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Thursday, February 10, 2022

कलचुरि राज परिवार

बात यही कोई 25-30 साल पुरानी है। हमारे बिलासपुर आफिस में एक सज्जन पधारे। दुआ-सलाम के बाद मैंने आने का प्रयोजन पूछा। उन्होंने कहा कि कलचुरियों का इतिहास जानना चाहते हैं। इतने संक्षिप्त के बावजूद समझ में आ रहा था कि ये न पत्रकारों वाली पूछताछ है, न शोधकर्ता की, कोई किताब लिखने वाला प्राणी भी नहीं लगा, प्रश्न करने का ढंग संयत और शालीन था। मैंने जवाब दिया, ढेरों जानकारियां हैं, मगर बिखरी हुई, आपको किस तरह की जानकारी (क्यों?) चाहिए। इस पर जवाब आया, वह चौंकाने वाला था। उन्होंने कहा मैं रतनपुर कलचुरि परिवार का वंशज बड़गांव वाला राजेश्वर सिंह हूं। मेरे सामने हजार साल का इतिहास जीवंत हो गया। बातें होने लगीं, मैंने कहा कि मुझे तो आपसे अपेक्षा है कि आपके परिवार संबंधी इतिहास की कुछ ऐसी जानकारी मिल जाएगी, जिससे हम अभी तक अपरिचित हैं। उन्होंने बताया कि उनके पास ऐसा कुछ नहीं है। मैंने तत्काल, प्रकाशित सामग्री की जो छायाप्रति दी जा सकती थी, उन्हें सौंपा। फोन नं., पता लेन-देन हुआ फिर चाय-पान और विदा। कभी यह किस्सा मंजुसांईनाथ को सुना रहा था, उन्हें इन बातों में कुछ खास दिखा और वे तैयारी में जुट गए, फिर एक दिन बताया कि वे सबसे मिल कर आ गए हैं और इतिहास की बारीकी टटोलने लगे। थोड़े दिन बाद इंडिया टुडे के 12 अक्टूबर 2005 अंक में यह छपा, स्थायी संदर्भ जैसे महत्व का मान कर, सुरक्षित और सार्वजनिक करने हेतु यहां यथावत- 


विरासत  छत्तीसगढ़/कल्चुरी राजवंश 

काल की मार से चूर 

भारत में संभवतः सबसे लंबे समय तक राज करने और छत्तीसगढ़ की संस्कृति तथा जीवन शैली पर 
अपनी अमिट छाप छोड़ने वाले कल्चुरी राजवंश का अब क्रूर नियति से सामना 

भारत में कभी सबसे लंबे समय तक राज करने वाले परिवारों से एक सूर्यवंशी राज परिवार अंधेरों में खोता जा रहा है। लेकिन अटूट आस्था राजेश्वर सिंह को उनके पुश्तैनी गांव महासमुंद जिले के राजा बडगांव में चंडी देवी के उस मंदिर में आशीर्वाद के लिए ले आती है जिनके प्रताप से यह परिवार सदियों तक चमकता रहा।

59 साल की उम्र में भी राजेश्वर सिंह अपने परिवार के अनुकूल प्रतिष्ठा पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। वे छत्तीसगढ़ के भाग्य निर्माता और राज्य के बाशिंदों की जीवन शैली पर अमिट छाप छोड़ने वाले कल्चुरी राजवंश का इकलौता जाना-पहचाना चेहरा हैं। छत्तीसगढ़ की संस्कृति और विशिष्ट जीवन शैली पर यह कल्चुरी प्रभाव ही था कि यह क्षेत्र बहुत पहले शेष मध्य प्रदेश से अलग हो गया था।

कल्चुरी महाभारत काल में हैहयवंशी माने जाते थे। वे चेदि देश के शासक भी थे और संभवतः महाभारत का शिशुपाल उनका पुरखा था। हैहयवंशियों के बारे में अधिकृत प्रमाण दूसरी सदी के बाद तब मिलते हैं, जब वे इंदौर के पास महिष्मती, जो अब महेश्वर कहलाता है, से उभरे। कृष्णराज कल्चुरी वंश का सबसे ताकतवर राजा था और उसी ने इस राजवंश को स्थापित किया।

कल्चुरी राज की सीमाओं के विस्तार का श्रेय कोकल्ल प्रथम को जाता है जिसने अपने राज्य को फैलाया और 8वीं सदी में जबलपुर के पास त्रिपुरी में अपनी राजधानी स्थापित की। इस अवधि के दौरान बाण शासक, जो पल्लवों के सामंत थे, छत्तीसगढ़ में राज कर रहे थे और बिलासपुर के पास पाली उनकी राजधानी थी। इतिहास बताता है कि कल्चुरी वंश के मुग्धतुंग ने छत्तीसगढ़ पर हमला किया और 10वीं सदी में बाण शासकों को पराजित किया। मगर इसके पहले कि कल्चुरी पाली में सुख लूटते, प्रतिशोध से भरे बाण शासकों ने कल्चुरियों पर हमला कर उन्हें हरा दिया और अपने हारे हुए इलाके फिर जीत लिए। मुग्धतुंग के एक उत्तराधिकारी कलिंगराज ने फिर बाण शासकों पर हमला किया और उन्हें छत्तीसगढ़ से खदेड़ दिया। उसने तुम्माण (वर्तमान में बिलासपुर के पास तुम्मान) को राजधानी बनाया। कल्चुरी वंश का सबसे प्रतिभावान शासक कलिंगराज का पौत्र रतनदेव था जिसने बिलासपुर के पास रतनपुर में राजधानी बनाई। यह स्थान आज भी कल्चुरियों की कुलदेवी देवी महामाया के निवास रतनपुर के रूप में मशहूर है। इस वंश का एक और प्रतापी राजा जाजल्लदेव था जिसके नाम से राज्य में जांजगीर जिले का नाम पड़ा था। कल्चुरियों की एक शाखा ने 14वीं सदी में रायपुर की स्थापना की।

मगर 1740 ईस्वी में जब मराठों ने रतनपुर पर हमला कर उन्हें हरा दिया। उस समय रघुनाथ सिंह रतनपुर का राजा था। हार के बाद कल्चुरियों को बड़गांव में जमींदार के रूप में रहना पड़ा। ऐशो-आराम के अभ्यस्त कल्चुरियों को बडगांव से मिल रहे राजस्व से मुश्किल हो रही थी। उन पर तरस खाकर मराठों ने उन्हें पांच गांव गोइंदा, मुढ़ेना, नांदगांव, भालेसर और बडगांव दे दिए और उन्हें कर न चुकाने की भी छूट दे दी। यह व्यवस्था देश के आजाद होने तक जारी रही। भारत के अन्य राजाओं या जमींदारों की तरह बड़गांव के कल्चुरियों के लिए भी आजादी खुश होने का सबब नहीं थी क्योंकि उनके सारे अधिकार छीन लिए गए और उन्हें प्रजा के बराबर कर दिया गया था।

पुरातत्व के उपनिदेशक राहुल कुमार सिंह दावा करते हैं कि कल्चुरी भारत में एकमात्र राजवंश है जिसने सबसे लंबे समय तक शासन किया। उन्होंने 10वीं सदी से 1740 ईस्वी तक यानी करीव 740 वर्ष तक राज किया। छत्तीसगढ़ के नामी इतिहासकार प्रभुलाल मिश्र की राय है, ‘‘कल्चुरी इसलिए सबसे लंबे समय शासक बने रहे क्योंकि उनके पास प्रशासन का बड़ा तामझाम नहीं था और वे सार्वजनिक जीवन में सबसे कम दखल देते थे। सो, लोग भी खुश थे।

मिश्र जोर देकर कहते हैं कि कल्चुरियों ने अपने राज में जातिवाद को कभी भी बढ़ावा नहीं दिया और समाज में मेलजोल की परंपरा बढ़ाई। वे कहते हैं, ‘‘मितान या महाप्रसाद की परंपरा कल्चुरी काल में ही शुरू हुई। छत्तीसगढ़ में ही मिलने वाली मितान परंपरा अनूठी है जिसमें दो भिन्न जातियों के लोग महाप्रसाद में बंधते हैं और मरते दम तक इसे निभाते हैं। इस संबंध को खून के रिश्ते से भी ज्यादा पवित्र माना जाता है।‘‘

छत्तीसगढ़ को उन्होंने अच्छी प्रशासनिक प्रणाली, सांस्कृतिक विकास, मंदिर निर्माण और जलप्रबंधन जैसा बड़ा योगदान दिया। पुरातत्वविद् डॉ. शिवकांत वाजपेयी कहते हैं, ‘अगर हमें छत्तीसगढ़ के गांवों-शहरों में कई तालाब मिलते हैं तो इसकी वजह कल्चुरी है।‘‘

इतने शानदार अतीत वाला यह परिवार आज बडगांव के एक कोने और मुढ़ेना गांव में एकांत जीवन जी रहा है। मुढ़ेना के एक जीर्ण-शीर्ण घर में राजेश्वर सिंह पत्नी, दो बेटों और 94 वर्षीया मां तथा भतीजे के साथ रहते हैं। उन्होंने अब गरीबी को ही अपनी नियति मान लिया है। राजेश्वर कहते हैं, ‘‘निश्चित ही हमें हमारा अतीत कचोटता है। पर हमारे पुरखे छत्तीसगढ़ के राजा थे, इस तथ्य से हमें रोटी नहीं मिलती। हमें संघर्ष करना पड़ता है, इसलिए संघर्ष कर रहे हैं। मौजूदा हालात हमारे अतीत के अनुसार नहीं हैं मगर इसे हमने अपनी जिंदगी का तरीका मान लिया है।‘‘

संपत्ति के नाम पर राजेश्वर के पास 30 एकड़ जमीन और महानदी के तट पर एक खान का पट्टा है। वे भी अन्य कल्चुरियों की तरह हैं जो शासक से किसान बन गए हैं। रायपुर के साइंस कॉलेज से स्नातक राजेश्वर ने एक बार राजनीति में भी भाग्य आजमाया मगर उसने साथ नहीं दिया। वे कहते हैं, ‘‘मैं कांग्रेस का कार्यकर्ता और विद्याचरण-श्यामाचरण शुक्ल का समर्थक था पर जब 1985 में मुझे टिकट नहीं दिया गया तो मैं निर्दलीय लड़ा।‘‘ नतीजा. वे भारी वोटों से हारे और इस हार से करीब दो लाख रु. की चपत लगी। इस नुक्सान ने उन्हें तोड़ दिया। फिर भी राजनीति से उनका प्रेम खत्म नहीं हुआ है। समय-समय पर उन्होंने पंचायत तथा अन्य स्थानीय निकायों के चुनाव लड़े। पर एक मामले में कल्चुरियों ने समझौता नहीं किया है, वह यह कि वे अभी भी अतीत के शाही परिवारों से ही वैवाहिक रिश्ते रखते हैं।

हैहयवंशी कल्चुरी परिवार अब बिखर गया है। राजेश्वर के बड़े भाई दलगंजन सिंह सहायक खाद्य अधिकारी पद से रिटायर होकर रायपुर में रह रहे हैं। रिटायर्ड स्कूल इंस्पेक्टर मनोरंजन सिंहदेव कांकेर में हैं, आदिमजाति कल्याण विभाग से सेवानिवृत्त एकाउंटेंट बसुरंजन सिंह महासमुंद में रहते हैं जबकि भूपेंद्र सिंह बड़गाव में किसान हैं। कल्चुरी वंश के एक सदस्य चंद्रध्वज सिंह एक प्राइवेट फर्म में सुपरवाइजर हैं। सत्यवान सिंह बडगांव के पास अच्छीडीह में किसानी करते हैं और लाल शिवकुमार सिंह बैंक अधिकारी पद से सेवामुक्त होकर भालेसर में बसे हैं। परिवार के एक और वंशज शिवनारायण सिंह ओडीसा के बलांगीर की एक फैक्टरी में हैं जबकि दो भाई नरेंद्र सिंह तथा महादेव सिंह बडगांव के पास गोइंदा में कृषक हैं।

राजेश्वर सिंह तथा कल्चुरी वंश के दूसरे उत्तराधिकारियों के लिए इतिहास प्रेरणास्पद, प्रसन्न करने वाला और क्रूर भी है।
-जी. मंजूसाईनाथ

परिशिष्ट- 
यह पोस्ट लगाते हुए कुछ संकोच हो रहा था, क्योंकि इस राज परिवार के 700 वर्ष के इतिहास और स्थिति की वर्तमान से कोई तुलना नहीं हो सकती, इसका औचित्य भी नहीं है। परिवार के लाल विजय सिंहदेव जी से मेरा परिचय रहा है और इस पोस्ट के बाद अन्य सदस्यों से भी संपर्क हुआ। महसूस हुआ कि व्यवहार में अब भी गरिमा और शालीनता के साथ सहज-सरलता की कोई कमी नहीं है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि संभवतः छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान में परिवर्तन, इस परिवार के आधिपत्य के बाद तेजी से आया, इसलिए परिवार के सदस्यों से मिलना और बात करना, ऐसा महसूस होता है कि छत्तीसगढ़ के गरिमामय और सौहार्द के सदियों पुराने, प्रतिष्ठापूर्ण इतिहास से जुड़ना है। इस दौरान पोस्ट पर ललित शर्मा जी की महत्वपूर्ण टिप्पणी आई है, जो वस्तुस्थिति को तार्किक ढंग से स्पष्ट और अद्यतन करती है, यहां जोड़ी जा रही है-

स्व: राजेश्वर जी सम्पन्न थे, तभी 1986 में 2 लाख रुपये खर्च कर निर्दलीय चुनाव लड़े थे। इनके पास सबसे बड़ी फर्शी माइंस थी, तब 300 लेबर काम करते थे। आज भी सबसे बड़ी माइंस उन्हीं की है मूढ़ेना में। उनमे दो खानों में लगभग 150 लोग काम कर रहे होंगे। आज 4 फैक्टरी और सबसे बड़ी 2 खदान मूढ़ेना का उन्ही के भतीजों और उनकी पत्नी की है। इनके भतीजे रायपुर देवेन्द्र नगर में हैं। लाल विजय सिंह की एक फैक्ट्री कलचुरी स्टोन नाम से है पर्याप्त जमीन भलेसर में है। 20 एकड़ खेती व 5 एकड़ आम जाम सीताफल का है बड़ा घर है। राजेश्वर सिंह जी का भी मूढ़ेना में बड़ा घर है।। लेकिन एकदम ही हालत बुरी है करके छपा है। स्थिति उतनी भी खराब नही थी जितना इन्होंने कहा। इस परिवार से 1 ibm में स्वीडन में है 2 सॉफ्टवेयर में, मेट्रो सिटी पुणे बंगलोर में हैं एक कांकेर नरहर देव में व्याख्याता हैं, एक sdo रैंक नगर निगम रायपुर में हैं, देवगढ़, सरायकेला, चिल्कीगढ़,पालकोट, चंद्रपुर और अम्बिकापुर के शंकरगढ़ लगभग हर जगह रिश्तेदारी है। कुल मिलाकर वर्तमान में स्थिति अच्छी है।

Wednesday, November 24, 2021

समडील ताम्रपत्र

इस ताम्रपत्र की जानकारी समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, शोध-जर्नल तथा ‘उत्कीर्ण लेख‘ पुस्तक के परिवर्धित संस्करण, 2005 में प्रकाशित है।

जाजल्लदेव द्वितीय का समडील से प्राप्त ताम्रपत्र लेख कलचुरि संवत्: 913
- राहुल कुमार सिंह, बिलासपुर
तब कागज-पेन का अभ्यास था, अपने लिखे का,
टाइप से अधिक साफ और त्रुटिरहित का भरोसा होता था।

दो ताम्रपत्रों का यह सेट सन 1992 के जुलाई माह में जिला मुख्यालय बिलासपुर से 25 किलोमीटर दूर समडील नामक ग्राम (गनियारी के निकट) में स्थानीय कृषक श्री लखनलाल पटेल आत्मज श्री अमृतलाल पटेल को कृषि कार्य के दौरान प्राप्त हुआ था1 जिसे जिला पुरातत्त्व संग्रहालय, बिलासपुर के वरिष्ठ मार्गदर्शक श्री ए.एल. पैकरा ने 27 दिसम्बर 1994 को स्थल से संकलित किया2। ये ताम्रपत्र वर्तमान में जिला पुरातत्त्व संग्रहालय, बिलासपुर के संग्रह में सुरक्षित हैं, जिनका सम्पादन मूल ताम्रपत्रों के आधार पर प्रथमतः यहाँ किया जा रहा है3

उक्त दोनों ताम्रपत्रों का समानान्तर अधिकतम आकार 30.5X20.5 सेंटीमीटर तथा वजन कुल 3 किलोग्राम है। दोनों पत्रों को आपस में सम्बद्ध करने के लिए प्रथम पत्र के निचले एवं द्वितीय पत्र के ऊपरी हिस्से में छेद है, किन्तु ताम्रपत्रों के साथ राजमुद्रा-छल्ला प्राप्त नहीं हुआ है। दोनों पत्रों के अन्तःपृष्ठ उत्कीर्ण तथा वाह्य पृष्ठ सपाट हैं। प्रत्येक पत्र का किनारा, अक्षरों को घिसने से बचाने के लिए उठा हुआ है। ताम्रपत्र लेख संतोषजनक संरक्षित स्थिति में है। 

ताम्रपत्रलेख के प्रथम पत्र पर 18 पंक्तियाँ तथा द्वितीय पत्र पर 17 पंक्तियाँ, इस प्रकार कुल 35 पंक्तियाँ उत्कीर्ण हैं। लेख की लिपि नागरी तथा भाषा संस्कृत है। तत्कालीन अन्य कलचुरि लेखो4 की भांति इस लेख में भी ‘श‘ के स्थान पर ‘स‘ तथा ‘ब‘ के स्थान पर ‘व‘ जैसी भूलें हुई हैं। आरंभ व अंतिम भाग के अतिरिक्त पूरा लेख 22 श्लोकों में छन्दोबद्ध है। 

लेख के आरंभ में5 ब्रह्म का नमन है। प्रारंभिक 12 श्लोकों में, तत्कालीन अन्य कलचुरि लेखों की भाँति शिव स्तुति तथा रत्नपुर शाखा के कलचुरियों की वंशावली है। इसके पश्चात के 3 श्लोकों में लेख का उद्देश्य निहित है, जिसके अनुसार अत्रि कुल में उत्पन्न जास्त के पौत्र तथा राणि के पुत्र राजसिंह को सूर्यग्रहण के अवसर पर एवडी मंडल में स्थित खूडाघट नामक ग्राम, जाजल्लदेव (द्वितीय) द्वारा दान दिया गया। बाइसवें अंतिम श्लोक में लेख के रचयिता वास्तव्य वंश में उत्पन्न वत्सराज के पुत्र नयतत्त्ववेत्ता धर्मसिंह का नामोल्लेख है। अंत में तिथि, कलचुरि संवत् 913 के माघ मास का सूर्यग्रहण तथा लेख उत्कीर्ण करने वाले का नाम चंद्रक आया है।

पूर्व लेखों में6 रचयिता का नाम धर्मराज तथा जंडेर ग्राम का उल्लेख मिलता है। इस लेख में जंडेर ग्राम का उल्लेख नहीं है तथा लेख रचयिता का नाम धर्मसिंह आया है, उसे पूर्व लेखों के रचयिता से अभिन्न मानना चाहिए। इसी प्रकार इस लेख को उत्कीर्ण करने वाले का नाम चंद्रक को पूर्व लेखों7 के चंद्रक से अभिन्न माना जा सकता है। लेख में आये स्थान नामों में एवडी मंडल पूर्व ज्ञात है8 यह क्षेत्र बिलासपुर-मुंगेली तहसील का पूर्वाेत्तर हिस्सा होना चाहिए9। दान में दिए गए ग्राम खूडाघट नाम का समीकरण रतनपुर के पास स्थित बांध स्थल खुंटाघाट या ग्राम खुटाडीह से किया जा सकता है10

लेख का काल, कलचुरि संवत 913 (ईस्वी सन् 1161-62) विशेष महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसके पूर्व अमोरा ताम्रपत्र11 से जाजल्लदेव द्वितीय की तिथि कलचुरि संवत 912 मानी गई थी, किन्तु बाद में ब्रह्मदेव के रत्नपुर शिलालेख12, कलचुरि संवत् 915 को जाजल्लदेव द्वितीय के पिता पृथ्वीदेव द्वितीय के राजत्वकाल का माना गया और मुख्यतः इसी आधार पर अमोदा ताम्रपत्र की तिथि कलचुरि संवत 919 मान ली गई13। पूर्व प्राप्त अभिलेखों से14 पृथ्वीदेव द्वितीय के राज्यकाल की अंतिम सुनिश्चित तिथि कलचुरि संवत 910 है। ब्रह्मदेव के रत्नपुर शिलालेख, कलचुरि संवत 915 का कुछ हिस्सा पूरी तरह घिसा हुआ है और इसके संपादन के अवसर पर भी मूल शिला के धैर्यपूर्वक परीक्षण से ही पूरे लेख का सामान्य अनुमान कर पाना संभव हो सका था15। इस लेख में पृथ्वीदेव (द्वितीय) का नामोल्लेख अवश्य है, इसीलिए अन्य प्रमाणों के अभाव में इसे, उसके काल का मान लिया गया होगा, किन्तु लेख के घिसे हिस्से में जाजल्लदेव द्वितीय के राजत्व काल होने का उल्लेख अवश्य रहा होगा।

इस प्रकार इस ताम्रपत्र लेख की प्राप्ति से कलचुरियों की रत्नपुर शाखा के इतिहास में जाजल्लदेव द्वितीय के राजत्वकाल की तिथि सुनिश्चित होती है, जिसके आधार पर अन्य उपरोल्लिखित अभिलेखों की तिथि व शासक-राजत्वकाल का निर्धारण सुगमतापूर्वक संशोधित हो जाता है।

टिप्पणियाँ
1. ग्राम के पूर्वी हिस्से में शिवसागर तालाब के किनारे आधुनिक मंदिर में कलचुरि कालीन शिवलिंग स्थापित व पूजित है तथा ग्राम से अन्य स्फुट पुरावशेष व ई. 3-4 सदी के ताँबे के चौकोर गज-देवी प्रकार के सिक्के भी प्राप्त हुए हैं, जो स्थल की प्राचीनता प्रमाणित करने में पर्याप्त हैं। 
2. संकलन में स्थानीय सरपंच श्री विष्णु जायसवाल एवं बिलासपुर के श्री रमेश प्रसाद जायसवाल का सहयोग प्राप्त हुआ था।
3. ताम्रपत्र संबंधी आरंभिक जानकारी स्थानीय समाचार पत्रों में तथा ‘कलचुरि राजवंश और उनका युग‘- 1998 में लक्ष्मीशंकर निगम के लेख ‘दक्षिण कोसल के कलचुरि‘ पृ.- 126 पर दी गई है।
4. कार्पस इन्सक्रिप्शनम इण्डिकेरम - 1955, खंड-IV , भाग-II के लेख।
5. यथोक्त - अन्य लेखों की भांति सिद्धि चिह्न नहीं है।
6. का.इ.इ. IV (II) लेख क्र.- 99 तथा प्राच्य प्रतिभा V (I) जनवरी ‘77 पृ. 105-111।
7. का.इ.इ. IV (II) लेख क्र.- 92 तथा 94।
8. का.इ.इ. IV (II) लेख क्र.- 89।
9. एवडी मंडल के ग्राम पंडरतलाई की पहचान, वर्तमान के मुंगेली अनुविभाग के ग्राम पांडातराई से होती है।
10. का.इ.इ. IV (II) लेख क्र.- 95 में पर्वत (तल) को बांधकर सरोवर निर्मित कराये जाने का उल्लेख है।
11. एपिग्राफिया इंडिका, भाग-XIX, पृष्ठ 209-214।
12. का.इ.इ. IV (II) लेख क्र.- 96।
13. का.इ.इ. IV (II) लेख क्र.- 99।
14. का.इ.इ. IV (II) लेख क्र.- 95।
15. का.इ.इ. IV (II) लेख क्र.- 96।
राइस पेपर पर बॉल पेन से
पांच प्रतियां बन जाती थीं, इस तरह।

• कलचुरियों की राजधानी रतनपुर के पास, खारंग नदी पर बांधा गया खारंग जलाशय, ‘खूंटाघाट बांध‘ नाम से जाना जाता है। बांध के बाद खारंग नदी, अपना नाम-पहचान खोई सी बिलासपुर की ओर बढ़ती है और लाल खदान के आगे अरपा नदी में मिल जाती है। दो धाराओं के इस संगम स्थल के गांव का नाम ही दुमुंहानी है। कहा जाता है इस जलाशय में कुछ गांव, डूब में आए और झाड़-झरोखे भी। पानी में डूबे पेड़ ठूंठ बन गए, खूंटों की तरह और नाम पड़ा खूंटाघाट। इससे लगता है कि यह नाम 'खूंटाघाट', बांध बनने के समय का, सिर्फ सौ साल पुराना है। जबकि इस ताम्रपत्र और अन्य अभिलेखों से यह स्पष्ट होता है कि रतनपुर में सात-आठ सौ साल पहले कोई बांध था, खूडाघट नामक गांव भी था और उसी की स्मृति-छाया, वर्तमान खूंटाघाट बांध और खूटाडीह ग्राम है।

शासकीय अभिलेखों के अनुसार इस खारंग जलाशय (संजय गांधी) बहुउद्देशीय वृहद परियोजना का प्रारंभ 1920-21 और पूर्णता 1930-31 है। डुबान क्षेत्र के कुल 28 ग्रामों में 7 पूर्ण, 21 आंशिक प्रभावित हुए। सिंचाई विभाग से प्राप्त 28 गांवों की सूची में क्रमांक 9, 15, 16, 24, 27 और 28 के गांवों को पूर्ण डुबान और अन्य 22 गांवों को आंशिक डुबान का बताया गया है। आंशिक डुबान के गांवों में क्रमांक 26 पर खूंटाघाट का नाम है।

हकीकत का अफसाना- कोई 30 साल पहले किसी दिन बिलासपुर, गोंड़पारा यानि राजेंद्रनगर वाले अपने दफ्तर में मेज पर के कागज-पुरजों की छंटाई करते हुए एक परची मिली, जिस पर कुछ लिखा हुआ था, जिज्ञासा हुई कि अजनबी सी यह किसकी लिखावट है। पूछने पर बताया गया कि कुछ दिन पहले एक किशोर आया था, उसने यह छोड़ा था, बताना भूल गए थे। मेरी पूछताछ का कारण था कि पुरजे पर की लिखावट, पुरानी नागरी लिपि की नकल है, साफ तौर पर पहचानी जा सकती थी। तुरंत हरकत जरूरी हो गया। कार्यालय के सहयोगियों ने याद कर बताया कि रमेश जायसवाल नाम था, सिंधी कालोनी में कहीं रहता था। उसकी खोज में निकले, ज्यादा मशक्कत नहीं हुई, रमेश मिल गए। बताया कि मामा के यहां समडील गए थे, तांबे के स्लेट पर लिखावट की जानकारी मिली, देखने गए और कुछ हिस्से की नकल बना ली थी, वही पुरजा छोड़ कर आए थे।

अगले ही दिन सुबह रमेश को साथ ले कर समडील जा कर गांव के देव-स्थलों, खेत-खार देखते लखन पटेल के घर पहुंचे। लखन ने ताम्रपत्र सहजता से दिखा दिया, फोटो और नाप-जोख भी करने दिया। बातें होने लगी। इस पर उसने बताया कि उसके कोई आल-औलाद नहीं थी। कुछ बरस पहले खेत जोतते यह मिला, उसे वह घर ले आया, पूजा-पाठ की जगह पर रख दिया। इसके बाद संतान प्राप्ति हुई, तब से इस ताम्रपत्र की पूजा-प्रतिष्ठा और बढ़ गई। ताम्रपत्र को संग्रहालय के लिए प्राप्त करना था, लेकिन लगा कि मामला संवेदनशील है, नियम-कानून के लिए बेसब्री करना ठीक नहीं होगा और करना भी हो तो, अभी वह अवसर नहीं है।

वापस बिलासपुर लौटकर इस ताम्रपत्र के मजमून पर मशक्कत शुरू हुई। कार्यालय के वरिष्ठ मार्गदर्शक श्री पैकरा साथ नहीं जा पाए थे, अफसोस करने लगे और जा कर स्थल और ताम्रपत्र देखने की इच्छा व्यक्त की। लोक-व्यवहार वाले कामों में श्री पैकरा की कार्य-कुशलता को मैंने अधिकतर अपने से बेहतर पाया है। मैंने उन्हें काम सौपा कि वहां जाएं तो स्वयं भी ग्राम और स्थल निरीक्षण का एक नोट बनाएं (उद्देश्य था कि पहले गांव और लोगों से मिलते-जुलते स्वयं वहां से आत्मीयता महसूस करें) और लौटने के पहले ताम्रपत्र देखने लखनलाल से मिलने जाएं। साथ ही यों मुश्किल है, लेकिन प्रयास करें (ऐसी चुनौती से उनका उत्साहवर्धन होता है) कि बिना किसी दबाव के ताम्रपत्र संग्रहालय के लिए प्राप्त हो जाए।

पैकरा जी तालाब, डीह, खेत-खार करते गांव में घूम-फिर कर लखनलाल के पास पहुंचे। लखनलाल ने ताम्रपत्र दिखाया और उसके साथ का किस्सा पूरे विस्तार से सुनाया। ताम्रपत्र मिले हैं तब से जमीन खरीद ली, लंबे समय बाद संतान हुआ। कुछ गांव वाले भी आ गए। उन्हें लगा कि इस ‘बीजक‘ में जरूर किसी खजाने का पता है, जिसके चक्कर में आया कोई फरेबी है। उत्तेजित गांव वालों को श्री पैकरा ने समझाइश और थोड़ी अमलदारी का रुतबा बताया। बातचीत होने लगी। पैकरा जी ने अपना पूरा नाम बताया अमृतलाल, संयोग कि लखनलाल के पिता का नाम भी अमृतलाल ही था। लखनलाल को फैसला करते देर न लगी। पुरखों का आशीर्वाद, वंश चलाने अब बाल-बच्चे, लोग-लइका तो आ ही गए हैं और पिता-पुरखा के सहिनांव पिता-तुल्य अमृतलाल इस ताम-सिलेट को लेने आ गए हैं। सहर्ष ताम्रपत्र पैकरा जी को सौंप दिया।

ताम्रपत्र, बिलासपुर संग्रहालय के संग्रह में है। रमेश जायसवाल, बिलासपुर निगम के पार्षद बने, जन-सेवा में लगे हैं। श्री पैकरा अब मुख्यालय रायपुर में उपसंचालक पद का दायित्व निर्वाह कर रहे हैं। समडील के तत्कालीन सरपंच विष्णु जायसवाल जी के पुत्र हेमंत जी से पता लगा, लखनलाल जी घर-परिवार सहित राजी-खुशी हैं। मैंने ताम्रपत्र पर तब शोध-पत्र लिखा और अब आपके लिए ‘पेशे-खिदमत‘ यह किस्सा कह रहा हूं।

Saturday, October 30, 2021

कोटगढ़

मध्य मैदानी छत्तीसगढ़, यानि मुख्यतः वर्तमान रायपुर, बिलासपुर और दुर्ग संभाग के छत्तीस गढ़, राजस्व प्रशासन की वह इकाइयां है, जो कभी रतनपुर मुख्यालय से संचालित, खालसा कहलाती थीं। इन गढ़ों की संरचनाओं में से कुछ मूलतः मराठों के पूर्वकालिक कलचुरियों द्वारा स्थापित किये गये होंगे, जैसा कि पुरातात्विक प्रमाणों से अनुमान होता है। इनके संबंध में सिलसिलेवार इतिहास, इससे संबंधित प्रशासनिक व्यवस्था और गढ़-किलों में जीवन शैली, संरचना पर निश्चित ढंग से कुछ कह पाना आसान नहीं। इस स्थिति में ऐसे केंद्रों- किलों के संबंध में ग्रामवासियों की जिज्ञासा, विभिन्न दंतकथाएं गढ़ लिया करती हैं। कुछ तथ्य पीढ़ियों से चले आकर कथानक का रूप ले लेते हैं और इतिहास की सीमित सूचना एवं प्राप्तियां, इन स्थलों के संबंध में किस्सों की मदद से कुछ कह सकने का आधार बनती है।

कोटगढ़, जांजगीर-चांपा जिले के अकलतरा-बलौदा मार्ग पर स्थित है। कोटगढ़ वस्तुतः कोट और गढ़ इन दो शब्दों से मिलकर बना है। इसमें कोट- आबादी वाला हिस्सा और गढ़- किले का भाग है। इससे प्रतीत होता है कि प्राचीन काल में ‘गढ़’ प्रशासनिक सेना प्रमुख व सैनिक कर्मचारियों का स्थान था जबकि किले से संबंधित सामान्य जन किले के उत्तर पूर्व में वर्तमान कोट, बरगवां एवं महमदपुर गांव के हिस्से में निवास करते थे। संलग्न गांव खटोला है, जिसे गढ़ के चारों ओर की ‘खाई का टोला‘ माना जा सकता है।

माना जाता है कि कलचुरीकालीन शिवनाथ के उत्तर में स्थित अठ्ठारह प्रमुख प्रशासनिक केन्द्रों में कोटगढ़ भी एक था। गढ़ के अधिकारी दीवान कहलाते थे और कोटगढ़ के अंतर्गत चौरासी गांव, बारह-बारह गांव के सात बरहों में विभाजित थे। अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में मराठा काल में अकलतरा, प्रशासनिक इकाई बना, जिसके अंतर्गत तिरसठ गांव थे। संभवतः यह कालांतर में कोटगढ़ का मुख्यालय बन गया था। उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभ में अंग्रेज शासकों ने खरौद, अकलतरा, खोखरा, नवांगढ़, जांजगीर, किकिरदा, परगनों के चार सौ उन्चास गांवों को मिलाकर एक परगना- खरौद बना दिया। कसडोल से नियंत्रित होने वाला खरौद परगना, शिवरीनारायण तहसील बना। बाद में यही जांजगीर अनुविभाग और अब जांजगीर-चांपा जिला है।

कोटगढ़ का किला इस क्षेत्र के अधिकतर किलों की भांति ही ‘धूलि दुर्ग’ की श्रेणी का है यानि मृत्तिका-दुर्ग, मिट्टी की चौड़े-ऊंचे प्राकार, रक्षा दीवार वाला। ऐसे अन्य गढ़ों की अपेक्षा यह अधिक सुरक्षित अवस्था में हैं जिससे इनकी संरचना समझने के लिये यह प्रतिनिधि संरचनाओं में से एक है। इसका लगभग पचास फीट ऊंचा मुख्य परकोटा, प्रायः सुरक्षित है। इस परकोटे के बाहर पचास फीट चौड़ी खाई- परिखा, चारों तरफ से रक्षा की एक महत्वपूर्ण पंक्ति के रूप में अब भी विद्यमान है यद्यपि कुछ स्थानों पर खाई पट गई है। इस खाई के बाहर दूसरा बाहरी परकोटे का अंश भी अभी विद्यमान है। इस प्रकार यदि क्रमशः बाहर से रक्षा पंक्तियों की गणना की जाय तो प्रथम परकोटा, खाई, मुख्य परकोटा और पुनः खाई तथा इसके बाद गढ़ के बीचों-बीच गढ़ीदार का स्थान। इन सुरक्षा पंक्तियों में तब सशस्त्र सैनिक, खाई में पानी के जन्तु और विभिन्न बाधक वनस्पति भी हुआ करती थी।

किले के अन्दर प्रवेश के लिये दो द्वार- पूर्व व पश्चिम दिशा में हैं। इसमें पूर्वी प्रवेश द्वार, प्रमुख मार्ग है जबकि पश्चिमी द्वार आज भी चोरनी दरवाजा के नाम से जाना जाता है। मुख्य प्रवेश द्वार स्पष्टतः मराठा काल की देन है। मेहराब वाला यह प्रवेश द्वार पत्थर व गारे की जुड़ाई से निर्मित है। जिसमें नक्काशी वाले पत्थर की संरचना भी है। प्रवेश द्वार के ऊपर हिस्से में बन्दूक की नली बाहर निकालने के लिये बनाये गये लम्बवत तिरछे छेद हैं। प्रवेश द्वार से अंदर प्रवेश करने पर लगभग सौ मीटर लम्बा संकरा दर्रा दिखाई पड़ता है और इसके पश्चात् किले के अंदर का विशाल खुला प्रांगण है। प्रांगण के लगभग बीचों बीच टीला है जिसके चारों तरफ भीतरी खाई की रेखाओं का स्पष्ट अनुमान किया जा सकता है। कहा जाता है कि तब बाहरी खाई जलमोंगरा, जलकुंभी, मगर, पानी वाले सांप, जैसे प्रतिरोधी जन्तु वनस्पतियांे से पूर्ण हुआ करती थी। मुख्य द्वार मजबूत लकड़ी एवं लोहे की पट्टियों से बना विशाल पटरा था, जिसमें बाहर की ओर बड़े-बड़े लोहे के भाले निकले रहते थे। किले से संबंधित सेना या व्यक्तियों के प्रवेश हेतु यह पटरा दोनों किनारे पर लगी मोटी-मोटी जंजीरों को छोड़कर खाई के ऊपर गिरा दिया जाता था और बाद में पुनः उन्हीं जंजीरों को खींचकर मुख्य प्रवेश द्वार बंद कर दिया जाता था।

बाह्य आक्रमण की रोकथाम के लिये बाहरी परकोटा था, जिस पर सशस्त्र पहरेदार हुआ करते थे फिर प्रतिरोधी मुख्य खाई तथा उसके बाद मुख्य परकोटा था। मुख्य परकोटे से आक्रमणकारी के प्रयास को विफल करने के लिये परकोटे पर सैनिकों के अलावा पत्थर के टुकड़ों का ढेर और खौलता हुआ तेल तैयार रखा जाता था। यदि आक्रमणकारी मुख्य द्वार से प्रवेश करना चाहे तो खाई के बाद भाले युक्त पटरा बाधक बनता था और ऊपर से भी उन पर वार किया जा सकता था। यदि आक्रमणकारी प्रवेशद्वार से अन्दर प्रवेश कर भी जाय तो लम्बे और संकरे दर्रे में भी उसके लिए व्यवधान होता था। किले के भीतरी प्रांगण में सैनिकों का विशाल समूह होता था इसके पश्चात पुनः भीतरी खाई पार कर ही आक्रमणकारी गढ़ीदार तक पहुंच सकता था। सुरक्षा के दो अन्य साधनों के रूप में चोरनी दरवाजा और कथित सुरंग का उपयोग किया जाता था। बताया जाता है कि उस सुरंग का दूसरा मुहाना अकलतरा के महल (हाथी बंधान) में खुलता था।

पुराने विवरणों में बताया गया है कि परम्परा में यह किला जयसिंह का कहा जाता था। कलचुरि परिवार के सामंत-प्रशासक अकलदेव का नाम भी परंपरा में है, जिसके नाम पर अकलतरा, बसा माना जाता है। संभवतः जयसिंह-अकलदेव कलचुरिकालीन गढ़ीदार थे जबकि मराठाकालीन गढ़ीदारों में अंतिम भुवनेश्वर मिश्र बताए जाते हैं। कसडोल मिश्र परिवार के सदस्य पुनेश्वर जी से जानकारी मिली कि उनके पूर्वज निहाल मिश्र थे, उनकी पीढ़ी में क्रमशः पतिराम, गोविंद, देवनाथ (जिनकी हत्या का आरोप सोनाखान के नारायण सिंह पर था) के बाद भुवनेश्वर मिश्र तथा उनके पुत्र रूद्रदत्त थे। 1909-10 के रायपुर जिला गजेटियर में निहाल मिश्र का नाम आया है, जिनके वंशज शिवदत्त के पास 17 गांव व उनके चचेरे भाई हेमराम के पास 15 गांव, इस प्रकार कसडोल मिश्र परिवार के पास कुल 32 गांव होने की जानकारी दी गई है। भुवनेश्वर मिश्र की वीरता की कहानी और उनका नाम आज भी दंतकथाओं में जीवित है। इनके प्रशासन, सैन्य व्यवस्था और देवी शक्ति की कहानियां, लोग आज भी कहते है। कहा जाता है कि भुवनेश्वर मिश्र की पत्नी को देवी का वरदान प्राप्त था। दंतकथाओं प्रचलित है कि बिलईगढ़ और सोनाखान के जमींदारों से भुवनेश्वर मिश्र का द्वेष था। बरसात की एक रात को किले के ही किसी व्यक्ति का सहयोग लेकर बिलईगढ़ जमींदार किले में प्रविष्ट हो गये और किसी तरह नींद में डूबे मिश्र दंपति तक पहुंच गए। जमींदार ने ज्यों ही तलवार से मिश्र जी के गले पर प्रहार किया, तलवार स्पर्श के पूर्व ही रुक गई, कई प्रयासों के बावजूद भी जमींदार को सफलता नहीं मिली। इस आलौकिक घटना से हतप्रभ जमींदार उलटे पांव बिलईगढ़ लौट गए।

जीवन के अंतिम दिनों में भुवनेश्वर मिश्र की धर्मपत्नी, उनका साथ छोड़ चल बसीं। बताया जाता है कि इसके बाद मिश्र जी में मानसिक अस्वस्थता के लक्षण दिखाई पड़ने लगे थे। खेल प्रेमी भुवनेश्वर मिश्र डुडवा-बरौंछा (कबड्डी के रूप) का निमंत्रण भिजवाकर आये हुए लोगों को तलवार निकाल कर मार डालने की धमकी दिया करते थे और तुरंत ही भाईचारे का प्रदर्शन करने लगते। अंततः भुवनेश्वर मिश्र को फिरंगियों का सामना करना पड़ा। कहा जाता है कि मिश्र जी सुरंग या चोरनी दरवाजे के मार्ग से अपनी स्वामिभक्त घोड़ी ‘बिजली’ सहित अकलतरा महल यानि हाथीबंधान आ गए। फिरंगियों की इसकी खबर मिल गई और मिश्र जी यहां पुनः घेर लिए गए। गिरफ्तार हुए मिश्र जी ललकारते रहे कि उन्हें उनकी ‘बिजली’ मिल जाये फिर कोई हाथ लगाकर बताए, तुम बारहों फिरंगियों के सिर, धड़ से अलग दिखाई देगें। फिरंगियों ने मिश्र जी की एक न सुनी और फिर उनका क्या हश्र हुआ इसकी खबर किसी को नहीं लगी।

इस गढ़ व आसपास मराठाकालीन अवशेषों विद्यमान हैं और प्राचीनतम तिथि निर्धारण के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की कनिंघम रिपोर्ट के अनुसार इस किले की प्राचीनता यहां के एक शिलालेख की लिपि के आधार पर लगभग एक हजार साल निर्धारित की जा सकती है। विभिन्न आकार की सिलें, अन्न पीसने की पत्थर की चकरी, मनके, ईटें, बर्तनों के टुकड़े व मूर्तिशिल्प आदि को दृष्टिगत रखते हुए इस किले की प्राचीनता की संभावना दसवी सदी ईस्वी या इसके पूर्व की ही प्रतीत होती है। प्रारंभिक कलचुरी काल से अब तक लगातार इस परिसर के चतुर्दिक आबादी स्पष्ट प्रमाणित है।

कलचुरियों के छत्तीस गढ़ फिर मराठों के किले-प्रशासनिक केन्द्र, उनकी प्रणाली पर शोध व व्यवस्थित अध्ययन की आवश्यकता अब भी है। किन्तु यह काल गौरव- कोटगढ़, आज भी इतिहास का मूक साक्षी और प्रतिनिधि है।

किस्से सुनना राजसी शौक है, तो मेरे पिता स्वर्गीय सत्येन्द्र कुमार सिंह जी में यह राजसी लक्षण भरपूर था। इस लेख का आधार उनके पास जमा किस्सों और उसके आधार पर मौखिक इतिहास का स्वरूप देने के प्रयास में यह मसौदा तीसेक साल पहले तैयार किया गया, अब आंशिक संशोधन कर प्रस्तुत।

Monday, January 7, 2013

कलचुरि स्थापत्य: पत्र

बात रतनपुर के तीन शिल्पखंडों से आरंभ करने में आसानी होगी, जो एक परवर्ती मंदिर (लगभग 15वीं सदी ई.) में लगा दिये गये थे। इस मंदिर 'कंठी देउल' का अस्तित्व वर्तमान में बदला हुआ है, क्योंकि यह एएसआइ द्वारा अन्य स्थान पर पुनर्संरचना की प्रक्रिया में है, इन शिल्पखंडों में से एक 'पार्वती परिणय' प्रतिमा है, जो अब रायपुर संग्रहालय में है। दो अन्य- 'शालभंजिका' एवं 'ज्योतिर्लिंग-ब्रह्‌मा, विष्णु प्रतिस्पर्धा' हैं। ये तीनों शिल्पखंड लगभग 9 वीं सदी ई. में रखे जा सकते हैं।
कंठी देउल, रतनपुर
रतनपुर शाखा के कलचुरियों की कला देखने के लिए इसकी पृष्ठभूमि में आठवीं सदी ई. तक के पाण्‍डु-सोमवंश की कला परम्परा है। नवीं सदी ई. की बहुत कुछ सामग्री उपलब्ध नहीं है, दसवीं सदी ई. के कुछ उदाहरण मिलते हैं, फिर ग्यारहवीं सदी के कलचुरि स्थापत्य-कला का भंडार इस क्षेत्र (छत्तीसगढ़ या दक्षिण कोसल) में है, वैसे इस शैली की अधिकांश सामग्री को बारहवीं सदी में रखना अधिक उपयुक्त है, कुछ उदाहरण तेरहवीं सदी के भी हैं, जो अवसान काल के माने जा सकते हैं। इस तरह कलचुरि कला शैली का आरंभ ग्यारहवीं सदी का है, विकास-समृद्धि बारहवीं सदी की और ह्रास तेरहवीं सदी में। इन काल खण्डों की अलग-अलग चर्चा उदाहरण सहित करने से यह स्पष्ट हो सकेगा।

चर्चा का पहला खंड ऐसी कलाकृतियां हैं, जिनमें पाण्‍डु-सोमवंशी शैली की स्पष्ट छाप देशी-पहचानी जा सकती है और जिनका काल नवीं सदी ई. निश्चित किया जा सकता है, इनमें रतनपुर के उपरिलिखित तीन शिल्पखंड तथा रतनपुर किला में अवशिष्ट प्रवेश द्वार हैं।

दूसरा खंड दसवीं सदी (विशेषकर उत्तरार्द्ध) से संबंधित है, जिसमें पाली का बाणवंशीय महादेव मंदिर है तथा दूसरा उदाहरण घटियारी का शिव मंदिर की मलबा-सफाई से प्राप्त प्रतिमाएं है। घटियारी का मंदिर स्पष्ट प्रमाणों के अभाव में किसी राजवंश (फणिनाग?) से संबंधित नहीं किया जा सकता।

तीसरे खंड ग्यारहवीं-बारहवीं सदी में कलचुरि शिल्प और मंदिरों की श्रृंखला है, जिनका आरंभ तुमान से होता है, तुमान मंदिर का काल ग्यारहवीं सदी है। बारहवीं सदी के ढेर सारे उदाहरण हैं, जिनमें जांजगीर और शिवरीनारायण के दो-दो मंदिर, नारायपुर का मंदिर युगल, आरंग का भांड देवल (जैन मंदिर, भूमिज शैली), गनियारी, किरारीगोढ़ी, मल्हार के दो मंदिर आदि तथा रायपुर संभाग सीमा के कुछ मंदिर हैं।

चौथे खंड में तेरहवीं सदी के मंदिर हैं, जिनमें सरगांव का धूमनाथ मंदिर, मदनपुर से प्राप्त मंदिर अवशेष, धरहर (राजेन्द्रग्राम, जिला शहडोल) का मंदिर है।

तीसरे खंड के मंदिरों की कुछ विशिष्टताओं की थोड़ी और चर्चा यहां होनी चाहिये। अनियमित ढंग से शुरू करने पर तुमान का मंदिर और मल्हार के केदारेश्वर (पातालेश्वर) मंदिरों में मंडप और गर्भगृह समतल पर नहीं है। गर्भगृह बिना जगती के सीधे भूमि से आरंभ होकर उपर उठता है, जबकि मंडप उन्नत जगती पर है, (दोनों में अब जगती ही शेष है, मंडप का अनुमान मात्र संभव है) अतः पूरी संरचना विशाल जगती पर निर्मित जान पड़ती है। इस विशिष्टता के फलस्वरूप मल्हार का गर्भगृह निम्नतलीय है, किन्तु तुमान में ऐसा नहीं है (यहां अमरकंटक के पातालेश्वर का उल्लेख हो सकता है।) तुमान के द्वार-प्रतिहारियों और नदी-देवियों में त्रिपुरी कलचुरियों की शैली की झलक है, इस शिव मंदिर के द्वार शाख में दोनों ओर क्रमशः 5-5 कर विष्णु के दसों अवतार अंकित है। समतल पर विमान और मंडप का न होना किरारीगोढ़ी में भी विद्यमान है। (पाली, नारायणपुर और नारायणपाल मंदिरों में मंडप है।)

द्वारशाखों का सम्मुख और पार्श्व की चर्चा भी करनी चाहिये, रतनपुर किला में अवशिष्ट (या अन्य किसी स्थान से लाये गये) मात्र प्रवेश द्वार के सम्मुख में लता-वल्ली व सरीसृप का अंकन पुरानी रीति की स्मृति के कारण हुआ जान पड़ता है, इसलिये इसका काल निश्चित तौर पर नवीं सदी का उत्तरार्द्ध माना जाना उपयुक्त नहीं है यह और परवर्ती हो सकता है। शाख सामान्यतः विकसित नवशाख हैं, जिनमें दोनों ओर समान आकार की तीन-तीन आकृतियां (दो-दो प्रतिहारी व एक-एक नदी-देवियां) हैं और जिनका आकार लगभग पूरी ऊंचाई से दो-तिहाई या अधिक है। यह इन मंदिरों की सामान्य विशेषता बताई जा सकती है। शाखों के वाह्य पार्श्व तथा अंतःपार्श्व (द्वार में प्रवेश करते हुए दोनों बगल) के कुछ उल्लेख आवश्यक हैं।

रतनपुर किला के अवशिष्ट प्रवेश द्वार के वाह्य पार्श्व में कथानकों ('रावण का शिरोच्छेदन व शिवलिंग को अर्पण', नंदी पूजा आदि) का अंकन है। रतनपुर महामाया मंदिर (14-15वीं सदी) के द्वारशाखों पर अपारंपरिक ढंग से कलचुरि नरेश बाहरसाय के अभिलेख दोनों ओर हैं। जांजगीर के मंदिरों में से विष्णु मंदिर में वाह्य पार्श्व युगल अर्द्धस्तंभों का है (नारायणपुर में भी), जिसमें धनद देवी-देवता तथा संगीत-समाज अंकित है, वहीं जांजगीर के दूसरे मंदिर, शिव मंदिर में इसी तरह के अर्द्धस्तंभों पर कथानक व शिवपूजा के दृश्य भी हैं।

गनियारी के मंदिर के इसी तरह के अर्द्धस्तंभों पर हीरक आकृतियां तथा पुष्प अलंकरण है। प्रवेश द्वार के अंतःपार्श्व अधिकांश सादे हैं, किन्तु गनियारी में सोमवंशी स्मृति है, अर्थात इस स्थान पर सोमवंशियों में एक पूर्ण व दो अर्द्ध उत्फुल्ल पद्य अंकन हुआ है, गनियारी में पांच-छः पूर्ण उत्फुल्ल पद्य आकृतियां इस स्थान पर अंकित हैं, अंतःपार्श्वों पर कथानक व देव प्रतिमाओं के अंकन की परम्परा ताला, देवरानी मंदिर और मल्हार, देउर मंदिर में है, इनमें द्वारशाख का अंतःपार्श्व सम्मुख से अधिक महत्वपूर्ण है, इसीका अनुकरण मल्हार के केदारेश्वर तथा शिवरीनारायण के केशव नारायण मंदिर में है। यहां द्वारशाख सम्मुख तो परम्परागत हैं किन्तु अंतःपार्श्वों में देवप्रतिमाएं अंकित हैं, मल्हार में शिव-पार्वती का द्यूत प्रसंग, पार्वती-परिणय, वरेश्वर शिव, अंधकासुर वध, विनायक-वैनायिकी आदि हैं, जबकि शिवरीनारायण में इस स्थान पर विष्णु के चौबीस रूपों का संयोजन है। (अंतःपार्श्वों तथा द्वारशाख पर विष्णु स्वरूप नारायणपुर में भी है।)

अलग-अलग मंदिरों व स्थलों की चर्चा करें तो किरारीगोढ़ी का खंडित मंदिर स्थापत्य में रथ-योजना प्रक्षेपों की कलचुरि तकनीक देखने के लिये महत्वपूर्ण है, यहां मंडप के चबूतरे से मिले स्थापत्य खंड में 'व्याल, नायिका व देव प्रतिमा' ऐसे समूह वाले कई खंड हैं, जिनसे मंडप की प्रतिमा योजना व अलंकरण का अनुमान होता है, ऐसे ही खंड घुटकू में प्राप्त हुए हैं, बीरतराई के कुछ खंड भी मंडप के अंश जान पड़ते हैं, कनकी से कई द्वारशाख मिले हैं, जो स्थल पर ही नये निर्मित मंदिरों में लगाये गये हैं, भाटीकुड़ा के अवशेष-सिरदल आदि रोचक और महत्वपूर्ण हैं।

श्री मधुसूदन ए. ढाकी को  07.12.1989 को मेरे द्वारा (अन्‍तर्देशीय पर) प्रेषित पत्र का मजमून, इसी पत्र के आधार पर (अन्‍य कोई औपचारिक आवेदन के बिना) मुझे अमेरिकन इंस्‍टीट्यूट आफ इंडियन स्‍टडीज की फेलोशिप मिली थी। (पद्मभूषण) ढाकी जी से जुड़ी कुछ और बातें आगे कभी।

Monday, April 9, 2012

छत्तीसगढ़ी

बोली और भाषा में क्या फर्क है, लगभग वही जो लोक और शास्त्र में है। या कहें ज्‍यों कला का सहज-जात स्‍वरूप और मंचीय प्रस्‍तुतियां/आयोजन में या परम्‍परा-अनुकरण से सीख लिये और स्‍कूली कक्षाओं में सिखाए गए का फर्क। और यह उतना अनिश्चित भी माना जाता है, जितना नदी और नाला का अंतर। भाषा, मंदिर में पूजित विग्रह-मूर्ति का संग्रहालय में सज्जित और सम्मानित कर दिये जाने जैसा है, जबकि बोली ग्राम और लोक-देवताओं की तरह, जो कई बार अनगढ़, अनाकार, अनामित, मगर पूजित, श्रद्धा केंद्र होते हैं। श्रद्धालु अपनी गति-मति से अपना रिश्ता बनाए रखता है।

भाषा के लिए लिपि और व्याकरण अनिवार्य मान लिया जाता है, लेकिन जरूरी नहीं कि वह पृथक लिपि हो और व्याकरण के बिना तो सार्थक अभिव्यक्ति, बोली हो या भाषा, संभव ही नहीं। हां! भाषा के लिए बोली की तुलना में मानकीकरण, शब्द भंडार और साहित्य अधिक जरूरी है। भाषा की आवश्‍यकता शास्‍त्र-रचना के लिए होती है। अभिव्‍यक्ति तो बोली से हो जाती है, साहित्‍य भी रच जाता है। वास्तव में बोली मनमौजी और कुछ हद तक व्‍यक्तिनिष्‍ठ होने से अधिक व्यापक होती है, वह संकुचित, मर्यादित और निर्धारित सीमा का पालन करते हुए भाषा के अनुशासन में बंधती है। बोली-भाषा की अपनी इस मोटी-झोंटी समझ में यह मजेदार लगता है कि अवधी, ब्रज 'भाषा' हैं और हिन्दी की पूर्वज, खड़ी 'बोली'। बोली, अधिक लोचदार भी होती है, शायद यह खड़ी-ठेठनुमा कम लोच वाली बोली, अपने खड़ेपन के कारण आसानी से भाषा बन गई।

फिलहाल यहां मामला छत्तीसगढ़ी का है और मैं चाहता हूं कि यह, भाषा के रूप में तो प्रतिष्ठित हो लेकिन उसका बोलीपन खो न जाए। पिछले दिनों खबर छपी- लोकसभा में एक सवाल के जवाब में बताया गया है कि छत्तीसगढ़ी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने का प्रस्ताव-अनुरोध छत्तीसगढ़ सरकार की ओर से प्राप्त हुआ है। इसी तरह अंगिका, बंजारा, बजिका/बज्जिका, भोजपुरी, भोटी, भोटिया, बुंदेलखंडी, धात्की, अंग्रेजी, गढ़वाली (पहाड़ी), गोंडी, गुज्जर/गुज्जरी, हो, कच्चाची, कामतापुरी, कारबी, खासी, कोदवा (कूर्ग), कोक बराक, कुमांउनी (पहाड़ी), कुरक, कुरमाली, लेपचा, लिम्‍बू, मिजो (लुशाई), मगही, मुंडारी, नागपुरी, निकोबारी, पहाड़ी (हिमाचली), पाली, राजस्थानी, संबलपुरी/कोसली, शौरसेनी (प्राकृत), सिरैकी, तेंयिदी और तुलु भाषा के लिए भी प्रस्ताव मिले हैं। स्पष्ट किया गया है कि आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए कोई मानदंड नहीं बताए गए हैं और इन्हें अनुसूची में शामिल करने की कोई समय सीमा निश्चित नहीं है। इस तारतम्‍य में छत्तीसगढ़ी बोलते-लिखते-पढ़ते-सुनते-देखते रहा, उनमें से कुछ उल्लेखनीय को एक साथ यहां इकट्‌ठा कर देना जरूरी लगा।

डा. बलदेव प्रसाद मिश्र ने 'छत्‍तीसगढ़ परिचय' में लिखा है- सरगुजा जिले के कोरवा और बस्‍तर जिले के हलबा के साथ कवर्धा के किसी बैगा और सारंगगढ़ के किसी कोलता को बैठा दीजिए फिर इन चारों की बोली-बानी, रहन-सहन, रीति-नीति पर विचार करते हुए छत्‍तीसगढ़ीयता का स्‍वरूप अपने मन में अंकित करने का प्रयत्‍न कीजिये। देखिये आपको कैसा मजा आयेगा!

दंतेश्‍वरी मंदिर, दंतेवाड़ा, बस्‍तर वाला 23 पंक्तियों का शिलालेख छत्तीसगढ़ी का पहला अभिलिखित नमूना माना जाता है। शासक दिकपालदेव के इस लेख में संवत 1760 की तिथि चैत्र सुदी 14 से वैशाष वदि 3 अंकित है, गणना कर इसकी अंगरेजी तिथि समानता 31 मार्च, मंगलवार और 4 अप्रैल, शनिवार सन्‌ 1702 निकाली गई है। लेख की भाषा को विद्वान अध्‍येताओं द्वारा हिन्‍दी कहीं ब्रज और भोजपुरी प्रभाव युक्‍त, छत्‍तीसगढ़ी मिश्रित हिन्‍दी तो कहीं बस्‍तरी भी कहा गया है। यह मानना स्‍वाभाविक लगता है कि छत्‍तीसगढ़ में भी ब्रज का प्रभाव कृष्‍णकथा (भागवत और लीला-रहंस) से और अवधी का प्रभाव रामकथा (नवधा, रामसत्‍ता) परम्‍परा से आया है और लिखी जाने वाली छत्‍तीसगढ़ी अपने पुराने रूप में अधिक आसानी से पूर्वी हिन्‍दी समूह के साथ निर्धारित की जा सकती है।

यह भी उल्‍लेख रोचक होगा कि लेख वस्तुतः साथ लगे संस्कृत शिलालेख का अनुवाद है, इस तरह अनुवाद वाले उदाहरण भी कम हैं और लेख में कहा गया है कि कलियुग में संस्‍कृत बांचने वाले कम होंगे इसलिए यह 'भाषा' में लिखा है। लेख का अन्य संबंधित विषय स्वयं स्पष्ट है -
शिलालेख का फोटो और उसी का छापा 
दंतावला देवी जयति॥ देववाणी मह प्रशस्ति लिषाए पाथर है महाराजा दिकपालदेव के कलियुग मह संस्कृत के बचवैआ थोरही हैं ते पांइ दूसर पाथर मह भाषा लिखे है। ... ... ... ते दिकपालदेव विआह कीन्हे वरदी के चंदेल राव रतनराजा के कन्या अजवकुमरि महारानी विषैं अठारहें वर्ष रक्षपाल देव नाम जुवराज पुत्र भए। तव हल्ला ते नवरंगपुरगढ़ टोरि फांरि सकल वंद करि जगन्नाथ वस्तर पठै कै फेरि नवरंगपुर दे कै ओडिया राजा थापेरवजि। पुनि सकल पुरवासि लोग समेत दंतावला के कुटुम जात्रा करे सम्वत्‌ सत्रह सै साठि 1760 चैत्र सुदि 14 आरंभ वैशाष वदि 3 ते संपूर्न भै जात्रा कतेकौ हजार भैसा वोकरा मारे ते कर रकत प्रवाह वह पांच दिन संषिनी नदी लाल कुसुम वर्न भए। ई अर्थ मैथिल भगवान मिश्र राजगुरू पंडित भाषा औ संस्कृत दोउ पाथर मह लिषाए। अस राजा श्री दिकपालदेव देव समान कलि युग न होहै आन राजा।

रायपुर के कलचुरि शासक अमरसिंघदेव का कार्तिक सुदि 7 सं. 1792 (सन 1735) का आरंग ताम्रपत्रलेख का सम्‍मुख और पृष्‍ठ भाग, जिससे छत्‍तीसगढ़ की तत्‍कालीन दफ्तरी भाषा का अनुमान होता है।
यह ध्‍यान में रखते हुए कि लिखने और आम बोल-चाल की भाषा में फर्क स्‍वाभाविक है, संदर्भवश मात्र उल्‍लेखनीय है कि पुरानी छत्‍तीसगढ़ी के नमूनों में कार्तिक सुदी 5 सं. 1745 (सन 1688) का कलचुरि राजा राजसिंहदेव के पिता राजा तख्‍तसिंह द्वारा अपने चचेरे भाई रायपुर के राजा श्री मेरसिंह को लिखे पत्र (जिसकी नकल पं. लोचनप्रसाद पांडेय ने कलचुरि वंशज बड़गांव, रायपुर के श्री रतनगोपालसिंहदेव के माध्‍यम से प्राप्‍त की थी) और संबलपुर के दो ताम्रपत्रों (दोनों में 80 वर्ष का अंतर और जिसमें पुराना सन 1690 का बताया जाता है) का जिक्र होता है।

उज्‍ज्‍वल पक्ष है कि छत्‍तीसगढ़ी का व्‍यवस्थित और वैज्ञानिक व्‍याकरण सन 1885 में तैयार हो चुका था। जार्ज ग्रियर्सन ने भाषाशास्‍त्रीय सर्वेक्षण में इसी व्‍याकरण को अपनाते हुए इसके रचयिता हीरालाल काव्‍योपाध्‍याय के उपयुक्‍त नामोल्‍लेख सहित इसे सन 1890 में एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल की शोध पत्रिका में अनूदित और सम्‍पादित कर प्रकाशित कराया। पं. लोचन प्रसाद पाण्‍डेय द्वारा, रायबहादुर हीरालाल के निर्देशन में तैयार किए गए इस व्‍याकरण को, सेन्‍ट्रल प्राविन्‍सेस एंड बरार शासन के आदेश से सन 1921 में पुस्‍तकाकार प्रकाशित कराया गया।

छत्‍तीसगढ़ राज्‍य गठन के बाद न्यायालय श्रीमान न्यायाधिपति उच्च न्यायालय, जिला बिलासपुर (छत्तीसगढ़) के विविध क्रिमिनल याचिका क्र. 2708/2001 में याचिकाकर्ता श्रीमति हरित बाई, जौजे श्री मेमलाल, उम्र लगभग 30 वर्ष, साकिन ग्राम कुर्रू, थाना अभनपुर तह/जिला रायपुर (छ.ग.) विरुद्ध छत्तीसगढ़ शासन, द्वारा - थाना अभनपुर, तहसील व जिला रायपुर (छ.ग.) अपराध क्रमांक- 210/2001 में आवेदन पत्र अन्तर्गत धारा 438 दण्ड प्रक्रिया संहिता - 1973 अग्रिम जमानत बाबत, निम्नानुसार आदेश हुआ-
दिनांक 8.1.2002
आवेदिका कोति ले श्री के.के. दीक्षित अधिवक्ता,
शासन कोति ले श्री रणबीर सिंह, शास. अधिवक्ता
बहस सुने गइस। केस डायरी ला पढ़े गेइस
आवेदिका के वकील हर बताइस के ओखर तीन ठन नान-नान लइका हावय। मामला ला देखे अऊ सुने से ऐसन लागत हावय के आवेदिका ला दू महिना बर जमानत मा छोड़ना ठीक रही।
ऐही पायके आदेश दे जात है के कहुँ आवेदिका ला पुलिस हर गिरफ्तार करथे तो 10000/- के अपन मुचलका अऊ ओतके के जमानतदार पुलिस अधिकारी लंग देहे ले आवेदिका ला दू महीना बर जमानत मे छोड़ देहे जाय।
आवेदिका हर ओतका दिन मा अपन स्थाई जमानत के आवेदन दे अऊ ओखर आवेदन खारिज होए ले फेर इहे दोबारा आवेदन दे सकथे।
एखर नकल ला देये जाये तुरन्त

यहां एक अन्य शासकीय दस्तावेज, संयोगवश यह भी अभनपुर तहसील के कुर्रू से ही संबंधित है। इस अभिलेख में कानूनी भाषा और अनुवाद की सीमा के बावजूद बढि़या छत्‍तीसगढ़ी इस्‍तेमाल हुई है। यह तारीख 10/12/2007 बिक्रीनामा है, जिसे ''बीकरी-नामा'' लिखा गया है। इसी अभिलेख से-
बेचैया के नावः- 1/ चिन्ताराम उम्मर 65 बछर वल्द होलदास जात सतनामी रहवैया गांव जेवरा डाकघर- जेवरा थाना बेमेतरा अउ तहसील बेमेतरा जिला- दुरूग (छ.ग.)

परचा के नं -पी-202328

लेवाल के नावः- 1/ फेरूलाल उम्मर 65 बछर वल्द भकला जात -सतनामी रहवैया गांव पचेड़ा डाकघर - कुर्रू अउ तहसील - अभनपुर जिला- रायपुर (छ.ग.)।

बीकरी होये भुईंया के सरकारी बाजारू दाम बरोबर चुकाय गे हाबय। पाछु कहु बाजारू दाम कोनो कारन कम होही ते लेवाल ह ओला देनदार रईही बीकरी नामा मा सब्बो बात ल सुरता करके ईमान धरम से लिखवाये हावन लबारी निकले मा मै लेवाल देनदार रईही। बीकरी होय भुईंया हा शासन द्वारा भु दान म दे गे भुईंया नो हय। छ0ग0भू0रा0सं0 मा बनाये कानुन के धारा 165/6 अउ 165/7 के उलंघन नई होवत हे। सिलिंग कानुन के उलंघन नई होवत हे। बीकरी करे गे भुईंया हा- सीलींग अउ सरकारी पट्‌टा दार भुईंया नो है , बीकरी करे भुईंया मा कोनो जात के एकोठन रूख नईये। निमगा खेती किसानी के भुईंया आय। बीकरी करेगे भुमि मा तईहा जमाना से ले के आज तक खेती किसानी ही करे जावत हे। बीकरी शुदा भुईंया हा आज के पहीली कखरो मेर रहन या गहन नहीं रखे गेहे।

छत्तीसगढ़ी की वैधानिक स्थिति की चर्चा के पहले उसके मरम-धरम में रंगे-पंगे बद्रीसिंह कटरिया जी जैसे कुछ सुहृद-बुजुर्गों से सुनी बातें याद आती हैं-

ससुर खाना खाने बैठे, पानी-पीढ़ा जरूरी। बहू पहेली बुझाते अनुमति चाहती है-
‘बाप पूत के एके नांव, नाती के नांव अवरू।
ए किस्सा ल जान ले ह, तओ उठाह कंवरू।।
ससुर उसी तरह जवाब देते हैं-
जेकर पिए महिंगल होय, अउ चलावै घानी।
ए किस्सा ल जान ले ह, त ओ जाह पानी।
आशय कि खाना परोसते बहू देखती है कि पानी नहीं है, कहती है बाप और पूत का नाम एक (महुआ) मगर पोते का और कुछ (डोरी/टोरी- महुआ का फल), यह बूझ लें, तब कौर उठावें। ससुर जवाब में पहेली का हल उसी तरह बताते हुए पानी ले कर आने की अनुमति देते हैं कि जिसके पीने से व्यक्ति हाथी की तरह मतवाला हो जाता है (महुआ) और उसके लिए घानी चलती है (महुआ का फल-डोरी), यह बूझते पानी ले आओ।

बरसात, पनिहारिन और पानी पर बुझौवल है, जो कामुक नायक-नायिका के बीच हुए संवाद की तरह जान पड़ता है-
जात रहें तोर बर, भेंट डारें तो ला (छेंक ले हे मो ला)।
जाए दे तैं मो ला, ले आहंव तो ला।
बात कुछ इस तरह कि तुम्हारे लिए (पानी लेने के लिए) जा रही थी, रास्ते में तुम मिल गए, (बरसात ने) रास्ता रोक लिया, मुझे जाने दो गे, तो तुम्हें ले आऊंगी।

एक सवाल-जवाब इस तरह होता है-
‘दोसी अस न दासी, तैं का बर लगे फांसी।
नाचा ए न पेखन, तैं का ल आए देखन।
जिव जाही मोर, फेर मांस खाही तोर।‘
शिकारी ने बगुला फंसाने के लिए फिटका (फंदा) लगाया है और उसमें बतौर चारा, घुंइ को बांध रखा है। बगुला घुंइ को खाने के लिए धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा है, उसके मन में कुछ संदेह भी है, घुंइ से पूछता है कि तुम न दोषी हो न दासी, फिर इस तरह क्यों बंधी-फंसी हो। घुंइ जवाब देती है, यहां नाचा हो रहा है न पेखन (प्रेक्षण, कोई प्रदर्शन), फिर तुम क्या देखने चले आए और आगाह करती है, तुम मुझे खाना चाहते हो तो मेरी जान जाएगी, मगर (शिकारी) तुम्हारा मांस खाएगा।

शिकारी के जाल और पक्षियों का एक मार्मिक प्रसंग यह भी-
तीतुर फंसे, घाघर फंसे, तूं का बर फंस बटेर।
मया पिरित के फांस म आंखी ल दिएं लड़ेर।
शिकारी ने चिड़िया फंसाने के लिए जाल बिछाया। वापस आ कर देखता है कि उसमें तीतर, घाघर जैसी सामान्य आकार की चिड़िया फंस गईं हैं, मगर छोटे आकार का बटेर भी है, जो आसानी से जाल के छेद से बाहर निकल सकता था तो बटेर से पूछता है, तीतर-घाघर फंसे, लेकिन तुम कैसे फंस गए हो। साथ-साथ चरने वाले बटेर का जवाब कि तुम्हारे बिछाए जाल में नहीं, मैं तो साथी चिड़ियों के प्रेम-प्रीत में (कैसे साथ छोड़ दूं) आंखें बंद कर पड़ गया हूं।

छत्‍तीसगढ़ विधान सभा में शुक्रवार, 30 मार्च, 2001 को अशासकीय संकल्‍प सर्व सम्‍मति से स्‍वीकृत हुआ- ''यह सदन केन्‍द्र सरकार से अनुरोध करता है कि संविधान के अनुच्‍छेद 347 के तहत छत्‍तीसगढ़ी बोली को छत्‍तीसगढ़ राज्‍य की सरकारी भाषा के रूप में शासकीय मान्‍यता दी जाए।'' तथा पुनः शुक्रवार, 13 जुलाई, 2007 को अशासकीय संकल्‍प सर्व सम्‍मति से स्‍वीकृत हुआ- ''यह सदन केन्‍द्र सरकार से अनुरोध करता है कि छत्‍तीसगढ़ प्रदेश में बोली जाने वाली छत्‍तीसगढ़ी भाषा को संविधान के अनुच्‍छेद 347 के तहत राज्‍य की सरकारी भाषा के रूप में मान्‍यता दी जाय।''

छत्‍तीसगढ़ राजभाषा अधिनियम, 1957 (क्रमांक 5 सन् 1958), (मूलतः मध्‍यप्रदेश राजभाषा अधिनियम, जो अनुकूलन के फलस्‍वरूप इस तरह कहा गया है) में ''राज्‍य के राजकीय प्रयोजनों के लिए राजभाषा'' में लेख है कि ''एतद्पश्‍चात् उपबंधित के अधीन रहते हुए हिन्‍दी, उन प्रयोजनों के अतिरिक्‍त, जो कि संविधान द्वारा विशेष रूप से अपवर्जित कर दिये गये हैं, समस्‍त प्रयोजनों के लिए तथा ऐसे विषयों के संबंध में, के अतिरिक्‍त जैसे कि राज्‍य-शासन द्वारा समय-समय पर अधिसूचना द्वारा उल्लिखित किये जाएं, राज्‍य की राजभाषा होगी।''
इसी राजपत्र में यह भी उल्‍लेख है कि ''मध्‍यप्रदेश आफिशियल लैंगवेजेज एक्‍ट, 1950 (मध्‍यप्रदेश की राजभाषाओं का अधिनियम, 1950) (क्रमांक 24, सन् 1950 तथा मध्‍यभारत शासकीय भाषा विधान, संवत् 2007 (क्रमांक 67, सन् 1950) निरस्‍त हो जाएंगे।''

छत्तीसगढ़ विधानसभा में 28 नवंबर 2007 को छत्तीसगढ़ी राजभाषा विधेयक पारित हुआ, इसके पश्‍चात शुक्रवार, 11 जुलाई 2008 के छत्‍तीसगढ़ राजपत्र में छत्‍तीसगढ़ राजभाषा (संशोधन) अधिनियम, 2007 को और संशोधित करने हेतु अधिनियम आया कि ''छत्‍तीसगढ़ राज्‍य के राजकीय प्रयोजनों के लिए प्रयुक्‍त की जाने वाली भाषा के रूप में हिन्‍दी के अतिरिक्‍त छत्‍तीसगढ़ी को अंगीकार करने के लिए उपबंध करना समीचीन है.'' और इसके द्वारा मूल अधिनियम में शब्‍द ''हिन्‍दी'' के पश्‍चात् ''और छत्‍तीसगढ़ी'' अंतःस्‍थापित किया गया। इसमें यह भी स्‍पष्‍ट किया गया है कि- ''छत्‍तीसगढ़ी'' से अभिप्रेत है, देवनागरी लिपि में छत्‍तीसगढ़ी।'' सन 2013 में 11 जुलाई को ही शासन ने अधिसूचना जारी कर प्रतिवर्ष 28 नवंबर को ‘‘छत्तीसगढ़ी राजभाषा दिवस‘‘ घोषित किया है।

तीन-एक साल पहले प्रकाशित पुस्‍तक, जिसमें ''दंतेवाड़ा के छत्‍तीसगढ़ी शिलालेख'' बताते हुए कोई अन्‍य चित्र, 1703 (शिलालेख का काल?, जो वस्‍तुतः सन 1702 है) अंक सहित छपा है।

नन्‍दकिशोर शुक्‍ल जी, पिछले चार-पांच साल में अपने निजी संसाधनों और संगठन क्षमता के बूते, लगातार सक्रिय रहते 'मिशन छत्‍तीसगढ़ी' के पर्याय बन गए हैं, कुछ गंभीर असहमतियों के बावजूद उनके ईमानदार जज्‍बे और जुनून का मैं प्रशंसक हूं।

दक्षिण भारत के मेरे एक परिचित ने मुझे अपने परिवार जन से छत्‍तीसगढ़ी में बात करते सुना तो यह कहकर चौंका दिया कि लगभग साल भर यहां रहते हुए उनका छत्तीसगढ़ी से परिचय मोबाइल के रिकार्डेड संदेश और रेल्वे प्लेटफार्म की उद्‌घोषणा के माध्यम से हुआ जितना ही है तब लगा कि अस्मिता को जगाए-बनाए रखने के लिए गोहार और हांक लगाने का काम, अवसरवादी स्तुति-बधाई गाने वालों, माइक पा कर छत्तीसगढ़ी की धारा प्रवाहित करने वालों और उसे छौंक की तरह, टेस्ट मेकर की तरह इस्तेमाल करने वालों से संभव नहीं है। विनोद कुमार शुक्‍ल जी की कहावत सी पंक्ति में- ''छत्‍तीसगढ़ी में वह झूठ बोल रहा है। लबारी बोलत है।'' तसल्ली इस बात की है कि छत्तीसगढ़ की अस्मिता के असली झण्डाबरदार ज्यादातर ओझल-से जरूर है लेकिन अब भी बहुमत में हैं। छत्‍तीसगढ़ी के साथ छत्तीसगढ़ की अस्मिता उन्हीं से सम्मानित होकर कायम है और रहेगी।

पुनश्‍चः
लगता है अखबार (16 अप्रैल 2012) की नजर इस पोस्‍ट पर पड़ी है।

इसका मुख्‍य अंश मेरी सहमति से, 19 अप्रैल 2012 को जनसत्‍ता, नई दिल्‍ली के संपादकीय पृष्‍ठ पर ब्‍लाग के उल्‍लेख सहित प्रकाशित हुआ है।