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Monday, December 5, 2022

डीपाडीह - वेदप्रकाश

वेदप्रकाश नगायच
1988 से 1990 सरगुजा में पुरातत्वीय गतिविधियों के उल्लेखनीय वर्ष हैं। इस दौरान डीपाडीह के स्मारक, पुरावशेष अनावृत्त हुए। इस कार्य में जी.एल. रायकवार जी के साथ, लगभग पूरे समय मेरी सहभागिता रही। आरंभिक चरण में बारी-बारी शामिल विभाग के अन्य अधिकारी में वेदप्रकाश नगायच जी की उपस्थिति महत्वपूर्ण रही। काम के साथ, विभिन्न प्राप्तियों पर विस्तार से विचार-विनिमय होता। नगायच जी ने इन अधपकी चर्चाओं को करीने और सलीके से अपने अनुभव का आधार दे कर लेख का स्वरूप दिया, जो ‘मध्यप्रदेश संदेश‘ के 25 फरवरी 1989 अंक में प्रकाशित हुआ, यहां प्रस्तुत-

डीपाडीह
मंदिरों का नगर

मध्यप्रदेश के पूर्वी अंचल में स्थित सरगुजा जिला प्राचीन इतिहास की अनेक श्रृंखलाओं को अपने में समाहित किये हुये है। सरगुजा का संपूर्ण क्षेत्र अलौकिक सौंदर्य से ओत प्रोत है। ऐसा प्रतीत होता है कि प्रकृति ने वनों, पर्वतों, नदियों एवं सरोवरों की नैसर्गिक छटा यहां बिखेर दी हो। संभवतः इसी से इसे ‘स्वर्गजा‘ की संज्ञा से विभूषित किया गया एवं पश्चातवर्ती काल में अपभ्रंश होते हुये इसका नाम सरगुजा हो गया।

इस जिले के पुरातत्वीय महत्व के स्थलों में रामगढ़ स्थित जोगीमारा एवं सीतावेंगा की गुफायें तथा पहाड़ पर ही स्थित विश्व की सबसे प्राचीन नाट्यशाला है जो तीसरी दूसरी शती ईसा पूर्व की है। जिसका अभिलेखीय साक्ष्य भी है। इसके अतिरिक्त मुख्य पुरातत्वीय स्थलों में महेशपुर, लक्ष्मणगढ़, सतमहला, देवगढ़, सीतामढ़ी, हरचौका, बेलसर, एवं डीपाडीह है। परंतु ये सभी स्थल पुरातत्वीय संपदा से सम्पन्न होते हुये भी रामगढ़ की विश्व विख्यात कीर्ति के समक्ष अपनी पहचान व महत्व के लिये उपेक्षित ही बने रहे।

हाल ही में मध्यप्रदेश पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग के आयुक्त श्री के. के. चक्रवर्ती ने इन उपेक्षित स्थलों का निरीक्षण करते हुये प्रथम दृष्टया डीपाडीह को पुरातत्वीय अन्वेषण का केंद्र बनाया। यहां के टीलों में दबे पड़े मंदिरों, मूर्तियों, परावशेषों को अनावृत्त करने हेतु राज्य पुरातत्व विभाग के अधिकारियों द्वारा मलवा सफाई का कार्य उनके निर्देशन में जारी है।

ग्राम डीपाडीह जिला मुख्यालय अंबिकापुर से ७३ कि.मी. उत्तर की ओर स्थित है जो कुसमी तहसील के अंतर्गत आता है। डीपाडीह की स्थिति अत्यन्त मनोरम है. चारों ओर से पहाड़ियों से घिरा हुआ तथा कन्हर, सूर्या तथा गलफुल्ला नदियों के संगम के किनारे बसा है। जहां सूर्या नदी का पानी गर्म है वहीं कन्हर एवं गलफुल्ला नदियों का पानी ठंडा है। समुद्रतल से डीपाडीह की ऊंचाई लगभग २९०० फीट है जिस से यहां का मौसम काफी सुहावना रहता है।

ग्राम डीपाडीह से करीब २ कि.मी. पर शाल वृक्षों के घने झुंडों के मध्य मुख्य रूप से शिव मंदिरों के करीब २० टीले एवं एक बावली है। इस स्थल को यहां के लोग सामत सरना कहते हैं। यहां की प्रचलित लोक-कथा के अनुसार बिहार प्रांत के टांगीनाथ से यहां के सामत या सम्मत राजा का युद्ध हुआ था जिसमें टांगीनाथ ने अपनी कुल्हाड़ी फेंककर सामत राजा पर वार किया और वह यहीं वीरगति को प्राप्त हुये थे, जिनकी यहां स्थित विशाल प्रतिमा को लोग पूजते हैं। वस्तुतः यह परशुधर शिव की प्रतिमा है जो कालक्रम में कई भागों में भग्न हो गई जिसे ग्रामवासियों द्वारा इस स्थल के विविध टीलों (मंदिरों के) से अलंकृत प्रस्तर खंड व प्रतिमाएं लाकर घेरकर एक लघु मढ़िया का रूप दे दिया है तथा सामत राजा के नाम से इन्हें पूजते हैं व आदिवासी लोग यहां अपने समाज की बैठकें किया करते हैं।

सामत सरना में टीलों के ऊपर भी प्रतिमाएं यत्र-तत्र बिखरी है जिनमें गणेश, भैरव, वीरभद्र, शिवगण, नदी-देवी, महिषासुरमर्दिनी, चामुण्डा व विविध शिल्पखंड प्रमुख हैं।

सामत सरना से थोड़ा आगे उरांवटोली (उरांव लोगों की बस्ती) स्थित है। सामत सरना एवं उरांव टोली के मध्य करीब ७-८ टीले तथा एक पक्का रानी तालाब भी है। सामत सरना से करीब १ कि.मी. पश्चिम की ओर कन्हर नदी के किनारे भी दो मंदिरों के भग्नावशेष हैं जिस में मंदिरों की द्वार चौखटें तथा अलंकृत शिल्पखंड यत्र तत्र बिखरे हुये हैं।

इस प्रकार डीपाडीह के ४-५ कि. मी. के क्षेत्रफल में करीब ३० मंदिरों के टीले हैं जो स्पष्टतया डीपाडीह के मंदिरों का नगर होना प्रमाणित करते हैं। अभी तक डीपाडीह के उरांवटोली स्थित एक विशाल टीले तथा सामत सरना के ३ टीलों की मलवा सफाई कार्य संपन्न हुये हैं जिनसे मंदिर के वास्तु एवं प्रतिमा विधान के नये आयाम स्थापित हुये हैं।

उरांवटोली जो कन्हर एवं गलफुल्ला नदियों संगम के समीप स्थित है, के विशाल टीले की मलवा सफाई में शिवमंदिर के ध्वंसावशेष प्रकाश में आये हैं। मंदिर का शिखर एवं मंडप भाग पूर्णतः धराशायी हो चुके हैं मंदिर की जगती एवं अधिष्ठान अपने मूलरूप में अनावृत्त हुये हैं।

मंदिर निर्माण योजनानुसार एक विशाल चबूतरे पर जिसमें मंडप, अंतराल एवं गर्भगृह तीनों अंग स्पष्ट हुये हैं। पूर्वाभिमुख इस मंदिर के मंडप में तीन सीढ़ी चढ़कर पहुंचते हैं। मंडप १६ स्तंभों पर आधारित रहा होगा। चार स्तंभों की तीन पंक्तियां हैं जिनकी कुंभियां अपने मूल स्थान पर हैं तथा उत्तर व दक्षिण दिशा में दो दो दीवाल स्तंभ हैं।

अंतराल खंड में एक एक शार्दूल प्रतिमा शार्दूल मंडप में स्थापित थी जिसमें एक शार्दूल मंडप में रखा पाया गया है। अंतराल की उत्तरी दिशा में नदी देवी गंगा तथा दक्षिणी दिशा में यमुना की प्रतिमायें प्रदर्शित थी जो वर्तमान में मूल स्थान से हटकर पायी गयी हैं। मात्र गंगा की प्रतिमा का निचला खंड भाग मूल स्थान पर है।

मंदिर की द्वार चौखट में मात्र दो द्वार शाखायें हैं जिनमें विद्याधरों का पुष्पहार लिये अंकन है। इस प्रकार का अंकन राजिम (रायपुर) एवं मल्हार (बिलासपुर) के मंदिरों में भी पाया गया है। 

मंदिर का गर्भगृह वर्गाकार है तथा बीच में स्लेटी प्रस्तर का विशाल शिवलिंग गोलाकार जलहरी सहित मूल स्थान पर भग्नावस्था में स्थापित है। 

मंदिर की बाह्य भित्ति पर खुरभाग में गोधा, सर्प, विच्छू, केला खाते बंदर, सर्प, मयूर, युद्ध, कमंडलु, व दंड को एक ओर रखे उपासक की लेटे हुये तथा मुक्तालड़ी युक्त मयूरों आदि का अंकन है। सामान्यतया छत्तीसगढ़ क्षेत्र में इस प्रकार का अंकन नगण्य है। मालवा की परमार कला में ही ऐसा अंकन पाते हैं। मंदिर के जंघा भाग पर कमलफुल्लों, पुरुष शीर्ष, चैत्यगवाक्ष में उमा महेश्वर युगल आदि का अंकन है। 

इस मंदिर की मलवा सफाई में प्राप्त प्रतिमाओं में दंडधारिणी कीचक, नदी देवी गंगा, एक सिर दो धड़ युक्त सिंह, मिथुन युगल, अर्ध उत्कटासन में बैठा पुरुष, चैत्य गवाक्ष में सूर्य, कुत्ते पर सवार त्रिशूल लिये भैरव तथा नक्काशीदार शिल्पावशेष प्रमुख हैं। 

यह मंदिर मूर्तिविद्या एवं स्थापत्य के आधार पर लगभग ८वीं शती ई. के उत्तरार्द्ध में निर्मित प्रतीत होता है। 

सामत सरना स्थित विशाल टीले की मलवा सफाई के पश्चात् इसका वर्गाकार गर्भगृह, द्वारचौखट, वर्गाकार मंडप, विशाल एवं अद्वितीय प्रतिमायें प्राप्त हुई हैं। इसी के सामने ध्वस्त आयताकार नंदी मंडप मिला है जिसमें अतिसुंदर एवं विशाल नदी का भक्तिभाव से अपने आराध्य एवं स्वामी शिव की ओर निहारते हुये रखा है। मलवा सफाई में निकले इस शिव मंदिर की जगती दोहरे चबूतरे युक्त है तथा ऊंचे चबूतरे पर मंडप की दीवार बनी है।


यह पूर्वाभिमुख सप्तरथयुक्त मंदिर विशाल वर्गाकार मंडप, अन्तराल तथा गर्भगृह इन तीन अंगों वाला है। वर्गाकार मंडप आठ स्तंभों पर आधारित रहा है जिसके दो स्तंभों की कुंभियां अपने मूल स्थान पर है। मंडप से प्राप्त दो स्तंभों पर जो गोलाकार है, नीचे से ऊपर तक चारों ओर मान्मथ अंकन है। मंडप के उत्तरी एवं दक्षिणी भित्ति से लगी प्रतिमाओं के ४-४ पादमूल (पेडेस्टल) पाये गये हैं जिनमें उत्तरी भित्ति के केवल दो पादमूलों पर १० भुजी महिषासुर मर्दिनी, १० भुजी भैरव, प्रतिमा प्रदर्शित पायी गयी तथा दक्षिणी भित्ति के एक पदमूल पर गौरी की (दो भागों में विभक्त) प्रतिमा है। पूर्वी भित्ति के प्रवेश द्वार के दोनों ओर भी एक- एक पादमूल पर क्रमशः नृवराह तथा कल्याण सुंदर मूर्ति (शिव विवाह दृश्य का आधा खंड भाग ही) प्रदर्शित है। इस प्रतिमा में ब्रम्हा को पुरोहित का कार्य करते एवं अग्नि द्वारा भी मानव रूप में विवाह दृश्य देखने का लोभसंवरण न कर पाना स्पष्टतः अंकित है। गणेश एवं कार्तिकेय भी विवाह में उपस्थित हैं व नंदी भी प्रसन्न होकर निहार रहा है। 

मंदिर के अंतराल एवं गर्भगृह में प्रविष्ट होने हेतु प्रस्तर निर्मित विशाल द्वार चौखट है जिसका उदुम्बर अपने मूल स्थान पर है जिसमें मध्य में चंद्रशिला अर्धपद्माकृति में है तथा दोनों ओर ढाल तलवार लिये योद्धा एवं गज पर पीछे से हमला करते हुये सिंह का अंकन है। प्रवेशद्वार की द्वार शाखायें त्रिशाल हैं। दायीं ओर की द्वारशाखा में वाहन मकर पर सवार नदी देवी गंगा का अनुचरों सहित अंकन है बीच में वानर एवं ऊपर वीणाधारिणी बनी है तथा लता पत्रावली का सुरुचिपूर्ण अंकन है। ऐसा ही अंकन बायीं ओर की द्वारशाखा नदी देवी यमुना वाहन कच्छप के अंकन सहित है। सिरदल भी त्रिशाख है मध्य में गजलक्ष्मी का अंकन है तथा दोनों ओर माला लिये विद्याधरों का अंकन है। दायें किनारे पर नंदी पर आरूढ़ चतुर्भुजी नृत्य शिव तथा बायीं ओर चर्तुभुजी परशुधर शिव अंकित है। ऊपर व नीचे के शाख पर लता-पत्रावली का अंकन है।

वर्गाकार गर्भगृह के बीच में चौकोर जलहरी के मध्य विशाल सिलेटी प्रस्तर का भग्न शिवलिंग है। मलवा सफाई में मंदिर के मंडप की बाहय भित्तियों के पास नृत्यगणेश, कार्तिकेय, विराट स्वरूप विष्णु, ब्रम्हा की अतिसुंदर एवं विशालकाय प्रतिमायें पायी गयी हैं जो समानुपातिक एवं कलात्मक हैं तथा गर्भगृह की बाह्य भित्तियों के मलवे में गौरी प्लेक एवं विविध देव सिर, अर्धनारीश्वर, भैरव, शिव, विष्णु उमा-महेश्वर, शिवगण, सूर्य, शार्दूल, गणेश आदि की प्रतिमायें व प्रतिमा खंड मिले हैं।

इस शिव मंदिर का चबूतरा जगती एवं अधिष्ठान मलवा सफाई में प्रकाश में आये हैं। अधिष्ठान में पद्मपत्र अलंकरण युक्त अधिष्ठान बंध है। अधिष्ठान बंध के ऊपर जंघाभाग में लघु स्तंभों पर आधारित मंडपिकाओं का अंकन है जिनके छाद्य में कमल पत्रों पर लघु कलशों का अंकन है। इनके ऊपर मध्य रथिका में चैत्य गवाक्ष का क्रमिक अंकन है। अधिष्ठान बंध के ऊपर कुड्य स्तंभों से बनी मंडपिकाओं पर बीच में बने पद्म अलंकरण युक्त दो घंटों के दोनों ओर सिंह (शार्दूल) अंकन है। यह अंकन मंदिर की तीनों ओर की बाह्य भित्ति पर हुआ है उत्तरी दिशा में अधिष्ठान बंध में कीर्तिमुख अंकन युक्त जलहरी बनी है।

इस मंदिर का शिखर एवं मंडप पूर्णतः धराशायी हो चुका है जिनके भग्नावशेष एवं शिल्पखंड चारों ओर पाये गये हैं। प्रतिमाओं एवं स्थापत्य विधा को देखते हुये इस मंदिर का काल लगभग ९वीं शती ई. का निर्धारित होता है। इस मंदिर के दक्षिणी पार्श्व में ५-६ लघु मंदिर, लघु शिवलिंग की स्थापना सहित चबूतरे पर स्थापित हैं।


सामत सारना स्थित मुख्य शिव मंदिर के उत्तरी पार्श्व में तीन गर्भगृह वाला मंदिर समूह मलवा सफाई में निकला है जो पूर्वाभिमुख हैं तथा एक दीवाल से दो भागों में विभक्त है जिस से एक मंडप व एक गर्भगृह का एक मंदिर तथा एक मंडप दो गर्भगृह के दो मंदिर के रूप में यह दीवाल विभक्त करती है। ये मंदिर समूह मात्र अधिष्ठान तक ही चारों ओर है शेष भाग पूर्णतः ध्वस्त हो चुका है।

दक्षिणी ओर के एक गर्भगृह वाले मंदिर का प्रवेश सादा सिल पर है, जिस पर पूर्व में द्वारशाखा रही होगी। मंडप वर्गाकार है जिसमें ४ कुंभियां अपने मूल स्थान पर है पर स्तंभ नहीं, तथा दीवारों के किनारे दो प्रतिमाओं के पादमूल है पर प्रतिमायें नहीं हैं। मंडप के दोनों ओर दीवारें मात्र एक मीटर तक ही ऊंची हैं। आयताकार अंतराल भाग में दक्षिणी ओर शिव एवं उत्तरी ओर चतुर्भुजी शिव की स्थानक भग्नसिर प्रतिमायें पादमूल पर स्थापित हैं।

इस शिव मंदिर के गर्भगृह की द्वारशाखा में दायीं ओर कूर्मवाहना नदी देवी यमुना एवं बायीं ओर नदी देवी गंगा है जिसके वाहन का अंकन पादमूल पर नहीं हुआ है दोनों को घट एवं छत्र सहित अंकित नहीं किया गया है, पर दोनों हाथ में माला लिये सौम्य मुख मुद्रा एवं अलंकरण युक्त हैं। गंगा एक कान में चक्र कंडल एवं दूसरे में पोंगी पहने हुये हैं। यहां की काफी प्रतिमाओं के कानों में पोंगी का अंकन प्रभूत मात्रा में हुआ है। आज भी उरांव जनजाति की स्त्रियों के कानों में पोंगी पहनने का प्रचलन पाते हैं।

गर्भगृह छोटा वर्गाकार है जिसकी जलहरी ३-४ भागों में भग्न मंडप में शिवलिंग प्रतिमा सहित पायी गयी। गर्भगृह भी साल वृक्ष के कारण ध्वस्त है व करीब २ मीटर ऊंचा ही शेष है। 

इस मंदिर के बाह्य दक्षिणी पश्चिमी किनारे पर चतुर्भुजी परशुधर शिव की अद्वितीय प्रतिमा लगी है जो हाथों में नागपाश, त्रिशूल, अक्षमाला तथा परशु लिये हैं तथा उनका दायां पैर परशु पर रखा है। पीछे पर्वत का अंकन है तथा शिव की जटायें लहराते हुये. अंकन है। यह प्रतिभा विज्ञान की दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण मूर्ति है।

मूर्तिविद्या एवं स्थापत्य की दृष्टि से यह मंदिर व प्रतिमायें ८ वीं शती ई. की निर्धारित की गयी है। 

इस मंदिर के उत्तरी पार्श्व में दो गर्भगृह एवं एक मंडप युक्त शिव मंदिर मलवा सफाई में निकाला गया है। पहले मंदिर की तरह इन दोनों के गर्भगृह भी एक ही सीध में हैं। ये दोनों भी साल वृक्ष के कारण ध्वस्त हैं। इसका मंडप आयताकार हैं जिसमें ४ स्तंभों की कंुभियां मंडप के मध्य हैं पर स्तंभ प्राप्त नहीं हुये हैं। मध्य मंडप का धरातल कुछ ऊंचा है मंडप के दोनों ओर की दीवालें मात्र १ मीटर ही ऊंची हैं मंडप की उत्तरी दीवारों एवं दक्षिणी से लगी ४ प्रतिमाओं में से तीन ही पायी गयी हैं। जो ठीक आमने सामने हैं। दक्षिणी दीवाल से लगी चतुर्भुजी नृत्यगणेश एवं समपाद स्थानक विष्णु की प्रतिमायें हैं इन दोनों के सिर भग्न हैं। उत्तरी दीवाल से लगी नृत्य गणेश प्रतिमा के ठीक सामने सूर्य प्रतिमा का निचला भाग है जिस में गमबूट पहने पैरों व नीचे सप्त अश्वों का अंकन मात्र ही है। चौथी प्रतिमा का मात्र पाद्मूल ही शेष है। 

पहले गर्भगृह की दायीं द्वार शाखा में नदी देवी यमुना को वाहन कूर्म पर सवार एवं हाथ में माला लिये अंकन है। यमुना बांयें कान में पोंगी व दांयें में चक्र कुंडल पहने हैं तथा केयूर, कंकण, हार, पाजेब आदि अलंकरण भी धारण किये हैं। बायीं द्वारशाखा की नदी देवी गंगा मूल स्थान पर नहीं है। मात्र सादा पादमूल ही है। सादा गर्भगृह लघु एवं वर्गाकार है पर ध्वस्तावस्था में है। इसके पार्श्व के दूसरे गर्भगृह का उत्तरी भाग ध्वस्त है जिसकी दायीं ओर की सादा द्वारशाखा ही शेष है।

केवल एक शिवलिंग एवं जलहरी (भग्न) ही इस मंडप में मलवा सफाई में प्राप्त हुई है।

पूर्व मंदिर की तरह यह भी कालक्रम में ८वीं शती ई. का है।

मंदिर समूह के ठीक पीछे पश्चिम में स्थित टीले की मलवा सफाई में चारों कोनों पर चार छोटे मंदिर अवशेष अनावृत्त हुये हैं जिनमें छोटे छोटे खंडों में शिवलिंग स्थापित है। मध्य टीले से मुख्य मंदिर एवं उसके चारों ओर पक्के फर्श का प्रदक्षिणा पथ प्रकाश में आया है जिसके मध्य में मंडप रहा है तथा यह मंदिर उत्तराभिमुख है। गर्भगृह के मध्य चामुंडा प्रतिमा तीन भागों में भग्न प्राप्त हुई है। इसका पादमूल सादा आयताकार प्रणालिका युक्त पाया गया है जबकि प्रणालिका शिवलिंग वाले मंदिरों में ही पायी जाती हैं। 

चबूतरे पर चारों ओर निर्मित लघु मंदिर एवं मध्य में प्रमुख मंदिर युक्त यह पंचायतन मंदिर भी ८वीं शती ई. का है। 

यहां के शेष टीलों का मलवा सफाई कार्य जारी है।

डीपाडीह के पूर्वाेत्तर में करीब २ कि. मी. पर चैला पहाड़ है जो इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि यहां पर प्राचीन शिल्पकारों ने पहाड़ से चट्टान काटकर शिल्पाकृतियां तैयार की थी तथा यहीं से ले जाकर डीपाडीह के सामत सरना व उरांव टोली के मंदिरों का निर्माण एवं मूर्तियां स्थापित की गयी।

इस पहाड़ को तीन स्तरों में काटकर शिल्पियों ने समतल स्थान तैयार किये व शिल्पांकन किया। इनका नीचे से ऊपर की ओर क्रमिक स्तरीकरण पाते हैं निचले स्तर पर शिल्पांकन चिन्ह, मध्य स्तर पर एक स्थल पर ‘ॐ नमः विश्वकर्मायः‘ अभिलेख तथा बालि सुग्रीव युद्ध, हाथी, पुरुष, वज्र आदि का अंकन तथा ऊपर के स्तर पर अनगढ़ कुबेर, नंदी आदि की प्रतिमायें व शिल्पांकन चिन्ह पाये गये हैं। इन तीनों स्तरों पर चट्टानों, पत्थरों की छीलन व सादा सपाट कार्य करने के चबूतरे ऐसी झलक देते हैं कि शिल्पी कार्य करके अभी ही गये हों।

- वेद प्रकाश नगायच

Monday, July 4, 2022

रामगढ़ की रंगशाला

जानकारी मिलती है कि ‘धर्मयुग‘ साप्ताहिक पत्रिका के 23 मार्च और 30 मार्च 1969 के अंकों में कुंतल गोयल जी का लेख छपा था, जिसका शीर्षक था- ‘रामगढ़ की पहाड़ियां जिनमें एशिया की अतिप्राचीन नाट्यशाला आज भी विद्यमान है‘। यहां प्रस्तुत लेख के कुछ तथ्य और स्थापनाएं यद्यपि भिन्न हैं, फिर भी इसका महत्व स्वयं स्पष्ट है। इसी विषय पर ‘रामगढ़ की रंगशाला‘ शीर्षक से यह लेख ‘रायपुर सम्भाग लघु समाचार पत्र सम्पादक संघ‘ की, हरि ठाकुर, रमेश नय्यर, शरद कोठारी के सम्पादन में 1980 में प्रकाशित स्मारिका में छपा था, यथावत-

भारत की लोक नाट्य संस्कृति का प्रागैतिहासिक केन्द्र
रामगढ़ की रंगशाला
- डा. कुन्तल गोयल
मनीषा भवन, न्यू कालोनी, अंबिकापुर, (सरगुजा) (म. प्र.)

भारतीय नाट्य कला के विकास में मध्यप्रदेश का योगदान विशिष्ट रहा है। यहां की संगीत-नाट्य परम्परा अत्यन्त प्राचीन एवं समृद्धिशाली रही है। महाकवि कालिदास, भवभूति, धनंजय आदि ने इस कला को समृद्धि के शिखर पर पहुंचाया है। कवि कालिदास के पूर्व के आचार्य भरत मुनि ने अपने नाट्यशास्त्र में रंगशालाओं तथा प्रेक्षागृहों का जो वर्णन किया है, वह आज भी सरगुजा के रामगढ़ पर्वत पर सुरक्षित है और यह विश्व की सर्वाधिक प्राचीन एवं एकमात्र नाट्यशाला के रूप में प्रसिद्ध है। भरत मुनि का नाट्य शास्त्र रूपकों (नाटकों) के शास्त्रीय अध्ययन का सर्वप्रथम ग्रन्थ माना जाता है जिसमें कहा गया कि ऋग्वेद से शब्द, यजुर्वेद से अभिनय, सामवेद से गान तथा अथर्ववेद से रस लेकर ब्रह्मा ने ललित-कलात्मक ‘नाट्य वेद‘ की सृष्टि की। इस तरह नृत्य, नाट्य एवं संगीत एक दूसरे से मिले-जुले हैं। नाट्य कला का मूल स्रोत ऋग्वेद ही है। इस आधार पर कहा जाता है कि रंगमंच को अभिनय कला से सम्बद्ध करने का श्रेय भारत को ही है। रामायण, महाभारत, अष्टाध्यायी, कामसूत्र, पतंजलि महाभाष्य आदि ग्रन्थों के आधार पर भी इसकी पुष्टि होती है कि भारतीय वांङमय से ही नाट्य कला का जन्म हुआ है। पाश्चात्य विद्वानों ने इस कला के उन्नयन का श्रेय यूनान को दिया है तथा नाच को नाटक का पूर्व रूप माना है। उन्होंने संस्कृत के नट तथा नाटक शब्द को नट् धातु से उद्भूत कहा है। किन्तु नाटककार धनंजय ने अभिनय के द्वारा रस-सृष्टि को ही नाट्य कहा है। उनकी दृष्टि में अभिनय द्वारा भाव-प्रदर्शन, नृत्य, ताल एवं लय के साथ हस्त-पाद संचालन नृत्य है। इस तरह नाट्य कला विशुद्ध रूप से भारतीय संस्कृति की धरोहर है। सरगुजा के रामगढ़ पर्वत की गुफायें नाट्यशाला के रूप में व्यवहत हुई हैं।

मध्यप्रदेश के पूर्वी अंचल में दक्षिण-पश्चिम की ओर अंबिकापुर से लगभग ५० किलोमीटर दूर बिलासपुर मार्ग में उदयपुर ग्राम के निकट स्थित रामगढ़ पर्वत प्राकृतिक वन-सुषमा से सम्पन्न रामायण एवं महाभारत कालीन स्मृतियों का ही धनी नहीं है वरन् मध्यप्रदेश के प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्थलों में सबसे अधिक प्राचीन है। यह स्थान सुन्दर मनोहारी वनों एवं पहाड़ियों से घिरा हुआ है। समुद्र तल से इसकी ऊंचाई ३२०२ फुट तथा धरातल से २००० फुट है। रामगढ़ की पहाड़ी पर स्थित प्राचीन मंदिर, गुफाओं एवं भित्ति चित्रों से प्राचीन एवं वैभवपूर्ण भारतीय संस्कृति का आभास मिलता है। यूं पहाड़ी पर अनेक मंदिरों के खण्डहर, गुफायें तथा अनेक दर्शनीय मूर्तियां हैं किन्तु सबसे अधिक प्रसिद्ध एवं महत्वपूर्ण हैं, पहाड़ी के शिखर पर स्थित ‘सीता बोंगरा‘ और ‘जोगीमारा गुफा‘। इन गुफा तक पहुँचने के लिए १८० फुट लम्बी एक पथरीली, विशाल, प्राकृतिक सुरंग पार करनी पड़ती है यह सुरंग इतनी ऊंची है कि हाथी भी इसमें बड़ी सरलता से प्रवेश कर सकता है। संभवतः इसी से इसे ‘हाथीखोह‘ या ‘हाथीपोल‘ कहा गया है। इसी सुरंग के ऊपर सीताबोंगरा और जोगीमारा की अद्वितीय कलात्मक गुफायें हैं। ये गुफायें पहाड़ी के उत्तरी भाग और पश्चिमी ढलान पर स्थित उत्तर से दक्षिण तक फैली हैं। उत्तरी गुफा ‘सीता बोंगरा‘ के नाम से जानी जाती है और दक्षिणी गुफा ‘जोगीमारा‘ गुफा कहलाती है। कहा जाता है कि भगवान राम ने अपने वनवास काल के समय इसी रामगढ़ पर्वत पर निवास किया था तथा सीता जी ने जिस गुफा में आश्रय लिया था, वह ‘सीता बोंगरा‘ के नाम से प्रसिद्ध हुई। बाद में यही गुफायें रंगशाला के रूप में कला प्रेमियों का स्थल बनीं। कर्नल औसले ने सन् १८४८ में तथा जर्मन विद्वान डा. ब्लाख ने सन् १९०४ में सर्वप्रथम इन गुफाओं के संबंध में महत्वपूर्ण प्रकाश डाला। इस तरह इन विद्वानों के द्वारा ही सरगुजा की इस विश्व प्रसिद्ध लोक नाट्य परम्परा के प्राचीन इतिहास का एक गौरवमय पृष्ठ सबके सम्मुख आया।

सीताबोंगरा: सबसे प्राचीन रंगशाला

“सीताबोंगरा“ एशिया की ही नहीं वरन् विश्व की सबसे प्राचीन एकमात्र रंगशाला है। इसकी बनावट नाट्यशास्त्र के प्रसिद्ध रचयिता भरत मुनि द्वारा वर्णित नाट्य मण्डप जैसी है। कुछ विद्वानों के अनुसार सीताबोंगरा का निर्माण मौर्यकालीन लोमश ऋषि-गुफा के पूर्व का है। भरत मुनि के नाट्यशास्त्र की रचना के पूर्व यह सहज ही यह अनुमान किया जा सकता है कि पहले पर्वत-गुफाओं में ही नाटक खेले जाते थे। इसके आधार पर ही भरत मुनि ने अपने ग्रन्थ में गुफाकृति वाले नाट्य मण्डप की व्यवस्था दी। यही नहीं नाट्यशास्त्र में मण्डप के बाह्य तथा आंतरिक भित्ति पर कलात्मक अलंकरण तथा भित्ति लेख का जो वर्णन मिलता है, उसे देखते हुये सीताबोंगरा तथा जोगीमारा की गुफायें भारतीय रंगमंच के सबसे प्राचीन उदाहरण कहे जा सकते हैं।

सीताबोंगरा की यह गुफा पत्थरों में ही गैलरीनुमा काटकर बनाई गई है। यह ४४ फुट लंबी और १५ फुट चौड़ी है। दीवालें सीधी हैं तथा प्रवेशद्वार गोलाकार है। इस द्वार की ऊंचाई ६ फुट है जो भीतर की ओर केवल ४ फुट रह जाती है। मुख्य द्वार के सम्मुख शिला निर्मित चन्द्राकार सोपान सदृश्य संयोजित पीठें हैं जो कि बाहर की ओर हैं। इन पर बैठकर दर्शकगण नाटकीय दृश्यों, संगीत, नृत्य आदि सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आनन्द लिया करते थे। इन पीठों पर लगभग ५० व्यक्तियों के बैठने की व्यवस्था थी। प्रवेश द्वार के समीप ही भूमि कोनों की पीठों की उपेक्षा कुछ निचाई पर है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसमें दो छिद्र हैं जिन्हें प्रवेश द्वार के निकट फर्श को काटकर बनाया गया है। इनका उपयोग खम्भे गाड़कर पर्दे लगाने के लिए किया जाता था। नाट्य मण्डप में इस तरह के पर्दा या तिरस्कारिणी की व्यवस्था अत्यन्त प्राचीन है। शीत या वर्षां ऋतु से बचने के लिये दर्शकगण अन्दर चौड़ी पीठों पर बैठ जाया करते थे और पर्दे के बगल में खड़े होकर कलाकार अपने कार्यक्रम प्रस्तुत करते थे। इस रंगशाला की तुलना यूनानी ऐंफो-थियेटर से की जाती है।

डा. कटारे के अभिमत से यह रंगशाला मुख्यतः नाट्य और नृत्य के लिये उपयोग में लाई जाती थी और इस दृष्टि से भारतीय संस्कृति के इतिहास में इसे अद्वितीय तथा अति प्राचीन समझना चाहिए। प्राचीन काल में भारत में गुफाओं का उपयोग नृत्यशाला के लिए किया जाता था। ऐसी कुछ गुफायें मिली हैं जिनमें पीठों की व्यवस्था से यह कहा जा सकता है कि ये नृत्य एवं नाट्य के लिए उपयोग में लाई जाती थीं। प्राचीन लोग ‘शोभिका‘ (गुहा सुन्दरी) का संबंध उनसे मानते हैं जो नृत्य और हैं नाट्य के लिए थीं। संभवतः आज के अशिक्षित आदिवासी अपने लोक नृत्यों द्वारा इसी हजारों वर्ष पुरानी लोक अभिनय की परम्परा को ही दोहराते हैं और अपना मनोरंजन करते हैं। सरगुजा ऐसे ही लोक नृत्यों की भूमि है।

नाट्यकला के विद्वानों की राय में महाकवि भवभूति का ‘‘उत्तर रामचरित‘‘ नाटक इसी सीताबोंगरा नाट्यशाला में यशोवर्मन के काल में अभिनीत किया गया था। पाली भाषा में उत्कीर्ण लेखों के अनुसार काशी के कलाकार देवदीन ने इस नाटक में भाग लिया था और उनके साथ नाट्यशाला की देवदासी सुतनुका ने अभिनय किया था।

सीताबोंगरा के प्रवेश द्वार के उत्तरी हिस्से पर गुफा की छत के ठीक नीचे मगधी भाषा में ३ फुट ८ इंच लम्बी दो पंक्तियाँ उत्कीर्णं हैं जिनके अक्षरों का आकार प्रकार ढाई इंच है। वे अब अस्पष्ट हैं:-
आदिपयति हृदय। सभावगरू कवयो ये रातयं........ दुले वसंतिया। हासावानुभूते। कुदस्पी तं एवं अलगेति।

इन पंक्तियों का आशय यह है- ‘हृदय को आलोकित करते हैं। स्वभाव से महान ऐसे कविगण रात्रि में ...... वासंती दूर है। हास्य और संगीत से प्रेरित। चमेली के पुष्पों की मोटी माला को ही आलिंगन करता है।‘

इससे यह स्पष्ट है कि यह गुफा सांसारिकता से पृथक साधु-संतों की तपोस्थली ही नहीं थी वरन् यह एक कलात्मक एवं सांस्कृतिक आयोजनों का स्थान था जहां कविता का सस्वर पाठ होता था, प्रेम गीत गाये जाते थे तथा नाटकों का अभिनय किया जाता था। इसका संबंध किसी भी धर्म अथवा सम्प्रदाय से न होकर मानवीय गुणों एवं अनुभूतियों से था सीताबोंगरा की यह रंगशाला ग्रीक थियेटर के आकार की बनी होने के कारण ही कतिपय विद्वान भारतीय नाट्य कला पर ग्रीक नाट्य कला का प्रभाव मानते हैं। किन्तु अनेक पाश्चात्य एवं भारतीय विद्वानों का यह अभिमत है कि यह कला विशुद्ध रूप से भारतीय परिवेश में ही अम्युदित हुई है तथा विकसित हुई है। असित कुमार हलधर का यह मत है कि प्राचीन भारतीय प्रेक्षागृह का एकमात्र यही उदाहरण उपलब्ध है।

जोगीमारा गुफा: नृत्यांगनाओं का विश्राम कक्ष 

‘सीताबोंगरा‘ के निकट ही ‘जोगीमारा‘ गुफा है जो ३० फुट लंबी और १५ फुट चौड़ी है। गुफा का द्वार पूर्व की ओर है। भारत की चित्रकला में इसे ‘वरूण का मंदिर‘ कहा गया है। यहाँ सुतनुका देवदासी रहती थी जो वरूण देव को समर्पित थी। कहा जाता है कि सुतनुका देवदासी ने सीताबोंगरा नृत्यशाला में नृत्य करने वाली नृत्यांगनाओं के लिये विश्राम कक्ष के रूप में इसे बनवाया था। सुतनुका जितनी सुन्दर थी, उतनी ही संगीत, नृत्य एवं अभिनय कला में दक्ष थी। यह सुतनुका देवदासी एक प्रेम-कथा की नायिका कही गई है। गुफा की उत्तरी भित्ति पर ये पांच पंक्तियाँ उत्कीर्ण हैं:-
पहली पंक्ति - शुतनुक नाम
दूसरी पंक्ति - देवदार्शक्यि।
तीसरी पंक्ति - शुतनुक नम। देवदार्शक्यि।
चौथी पंक्ति - तं कमयिथ वलन शेये।
पांचवीं पंक्ति - देवदिने नम। लुपदखे।

इन पंक्तियों का आशय है- सुतनुका नाम की देवदासी (के विषय में) सुतनुका नाम की देवदासी उसे प्रेमासिक्त किया। मूर्खतावश ( बनारस निवासी) श्रेष्ठ देवदीन नाम के रूपदक्ष ने।

इस संबंध में आचार्य कृष्णदत्त वाजपेयी का मत है कि लेखों से ध्वनि निकलती है कि सुतनुका नाम की नर्तकी थी जिसके लिए देवदासी तथा रूपदर्शिका इन दो शब्दों का प्रयोग किया गया है इसके प्रेमी का नाम देवदत्त था। संभवतः इसी देवदत्त के द्वारा गुफाओं में उक्त लेख अंकित कराये गये ताकि उस स्थान पर उसकी नाट्य प्रिया सुतनुका का नाम अजर-अमर हो जाये।

इस पृष्ठभूमि मे सुतनुका तथा देवदत्त (देवदीन) की एक प्रणय-कथा उभरती है जिसका नायक है देवदीन जो रंगशाला का रूपदक्ष था और नायिका सर्वांग सुन्दरी सुतनुका देवदासी थी। इस श्रेष्ठ रूपदक्ष देवदीन ने देवदासी को प्रेम-आसक्त करने का मूर्खतापूर्ण कार्य किया। देवदीन रंगीन चित्रकारी में पटु था। उसका कार्य सुतनुका तथा नाटक के अन्य पात्रों को नृत्य एवं नाट्य कला के अनुरूप रूप देकर सज्जित करना था। देवदीन ने सुननुका की रूपश्री पर मोहित होकर उसे अपने प्रेमपाश में आबद्ध कर लिया। सुन्दर, सुडौल, कलामयी, सरल हृदया सुतनुका देवदीन की चेष्टाओं में उलझ गई। नाट्यशाला के अधिकारियों ने उनकी इस प्रणय लीला का विरोध किया और भविष्य में लोगों को सचेत करने के लिए इस प्रणयकथा को गुफा की भित्ति पर अंकित करवा दिया। सीताबोंगरा की भित्ति पर जो अभिलेख उत्कीर्ण है, उससे यह भी स्पष्ट होता है कि सुतनुका के वियोग में व्यथित देवदीन ने अपने प्रेम को स्थायित्व देने के लिए उद्गार स्वरूप इसे अंकित किया था।

‘जोगीमारा‘ गुफा में भारतीय भित्ति चित्रों के सबसे प्राचीन नमूने अंकित हैं। भित्ति चित्रों के अधिकांश भाग मिट गए हैं और सदियों की नमी ने भी उन्हें काफी हद तक प्रभावित किया है। कला की दृष्टि से यद्यपि ये श्रेष्ठ नहीं कहे जा सकते फिर भी उनकी प्राचीनता के संबंध में संदेह नहीं किया जा सकता। इन चित्रों को पृष्ठभूमि धार्मिक है। भारत में शिलाखण्डों को काट कर चैत्य विहार तथा मंदिर बनाने की प्रथा थी और उनकी भित्तियों पर पलस्तर लगाकर चूने जैसे पदार्थों से चिकना कर जो चित्र बनाये जाते थे, उन्हीं के अनुरूप यह जोगीमारा गुफा है। विद्वानों ने इसकी चित्रकारी ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी की मानी है। ये भित्ति चित्र अजन्ता तथा एलोरा के गुफा मन्दिरों की भाँति हैं जो यहां के पुरातन सांस्कृतिक सम्पन्नता का प्रतीक हैं। डा. हीरालाल ने इन भित्ति चित्रों को बौद्ध धर्म से संबंधित कहा है तथा रायकृष्णदास की राय में ये जैन धर्म से सम्बद्ध हैं जिन्हें कलिंग नरेश खारवेल ने बनवाया था।

‘जोगीमारा‘ गुफा कवि कुलगुरू कालिदास से भी संबंधित कही जाती है। उनके ‘मेघदूत‘ का यक्ष इसी जोगीमारा गुफा में निर्वासित था जहां से उसने अपनी प्रिया को प्रेम का पावन सन्देश दिया था। यहां के अप्रितम प्राकृतिक वन-सौन्दर्य एवं जल-कुण्ड का वर्णन कालिदास ने अपने ‘मेघदूत‘ में किया है। यहीं पर सघन सुशीतल छायादार वृक्ष हैं तथा सीताजी द्वारा पवित्र किया गया जल-कुण्ड है। यही वह स्थान है जहां श्रीरामजी ने सीताजी सहित अपने वनवास काल में विश्राम किया था।

रामगढ़ की इन गुफाओं में उत्कीर्ण शिलालेखों से ‘मेघदूत‘ के कथानक की पर्याप्त सादृश्यता है। एक ओर वसंत के पूनम की खिली मादक रात्रि, गायन, वादन एवं नाट्य का मनोरंजक सम्मेलन, विरह कातर प्रेमी अपनी प्रिया के अभाव में चमेली की मादक गंध वाली माला में ही अपनी प्रिया की समीपता का अनुभव करता है और दूसरी ओर ‘मेघदूत‘ में कजरारे बादल, शीतल मंद बयार से उद्वेलित विरह कातर प्रेमी, प्रिया की स्मृति में सन्तप्त रहता है। उक्त शिलालेख कवि कालिदास के पूर्व का होने में कारण सम्भावित है कि कवि ने इसी से अपने ‘मेघदूत‘ के कथानक की प्रेरणा ग्रहण की हो। इस तरह स्पष्ट है कि रामगढ़ पहाड़ी पर स्थित ‘सीताबोंगरा‘ और ‘जोगीमारा‘ की ये गुफायें सरगुजा के वन-बीहड़ अंचल में आज से ढाई हजार वर्ष पूर्व सांस्कृतिक आयोजनों, संगीत, नृत्य, नाटक एवं कविता-पाठ के द्वारा यहां के जन-मानस का मनोरंजन करती रही हैं तथा दर-दर के कलाप्रेमियों के आकर्षण का केन्द्र रही हैं। उस समय भी यहाँ के निवासी इतने सुसंस्कृत एवं कलाप्रिय थे कि अपनी कलाप्रियता की स्पष्ट छाप यहाँ के जन-मानस पर सदैव के लिए अंकित कर गये हैं।

डॉ. कुन्तल गोयल का परिचय एवं चित्र उनके एक अन्य लेख के साथ इस लिंक पर है।

Monday, March 28, 2022

सरगुजा - कुन्तल

डॉ. श्रीमती कुन्तल गोयल का जन्म 31.12.1935 (देहांत 25 अक्टूबर 2015) को बैकुण्ठपुर, कोरिया में साहित्यिक अभिरुचि वाले परिवार में हुआ। आपके पिता स्व. बाबूलाल जैन ‘जलज‘ स्वयं द्विवेदी कालीन कवियों में थे। आपके चार भाइयों में डॉ. कान्ति कुमार जैन प्रतिष्ठित साहित्यकार हुए। आपका विवाह निबंधकार प्रोफेसर उत्तम चन्द्र जैन गोयल से हुआ। आपने सन 1971 में रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय, जबलपुर से 'नृतत्व एवं समाजशास्त्र के आधार पर छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के लोकगीतों का अध्ययन‘ विषयक शोध-उपाधि, डॉ. महावीरसरन जैन के निर्देशन में प्राप्त की। यह शोध-प्रबंध पुस्तक रूप में ‘काले कंठों के श्वेत गीत‘ शीर्षक से प्रकाशित है। आपके कहानी संग्रह, संस्मरण, ललित निबंध और छत्तीसगढ़ की लोक कथाएँ प्रकाशित हैं। विभिन्न सम्मान पुरस्कारों के साथ आपको छत्तीसगढ़ शासन का प्रतिष्ठित ‘पं. सुंदरलाल शर्मा साहित्य सम्मान-2009‘ प्राप्त है।

सरगुजा अंचल की संस्कृति परउनका लेखन महत्वपूर्ण रहा है। राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में उनकी रचनाएं प्रकाशित होती रही हैं। यहां प्रस्तुत उनका लेख ‘मध्यप्रदेश संदेश‘ पत्रिका (10 अप्रैल 1983) में प्रकाशित हुआ था। लेख के साथ परिचय दिया गया है कि ‘‘प्रस्तुत लेख में सरगुजा जिले की वन-सम्पदा पर विस्तार से जानकारी दी है. वहीं वृक्षारोपण की ओर भी संकेत किया है. इसके साथ ही सरगुजा जिले का ऐतिहासिक संदर्भ भी प्रस्तुत किया है.“


इतिहास के पृष्ठों को समेटे
सरगुजा की वनश्री

सरगुजा जिले का प्राकृतिक एवं सुरम्य सौन्दर्य सदैव से प्रकृति प्रेमियों के आकर्षण का केन्द्र रहा है. आकाश छूते हरे-भरे पत्तों से लकदक सघन साल वन और उनसे झरती रोशनी का सम्मोहन, खिलते हुए पलाश, रस भरे महुये और दूर-दूर तक फैली उनकी मधुर मादक गंध, खिल-खिल करते गुलमोहर, गगनचुम्बी वृक्षों की सघन पातें, मध्य में हरियाली से आच्छादित पर्वत श्रेणियों से घिरे वर्तुलाकार समतल भूरे मैदान, कहीं-कहीं एक भयावह मायाजाल की अनुभूति देता अभिनव सौन्दर्य, वन्य पशुओं की गर्जन-तर्जन के बेधक स्वर- सचमुच ही सरगुजा जिले के ऊंघते अनमने वनों को एक निराली रहस्यमयता प्रदान करते हैं. साथ ही सुरम्य और रमणीक साल वन ने उनकी रूप-छवि में श्रीवृद्धि कर उसे “स्वर्ग“ बना दिया. वर्ष में संभवतः कुछ ही दिन ऐसे होते हैं जब साल वृक्ष पत्रविहीन होता है. जब इन वृक्षों में नये पुष्प खिलते हैं तब लालिमायुक्त फूलों का आकर्षण दूर से ही हमारी दृष्टि-परिधि को बांध लेता है और मन तरंगित हो उठता है. इन वनों के कारण ही सरगुजा का ग्रीष्मकाल अत्यन्त शीतल रहता है और उसकी रातें बड़ी सुहावनी और मादक होती है. स्वर्गिक विलास के ये अभिन्न सहचर सरगुजा के ये सघन वन और उसका सौन्दर्य अपने आप में एक ऐसा तिलस्म है जिसे देख पाना आसान नहीं है.

यहां की धरती अरबों टन कोयला से समृद्ध है जो इन्हीं वनों की देन है. सरगुजा यदि लम्बे काल तक बाह्य आक्रमणों से सुरक्षित रहा तो उसका एक प्रमुख कारण यही रहा कि सघन साल वनों की ढाल ने उस पर शत्रुओं की नजर नहीं लगने दी. महाकान्तर कहलाने वाले जिस सघन और विशाल वन का उल्लेख उत्तर और दक्षिण भारत के बीच एक विभाजक रेखा के रूप में प्राचीन काल से स्वीकार किया जाता रहा है, सरगुजा के वन उसी का अभिन्न अंग हैं. यद्यपि महाकान्तर जैसी गहनता अब नहीं रह गई है तथापि सरगुजा का सौन्दर्य उसके सघन वनों और उनमें विचरण करने वाले विविध वन्य प्राणियों में आज भी सुरक्षित है.

सरगुजा के साल वन अनेक चिर-स्मरणीय घटनाओं के साक्षी रहे हैं. वे अपने क्रोड़ में न केवल धार्मिक एवं ऐतिहासिक स्थलों को संजोये हुए हैं वरन् पौराणिक आख्यानों के साक्ष्य भी प्रस्तुत करते हैं. पीढ़ियों से इन वनों ने जन-जीवन की गतिविधियों को प्रभावित किया है तथा भारतीय संस्कृति के उन्नयन में उनका प्रेरक योगदान रहा है.

प्राचीन काल में सरगुजा अंचल “दण्डकारण्य“ के अंतर्गत समाविष्ट था. दण्डक के नामकरण के संबंध में यहां एक किंवदन्ती प्रचलित है- कहा जाता है कि एक बार भारी दुर्भिक्ष पड़ने पर सभी ऋषियों ने अपने आश्रमों का त्याग कर महर्षि गौतम के आश्रम में शरण ली. दुर्भिक्ष की समाप्ति पर जब ऋषिगण प्रस्थान हेतु उनसे विदा मांगने आये तो महर्षि ने उनसे वहीं रहने का अनुरोध किया. ऋषियों ने यह स्वीकार तो कर लिया पर उन्होंने मुक्त होने के लिये एक मायावी गाय की रचना की और उसे एक खेत में खड़ा कर दिया. जब महर्षि उसे भगाने के लिये गये तो वह गिर कर मर गई. ऋषियों ने अनुकूल अवसर पाकर गौ-हत्या का पाप लगाया. महर्षि ने अपने योग बल से वस्तु स्थिति की सत्यता भांप ली और ऋषियों को यह श्राप दिया- तुम जहां भी जाओगे, वह स्थान नष्ट-भ्रष्ट होकर वनस्पतियों से विहीन हो जायेगा. तभी से यह स्थान “दण्डकारण्य“ या “दण्डक वन“ नाम से विख्यात हुआ. कहा जाता है कि भगवान राम के दण्डकारण्य में प्रवेश करने पर उनके चरण-स्पर्श से यह क्षेत्र श्रापमुक्त होकर पुनः सौन्दर्यश्री से समृद्ध हुआ.

भगवान राम ने अपने वनवास की कुछ अवधि सरगुजा के इन्हीं सघन वन कांतरों में व्यतीत की थी. जिस पर्वत पर उन्होंने आश्रय लिया था वह पर्वत आज भी उनके कारण “रामगढ़“ या “रामगिरि“ के नाम से विख्यात है. उनके चरण-स्पर्श से यह स्थल हरितिमायुक्त सौन्दर्यश्री से मण्डित हुआ. इसका उल्लेख गोस्वामी तुलसीदास की इन पंक्तियों में भी हुआ है-“दंडक पुहुमि माय परस पुनीत भई उकटे विटप लागे फूलन फलन.“ यहीं पर वह मतंग वन जो अपनी गोद में मातिन पर्वत को समाये हुए है. बाल्मीकि रामायण में भी अनेक स्थलों पर साल वनों का उल्लेख मिलता है. भगवान राम की विशाल मनोहर पर्णकुटी साल पत्तों से ही आच्छादित की गई थी. प्रयाग से चित्रकूट जाने वाला मार्ग भी साल वनों से ही सुशोभित था. कहा जाता है कि भरत की सेना को देखने के लिये लक्ष्मण पुष्पित साल वृक्ष पर चढ़े थे. ये सभी प्रसंग सरगुजा के साल वनों की समृद्धि को रेखांकित करते हैं. यह एक आश्चर्य है कि इस अंचल में आज भी 120 फुट तक आकाश की ऊंचाई छूने वाले साल वृक्षों का सौन्दर्य नितान्त उनका अपना ही है।

सरगुजा के इन्हीं साल वनों में आर्य संस्कृति के प्रचार-प्रसार की दृष्टि से अनेक आर्य ऋषियों ने अपने आश्रमों की स्थापना की थी और आजीवन वहां निवास किया था. रामगढ़ पर्वत पर विद्यमान महामुनि वशिष्ठ का आश्रम आज भी दर्शनीय है. शरभंग, सुतीक्ष्ण आदि ऋषियों के आश्रम भी इन्हीं वनों में थे जहां भगवान राम ने ऋषियों को संत्रस्त करने वाले क्रूर राक्षसों के विनाश की कठोर प्रतीज्ञा ली थी. राक्षसों के बध का प्रमाण यहां का “रकसगण्डा“ नामक वह स्थल है जो राक्षसों की हड्डियों के ढेर के कारण अपने नाम को सार्थक करता है.

महाभारत काल में पाण्डवों ने अपना अज्ञातवास इन्हीं सघन वनों में व्यतीत किया था. उन्हें खोजते हुए कौरव भी इस जनपद में आये थे. कहा जाता है कि कौरवों और पाण्डवों के सम्पर्क से यहां की स्त्रियों को जो सन्तानें उत्पन्न हुई, वे आज भी अपने को “कौरवा“ और “पाण्डो“ कहती हैं तथा कौरव-पाण्डवों को अपना वंशज मानती हैं. ये जातियां बड़ी धनुर्विद, युयुत्सु और दर्पीली हैं कुछ वर्षों पूर्व सरगुजा रियासत में कौरव जाति का इतना आतंक था कि बाहर से पाने वाले यात्री को वे सहज ही लूट लिया करते थे. इस संबंध में यह किंवदन्ती प्रचलित है कि यदि शेर से वे बच भी गये तो कोरवों से बच पाना उनके लिये नितान्त असम्भव था. यहां एक दिलचस्प बात यह है कि ये जातियां भारत के किसी अन्य स्थान में नहीं पाई जाती. यह तथ्य भी उल्लेखनीय है कि महाभारतकालीन विराट नगर सरगुजा के सीमावर्ती शहडोल जिले में स्थित सोहागपुर क्षेत्र है जहां से उन्होंने सरगुजा के सघन वनों में प्रवेश कर अपने को अज्ञात रखा था.

जैन और बौद्ध धर्म का प्रभाव भी इस वन्यांचल पर कम नहीं पड़ा. यहां की जोगीमारा गुफा में प्राप्त तीर्थकर का भित्ति चित्र तथा पहाड़ी पर स्थित मंदिर में जैन तीर्थकरों के चिन्ह जैन धर्म के प्रभाव के साक्ष्य हैं. कहा जाता है कि ये कलिंग नरेश खारवेल के समय के हैं जो जैन धर्मावलम्बी था. सरगुजा में प्राप्त बौद्धकालोन अवशेषों की अपनी कहानी है. भगवान बुद्ध ने अपने अनुयायियों को अपने जीवन काल में पांच वृक्ष लगाने और उनका पांच वर्ष तक संरक्षण करने का उपदेश दिया था. इसके पीछे यह व्यावहारिक सत्य था कि जहां वन हैं वहां जल है, जहां जल है वहां अन्न है और जहां अन्न है वहां जीवन है. डा. शूमाखर ने भी अपने “बौद्ध अर्थशास्त्र“ में लिखा है- “जब तक भारत में पेड़ लगाने और उनका पोषण करने की बौद्ध परम्परा प्रचलित रही, न कभी अकाल पड़ा, न कभी सूखा. बाढ़ें भी नहीं आती थी.“ इस कथन की सत्यता इस काल में यहां चरितार्थ हुई. आज भी सरगुजा में बौद्धकालीन अवशेष सघन वनों के मध्य पाये जाते हैं. प्राकृतिक वैभव से सम्पन्न यहां का मैनपाट बौद्धकालीन गुफाओं एवं मठों के लिये सर्वप्रसिद्ध है. कहा जाता है कि चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भारत यात्रा के दौरान कुछ समय यहां भी व्यतीत किया था. यहां के हरचौका, ग्राम में बौद्ध भिक्षुत्रों के जो 18 मठ मिले हैं. वे सब सुरम्य वनों के मध्य ही स्थापित हैं. सरगुजा के बौद्धकालीन अवशेष वनों के प्रति अपने आत्मीय भाव का परिचय देते हुए यहां की प्राकृतिक सम्पदा को श्रीवृद्धि ही नहीं कर रहे वरन् अपनी बौद्ध परम्परा का भी निर्वाह कर रहे हैं.

सरगुजा के इन वन प्रान्तरों ने हमारी बौद्धिक चेतना को जाग्रत कर हमारी अनुभूतियों का भी सिंचन किया है. आदिकवि बाल्मीक ने अपनी रामायण में सरगुजा के साल वनों की महिमा गाई है. महाकवि कालिदास ने रामगढ़ पर्वत के चारों ओर प्राकृतिक सुषमा और अभिनव सौन्दर्य से प्रभावित होकर राम की विरहावस्था का संकेत लेकर अपनी अमर कृति “मेघदूत“ की रचना की. उन्होंने अपनी प्रिया के विरही यक्ष को सघन छायादार सुशीतल वृक्षों से शोभित इसी रामगिरि में निवास कराया है. भवभूति का “उत्तर रामचरित“ भी यहां की वनश्री के विविध सौन्दर्य छवियों से रूपायित है.

सरगुजा के इन्हीं वनांचलों ने बड़े स्नेह से पशु-पक्षियों को भी आश्रय दिया है. यहां के आदिवासी वृक्षों के ही नहीं वनचरों के भी सहचर रहे हैं. देशी राज्य सरगुजा अपने राज्य काल में विविध वन्य पशुओं का समृद्ध आश्रय स्थल था. यहां के वन शेर, हाथी, चीता, गेंडा, जंगली भैंसा, हिरण, बारहसिंगा, बराह तथा विभिन्न प्रकार के मनोरम पशु-पक्षियों से सुशोभित रहे हैं. शेरों की यहां कई जातियां उपलब्ध थीं. विश्व प्रसिद्ध सफेद शेर मोहन सबसे पहले सीधी-सरगुजा क्षेत्र में ही देखा गया था. चीता नामक शेर की जो नस्ल समाप्त हो गई है, वह यहां 1932 तक जीवित रूप में देखा गया था. कहा जाता है कि रियासत काल में यहां शेरों को संख्या इतनी अधिक थी कि प्रवासियों का इनसे बचकर पा पाना असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य था. इस संबंध में यह लोकोक्ति अत्यन्त प्रचलित थी- “जहर खाय न माहुर खाय, मरे का होय तो सरगुजा जाय.“ आशय यही है कि मरने के लिये जहर खाने की आवश्यकता नहीं है. सरगुजा के हिंस्र पशु ही इसके लिये पर्याप्त है.

सरगुजा के वन प्रान्तर गज-यूथों के लिये भी सुप्रसिद्ध रहे हैं. यहां यह तथ्य उल्लेखनीय है कि प्रत्येक वर्ष विजयादशमी के अवसर पर हाथियों का भव्य जुलूस निकाला जाता था, ऐसी भव्यता कम ही रियासतों में देखने को मिलती होगी. स्वाधीनता संग्राम के अंतिम दिनों में महाराजा रामानुजशरण सिंह देव ने अपनी सेना से 100 हाथी महात्मा गांधी के आयोजन को सफल बनाने के लिये रांची भिजवाये थे. महाराजा द्वारा यहां के हाथी पन्ना, छतरपुर, ग्वालियर, झांसी, आदि बुन्देलखण्ड के महाराजाओं को भेंट स्वरूप भी दिये जाते थे.

सरगुजा के महाराजा विश्व के माने हुए शिकारियों में से एक थे. उन्हें जिम कार्बेट से भी सौ गुना बड़ा शिकारी माना जाता है. वनराज के लिये उनका एक ही अचूक निशाना पर्याप्त होता था. उन्होंने अपने जीवन काल में 1300 शेरों का शिकार कर विश्व कीर्तिमान स्थापित किया था. आज भी महाराजा द्वारा शिकार किये गये अनेक नखी एवं खूंखार वन्य प्राणियों के अवशेष “सरगुजा पैलेस“ में देखे जा सकते हैं. रियासत काल में यहां प्रति वर्ष 20 से 30 शेर मारे जाते थे और 40 वर्षों तक निरन्तर शेरों का इस तरह शिकार किये जाने पर भी उनकी संख्या कम नहीं हुई. इसका एक कारण यही रहा है कि यहां के सघन वनों में उतने शेरों की परवरिश करने की क्षमता थी. यहां कभी मनोरंजन के लिये निरीह पशुओं का शिकार नहीं किया गया. यही वह क्षेत्र है जहां लुप्तप्राय पैंथर का अंतिम शिकार 1932 में किया गया था. इन वन्य पशुओं के अतिरिक्त यहां के वन मयूर नृत्यों से शोभित, कोकिलों की कूक से गुंजित विविध मनोहारी पक्षियों से ही दर्शनीय नहीं है वरन् यहां के लोक गीतों में वे संस्कृति के समृद्धशाली तत्वों के रूप में भी अवतरित हुए है.

सरगुजा एक आदिवासी बहुल क्षेत्र है और यहां के आदिवासी बीहड़ एवं घने वनों क मध्य स्थित छोटे-छोटे ग्रामों में निवास करते ह यहां की आदिवासी संस्कृति मूलतः वन्य संस्कृति है. गौंड, शबर, निषाद, उरांव आदि जातियां यहां के वनों से अभिन्न रूप से जुड़ी हुई हैं. ये वन इनके सामाजिक, धार्मिक एवं आर्थिक जीवन का आधार हैं. वृक्षों से इनके जीवन का लालन-पालन होता है. इनके फल-फूल इनके जीवनयापन के ही नहीं इनकी श्रृंगारिक अभिरुचियों को भी सन्तुष्टि प्रदान करते हैं. इस तरह वन, वन्य पशु और वनवासी प्राकृतिक समग्रता के अंग हैं. वृक्षों में ये अपने कुल देवता के में निवास मानते हैं. अपने शांत, सुखद और समृद्धपूर्ण जीवन के लिये वे इनकी विधिवत पूजा अर्चना करते हैं. अपनी धार्मिक मान्यताओं के कारण ये देवी-देवताओं को भेंट करने के लिये छोटे-छोटे उपवन लगाते हैं जिन्हें “सरना“ कहा जाता है. यह स्थान अत्यंत पवित्र और पूज्य माना जाता है तथा पीढ़ी दर पीढ़ी इसे सुरक्षित रखा जाता है. सरगुजा में सरना प्रथा प्रचलित होने के कारण यहां के वनों को अनजाने संरक्षण मिलता रहा है. साल, महुआ, बड़, पीपल, आंवला आदि वृक्ष इनके जीवन में इतने रच बस गये हैं कि ये उनके लिये उपास्य देव बन गये है. आर्य संस्कृति से प्रभावित इनकी मान्यता के अनुसार वट तथा पीपल की जड़ में ब्रह्म देवता का निवास माना जाता है. सन्तान प्राप्ति के लिये स्त्रियां वट तथा आंवला वृक्ष की पूजा करती हैं. महुआ में महुआ देव का में निवास माना जाता है तथा नीम वृक्ष में आदि शक्ति देवी का पवित्र निवास मानकर बड़ी श्रद्धा से उसकी पूजा-अर्चना की जाती है. नीम, पीपल, वट आदि पवित्र वृक्षों के चारों ओर चबूतरा बनाकर ध्वजा स्थापित कर बड़े विधि-विधान के साथ आदिवासी स्त्री और पुरुष अपनी भावनाओं को अर्पित करते हैं. और इनसे आशीर्वाद की कामना करते हैं. ये वृक्ष, ये वन इन वनवासियों के लिये अपने ही जैसे सजीव और हितकारी हैं. इन वृक्षों की महत्ता इनके लिये सामाजिक कार्यों में भी कम नहीं है. जिस लड़की के विवाह अधिक कठिनाई आती है या जिसका विवाह होता ही नहीं है, उसका विवाह कपड़े में लिपटी महुये की लकड़ी से कर दिया जाता है. इसके बाद उस लकड़ी को वन में किसी वृक्ष से बांध दिया जाता है. जो भी व्यक्ति सर्वप्रथम प्राकर उसे बन्धन मुक्त करता है, उससे उस लड़की का विवाह कर दिया जाता है.

हमारे वेदों और ऋषि मुनियों ने वृक्ष संवर्द्धन को “स्वर्ग का द्वार“ निरूपित किया है. इतिहास की सांस्कृतिक धरोहर के धनी सरगुजा के ये साल वन आज संकट के दौर से गुजर रहे हैं. हम आज उस दिन की प्रतीक्षा कर रहे हैं जब हर सरगुजावासी साल वनों के गौरवपूर्ण इतिहास से गुजर कर सम्राट अशोक की तरह कह सकेगा- “रास्ते पर मैंने वट वृक्ष रोप दिये हैं जिससे मनुष्यों और पशुओं को छाया मिले. अमराइयां लगाई हैं जो फल दें.“ यदि हम ऐसा कर सके जो निश्चित ही सरगुजा कल की तरह आज भी स्वर्ग की सार्थकता सिद्ध कर सकता है.
डॉ. कुंतल गोयल पर डॉ. रेखा दुबे ने
शोध किया, जो पुस्तक रूप में
2013 में प्रकाशित हुआ।


Sunday, November 14, 2021

हाथी

छत्तीसगढ़ के हाथियों का पहला और रोचक उल्लेख आठवीं सदी ईस्वी के उद्योतनसूरिकृत ग्रंथ ‘कुवलयमाला‘ में आया है। मधुरान्तक देव का राजपुर, बस्तर से प्राप्त ग्यारहवीं सदी ईस्वी के ताम्रपत्र में अनूठा उल्लेख है कि ‘आकाश (वर्षाजल) से उत्पत्ति वाले, भूगर्भ में स्थित खनिज, और जंगली हाथी भी दान में दे दिए गए हैं। प्रसंगवश, वाल्मीकि रामायण, अयोध्या कांड के सौवें सर्ग के पचासवें श्लोक में राम भरत से प्रश्न करते हुए आश्वस्त होना चाहते हैं कि हाथी उत्पन्न होने वाले जंगल सुरक्षित हैं? संभव है, इसमें दक्षिण कोसल सम्मिलित हो। (उल्लेखनीय कि रघुवंश के नवें सर्ग में हाथी को मारना शास्त्रविरुद्ध बताया गया है।)

आइने अकबरी में हाथियों के संदर्भ में उल्लिखित बरार के विभिन्न स्थान नाम, छत्तीसगढ़ से संबंधित हो सकते हैं, किंतु उनकी सुनिश्चित पहचान निर्धारित नहीं हो सकी है, तथापि बस्तर और रतनपुर का स्पष्ट उल्लेख है। मुगल काल में कलचुरियों द्वारा और देशी रियासतों के दौर में राजाओं द्वारा छत्तीसगढ़ के हाथी उपहार में दिए जाने की जानकारी मिलती है। शक संवत 1242 के कांकेर शिलालेख में काकैर के राजा भानुदेव के मंत्री नायक वासुदेव का उल्लेख है, जिनके पूर्वज हाथी पकड़ते थे? 15 वीं सदी के अंतिम दौर में रतनपुर के कलचुरि शासक वाहरेन्द्र के 1000 अश्व के साथ 60 हाथियों का अभिलेखीय उल्लेख मिलता है। बाबू साधुचरणप्रसाद की पुस्तक ‘भारत-भ्रमण‘ में कुदरमाल शीर्षक के अंतर्गत सन 1893 का उल्लेख आया है कि 'उस (हसदू) नदी के किनारों पर जंगलों में कभी कभी जंगली हाथियों के दल देख पड़ते हैं।' 1939 के ऐतिहासिक त्रिपुरी (जबलपुर) कांग्रेस अधिवेशन में शोभायात्रा के लिए 25 हाथी महाराजा सरगुजा ने अपने खर्च पर भेजे थे।

सुश्री डॉ. कुन्तल गोयल ने मध्यप्रदेश सन्देश में ‘इतिहास के पृष्ठों को समेटे सरगुजा की वनश्री‘ शीर्षक से प्रकाशित लेख में बताया है- ‘स्वाधीनता संग्राम के अंतिम दिनों में महाराजा रामानुजशरण सिंह देव ने अपनी सेना से 100 हाथी महात्मा गांधी के आयोजन को सफल बनाने के लिए रांची भिजवाए थे। महाराजा द्वारा यहां के हाथी पन्ना, छतरपुर, ग्वालियर, झांसी, आदि बुन्देलखण्ड के महाराजाओं को भेंट स्वरूप भी दिये जाते थे।

1990-91 में अपने मुझे डीपाडीह, सरगुजा प्रवास के दौरान सुनने में आया कि कुसमी के रास्ते पर हाथियों का पूरा झुंड है, छोटा नागपुर में कहीं, शायद बेतला नेशनल पार्क से भटक कर आ गए हैं। ग्रीन आस्कर विजेता ‘द लास्ट माइग्रेशन‘ फिल्म वाले माइक पांडेय रायपुर आए, तब उनसे मुलाकात में बातें हुई थीं। पार्वती बरुआ के नाम और काम की खबरें मिलती रही हैं। अंबिकापुर के अमलेन्दु मिश्र, प्रभात दुबे का नाम भी हाथियों के प्रसंग में आता है। पता लगा था कि जशपुर-सरगुजा में अब भी, खासकर तपकरा के लोग हैं, जिनका हाथियों से पुश्तैनी रिश्ता है, जो हाथी को रास्ता दिखा देते हैं, बिना झिझक खदेड़ सकते हैं।

बिलासपुर- जगदलपुर वाले वकील साहब शरदचंद्र वर्मा जी से जब भी मुलाकात होती, बातचीत का मुख्य विषय हाथी होते। वे कैप्टन जे फॉरसिथ की पुस्तक ‘द हाइलैंड्स आफ सेन्ट्रल इंडिया‘ का जिक्र करते, जिसमें छत्तीसगढ़ के हाथियों से जुड़े तथ्य और ढेरों रोचक जानकारियां हैं। यहां प्रस्तुत उनका लेख अमृत संदेश, रायपुर में रविवार 25 जनवरी 1987 को छपा था। जैसाकि लेख में बताया गया है, यह मुख्यतः फॉरसिथ की पुस्तक के अंश की हिंदी में प्रस्तुति है। बाद में इससे अलग फॉरसिथ की पूरी पुस्तक का हिंदी अनुवाद दिनेश मालवीय द्वारा किया गया, जो वन्या प्रकाशन की ओर से राजकमल प्रकाशन द्वारा 2008 में ‘मध्यभारत के पहाड़ी इलाके‘ शीर्षक से प्रकाशित हुआ है।

इस भूमिका के साथ शरदचंद्र वर्मा का लेख-

मध्यप्रदेश के अंतिम हाथी बिलासपुर में

मध्यप्रदेश के बिलासपुर जिले ये ऊंचे घने पहाडी वनों में इस सदी के तीसरे दशक तक हाथी वास करते थे। ए.ए. डनबर ब्रन्डर १९२३ में ... अपनी पुस्तक वाइल्ड एनिमल्स आफ सेन्ट्रल इंडिया‘ में लिखा कि बिलासपुर जिले के उत्तर पूर्व में स्थित जमींदारियों के जंगलों में अभी भी कुछ हाथी हैं। यह मध्यप्रांत का अकेला भाग है, जहां पर मैंने जंगली हाथियों को देखा है और मेरा मत है कि यह एकमात्र भाग है जहां पर ये अभी भी हैं। वर्षा के दिनों में ये हाथी कभी-कभी पश्चिम की ओर मंडला जिले तक निकल जाते हैं।

बिलासपुर के वृद्ध लोग बतलाते हैं कि उन हाथियों को सरगुजा के राजा पकड़ कर ले गये। सरगुजा राज में जंगली हाथियों को पकड़ने की पुरानी परम्परा रही है। यहां के मदनेश्वर शरण सिंह देव ने हाल की एक भेंट में बतलाया था कि उनके यहां १९३० में, जिस वर्ष उनका जन्म हुआ आखिरी बार हाथी पकड़ा गया था। अंबिकापुर के वरिष्ठ अधिवक्ता समर बहादुर सिंह ने भी बतलाया कि बिलासपुर जिले के मातन (मातंग का अपभ्रंश) के जंगल में हांककर लाया गया विशाल एक दंता हाथी १९३० में सरगुजा राज के द्वारा मैनपाट के पास दरीमा जंगल में पकड़ा गया था। इस प्रकार उस वन अंचल में हाथी मिलने और उनको पकड़ने की एक परम्परा ही समाप्त हो गई। उपलब्ध साहित्य और जनसम्पर्क के माध्यम से उस समाप्त हो चुकी परम्परा को समझने के प्रयास में केप्टेन जे. फारसाइथ की ‘हाई लेंड्स आफ सेन्ट्रल इंडिया‘ से संबंधित अंश का सारः

आज से सवा सौ साल पहले १८६० में फारसाइथ अपने एक हाथी के साथ संबलपुर से बिलासपुर २८ अप्रेल को पहुंचे। उस समय अमरकंटक (उस समय पेंड्रा जमींदारी का एक भाग था) के उत्तर और पूर्व के पहाड़ी जंगलों में हाथियों के बड़े-बड़े दल थे। वे हाथी छत्तीसगढ़ मैदान के लगे हुए भागों में फसल पकते समय उतर वहां की खड़ी फसल को बर्बाद करते जिसके कारण कृषि के प्रयासों में बाधा उत्पन्न होती थी। फारसाइथ यात्रा का एक उद्देश्य यह भी था कि उन हाथियों के प्राकृतिक वास में जाकर उनकी संख्या का अनुमान लगा उनके नाश का उपाय सुझाना। चूंकि वह विस्तृत, विशाल साल वन क्षेत्र बियावान, निर्जन प्राय था वहां भूमिया लोग की दूर दूर बिखरी, बिरली बसी बस्तियां थी जहां पर किसी प्रकार का रसद सामान मिलने की आशा नहीं थी, इसलिये उसका प्रबंध बिलासपुर में ही करना पड़ा। उस समय के छोटे से बिलासपुर में जितना चाहो अनाज मिलता था और वह भी बहुत सस्ता, एक शिलिंग में लगभग सौ पौंड। भरपूर मात्रा में गेहूं, चावल और चना खरीद वहां उपलब्ध बंजारा लोग के बैलों में लदवाकर ३ मई को छत्तीसगढ़ की प्राचीन राजधानी रतनपुर की ओर रवाना हुए। दुर्भाग्यवश यहां पहुंचते ही फारसाइथ छोटी माता के प्रकोप से बीमार पड़ गये। दूसरे दिन यद्यपि वह बीमार थे, फिर भी उसी हालत में अगले पड़ाव की ओर बढ़े। अगले दिन तबियत अधिक खराब होने के कारण उनको छह मील दूर आगे की ओर (लाफा) ले जाया गया। उस हालत में वह दृढ़ निश्चय थे कि जब तक हाथी को देखने की उनकी इच्छा पूरी होने की थोड़ी भी आशा है, तब तक वह वापस नहीं लौटेंगे। आगे लगभग सात मील दूर तक शंकवाकार पहाड़ी के शीर्ष पर मुकुट के समान एक पुराना किला लाफागढ़ स्थित है। उसकी ऊंचाई समुद्र सतह से लगभग ३००० फुट है। वहां ऊपर पानी और छाया के साथ साथ ठंडक भी थी, इसलिये उनको वहां ले जाने का निश्चय किया गया। अगली सुबह गढ़ के नीचे, बीच पहाड़ में बसे एक गांव में ले जाया गया। उस गांव तक जाने से लिये पहाड़ में एक संकरा सा रास्ता बना था। उस स्थान की समुद्र सतह से ऊंचाई उच्च दाब मापी यंत्री में २४५० फीट थी। वहां एक विशाल बरगद पेड़ की छाया में फारसाइथ के लिये एक बड़ी झोपड़ी बनाई गई थी। बातचीत में वहां भूमिया लोग ने बताया कि जंगली हाथी, सचमुच में उनके देश के राजा और राक्षस दोनों ही है। जब जिधर मन में आता है, उधर निकल पड़ते है और डाही धान की फसल को तहस नहस कर देते हैं। जैसा कि स्वाभाविक है, प्रकृति की अनियंत्रित आक्रमक शक्तियों को इन जन-जातियों के द्वारा देवी देवता का रूप दे उनको पूजा, भेंट से प्रसन्न करने का प्रयास किया जाता है।

दूसरे दिन सुबह उनको पहाड़ के ऊपर ले जाया गया। यहां तक पहुंचने का पगडंडी रास्ता खड़ा और आड़ा तिरछा लगभग ७३० फुट की ऊंचाई लिये था। एक छोटे तालाब के किनारे छायादार पेड़ के नीचे तम्बू गाड़ा गया था। पहाड़ का सबसे ऊंचा भाग तम्बू के ऊपरी ओर पर था, उसकी ऊंचाई समुद्र सतह से ३४१० फुट थी। यहां आये लाफा के ठाकुर ने जंगली हाथियों के बारे में काफी कुछ बतलाया। वे हाथी उसकी और पास की मातन और उपरोड़ा जमीदारियों के जंगलों में स्वछन्द विचरण करते थे। ठाकुर को केवल एक घटना मालूम थी जिसमें कोई जंगली हाथी किसी भूमिया के द्वारा मारा गया हो। वह हाथी बूढ़ा नर था। उसका एक दांत टूट गया था। पेड़ पर रखवाली के लिये बैठे एक भूमिया ने हाथी की सूंड़ में एक बिसर (विषैला बाण) उस समय मारा जब हाथी उसके धान के खेत में आकर फसल का नुकसान कर रहा था। घायल हाथी कई दिनों तक आसपास के जंगल में भटकता रहा। उस बीच वह दुबला और कमजोर हो गया था। एक दिन, हाथी पानी के एक स्रोत में प्यास बुझाने और अपनी देह पर पानी डालने के लिये पहुंचा। पर वहां एक बार जो बैठा तो दुबारा उठ नहीं सका। उसकी खबर मिलते ही पड़ोस के एक ठाकुर ने वहां पहुंचकर अपनी भरमार बंदूक से उस पर अंधाधुंध गोलियां चलाई। हाथी के मरने के बाद उसकी देह से ढेर सारी गोलियां निकाली गई थीं।

जहां पर फारसाइथ का डेरा लगा था, उसके दक्षिण दिशा में छत्तीसगढ़ का खुला मैदान जहां से होकर वह लाफागढ़ पहुंचे थे और उत्तर दिशा में हाथी देश का महाविशाल हरा वन क्षेत्र था जहां पर बीच-बीच में अलग से उभरी दिखती पहाड़ियां थी। इस भाग में गढ़ के तल से आरंभ होकर एक लम्बी घाटी है जिसमें बसाहट के लिये जंगल साफ किया गया भाग बीच बीच में स्पष्ट दिखता था। १५ मई तक लाफागढ़ में विश्राम करने के बाद कुछ चलने फिरने लायक होते ही एक हाथी पर सवार हो मातन की ओर पहाड़ उतर कर बढ़े। पर यहां पहुंचते ही फिर बीमार हो गये। गांव के पास के एक स्रोत में कई हथनियां पानी पीने के लिये रोज आती थीं। वह स्थान एक मील से भी कम दूरी पर था। उस समय नर हाथी को छोड़कर किसी हथनी या अन्य को मारने पर सरकार द्वारा प्रतिबंध था क्योंकि उनको खेदकर जीवित पकड़ने का विचार था। पर वहां पर एक पुराना बदमाश हाथी था जिसने कई लोगों को पकड़कर मार डाला था। इसलिये कुछ भूमिया लोगों को उसका पता लगाने के लिये भेजा गया।

दूसरे दिन रात में गर्मी से राहत पाने के लिये फारसाइथ अपने तम्बू के बाहर सो रहे थे कि कोलाहल से उनकी नींद टूट गई। कुछ देर बाद उनकी समझ में आया कि पास की पहाड़ी की ढाल के जंगल में हाथियों के एक दल की चीख चिल्लाहट से वह कोलाहल हो रहा था। हाथी दल सारी रात सूर्याेदय से कुछ पहले तक वहां बांस को तोड़ने-खाने में लगा रहा। बीच बीच में चीखना चिल्लाना भी चलता रहा। उस सबसे फारसाइथ के पालतू हाथी बहुत बेचैन हो गये थे, इसलिये सावधानी के लिये उनको रस्सों से बांधा, साथ ही उनके पास कुछ लोगों को भाला लेकर खड़ा किया गया ताकि भड़कने की स्थिति में उन पर काबू रखा जा सके। शाम को वह उस पहाडी की ओर गये। वहां का वह भाग पूरी तरह से सपाट, चौपट हो गया था। जगह-जगह बांस को तोड़, खींच गिराया, कई को दांत से चबा कर छोड़ दिया और बहुत से के कोमल भाग को खा लिया गया था। सलई और उथली जड़ वाले अन्य पेड़ों को उखाड़ गिरा दिया गया था। उनकी ऊपरी डगालों की नर्म छाल को खींच छील कर निकाल दिया गया था। उन हाथियों की पेड़ को उखाड़ फेंकने की क्षमता आठ इंच के घेरे वाले पेड़ों तक ही सीमित लगी। स्वतः के पालतू हाथियों के साथ भी वैसा ही अनुभव था। वहां वे पेड़ जड़ से उखाड़ फेंके नहीं गये थे बल्कि मस्तक और सामने के एक पैर की सहायता से शरीर अथवा जैसे कि यहां के लोगों ने बतलाया पीठ के भार से उन पर बल डालकर झुकाये गिराये गये थे। अफ्रीका की यात्रा कर आये लोगों का कथन है कि वहां हाथी बड़े बड़े पेड़ों को उखाड़ कर फेंक मारने के काम में लाये जाते हैं, केवल कपोल कल्पना है। एक ने तो यहां तक कहा है कि उसने वहां अठारह इंच के घेरे के दो पेड़ों को उखाड़ कर दस बारह गज की दूरी तक फेंकते देखा था। जंगल के दल में से हाथी जिस ओर गया था, वहां एक चौड़ा रास्ता सा बन गया था। दल ने जहां पर मातन नदी को पार किया था, वहां पर सूखी रेत में हाथियों के विभिन्न आकार के पांव के चिन्ह, दंतैल के डेढ़ फुट व्यास से ले कर बच्चे के चाय के प्याला तक दिख रहे थे। उन हाथियों की संख्या पचास साठ तो थी ही। तबियत ठीक न होने के कारण फारसाइथ ने उनका पीछा नहीं किया।

अगले दिन दोपहर में जब वह सो रहे थे, भूमिया लोग ने आकार बतलाया कि आधा मील से भी कम दूरी पर एक अकेला दंतैल है। खबर सुनकर, अपनी अस्वस्थता के बाद भी वह अपने आपको रोक नहीं पाये। जैसे थे वैसे ही एक घोड़ा में सवार होकर कम से कम उस हाथी को देख पाने का लालच किये चल पड़े। वह हाथी मातन नदी के बलुआ तट पर खड़ा था। यहां पर उसने एक बड़ा गहरा गड्ढा खोद कर उसकी गीली बालू को मक्खियों से बचने के लिये अपनी देह पर पोत लिया था। वह एक बहुत बड़ा दंतैल, आकार में नेपाली हाथी के समान था। उसके और पालतू हाथी के बीच में जो अंतर स्पष्ट दिखा- वह था उसकी गर्दन और अग्रभागों का अधिक मांसल होना। वह अन्तर वन भैंसा में भी दिखा। हाथी नदी की एक कगार से अपने दांत टिकाये खड़ा था अपनी पूंछ को धीरे-धीरे इधर-उधर डुला रहा था। वह झपकी ले रहा था। उसके पास पहुंचने का कोई रास्ता नहीं था और किसी हाथी पर गोली चलाने के लिये लगभग डेढ़ सौ गज का अंतर बहुत अधिक था। इसलिये वहां बैठे बड़ी देर तक उसे इस आशा में देखते रहे कि वह उस स्थान से हटेगा पर वैसा हुआ नहीं। तब चलकर उस स्थान को ढूंढ़े जहां से होकर हाथी नदी की खड़ी कगार में से उतरा था। वहां पहुंच पीछे की ओर बैठकर एक भूमिया को लम्बा घूमकर हाथी की ओर जाने को कहा ताकि उसकी गंध हाथी को मिले। जब हाथी को भूमिया की गंध का पहला, हल्का झोंका मिला तब उसका व्यवहार देखने लायक था। वह अपने दांतों के सहारे कगार से टिका चुपचाप खड़ा रहा पर उसकी पूंछ का हिलना डुलना बंद हो गया। उसकी सूंड का सिरा गोल घूमकर कान के नीचे गंध की दिशा में हो गया था। उसके कान सूक्ष्म आवाज को पकड़ने के लिये चौकस चौकन्ने खड़े हो गये। उस स्थिति में वह बहुत देर तक चुपचाप खड़ा था। उसके बाद ही भूमिया कुछ हटकर हवा की सीध में आकर तुरंत एक झाड़ पर जा चढ़ा, यद्यपि उस समय तक हाथी उसे देखा नहीं था। ऐसा लगा कि उन भूमिया लोगों को अपने इस जंगल देव से बहुत भय लगता है। उसके बाद हाथी वहां से चुपचाप निकलकर, अपने दुश्मन की ओर देखे बिना भारी धीमी चाल से नदी की दूसरी कगार की ओर से जो लगभग दो सौ गज की दूरी पर था, चढ़ने के लिये बढ़ा। फारसाइथ उस स्थान के पास पहुंचने के लिये घास में लुकते छिपते एक हाथी रास्ता के पास जहां पर हाथी के आ पहुंचने का अनुमान था, जा कर बैठ गये। उनका अनुमान गलत नहीं निकला। धड़कते दिल से की जा रही प्रतीक्षा के एक दो मिनट बाद ही उसका भारी मस्तक और चमकते दांत, इधर-उधर डोलते अस्सी नब्बे कदम दूर दृश्य में उभरे। फारसाइथ निश्ंिचत थे कि यदि हाथी उनकी ओर आयेगा तो अपनी भारी रायफल से उसे पा लेंगे। वे सोच रखे थे कि हाथी जब तक बिलकुल पास नहीं होगा, तब तक गोली नहीं चलायेंगे। उन दोनों के बीच में लगभग ४० (चालीस) गज का अंतर रह गया था। वे रायफल को कंधे पर रख कर आंख की सीध में ला रहे थे तभी पीछे से हल्की खांसने की आवाज से उनका ध्यान उस ओर को हुआ। वे यह देखकर आश्चर्यचकित हुए कि वहां पर पीला कोट और लाल रंग की पगड़ी पहिने एक ऊंचा कद का आदमी दीमक की बाम्बी पर खड़ा हो एक पेड़ पर उठने-चढ़ने की कोशिश कर रहा था।

उधर से ध्यान हटाकर वे हाथी की ओर मुड़े पर तब तक जो कुछ वहां दिखा वह पेड़ों के बीच में से वापस जाते हाथी का भारी भरकम पिछला गोल हिस्सा था। उस सबसे उत्तेजित होकर चे ओझल होते दंतेल के पीछे जोर से दौड़ पड़े। उससे अधिक उनको कुछ याद नहीं रहा। चेतन होने पर साथ के लोगों द्वारा अपने को घोड़ा की पीठ पर सहारा दे डेरा की ओर ले जाते पाया। उनसे मालूम हुआ कि लगभग सौ गज दौड़ने के बाद अचेत हो घास पर गिर पड़े थे। उनके पीछे चोरी छिपे आ जाने वाला आदमी मातन के ठाकुर का एक संबंधी था। वह बहुत देर तक घास में चुपचाप लेटा था, पर ज्योंही उसकी नजर उस भयानक मानव हंता पर पड़ी त्यों ही उसकी अफीम अभ्यस्त स्नायुएं जवाब दे गई। यह इतना दयनीय और लज्जित दिख रहा था कि फिर फारसाइथ उससे वह सब न कह सके जो उसके बारे में सोचे थे। वैसे भी उस समय उस क्षेत्र के लोगों में काफी भय व्याप्त था। कुछ समय पहले ही उपरोड़ा के ठाकुर का एक छोटा बेटा एक हाथी के द्वारा कुचल, मार डाला गया था। बिलासपुर के कुछ शिकारी उसे मैदान में उतर आये कुछ हाथियों के शिकार के लिये ले गये थे। वहां पर पीछा किये जा रहे एक घायल दंतेल ने पलट कर हमला किया जिसमें ठाकुर का बेटा जब तक सम्हले और बचे तब तक वह कुचला जा चुका था। उस दिन जो कुछ भी हुआ वह अपने आप में निराशाजनक था। उसके बाद उनको और उनके साथी को किसी हाथी पर गोली चलाने का दूसरा अवसर नहीं मिला।

मातन के आसपास हाथियों के जो प्रमुख वास थे, वहां फारसाइथ थोड़ी-थोड़ी दूर तक गये। वहां चारों ओर अन्य वन्य प्राणी भी बहुत थे। नालों के किनारे चीतल और साल वन के खुले मैदानों में लाल हिरण (बारा सिंघा) थे। मातन के उत्तर पूर्व में एक छोटी पहाड़ी है, जिसे मातन दाई कहते है। उस पहाड़ी के एक छोर पर, खाई के नीचे हाथियों की बहुत सी हड्डियां बिखरी पड़ी थीं। उसके बारे में मालूम हुआ कि उनके आने के एक साल पहले वहां एक दुर्घटना में एक छोटे दल के प्रायः सभी हाथी उस स्थान पर मारे गये। मातन के ठाकुर और अन्य लोग बाजा गाजा के साथ पहाड़ी पर स्थित देवी की वार्षिक पूजा के लिये संकरे रास्ते से जो ऊपर की ओर जाने का एक मात्र रास्ता था, आगे बढ़ रहे थे। ये लोग बेखबर कि उनके आगे पांच हाथियों का एक दल है जो हो रहे हो-हल्ला से आगे-आगे भागे जा रहा था। वह दल जब ऊपर पहाड़ी के छोर पर पहुंच गया फिर भी आवाज को अपनी ओर आते पाया तब वह भयभीत और घबड़ा गया। दल के चार हाथियों ने पहाड़ी की विरूद्ध दिशा में उतरने की कोशिश की। उस ओर ऊपर से नीचे बिखरे पत्थरों का एक ढाल है, जो एकाएक एक खड़ी खाई में समाप्त होता है। एक बार उस ओर बढ़ जाने के बाद उन भारी भरकम हाथियों के लिये वापस ऊपर आ पाना संभव नहीं था। वे ढाल से फिसल कर सीधे नीची खाई में जा गिर, मारे गये। पांचवां हाथी, एक दंतेल था, जिससे हाल में फारसाइथ से सामना हुआ था। उसने निकल बचने के लिये आती भीड़ पर चिंघाड़ते हुए हमला किया जिससे लोग इधर-उधर तितर-बितर हो गये और वह वहां से नीचे की ओर भाग गया।

२६ तारीख को फारसाइथ का साथी उनसे आ मिला। वह साल वन के पूर्वी भाग की ओर वहां के हाथी देश, जो उपरोड़ा के ठाकुर के आधिपत्य में था, का भ्रमण कर आया था। मातन से वे लोग उत्तर दिशा की ओर बढ़े ताकि अमरकंटक के बीच में फैले भू-भाग को भी देख परख लें। माह के अंत तक ये लोग साल वन के एक अंतहीन भाग से यात्रा करते रहे। एक अवसर पर फारसाइथ बिना किसी पथप्रदर्शक के एक हाथी रास्ता जो यहां के घने वन में सड़क का काम देता है, से हटकर निकल पड़े। उनको विश्वास था कि थोड़ी दूर के घुमाव के बाद वे फिर से रास्ता पा लेंगे। पर भटककर वे एक छोटे से जलस्रोत और दो चार झोपड़ियों के स्थान पर पहुंच गये जो बियावान जंगल के बीच अपने बुगलुगी नाम में खुश था।

जहां से होकर वे गुजरें, उस भू-भाग की समुद्र सतह से ऊंचाई १७०० फीट थी। वहां पानी की कमी के कारण वन्य प्राणी बहुत कम थे। मालूम हुआ कि वर्षा के दिनों में हाथी, वन भैसा, गौर और असंख्य लाल हिरण (बारासिंघा) यहां विचरण करते है। केंदा और पेण्डरा के जंगलों में जो मैकल पर्वत श्रेणी के. ठीक नीचे में स्थित वहां बहुत वन भैसे होने की खबर मिली थी, पर समय नहीं था इसलिये वे रूके नहीं। फारसाइथ की राय में जब मंडला के पठारी जंगलों में पालतू पशुओं के झुंड चरने पहुंचते थे, तब वहां से वनभैंसे मुख्यतया इधर के जंगल की ओर आ जाते थे। अब तक उनको जितना मालूम हो सका था, उसके अनुसार लगभग बारह सौ वर्गमील के वन क्षेत्र में हाथी वास करते थे। उनकी अनुमानित संख्या दो से तीन सौ तक थी। और वे निश्चित रूप से अपने आसपास की फसल को बहुत नुकसान करते थे। फलस्वरूप उन क्षेत्रों के ठाकुरों द्वारा पटाई जाने वाली वार्षिक लगान को कई वर्षों तक माफ करना पड़ा। वहां के लोग हाथी जैसे शक्तिशाली प्रतिद्वंदी से बचने-बचाने में पूरी तरह असहाय थे। रास्ते में जंगल से लगे जो गांव मिले, वहां अधिकांश में ऊंचे पेड़ों पर मकान बनाये गये थे। गांव में हाथी दल के आने पर लोग उन मचालों पर चढ़कर अपना बचाव करते थे। फारसाइथ के विचार से जंगली हाथियों को मारने के प्रयास में उनके द्वारा किये जाने वाले उत्पात में वृद्धि ही होती है। उसके अलावा किसी हाथी को मारना किसी आदमी को फांसी में टांगने जैसा है जो कि उसका सबसे बुरा उपयोग है।

हाथियों को देखने की इच्छा पूरी करने के लिये फारसाइथ ने हसदेव और उसकी सहायक नदियों के एक विस्तृत विशाल भू-भाग की यात्रा की थी। और १ जून को पूर्व दिशा की ओर से खड़ी चढ़ाई लिये जो पहाड़ी रास्ता है, उससे होकर अमरकंटक पहुंचे। यहां दो दिन आराम करने के बाद जबलपुर की ओर चले गये। काफी पत्र-व्यवहार के बाद तत्कालीन भारत सरकार ने अपने सुसंगठित हाथी पकड़ने वाले दल को इन जंगलों में भेजा था, जिसने सन् १८६५ से ६७ के बीच में यहां के हाथियों को पकड़ने का उपक्रम किया था।

Thursday, November 4, 2021

टांगीनाथ सामत राजा और पछिमहादेव

यह किस्सा थोड़े फेर-बदल के साथ इंडिया टुडे साहित्य वार्षिकी 2019 में विचार/पुरातत्व के अंतर्गत ‘डीपाडीह के टांगीनाथ और अतीत की कड़ियां‘ शीर्षक से छपा था। 

डीपाडीह की बात, उसकी पृष्ठभूमि के साथ करने में आसानी होगी। सरगुजा का यह पूरा अंचल अपने आप में पुरातात्त्विक और सांस्कृतिक दृष्टि से बहुत समृद्ध क्षेत्र है। लेकिन इसकी विशेष प्रसिद्धि रामगढ़ की प्राचीन रंगशाला के लिए थी। यहां के अन्य पुरातात्त्विक स्थलों में डीपाडीह और महेशपुर दो ऐसे स्थल थे, जिनकी चर्चा फुटकर उल्लेख के रूप में जरूर होती थी। डीपाडीह के साथ एक तो टांगीनाथ का जिक्र आता था और दूसरी बात होती थी सामत राजा या सम्मत राजा से जुड़ी हुई।

इनमें पालवंशी प्रभाव का प्राचीन स्थल टांगीनाथ, छोटा नागपुर के महुवाडांड और नेतरहाट जाने वाले रास्ते में है। टांगीनाथ, यों नाम से लगता है कि यह परशुराम से संबंधित होगा, लेकिन उस टांगीनाथ और डीपाडीह को देखा तो पाया कि यहां जो सबसे ज्यादा प्रकट और विशाल मूर्ति है, वह परशुधर शिव, एकदम अलग प्रतिमाशास्त्रीय प्रतिमान, जो यों शिव का लोकप्रिय विग्रह नहीं है। शिल्पशास्त्रीय ग्रंथों में जरूर जिक्र आता है, यहां परशु लिए हैं, जो स्थानीय भाषा में टांगी या फरसा कहा जाता है। उस परशुधर शिव की मूर्ति को देखकर स्थानीय लोगों में यह धारणा बनी कि ये टांगीनाथ हैं, टांगी लिए हुए देव हैं, उसके साथ कहानी जुड़ी है, जिसमें एक सामत राजा हुआ करते थे और उनका टांगीनाथ से युद्ध हुआ। टांगीनाथ ने उनके पैर काट दिए। जिस विशाल प्रतिमा की यहां चर्चा है, उसका पैर टूटा हुआ है और वह पैर परशु पर टिका है, तो ऐसा लगता है कि उस परशु से उनका पैर काट दिया गया है।

एक रोचक बात आई कि सम्मत राजा क्या है? वास्तव में कोई सामंत राजा था? कोई अर्द्धसंप्रभु राजनैतिक शक्ति यहां हुआ करती थी और जिसका यह केन्द्र था? यहां चाव से सुनी-सुनाई जाने वाली कहानियों में एक पात्र पछिमहादेव भी है। संयोग कि जिस प्रकार पालवंशी राजाओं के नाम में अंत में पाल जुड़ा होता था, उसी तरह यहां से पश्चिम में स्थित त्रिपुरी के कई कलचुरि राजाओं के नाम के अंत में देव रहा है। कहानी में पछिमहादेव के बैल का रूप धर लेने की बात भी कही गई है, तब ध्यान जाता है कि यह ‘पच्छिम-महादेव‘ तो नहीं! अब स्थल उत्खनन से उजागर हुआ कि यह एक विस्तृत पुरातात्विक-धार्मिक स्थल है और यह केन्द्र किसी सबल राजनैतिक प्रभुत्व के अधीन रहा होगा।

स्थल के राजनैतिक इतिहास को देखने में मुश्किल होती है जब कोई अभिलेख न मिले या पुराने साहित्य में कोई स्पष्ट उल्लेख/संदर्भ न आए। इसी तरह दूसरे स्रोत- कोई ताम्रपत्र, कोई शिलालेख, जिससे स्थल की प्राचीनता को जोड़कर समझ सकें, ऐसा कुछ खास प्रमाण यहां नहीं मिला है। शिव इस स्थल के प्रमुख देवता हैं, लेकिन यहां देवी मंदिर भी मिले हैं। एक बहुत महत्वपूर्ण मंदिर देवी चामुण्डा का मिला है। स्थानीय लोगों में ‘बोरजो टीला‘ नाम से ज्ञात स्थल की खुदाई से उद्घाटित स्मारक और मूर्तियों से अनुमान हुआ कि वह सूर्य का मंदिर है, यहां द्वादश आदित्यों की मूर्तियां रही होंगी।

आरंभिक संरचना उरांव टोली का शिव मंदिर, आठवीं सदी ईसवी का है। यहां से आगे लगभग तेरहवीं शताब्दी तक लगातार स्थापत्य गतिविधियों के प्रमाण यहां दिखाई पड़ते हैं। इससे स्पष्ट रूप से समझ में आता है कि यह एक धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक सक्रियता का केन्द्र रहा होगा। इस स्थल के चारों ओर पहाड़ियां हैं, बीच में सपाट मैदान है और सरगुजा की महत्वपूर्ण नदी, कन्हर यहां से गुजरती है। कन्हर नदी के बहाव की दिशा में उसके दाहिने तट पर यह स्थल स्थित है। यहां से एक किलोमीटर भी कम दूरी पर ऊपर बायीं ओर, सूर्या नाम की छोटी नदी, कन्हर में मिलती है। वहां से आधे-पौन किलोमीटर नीचे उतरते हैं तो गलफुल्ला नाम की दूसरी नदी दाहिनी ओर मिलती है। इस तरह भौगोलिक दृष्टि से यहां तीन नदियों का संगम है और यही स्थल के चयन के पीछे मुख्य कारण रहा होगा।
चइला पहाड़ पर उत्कीर्ण लेख
‘ॐ नमः विस्वकर्मायः।।‘
यहां का चइला पहाड़ उल्लेखनीय है, जहां से इन मंदिरों के निर्माण हेतु पत्थर लाए गए हैं, मंदिरों से बमुश्किल तीन किलोमीटर दूर है। चइला, छीलन को कहा जाता है, ऐसा स्थान जहां पाषाणखंड को छील कर कलाकृतियों का रूप-आकार दिया गया है। अब भी मौके पर आठवीं-नवीं सदी की लिपि में खुदे अक्षर और बड़ी तादाद में छीलन, अधबने उकेरे खंड बिखरे हुए हैं। प्रसंगवश, सरगुजा के एक अन्य महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल महेशपुर में भोजासागर-रनसागर जोड़ा तालाब के पास 'टांकीनारा' पत्थर खदान (टांका-टांकी शब्द सामान्यतः जोड़ने के अर्थ में प्रयुक्त होता है, लेकिन पत्थर को तोड़ने के लिए छेनी से चिह्न बनाने को, टांकी मारना कहा जाता है) भी इसी प्रकार का स्थान है।

आठवीं से तेरहवीं सदी तक, समाजार्थिक दृष्टि से या राजनैतिक दृष्टि से भी देखें तो यहां लगातार निर्माण का क्रम विद्यमान है। यहां छोटे-बडे, अलग-अलग देवी-देवताओं के मंदिर हैं और ढेरों अवशेष, इससे निष्कर्ष निकालने में कोई कठिनाई नहीं कि यहां धार्मिक सामंजस्य रहा है। यहां प्रभावी राजनैतिक शक्ति ने सभी को उदार स्वीकृति दी थी। सभी धर्म-सम्प्रदाय के मानने वालों के साथ उनकी सहमति थी कि वे वहां निर्माण करा सकें। डीपाडीह में रोचक एकाश्मीय लघु मंदिर भी है, जो संभवतः मंदिर निर्माण कराने की मान्यता-पूर्ति के लिए हैं।

माना जा सकता है कि इस पूरे दौर में डीपाडीह धार्मिक आस्था का केन्द्र बन गया था। स्वाभाविक ही, जो धार्मिक आस्था का केन्द्र होता है वहां ऐसी सामाजिक और आर्थिक गतिविधियां सक्रिय हो जाती हैं। डीपाडीह के लिए ऐसी मान्यताएं रही होंगी कि उस पुण्य क्षेत्र में मंदिरों का निर्माण कराया जाय और अपनी क्षमता, अपने सामर्थ्य के अनुसार मनौती पूरी होने पर, ऐसे छोटे मंदिर उस क्षेत्र में बनवाते रहे होंगे। स्पष्ट होता है कि हर आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक मान्यता के व्यक्ति के लिए यह ऐसा स्थल था, जो हर वर्ग-समुदाय की प्रबल आस्था का केन्द्र रहा और आज भी है।

इस स्थल के उत्खनन से उजागर तथ्यों के आधार पर निष्कर्ष निकलता है कि सोमवंशी, जिन्होंने लगभग सातवीं-आठवीं सदी में सिरपुर जैसा महत्वपूर्ण केन्द्र विकसित किया और इस काल के मंदिरों में सोमवंशियों की एक विशिष्ट शैली की छाप है। इस शैली की दो-तीन उल्लेखनीय लक्षण- तारकानुकृति (स्टेलेट या स्टार शेप्ड प्लान) भूयोजना और स्थापत्य में ईंटों का प्रयोग है, जो डीपाडीह के उरांव टोली, शिव मंदिर जैसे स्थापत्य के अलावा अन्य मंदिरों में भी है। यहां छत्तीसगढ़ के मध्य-मैदानी आरंभिक राजवंश सोम-पांडु काल के कला-प्रमाण है लेकिन परवर्ती काल में 11 वीं सदी ईस्वी के रतनपुर कलचुरियों का राजनैतिक और कला-प्रभाव क्षेत्र व्यापक होने के बावजूद यहां लगभग अनुपस्थित है। यहां की कला त्रिपुरी, जबलपुर के कलचुरि, जो रतनपुर कलचुरियों के पूर्वज हैं, से मेल खाती है। नक्शे में देखें तो त्रिपुरी, जबलपुर से शहडोल होते हुए डीपाडीह तक सीधी क्षैतिज रेखा खींची जा सकती है।

प्राचीन स्थलों से विशेषकर खुदाई से प्राप्त होने वाले अवशेषों की दशा देखकर अक्सर किसी दुर्घटना, आपदा की धारणा बना ली जाती है। इस दृष्टि से डीपाडीह में उजागर हुए पुरावशेषों, कलाकृतियों, संरचनाओं को समझने का प्रयास करें तो बहुत सारी अनकही कहानी साफ तौर पर समझी जा सकती है, जिसे यों समझ पाना शायद ही संभव हो।

सामत सरना मंदिर के मंडप के बाहिरी भाग में नन्दी की प्रतिमा है, वह अपनी मूल स्थिति से थोड़ा टेढ़ा, खिसका हुआ है, जो साल के बड़े पेड़ की जड़ों के कारण है। अंदर मंडप में दोनों तरफ आदमकद मूर्तियां हैं। जिसमें विष्णु, महिषासुरमर्दिनी, कार्तिकेय की बहुत सुंदर मूर्तियां साथ ही वराह अवतार की मूर्ति है। ये सभी मूर्तियां खुदाई के दौरान मुंह के बल पड़ी हुई मिलीं थीं, जिससे उनके मूल स्थान को समझने में कोई कठिनाई नहीं हुई, इन मूर्तियों की साफ-सफाई और उपचार कर ठीक उसी जगह पर उनकी चौकी-पादपीठ, जो मूल स्थान पर सुरक्षित थी, पर खड़ा कर दिया। इसी तरह मंदिर के मुख्य प्रवेशद्वार के सामने दोनों द्वारशाखा और सिरदल, मुंह के बल पड़े मिले। एक ही पाषाणखंड वाले सिरदल पर गजलक्ष्मी के बगल का हिस्सा गहरा उकेरा हुआ है जिसकी वजह से वह हिस्सा टूटा और सिरदल के दो टुकड़े हो गये थे। उसे जोड़ने के लिए पत्थर में छेदकर सरिया और रसायनिक उपचार की मदद से दोनों हिस्सों को जोड़ा गया और इसके बाद उसे फिर वापस मूलरूप में खड़ा कर दिया गया।

डीपाडीह के लिए अनुमान किया जा सकता है कि 13वीं-14वीं सदी ईसवी के बाद स्थल की मान्यता वैसी नहीं रह सकी, जितनी 500 सालों में यानि 8वीं से 13वीं सदी ईसवी तक। धीरे-धीरे स्थल उपेक्षित होता गया, रखरखाव अभाव हुआ और संरचनाएं जर्जर होकर गिर गईं। डीपाडीह के लिए पूरे भरोसे से कहा जा सकता है कि वहां न कोई तोड़फोड़ हुई न भूकंप आया था।

डीपाडीह में पुरानी बावड़ियां हैं, एक छोटा सा रानी पोखर है, उसी तरह सामत-सरना मंदिर के पिछवाड़े एक बावली है। उस बावली को साफ करने की चर्चा बार-बार काम करने वालों और गांव वालों के बीच होती थी, काम शुरू हुआ तो आसपास के गांवों से लोग आने लगे तो पता लगा कि उस बावली में बहुत सारा धन गड़े होने की बात कही जाती है। बात का रस लेते हुए हमलोगों ने पूछा कि क्या मान्यता है, खजाना कितना नीचे है? किसी ने कहा एक पोरिस, पुरुष प्रमाण गहराई में, किसी ने कुछ और। पुरातत्वीय दृष्टि से जांच के लिए एक कोने पर ‘पिट’ लिया कि किसी तरह के पुरावशेष की क्या संभावना हो सकती है? वहां प्राकृतिक भराव वाली मिट्टी ही निकली, लोगों को भी इससे तसल्ली हो गई।

किसी अल्पज्ञात, नए-नवेले से पुरातात्विक स्थल पर बात करना, तब चुनौती जैसा होता है, जब आप विशेषज्ञ की भूमिका निर्वाह करने बैठे हों। डीपाडीह पर बात करते हुए मुझे यह महसूस हुआ था। यह स्थिति कुछ अन्य स्रोत-सामग्री का उदारता से इस्तेमाल करने की छूट मिलती है और स्थापना में पूर्व संदर्भों का दबाव नहीं रहता, उपलब्ध तथ्य-कारक और जानकारियों-प्रमाणों के आधार पर जिस अधिकतम स्तर तक तार्किक संभावना-स्थापना चाहें, प्रस्तुत की जा सकती है यहां ऐसा ही प्रयोग-प्रयास है , क्योंकि सरगुजा के इस अंचल का लिखित-अभिलिखित प्रमाण नहीं मिलता जिस आधार पर इससे अधिक कुछ तय किया जा सके। शिल्प-स्थापत्य परम्परा का सातत्य भी अधिक मदद नहीं करता। डीपाडीह किसी दिशा से प्रवेश करें, पहुंच कर हर बार लगता है, ये कहां आ गए हम! यहां भौगोलिक-ऐतिहासिक दृष्टि से पाल वंश और शिल्प परम्परा-साम्यता की दृष्टि से शरभ-सोमवंशी और त्रिपुरी कलचुरियों की साफ-साफ छाप जरूर पहचानी जा सकती है।

Friday, September 10, 2021

Sitabengara-Jogimara

सरगुजा के उदयपुर-रामगढ़ के पक्ष में कालिदास के रामगिरि होने का दावा है, रामवनगमन के दौरान सीता-राम के विश्राम की मान्यता है और इसे प्राचीनतम नाट्यशाला भी कहा गया है। इस पहाड़ी पर मानव-निर्मित गुफाएं सीताबेंगरा-जोगीमारा कई तथ्यों के कारण उल्लेखनीय और महत्वपूर्ण है। पिछले कोई डेढ़ सौ साल से इस पर बहुतेरे अध्येताओं, विशेषज्ञों ने प्रकाश डाला है, जिनकी जानकारी इन्हीं पृष्ठों पर आगे दी जाएगी। यहां ऐसी ही जानकारियों के आधार पर प्रस्तुत है किशोर दिवसे जी की अनुमति से उनका लेख, कई तथ्य और स्थापनाओं से सहमति न होने के बावजूद, इसे महत्वपूर्ण मानता हूं। यह अंग्रेजी अखबार मध्यप्रदेश क्रानिकल, रायपुर में 1 मार्च 1998 को प्रकाशित हुआ था-

Ancient Amphitheatre of Asia : Sitabengara & Jogimara caves
 
Chhattisgarh had been and is still a top starrer as for as its flora, fauna , bio- diversity, and archaeological heritage is concerned. Thevolcano of questions every time errupts are -low political will of Chhattisgarh govt. to make and strenghthen tourist circuits, feeble vox populi to enhance CG tourism chart prominent on national map, and state industrialists to participate actively for the development on tie-up basis. By - gone days are OK but its high time to make Chhattisgarh state's amazing archaeological heritages glittering stars...., and of course- Ancient Amphitheatre of Asia : Sitabengara & Jogimara caves must be placed on top priority.

Abundance of buried treasure and antique edifices above the ground are hidden in the depths and remote unidentified locations of the archeologically fertile belt of Bilaspur division in Chhattisgarh. Sitabengara and Jogimara caves are one of them, which are of utmost archaeo-historical importance. The caves are located about 175 kms from Bilaspur in the Ramgiri Mountain near Lakhanpur in Ambikapur district. The golden glittering fact about Sitabengara and Jogimara caves is that 'It is most ancient amphitheatre of Asia.'

Sitabengara and Jogimara caves are lying side by side and one said to be of 3rd century BC. Sitabengara is considered as 'Natyamandapam' and Jogimara is the 'green room' of the participant artists and dancers. The archaeologists opine that 'it is an amphitheatre related to Mahakavi Kalidasa more than 2000 years back.' Intensive research on it may put some more light on its historical and archaeological importance. Sitabengara is the ancient amphitheatre of India and most probably Asia. Infact, it is not related to any particular religion, but the wall paintings in the caves reflect the development of folk art and literature alongwith the socio-economic infrastructure prevalent during the then period.

Sitabengara is said to be the largest cave used as an amphitheatre. The gallery and the rocky staircase are carved by cutting mountain. The outwardly appearance of Sitabengara is same as described in the ancient legendary writings of Bharat muni the father of ancient dramatics.

The cave Natyamandapam is 44X15 feet in size. The walls are vertical, entrance is oval and it is 6 feet in height. Going inwards, the height diminishes to 4 feet. The cave’s internal structure was used as a dais of the theatre in the ancient times. The amphitheatre is formed in 3 tier system and each tier is of 7.5 feet in height. The level of all the three manchas is separated by 21 feet. In front of main entrance, lies stone carved moon-shaped platform facing outwards. It’s presumed that the dramatic performances and other programmes were being convened in this ancient premises. This platform had a capacity of accommodating 60 persons atleast.

The front elevation of the cave is quite simple with no carvings which were prominent during the time of Ashoka (Maurya dynasty). The archaeologists opine that this cave must have been formed before the formation of the cave of Lomash Rishi i.e. during the Maurya period. There are two holes tying in the close vicinity which are formed by cutting the surrounding platform of the entrance. These holes must have been used to fix the poles. It is presumed that to avoid inconvenience in autumn and rainy season it had an arrangement to hang curtains on it. In that case the spectators must be sitting on the broad plateau and the chorus singers /performers must have been in action by the side of it. It may be said that the curtain tradition might have been originated from India. According to Dr. Katare- 'this amphitheatre might have been used mainly for drama and dance performance'. Hence, the cave must be considered unparallel and ancient in the history of Indian culture.

According to the ancient believes the caves are also related to Yogika’s (Sura-Sundari) who participated in the Nritya natika. Some archaeologists opine that Sitamark Jogimarhi of Orissa and Natyamandapam of Pulgal caves near Nasik, all the sites were used by the tribal communities at that time. Bharat muni in his Natyashashtra, has mentioned and described Vikrishta Natyamandapam. In that context if we study Sitabengara Jogimara, we may conclude that these caves also come under Vikrishta category. The exterior decoration of Natyamandapam is by vivid means and the interior decoration was done be using mud-powder, and coatings of cow-dung and stone powder. These patterns of stone wall coatings are still seen on the walls of the caves.

According to the pundits of dramatics, the play the Uttar-Ramcharitra of Mahakavi Bhavabhuti was staged here during the time of Yashawardhan. The inscriptions found in Pali disclose Devideen, an artist from Kashi had participated in the play here and co-artist was a daasi Sutanuka. As far as its history relates back Shri Lochan Prasad Pandey (Late) opine that this amphitheatre was formed about 2000 years back where plays were staged on the northern side of Sitabengara cave's entrance. Just below the caves of roofing following narration in Magadhi (Pali) is inscribed of which each line is 3 feet in length, and each letter sizes about 2.5 inch which are faded now. The inscribed couplet is mentioned herewith.

"aadimayanti hridayam sarawagurukawayo ye shatayam phale wasantiya ha bhawanee bhute kridaspitam awam alagete"

The researchers have interpreted the couplet as 'Enlightens the heart so great poets are conferring at night, where the breezes float everywhere…full of humor and music. The breeze embraces the mother jasmine'

It's evident from the above inscription that the cave was not a site of rishis and monks meant for practicing tapa but obviously a major place of cultural and artistic performances. Here poems were recited and plays were staged and were not related to any particular religion or cult, but human feelings.

The interior decorum elevates the cave to the norms being most ancient amphitheatre of Asia. Moreover the overall amphitheatres formation co-relates to that of great theatres in architecture may be due to this similarity. Some Pundits feel that India dramatist has been influence by Greeks while other straightaway deny it.

DANCERS' GREEN ROOM JOGIMARA CAVES 

In the close vicinity of Sitabengara is located Jogimara cave. In fact the caves are no far apart. It measures 30 feet length and 15 feet in breadth with eastern front elevation. In the book entitled 'Bharat Ki Chitrakala' this cave is termed 'Temple of Spring'. The folklore related to it narrate herewith a Devadasi Sutanuka was devoted to God of Spring. It is said that Jogimara was green room made for resting dancers engaged in chorus. The Sutanuka is said to be Nayika of a love story. On the wall of the cave five lines ver is inscribed which is faded down to the passage of years and years.

1. Shutanukanama 2. devdasikya 3. Shutanukanam Devadasikya 4. wankmayiya lahane sheye 5. Devadite namh Lupandase. It means Sutanuka devadasi (about her) A devadasi named Sutanuka, she was flirted by a resident of Varanasi Rupadaksha (make up man)

The Story in the folk lore farm is very much interesting- A devadasi sutanuka was in love with an artiste Devideen breaking all the socio-mythological barriers of their community. Devideen’s heart was also floming with the fire of love in reciprocation. Their feeling of love. were terms formed into this inscription to make their love immortal and never lasting. In contradiction to this thought some historians opine that to expose the love birds game these verse was inserioed so that others are cautious and deta in the future. Had Devideen inscribed the lines, the other colleagues would have washed it off.

Ancient Indian wall paintings are depicted in Jogimara caves. Major portions of these paintings are faded due to the persistent exposure to humidity since last few centuries. Artististic value is not much but it’s being ancient is undoubted and mainly based on mythological themes. Indians have the age old tradition of making Chaitya Vihar, temples. and sculptures by carving stones. Wall paintings were made by plastering the wall with lime. The wall paintings are taken to be during 300 century BC. Roof of the cave is painted with the figures of flowers, three horses two wheeled hooded chariot, figures of elephants and soldiers. The wall paintings depict human forms wild life & beautiful natural scenes.

Left Human forms are coloured red with outer black linings. The eyes are coloured white and hairs are styled in hairdo (Juda) form. The line sketches of horses ,birds and trees are also lined red which throw light on the social life during that period. The drawings of circles and different geometrical shapes are coloured red and yellow. In a few places fish and crocodile forms are also visible, One important fact to be mentioned here is that some paintings are replaced with new ones.

According to Dr. Hiralal these wall paintings are related to Bundela period while Ramkrishnadas opine the paintings to be of Jain period which were paintings by the order of Kaling King Kharwel.

Most astonishing fact for the the researchers and academicians about these caves is that it may be related to Mahakali Kalidasa’s poetic creations. In the world famous epic of Kalidasa Meghdootam its mentioned that Yaksha took shelter in Jogimara cave where he sent his message of his being loneliness to his beloved by sending to clouds as messengers. The Beautiful heart throbbing sites of natural greenery and Jalakund is mentioned by Kalidasa in Meghdoot. The route described was from Ramgiri to Alkapuri where the clouds acted as messangers that travelled for a long distance. Where the clouds rained on way that very spot which was a panoramic hilly terrain was known as Amrakoot is now called Amarkantaka. It is a widely acclaimed tourist centre of Chhattisgarh with magnifiscent bio-diversity and abundance of medicinal plants. Amarkantak is situated in the north west of Raigarh and North east of Vindhyachal mountain range, On route Ujjain and its 200 kms away from Bilaspur.

The other sight seeing places in the close viscintly and nearby are Kabir Chaura, Vashishtra Gufa, Lakshman Ghogra and few remanants of temples. Tracking up the mountain Ramgiri we find remnament of the main entrance of the fort which is formed by two huge Shilakhand called Pauri Deodhi. Going upstairs is Kabir Chaura. This is a plateau and belonged to Jogi of Ramgarh Dharamdas. Vashistha Gufa is at some distance where Vashistha muni was said to be practicing meditation. Further stairs are there to reach the magnificent Simhadwar. Stattue of Bhairav is lying here with the infront facing towards left. Onwards is Ganesh Seedhi up to Rawan Darbar where Broken scupltures of Rawan, Kumbhakarna and dancers are lying. A narrow pathway from here leads to the top of Ramgiri who the statues of lord Rama, Lakshman and Sita are in a temple. The courtyard of the temple has the statues of flying god Hanuman and lord Shanker. Remanants of three temples are a top the hill. First is of Varundeo (god of rains) Second is totally destroyed but broken pieces of Mahakali, lord Ganesh and other gods and goddess statues are lying here. The third temple lies at the last. The sculptures here are of lord Vishnu, medtating. apsaras, lord Ram with Sita with monkey god Hanuman. According to Mirashi the sculptures can be considered of medieval age in context to the alankars and most prominent feature in the sculptures is that the faces have the image of the tribal’s inhabitant of that period. A few more caves are still at Ramgiri yet to be explored which were the meditation places. One large cave is Laxman Bengara located in the southern mountains of Ramgiri. Folktales narrate that Ram and Laxman during their Vanwas of 14 years stayed here in exile so that not to be noticed during that period.

A small plateau is still there on a resting place and a magnificent natural scenic beauty can be witnessed in front. This is the historical site of ‘Ramgitri’ offering the researchers, tracking and the adventure lovers with abundance and visibity of any thing that is imbibed in environmental charizma. and biodiversity including logical believes, folklores and folktales. Mr.G.L. Raikwar and Mr. Rahul singh, archaeological officers duo took lot of pains for this site. Every year on Ramanami a mela is held here where hundreds of devotees congregate and take a holy dip at Sitakund.

MP government arranges a programme every year in the first day of Ashadha and wonderful cultural programmes are held. But the dark side of the coin of it is that the natural looks of the cave instead of being maintained its natural form its being deterioted by cementing the stair case. Wox popli opines, this pre-historical amphitheatre to be made a tourist spot which is possible only when the archaeological dept .and MP govt takes interest. In addition to this political stalwarts of Bilaspur division which are at present not that much active towards the tourism sector must show keen interest in hidden treasure from this area because lack of adequate funding for the archaeological department. The question at last arises before the intellectuals when do are start digging to regain our lost art and history.

Kishore Diwase
Senior Journalist, Writer, Translator
Pune, Maharashtra,Mobile -09827471743
Mail-id -kishorediwase0@gmail.com

Saturday, February 4, 2017

इमर

छत्तीसगढ़ में हाथी के पुराने संदर्भों से वाकिफ हूं, एक नाम आठवीं सदी ईस्वी का उद्योतनसूरिकृत ग्रंथ 'कुवलयमाला' है, जिसमें छत्तीसगढ़ के हाथियों का पहला और रोचक उल्लेख मिलता है। मुगल काल में कलचुरियों द्वारा और देशी रियासतों के दौर में राजाओं द्वारा छत्तीसगढ़ के हाथी उपहार में दिए जाने की जानकारी मिलती है। कैप्टन जे फारसिथ की पुस्तक में छत्तीसगढ़ के हाथियों से जुड़े तथ्य और ढेरों रोचक जानकारियां हैं।

अपने सरगुजा प्रवासों में कुछ साल पहले डीपाडीह-कुसमी के रास्ते पर हाथियों का पूरा झुंड हमारे बगल में था और पिछले साल महेशपुर में अकड़ा आमने-सामने मिल गया था। हाथी वालों में समकालीन शरद वर्मा जी, जगदलपुर-बिलासपुर वाले को सपरिवार जानता हूं, माइक पांडेय से मिल चुका हूं, पार्वती बरुआ के नाम और काम से परिचित हूं, अंबिकापुर के अमलेन्दु मिश्र, प्रभात दुबे से भी बातें हुई हैं, वन विभाग के डीएफओ, सीसीएफ साहबान को भी जानता हूं। अपनी इन जानकारियों-सूचनाओं-संपर्कों के बावजूद ठिठका हूं...

पता लगा कि जशपुर-सरगुजा में अब भी, खासकर तपकरा के लोग हैं, जिनका हाथियों से पुश्तैनी रिश्ता है, जो हाथी को रास्ता दिखा देते हैं, बिना झिझक खदेड़ सकते हैं, और अब मुलाकात हुई अंबिकापुर को जल-आपूर्ति करने वाले बांकी बांध पर बसे पहाड़ी गांव गंझाडांड़ निवासी 22 वर्षीय युवक से, लगा कि इसका नाम एंथनी गोंजाल्विस से कुछ कम न होगा, पता लगा कि पिछले दिनों अंबिकापुर शहर में आ गए हाथियों को इन्होंने खदेड़ा था। बाप-दादा को देख-सुन कर सीखा है, हाथी खदेड़ना, हाथी से डर नहीं लगता उसे। हमलोग चर्च के पास खड़े बात कर रहे हैं।

मैं उसका नाम नोट कर रहा हूं, वह दुरुस्त कराता है कि उसके नाम खलखो में ल आधा नहीं पूरा है और वह स्पेलिंग केएच के बदले एक्स यानि एक्सएएलएक्सओ लिखता है, पूरा नाम इमर वल्द श्री रामधनी खलखो (उरांव)। सरगुजा के हाथियों के सिलसिले में इसका नाम मैंने अब तक किसी से नहीं सुना था, लेकिन वह जोड़ता है कि उसके साथ 26 वर्षीय भीखम वल्द श्री चोनहास तिर्की भी थे। इमर, दसवीं तक पढ़े हैं, शायद पास, शायद फेल।

थोड़ी बात 'खलखो' के साथ कुडुख-उरांव बोली पर। खलखो का अर्थ एक पक्षी है, और इसमें ख नुक्ता लगाकर लिखा जाता है। थोड़े उच्चारण भेद से पित्ताशय का अर्थ देने वाला शब्द, जो लगभग खळखो उच्चारित होता है, बन जाता है, लेकिन इन दोनों में ल और ळ की तरह ख के उच्चारण में भी फर्क है तथा लिखने में सामान्यतः पक्षी अर्थ वाला ख नुक्ता सहित और पित्ताशय वाला बिना नुक्ता 'खर्च' में उच्चारित होने वाले ख की तरह है। एक और सरनेम शब्द है 'खेस्स', यानि धान, जिसे अंगरेजी में केएचइएसएस के बजाय एक्सइएसएस लिखा जाता है, इसी तरह के दूसरे शब्द् 'खेंस' (खून) से समझने में मदद मिल सकती है, जो नुक्ता लगा कर लिखा और लगभग 'खबर' वाले ख की तरह उच्चारित होता है। ऐसा ही अन्य शब्द खाखा (नुक्ता वाला, एक्सएएक्सए) है, जो सामान्यनतः 'ओड़ा-खाखा' (यानि चिडि़या-विडि़या या चिरई-चुरगुन) इस्तेमाल होता है।

इस तरह 'खलखो' और 'खेस्स ' का ख (जो खळखो और खेंस के ख से भिन्न है), संभवतः भाषाविज्ञान में काकल्य स्पर्श यानि Glottal stop कही जाने वाली ध्वनि वाला है, जिसे 'क्स' (एक्स वाले) जैसे उच्चारण, जिसमें ह जैसी स्पर्शरहित कंठोष्ठ्य ध्वनि भी है, से बेहतर स्प‍ष्ट किया जा सकता है, इसलिए अंगरेजी में 'खलखो', 'खेस्स' या 'खाखा' जैसे शब्दों को लिखने के लिए यह केएच के बजाय एक्स अधिक संगत होता है। यह जोड़ना आवश्यक होगा कि कुडुख को भी केयूआरयूएक्स भी लिखा जाता है और झारखंड के डा. नारायण ओरांव द्वारा कुडुख के लिए बनाई गई वर्णमाला तोलोंग सिकी (कुँड़ुख़ और तोलोङ सिकि, लिखा जाता है) में भी दो ख हैं, बिना नुक्ता वाला ख, जिसे केएच लिखा जाता है और दूसरा नुक्ता वाला, जिसे एक्स लिखा जाता है। कहा जा सकता है कि वस्तुतः कुडुख की इस वर्णमाला में नुक्ता सहित लिखा जाने वाला ख, जो अगरेजी के 'एम' की तरह लिखा जाता है, की ध्वनि ही एक ऐसी है, जो नागरी में संभव नहीं है और जिसके कारण अलग लिपि की आवश्यकता महसूस की गई होगी।

मेरे साथ जगदेवराम भगत हैं, उरांव भाईचारा पनप गया, इमर अधिक सहज हो गए हैं। वे यह भी बताते हैं कि गंझाडांड़ के लगभग सभी निवासी उरांव और कोरवा इसाई बदल गए हैं, लेकिन वे और उनका परिवार नहीं। जाने कैसे दोनों ने बिना किसी प्रसंग, जान लिया है कि दोनों अनबदले उरांव हैं। प्रकृति और परम्परा से जुड़े, जल-जंगल-जमीन से अभिन्न।

हाथी का सामना होने पर हमने अपने लिए टिप्‍स मांगे, इमर ने कहा, बहुत आसान। अक्‍सर होता यह है कि हाथी पीछे पड़ जाए तो लोग उससे दूरी बनाने के लिए सरपट दौड़ लगाते, भागने की कोशिश करते हैं लेकिन ऐसा करके हाथी से नहीं बचा जा सकता, जबकि करना बस यह होता है कि सीधे भागने के बजाय एकदम दायें या बांयें भागें, नब्‍बे अंश पर मुड़कर। हाथी ऐसे नहीं मुड़ पाता, आप तक नहीं पहुंच सकता और आप सुरक्षित रह सकते हैं।

इमर, बांध से मछली पकड़ते हैं। अफसोस सहित बताते हैं कि एक बार इसी जाल में बदक फंस गई थी, कैसी थी पूछने पर जेब से स्मार्ट फोन निकाल कर 'रेड क्रेस्टेड पोचर्ड' की तस्वीर दिखा देते हैं। यहां आने तक जमा सूचनाओं की गठरी अब इन बातों के बाद बोझ लग रही है। घंटे भर के साथ में इमर के बोले गए 20-25 वाक्यों से कितना कुछ सुन-जान लिया है। उम्मीद है चुप्पे-से इमर, अगली किसी लंबी मुलाकात में मुखर होंगे और वह मेरे लिए अपनी समझ झाड़-पोंछ करने का बेहतर अवसर होगा।