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Friday, June 26, 2026

पुरा-शहडोल

बात की शुरुआत देश-काल से। 35-40 साल पुराने मध्यप्रदेश का समय। बिलासपुर में पुरातत्व विभाग के दो कार्यालय, रजिस्ट्रीकरण अधिकारी और संग्रहाध्यक्ष, हुआ करते थे। बिलासपुर कार्यालय का कार्यक्षेत्र तब सात जिलों वाले छत्तीसगढ़ के बिलासपुर, सरगुजा और रायगढ़ जिला वाला बिलासपुर संभाग। इसमें खास कि तब का शहडोल जिला, जिसमें उमरिया और अनूपपुर भी होते थे, बिलासपुर कार्यालय के अधीन होता था। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद शहडोल अलग हुआ, लेकिन कार्यक्षेत्र यही बना रहा। प्रसंगवश बिलासपुर जिला कार्यालय में किसी ने मुझे समझाइश दी कि कलेक्टर को नाराज मत कर लेना, आपका सीआर वही लिखेगा, इस समझाइश में धमकी की धमक मैंने सुन ली। बातों-बातों में हमारे संचालक रहे प्रदीप पंत जी से यह बताया, उन्होंने कहा, जिसने ऐसा कहा है उसे शायद पता नहीं कि कलेक्टर जिले का अधिकारी होता है और आपके अधीन पूरा संभाग है।

वापस बात पटरी पर, तो पुरातत्व के मामले में तब का शहडोल जिला, तब के बिलासपुर जिला कार्यालय के अधीन होता था, इसलिए हमलोगों का शहडोल से अपनापा था। शहडोल संग्रहालय की स्थापना, जिला पुरातत्व संघ की पहल पर हुई थी, अमलाई पेपर मिल के जनसंपर्क अधिकारी राजेन्द्र कुमार बंसल, इस संघ के सक्रिय सदस्य थे। संग्रहालय में विभागीय मुलाजिम लाल बहादुर सिंह की तैनाती हुई तो संग्र्रहालय के कामकाज में बंसल जी की दखल के चलते विवाद होने लगे। इसके बाद शहडोल संग्रहालय में सिंह जी के बाद डॉ. अशर्फीलाल पाठक पदस्थ हुए, उनसे शहडोल जिले के पुरातत्वीय समाचार मिलते रहते थे। फिर अप्रैल 1987 में शहडोल जिले के पुरातत्वीय स्थलों के सर्वेक्षण में वरिष्ठ अधिकारी जी.एल. रायकवार जी का साथ रहा। अप्रैल 1989 में वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी, पुराविद डॉ. कल्याण चक्रवर्ती जी के साथ सघन दौरा हुआ तथा मध्यप्रदेश में पुरातत्वीय सलाहकार रहे भारतेन्दु परिवार के, हार्वर्ड विश्वविद्यालय वाले डॉ. प्रमोदचन्द्र जी तथा उनकी पत्नी श्रीमती मैरी कार्मेन के साथ, जिले के स्थलों को और बांधवगढ़ में रुककर, विशेष अनुमति सहित वहां के पुरावशेषों, अभिलिखित गुफाओं को देखने-समझने का अवसर मिला। श्रीमती मैरी ने इस अंचल की कलचुरि कला पर शोध किया है।

डॉ. प्रमोदचन्द्र मानते हैं कि त्रिपुरी कलचुरियों की कला से उत्कृष्ट प्रमाण इस क्षेत्र में हैं। उल्लेखनीय है कि विदेशों में आयोजित होने वाले ‘फेस्टिवल आफ इंडिया‘ के लिए चयन का जिम्मा डॉ. प्रमोदचन्द्र का था, उन्होंने भारतीय कला के प्रतिनिधि उदाहरणों में शहडोल, सोहागपुर के कुंवर मृगेन्द्र सिंह के निजी संग्रह के ‘भैरव‘ को भी चुना था। उनकी सलाह पर हमने मेमायर्स आफ द आक्यालाजिकल सर्वे आफ इंडिया, नं. 23 का आर.डी. बैनर्जी का ‘द हैहयाज आफ त्रिपुरी एंड देअर मान्युमेंट्स-1922‘ उड़नछू बांच लिया था। डॉ. रमानाथ मिश्र की किताब से इस अंचल की प्राचीन कला को जानने-समझने में मदद मिली और डॉ. रहमान अली के इस अंचल के शोध की जानकारी प्रत्यक्ष उनसे सुनने को मिलती रहती थी। देवकुमार मिश्र की ‘सोन के पानी का रंग‘ का सहारा तो था ही, यों भी मेरी पढ़ी-जानी किताबों में यह नदियों पर लिखी हिंदी की पहले नंबर पर रखी जाने वाली किताब है। वेगड़ जी की ‘तीरे तीरे नर्मदा‘ के प्रति पूरे सम्मान के बावजूद ऐसी और किसी किताब की गिनती मेरे लिए पांच के बाद ही शुरू होगी।

तब न मोबइल फोन था न गूगल, तो ऐसे काम पर निकलते हुए तैयारी में एक जरूरी चीज होती ‘मजमुली नक्शा‘ और दूसरी जिले के कक्षा तीसरी की भूगोल किताब। जिले का संक्षिप्त गजेटियरनुमा, इस भूगोल पाठ्य पुस्तक के अध्याय होते थे- स्थिति और विस्तार, भू-रचना, जलवायु, वनस्पति तथा पशुधन, खनिज-संपत्ति, सिंचाई तथा विद्युत सुविधाएं, कृषि और उसकी उपजें, उद्योग-धंधे? परिवहन के साधन, जिले के प्रसिद्ध स्थान, जिले की प्रशासनिक इकाइयां और जिले के निवासी। इस पचास पेजी सचित्र किताब को अच्छी तरह बांच लेने के बाद सव्रेक्षण-दौरे की योजना बनाना तो आसान होता ही था, जरूरत पड़ने पर अपनी जानकारी का रौब या परिस्थिति अनुसार उस अंचल से अपनी निकटता जाहिर कर, बहुत सारे काम आसान हो जाते। सर्वेक्षण का काम पूरा हो जाने पर इस पुस्तिका की जानकारियां प्रतिवेदन बनाने में भी उपयोगी होती। (इस पुस्तिका की पीडीएफ प्रति मेरे पास अब भी सुरक्षित है, कोइ महानुभाव इच्छुक हों तो कमेंट में अपना वाट्सएप नंबर दे दें, प्रति भेज दी जाएगी, इस निवेदन सहित कि हो सके तो वे मेरे तब के जिले बिलासपुर की भूगोल पुस्तिका पीडीएफ उपलब्ध करा दें, जो अब मेरे पास नहीं रही।) इतनी तैयार के बाद चाक-चौबंद, आश्वस्त मैदान में उतर गए।

पुरानी बातों के कोर-कार दुरुस्त कर देता है समय। वह वैसी ही याद नहीं रह जाती जैसी वह होती है, इसलिए लिखने बैठें तो यादों की चकरघिन्नी। यों भी याददाश्त से कहीं अधिक भरोसा अपने भूलने पर है, सो भूल-चूक माफ। आगे अपनी डायरी के नोट्स, मगर उसके पहले कुछ भूला-कुछ याद किया, पेश-

जैसिंहनगर, तहसील आफिस के आसपास मंडराते जीव। तहसीलदार साहब सागर विश्वविद्यालय के पुरातत्व के विद्यार्थी रहे ज्योति सक्सेना जी। बाद में वे ही अनूपपुर में भी मिले। अपनी शासकीय सेवा में कभी उनका जुड़ाव पुरातत्व से होगा, उन्होंने शायद ही सोचा होगा। सर्वेक्षण का परवाना दिखाने की जरूरत बस इसलिए हुई कि ऐसा भी सरकारी काम होता है। वे सहयोग के लिए तत्पर। चाय-पानी के इंतजाम तक हम तहसील के दर्दी-फरियादियों से गुफ्तगू करते रहे। वे अपनी सारी परेशानी, गिला-शिकवा भूलकर, खुद आगे बढ़ कर पुराने ठौर-ठिकानों का पता देते रहे, किस्से सुनाते रहे। एक सयाने ने बताया कि जैसिंहनगर नाम, रीवां के राजा जयसिंह देव से आया है। राजा का सिक्का चलता था, सचमुच का, तांबे का टकसाली सिक्का। लोगों की जबान पर पुराना नाम ही बना रहता था। राजा का फरमान आया कि नमकहराम होगा, जो अपने गांव का पुराना नाम लेगा। पता लगता, जिस किसी ने गांव का पहले वाला नाम लिया है, उसकी जबान बदलने के लिए पूरी मुट्ठी भर नमक खिलाए जाने की सजा तजवीज कर दी गई। सयाने ने कहा मगर बाप-दादा से सुना नाम हमें अब भी याद है, चारों तरफ नजर घुमाई फिर गुम हुआ नाम धीरे से उचारा- ‘गुमगौर‘। बदले में हमने उसका मुंह मीठा कराया, चाय पिला कर।

सुन रखा था कि पुराने समय में कोरिया, छत्तीसगढ़ के चांगभखार यानी जनकपुर-भरतपुर जाने के लिए यहां से जाना होता था, तो कुछ दूर यह रास्ता भी नाप लिया। तब वहां बातों-बातों में मसीराघाट पर बन रहे पुल का जिक्र आता था, वहां तक भी हो आए। ठेकेदार के कारिन्दों ने अकारण आग्रहपूर्वक चाय पिलाई, उन्हें निर्देश रहा होगा कि सरकारी मुलाजिम आएं, किसी भी विभाग के, किसी भी काम से, बिना पूछ-परख न जाने दें। सरकारी आदमी, जाने कौन, कब, कैसी मुसीबत खड़ी कर दे।

एक वकील साहब भी मिले, पेशी और मुवक्किल से निपट चुके थे, बताने लगे- यहां क्या मिलेगा आपको, विराट मंदिर के दर्शन कर लीजिए बाकी तो बंजर, जंगल, खदानें, बेरोजगारी, आदिवासी। कोई उद्योग नहीं, विकास नहीं। तहसीलदार साहब ने पयासी जी को साथ कर दिया। वे मानों शहडोल के देसी आडियो गजेटियर। कथा बांच रहे हैं- सोन-जोहिला और नर्मदा के त्रिकोण की। मसीरा घाट और दशरथ घाट दिखा लाने का वादा, चाहे छुट्टी लेनी पड़े। सोन-जोहिला संगम पार करने लायक छिछला पानी, रायकवार जी की देखा-देखी, संगम में पैर डालने के पहले सिर पर पानी डाला, आचमन किया, दशरथ घाट के दर्शन कर लौटे।


वापसी में एक सूने कच्चे घर की बाहिरी दीवार पर चित्रकारी दिखी। चित्र के अनुसार यह ग्राम बरहा के सुखसेन बैगा की कृति है, जो अपने को अभी नौसिखुआ-आधा पेन्टर मानता है, लिखा है- आई यम पेन्टर अभी 1/2। चित्र में वनस्पति गमले में आ गई है, धनुष-बाण और मुकुटधारी राजा है, शायद सोन नद का मानवीकरण, जिसमें वह खुद को देख रहा है और साथ उसके सपनों की रानी? नर्मदा-जोहिला? आधुनिका- बॉब्ड। संभव है उसने मोहनजोदड़ो की नर्तकी कांस्य प्रतिका का चित्र देखा हो। कांस्य नर्तकी कमर पर हाथ टिकाए हुए है, मूर्तिकला की शब्दावली में ‘कट्यावलंबित‘। आ देखें जरा ... वाली चुनौतीपूर्ण देहभाषा (बॉडी लैंगुएज), जबकि, कल्पनाशील चित्रकार की नायिका ने दोनों हाथ कमर रखे हैं। स्त्रैण नजाकत वाली, कुछ-कुछ पीटी मुद्रा। ‘तिपतिया लॉकेट‘ ठीक उसकी नकल जैसा ही है। अंचल के बैगा युवक की आदिम चेतना में शायद इसी तरह की आधुनिकता के गणित की खिचड़ी पक रही है।

दियापीपर। शहडोल से जैसिंहनगर के रास्ते पर सोन का पुल पार करते ही बैरियर, बड़े लट्ठ-अड़गड़ वाला टोल नाका। सरकारी काम वाली गाड़ी का हवाला दिया, कुछ नरम-गरम। बात बन गई, बैरियर खुल गया। मगर इस बातचीत के दौरान नाका वालों को पता चला कि हम पुरानी जगहों की खोज कर रहे हैं, मंदिर-मूर्तियों की, तो वे भक्ति-भावना से भर कर बताने लगे कि हम आगे बढ़ कर दाएं मुड़ जाएं। ढेरों पुराने पत्थर, मूरत, देवी-देवता हैं। सीधे के बजाय हम दाहिने मुड़ कर आगे बढ़े। बड़ी तादाद में ढेरों पुरावशेष बिखरे हुए। लेकिन समस्या थी कि पूरे मैदान में ऊँची- ऊँची, सूखी घास थी। थोड़ी साफ-सफाई की और कुछ खुले में पड़ी कलाकृतियों की फोटोग्राफी, विवरण दर्ज करते रहे। तब तब न जाने कहां से कोई चिंगारी उठी और देखते-देखते सूखी घास में आग फैलने लगी, झाड़ू-बुहारू जैसे सब उपाय, जो भी संभव था, किया। बड़ी मुश्किल से बात बनी। चारों ओर सुनसान था, फिर भी मौके की नजाकत का अनुमान कर काम आगे बढ़ाए बिना बढ़ लिए। ड्राइवर से पूछा, तुमने सिगरेट के लिए तीली जलाई थी?, वह लगातार मना करता रहा और सफाई देने लगा कि गाड़ी के एक्जास्ट से चिंगारी निकली होगी, जिसके चलते ऐसा हुआ और नाम भी तो ऐसा है ‘दियापीपर। बहरहाल वापस लौटते फिर बेरियर पर रुके तो बताया गया- आपलोगों को मालूम, दियापीपर मैदान घास में आग लग गई थी। हमने कहा, सब हरिइच्छा, अब तो सारे देव प्रकट हो गए होंगे। फिर वहां जा कर, छूटा काम पूरा किया।

एक किस्सा कौड़िया का। चंदिया से दस-दस किलोमीटर बांयें-दायें दो पुरातत्वीय भंडार, कौड़िया और पथरहटा। सुराही वाले चंदिया रोड स्टेशन से परिचय पुराना रहा। अब चंदिया पहुंचे। इलाके से लगभग अपरिचित, तो पहले पहुंचे पुलिस थाना। थानेदार साहब का इंतजार करने लगे। हमें जाना था कौड़िया। देर हो रही थी, दुविधा में थे कि इंतजार करें या निकल चलें। समय बिताने के लिए थाने में लगी तख्तियां बांचने लगे। एक तख्ती लगी थी- ‘बदमाश गांवों की सूची‘, उस पर सबसे ऊपर पहला नाम था ‘कौड़िया‘। थानेदार साहब आए, हमलोगों को शुभकामनाएं देते विदा करते ताड़ लिया कि हमारी नजर तख्ती पर कहां जा रही है। मुंशीजी उसी इलाके के थे, हमलोगों के काम और साथ देने के प्रति उत्सुक। थानेदार साहब ने उन्हें हमारे साथ कर दिया। मुंशी जी पूरे इलाके का इतिहास-भूगोल बताते रहे, उनकी बातचीत में किसी अपराध, दीवानी-फौजदारी का भूले से भी जिक्र नहीं आया। कौड़िया के रास्ते में हमें कुछ ग्रामवासी कुछ आगे पास के गांव ‘बिलासपुर‘ जाने वाले मिले। बीच में हम माइक्रोलिथिक टूल्स मिलने की संभावना से रुके, तो हमारी देखा-देखी, इस काम में वे सबसे आगे रहे।

हमारा इरादा था कि दिन रहते कौड़िया-सलैया और पथरहटा कर, अंधेरा होते शहडोल वापस लौट जाएंगे। मगर कौड़िया-सलैया के कुछ हिस्से के नोट्स और फोटो लेते अंधेरा होने लगा। शहडोल वापस लौट कर अगले दिन फिर आना, कशमकश में थे। गांव में सरपंच जी से मिले अकड़े से युवा और देख कर ही समझ में आ गया हेठी न खाने वाले। बात होने लगी तो पता लगा कि गांव में दो-पार्टी वाली फूट है, जिसके कारण अपराध दर्ज होते रहते हैं। हमारे मामले में दोनों पार्टी के लोग तदर्थ रूप से सहयोगी बन गए। रात रुकने का इंतजाम और भोजन अपने निवास पर सरपंच जी ने कराया। गांव के इकट्ठे हुए लोग सहयोग की अपनी भूमिका के लिए तत्पर थे। उस इलाके में कुछ घटनाओं की जानकारी थी, जिसमें पुरातात्विक सामग्री की जानकारी और उसमें रुचि लेने वालों की गाड़ी में तोड़-फोड़ और पिटाई भी हो चुकी है। जबकि हम दूसरे दिन काम पूरा कर शहडोल संग्रहालय के लिए गांव वालों की मदद से एक सूर्य प्रतिमा, अपनी जीप में लदवा कर वापस लौटे।

रायकवार जी का 'पूर्वानुमान" कभी अनर्गल जान पड़ता है, मगर कई बार चौंकाता भी है। कौड़िया में घूमते हुए वे कभी पूछते और कहीं भी तो मूर्तियां नहीं रखी हैं, कुंए के पास, देवालय में, इस-उस दिशा में, हमें लगता तीर-तुक्का, लगभग सही ही बैठ रहा है। बात जुड़ी कि गांव वाले जो किस्सा सुना रहे थे- बहुत पहले दो लोग एक बड़ी गाड़ी ले कर आए थे, अपने को पुरातत्व विभाग का बताया और एक मूर्ति ‘चुरा‘ कर ले गए थे। वापस आते यह भेद रायकवार जी ने खोला कि उन्हें और वी.पी. नगायच जी को शहडोल संग्रहालय के लिए प्रतिमा संग्रह का आदेश हुआ था। तब, रायकवार जी सागर में और वे रीवां में पदस्थ थे। अजीत जोगी जी शहडोल कलेक्टर थे, और कुंवर अर्जुन सिंह के रिश्तेदार हरचरण सिंह जी, उमरिया एसडीएम, उन्होंने एमपीइबी की डग्गा गाड़ी दे दी, जिसमें उनके द्वारा शहडोल संग्रहालय के लिए कौड़िया से सूर्य प्रतिमा लाई गई थी। रायकवार जी ने अपनी शैली में यह किस्सा सुनाया। बाद में सविस्तार विवरण नगायच जी ने याद किया- सन 1978 की बात है। 

यह पढ़ कर नगायच जी की टिप्पणी आई है, शब्दशः- 16 जनवरी को कलेक्टर शहडोल श्री जोगी जी से मिला साथ में श्री राजेंद्र बंसल भी थे। उनके निर्देश पर 17 जनवरी को नायब तहसीलदार श्री कुबेर सिंह जी को लेकर अंतरा एवं पंचगाँव गए। अंतरा से कुछ मूर्तियां एकत्र की फिर चदनिया एवं जोधपुर गये। वापसी में जीप में आग लगा गई, बाल बाल बचे। 18 जनवरी को श्री जोगी जी से मिला। जीप से उमरिया गए एवं श्री हरचरण सिंह एसडीएम से मिले उन्होंने संकलन हेतु वाहन व्यवस्था कल करने को कहा वापस शहडोल आया, रात्रि श्री रायकवारजी सागर से आ गए। हम दोनों बंसल जी के खाली घर में रुके। 19 जनवरी को उमरिया गए सिंह साहब ने एक ट्रक की व्यवस्था कर दी। कौड़िया में कुएं के पास रखी एक सुंदर सी सूर्य प्रतिमा को गाँव वालों ने जिसे वह देवीदाई कहते थे बड़ी मुश्किल से ले जाने दी। अगले दिन पुनः एमपीइबी की पिकअप एवं पुलिस के 2 जवान लेकर गए तथा कौड़िया से करीब 8-10 मूर्तियां लाकर शहडोल संग्रहालय रखवाई गई। दोनों दिन इस पूरी प्रक्रिया में भूखे रहे। अंततः 2 शानदार मूर्तियां अर्धनारीश्वर मस्तक अंतरा से एवं कौड़िया से सूर्य प्रतिमा हमारी उपलब्धि रही। शासकीय डायरी जो अभी भी मेरे पास उपलब्ध है, उसी से ये जानकारी शेयर कर रहा हूँ।

इस दौरान धरहर, राजेन्द्रग्राम (तत्कालीन राष्ट्रपति जी के प्रवास के कारण रखा गया नाम) का विशाल वृक्ष ‘पपीता बाबा‘, मढ़ीबाग का सुनसान, रहस्यमय वातावरण, वीरसिंहपुर पाली की देवी प्रतिमा, अन्तरा की चामुण्डा, सिंहपुर का प्रवेश द्वार, राजाबाग का संग्रह अविस्मरणीय है।

अब डायरी के नोट्स - 

# चितरांव - जैसिंहनगर से जनकपुर मार्ग पर जाकर बायाँ व्यपवर्तन कुल दूरी 20 किमी. painted rock-shelter site, tools. 
# जोहिला नदी के नौरोजाबाद सड़‌क पुल के नीचे tools.
# चंदि‌या से पथरहटा मार्ग पर खेतों में tools
# (छोटी)महानदी-मछड़ार संगम (चंदि‌या-कौड़िया मार्ग) के निकट कारी पाथर unpainted shelters, tools. 
# बसोहरा - जैसिंहनगर से 12 किमी. shelter तथा tools. 
# निगाई - जैसिंहनगर से मानपुर जाने पर tools.
# नगरवाह - जैसिंहनगर से मुख्य मार्ग पर 6 कि.मी. कौवासरई से 4 किमी. shelter, tools.
# शह‌डोल - सोहागपुर का विराटेश्वर मंदिर, निकटवर्ती क्षेत्र के mounds में rich remains जैन मंदिर में प्रतिमाएं / कुँवर साहब, राजाबाग के यहाँ कृष्ण लीला के तीन पटल, भैरव, गजासुरवध, (outstanding), शिव, शेषशायी विष्णु, कुबेर, त्रिदेवी (वैष्णवी, ब्रह्माणी, माहेश्वरी), अन्य कई प्रतिमाएं 
# धरहर- राजेन्द्र‌ग्राम से अमरकंटक मार्ग पर 7 कि. मी. से दायें व्यपवर्तन पर 1 कि.मी. late 12th या 13th cent. का पूर्वाभिमुख कलचुरि (रतनपुर?) शैली का शैव मंदिर / प्रवेश द्वार के उपर (सामने), पत्थर गिरा हुआ, द्विशाख, ललाट-बिंब पर शिव - त्रिदेव तथा नवग्रह, द्वारशाख पर गंगा-यमुना, शैव द्वारपाल/उदुम्बर, कलशधारी उपासक / त्रिअंग (पंचरथ), दक्षिणी भित्ति की द्वितल जंघा पर- कार्तिकेय, गणेश (अन्तराल), दिक्पाल, मिथुन युगल, मध्य रथ पर ब्रह्मा, नटराज (सौम्य), दिक्पाल, पश्चिम भित्ति पर - मिथुन शेष ध्वस्त, उत्तर भित्ति पर - वीणाधर शिव, नटराज (उग्र-भैरव), अन्तराल में माहेश्वरी, चामुण्डा उत्सेध में - अधिष्ठान (वेदिबंध), खुर, कपोत, सूचिका, मुकुल, खुरछाद्य, गजथर - जंघा. तुल्य सरगाँव (बिलासपुर) का धूमनाथ मंदिर, इससे कुछ और परवर्ती. 
# सीतामढ़ी - सोहागपुर-मानपुर मार्ग पर चौरी से 3 किमी., कुल लगभग 25 किमी. 3 छोटे मंदिर 9th cent. (प्रतिहार शैली) 
# हर्रा- अन्तरा-केलमनिया मार्ग पर 22 किमी./ गोमेद-अंबिका, दो कृष्ण कथा फलक, नृवराह, विष्णु सिरदल, नवग्रह पटल, उमा- महेश द्यूत (जबलपुर संग्रहालय की प्रतिमा तुल्य)
# दुलहरा - हर्रा के निकट / विष्णु, गणेश, नायिकाएँ, small door frame, remains.
# केसवाही - बुढ़ार से जैतपुर मार्ग पर 27 किमी./ शाहपुर (8 किमी.) में विष्णु, ध्वस्त मंदिर के अवशेष, सांडामाल (8 किमी.) में ध्वस्त विशाल मंदिर एवं अवशेष / सगरा (7 किमी.), में remains. 
# मानपुर - मानपुर से ताला भार्ग पर 5 किमी. ज्वालामुखी मंदिर - विष्णु मंदिर, मंदिर में भूमिस्पर्श मुद्रा में बुद्ध प्रतिमा.
# मार्कण्डेय आश्रम- मानपुर-अमरपाटन मार्ग पर छोटी महानदी व सोन के संगम पर उमा-महेश, विष्णु, दिक्पालों की प्रतिमाएँ.
# आमडीह - अनूपपुर से कोतमा मार्ग पर 18-20 किमी. (फुनगा, पसला के निकट, बिजौड़ी ग्राम से लगा हुआ) /ब्रह्मा, तीन लक्ष्‌मीनारायण, दो उमा-महेश, हनुमान तथा अन्य अवशेष.
# छुलकारी - उपरोक्त स्थल के पास ही/ विष्णु, लक्ष्मीनारायण, योगियों की प्रतिमाएँ.
# सामतपुर - अनूपपुर में 13th cent. का मंदिर, कर्ण व अर्जुन का युद्ध दो स्तंभों पर अंकित (सूर्य व इन्द्र सहित), सिरदल, उत्तरंग पर पंक्ति में standing दशावतार, अलंकृत स्तंभ, नदी देवी, शैव द्वारपाल, बाहर उमा-महेश, लक्ष्मीनारायण.
# अन्तरा - केलमनिया मार्ग पर 9 किमी./ कंकाली मंदिर में unique चामुण्डा (cement retouching), विशाल, अति प्रभावशाली, उमा-महेश, विष्णु, आदिनाथ, योगिनी प्रतिमाएँ, temple mounds. 
# सिंहपुर - पतखई मार्ग पर 14 किमी. / परवर्ती संरचना, कथित पंचमठा या मान्य शिव मंदिर किन्तु शायद वस्तुतः मकबरा या समाधि में पंचशाख, अत्यंत विकसित और भव्य वैष्णव प्रवेश द्वार लगा है, यहीं विशाल वैष्णव प्रतिमा शीर्ष (capital), बौद्ध तारा, योगिनी, गरुड़ की एकाकी मुख्य प्रतिमा, सप्तमातृका पट्ट व pillars भी लगे हैं। दूसरे नवनिर्मित मंदिर में चामुण्डा (अन्तरा तुल्य आकार में छोटी पर अधिक सुरक्षित), गणेश प्रदक्षिणा में आदिनाथ, पार्श्वनाथ की कई प्रतिभाएँ.
# वीरसिंहपुर पाली- बिरासनी देवी मंदिर - मुख्य गर्भगृह में विशाल हरिहर, एक अन्य हरिहर, एक विष्णु, एक अन्य (संभवतः विष्णु), प्रतिमा तथा अन्य गर्भगृह में गणेश, महिषमर्दिनी बाहर प्रांगण में महिषमर्दिनी, अन्धक-गजासुर वध शिव, नटराज, तीन-चार उमा-महेश, सूर्य कुछ अन्य
# उमरिया - सगरा मंदिर के ancient door frame को paint कर दिया गया है।
# मढ़ीबाग - उमरिया से शहपुरा मार्ग पर 13th cent. का शैव मंदिर, मंडप पुनर्रचित, दिक्पाल, सूर्य, गजासुर वध, नृसिंह, चामुण्डा, सिरदल पर शिव, सरस्वती, गणेश
# बांधवगढ़- 2nd cent. के inscribed rock-cut chambers विस्तृत विवरण N.P. Chakravarti का paper, E.I. Vol. XXXI part IV, Oct. 1955 में top पर 5 मंदिर प्रतिहार शैली?, 8th से 10th cent. A.D. के / monolithic rock-cut वराह, मत्स्य, नृवराह (18‘), साथ में स्तंभ, शेषशायी विष्णु ( कथित चरणगंगा पर -11.75 मीटर), पैर की ओर ब्रह्मा, सिर की ओर शिवलिंग, विभिन्न स्थानों पर कलचुरि युवराजदेव के अभिलेख / राजा तालाब या बाबा तालाब के निकट मढ़िया में सूर्य, गजलक्ष्मी, विष्णु, शिव, गौरी, ब्रह्मा, कार्तिकेय, गंगा तथा पास ही रेवन्त प्रतिमा-सभी 12-13th cent. की / एक अन्य मंदिर व अवशेष, बड़ी शेषशायी पर building remains भी, 10th cent. का पश्चिमाभिमुख संभवतः शिव मंदिर, जाते हुए चढ़ाई में habbitational remains. यह स्थान तानसेन, सेन भगत व धर्मदास से संबंधित किया जाता है, प्रमाण के रूप में कुछ अवशेष भी विद्यमान हैं।
# अमरकंटक- कर्ण के मंदिर के नाम से ज्ञात मंदिर समूह, पातालेश्वर शिव मंदिर तथा नर्मदा उद्गम कुंड पर विभिन्न परवर्ती मंदिर, इनमें कलचुरि (संभवतः रत्नपुर के) राजा-रानी, दम्पति / अश्वारोही व गजारोही प्रतिमाएँ / पास ही जंगल में शिलोत्कीर्ण गणेश (त्रिकूट या कर्ण मंदिर से आगे 5 कि.मी.) की दो प्रतिमाएँ 8th cent A.D. स्थल सिद्ध विनायक या भृगुकमण्डल के नाम से जाना जाता है।
# जैसिंहनगर - पुराना नाम ‘गुमगौर‘। ग्राम के फूलमती व दुर्गा मंदिर में विष्णु, शिवलिंग, आमलक, नृसिंह, गजशार्दूल आदि प्रतिमाएँ
# अटरिया - जैसिंहनगर से मान‌पुर मार्ग में सोन के पूर्व दायाँ व्यपवर्तन कुल 25 किमी. सूर्य, विष्णु, हरिहर आदि प्रतिमाएँ
# बनचांचर - अटरिया के निकट घाटी डोंगरी नामक पहाड़ी पर स्थापत्य-प्रतिमा अवशेष सूर्य, विष्णु, दुर्गा, महिषमर्दिनी, उमा-महेश आदि
# मऊ - ब्यौहारी से 8 किमी./ भग्न मंदिरों के अवशेष, सूर्य, कार्तिकेय, विष्णु, गौरी, लक्ष्‌मीनारायण, योगिनी, एकमुख लिंग, गणेश, जैन प्रतिमाएँ.
# केल्हई- जैसिंहनगर से खन्नौधी से सन्ना होकर कुल 20 किमी. सोन-जोहिला संगम, दशरथ घाट पर कार्तिकिय.
# दियापीपर- शहडोल-जैसिंहनगर मार्ग पर 20 किमी. सोन पार कर दायां व्यपवर्तन विभिन्न मंदिरों के mounds, प्रतिमाएँ, स्थापत्य खंड.
# गोकरद - मसीराघाट, सोन पर नवनिर्मित सड़‌क पुल, मानपुर मार्ग पर विष्णु, सूर्य प्रतिमा.
# कोयलारी - अमरकंटक से राजेन्द्रग्राम आते दायाँ पुनः बायाँ व्यपवर्तन 32 किमी. पर- partially standing temple & remains.
# बुढ़ार के पास बम्हनी से प्राप्त मेकल पाण्डवंश का ताम्रपत्र
# ब्यौहारी तहसील से प्राप्त, रायपुर संग्रहालय में जमा कुषाण, गुप्त व मुगल, शताधिक सिक्के.
# बांधवगढ़? से प्राप्त माघ शासकों के सिक्के.
# पथरहटा - चंदिया से 10 किमी./ अवशेष, माहेश्वरी, नृसिंह, विष्णु, उमा-महेश, योगिनी, हनुमान, तीर्थकर चतुष्टिकाएँ, आदिनाथ, सूर्य, अम्बिका, मिथुन, नृत्य फलक, शिवलिंग, स्तंभ, सती प्रस्तर-अभिलेख आदि.
# कौड़िया-सलैया - बावली में द्वारशाख, सिरदल, आदित्य पट्ट, एकाधिक उमा-महेश, सूर्य, गणेश, जैन प्रतिमाएं / बावली के अतिरिक्त स्थल- गढ़ी व जात्रा, खेतों में भी remains.

(जिन विवरणों में dates नहीं है, वे सामान्यतः, क्षेत्र के अधिकांश remains और sites भी, late 9th early 10th cent. के हैं, और क्षेत्र में त्रिपुरी कलचुरि कला के श्रेष्ठ उदाहरण द्यिमान हैं।) 

चलते-चलते -
मौके पर पहुंच कर डाक बंगला यानि लोक निर्माण विभाग के रेस्ट हाउस में ठहरने के लिए कमरा मिले न मिले, जाते जरूर थे, क्योंकि वही मुख्यालय का शून्य मील का पत्थर होता था, दूरियों की सारी पैमाइश वहीं से शुरू होती थी और तब इसे नोट कर रखना जरूरी काम होता था। अपनी डायरी में दर्ज कर लिया था- शहडोल से दूरियां, किलोमीटर में - रीवां 161, इलाहाबाद 292, कटनी 132, उमरिया 70, सतना 211, बांधवगढ़ 107, अमरकंटक 108, डिंडौरी 193, जबलपुर 222, मण्डला 318, बिलासपुर 225, अंबिकापुर 247, अमलाई 30, चचाई 40।

Wednesday, March 28, 2012

भूल-गलती

स्वदेश-परिचय माला में प्रकाशित ग्यारह पुस्तकों में एक, ''भारत की नदियों की कहानी'', आइएसबीएन : 978-81-7028-410-9 है। हिन्दी के प्रतिष्ठित राजपाल एण्ड सन्ज़ द्वारा प्रकाशित इस पुस्तकमाला के लेखक हैं, प्रसिद्ध साहित्यकार, इतिहास और कला के मर्मज्ञ डॉ. भगवतशरण उपाध्याय। यह भी बताया गया है कि- ''प्रत्येक पृष्ठ पर दो रंग में कलापूर्ण चित्र, सुगम भाषा और प्रामाणिक तथ्य।'' पुस्तक देखते-पढ़ते यह अजीब लगा कि पुस्‍तक में कुछ रेखांकन जरूर हैं, लेकिन चित्र प्रत्येक पृष्ठ पर नहीं।
सुगम भाषा और प्रामाणिक तथ्यों वाली बात के परीक्षण के लिए पुस्तक के अंश उद्धृत हैं-

''नर्मदा
मैं अमरकण्टक की पहाड़ी गाँठ से निकलती हूँ और भारत के इस सुन्दर प्रदेश को ठीक बीच से बाँट देती हूँ। मेरे एक ओर विन्ध्याचल है, दूसरी ओर सतपुड़ा और दोनों के बीच चट्‌टानें तोड़ती तेज़ी से मैं पश्चिमी सागर तक दौड़ती चली जाती हूँ। अनेक बार मैं पहाड़ की चोटी से गिरती भयानक प्रपात बनाती हूँ, अनेक बार पहाड़ी भूमि की गहराइयों में खो जाती हूँ, अनेक बार जामुन के पेड़ों के बीच फैली हुई बहती हूँ। मेरा इतिहास पुराना है, मेरी घाटी में सभ्यताओं ने समाधि ली है।''

पुस्‍तक के उपरोक्‍त अंश में पहाड़ी गाँठ शब्द का प्रयोग सुगम-सहज नहीं लगा। सुन्दर प्रदेश को बांटने वाली बात जमती नहीं, ऐसा लगता है कि इस प्रदेश को बांटने के लिए नदी प्रवाहित हुई है। भयानक शब्द का प्रयोग भी खटकता है (याद करें, वेगड़ जी की नर्मदा पर लिखी पुस्तकें- सौंदर्य की नदी नर्मदा, तीरे-तीरे नर्मदा, और अमृतस्‍य नर्मदा) और ''सभ्यताओं ने समाधि'' जैसा प्रयोग भी अखरता है।

एक और अंश देखें-

''सोन
मैं भी ब्रह्मपुत्र की तरह नद की संज्ञा से ही विभूषित हूँ।... बरसाती दिनों में बड़ा भयंकर स्वरूप होता है मेरा। ... मेरी बालुका-राशि अति शक्तिशालिनी होती है, इसीलिए भवन-निर्माण आदि में सोन की रेत सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। ... प्रसिद्ध तीर्थस्थल अमरकंटक मेरा उद्‌गम है। ... एक छोटे-से चहबच्चे से 'पेंसिल' के आकार में निकलती हूँ मैं।
... मुझे गर्व है कि अमरकंटक के सदृश पुनीत पर्वत से मेरा प्राकट्‌य हुआ। ... ज्ञात ही है कि नर्मदा का उद्‌गम-स्थल भी यही है, अतः नर्मदा मेरी बड़ी बहन है। ... नर्मदा और अमरकंटक का वर्णन विस्तार से इसलिए करना पड़ा क्योंकि जहाँ से मेरी प्यारी सखी निकलती है, वहीं से थोड़ी दूर उत्तर में मेरी एक सहायिका नदी भी निकलती है, जिसे ज्योतिरथ्या का नाम प्राप्त है। ... ज्योतिरथ्या को अपभ्रंश में जोहिला भी कहते हैं। ... ज्योतिरथ्या या जोहिला के जल को ग्रहण करने के पश्चात्‌ ही मैं नदी से नद बनती हूँ। ... एक दूसरी महत्वपूर्ण नदी जो मेरे उदर के आकार को बढ़ाती है, वह है महानदी।''

यहां नद कहते हुए संज्ञा के बजाय लिंग (स्‍त्रीलिंग-पुल्लिंग) की बात उचित होती, वैसे आत्मकथन शैली में लिखे होने पर भी कहीं मेरी रेत के बजाय 'सोन की रेत' लिखा गया है साथ ही सोन और ब्रह्मपुत्र दोनों के लिए लिंग का ध्यान नहीं रखा गया है। भयंकर (विशाल, विकराल का प्रयोग उपयुक्त होता) शब्द के प्रति लेखक की आसक्ति यहां भी बनी हुई है। ... भवन-निर्माण के लिए क्या शक्तिशालिनी बालू होती है? ... पेंसिल के आकार से आशय स्पष्ट नहीं होता। नद-नदी के आकार के लिए प्रचलित 'काया' के बजाय उदर शब्द का प्रयोग अजीब लगता है। महानदी के जिक्र में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि यह छत्तीसगढ़ वाली प्रसिद्ध महानदी (हीराकुंड बांध वाली) नहीं, बल्कि इससे इतर छोटी महानदी है। गोपद नदी को ही शायद यहां गोमत कह दिया गया है इसी तरह ओंकारेश्‍वर को बार-बार ओंकालेश्‍वर कहा गया है।

सोन के लिए एक बार अमरकंटक 'मेरा उद्गम' और दूसरी बार अमरकंटक से 'मेरा प्राकट्‌य' बताया गया है, इससे लगता है कि लेखक के मन में सोन के उद्‌गम को लेकर संदेह रहा है या वे जान-बूझ कर पाठक को भ्रमित करना चाहते हैं ऐसा तो संभव नहीं कि इन दोनों से अलग उन्हें यह पता ही न रहा हो। इसी तारतम्य में सोन उद्‌गम के लिए मध्यप्रदेश राज्य पर्यटन विकास निगम लिमिटेड द्वारा एक तरफ अमरकंटक से 3 किलोमीटर पर सोनमुड़ा को ''The source of river Sone'' बताया जाता है वहीं अपने अमरकंटक फोल्डर में 'निगम' ने (सोनमुड़ा को प्रूफ की भूल से? सोन मुंग लिख कर) ''उद्‌गम है'' के बजाय ''उद्‌गम माना जाता है'' छापा है।
सोन, नर्मदा और जोहिला के उद्‌गम अंचल में राजकुमार सोन, राजकुमारी नर्मदा की उसके प्रति आसक्ति, दोनों का विवाह तय होना, जोहिला नाइन का छलपूर्वक सोन से संगम और नर्मदा का रूठकर कुंवारी रह जाने की कथा व गीत प्रचलित है- ''माई नरबदा सोन बहादुर जुहिला ल लेइ जाय बिहाय'' और ''मइया कंच कुंवारी रे, सोन बहादुर मुकुट बांध के जुहिला ल लाने बिहाय।'' संबंधित प्रकाशनों में भी आसानी से यह कथा छपी मिल जाती है, फिर जोहिला को सहायिका कहने तक तो ठीक है, लेकिन नर्मदा को सोन की बड़ी बहन कहने की बात एकदम नहीं जमती।

सोन का वास्‍तविक उद्‌गम, छत्‍तीसगढ़ के पेन्‍ड्रा के पास सोन बचरवार में मौके पर स्पष्ट है ही, स्‍तरीय अध्ययनों तथा सर्वे आफ इण्डिया के प्रामाणिक नक्शे में भी इसका तथ्यात्मक विवरण उपलब्ध है। इस तरह ''भारत की नदियों की कहानी'' पुस्‍तक में अमरकंटक को सोन का उद्‌गम बताया जाना भारी भूल है। अपनी पसंदीदा पुस्‍तकों में से एक 'पुरातत्‍व का रोमांस' के लेखक के रूप में, भगवतशरण उपाध्‍याय जी के प्रति मेरे मन में बहुत सम्‍मान है लेकिन उनकी पुस्‍तक 'सवेरा-संघर्ष-गर्जन' वाले (राहुल सांकृत्‍यायन की 'वोल्‍गा से गंगा' की तुलना का) विवाद के कारण उनकी छवि पर विपरीत प्रभाव पड़ा, वह इस प्रकाशन से गंभीर हो जाता है। याद करें, छपाई की श्रमसाध्‍य, समयसाध्‍य और जटिल प्रक्रिया के दौर में अधिकतर अच्‍छे प्रकाशनों में शुद्धि पत्र का पृष्‍ठ होता था। ऐसा भी उदाहरण मैंने देखा है, जिसमें पुस्‍तक की मुद्रित प्रतियों में लेखक स्‍वयं द्वारा कलम से प्रूफ की गलती का सुधार किया गया है।

प्रसंगवश, ब्‍लागिंग का प्रभाव, उसकी ताकत, सार्थकता मात्र ब्‍लाग और पोस्‍ट की संख्‍या के आधार पर या टिप्‍पणियों के आदान-प्रदान से तो संभव नहीं है। कविताओं पर सुंदर, नादान-कामुक वाली 'हॉट एन सॉर' या 'स्‍वीट-सॉर', बेमेल तस्‍वीरें लगाना जैसी प्रवृत्ति भी तेजी से फैलती है। संभव है यह जल्‍दी ही बहुमत बन जाए, तब तो असहमति के बावजूद जन-भावना का सम्‍मान करते हुए जनता-जनार्दन का निर्णय शिरोधार्य करना पड़ सकता है, सो इसकी आलोचना में देर करना ठीक न होगा। ऐसे ब्‍लागर अच्‍छी तरह समझते होंगे कि उनकी रचना कितनी प्रभावी है। यह भी अंदाजा होता है कि वे अपने अपेक्षित पाठक का क्‍या मूल्‍यांकन करते हैं।

इसका खास प्रयोजन यह कि हिन्‍दी ब्‍लागिंग में जिम्‍मेदारी और गंभीरता का सामूहिक भाव, उसे मजबूती देने में सहायक हो सकता है इस दृष्टि से विचार है कि एक जन-मंच (फोरम) हो, जिसमें खास कर प्रतिष्ठित-स्‍तरीय प्रकाशक-लेखकों की ऐसी पुस्‍तकों की चर्चा हो, जिसमें गंभीर तथ्‍यात्‍मक चूक होती है। ऐसी लापरवाही सामान्‍य ज्ञान की पुस्‍तकों में भी मिल जाती है। ऐसा फोरम यदि अच्‍छे संपादन सहित काम करने लगे तो शायद इस प्रवृत्ति पर अंकुश हो, यह लोक-नियंत्रण (पब्लिक सेंसर) जैसा काम होगा। यानि 'भूल-गलती उदासीनता का फायदा लेते, जिरह-बख्‍तर पहन कर न बैठ जाए।' ऐसा फोरम वांछित गति और स्‍तर पा ले तो प्रकाशक और लेखक भी अपना पक्ष स्‍पष्‍ट करने यहां आएंगे। उपभोक्‍ता और बौद्धिक जागरूकता, प्रतियोगी परीक्षाओं के वस्‍तुनिष्‍ठ प्रश्‍नों के उत्‍तर, कानूनी संदर्भ-अड़चन जैसे अन्‍य पक्ष इसके विस्‍तार में शामिल होंगे। अधिक गंभीर गलतियों वाले प्रकाशन पर रोक भी लग सकती है।

यहां ऐसी टिप्‍पणियां अपेक्षित हैं, जिनसे पता लग सके कि क्‍या आपके पास इस तरह के कुछ ठोस उदाहरण हैं? ऐसे फोरम में आपकी कितनी भागीदारी, कैसा योगदान हो सकता है? यह पोस्‍ट वस्‍तुतः ऐसे फोरम के लिए उदाहरण सहित विचार-प्रस्‍ताव है। तकनीक-सक्षम, ब्‍लागिंग पर निगरानी रखने वाले सक्रिय ब्‍लागर चाहें तो इस योजना पर काम कर सकते हैं।

Wednesday, August 3, 2011

सोन सपूत

सभ्यता, किसी पहाड़ी की कोख-कंदरा में जन्म लेती है और विकसित होती हुई नदी तटों पर पहुंचती है लेकिन संस्कृति, नदियों के अगल-बगल, आभूषित, अलंकृत होती है और नदी-जलधाराओं के उद्‌गम और संगम बिंदु, संस्कृति के घनीभूत केंद्र होते हैं। ऐसा ही केंद्र है- छत्तीसगढ़ में पेण्‍ड्रा के निकट ग्राम सोन बचरवार का सोनमुड़ा या सोनकुण्ड। सोन नदी नहीं, सोन नद का उद्‌गम जो 'शोण' या 'शोणभद्र' नाम से भी जाना गया है।

लोक विश्वास में अमरकंटक का सोनमुड़ा (सिद्ध शोणाक्षी शक्ति पीठ) 'सोन' तथा 'भद्र' दो भिन्न जलधाराओं का उद्गम, साथ ही भद्र का सोन में संगम स्थल माना जाता है, किन्तु तथ्य की दृष्टि से यह भ्रम है। इस विश्वास के कारणों में प्रमुख तो पौराणिक भूगोल की जानकारियां हैं, जिनमें सोन और नर्मदा का उद्‌गम मेकल से और पास-पास होना बताया गया है साथ ही एक रोचक किंतु अविश्वसनीय तथ्य यह भी है कि लोक विश्वास और परंपरा (प्रशासनिक अड़चन, राजनैतिक कारणों) का ध्यान रखते हुए सन 1952-53 में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को अमरकंटक के सोनमुड़ा को ही सोन का उद्‌गम बताकर दिखाया गया। उल्लेखनीय है कि इसी अवसर पर आदर्श ग्राम 'राजेन्‍द्रग्राम' नामकरण भी हुआ (गांव का मूल नाम बसनिहा बताया जाता है)। अमरकंटक वाले सोनमुड़ा का प्रवाह, आमानाला, आमाडोब नाला, माटीनाला होकर अरपा में मिल जाता है जो अरपा, शिवनाथ होकर महानदी में मिलती है। किंतु वास्तविक सोन का उद्‌गम मौके पर तो स्पष्ट है ही गंभीर अध्ययनों तथा सर्वे आफ इण्डिया के प्रामाणिक नक्शे, 19वीं सदी के जे.डी. बेगलर के पुरातत्वीय सर्वेक्षण और देवकुमार मिश्र की पुस्तक 'सोन के पानी का रंग' में भी इसका तथ्यात्मक विवरण उपलब्ध है।

पचासेक साल पहले मध्‍यप्रदेश में नवमी कक्षा की हिन्‍दी पाठ्य पुस्‍तक 'नव-साहित्‍य-सुधा' में पाठ-7, श्री राखालदास वन्‍द्योपाध्‍याय का 'अमरकंटक' शीर्षक निबंध होता था। इस निबंध की आरंभिक पंक्तियां हैं- ''विन्‍ध्‍यप्रदेश में विन्‍ध्‍यपर्वत के एक शिखर से तीन भारी-भारी नदियां निकली हैं- महानदी, सोन (शोणभद्र) और नर्मदा। इसीलिए अमरकंटक समस्‍त भारतवर्ष में विख्‍यात है।'' यहां सोन उद्गम की भूल तो है ही, महानदी को भी यहां से निकली बताया गया है जबकि जोहिला, वस्‍तुतः जिसका उद्गम यहा है, का नाम भी नहीं है। राखालदास वन्‍द्योपाध्‍याय से ऐसी भूल और यह पाठ्यपुस्‍तक के लिए स्‍वीकृत हो कर पढ़ाया जाना, आश्‍चर्यजनक है।

देश की प्रसिद्ध पुल्लिंग जलधाराओं में सिंधु और ब्रह्मपुत्र के साथ सोन मुख्‍य है। सिक्किम की कुंवारी कही जाने वाली नदी तिस्‍ता की प्रेम कहानी का नायक नद रंगीत है। छत्तीसगढ़ की एक प्रमुख जलधारा, शिवनाथ तथा सरगुजा का कन्हर भी नद माने गये हैं। दमेरा पहाड़ी, जशपुर से निकली सिरी और बांकी जलधाराएं क्रमशः भाई-बहन मानी जाती हैं। सरगुजा के सूरजपुर-प्रतापपुर की दो जलधाराओं, बांक और बांकी नाम में दंतकथा की पूरी संभावना है। कांकेर वाली दूध नदी, महानदी की पुत्री मानी जाती है। कोल्‍हान नाला को राजा कहा जाता है। कोरिया की मेन्‍ड्रा पहाड़ी के उत्‍तर से निकली गोपद को नारी और दक्षिण से निकले हसदेव को पुरुष माना जाता है। छत्तीसगढ़-मध्यप्रदेश की सीमा पर ग्राम बांकी (पंडरीपानी) के कांदावानी-दंतखेड़ा पहाड़ी से निकलने वाली हांफ-हंफनिन, प्रेमी-प्रेमिका मानी जाती हैं। हांफ, शिवनाथ के बांयें तट पर तरपोंगी, बेमेतरा जिला और दाहिने तट पर बलौदाबाजार जिले के तरपोंगा मावली माता मंदिर के पास शिवनाथ से महानदी होते बंगाल की खाड़ी में जाती है। हंफनिन (हलो), नर्मदा की सहायक बुढ़नेर नदी में मिल कर अरब सागर चली जाती है। अर्थात नर्मदा और सोन की तरह इनका भी 'मिलन' नहीं हो पाता। कान्हा-मुक्की की नर्मदा की सहायक जलधारा ‘बंजर‘, पुल्लिंग तो भीमलाट संगम की दूसरी नदी ‘जमुनिया‘ स्त्रीलिंग मानी जाती है। इसी तरह मवई, मंडला की जलधाराओं और गांव का नाम ही ‘भाई-बहन नाला‘ है।

कोरबा-बिलासपुर की एक छोटी नदी, लीलागर के नाम में लीला और आगर की संधि है, वैसे दो नदियां लीलागर और आगर अलग-अलग भी हैं और देवार गीत में लीला नारी और आगर पुरुष है, जिनके विवाह की गाथा गाई जाती है। यह भी उल्लेखनीय है कि इस गीत में कन्या-प्राप्ति के लिए करमसैनी की पूजा के फलस्वरूप लीला का जन्म हुआ है। पहाड़ और जलधारा का रिश्‍ता तो जन्‍मदाता और संतति का होता ही है। प्रचलित लोक मान्यता में अगल-बगल के तालाब सास-बहू, देवरानी-जेठानी या मामा-भांजा के होते हैं तो नदियों के बीच आपसी रिश्ता रानी-चेरी, प्रेमी-प्रेमिका या भाई-बहन का माना जाता है। समान उद्‌गम स्थल से निकली नदियां रानी-दासी या भाई-बहन तो मानी गई है किंतु प्रेमी-प्रेमिका के लिए सामान्यतः भिन्न उद्‌गम की सामाजिक मर्यादा का ध्यान रखा जाता है।

सोन ओर नर्मदा की प्रेमकथा पूरे अंचल में कई तर‍ह से प्रचलित है। कहा जाता है कि राजा मेकल ने पुत्री राजकुमारी नर्मदा के लिए निश्चय किया कि जो राजकुमार बकावली के फूल ला देगा, उसका विवाह नर्मदा से होगा। राजपुत्र शोणभद्र, बकावली के फूल ले आए, लेकिन देर होने से विवाह संभव न हुआ। इधर नर्मदा, सोन के रूप-गुण की प्रशंसा सुन आकर्षित हुई और नाइन-दासी जोहिला से संदेश भेजा। जोहिला ने नर्मदा के वस्त्राभूषण मांग लिए और संदेश ले कर सोन से मिलने चली। जैसिंहनगर के ग्राम बरहा के निकट जोहिला का सोन से संगम, वाम-पार्श्व में दशरथ घाट पर हो जाता है और कथा में रूठी राजकुमारी नर्मदा कुंवारी ही उल्टी दिशा में बह चलती है। रानी और दासी के पोशाक बदलने की कथा, अन्य संदर्भों में इलाहाबाद जिले के पूर्वी भाग की अवधी बोली क्षेत्र में भी प्रचलित है।

सोन को पवित्र और अभीष्ट फल देने वाला कहा गया है तथा यह भी कि गुरू के मकर राशि में आने पर जो यहां बास करे वह विनायक पद प्राप्त करता है। रामचरित मानस में आता है- ‘सानुज राम समर जसु पावन। मिलेउ महानदु सोन सुहावन। अर्थात अनुज लक्ष्मण सहित राम के युद्ध-यशरूपी सुहावना महानद सोन (उसमें आ कर) मिलता है। सोन के पुल्लिंग मानने का आधार तो पता नहीं चलता, किन्तु दशरथ घाट से मसीरा घाट जाते हुए और उसके आगे भी तेज ढाल वाला सोन का पाट पुरूष का विशाल, विस्तृत उरू प्रदेश लगता है। माघ पूर्णिमा की तिथि, हमारी संस्कृति में सामुदायिक मेल-मिलाप का उत्सव है। सोन बचरवार, आमाडांड और लाटा गांव के बीच स्थित सोन उद्‌गम 'सोनकुंड' पर भी जनसमूह इस तिथि पर आदिम संस्कृति, सभ्यता के लक्षणों सहित घनीभूत होने लगता है।

इस स्थान पर पहले पहल सन्‌ 1930 में बनारस के ग्वारा घाट से स्वामी सहज प्रकाशानंद आए और साफ-सफाई कर कुटी बनाई। 1931 में पेंड्रा के जमींदार लाल अमोल सिंह ने कुंड का जीर्णोद्धार कराया। ब्रह्मचारी चिदानंद, योगानंद स्वामी जी के शिष्य हुए। सन्‌ 1976 में स्वामी जी ब्रह्मलीन हुए अब उनकी समाधि वहां है तथा कुटी व धार्मिक क्रियाकलापों का संचालन वर्तमान बेलगहना वाले सिद्ध मुनि बाबा आश्रम के स्वामी सदानंद के अधीन होता है, जो माघ पूर्णिमा और गुरू पूर्णिमा पर स्वयं यहां विराजते हैं। रोजाना की गतिविधियों की निगरानी स्वामी कृष्णानंद की देख-रेख में होती है।
बस्तर में दंतेवाड़ा, रायपुर में राजिम और बिलासपुर (अब जांजगीर) में शिवरीनारायण की मान्यता आंचलिक पुण्य क्षेत्र की है वहां महानदी के रामकुंड की भांति सोनकुंड के प्रवाह में स्थानीय जन, श्राद्ध व अस्थि विसर्जन भी करते है। सोन उद्‌गम के अथाह कुंड के पार्श्व में भरने वाले ठेठ आंचलिक मेले के परंपरा की गहराई और सघनता अथाह है। संभवतः उतनी ही गहरी जितनी सोन का मूल अथवा उतनी ही सघन, जितनी मानव-मन की श्रद्धा।

दैनिक भास्कर, बिलासपुर में मेरा यह लेख ''छत्‍तीसगढ़ी कोख का 'सोन' सपूत'' शीर्षक से 21 फरवरी 2001 को लगभग इसी तरह प्रकाशित हुआ था।

छत्‍तीसगढि़या हम, मध्‍यप्रदेश से तो अभिन्‍न रहे ही हैं, लेकिन इससे आगे बढ़ कर मुझ जैसे, सोन के माध्‍यम से उत्‍तरप्रदेश और बिहार होते हुए खुद को गंगा से जुड़ा महसूस करते हैं। इस विषय पर एक अन्‍य पोस्‍ट बेहतर और रंगीन चित्रों के साथ यहां है।