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Thursday, January 19, 2012

भानु कवि

चालो री साहेल्यां म्हारा जगन्नाथ जी आया री।
जगन्नाथ जी आया वो तो कोई पदारथ लाया री।
निमाड़ क्षेत्र में प्रचलित रही गीत की ये पंक्तियां भगवान जगन्नाथ के लिए नहीं बल्कि राजस्व अधिकारी के रूप में वहां पदस्थ रहे जगन्नाथ प्रसाद 'भानु' के लिए है, जो गीत की अगली पंक्तियों से पता लगता है-
आगूं तो हम सौ-सौ देत, अब नौ दसक सुनाया री।
बाकी रुपया सबै छुड़ाया, हरखीना घर आया री॥
निमाड़ में पदस्थ रहते भानुजी ने लगान में कमी कर जनता का दिल जीत लिया था। भानुजी निमाड़ी किसानों के प्रेम का स्मरण कर कहा करते थे- 'इस छल-कपट से भरे हुए संसार में मुझे ग्रामीण जनता से जो प्रेम और प्रतिष्ठा मिली, वह देव-दुर्लभ है।'

हिन्दी साहित्य के इतिहास में छंदशास्त्र के सर्वप्रमुख विद्वान, छत्तीसगढ़ के गौरव पुरुष जगन्नाथ प्रसाद 'भानु' का जन्म 8 अगस्त 1859 को तत्कालीन मध्यप्रांत की राजधानी नागपुर में हुआ। सैनिक सुकवि 'हनुमान नाटक' के रचयिता पिता बख्‍शीराम से साहित्यिक संस्कार, उन्हें घुट्‌टी में मिला। भानुजी का बचपन बिलासपुर में बीता, आरंभिक शिक्षा भी यहीं हुई और आपके जीवन का अधिकतम रचनाकाल भी बिलासपुर में ही व्यतीत हुआ। मेधावी बालक जगन्नाथ ने अपनी रुचि और स्वाध्याय से हिंदी, संस्कृत, प्राकृत, अंग्रेजी, उर्दू, फारसी, उड़िया और मराठी भाषा पर अधिकार प्राप्त कर लिया। भाषा और गणित में उनकी विशेष रूचि थी।

साहित्य का अध्ययन करते हुए भानुजी ने महसूस किया कि हिंदी में 'छंद' विषय पर वैज्ञानिक और व्यवस्थित कार्य का अभाव है और उन्होंने इस दिशा में कार्य आरंभ किया। छह वेदांगों में शिक्षा, व्याकरण, कल्प, निरुक्त और ज्योतिष के साथ छंद भी है। सर्वप्रथम संस्कृत के छंद ग्रंथ 'पिंगलशास्त्र' की रचना पिंगलाचार्य ने की, जो भगवान शेष के अवतार माने गए हैं, किंतु हिंदी के छंद ग्रंथों में जगन्नाथ प्रसाद भानु कृत प्रथमतः सन 1894 में प्रकाशित 'छंदःप्रभाकर' सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। सन 1939 में इसके नवें संस्करण प्रकाशन के बाद 1940 में उन्‍हें हिन्‍दी के प्रथम 'महामहोपाध्‍याय' उपाधि से विभूषित किया गया।
इस ग्रंथ का 10वां संस्करण जगन्नाथ प्रिंटिंग प्रेस, बिलासपुर से सन 1960 में प्रकाशित हुआ। इस संस्करण में ग्रंथ का परिचय इस प्रकार दिया गया है- 'छन्‍दःप्रभाकर' अर्थात भाषा पिंगल, सूत्र और गूढ़ार्थ सहित जिसमें छन्‍द शास्त्र की विशेष ज्ञानोत्पत्ति के लिए मात्राप्रस्तार, वर्णप्रस्तार, मेरु, मर्कटी, पताका प्रकरण, मात्रिकसम, अर्द्धसम, विषम और वर्णसम, अर्द्धसम और विषम वृत्त प्रकरणों का वर्णन बड़ी विचित्र और सरल रीति से लक्षण और उत्तम उदाहरणों सहित दिया है।

ग्रंथ की भूमिका में भानुजी ने सरल शब्दों में छंद का परिचय और महत्व इस प्रकार बताया था- 'छंद शास्त्र का थोड़ा ज्ञान होना मनुष्य के लिए परमावश्यक है। आप लोग देखते हैं कि हमारे ऋषि, महर्षि और पूर्वजों ने स्मृति, शास्‍त्र, पुराणादि जितने ग्रंथ निर्माण किये हैं वे सब प्रायः छन्‍दोबद्ध हैं। यहां तक कि श्रुति अर्थात वेद भी छंदस कहाते हैं। छंद का इतना गौरव और माहात्म्य क्यों? इसका कारण यही है कि कोई भी विषय छंदोबद्ध रहने से रमणीयता के कारण शीघ्र कंठस्थ हो जाता है और पाठकों और श्रोताओं दोनों को एक साथ ही आनंदप्रद होता है। इसके सिवाय उसका आशय गद्य की अपेक्षा थोड़े ही में आ जाता है। वे आगे लिखते हैं- 'इस ग्रंथ में हमने श्रीयुतभट्ट हलायुध के सटीक प्राचीन संस्कृत छन्‍द शास्त्र, श्रुतबोध वृत्तरत्नाकर, छन्‍दोमंजरी, वृत्तदीपिका, छंदःसारसंग्रह इत्‍यादि ग्रन्‍थों का आधार लिया है।' इस पुस्तक में सौ से अधिक पारिभाषिक शब्द, चार सौ से अधिक छंद नियम है तथा आठ सौ से अधिक शब्द नाम विषयसूची में सम्मिलित हैं।

यह न सिर्फ हिन्दी छंद शास्त्र का पहला ग्रंथ होने के कारण उल्लेखनीय है, बल्कि इसका महत्व इसलिए है कि इसमें मात्रा, वर्ण, प्रत्यय आदि का व्यवस्थित विश्लेषण किया गया है। बहुभाषाविद होने का लाभ लेते हुए भानु जी ने ग्रंथ में संस्कृत, मराठी तुलनात्मक उदाहरणों के साथ तुकान्त काव्य के उल्लेख सहित उर्दू-फारसी बहरों और अंगरेजी के मीटर का हिन्दी छंदों के साथ विवेचन किया है।

रामचरितमानस को आधार बना कर तैयार किया गया उनका ग्रंथ नव पंचामृत रामायण 1897/1924 में प्रकाशित हुआ, साथ ही उनकी श्री तुलसी तत्‍व प्रकाश (1931), रामायण वर्णावली (1936), श्री तुलसी भाव प्रकाश (1937) पुस्‍तकों के नाम मिलते हैं। इसके अतिरिक्त उनके अन्य ग्रंथ हैं- काव्य प्रभाकर (1905/1909), छंद सारावली (1917), अलंकार प्रश्नोत्तरी (1918), हिंदी काव्यालंकार (1918), काव्य प्रबंध (1918), काव्य कुसुमांजलि (1920), नायिका भेद शंकावली (1925), रस रत्नाकर (1927), अलंकार दर्पण (1936) आदि। उनकी अन्य काव्य कृतियां 'तुम्हीं तो हो' (1914), जय हरि चालीसी (1914) और शीतला माता भजनावली (1915) है। फैज उपनाम वाली उनकी दो उर्दू पुस्तकों, गुलजारे सखुन (1909) तथा गुलजारे फैज़ (1914) और सन 1927 में रचित अंग्रेजी तीन पुस्तिकाओं 'की टू परपेचुअल कैलेंडर बीसी', 'की टू परपेचुअल कैलेंडर एडी' तथा 'कांबिनेशन एंड परम्यूटेशन आफ फिगर्स' हैं। इसके साथ काल प्रबोध (1899), अंक विलास (1925) और काल विज्ञान (1929) सहित कई छत्तीसगढ़ी पुस्तिकाओं की रचना भी आपने की, जिसमें खुसरा चिरई के बिहाव सर्वाधिक लोकप्रिय हुई (वैसे इसी शीर्षक से खरौद के पं. कपिलनाथ मिश्र की प्रसिद्ध रचना भी है।) इसके अतिरिक्‍त भानुजी की कुछ अप्रकाशित रचनाओं की सूचना भी मिलती है।

सरकारी नौकरी के बाद सक्रिय सार्वजनिक जीवन बिताते हुए भानुजी ने सन 1913 मे बिलासपुर में जगन्नाथ प्रेस नामक छापाखाना आरंभ कर इस अंचल के एक बड़े अभाव की पूर्ति की। भानु जी की मित्र मंडली और परिचय का क्षेत्र अत्यंत व्यापक था। वे तत्कालीन सभी प्रमुख साहित्य मनीषियों और महापुरुषों के सतत संपर्क में रहते और सम्मान पाते थे। श्रीकृष्ण कन्या शाला के अध्यक्ष, बिलासपुर डिस्पेंसरी के सदस्य, सहकारी बैंक के संस्थापक, महाकोशल हिस्टोरिकल सोसाइटी कौंसिल के अध्यक्ष, मध्यप्रांतीय लिटरेरी एकेडमी के अजीवन सदस्य जैसी विभिन्न संस्थाओं से संबद्ध रहकर छत्तीसगढ़ में साहित्यिक और बौद्धिक वातावरण के निर्माण में अविस्मरणीय योगदान दिया। वे नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा महात्‍मा गांधी, जार्ज ग्रियर्सन, आचार्य महावीर प्रसाद दि्ववेदी, पं. गौरीशंकर ओझा, हरिऔध जी व बाबू श्‍यामसुंदर दास के साथ सम्‍मानित हुए थे। महामहोपाध्‍याय, साहित्‍य-वाचस्‍पति, साहित्‍याचार्य, रायबहादुर भानु जी का निधन 25 अक्टूबर 1945 को हुआ।

मेरे द्वारा तैयार यह आलेख, लगभग इसी रूप में प्रथमतः 25 अक्टूबर 2004 को समाचार पत्र दैनिक हरिभूमि, बिलासपुर के पृष्ठ-4 पर प्रकाशित।

15-20 साल पहले भानुजी के पोते श्री घनश्‍याम उर्फ मोहनकुमार कवि से मेरा मिलना-जुलना होता था, उनके चांटापारा स्थित निवास पर जाकर, भानुजी के अध्ययन कक्ष और संग्रह को भी देखने का अवसर मिला, किन्तु इस लेख के लिए जानकारियों की पुष्टि का प्रयास किया तो वहां वैसा कुछ भी शेष नहीं रहा था, मोहन जी से भी मुलाकात न हो सकी, न पता लगा सका इसलिए मात्र विभिन्न प्रकाशित स्रोतों और चर्चाओं को आधार बना कर यह लेख तैयार किया गया था।