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Saturday, December 25, 2021

गुरु घासीदास बाबा

सन 2006 गुरु घासीदास जी की 250वीं वर्षगांठ का अवसर था। इस वर्ष 18 से 31 दिसंबर तक संस्कृति विभाग, छत्तीसगढ़ शासन द्वारा पूरे राज्य में विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए गए साथ ही परिचयात्मक पुस्तिका प्रकाशित की गई। प्रदर्शन और पुस्तक प्रकाशन में भूमिका निर्वाह के सुअवसर का स्मरण करते हुए, पुस्तिका के अंश प्रस्तुत-

गुरु बाबा घासीदास जी की 250वीं जयंती
लोक कला महोत्सव
(18 से 31 दिसंबर 2006)

राज्य शासन द्वारा गुरु घासीदास जी की 250वीं वर्षगांठ के अवसर पर जिला एवं राज्य स्तरीय वृहद लोक कला महोत्सव आयोजित करने का निर्णय लिया गया। इसके अंतर्गत रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग, राजनांदगांव, जांजगीर एवं कवर्धा जिले में 3 दिन, महासमुंद, धमतरी, रायगढ़, कोरबा में 2 दिन तथा बस्तर, कांकेर, दांतेवाड़ा, कोरिया, सरगुजा एवं जशपुर में 1 दिन का कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा, जिसमें प्रदेश के सतनामी समाज के प्रशंसित लोक कलाकार अपनी प्रस्तुति देंगे। इन कार्यक्रमों में पंथी नृत्य प्रतियोगिता के साथ अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रम भी देखने को मिलेंगे।

राष्ट्रीय स्तर के कलाकार दलों का चयन कर प्रत्येक दल को तीन जिले में सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुतीकरण का अवसर प्राप्त होगा। ये दल संत कबीर, संत रैदास आदि के भजन एवं गुरु घासीदास जी का महिमामय उपदेशों का गायन प्रस्तुत करेंगे। इन कार्यक्रमों के तहत जिला स्तरीय समिति द्वारा अनुशंषित सतनामी समाज के प्रतिष्ठित नागरिकों के श्रीफल, शाल एवं जैतखाम स्मृति धारकर जिला स्तरीय कार्यक्रम में सम्मान दिया जाएगा।

स्टेट स्तरीय समारोह की घटना रायपुर में 30 व 31 दिसंबर को किया जाएगा, जिसमें पंथी नृत्य प्रतियोगिता के पुरस्कार के साथ-साथ संस्कृति विभाग की स्थापना स्व. देवदास बंजारे स्मृति पुरस्कार भी दिया जाएगा। मारा पंथी पार्टियों को जिला स्तर पर 50, 25 व 15 हजार और राज्य स्तर पर एक लाख, 75 हजार व 50 हजार रुपये की राशि पुरस्कार के साथ पंथ नृत्य की प्रतिकृति (ढोकरा शिल्प) प्रदान करने की सोच। इस समारोह में सतनामी समाज के राजगुरूओं का सम्मान किया जाएगा।

पूज्य संत गुरु बाबा घासीदास 
सत-नामी वसुंधरा का अनमोल रत्न

पूज्य गुरु घासीदास का अवतरण 1756 में सत की पूर्ण स्थापना एवं समाज में उपेक्षितों को सामाजिक न्याय के द्वारा एकात्मता एवं समरसता स्थापित करने के लिए हुआ था। यही उद्देश्य सतनाम के रूप में प्रचलित हुआ। इस पंथ का अभ्युदय समाज एवं संस्कृति के नवजागरण की एक अलौकिक घटना है। इस महान संत के अवतरण से छत्तीसगढ़ की धरा आत्मगौरव सम्पन्न हुई। समरसता के इस अग्रदूत के जीवनगाथा, उनके उपदेश आज भी समाज के लिए अनुगामी हैं। उनके उपदेशों में आध्यात्मिकता, दार्शनिकता, सामाजिक दृष्टि और जीवन दर्शन का विशाल भण्डार समाहित है। सतनाम पंथ के प्रवर्तक गुरु घासीदास एक महामानव थे, जिनमें मानवता, प्रेम, दया, दया, करुणा, समता, सामाजिक समरसता भरी थी। वे सभी समानता को समझते थे।

पूज्य गुरु घासीदास सन् 1807 में सत्य की खोज में जगन्नाथ पुरी की यात्रा पर निकल पड़े अपने साथियों के साथ। सारंगढ़ तक ही पहुंचें और कि उन्हें आत्मबोध हुआ और सत्यनाम की मणि मिली। चक्र से सतनाम, सतनाम का उच्चारण करते हुए वापस लौटें और लोक मंगल में लीन हो गए।

युगप्रवर्तक संत गुरु घासीदास गिरौदपुरी से सोनाखान के जंगल छातापहाड़ में 6 माह के लिए अंर्तध्यान हो गया तथा जंगल के एकांत में विवेक और तपस्या करते-करते, औंरा-धौंरा, तेन्दू वृक्ष के नीचे आत्मज्ञान की कमीशन में लीन हो गए। छातापहाड़ के सघन वन के बीच स्थित विशाल शिला के ऊपर वे ध्यानमुद्रा में ध्यानस्थ हो गए। इसी बीच संतगुरु को सत्यपुरुष साहेब के दर्शन हुए। वे बाबा को सत्य का संदेश देकर, सतनाम के प्रचार के लिए आदेशित कर अंतध्यान हो गए। पूज्य गुरु घासीदास को उसी समय सत्य की अनुभूति हुई और नई चेतन ऊर्जा प्राप्त करके ताप समाप्त कर 28 संलग्नक 1820 को प्रतीक्षारत् के रूप में उन्होंने 'सतनाम' का दिव्य संदेश दिया।

सत्य ही ईश्वर है, सत्य ही मानव का जेवर है, मांसाहार पाप है, सभी जीव समान हैं, पशुबलि, जीवत्या है, विहीन पदार्थों का सेवन मत करो, मूर्तिपूजा बंद करो, जड़ सेता आता है, लड़कों को हल में मत जोतो, दोपहर में जोड़ने या भोजन ले जाने बंद करो, निराकार सतनाम साहेब का जप करो, पर नारी को माता मानो, सूर्य के भिन्न, सुबह-शाम सतनाम का जप करने से मन पवित्र होगा, मानव जाति के नाम यही उनके जीवन का मूल संदेश है ।

इसी दिव्य संदेश को सुनने एवं उनके दर्शन पाने के लिए स्थान भक्तजन गिरौदपुरी में एकत्रीकरण होने लगे। उनके दर्शन पाकर, उनके उपदेश श्रवण, भक्तजन भाव-विभोर एवं मुग्ध हो जाते थे। पूज्य गुरु घासीदास जी ने सतनाम का गांव-गांव घूमकर लोकभाषा छत्तीसगढ़ी में उपदेश दिया। उनके उपदेशों से जनजागृति एवं जनचेतना का विकास हुआ। इससे विशाल जनसमूह उनके अनुयायी बने। आज भी उनके यशगाथा और उपदेशक देश भर में वरीयता प्राप्त लाखों अनुयायी हैं।

आपने सतनाम पंथ के यात्रियों को जैतखाम स्थापित करने का संदेश दिया। शुभ्र वस्त्र, ध्वल, उज्ज्वल ध्वज आकाश में फहराये, जो विश्वशांति, सत्य व अहिंसा का संदेश देते हैं। जैतखाम समाज में फैली हुई बुराई, अंधविश्वास, रूढ़िवाद, अज्ञानता पर विजय का प्रतीक है जो धरा से ऊर्जा लेकर सूर्य, चंद्र किरणों से समाज को शक्तिशाली, ऊर्जावान बलशाली और प्रज्ञा बनाता है।

पूज्य गुरु घासीदास का जीवन दर्शन युगों-युगों तक मानवता के संदेश देगा। राष्ट्रीय जागरूकता को विकसित करने में आपकी अविश्वसनीय योगदान हो रहा है। आप वर्तमान युग के विद्युत क्रांति गुरु हैं, आपका व्यक्तित्व एक ऐसा प्रकाश स्तंभ है, जिसमें सत्य, अहिंसा, करूणा तथा जीवन का ध्येय उदासीन रूप से प्रकट होता है। आपके उपदेशों की विशेषता यह है कि आपने अपने संपूर्ण उपदेश छत्तीसगढ़ी में ही दिए गए आपके उपदेशों के सार पंथी गीतों व मंगल गीतों में मिलते हैं।

पंथी में प्रमुख रूप से बाबा घासीदास के जीवन चरित्र पर केंद्रित इन गीतों में जहां एक ओर प्रेम, करुणा, श्रद्धा और शांति जैसे भावों की प्रेरणाएं पिरोई होती हैं वहीं दूसरी ओर अहिंसा, सद्भावना, एकता, मानवता आदि के संदर्भ में तारक, मूल्यपरक और शिक्षा स्नातक के नगीने भी जुड़े हुए हैं। 

अमर वाणी
संत गुरु के दिव्य संदेश

  • सत्य ही ईश्वर है, ईश्वर ही सत्य है।
  • ब्रह्म निर्गुण निराकार है।
  • सत्य आचरण पर उतरें।
  • जीव हत्या पाप है।
  • सभी जीव समान हैं।
  • मांस भक्षण पाप है।
  • पशु बलिन्ध अविश्वास है।
  • पूजा पूजा जड़ता है। मूर्ति पूजा निषेध है।
  • शराब, धूमपान करना मानव के लिए अहितकर है।
  • नारी एवं पुरुष समान है, पर नारी को माता जानो।
  • चोरी करना पाप है।
  • समाज में नियोजित, संगठित करो।
  • जात पात, छुआछूत मानव द्वारा बनाया गया है।
  • सतपुरुष सतनाम साहेब के सभी सन्तोष है।
  • सभी धर्मों का आदर करो।
  • गुरु एवं अनुदान का सम्मान करें।
  • संदीप लाइफ टाइम करो।
  • जैतखाम प्रत्येक शिष्यों के लिए पूज्यनीय एवं आदर्श है।
  • विधवा विवाह नारियों के लिए समाज में लागू करो, नारी समाज में सहभागी बनाकर जी सके।
  • समाज में महंत, भंडारी, छडीदार का पद रखें जो समाज का उच्च व्यक्ति होगा, गुरु के बताए मार्ग पर चलेगा।
  • सतनाम धर्म का पालन गृहस्थ में रहकर भी किया जा सकता है।
  • मानव, काम क्रोध, लोभ, मोह का परित्याग करे।
  • सभी मानव को भाई चारे का संदेश दें।
  • सत्य अहिंसा मानवता का संदेश है।
  • कंठी धारण करो।
  • नाम की कमाई करके, आत्मा को परमात्मा से मिलाय करके सतनाम साहेब के पास जाने का प्रयास करे।

Wednesday, November 3, 2021

सतनाम

छत्तीसगढ़ राज्य गठन के पश्चात, एक सप्ताह विभिन्न स्थलों का सर्वेक्षण राजमहंत श्री जगतूराम सोनवानी, रायपुर और राजमहंत श्री रामसनेही सोनवानी जी, बिलासपुर के मार्गदर्शन में संस्कृति विभाग के अधिकारी डा. के.पी. वर्मा द्वारा किया गया था। यहां प्रस्तुत जानकारी मुख्यतः डा. वर्मा के नोट का अंश है, साथ ही इस संबंध में डा. जे.आर. सोनी जी तथा डा. अनिल भतपहरी जी से प्राप्त सुझाव को भी सम्मिलित किया गया है।

सोनी जी ने गुरु घासीदास के 7 सिद्धांतों तथा 42 उपदेशों (राधाकृष्ण प्रकाशन की पुस्तक ‘गुरु घासीदास‘) में प्रमुख संदेश- 1. मदिरा-पान का त्याग 2. मांस का त्याग 3. मानव-मानव एक समान 4. मूर्ति-पूजा बन्द करो 5. गायों को हल में मत जोतो 6. दोपहर में हल मत चलाओ 7. निरन्तर सतनाम का ध्यान करो, बताया है। इसी पुस्तक में उल्लेख है कि राजमहंत किशनलाल कुर्रे ने उनकी अमृतवाणियों की संख्या 82 मानी है तथा बाबाजी-गुरु घासीदास द्वारा भूमिहीनों को भूमि का मालिक बनाने के लिए प्रयास की ओर ध्यान आकृष्ट कराया तथा भतपहरी जी ने सतनाम रावटी दर्शन यात्रा के 22 से 25 दिसंबर 2018 तक, तीन दिवसीय शोध अध्ययन अभियान की जानकारी उपलब्ध कराई है, जिसमें 1-चिरईपदर, 2-दंतेवाड़ा, 3-कांकेर, 4-पानाबरस, 5-डोंगगरगढ़, 6-भंवरदाह, 7-भोरमदंव, 8-रतनपुर तथा 9-दल्हापहाड़ की यात्रा की गई थी। इन रावटी स्थलों में धर्मोपदेशना और सतनाम-पान (दीक्षा) भी हुआ करते थे। उक्त स्थलों पर दर्शनार्थी वर्षों से आते-जाते हैं। अब जो कुछ वीरान थे, वहां भी जाने लगे हैं। यहां प्रदर्शित नक्शा भी भतपहरी जी ने उपलब्ध कराया है।

वर्मा जी से प्राप्त नोट का अंश- 
छत्तीसगढ़ में बाबा गुरु घासीदास की रावटी (पड़ाव) से संबंधित कई स्थल हैं लेकिन राजगुरु या महंतों से प्राप्त जानकारी के आधार पर महत्वपूर्ण स्थल/रावटी संबंधी की जानकारी इस प्रकार है-

छाता पहाड़- रायपुर जिले के सतनामी सम्प्रदाय के महंत स्वर्गीय श्री जगतूराम सोनवानी के अनुसार बाबा घासीदास ने सोनाखान जमींदारी के अंतर्गत छाता पहाड़ नामक स्थल पर तपस्या की थी। यह स्थल गिरौदपुरी से लगभग 8 किलोमीटर की दूरी पर महराजी ग्राम से 2 किलोमीटर अंदर जंगल में स्थित है। छाता पहाड़ में एक विशाल चट्टान है जिसके उपर बाबाजी ने तपस्या किया था तथा उसके पास घने जंगलों के मध्य पहाड़ी झरना स्थित है। इसके बाद नवागांव होते हुए छेरकापुर में रुके थे जहां पर मंदिर निर्मित है तथा यहां से अमेरा होते हुए तेलासी तथा भण्डार गये।

भण्डारपुरी उनकी कर्मभूमि रही तथा यहां पर उनके बड़े लड़के अमरदास जी का पलंग अभी भी रखा है जिसकी पूजा होती है। भण्डारपुरी से पांच किलोमीटर की दूरी पर तेलासी बाड़ा है। यहां पर भी उनके बड़े लड़के अमरदास निवास करते थे। एक किवदंती के अनुसार एक बार बाबा घासीदास जी घूमते हुए तेलासी पहुंचे तथा उनके बड़े लड़के से ग्राम के बाहर तालाब के मेड़ में मुलाकात हुई। बाबा जी ने लड़के को पहचानने से मना कर दिया बाद में ग्रामीणों के समझाने पर वे माने। यहां पर बाबा घासीदास जी का परिवार निवास करता था बाद में उनके बड़े लड़के अमरदास जी दुर्ग जिले में तपस्या करते हुए शिवनाथ नदी के दायें तट पर चेटुआ घाट में समाधि लीन हो गये।

चिरई पदर- यह स्थल वर्तमान दंतेवाड़ा जिले के अंर्तगत है जहां पर बाबा जी ने घूमकर तपस्या करते हुए गये थे तथा वहां की जनता को उपदेश दिये तथा प्रभावित किया।

पानाबरस- यह स्थल कांकेर जिले के अंतर्गत आता है यहां पर भी बाबा जी घूमते हुए गए थे तथा पड़ाव डाला था। वहां रूककर उन्होंने जनता को तथा साधु संतों को उपदेश दिया तथा अपने विचारों से प्रभावित किया। 

डोंगरगढ़- कांकेर तरफ से लौटते हुए बाबा जी ने डोंगरगढ़ में भी रावटी लगाई थी तथा इस क्षेत्र की जनता भी इनके प्रभाव में आई और बाबा जी के सत्कर्मों एवं विचारों से प्रभावित हुए। 

भंवर दहरा- डोंगरगढ़ से घूमते हुए राजनांदगांव जिले के गंडई पंडरिया नामक स्थल से लगभग 10 किलोमीटर की दूरी पर पहाड़ी के उपर घने जंगलों के मध्य बाबा जी गये तथा जहां पर आज भी ऊंची-ऊंची चट्टाने हैं तथा पानी का झरना है। यहां की चट्टानों में मधुमख्खियां भी हैं तथा जंगली जानवरों का आज भी आतंक है। यहां से भी बाबा जी ने इस क्षेत्र की जनता को उपदेशों के द्वारा काफी प्रभावित किया।

रतनपुर- इस स्थल का निरीक्षण मेरे (डा. के.पी. वर्मा) द्वारा बिलासपुर जिले के महंत ग्राम सेंदरी के श्री रामसनेही गुरुजी के साथ दिनांक 23.12.01 को किया गया था। रतनपुर बस्ती के पहले दुलहरा तालाब की मेड़ पर बाबा जी ने रावटी लगायी थी जहां पर प्रतिवर्ष माघ पूर्णिमा में मेला भरता है इस क्षेत्र की जनता को भी बाबा जी ने अपने उपदेशों से काफी प्रभावित किया था।

दलहा पहाड़- रतनपुर से घूमते हुए बाबा घासीदास जी ने बलौदा होते हुए 16 किलोमीटर की दूरी पर दलहा पहाड़ नामक स्थल पर भी रावटी लगाई थी जो बम्हनी नामक ग्राम से 7 किलोमीटर अंदर है। यहां पर पहाड़ी में एक कुंड है तथा वर्तमान में एक धर्मशाला भी है। यहां पर भी साधु संत तथा दर्शनार्थी आते थे। महंत रामसनेही से प्राप्त जानकारी के अनुसार यहां के कुंड के पानी को अमृत बनाकर मलेरिया बुखार से पीड़ित लोगों को दिया करते थे जिससे वे ठीक हो जाते थे। यहां पर जगदेवा जी स्वामी का 19 वर्ष पूर्व का बना हुआ तपस्या स्थल है।

इसके बाद बाबा जी यहां से तपस्या करते हुए बलोदा से 11 किलोमीटर दूरी पर खोंड़ पचरी नामक ग्राम भी गये थे जिनके साथ साधु संत भी थे यहां पर एक विशाल तालाब 22 एकड़ क्षेत्रफल में निर्मित है, जिसकी मेड़ पर बाबा जी ने तपस्या किया था तथा रावटी लगाई थी। यहां पर भी दर्शक तथा बीमार लोग आते थे। उनको भी बाबा जी ने उपदेशों एवं अपने विचारों से अवगत कराया तथा सत्कर्मों एवं अच्छे विचारों के द्वारा जनता को प्रभावित किया। तत्पश्चात बाबा घासीदास जी पामगढ़ तथा गिधौरी होते हुए गिरौदपुरी चले गये। यह उनकी अंतिम रावटी थी। खोंड पचरी में चैत्र-कृष्ण पक्ष में सप्तमी, अष्टमी एवं नवमी को मेला मरता है।

इस प्रकार उपर्युक्त विवरण से यह जानकारी प्राप्त होती है कि आज से ढाई सौ वर्ष पूर्व में आवागमन के साधनों की कमी तथा बीहड़ जंगलों के होते हुए भी बाबा जी ने संपूर्ण छत्तीसगढ़ में तत्कालीन मानव समाज के दूषित आचरण में उनके मन को मानव समाज में निहित विषमताओं के कारणों को जानने हेतु उद्वेलित किया। मानव का आपस में जाति भेद, ऊंच नीच का भेद, छुआ-छूत आदि के कारण मानव द्वारा मानव पर हृदय विदारक अत्याचार का दृश्य देखा था। सतनाम धर्म साधना से आई शक्तियों ने उन्हें एकांत चिंतन की ओर तथा एकांत चिंतन ने उन्हें समाधि की ओर अग्रेषित किया। समाधि साधना से उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई तथा उन्होंने अपने आध्यात्मिक शक्ति साधना से अनेकों सिद्धियां प्राप्त की।

बाबा घासीदास ने अपनी सिद्धि से सही धर्म तथा जाति की स्थापना, मानव के विभिन्न दुखों का आध्यात्मिक ज्ञान से इलाज, मानव में सामाजिक चेतना एवं राष्ट्रीय चेतना का विकास, लोगों को कर्मशील, परिश्रमी बनाना तथा नारियों को विकास की धारा में जोड़ना, दलितों में स्वाभिमान जागृत करना, नशा सेवन, मांस भक्षण आदि को दूर करना, जीवों के कष्टों को अहसास करने की क्षमता मनुष्यों में पैदा करना, जीव हत्या को रोकना, बलि प्रथा का अंत करना, पशुओं पर अत्याचार बंद कराना आदि उद्देश्यपूर्ण हुए तथा एक महान संत के रूप में उभरकर जनता के सामने प्रकट हुए।

सतनाम धर्म-संस्कृति के प्रणेता गुरु घासीदास जी से संबंधित विभिन्न स्तरीय शोध-प्रकाशन हुए हैं। डा. सोनी तथा डा. भतपहरी के अलावा मंगत रवीन्द्र जी, रामशरण टंडन जी जैसे परिचितों से इस संबंध में चर्चा होती रही है। अब तक बाबाजी और सतनाम धर्म-संस्कृति से संबंधित गंभीर, तथ्यात्मक जानकारियों, साहित्य आदि की सूची, संभव है कि तैयार की गई हो, किंतु सहज उपलब्ध नहीं होती। पुराने कामों में श्री नम्मूराम मनहर, संत मंगल, पंडित सखाराम बघेल, पं. मनोहरदास नृसिंह, श्री नकुल ढीढी, श्री समयदास अविनाशी, डा. हीरालाल शुक्ल आदि की चर्चा, उल्लेख देखने को मिलता है। एक पुस्तक संस्कृति विभाग के सहयोग से राधाकृष्ण प्रकाशन द्वारा, तपश्चर्या एवं आत्म-चिंतन ‘गुरु धासीदास‘ शीर्षक से प्रकाशित हुई है। ऐसे सभी महत्वपूर्ण प्रकाशित संदर्भों की सूची संक्षिप्त परिचय सहित प्रकाश में आने, इंटरनेट पर उपलब्ध करा दिए जाने से छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक इतिहास के इस पक्ष में रुचि लेने वालों, अध्येताओं, शोधार्थियों और सर्व समाज के लिए आवश्यक और उपयोगी होगा।

Wednesday, January 12, 2011

गिरोद

यही है इस कथा का शीर्षक और गांव का नाम- गिरोद। किसी छोर से शुरू हो सकने वाली और जहां चाहे रोकी जा सकने वाली कथा। देखिए किस तरह। दस साल पुराने छत्तीसगढ़ विधान सभा से पांच किलोमीटर के दायरे में। लोहा कारखाने के पास, पंद्रह साल से जिसकी भारी मशीनों का तानपूरा यहां जीवन-लय को आधार दे रहा है। कोई बारह सौ साल पुराने अवशेष युक्त गांव का अब यही पता है। वैसे गांव का स्थानीय उच्चारण है- गिरौद या गिरउद। आपका हार्दिक स्वागत है।
गांव के एक छोर पर तालाब के किनारे कोई डेढ़ सौ साल पुराना मंदिर है, जिसका निर्माण गांव प्रमुख दाऊ परिवार ने कराया। पत्थर की नक्काशी वाले स्तंभों और प्रवेश द्वार वाला स्थापत्य मराठा शैली का नमूना है।
खजुराहो में मिथुन मूर्तियों की बहुलता है और प्रसिद्धि यहां तक कि ऐसी कलाकृतियों को खजुराहो शैली नाम दे दिया जाता है, लेकिन ऐसे अंकन कमोबेश मंदिरों में दिख जाते हैं। माना जाता है कि इससे संरचना पर नजर नहीं लगती, बिजली नहीं गिरती, सचाई राम जाने। यह मंदिर भी इससे अछूता नहीं और इन पर नजर बरबस पड़ती है।
इस शिव मंदिर के पास ठाकुरदेव की पूजा-प्रतिष्‍ठा की परम्परा निर्वाह के लिए कमल वर्मा ने बइगाई का कोर्स किया है, गुरु सूरदास तिखुर वर्मा से प्रशिक्षण लिया, जिसके आरंभ के लिए हरेली अमावस्या और गुरु द्वारा सफल मान लिये जाने पर दीक्षांत के लिए नागपंचमी अथवा ऋषिपंचमी तिथि निर्धारित होती है।
समष्टि लोक के व्यवहार में विद्यमान और प्रचलित टोना-टोटका, रूढ़ि माना जा कर कभी प्रताड़ित भी होता है। दुर्घटनावश बनी परिस्थितियों के चलते अंधविश्वास कह कर तिरस्कार योग्य मान लिये जाने से अक्‍सर इसके पीछे अनवरत गतिमान व्यवस्था ओझल रह जाती है। इसके साथ चर्चा 'सवनाही छेना' की यानि अभिमंत्रित गोइंठा-कंडा, जो गांव बइगा सावन में शनिवार की रात पूजा कर, रविवार को घरों के दरवाजे पर लटका जाता है, ताकि अवांछित-अनिष्ट प्रवेश न कर सके।
घर के दरवाजे पर पहटनिन हर साल हांथा लिखती है। पहटनिन यानि पहटिया-गोसाइन और पहटिया यानि रात बीतते और पहट (प्रखेट? 'खेटितान' अर्थात्- वैतालिक, स्तुतिपाठक जो गृहस्वामी को गा बजा कर जगाता है) होते रोजमर्रा की पहली दस्तक देने वाला ठेठवार। पहट-मुंदियरहा, सुकुवा, कुकराबास, फजर, झुलझुलहा, पंगपंगाए बेरा, भिनसरहा, मुंह-चिन्‍हारी तब होता है परभाती, बिहनिया, रामे-राम के बेरा। हांथा के साथ कहीं शुभ-लाभ लिखा है और इन दिनों जनगणना का क्रमांक भी। हांथा के लिए अवसर होता है देवारी यानि बूढ़ी दीवाली, मातर अर्थात्‌ भैया दूज, जेठउनी एकादशी से कार्तिक पुन्नी तक। फिर इसी से मिलती-जुलती आकृतियां अगहन के बिरस्पत पूजा में चंउक बन कर आंगन में उतर आती हैं।

गांव का मुख्‍य हिस्सा है, दाऊ का निवास, गुड़ी और चंडी माता का चबूतरा। नवरात्रि पर जोत जलाने की परम्परा है और जिस तरह गिनती की शुरुआत एक के बजाय 'राम' बोल कर की जाती है, उसी तरह पहली ज्योति मां चंडी के नाम पर बिठाई जाती है।
चंडी दाई में ग्राम देवता की परम्परा और पुरातत्व घुल-मिल गए हैं यानि चंडी के रूप में पूजित सातवीं-आठवीं सदी ईस्वी की महिषमर्दिनी के साथ इतनी ही पुरानी प्रतिमाएं और स्थापत्य खंड भी हैं। चबूतरे पर पूजा के लिए तो दिन-मुहूरत होता है, लेकिन यह गुलजार रहता है, चिड़ी के गुलामों, पान की मेमों, ईंट के बादशाहों, हुकुम के इक्कों के साथ पूरी वाबन परियों से मानों देवालय के महामंडप में देवदासियों का नर्तन हो रहा हो और चौपड़ की बाजियों में असार संसार के मोहरे, तल्लीन साधक और उनके साथ सत्संगी से दर्शक भी जमा हैं। गांव के प्रवेश द्वार पर लीला मंच है और एक कमरे में बाना-सवांगा, वस्त्राभूषण सहित भजन-कीर्तन का बाजा-पेटी सरंजाम भी।
बुजुर्ग याद करते हैं, रेल लाइन के किनारे का डीह, यानि जहां कभी गांव आबाद था और बाद में वहीं संतरा, आम, केला, नीबू, अमरूद का मेंहदी की बाड़ वाला फलता-फूलता बगीचा था। लेकिन पिछले डेढ़-दो सौ सालों में धीरे-धीरे यहां, दो किलोमीटर दूर खिसक आया, आकर्षण बना वही शिव मंदिर और शायद कारण था सड़क और रेल से बदला कन्टूर, खेत और पानी। पुराना पचरी तालाब, जिसके बीच में चौकोर सीढ़ीदार कुंड बताया जाता है।
सन 1900 में पूरे छत्तीसगढ़ में महाअकाल का जिक्र होता है। इस साल मार्च माह में रायपुर जिले को 56 कार्य प्रभार क्षेत्र (चार्ज) में विभाजित कर राहत कार्य से लगभग 2 लाख लोगों को रोजगार मुहैया कराए जाने की बात पढ़ने को मिली थी, जिसमें एक हजार से भी अधिक पुराने तालाबों को दुरुस्त कराया गया था। यह अप्रत्याशित अभिलिखित मिल गया यहां, चार्ज नं.8 के काम का प्रमाण। लोग याद करते हैं- 'बड़े दुकाल पहर के, बिक्टोरिया रानी के सुधरवाए तलाव'

बात करते-करते पता लग रहा है गांव का पूरा इतिहास, व्यवस्थित और कालक्रमानुसार। काल निर्धारण के लिए शब्द इस्तेमाल हो रहे हैं- छमासी रात, पण्डवन काल, सतजुगी, बिसकर्मा के, रतनपुर राज, भोंसला, अंगरेज ...। इसे ईसा की सदियों में बिठाने के लिए पुरातत्व-प्रशिक्षित, मेरे ज्यादा जोर दे कर सवाल पूछने पर, बाकी सब लाजवाब हैं शायद मैं उनकी यह भाषा नहीं समझ पा रहा हूं और वे मेरी। लेकिन अब तक मौन रहा सियनहा बूझ रहा है और सबको समझ में आ जाने वाली बात धीरे से कहता है 'तइहा के गोठ ल बइहा ले गे'।

पुराना तालाब, फिर बना मंदिर, जिसके बाद दाऊ का घर बना, मराठा असर वाली बुलंद इमारत। लगता है इस मकान में न जाने क्या-क्या होगा। अजनबी से आप, गांव में अकारण तो आए नहीं हैं, यह तो गंवई-देहातियों का काम है, शहरी कामकाजियों का नहीं। लेकिन गांव में कुछ लेने-देने नहीं आए हैं, यह भरोसा बनते ही, आत्मीयता का सोता अनायास फूट पड़ता है।
घर का दरवाजा खुला है, बेरोक-टोक, स्वयं निर्धारित मर्यादा पालन की देहाती शिष्टता निभाते, बैठक में पहुंचने पर तस्वीरें टंगी दिखती हैं। पहली फोटो दाऊ गणेश प्रसाद वर्मा की, चेहरा बदल जाए तो सब कुछ, हम-आप सब की पिछली पीढ़ी जैसा। दूसरी तस्वीर है, उनके पिता दानवीर दाऊ भोलाप्रसाद वर्मा की।
पचरी तालाब के शिलालेख के बाद दूसरा अप्रत्याशित हासिल यह तस्वीर है। रायपुर 'कुरमी बोर्डिंग' के साथ जुड़ा 'भोला' कौन है, जिज्ञासा रहती थी। पता लगा, दाऊ भोलाप्रसाद वर्मा यानि वह दानवीर, जिसने कोई 80 साल पहले, छुईखदान बाड़ा कहलाने वाले क्षेत्र का 28 हजार वर्गफुट हिस्सा खरीद कर दान किया था, यह भवन छत्तीसगढ़ की अस्मिता से जुड़े मुद्‌दों सहित राज्य आंदोलन-बैठकों के प्रमुख केन्द्रों में एक रहा है।
राज्य केन्द्र, राजधानी रायपुर से यहां आने पर लग रहा है कि यह गांव शाखा और पत्ते नहीं, बल्कि जड़ें ही यहां हैं। सो, जमीन पा लेना आश्वस्त कर रहा है और याद भी दिला रहा है, ऊर्ध्वमूलमधः शाखमश्वत्थं ...

गुफ्तगूं :

अब कभी-कभी स्वयं से ही ईर्ष्‍या होती है कि ज्यादातर पिछला समय गांव-कस्बों में बीता। हजारों गांवों में गया, ज्यादातर में मात्र एक बार। अकारण ही आ गया था यहां, फिर भी 'वहां गए क्यों थे' के जवाब का दबाव हो तो कहूंगा 'किस्सा' के लिए। दादी-नानी तो रही नहीं, जो किस्से सुनाएं और हम रह गए बच्चे, अपने सच्चे भरोसों पर संदेह होने लगता है तो खुद से 'कथा-किस्से' का जुगाड़ ही उपाय रह जाता है। इस जन्मना-कर्मणा का हासिल कि हर गांव कथा होता है, जिसे कुछ हद तक पढ़ना सीखा है मैंने। जी हां, कोई भी गांव मेरे लिए कथा की तरह खुलता है और पाठक के साथ पात्र बनने को आमंत्रित करता है तो गांव-कथा में गाथा-बीज भी अंकुराने लगता है। ये भी कोई कथा है ..... आप न माने, मुझे तो कथा, गाथा बनते दिख रही है। ..... कुछ साथी भी है, वापसी की जल्दी है। इसलिए चल खुसरो घर ...

गिरोद से छत्तीसगढ़ के महान संत बाबा गुरु घासीदास जी याद आ रहे हैं, इसी नाम के एक अन्य ग्राम में उनकी पुण्‍य स्‍मृति है और जहां इन दिनों कुतुब मीनार से ऊंचा स्मारक 'जैतखाम' बन रहा है। पिछली सदी के एक और संत स्वामी आत्मानंद जी के नाम पर गांव में मनवा कुर्मी क्षत्रीय समाज रायपुर द्वारा संचालित अंग्रेजी माध्यम विद्यापीठ है। और भी कुछ-कुछ, बहुत कुछ ... । इस गाथा को शब्द बनने के पहले यहीं रोक ले रहा हूं, मध्यमा-पश्यन्ती स्तुति बना कर, अकेले पुण्य लाभ के लिए मन में दुहराते, अपनी खुदाई जो है।