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Saturday, January 22, 2022

छत्तीस पांती तालाब

छत्तीसगढ़ के तालाबों और जल-प्रबंधन पर लिखते हुए कभी बात हुई कि इन जानकारियों को जल-जीवन, तालाब की छत्तीस पांती (पंक्ति) के रूप में किस तरह सजाया जा सकता है, इसी प्रयास का परिणाम-

01. छत्तीसगढ़ में जल-संसाधन और प्रबंधन की समृद्ध परम्परा के प्रमाण, तालाबों के साथ विद्यमान है और इसलिए तालाब स्नान, पेयजल और अपासी (आबपाशी या सिंचाई) आवश्यकताओं की प्रत्यक्ष पूर्ति के साथ जन-जीवन और समुदाय के वृहत्तर सांस्कृतिक संदर्भयुक्त बिन्दु हैं।

02. नौ लाख ओड़िया, नौ लाख ओड़निन के उल्लेख सहित दसमत कइना की गाथा, एक लाख मवेशियों का कारवां लेकर चलने वाला लाखा बंजारा और नायकों के स्वामिभक्त कुत्ते का कुकुरदेव मंदिर सहित उनके खुदवाए तालाब, लोक-स्मृति में जीवन्त हैं।

03. खमरछठ (हल-षष्ठी) की पूजा के साथ प्रतीकात्मक तालाब-रचना और संबंधित कथा में तथा बस्तर अंचल की लछमी जगार गाथा में तालाब खुदवाने संबंधी मान्यता और सुदीर्घ परम्परा का संकेत है।

04. सरगुजा अंचल में कथा चलती है कि पछिमहा देव ने सात सौ तालाब खुदवाए थे और राजा बालंद, कर के रूप में खीना लोहा वसूलता और जोड़ा तालाब खुदवाता। उक्ति है- सात सौ फौज, जोड़ा तलवा; अइसन रहे बालंद रजवा।

05. यह रोचक है कि छत्तीसगढ़ में आमतौर पर समाज से दूरी बनाए रखने वाले नायक, सबरिया, भैना, लोनिया, बेलदार और रामनामियों की भूमिका तालाब निर्माण में महत्वपूर्ण होती है और उनकी विशेषज्ञता तो काल-प्रमाणित है ही।

06. छत्तीसगढ़ में पड़े भीषण अकाल के समय किसी अंग्रेज अधिकारी द्वारा खुदवाए गए उसके नाम स्मारक बहुसंख्य ‘लंकेटर तालाब’ अब भी जल आवश्यकता की पूर्ति और राहत कार्य के संदर्भ सहित विद्यमान हैं।

07. छत्तीसगढ़ के ग्रामों में तालाबों की बहुलता इतनी कि ‘छै आगर छै कोरी’, यानि 126 तालाबों की मान्यता रतनपुर, मल्हार, खरौद, महन्त, अड़भार, आरंग, धमधा जैसे कई स्थानों के साथ सम्बद्ध है। बस्तर अंचल के बारसूर, बड़े डोंगर, कुरुसपाल और बस्तर आदि ग्रामों में ‘सात आगर सात कोरी’ (147) तालाबों की मान्यता है, इन गांवों में आज भी बड़ी संख्या में तालाब विद्यमान हैं।

08. भीमादेव, बस्तर में पाण्डव नहीं, बल्कि पानी के देवता हैं। बस्तर में विवाह के कई नेग-चार पानी और तालाब से जुड़े हैं। विवाह के अवसर पर दूल्हा अपनी नव विवाहिता को पीठ पर लाद कर स्नान कराने जलाशय ले जाता है और पीठ पर लाद कर ही लौटता है।

09. छत्तीसगढ़ में छत्तीस से अधिक संख्या में परिखायुक्त मृत्तिका-दुर्ग (मिट्टी के किले या गढ़) जांजगीर-चांपा जिले में ही हैं, इन गढ़ों का सामरिक उपयोग संदिग्ध है किन्तु गढ़ों के साथ खाई, जल-संसाधन की दृष्टि से आज भी उपयोगी है।

10. छत्तीसगढ़ में तालाबों के विवाह की परम्परा भी है, जिस अनुष्ठान (लोकार्पण का एक स्वरूप) के बाद ही उसका सार्वजनिक उपयोग आरंभ होता था। विवाहित तालाब की पहचान सामान्यतः तालाब के बीच स्थित स्तंभ से होती है। इस स्तंभ से घटते-बढ़ते जल-स्तर की माप भी हो जाती है।

11. छत्तीसगढ़ में तालाबों के विवाह की परम्परा रही है और कुछ तालाब अविवाहित भी रह जाते हैं, लेकिन ऐसे तालाबों का अनुष्ठानिक महत्व बना रहता है क्योंकि ऐसे ही तालाब के जल का उपयोग चिन्त्य या पीढ़ी पूजा के लिए किया जाता है।

12. जांजगीर-चांपा जिले के किरारी के हीराबंध तालाब से प्राप्त काष्ठ-स्तंभ, उस पर खुदे अक्षरों के आधार पर दो हजार साल पुराना प्रमाणित है। इस उत्कीर्ण लेख से तत्कालीन राज पदाधिकारियों की जानकारी मिलती है।

13. तालाबों के स्थापत्य में कम से कम मछन्दर (पानी के सोते वाला तालाब का सबसे गहरा भाग), नक्खा या छलका (लबालब होने पर पानी निकलने का मार्ग), गांसा (तालाब का सबसे गहरा किनारा), पैठू (तालाब के बाहर अतिरिक्त पानी जमा होने का स्थान), पुंछा (पानी आने व निकासी का रास्ता) और मेढ़-पार होता है।

14. तालाबों के प्रबंधक अघोषित-अलिखित लेकिन होते निश्चित हैं, जो सुबह पहले-पहल तालाब पहुंचकर घटते-बढ़ते जल-स्तर के अनुसार घाट-घठौंदा के पत्थरों को खिसकाते हैं, घाट की काई साफ करते हैं, दातौन की बिखरी चिरी को इकट्ठा कर हटाते हैं और इस्तेमाल के इस सामुदायिक केन्द्र के औघट (पैठू की दिशा में प्रक्षालन के लिए स्थान) आदि का अनुशासन कायम रखते हैं।

15. तालाबों के पारंपरिक प्रबंधक ही अधिकतर दाह-संस्कार में चिता की लकड़ी जमाने से लेकर शव के ठीक से जल जाने और अस्थि-संचय करा कर, उस स्थान की शांति- गोबर से लिपाई तक की निगरानी करते हुए सहयोग देता है और घंटहा पीपर (दाह-क्रिया के बाद जिस पीपल के वृक्ष पर घट-पात्र बांधा जाता है) के बने रहने और आवश्यक होने पर इस प्रयोजन के वृक्ष-रोपण की व्यवस्था भी वही करता है। ऐसे व्यक्ति मान्य उच्च वर्णों के भी होते हैं।

16. तालाबों का नामकरण सामान्यतः उसके आकार, उपयोग, चरित्र पर आधारित होता है, इनमें खइया, नइया, पचरिहा, खो-खो तालाब, पनपिया, सतखंडा, अड़बंधा, डोंगिया, गोबरहा, पुरेनहा, देउरहा, नवा तलाव, पथर्रा, कारी, पंर्री जैसे नाम हैं।

17. तालाबों का नामकरण उसके चरित्र-इतिहास और व्यक्ति नाम पर भी आधारित होता है, जैसे- फुटहा, दोखही, भुतही, छुइहा, फूलसागर, मोतीसागर, रानीसागर, राजा तालाब, गोपिया, भीमा आदि। बरात निकासी, आगमन व पड़ाव से सम्बद्ध तालाब का नाम दुलहरा पड़ जाता है।

18. पानी और तालाब से संबंधित ग्राम-नामों की लंबी सूची है इनमें उद, उदा, दा, सर (सरी भी), सरा, तरा (तरी भी), तराई, ताल, चुआं, बोड़, नार, मुड़ा, पानी आदि जलराशि-तालाब के समानार्थी शब्दों के मेल से बने गांवों के नाम आम हैं।

19. जल अभिप्राय के उद, उदा, दा जुड़कर बने ग्राम नाम के कुछ उदाहरण बछौद, हसौद, तनौद, मरौद, रहौद, लाहौद, चरौदा, कोहरौदा, बलौदा, मालखरौदा, चिखलदा, रिस्दा, परसदा, फरहदा हैं।

20. जल अभिप्राय के सर, सरा, सरी, तरा, तरी, के मेल से बने ग्राम नाम के उदाहरण बेलसर, भड़ेसर, लाखासर, खोंगसरा, अकलसरा, तेलसरा, बोड़सरा, सोनसरी, बेमेतरा, बेलतरा, सिलतरा, भैंसतरा, अकलतरा, अकलतरी है।

21. तालाब समानार्थी तरई या तराई तथा ताल के साथ ग्राम नामों की भी बहुलता है। कुछ नमूने डूमरतराई, शिवतराई, पांडातराई, बीजातराई, सेमरताल, उड़नताल, सरिसताल, अमरताल हैं।

22. चुआं, बोड़ और सीधे पानी जुड़कर बने गांवों के नाम बेंदरचुआं, घुंईचुआं, बेहरचुआं, जामचुआं, लाटाबोड़, नरइबोड़, घघराबोड़, कुकराबोड़, खोंगापानी, औंरापानी, छीरपानी, जूनापानी जैसे ढेरों उदाहरण हैं।

23. तालाबों और स्थानों का नाम सागर, डबरा तथा बांधा आदि से मिल कर भी बनता है तो जलराशि सूचक बंद के मेल से बने कुछ ग्राम नाम ओटेबंद, उदेबंद, कन्हाइबंद, बिल्लीबंद, टाटीबंद जैसे हैं।

24. तालाब अथवा जल सूचक स्वतंत्र ग्राम-नाम तलवा, झिरिया, बंधवा, सागर, डबरी, डभरा, गुचकुलिया, कुंआ, बावली, पचरी, पंचधार, सेतगंगा, गंगाजल, नर्मदा और निपनिया भी हैं।

25. छत्तीसगढ़ की प्रमुख नदी का नाम महानदी और सरगुजा में महान नदी है तो एक जिला मुख्यालय का नाम महासमुंद है और ग्राम नाम बालसमुंद (बेमेतरा) भी है लेकिन रायपुर जिले के पलारी ग्राम का बालसमुंद, विशालकाय तालाब है। जगदलपुर का समुद्र या भूपालताल बड़ा नामी है।

26. कार्तिक-स्नान, ग्रहण-स्नान, भोजली, मृतक संस्कार के साथ नहावन और पितृ-पक्ष की मातृका नवमी के स्नान-अनुष्ठान, ग्राम-देवताओं की बीदर-पूजा, अक्षय-तृतीया पर बाउग (बीज बोना) और विसर्जन आदि और पानी कम होने जाने पर मतावल, तालाब से सम्बद्ध विशेष अवसर हैं।

27. हरेली (सावन अमावस्या) की गेंड़ी को पोरा (भाद्रपद अमावस्या) के दिन तालाब का तीन चक्कर लगाकर गेंड़ी के पउवा (पायदान) का विसर्जन तालाब में किए जाने का लोक विधान है और विसर्जित सामग्री के समान मात्रा की लद्दी (गाद) तालाब से निकालना पारम्परिक कर्तव्य माना जाता है।

28. गांवजल्ला (ग्रामवासियों द्वारा मिल-जुल कर) लद्दी (गाद) निकालने के लिए गांसा काट कर तालाब खाली कर लिया जाता है। पानी सूख जाने पर तालाब में झिरिया (पानी जमा करने के लिए छोटा गड्ढ़ा) बना कर पझरा (पसीजे हुए) पानी से आवश्यकता पूर्ति होती है।

29. तालाब की सत्ता, उसके पारिस्थितिकी-तंत्र के बिना अधूरी है, जिसमें जल-वनस्पति, सीप-घोंघी, जोंक, संधिपाद, चिड़िया (ऐरी), मछलियां, उभयचर आदि और कहीं-कहीं ऊद व मगर भी होते हैं।

30. जलीय जन्तुओं को देवतुल्य सम्मान देते हुए सोने का नथ पहनी मछली और लिमान (कछुआ) का तथ्य और उससे सम्बद्ध विभिन्न मान्यताएं तालाब की पारस्थितिकी सत्ता के पवित्रता और निरंतरता की रक्षा करती हैं।

31. जल की रानी, मछलियों के ये नाम छत्तीसगढ़ में सहज ज्ञात होते हैं- डंडवा, घसरा, अइछा, सोढ़िहा या सोंढ़ुल, लुदू, बंजू, भाकुर, पढ़िना, भेंड़ो, बामी, काराझिंया, खोखसी या खेकसी, झोरी, सलांगी या सरांगी, डुडुंग, डंडवा, ढेंसरा, बिजरवा, खेगदा, तेलपिया, ग्रासकाल।

32. तालाब जिनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं, उनके जबान पर कटरंग, सिंघी, लुडुवा, कोकिया, रेछा, कोतरी, खेंसरा, गिनवा, टेंगना, मोहराली, सिंगार, पढ़िना, भुंडी, सांवल, बोलिया या लपची, रुखचग्घा, केवई, मोंगरी, पथर्री, चंदैनी, कटही, भेर्री, कतला, रोहू और मिरकल मछलियों के नाम भी सहज आते हैं।

33. सामुदायिक-सहकारी कृषि का क्षेत्र- बरछा, कुसियार (गन्ना) और साग-सब्जी की पैदावार के लिए नियत तालाब से लगी भूमि, पारंपरिक फसल चक्र परिवर्तन और समृद्ध-स्वावलंबी ग्राम की पहचान माना जा सकता है। आम के पेड़ों की अमरइया भी प्रमुख तालाब के अभिन्न अंग होते हैं।

34. तालाब स्नान के बाद जल अर्पित करने के लिए शिवलिंग, मंदिर, देवी का स्थान- माताचौंरा या महामाया और शीतला की मान्यता सहित नीम के पेड़ और अन्य वृक्षों में पीपल (घंटहा पीपर) भी तालाबों के अभिन्न अंग हैं।

35. छत्तीसगढ़ में तालाब के साथ जुड़े मिथक, मान्यता और किस्सों में झिथरी, मिरचुक, तिरसाला, डोंगा, पारस-पत्थर, हंडा-गंगार, पूरी बरात तालाब में डूब जाना जैसे पात्र और प्रसंग तालाब के चरित्र को रहस्यमय और अलौकिक बनाती है।

36. तालाब से जुड़ी दंतकथाओं में पत्थर की पचरी, मामा-भांजा की कथा, राहगीरों के उपयोग के लिए तालाब से बर्तन निकलना और भैंसे के सींग में चीला अटक जाने से किसी प्राचीन निर्मित या प्राकृतिक तालाब के पता लगने का विश्वास, जन-सामान्य के इतिहास-जिज्ञासा की पूर्ति करता है।

Wednesday, November 28, 2012

तालाब परिशिष्‍ट

वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी डा. के.के. चक्रवर्ती जी के साथ दसेक साल पहले रायपुर से कोरबा जाने का अवसर बना। रास्ते में तालाबों पर चर्चा होने लगी। अनुपम मिश्र की पुस्तकों का भी जिक्र आया। छत्तीसगढ़ में तालाबों के विभिन्न पक्षों पर मेरी बातों को वे ध्यान से सुनते रहे, फिर रास्ते में एक तालाब आया, वहां रुक कर उन्होंने तालाब के स्थापत्य पर सवाल किया और बातों का सार हुआ कि मैं जितनी बातें कह रहा हूं वह सब एक नोट बना कर उन्हें दिखाऊं, मैंने हामी भरी, लेकिन मुझे लगता रहा कि इसमें लिखने वाली क्या बात है, लिख कर क्या होगा। मेरी ओर से बात आई-गई हुई। कोरबा पहुंच कर उन्होंने फिर याद दिलाई, कहा रात को ही लिख लूं और दिखा दूं। बचने का कोई रास्ता नहीं रहा तो मैंने अगली सुबह तक मोहलत ली और कच्चा मसौदा, जो पिछली पोस्‍ट तालाब में आया है, उन्हें दिखाया, चक्रवर्ती जी ने इसमें रुचि ली। काफी समय बाद स्वयं इसे फिर से देखा तो लगा कि यह औरों की रुचि का भी हो सकता है। बहरहाल, इस तरह लगभग बिना सोचे शुरुआत हुई। अब सचेत समझ पाता हूं कि मेला, ग्राम देवता और तालाब तीन ऐसे क्षेत्र हैं, जिसमें निहित सामुदायिक-सांस्‍कृतिक जीवन लक्षण के प्रति मुझे आरंभ से आकर्षण रहा है। यहां तालाब पर कुछ और बातें-

• तालाबों के विवाह की परम्‍परा के साथ स्‍मरणीय है कि इस तरह का विवाह अनुष्‍ठान फलदार वृक्षों के लिए भी होता है, जिसके बाद विवाहित वृक्ष के फल का उपयोग आरंभ किया जाता है। तालाबों का विवाह, अवर्षा की स्थिति होने पर या जल-स्रोतों को सक्रिय करने के लिए किया जाने वाला अनुष्‍ठान है। तालाबों के कुंवारे रह जाने की तरह एक उदाहरण जिला मुख्‍यालय धमतरी के पास करेठा का है, जहां के ग्राम देवी-देवता अविवाहित माने जाते हैं, इस गांव को कुंआरीडीह भी कहा जाता है। बहरहाल, सन 2011 में 12-13 जून को जांजगीर-चांपा जिले के केरा ग्रामवासियों द्वारा राजापारा के रनसगरा तालाब का विवाह विधि-विधानपूर्वक कराया गया, जिसमें वर, भगवान वरुण और वरुणीदेवी को वधू विराजित कराया गया। इस मौके पर लोगों ने अस्सी साल पहले गांव के ही 'बर तालाब' के विवाह आयोजन को भी याद किया।




• सन 1900 में पूरा छत्तीसगढ़ अकाल के चपेट में था। इसी साल रायपुर जिले के एक हजार से भी अधिक तालाबों को राहत कार्य में दुरुस्त कराया गया। रायपुर के पास स्थित ग्राम गिरोद में ऐसी सूचना वाला उत्कीर्ण शिलालेख सुरक्षित है।




• 18 मई 1790 को अंगरेज यात्री जी.एफ. लेकी रायपुर पहुंचा था। उसने यहां के विशाल, चारों ओर से पक्‍के बंधे तालाब (संभवतः खो-खो तालाब या आमा तालाब) का जिक्र करते हुए लिखा है कि तालाब का पानी खराब था। 'नागपुर डिवीजन का बस्‍ता', दस्‍तावेजों में रायपुर और रतनपुर के तालाबों का महत्‍वपूर्ण उल्‍लेख मिलता है। प्रसिद्ध यात्री बाबू साधुचरणप्रसाद, अब जिनका नाम शायद ही कोई लेता है, 1893 में छत्‍तीसगढ़ आए थे। उन्‍होंने रायपुर के कंकाली तालाब, बूढ़ा तालाब, महाराज तालाब, अंबातालाब, तेलीबांध, राजा तालाब और कोको तालाब का उल्‍लेख किया है। इसी प्रकार पं. लालाराम तिवारी और श्री बैजनाथ प्रसाद स्‍वर्णकार की रचना 'रतनपुर महात्‍म्‍य' में भी रतनपुर के तालाबों का रोचक उल्‍लेख है।

• छत्तीसगढ़ की प्रथम हिंदी मासिक पत्रिका 'छत्तीसगढ़ मित्र' के सन्‌ 1900 के मार्च-अप्रैल अंक का उद्धरण है- ''रायपुर का आमा तलाव प्रसिद्ध है। यह तलाव श्रीयुत सोभाराम साव रायपुर निवासी के पूर्वजों ने बनवाया था। अब उसका पानी सूख कर खराब हो गया है। उपर्युक्त सावजी ने उसकी मरम्मत में 17000 रु. खर्च करने का निश्चय किया है। काम भी जोर शोर से जारी हो गया है। आपका औदार्य इस प्रदेश में चिरकाल से प्रसिद्ध है। सरकार को चाहिए कि इसकी ओर ध्यान देवे।''

• शुकलाल प्रसाद पांडे की कविता 'तल्लाव के पानी' की पंक्तियां हैं -
''गनती गनही तब तो इहां ल छय सात तरैया हे,
फेर ओ सब मां बंधवा तरिया पानी एक पुरैया हे।
न्हावन छींचन भइंसा-मांजन, धोये ओढ़न चेंदरा के।
ते मा धोबनिन मन के मारे गत नइये ओ बपुरा के॥
पानी नीचट धोंघट धोंघा, मिले रबोदा जे मा हे।
पंडरा रंग, गैंधाइन महके, अउ धराउल ठोम्हा हे।
कम्हू जम्हू के साग अमटहा, झोरहातै लगबे रांधे,
तुरत गढ़ा जाही रे भाई रंहन बेसन नई लागे।''

• पानी-तालाब के वैदिक संदर्भ पर भी दृष्टिपात करते चलें। वैदिक साहित्य में छोटे गड्‌ढे का जल- स्रुत्य, नदी का जल- नादेय और तराई की नदियों का जल- नीप्य, कुएं का जल कूप्य तो छोटे कुएं का जल अवट्‌य कहा गया है। दलदली भूमि का जल सूद्य तो नहर का जल कुल्य है। अनूप्य और उत्स्य, जलीय स्थानों और जलस्रोतों से निकलने वाला जल है। बावड़ी का जल वैशंत, झील का जल हृदय तो तालाब के जल के लिए सरस्य शब्द प्रयुक्त हुआ है।


• तालाब, उनसे जुड़ी मान्‍यताएं और एक-एक शब्‍द के साथ पूरी कथा है, नमूने के लिए 'मामा-भांजा', ‘छै आगर छै कोरी‘, 'सागर', 'बालसमुंद' और 'सरगबुंदिया'। तालाब के 'मामा-भांजा' नामकरण का कारण बताया जाता है कि किसी भांजे ने अपने नाम से तालाब खुदवाने के लिए अपने मामा को विश्‍वासपूर्वक जिम्मा दिया था, मामा ने साथ-साथ अपने नाम से भी एक तालाब खुदवा लेने के लिए भांजे का सहयोग चाहा, भांजे ने इसके लिए हामी भरी, तब मामा ने छलपूर्वक तालाब खुदवाने के लिए निचले हिस्से में, जहां पानी की अधिक संभावना थी, अपने नाम से और भांजे के लिए उथले स्थान का निर्धारण कर लिया। मौके पर पहुंचने से भांजे को स्थिति का पता लगा, उसने इसे नियति मानकर स्वीकार कर लिया, लेकिन काम पूरा होने के बाद ऊंचाई पर खुदे 'भांजा' तालाब में लबालब पानी भरा, लेकिन निचले हिस्से के 'मामा' तालाब सूखा रह गया, क्योंकि इसमें कोई प्राकृतिक जल-स्रोत नहीं था। बिलासपुर के मामा-भांजा तालाब जोड़े के भांजा तालाब पर अब आबादी बस गई है और मामा तालाब को ही मामा-भांजा तालाब कहा जाने लगा है, जिसमें आसपास के घरों के निकास का गंदा पानी जमा होता है।साथ ही खल्‍लारी, महासमुंद के पास एक गांव का नाम ही मामा भांचा है। इस गांव के एक छोर पर अंगारमोती देवता वाला गधिया तरिया है, जिसके पास देवता मामा-भांचा की मान्‍यता वाला उकेरा जोड़ा-पत्‍थर है। बताया जाता है कि भूलवश मामा का बाण लग जाने से भांजे की मौत हो गई, ग्‍लानिवश मामा ने भी अपनी इहलीला समाप्‍त कर ली, वही मामा-भांचा देवता हुए, अब पूजित हैं।

‘छै आगर छै कोरी‘ की गिनती, एक सौ छब्बीस को भी बूझते चलें। यह पहेली जैसा कि सौ हो जाता है, एक सौ छब्बीस। इसका आधार पांच, बीस और सौ की गिनती है। पांच की गिनती एक हाथ की ऊंगली, और बीस दोनों हाथ और दोनों पैर की पांच-पांच, सारी उंगलियां मिलाकर हुईं बीस। या एक हाथ की पांच उंगलियों के तीन-तीन पोर और एक सिरा, इस तरह हर ऊंगली पर चार की गिनती और पांच उंगलियां पर मिल कर बीस हुईं। यही बीस हुआ कोरी और पांच कोरी हुआ सौ, मगर इसमें छठवां कोरी और उस पर भी छै आगर कहां से आ जाता है। वह ऐसे कि किसी वस्तु, फल आदि की खरीद-फरोख्त या लेन-देन में चलन रहा है पुरौनी का। पुरौनी इसलिए कि दी जा रही पांच वस्तुओं में एक खराब निकले, टूट-फूट हो तब भी संख्या पांच ही रहे, इस तरह हर पांच पर एक की पुरौनी से वह छै हो जाता है, तो हर बीस चौबीस हो जाता है। इस तरह आगे बढ़ते बीस पूरा होने की भी एक पुरौनी होती है, इससे चौबीस, पच्चीस हो जाता है। ऐसा पांच बार करते सौ पर पहुंचते हैं तो संख्या हो जाती है एक सौ पच्चीस अंत में यह पूरा होने पर फिर एक, इस तरह पूरे हुए एक सौ छब्बीस, ‘यानि छै आगर छै कोरी‘। तालाबों के लिए, सौ का संकल्प हो तो इस संभावना का ध्यान रखते हुए कि अगर सौ में से कुछ का काम पूरा न हो पाए, किसी में पानी न आए, इस तरह की और कोई अड़चन आ जाने पर भी सौ का संकल्प प्रतीकात्मक न हो वास्तविक हो, इसलिए छै आगर छै कोरी तालाब की योजना-गणना होती थी और अधिकतर सभी सफल होते थे, ऐसा न होने पर और छै आगर छै कोरी रूढ़ हो जाने के कारण और भी अतिरिक्त तालाब खुदवाए जाते थे।

सागर, नरियरा ग्राम का विशाल तालाब है। इस तालाब में पारस पत्‍थर होने की किस्‍सा बताया जाता है- एक बरेठिन सागर तालाब में नहाने गई, वहां पैर के आभूषण, पैरी को दुरुस्‍त करने की जरूरत हुई, उसने घाट पर पड़ा पत्‍थर ले कर ठोंक-पीट किया और वापस घर आ गई। घर में ध्‍यान गया कि उस पैरी में सुनहरी चमक है। पूछताछ होने लगी। बरेठिन को तालाब वाली बात याद आई और यह बताते ही खबर जंगल की आग की तरह पूरे इलाके में फैल गई कि नरियरा के सागर तालाब में पारस पत्‍थर है, खोज होने लगी, लेकिन सब बेकार। बात अंगरेज सरकार तक पहुंची। कुछ ही दिनों में अंगरेज अधिकारी नरियरा आए, उनके साथ दो हाथी और तालाब की लंबाई की लोहे की जंजीर थी। हाथियों के पैर में जंजीर बांधी गई और दोनों हाथियों को तालाब के आर-पार जंजीर को डुबाते हुए, तालाब की परिक्रमा कराई गई। जंजीर बाहर आई तो उसकी ढाई कड़ी सोने की थी, लेकिन इसके बाद भी उस पारस पत्‍थर को नहीं मिलना था तो वह नहीं मिला और अब भी यह आस-विश्‍वास बना हुआ है। वैसे इस तालाब आबपाशी से खेतों से धान और बरछा से गन्‍ना, सब्जियां सोना ही उगलती हैं। पारस पत्‍थर की इससे मिलती-जुलती कहानी सिरपुर के रायकेरा तालाब के साथ और बड़े डोंगर (भंडारिन डोंगरी) के छिन्द तरई के साथ भी जुड़ी है।

पलारी का बालसमुंद देखकर, उसके नामकरण का स्‍वाभाविक अनुमान होता है कि तालाब का विशाल आकार इसका कारण है। लेकिन यहां एक रोचक किस्‍सा है कि इसे नायक सरदार ने छैमासी रात में शोध-विचार कर खुदवाया, परन्तु तालाब सूखा का सूखा रहा। नायक सरदार ने जानकारों से राय की और उनके बताये अनुसार लोक-मंगल की कामना करते अपने नवजात शिशु को सूखे खुदे तालाब में परात में रख कर छोड़ दिया। देखते ही देखते रात बीतते में तालाब लबालब हो गया और नवजात परात सहित पानी पर उतराने लगा। इसी वजह से तालाब का नाम बालसमुंद हुआ। प्रसंगवश, जल-स्रोत और उसके लोकोपयोग से जुड़ी एक वास्‍तविक प्रसंग है, बिलासपुर जिले के गनियारी का। इस गांव में पीने के पानी की कमी को देखकर गांव के प्रमुख दिघ्रस्‍कर-शास्‍त्री परिवार ने कुआं खुदवाया, इसी दौरान गांव की चर्चा उनके कान में पड़ी कि यह कुआं तो वे अपने लिए खुदवा रहे हैं और यश पाना चाह रहे हैं कि जन-कल्‍याण का काम कर रहे हैं। जिस दिन कुएं का पूजन-लोकार्पण हुआ, परिवार प्रमुख ने घोषणा कर दी कि अब वे इस कुएं का क्‍या, इस गांव का भी पानी नहीं पिएंगे, और दिघ्रस्‍कर परिवार के लोग आज भी गनियारी जाते हुए पीने का पानी अपने साथ ले जाते हैं।

अब सरगबुंदिया, यानि? मतलब एकदम साफ है, सरग+बुंदिया, सरग=स्‍वर्ग और बुंदिया=बूंदें, यानि स्‍वर्ग की बूंदें, अमृतोपम जल, ऐसा तालाब जिसका पानी साफ, मीठा हो। भाषाशास्‍त्र में हाथ आजमाते और तालाबों की खोज-खबर लेते यह मेरे लिए मुश्किल नहीं रह गया है। तालाबों की बात करते हुए अब मैं लोगों को अपनी इस स्‍थापना को मौका बना कर सगर्व बताता, सरगबुंदिया यानि पनपिया यानि जिस तालाब का पानी, पीने के लिए उपयोग होता है। एक दिन मेरी बातें सुनकर किसी बुजुर्ग ने धीरे से बात संभाली और मुझे बिना महसूस कराए सुधारा कि सरगबुंदिया में पानी का कोई सोता नहीं है, न भराव-ठहराव न रसन-आवक, बस स्‍वर्ग की बूंदों, बरसात के भरोसे है। देशज भाषा का सौंदर्य। जान गया कि अभी तालाबों पर जानकारियां ही जुटाना है, मेरी समझ इतनी नहीं बनी है कि उन‍की साधिकार व्‍याख्‍या करने लगूं।

• 1909-10 के रायपुर जिला गजेटियर में, जिले की खास विशेषता यहां बड़ी संख्या में तालाबों का होना कहा गया है, जबकि बिलासपुर जिला गजेटियर में उल्लेख है कि छोटे गांवों में भी कम से कम एक और बड़े गांवों में पांच या छह तालाब होते हैं। रतनपुर में 150 तालाब हैं और जिले में छोटे-बड़े मिला कर कुल 7018 तालाब हैं। डॉ. महेश कुमार चंदेले ने रायपुर के नगरीय भूगोल के अपने अध्‍ययन में बताया है कि नगर के कुल क्षेत्रफल का 7.90 प्रतशित यानि 308.89 हेक्‍टेयर क्षेत्र तालाबों का है। रायपुर के भूगोलविद, प्रो. एन.के. बघमार के रायपुर जिले के जल-संसाधन पर शोध प्रबंध में तत्‍कालीन (1988) जिले में 25935 तालाब आंकड़ा है। वे स्‍पष्‍ट करते हैं कि छत्‍तीसगढ़ में 35000 तालाब बताए जाते हैं, जबकि रिमोट सेंसिंग से लगभग 64000 तालाबों का पता चलता है। उनके निर्देशन में श्री जितेन्‍द्र कुमार घृतलहरे ने 'रायपुर जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में तालाबों का भौगोलिक अध्‍ययन' शीर्षक से सन 2006 में शोध किया है।

• छत्‍तीसगढ़ लोक स्‍वास्‍थ्‍य यांत्रिकी विभाग में रहे रामनिवास गुप्ता जी इन दिनों इंडियन वाटर वर्क्‍स एसोसिएशन के अध्‍यक्ष हैं (मुझे अजीब लगा कि डा. बघमार और श्री गुप्‍ता की आपस में कोई मेल-मुलाकात नहीं है, दोनों रायपुर में ही रहते हुए, एक-दूसरे के काम से क्‍या नाम से भी परिचित नहीं), उन्‍होंने 'छत्‍तीसगढ़ में ताल-तलैये और देवालय, 21 वीं सदी में जल', ''कटघरे में हम'' शीर्षक से पुस्तिका सन 2005 में प्रकाशित कराई है। इस पुस्तिका में तत्‍कालीन बिलासपुर संभाग के तालाबों की जल संग्रहण क्षमता का अध्‍ययन के साथ मंदिर एवं वृक्षों की तालिका बनाई गई है, यद्यपि कई स्‍थानों पर आंकड़ों का जोड़ न होने और विसंगति से लगता है कि ये अनंतिम संख्‍या है, किन्‍तु अनुमान के लिए ये आंकड़े पर्याप्‍त हैं। पुस्तिका के अनुसार 7802 ग्रामों में निर्मित 13381 तालाबों के जल भराव में 30 से 45 प्रतिशत तक कमी आई है। पुनः 13662 तालाबों पर स्थित कुल 70964 वृक्षों में, आम-42916, पीपल-4200, बरगद-3539, नीम-3570, बबूल-3381, जामुन-589, खम्‍हार-400, सेमर-683, तेंदू-2775, महुआ-2929, अन्‍य-5982 हैं। 13662 तालाबों के पर स्थित कुल 6167 मंदिरों में 3791 शिव मंदिर, 1881 हनुमान मंदिर और 495 अन्‍य मंदिरों के तत्‍कालीन जिलेवार आंकड़े दिए गए हैं। श्री गुप्‍ता ने बताया कि उन्‍होंने पूरे छत्‍तीसगढ़ के तालाबों के आंकड़े भी इकट्ठे कराए हैं और रतनपुर के तालाबों का व्‍यापक सर्वेक्षण-अध्‍ययन किया है, यद्यपि यह अब तक कहीं प्रकाशित नहीं हुआ है।

• स्वच्छ जल के लिए निर्धारित मानक में पानी का रंग, कठोरता, अम्लता, घुलनशील ठोस के अलावा उसमें लौह, क्लोराइड, मैगनेशियम, मैगनीज, फ्लोराइड, मरकरी, जिंक की मात्रा आदि बिंदुओं पर परख की जाती है। अक्‍सर यह देखा गया है कि तालाबों का सौन्दर्यीकरण उनके लिए अनुकूल साबित नहीं होता और ऐसे प्रयासों में तालाब के स्‍थापत्‍य का ध्‍यान न रखा गया तो जल की शुद्धता और स्‍वच्‍छता का स्तर घटता जाता है। ऐसे उदाहरणों की भी चर्चा होती है, जिसमें सौन्दर्यीकरण के चलते निकास प्रभावित होने से अशुद्धि बढ़ी, तालाब का प्रयोग कम होने लगा, उपेक्षा हुई, साथ ही स्रोत प्रभावित होने के फलस्‍वरूप तालाब का अस्तित्‍व ही समाप्‍त हो गया। निसंदेह, नये तालाबों के निर्माण या तालाबों के मनमाने सौंदर्यीकरण की बजाय विद्यमान को यथावत बनाए रखना ही पर्याप्‍त होगा। ज्‍यों ज्‍यादातर कुएं उपयोग न होने से बड़े कूड़ादान बन जाते हैं, उसी तरह उपयोगिता और अनुशासन कायम न रहे तो तालाबों का अघोषित 'सालिड वेस्‍ट डंपिंग स्‍टेशन' बन कर, नई बसाहट के लिए प्‍लाट में तब्‍दील होते देर नहीं लगती। उदाहरण- रायपुर नगर के मध्य का पंडरी तरई अब घनी बसाहट वाला पंडरी रह गया है, लेंडी तालाब शास्त्री बाजार हो गया है और रजबंधा तालाब, जो कुछ दिन पहले तक रजबंधा मैदान रहा, अब यहां स्वतंत्रता सेनानियों का शहीद स्मारक भवन और प्रेस कॉम्प्लेक्स वाला रजबंधा व्यावसायिक परिसर है।

पारम्‍परिक सामुदायिक जीवन का केन्‍द्र और प्रतिबिम्‍ब तालाबों, उनकी पनीली यादों में अब आधुनिक जीवन-शैली की जरूरतें परिलक्षित होने लगी हैं।

Wednesday, November 14, 2012

तालाब

छत्तीसगढ़ की सीमावर्ती पहाड़ियां उच्चता, प्राकृतिक संसाधनयुक्त रत्नगर्भा धरती सम्पन्नता, वन-कान्तार सघनता का परिचय देती हैं तो मैदानी भाग उदार विस्तार का परिचायक है। इस मैदानी हिस्से की जलराशि में सामुदायिक समन्वित संस्कृति के दर्शन होते हैं, जहां जल-संसाधन और प्रबंधन की समृद्ध परम्परा के प्रमाण, तालाबों के साथ विद्यमान है और इसलिए तालाब स्नान, पेयजल और अपासी (आबपाशी या सिंचाई) आवश्यकताओं की प्रत्यक्ष पूर्ति के साथ जन-जीवन और समुदाय के वृहत्तर सांस्कृतिक संदर्भयुक्त बिन्दु हैं।

अहिमन रानी और रेवा रानी की गाथा तालाब स्नान से आरंभ होती है। नौ लाख ओड़िया, नौ लाख ओड़निन के उल्लेख सहित दसमत कइना की गाथा में तालाब खुदता है और फुलबासन की गाथा में मायावी तालाब है। एक लाख मवेशियों का कारवां लेकर चलने वाला लाखा बंजारा और नायकों के स्वामिभक्त कुत्ते का कुकुरदेव मंदिर सहित उनके खुदवाए तालाब, लोक-स्मृति में खपरी, दुर्ग, मंदिर हसौद, पांडुका के पास, रतनपुर के पास करमा-बसहा, बलौदा के पास महुदा जैसे स्थानों में जीवन्त हैं।

गाया जाता है- 'राम कोड़ावय ताल सगुरिया, लछिमन बंधवाय पार।' खमरछठ (हल-षष्ठी) की पूजा में प्रतीकात्मक तालाब-रचना और संबंधित कथा में तथा बस्तर के लछमी जगार गाथा में तालाब खुदवाने संबंधी पारम्परिक मान्यता और सुदीर्घ परम्परा का संकेत है। रतनपुर का घी-कुडि़या तालाब राजा मोरध्‍वज के अश्‍वमेध यज्ञ आयोजन में घी से भरा गया था, माना जाता है। सरगुजा अंचल में कथा चलती है कि पछिमहा देव ने सात सौ तालाब खुदवाए थे और राजा बालंद, कर के रूप में खीना लोहा वसूलता और जोड़ा तालाब खुदवाता, जहां-जहां रात बासा, वहीं तालाब। उक्ति है- ''सात सौ फौज, जोड़ा तलवा; अइसन रहे बालंद रजवा।'' विशेषकर पटना (कोरिया) में कहा जाता है- सातए कोरी, सातए आगर। तेकर उपर बूढ़ा सागर॥

तालाबों की बहुलता इतनी कि 'छै आगर छै कोरी', यानि 126 तालाबों की मान्यता रतनपुर, मल्हार, खरौद, महन्त, नवागढ़, अड़भार, आरंग, धमधा जैसे कई गांवों के साथ सम्बद्ध है। सरगुजा के महेशपुर और पटना में तथा बस्तर अंचल के बारसूर, बड़े डोंगर, कुरुसपाल और बस्तर आदि ग्रामों में 'सात आगर सात कोरी'- 147 तालाबों की मान्यता है, इन गांवों में आज भी बड़ी संख्‍या में तालाब विद्यमान हैं। कहा जाता है कि दुर्गा देवी के आदेश से कुमडाकोटया राजा बड़े डोंगर में प्रतिदिन एक तालाब खुदवाते थे। इस तरह सात आगर सात कोड़ी यानि 147 तालाब, 147 दिनों में खुदवाए थे- 'सात कोड़ी, सात आगर। तीन बंधा, तीन सागर।' इनमें 147 तालाबों के अलावा बूढ़ा सागर, गंगा सागर और मांकदर सागर, ये तीन सागर हैं साथ ही संवसार बंधा, डंडई बंधा और पंडरा बंधा, से तीन बंधा हैं। 'लखनपुर में लाख पोखरा' यानि सरगुजा की लखनपुर जमींदारी में लाख तालाब कहे जाते थे, अब यह गिनती 360 तक पहुंचती है। छत्तीसगढ़ में छत्तीस से अधिक संख्‍या में परिखा युक्त मृत्तिका-दुर्ग यानि मिट्‌टी के किले या गढ़ जांजगीर-चांपा जिले में ही हैं, इन गढ़ों के साथ खाई, जल-संसाधन की दृष्टि से आज भी उपयोगी है। रायपुर और सारंगढ़ के श्रृंखलाबद्ध तालाब और उनकी आपसी सम्बद्धता के अवशेष स्मृति में और मौके पर अब भी विद्यमान है।

भीमादेव, बस्तर और जनजातीय मान्‍यताओं में पाण्डव नहीं, बल्कि पानी-कृषि के देवता हैं। जांजगीर और घिवरा ग्राम में भी भीमा नामक तालाब हैं। बस्तर में विवाह के कई नेग-चार पानी और तालाब से जुड़े हैं। कांकेर क्षेत्र में विवाह के अवसर पर वर-कन्या तालाब के सात भांवर घूमते हैं और परिवारजन सातों बार हल्दी चढ़ाते हैं। दूल्हा अपनी नव विवाहिता को पीठ पर लाद कर स्नान कराने जलाशय भी ले जाता है और पीठ पर लाद कर ही लौटता है।
यह रोचक है कि आमतौर पर समाज से दूरी बनाए रखने वाले नायक, सबरिया, भैना, लोनिया, मटकुड़ा, मटकुली, बेलदार और रामनामियों की भूमिका तालाब निर्माण में महत्वपूर्ण होती है और उनकी विशेषज्ञता तो काल-प्रमाणित है ही। छत्तीसगढ़ में पड़े भीषण अकाल के समय किसी अंग्रेज अधिकारी, संभवतः एग्रीकल्‍चर एंड हार्टिकल्‍चर सोसायटी आफ इंडिया के 19 वीं सदी के अंत में सचिव रहे जे. लेंकेस्‍टर, की पहल पर खुदवाए गए उसके नाम स्मारक बहुसंख्‍य 'लंकेटर तालाब' अब भी जल आवश्यकता की पूर्ति और राहत कार्य के संदर्भ सहित विद्यमान हैं।

छत्तीसगढ़ में तालाबों के विवाह की परम्परा भी है, जिस अनुष्ठान (लोकार्पण का एक स्वरूप) के बाद ही उसका सार्वजनिक उपयोग आरंभ होता था। विवाहित तालाब की पहचान सामान्यतः तालाब के बीच स्थित स्तंभ से होती है। लकड़ी के इन स्‍तंभों का स्‍थान अब सीमेंट लेने लगा है और सक्ती के महामाया तालाब में उल्‍लेखनीय लोहे का स्तंभ स्थापित है, स्तंभ से घटते-बढ़ते जल-स्तर की माप भी हो जाती है। किरारी, जांजगीर के हीराबंध तालाब से प्राप्त स्तंभ पर खुदे अक्षरों के आधार पर यह दो हजार साल पुराना प्रमाणित है। इस प्राचीनतम काष्ठ उत्कीर्ण लेख से तत्कालीन राज पदाधिकारियों की जानकारी मिलती है। कुछ तालाब अविवाहित भी रह जाते हैं, लेकिन चिन्त्य या पीढ़ी पूजा के लिए ऐसे तालाब का ही जल उपयोग में आता है।
बिलासपुर के पास बिरकोना का कपुरताल
सूखे तालाब में पुराने लकड़ी के स्‍तंभ का अंश
तथा बाद में बना सीमेंट का स्‍तंभ
तालाबों के स्थापत्य में कम से कम मछन्दर (पानी के सोते वाला तालाब का सबसे गहरा भाग), नक्खा या छलका (लबालब होने पर पानी निकलने का मार्ग), गांसा (तालाब का सबसे गहरा किनारा), पैठू (तालाब के बाहर अतिरिक्त पानी जमा होने का स्थान), पुंछा (पानी आने व निकासी का रास्ता) और मेढ़-पार होता है। तालाबों के प्रबंधक अघोषित-अलिखित लेकिन होते निश्चित हैं, जो सुबह पहले-पहल तालाब पहुंचकर घटते-बढ़ते जल-स्तर के अनुसार घाट-घठौंदा के पत्थरों को खिसकाते हैं, घाट की काई साफ करते हैं, दातौन की बिखरी चिरी को इकट्ठा कर हटाते हैं और इस्तेमाल के इस सामुदायिक केन्द्र के औघट (पैठू की दिशा में प्रक्षालन के लिए स्थान) आदि का अनुशासन कायम रखते हैं। घाट, सामान्‍यतः पुरुषों, महिलाओं के लिए अलग-अलग, धोबी घाट, मवेशी घाट (अब छठ घाट) और मरघट होता है। तालाबों के पारंपरिक प्रबंधक ही अधिकतर दाह-संस्कार में चिता की लकड़ी जमाने से लेकर शव के ठीक से जल जाने और अस्थि-संचय करा कर, उस स्थान की शांति- गोबर से लिपाई तक की निगरानी करते हुए सहयोग देता है और घंटहा पीपर (दाह-क्रिया के बाद जिस पीपल के वृक्ष पर घट-पात्र बांधा जाता है) के बने रहने और आवश्यक होने पर इस प्रयोजन के वृक्ष-रोपण की व्यवस्था भी वही करता है। अधिकतर ऐसे व्यक्ति मान्य उच्च वर्णों के होते हैं।

तालाबों का नामकरण सामान्यतः उसके आकार, उपयोग और विशिष्टता पर होता है, जैसे पनपिया या पनखत्‍ती, निस्तारी और अपासी (आबपाशी) और खइया, नइया, पंवसरा, पंवसरी, गधियाही, सोलाही या सोलहा, पचरिहा, सतखंडा, अड़बंधा, छुइखदान, डोंगिया, गोबरहा, खदुअन, पुरेनहा, देउरहा, नवा तलाव, पथर्रा, टेढ़ी, कारी, पंर्री, दर्री, नंगसगरा, बघबुड़ा, गिधवा, केंवासी (केंवाची)। बरात निकासी, आगमन व पड़ाव से सम्बद्ध तालाब का नाम दुलहरा पड़ जाता है। तालाब नामकरण उसके चरित्र-इतिहास और व्यक्ति नाम पर भी आधारित होता है, जैसे- फुटहा, दोखही, भुतही, करबिन, काना भैरा, छुइहा, टोनही डबरी, सोनईताल, फूलसागर, मोतीसागर, रानीसागर, राजा तालाब, रजबंधा, गोपिया आदि। जोड़ा नाम भी होते हैं, जैसे- भीमा-कीचक, सास-बहू, मामा-भांजा, सोनई-रूपई। 'पानी-पोखर' दिनचर्या का तो 'तलाव उछाल' जीवन-मरण का शब्‍द है।
रानी पोखर, डीपाडीह, सरगुजा
पानी और तालाब से संबंधित ग्राम-नामों की लंबी सूची हैं और उद, उदा, दा, सर (सरी भी), सरा, तरा (तरी भी), तराई, ताल, चुआं, बोड़, नार, मुड़ा, पानी आदि जलराशि-तालाब के समानार्थी शब्दों के मेल से बने हैं। उद, उदा, दा जुड़कर बने ग्राम नाम के कुछ उदाहरण बछौद, हसौद, तनौद, मरौद, रहौद, लाहौद, चरौदा, कोहरौदा, बलौदा, मालखरौदा, चिखलदा, बिठलदा, रिस्दा, परसदा, फरहदा हैं। सर, सरा, सरी, तरा, तरी, के मेल से बने ग्राम नाम के उदाहरण बेलसर, भड़ेसर, लाखासर, खोंगसरा, अकलसरा, तेलसरा, बोड़सरा, सोनसरी, बेमेतरा, बेलतरा, सिलतरा, भैंसतरा, अकलतरा, अकलतरी, धमतरी है। तरई या तराई तथा ताल के साथ ग्राम नामों की भी बहुलता है। कुछ नमूने डूमरतराई, शिवतराई, जोरातराई, पांडातराई, बीजातराई, सेमरताल, उड़नताल, सरिसताल, अमरताल हैं। चुआं, बोड़ और सीधे पानी जुड़कर बने गांवों के नाम बेंदरचुआं, घुंईचुआं, बेहरचुआं, जामचुआं, लाटाबोड़, नरइबोड़, घघराबोड़, कुकराबोड़, खोंगापानी, औंरापानी, छीरपानी, जूनापानी जैसे ढेरों उदाहरण हैं। स्थानों का नाम सागर, डबरा तथा बांधा आदि से मिल कर भी बनता है तो जलराशि सूचक बंद के मेल से बने कुछ ग्राम नाम ओटेबंद, उदेबंद, कन्हाइबंद, हाड़ाबंद, बिल्लीबंद जैसे हैं। ऐसा ही एक नाम अब रायपुर का मुहल्ला टाटीबंद है। वैसे टाटा और टाटी ग्राम नाम भी छत्तीसगढ़ में हैं, जिसका अर्थ छिछला तालाब जान पड़ता है।

संदर्भवश, छत्तीसगढ़ की प्रमुख नदी का नाम महानदी है तो सरगुजा में महान नदी और यहीं एक मछली नदी भी है, इसी तरह मेढकी नदी कांकेर में है। सरगुजा में ही सूरजपुर-प्रतापपुर के गोविंदपुर के पास नदी 'रजमेलान' के एक तट-स्थान को पद्मश्री राजमोहिनी देवी की ज्ञान-प्राप्ति का स्थाान माना जाता है, रोचक यह कि रजमेलान, वस्तुतः नदी नहीं बल्कि 'रज' नामक नदी में एक छोटी जलधारा 'सत्' के मिलान यानि संगम का स्थान है। इसी अंचल की साफ पानी वाली बारहमासी पिंगला नदी ने तमोर पहाड़ी के साथ 'तमोर पिंगला' अभयारण्य को नाम दिया है। कांकेर में दूध नदी, फिंगेश्‍वर में सूखा नदी और बीजापुर में मरी नदी है तो एक जिला मुख्‍यालय का नाम महासमुंद है और ग्राम नाम बालसमुंद (बेमेतरा) भी है लेकिन रायपुर बलौदा बाजार-पलारी का बालसमुंद, विशालकाय तालाब है। जगदलपुर का तालाब, समुद्र या भूपालताल बड़ा नामी है। बारसूर में चन्‍द्रादित्‍यसमुद्र नामक तालाब खुदवाए जाने के अभिलेखीय प्रमाण है। इसी तरह तालाबों और स्थानों का नाम सागर, डबरा तथा बांधा आदि से मिल कर भी बनता है। तालाब अथवा जल सूचक स्वतंत्र ग्राम-नाम तलवा, झिरिया, बंधवा, सागर, रानीसागर, डबरी, गुचकुलिया, कुंआ, बावली, पचरी, पंचधार, सरगबुंदिया, सेतगंगा, गंगाजल, नर्मदा और निपनिया भी हैं। जल-स्रोत या उससे हुए भराव को झिरिया कहा जाता है, इसके लिए झोड़ी या ढोढ़ी, डोल, दह, दहरा, दरहा और बहुअर्थी चितावर शब्द भी हैं।

कार्तिक-स्नान, ग्रहण-स्नान, भोजली, मृतक संस्कार के साथ नहावन और पितृ-पक्ष की मातृका नवमी के स्नान-अनुष्ठान, ग्राम-देवताओं की बीदर-पूजा, अक्षय-तृतीया पर बाउग (बीज बोना) और विसर्जन आदि के अलावा पानी कम होने जाने पर मतावल, तालाब से सम्बद्ध विशेष अवसर हैं। सावन अमावस्या पर हरेली की गेंड़ी, भाद्रपद अमावस्या पर पोरा के दिन, तालाब का तीन चक्कर लगाकर पउवा (पायदान) विसर्जन और चर्मरोग निदान के लिए तालाब-विशेष में स्‍नान, लोक विधान है। विसर्जित सामग्री के समान मात्रा की लद्‌दी (गाद) तालाब से निकालना पारम्परिक कर्तव्य माना जाता है। ग्रामवासियों द्वारा मिल-जुल कर, गांवजल्ला लद्‌दी निकालने के लिए गांसा काट कर तालाब खाली कर लिया जाता है। बरसात में, नदी-नाले का पुराना छूटा प्रवाह मार्ग-सरार, तालाब बन जाता है। गरमियों में पानी सूख जाने पर तालाब में पानी जमा करने के लिए छोटा गड्‌ढ़ा- झिरिया बना कर पझरा (पसीजे हुए) पानी से आवश्यकता पूर्ति होती है। खातू (खाद) पालने के लिए सूखे तालाब का राब और कांपू मिट्‌टी निकालने की होड़ लग जाती है।

तालाब की सत्ता, उसके पारिस्थितिकी-तंत्र के बिना अधूरी है जिसमें जलीय वनस्पति- गधिया, चीला, रतालू (कुमुदनी), खोखमा, उरई, कुस, खस, पसहर, पोखरा (कमल), पिकी, जलमोंगरा, ढेंस कांदा, कुकरी कांदा, सरपत, करमता, सुनसुनिया, कुथुआ, जलीय जन्तु सीप-घोंघी, जोंक, संधिपाद, चिड़िया (ऐरी), उभयचर आदि और कभी-कभार ऊद व मगर भी होते हैं। मछलियों के ये नाम छत्तीसगढ़ में सहज ज्ञात हैं- कतला, कोतरा-कोतरी, रोहू, मिरकल, सोढ़िहा या सोंढ़ुल, सिंगार, पढ़िना, भुंडी, सांवल, बामी, काराझिंया, बोलिया या लपची, केउ या रुखचग्घा, केवई, मोंगरी, खोखसी या खेकसी, टेंगना, सवांगी, सलांगी या सरांगी, तेलपिया, ग्रासकाल। तालाब जिनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं, उनकी जबान पर कटरंग, सिंगी-सिंघा-कटरा, कुसरा, कटही, केसरी, लुदू, झोरी, बंजू, भाखरी, भाकुर, गिवना, गुरदा, गुंगवारी, लुडुवा, डुडुंग, डंडवा-डंडिया, ढेंसरा, बिजरवा, खेगदा, रुदवा, कोकिया, रोहिछा, रेछा, खेंसरा, गिनवा, भेंड़ो, मोहराली, घंसरा, अइछा, पथर्री, चंदैनी, भेर्री, चिल्हाटी, फलिया, बामर, बूंच, मलाज जैसे मछलियों के नाम भी होते हैं।
बड़े कछुए और मछलियों वाला सरोना का तालाब
जलीय जन्तुओं को देवतुल्य सम्मान देते हुए सोने का नथ पहनी मछली और लिमान (कछुआ) का तथ्य और उससे सम्बद्ध विभिन्न मान्यताएं रायपुर के निकट ग्राम सरोना और कोटगढ़-अकलतरा के सतखंडा तालाब जैसे उदाहरणों में उसकी पारस्थितिकी, सत्ता की पवित्रता और निरंतरता की रक्षा करती हैं। इसी तरह 'तरिया गोसांइन' और 'अंगारमोती' जैसे ग्राम देवता खास तालाबों के देवता हैं, जो ग्राम के जल-आवश्यकता की पूर्ति का ध्यान रखते है, जिन तालाबों में ऐसे देवता वास हो, उनके जल का शौच के लिए इस्‍तेमाल नहीं किया जाता, कोई अन्‍जाने में ऐसा कर बैठे तो देवता उसे माफ तो करता है, लेकिन सचेत करते हुए आभास करा देता है कि भविष्‍य में भूल न हो, और फिर भी तालाब के पारम्परिक नियमों की उपेक्षा या लापरवाही हो तो सजा मिलती है।

सामुदायिक-सहकारी कृषि का क्षेत्र- बरछा, कुसियार (गन्ना) और साग-सब्जी की पैदावार के लिए नियत तालाब से लगी भूमि, पारंपरिक फसल चक्र परिवर्तन और समृद्ध-स्वावलंबी ग्राम की पहचान माना जा सकता है। बंधिया में अपाशी के लिए पानी रोका जाता है और सूख जाने पर उसका उपयोग चना, अलसी, मसूर, करायर उपजाने के लिए कर लिया जाता है। आम के पेड़ों की अमरइया, स्नान के बाद जल अर्पित करने के लिए शिवलिंग, देवी का स्थान- माताचौंरा या महामाया और शीतला या नीम के पेड़, अन्य वृक्षों में वट, पीपल (घंटहा पीपर) और आम के पेड़ों की अमरइया भी प्रमुख तालाबों के अभिन्न अंग हैं।

झिथरी, मिरचुक, तिरसाला, डोंगा, पारस-पत्थर, हंडा-गंगार, पूरी बरात तालाब में डूब जाना (नाउ बरात, बरतिया भांठा) या पथरा जाना जैसी मान्यता, तालाब के चरित्र को रहस्यमय और अलौकिक बनाती है तो पत्थर की पचरी, मामा-भांजा की कथा, राहगीरों के उपयोग के लिए तालाब से बर्तन निकलना और भैंसे के सींग में जलीय वनस्पति-चीला अटक जाने से किसी प्राचीन निर्मित या प्राकृतिक तालाब के पता लगने का विश्वास, जन-सामान्य के इतिहास-जिज्ञासा की पूर्ति करता है।

दसेक साल पहले वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी डा. के.के.चक्रवर्ती जी से हुई चर्चा के बाद उनके निर्देश पर मेरे द्वारा तैयार मूल नोट के आधार पर, बाकी कुछ बातें और चित्र अगली पोस्ट 'तालाब परिशिष्ट' में।

Wednesday, January 12, 2011

गिरोद

यही है इस कथा का शीर्षक और गांव का नाम- गिरोद। किसी छोर से शुरू हो सकने वाली और जहां चाहे रोकी जा सकने वाली कथा। देखिए किस तरह। दस साल पुराने छत्तीसगढ़ विधान सभा से पांच किलोमीटर के दायरे में। लोहा कारखाने के पास, पंद्रह साल से जिसकी भारी मशीनों का तानपूरा यहां जीवन-लय को आधार दे रहा है। कोई बारह सौ साल पुराने अवशेष युक्त गांव का अब यही पता है। वैसे गांव का स्थानीय उच्चारण है- गिरौद या गिरउद। आपका हार्दिक स्वागत है।
गांव के एक छोर पर तालाब के किनारे कोई डेढ़ सौ साल पुराना मंदिर है, जिसका निर्माण गांव प्रमुख दाऊ परिवार ने कराया। पत्थर की नक्काशी वाले स्तंभों और प्रवेश द्वार वाला स्थापत्य मराठा शैली का नमूना है।
खजुराहो में मिथुन मूर्तियों की बहुलता है और प्रसिद्धि यहां तक कि ऐसी कलाकृतियों को खजुराहो शैली नाम दे दिया जाता है, लेकिन ऐसे अंकन कमोबेश मंदिरों में दिख जाते हैं। माना जाता है कि इससे संरचना पर नजर नहीं लगती, बिजली नहीं गिरती, सचाई राम जाने। यह मंदिर भी इससे अछूता नहीं और इन पर नजर बरबस पड़ती है।
इस शिव मंदिर के पास ठाकुरदेव की पूजा-प्रतिष्‍ठा की परम्परा निर्वाह के लिए कमल वर्मा ने बइगाई का कोर्स किया है, गुरु सूरदास तिखुर वर्मा से प्रशिक्षण लिया, जिसके आरंभ के लिए हरेली अमावस्या और गुरु द्वारा सफल मान लिये जाने पर दीक्षांत के लिए नागपंचमी अथवा ऋषिपंचमी तिथि निर्धारित होती है।
समष्टि लोक के व्यवहार में विद्यमान और प्रचलित टोना-टोटका, रूढ़ि माना जा कर कभी प्रताड़ित भी होता है। दुर्घटनावश बनी परिस्थितियों के चलते अंधविश्वास कह कर तिरस्कार योग्य मान लिये जाने से अक्‍सर इसके पीछे अनवरत गतिमान व्यवस्था ओझल रह जाती है। इसके साथ चर्चा 'सवनाही छेना' की यानि अभिमंत्रित गोइंठा-कंडा, जो गांव बइगा सावन में शनिवार की रात पूजा कर, रविवार को घरों के दरवाजे पर लटका जाता है, ताकि अवांछित-अनिष्ट प्रवेश न कर सके।
घर के दरवाजे पर पहटनिन हर साल हांथा लिखती है। पहटनिन यानि पहटिया-गोसाइन और पहटिया यानि रात बीतते और पहट (प्रखेट? 'खेटितान' अर्थात्- वैतालिक, स्तुतिपाठक जो गृहस्वामी को गा बजा कर जगाता है) होते रोजमर्रा की पहली दस्तक देने वाला ठेठवार। पहट-मुंदियरहा, सुकुवा, कुकराबास, फजर, झुलझुलहा, पंगपंगाए बेरा, भिनसरहा, मुंह-चिन्‍हारी तब होता है परभाती, बिहनिया, रामे-राम के बेरा। हांथा के साथ कहीं शुभ-लाभ लिखा है और इन दिनों जनगणना का क्रमांक भी। हांथा के लिए अवसर होता है देवारी यानि बूढ़ी दीवाली, मातर अर्थात्‌ भैया दूज, जेठउनी एकादशी से कार्तिक पुन्नी तक। फिर इसी से मिलती-जुलती आकृतियां अगहन के बिरस्पत पूजा में चंउक बन कर आंगन में उतर आती हैं।

गांव का मुख्‍य हिस्सा है, दाऊ का निवास, गुड़ी और चंडी माता का चबूतरा। नवरात्रि पर जोत जलाने की परम्परा है और जिस तरह गिनती की शुरुआत एक के बजाय 'राम' बोल कर की जाती है, उसी तरह पहली ज्योति मां चंडी के नाम पर बिठाई जाती है।
चंडी दाई में ग्राम देवता की परम्परा और पुरातत्व घुल-मिल गए हैं यानि चंडी के रूप में पूजित सातवीं-आठवीं सदी ईस्वी की महिषमर्दिनी के साथ इतनी ही पुरानी प्रतिमाएं और स्थापत्य खंड भी हैं। चबूतरे पर पूजा के लिए तो दिन-मुहूरत होता है, लेकिन यह गुलजार रहता है, चिड़ी के गुलामों, पान की मेमों, ईंट के बादशाहों, हुकुम के इक्कों के साथ पूरी वाबन परियों से मानों देवालय के महामंडप में देवदासियों का नर्तन हो रहा हो और चौपड़ की बाजियों में असार संसार के मोहरे, तल्लीन साधक और उनके साथ सत्संगी से दर्शक भी जमा हैं। गांव के प्रवेश द्वार पर लीला मंच है और एक कमरे में बाना-सवांगा, वस्त्राभूषण सहित भजन-कीर्तन का बाजा-पेटी सरंजाम भी।
बुजुर्ग याद करते हैं, रेल लाइन के किनारे का डीह, यानि जहां कभी गांव आबाद था और बाद में वहीं संतरा, आम, केला, नीबू, अमरूद का मेंहदी की बाड़ वाला फलता-फूलता बगीचा था। लेकिन पिछले डेढ़-दो सौ सालों में धीरे-धीरे यहां, दो किलोमीटर दूर खिसक आया, आकर्षण बना वही शिव मंदिर और शायद कारण था सड़क और रेल से बदला कन्टूर, खेत और पानी। पुराना पचरी तालाब, जिसके बीच में चौकोर सीढ़ीदार कुंड बताया जाता है।
सन 1900 में पूरे छत्तीसगढ़ में महाअकाल का जिक्र होता है। इस साल मार्च माह में रायपुर जिले को 56 कार्य प्रभार क्षेत्र (चार्ज) में विभाजित कर राहत कार्य से लगभग 2 लाख लोगों को रोजगार मुहैया कराए जाने की बात पढ़ने को मिली थी, जिसमें एक हजार से भी अधिक पुराने तालाबों को दुरुस्त कराया गया था। यह अप्रत्याशित अभिलिखित मिल गया यहां, चार्ज नं.8 के काम का प्रमाण। लोग याद करते हैं- 'बड़े दुकाल पहर के, बिक्टोरिया रानी के सुधरवाए तलाव'

बात करते-करते पता लग रहा है गांव का पूरा इतिहास, व्यवस्थित और कालक्रमानुसार। काल निर्धारण के लिए शब्द इस्तेमाल हो रहे हैं- छमासी रात, पण्डवन काल, सतजुगी, बिसकर्मा के, रतनपुर राज, भोंसला, अंगरेज ...। इसे ईसा की सदियों में बिठाने के लिए पुरातत्व-प्रशिक्षित, मेरे ज्यादा जोर दे कर सवाल पूछने पर, बाकी सब लाजवाब हैं शायद मैं उनकी यह भाषा नहीं समझ पा रहा हूं और वे मेरी। लेकिन अब तक मौन रहा सियनहा बूझ रहा है और सबको समझ में आ जाने वाली बात धीरे से कहता है 'तइहा के गोठ ल बइहा ले गे'।

पुराना तालाब, फिर बना मंदिर, जिसके बाद दाऊ का घर बना, मराठा असर वाली बुलंद इमारत। लगता है इस मकान में न जाने क्या-क्या होगा। अजनबी से आप, गांव में अकारण तो आए नहीं हैं, यह तो गंवई-देहातियों का काम है, शहरी कामकाजियों का नहीं। लेकिन गांव में कुछ लेने-देने नहीं आए हैं, यह भरोसा बनते ही, आत्मीयता का सोता अनायास फूट पड़ता है।
घर का दरवाजा खुला है, बेरोक-टोक, स्वयं निर्धारित मर्यादा पालन की देहाती शिष्टता निभाते, बैठक में पहुंचने पर तस्वीरें टंगी दिखती हैं। पहली फोटो दाऊ गणेश प्रसाद वर्मा की, चेहरा बदल जाए तो सब कुछ, हम-आप सब की पिछली पीढ़ी जैसा। दूसरी तस्वीर है, उनके पिता दानवीर दाऊ भोलाप्रसाद वर्मा की।
पचरी तालाब के शिलालेख के बाद दूसरा अप्रत्याशित हासिल यह तस्वीर है। रायपुर 'कुरमी बोर्डिंग' के साथ जुड़ा 'भोला' कौन है, जिज्ञासा रहती थी। पता लगा, दाऊ भोलाप्रसाद वर्मा यानि वह दानवीर, जिसने कोई 80 साल पहले, छुईखदान बाड़ा कहलाने वाले क्षेत्र का 28 हजार वर्गफुट हिस्सा खरीद कर दान किया था, यह भवन छत्तीसगढ़ की अस्मिता से जुड़े मुद्‌दों सहित राज्य आंदोलन-बैठकों के प्रमुख केन्द्रों में एक रहा है।
राज्य केन्द्र, राजधानी रायपुर से यहां आने पर लग रहा है कि यह गांव शाखा और पत्ते नहीं, बल्कि जड़ें ही यहां हैं। सो, जमीन पा लेना आश्वस्त कर रहा है और याद भी दिला रहा है, ऊर्ध्वमूलमधः शाखमश्वत्थं ...

गुफ्तगूं :

अब कभी-कभी स्वयं से ही ईर्ष्‍या होती है कि ज्यादातर पिछला समय गांव-कस्बों में बीता। हजारों गांवों में गया, ज्यादातर में मात्र एक बार। अकारण ही आ गया था यहां, फिर भी 'वहां गए क्यों थे' के जवाब का दबाव हो तो कहूंगा 'किस्सा' के लिए। दादी-नानी तो रही नहीं, जो किस्से सुनाएं और हम रह गए बच्चे, अपने सच्चे भरोसों पर संदेह होने लगता है तो खुद से 'कथा-किस्से' का जुगाड़ ही उपाय रह जाता है। इस जन्मना-कर्मणा का हासिल कि हर गांव कथा होता है, जिसे कुछ हद तक पढ़ना सीखा है मैंने। जी हां, कोई भी गांव मेरे लिए कथा की तरह खुलता है और पाठक के साथ पात्र बनने को आमंत्रित करता है तो गांव-कथा में गाथा-बीज भी अंकुराने लगता है। ये भी कोई कथा है ..... आप न माने, मुझे तो कथा, गाथा बनते दिख रही है। ..... कुछ साथी भी है, वापसी की जल्दी है। इसलिए चल खुसरो घर ...

गिरोद से छत्तीसगढ़ के महान संत बाबा गुरु घासीदास जी याद आ रहे हैं, इसी नाम के एक अन्य ग्राम में उनकी पुण्‍य स्‍मृति है और जहां इन दिनों कुतुब मीनार से ऊंचा स्मारक 'जैतखाम' बन रहा है। पिछली सदी के एक और संत स्वामी आत्मानंद जी के नाम पर गांव में मनवा कुर्मी क्षत्रीय समाज रायपुर द्वारा संचालित अंग्रेजी माध्यम विद्यापीठ है। और भी कुछ-कुछ, बहुत कुछ ... । इस गाथा को शब्द बनने के पहले यहीं रोक ले रहा हूं, मध्यमा-पश्यन्ती स्तुति बना कर, अकेले पुण्य लाभ के लिए मन में दुहराते, अपनी खुदाई जो है।