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Wednesday, February 21, 2024

दो महीने, नौ किताबें

2022-2023 दिसंबर-जनवरी, दो महीनों में फुटकर पढ़ाई के साथ पढ़ी गई नौ किताबें। 2019 से 20022 के बीच छपी नौ की नौ सुशोभित की- 
माया का मालकौंस (2019) 
गांधी की सुंदरता, सुनो बकुल! (2020) 
कल्पतरु, दूसरी कलम, अपनी रामरसोई (2021) 
पवित्र पाप, देखने की तृष्णा, मिडफ़ील्ड (2022) 
मेरी जानकारी में इसके अलावा उनकी गद्य की माउथ ऑर्गन, बायस्कोप, बावरा बटोही, आइंस्टाइन के कान, यह चार तथा कविता की अन्य चार पुस्तकें अब तक (जनवरी 2023) प्रकाशित हैं।

इन पर बात करने के पहले संक्षिप्त भूमिका। कोविड के आगे-पीछे नये-युवा लेखकों को पढ़ता रहा। 24 जुलाई 2020 को अपने फेसबुक पर ’चार-यार चालीसा’, ऐसे चार जो उम्र के चौथे दशक में हैं, की बात कही थी- 

मुझ जैसे बुजुर्ग के चौथे अंतःकरण या ग्यारहवीं इन्द्रिय, चंचल मन में ऐसे युवा के प्रति सम्मान होता है, जो यों अभिभावक मानते हुए व्यवहार करें, लेकिन आपस में ऐसी हर छूट की गुंजाइश रखें जो मित्रों के साथ होती है। चिड़िया और बच्चों से आप अपनी मैत्री का दावा कर सकते हैं लेकिन उस पर मुहर तभी लगती है, जब वे भी ऐसा मानें, प्रकट करें। 

चार में से ऐसे दो उत्तर भारतीय पहले, आशुतोष भारद्वाज(1976) स्वयंभू किस्म के प्रखर, उत्साही मगर संयत बौद्धिक, किसी भी संस्कार-परंपरा से आकर्षित होते हैं, जूझने-परखने, जितना सम्मान करने, उतना ही खारिज करने को सदैव तत्पर। दूसरे, व्योमेश शुक्ल (1980) परंपरा के लक्षणों को संस्कारों से जोड़कर, सब भार स्वयं वहन करते हैं, मगर उसे प्रसंगानुकूल वजन घटा-बढ़ा कर व्यक्त कर सकते हैं, बनारसी स्निग्धता तो है ही। इन दोनों से अच्छी मेल-मुलाकातें हैं। 

अन्य दो, मालवी, जिनसे कभी मुलाकात नहीं है, एकाध बार फोन पर बात हुई, उन्हें पढ़ता जरूर रहता हूं, लिक्खाड़ सुशोभित (1982) ऐसा लगा कि गांधी पर लिखते हुए उनकी सोच और अभिव्यक्ति में गांधी का स्थायी प्रवेश हुआ, पैठ गए, अधिक प्रभावी और रसमय बना दिया है। अनुशासन और मर्यादा का शील भी उनमें स्थायी है, इसके लगभग ठीक विपरीत अम्बर पांडेय (1984) अनुशासन की मानों उनकी अपनी संहिता हैं। उच्छृंखलता कभी अभिव्यक्ति में आती है, वह शायद स्वभाव की नहीं है, बल्कि यदा-कदा मन-तुरग को जीन-लगाम मुक्त कर हवाखोरी कराते रहते हैं (पिछले साल 2023 में सुशोभित से जनवरी में भोपाल में मुलाकात हुई और अम्बर मिल गए कथा कहन, जयपुर में, फरवरी में)।

किसी चिंतक-दार्शनिक को पढ़ने में उसका जीवन-वृत्त जानना रोचक और मददगार होता है, यह देखने के लिए कि जीवन स्थितियों ने उसके विचारों पर कोई, क्या और कितना असर डाला है। चारों उम्र के चौथे दशक यानि तीसादि बरस आयु के हैं। अपना पर्याप्त समय पढ़ने में खरचा है। इनके लेखन से, इनकी दिमागी बनावट (इंटेलेक्चुअलिटी) को समझने का आनंद लेता रहता हूं। ऐसे मित्र, जिनके बारे में धारणा चाहे बदलती रहे, मेरे मन में इनके प्रति मैत्रीभाव एक जैसा अडिग बना हुआ है।

(जेंडर बैलेंस आग्रह बतौर अगली किश्त विचाराधीन है☺️) 

अब 2022-2023 दिसंबर-जनवरी, दो महीनों में पढ़ी गई नौ किताबें, फुटकर पढ़ाई के साथ। सारी सुशोभित की। पढ़ते हुए कुछ नोट्स-टिप्पणियां-

# ‘पुस्तक को एक दिन में पढ़कर समाप्त हो जाना चाहिए। या जितने भी दिनों में वह पढ़ी जाए, वह मेरी चेतना में एक ही दिन हो।‘

# दृश्यों पर, स्वाद पर, शब्दों पर, आवाज पर मैं उनके साथ अपने पढ़ने का दायरा विस्तृत होते पाता हूं।

# कई बार ऐसा लगता है कि तथ्य, सूचना, संदर्भ एकत्र कर रहा है, और व्याख्या तक ले जाने के फिराक में है। मगर खुद को साबित करने के दबाव से मुक्त।

# भाषा सध जाए और मन ‘बहक‘ जाए फिर कलम क्योंकर न फिसले।

# एक अकेले एकांत में भटकता है, न ऊबता, न घबराता, कुछ जग की से होते अपनी तक आता है, सन्नाटा बुनता, सुनता, गुनता, गढ़ता है और दम मारने आता है शब्द-भाषा थामे, अभिव्यक्त होता है।

# वे जिस लेखक-जिद से लिखते हैं, उसके लिए पाठक-जिद से ही पढ़ना संभव होता है।

# इस जिम्मेदारी से लिख रहे हैं कि हिंदी पाठक को क्या पढ़ने-जानने, समझने-बूझने और मन बहलाते, पाठकीय भूख मिटाने को मिलना चाहिए।

# हिंदी पाठक को मुहैया कराने की यह जिद है, खासकर फुटबॉल और कुछ हद तक विश्व सिनेमा, विश्व साहित्य।

# फुटबॉल अपने नियमों के दायरे में, गोल के आंकड़ों के आगे कहां तक पहुंच जाता है। उस रेंज की, फलक की हैं जो कम समय में कम उम्र द्वारा लिखी गई, जिसे धीरज से पढ़ पाना, आमतौर पर जिद से ही संभव है।

# फिल्म की स्टोरी सुनना और सुनाना, कभी इसलिए कि फिल्म नहीं देख पाएंगे, या फिल्म देखनी है, ट्रेलर की तरह।

# खुली-खुली सी सरपट पढ़ जाने वाली, बात-बात में कविता बनकर चुनौती-सी बातें, कल्पतरु के गद्य में सुनो बकुल से अधिक कविताई होने लगी है।

# कवि मन के प्रवाह में कैसा वाक्य सहज रच जाता है- ‘और उसने भी बतलाया नहीं कि नहीं मैं तेरा नहीं हूं।‘

# पाठक को छूट हो, अगर चाहे सहज अर्थ या रूपकों का भेद ले, विचार और व्याख्या को प्रेरित करे, संभावना बनाए।

# मैं खुद को लेखक-पुस्तक के हवाले नहीं कर देता, मानता हूं कि वह मेरे हवाले है, इससे दबाव नहीं होता कि उसे शब्द दर शब्द पीना है, नजरें दौड़ती हैं फिर किताब की कुव्वत कि वह कितनी याद रहे, कितनी जज्ब हो और कितनी यूं ही गुजर जाए। सुनने-देखने पर इतना आसान काबू नहीं होता।

# किताबें- आप लेखक के पास नहीं पहुंच सकते, जब मन चाहे खोल-बंद कर सकते हैं, वह ‘लाइव‘ नहीं है कि अभिव्यक्त होने के दौरान सामने रहना जरूरी है, लिखा हुआ पढ़ते चिट मारने जैसा भी।

# सुशोभित- मूलतः फीचर वाले पत्रकार हैं, अहा! जिंदगी वाले, स्तंभ लेखन वाले। वरना पत्रकार कब सतही और सरसरी हो जाते हैं उन्हें खुद भी पता नहीं लगता और साहित्यकार कब अनावश्यक उलझाव भरे नाटकीय।

# सुशोभित- साहित्यकार कैसे हैं, हैं भी या नहीं, यह तो समीक्षक तय करेंगे यों वे लगभग लगातार पाठक, दर्शक या श्रोता-सी ही मुद्रा में होते हैं, लेकिन लेखक या कहें लिक्खाड़ आला दरजे के हैं।

# सुशोभित- लेखक, शहरी माहौल, अपने कार्य-स्थल की भीड़ और पारिवारिक सघनता के बीच भी अपने को नितांत एकाकी रख कर सृजन करता रहा है मगर यह भी जरूरी होता है कि उसमें जंगल, नदी के किनारे, सुनसान-सन्नाटे में स्थित रहते, भरा-पूरापन कितना उमगता है।

# सुशोभित- ‘रोज-मर्रा‘ का मरने से कोई ताल्लुक नहीं, फिर भी बहुतेरे अक्सर दैनंदिन जीवन को मशीनी-मुर्दों की तरह जीते हैं, मगर उसमें जीवन-मधु का संचय करना, संभव करते जान पड़ते हैं।

Wednesday, March 25, 2020

काजल लगाना भूलना

गोया, भुलाना भी याद रखना होता है ... बहुतेरों को यह पता नहीं होता कि वे जो लिख-अभिव्यक्त कर रहे हैं वह साहित्य है, छपा-छापा, बिका और पढ़ा जा सकने वाला है। पुस्तकाकार न आ सके, वह नोट्स-डायरी में दर्ज साहित्य, दाखिल-खारिज हुआ करता है, लेकिन बहुत सारे ऐसे खारिज को मान्य किए जाने के पक्ष में खड़े व्योमेश का स्वागत है। उन्हीं के शब्दों में कहें तो- ‘‘और कोई चुपके-चुपके लगा रहता है कि अपनी महान हिन्दी भाषा में कुछ वाक्य लिख ले।‘‘ अपने लिखे, अपनी बातों पर खुद को भरोसा आसानी से नहीं होता, आमतौर पर औरों की तस्दीक से हो पाता है, अन्य की प्रतिक्रिया बिना पैदा आत्मविश्वास देर से, अधिक प्रयास, अधिक धैर्य के परिणाम से उजागर होता है, जैसे यह महान क्रिया और पुस्तक का शीर्षक ‘काजल लगाना भूलना‘ है। मगर ये क्‍या बात हुई, भूलने की बात कुछ देर को भूल भी जाएं तो काजल कोई लगाता भी है क्‍या? काजल, आंखों में डाला जाता है, जैसे कजरा मोहब्‍बत वाला... या आंजा जाता है और दिठौना हुआ तो माथे या गाल पर टीका जाता है, फिर यह कौन सा काजल आ गया, लगाने वाला! खैर, अंदर के पूरे पेज पर अकेला संक्षिप्त सा वाक्य- ‘मैं बहुत खुश होकर रोने की दवाई बेचने लगा।‘ या ‘तब से मैंने कुछ नहीं कहा है।‘ तभी अपनी जगह बना पाता है, सार्थक होता है, जब वह किसी जाने-माने की कलम से निकले, भटके नहीं, बल्कि पुस्तक में शामिल हो।

भूलना, अकर्मक है? लेकिन जानबूझकर कर भूलना सकर्मक होगा, तो फिर भूल कर भूलना? और यह ‘भूलना‘ काजल लगाना के लिए, जिसका लगाना हुआ करता है, इसे न याद करना होता, न भूलना होता है, क्योंकि जो होता है, वह हुआ करता है, न हुआ तब भी हुआ, और हुआ तब तो हुआ ही। व्याकरण की क्रिया में छंद का फ़ाइलातुन, मफैलुन। फिसलन लापरवाह, चिकनी-चुपड़ी चापलूसी, तटस्थ माध्यम लुब्रिकेशन और आत्मीय स्नेहन के बीच सधे विनोद कुमार शुक्ल, खिड़की-दरवाजा हैं। गाड़ा वाला गड़हा ओंगन तेल के साथ चलता है, चक्का फंसे अस्कुर में तेल ओंगता और ओंगन पाठ देवता पर तेल चढ़ाता, कि गाड़ा (छत्तीसगढ़ में भैंसा जुता मालवाहक ‘गाड़ा‘ चलता है न कि बैल‘गाड़ी‘) अटके नहीं, सफर निर्विघ्न हो।

‘मैं रहा तो था‘ की सरपट में ‘सपना‘ है और उसमें ‘कलाई में दिल की धड़कन थी‘ ... ‘शरीर आत्मा पर फिदा हुआ जा रहा था‘ जैसी फिदा कर देने वाली, धड़कती पंक्तियां। व्योमेश की अन्य पुस्तक ‘कठिन का अखाड़ेबाज‘ लगभग साथ-साथ आई है, ‘लीलामय‘ इन दोनों में शामिल है। (इस पुस्तक ‘काजल लगाना भूलना‘ के शीर्षक में उर्फ कठिन का अखाड़ेबाज भी जोड़ा जा सकता था!) ‘लीलामय‘ गद्यमय होता जान पड़ता है, वैसे भी इसे ‘गद्य कविता‘ ही कहा गया है, इस पर किसी परिचित ने सवाल किया- क्यों नहीं ‘अगद्य‘? और महिमामंडित करना हो तो क्यों न इसे गद्यातीत कहा जाए। बहरहाल, ओझल सी कविता झलकती है- ‘यह मानते ही कि बनारस के किनारे से नहीं बहती गंगा, गंगा बनारस के किनारे बहने लगेगी। उसकी अनुपस्थिति का यकीन ही उसकी उपस्थिति की उम्मीद है।‘ और मानों परिभाषित करने का इरादा हो- ‘लीला में अभिनय नहीं है। अभिनय है टीवी सीरियलों में। यहां भगवान की, स्वरूपों की झांकी है। रामलीला का तर्क यह है कि जो होते हैं वह अभिनय नहीं करते।

‘चौथा दरवाजा‘ की कवितानुमा कविता या पद्य कविता पढ़कर विश्वास बना रह जाता है कि कविताओं के प्रति मेरी समझ सीमित थी, है और रुचि संकीर्ण ही रह जाने वाली है। तभी तो ‘कवि‘ भी मानों मेरे पक्ष में ‘कार्य-कारण‘ बताता है- ‘लिखता है कभी अपने छंद में और मुझ तक पहुंचता है वह गद्य के सबसे रुक्ष उदाहरण की तरह।‘ लेकिन ‘पों...‘ में ‘‘कह रहे हों ‘की‘ हां‘‘ और ‘‘कह रहे हों ‘कि‘ हां‘‘ के ‘की‘, ‘कि‘ को कभी प्रयोग तो कभी प्रूफ की भूल की तरह मान कर पढ़ने का आनंद है। बहते-लुढ़कते अंत में ‘वक़्त का पहिया कि साइकिल का‘ नहीं बल्कि ‘का कि‘ प्रयोग वाला ‘‘वक़्त का कि साइकिल का पहिया‘‘ आता है। बात, कविता की भाषा के नामवरी विमर्श अंदाज में शुरू होती है, जमीन बनाने के लिए, जिस पर साइकिल के पहिये को घूमना, टेढ़ा होना, ठिठकना और फिर गद्य कविता में ढल जाना है।

सघन, जटिल, चकाचौंधक नाटककार, संश्लिष्ट चिंतनशील, मौलिकता-आग्रही साहित्यकार, सधे वक्ता, यह सब एलीट लेकिन प्रवक्ता ऐसे कि जब चाहें, किसी के, जनता-जनार्दन के मन तक राह बना लें, सहज उतर जाएं। रचना-कर्म और अभिव्यक्तियां ऐसी, जिसे देखकर संदेह नहीं रह जाता कि यह इस युवा का स्व-अर्जित मात्र नहीं, परम्परा और समष्टि का निमित्त बरताव है।