, तो इस महाकाव्य में उन्हें पलाश, बालचंद्र के समान वक्र और अतिलोहित लाल दिखता है। फिर हमारा मंगलाचरण? क्या परवाह, यह तो फुटकर लिखावट है, कोई उदार समीक्षक भूले-भटके इसे ही ‘ललित निबंध‘ ठहरा दे तो उसकी जै-जै। फिर भी आग्रह हो, कोई ढूंढने पर ही उतारू हो जाए तो पंडितों पर भरोसा कि पलाश भी एकशब्दीय मंगलाचरण साबित हो सकता है।
सोचा, पता करूं, वेदों में ‘पलाश‘ पर क्या कहा गया है? लेकिन क्या वेदों में पलाश शब्द आया होगा। वैदिक कवि इस शब्द से, इस पेड़ और फूल से परिचित थे? ऐसा तो नहीं कि वे इसे ‘किं-शुक‘ कहते रहे हों। ढाक या टेसू, जैसा देशज तो नहीं कहते रहे होंगे। ढाक, सुनते ही लगता है कि पलाश को इस नाम से जानने-पुकारने वाले ने या तो इसके पेड़ को देखा है या फल को और ‘वही ढाक के तीन पात‘ कहते उसका ध्यान गया है पत्तों पर। उसने फूल खिला पलाश देखा होता तो ‘टेसू‘ जैसा ही कुछ नाम देता। मगर फूल तो मौसमी है- ‘कूलन में केलिन में..‘ बसंत हमेशा तो नहीं बगरा रहता। ढाक और टेसू शब्द कहां से आते हैं, तलाश के लिए सूत्र पकड़ कर आगे बढ़ सकते हैं कि दोनों शब्दों में ‘ट‘ वर्ग है, लेकिन बस अटकना है। बहकना-भटकना, जहां-तहां मुंह मारना और बात-बेबात सिर घुसेड़ना समीचीन नहीं, अस्तु ...
पूर्ववर्तियों को याद करता चलूं, शायद कोई बात बने। पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, न कि ‘पद्मलाल-पन्नालाल‘, उन्होंने अपने इस तरह नाम पर भी निबंध लिखा है। हमने स्कूल के दिनों में उनका निबंध पढ़ा था- ‘क्या लिखूं?‘। मन ही मन मदद की गुहार, वह याद करता हूं। निबंध आरंभ होता है- ‘मुझे आज लिखना ही पड़ेगा ...‘ कहते हुए बताते हैं कि ‘दूर के ढोल सुहावने‘ और ‘समाज सुधार‘ पर निबंध लिखना है ... उनकी बात यहां से शुरू हो कर, आगे ‘क्या खूब‘ होते कहां से कहां पहुंच जाती है। अब सोचता हूं कि क्या उन्होंने इस निबंध में यह भी कहना चाहा है कि समाज-सुधार पर बात दूर के ढोल की तरह हैं, इसे अपनी ढपली अपना राग की तरह गाने-बजाने से काम नहीं बनता, इसके लिए कुछ सकारात्मक-सार्थक करना होता है। तो ऐसा न हो कि पलाश पर साहित्य रच, प्रकृति-प्रेम यहीं तक सिमट कर रह जाए।
कबीर कहते हैं- ‘मसि कागद छुयौ नहीं, कलम गह्यौ नहीं हाथ‘, अब कौन मसि-कागद-कलम छूता है, अब ‘कलम के सिपाही‘, कम से कम शाब्दिक रूप में तो अप्रासंगिक ही हो गए। टच-स्क्रीन मोबाइल और ‘स्पीच टू टेक्स्ट‘ के बाद यों की-बोर्ड भी, बीती बात हो रहा है। दूसरी तरफ कुछ सोचने-याद करने या किताबें पलटने के पहले एआइ-एलएलएम ललचा रहा है, ‘मैं हूं ना‘ की तरह हर मौके पर साथ देने को तैयार, मगर डिस्क्लेमर के साथ कि ‘एआई गलत जानकारी दे सकता है, इसलिए, इसके जवाबों की दोबारा जांच कर लें‘। अब कुछ लिखना हो तो यह भी ध्यान रखना होता है कि ऐसा क्या लिखे जो एआइ के लिए संभव न हो। चोर-मन, एआइ की याद दिलाता रहता है। इस पर सोचा कि उसे कमांड क्या दूंगा- शायद यह कि ‘मुझे पलाश पर लेख लिखना है, इसके समानार्थी शब्द बता दो, वे शब्द मुख्यतः कहां-कहां इस्तेमाल हुए हैं, यह भी बता दो और यह भी बता दो कि सर्च के लिए इसके अलावा ‘की-वर्ड‘ क्या होगा, यानि यह भी बता दो कि मैं क्या पूछूं‘। अनुमान कर रहा हूं कि ‘वाल्मीकि, व्यास, कालिदास, भारवि ...‘ आदि तो बता ही देगा। फिलहाल, अपनी यादों की उधेड़बुन के सहारे ...
कबीर-पलाश के साथ हजारी प्रसाद द्विवेदी के ललित निबंधों की युति स्वाभाविक है। रामचंद्र शुक्ल के तुलसी तो हजारी प्रसाद द्विवेदी के कबीर। द्विवेदीजी की ललित लेखनी, आम से ले कर कुटज पर तक चली है, फिर क्या पलाश उनसे छूटा रह गया। छूटा तो नहीं मगर वे पलाश के लिए कबीराना हो गए। उन्हें ‘शिरीष के फूल‘ के साथ पलाश और उससे जुड़ कर कबीर-वाणी याद आ जाती है- ‘दिन दस फूला फूलि के, खंखड़ भया पलास‘। सोचता हूं कि ऐसी क्या बात है कि वसंत-वनशोभा वाले इस वृक्ष का दंड ब्रह्मचारी धारण करते हैं। अब इन सब से बचते-बचाते आगे बढ़ना है। ध्यान रखना है कि अप्रासंगिक-सा होने लगे तो ललित निबंध बता देने पर बात बन सकती है, बशर्ते कुछ लालित्य हो, ललित के नाम पर ‘गलित-पलित‘ न हो।
कभी बड़ौदा गया था, वहां जिन सज्जन से मेरी पहली मुलाकात हुई, उन्हें मैंने अपना नाम-परिचय बताया, ‘राहुल‘, वे गर्मजोश मुस्कान सहित हाथ मिलाते हुए बोले- ‘आई एम केतुल, वेलकम!‘, कुछ खिसियानी कुछ मुस्कानी, मैंने पूछा आप कवि हैं?, तुक अच्छा मिला लेते हैं, राहुल-केतुल। बातचीत होने लगी, पता लगा कि यह नाम गुजरात में आम है, मैंने यह नाम पहली बार सुना था। वे पंडित निकले, राहु-केतु पर बात होने लगी। उन्होंने पूछा, आप पुरातत्व, मूर्तिविज्ञान से जुड़े हैं, आप ‘पलाशपुष्पसंकाशं‘ से परिचित नहीं हैं? प्रसिद्ध नवग्रह स्तोत्र में केतु का रंग, पलाश पुष्प जैसी कांति वाला, लाल कहा गया है। मैंने अपनी नासमझी पर परदा डालने मौका निकाला कि मंदिरों के प्रवेश-द्वार में सिरदल के नवग्रह पट्ट पर राहु-केतु को तो देखा है, किंतु पाषाण-कृति होने के कारण मेरा ध्यान उनके अंग-लक्षण, आकार-बनावट तक सीमित रहा। फिर पलाश के लाल को लाल कहना भी कोई कहना हुआ! बानगी स्वरूप पेश, कुन्तक (वक्रोक्तिजीवित में) अपने प्रयत्न की उपादेयता प्रतिपादित करते हुए कहते हैं- ‘यथातत्त्वं विवेच्यन्ते भावास्त्रैलोक्यवर्तिनः। यदि तन्नाद्भुतं नाम दैवरक्ता हि किशुकाः।।‘ त्रिलोकी में स्थित पदार्थों का यदि यथातथ्य रूप में विवेचन किया जाता है तो उसमे अद्भुतता नहीं होगी क्योकि किंशुक तो स्वभावतः लाल हुआ ही करता है (अतः यदि कवि यह वर्णन करे कि किंशुक लाल होता है तो उसे हम अद्भुत न होने के कारण साहित्य या काव्य नहीं कहेंगे)।
पलाश/पलास, टेसू या रक्तपुष्प, इस पेड़ और फूल दोनों के लिए कहा जाता है पर किंजुल, किंशुक, केसू सामान्यतः फूल को कहा जाता है, इसी तरह पेड़ के लिए नाम मिलता है- काष्ठद्रु, ढाक, छिवला, त्रिपर्ण, ब्रह्मद्रुम और यूप्य। रोचक कि पत्र-पत्ता यानी ‘पर्ण‘ शब्द भी पलाश का समानार्थी है। इसके वनस्पति वैज्ञानिक नाम ‘ब्यूटिआ मोनोस्पर्मा‘ नाम में मोनोस्पर्मा तो समझ में आता था कि इसकी फली एकल-बीजी है, लेकिन ब्यूटिआ को ब्यूटी, सुंदर ही मानता था। पता चला कि यह अंगरेज वनस्पति विज्ञानी, जॉन स्टुअर्ट, अर्ल द ब्यूट से आया है, एकबारगी मन उदास हुआ, कुछ अपनी नासमझी, गलतफहमी पर और उससे कुछ अधिक यह जान कर कि ब्यूटिआ, ब्यूटी नहीं ब्यूट है, फिर याद कर लिया कि नाम में क्या रखा है, नाम-रूप से गुण-भाव तो नहीं बदल जाते। और क्या नाम भी नहीं बदल जाते, बातचीत में एक साथी आपत्ति कर रहे हैं ‘ब्यूटिआ मोनोस्पर्मा‘ नहीं ‘ब्यूटिआ फ्रोंडोसा‘। बस यह ध्यान रहे कि पलाश ‘फारेस्ट फायर‘ नहीं है, ‘फ्लेम ऑफ द फारेस्ट‘ है, पंचतत्व, महाभूतों में से एक। कवि नरेन्द्र शर्मा फागुनी-बसंती हो, लिखते हैं- ‘लग गयी आग; बन में पलाश, नभ में पलाश, भू पर पलाश। लो, चली फाग; हो गयी हवा भी रंगभरी छू कर पलाश।‘ अज्ञेय का ‘टेसू‘ भी कहता है- ‘इस वनखंडी में आग लगा दूं।‘
कभी बांग्ला गीत सुना था, जिसमें सीधे कमलनयन या पद्मलोचन के बजाय कहा गया है- ‘दाओ दरशन पद्म-पलाश लोचन‘। पलाश-लोचन यानि?, सोच में पड़ गया हूं- आंखें, मृगनयनी, खंजन-नयन या जैसा किसी ताम्रपत्र उत्कीर्ण लेख में आता है- ‘चकोरनयनं लिखितं सुवाक्यैः‘, और आंखें सिर्फ नेत्र-गोलक ही तो नहीं हैं, नीली, फीरोजी, बिल्लौरी, कजरारी आंखों के साथ भौंह/पलक, बरौनी!, किसे जोड़ कर कहा गया होगा पलाश-लोचन!, भेद नहीं पाता तब ‘संवेदनात्मक ज्ञान‘ से ‘ज्ञानात्मक संवेदना‘ की ओर बढ़, भाव में उतर गुनगुना सकते हैं?- ‘हमको तो जान से प्यारी हैं पलाशी आंखें!‘ बुद्धि तो काव्य-रस में बाधक हो जाती है- किसी कवि ने पलाश को मानों गुलाब के टक्कर में खड़ा कर रहा हो, कहता है- ‘जब जब मेरे घर आना तुम, फूल पलाश के ले आना तुम‘। ओ कवि! ऐसा कह कर तो तुम रास्ता ही बंद कर दे रहे हो, पलाश तो ‘दिन दस फूला ...‘ है।
रामविलास शर्मा नाम से आगरा वाले आलोचक पर ही ध्यान जाता है, उन्होंने कविताएं भी लिखीं, ‘तार सप्तक‘ के कवि हैं, यद्यपि उन्होंने कहा था- ‘पता नहीं कविता पढ़ कर अपरिचित मित्र मेरे बारे में किस तरह की कल्पना करेंगे। मैं उन्हें एक बात का आश्वासन देना चाहता हूं,- जैसे वे मेरी कविताओं के बारे में ‘सीरियस‘ नहीं हैं, वैसे मैं भी नहीं हूं।‘ फिर इसी नाम के साथ कभी दो कविता, ‘छत्तीसगढ़ की शाम‘ मिली थीं, उसी के साथ एक कविता ‘टेसू फूले भी थी। अनुमान हुआ यह कोई अन्य रामविलास शर्मा, प्रकृति का चितेरा कवि है। उनकी खोज-खबर मिली कि शायद मालवा निवासी थे, स्टेट ट्रांसपोर्ट वाले। लाल बस, स्टेट ट्रांसपोर्ट के कुछ बुजुर्ग परिचित बताने लगे कि 1963 में सड़क परिवहन के राष्ट्रीयकरण से मध्यप्रदेश राज्य परिवहन निगम बना, जो पूर्ववर्ती ‘मध्यभारत रोडवेज‘ और ‘सीपी ट्रांसपोर्ट सर्विसेज‘ के एकीकरण का परिणाम था। ये रामविलास मध्यभारत रोडवेज होते मध्यप्रदेश राज्य परिवहन निगम में आए, डिपो मैनेजर रहे। वे छत्तीसगढ़ में रहे या आना-जाना रहा। पिछली सदी के सातवें-आठवें दशक के भोपाल के साहित्यिक-सांस्कृतिक माहौल के लिए विश्वसनीय स्रोत डॉ. सुशील त्रिवेदी हैं, उन्होंने याद किया कि ये रामविलास शरद जोशी के करीबी थे, भगवत रावत, सोमदत्त गर्ग और घनश्याम ‘मधुप‘ के साथ होते थे। उनका संग्रह ‘कविता में सुबह‘ 1978 में साहित्य परिषद भोपाल से छपा था, तब चर्चित था, अब शायद ही कोई याद करता है। नाम पर अटक-भटक कर फिर पलाश पर आएं, उनकी कविता ‘टेसू फूले‘ की पंक्ति है- ‘अंग अंग में टेसू फूले, आँखों में रंगीन सपन‘। मित्र महेश भोपाल के दिनों को याद करते रहते हैं। वे ‘प्राच्य निकेतन‘, बिरला मंदिर के सहपाठी, वहां तब पर्यटन की भी पढ़ाई होती थी। इसी क्रम में बात निकली मध्यप्रदेश पर्यटन के होटल ‘पलाश‘ की। मैंने पर्यटन मंडल के अधिकारी से पूछ लिया था, कि क्या ऐसे पर्यटक-सैलानी भी आते हैं, जो पूछते हों कि ‘पलाश‘ क्या होता है। वे मुस्कुराए, होटल आने का न्योता दिया और पहुंचने पर होटल के सामने, परिसर में लगा पलाश का पेड़ दिखाया। कहा, सिर्फ नाम का नहीं, यहां सचमुच पलाश है और अंदर फागुनी-बासंती माहौल भी।
1757 वाली प्लासी की लड़ाईं के साथ देश का इतिहास तो बदला ही, पश्चिम बंगाल के पलाश-बहुल स्थान के नाम ‘पलाशी/पलासी‘ को भी बदल कर प्लासी हो गया। अब शेखर बंद्योपाध्याय की किताब के अंग्रेजी मूल में शीर्षक Plassey है, मगर उसके हिंदी अनुवाद ‘पलासी से विभाजन तक‘ में वह वापस आया है। छत्तीसगढ़ में पचासों गांव होंगे, जिन्हें पलाश/परसा से नाम मिला है। सिर्फ ‘परसा‘ नामधारी गांव तो हैं ही, परसाही, परसहा, परसदा भी कई-कई हैं। इसके अलावा परसा के साथ पानी, मुड़ा, बुड़ा, पारा, टोला, पाली, गुड़ी, डीह, खोर, खोल, खोला, भांठा, कांपा जैसे प्रत्यय जुड़ कर गांवों के नाम बने हैं। इनमें एक नाम परसाभदार भी है। गांव न बस पाया हो, गांवों के साथ जुड़ा ‘परसाभदेर‘ भूखंड अब भी सुनने मिल जाता है।
छत्तीसगढ़ में भदार/भदेर, परसा के समूह वाले इलाके के लिए कहा जाता है, ज्यों आम की अमरइया, महुआ की मउहारी, बांस की बंसवार, कउहा का रवार या बोइर का खोर। मेरे गांव का दक्षिणी भाग, जो सीमेंट फैक्ट्री आ जाने के कारण सीसीआइ भांठा कहलाने लगा, परसाभदेर था। भरकहा-भांठा, जहां परसा बहुतायत में, कहीं-कहीं बनबोइर और मकोइया। आजादी के बाद तक यहां कृष्णसार मृग होते थे, और आसपास हुम्मा यानी ग्रेट इंडियन बस्टर्ड भी। तीतुर, भठतीतुर, लमहा और कभी-कभी बरहा अब भी दिख जाते हैं। औषधीय उपयोग और उसके लाभ से कोई भी वनस्पति अछूती नहीं, फिर पलाश की क्या बात। औषधि रूप में प्रयोग और उससे लाभ-हानि का जिम्मा लेने से बचते, इसे गूगल के मत्थे छोड़ आगे बढ़ें। एक तरफ यज्ञ के लिए हवन-श्रुवा तो गंवई जीवन में दोना-पत्तल बनाने के लिए परसा के पत्ते और चूना-पोताई के लिए परसा-जरी की कूंची काम आती रही। पलाश की जड़ से निकाली रस्सी- ‘बांख‘, हल-नांगर का नहना-जोता के अलावा सुहाई, सींका के भी काम आती थी। और होली के लिए टेसू-फूलों से रंग बनाने का उद्यम, मेरे हमउम्र बचपन में अधिकतर ने किया है।
आधी सदी पुराने दिन। जांजगीर निवासी ख्यातनाम अधिवक्ता विजय कुमार दुबे जी ने हमें स्कूल में विज्ञान पढ़ाया, उनका स्नेह यथावत है। फोन पर प्रणाम कर लेता हूं। सुयोग बना है उनसे आशीर्वाद लेने का। उनका ललित निबंध संग्रह ‘पलाश‘ (सन 1993) है। पर्यावरण से प्रेरित इस संग्रह में विद्यानिवास मिश्र, प्रधान सम्पादकः नवभारत टाइम्स का संदेश प्रकाशित है, जिसमें वे लिखते हैं कि ‘... हर निबंध को सहज प्रकृति के सौंदर्य और उस सौंदर्य के मनुष्य मन पर पड़ते प्रभाव इसमें ऐसा अंकित है कि प्रकृति मनुष्य से अलग दिखाई नहीं पड़ती।‘ संग्रह में ‘टप टप टपके महुआ, मेरी धरती कहां गई, यह धरती कितना देती है, बह रहे जहां उन्चास पवन, माटी कहे कुम्हार से‘ जैसे पर्यावरण पर आधारित निबंध हैं। रचनाकार ने इन निबंधों के लिए कहा है कि ‘... पलाश के इन अनिंद्य पुष्पों को लोक-मानस की पूजा में समर्पित ...‘ मानों प्रकृति और पर्यावरण पर आधारित सारे निबंधों के लिए एक शब्द में पर्याय ‘पलाश‘ ही हो सकता है।
‘धर्मयुग‘ 19 मार्च 1978 के अंक में कैलाश गौतम की कविता ‘फागुनी दोहे‘ छपी, हमलोगों ने पढ़ी और रट ली। इसके दसेक साल बाद वे मल्हार आए, अपने मित्र रामप्रताप सिंह ‘विमल‘ जी के बुलावे पर, तब यह उनसे प्रत्यक्ष सुनी, इन दोहों में आम के बौर, कचनार, गुलमोहर, महुआ तो है, पलाश नहीं। मगर उनकी एक अन्य कविता में पलाशी फगुनाहट इस तरह है- ‘भीतर से खिड़कियाँ खुलेंगी, बौर आम के महकेंगे/ आंच पलाशों पर आयेगी, सुलगेंगे कुछ दहकेंगे/ घर का महुआ रंग लाएगा, चूना जैसे पान में। ‘कैलाश गौतम के ‘फागुनी दोहे‘ का पहला दोहा है- ‘लगे फूंकने आम के बौर गुलाबी शंख, कैसे रहें किताब में हम मयूर के पंख‘। ऐसी ही बात कही जाती है- ‘अबकी बिछड़े तो मुमकिन है ख्वाबों में मिलें, जैसे सूखे हुए कुछ फूल किताबों में मिले‘ इसी तर्ज पर अपनी पत्र-डायरी में पुराने मगर अब भी ताजा कुछ पलाश-स्मृतियां जतनी हुई हैं-
दिनांक 23-2-1988 - ताला में धीरे-धीरे पलाश फूलने लगे हैं, दोपहर की चुभती धूप में नदी की ओर पहुंच जाने पर खिलते जा रहे पलाश और नदी में बनती उनकी परछाईं देखकर धूप की तेजी महसूस नहीं होती और पूरे वातावरण में भोर की खिलती धूप जैसी लालिमा बिखरती दिखाई देती है - होली की शुभकामनाएं।
दिनांक 3-3-1988 - ताला का नजारा अब कुछ तेजी से बदलने लगा है। पलाश खिलने में भी तेजी आ गई है, चारों ओर खुशी की लाली छाने लगी है। रास्ते में सेमल के सूखे बेजान से पेड़ों पर बड़े-बड़े लाल फूल लगे हैं और कुछ नीचे भी टपकने लगे हैं, जो हमसे जल्दी संवेदना ग्रहण कर बता रहे हैं कि वातावरण में गरमी घुलने लगी है। आम के बौर का तो हाल ही मत पूछो। महुआ के भी फूल आ गए हैं और हवा में इनकी गंध भी घुल गई है।
दिनांक 17-3-1988 - लगभग दस दिन पहले बिलासपुर से अम्बिकापुर के रास्ते में और अम्बिकापुर से यहाँ (डीपाडीह) आते हुए रास्ते में सेमल के पेड़ों को देख रहा था। लकादक फूलों से भरे पेड़। 7-8 फुट से 40-50 फुट तक के पेड़। सभी पर मस्ती का वही आलम। सेमल का पेड़ ध्यान से देखा है? बिना पत्तों के कांटेदार तो कभी उबड़-खाबड़ तनों वाले लम्बे-ऊंचे पेड़। एकदम सूने-सूने से, पर मनहूस नहीं और इनके फूलों को देखकर लगता था कि यह लाली पूरे पेड़ की, साल भर की शुष्कता को अचानक प्रकट करने लगी हो, लगने लगता कि सेमल सिर्फ पेड़ ही नहीं पूरा का पूरा जिन्दा चरित्र है। अपने इस कमरे से साइट तक जाते हुए भी रास्ते में सेमल का एक ऊँचा पेड़ है, पर अब उसके सब फूल झड़ गये हैं, सेमल ने जैसे फिर से मानो मौन धारण कर लिया हो। यह मंभीरता उसके फलों के कारण भी हो सकती है, फल या सृजन के संग गंभीरता तो आती ही है। (दहकते दोपहर का फ्लेम आफ द फारेस्ट- ‘किं शुक?’ शुक जैसा। मगर इस मौसम में सेमल पर भी शबाब है और उसके फूल झड़ने के बाद हरे तोते की तरह फल लटकने लगते हैं, जो गरमी बढ़ने पर बिखर, फाहे बन उड़न-छू हो लेंगे।)
दिनांक 30-3-1988 - कल (बिलासपुर से डीपाडीह) रास्ते में आते हुए खूब पलाश के फूल दिखे। अभी बेतहाशा खिले हैं और नीचे झड़ने भी लगे हैं। जादुई चांदनी रात, जंगल के बीच में इनकी लाली देख कर लगता है कि जैसे पूरे जंगल पर सुहाग बगर गया हो - वनश्री सुहागन हो गई हो ... नटखट बसंत ने मांग भरते सिंदूर बिखरा दिया हो ... मंगलमय सुंदरता का झीना आवरण।
हाजिर नाजिर, ‘अकलम-खुद‘ यह लेखन, स्मृति-जन्य विभिन्न संदर्भों युक्त मौलिक, एआई मुक्त है। यह अवश्य संभव है कि इस लेख के ऑनलाइन होने के बाद यह एलएलएम-कंटेट बन कर, एआइ को समृद्ध करे। तो जैसी परंपरा मंगलाचरण की है, वैसी ही समापन पर कामना- ‘बेबी बूमर्स‘ पीढ़ी के इस अकलतरावासी, इन दिनों ‘प्रमुख, धरोहर परियोजना, बायोडायवर्सिटी एक्सप्लोरेशन एंड रिसर्च सेंटर‘ की ओर से- ‘जा एआइ, पलाश तेरी वंश-वृद्धि में सहायक हो, बाल-बच्चे सुखी रहें, तूने जेन-जी की सोच बदली, वे तेरी हैसियत बदल कर अल्फा-बीटा पैदा कर रहे हैं, गामा, डेल्टा, पाई होते ओमेगा से भी आगे निकल जाएं, एल्फाबेट, अलिफ-बे और अपना ककहरा भी जानें। पलाश की आवाजाही बरास्ते मन, साहित्य में, रन-बन में भी बनी रहे। स्क्रीन से बाहर मौसम न हो तो भी चित्त में पलाश की लहक-बहक रहे।
-राहुल कुमार सिंह
आदरणीय सतीश जायसवाल जी का संदेश तथा प्रत्यक्ष में हुई चर्चा के तारतम्य में यह लेख लिखा गया है। सतीश जी का संदेश इस प्रकार था-
पलाश : दृश्य में, संवेदनाओं में ! एक गद्य संचयन की योजना ...
पलाश अदम्य जिजीविषा का ग्रीष्मकालीन फूल है। धूप जितनी प्रखर होती है पलाश उतना ही दमकता है। सूर्य को चुनौती देता है। यह जितना जंगली है उतना ही घरेलू भी है। घर के आंगन तक चला आता है। पलाश पेंटिंग्स में मिलता है, फोटोग्राफी में मिलता है। इसके पौराणिक संदर्भ हैं। तो इससे जुड़ी कथा, किंवदंतियां भी जनजातीय समाज में व्याप्त हैं। औषधीय गुणों के साथ साथ लोक व्यवहार में भी पलाश के उपयोग बताए जाते हैं।
पलाश को कविता में अच्छा विस्तार मिला है लेकिन गद्य में इसकी जरूरत है। एक सुगठित कथेतर में इस जरूरत के अनुकूल होगा। इसे ध्यान में रखकर एक संचयन की योजना आपके सामने रख रहा हूं। आपसे एक आलेख का आग्रह है। सामान्य तौर पर अढ़ाई, तीन हजार शब्दों को एक आलेख के लिए आदर्श माना जाता है। लेकिन "पलाश" की अपनी जरूरत और आपके मन का फैलाव शायद इस सीमा के बाहर भी जा सकता है। अलबत्ता हमारे पास समय की थोड़ी बंदिश होगी। ...

