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Friday, May 26, 2023

भोरमदेव – 2006

छत्तीसगढ़ के मूर्धन्य पुराविद डॉ. विष्णुसिंह ठाकुर, सन 2006 में भोरमदेव पर पुस्तिका की तैयारी कर रहे थे, इसके पूर्ण होने या प्रकाशन की जानकारी मुझे नहीं है, मगर इस क्रम में उनके द्वारा तैयार नोट का यह हिस्सा मेरे पास सुरक्षित रहा, यथावत प्रस्तुत- 


भोरमदेव महोत्सव 2006 के अवसर पर प्रकाशित विवरणिका में फणिनागवंश की उत्पत्ति पर आधारित ऐतिहासिक आख्यायिका का सांकेतिक उल्लेख प्रथम बार लिखित रूप में प्रकाशित किया जा रहा है। समकालीन राजनीतिक इतिहास में फणिनाग वंष के स्थान एवं महत्व को रेखांकित करने वाले कुछ-एक सन्दर्भों का भी निर्देष विवरणिका में लेखक द्वारा प्रामाणिकता के साथ प्रस्तुत किया गया है। फणिनाग वंश के विभिन्न नरेशों के राजत्वकाल में राजधानी चउरापुर में किये गये निर्माण कार्यों का भी मात्र एक शिलालेख के आधार पर संक्षिप्त में उल्लेख है। पाठकों में सब कुछ सही-सही जानने की तीव्र उत्कण्ठा जगा रही है यह विवरणिका। सम्भवतः लेखक का यही उद्देश्य हो। राजनीतिक इतिहास के ही समान फणिनागवंशीय शासन काल के मध्य ‘‘स्थापत्य एवं शिल्प कला’’ का भी सर्वांगपूर्ण प्रकाशन अपेक्षित है। राज्य तथा देश के इतिहासकार एवं कला अध्येता इन अपेक्षाओं को पूर्ण करने के लिए सामने आयेंगे इस आशा के साथ-प्रस्तुत है यह विवरणिका ... 

भोरमदेव 

छत्तीसगढ़ के कबीरधाम (कवर्धा) जिले के मुख्यालय से उत्तर-पश्चिम दिशा में 17.6 कि.मी. की दूरी पर राजस्व ग्राम चौरा स्थित है। यह सम्पूर्ण ग्राम पुरातत्वीय महत्व के टीलों, तीन प्राचीन मन्दिरों, सतखण्डा महल नामक स्मारक के समाप्तप्राय भग्नावषेशों तथा प्राचीन दुर्ग के नष्टप्राय प्राचीन स्थापत्य अवशेष को अपने क्रोड़ में समेट गौरवशाली प्राचीन इतिहास का मूकसाक्षी बना आज भी अपनी भौतिक सत्ता बनाये हुए है। यहाँ के ऐतिहासिक वास्तुरूपों में निम्न मन्दिर विशेष उल्लेखनीय महत्व के हैं – 

(अ) मड़वा महल मन्दिर- इसका निर्माण फणिनागवंशी महाराज रामचन्द्र के शासन काल में चौदहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में हुआ था। यह मन्दिर मड़वा महल अभिलेख के अनुसार राम के उपास्य पशुपति रामेश्वर शिव को समर्पित था। 

(आ) छेरकी महल मन्दिर - फणिनागवंशी नरेश महाराज रामचन्द्र के द्वारा एक विष्णु मन्दिर के निर्माण किये जाने का उल्लेख मड़वामहल अभिलेख में हुआ है। छेरकी महल मन्दिर के प्रवेश द्वार के सिरदल पर तीन छद्म देवपीठ मूर्तांकित है। इनके मध्य में बायीं से दायीं दिशा की ओर क्रमशः अर्धपर्यंकासन में बैठे गणेश, मध्य में पद्मासन मुद्रा में बैठी दोनों हाथों पद्मपुष्प धारण की हुई श्री लक्ष्मी तथा दक्षिण में अर्धपर्यंकासन में वीणावादन करती सरस्वती का मूर्तांकान है। प्रवेश द्वार के मध्यवर्ती ललाट बिम्ब पर लक्ष्मी के मूर्ताकंन से इस मन्दिर को मूलतः विष्णु को समर्पित मन्दिर स्वीकार करना साक्ष्यसिद्ध कहा जा सकता है। 

(इ) भोरमदेव मन्दिर - चौरा में उपलब्ध ऐतिहासिक महत्व के मन्दिरों में स्थापत्य एवं शिल्प निदेशित शैलीगत वैशिष्ट्य की दृष्टि से भोरमदेव मन्दिर को चौरा के मुकुट का मूल्यवान मणि सम्बोधित किया जा सकता है। 

इस मन्दिर के महामण्डप के अन्तराल से संलग्न अर्धमण्डप के दाहिने ओर गर्भगृह की बाहरी भित्ति से सटाकर एक सम्मुखाभिमुख मूर्ति रखी हुई है। इस मूर्ति में राजपुरुष और राजमहिषी का करबद्ध मुद्रा में मूर्तांकन है। इस मूर्ति के पादपीठ पर ‘‘संवत् 840, राणक श्री गोपाल देव राज्ये’’ उत्कीर्ण है। संवत् 840 को समकालीन कोसल में प्रचलित कलचुरि संवत् की तिथि माना गया है। अर्थात् इस मन्दिर का निर्माण फणिनागवंशी महाराज श्री गोपाल देव, जो रत्नपुर के कलचुरि नरेश के अधीनस्थ सामन्त थे, द्वारा कलचुरि संवत् 840 अर्थात् ई.स. 840$248=1088-89 में किया गया। सामान्यतः इस मन्दिर को छत्तीसगढ़ का खजुराहो कहा जाता है। इस प्रकार की तुलना का प्रमुखतम कारण मन्दिर के बाह्य अंगो में बैठायी गई अथवा उकेरी गयी मूर्तियों में मैथुन मूर्तियों की उपस्थिति है। उल्लेखनीय है कि जो भी मन्दिर तांत्रिक उपासना से सम्बद्ध थे उनकी बाह्य भित्ति पर मैथुन मूर्तियाँ पाई जाती हैं। मात्र मैथुन मूर्तियों के कारण इसे खजुराहो कहना इसकी शिल्पगत वैशिष्ट्य पर पर्दा डालने जैसा है। इस मन्दिर के स्थापत्य शैली पर कोसलीय शैली के अतिरिक्त किसी बाहरी शैली का प्रभाव है तो वह है परमार मन्दिर स्थापत्य शैली। 

भोरमदेव मन्दिर से लगभग 3 मी. दूरी पर ईंटों का एक भग्न मन्दिर विद्यमान है। इस मन्दिर में विमान तथा छोट सा मुख मण्डप दो अंग है। विमान का अधिष्ठान ताराकृति वाला है। यह मन्दिर 8-9 वीं शताब्दी ई. सन की निर्मिति है। भोरमदेव मन्दिर परिसर के बाहर उत्तर दिशा में लगभग 10 मी. की दूरी पर एक विशाल तालाब विद्यमान है। मड़वामहल अभिलेख में इसे ‘‘महास्तडागः’’ कहा गया है। चौरा गाँव के पुरा स्थल के दक्षिण दिशा में संकरी नामक नदी है। मड़वा महल अभिलेख में इसे ‘‘हरिशंकरी’’ कहा गया है। इस हरिशंकरी के दक्षिण तट में स्वयम्भू हटकेश्वर शिव प्रकट हुए है। हटकेश्वर शिव फणिनागवंश के आराध्य कुल देवता थे। 

चौरा का भोरमदेव मन्दिर छत्तीसगढ़ अंचल में अपने ढंग की वास्तु योजना का एकाकी उदाहरण है। इस मन्दिर की वास्तु योजना का अनुकरण करते हुए 13 वीं 14 वीं शताब्दी में देव बलौदा के शिव मन्दिर का निर्माण फणिनागवंशी शासकों द्वारा कराया गया है। कालगत अन्तर का स्पष्ट प्रभाव वास्तु अंगों के प्रस्तुतीकरण में दिखाई पड़ता है। तांत्रिक शैवोपासना का केन्द्र होते हुए भी भोरमदेव मन्दिर की देव प्रतिमाओं में सर्व समन्वयात्मक धार्मिक प्रवृत्ति की जीवन्तता देखने में आती है। यहाँ के शिल्पों का गहन अध्ययन तत्कालीन सांस्कृतिक दशा के अध्ययन की दृष्टि से महत्वपूर्ण सिद्ध होता है। 

द्वादश महोत्सव

भोरमदेव महोत्सव का यह बारहवाँ वर्ष था। दिनांक 27 मार्च 2006 से दिनांक 28 मार्च 2006 को इस वर्ष दो दिवसीय महोत्सव आयोजित किया गया। छत्तीसगढ़ के महामहिम राज्यपाल माननीय के.एम. सेठ के कर कमलों द्वारा महोत्सव का विधिवत उदाघाटन किय गया। अपने उद्बोधन में महामहिम राज्यपाल ने ऐतिहासिक, सांस्कृतिक तथा पुरातत्वीय महत्व के धरोहरों का संरक्षण और उससे सम्बद्ध परम्परागत विष्वासों तथा जन आस्था के पक्षों को अनुरक्षित करते हुए उसके लोकसम्मत संवर्धन की दिशा में राज्य शासन के प्रयासों का उल्लेख करते हुए कहा कि किसी स्थान से जुड़ी परम्परागत आस्था-विश्वास को संरक्षित रखते हुए उसके सम्वर्धन की दिशा को गति प्रदान करने के लिए अध्येताओं, जिज्ञासुओं, शोधार्थियों, सुरूचि सम्पन्न पर्यटकों को इसकी ओर आकर्षित करना आवश्यक होता है। इस प्रक्रिया से स्थान विशेष के इतिहास एवं संस्कृति के बहुआयामी स्वरूप का उद्घाटन कर पाना सम्भव हो जाता है। 

उद्घाटन के पश्चात् देर रात तक सांस्कृतिक कार्यक्रम होता रहा। 

दूसरे दिन 28 मार्च को समापन समारोह के मुख्य अतिथि छत्तीसगढ़ शासन के मुख्यमंत्री माननीय रमन सिंह के मुख्य आतिथ्य में आरम्भ हुआ। माननीय मुख्यमंत्री डॉ. रमनसिंह ने लोगों को बताया की भोरमदेव को पर्यटन केन्द्र के रूप में विकासित करने हेतु एक योजना राज्य शासन ने केन्द्र शासन को भेजा है। इस प्रस्तावित योजना पर 12 करोड़ रू. की लागत व्यय अनुमानित है। आगामी दो वर्षों में इसका परिणाम यहाँ दिखाई पड़ने लगेगा। इस अवसर पर माननीय महेन्द्र कर्मा एवं माननीय प्रेमप्रकाश पाण्डेय ने भी अपने विचार रखे। अन्त में संस्कृति, पुरातत्व एवं पर्यटन मंत्री श्री बृजमोहन अग्रवाल ने आगामी वर्ष से महोत्सव को अधिक व्यापक बनाये जाने की बात कही। उपरान्त अतिथियों एवं उपस्थित लोगों ने अनुराधा पोडवाल के भजनों तथा अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आनन्द उठाया। 

लेखकीय 

भोरमदेव नाम स्मरण के साथ ही कबीरधाम जिला मुख्यालय कवर्धा से उत्तर-पश्चिम दिशा की ओर लगभग 17.6 कि.मी. की दूरी पर हरिशंकरी (संकरी) नदी के उभय तटों पर फैले जनशून्य ग्राम चौरा की विस्तार सीमा अन्तर्गत पद्मसरोवर नामक महातडाग के दक्षिण में 30 मी. की दूरी पर स्थित ग्यारहवीं शताब्दी के उत्तरभारतीय नागर प्राकर की मन्दिर स्थापत्य शैली में प्रस्तर निर्मित जिस मन्दिर विशेष की ओर ध्यान केन्द्रित होता है, उसके निर्माण का श्रेय प्राचीन चउरापुर वर्तमान चौराग्राम को राजधानी बनाकर अपनी स्वतन्त्र राजनीतिक पहिचान स्थापित करने वाले फणिनागवंशीय नरेशों के उत्तराधिकार क्रम में छठे क्रम पर राज्य करने वाले राजा श्री गोपालदेव को रहा है। वास्तु रूप की सर्वांगपूर्णता, विशालता, भव्यता, अलंकरणात्मक अभिकल्पों की अभिव्यंजना में गतिमयता, अभिरामता, चारूता, लयात्मकता तथा प्रतीकात्मक भावबोध, षिल्पों में निदेशित विषयगत विविधता, विराटता, समग्रता, भावाभिव्यंजना की प्रौढ़ता, सहजता, क्रमबद्धता के साथ-साथ अपरिमित सम्प्रेषणशीलता को अपने अंग-अंग में भास्वर करते इस मन्दिर का छत्तीसगढ़ के ‘प्राचीन मन्दिर स्थापत्य एवं शिल्प’ के इतिहास में अपना विषिष्ट स्थान एवं महत्व है। 

प्राचीन चउरापुर वर्तमान चौरा का राजनीतिक इतिहास के साथ-साथ समसामयिक सांस्कृतिक इतिहास के समस्त पक्षों पर महत्वपूर्ण साक्ष्यों को संरक्षित रखने वाले स्थान के रूप में अनुपेक्षणीय महत्व है। प्रस्तुत लघु विवरणिका के आरम्भ में चउरापुर को केन्द्र स्थानीय मानते हुए यहाँ के मन्दिरों, ऐतिहासिक स्मारकों के उल्लेख के साथ-साथ सम्पूर्ण परिवेश का दृश्यांकन प्रस्तुत किया गया है। यहाँ के मड़वामहल मन्दिर से प्राप्त शिलालेख में दिये गये विवरण के आधार पर फणिनागवंश के इतिहास पर प्रसंगानुरूप प्रकाश डाला गया है। विवरणिका में महोत्सव पर्व के उदघाटन तथा समापन सत्रों पर आधारित विवरण ही वर्तमान कृति के आलेखन का मुख्य प्रयोजनीय पक्ष रहा है। आशा है विवरणिका का वर्तमान प्रकाशन भावी अपेक्षाओं का पथ प्रदर्शक सिद्ध होगा। माननीय संस्कृति, पुरातत्व एवं पर्यटन मन्त्री श्री बृजमोहन अग्रवाल जी मेरे अभिन्न हैं। उनके द्वारा व्यक्त विचार एवं भावना इस लघु विवरणिका के सृजन के कारक आधार रहे हैं। अगर शरीर साथ देता रहा तो भविष्य में फणिनाग वंश और उनका काल शीर्षक से राजनीतिक तथा सांस्कृतिक इतिहास पर स्वतन्त्र पुस्तक छत्तीसगढ़ को अर्पित करने की अभिलाषा है।

इस लघु विवरणिका को उसके प्रस्तुत स्वरूप देने में वैचारिक स्तर पर मुझे राज्य पुरातत्व एवं संस्कृति विभाग के अधिकारी वर्ग का पूर्ण सहयोग रहा है। उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित कर उनसे प्राप्त सहयोग की भरपाई नहीं की जा सकती। मैं उन सबका ऋणी रहूंगा। कम्प्यूटर टाइपिंग से लेकर इसके प्रस्तुत रूप सज्जा को समूर्त रूप देने में सर्वश्री पी.सी. पारख, श्री तापस बसक, श्री संजय सिंह, श्री रविराज शुक्ल का उल्लेखनीय सहयोग रहा है। मैं इन्हें अपना हार्दिक धन्यवाद ज्ञापित करता हॅू। सुधि जनों को समर्पित है मेरा यह प्रयास ... 

भवदीय 
विष्णु सिंह ठाकुर

Tuesday, July 26, 2022

नदी गोठ

‘जीवन देवइया छत्तीसगढ़ के नदिया‘ शीर्षक वार्ता, ‘मोर भुंइया‘ आकाशवाणी, रायपुर का कार्यक्रम, जिसकी प्रस्तुति श्याम वर्मा जी की तथा भाग लिया डॉ. विष्णु सिंह ठाकुर, डॉ. लक्ष्मी शंकर निगम और राहुल कुमार सिंह ने। प्रथम प्रसारण तिथि- 17 जनवरी 2012.
डॉ. विष्णुसिंह ठाकुर,राहुल कुमार सिंह और डॉ. लक्ष्मीशंकर निगम
यह वार्ता आकाशवाणी से समय-समय पर दुहरा कर प्रसारित होती रही है और जब भी प्रसारित होती है, पसंद करते किसी परिचित का फोन आता है। ठाकुर सर और निगम सर के साथ बैठना और बात करना, मेरे लिए तो तीर्थ-लाभ जैसा ही है। व्यापक विषय ‘समय-सीमा‘ में, इसलिए आधी-अधूरी सी लग सकती हैं। यह ध्वन्यांकित वार्ता मामूली सुधार कर बातचीत की ही तरह यहां प्रस्तुत-

सिंह- गोठ-बात बर हमन इहां जुरे हन, डॉ. विष्णु सिंह ठाकुर साहब हें, पुरातत्व क्षेत्र के अउ छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ अध्येता आयं, काफी इन सर्वेक्षण करे हावयं, चप्पा चप्पा छत्तीसगढ़ के देखे हुए हे आपके और डॉ. लक्ष्मी शंकर निगम साहब हें, आप पुरातत्व अउ विशेषकर पुरातत्व के ऐतिहासिक भूगोल के क्षेत्र म, दक्षिण कोसल के ऐतिहासिक भूगोल हे, ते कर संबंध म आप शोध करे हें। छत्तीसगढ़ कई क्षेत्र म जाए के आपो ल काफी मौका मिले हे अउ मैं राहुल कुमार सिंह, महूं पुरातत्व के विद्यार्थी रहें और ओ कर बाद अपन काम काज के दौरान मो ल बस्तर से ले के सरगुजा तक पूरा उत्तर-दक्षिण, रायगढ़ से ले के राजनांदगांव तक, अलग अलग काम से क्षेत्र म जाए आए बर मिलिस, नदिया नाहकन, नंदिया के संग-संग चलत रहेन, नदिया के उद्गम संगम ल देखत रहेन, ओइ सब चर्चा बर हमन बइठे हन। ठाकुर साहब लगातार ए क्षेत्र ल देखत रहे हें, जीवन देवइया नदिया मन के बारे म ठाकुर साहब से हम कुुछ सुनना चाहबो, जानना चाहबो

श्री ठाकुर- राहुल जी, आजकल एक ठक कहावत निकले हे ‘जल ही जीवन है‘ और ए हर प्रशासकीय स्तर से प्रचारित करे जात हे। जल देथे कोन हर, आसमान हर देथे, फेर हम पाथन कहां, बोहावत-बोहावत जउन नदिया नरवा म पानी आवत रथे तउने ल हम हर पाथन, देखथन, अउ तइहा जुग में आदमी हर अपन बसेरा नदिया के तीर में, पानी के तीर में बनावय, एकरे सेतिर पूरा भारत में हम देखबो त का बर, देखथन हमर सभ्यता हर एक साल, दू साल, तीन साल, दस साल, हजार साल, नदिया के तीर म बसे हे। परंपरा हमार जीवित हे उहां, नदिया में, तओ छत्तीसगढ़ के घलो हमर ओइ हालत हे ओइसनहे, यहां के सबले बड़े नदिया जउन ह सब नदिया मन ल बटोरत बटोरत बोहावत आथे अउ समुद्र म जा के मिल जाथे ओ महानदी ए। कांकेर से सिहावा तक एक पहाड़ी ए जउन ल राजीवनयन महातम्य जे प्रकाशित होए हे ते म कंक कहे हे अउ श्रीमदभागवत म भी ए नाम हे कंक, कंक पर्वत से निकले के सेती ए कर नाम हे कंकनंदिनी

सिंह- ए ल चित्रोत्पला गंगा के भी नाम दिए जाथे, महानदी ल

श्री ठाकुर- हं, महानदी ल चित्रोत्पला गंगा भी कहे जाथे, बिलकुल आप सही कहत हौ, चित्रोत्पला, नीलोत्पला, उत्पल याने कमल। तओ जउन राजिम नयन हे, राजिम हे वो कमल क्षेत्र में हे, कमल क्षेत्र कहलाथे, का बर, ओही मेर महानदी हर चित्रोत्पला हे, सिरपुर म आ के बिचारी हर महानदी ए।

सिंह- निगम सर से चर्चा करत हन के हमर चित्रोत्पला गंगा तो हमर महानदी ए, जे समुद्र म जाथे अउ गंगा नदी, एक मैदानी भाग म जे ग्लेशियर के नदी होथे, पहाड़ी नदी, बरफ पिघले के नदी, ते मन के स्थिति अउ हमर इहां के छत्तीसगढ़ के स्थिति कइसे रथे

श्री निगम- वइसे छत्तीसगढ़ के जे मैदान हे, ओ मैदान ह उत्तर भारत के दोआब के बाद सबसे बड़े ए, ओतका बड़ मैदान देखे बर नइ मिलय। ओ ल तैं नक्सा म देखबे त अइसे लगिही कि बिलकुल प्लेन चलत हे कहूं उंच-नीच नइ दिखत हे। दोआब जे गंगा यमुना के हे ओ म जतका पानी आथे ओ म से जादा पानी हिमालय पहाड़ से आथे, ओ बर्फीला ए, बर्फीला होए के कारण, बाद में तो बरसाती पानी आथे, अउ ठंड में, गरमी में, ठंड में तो जम जाथे, लेकिन गरमी में बरफ पिघल के फेर पानी आथे। छत्तीसगढ़ म ओ स्थिति नइए, इहां के अधिकांश नदी मन बरसात म तो बहुत बोहाथे, गरमी म कइ ठन सूख जाथे, ओ कर कारण ए हे कि ओ कर जल संग्रहण क्षेत्र हे ओ म बारों महीना पानी नइ मिलय, लेकिन ए नदी म जइसे ठाकुर साहब बताइस, सब ले बड़े नदी महानदी ए, अउ जो हर समुद्र म जाथे, त समुद्र म जाथे त बाद में जइसे जइसे बढ़त जाथे ओ कर रूप ह विकराल होत जाथे, बड़े होत जाथे अउ खासकर के सिवनाथ नदी, जो ओ कर सब ले बड़े सहायक नदी ए छत्तीसगढ़ में वहां जाए के बाद ओ कर रूप ह एकदम बदल जाथे। त महानदी के जल संग्रहण क्षेत्र काफी बड़े हे, लेकिन शिवरीनारायण, जिहां सिवनाथ हर मिलथे, ओ मेर एक ठन अउ नदी मिलथे, जोंक नदी, जोंक घलो बड़े नदी ए, उड़ीसा के माड़ागुड़ा से निकले हे, पुरातात्विक स्थल ए, अउ बोहात-बोहात शिवरीनारायण म आ के मिलथे, जोंक भी मिलथे, सिवनाथ भी मिलथे। तो जइसे राजिम एक बड़े संगम ए वइसे एक बड़े संगम बनथे ओकरे पाए के राजिम असन बड़े तीर्थ सिवरीनारायण ल घलो माने जाथे। एक बात अउ बता दंव राहुल जी, हमर इहां नदी के उद्गम, ओ कर संगम, अउ जउन मेर ओ समुद्र म मिलथे, तीनों स्थान ल बड़ा पवित्र माने जाथे,

सिंह- सब तीरथ ए

श्री निगम- सब तीरथ ए, अउ हम देखथन कि तीरथ होए के कारण ए कर धार्मिक महत्ता तो हइ हे, ए कर पुरातात्विक महत्ता भी बहुत अधिक आ गए हे अउ सब स्थान में बड़ा पुरातत्व के धार्मिक नगरी अउ तीरथ सब मिलथे। जइसे कि राजिम हे, सिवरीनारायण हे, सोमनाथ हे, मनियारी अउ सिवनाथ के संगम म ताला हे अउ आगे जइसे जइसे बढ़त जाबो वइसे वइसे संगम मिलत जाही, अउ ओ संगम के बड़ा महत्व हे।

सिंह- नदिया मन सब बांध बनिन, बांध ले नहर बनिन एहू मन तो एक तरह से पहिली जे पुराना सभ्यता के आधार रहिसे अउ अब ओ कर आधार म जे बांध बन के, नहर बन के अलग-अलग पानी पलोये के इंतिजाम होइस, सिंचाई के इंतिजाम होइस ओहू ह एक नया तरह से जीवनदायिनी स्वरूप ए नदिया मन के

श्री ठाकुर- हां, बिलकुल ठीक कहत हव। गंगरेल बांध हे अउ गंगरेल बांध से विशाल नहर निकलथे। ओ नहर हर आधा ले जादा, पूरा रायपुर जिला अउ दुर्ग के बहुत बड़े हिस्सा ए मन ल पलोथे, गंगरेल हर। मगर पूरा छत्तीसगढ़ ल पलो सकय अतका छमता ओ म नइए। संगे संग एक विशेष बात बतावत हंव, जउन चारों कोती के पानी इकट्ठा होथे, एक स्थान में, ते ठेलका बांधा, बांध नो हय, मैदान हर अइसे ढालू हो गे चारों तरफ से अउ ढलुआ में आ के केंद्र म ओ हर जल हर भरा जाथे, ढेलका गांव में ओ बोहाथे अउ उहां से जेन नरवा निकलथे ओ गंगरेल के धारा ल ठेलका बांध म डालथें अउ ठेलका बांधा के नहर में, गांव के नहर में, जइसे गरमी के फसल बर जइसे हमार इहां नहर छोड़थें त नहर म नइ आवय, ठेलका बांधा म आथे अउ ठेलका बांधा, सब नरवा मन में जाथे चांपारन में चम्पारण जेन कथें ए मन हर तो शासकीय ए में भले बोल देथंव, मगर ओ ल मैं चंपारण नइ मानव, चांपाझर ल, वहां नरवा बोहात आथे, ओ नरवा मोर गांव से गए हे

सिंह- नदिया मन के साथ, हम जे बात करथन तओ नदी मन जइसे बरसात के दिन म जब नदी बढ़ जाथे, पूरा आथे, त ओ कर से काफी नुकसान भी होथे और ए मन ल सब ल नियंत्रित करे बर, काबू करे बर, अउ ओ कर जे जीवनदायी स्वरूप ए, जीवन देवइया ओ कर रूप ए, तइ ल एक प्रकार से बनाए रखे बर बांध, अलग-अलग बांध, देश म बड़े बड़े बांध बनिस, अउ निगम सर ओ कर बारे म कुछ जे बड़े बांध हमर इहां बने हे

श्री निगम- हमर इहां जे सब से बड़े बांध, जेन हिंदुस्तान म हे ओ तो भाखरा नंगल ए। पुराना छत्तीसगढ़ के हिस्सा रहिस संबलपुर, ते म हीराकुड म घलो बांध बने हे बहुत बड़े अउ छत्तीसगढ़ म देखबे त एक ठन बांध हे धमतरी तीर में माडम सिल्ली, ओ कर सबसे बड़े बात ए ओ समय के बने हे, जब सीमेंट के अविस्कार नइ होए रहिसे, चूना म जोड़े हे ओ ल। अउ दूसर का करे हे ओ ल साइफन तकनीक के प्रयोग करे हे ओ म पानी हर जइसे जादा होथे, खिड़की खोले के जरूरत नइ होवय साइफन से निकल जाथे। ए लगभग सौ साल होवत हे। भाखरा नंगल, हीराकुंड तो हइ हे, बाणसागर घलो नवा जीवन देहे हे ओ क्षेत्र ल। हमर इहां के जउन बांध मन हें, वइसे कहि सकत हस कि पहिली नदिया नाला के सब पानी समुद्र में जाथे, फेर बांध ल हमन बना के वापस ओ ल खेत म भेज देहेन। त ए बांध हर फेर जीवनदायिनी बन गे। पहिली तो नदी के किनारे बसना जरूरी रहिसे, अब तो जरूरत नइए, अब तैं कहूं बस जा, बांध बन गे त पानी तोर इहां पहुंच जाही। अउ जीवनदायिनी नहर घलो बन गे ओ कर शाखा।

सिंह- एक प्रकार के नहर घलउ हर नदिया के ही रूप ए, ओकरे निकास ए। तओ नदिया मन तो जीवनदायिनी हें फेर बांध के रूप म बंधिन अउ फेर नहर के रूप म बन के जीवनदायिनी एक अलग रूप म नदिया मन ही निकलिन। त ए तरह के हमर जीवन बर चाहे ओ हर फसल के रूप म होवय, हमर रोजमर्रा के जिंदगी बर होवय, हमर पूरा सभ्यता बर होवय, ए हर प्रकार से नदिया मन हमर जीवनदायिनी ए अउ कहे गए हे सप्तगंगा कहे गए हे देश के हमर जेन बड़े नदिया, अउ सिर्फ हमर देश म नहीं पूरा दुनिया म चाहे ओ नील नदी होवय या यांगटी सिक्यांग होवय, तओ ए सब नदी ह्वांग-हो नदी होवय,

श्री निगम- मिसिसिपी

सिंह- मिसिसिपी हे। हमर गंगा यमुना सरस्वती तो हइ हावयं, त ए सब मन हमर जीवनदायिनी नदी एं। ए सब नदी मन के स्मरण हर ही अपन आप म एक तीर्थ के लाभ देथे, का बर ए सब मन जीवनदायिनी एं। एकर बारे म जे बड़े बड़े पुण्य तीर्थ बनथें नदी मन धार्मिक रूप से भी ए कर बड़ा महत्व हो जाथे।

श्री ठाकुर- राष्ट्रीय स्तर पर पुराण परंपरा म जउन नदी मन के उल्लेख आए हे अउ जउन ल हम ह सामान्य परंपरा हे कि नहाए के पहिली, चाहे हम गांव के तरिया म नहावत हों, नरवा म नहावत हों, ओ पानी ल धर लेथन ओ म हम ह ओ ल अभिषिक्त करथन, गंगा यमुना याने ओ ए पानी में विराजमान हे, अउ हम फेर ओ पानी ल अपन सिर म लेथन, शरीर म लेथन नहाथन। ये गौरव परंपरा में धर्म के क्षेत्र में महानदी ल कहां तक नइ मिलिस, शिवरीनारायण के आगे तक। मगर ए स्थान में, याने मैं आपसी चर्चा में कह चुके हंव, छत्तीसगढ़ हर हमर पांचरात्र धर्म के सबसे बड़े केंद्र ए और महानदी ओ कर संवाहिका ए, शिवरीनारायण कहथन, ओ शबरी के नो हय ओ बिचारी नासिक के ए शबरी हर ओ सौरी नारायण, विष्णु के एक नाम सौरी हे, चतुर्विंशति रूप, अभी मैं श्रीमदभागवत पढ़त हंव, चतुर्विंशति रूप जउन हे ओ में आदि नारायण, ये कोन ए, जउन विग्रह ए, ओ राजिम में हे, ओही रूप सौरी में हे, शिवरीनारायण में, बिल्कुल अलग-अलग नारायण के रूप ए एमन, अउ जांजगीर तो एकमात्र अइसे जगह ए, जिहां मंदिर में चौबीस विष्णु के चौबीसो स्वरूप के चतुर्विंशति स्वरूप के अंकन हे, ठीक...

सिंह- ए मन ल कई प्रकार के नया नया रूप देथे नदिया हर तओ कइसे ढंग से दिखथे हम ल

श्री निगम- अभी ठाकुर साहब जे बात करिस ओ म एक बात अउ ख्याल आत हे, महानदी जो हमर हे, ओ जगन्नाथ जी के यात्रा के भी नदी ए। आज जगन्नाथ पुरी ल कहिथें, कि जगन्नाथ जी के बड़े केंद्र ए, लेकिन जगन्नाथ जी के मंदिर हे ओ कर पहिली हमर इहां शिवरीनारायण म जगन्नाथ जी के दर्शन हो जाथे। अउ मो ल तो अइसे लगथे कि जगन्नाथ जी हे न, ते छत्तीसगढ़ से ही होत होत जगन्नाथ पुरी पहुंचे हे।

श्री ठाकुर- राय ब्रह्मदेव के समय में राजिम में जगन्नाथ मंदिर दाउजी हर बनाए हे, ए कर अभिलेख हे, बालचंद जैन ओ ल प्रकाशित करे हे, अभी भी दीवाल म ओ लिखे हुए रखे हे ओ कर इहां अउ ओ कर बाद शिवरीनारायण में भी होए हे। तओ दोनों क्षेत्र, जिहां तीन नदिया के संगम मानथन हम परंपरागत रूप से, जिहां भी महानदी के तीन नदिया मन के बीच संगम होए हे ओ पांचरात्र धर्म के केंद्र रहे हे।

सिंह- ए तो नस-नाड़ी भी ए, एक प्रकार के जीवन के प्रवाह हे, जे नस-नाड़ी कहे जाथे नदिया मन ल, कभू अइसनहा जमाना भी रहिस हे कि जब शायद सड़क के अतका इंतिजाम नइ रहिस तओ

श्री ठाकुर- नइ राहुल, सुरता होही आप जानत हौ, जांजगीर के आगे चांपा के रास्ता में हसदो

सिंह- हसदो नहाकथे, जी, जी हां 

श्री ठाकुर- हंस दो, दो हंस, द्वि हंस के कथा अउ ए हसदो कतेक ...

सिंह- ए सब मन तो नदी मन जे प्रकार से जीवन संचार ए, रक्त प्रवाह ए, तइ प्रकार से ए हावयं, ए मन के बताहीं निगम सर

श्री निगम- छत्तीसगढ़ में जो नदी हे, हमन नदी के तो सुरता बहुत करेन, ओ कर वैभव ल गाथा ल, लेकिन यहां कोन कोन नदी हे ओकरो बारे म थोरकन बता देतेव आप।

सिंह- एक सोन ल, सोन के नांव सब ले पहिली मैं लेना चाहिहंव। ओ ए नांव से कि सोन के बारे म अक्सर कहे जाथे कि ए हर अमरकंटक ले निकले हे, अइसनहा लेकिन मान्यता ए, ए हर। सच्चाई ए हे कि ए हर पुराना पेंड्रा जमींदारी के गांव रहिस सोन बचरवार, ए सोन बचरवार हर आज भी छत्तीसगढ़ के हिस्सा ए, जिहां से ए सोन नदी के उद्गम हावय और कुछ हिस्सा ही ए कर छत्तीसगढ़ म होवय लेकिन एकर उद्गम सोन के, छत्तीसगढ़ म हे ओइ नांव से ए कर नांव लेना जरूरी हे सोन के नांव कि जइसे देश म हम ब्रह्मपुत्र के नांव लेथन, तओ ब्रह्मपुत्र ल पुल्लिंग नदी माने जाथे, नदी आमतौर से स्त्रीलिंग ए, लेकिन कुछ नदी अइसनहा हे जे मन ल नदी नहीं, नदी के बदला म नद कहे जाथे त ओ म ब्रह्मपुत्र एक हावय बड़े नद ए, अउ ओ रूप म देखन अगर हम अपन क्षेत्र म, छत्तीसगढ़ म त दूसर शायद सब ले महत्वपूर्ण अउ बड़े नद ए, जे हर सोन ए और अइसनहे हमर इहां शिवनाथ जे हर महानदी के प्रमुख सहायक जलधारा ए ओहू ल पुल्लिंग माने गए हे नद माने गए हे, एक सरगुजा के जल प्रवाह हे कन्हर, कन्हर घलौ ल कहे जाथे ओ कर बारे म मान्यता हे। जशपुर म नदी मन ल ले के बहुत, जशपुर के नदी के कहानी हे, जशपुर से लगे हुए पांच-सात किलोमीटर दूर नदी निकलथे, एक नदी हे सिरी अउ दूसर नदी हे बांकी, दुनों छोट छोट नदी ए, सिरी ल पुल्लिंग माने जाथे, पुरुष नद माने जाथे, ओ कर बहाव के दिशा सीधा हे और बांकी के नाम शायद अइ नांव से बांकी पड़े हे का बर एकर बड़ा सरपीला, टेढ़ा-मेढ़ा एकर बहाव हावय और दुनों के उद्गम एके जगह ले हे एके पहाड़ी ले हे, दुनों ल माने जाथे कि दुनों के चूंकि उद्गम एक ही ए, ते नांव से दुनों ल भाई-बहिनी माने जाथे। त हमर इहां ए नदी मन के स्वरूप ल आमतौर से और नदी मन के पवित्रता हे, मंदिर मन म बहुत महत्वपूर्ण ओ कर एक चित्रण होथे सर, ओ कर बारे म कुछ, नदी मन ल जे स्थान दिए गए हे मंदिर म जेन प्रकार से

श्री निगम- ए हर अइसे लगथे, गुप्त काल म चालू होए रहिस हे। कालिदास अपन कुमारसंभव म लिखे हे कि मंदिर के द्वार में गंगा-यमुना के अंकन करना चाहिए। त ओ परंपरा फेर अइसे चलिस कि हर मंदिर में गंगा-यमुना के अंकन द्वार में हो जाथे अउ अइसे कह सकत हस कि अगर तोर तिर पानी नइए, अउ तैं पवित्र हो के नइ आए, त ओ कर दर्शन मात्र से तैं पवित्र हो गएस, मंदिर म घुसे के पहिली, नदी के दर्शन हो जाथे, ओ कर पूजन हो जाथे त आदमी पवित्र हो जाथे,

सिंह- प्रतीक रूप म हो जाथे। 

श्री निगम- प्रतीक रूप म हो जाथे। त इही सब बात ए अब पुराना सियान मन काए सोच सोच के लिखे हें, बनाए हें ओ तो शास्त्र भी जानथे अउ पुरातत्व भी जानथे, लेकिन आम आदमी ओ ल नइ समझत हे, ओ कर वजह से थोड़ा समस्या हो जाथे त ओ ल जानना भी चाहिए अउ हमर मन के काम बताए के घलो आय।

सिंह- जीवन, नदी मन, पवित्रता के परिचायक ए, हमर धार्मिक विश्वास, सभ्यता के लेकिन निश्चित रूप से अलग अलग ढंग से देखे जाए त मनुष्य के जीवन बर कतका जरूरी ए और कोन प्रकार से ओ मन जीवनदायिनी स्वरूप देथें, ते कर हम ल हमेशा प्रत्यक्ष उदाहरण देखे बर मिलत रथे, चाहे हमर सभ्यता होवय, संस्कृति होवय, हमर खान-पान होवय, हमर यातायात परिवहन ए और जल के आवश्यकता तो हइ हे ओ कर तो पूर्ति करते हावयं, सिंचाई म, खेती बाड़ी म सब जगह तओ ए जीवनदायिनी नदी मन ल हम आज याद करत हन। नदिया मन हमर तो जइसे महानदी हे, राजिम हे, आरंग हे सिरपुर हे, शिवरीनारायण हे, नारायणपुर हे। अइसनहा बहुत अकन स्थान हे जे सिर्फ धार्मिक स्थान नो हय, ए कर संग म व्यापारिक स्थान भी ए, राजधानी भी ए, तओ ओ कर बारे म आपके साथ देखे हुए निगम साहब के

श्री निगम- राजधानी बर अइसे ए कि बहुत जरूरत हे, बहुत पानी लगथे, बिन पानी के राजधानी नइ चल सकय, घर-मकान बनाबे, सेना रइही, घोड़ा रइही, हाथी रइही, ओ कर नहाए धोए बर, खाए पिए बर लगिही, त ए बड़ा अइसे स्थान होना चाहिए, जहां पानी के साधन रहय। और नदिया से बढ़िया साधन तो कुछ हो नइ सकय। जब नदिया नइ रहय त तरिया बना लेथें, लेकिन तरिया म तो इकट्ठा करबे, ए म तो प्रवाहित होत हे। त छत्तीसगढ़ म जब राजधानी के बात चलिस त मोर ख्याल से सबसे जुन्ना राजधानी महानदी के तीर में सिरपुर ह मिलथे। सिरपुर के राजधानी आप देखो ईंटा के मंदिर बने हे उहां। ईंटा के मंदिर का बिना पानी के बना सकिहीं,

सिंह- बहुत जरूरी हे

श्री निगम- बहुत जरूरी हे, भट्ठा लगाए बर, ईंटा बनाए बर, त पूरा राजधानी हर वहां से बने हे, ईंट के मकान भी बने हे वहां, कई ठन मंदिर बने हे अउ अइसे कहे जाथे कि सिरपुर में पहिली अतका खजाना छुपे हे कि पूरा पृथ्वी हर दू दिन तक खा सकत हे, त ए हर महानदी के समृद्धि ए। महानदी के तीर म बस गे, सबे प्रकार के उहां व्यापार भी होत रहिस हे, हम ल जानकारी मिले हे कि वहां अनाज के भंडार रहिस हे। गंध के व्यापारी रहयं वहां, ओकरे नांव से गंधेश्वर महादेव नाम पड़े हे, तओ व्यापारी रहिन हें उहां, चीनी यात्री ह्वेनसांग आए रहिस हे, यात्रा पथ घलो ए। मगध के राजकुमारी के शादी होए रहिस हे इहां के राजा संग, वासटा आए रहिस हे। मगध तक रस्ता रहिस होही तभे तो।

सिंह- चीनी सिक्का, रोमन सिक्का

श्री निगम- चीनी सिक्का, रोमन सिक्का मिलथे, त ए हर व्यापार के बहुत बड़े केंद्र रहिस हे, धर्म के बड़े केंद्र रहिस हे और राजनीति के तो सत्ता रहिबे करिस हे ए म राजवंश के जे भूमिका हे ते तो हइ हे लेकिन ए म बहुत बड़े भूमिका नदी मन के घलो हे अउ ओकरे पाए के आप देखो जहां भी होही राजधानी नगर के नदी के तीर में बसथे।

सिंह- सिरकट्टी ल भी माने जाथे कि बंदरगाह ए, प्राकृतिक रूप से सिरकट्टी म ...

श्री ठाकुर- सिरकट्टी में बंदरगाह डॉ. चन्द्रौल सिद्ध करे हे। फिंगेस्वर करा,

श्री निगम- पांडुका तीर हे। 

श्री ठाकुर- पांडुका के उपर म और वहां नौकायन, नौका से अउ हम जे भुवनेश्वर के संबंध म जे इतिहास हे महानदी के मार्ग से नौका म आदमी आवय, व्यापारी अपन व्यापारिक माल ल ले के आवय, और सरकट्टी म बकायदा बने हुए हे सीधा जा के नाव ह खड़ा होवय अउ अइसे तट के तीर में गड्ढा सीधा, तओ नौका हर अइसे तट के तीर म आ गे, माल उतार चढ़ा, अउ ओकर बाद, ओ हर अइसे गिंजर के अइसे दूसर लाइन म आवय

सिंह- पथरा हावय, संयोग से तट मिल गए हे पत्थर के

श्री निगम- बहुत बढ़िया हे अइसे कि नदिया के तट म पथरा हे पथरा ह घुस गए हे, अइसे लेगबे त तो जमीन मिल जाही नदी के भीतर पथरा मिल गे त ओ ल काट दिन ओ मन, अउ चेनल बना देहे हे, कई ठन डोंगा ल उहां रख सकत हस।

सिंह- धमतरी के पास म लीलर म भी ए प्रकार के माने जाथे कि अइसे व्यवस्था हे

श्री निगम- अइसे लगथे कि पुराना जमाना म ए सब नदी बंदरगाह रहिन हें

सिंह- एक मल्हार के भी नाम मिलथे, मल्लालपत्तन

श्री ठाकुर- मल्लालपत्तन नाम ही सूचक हे कि यहां नदिया के, नौकायन के केंद्र रहे हे, व्यापारिक

सिंह- रोमन सिक्का उहों ले मिले हे, पुराना रोमन सिक्का मिले हे और अलग-अलग तरह के बीड मिलथे, मनका मिलथे

श्री ठाकुर- पुरातात्विक सामग्री के तो भंडार आय

श्री निगम- एक चीज अउ राहुल जी बतावं मैं, छत्तीसगढ़ के नदिया मन के बारे में। पुराण म बड़ा कथा मिलथे, कथा तो नइ, जानकारी बहुत मिलथे। ए बात थोड़ा सा गड़बड़ जरूर रथे कि पुराणकार हर बोलथे कि कोई भी नदिया हर झील से निकलथे, अउ झील हर पहाड़ के तलहटी म बसिही, वहीं से निकलही ओइ पा के जतका नदिया हम पढ़त रहेन स्कूल के जमाना म महानदी, सिहावा पर्वत से निकल के बंगाल की खाड़ी में जाती है, अइसे पढ़त रहेन

सिंह- पुराण मन म अइसनहे नाम मिलथे

श्री निगम- पुराण में तो येही नाम तो नइ मिलय मगर हमर छत्तीसगढ़ के बहुत सारा नदी के नाम मिलथे, मिलान हो जाथे अउ काफी कोसिस करे हें विद्वान मन, जे म चित्रोत्पला, महानदी हो जाथे, शुनि शिवनाथ नदी ए, अरपा हे ओकरो नाम मिलथे कृपा के नाम से, खारुन ल क्रमु बोलथें, त अइसे बहुत सारा नदी मन हें, अभी ठाकुर साहब हरिशंकरी के नाम बताइस, त ए सब हर पुराण म मिलथे, त ए बात से स्पष्ट होथे कि छत्तीसगढ़ के नदिया मन के बारे में पुराणकार जानत रहिस हे, अउ न केवल जानत रहिस, बल्कि बताए हे कि कोन सा नदिया कोन से पर्वत से निकले हे, ओ म थोड़ा से गड़बड़ हो गए हे शायद हमर पुरातत्ववेत्ता अउ भूगोल वाला मन नइ जानत रहिन कोन नदिया कहां से निकलथे, का पाए के जब नदिया पहाड़ से निकलथे त कई ठन धारा आथे, त धारा के कारण भ्रम हो जात रहिस ओ मन ल लेकिन नदिया मन के बारे म जानकारी मिलथे।

श्री ठाकुर- राहुल जी, निगम जी मन जइसे बताइन न कि जइसे पुराण साहित्य में छत्तीसगढ़ के नदिया मन के बारे म उल्लेख मिलथे, बिलकुल मिलथे, ओ कर बारे म कोई कथा नइ मिलय

सिंह- लोक जीवन म खूब कथा हे 

श्री ठाकुर- त ए बिलकुल आप सही कहत हौ, लोकजीवन से जुड़े हे ए हर नदी मन, लोक संस्कृति, नागरक संस्कृति उभय संस्कृति एक साथ 

श्री निगम- छत्तीसगढ़ म दिखथे 

श्री ठाकुर- नदिया मन के माध्यम से मिलथे। 

सिंह- लीलागर बर, सिवनाथ बर, सब बर कहानी हावय, कुछ न कुछ कहानी मिल जाथे, ओ मन ल बड़ा जीवन स्वरूप, ओ मन के मानवीकरण कर के कहानी ओ मन के बहुत प्रचलित हावय।

श्री ठाकुर- लोक संस्कृति में अधिकांश नदी मन के बारे म कहानी मिलथे

श्री निगम- लेकिन ओ ल ठीक से व्यवस्थित करे के आवश्यकता हे। जे म पुराणकार अउ जउन लोक संस्कृति हे, दुनों के जब सम्मिश्रण होही, तब छत्तीसगढ़ के नदिया उपर बहुत सुंदर प्रकास पड़ सकत हे। 

श्री ठाकुर- बिल्कुल सही कहथौ, नागरक संस्कृति अउ लोक संस्कृति दुनों के हम ल दर्शन करे बर, हम ल मिलही

सिंह- दुनों ल शायद मिला के देखे के जरूरत हे, मतलब हमर एक ज्ञान के परंपरा हे, अध्ययन के परंपरा हे, हमर लोक जीवन, हमर अनुभव के परंपरा हावय, अउ ज्ञान के अउ अनुभव के दुनों के एक साथ मिलन जे प्रकृति के रूप म नदी हर हे, सभ्यता के रूप म मानव जीवन हे तओ ए कर सम्मिलन, लेकिन ए सब चीज हर, कहीं न कहीं ए देखे बर मिलथे कि नदी के संग संग होत हावय, नदी के किनारे किनारे म होत हे अउ नदी के पूरा एक अपन संस्कृति हो जाथे, सभ्यता हो जाथे अउ जे कर से सिर्फ न राजनैतिक स्थिति ल, व्यापारिक स्थिति ल भी, आर्थिक स्थिति ल भी अउ जीवन के सांस्कृतिक पक्ष ल हर दृष्टि से नदी के संग जोड़ के देखे जा सकत हे अइसनहा सब हमर नदिया मन हें, हमर जीवनदायिनी नदी मन हें, ठाकुर साहब आप बात म हिस्सा लेय, निगम साहब आपके भी धन्यवाद, बड़ा एक आनंददायक चर्चा रहिस, धन्यवाद।