Wednesday, November 24, 2021

समडील ताम्रपत्र

इस ताम्रपत्र की जानकारी समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, शोध-जर्नल तथा ‘उत्कीर्ण लेख‘ पुस्तक के परिवर्धित संस्करण, 2005 में प्रकाशित है।

जाजल्लदेव द्वितीय का समडील से प्राप्त ताम्रपत्र लेख कलचुरि संवत्: 913
- राहुल कुमार सिंह, बिलासपुर
तब कागज-पेन का अभ्यास था, अपने लिखे का,
टाइप से अधिक साफ और त्रुटिरहित का भरोसा होता था।


दो ताम्रपत्रों का यह सेट सन 1992 के जुलाई माह में जिला मुख्यालय बिलासपुर से 25 किलोमीटर दूर समडील नामक ग्राम (गनियारी के निकट) में स्थानीय कृषक श्री लखनलाल पटेल आत्मज श्री अमृतलाल पटेल को कृषि कार्य के दौरान प्राप्त हुआ था1 जिसे जिला पुरातत्त्व संग्रहालय, बिलासपुर के वरिष्ठ मार्गदर्शक श्री ए.एल. पैकरा ने 27 दिसम्बर 1994 को स्थल से संकलित किया2। ये ताम्रपत्र वर्तमान में जिला पुरातत्त्व संग्रहालय, बिलासपुर के संग्रह में सुरक्षित हैं, जिनका सम्पादन मूल ताम्रपत्रों के आधार पर प्रथमतः यहाँ किया जा रहा है3

उक्त दोनों ताम्रपत्रों का समानान्तर अधिकतम आकार 30.5X20.5 सेंटीमीटर तथा वजन कुल 3 किलोग्राम है। दोनों पत्रों को आपस में सम्बद्ध करने के लिए प्रथम पत्र के निचले एवं द्वितीय पत्र के ऊपरी हिस्से में छेद है, किन्तु ताम्रपत्रों के साथ राजमुद्रा-छल्ला प्राप्त नहीं हुआ है। दोनों पत्रों के अन्तःपृष्ठ उत्कीर्ण तथा वाह्य पृष्ठ सपाट हैं। प्रत्येक पत्र का किनारा, अक्षरों को घिसने से बचाने के लिए उठा हुआ है। ताम्रपत्र लेख संतोषजनक संरक्षित स्थिति में है। 

ताम्रपत्रलेख के प्रथम पत्र पर 18 पंक्तियाँ तथा द्वितीय पत्र पर 17 पंक्तियाँ, इस प्रकार कुल 35 पंक्तियाँ उत्कीर्ण हैं। लेख की लिपि नागरी तथा भाषा संस्कृत है। तत्कालीन अन्य कलचुरि लेखो4 की भांति इस लेख में भी ‘श‘ के स्थान पर ‘स‘ तथा ‘ब‘ के स्थान पर ‘व‘ जैसी भूलें हुई हैं। आरंभ व अंतिम भाग के अतिरिक्त पूरा लेख 22 श्लोकों में छन्दोबद्ध है। 

लेख के आरंभ में5 ब्रह्म का नमन है। प्रारंभिक 12 श्लोकों में, तत्कालीन अन्य कलचुरि लेखों की भाँति शिव स्तुति तथा रत्नपुर शाखा के कलचुरियों की वंशावली है। इसके पश्चात के 3 श्लोकों में लेख का उद्देश्य निहित है, जिसके अनुसार अत्रि कुल में उत्पन्न जास्त के पौत्र तथा राणि के पुत्र राजसिंह को सूर्यग्रहण के अवसर पर एवडी मंडल में स्थित खूडाघट नामक ग्राम, जाजल्लदेव (द्वितीय) द्वारा दान दिया गया। बाइसवें अंतिम श्लोक में लेख के रचयिता वास्तव्य वंश में उत्पन्न वत्सराज के पुत्र नयतत्त्ववेत्ता धर्मसिंह का नामोल्लेख है। अंत में तिथि, कलचुरि संवत् 913 के माघ मास का सूर्यग्रहण तथा लेख उत्कीर्ण करने वाले का नाम चंद्रक आया है।

पूर्व लेखों में6 रचयिता का नाम धर्मराज तथा जंडेर ग्राम का उल्लेख मिलता है। इस लेख में जंडेर ग्राम का उल्लेख नहीं है तथा लेख रचयिता का नाम धर्मसिंह आया है, उसे पूर्व लेखों के रचयिता से अभिन्न मानना चाहिए। इसी प्रकार इस लेख को उत्कीर्ण करने वाले का नाम चंद्रक को पूर्व लेखों7 के चंद्रक से अभिन्न माना जा सकता है। लेख में आये स्थान नामों में एवडी मंडल पूर्व ज्ञात है8 यह क्षेत्र बिलासपुर-मुंगेली तहसील का पूर्वाेत्तर हिस्सा होना चाहिए9। दान में दिए गए ग्राम खूडाघट नाम का समीकरण रतनपुर के पास स्थित बांध स्थल खुंटाघाट या ग्राम खुटाडीह से किया जा सकता है10

लेख का काल, कलचुरि संवत 913 (ईस्वी सन् 1161-62) विशेष महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसके पूर्व अमोरा ताम्रपत्र11 से जाजल्लदेव द्वितीय की तिथि कलचुरि संवत 912 मानी गई थी, किन्तु बाद में ब्रह्मदेव के रत्नपुर शिलालेख12, कलचुरि संवत् 915 को जाजल्लदेव द्वितीय के पिता पृथ्वीदेव द्वितीय के राजत्वकाल का माना गया और मुख्यतः इसी आधार पर अमोदा ताम्रपत्र की तिथि कलचुरि संवत 919 मान ली गई13। पूर्व प्राप्त अभिलेखों से14 पृथ्वीदेव द्वितीय के राज्यकाल की अंतिम सुनिश्चित तिथि कलचुरि संवत 910 है। ब्रह्मदेव के रत्नपुर शिलालेख, कलचुरि संवत 915 का कुछ हिस्सा पूरी तरह घिसा हुआ है और इसके संपादन के अवसर पर भी मूल शिला के धैर्यपूर्वक परीक्षण से ही पूरे लेख का सामान्य अनुमान कर पाना संभव हो सका था15। इस लेख में पृथ्वीदेव (द्वितीय) का नामोल्लेख अवश्य है, इसीलिए अन्य प्रमाणों के अभाव में इसे, उसके काल का मान लिया गया होगा, किन्तु लेख के घिसे हिस्से में जाजल्लदेव द्वितीय के राजत्व काल होने का उल्लेख अवश्य रहा होगा।

इस प्रकार इस ताम्रपत्र लेख की प्राप्ति से कलचुरियों की रत्नपुर शाखा के इतिहास में जाजल्लदेव द्वितीय के राजत्वकाल की तिथि सुनिश्चित होती है, जिसके आधार पर अन्य उपरोल्लिखित अभिलेखों की तिथि व शासक-राजत्वकाल का निर्धारण सुगमतापूर्वक संशोधित हो जाता है।

टिप्पणियाँ
1. ग्राम के पूर्वी हिस्से में शिवसागर तालाब के किनारे आधुनिक मंदिर में कलचुरि कालीन शिवलिंग स्थापित व पूजित है तथा ग्राम से अन्य स्फुट पुरावशेष व ई. 3-4 सदी के ताँबे के चौकोर गज-देवी प्रकार के सिक्के भी प्राप्त हुए हैं, जो स्थल की प्राचीनता प्रमाणित करने में पर्याप्त हैं। 
2. संकलन में स्थानीय सरपंच श्री विष्णु जायसवाल एवं बिलासपुर के श्री रमेश प्रसाद जायसवाल का सहयोग प्राप्त हुआ था।
3. ताम्रपत्र संबंधी आरंभिक जानकारी स्थानीय समाचार पत्रों में तथा ‘कलचुरि राजवंश और उनका युग‘- 1998 में लक्ष्मीशंकर निगम के लेख ‘दक्षिण कोसल के कलचुरि‘ पृ.- 126 पर दी गई है।
4. कार्पस इन्सक्रिप्शनम इण्डिकेरम - 1955, खंड-IV , भाग-II के लेख।
5. यथोक्त - अन्य लेखों की भांति सिद्धि चिह्न नहीं है।
6. का.इ.इ. IV (II) लेख क्र.- 99 तथा प्राच्य प्रतिभा V (I) जनवरी ‘77 पृ. 105-111।
7. का.इ.इ. IV (II) लेख क्र.- 92 तथा 94।
8. का.इ.इ. IV (II) लेख क्र.- 89।
9. एवडी मंडल के ग्राम पंडरतलाई की पहचान, वर्तमान के मुंगेली अनुविभाग के ग्राम पांडातराई से होती है।
10. का.इ.इ. IV (II) लेख क्र.- 95 में पर्वत (तल) को बांधकर सरोवर निर्मित कराये जाने का उल्लेख है।
11. एपिग्राफिया इंडिका, भाग-XIX, पृष्ठ 209-214।
12. का.इ.इ. IV (II) लेख क्र.- 96।
13. का.इ.इ. IV (II) लेख क्र.- 99।
14. का.इ.इ. IV (II) लेख क्र.- 95।
15. का.इ.इ. IV (II) लेख क्र.- 96।
राइस पेपर पर बॉल पेन से
पांच प्रतियां बन जाती थीं, इस तरह।


• कलचुरियों की राजधानी रतनपुर के पास, खारंग नदी पर बांधा गया खारंग जलाशय, ‘खूंटाघाट बांध‘ नाम से जाना जाता है। बांध के बाद खारंग नदी, अपना नाम-पहचान खोई सी बिलासपुर की ओर बढ़ती है और लाल खदान के आगे अरपा नदी में मिल जाती है। दो धाराओं के इस संगम स्थल के गांव का नाम ही दुमुंहानी है। कहा जाता है इस जलाशय में कुछ गांव, डूब में आए और झाड़-झरोखे भी। पानी में डूबे पेड़ ठूंठ बन गए, खूंटों की तरह और नाम पड़ा खूंटाघाट। इससे लगता है कि यह नाम 'खूंटाघाट', बांध बनने के समय का, सिर्फ सौ साल पुराना है। जबकि इस ताम्रपत्र और अन्य अभिलेखों से यह स्पष्ट होता है कि रतनपुर में सात-आठ सौ साल पहले कोई बांध था, खूडाघट नामक गांव भी था और उसी की स्मृति-छाया, वर्तमान खूंटाघाट बांध और खूटाडीह ग्राम है।


हकीकत का अफसाना- कोई 30 साल पहले किसी दिन बिलासपुर, गोंड़पारा यानि राजेंद्रनगर वाले अपने दफ्तर में मेज पर के कागज-पुरजों की छंटाई करते हुए एक परची मिली, जिस पर कुछ लिखा हुआ था, जिज्ञासा हुई कि अजनबी सी यह किसकी लिखावट है। पूछने पर बताया गया कि कुछ दिन पहले एक किशोर आया था, उसने यह छोड़ा था, बताना भूल गए थे। मेरी पूछताछ का कारण था कि पुरजे पर की लिखावट, पुरानी नागरी लिपि की नकल है, साफ तौर पर पहचानी जा सकती थी। तुरंत हरकत जरूरी हो गया। कार्यालय के सहयोगियों ने याद कर बताया कि रमेश जायसवाल नाम था, सिंधी कालोनी में कहीं रहता था। उसकी खोज में निकले, ज्यादा मशक्कत नहीं हुई, रमेश मिल गए। बताया कि मामा के यहां समडील गए थे, तांबे के स्लेट पर लिखावट की जानकारी मिली, देखने गए और कुछ हिस्से की नकल बना ली थी, वही पुरजा छोड़ कर आए थे।

अगले ही दिन सुबह रमेश को साथ ले कर समडील जा कर गांव के देव-स्थलों, खेत-खार देखते लखन पटेल के घर पहुंचे। लखन ने ताम्रपत्र सहजता से दिखा दिया, फोटो और नाप-जोख भी करने दिया। बातें होने लगी। इस पर उसने बताया कि उसके कोई आल-औलाद नहीं थी। कुछ बरस पहले खेत जोतते यह मिला, उसे वह घर ले आया, पूजा-पाठ की जगह पर रख दिया। इसके बाद संतान प्राप्ति हुई, तब से इस ताम्रपत्र की पूजा-प्रतिष्ठा और बढ़ गई। ताम्रपत्र को संग्रहालय के लिए प्राप्त करना था, लेकिन लगा कि मामला संवेदनशील है, नियम-कानून के लिए बेसब्री करना ठीक नहीं होगा और करना भी हो तो, अभी वह अवसर नहीं है।

वापस बिलासपुर लौटकर इस ताम्रपत्र के मजमून पर मशक्कत शुरू हुई। कार्यालय के वरिष्ठ मार्गदर्शक श्री पैकरा साथ नहीं जा पाए थे, अफसोस करने लगे और जा कर स्थल और ताम्रपत्र देखने की इच्छा व्यक्त की। लोक-व्यवहार वाले कामों में श्री पैकरा की कार्य-कुशलता को मैंने अधिकतर अपने से बेहतर पाया है। मैंने उन्हें काम सौपा कि वहां जाएं तो स्वयं भी ग्राम और स्थल निरीक्षण का एक नोट बनाएं (उद्देश्य था कि पहले गांव और लोगों से मिलते-जुलते स्वयं वहां से आत्मीयता महसूस करें) और लौटने के पहले ताम्रपत्र देखने लखनलाल से मिलने जाएं। साथ ही यों मुश्किल है, लेकिन प्रयास करें (ऐसी चुनौती से उनका उत्साहवर्धन होता है) कि बिना किसी दबाव के ताम्रपत्र संग्रहालय के लिए प्राप्त हो जाए।

पैकरा जी तालाब, डीह, खेत-खार करते गांव में घूम-फिर कर लखनलाल के पास पहुंचे। लखनलाल ने ताम्रपत्र दिखाया और उसके साथ का किस्सा पूरे विस्तार से सुनाया। ताम्रपत्र मिले हैं तब से जमीन खरीद ली, लंबे समय बाद संतान हुआ। कुछ गांव वाले भी आ गए। उन्हें लगा कि इस ‘बीजक‘ में जरूर किसी खजाने का पता है, जिसके चक्कर में आया कोई फरेबी है। उत्तेजित गांव वालों को श्री पैकरा ने समझाइश और थोड़ी अमलदारी का रुतबा बताया। बातचीत होने लगी। पैकरा जी ने अपना पूरा नाम बताया अमृतलाल, संयोग कि लखनलाल के पिता का नाम भी अमृतलाल ही था। लखनलाल को फैसला करते देर न लगी। पुरखों का आशीर्वाद, वंश चलाने अब बाल-बच्चे, लोग-लइका तो आ ही गए हैं और पिता-पुरखा के सहिनांव पिता-तुल्य अमृतलाल इस ताम-सिलेट को लेने आ गए हैं। सहर्ष ताम्रपत्र पैकरा जी को सौंप दिया।

ताम्रपत्र, बिलासपुर संग्रहालय के संग्रह में है। रमेश जायसवाल, बिलासपुर निगम के पार्षद बने, जन-सेवा में लगे हैं। श्री पैकरा अब मुख्यालय रायपुर में उपसंचालक पद का दायित्व निर्वाह कर रहे हैं। समडील के तत्कालीन सरपंच विष्णु जायसवाल जी के पुत्र हेमंत जी से पता लगा, लखनलाल जी घर-परिवार सहित राजी-खुशी हैं। मैंने ताम्रपत्र पर तब शोध-पत्र लिखा और अब आपके लिए ‘पेशे-खिदमत‘ यह किस्सा कह रहा हूं।

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