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Wednesday, March 19, 2025

बस्तर में संग्रहालय

बस्तर के अखबार ‘दण्डकारण्य समाचार‘ की 1959 से 2003 तक की 45 वर्षों की यात्रा का संकलन है ‘जिज्ञासा‘। इसमें दस्तावेजी महत्व की जानकारियां हैं। संग्रहालय विज्ञान से जुड़े होने के कारण इसकी दो प्रविष्टियां मेरे लिए खास हैं- पहली 1961 में उद्घाटित पुरातत्वीय संग्रहालय (पेज-25) और दूसरी जगदलपुर में 1964 में नृतत्वशास्त्रीय संग्रहालय (पेज-70) के प्रस्ताव पर कार्यवाही का निम्नानुसार है- 

Vol 2 No. XXXIX Jagdalpur, Sunday, February 12, 1961 

Kabir Inaugurates Archeological Museum 

Jagdalpur, Feb. 5. The Minister for Scientific Research and Cultural Affairs Professor Humaun Kabir told a packed gathering here that the object of the Government was to study Indian Archeology throughout India and Baster would now also be put under this programme. 

He was inaugurating a small Archeological Museum housed in the District Collectorate on the afternoon of Feb. 4. The function was orgins by the District Publicity and Social Welfare department with an initial collection about 20 sculptures. 

"Bastar is a land of fascinating interest having influences from different parts of the country with manifestations of diversity of culture besides its unique place in the sphere of Anthropology, Geology and the ike and rich also in archeological remains scattered all over the disrict with thousands of years of history behind them," Shri Kabir said, Announcing a token grant of Rs. 1000/00 for the museum, the Minister said that while the departments of Anthropology and Gelogy are already at work at Bastar, the Government would step in the archelogical sphere also when time was ripe for it and appreciated the move taken locally towards this. 

speaking at length of cultural heritage of India Prof. Humayun Kabir said that researches now being carried & linguistic survey of India being made from next year would have more insight into this. The Minister advised the district to apraoch Government of India for a technical Institute to be followed by Polytechnic Institution for the benifit of tribals. Later in the evening Prof. Humayan Kabir paid visit to Republic Day Exhibition and gave away prizes to the competitors in the presence of a t gatheringe. He felt happy at the development programmes undertaken at Bastar and laid stress on placing emphasis on spread of education which alone would lead our country to progress, he said. 

On both these functions, in the absence of the Collector, the Duputy Collector Sri P.G.Y. Mudaliar who welcomed the Minister and introducted him to gathering stated in brief the background under which the functions were held and later proposed a vote of thanks for the chief guest in glowing terms. He also thanked all those connected with the successful organisation of the functions. 

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Voll. V No. 40 Jagdalpur, Sunday April 26, 1964 

Anthropological Museum at Jagdalpur 

JAGDALPUR, April 14, 1964. The Government of lndia, it is understood, is examning a proposal for opening of an Anthropological Museum at Jagdalpur, the Hdqrs of Bastar District. The Directorate of the Anthropological Survey of India, Calcutta, had recently deputed Doctor N.C. Chowdhary, the Curator of Indian Museum to Jagdalpur for survey and to find out this possibility. This survey by the Anthropological Survey of India was undertaken in view of a request from the Ministry of Education, Government of India inviting comments and suggestions on the proposal immediately and also asking for a comprehensive scheme with full financial involvement in case the directorate support the proposal, it is very reliably learnt. 

Shri Sunderial Tripathi of the Anthropological Institute Jagdalpur, it is also gathered, met the Education Minister Shri M.C. Chagla in New Delhi early last March and put before him the fact that Bastar area had many interesting historical finds relating to tribals, finds of early 9th to 15th Century A.D. and urged the desirability of establishing an Anthropological museum at Jagdalpur Maintained directly by the Central Government which would prove very useful to the country. 

Doctor Chowdhary who was here for four days left for Calcutta and is likely to submit his comments and suggestions shortly to the Directorate.

Tuesday, March 18, 2025

प्रवीरचंद्र भंजदेव - कालक्रम

बस्तर के अखबार ‘दण्डकारण्य समाचार‘ की 1959 से 2003 तक की 45 वर्षों की यात्रा का संकलन है ‘जिज्ञासा‘। इसमें आई दस्तावेजी महत्व की जानकारियों में पेज 84 पर वर्ष 7 अंक 37 जगदलपुर, रविवार 27 मार्च 1966 के साथ ‘राजमहल में गोली कांड, पुलिस की गोली से प्रवीरचंद्र भंजदेव का निधन‘ प्रकाशित है और इसी क्रम में पेज 85-86 पर उनके जीवन की महत्वपूर्ण तिथियां इस प्रकार छपी हैं- 

स्वर्गीय प्रवीर के जीवन की महत्वपूर्ण तिथियां 

२५ जून १९२९-प्रवीरचंद्र भंजदेव का शिलांग में जन्म 
९ मार्च १९३४-प्रवीर के लघु भ्राता वर्तमान महाराजा श्री विजयचंद्र भंजदेव का इंग्लैंड में जन्म। 
फरवरी १९३६- प्रवीर की माता महारानी प्रफुल्ल कुमारी का इंग्लैंड में देहावसान। 
१६ जुलाई १९४७- प्रवीर का विधिवत राज्याभिषेक। 
१ जनवरी १९४८- बस्तर का रियासत का विलीनीकरण। 
१९५३-शासन द्वारा प्रवीर की सारी संपत्ति कोर्ट आफ वार्डस के अधीन करने की घोषणा 
१९५५- प्रवीर द्वारा आदिवासी किसान मजदूर संघ की स्थापना। 
१९५७- प्रवीर का जिला कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में निर्वाचित होना तथा बाद में आम चुनाव में विधायक निर्वाचित होना। प्रवीर के पिता स्व. श्री प्रफुल्लचंद्र का निधन। 
१९५८- प्रवीर द्वारा आदिवासी सेवा दल स्थापना। 
१९५९- श्री प्रवीर द्वारा विधानसभा की मान्यता से त्यागपत्र। 
११ फरवरी १९६१-धनपूंजी गांव में प्रवीर की गिरफ्तारी
 
१२ फरवरी १९६१- शासन द्वारा प्रवीर गतिविधियों तथा उनके वक्तव्यों को जनविरोधी बताते हुये उनकी मान्यता रद्द की घोषणा। 
२७ मार्च १९६१- तोकापाल अश्रु गैस कांड। 
३१ मार्च १९६१- लोहंडीगुड़ा तथा सिरिसगुड़ा में आदिवासियों द्वारा प्रदर्शन तथा प्रवीर की रिहाई की मांग। लोहंडीगुड़ा में पुलिस द्वारा आदिवासियों पर गोली चालन। 
२६ अप्रैल १९६१- प्रवीर की नरसिंहगढ़ जेल से रिहाई, शासन द्वारा नियुक्त सलाहकार बोर्ड द्वारा प्रवीर की गिरफ्तारी को अवैध निरूपित किया जाना। 
४ जुलाई १९६१-प्रवीर का पाटन की राजकन्या शुभ राजकुमारी से विवाह (प्रवीर द्वारा महारानी वेदवती देवी नामकरण) 
अक्टूबर १९६१- प्रवीर द्वारा १४ वर्षों की लंबी अवधि के बाद पुनः विधिवत रथारुढ़ होकर दशहरा समारोह का नेतृत्व (इसके पूर्व वे १९४७ में रथारुढ़ हुये थे।) 
नवंबर १९६१- प्रवीर द्वारा ‘राजा मड़ई‘ का पुनः शुभारंभ (राजा मड़ई १९३७ से बंद थी) 
दिसंबर १९६१-प्रवीर दूद्वारा ‘महाराजा पार्टी‘ की स्थापना। 
फरवरी १९६२- कांकेर तथा बीजापुर के अतिरिक्त शेष सभी क्षेत्रों से महाराजा पार्टी के प्रत्याशियों की विजय। 
६ अक्टूबर १९६२- महारानी वेदवती देवी का बस्तर आगमन। 
८ तथा ९ अक्टूबर १९६२- महाराजा प्रवीर तया महारानी वेदवती देवी, दोनों के द्वारा रथारुढ़ होकर दशहरा समारोह का नेतृत्व। 
८ मई १९६३-जगदलपुर राजमहल में प्रवीर की संपत्ति कोर्ट आफ वार्डस से मुक्त करने के लिये आदिवासियों द्वारा कोर्ट आफ वार्डस के कार्यालय पर हमला। 
९ मई १९६२- महारानी वेदवती द्वारा महल का त्याग तथा पाटन को प्रस्थान। 
१० मई १९६३- म. प्र. शासन द्वारा प्रवीर की संपत्ति कोर्ट आफ वार्डस से मुक्त करने का निर्णय। 
३० जुलाई १९६३- प्रवीर की ३० लाख की संपत्ति कोर्ट आफ वार्डस से मुक्त 
१६ नवंबर १९६३- प्रवीर द्वारा दीपावली के अवसर पर दान करते समय रिक्शा चालक मोतीलाल का हाथ काट दिया जाना। 
१९ नवंबर १९६३- मोतीलाल का हाथ काटने के अभियोग में प्रवीर की गिरफ्तारी तथा ५०० रुपये की जमानत पर रिहाई। 
२२ सितंबर १९६४- हाथ काटने के अभियोग में प्रवीर को १००० रु. जुर्माना तथा १८ माह की सख्त कैद की सजा सुनाया जाना एवं प्रवीर द्वारा अपील पेश। 
१२ जनवरी १९६५- प्रवीर द्वारा दिल्ली जाकर शांतिवन में अनशन। गृहमंत्री श्री नंदा द्वारा आश्वासन दिये जाने पर अनशन की उसी दिन समाप्ति। 
२ नवंबर १९६५-खाद्य संकट से प्रभावित सैकड़ों आंदिवासियों का महल में जमाव। 
१६ नवंबर १९६५-आदिवासी महिलाओं द्वारा रुपये में चार सेर चावल तथा सोने की लापता छड़ी की मांगों को लेकर जिलाधीश कार्यालय में धरना तथा प्रदर्शन। 
१२ दिसंबर १९६५- प्रवीर द्वारा सोने की लापता छड़ी की मांग लेकर अनशन। 
१६ दिसंबर १९६५-कमिश्नर श्री वीरभद्रसिंह के आश्वासन पर अनशन समाप्ति। 
४ फरवरी १९६६-केशरपाल में लेव्ही वसूली के समय उपद्रव। पुलिस द्वारा आदिवासियों पर अश्रु गैस लाठी चार्ज। 
८ फरवरी १९६६- लेव्ही वसूली के प्रश्न पर प्रवीर द्वारा विजय भवन में अनशन आरंभ। 
११ फरवरी १९६६- शासन द्वारा उचित कार्यवाही का आश्वासन दिये जाने पर अनशन की समाप्ति। 
१८ मार्च १९६६- राजमहल में पुलिस द्वारा आदिवासियों को पीटे जाने पर आदिवासियों द्वारा तीर कमान संभाल लिया जाना प्रवीर के बीच बचाव से अप्रिय घटना का टल जाना। 
२५ मार्च १९६६- आदिवासी कैदियों को न्यायालय ले जाते समय अन्य आदिवासियों द्वारा पुलिस दल पर तीर फेंकना जिसमें एक सूबेदार सहित ९ पुलिसमैन आहत (सरदार अवतार सिंह) की मृत्यु। पुलिस द्वारा आदिवासियों को महल में घेरकर गोली चालन। आधी रात तक संघर्ष। 
२५ मार्च १९६६- रात्रि के समय गोलियों से प्रवीर की महल में मृत्यु। 
२६ मार्च १९६६- प्रवीर का संध्या समय अंतिम संस्कार।
-इस्माईल जगदलपुरी

Friday, February 7, 2025

शब्दों से परे कविता

कविताओं की मेरी समझ और रुचि संकीर्ण है, मगर परिचितों की कविता पढ़ने को अवश्य उत्सुक रहता हूं। एक खेल-सा होता है कि रचनाकार का व्यक्तित्व जैसा प्रकट है और जिस तरह परिचित हूं, उसकी रचनाओं की संगति कितनी बैठती है और फिर वह ऐसा कवि हो, जो प्रशासनिक अधिकारी हो और जिसके मातहत काम किया हो तब यह खेल और भी रोचक हो सकता है, कुछ-कुछ रोमांचक भी, मगर अंतराल लंबा हो तो यह रोमांच वैसा नहीं रह जाता और कवि-पाठक के रिश्ते का सहज निर्वाह संभव हो जाता है। यही स्थिति बनी त्रिलोक महावर जी की पुस्तकें पा कर। 

उनकी चार पुस्तके हाथ में हैं- ‘शब्दों से परे‘-2018, कविता का नया रूपाकार‘-2020, ‘नदी के लिए सोचो‘-2021 दूसरा संस्करण, ‘आज के समय में कविता‘-2022। 

‘शब्दों से परे‘ उनकी चयनित कविताएं हैं, आवरण शशांक का है, जिन्होंने उनकी कविताओं पर विमर्श की पुस्तक कविता का नया रूपाकार‘, जिसमें उनके संग्रह ‘शब्दों से परे‘ और ‘हिज्जे सुधारता है चाँद‘ पर केंद्रित विमर्श हैं, के लिए चयन किया है, संभव है कि ‘शब्दों से परे‘ की कविताओं के चयन में भी उनका मशविरा रहा हो। ‘आज के समय में कविता‘ भी उनके संग्रह ‘शब्दों से परे‘ से संबंधित है, जो उसके विमोचन पर एक सत्र में आयोजित परिचर्चा का दस्तावेज है, जबकि ‘नदी के लिए सोचो‘, उनका अन्य कविता संग्रह है। 

‘नदी के लिए सोचो‘ की कुछ कविताएं ‘शब्दों से परे‘ में भी हैं। कविताओं में बेतवा, इंद्रावती, तमसा, यमुना, बैनगंगा आदि नदी है, चांद के साथ और जंगल-दरख्त भी। नदी दुबलाती है, सिकुड़ती है, मौन रहती है, उसकी कमर कुछ ज्यादा ही झुक जाती है, कभी नवयौवना भी है, नदी रोती भी है, नदी सिसकती है, अब सपने में आती है, जैसे शब्द, पाठक को शब्दों से परे सहज ले जाते हैं। पर्यावरण के हालात भी कवि को रचने के लिए बाध्य करते हैं। ‘शब्दों से परे‘ में रूमानी कविताएं भी हैं और कम शब्दों में बात कहने के हुनरमंद, इस संग्रह की अंतिम और लंबी कविता ‘सिक्के की आखिरी साँस में मानों अपनी स्मृति के सारे पड़ाव को चवन्नी के बरअक्स देख-दिखा लेना चाहते हैं। 23 पाद टिप्पणियों वाली कविता, बस्तरिया भाषा-संस्कृति के शब्दों से अभिव्यक्त, कवि की तरल स्मृति का प्रवाह जैसा है। 

सीधे, सपाट बात कह कर असर पैदा करना, जैसे स्वयं शीर्षक ‘नदी के लिए सोचो‘ भी, इसे समीक्षकों द्वारा कितना काव्य माना जाता है, पता नहीं, लेकिन मन को छूता जरूर है। मगर नामवर सिंह, विनोद कुमार शुक्ल, राजेश जोशी, सतीश जायसवाल, राधेलाल विजघावने, राम अधीर, तेजिन्दर, शशांक, रामकुमार तिवारी, रमेश अनुपम, संजीव बख्शी, रऊफ परवेज, लक्ष्मीनारायण पयोधि, नारायण लाल परमार, विजय सिंह, सतीश कुमार सिंह नथमल शर्मा, सुधीर सक्सेना, शाकिर अली जैसे मर्मज्ञ और सुधिजन, इन कविताओं का मूल्यांकन कर चुके हैं, फिर और कुछ कहने को बस इतना कि मेरा भी वोट, इन कविताओं को। 

कविता ‘कहि देबे संदेश‘ की आखिरी पंक्तियां हैं- रोटी की आस है/ पानी की प्यास है/ धरती उदास है‘ मगर कवि यह भी मानता है कि- ‘ठिठुरती हुई जिजिविषा को भरोसा है/ एक दिन नदी फिर बहेगी/ धूप के साथ-साथ‘।

Saturday, September 17, 2022

खैरागढ़ ताम्रपत्र

बात 1989-90 की है। हमलोग रायपुर विश्वविद्यालय में आचार्य रमेन्द्रनाथ मिश्र जी के परिसर स्थित प्राध्यापक आवास तथा विश्वविद्यालय के शिक्षण विभाग गए थे। वहां हुई दो खास बात याद है पहली कि शिक्षण विभाग में चर्चा के दौरान पता चला कि इस वर्ष एम.फिल. में 36 विद्यार्थी हैं तो उनके शोध निबंध के लिए विषय तय करने में सब की एक राय बनी कि प्रत्येक को छत्तीसगढ़ के 36 में से एक-एक गढ़, विषय यह ध्यान रखते हुए दिया जाए कि विद्यार्थी उस अंचल का निवासी या उससे परिचित हो।

यहां संदर्भ दूसरी बात का है, वह यह कि मिश्र जी ने अपने निवास पर एक ताम्रपत्र दिखाया। बाकी लोग चर्चा करते रहे, मैंने उनकी अनुमति से वहीं इसका प्रारंभिक पाठ तैयार कर लिया। इस पाठ को सुधार कर अच्छी तरह संपादित कर प्रकाशित कराने का विचार था, मगर ऐसा करना रह गया। पिछले दिनों मेरे द्वारा तैयार किया गया पाठ मिला तो फिर खोजबीन में लगा।

इसका परिचयात्मक प्रारंभिक प्रकाशन शोध पत्रिका ‘प्राच्य प्रतिभा‘ Journal of Prachya Niketan, Bhopal Vol.-V, No.-2, July 1977 में हुआ था। मालूम हुआ कि यह संक्षिप्त परिचय सहित अब इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ के संग्रहालय में प्रदर्शित है। इनमें आई जानकारी अंशतः उपयोगी मगर, दोनों अशुद्धियों के कारण भ्रामक है। साथ ही इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ के शोध जर्नल ‘कला-वैभव‘, अंक 18-19 वर्ष 2009-10/2010-11 में पृष्ठ-90 पर चित्र सहित संक्षिप्त विवरण डॉ. मंगलानंद झा ने प्रकाशित कराया, जो उपरोक्त चित्र में आई जानकारी के ही अनुरूप है, मगर उसमें ताम्रपत्र की लम्बाई साढ़े 46 सें.मी. व चौड़ाई 31 सें.मी, कुल वजन 1 किलो 974 ग्राम उल्लिखित है। ‘प्राच्य प्रतिभा‘ में लेखक के नाम की त्रुटि के अलावा ताम्रपत्र का आकार भी गलत छपा है। ताम्रपत्र का आकार खैरागढ़ विश्वविद्यालय की जानकारी में भी अशुद्ध है, मगर इस संबंध में श्री चौरे ने स्पष्ट किया कि ताम्रपत्र का वास्तविक आकार 48X30 सेंटीमीटर है। उक्त ताम्रपत्र का चित्र श्री मिश्र के निवास पर उपलब्ध है। उन्होंने कृपापूर्वक उस चित्र से प्रति तैयार करने की अनुमति दी, जो यहां नीचे है। आप महानुभावों के प्रति आभार।

ताम्रपत्र का पूरा पाठ साथ ही इसका संपादन भी संभवतः अभी तक नहीं हुआ है। इसमें विलंब न करते हुए, रुचि रखने वाले अध्येता, जो इसे प्रकाशित भी करा सकते हैं, ऊपर फोटो, जिससे पाठ देखा जा सकता है और नीचे 1989-90 में मेरे द्वारा तैयार पाठ की हस्तलिखित प्रति का चित्र तथा पंक्तिवार पाठ-टेक्स्ट, जिसे शुद्ध करते हुए, संपादित कर प्रकाशित किया जाना है, प्रस्तुत है।

यतो धर्मश्ततोजयाः
श्री
श्री श्री चन्द्रबंसी (याने) सोवनंसी कात्कीयवंस गंगवंसी राजओं का लेख

(पंक्ति 01) सोमबंशी राजाओं के बंस से जरासंघ के पुत्र शहदेव के सौमापी नामक पुत्र होये फेर इस तरह वसावली चालु हुई श्र्सुत
(पंक्ति 02) वान अयुता निर तीत्र सुफत्र ब्रहस्त करमा सु स्रुमद्रासेन मुमत रावल सुनीत सत्यजीत विस्वजीत रीपुजयं ये सव चंद्र
(पंक्ति 03) वंसी कलीजुग के १००० वर्स तक राज करे हैं वाद रीपुंजय नामक राजा से इनकी वंसावली चालु है इस कुल का मुख असथा
(पंक्ति 04) न हस्तनापुर का था जो मुसलमानों के चड़ाई के कार्ण बीर विक्रम देव राजा हस्ततान्पुर छोड़ कर मद्रास की ओर करना
(पंक्ति 05) टक में विक्रमी सम्वत् ८८२ में बुनीयाद डालकर राज अस्थापीत कीये जीन्के पुरत्र प्रताप रुद्रदेव जगदीश पुरी आये
(पंक्ति 06) और चन्दसेखर सुरजवसी से वीजै कर राज प्राप्त कीये इन्के तीन पुत्र प्रथम पुत्र बोधकेसरी देव ७१ वर्स पुरी
(पंक्ति 07) का राज भोग्य किये कीये दुतीये पुत्र कातकी प्रताप राद्रदेव मंन्द्रास में राज कीये इन्के वंसज भीमसेन
(पंक्ति 08) देव मुसलमानी परवर्तन में विक्रमी सम्वत ११८८ सुभ पक्षे भाद्रोपदेमा शापच्चोरिध झूंसी
(पंक्ति 09) के तर्फ जात्रा कर राज्य कीये त्रितीये पुत्र कात्की प्रताप रुद्रदेव नामक राजा का भाई आन्यम
(पंक्ति 10) राज उस अस्थान को छोड़ औरंगल यानी वारगल में आ बसे थे जब मुसलमानों ने इस अस्थान पर चड़ा
(पंक्ति 11) ई की तब अन्यमराजा बस्तर को चला आया और वहाँ पर राज अस्थापीत कीया जिसके वंसज
(पंक्ति 12) हम्मीरदेव उर्फ येमी राजदेव महाराजा हुए तीन्के पुत्र भैराजदेव तीन्के पुत्र पुरसोतमदेव
(पंक्ति 13) जगदीस जाकर मन्दीर साफ कराकर अपने पुरी राजवंश में शामिल हो मादुला पांजी लिखा
(पंक्ति 14) य जिन्के पुत्र जैसिंहदेव के पुत्र नरसिंहदेव के पुत्र प्रतापराजदेव जीन्के पुत्र जगदीस देव
(पंक्ति 15) जिन्के पुत्र विरनरायदेव इन्के पुत्र विरसिंहदेव इन्की रानी चन्दलिन बदनकुमारी महारानी
(पंक्ति 16) बिशए दीगपालदेव पुत्र प्राप्त हुये ते दिगपालदेव बिबाह कीन बरदी के चन्देल राव रतन राजा
(पंक्ति 17)वो कन्या अजबकुमारी महारानी विशये दो पुत्र उतपन्न हुये प्रथम पुत्र रक्षपालदेव जो ब
(पंक्ति 18) स्तर का राज भोग्य किये ऐ राजा चालक बृहमन का आसेप लेते हुये बंस वल्दकर रक्षा किये
(पंक्ति 19) दुतिय पुत्र अनंगपाल देव जो पुरी पुरसोत्तमदेव के पुष्प पुत्र हो कर सिहावा में शेस साल छिपकर राज किये इन्के पुत्र वीर
(पंक्ति 20) कान्हरदेव उर्फ करनेस्वरदेव जिन्के वंस का यह लेष लिषा जाता है बौध केसरीदेव पुरी नरेश के त्रितीये पुस्त
(पंक्ति 21) में पुरसोतम देव हुये और समुन्द्र की रेनुका से श्री जगनाथ जी के मंदिर को निकालकर सुना सजाकर श्रीकृष्णाजि के
(पंक्ति 22) उस पिंडज को लाकर चन्दन के घरे रामेरष कर अस्थापना की जो पान्डवों के जलाने से बाकी रह गया था वो आोडीया राज थापेतिन
(पंक्ति 23) के पट पुस्त में कर्ज केसरी देव जिन्के पुत्र (दुतिये) पुरसोतमदेव जो अपने जेष्ठ पुत्र सिध्द केसरीदेव को पुरी का राज सर्मपन कर
(पंक्ति 24) कुस्ट रोग्ग ग्रसित सिहावा आये कुन्ड में अशनान कर कुष्ठ नास किये वो सिहावा में रहै दिगपालदेव से बस्तर राजा से अनंगपाल
(पंक्ति 25) देव नामक पुत्र मांग पुस्य पुत्र माने और सिहावा राज प्राप्त कर प्राणांयाम बैकुठ गये अनंगपाल थोड़े दिन छिपकर राज्य
(पंक्ति 26) किये जिन्हें पुत्र वीर कान्हरदेव विवाह कनि भोपालादेवी से विष्यात पुरी से मदत लाये कर श्री साके १२४२ रुद्र नाम
(पंक्ति 27) सम्वतसरे सुभ पक्षे पंचम्यांतिथौ सिहावा नाम नगरे श्रृड्गी रिषि आश्रमे वर्तमान काकैर नाम नगरे सोमबंसी व्याघ्र प
(पंक्ति 28) द अत्रि गोत्र प्रथम विषयात हो सिहावा राज किये तिनके पुत्र कपिल नरेन्द्र देव के पुत्र तानुदेव जो सिहावा मे राज करते
(पंक्ति 29) हुये कांकेर नौरंगपुर की जमिदारी को भैना (याने) कड़ार से फते कर दोनों तालूका में राज कीये
(पंक्ति 30) ते सिहावा-कांकैर का राज करते हुए नागवंसि छत्रीयों से धमतरी दाहेज में पाये धमतरी अमल कर तीनो तालुका में राज कीये
(पंक्ति 31) जिन्के पुत्र अजै नरेनद्रदेव तिनों तालुका में राज किये इन्के पुत्र हमिरदेव तीनों तालुका में राज कीये तिन्के पुत्र रुद्रदेव धर्मशील
(पंक्ति 32) सिव भक्त राजा भये रुद्रदेव राजा के पधारे रुद्रेश्वर महादेव महानदी के तीर में धमतरी के नजीक इन्के पुत्रं हिमं
(पंक्ति 33) चल साह देव धमतरी में गद्दी कर तीनो तालुका में राज किये अर्थ रुद्रदेवराजा के प्रसंसा में पत्र लिषाये
(पंक्ति 34) मैथिल रामचरणदास लिषे के सम्बत १७०७ मासोतमे मासे फालगुन मास कृष्ण पछे सुभ तिथौउ
(पंक्ति 35) चतुरदसी सुभनाम नछत्रे श्री रुद्रेस्वर महादेव के पूजान उत्साह सहित पूर्ण भये अस राजा रुद्रदेव सम शिव भक्त आज राजा कल जुग में थोर
(पंक्ति 36) होई है - इति सुभमस्ताः
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Tuesday, September 6, 2022

बहुभाषी बस्तर

बस्तर की छत्तीस भाषाएं, यों अतिरंजित लग सकती हैं मगर डब्लू. वी. ग्रिग्सन ने सन 1938 में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘द मारिया गोंड्स ऑफ बस्तर‘ में अपने सहयोगी चेतन सिंह के प्रति आभार व्यक्त किया है, ‘जो बस्तर की सभी ‘36‘ भाषाएं जानते थे।‘ 36 भाषाओं के दुगने यानि 72 का उल्लेख मिलता है सूचना तथा प्रकाशन संचालनालय, म.प्र. द्वारा प्रकाशित (1973?) एवं चन्द्रा प्रिंटर्स भोपाल द्वारा मुद्रित-12-73-5000, ‘आपका जिला बस्तर‘ पुस्तिका में- 'संपूर्ण जिले में 72 बोलियां बोली जाती हैं, जिनमें गोंड़ी, हल्बी, भतरी, दोरली, धुरवी, मारवी, मुरिया, छत्तीसगढ़ी, हिन्दी, तेलगू, उड़िया, बंगाली, मराठी आदि प्रमुख हैं।' (सरगुजा भी कुछ ही पीछे रहा है, 1998 में प्रकाशित गजेटियर के अनुसार इस जिले में कुल मिलाकर 61 भाषाएं तथा बोलियां बोली जाती थीं।) स्पष्ट है कि बस्तर बहुभाषी (और एकाधिक लिपि) अंचल है और ऐसा स्वाभाविक है, क्योंकि छत्तीसगढ़ का यह भाग, जो दंडकारण्य और महाकांतार, जाना जाता था, भौगोलिक दृष्टि से महाराष्ट्र, आंध्र-तेलंगाना और उड़ीसा से संलग्न है, यह अंचल राम वनगमन पथ, राजा नल, सम्राट समुद्रगुप्त के पौराणिक ऐतिहासिक, साहित्यिक संदर्भों से जुड़ता है। यहां दक्षिण, पूर्व-पश्चिम और उत्तर से शासक, राजनैतिक हस्तक्षेप के अलावा ब्राह्मण व अन्य जातियों के आगमन और बसने के ऐतिहासिक प्रमाण भी हैं।

एपिग्राफिया इंडिका, वाल्युम-9, 1907-08 के शक संवत 1033 गुंड महादेवी के नारायणपाल शिलालेख का परिचय देते हुए रायबहादुर हीरालाल की टिप्पणी रोचक और महत्वपूर्ण है- 'भारत में आर्य तथा द्रविड़ जन समूह के मध्य नर्मदा, जिस प्रकार पृथक सीमारेखा खीचती है, उसी प्रकार बस्तर में इन्द्रावती की भूमिका महत्वपूर्ण है। इसलिए यह आश्चर्यजनक नहीं है कि इन्द्रावती नदी के उत्तरी भाग से प्राप्त समस्त अभिलेख देवनागरी लिपि में हैं तथा दक्षिणी भाग में इसी समय के अभिलेख तेलुगु लिपि में हैं। ऐसा स्पष्ट ज्ञात है कि यद्यपि नागवंशी राजा इन्द्रावती के उत्तर और दक्षिणी दोनों तरफ शासन करते थे, तथापि आर्य और द्रविड़ समुदाय कीे प्रजातीय मान्यताएं एवं कम से कम भाषायी सम्प्रेषण की दृष्टि से, स्वतः के प्रभाव को विज्ञापित करने के लिए उन्होंने इन्द्रावती नदी को ही विभाजक रेखा मान्य किया था। नारायणपाल का हमारा यह अभिलेख इन्द्रावती नदी के उत्तर तटीय क्षेत्र से प्राप्त हुआ है, इसी कारण संस्कृत में है।

इस संदर्भ में दंतेवाड़ा के प्रसिद्ध दंतेश्वरी मंदिर शिलालेख का उल्लेख आवश्यक और प्रासंगिक है। यहां दो शिलालेख दिकपालदेव के हैं, जिनकी तिथि संवत 1760 अर्थात सन 1703 है। इनमें से दोनों शिलालेखों की लिपि नागरी है, एक की भाषा संस्कृत और दूसरा ‘भाषा‘ (हिन्दी, इस लेख की भाषा, छत्तीसगढ़ी का पहला अभिलिखित प्रमाण के रूप में स्थापित है) में है। दूसरे पत्थर पर उत्कीर्ण लेख, वस्तुतः संस्कृत वाले पहले का ही संक्षेप आशय प्रकट करने वाला अनुवाद है। रोचक कि दूसरे शिलालेख के आरंभ में ही कहा गया है कि ‘देववाणी मह प्रशस्ति लिषाए पाथर है महाराजा दिकपालदेव के कलियुग मह संस्कृत के बचवैआ थोरहो हैं तै पांइ दूसर पाथर मह भाषा लिषे है।‘ पुनः अंत में कहा गया है कि- ‘ई अर्थ मैथिल भगवानमिश्र राजगुरु पंडित भाषा औ संस्कृत दोउ पाथर मह लिषाए। अस राजा श्री दिकपालदेव देव समान कलि युग न होहै आन राजा।‘ आशय स्वयं स्पष्ट है।

बस्तर पर शोध करने वाले पहले भारतीय छत्तीसगढ़ निवासी डॉ. इंद्रजीत सिंह का शोध-ग्रंथ 1944 में प्रकाशित हुआ। कलकत्ता, इलाहाबाद और लखनउ से पढ़ाई करने वाले डॉ. सिंह को हिंदी, बांग्ला, अंग्रेजी, छत्तीसगढ़ी, अंग्रेजी और लैटिन का अच्छा अभ्यास था। अपने शोध के दौरान उन्हें हल्बी का अच्छा अभ्यास हो गया था और बस्तर की अन्य लगभग सभी भाषाओं को मोटे तौर पर समझने लगे थे। उनकी पुस्तक ‘द गोंडवाना एंड द गोंड्स‘ के परिशिष्ट में लगभग 300 शब्दों की शब्दावली है, यह बस्तर संबंधी जिज्ञासा रखने वाले के लिए प्रारंभिक तैयारी के लिए जरूरी शब्द-संग्रह है।

सन 1998 में रामकथा के तीन ग्रंथों- हलबी रामकथा, माड़िया रामकथा और मुरिया रामकथा का प्रकाशन मध्यप्रदेश के जनसम्पर्क विभाग से हुआ। ग्रंथों के सम्पादक भाषाविज्ञानी प्रोफेसर हीरालाल शुक्ल हैं। भारी-भरकम इन ग्रंथों का आकार कल्याण के विशेषांक जैसा और पृष्ठ संख्या क्रमशः 688, 454 और 644 है।

एक अन्य उल्लेख- अपने जीवन काल में मिथक बन गए बस्तर के महाराजा प्रवीरचंद्र भंजदेव ने छोटी सी पुस्तक लिखी थी ‘आइ प्रवीर द आदिवासी गॉड‘। अब एक अन्य ताजा उल्लेख, कांकेर रियासत के आदित्य प्रताप देव, जो दिल्ली के प्रतिष्ठित सेंट स्टीफंस कॉलेज में इतिहास पढ़ाते हैं, उनकी इसी वर्ष 2022 में प्रकाशित पुस्तक ‘किंग्स, स्पिरिट एंड मेमोरी इन सेंट्रल इंडिया‘ ‘एनचांटिंग द स्टेट‘ का। यह पुस्तक उनके सुदीर्घ और गंभीर शोध का परिणाम है ही, कांकेर को बस्तर से अलग देखने और कुछ अर्थों में प्रवीरचंद्र भंजदेव के ‘आइ प्रवीर ...‘ से अलग ‘‘द किंग एज ‘आइ‘‘, जो इस पुस्तक का पहला अध्याय है, दृष्टिगत है। अपनी पुस्तक में वे वास्तविक अवधारणाओं को समझने में पारिभाषिक बना दिए गए शब्दों, रूढ़ मुहावरों के चलते समझ की भाषाई सीमा का उल्लेख करते हैं। कांकेर में बोली जाने वाली भाषा के संबंध में स्पष्ट करते हैं कि छत्तीसगढ़ी और हिंदी बोलते हैं, जिसमें कई शब्द हल्बा और गोड़ी के होते हैं। साथ ही विशिष्ट शब्दों का अर्थ स्पष्ट करने के लगभग डेढ़ सौ शब्दों की शब्दावली है।

बस्तर की जबान (भाषा-बोली) के लिए जितना मैं समझ सका हूं, बस्तर की संपर्क भाषा हल्बी है। (यहां उल्लेखनीय कि पुराने बस्तर जिले या वर्तमान बस्तर संभाग के कांकेर या केसकाल घाटी तक छत्तीसगढ़ी प्रचलित है।) हल्बी पर छत्तीसगढ़ी और मराठी का प्रभाव है, बल्कि कुछ स्वतंत्र और मौलिक प्रयोगों के साथ वह इन्हीं दो भाषाओं का मिश्रण है। इसी तरह अधिकतर उड़ीसा से जुड़े क्षेत्र में बोली जाने वाली भतरी पर उड़िया प्रभाव-मिश्रण है। दोरली को गोंडी का रूप माना जा सकता है, जिसमें सुकमा वाली दोरली पर उड़िया का और बीजापुर वाली पर मराठी का प्रभाव होने से दोनों में अंतर आ जाता है, मगर दोनों भाषा-भाषी को एक-दूसरे की बात समझने में कठिनाई नहीं होती। इसके अलावा गोंडी है। मगर ध्यान रहे कि माड़ (अबुझमाड़) की गोंडी अलग है, जबकि इससे भिन्न दंतेवाड़ा, बीजापुर, कोंटा की गोंड़ी आपस में मिलती जुलती है। माड़ की गोंड़ी और दक्षिण-पश्चिमी गोंडी में इतना फर्क हो जाता है कि इन्हें एक-दूसरे की जबान समझ पाना कठिन होता है।

प्रसंगवश, भाषा संपर्क और अभिव्यक्ति का माध्यम है तो औपचारिक दूरी बनाने का भी साधन है। पुराने नाटकों में राजा और पुरोहित जैसे पात्रों के संवाद संस्कृत में होते हैं, वहीं नारी पात्र, सेवक, ग्रामवासी और विदूषक आदि अपभ्रंश जैसी भाषा बोलते थे। रामायण का प्रसंग है- 'अहं ह्यतितनुश्चैव ... ... ... शक्या नान्यथेयमनिन्दिता।।' हनुमान सोचते हैं कि वानर हो कर भी मैं यहां मानवोचित, द्विज की भाँति संस्कृत का प्रयोग करूँगा तो सीता मुझे रावण समझकर भयभीत हो जाएंगी, ऐसी दशा में अवश्य ही मुझे उस सार्थक भाषा का प्रयोग करना चाहिये, जिसे अयोध्या के आस-पास की साधारण जनता बोलती है। कालिदास के कुमारसंभव का सातवां सर्ग शिव-पार्वती विवाह प्रसंग है, जिसमें कुछ इस प्रकार कहा गया है कि- सरस्वती ने वर की स्तुति संस्कृत में और वधू की स्तुति सुखग्राह्य (प्राकृत?) भाषा में की। ... शिव-पार्वती ने अलग-अलग भाषा की शैलियों से निबद्ध, अप्सराओं द्वारा खेला नाटक देखा। दो अन्य प्रसंग। पहला, जिसमें राजा भोज राह चलते ग्रामीण महिला से प्राकृत में सवाल करते हैं और वह शुद्ध संस्कृत में जवाब देती है। इसी तरह विद्यानिवास मिश्र ने काशी में विवाह के अवसर पर महामहोपाध्याय शिवकुमार शास्त्री और टहल नाई के प्रसंग का उल्लेख किया है, जिसमें शास्त्रीजी द्वारा शास्त्रीय विधि के अनुमोदन और नाई द्वारा लोकाचार स्मरण कराने पर, शास्त्रीजी द्वारा बार-बार एक ही बात दुहराते उसकी बात खारिज करने पर नाई ने ‘सर्वत्रैव षड् हलानि‘ कह कर, पंडितजी को विस्मय में डाल दिया।

सरकार में जनप्रतिनिधि, जनता के बीच जाकर उनकी भाषा का प्रयोग कर आत्मीयता का प्रयास करते हैं तो दूसरी ओर कामकाज या सरकारी सहयोगी-मातहतों के साथ अंग्रेजी-हिंदी। इसी प्रकार वरिष्ठ अधिकारी, कनिष्ठ अधिकारियों से अंगरेजी में बात करते हैं और सामान्यतः उनकी अपेक्षा होती है कि मातहत उनसे हिंदी में बात करे न कि (बढ़-चढ़ कर) अंगरेजी में, ऐसा तब भी, जब दोनों छत्तीसगढ़ी भाषी होते हैं। यही व्यवहार अधिकारियों और मातहत या जनता के बीच होता है। अधिकारी हिंदी बोलते हैं और सहायक, मजदूर या ग्रामवासी जनता छत्तीसगढ़ी, दोनों आमतौर पर अलग-अलग भाषा का प्रयोग करते, एक-दूसरे की बात अच्छी तरह समझते होते हैं। ऐसा परिवार में भी होता है। एक ही घर के विभिन्न सदस्यों के बीच, खासकर बुजुर्ग महिलाएं छत्तीसगढ़ी बोलती हैं और अन्य सदस्य उनसे हिंदी में बात करते हैं, जबकि दोनों को एक-दूसरे की बात आसानी से समझ में आती है। प्रसंगवश, गुलेरी जी ने ‘खड़ी बोली: म्लेच्छ भाषा‘ में बताया है कि ‘हिंदू कवियों का यह सम्प्रदाय रहा है कि हिंदू पात्रों से प्रादेशिक भाषा कहलवाते थे और मुसलमान पात्रों से खड़ी बोली।‘

यह भूमिका एक ही पत्र पर दो लिपि और दो भाषा में उत्कीर्ण, अपने किस्म के अनूठे उदाहरण के लिए, जो जगदलपुर से प्राप्त महाराजा राजपालदेव का ताम्रपत्र है। इसका प्रकाशन COPPER PLATE INSCRIPTION OF KAKATIYA RĀJAPĀLADEVA By Shri Balchandra Jain, M. A., Sahityashastri, M. G. M. Museum, Raipur. इस प्रकार शीर्षक से  The Orissa Historical Research Journal, Vol-X, No. 3 पेज 57-60 पर हुआ था, जिसे हीरालाल शुक्ल ने यथावत, 1986 में प्रकाशित History of Chhattisgarh (seminar papers) में Historical Source of Pre-Modern Bastar शीर्षक अंतर्गत शोधपत्र में शामिल किया। साथ ही श्री शुक्ल ने अपनी पुस्तक ‘आदिवासी बस्तर का बृहद् इतिहास‘ के चतुर्थ खंड में लगभग शब्दशः शामिल किया है, मूलतः श्री बालचन्द्र जैन द्वारा राष्ट्रबंधु साप्ताहिक के अंक 24.7.1969 में प्रकाशित कराया गया था, जो यहां प्रस्तुत है-

रायपुर के महंत पासीदास स्मारक संग्रहालय में बस्तर के राजवंश से संबंधित एक महत्वपूर्ण ताम्रपत्र है जो बस्तर के कलेक्टर से प्राप्त हुआ था। पत्र टूटकर दो टुकड़ों में विभाजित है। उसकी चौड़ाई लगभग ३१ से० मी०, ऊंचाई लगभग १८ से० मी० और वजन ३७५ ग्राम है। उससे ऊपरी दायें भाग पर अर्धचन्द्र और पंजे की आकृतियां हैं किन्तु बाँयें भाग के प्रतीक खण्डित हो गये हैं। ताम्रपत्र के निचले भाग में बीचों-बीच दुहरी रेखाओं से बने वर्ग में नागरी अक्षरों में सही शब्द उत्कीर्ण है। उपरले भाग के मध्य में राजमुद्रा है। यद्यपि राजमुद्रा का अधिकांश खंडित है किंतु वंश के अन्य राजा भैरमदेव की मुद्रा के आधार पर प्रस्तुत ताम्रपत्र की मुद्रा का लेख पूरा करके इस प्रकार पढ़ा जा सकता है:-

उपर्युक्त मुद्रालेख से विदित होता है कि महाराज राजपालदेव प्रौढ़प्रतापचक्रवर्ती की उपाधि धारण करते थे और माणिक्येश्वरी देवी के भक्त थे। माणिक्येश्वरी दुर्गा का ही एक रूप है। उसके वाहन सिंह की आकृति भी मुद्रा के मध्य में उत्कीर्ण है। ऐसा अनुमान किया है कि दन्तेवाड़ा की सुप्रसिद्ध दन्तेश्वरी देवी को माणिक्येश्वरी मी कहा जाता था। ताम्रपत्र पर छह पंक्तियों का एक लेख उड़िया और नागरी अक्षरों में उत्कीर्ण है। वह इस प्रकार है:- (उड़िया अक्षरों में) ।। श्री जगन्नाथ श्री बलभद्र श्री सुभद्रा सहित एहि किति निमित को साक्षी ।। श्री रक्षपालदेव राजा चालकी वंश राज्यपरियन्त पपलाडण्डि बह्मपुरा घर तीनि शए जीवन दण्ड नाही मरण मुसाली नाही शरण मार नाही ए बोलन्ते न पाल ई ताहार सुअर मा अ गधा बाप ए बोलन्कथ चन्द्र सूर्य वंश जग लोकपाल धर्मराज साक्षी वारि घरे मेलिया बांचे (नागरी अक्षरों में) जब लै श्री चालकी वंश राजा तब लै ब्रम्हपुरा क्षाडनो नाहि ए बोल छाडि कै पपलावडि आ जाइ तो सुअर माइ बाप गादह अष्टलोकपाल धर्मराज साक्षि (उड़िया अक्षरों में) वसाल सूर्य र वान कूप धौ मच्छ ते जहींकार एहि रेखा। सही

लेख से विदित होता है कि राजा रक्षपाल देव (राजपालदेव) ने पपलाडंडी के तीन सौ (ब्राह्मण) परिवारों को कुछ विशेषाधिकार देकर अपने नगर में बसाया था। राजा ने जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की साक्षीपूर्वक वचन दिया था कि जब तक चालकी वंश का राज्य रहेगा तब तक पपलाडंडी से आकर ब्रम्हपुरा में बसे तीन सौ परिवारों को जीवनदण्ड नहीं दिया जायगा, यदि उनमें से किसी की निपूते मृत्यु हो जायगी तो भी राज्य उनकी सम्पत्ति नहीं लेगा तथा शरण में लोगों आये लोगों को शारीरिक दण्ड नहीं दिया जायगा। बस्तर में आकर बसे उपर्युक्त ब्राम्हनों ने भी उसी प्रकार अष्ट दिक्पाल और धर्मराज की साक्षीपूर्वक वचन दिया था कि जब तक बस्तर में चालकी वंश राज्य करेगा तबतक हम लोग ब्रम्हपुरा नहीं छोड़ेगे। दोनों ही पक्षों ने इस शाप वचन को भी स्वीकार किया था कि प्रतिज्ञा का पालन न करने वाले व्यक्ति की माता शूकरी और पिता गधा होगा।

ध्यान देने की बात है कि प्रस्तुत ताम्रपत्रलेख दो भाषाओं और दो लिपियों में है। हिन्दी भाषी राजा की प्रतिज्ञा उड़िया भाषा में और उड़िया भाषी ब्राम्हणों की प्रतिज्ञा हिन्दी भाषा में लिखी गई है ताकि प्रत्येक पक्ष समझौते की शर्तें पढ़ और समझ सके। ताम्रपत्रलेख में कोई तिथि नहीं दी गई है किन्तु उसमें चालुकी वंश के राजा रक्षपालदेव का उल्लेख है यह राक्षपाल काकतीय वंश के राजपालदेव दिक्पालदेव के पुत्र और उत्तराधिकारी थे। दिक्पालदेव का उल्लेख दन्तेवाड़ा के वि० सं० १७६० (ईस्वी १७०३) के शिलालेख में मिलता है जिसमें उनकी दन्तेवाडा यात्रा का विवरण है। उस यात्रा के समय राजपालदेव युवराज थे और अपने पिता के साथ वे भी दन्तेश्वरी देवी के दर्शन करने गये थे। इस आधार यह अनुमान करना कठिन नहीं है कि राजपालदेव वि० सं० १७६० के पश्चात ही कभी बस्तर के राज सिंहासन पर अभिषिक्त हुये होंगे। तदनुसार प्रस्तुत ताम्रपत्र शासन की तिथि भी वि० स. १७६० के पश्चात की ही विचारी जा सकता है।

बस्तर का राजवंश काकतीय नाम से प्रसिद्ध है किन्तु प्रस्तुत ताम्रपत्रलेख में राजा राजपालदेव अपना वंश चालकी (चालुक्य) बताते हैं। यह ध्यान देने योग्य बात है।

इस पर मेरी संक्षिप्त टिप्पणी कि चालकी, बस्तर के स्थानीय प्रशासनिक ढांचे मे एक पद भी होता है तथा लेख में आया शब्द ‘मेलिया‘ अन्यत्र मेरिया आता है, जिसका अर्थ नरबलि होता है।

Tuesday, November 16, 2021

छोटे डोंगर

छोटे डोंगर की पुरासम्पदा - नरेश कुमार पाठक

मध्यप्रदेश के दक्षिणी भाग में स्थित बस्तर जिला अपनी जनजातीय संस्कृति एवं वन्य सम्पदा के लिए प्रसिद्ध है। प्राचीन साहित्य एवं अभिलेखों में इस अंचल का उल्लेख दण्डकारण्य एवं महाकान्तार के रूप में मिलता है। पूर्व मध्यकाल में इसे चक्रकोट के नाम से सम्बोधित किया जाता था। यह क्षेत्र अपनी दीर्घ ऐतिहासिक परम्पराओं तथा पुरातात्विक सम्पदा के लिये भी विख्यात है। बस्तर की भौगोलिक स्थिति के कारण यहां की पुरातात्विक सामग्रियों का विस्तृत सर्वेक्षण पूर्व में नहीं हो सका है, अतः सर्वेक्षण एवं नवीनतम शोधों के माध्यम से प्राचीन पुरावशेषों की जानकारी लगातार प्रकाश में आ रही है। इसी क्रम में बस्तर जिले के नारायणपुर तहसील में स्थित छोटे डोंगर का उल्लेख किया जाना समुचित होगा। छोटे डोंगर रायपुर से लगभग 240 किलोमीटर दूर रायपुर-जगदलपुर-जैपुर राष्ट्रीय मार्ग क्रमांक 43 पर बस्तर जिले का कोण्डागांव नगर स्थित है एवं कोण्डागांव से लगभग 51 किलोमीटर दूर कोण्डागांव-अन्तागढ़ मार्ग पर बस्तर जिले का तहसील मुख्यालय नारायणपुर है। नारायणपुर से दक्षिण पश्चिम में लगभग 50 किलोमीटर दूर नारायणपुर-ओरछा मार्ग पर छोटे डोंगर नामक गांव अवस्थित है।

छोटे डोंगर की बस्ती के बाहर नई तराई तालाब के किनारे एक प्राचीन स्मारक भग्नावशेष अवशिष्ट है, इन अवशेषों का निरीक्षण सर्वप्रथम भारतीय प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी श्री के.के. चक्रवर्ती (वर्तमान आयुक्त, पुरातत्व एवं संग्रहालय, मध्यप्रदेश) ने सन 1987-88 में रायपुर के पुरातत्ववेत्ता श्री वेदप्रकाश नगायच के साथ किया था। उस समय तालाब के पश्चिमी किनारे पर गोलाई लिये एक सामान्य आकार का उन्नत टीला स्थित था जिसमें ध्वस्त स्मारक के अवशेष दृष्टव्य हो रहे थे। इसके समीप तालाब की ओर ढलान वाले भाग में दो प्रतिमायें एवं एक शिलालेख भी पड़े हुए थे। इस प्राचीन स्थल में विलुप्त प्राचीन संस्कृति को प्रकाश में लाने के लिए आवश्यक था कि यहां स्थित टीलों की सफाई कार्य प्रारंभ किया जावे। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुये, मार्च 1988 में मध्यप्रदेश पुरातत्व एवं संग्रहालय के तत्वावधान में डा. जी.के. चन्द्रौल, उपसंचालक, पुरातत्व एवं संग्रहालय, रायपुर, रायपुर में पदस्थ पुरातत्ववेत्ता द्वय सर्वश्री वेदप्रकाश नगायच एवं श्री राजाराम सिंह एवं श्री नरेश कुमार पाठक, संग्रहाध्यक्ष, जिला पुरातत्व संग्रहालय, जगदलपुर द्वारा टीले की मलबा-सफाई कार्य सम्पन्न कराया गया।

इस प्राचीन टीले के सतह पर जमी हुई मिट्टी, खंडित स्थापत्य खंड एवं प्रस्तरों के टुकड़े धीरे-धीरे हटाये जाने के उपरान्त एक प्रस्तर निर्मित आयताकार चबूतरा निकल आया। कार्य के आगे बढ़ने के साथ ही पाषाण निर्मित द्वार चौखट अपने मूल स्थिति में प्राप्त हुआ। द्वार के वाम एवं दक्षिण दोनों पार्श्व की द्वार शाखाएं टूट कर गिर चुकी थीं, वे चबूतरा के ऊपर सफाई कार्य के दौरान प्राप्त हुई हैं। उन्हें यहीं रखा गया है। इससे यह स्पष्ट हो गया कि यह एक प्राचीन मंदिर का अवशेष है तथा यह मंदिर पूर्वाभिमुखी है।

यह प्राचीन मंदिर 9वीं 10वीं शती ईस्वी में निर्मित हुआ प्रतीत होता है। इसके सूक्ष्म परीक्षण से ज्ञात होता है कि यह मंदिर शिव मंदिर था। यद्यपि गर्भगृह में जलधारी व शिवलिंग प्राप्त नहीं हुए हैं, किन्तु यहां से पूर्व दिशा में लगभग 200 मीटर की दूरी पर स्थित रामसागर के किनारे आम पेड़ के नीचे दो गोल शिवलिंग युक्त जलधारी तथा एक प्राचीन चौकोर जलधारी रखी है, जो सम्भवतः इसी ध्वस्त मंदिर की मूल जलधारी प्रतीत होती है, जिस पर शिवलिंग प्रतिष्ठापित रहा होगा। इसके शिव मंदिर होने का एक दूसरा प्रमाण भी है, कि उमा-महेश्वर प्रतिमा मंदिर के चबूतरे पर पूर्वी दीवार के समीप 0.70 मीटर की ऊंचाई पर प्राप्त हुई है, तथा तीसरे इस टीले के पूर्व ढलान वाले भाग से गणेश प्रतिमा का निचला खण्ड प्राप्त हुआ है।

बस्तर क्षेत्र में तालाब एवं पोखरों (तराईयों अथवा तलाईयों) का बाहुल्य है, क्योंकि ये जल प्राप्ति के प्रधान स्रोत रहे हैं। अतः इस क्षेत्र में पूजा स्थल भी तालाब के किनारे अधिकता से मिलते हैं। छोटे डोंगर का यह मंदिर भी इसी परम्परा में निर्मित किया गया प्रतीत होता है।

वर्तमान में मलबा सफाई करने के पूर्व मंदिर के निर्माण के समय बनाये गये प्लेटफार्म (चबूतरे) का रूप स्पष्ट मिला है, जो 5.40 मीटर लम्बा 4.10 मीटर चौड़ा रहा। इसके उपर सामने 1.60 मीटर छोड़कर गर्भगृह बनाया गया। सम्भवतः इसका उपयोग खुले मण्डप के रूप में किया जाता रहा होगा। मंदिर के सम्मुख भाग को छोड़कर शेष तीनों ओर 75 सेंटीमीटर का स्थान चबूतरे में गर्भगृह के बाहर रिक्त है। अतः अनुमान किया जा सकता है कि यह प्रदक्षिणा पथ के रूप में प्रयुक्त होता रहा होगा।

मंदिर पूर्वाभिमुखी है तथा इसका बाह्य आकार 3 मीटर पूर्व-पश्चिम, 2.60 मीटर उत्तर-दक्षिण में है। गर्भगृह की अन्तमिती (अन्तःभित्ति?)का आकार 1.90 मीटर पूर्व-पश्चिम, 1.50 मीटर उत्तर-दक्षिण है। इसका फर्स छोटे पत्थरों के टुकड़ों को चूने के साथ मिला के कूटकर बनायी गई है, जिसपर शिवलिंग की स्थापना की गई होगी। वर्तमान में जलधारी व शिवलिंग प्राप्त होने से उसकी सही स्थिति स्पष्ट नहीं की जा सकती, गर्भगृह की उत्तरी दीवार का पूर्व उत्तरी कोने के पत्थर अपने मूल स्थान पर खड़े मिले हैं, जिनकी ऊंचाई जगती सहित 1.70 मीटर है। इसके पास ही एक दूसरा पाषाण खंड मिला है जो कि संभवतः इसी दीवार का हिस्सा रहा होगा जो कि 1.45X.60X.18 मीटर का है। गर्भगृह के प्रवेश द्वार की चौड़ाई 50 सेंटीमीटर है।

मूर्तियां
छोटे डोंगर के उल्लिलित मंदिर एवं निकट स्थित गढ़पारा के आसपास महत्वपूर्ण मूर्तियां एवं कलावशेष बिखरे पड़े हैं, जिनका विवरण निम्नानुसार है-

शिव: यह मूलतः एक बलुआ पत्थर का स्थापत्य खण्ड है, जिसे कालान्तर में शिव की प्रतिमा के रूप में परिवर्तित किया गया है। इस प्रतिमा में (100X38X16 सेंटीमीटर) शिव को द्विभुजी प्रदर्शित किया गया है। शिव को जटा मुकुट, कुण्डल, सर्पाहार आदि अलंकरणों से युक्त प्रदर्शित किया है।

उमा-महेश्वर: गढ़पारा से प्राप्त कृष्ण पाषाण में निर्मित इस प्रतिमा (60X18 सेंटीमीटर) उमा-महेश्वर का है जिसमें बैठे हुये महेश्वर का दायां पैर भग्न है। बायीं जंघा पर उमा आलिंगन मुद्रा में बैठी हुई है। शिव की भुजाओं में दक्षिणाधः (दक्षिणात्य) क्रम से मातुलिंग, त्रिशूल, सर्प धारण किए हुए एवं उमा के बायें उरोज का स्पर्श किये हैं। देव जटा-मुकुट, चक्र कुण्डल, ग्रैवेयक एकावलीहार, बलय (वलय?), मेखला एवं नूपुर धारण किये हैं। उमा की भुजा दक्षिणात्य क्रम से शिव के दायें स्कंद पर स्थित है। शेष भुजाओं में अंजन लगाने की सलीका (शलाका?), दर्पण एवं अर्ध चन्द्राकार कंधा से मुक्त है। देवी सुन्दर मुकुट, अलंकृत केश, चक्रकुण्डल, एकावली लोकिट युक्त ग्रैवेयक, उरोज तक फैली एक अन्य हारावली, बलय, मेखला, नूपुर एवं उत्तरीय धारण किये हैं। दायें ओर का पादपीठ भग्न है, बायें पादपीठ पर एक खण्डित पूजक आराधनारत अंकित है।

उमा-महेश्वर: गढ़पारा से ही प्राप्त यह प्रतिमा (68X50 सेंटीमीटर) कृष्ण पाषाण पर निर्मित है। इसमें सव्य(?)ललितासन महेश्वर की बायी जंघा पर उमा आलिंगन मुद्रा में प्रदर्शित है। शिव की भुजाएं दक्षिणाधः क्रम से मातुलिंग, सर्प का फणयुक्त त्रिशूल, सर्प एवं उमा के बायें उरोज को स्पर्श करते हुये प्रदर्शित है। शिव जटा मुकुट, चक्र कुण्डल, लटकन (ताबीज) युक्त एकावली, ग्रैवेयक, दोवली अन्य हार, बलय, मेखला, नूपुर एवं उत्तरीय धारण किये हैं। उमा की भुजाओं में दक्षिणाधः क्रम से शिव के दाये स्कंद पर अंजन लगाने की सलीका, दर्पण एवं अर्ध चन्द्राकार वस्तु सम्भवतः कंधा लिये हैं। पार्वती सुन्दर मुकुट से अलंकृत केश, चक्र कुण्डल, लोकिट युक्त ग्रैवेयक उरोज तक फैली दोवली हार, सोलह चूडियों युक्त बलय, मेखला, नूपुर, उत्तरीय एवं अधोवस्त्र धारण किये हैं। नितान में दोनों ओर मालाधारी विद्याधर पादपीठ पर शिव के बीच उनका वाहन नन्दी एवं पार्वती के नीचे उनके वाहन सिंह का अंकन है।

उमा-महेश्वर: यह प्रतिमा (40X31X15 सेंटीमीटर) मंदिर के मलबा-सफाई में प्राप्त हुई थी वर्तमान में जिला पुरातत्व संग्रहालय, जगदलपुर (अवाप्ति पंजी कमांकः 29) में संग्रहित है। हरे रंग के पत्थर पर निर्मित प्रतिमा काफी खण्डित अवस्था में हैं। सव्य ललितासन में बैठे हुये शिव की बायी जंघा पर उमा आलिंगन मुद्रा में बैठी हुई है। महेश्वर का दायां पैर, दायी भुजायें व सिर टूटा हुआ है। बायीं उपरी भुजा में सम्भवतः सर्प एवं बायीं नीचे भुजा में सम्भवतः उमा के बायें कंधे पर है। धर, यज्ञोपवीत व मेखला से सुशोभित है। उमा की दायी भुजा शिव के दायें स्कंद पर बायी भुजा अपने बायें पैर की जंघा पर रखे हुये है। देवी का मुख टूटा है। यह केश, हार, मेखला व नूपुर से अलंकृत है। पार्श्व में दायीं ओर खट्वांग पुरुष बायीं ओर चंवरधारिणी खड़ी है। शिव और उमा के नीचे उनके वाहन नन्दी एवं सिंह क्रमशः अंकित है। सामने चार अस्पष्ट प्रतिमा बैठी हुई है। वितान में तीन लघु प्रतिमा सम्भवतः त्रिदेव की है। दोनों ओर मालाधारी विद्याधर और उनके नीचे दोनों पार्श्व में एक-एक पूजक अंजली हस्त मुद्रा में बैठे हुये शिल्पांकित है। प्रतिमा को शिल्पी ने पूर्णरूप न देकर अर्धगढ़ित छोड़ दिया है।

गणेश: गढ़पारा से प्राप्त कृष्ण पाषाण पर निर्मित (150X32 सेंटीमीटर) चतुर्भुजी गणेश सव्य ललितासन में बैठे हुये अंकित है। गणेश की भुजाओं में दक्षिणाधः क्रम से दन्त, परशु, पुष्प एवं मोदक लिये हैं। गणपति मुकुट, पुष्प एवं मोदक लिये हैं। गणपति मुकुट, सूपकर्ण, दन्त, ग्रैवेयक, यज्ञोपवीत, बलय व नूपुर धारण किये हुये है। सूढ बायी ओर को मुड़ी हुई मोदक पात्र को स्पर्श कर रही है। पादपीठ पर नीचे गणपति के वाहन मूषक का अंकन है। यह प्रतिमा अपराजितपृच्छा के विवरण से काफी साम्यता लिये हैं, जिसके अनुसार गणेश चार भुजाओं में से दायी भुजाओं में कमल कलिका एवं मोदक पात्र होना चाहिये।

गणेश: गढ़पारा से ही प्राप्त चतुर्भुजी आसनस्थ गणेश सव्य ललितासन में बैठे हुये हैं। दायी नीचे की भुजाओं में दन्त लिये हैं। शेष तीन भुजायें भग्न है। देव यहां मुकुट, सूपकर्ण, हार केयूर एवं नूपुर धारण किये दृष्टव्य है। सूंड टूट चुकी है। प्रतिमा भग्न अवस्था में है। 50X32 सेंटीमीटर आकार की यह प्रतिमा कृष्ण पाषाण पर निर्मित है।

नृत्य गणेश: छोटे डोंगर से प्राप्त कृष्ण पाषाण की नृत्य गणेश की यह प्रतिमा दो खंडों में प्राप्त हुई है (110X50X25 सेंटीमीटर) प्रतिमा का उपरी भाग भग्न है, जिसे छोटे डोंगर के गढ़पारा में रखा गया है। नीचे का भाग मंदिर के टीले के निकट से प्राप्त जिला पुरातत्व संग्रहालय, जगदलपुर (अवाप्ति पंजी क्रमांकः 30) में संग्रहित है। द्विभंग मुद्रा में अंकित चतुर्भुजी गणेश की बायी ऊपरी भुजा में अक्षमाला नीचे की भुजा में कमल कलिका है। बायीं दोनों भुजायें भग्न है। देव करण्ड मुकुट, रूपकर्ण, ग्रैवेयक, सर्प यज्ञोपवीत, केयूर, बलय, मेखला एवं पैजनी धारण किये हैं। पार्श्व में दायी ओर एक पूजक अंजली मुद्रा में बैठा हुआ है। बांयी ओर उनका वाहन मूषक का आकर्षण मुद्रा में अंकन है। पादपीठ पर देवनागरी लिपि में लेख उत्कीर्ण है, जिसे डा. विवेकदत्त झा ने ‘श्री गणराज प्रतिमा प्रतिष्ठा‘ पढ़ा है। तथा इसका काल 11 वीं शताब्दी ईस्वी निर्धारित किया है। वस्तुतः लेख का पाठ ‘श्री उग्रवराहस्य प्रतिष्ठाः।।‘ लिपि के आधार पर इसे 9 वीं शताब्दी ईस्वी का माना जाना समुचित प्रतीत होता है।

कार्तिकेय: गढ़पारा में पीपल के वृक्ष के नीचे 51X25 सेंटीमीटर कृष्ण पाषाण में निर्मित कार्तिकेय की अत्यन्त कलात्मक प्रतिमा अवस्थित है। यह प्रतिमा क्षरित स्थिति में है। देवता की दोनों भुजाएं तथा मुख मण्डल खण्डित है। द्विभंग मुद्रा में खड़े कार्तिकेय मुकुट, कुण्डल, ग्रैवेयक, केयूर कटि मेखला और धोती से सुसज्जित है। उनके वाहन मयूर के ले हुये पंखों का मनोहारी अंकन देवता के पीछे किया गया है।

महिषमर्दिनी: गढ़पारा से अलीढ़ मुद्रा में अंकित देवी महिषमर्दिनी का नीचे का भाग टूटा है। अष्टभुजी देवी की सभी भुजाएं टूटी है। भगवती, मुकुट, सुन्दर प्रभामण्डल, कर्ण कुण्डल, हार, ग्रैवेयक, केयूर, बलय, कटि मेखला बनमाला साड़ी से सुशोभित है। देवी महिषासुर का मर्दन करने की मुद्रा में प्रदर्शित है। भावांकन की दृष्टि से प्रतिमा को वीर रस की ओजस्वी अभिव्यक्ति माना जा सकता है। कृष्ण पाषाण पर निर्मित प्रतिमा आकार 28X21सेंटीमीटर है।
(इसके अतिरिक्त लेख में 5 सती स्तंभ और 3 योद्धा प्रतिमाओं का आकार सहित उल्लेख है।)

अभिलेख: छोटे डोंगर के शिव मंदिर के टीले से एक शिलालेख और पूर्व में वर्णित प्रतिमा पादपीठ लेख प्राप्त हुए हैं। शिलालेख वर्तमान में जिला पुरातत्व संग्रहालय, जगदलपुर में संरक्षित है। यह खण्डित शिलालेख कृष्ण पाषाण पर 69X48X21 सेंटीमीटर आकार का है। इसमें प्रस्तर के दोनों ओर लेख अंकित है। अग्रभाग में कुल 6 पंक्तियां हैं तथा पृष्ठ भाग में 9 पंक्तियां हैं। डा. विवेकदत्त झा के मतानुसार इसमें ‘वंखकादित्य‘ नामक राजा का उल्लेख है। जो राजमल्ल का उत्तराधिकारी था। अभिलेख में पृष्ठ भाग में ‘परद्वार विषय‘ के संबंध में जानकारी है। डा. झा इस लेख को 9 वीं शताब्दी के उत्तरार्ध का मानते हैं। प्रस्तुत अभिलेख के वाचन से स्पष्ट होता है कि इसमें राजा का नाम का अंश वस्तुतः ‘श्री कदितमि देनुज‘ का उल्लेख है। इसी प्रकार पृष्ठ भाग में परद्वार विषय के ’परद्वार विषय‘ अधिक शुद्ध पाठ है। श्री जी.एल. रायकवार के अनुसार सम्भावित तद्समय हरद्वार विषय होगा। यह संभवतः विषय वर्तमान में अबूझमाड़ का प्राचीन नाम रहा होगा। इस प्रकार यह अभिलेख बस्तर के इतिहास पर नवीन प्रकाश डालता है।

छोटे डोंगर के काल निर्धारण में कलावशेषों तथा अभिलेखीय साक्ष्यों के आधार पर करने का प्रयास किया गया है। जगदलपुर संग्रहालय में संरक्षित अभिलेख (कमांकः -) तथा प्रतिमा पादपीठ लेख (क्रमांकः 30) संग्रहित है। प्रतिमा पादपीठ पर अंकित लेख 9 वीं क्रमांक शताब्दी ई. का है। अतः प्रतिमा का काल भी यही निर्धारित किया जा सकता है। अन्य प्रतिमायें भी इसके समकालीन प्रतीत होती है। सती स्तम्भ एवं प्रतिमाएं 14-15 वीं शताब्दी की प्रतीत होती है। एक पाषाण खण्ड को 18 वीं शताब्दी में शिव प्रतिमा के रूप में परिवर्तित किया गया है। अतः यह निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि छोटे डोंगर में 9 वीं शताब्दी से लेकर 18 वीं शताब्दी तक की कला परम्परा विद्यमान रही है।

श्री पाठक ने प्रकाशन हेतु यह लेख डा. ए.एल. श्रीवास्तव को अगस्त 1995 में प्रेषित किया था, जिसके प्रकाशित होने की जानकारी मुझे नहीं है। लेख में टाइपिंग की कुछ भूलें हैं, जहां स्पष्ट हो सका वह संशोधित करते हुए शेष मजमून यथावत रखा गया है। लेख के साथ पाद टिप्पणियां भी हैं, जिसमें श्री पाठक ने अपने गुरुवर डा. लक्ष्मीशंकर निगम के मार्गदर्शन एवं सुझाव हेतु आभार व्यक्त किया है। साथ ही ‘श्री उग्रवराहस्य प्रतिष्ठाः‘ वाले लेख पाठ के लिए मेरे नाम का, मेरी तत्कालीन पदस्थापना सहित (श्री राहुल कुमार सिंह, संग्रहाध्यक्ष, बिलासपुर) आभार उल्लेख किया है।

Wednesday, November 10, 2021

समर लोक

मेहरुन्निसा परवेज का साहित्य जगत में खास स्थान रहा है और वे चर्चित भी रही हैं। वे छत्तीसगढ़ से जुड़ी पद्मश्री सम्मानित एकमात्र महिला साहित्यकार हैं। उन्हें यह सम्मान 2005 में मध्यप्रदेश कोटे से मिला, लेकिन जगदलपुर, बस्तर से घनिष्ट जुड़ी रहने के कारण, तब उन पर यहां, छत्तीसगढ़ में बातें होती थीं, अब राज्य में भुला दी गई सी हैं। भोपाल, मध्यप्रदेश और देश में उन्हें अब अधिकतर आईएएस व सांसद पति श्री भागीरथ प्रसाद तथा आईपीएस व अभिनेत्री पुत्री सुश्री सिमाला प्रसाद के साथ याद किया जाता है। यहां उनके एक कहानी संग्रह का संदर्भ ले कर कुछ बातें कहते, उनकी रचनाधर्मिता को याद करने का प्रयास है।

संग्रह की पहली कहानी ‘जुगनू‘ में बेसब्री और बस शब्द का इस्तेमाल, आगे चल कर बस खड़ी होने के बाद बस के आते ही की बात, ‘मदारी ने भानुमति का पिटारा‘, उनके सहकर्मी या मातहत के बजाय पुलिस के अधिकारी कहना, ‘कमसिन उम्र‘, ‘हिम्मत नहीं थी‘ और आते ही सब को मलेरिया का दुहराव, और बाद में मलेरिया के बजाय निमोनिया, जैसी चूक से आरंभ में ही पाठकीय सुरुचि आहत होती है। उनमें साहित्यकार होने के प्रकट और मुखर लक्षण न दिखाई पड़ने के कारण कभी कहा जाता था कि उनके अनगढ़ लिखे को कोई दुरुस्त करता है, तब वे छपती हैं। यह कहानी, लगता है कि मांजने से रह गई है।

कहानी ‘भाग्य‘ बेटी-नारीत्व को एकदम अलग तरह से, लेकिन स्वाभाविक उभारा गया है, जिसके बीच एक पारंपरिक कहानी भी बुन दी गई है। कुछ अलग तेवर की कहानी ‘बड़े लोग‘ पढ़ते हुए सप्रे जी की एक टोकरी भर मिट्टी याद आती है। इस कहानी में बातों को कहने का अंदाज, प्रौढ़ कलम का नमूना है, जो ‘नंगी आंखों वाला रेगिस्तान‘ में पुष्ट होता है। ‘अपनी जमीन‘ बेबात सी बात को कहानी बना देने का अपना अंदाज है। लंबी कहानी ‘सूकी बयड़ी‘, जिसमें लेखिका ने मानों भटकते हुए वह मुकाम पा लिया, जिसकी उसे तलाश थी और इसलिए टेसूआ-कमला प्रसंग को उलझा छूटा रहने दिया है। ठहर कर, सुभीते से गुनी-बुनी-कही गई कहानी।

संग्रह की अंतिम दो कहानियां ‘समर‘ और ‘लाल गुलाब‘ साहित्यकार के जीवन-संस्मरण और कहानी के बीच आवाजाही का ऐसा नमूना है, जो आमतौर पर देखने में नहीं आता, यह लेखिका की पारदर्शिता और साहित्यिक निष्ठा का प्रतिबिंब है, जो पाठक के मन में उनके प्रति श्रद्धा भाव जगाता है। वे अपने ‘समर लोक‘ से अभिन्न हैं। कहानियां रचते हुए वे उस सम के आसपास हैं, जहां उनका जीवन उनके लिए फकत कहानी है। कहानी से कम न कहानी से ज्यादा। वे कहती हैं- ‘मैं लोगों के चेहरे पढ़ती हूं‘। निसंदेह उन्हें लोगों के चेहरे पढ़ना और पढ़े को कह देना आता है, लेकिन जिसे चेहरा पढ़ना न आता हो वह अनाड़ी भी उनकी तस्वीरों में उनकी मीनाकुमारियत को बेचूक पढ़ सकता है।

कहानी कहने में ऐसे बिंदु पर बात शुरु करना, जहां चौंकाने वाली नाटकीयता हो, जिज्ञासा पैदा हो, वाली शैली का वे खूब इस्तेमाल करती हैं। पारा-पड़ोस की कहानी, कुछ गढ़ कर, कुछ बढ़-बढ़ा कर सुना रहा हो। आसपास सहज बीतती जिंदगी दास्तान बना कर कही जाए तो कैसी विसंगत दिखती है, महसूस कराने में सिद्धहस्त हैं। सहज में विसंगति को पकड़ पाना और विसंगतियों को सहज निभा लेना, लगता है खुद जिया है, इसलिए अभिव्यक्त कर पाती हैं।

चलन है कि पाठक को बस पढ़ना होता है, पढ़े पर कोई प्रतिक्रिया हो तो आपस में बातें कर लेता है, लिख कर सार्वजनिक नहीं करता, और करे तो आलोचक/प्रचारक जैसा कुछ मान लिया जाता है। तलाश शुरू कि ‘खुन्नस क्यों है?‘ ‘आपसदारी निभाई जा रही है?‘ ‘चक्कर क्या है?‘ क्योंकि सामान्य पाठक को सिर्फ सामान्य नहीं, शायद मामूली भी माना जाता है। प्रतिनिधि रचनाएं, श्रेष्ठ संचयन, चुनी हुई कविताएं, लोकप्रिय कहानियां, जैसे संग्रहों में रचनाओं का काल और प्रकाशन संदर्भ दिया जाना दुर्लभ है, इससे लगता है कि पाठक को इससे परिचित कराना जरूरी नहीं माना जाता, उसे इसका अधिकारी नहीं माना जाता, जैसा यहां भी है।

प्रसंगवश याद करें तो छत्तीसगढ़ की महिला साहित्यकार, जो राष्ट्रीय स्तर पर जानी गई, लेकिन जिनकी अब चर्चा शायद ही होती है, उनमें मेहरुन्निसा जी के समानांतर दूसरा नाम निसंदेह डॉ. कुंतल गोयल ही होगा, जिन्हें 2009 में पंडित सुंदरलाल शर्मा, छत्तीसगढ़ राज्य साहित्य सम्मान प्राप्त हुआ। अमृता प्रीतम को छत्तीसगढ़ से जोड़कर यहां अक्सर याद कर लिया जाता है मगर ‘अहिरन‘ वाली मामोनी यानि इंदिरा गोस्वामी को शायद ही कभी। इसके साथ स्नेह मोहनीश ‘महापात्र‘, इंदिरा राय, शशि तिवारी, शांति यदु जैसे नाम भी हैं, जिन पर अब यदा-कदा ही चर्चा होती है। (यहां नाम जोड़ने-छोड़ने जैसी बात नहीं है। फिर भी स्पष्टीकरण कि छत्तीसगढ़ में ऐसी कई-एक महिला साहित्यकार हैं, जिनमें रायपुर की जया जादवानी वरिष्ठ हैं साथ ही पिछले दस वर्षों में युवा लेखिकाओं में जशपुर की अंकिता जैन, बिलासपुर-दुर्ग की मधु चतुर्वेदी, जांजगीर-रायपुर की श्रद्धा थवाईत और बीजापुर की पूनम वासम ने राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई है, सक्रिय हैं।)

Sunday, November 7, 2021

बस्तर - विवेकदत्त

संचालनालय संस्कृति एवं पुरातत्व द्वारा 28-29 जनवरी 2014 को राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की गई थी। गोष्ठी में आधार वक्तव्य प्रोफेसर विवेकदत्त झा, पूर्व विभागाध्यक्ष प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर का था। वह पुस्तिका के रूप में वितरित किया गया था, जो यहां प्रस्तुत है-

बस्तर का इतिहास एवं पुरातत्व

राज परिवारों की जय-पराजय तथा उपलब्धियों का लेखा-जोखा मात्र इतिहास नहीं है। इतिहास समाज का आइना है। संदर्भित काल के समाज की राजनीति, दर्शन, शिक्षा, साहित्य, कला-स्थापना, आर्थिक दशा, धर्म, परमपराओं, पर्यावरण और सामाजिक ताने-बाने को उजागर करने वाला इतिहास ही समग्र इतिहास है। इसलिए इतिहास को पंचमवेद कहा गया है।

किसी क्षेत्र की संस्कृति और इतिहास को स्वरूप देने में भूगोल तथा पारिस्थितिकी (इकोलॉजी) की अहम भूमिका होती है। उर्वर समतल भूमि, प्रचुर जल संसाधन और अनुकूल पारिस्थितिकी वाले क्षेत्र में विकास की गति तीव्र होती है। इसके उलट पहाड़ों, वादियों ऊँची-नीची और आवागमन के लिए प्रतिकूल असमतल भूआकृति वाले अंचल भौतिक विकास में पिछड़े होते हैं, किन्तु सांस्कृतिक विकास में संदर्भ में अधिक समृद्ध होते हैं। बस्तर जैसे अपेक्षाकृत कम विकसित एवम् आधुनिक सभ्यता से लगभग अप्रभावित तमाम क्षेत्रों का समाज अपनी जड़ों से रहन-सहन, लोकगीतों, लोककथाओं, धार्मिक उत्सवों, सामाजिक संगठन तथा कठिनाइयों के निराकरण में प्रयुक्त देशज उपायों-तकनीकों में अतीत सूत्र होते हैं। इन्हीं सूत्रों के सहारे वर्तमान से अतीत तक पहुँचना होता है। मुरिया, माड़िया, समाज में कन्या के वयस्क विवाह, विवाह में उसकी सहमति के अधिकार, कन्या मूल्य, अबुझमाड़ में भूमि पर ग्राम का सामूहिक स्वामित्व, नवान्न बनाने के उपयोग के पूर्व पूजा, वृक्ष और पशुपूजा, घोटुल, अर्थव्यवस्था, शव विसर्जन, उपासना, अतिथि सत्कार, सद्यः प्रसूता नारी को प्रदत्त सुविधाएँ दी गई।

छत्तीसगढ़ के दक्षिण-पश्चिम में स्थित क्षेत्रफल में केरल राज्य से बड़ा आदिवासी बहुल यह अंचल विभिन्न संस्कृतियों का संगम स्थल है। विगत कुछ वर्षों में आवागमन के साधनों में बढ़ोतरी आवश्य हुई है, प्राकृतिक संसाधनों का दोहन जारी है तथा शासन की अनेक परियोजनाएँ जारी हैं। इस सबके बावजूद विकास की गति धीमी है। विशाल वन, पर्वत श्रृंखलाएँ, गहरी नदियां, नौकायन के लिए अनुपयुक्त अनेक छोटी-छोटी जलधाराएँ और नक्सलवादी गतिविधियाँ प्रगति में बाधक हैं। लगभग 4,000 वर्ग किलोमीटर में फैले दुर्गम अबूझमाड़ में आवागमन के साधनों का लगभग अभाव है।

बस्तर अंचल रामायण काल में दण्डकारण्य, दक्षिण कोसल, महाभारत काल में कांतार, बुद्ध के समय कलिंग तथा गुप्तकाल में दक्षिणकोसल/ महाकांतार के अंतर्गत था। 9वीं-10वीं शताब्दी ईसवी में लगभग इस अंचल की संज्ञा चक्रकूट/ चककोट्य हो गयी। भ्रमरकोट्य बस्तर का एक क्षेत्र था। कालांतर में जब काकतीय राजवंश ने वर्तमान बस्तर ग्राम को राजधानी का गौरव प्रदान किया, तब उनके द्वारा शासित क्षेत्र की संज्ञा बस्तर हो गयी।

बस्तर के इतिहास तथा पुरातत्व को उजागर करने वाले विद्वानों में कर्नल ग्लसफर्ड, केप्टेन मेकवियर, केप्टेन इलियट, पण्डा बैजनाथ, केदारनाथ ठाकुर, एच. कृष्णा शास्त्री, वी. वी. मीराशी, रायबहादुर हीरालाल, एस.एन. राजगुरू, डब्लू.बी. ग्रिग्सन, वी.डी. कृष्णास्वामी, पण्डित सुंदरलाल त्रिपाठी, बी.सी. जैन, जेड. एम. कपूर, कृष्ण कुमार झा, हीरालाल शुक्ल और विवेक दत्त झा प्रमुख हैं। डेक्कन कॉलेज, पूना के कृष्णास्वामी ने सर्वप्रथम 1952 में प्रिहिस्टारिक बस्तर शीर्षक से शोधलेख प्रस्तुत कर इस अंचल के प्रागैतिहासिक अवशेषों पर प्रचुर प्रकाश डाला था। उसके पूर्व बस्तर रियासत के वनाधिकारी पं. केदारनाथ ठाकुर का ग्रन्थ बस्तर भूषण 1908 में प्रकाशित हो चुका था। उक्त ग्रन्थ बस्तर रियासत के राजनीतिक-सांस्कृतिक इतिहास तथा कलावशेषों की विस्तृत जानकारी प्रदान करता है। 1906-07 में बस्तर रियासत के तत्कालीन प्रशासक पण्डा बैजनाथ ने केशकाल के समीप स्थित गढ़धनोरा के प्राचीन टीलों में उत्खनन द्वारा शिवलिंग और ईंटों से निर्मित मंदिर अवशेष उजागर किए। कालांतर में मध्यप्रदेश शासन के पुरातत्व निदेशालय के पुरातत्वविद डॉ. जी.के. चन्द्रौल के द्वारा सर्व श्री नरेश पाठक, वेद प्रकाश नगायच, जी.एल. रायकवार एवं राहुल कुमार सिंह के सहयोग से गढ़धनोरा में उत्खनन के द्वारा नगर, मंदिर समूह और भग्नावशेष प्रकाश में लाने का कार्य किया। पण्डित सुंदरलाल त्रिपाठी ने रामायणकालीन घटनाओं से बस्तर क्षेत्र का सम्बन्ध स्थापित करने का सफल प्रयास किया।

प्राक-इतिहास - 1965 से 1985 के मध्य प्रोफेसर विवेक दत्त झा द्वारा किए गये अनुसंधान के फलस्वरूप पाषाणयुगीन संस्कृतियों, महाश्म संस्कृतियों की विस्तृत जानकारी के साथ-साथ स्थापत्य और मूर्तिकला पर नवीन सूचनाएँ उपलब्ध हुई। संस्कृति, कला और राजनीति के केन्द्रों का भी उद्घाटन हुआ।

निम्नपुरापाषाण कालीन उपकरण - इन्द्रावती, नारंगी, कांगेर, शबरी, खोलाब, भंवरडिग, तालचेरू, मिनगाचल तथा छोटी-छोटी नदियों, नालों के तट पर और समतल मैदानों में प्राप्त हुए हैं। मनुष्य को न तो मजबूत और काट-छॉंट के लिए उपयुक्त पत्थरों की जानकारी थी न उपकरण निर्माण के तकनीकों की। इसलिए, इस काल के उपकरण उन मोटे कणों वाले बलुआ पत्थर, फ्लिट और क्वार्टजाइट पर बने हैं जो सर्वत्र आसानी से उपलबध हो जाते थे। ये उपकरण बड़े और असुघड़ हैं। उपकरण निर्माण में शारीरिक शक्ति की भूमिका प्रमुख थी, बुद्धि का योगदान नगण्य। अविकसित मस्तिष्क के साथ मानवजीवन अत्यंत संघर्षपूर्ण था। शारीरिक और आर्थिक जरूरतों के चलते पुरूष और नारी साथ तो रहते थे, किंतु उनमें भावनात्मक लगाव नहीं था। संकट में समय एक-दूसरे का साथ छूट जाता था क्योंकि परिवार प्रथा का जन्म नहीं हुआ था। निपट अकेले, लगभग नग्न मनुष्य का आश्रय स्थल प्राकृतिक गुफाएँ थी। कृषि से अनभिज्ञ मानव का जीवन कन्द, मूल, फल और आखेट पर निर्भर था। दीर्घकाल तक चलने वाले निम्न पुरा पाषाण काल में बस्तर में प्राप्त पाषाण उपकरणों में विकास की दो अवस्थाएँ दिखाई देती हैं। प्रथम अवस्था में अनिश्चित आकार के बड़े उपकरणे में केवल कार्यांग (वर्किंग एज) के समीप काट-छॉट कर काम चलाउ भोथरी धार निर्मित की जाती थी। शेष भाग पर मूल पत्थर बना रहता है। दूसरी अवस्था में अपेक्षाकृत छोटे, लगभग नियमित आकार और तीक्ष्ण कार्यांग वाले उपकरण क्रमशः विकास के परिचायक हैं। मूठछुरा (हेण्डएक्स), खुर्चनी (स्केपर), गंडासा, कतरना (चॉपर, चॉपिंग टूल) और विदारक (क्लीवर) प्रमुख उपकरण हैं।

मध्यपुरापषाण काल (मिडिल पेलियोलिथिक एज) में लगभग 50,000 (पचास हजार) वर्ष पूर्व विकसित मस्तिष्क और दीर्घकालीन अनुभव के परिणामस्वरूप मनुष्य ने छोटे, बेहतर और कारगर बहुउपयोगी उपकरणों का निर्माण फ्लिंट, चर्ट, जास्पर और अगेट जैसे मजबूत तथा काट-छाँट के लिए उपयुक्त पत्थरों पर किया। संभवतः परिवार प्रथा का जन्म हो चुका था इसलिए परिवार में श्रम विभाजन प्रारंभ हुआ और पहले की तुलना में उदरपूर्ति के साधन जुटाना आसान हो गया। जलवायु परिवर्तन के कारण इस युग में उपकरण निर्माण की तकनीक में विकास हुआ। बुद्धि और शक्ति के उपयोग द्वारा पत्थर की भारी तथा बाणफलक जैसे सपुच्छ उपकरण बनाये जाने लगे। तीर-धनुष का उपयोग किया जाने लगा। बाणफलक, खुर्चनी, अग्रास्त्र, ब्लेड उस काल के प्रमुख उपकरण हैं। बस्तर के विभिन्न क्षेत्रों में इस काल के सभी उपकरण प्राप्त हुए हैं।

भारत में लगभग 35,000 वर्ष पहले एक और जलवायु परिवर्तन के साथ उच्च पुरा पाषाण काल (अपर पेलियोलिथिक एज) का प्रारंभ हुआ। होमोसेपियन्स (प्रज्ञ मानव) नामक मानव प्रजाति का पदार्पण हुआ। वह विकसित मस्तिष्क वाला था। जलवायु परिवर्तन के कारण धरती की सतह पर एकत्र बर्फ की चादर पिघली और वनस्पतियों का विस्तार हुआ। विकसित तकनीक द्वारा बहुत छोटे, तीक्ष्ण और सुडौल उपकरण निर्मित किए जाने लगे। उपकरणों को लकड़ी और हड्डी की मूठ लगाकर उपयोग में लाया गया। उक्त उपकरणों द्वारा वनोपज को काटकर संग्रहीत किया जाने लगा। अतिरिक्त मांस का संग्रह भी होने लगा। श्रम विभाजन के फलस्वरूप वनोपज संग्रह, आखेट, उपकरण निर्माण का दायित्व परिवार के अलग-अलग सदस्यों का होता था। ब्लेड और तक्षणी (ही व्यूरिन) प्रमुख उपकरण थे। भाला, धनुष-बाण के उपयोग द्वारा जलजीवों का आखेट भी प्रारंभ हुआ। इसी युग में हड्डी, लकड़ी और मुलायम पत्थरों पर मानव, पशु और पक्षी आकृति निर्मित की जाने लगी। हड्डी, सींग, सीपी और पत्थर के आभूषणों का निर्माण भी प्रारंभ हुआ। बस्तर में उक्त आभूषण और शैल चित्र (इस काल के) नहीं मिले हैं। देश के कुछ क्षेत्रों में इस काल के शैलचित्र प्राप्त हुए हैं। चर्ट, फ्लिंट ओपल, जस्पर, अगेट, चालसीडोनी, क्वार्ट्स और गनफ्लिंट जैसे बेहतर पत्थरों पर लम्बे और पतले ब्लेड निर्मित किए गये।

मध्यपाषाण काल (मेसोलिथिक एज) में बाणफलक, छेदक, तक्षणी, आरी ब्लेड जैसे सूक्ष्म पाषाण उपकरण ब्लेड तथा निपीड़ प्रविधि द्वारा निर्मित किए गये। अधिकतर प्राकृतिक गुफाओं, शैलगृहों में समय गुजारने वाले मानव ने अपने चतुर्दिक प्रकृति, दैनिक कार्यकलापों, पशु-पक्षी और आखेट में चित्रों का आरेखन गुफा की दीवार और छत पर किया गया। गेरू, हेमेटाइट पत्थर, पीली तथा खड़िया मिट्टी और पत्तियों के रस द्वारा बनाये गये ये चित्र तत्कालीन मानव जीवन के विविध पक्षों पर प्रकाश डालते हैं। मृतक के शव को गुफा के फर्श पर दफनाने की प्रथा के प्रचलन के प्रमाण भी उपलब्ध हुए हैं। इस समय तक सामाजिक संगठन का सूत्रपात हो गया, जिसके द्योतक विशाल उपकरण निर्माण स्थलों (फैक्टरी साइट) और चित्रित शैलगृहों की बड़ी संख्या है। वस्तु विनिमय प्रथा प्रचलित थी। संभवतः, फैक्टरी समूह और चित्रित गुफाओं में समीप आवश्यक वस्तुओं का लेन-देन किया जाता था। खुले मौसम में मैदान में अस्थाई शिविर बनाये जाते थे।

नवपाषाण युग (नियोलिथिक एज) - पाषाण युग का अंतिम चरण था। पर वास्तव में इस युग में हुई सांस्कृतिक क्रांति के फलस्वरूप विकास क्रम ने गति प्राप्त की। बढ़ी हुई जनसंख्या की उदरपूर्ति आखेट और वनोपज पर संभव नहीं थी। विकल्प के रूप में पशुपालन और कृषि को अपनाया गया इसके लिए मानव शक्ति की आवश्यकता अनिवार्य थी। फलतः बड़े और सुसंगठित कबीले का जन्म हुआ और खेती के लिए स्थाई रूप से मनुष्य एक ठिकाने पर रहने लगा। इसी वजह से झोपड़ी का जन्म हुआ। अनाज और जल संग्रहण के लिए मिट्टी के बर्तन बनाये गये तथा खेती और झोपड़ी के लिए जंगल की सफाई हेतु बड़े प्रस्तर कुठार छेनी, बसूला बनाये गये जो धारदार तथा नियमित आकार के होते थे। अनजान मनुष्य ने जंगल जलाकर, नुकीली लकड़ी से मिट्टी गोड़कर पहाड़ी ढलानों में खेती करना प्रारम्भ किया। बस्तर जिला के अबूझमाड़ में इसी प्रकार की चलखेती आज भी प्रचलित है। तब की भॉति अब भी बेबर या झूम खेती की जमीन पर गॉव और कबीले का स्वामित्व होता है। संग्रहीत अनाज, पशुधन और स्त्रियों पर अधिकार के लिए कबीले एक दूसरे पर आकमण करने लगे। आक्रमणों से रक्षा के लिए ऊँचे पठारों पर बस्ती बसकर पत्थर की बाड़ उसके चारों ओर बनाई जाती थी। बस्तर जिला के वेदरे (कुटरू में समीप), गढ़चंदेला (लोहाण्डीगुड़ा के समीप), गढ़धनोरा और तीरथगढ़ में पठार पर ऐसे आवास स्थल पाये गये हैं। बस्तर अंचल में छोटे डोंगर, गढ़चंदेला और दोरनापाल में पत्थर की चिकनी-धारदार कुल्हाड़ियां प्राप्त हुई है।

महाश्म शवागार संस्कृति (मेगालिथिक कल्चर) - इस संस्कृति के उद्भव केन्द्र एवं उद्भव काल पर मत वैभिन्य है। यह माना जाता है कि मध्यभारत में इसका उद्भव काल 1000 ईसापूर्व के लगभग है। इस लौहकालीन संस्कृति में मानव शव को कब्र में रखकर उसके चहुँ ओर विशाल प्रस्तर खण्डों को लम्बवत खड़ाकर कब्र को चपटे-मोटे पत्थर से ढंक दिया जाता था। समीप ही एक विशाल प्रस्तर खड़ा करने की प्रथा थी। शव के साथ अन्न, जल, अस्त्र-शस्त्र और पकी मिट्टी के पात्र, आभूषण इत्यादि रखे जाते थे। वस्तुतः यह पुनर्जन्म पर आस्था का संकेत है। दूसरे लोक की यात्रा में और वहां पहुंचने पर मृतक को भोजन, जल और जीविकोपार्जन के लिए अस्त्र-शस्त्र की आवश्यकता होगी। इस विश्वास के वशीभूत यह किया जाता था।

उल्लेखनीय है कि बस्तर जिले में मुरिया और माड़िया समाज में यह परम्परा आज भी जीवित है। नेला कांकेर, करकेली, इरपा, हांदामुडा, संकनपल्ली, राये, गोंगपाल सहित अन्य अनेक स्थलों में बड़े प्रस्तर खण्डों से आवृत्त कब्र और/अथवा लम्बवत खड़े किए गये पत्थर के, स्मृति स्तंभ प्राप्त हुए हैं। कहीं-कहीं काष्ठ स्तंभ, जिसपर मानव और पशु-पक्षियों, सरीसृपों की आकृतियाँ उकेरी गयी हैं, भी हैं। ऐसे स्तंभों को ‘माड़िया खुंटा‘ कहा जाता है। बस्तर में प्राप्त कब्रों में मिट्टी के बर्तन, नृत्य की वेशभूषा कुल्हाड़ी, तीर धनुष और बैल की पूँछ तथा सींग रखी जाती है।

मानव शव को भूमि में दफनाकर उसके ऊपर कब्र निर्मित करने की प्रथा ऋग्वैदिक संस्कृति में प्रचलित थी। ऋग्वेद (ऋग्वेद 10,15,14,10,18,13) में मानव शव को भूमि में गाड़कर उसके ऊपर काष्ठ स्तंभ स्थापित करने का उल्लेख है। मृतक शरीर की उपलब्धि के लिए भूमिगृह (शवाधान) में धनुष सहित सभी वस्तुएँ रखे जाने का निर्देश भी है (ऋग्वेद, 7,89,1) यजुर्वेद, तैत्तिरीय ब्राह्मण और शतपथ ब्राह्मण में भी इसी प्रकार का उल्लेख मिलते हैं।

शैलचित्र, शैलोत्कीर्ण चित्र (रॉक पेन्टिंग, रॉक एनग्रेविंग) - उच्च पुरापाषाण काल में प्रज्ञ मानव ने अवकाश के क्षणों में काष्ठ, अस्थि और प्रस्तर की छोटी प्रतिमाओं, आभूषणों के निर्माण के साथ-साथ नैसर्गिक रंगों से गुफाओं के अंदर और बाहर रेखाचित्र बनाना प्रारंभ किया। इन रेखा चित्रों में सूर्य, चंद्र, तारा, पशु-पक्षी, आखेट, समूह नृत्य, जलधारा, अस्त्र-शस्त्र और तत्कालीन जीवन के विविध पक्षों का प्रदर्शन हुआ है। यह परम्परा परवर्ती कालों में चलती रही। देश के आंतरिक अंचलों में आज भी मिट्टी की बनी झोपड़ियों की वाह्य दीवारों पर पशु-पक्षियों, सूर्य, चन्द्र, तारा और वृक्षों के रंगीन चित्र पाये जाते हैं।

बस्तर में उच्च पुरापाषाण युगीन और मध्य पाषाण युगीन शैल चित्र अब तक नहीं मिले हैं। ताम्रपाषाण काल में और उसके परवर्ती चित्र बस्तर के शैलगृहों में चित्रकूट जलप्रपात के समीप मटनार, बड़े डोंगर के समीप आलोर की लिंगसहाय डोंगरी, उसूर के समीप नडपल्ली और नम्बीधारा, एड़का तथा चारामा, कांकेर क्षेत्र में पाये गये हैं। विभिन्न स्थलों में प्राप्त कत्थई रंग से चित्रित हैं। अबूझमाड़ में भीतरी क्षेत्र में स्थित एरिमट्टी और कोहकापाल क्षेत्र में अनेक चित्रित शैलगृह हैं। नम्बीधारा में चित्रित गुफा के प्रवेश के पार्श्व में उत्कीर्ण मानव मस्तक बस्तर में प्राप्त एकमात्र रॉक एनग्रेविंग है।

शैलचित्र तथा महाश्म शवागारों के अतिरिक्त बस्तर में आद्य ऐतिहासिक काल (प्रोटोहिस्टारिक पीरियड) के अवशेष उपलब्ध नहीं हैं। दंतेवाड़ा में दंतेश्वरी मंदिर के समीप नदी में जाने वाली कच्ची पगडण्डी में खुदे हुए एक गर्त में मुझे धूप में सुखाई ऐसी ईंटे प्राप्त हुई थी जिसका माप प्राक-हड़प्पा संस्कृति की ईंटों के समान है। इस प्रमाण की पुष्टि हेतु सघन अन्वेषण की आवश्यकता है। स्मरणीय है कि बस्तर में आद्य ऐतिहासिक संस्कृति के मिट्टी के भाण्ड प्राप्त नहीं हुए हैं। इसलिए, इस संदर्भ में कोई निर्णय लेना तर्कसंगत नहीं है।

परोक्ष प्रमाण ऋगवैदिक काल तथा महाकाव्य काल की संस्कृति से बस्तर का सम्पर्क प्रदर्शित करते हैं। वैदिक साहित्य में वर्णित शव विसर्जन, पुनर्जन्म पर विश्वास, पितृपूजा, कन्या का वयस्क विवाह, मुण्डन, नामकरण संस्कार इत्यादि बस्तर के मूल निवासियों में प्रचलित हैं। मातृदेवी (वस्तुतः उर्वरा की देवी पृथ्वी) की उपासना ऋग्वैदिक काल, हड़प्पा संस्कृति से लेकर प्रारंभिक ऐतिहासिक काल में प्रचलित रही है। मातृदेवी, लज्जिका, नग्निका इत्यादि संज्ञाओं से विभूषित देवी प्रतिमाएं हड़प्पा संस्कृति, परवर्ती संस्कृतियों में निर्मित की जाती थी। बस्तर के मुरिया, माड़िया धरती की माता के रूप में उपासना करते हैं, उनके समाज की प्रत्येक झोपड़ी में पूर्वजों के लिए एक अन्नपात्र रहता है। काष्ठनिर्मित स्मृति स्तंभ (माड़िया खूटा) पर अन्य आकृतियों के साथ मातृदेवी की आकृति उकेरे जाने के कुछ उदाहरण मिले हैं। गढ़बोधरा में ग्यारहवीं-बारहवीं शताब्दी में निर्मित मातृदेवी की एक प्रस्तर प्रतिमा प्राप्त हुई है। उक्त प्रतिमा में नारी का मस्तक और दोनों हाथ प्रयोजन वश नहीं उकेरे गये हैं। उन्नतवक्ष आकृति कूल्हों के बल दोनों पैर फैलाकर बैठी है, जिसके दोनों घुटने और दोनों पंजे बाहर की ओर मुड़े हैं, योनि समादर पूर्वक प्रदर्शित है। अलंकृत कटिमेखला, अनेक पादवलयों और कड़ों से सुशोभित देवी के स्कंध पार्श्वों में गोलाकार कमलाकृति उकेरी गयी है।

रामायण काल में छत्तीसगढ़ को दक्षिण कोसल कहा गया है। दक्षिण कोसल में बस्तर और उसके निकटवर्ती क्षेत्र कांतार के नाम से जाने जाते थे। कांतार की समुद्रगुप्त के शासन काल में, महाकांतार संज्ञा हो गयी, जिसमें शासक व्याघ्रराज को समुद्रगुप्त ने पराजित किया था। यह व्याघ्रराज संभवतः नल शासक वराहराज का पूर्वज था। बस्तर का भगवान राम से सम्पर्क था। प्रोफेसर के.डी. वाजपेयी और पण्डित सुंदरलाल त्रिपाठी के इस मत से लेखक की पूर्ण सहमति है कि भगवान राम बनवास काल में बस्तर गये थे। वाल्मीकि रामायण के अरण्यकाण्ड में जिस चित्रकूट का उल्लेख हुआ है वह बस्तर का चित्रकूट जलप्रपात है। स्मरणीय है कि, वाल्मीकि रामायण के अयोध्याकाण्ड में भी चित्रकूट की चर्चा है। इस प्रकार, अरण्यकाण्ड और अयोध्याकाण्ड के चित्रकूट भिन्न-भिन्न थे। अयोध्याकाण्ड का चित्रकूट कामतानाथ गिरी (जिला बांदा) में है। रावण को निर्मूल करने के पश्चात पुष्पक विमान से अयोध्या लौटते हुए श्रीराम ने भगवती सीता को दण्डकारण्य में स्थित चित्रकूट का दर्शन कराया, उसका वर्णन कालिदास कृत रघुवंश में हुआ है। पंडित सुंदरलाल त्रिपाठी ने इस मत की स्थापना की जिसका समर्थन प्रोफेसर वाजपेयी और संस्कृत के प्रख्यात विद्वान रेवाप्रसाद द्विवेदी ने किया है। रघुवंश में चित्रकूट के जलप्रपात तथा वहाँ की प्रकृति की जो चर्चा है वह पूर्णतः बस्तर के चित्रकूट से मिलती है। बस्तर में प्रचलित परम्पराएँ और स्थलनाम यथा शबरी नदी, शबर (सौरा), बीजापुर और नारायणपुर जिलों में स्थित कोसलनार ग्राम, कुशनार ग्राम (कुश के समर्पित), श्री राम का अंचल से सम्पर्क प्रदर्शित करते है। रघुवंश और वाल्मीकि रामायण के विवरणों से स्पष्ट है कि कुश का दक्षिण कोसल पर अधिकार था। ऐतरेय ब्राह्मण, मत्स्य पुराण तथा वायुपुराण में शबर जाति को दक्षिणापथ का निवासी कहा गया है।

महाभारत कालीन प्रख्यात नरेश निषधपति नल का संबंध बस्तर क्षेत्र से रहा है। महाभारत के नलोपाख्यान, शतपथ ब्राह्मण और कथासरित सागर में वर्णित नल का निषध देश बस्तर का निकटवर्ती क्षेत्र में रहा है। यद्यपि, विद्वान क्रमशः बरार, दक्षिण मालवा, उच्च और निम्न विन्ध्य क्षेत्र, बरार के उत्तर-पश्चिम में सतपुड़ा के निकट विन्ध्य और पयोष्णी के निकटवर्ती क्षेत्र में निषधदेश की स्थिति मानते है, तथापि नलोपाख्यान (महाभारत) में यह विवरण मिलता है कि राज्यच्युत राजा नल 10 दिनों की पदयात्रा कर कोसल (दक्षिण कोसल) के राजा ऋतुपर्ण की राजधानी सुपला पहुंचा। आपस्तम्ब धर्मसूत्र में भी कोसल नरेश ऋतुपर्ण की राजधानी सुफला बतलायी गयी है। स्मरणीय है कि कोसल (अयोध्या) में शासकों की सूची में ऋतुपर्ण का नाम नहीं मिलता है, न ही सुफला का उल्लेख उत्तरकोसल की राजधानी के रूप में कहीं हुआ है। अतः ऋतुपर्ण को दक्षिण कोसल का शासक मानना होगा, उसकी राजधानी तक 10 दिनों की पदयात्रा द्वारा पहुंचने वाला राजा नल दक्षिण कोसल के अंतर्गत किसी क्षेत्र का शासक रहा है। बस्तर, कोरापुट और दुर्ग जिलों में प्रारंभिक नल शासकों की मुद्राएँ, पुरालेख और कलावशेष पाये गये हैं। कोरापुट जिले में स्थित पोड़ागढ़ की पहचान प्रारंभिक नल शासकों की राजधानी पुष्करी से की गयी है। प्रारंभिक नल नरेश अपने आप को पौराणिक नल का वंशज मानते थे। इसलिए, पौराणिक नल का राज्य निषध, कोरापुट, बस्तर, रायपुर, दुर्ग जिलों में कहीं स्थित था। परवर्ती नल शासक विलासतुंग का अभिलेख भी राजिम (जिला रायपुर) में है।

इतिहास - बस्तर का प्रारंभिक इतिहास उजागर करने वाले साक्ष्य अनुपलब्ध हैं। नंद-मौर्य काल में नंदों और मौर्यों ने बिहार से लेकर गोदावरी नदी घाटी और उड़ीसा सहित भारत के बड़े क्षेत्र, अपने अधिकार में कर लिया। संभवतः कलिंग विजय के उपक्रम में अशोक ने बस्तर पर अधिकार किया था। आलोर ग्राम के समीप चित्रित गुफा में मौर्यकालीन शंखलिपि में एक अभिलेख है। कलिंग नरेश खारवेल ने भी बस्तर को पद्दलित किया होगा। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिला के अंतर्गत मल्हार में सातवाहन शासक वेदश्री की मृण्मुद्रा, गुंजी और किरारी के अभिलेख, छत्तीसगढ़ में सातवाहनों का अधिकार प्रदर्शित करते हैं। किन्तु, बस्तर पर उनके अधिकार का प्रामाणिक साक्ष्य नहीं है। बस्तर ग्राम में प्राप्त विष्णु की एक प्रतिमा सातवाहन कला से प्रभावित है। दक्षिण कोसल (छत्तीसगढ़) और महाकांतार (बस्तर क्षेत्र) पर जब सम्राट समुद्रगुप्त ने आक्रमण किया तब बस्तर पर व्याघ्रराज का अधिकार था। व्याघ्रराज संभवतः नल शासक वराहराज का पूर्वज था। ग्रहण मोक्ष नीति के अंतर्गत समुद्रगुप्त ने दक्षिणापथ में पराजित राजाओं को स्वाधीन कर दिया। फलस्वरूप, नल नृपति बस्तर और समीपवर्ती क्षेत्रों पर शासन करते रहे। गुप्तवंश के नल राजाओं से संबंध सौहार्दपूर्ण बने रहे। इसीलिए, परवर्ती नल शासक भवदत्तवर्मन ने गुप्तों के केन्द्र प्रयाग तक जाकर वहाँ दान दिया।

उत्तर बस्तर में पाला, गुबरहिन तथा गढ़धनोरा के कला और स्थापत्य अवशेष, छोटे डोंगर का पाँचवी शताब्दी का अभिलिखित सती स्तंभ नल शासन काल के हैं। प्रतीत होता है कि गढ़धनोरा उत्तर बस्तर में नलों का प्रशासनिक केन्द्र था। गढ़घनोरा के समीप एडेंगा में नल राजाओं की स्वर्ण मुद्राएँ प्राप्त हुई हैं। भवदत्तवर्मन और अर्थपति शैव धर्मावलम्बी थे, तो स्कंदवर्मन वैष्णव। स्कंदवर्मन ने पुष्करी में विष्णु मंदिर निर्मित किया था, भवदत्त और अर्थपति की स्वर्णमुद्राओं में शिव का स्तवगान किया गया है। एडेंगा के अतिरिक्त कुलिया (जिला दुर्ग) में भवदत्तवर्मन, अर्थपति, स्तंभ और नंदनराज नामक नल राजाओं की स्वर्ण मुद्राएँ पायी गयी हैं। राजिम (रायपुर) में परवर्ती नल नरेश विलासत्तुंग का अभिलेख है। नलों का दूसरा प्रशासनिक केन्द्र पुष्करी में था। पुष्करी की पहचान कोरापुट जिले के पोड़ागढ़ से की गई है, वहां स्कंदवर्मन का अभिलेख और विष्णुमंदिर के अवशेष हैं। भवदत्तवर्मन नलवंश का सर्वाधिक शक्तिशाली नरेश था। उसने वाकाटक नरेश को पराजित कर उनकी राजधानी नंदिवर्धन पर कब्जा कर लिया था। पृथ्वीषेण द्वितीय के बालाघाट ताम्रपत्र तथा अजंता अभिलेख से जानकारी मिलती है कि कलिंग, कुन्तल, अवंति, मालवा, कोसल तथा आन्ध्र पर वाकाटकों का अधिकार था। कोसल (दक्षिण) आंध्र, और कलिंग से सम्पृक्त बस्तर पर भी वाकाटकों का अधिकार था। प्रोफेसर मिराशी के अनुसार भवदत्त ने वाकाटक नरेन्द्रषेण को पराजित किया था और वाकाटक राजधानी विवर्धन से अपना अभिलेख प्रचलित किया। भवदत्त का साम्राज्य कोरापुट, बस्तर, रायपुर और दुर्ग जिलों तक विस्तृत था। उसके द्वारा प्रयाग यात्रा और दान दिये जाने का अभिलेखीय प्रमाण भी है।

वाकाटक नरेन्द्रषेण के पुत्र पृथ्वीसेन द्वितीय ने समकालीन नरेश अर्थपति को, जो भवदत्त का पुत्र और उत्तराधिकारी था, पराजित कर नल साम्राज्य के कुछ भाग पर अधिकार कर लिया अर्थपति का अधिकार बस्तर कोरापुट तक सीमित रह गया। कुछ साल बाद वासिम शाखा के वाकाटक अधिपति हरिषेण ने 480 ईसवी के पूर्व नल शासक अर्थपति को पुनः पराजित कर उनकी राजधानी पुष्करी को नष्ट कर दिया। उनके आक्रमण के दौरान संभवतः अर्थपति मारा गया। अर्थपति के अनुज स्कंदवर्मन ने वाकाटक हरिषेण से नल प्रदेश छीनकर पूर्वजों के राज केन्द्र पुष्करी का जीर्णाेद्वार किया। नंदनराज और स्तंभ नामक नल शासकों ने स्वर्णमुद्राएँ प्रचलित की थी, किन्तु उनके शासन काल और घटनाओं की जानकारी प्रदान कारने वाले प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। उनकी स्वर्ण मुद्राओं के आकार-प्रकार, भार और उन पर अंकित आकृति तथा प्रतीक का अन्य नल शासकों की स्वर्ण मुद्राओं से पूर्ण साम्य है, इस आधार पर उन्हें नलवंशी शासक माना गया है।

बस्तर क्षेत्र को एक राजनीतिक सूत्र में पिरोकर स्थायी शासन प्रदान करने का श्रेय नलवंश को है। उन्होंने ही सर्वप्रथम इस अंचल में स्वर्णमुद्राएँ प्रचलित की। देव प्रतिमाओं तथा देवमंदिरों के निर्माण का सूत्रपात किया। उल्लेखनीय है कि उड़ीसा के कोरापुट जिले का अधिकांश क्षेत्र ईसवी सन 1811 तक एवं रायपुर जिले का सिहावा क्षेत्र ईसवी सन 1830 तक बस्तर रियासत के अंतर्गत था। नलों के उपरांत पाण्डुवंशियों ने कुछ काल के लिए इस क्षेत्र पर अधिकार किया, बाद में जो चालुक्य कीर्तिवर्मन के हाथों पराजित हुए। पाँचवी शताब्दी ईसवी से बिलासपुर, दुर्ग, रायपुर, कालाहांडी, सम्बलपुर और रायगढ़ क्षेत्र पर शासनरत शरभपुरिया शासकों का आधिपत्य भी बस्तर पर रहा प्रतीत होता है। छोटे डोंगर (बस्तर) में प्राप्त छठी शताब्दी ईसवी के एक नष्टप्रायः शिलालेख में ‘शरभ‘ शब्द पठनीय है।

सातवीं-आठवीं शताब्दी के लगभग बस्तर और उसके आसपास चक्रकूट/ चककोट्य/ शक्करकोट्टम/चित्रकूट कहलाया। राष्ट्रकूट नरेश दंतिदुर्ग के सामंत राजा बेमुलवाड़ के युद्धमल प्रथम ने चित्रकूट के अभेद्य प्राकृतिक दुर्ग को जीत लिया। चित्रकूट का यह प्राकृतिक दुर्ग बस्तर के चित्रकूट जलप्रपात के समीप इन्द्रावती और नारंगी नदियों के संगम पर स्थित गढ़बोधरा दुर्ग है। तीन ओर से नदियों तथा चौथी ओर से मिट्टी की सुरक्षा दीवार से घिरा हुआ यह दुर्ग वास्तव में अभेद्य रहा है। कुछ विद्वानों की मान्यता है कि कामतानाथ गिरि (जिला बांदा) के चित्रकूट को युद्धमल प्रथम ने हस्तगत किया था। किन्तु, यह स्वीकार नहीं किया जा सकता क्योंकि वहाँ कोई दुर्ग नहीं है, न ही युद्धमल का मध्यभारत क्षेत्र पर भी अधिकार रहा है। पम्पकृत विक्रमार्जुन विजय में उल्लेख है कि राष्ट्रकूट कृष्ण द्वितीय के सामंत बड्डेग प्रथम सोलदगुण्ड ने चक्रकूट पर विजय प्राप्त की। इस अंचल पर अधिकार हेतु राष्ट्रकूटों और चालुक्यों में दीर्घकालीन संघर्ष हुआ। इस संघर्ष के दौरान कभी चालुक्यों और कभी राष्ट्रकूटों का इस पर अधिकार रहा। चालुक्य विजयादिव्य तृतीय ने अपने विजय अभियान में चक्रकूट को अग्निसात कर दिया था यह मल्लपदेव के पीठापुरम अभिलेख में वर्णित है।

10वीं शताब्दी के अंतिम चरण में बस्तर के बड़े क्षेत्र पर नागवंश का अधिकार हो गया। नागवंश के शासन काल में परमार, चालुक्य और कलचुरि नरेश बस्तर पर आक्रमण करते रहे। उदयपुर प्रशस्ति, जयनाद अभिलेख और नवसाहसांकचरित परमारों का बस्तर क्षेत्र पर अधिकार प्रदर्शित करते हैं। नवसाहसांकचरित के अनुसार दक्षिण कोसल के विजेता परमार नरेश सिंधुराज ने भोगवती के नाग शासक शंखपाल की कन्या शशिप्रभा से विवाह किया था। शंखपाल चक्रकूट में राज्य करने वाले भोगवती पुरवरेश्वर नाग शासकों का पूर्वज था और कलचुरि जगदेव ने संयुक्त अभियान के दौरान काकरय (कांकेर) नरेश को पराजित किया।

चक्रकूट पर अधिकार के लिए पश्चिमी चालुक्यों और चोलों के एकाधिक आक्रमण 11वीं शताब्दी में हुए। चक्रकूट पर ग्यारहवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में राजेन्द्र चोल प्रथम ने अधिकार कर लिया उस समय संभवतः नृपतिभूषण, जिसका 1023 ईसवी का अभिलेख एर्राकोट में प्राप्त हुआ है, चक्रकूट का अधिपति था। चोल राजेन्द्र प्रथम ने चक्रकूट में अपने प्रतिनिधि के रूप में संभवतः नाग धारावर्ष को नियुक्त किया। कुछ समय पश्चात् 1047 ईसवी के लगभग चालुक्य सोमेश्वर प्रथम ने चक्रकूट पर आक्रमण किया। उक्त आक्रमण में चालुक्य राजा ने सेनापति नागवर्मा ने चक्रकूट में कालकूट धारावर्ष को पराजित किया यह नांदेड़ अभिलेख में लिखा है। यह धारावर्ष चक्रकूट में चोल राजेन्द्र प्रथम का प्रतिनिधि था। 1055 ईसवी के लगभग चालुक्य विक्रमादित्य षष्ठ ने चक्रकूट पर विजय प्राप्त की जिसका उल्लेख विक्रमांकदेवचरित तथा जयनाद अभिलेख में हुआ है। 1068 में लगभग वीर राजेन्द्र चोल ने चक्रकूट में चालुक्य नरेश को पराजित किया जिसका विवरण तिरूम्मकुदल अभिलेख में है। पराजित चालुक्य शासक सोमेश्वर प्रथम था। चोल कुलोत्तुंग प्रथम ने भी बस्तर पर अधिकार किया था। तमिल युद्ध काव्य कलिंगत्तुत्परणि के साथ-साथ अभिलेखों द्वारा भी सिद्ध हुआ है।

उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर नृपतिभूषण को बस्तर का प्रथम नागवंशी शासक माना गया है जिसका 1023 ई. का अभिलेख प्राप्त हुआ है। किंतु परोक्ष साक्ष्य इंगित करते हैं कि नागवंश का आधिपत्य नृपतिभूषण के पूर्व भी बस्तर पर था। नवसाहसांकचरित में सिंधुराज के द्वारा भोगवती के नाग शासक शंखपाल की कन्या से विवाह किये जाने का विवरण है। बस्तर के ज्ञात नागवंशी शासकों की उपाधि उनके अभिलेखों में ‘भोगवतीपुरवरेश्वर‘ मिलती है। अतः दसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में भोगवती अधिपति शंखपाल को नृपतिभूषण का पूर्वज बस्तर का नागवंशी शासक स्वीकार करना चाहिए। इसके भी पूर्व संभवतः वल्लभराज नामक नागवंशी शासक बस्तर पर शासन कर रहा था। चित्रकूट के निकटवर्ती उपेत नामक ग्राम में 9वीं शताब्दी ताम्रपत्र मिला है जिस पर ताम्रलेख ‘चक्रकूट शासति वल्लभराजुलु नागावंतश‘ है। निःसंदेह वल्लभराज 9वीं शताब्दी में बस्तर का नाग नृपति था। प्रस्तुत पंक्तियों के लेखक को छोटे डोंगर में एक प्रस्तर अभिलेख मिला है। 9वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में उक्त अभिलेख में वंखकादिव्य नामक शासक का नामोल्लेख हुआ, परंतु उसके वंश का उल्लेख करने वाला अंश नष्ट हो गया है। अतः वह नागवंश का ही था यह अंतिम रूप से नहीं कहा जा सकता। जो भी हो, बस्तर में नागवंश का इतिहास 11वीं शताब्दी से नहीं बल्कि वल्लभराज के साथ 9वीं शताब्दी से प्रारंभ स्वीकार किया जाना चाहिए।

बस्तर में नाग शासकों की वंशावली, उनके अनुकम को लेकर मत वैभिन्य है। कृष्णाशास्त्री तथा बालचन्द्र जैन के मतानुसार 1060 ई. के बारसुर अभिलेख में उल्लिखित धारावर्ष जगदेक भूषण उत्तराधिकारी था नृपतिभूषण का। धारावर्ष जगदेकभूषण एक ही व्यक्ति था। एस.एन. राजगुरू के अनुसार धारावर्ष और जगदेकभूषण भिन्न शासक थे। वस्तुतः नृपतिभूषण और धारावर्ष को अलग शासक स्वीकार करना चाहिए। चन्द्रादित्य के उक्त बारसुर अभिलेख में धारावर्ष के लिए ‘महाराज‘ संज्ञा प्रयुक्त हुई है, इसलिए यह भ्रम पैदा हुआ है। किन्तु उसी अभिलेख में जगदेकभूषण के माण्डलिक चन्द्रादित्य के लिए की ‘महाराज‘ भी उपाधि प्रयुक्त होना विचारणीय है। दरअसल, धारावर्ष और चन्द्रादित्य दोनों ही जगदेकभूषण के अधीन माण्डलिक राजा थे। धारावर्ष की राजमहिषी गुण्डमहादेवी के नारायणपाल अभिलेख तथा कुरुसपाल अभिलेख में धारावर्ष की उपाधि राजभूषण है। नांदेड़ अभिलेख में चालुक्य सेनापति नागवर्मा के द्वारा चक्रकूट में कालकूट धारावर्ष को पराजित किये जाने का उल्लेख है, जगदेवभूषण का नामोल्लेख नहीं हुआ है। प्रतीत होता है कि 1028 ईसवी के लगभग राजेन्द्र चोल प्रथम ने बस्तर के नागशासक नृपतिभूषण को पराजित कर धारावर्ष को अपने अधीन चक्रकूट (बस्तर) का शासक नियुक्त किया। चोलों के प्रतिद्वंदी चालुक्य सोमेश्वर प्रथम और उसके पुत्र विक्रमादित्य षष्ठ ने 1044 ई. से लेकर 1055 ई. के मध्य चक्रकूट पर आक्रमण कर वहाँ के शासक चोल राजा के प्रतिनिधि धारावर्ष को पराजित कर जगदेकभूषण को चक्रकूट का राजा नियुक्त किया। धारावर्ष और जगदेवभूषण दो अलग-अलग नागवंश की शाखा के थे। प्रतीत होता है कि दोनों परस्पर संबंधी थे। इसीलिए जगदेकभूषण ने धारावर्ष को अपना माण्डलिक राजा नियुक्त कर दिया। अभिलेखिक प्रमाण सिद्ध करते हैं कि 1060 ईसवी तक धारावर्ष निश्चित रूप से जगदेकभूषण का माण्डलिक रहा है।/div>

जगदेकभूषण के शासन काल का अंत कब हुआ यह ज्ञात नहीं है। जगदेकभूषण के पश्चात् मधुरांतकदेव, जो संभवतः उसका वंशज था, भ्रमरकोट्य मण्डल का शासक हुआ 1065 ईसवी के पूर्व। 1069 ईसवी के पूर्व धारावर्ष के पुत्र सोमेश्वर, मधुरांतक देव का वध कर चक्रकूट का शासक बन बैठा। दीर्घकालीन शासन, लगभग 1069 से लगभग 1111 ईसवी तक, शासन करने वाला नाग शासक सोमेश्वर इस वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली नृपति था। उसके शासन काल में आर्थिक तथा सांस्कृतिक क्षेत्र में बहुत विकास हुआ। उसकी स्वर्ण मुद्राओं और उसके काल में निर्मित देवालयों, प्रतिमाओं तथा जलाशयों द्वारा समृद्धि की सूचना मिलती है। कुरुसपाल अभिलेख में सूचना सन्निहित है कि सोमेश्वर ने रतनपुर, लंज्जि (लॉजी, जिला बालाघाट), लेम्णा (लवण, जिला रायपुर) वज्र (बैरागढ़, जिला चन्द्रपुर), वेंगी और भद्रपट्टम (भाण्डर) सहित दक्षिण कोसल के 06 लाख 96 हजार ग्रामों पर अधिकार कर लिया। बिलासपुर, रायपुर और बालाघाट सहित लगभग सम्पूर्ण दक्षिण कोसल पर छिंदक नाग शासक में सोमेश्वर रतनपुर के कलचुरि शासक जाजल्लदेव को पराजित कर दक्षिण कोसल का बड़ा भू-भाग हस्तगत का लिया गया। 1114 ईसवी में पूर्व जाजल्लदेव प्रथम ने सोमेश्वर पर आक्रमण कर उसे बंदी बना लिया। यह विवरण जाजल्लदेव प्रथम के 1114 ईसवी के रतनपुर अभिलेख में है। सोनसरी (जिला बिलासपुर) में नाग सोमेश्वर की तथा नारायणपाल (बस्तर) में जाजल्लदेव की स्वर्णमुद्राओं की प्राप्ति से परस्पर राजाओं के संघर्ष की पुष्टि होती है। सोमेश्वर देव नाग के शासनकाल का गंगमहादेवी का 1108 ईसवी का बारसूर अभिलेख सिद्ध करता है कि सोमेश्वर 1108 ईसवी तक निश्चित रूप से चक्रकूट का अधिपति था। उसकी मृत्यु 1108 से 1111 ईसवी में मध्य कभी हुई। गुंड महादेवी का 1111 ईसवी का नारायणपाल अभिलेख कन्हरदेव के शासनकाल में उत्कीर्ण किया गया है। सोमेश्वर का उत्तराधिकारी कन्हर संप्रभु शासक न होकर संभवतः रतनपुर के कलचुरि वंश के करद सामंत की भॉति राज्य करता रहा। उसके शासन काल के एकमात्र नारायणपाल अभिलेख में कन्हर की उपाधि श्री मद्वीर कन्हरदेव है। कन्हरदेव के पश्चात नागवंश का क्रमिक इतिहास प्रमाणों के अभाव में पुनर्निमित करना कठिन है। कन्हरदेव के उत्तराधिकारी कलचुरियों के अधीन शासक थे। सोमेश्वर की पराजय के साथ ही चक्रकूट का नागवंश कलचुरियों के अधीन हो गया था। नरसिंहदेव (1218-1224) के उत्तराधिकारी जयसिंहदेव के अभिलेख मध्य बस्तर में पाये गये हैं जिससे प्रतीत होता है कि नरसिंहदेव के पश्चात् नागवंश का अधिकार मध्य बस्तर तक सीमित रह गया। बारसुर के खण्डित शिलालेख में उल्लिखित कन्हरदेव तथा टेमरा सती स्तंभ लेख के हरिश्चन्द्रदेव को उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर निर्विवाद रूप से नागवंशी शासक नहीं माना जा सकता। उक्त अभिलेखों में शासकों की विरूदावली और वंश का उल्लेख नहीं हुआ है।

कतिपय विद्वानों का मत है कि चककूट के नागवंश में एक से अधिक सोमेश्वरदेव और एक से अधिक कन्हर नामक शासक हुए हैं। 1224 के पश्चात् कांकेर को छोड़कर शेष बस्तर में स्थानीय शासकों का अधिकार रहा यह प्रतीत होता है। कांकेर के शासक अपने आप को सोमवंशी जानते थे। 1192 से 1320 ईसवी तक कांकेर (प्राचीन काकरय) के शासकों की उपाधि ‘सोमवंशान्वय प्रभूत महामाण्डलिक‘ रही है। वे संभवतः कलचुरिवंश के महामाण्डलिक थे। इन सोमवंशी शासकों की प्रारंभिक राजधानी ‘सिहावा‘ रही है। वाघराज अथवा कर्णराज के समय उनका राजकेन्द्र कांकेर हो गया। कर्णराज, पम्पराज और भानुदेव के अभिलेख और ताम्रपत्र प्राप्त हुए हैं। सोमवंशी शासकों के राज्यकाल में निर्मित मंदिर और प्रतिमाएं सिहावा, देवहद और कांकेर क्षेत्र में हैं। कर्णराज इस वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक था। उसके सिहावा अभिलेख के अनुसार कर्ण ने पड़ोसी शासकों को पराजित कर उनसे कर वसूल किया। भानुदेव इस वंश का अंतिम ज्ञात शासक है।

ईसवी 1424 से लेकर भारतीय गणतंत्र की स्थापना तक बस्तर पर राज्य करने वाले राजवंश की स्थापना अन्नमदेव द्वारा की गई। अन्नमदेव किस वंश का था इसे लेकर मत वैभिन्य है। दिक्पालदेव के शासनकाल के 1703 ई. के दंतेवाड़ा शिलालेख, अन्नमदेव के वंशजों के अन्य अभिलेखों के आधार पर वेंकटरमनैय्या ने अन्नमदेव को वारंगल का काकतीय शासक प्रतापरुददेव का अनुज माना है। इस मत को स्वीकार करने में बड़ी बाधा यह है कि ईसवी 1323 में प्रतापरुद्र का देहावसान हुआ और उसके 99 वर्ष उपरांत ई. 1424 में अन्नमदेव ने बस्तर में शासन प्रारंभ किया। दो भाईयों के मध्य इतनी अवधि का अंतराल संभव नहीं है। प्रतीत होता है कि ‘प्रतापचरितम्‘ नामक ग्रन्थ के भ्रामक विवरण को सत्य मानकर दंतेवाड़ा अभिलेख के लेखक भगवान मिश्र ने और उनका अनुक्षरण कर वेंकटरमनैय्या ने अन्नमदेव को काकतीय स्वीकार किया। प्रतापचरितम् में वर्णन है कि प्रतापरुद्र की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र वीरभद्र वारंगल की गद्दी पर बैठा और प्रतापरुद्र का अनुज अन्नमदेव विन्ध्यपर्वत की ओर चला गया परन्तु वास्तव में वारंगल नरेश प्रतापरुद्र के पुत्र वीरभद्र तथा अनुज अन्नमदेव का प्रातपरुद्र यशोभूषण नामक ग्रन्थ और 1357 तक के वारंगल के काकतीय अभिलेखों में उल्लेख नहीं है। ‘प्रतापरुद्र यशोभूषण‘ नामक ग्रन्थ माननीय प्रतापरुद्र के जीवनकाल में लिखा गया है। प्रतापरुद्र निःसंतान था। बस्तर के लोकगीतों में बस्तर नरेश को ‘चालकी राजा‘ (चालुक्य राज) कहा गया है। तब क्या बस्तर के अंतिम राजवंश को चालुक्य स्वीकार किया जाना चाहिए किन्तु, इस गत की पुष्टि हेतु साक्ष्य अनुपलब्ध हैं। पण्डित सुंदरलाल त्रिपाठी में मतानुसार नेल्लोर और कर्नूल के समीप स्थित राज्य एडुव में 15वीं शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों में शासनरत तेलुगु चोड़ अन्नमदेव अथवा अन्नमराज बस्तर के अंतिम राजवंश का संस्थापक था। उसके पुत्र का नाम वीरभद्र था।

मुदाएं - नल और नागवंशी शासकों की स्वर्ण मुद्राएँ तथा कलचुरि शासक जाजल्लदेव प्रथम भी स्वर्ण मुद्राएँ बस्तर में पायी गई है। 

नल शासकों की मुद्राएं - 1939 में कोण्डागांव तहसील में स्थित केसकाल के समीप स्थित एडेंगा ग्राम में वराहराज, भवदत्तवर्मन तथा अर्थपति की स्वर्ण मुद्राएँ प्राप्त हुई हैं। उक्त मुद्राओं का प्रकाशन प्रोफेसर मीराशी ने ‘न्यूमिस्मेटिक सोसायटी ऑफ इंडिया जर्नल‘ में किया है, (जे.ए.एस.आई., क्रमांक 1, पृष्ठ 28 इत्यादि)। लखनऊ संग्रहालय में संग्रहीत नल नृपतियों की चार स्वर्ण मुद्राएं रायबहादुर प्रयागदयाल ने प्रकाशित की है। (जे.ए.एस.आई., क्रमांक 33, खण्ड 2 पृष्ठ 115 इत्यादि)। दुर्ग जिले के कुलिया ग्राम में प्राप्त मुद्रानिधि में नल शासक भवदत्त तथा अर्थपति की मुद्राओं के साथ नंदनराज और स्तम्भ की स्वर्णमुद्राएं प्राप्त हुई हैं। नंदनराज और स्तंभ को भी नलवंशी शासक स्वीकार किया गया है, (जे.ए.एस.आई., अंक 45 इत्यादि) तथा प्राच्य प्रतिमा, जिल्द 5, अंक 1, पृ. 69-74)। सोमेश्वरदेव नाग की स्वर्णमुद्राएं बिलासपुर जिले के सोनसरी ग्राम में मिली हैं।

नाग शासकों की मुद्राएं - सन् 1957 में बस्तर के निकटवर्ती और सन् 1811 तक बस्तर रियासत में सम्मिलित कोरापुट जिला के ग्राम कोडिंगा के समीप नाग नृपतियों की स्वर्ण मुद्राएं पायी गई है। 

आदिवराह द्रम्म - आदिवराह द्रम्म मुद्राएं नामक चार रजत मुद्राएं बस्तर ग्राम में उपलब्ध हुई थी (न्यूमिस्मेटिक नोट्स एण्ड मोनोग्राफ्स, वाराणसी, पृ. 14)। 

कलचुरि जाजल्लदेव प्रथम की स्वर्णमुद्राएं - नारायणपाल (बस्तर) में कलचुरि नरेश जाजल्लदेव प्रथम की स्वर्ण मुद्राएं मिली है। 

अभिलेख तथा ताम्रपत्र - बारसुर, नारायणपुर, दंतेवाड़ा, पोटीनार एर्राकोट, टेमरा (सती स्तंभ लेख), कुरुसपाल, राजपुर (ताम्रपत्र), गढ़िया, कर्णराज का सिहावा अभिलेख, पम्पराज के कांकेर और पाढ़िपट्टन से प्रचलित ताम्रपत्र, भानुदेव का कांकेर अभिलेख के द्वारा बस्तर में इतिहास पर प्रचुर प्रकाश पड़ा है। छोटे डोंगर का 4-5वीं शती का स्तंभी लेख अपठनीय है।

छोटे डोंगर में 9वीं 10वीं शताब्दी का वंखकादित्य का अभिलेख, इसी काल की एक अन्य अभिलेख, केसरपाल का छठी-सातवीं शताब्दी का अभिलेख और वल्लभराज का उपेत ताम्रपत्र द्वारा मध्यकालीन बस्तर का इतिहास समृद्ध हुआ है।

मूर्तिकला - प्रतिमा वह लक्षण है जो लक्ष्य को प्रदर्शित करता है। मनोगत भाव का स्थूल प्रतीक ही प्रतिमा है। देव विशेष और व्यक्ति विशेष की आकृति की सूचक प्रतिमा है। कला के चारुत्व, रस, अर्थ, छंद और रुप हैं। भावजनित रस की अभिव्यक्ति जब रुप (आकृति) द्वारा होती है तब वह प्रत्यक्ष और प्रभावी होती है। प्रतिमा द्वारा धर्म, अर्थ और काम की सिद्धि के साथ-साथ मोक्ष का मार्ग भी प्रशस्त होता है। हड़प्पा संस्कृति से प्रतिमा निर्माण के प्रत्यक्ष प्रमाण मिलते हैं। ऋग्वेद (2/23) में इन्द्र की रंगीन प्रतिमा का विवरण है। ऋग्वेद में अन्यत्र (ऋग्वेद 4, 17, 4) कहा गया है कि इस इन्द्र को बनाने वाला कोई चतुर कारीगर होगा। अथर्ववेद तथा यजुर्वेद में भी प्रतिमा का उल्लेख है। उपनिषदों, ब्राह्मण ग्रन्थों, स्मृतियों एवं महाकाव्यों में प्रतिमा और प्रतिमा निर्माण के उल्लेख हैं। कौशाम्बी, मथुरा, राजघाट और तक्षशिला में मौर्यकाल की पूर्ववर्ती मातृदेवी की प्रतिमाएं मिली है। मौर्यकाल से प्रतिमा निर्माण की अविच्छिन्न परम्परा रही है।

बस्तर अंचल में ईसा की तीसरी शताब्दी से प्रतिमाएं निर्मित होने लगी थी। बस्तर ग्राम में तीसरी शताब्दी ईसवी की विष्णु प्रतिमा है, छोटे डोंगर में चौथी शती ईसवी का सती स्तंभ जिस पर मानव दम्पति की आकृति उकेरी गयी है। पांचवी-छठी शताब्दी की प्रतिमाएं पाला, गुबरहिन-गढ़धनोरा, देवधनोरा और भोंगापाल में है।

9वीं-10वीं शताब्दी से बस्तर में वैष्णव, शैव, ब्रह्मा, सौर, गाणपत्य, शाक्त, सम्प्रदायों, बौद्ध और जैन धर्मों की प्रतिमाएं, पौराणिक पशुओं, पशु-पक्षियों, नाग और मानव और मिथुन प्रतिमाएं गढ़ी जाने लगीं। इस क्षेत्र की प्रतिमाओं में उड़ीसा, दक्षिण भारत और दक्षिण कोसल की कलचुरिकालीन कलाओं का प्रभाव परिलक्षित होता है। प्रतिमाओं पर तंत्र का प्रभाव भी परिलक्षित होता है। समन्वित देव प्रतिमाओं का सृजन भी बस्तर में हुआ है। भैरमगढ़ में प्राप्त हरि-हर-हिरण्यगर्भ-पितामह की एक अत्यंत विरली प्रतिमा है। इसी प्रकार बड़े डोंगर में काले पत्थर पर निर्मित लक्ष्मी-नृसिंह की दुर्लभ प्रतिमा है। जिसमें नृसिंह के बायीं जंघा में बैठी लक्ष्मी का मुख भी नृसिंह जैसा (सिंहमुखी) प्रदर्शित किया गया है। ब्रह्मा भी एक ऐसी प्रतिमा दंतेश्वरी मंदिर बारसुर के सभामण्डप में सुरक्षित है जिसमें एकमुखी, चतुर्भुजी, ऊर्ध्वकेशी ब्रह्मा ललितासन मुद्रा में हंस पर आसीन हैं। उनेक हाथों में क्रमशः अक्षमाला, श्रुक, वेद और हंस प्रदर्शित हैं। परिसर में ऊपर की ओर 06 हंसों भी एक पंक्ति है। ब्रह्मा के हाथ में हंस प्रदर्शित करने के शास्त्रीय निर्देश नहीं है। उस मायने यह एक बिरली प्रतिमा है जो अन्यत्र नहीं पायी गयी है। दंतेवाड़ा में द्विभुजी शिव की पद्मासन मुद्रा में आसीन प्रतिमा के वामहस्त में प्याला और दक्षिण हस्त में चाबुक है। यह शास्त्रीय निर्देशों से हटकर है।

दंतेश्वरी मंदिर, दंतेवाड़ा में उमा-महेश्वर की दो विशिष्ट प्रतिमाएं हैं। पहली प्रतिमा में द्विभुजी देवता की जंधा पर विराजमान द्विमुखी देवी दायें हाथ में नंदी की पूंछ पकड़ी हुई हैं। दूसरी उमा-महेश्वर प्रतिमा में देवी शिव की दायीं जंघा पर आसीन हैं तथा दाहिने हाथ में त्रिशूल धारण किये हुए हैं। भैरमगढ़ में पद्मासन मुद्रा में प्रदर्शित, खड्ग, डमरु, त्रिशूल और कपाल धारिणी देवी के मस्तक पर शिवलिंग, प्रदर्शित है। प्रधानिक रहस्य के निर्देशानुसार मस्तक पर शिवलिंग, योनिधारी महालक्ष्मी के हाथों में क्रमशः बिजौरा नीबू, गदा, ढाल और कपाल होना चाहिए। मस्तक पर शिवलिंग और हाथ में कपाल प्राधानिक रहस्य के निर्देशानुसार प्रदर्शित हैं।

देवरली मंदिर बारसुर में शिव की एक अद्भुत तथा प्रतिमा विज्ञान से, हटकर सर्वथा नवीन रुप में प्रदर्शित है। पद्मासन मुद्रा में आसीन चतुर्भुजी नग्न देवता की भुजाओं में क्रमशः कटार, परशु, चक्र और कपाल प्रदर्शित हैं। देवता ऊर्ध्वरतेस नहीं हैं। गुदमा ग्राम के मंदिर में स्थापित चतुर्भुजी देवी की पहचान नहीं हो सकी है। तंत्र से प्रभावित प्रतिमा लोमड़ी जाति के पशु पर आसीन है। देवी के हाथों में क्रमशः खड्ग, डमरु, त्रिशूल और ढाल हैं। डमरु और सर्प लिपटे हैं। देवी का मुकुट दैत्य के खुले हुए मुख में आधा छुप गया है जिसके दोनों पार्श्व में एक-एक दैत्य मुख है, देवी के चरणों के समीप भी दोनों और एक-एक दैत्य मुख अंकित है। यह प्रतिमा शास्त्रीय निर्देशों से नहीं मिलती। गढ़बोदरा की मातृदेवी/लज्जिका अथा नग्निका की प्रतिमा का विवरण पूर्व पृष्ठों में दिया जा चुका है। तीरथगढ़ में प्राप्त चतुर्मुखी भैरव प्रतिमा गति, लालित्य और आभूषणों के प्रदर्शन में मूर्तिकार का कौशल परिलक्षित है। राजापारा, कांकेर, दंतेश्वरी मंदिर, दंतेवाड़ा तथा बालाजी मंदिर जगदलपुर में स्तम्भशीर्ष पर गरुड़ की आकृति प्रदर्शित है। बड़े डोंगर और दंतेवाड़ा में राजा और राजदम्पति की स्वतंत्र प्रतिमाएं हैं। बारसुर, छोटे डोंगर और भैरमगढ़ सहित अन्य स्थलों में शिलापट्ट पर उकेरी गई, ढाल-तलवार धारी पुरुष आकृति है जिसमें लंबे बाल, चोटी की भांति पीछे लटके प्रदर्शित हैं। 11-12वीं शताब्दी की इन प्रतिमाओं को स्थानीय निवासी मेलिया के नाम से पुकारते हैं। उनकी मान्यता है कि प्राचीन बस्तर में प्रचलित नरबलि प्रथा में बलि हेतु पुरुष प्रदान करने का कार्य मेलिया करते थे।

बस्तर ग्राम, गढ़बोदरा, बीजापुर, भैरमगढ़, बारसुर, दंतेवाड़ा में मिट्टी की सुरक्षा प्राचीन आवास स्थलों पर आक्रमण से बचाव के लिए बनाई गई थी। बेदरे और गढ़चंदेला में नवप्रस्तर युग में पत्थर भी सुरक्षा दीवार निर्मित की गयी थी।बस्तर ग्राम में 600X400 मीटर की सुरक्षा प्राचीर में चार प्रवेश द्वार हनुमान द्वार, भोंड द्वार, गायता द्वार और तेलगा द्वार थे। सुरक्षा दीवार के बाहर निर्मित खाई अतिरिक्त सुरक्षा प्रदान करती थी। छोटे डोंगर, बड़े डोंगर, दंतेवाड़ा, भैरमगढ़, बारसुर, गढ़बोदरा, गढ़धनोरा, बीजापुर, कांकेर मध्यकालीन बस्तर में महत्वपूर्ण राजकेन्द्र/ प्रशासनिक केन्द्र थे। सती प्रथा और पर्दा प्रथा बस्तर के आदिवासी समाज में कभी प्रचलित नहीं थी। राजपरिवारों, राज्याधिकारियों, सम्पन्न नागरिकों और सैनिकों में सती प्रथा का प्रचलन था। बस्तर के आदिवासी समाज में प्रचलित अतिथि सत्कार सराहनीय है। मुरिया और माड़िया समाज के छोटे से छोटे गांव में, गांव से कुछ हटकर अतिथिगृह के तौर पर एक झोपड़ी होती है, जिसे कोसघोटुल व थानागुड़ी अथवा पाईकगुड़ी कहा जाता है। ग्राम में आने वाले प्रत्येक अतिथि को अतिथिगृह में ठहराया जाता है। अठपहरिया नामक ग्राम का एक कर्मचारी अतिथिगृह को झाड़ता पोंछता है, खाना पकाता है और रात्रि में अतिथि के पास ही रहता है। 24 घंटे तक ग्राम की ओर से अतिथि को निशुल्क, लकड़ी, राशन, दूध, नमक, मिर्च, हल्दी, घी प्रदान किया जाता है। आग्रह करने पर भी ग्रामीण अतिथि से दाम नहीं लेते हैं। अठपहरिया को ग्रामवासी सेवा शुल्क के रूप में फसल आने पर अनाज देते हैं।

इस वक्तव्य के अंत में संदर्भ सूची है, जिसमें 54 प्रविष्टियां हैं। इनमें झा जी की स्वयं की पुस्तक ‘बस्तर का मूर्तिशिल्प‘ मुख्य है। अन्य का उल्लेख वक्तव्य में आया है, इसलिए यहां पृथक से नहीं है।