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Sunday, March 15, 2026

उजले ‘श्याम‘

संयोजक श्री शशिकांत चतुर्वेदी, श्री सूर्यकान्त चतुर्वेदी और संपादक श्री रूद्र अवस्थी के
‘पं. श्यामलाल चतुर्वेदी स्मृति ग्रंथ‘ में शामिल मेरा लेख, यहां आंशिक परिवर्धन सहित प्रस्तुत-


उजले ‘श्याम‘

स्नेह-वात्सल्य को शब्दों में अभिव्यक्त कर पाना असंभव जैसा, मेरे बूते का नहीं, और इसे संभव बनाने का प्रयास भी दुष्कर होता। साथ ही यह भी समस्या थी कि पंडित श्यामलाल चतुर्वेदी जी के अभिनन्दन ग्रंथ सहित उन पर इतना कुछ लिखा-छपा है, उससे अलग क्या ही कुछ लिख सकूंगा। मगर भाई सूर्यकांत जी का आग्रह बना रहा, वही संबल बना। मैंने पहले अपनी यह सीमा बताई, बात न बनी तो फिर कुछ समय चाहा, उन्होंने समय दे दिया, समय-सीमा तक पहुंचने तक मन ही मन आदरणीय पंडित श्यामलाल चतुर्वेदी जी को लगभग प्रतिदिन स्मृति-श्रद्धा-सुमन अर्पित करता रहा, मगर कुछ भी न लिख पाया। फिर से समय-सीमा पूछा, जवाब चारों खाने चित्त कर देने वाला था, भाईजी ने कहा- आपके लिए कोई समय-सीमा नहीं है, हमारी समय-सीमा आपका लेख आ जाने तक है। इस पर मैंने पुनः उस दिवंगत पुण्य आत्मा का स्मरण किया कि ‘तुम्हीं ने दर्द दिया है, तुम्हीं दवा देना‘, और ‘तेरा तुझको सौंपता‘ भाव से यह जो टूटी-फूटी है, उसमें पंडितजी के प्रति मेरी भावना का अंश झलक सकेगा मानते, समर्पित है।

कुछ घर ऐसे होते हैं, जहां आप अकारण भी जाना चाहते हैं, जा सकते हैं, मगर लौटते हैं कुछ हासिल के साथ, समृद्ध हो कर। बिलासपुर का घसियापारा, जो अब राजेंद्र नगर था और बृहस्पति बाजार के बीच, तिलकनगर के पिछवाड़े का एक घर, जो कुटी या आश्रम सा जान पड़ता, यों नजरअंदाज हो जाए, मगर जो इससे परिचित, उसके लिए अगल-बगल ओझल रहे, इसी पर नजर टिके, इसी का आकर्षण हो, यही पंडित श्यामलाल चतुर्वेदी जी का निवास था। मेरे गृहग्राम अकलतरा के पड़ोसी कोटमी निवासी पंडितजी उन दिनों राजेन्द्रनगर स्थित हमारे दफ्तर के पड़ोसी थे। हमें जब भी अवसर होता, उनके सान्निध्य पाने इस ‘गुरुकुल‘ पहुंच जाते, और सदैव ‘बिन मांगे मोती‘ पा कर लौटते। 

सच्चे राष्ट्रवादी पंडितजी को अक्सर लोग दलगत संकीर्णता में सीमित कर देखते हैं, जबकि आजादी की लड़ाई के दौरान चरखा, तकली चलाने वाले गांधीवादी आप कांग्रेस के सदस्य बनाने के लिए सक्रिय रहते थे। व्यक्तिगत सत्याग्रह में जेल जाने के लिए दरखास्त भी दिया था, मगर आवेदन उनके नाबालिग होने के कारण नापास कर दिया गया, यह बताते हुए मुस्कुरा कर कहते ‘सेनानी हो गए होते हम‘। गीत याद करते थे- ‘घर-बार छोड़ कर के जाएंगे जेलखाना, ये डर नहीं है हमको खाएंगे जेल खाना, जिस जेल में महाप्रभु श्रीकृष्णचंद्र जन्मे, मेरे लिए तो प्यारा मंदिर जेलखाना।‘ बाद में देश के विभाजन के दौरान संघ के संपर्क में आए औैर प्रचारकों का त्याग, समर्पण आपके लिए प्रेरक बना, उन तपस्वियों का संस्कार मिला। इसी तरह आजादी के बाद विनोबाजी के भूदान यज्ञ से जुड़ गए। गांव-गांव घूमते, पत्रकारिता के लिए समाचार भी इकट्ठा करते। 

कर्मवीर के लिए पहला समाचार ही क्रांतिकारी सुर का था। वे बताते कि गांव के मालगुजार के लिए उन्होंने आवेदन लिखा, उसने प्रयत्न किया, उसे शक्कर मिट्टी तेल का लाइसेंस मिल गया। आपने उससे कहा कि अब इसमें अमीर-गरीब का भेद न करना सबको बराबरी का मानते सामान देना। उस मालगुजार का आतंकी बेटा मनमानी करने लगा, घटनाक्रम कुछ ऐसा हुआ कि आपका उसके खिलाफ लिखा समाचार छपा, उसका लाइसेंस निरस्त हो गया। वे याद करते थे कि बिलासपुर में रहते हुए उन्हीं के शब्दों में अपने ‘झगड़ालू गांव‘ के निर्विरोध सरपंच बन गए। गांव में असहयोग का माहौल बना कर ‘शराब भट्ठी‘ को हटवाया। अपने ही घर के सामने बने चबूतरे को हटवा कर गांव वालों से बेजा-कब्जा हटाने की अपील की। उनका ग्राम पंचायत, गांधी शताब्दी वर्ष 1969 में बिलासपुर संभाग का सर्वश्रेष्ठ पंचायत घोषित हुआ था। कोटमी सोनार अब क्रोकोडायल पार्क के लिए मशहूर है। गांव के जलाशयों में मगर पुराने समय से बसते रहे हैं। निस्तारी तालाबों में भी रहते थे, जहां लोग सहज नहाना-धोना करते थे। मगर गांव में किसी को इन जीवों से नुकसान दुर्लभ रहा है, इससे संबंधित घटनाएं वे रोचक ढंग से सुनाते थे कि किस तरह नहाते हुए व्यक्ति से लट्ठ की तरह बहता आया मगर टकरा जाता था और लोग उसे धक्का दे कर स्नान जारी रखते थे या गरमी में एक तालाब से दूसरे तालाब जाते हुए मगर को खातू वाले गड़हा, गाड़ा में डाल कर पानी वाले तालाब में छोड़ आते थे। 

अकलतरा की रामलीला, शिवरीनारायण के नाटक और नरियरा की कृष्णलीला पर उनकी प्रेरणा और उनके द्वारा दी गई जानकारियों के आधार पर उन स्थानों में जा कर और लोगों से संपर्क कर मैंने ‘तीन रंगमंच‘ लेख तैयार किया और उसकी प्रति उन्हें ले जा कर दी, जिसे देखकर प्रसन्न हुए और आशीर्वाद दिया। नरियरा की कृष्णलीला नाटकों में ब्राह्मण को ही कृष्ण बनाते थे। वे बाल-कृष्ण का रूप धरते थे। उनकी मां तालाब में नहाने जाती थीं, तो गांव वाले कहते ‘भगवान के दाई आए हे‘। संभर-पखर जाने पर आखिर में मुकुट लगता। इसके बाद ‘प्राण प्रतिष्ठा‘ मान ली जाती थी, तब कृष्ण बने आपको, ईश्वर-स्वरूप मानते मंच पर आने के पहले जमीन पर पैर रखने नहीं दिया जाता था, कोई न कोई गोद में उठाए रहता था। ऐसे ही संस्कार उन्हें बचपन से मिलते रहे, और संभवतः उनके भीतर का आत्मबल, यही से आया धार्मिक-आध्यात्मिक भाव था। संत-महात्माओं का सत्संग का कोई अवसर नहीं चूकते। हमारे घर मां पूर्णप्रज्ञा का आगमन होता, तब उनकी नियमित उपस्थिति होती थी। 
सन उन्‍नीस सौ तीसादि दशक का नरियरा लीला संबंधित चित्र 

फिल्म ‘थ्री ईडियट्स‘ के चतुर रामलिंगम के ‘चमत्कारी, धन‘ वाले भाषण के साथ मुझे आपसे जुड़ा एक प्रसंग याद आया था, जो साधूलाल गुप्ता बताते थे। बिलासपुर में होली के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में संभाग के कमिश्नर ‘संभागायुक्त‘ आमंत्रित थे। आपने अपनी बात शुरू करते हुए उन्हें संबोधित करते हुए ‘भा‘, ‘भो‘ हो गया। बस, फिर क्या, पूरा माहौल में होलियाना लहर में बहने लगी। एक प्रसंग बिलासपुर से खरौद-शिवरीनारायण जाते हुए, रास्ते में पामगढ़ बस स्टैंड पर का सुनाते थे। चाय पीने रुके, बेंच पर बैठे थे। एक युवा आया और उनसे उपहास करते कहा ‘नेताजी, थोड़ा सरको।‘ आपने उससे कहा कि भाई! तुमने मुझे नेताजी क्यों कहा?, उसने कहा ‘ड्रेस से तो तुम नेता दिख रहे हो, बस इतना सुनना था कि पंडितजी ने कहा और तुम अपने पहनावे से मुझे लफूट लग रहे हो, तो क्या मैं तुम्हें लफूट जी कहूं? 

आपकी प्रसिद्ध कविता ‘बेटी के बिदा‘ के लिए मान लिया जाता है कि उनके मन में ये भाव अपनी बेटी को विदा करते हुए आए होंगे, जबकि जैसा वे बताते, अपनी शादी के बाद विदा होने के दौरान गांव-घरवालों की व्यथा को देख कर एकबारगी तो उन्हें ऐसा लगा कि पत्नी को छोड़कर ही वापस लौट जाएं और फिर वहीं इस कविता के भाव पैदा हुए थे। खुद मजे लेते बताते थे कि विवाह के समय पत्नी पांचवी पास थीं और आप पांचवी। धुन लगी और प्राइवेट परीक्षाएं पास करते हुए एम.ए. की परीक्षा तक पहुंचे। पाठ्यक्रम में आपकी ही कविता थी, जिस पर प्रश्न पूछा गया था, अपनी ही कविता पर पूछे गए प्रश्न का उत्तर लिख कर परीक्षा पास करने की संभवतः यह अकेली घटना है। 

एक प्रसंग उन्होंने बताया था। लोचनप्रसाद पांडेय बिलासपुर से रायगढ़ जा रहे थे। रेलगाड़ी पर से रास्ते में उनका ध्यान विशिष्ट आकृति की ओर गया, उन्होंने किसी सहयात्री से गुजर रहे गांव का नाम पूछ लिया। रायगढ़ पहुंचकर उन्होंने एक पोस्टकार्ड लिखा, कि जयरामनगर और अकलतरा स्टेशन के बीच लीलागर नदी के पुल के बाद बायीं ओर मिट्टी का टीला दिखाई पड़ता है, इसके बारे जानकारी चाहिए। पत्र, श्री पटवारी जी (या सरपंच जी) संबोधित, पता लिखा था। उलझन भरे इस पते-संबोधन वाला पत्र, आपके पास ही पहुंचना था, पोस्टमैन पत्र उन तक छोड़ गया। पत्र का जवाब लिखने के बजाय आपने स्वयं लोचनप्रसाद जी से मुलाकात की और मिट्टी के परकोटे वाले गढ़ तथा गांव के पुरातात्विक अवशेषों की जानकारी से अवगत कराया। संभव है यह पोस्टकार्ड अब भी सुरक्षित हो। 

आपने लोचनप्रसाद जी के निधन पर 1 दिसंबर 1957 को ‘नई दुनिया में श्रद्धांजलि-लेख लिखा था, जिसका अंश इस प्रकार है- ‘यदि श्रद्धेय पाण्यडेजी की अपूरणीय क्षति से हम धरोहर के समुचित सदुपयोग सीख सकें, अपनी सामाजिक जिम्मेदारी पूर्ण करने की दिशा में ईमानदारी से प्रयत्न कर सकें, अपनी अकर्मण्यता छिपाने के लिए कार्यक्षमता के कांधे पर न चढ़ें, साहित्यिक राजनीतिज्ञ से श्रेष्ठ होता है यह सही मायने में आचरण से कर दिखा सकें, तो यह विश्वास किया जा सकता है कि स्वर्गीय पाण्डेय के नेह-लोचन का कृपा-प्रसाद हम अदृष्ट से पाते रहेंगे।‘ अब हम यही बात पं. श्यामलाल जी के लिए भी लागू हो सकती हैं। 

वे संपर्क में आए लोगों के संस्मरण और उसे अभिव्यक्त करने की उनकी शैली लाजवाब थी। ‘बड़े के संग म खावय बीरा पान‘ शीर्षक से, मेरे पितामह इंद्रजीत सिंह जी के लिए उन्होंने लिखा था, जिसका एक अंश इस प्रकार है- जिनके प्रति आदर का स्थायी भाव बरसों से हो और संयोगवश उसे अभिव्यक्त करने का अवसर यदि प्राप्त हो जाये तो हर्षित होकर उसका निर्वाह करना कौन नहीं चाहेगा ? ऐसा ही एक सुअवसर मुझे मिला है और मैं अकलतरा के राजा साहब स्वर्गीय मनमोहन सिंह जी के सुपुत्र डॉक्टर इन्द्रजीत सिंह जी की जन्म शताब्दी पर अपने खयालातों की खतौनी कर रहा हूँ। 
 ... 
 लाल साहब ख्याति के खैरख्वाह नहीं थे किन्तु अत्यन्त परिश्रम से छत्तीसगढ़ के वनाँचलों में जाकर समय और सम्पत्ति की आहुति देकर उन्होंने जो ‘गोड़ जनजाति के आर्थिक जीवन‘ को लेकर अंग्रेजी में ‘गोड़वाना एण्ड द गोंड्स‘ शीर्षक से शोध ग्रंथ का प्रणयन किया, वह लाल साहब की समाज को अनमोल देन है। विश्व के ख्यातनाम अर्थशस्त्री डॉ. राधा कमल मुखर्जी एवं डाँ. डी.एन. मजुमदार इनके मार्गदर्शक थे। यह ग्रंथ सन् 1944 में प्रकाशित हुआ था। पुस्तक का समापन कुछ इस तरह से है - ‘जनजातीय समुदाय के उत्थान और विकास के कार्य ऐसे लोगों के हाथों होना चाहिए जो उनके ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य और सामाजिक व्यवस्था को पूरी सहानुभूति सहित समझ सके।‘ बीसवीं सदी के (तीसरे-) चौथे दशक के बीच बस्तर अंचल मेएक छत्तीसगढ़ी राजकुमार का शोध कार्य अभूतपूर्व है।' 

मीर अली मीर की प्रसिद्ध कविता है ‘नंदा जाही‘, संभवतः यह कविता पंडितजी के विचारों से प्रेरित है, वे बार-बार दुहराया करते थे कि ‘छत्तीसगढ़ी के शब्द नंदावत हे‘। मुझे हमेशा यह लगता था कि छत्तीसगढ़ी में बोली का लोच-लालित्य, लिखते हुए सीमित होने लगता है, उसके रस-प्राण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, ऐसी बात कह कर आलोचना का पात्र भी बन चुका हूं। मगर एक बार पंडितजी के विचार सुनने का अवसर मिला, जिसमें उन्होंने कहा कि ‘मोर एक अलग तरह के बिचार हे, छत्तीसगढ़ी हर लिखे के नोहय, बोले के, अतका लुदरू हे, लिखा-पढ़ी म आइस, तब ले खोखा म बंद होत जात हे।‘ इसके साथ उनका स्पष्ट मत होता था कि बोलचाल में छत्तीसगढ़ी बनी रहे, यह बहुत जरूरी है। वे जैसी छत्तीसगढ़ी बोलते थे, वह स्वयं में इसका सबसे प्रबल प्रमाण है। अब छत्तीसगढ़ी के मानकीकरण और विविधता पर विचार करते हुए यह ध्यान रखना चाहिए कि भाषा-बोली, अभिव्यक्ति का कोई माध्यम हो, बोली का लोच, उसका सौंदर्य होता है न कि सीमा। छत्तीसगढ़ी का बोलीपन बने रहने की कीमत पर ही उसका भाषा बन जाना मंजूर किया जा सकता है। किसी जबान का बोलीपन खो जाए तो यह भाषा, मानक भाषा, राजभाषा, आठवीं अनुसूची में शामिल होने की सार्थकता पर प्रश्न चिह्न होगा। 

2004 में दैनिक हरिभूमि, बिलासपुर में जगन्नाथ प्रसाद ‘भानु‘ की पुण्यतिथि पर मेरा लेख छपा। मुलाकात होने पर उन्होंने पूछा कि भानु जी की छत्तीसगढ़ी रचना ‘खुसरा चिरई के बिहाव‘ के बारे में मुझे कहां से पता चला। आगे उन्होंने ध्यान आकृष्ट कराया कि इसी नाम की रचना खरौद निवासी पं. कपिलनाथ मिश्र की भी है। मुझे याद आया कि मैंने यह पुस्तक शिवरीनारायण के मेले में बिकते देखी थी, तब इसके रचनाकार की ओर मेरा ध्यान नहीं गया था। पंडितजी ने कहा कि भानु जी की इस रचना के बारे में उन्होंने भी सुना है, मगर देखा नहीं है और निर्देश दिया कि पता करने की कोशिश करना। बाद में कपिलनाथ जी वाली पुस्तक तो मिल गई, मगर भानु जी वाली अब तक नहीं मिली है। 

छत्तीसगढ़ हिन्दी साहित्य सम्मेलन का त्रैमासिक पत्र ‘क्षितिज‘ के सम्पादक मण्डल में प्यारेलाल गुप्त, गजानन शर्मा, शिवनारायण जौहरी और द्वारिकाप्रसाद ‘विप्र‘ के साथ आप भी थे। इस त्रैमासिक पत्र का प्रथम अंक चैत्र-वैशाख-ज्येष्ठ सं. 2017 वि. (सन 1960) में उनकी यह छत्तीसगढ़ी कविता छपी थी। 

कुटेमहा घटा सो 
(असामयिक बादल के प्रति.) 
- श्यामलाल चतुर्वेदी ‘श्याम‘ 

बादर! झनि आ झनि आ। अभी तैं झनि आरे! झनि आ। 
हमर साल भर के मेहनत हर, बाहिर बगरे हावै। 
तोर रंग के एक झलक म, पोटा हमर (माई पोटा) सुखावै।। 
सावन भादों के हे देवता! झन रावन बन जा तैं। 
हांथ जोर के पांव परत हन, हमला अभी बँचा तैं।। 

बिजली कस तोर दांत दिखय, गरजना सहीं तोर हांसी। 
आवा जाही देख सहीं, लगथे का बदे हे फांसी।। 
छिन छिन हवै अमोल बखत ये, फुरसत (फुरसुत) नहीं मरे के। 
पाल पोंस के तहीं बनाये (बढ़ोये), पांव परी मुंड़ टेंके।। 
अपन हाँथ म बना के कुरिया, आगी झनिच (झन तो आगी) लगा। 
बादर झनि आ झनि आ।। 

तैं हमार जिवराखन देंवतन मा तैं ( ) बड़का भारी। 
झन करबे मसखरी झींक के भात परोसे थारी।। 
जाही जीव अजाहे सिरतोन करे कुँदे जर जाही। 
जुड़ जुड़ पानी चिटको परही, करपा हर (ह) सर जाही। 
तोर जुड़ास अगिन होही, तै चिटको तो पतिआ। 
(तोर जुड़ास जिनगी जुड़वाही मर जाबो, पतिआ) 
बादर झनि आ झनि आ।। 

पन पिआस के प्यास बुतोइया (बुतोइय्या), पिरथी के रंगरेजवा। 
नेवता देके ठग देइस का सोर तोर सो भेजवा।। 
(धोखा देइस का? कोनो हर, सोर तोर सो भेजवा) 
दगा कोनो के सगा नहीं, जा झटकुन सोर सुनादे। 
(दगा कोनो के सगा नहीं, सोरिहा ल सफा सुनादे) 
इहां ठाढ़ हो दुख झन दे, जा काम अपन निपटादे।। 
(तरी उपर चल रहे साँस ला, तिरिआके, थिरिया दे।।) 
नेवता ले असाढ़ सावन के, जा झन बेर पहा।। 
(नेवता ले असाढ़ सावन के, जा तो झन गर्रा।।) 
हूल बरोबर लगय सुनत तोर, थोर को हिही हहा।।
 
तोर गाना सुन प्रान सुखाथे, रोना के संग मरना। 
सबले अच्छा होही अभी, ईंहां ले तोरेच टरना।। 
(ऊपर की ये दो पंक्तियां नहीं हैं।) 
तैं परमारथ करके अपने, हांथ ले लूट नंगा झन। 
(परमारथ कर अपने हाँथे, झन तो लूट, नँगा झन) 
अपने पोंसे लइकन मन बर फोक्कट अभी जंगा झन।। 
(ऊपर की यह पंक्ति भी नहीं है।) 
एक के करे अकाइस तेला झन तो (तैं) एक बना।। 
बादर झनि आ झनि आ। 

नोहन हम सिरि क्रिस्न के संगी न तो बिरिज रहवइया (रहवइय्या)। 
इन्द्र रजा के हम असरोइया (असरोइय्या), गउ किरिया रे भइया (भइय्या)। 
जियेन सगर दिन तुहर पुन्न मा (दया मा), तुंहर भरोसा जीबो। 
तुंहरे पुन मा चिटिक मिटिक पा, पसिया पानी पीबो।। 
(चिटिक मिटिक पा जाबो तब तौ, पसिया पानी पीबो।।) 
कुछ कसूर करे हन तौ कह फोकटे झन डेरुआ। 
(कुछू कसूर करे हन तौ कह थपरा दे घनि आ।) 
बादर झनि आ झनि आ। 

चार महीना के तोर मेहनत (मेहनत हर), छिन मा चरपट होही। 
हमला अजम कसम से हावै, तै नोहस निरमोही।। 
अतक (अतेक) बड़े पानी के राजा, आइस बिना बलाये। 
सुनिहीं (सुनही) तउने छि छि (छि! छि!) करहीं, येमा मंजा का आये।। 
टेम टेम म बने लागथे, गारी घलो ल गा (खा)। 
(‘तैं लहुट लहुट घर जा‘ यह पंक्ति अतिरिक्त है।) 
बादर झनि आ झनि आ।। 

यही ‘कुटेमहा घटा सो‘ शीर्षक कविता 2007 में प्रकाशित उनके काव्य संग्रह ‘पर्रा भर लाई‘ के नवम् संस्करण में ‘बादर झनि आ झनि आ‘ शीर्षक से शामिल है। यहां इसके रचना काल या पूर्व प्रकाशन का संदर्भ नहीं है। बाद के प्रकाशन में कविता के कुछ शब्द बदल गए हैं, जो ऊपर कोष्ठक में इंगित हैं। इसीसे संबंधित कुछ अन्य बातें। ‘क्षितिज‘ के संपादक मंडल में होने की उल्लेख उन्होंने आलोक शुक्ल के साक्षात्कार में किया है, अन्यथा इसकी जानकारी सामान्यतः नहीं मिलती थी। संयोग कि मुझे डॉ. सुशील त्रिवेदी जी के संग्रह में यह अंक देखने को मिल गया। एक अन्य बात की ओर मेरा ध्यान गया, जिसकी चर्चा न के बराबर होती है कि ‘क्षितिज‘ में प्रकाशित इस कविता के साथ उनका उपनाम ‘श्याम‘ आया है।

इस कविता के लिए मुकुटधर पांडेय ने श्रीधर पाठक की पंक्ति ‘उलटि जाहु धन अबही बिनवत हे घनश्याम‘ को याद किया था। मुझे याद आया कि पुरानी फिल्म ‘शिकस्त‘ में लता मंगेशकर का गाया मधुर गीत है- कारे बदरा तू न जा, न जा। इसके विपरीत यहां कहा गया है बादर झनि आ, झनि आ। किसान ऐसे बेमौसम बादल को बरजता ही है, क्योंकि ‘कुंवरहा घाम अलकर, अउ कातिक के पानी‘। पकी पकाई फसल पर पानी फिरने का अंदेशा जो होता है। मेरे लिए उनकी यह कविता वैदिक देवता पर्जन्य की स्तुति का आभास देने वाली है। इस कविता में समय के साथ शब्दो-अंशों में परिवर्तन की विवेचना और कविता की व्याख्या, छत्तीसगढ़ी के लोक-मन के साथ पंडितजी के कवि-मन का उजागर कर सकती है, संभव है शोधार्थियों का ध्यान इस ओर गया हो।

छत्तीसगढ़ की संस्कृति नीति, विभागीय पत्रिका ‘बिहनिया‘ के नामकरण में आपकी प्रमुख भूमिका रही और छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के प्रथम अध्यक्ष नियुक्त हुए। आयोग के वर्तमान स्वरूप की नींव उन्होंने डाली थी। यद्यपि ‘सरकारी‘ कार्यप्रणाली और स्थितियों से खिन्न हो जाते थे। आपने आयोग के सचिव पद के लिए मुझसे कहा। मेरे यह कहने पर कि इस महत्वपूर्ण पद के लिए मुझसे अधिक योग्य और उपयुक्त लोग हैं, राजी नहीं हुए। इस पर मैंने फिर निवेदन किया कि सचिव पद का काम अन्य भी कर सकते हैं मगर पुरातत्व के क्षेत्र में काम करने वालों की कमी है, इस तर्क पर आसानी से सहमत हो गए। भाषा, संस्कृति और पुरातत्व से छत्तीसगढ़ का गौरव और महिमामंडन सदैव उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता में रहा।

- राहुल कुमार सिंह 
प्रमुख, धरोहर परियोजना, 
बायोडायवर्सिटी एक्सप्लोरेशन एंड रिसर्च सेंटर

Sunday, May 24, 2020

त्रिमूर्ति से त्रिपुरी-1939

बिलासा केंवटिन वाले बिलासपुर से अनाम शबरी वाले शिवरीनारायण के रास्ते में है, त्रिमूर्ति तिराहा या शायद चौराहा। पहले यह मस्ताना चौक के नाम से जाना जाता था। यह नाम क्यों रहा होगा, खुद सोचें, बता कर आपके मन की गुदगुदी कम नहीं करना चाहता। इतना जान लें कि मान-शान में मुकाबला हजरतगंज और लोकनाथ से। कितनी दूर और कितना समय लगेगा? सवाल पूछने वालों से यही कहा जा सकता है कि फिर तो आप न ही जाएं वहां। हिसाब-किताब से मुक्त जाएं, तभी आप उस त्रिमूर्ति तक पहुंच पाएंगे। फिर भी क्लू दिया जा सकता है, रिस्दा के बाद लीलागर नदी का पुल, कुटीघाट, मंगल मवेशी बजार का भांठा, शरणार्थी कैम्प और अब प्लांटेशन वाला, फिर दाहिनी ओर कोनार का गढ़ दिखने लगेगा और बाईं ओर दूर वाली चिमनी, बनाहिल पावर प्लांट की और पास वाली रेमंड, लाफार्ज, निरमा वालों का न्यूवोको, नाम बदलता रहा इस सीमेंट फैक्ट्री का। बस, अब तब है त्रिमूर्ति।

यह कहानी इसी त्रिमूर्ति के आसपास गढ़ी-बुनी गई है, रचयिता है समय, लोग और यह भू-खंड। वैसे भी दस्तावेजों के आधार पर तैयार इतिहास अधिकतर प्रयोजनमूलक होता है, जबकि सच्चा सांस्कृतिक इतिहास लोक स्मृतियों में ही जीवन्त रहता है, जो समूह-अस्मिता को गढ़ता है। तू कहता कागज की लेखी ..., लेकिन यह तो ठीक-ठीक आंखन देखी भी नहीं, कानन सुनी और कुछ मन में गुनी हुई है।

नरियरा-बनाहिल-झलमला, आरसमेटा-कोनार-कोसा, सोनसरी-रिस्दा-डोंडकी, मुड़पार-मलार, भैंसो-नंदेली-व्यासनगर और मुलमुला, जिस गांव में यह त्रिमूर्ति है। आसपास वीरान गांव मस्तुरीडीह, गोंदाडीह, रोझनडीह, तावनडीह, बोहारडीह और इन सब के बीच आबाद है यह गांव मुलमुला। इस इलाके पर कभी रीझ गई थीं अमृता प्रीतम और इनमें से कुछ गांवों का उल्लेख उनकी कहानी ‘लटिया की छोकरी‘, ‘गांजे की कली‘ में आता है। माना जाता है कि जिस अंदाज की छत्तीसगढ़ी इस आसपास बोली जाती है, वैसी मिठास और सौंदर्य और कहीं नहीं। यह खास तौर पर उल्लेखनीय इसलिए कि ऐसा इन गांवों के लोगों को कहते कभी नहीं सुना, मगर ऐसा ज्यादातर वे मानते हैं, जो इस क्षेत्र से दूर-दराज हैं, अड़ोसी-पड़ोसी कहते ही हैं, जिनमें एक अकलतरा निवासी मैं स्वयं भी हूं।

मुलमुला के चतुर्दिक वीरान/आबाद, राजस्व अभिलेखों और लोक प्रचलन के ग्राम(-नाम) हैं, जिनमें पूर्व दिशा के तावनडीह नाम के साथ अब कोई आबादी नहीं है, स्मृति में भी इसका अस्तित्व लगभग लुप्त है। पश्चिम का कुटीघाट-नंदियाखंड, वस्तुतः गांव नहीं, बल्कि लीलागर नदी के बायें तट पर स्थित मंदिर और घाट के कारण प्रचलित नाम हैं। उत्तर का गोंदाडीह, कभी वीरान, अब सीमेंट कारखाना स्थापित हो जाने के बाद फिर से आबाद, स्मृतियों में, जबान पर और अभिलेखों में भी पुनर्जीवित हो गया है। दक्षिण का मस्तूरीडीह, जो अब वीरान गांव है, मुलमुला के साथ संलग्न, विशेष महत्व का है। बताया जाता है कि इस गांव की आबादी पहले यहीं बसती थी, खेती-पानी और यातायात सहूलियत के कारण वर्तमान स्थिति की ओर खिसक आई। प्रसंगवश, कुछ दूरी पर पूर्व में रोझिनडीह, दक्षिण-पूर्व में बोहारडीह (हाड़ादहरा) और गोंदाडीह से लगा घघराबोड़ है, इन गांवों, ग्राम-नामों के साथ भी रोचक बातें पता चलती हैं।

अब कुछ बातें त्रिमूर्ति की। तय किया गया कि इस मार्ग संगम पर आसपास की विभूतियों की मूर्ति लगेगी। सबसे पहले तीन निर्विवाद नाम आ गए, लेकिन पूरा अंचल प्रतिभाओं की खान है, इसलिए तय करने में देर होने लगी, किसी ने सुझाया कि दो-तीन मंजिला बना दिया जाए, जिससे हर जाति, वर्ग, दल के महापुरुष एकोमोडेट किए जा सकें। इस तरह तीन का तेरह होने लगा। बहरहाल, हल निकला समय के साथ। इन कुछ गांवों लिए कहा जाता है- नार-फांस नरियरा बसै, फंकट बसै कोनार, काट-कूट कोसा बसै, देवता बसै मलार। आज के कवि अधिकतर बिना तुक की कविताएं रचते हैं, बेतुकी? वे अपने शब्दों पर संदेह करते दिखते हैं और अपनी कविता पर खुद ही भरोसा नहीं कर पाते। सहज विश्वासी लोकमन पर पद्य में कही गई बात का भरोसा जल्दी बैठता है और यदि उसमें तुकबंदी भी हो, जो आमतौर पर बिठाई ही गई होती है तो फिर कहने क्या। इस तरह की पद्य-पंक्ति मानो पत्थर की लकीर। इन गांवों के लिए कही गई ये बातें, परिहास-उपहास का आधार बनती हैं तो इन्हीं से महिमामंडन भी किया जाता है। लोकमन अपनी सुविधा से शब्द और पंक्ति जोड़-घटा, बदल लेता है और व्याख्या भी प्रसंगानुकूल कर लेता है।

इन गांवों में से नरियरा, रिस्दा, कोनार और मुलमुला के क्रमशः ‘भैरो, भोला, भुसउ, भान, ते कर मरम न जानय आन‘ अर्थात् इन चार महानुभावों के मर्म को अन्य कोई नहीं जान सकता। कुछ लोग आन के बजाय भगवान जोड़ते हैं, यानि भगवान ही इनका मर्म जान सकता है ’मरम जानय भगवान‘ या वह भी इनका मर्म नहीं जान सकता ‘न जानय भगवान‘। कभी इरादा होता है, चार खंडों का ग्रंथ बना डालूं, लेकिन वह इन महापुरुषों की महिमा का अनुमान लगाने को भी पर्याप्त न होगा, सोच कर रुक जाता हूं। फिलहाल इनमें से भानसिंह जी का एक प्रसंग, ‘मामूली-सा‘। उन्होंने अपनी संतानों का जैसा विवाह संबंध संभव किया था, वह पूरे विश्व में ज्ञात एकमात्र उदाहरण है। उन्होंने अपनी छह संतानों का ऐसा रिश्ता तय किया कि पिता-पुत्र उनके समधी बने। छह विवाह की तीन पिता-पुत्र समधी जोड़ियां। भानसिंह की पुत्री गुलापी देवी और पुत्र जीतसिंह, जिनका विवाह क्रमशः सिंउढ के चिंता सिंह के पुत्र बोधन सिंह (पत्नी गुलापी देवी) से तथा चिंता सिंह के पुत्र गोलन सिंह की पुत्री कुमारी देवी (पति जीत सिंह) से हुआ। इसी तरह भानसिंह के पुत्र रूप सिंह और पुत्र धीर सिंह, जिनका विवाह क्रमशः हरप्रसाद सिंह की पुत्री कनकलता (पति रूपसिंह) से और हरप्रसाद सिंह के पुत्र केशव कुमार सिंह की पुत्री रंजना देवी (पति धीर सिंह) से हुआ। पुनः भानसिंह की पुत्री शकुंतला देवी और पुत्री करुणा देवी, जिनका विवाह क्रमशः कौशल सिंह के पुत्र हरिहर सिंह (पत्नी शकुंतला देवी) से तथा कौशल सिंह के पुत्र विशेसर सिंह के पुत्र बृजराज शरण सिंह (पत्नी करुणा देवी) से हुआ। इस तरह भान सिंह के समधी बने सिंउढ़ ग्राम के पिता-पुत्र चिंता सिंह और गोलन सिंह, अकलतरा के पिता-पुत्र हरप्रसाद सिंह और केशव कुमार सिंह तथा नरियरा के कौशल सिंह और विशेसर सिंह।

इस अंचल की प्रसिद्धि लीला-नाटक और संगीत के लिए भी रही है। नरियरा में गउद वाले रासधारी दादू सिंह, रायगढ़ घराने के कत्थक गुरू कार्तिकराम का डेरा रहता था। अब ऐतिहासिक 52 वां कांग्रेस अधिवेशन, सन 1939 (10 से 12 मार्च) का प्रसंग, जिसमें गांधीजी समर्थित पट्टाभि सीतारमैय्या को हरा कर सुभाषचंद्र बोस दूसरी बार अध्यक्ष चुने गए थे। इस अधिवेशन के लिए स्थान चयन में छत्तीसगढ़ की भी दावेदारी थी, किंतु अंततः त्रिपुरी (जबलपुर) का चयन किया गया, किन्तु कर्ता-धर्ता महाकोशल प्रांतीय कांग्रेस कमेटी के सभापति और सेनापति, जीओसी यानि जनरल आफिसर कमांडिंग, छत्तीसगढ़ के ठाकुर छेदीलाल यानि अकलतरा वाले बैरिस्टर साहब थे।

इस अधिवेशन के लिए याद किया गया कि 1926 में कांग्रेस के 41वें गोहाटी अधिवेशन में हाथियों की शोभायात्रा निकाली गई थी, लेकिन यह हाथी बहुल असम में हुआ था। बैरिस्टर साहब ने इस बावनवें अधिवेशन को भव्य और यादगार बनाने के लिए 52 हाथियों की शोभायात्रा का कठिन संकल्प ले लिया, जिसकी पूर्ति के लिए शोभायात्रा उपसमिति के प्रभारी बैरिस्टर साहब के छोटे भाई कुंवर भुवन भास्कर सिंह ने जी-तोड़ प्रयास कर, इसे संभव बनाया। शोभायात्रा के लिए 25 हाथी महाराजा सरगुजा ने स्वयं के खर्च पर भेजे थे। इसके अतिरिक्त रीवां महाराज और उनके माध्यम से विभिन्न रजवाड़ों और जमींदारियों से हाथी आए थे। इसमें बघेलखंड कांग्रेस कमेटी का योगदान भी उल्लेखनीय था। प्रसंगवश, सुश्री डॉ. कुन्तल गोयल ने मध्यप्रदेश सन्देश में ‘इतिहास के पृष्ठों को समेटे सरगुजा की वनश्री‘ शीर्षक से प्रकाशित लेख में बताया है- ‘स्वाधीनता संग्राम के अंतिम दिनों में महाराजा रामानुजशरण सिंह देव ने अपनी सेना से 100 हाथी महात्मा गांधी के आयोजन को सफल बनाने के लिए रांची भिजवाए थे।‘ संभवतः यह जानकारी 1940 के रामगढ़ कांग्रेस अधिवेशन से संबंधित है, इससे लगता है कि कांग्रेस अधिवेशनों में हाथियों की शोभायात्रा का चलन हो गया था। 

इस शोभायात्रा में सबसे आगे, पहले हाथी पर गांधी जी और अध्यक्ष सुभाषचंद्र बोस की तस्वीर ले कर कुंवर भुवन भास्कर सिंह के जुड़वा कुंवर भुवन भूषण सिंह उर्फ नक्की बाबू बैठे थे। नंदेली के पचकौड़ प्रसाद (इन हारमोनियम वादक को बाजा मास्टर नाम दिया था बैरिस्टर साहब ने, क्योंकि उनके पिता का नाम भी यही ‘पचकौड़‘ था।) संगीत उपसमिति के प्रमुख थे, जिनके नेतृत्व में वंदेमातरम गीत और पं. लोचन प्रसाद पांडेय द्वारा रचित स्वागत गान जैसी सांगीतिक प्रस्तुतियां हुई थीं। चर्चा होती है कि इस दल में भिखारी ठाकुर भी थे, लेकिन बोलबाला इस अंचल के संगीतकारों तबला वादक भान सिंह, इसराज वादक सुखसागर सिंह, वायलिन-सितार वादक हजारी सिंह का था।
हाथियों वाली शोभायात्रा

पं. लोचन प्रसाद पांडेय ने स्वागत गान की रचना तथा त्रिपुरी कांग्रेस के संस्मरण को अपनी आत्मकथा में कुछ इस तरह दर्ज किया है-

एक दिन प्रातः मैं ठाकुर छेदीलाल बैरिस्टर (बार एट-ला) से मिलने उनके बिलासपुर स्थित निवास पर गया। उन दिनों वे प्रांतीय कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष थे। उन्होंने सस्नेह मेरा स्वागत करते हुए छत्तीसगढ़ी में कहा- ‘महराज मैं आज चिट्ठी भेजवैया रहें।‘ त्रिपुरी कांग्रेस अधिवेशन के लिए एक स्वागतगान की आवश्यकता थी। उन्होंने कहा- ‘इस कार्य को आपके अतिरिक्त और कौन अच्छी तरह कर सकता है।‘ थोड़ी देर मौन रह कर मैंने उत्तर दिया- ‘बैरिस्टर साहब, मैं तो अब हिन्दी पद्य रचना बन्द कर दिये हेंव‘ इस पर उन्होंने कहा कि - मैं अपने प्रांत की ओर से आपसे इस कार्य का भार ग्रहण करने का अनुरोध करता हूं। मैंने प्रत्युत्तर में कहा कि चूँकि यह आदेश प्रांतीय कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष का है अतः मैं इसका पालन करूंगा; लेकिन मुझे भय है कि कहीं मेरी कविता उच्च कोटि की न बन सके।‘ इस पर वे हँस पड़े और मैंने उनसे विदा ली।

घर लौट कर मैंने बैरिस्टर साहब की इच्छानुसार हिन्दी में कुछ पंक्तियां लिखीं पर वे मुझे उच्चकोटि की प्रतीत नहीं हुई। उचित समय पर मैंने इन पंक्तियों को बैरिस्टर साहब के पास उनका अभिमत जानने के लिए भेज दिया।... ... ...त्रिपुरी में मेरी भेंट श्री छेदीलाल जी, शुक्ल जी, महंत जी, मिश्र जी सेठ गोविंद दास तथा अन्य कांग्रेस जनों से हुई। ये सभी महानुभाव अधिवेशन के प्रबंध एवं स्वागत कार्यों में जुटे हुए थे। महंत जी ने मुझे बताया कि स्वागत समिति ने कांग्रेस के खुले अधिवेशन में गाए जाने के लिए मेरा स्वागत गान स्वीकृत कर लिया है। यह खबर सुन मैंने ईश्वर को धन्यवाद दिया। ठाकुर छेदीलाल बैरिस्टर का भी मैं आभारी था क्योंकि उन्होंने ही तो स्वागत गान लिखने के लिए मुझे आदेशित किया था।... ... ...महात्मा जी उस समय तक नहीं पधारे थे। अध्यक्ष गंभीर रूप से अस्वस्थ्य होने के कारण कलकत्ते में रोग-शैय्या पर पड़े थे। अध्यक्ष के स्वागत तथा जुलूस के लिए 56 से अधिक हाथी पहुंच चुके थे।... ... ...जब हम रौशनियों से जगमगाती दुकानों और पुस्तक विक्रेताओं के स्टालों का निरीक्षण कर रहे थे तभी यह शोर उठा कि एक हाथी अनियंत्रित हो गया है तथा दुकानों को तोड़ रहा है। हम लोग असमंजस में पड़ गये। लेकिन तुरंत ही खबर आई कि हाथी नियंत्रण में आ गया है तथा किसी प्रकार घबड़ाने की जरुरत नहीं है । इस सूचना से हमें राहत मिली।... ... ...ऐसा ज्ञात हुआ था कि त्रिपुरी कांग्रेस के प्रथम दिन के सभी कार्यक्रमों को न केवल अभिलिखित किया गया था बल्कि उनका चलचित्र भी उतारा गया था।

त्रिपुरी कांग्रेस के खुले अधिवेशन (1939) में गाया गया स्वागत गान

त्रिपुरी आज मुदित महान
महाकोशल चेदि मेकल हुए गौरववान
राष्ट्रपति भारत हृदय मणि विश्वबंधु प्रधान
सत्य समता अहिंसा के दिव्य दूत महान
यहां पधारे साथ लेकर भारत-भू भगवान
बुद्ध-ईसा-कृष्ण के तप-योग-बल बलवान
पुण्य आश्रम शर्मदा शुभ नर्मदा वरदान
युद्ध ज्वाला से लहे संसार अपना त्राण
पधारो भारत के यश चंद
तव सुभाष की सुधा लाभ कर कटे जाति दुख द्वन्द
वसुधा-हो वसु-पूर्ण प्रेम मय, मानवता स्वच्छंद
दुर्गावती-वीरता-केतन त्रिपुरी-शौर्य-अमन्द
रेवा जल से चरण पखारे ले सेवा आनंद

गान

त्रिपुरी करत स्वागत गान
जयति भारत विश्व हित रत जयति हिन्दुस्तान
अंग, बंग, कलिंग स्वागत शौर्य शक्ति निधान
सिन्धु-गुर्जर द्रविड़ उत्कल कला-कौशलवान
हस्तिना, काशी, अयोध्या, द्वारका गुण खान
समुद्र स्वागत पंचनद-भू कामरूप महान
हृदय सिंहासन बिछे हैं कर रहे आह्वान
नर्मदा तट महाकोशल बने गौरव-वान
वीर नन्द-आर्य ललना शक्ति केतन प्रधान
भूमि यह दुर्गावती की धन्य आज महान
कलचुरी हैहय महीपों का सुराज विधान
लखे नव ऋषि राज का नव-युग ‘स्वराज‘ विहान

पं. लोचनप्रसाद जी ने इंडियन हिस्टारिकल रिकार्ड कमीशन के कलकत्ता अधिवेशन 1938 के संस्मरण में ‘त्रिपुरी‘ से संबंधित एक अनूठा अविश्वसनीय प्रसंग का उल्लेख किया है कि हिस्ट्री कांग्रेस अधिवेशन के प्रतिनिधियों के लिए आयोजित स्टीमर विहार में ‘जगत विख्यात जादूगर पी.सी. सरकार हमारे मनोरंजनार्थ स्टीमर पर उपस्थित थे। उन्हांेने जादू के अद्भुत और आश्चर्यजनक खेलों का प्रदर्शन किया। हममें से कोई भी व्यक्ति ब्लैक बोर्ड पर अपनी इच्छा से कुछ भी लिखता था और श्री सरकार जो कि न केवल ब्लैकबोर्ड की ओर पीठ किये हुए थे बल्कि अपनी आंखों पर पट्टी भी बांधे हुए थे, उसे पढ़ते और उसका अर्थ बताते थे। यह हमारे लिए विस्मयकारी था। मैंने ब्लैकबोर्ड पर 300 ईसापूर्व की ब्राह्मी लिपि में ‘त्रिपुरी‘ लिखा। श्री सरकार से तुरंत उत्तर आया- “पिछले वर्ष के कांग्रेस अधिवेशन का स्थल, जिसके जुलूस में 56 हाथी थे“ वहां उपस्थित सभी विद्वान श्री सरकार की योग शक्ति पर चकित हो गये। (यहां तिथि के उल्लेख में चूक दिखती है, क्योंकि त्रिपुरी कांग्रेस का वर्ष 1939, इस अधिवेशन के साल 1938 के बाद का है!)
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आगे कुछ बातें सीधे मुलमुला की माटी यानि आदरणीय भाई साहब रमाकांत सिंह जी उर्फ बाबू साहब वल्द जीत सिंह वल्द भान सिंह की ओर से, नाममात्र को कतर-ब्योंत कर, उनकी अनुमति से प्रस्तुत-

मोर गुरु गटारन

हर युग में छला जाता है शिष्य यदि गुरु द्रोण हो। द्वापर में छला गया एकलव्य और कलियुग में सुखसागर। गुरु रामलखन दास जी वैष्णव, बनारस घराना। कण्ठे महाराज के परम और प्रिय शिष्य। वैष्णव जी का शायद प्रेम, झुकाव ज्यादा भान सिंह की ओर। सुखसागर ददा विनोदी स्वभाव संग स्मरण-कुशाग्र थे। वैष्णव जी के कलादान, ज्ञान के अंतिम वर्षों में मुलमुला में भान सिंह को एक शाम कुंआ के पाट पर बैठ तबला वादन की एक अतिरिक्त कला का गुप्त ज्ञान दे रहे थे। गुरु-शिष्य डूब गए थे, गोधूलि बेला में लय-सुर-ताल में।

ढाबों की पंक्तियां, जामुन, बिही, केला, सीताफल और बंधवा तालाब के पार पर अटी पड़ी गटारन झाड़ियां। जैसे-तैसे रात बीती, सुबह रियाज में भिड़ गये। भानसिंह गुनगुनाते हुए तबले पर चलाने लगे उंगलियां। अचानक इसराज पर वही लय-सुर-ताल झंकृत हो उठे। इधर भान सिंह की उंगलियां तबले पर नाचे, उधर इसराज के तार डोल उठे बोल पर बोल।

रामलखन दास जी मगन थे अपनी सिखाई विद्या पर, किन्तु अचानक बिजली सी कौंधी, माथा सन्न सन्न कर गया। अरे सुखसागर! ए धुन ल तैं कहाँ पाये रे? तो ला कोन सिखोइस?, तोर गुरु कोन? सुखसागर ददा बोले- मोर गुरु गटारन। ‘मोर गुरु गटारन‘, बन गई पहेली। वैष्णव जी बोले मैं समझा नहीं, जरा खुलकर बताओ तो। ये धुन, ये ताल मुलमुला में आखिर तुम्हें किसने सिखाया। सुखसागर ददा ने कहा, गुरुदेव आप भान भैया को ये ताल सिखला रहे थे। हां तो, तब मैं गटारन झाड़ी के नीचे दिशा-मैदान में बैठा था। क्या बोले, अरे भाई मैं दिशा फड़ाका में बैठा था। वैष्णव जी बोले मैं तो बहुत देर तक समझाता रहा ये ताल। तो क्या हुआ, मैं भी आखिरी तक सुनता रहा। मैं भूल गया कि मैं नित्य कर्म के लिए बैठा हूँ। धुन और ताल में इतना खो गया कि सब भूल गया। मुझे याद रहे तो बस वो ताल और धुन संग बोल। बोधि वृक्ष के नीचे बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई। और मुझे गटारन के नीचे आपके गुप्त ज्ञान की। अनायास सुखसागर ददा का विनोदी चंचल मन बोल उठा, मोर गुरु गटारन। ये कोई किस्सा नही जीवन के जीवंत पल साक्ष्य सहित। उनके हाथों लिखी पांडुलिपि, सुखसागर ददा के छोटे सुपुत्र भूलन सिंह के पास सुरक्षित है।

एक और संस्मरण। भैया क्रान्तिकुमार सिंह की जुबानी। बनारस घराने की सुप्रसिद्ध नर्तकी विद्याधरी, इसने जीवन पर्यन्त पूज्य कण्ठे महाराज की आराधना की। कण्ठे महाराज की मीरा थी विद्याधरी। घुंघरू बंधे तो बस कण्ठे महाराज के तबले की थाप पर और खुल गये तो फिर कभी बंधे ही नहीं। मोह, मौन और संकल्प भंग होता है। कण्ठे महाराज के शिष्य रहे श्री रामलखन दास वैष्णव जी। रामलखन दास जी के शिष्य रहे मुलमुला परिवार में भानसिंह ’तबला‘ और सुखसागर सिंह ’इसराज‘।

बनारस घराना ने बरसों कूटा और मांजा दोनों भाइयों को। रामलखन दास जी जब आश्वस्त हो गए, तब इन्होंने अपने शिष्यों से कहा बबुआ अब गंगा स्नान करेंगे। एक सुघर दिन गंगा स्नान कर गुरु कण्ठे जी को प्रणाम किया। एक संजोग इंतजार में बैठा था। विद्याधरी अपने घुंघरू उतार गुरु कण्ठे जी के पास बैठी थी। गुरु शिष्य का मिलन और वार्ता रहा होगा अलौकिक। रामलखन दास जी ने कण्ठे महाराज से मिलवाया, ये रहे मेरे शिष्य भान सिंह और सुखसागर सिंह। वैष्णव जी अपनी साधना, अपने गुरु को दिखाना चाहते थे। हठी बैरागी वैष्णव अपने शिष्यों को अँखिया चुका था, चूकना मत ये अवसर, आज नहीं तो कभी नहीं। रामलखन दास जी के मन रही होगी गांठ। विद्याधरी नाचे उसके शिष्यों की ताल और थाप पर। कारण भी ईश्वरीय महिमा ही कहें, विद्याधरी ने जब से होश सम्हाला था तो थिरकी थी गुरु कण्ठे जी की थाप पर, घुंघरू खुले तो उसकी थाप पर।

रामलखन दास जी का आदेश और उबलता खून दौड़ पड़ा। वैष्णव जी का आदेश हुआ, घुँघरु बंधे तो गुरु दक्षिणा पूरी हुई समझो, अन्यथा मेरी गंगा समाधि, मेरा हठ या भाग्य मानो। शुरू करो आठ गुना से, फिर करो सोलह गुना। सोलह गुना पर थोड़ा दौड़ाओ और बत्तीस गुना पर नचाओ। ताल और थाप का ऐसा संगम हुआ कि विद्याधरी के हाथ पड़े हर थाप पर, जांघ पर। पैरों में न जाने कब घुंघरू बंधे। कौन जाने कब पैरों ने थिरकना शुरू किया और कब किसके ताल-लय पर, कौन थिरका, थमा। उस संस्मरण की गूंज आज भी थिरकती है कानों में। कण्ठे महाराज को गुरु दक्षिणा मिली वैष्णव जी से। और वैष्णव जी भर पाए गुरु दक्षिणा मुलमुला से। रामलखन दास जी बोले कण्ठे महाराज जी से महाराज जी! ये ससुर हमको मलमल का धोती आउ कुर्ता दिए थे। फिन भुछि दक्षिना नहीं दिए थे न, आज मन गदगदा गया, मिल गया सब्बे कुछउ।


Sunday, March 27, 2011

तीन रंगमंच

ब्रज की सी यदि रास देखना हो प्यारों।
ले नरियरा ग्राम को शीघ्र सिधारो॥
यदि लखना हो सुहृद! आपको राघवलीला।
अकलतरा तो चलो, मत करो मन को ढीला॥
शिवरीनारायण जाइये, लखना हो नाटक सुग्घर।
वहीं कहीं मिल जाएंगे जगन्नाटक के सूत्रधर॥

रामकथा, कृष्णकथा, महाभारत और पौराणिक-ऐतिहासिक कथाओं के साथ मंचीय प्रयोजन हेतु नाट्‌य साहित्य को तो छत्तीसगढ़ ने आत्मसात किया ही रामलीला, रासलीला-रहंस से लेकर पारसी थियेटर तक का चलन रहा, जिसमें आंचलिक भाषाई-लोक और संस्कृत, ब्रज, अवधी, उर्दू के साथ हिन्दी के 'शिष्ट' नागर मंचों की सुदीर्घ और सम्पन्न परम्परा यहां दिखती है। लीला-नाटकों के पेन्ड्रा, रतनपुर, सारंगढ़, किकिरदा, मल्दा, बलौदा,  राजिम, कवर्धा, बेमेतरा, राहौद, कोसा जैसे बहुतेरे केन्द्र थे, लेकिन पंडित शुकलाल पाण्डेय के 'छत्तीसगढ़ गौरव' की उक्त पंक्तियों से छत्तीसगढ़ के तत्कालीन तीन प्रमुख रंगमंचों- नरियरा की कृष्णलीला, अकलतरा की रामलीला और शिवरीनारायण (तीनों स्थान वर्तमान जांजगीर-चांपा जिला में) के नाटक की प्रसिद्धि का सहज अनुमान होता है। इन पंक्तियों का संभावित रचना काल 1938-1942 के मध्‍य है।

शिवरीनारायण में पारंपरिक लीला मंडली हुआ करती थी, लगभग सन 1925 में मंडली के साथ संरक्षक के रूप में मठ के महंत गौतमदास जी, लेखक पं. मालिकराम भोगहा और निर्देशक पं. विश्वेश्वर तिवारी का नाम जुड़ा। इस दौर में भोगहा जी के लिखे नाटकों- रामराज्य वियोग, प्रबोध चंद्रोदय और सती सुलोचना की जानकारी मिलती है, जिनका मंचन भी हुआ। मठ के अगले महंत लालदासजी हुए और पं. विश्वेश्वर तिवारी के पुत्र पं. कौशल प्रसाद तिवारी के जिम्मे मुख्तियारी आई। आप दोनों की देख-रेख में सन 1933 से 'महानद थियेट्रिकल कम्पनी' के नाम से शिवरीनारायण में नियमित और व्यवस्थित नाट्‌य गतिविधियों का श्रीगणेश हुआ।

शिवरीनारायण में मनोरमा थियेटर, कलकत्ता के संगीतकार मास्टर अब्दुल शकूर और के. दास, परदा मंच-सज्जा सामग्री के लिए खुदीराम की सेवाएं ली जाती थीं। जबकि स्थानीय अनेकराम हलवाई और बनगइहां पटेल को संगीत प्रशिक्षण के लिए विशेष रूप से कलकत्ता भेजा गया था। नाटक और 'पात्र-पात्रियां' सहित उसकी जानकारी छपा कर, परचे पूरे इलाके में बांटे जाते। यहां मंचित होने वाले भक्त ध्रुव, हरिश्चंद्र तारामती, कंस वध, दानवीर कर्ण, शहीद भगत सिंग, नाटकों के नाम आज भी लोगों के जुबान पर हैं। दिल की प्यास, आदर्श नारी, शीशे का महल जैसे प्रसिद्ध और चर्चित नाटक का भी मंचन यहां बारंबार हुआ।

कलकत्ता के जमुनादास मेहरा का कृष्ण सुदामा और सूरदास, पंडित नारायण प्रसाद 'बेताब' देहलवी का महाभारत, नई जिंदगी, भारत रमणी, आगा हश्र कश्‍मीरी का यहूदी की लड़की, आंख का नशा, दगाबाज दोस्त, पंडित राधेश्याम रामायणी कथावाचक का ऊषा अनिरुद्ध, वीर अभिमन्यु और किशनचंद जेबा का जब्तशुदा नाटक भक्त प्रह्लाद आदि भी यहां खेले गए। तब नाटकों की स्क्रिप्ट मिलना सहज नहीं होता। बताया जाता है कि नये नाटक के स्क्रिप्ट के लिए रटंत-पंडितों और शीघ्र-लेखकों की पूरी टीम कलकत्ता जाती और सब मिल कर बार-बार नाटक देखते हुए चुपके से पूरे संवाद उतार लेते। यह भी बताया जाता है कि चर्चित नाटकों के कलकत्ता में हुए प्रदर्शन के महीने भर के अंदर वही नाटक यहां खेलने को तैयार होता। इस तरह कलकत्ते के बाद पूरे देश में कहीं और प्रदर्शित होने में शिवरीनारायण बाजी मार लेता।

अभिनेताओं में केदारनाथ अग्रवाल और विश्वेश्वर चौबे को विशेषकर शिव-पार्वती की भूमिका के लिए, कृपाराम उर्फ माठुल साव को भीम, गुलजारीलाल शर्मा को हिरण्यकश्यप, गयाराम पांडेय को अर्जुन, मातादीन केड़िया को दुर्योधन, लादूराम पुजारी को द्रोण व शंकर, तिजाउ प्रसाद को राणा प्रताप तथा श्यामलाल शर्मा व बनमाली भट्‌ट को हास्य भूमिकाओं के लिए याद किया जाता है। इसके अलावा तब के कुछ प्रमुख कलाकार झाड़ू महराज, कृपाराम साव, लक्ष्मण शर्मा, रामशरण पांडेय, बोटी कुम्हार, रुनु साव, नंदकिशोर चौबे, बसंत तिवारी, भालचंद तिवारी, श्यामलाल पंडित आदि थे। शिवरीनारायण में खेले जाने वाले जयद्रथ वध नाटक में धड़ से सिर का अलग हो जाना, शर-शय्या और पुष्पक विमान जैसे अत्यन्त जीवन्त और चमत्कारी दृश्यों की चर्चा अब भी होती है। यहां पं. शुकलाल पांडेय की कुछ अन्य पंक्तियां उल्लेखनीय हैं-

हैं शिवलाल समान यहीं पर उत्तम गायक।
क्षिति गंधर्व सुरेश तुल्य रहते हैं वादक।
विविध नृत्य में कुशल यहीं हैं माधव नर्तक।
राममनोहर तुल्य यहीं हैं निपुण विदूषक।
हैं गयाराम पांडेय से अभिनेता विश्रुत यहीं।
भारत में तू छत्तीसगढ़! किसी प्रान्त से कम नहीं॥

अमरीका के पोर्टलैंड, ओरेगॉन में लगभग सन 1920 में निर्मित Eilers & Co.  का पियानो शिवरीनारायण के नाटकों की शोभा हुआ करता था, जिसका संगीत न सिर्फ सुनने योग्य होता था, बल्कि लोग इस पियानो को बजता देखने को भी बेताब रहते। इस पियानो को संरक्षित करने की दृष्टि से अत्यंत जर्जर हालत में अकलतरा के सत्येन्द्र कुमार सिंह ने लगभग 30 साल पहले खरीदा और स्थानीय स्तर पर ही उसकी मरम्मत कराई और बजने लायक बनाया। शिवरीनारायण के नाटकों के प्रदर्शन की भव्यता और स्तर का अनुमान नाटक में संगीत के लिए इस्तेमाल होने वाले इस पियानो को देखकर किया जा सकता है।

महानद थियेट्रिकल कम्पनी 1956 तक लगातार सक्रिय रही, लेकिन 1958 में महंतजी के निधन के साथ संस्था ने भी दम तोड़ दिया। अंतिम दौर में 'गणेश जन्म' नाटक की तैयारी जोर-शोर से हो रही थी। तत्कालीन परिस्थितियों के चलते इस नाटक का प्रदर्शन न हो सका और यह कौशल प्रसाद तिवारी जी की व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया और तिवारी जी पर आक्षेप करते हुए पोस्टर छपे- 'गणेश-जन्म कब होगाॽ' इस दौर के घटना-क्रम से आहत तिवारी जी ने जीवन भर के लिए न सिर्फ नाटकों से रिश्ता बल्कि अपना पूरा सामाजिक सरोकार ही सीमित कर लिया। अपने अंतिम दिनों में वे जरूर नाटकों और पारसी थियेटर के ऐतिहासिक विश्लेपषण के साथ अपनी तथा-कथा लिख रहे थे, लेकिन क्या और कितना लिख पाये पता नहीं चलता। शिवरीनारायण में भुवनलाल भोगहा की 'नवयुवक नाटक मंडली' एवं विद्याधर साव द्वारा संचालित 'केशरवानी नाटक मंडली' के साथ कौशल प्रसाद तिवारी के 'बाल महानद थियेट्रिकल कम्पनी' की जानकारी मिलती है, जिससे यहां 'महानद थियेट्रिकल कम्पनी' के समानान्तर और उसके बाद भी नाटक मंडलियों और मंच की परम्परा होना पता लगता है।

नरियरा में रासलीला की शुरुआत प्यारेलाल सनाढ्‌य ने लगभग 1925 में की थी, जिसे नियमित, संगठित और व्यवस्थित स्वरूप दिया कौशल सिंह ने। तब से यह प्रतिवर्ष माघ सुदी एकादशी से आरंभ होकर 15 दिन चलती थी। यहां के पं. रामकृष्ण पांडेय के पास 60-70 साल पुराने हस्तलिखित स्क्रिप्ट में वंदना के बाद कृष्णकथा के विभिन्न प्रसंगों को लीला शीर्षक दिया गया है जो मानचरित, बैद्य, गोरे ग्वाल, खंडिता मान, दान, जोगन, चीर हरन, होरी, राधाकृष्ण विवाह, यमलार्जुन, उराहनो, माखन चोरी, गोचारण, पूरनमासी, चन्द्रप्रस्ताव, गोवर्धन गोप, मालीन और प्रथम स्नेह लीला नाम से है।
सन उन्‍नीस सौ तीसादि दशक का नरियरा लीला संबंधित चित्र 
कृष्ण भक्ति से ओत-प्रोत ग्राम नरियरा की प्रतिष्ठा छत्तीसगढ़ के वृन्दावन की रही है। यहां मंचित होने वाली लीला में गांव के गोकुल प्रसाद दुबे, राजाराम, कुंजराम के अलावा आसपास के भी अभिनेता होते, जिनमें जनकराम, सैदा, कपिल महराज, अमोरा, रामवल्लभदास, प्रभुदयाल, मदनलाल, श्यामलाल चतुर्वेदी और गउद वाले दादूसिंह रासधारी, प्रमुख नाम हैं। संगीत पक्ष का दायित्व बिशेषर सिंह पर होता था, जिनकी जन्मजात प्रतिभा में निखार आया, जब वे नासिक जाकर पं. विष्णु दिगंबर पलुस्कर के भतीजे चिन्तामन राव और सेमरौता, उत्तरप्रदेश के उस्ताद मुरौव्वत खान से प्रशिक्षित हुए। लीला के स्थानीय कलाकारों को भी तालीम के लिए वृन्दावन भेजे जाने का जिक्र आता है।
ऊपर गोल घेरे में ठाकुर कौशल सिंह
नीचे गोल घेरे में ठाकुर विशेषर सिंह
नरियरा से जुड़े अन्य संगीतज्ञ होते थे तबला वादक पं. गोकुल प्रसाद दुबे और सारंगी वादक भारत प्रसाद, बाजा मास्टर पचकौड़ प्रसाद, भानसिंह- तबला, सुखसागर सिंह- इसराज, अफरीद के रामेश्वरधर दीवान और साहेबलाल- बांसुरी, भैंसतरा के रघुनंदनदास वैष्णव- चिकारा, जैजैपुर के महेन्द्र प्रताप सिंह पखावजी के साथ बेलारी के बसंतदास, कुथुर के शिवचरन, मेहंदी के काशीराम तथा कोसा के पुर्रूराम। इस प्रकार नरियरा ऐसा केन्द्र बन गया था, जहां पूरे अंचल के संगीत प्रतिभाओं की सहभागिता होती थी। विक्रम संवत्‌ 2000 समाप्त होने के उपलक्ष में बहुस्मृत श्री विष्णु स्मारक महायज्ञ का आयोजन रतनपुर में हुआ। यज्ञ में माघ शुक्ल 8, मंगलवार, 1 फरवरी 1944 को नरियरा कृष्णलीला आरंभ हुई, जो इसके अंतिम यादगार और प्रभावी प्रदर्शन के रूप में याद किया जाता है।

प्रसंगवश थोड़ी चर्चा रतनपुरिहा गम्मत अथवा गुटका यानि कृष्ण लीला की। छत्तीगसगढ़ की प्राचीन राजधानी रतनपुर में लीला की समृद्ध परम्परा डेढ़ सौ साल से भी अधिक पुरानी है। गणेशोत्सव पर आयोजित होने के कारण यह भादों गम्मत के नाम से भी जाना जाता है। इस लीला की ब्रज, अवधी, मराठी, छत्तीसगढ़ी और संस्कृत, पंचमेल रूपरेखा-स्क्रिप्ट बाबू रेवाराम ने तैयार की। कहा गया है- 'कृष्ण चरित यह मह है जोई, भाषित रेवाराम की सोई।' रतनपुरिहा गम्मत की परम्परा के संवाहकों में लक्ष्मीनारायण दाऊ का नाम बहुत सम्मान से याद किया जाता है। लीला के प्रति उनका समर्पण किस स्तर तक था, इसका अनुमान पूरे इलाके में प्रचलित संस्मरणों-किस्सों से होता है। खैर! इसके बावजूद नरियरा के लीला का 'क्रेज' अलग ही था।

लक्ष्मीनारायण दाऊ
हुआ कुछ यूं कि रतनपुर विष्णु महायज्ञ में नरियरा की लीला का प्रदर्शन कराए जाने की बात आई, लेकिन अड़चन थी कि नरियरा कृष्णलीला का मंचन गांव के ही मंदिर के साथ बने मंच पर होता था, इसके अलावा कहीं और नहीं। जिम्मेदारी ली, श्री विष्णु महायज्ञ की स्थायी समिति के पदाधिकारी- कोषाध्यक्ष लक्ष्मीनारायण दाऊ ने। नरियरा वालों को संदेश भेजा गया, जो खर्च लगे दिया जाएगा, लेकिन यज्ञ में लीला होनी ही चाहिए। नरियरा वाले अड़े रहे कि किसी कीमत पर लीला, मंदिर के मंच से इतर कहीं नहीं होगी। बताया जाता है कि तब दाऊजी स्वयं नरियरा गए और एक नारियल, कौशल सिंह के हाथ में देकर कहा कि श्री विष्णु महायज्ञ का न्यौता है, नरियरा रासलीला मंडली को, कृपया स्वीकार करें। बस बात सुलझ गई। गाड़ा (भैंसा गाडि़या) रतनपुर रवाना होने लगे और नरियरा वालों ने यज्ञ समिति को भोजन-छाजन में भी एक पैसा व्यय नहीं करने दिया।

नरियरा मंच की परम्परा ने पचासादि के दशक में करवट ली और वल्लभ सिंह इस दौर के अगुवा हुए। अब लीला के साथ धार्मिक और सामाजिक नाटकों का मंचन होने लगा। पुरानी पीढ़ी के प्रसिद्ध संगीतकार, हारमोनियम वादक और गायक बिशेषर सिंह ने व्यास गद्‌दी संभाली। इसराज पर आपका साथ देते थे सुखसागर सिंह, तबले पर भानसिंह और बाद में उनके पुत्र वीरसिंह। बांसुरी और सितार हजारी सिंह बजाते थे। नाटकों के प्रमुख अभिनेता कृष्ण कुमार सिंह, मेघश्याम सिंह, भरतलाल पांडे, बिसुन साव, रामदास, पं. गीता प्रसाद, धनीराम विश्वकर्मा, दयादास, ननकी बाबू होते थे।
कृष्ण कुमार सिंह एवं भरतलाल पांडे
इस दौर में खेले जाने वाले नाटकों में सती सुलोचना, भक्त प्रह्‌लाद, वीर अभिमन्यु, बिल्व मंगल, वीर अभिमन्यु, हरिश्चन्द्र, ऊषा अनिरुद्ध, मोरध्वज, दानवीर कर्ण, चीरहरण आदि प्रमुख थे। 'राजेन्द्र हम सब तुम पर वारि जाएं, हिल-मिल गाएं खुशियां मनाएं' और 'मिला न हमको कोई कद्रदां जमाने में, ये शीशा टूट गया देखने दिखाने में' जैसे नृत्य-गीतों के बोल सबके जबान पर होते थे। नरियरा में नाटकों का यह दौर लगभग 30 साल पहले तक चलता रहा, लेकिन व्यतिक्रम के साथ ही सही यह परम्परा अगली पीढ़ी तक बनी रही।

अकलतरा में बैरिस्टर साहब ने रामलीला मंडली की स्थापना की, जिसकी शुरुआत 1919 से हुई। लेकिन 1924 के बाद दूसरी बार 1929 से 1933 तक होती रही। अकलतरा के रंगमंच में पारम्परिकता से अधिक व्यापक लोक सम्पर्क तथा अंग्रेजी हुकूमत के विरूद्ध अभिव्यक्ति का उद्‌देश्य बताया जाता है। यहां प्रदर्शित होने वाले नाटकों की दस्तावेजी जानकारी लाल साहब डा. इन्द्रजीत सिंह की निजी डायरी से मिली कि सन्‌ 1931 में 23 से 26 अप्रैल यानि वैशाख शुक्ल पंचमी से अष्टमी तक क्रमशः लंकादहन, शक्तीलीला, वध लीला और राजगद्दी नाटकों का मंचन हुआ।

सर्कस कंपनियों के साथ आर्कलैम्प जलाकर घुमाया जाता था, ताकि दूर-दूर के लोग जान सके कि सर्कस आया है और शो शुरू होने वाला है। इसी तरह का, लेकिन कुछ अलग इंतजाम अकलतरा रामलीला के लिए किया जाता था। इसके लिए एक पोरिस (पुरुष प्रमाण) गड्ढा खोदा जाता, जिसमें लीला शुरू होने के घंटे भर पहले, लाल साहब अपनी 500 ब्लैक पाउडर एक्सप्रेस बंदूक दागते थे, जिसकी आवाज एक-डेढ़ कोस तक सुनाई देती और आस-पास के गावों में पता चल जाता कि अकलतरा में रामलीला शुरू होने वाली है। कुछ ऐसे दर्शक रोज होते जो इस दृश्‍य को भी लीला की आस्‍था लिए देखने पहुंच जाते।

अकलतरा रामलीला मंडली के एक अन्य दस्तावेजी स्रोत से पता चला कि चैत माह में नारद मोह, राम जन्म, विश्वामित्रागमन, फुलवारी लीला, धनुष यज्ञ, राम विवाह, कैकई मंथरा संवाद, राम बनवास, भरत मनावनी, सीताहरण, बालिवध, लंका दहन, रामपयान, सेतुबंध, शक्तीलीला, सुलोचना सती, रावण वध, रामराज्याभिषेक लीलाएं होती थीं। यह जानकारी ''बी.एल. प्रेस- 1/2 मछुआबाजार स्ट्रीट, कलकत्ता में छपे 'विज्ञापन' परचे से मिलती है, जिसमें अभिनयकर्ताओं की सूची में चन्दन सिंह, हमीर सिंह, सम्मत सिंह 1 व 2, ननकी सिंह 1 व 2, रामाधीन, शिवाधीन, गुनाराम, मुखीलाल, चुन्नीलाल आदि 40 अभिनेताओं के नाम हैं। इस परचे में ठाकुर दलगंजन सिंह को प्रधान व्यास, ठाकुर स्वरूप सिंह को व्यास और पंडित पचकौड़प्रसाद (बाजा मास्टर के नाम से प्रसिद्ध) को हारमोनियम माष्टर लिखा गया है, जबकि विनीत के स्थान पर ठाकुर छोटेलाल, मैनेजर का नाम है।''

मथुरा, लखनऊ तथा वृंदावन के साथ-साथ अल्फ्रेड और कॉरन्थियन नामक कलकत्ता की दो थियेटर कम्पनियों का प्रभाव इस अंचल के रंगमंच पर विशेष रूप से था और इन्हीं कम्पनियों के सहयोग से परदे, नाटक सामग्री व अन्य व्यवस्थाएं की जाती थी। छत्तीसगढ़ में हिन्दी नाटकों के आरंभिक दौर का यह संक्षिप्त विवरण राष्ट्रीय परिदृश्य के साथ जुड़ कर, यहां रंग परम्परा की मजबूत पृष्ठभूमि का अनुमान कराता है।

• यहां आए परम्परा के संवाहक और संरक्षक प्रतिनिधियों का नाम उल्लेखनीय और स्मरणीय होने के साथ आदरणीय है।
• इस विषय पर शोधपरक व्यापक संभावनाएं हैं, आरंभिक सर्वेक्षण और वार्तालाप में संबंधित तथ्यात्मक जानकारी तथा दस्तावेजी व अन्य सामग्री जैसे वाद्य यंत्र, वेशभूषा, परदे आदि की ढेरों सूचनाएं प्राप्त हुई हैं।

डा. रामेश्वर पांडेय
इस लेख को तैयार करने में सर्वश्री श्यामलाल चतुर्वेदी, कोटमी-बिलासपुर, डा. बी.के.प्रसाद, बिलासपुर, बस्‍तर बैंड वाले अनूप रंजन, कोसा-रायपुर, शिवरीनारायण के कलाकार, कवि व संगीतज्ञ डा. रामेश्वर पांडेय 'अकिंचन' (जो कहते हैं- 'मेरा जन्म 83 साल पहले तब हुआ जब कृष्ण-सुदामा नाटक खेला जा रहा था'), विश्वनाथ यादव, डा. आलोक चंदेल, डा. अश्विनी केशरवानी, पूर्णेन्द तिवारी, बृजेश केशरवानी, अकलतरा के रवीन्द्र सिसौदिया, रविन्द्र सिंह बैस, सौरभ सिंह, नरियरा के पं. रामकृष्ण पांडेय, देवभूषण सिंह, कृष्ण कुमार सिंह, पं. भरतलाल का सहयोग लिया गया।

मूलतः, सन 2008 में विश्व रंगमंच दिवस 27 मार्च के अवसर पर रायपुर से प्रकाशित संकलन 'छत्तीसगढ़ हिन्दी रंगमंच' के लिए मेरे द्वारा तैयार किया गया आलेख।