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Sunday, September 25, 2022

छत्तीसगढ़ में प्रकाशित कृतियां

रायपुर से प्रकाशित समाचार पत्र ‘राष्ट्रबंधु‘ में श्री हेमनाथ यदु के दो लेख प्रकाशित हुए थे। इन लेखों की प्रकाशन तिथि में व्यतिक्रम जान पड़ता है। ‘छत्तीसगढ़ में प्रकाशित कृतियां‘ 16-12-1976 में प्रकाशित हुआ, जिसके आरंभ में चौदहवीं शताब्दी और स्व. श्री गोपाल मिश्र का उल्लेख आया है। इस लेख के अंत में ‘(शेष आगामी अंक में)‘, उल्लिखित है, जबकि इसी शीर्षक का लेख इसके पहले 21-28/12/1976, दीपावली अंक में प्रकाशित हुआ था, इस लेख का आरंभ 1956 से ‘सहयोगी प्रकाशन‘ के माध्यम से होने वाले प्रकाशन से होता है। पत्रिका के संपादक यशस्वी हरि ठाकुर जी के योग्य उत्तराधिकारी-पुत्र श्री आशीष सिंह ने, न सिर्फ यह सब संभाल कर रखा है, बल्कि अपने पिता की तरह ही उदारतापूर्वक मुझ जैसे जिज्ञासुओं के लिए पूरी तहकीकात सहित सामग्री-जानकारी उपलब्ध कराते हैं। 

श्री हेमनाथ यदु (01.04.1928-05.04.1979) स्वयं छत्तीसगढ़ी के महत्वपूर्ण रचनाकार हैं। लोक निर्माण विभाग की शासकीय सेवा में रहे। उनकी रचनाएं ‘सोन चिररइया‘, छत्तीसगढ़ के गउ तिहार‘, ‘छत्तीसगढ़ी रामायण‘, ‘नवा सुरुज के अगवानी‘, ‘मन के कलपना‘ आदि हैं। 

लेख के आरंभ में ‘चौदहवीं शताब्दी‘ आया है, मगर इस काल के साथ किसी का नाम नहीं है, संभवतः यह धर्मदास के लिए है। इसके बाद गोपाल मिश्र का नाम आता है, जिनका जीवन काल संवत 1706-1781 (1649-1724) तथा उनकी कृति ‘खूब तमाशा‘ का रचनाकाल सन 1689 के आसपास माना जाता है। लेख में कृतियों के रचनाकाल, प्रकाशन वर्ष का उल्लेख नहीं है, साथ ही जान पड़ता है कि सूची कालक्रम अनुसार नहीं है। लेख में कुछ मुद्रण-प्रूफ त्रुटियां भी हैं, वह सुधिजनों के लिए अड़चन नहीं करेगा, मगर शोध आदि प्रयोजन हेतु इस ओर ध्यान रखना आवश्यक होगा। 

छत्तीसगढ़ में प्रकाशित कृतियां (16.12.1976) 

छत्तीसगढ़ में प्रकाशित कृतियां चौदहवीं शताब्दी से मिलती हैं। प्रकाशन में स्व० श्री गोपाल मिश्र का नाम प्रथम पंक्ति में लिखा जा सकता है। भक्त चिन्तामणि, खूब तमाशा, सुदामा चरित्र, रामप्रताप, जैमिनी अश्वमेध इनकी कृति है। स्व० माखनचंद्र मिश्र का छंदविलास, जगमोहन सिंह का श्यामास्वप्न, पं. मालिक त्रिवेदी द्वारा रचित रामराज्य वियोग एवं प्रबोधचन्द्रिका उल्लेखनीय है। छन्द रत्नमाला, रामलीला, मित्रकाव्य, रामविनोद, रामस्तव के रचयिता रघुबरदयाल है। उमराव बख्शी द्वारा रामायण नाटक रचित है। कुछ अन्य लेखकों की कृतियां इस प्रकार हैः- 

अज्ञातवास, सीता अन्वेषण, मधुकर सीकर - सरयू प्रसाद त्रिपाठी ‘मधुकर‘
सावित्री. गीतवल्लरी - विद्याभूषण मिश्र
अपराधी - यदुनन्दन प्रसाद श्रीवास्तव
ज्योति निर्झर- रूपनारायण ‘वेणु‘ 
अग्नि परीक्षा, लहर ओर चांद - देवीसिंह चौहान 
निशा - बृजभूषणलाल पाण्डे 
बिहारी सतसई को सतलरी, ज्ञानेश्वरी का अनुवाद, गीत गोविन्द का अनुवाद - वृजराज सिंह ठाकुर, माधो प्रसाद तिवारी 
चांपा दर्शन- हरिहर प्रसाद तिवारी
कवर्धा दर्पण - सम्पादक पं० गिरधर शर्मा
इस्पात के स्वर-सम्पादित डा० सच्चिदानन्द पाण्डेय एण्ड डा० मनराखन लाल साहू
समकालीन कविता सार्थकता और समझ-राजेन्द्र मिश्रा
रम्य रास, कल्पना कानन, जोशे फरहद, बैगडिया का राजकुमार - राजा चक्रधर सिंह
भूल भुलैया, छत्तीसगढ़ गौरव - सुरलाल पाण्डेय 
छन्द प्रभाकर - जगन्नाथ प्रसाद भानु
कृष्णायन, सत्य की खोज - बिसाहूराम 
छत्तीसगढ़ी हल्बी ओर भतरी का तुलनात्मक अध्ययन - भालचन्द्रराव तैलंग 
अन्तिम अध्याय - पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी 
वाह री ससुराल - घनश्याम प्रसाद ‘श्याम‘
भूख - स्वराज प्रसाद त्रिवेदी
शराबी - मुकुन्द केशव पाध्ये 
चन्द्रशेखर आजाद को जीवनी - विश्वनाथ वैशम्पायन
कामायनी एक अध्ययन, साहित्यकार की डायरी, चांद का मुंह टेढ़ा - गजानन्द माधव मुक्तिबोध
दुर्ग दर्पण- गोकुल प्रसाद
माया दर्पन - श्रीकांत
हरिना संवरी - मनहर चौहान
जानौ अतका बात - गयाराम साहू 
बलिदान - तुलाराम गोपाल

छत्तीसगढ़ से प्रकाशित कृतियां (21-28.12.1976)

छत्तीसगढ़ में प्रकाशन के अभाव में अनेकों कृतियां अप्रकाशित है। इस समस्या को हल करने के लिए सन् १९५६ में सहयोगी प्रकाशन का जन्म होता है। सहयोगी प्रकाशन के माध्यम से इस अंचल के कवि प्रथम बार पुस्तकाकार में प्रकाशित हुए। उनके द्वारा प्रकाशित निम्नलिखित कृतियां है। पता है सहयोगी प्रकाशन कंकाली पारा रायपुर। 

प्रकाशित कृतियों की सूची:-

१. नये स्वर १ सम्पादक हरि ठाकुर 
२. नये स्वर २ सम्पादक हरि ठाकुर 
३. नये स्वर ३ सम्पादक नन्दकिशोर तिवारी
४. गीतों के शिलालेख - हरि ठाकुर
५. नये विश्वास के बादल हरि ठाकुर 
६. लोहे का नगर - हरि ठाकुर 
७. कुंजबिहारी चौबे के गीत (छत्तीसगढ़ी)
८. सुआ गीत (संलकन - हेमनाथ यदु 
९. सुन्दर कांड (छत्तीसगढ़ी) हेमनाथ यदु
१०. किष्किंधा कांड (छत्तीसगढ़ी) हेमनाथ यदु 
११. रंहचुली (छत्तीसगढ़ी) भगतसिंह सोनी 
१२. छत्तीसगढ़ के रत्न- हरि ठाकुर
१३. संझौती के बेरा ( छत्तीसगढ़ी) - लखनलाल गुप्त 
१४. छत्तीसगढ़ी साहित्य का ऐतिहासिक अध्ययन - नन्दकिशोर तिवारी

ज्योति प्रकाशन के द्वारा निम्नांकित पुस्तकों का प्रकाशन किया गया। पता - सत्तीबाजार रायपुर है।

१. डोकरी के कहनी शिवशंकर शुक्ल
२. रधिया के कहनी - शिवशंकर शुक्ल
३. राजकुमारी नयना - शिवशंकर शुक्ल 
४. अक्कल हे फेर पइसा नइये - शिवशंकर शुक्ल
५. मोंगरा - शिवशंकर शुक्ल 
६. दियना के अंजोर - शिवशंकर शुक्ल 
७. छत्तीसगढ़ी लोकसाहित्य का सामाजिक अध्ययन डा. दयाशंकर शुक्ल 
८. भाभी का मन्दिर - शिवशंकर शुक्ल 

प्रकाशन के क्षेत्र में प्रयास प्रकाशन बिलासपुर का नाम भुलाया नहीं जा सकता। प्रयास प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्तकों की सूची निम्नानुसार है। 

१. प्रयास (काव्य संग्रह) सम्पादक डा. विनयकुमार पाठक 
२. नये गीत थिरकते बोल - काव्य संग्रह - सम्पादक डा. विनयकुमार पाठक
३. सुघ्धर गीत (छत्तीसगढ़ी) सम्पादक डा. विनयकुमार पाठक 
४. नवा सुरुज नवा अंजोर (छत्तीसगढ़ी) सम्पादक स्व. अखेचंद क्लांत
५. भोजली गीत छत्तीसगढ़ी) स्व. अखेचन्द क्लांत 
६. खौलता खून - सम्पादक डा. विनयकुमार पाठक
७. मैं भारत हू - सम्पादक डा. विनयकुमार पाठक 
८. जागिस छत्तीसगढ़ के माटी - गयाराम साहू 
९. चंदा उए अकास म (छत्तीसगढ़ी) - बृजलाल शुक्ला
१०. नव जागृति हो सबके मन में - श्याम कार्तिक चतुर्वेदी
११. जीवन मधु - श्याम कातिक चतुर्वेदी
१२. घरती के भगवान - सीताराम शर्मा
१३. चन्दा के छांव म - शकुन्तला शर्मा ‘रश्मि‘ 
१४. अब तो जागौ रे - गयाराम साहू 
१५. जला हुआ आदमी - कृष्ण नागपाल बूंद
१६. जंगल में भटकते यात्री - कृष्ण नागपाल बूंद
१७. फुटहा करम - ठा. हृदयसिंह चौहान
१८. छत्तीसगढ़ी लोक कथा - डा. विनयकुमार पाठक
१९. प्रबंध पाटल - डा. पालेश्वर शर्मा
२०. सुसक झन कुररी! सुरता ले - डा. पालेश्वर शर्मा
२१. वैदेही विछोह - कपिलनाथ कश्यप 
२२. नवा बिहान (छत्तीसगढ़ी) - भरतलाल तिवारी 
२३ छत्तीसगढ़ी साहित्य अऊ साहित्यकार - डा. विनयकुमार पाठक 
२४. भुइयां के पाकिस चूंदी - राजेन्द्रप्रसाद तिवारी 
२५. राम विवाह - टीकाराम स्वर्णकार 
२६. बेलपान (छत्तीसगढ़ी) - देवधर दास महन्त 
२७. कलस करवा - सतीश कुमार प्रजापति एवं संगमसागर 

छत्तीसगढ़ सहयोगी प्रकाशन के माध्यम से मात्र एक पुस्तक सोन चिरइया (छत्तीसगढ़ी) रचयिता हेमनाथ यदु का ही प्रकाशन हो पाया। इसी तरह साहित्य समागम जोरा रायपुर द्वारा सुमन संचय का ही प्रकाशन किया गया है। इसके सम्पादक है उदयकुमार साहू। 

कुछ अन्य फुटकर प्रकाशन का विवरण नीचे लिखे अनुसार है। 

दानलीला - सुन्दरलाल शर्मा 
दानलीला - बैजनाथ प्रसाद 
दानलीला - नर्मदाप्रसाद दुबे 
नागलीला - गोविन्दराव विट्ठल 
कांग्रेस आल्हा - पुरुषोत्तमलाल 
श्री मातेश्वरी गुटका - जगन्नाथ भानु 
लड़ाई के गीत - किशनलाल ढोटे 
राम केवट संवाद - द्वारिका प्रसाद तिवारी 
कुछु काही -‘‘- 
सुराज गीत -‘‘- 
फागुन गीत -‘‘- 
राम बनवास - श्यामलाल चतुर्वेदी 
सोन के माली - नारायणलाल परमार 
सुदामा चरित्र - फूलचन्द श्रीवास्तव 
ग्राम संगीत - -‘‘- 
गंवई के गीत - विमलकुमार पाठक 
सियान गोठ - स्व. कोदूराम दलित 
हीरू के कहनी - बंशीधर पांडेय 
महादेव के बिहाव - गयाप्रसाद बसोढ़िया 
छत्तीसगढ़ी लोक कहानियां - नारायणलाल परमार 
श्याम सन्देश- स्व. जमनाप्रसाद यादव 
छत्तीसगढ़ी सुराज - गिरधरदास वैष्णव 
गंवई में अंजोर - रामकृष्ण अग्रवाल 
चन्दा अमरित बरसाइस - लखनलाल गुप्त 
सरग ले डोला आइस - 
अपूर्वा - डा. नरेन्द्र देव वर्मा 
छत्तीसगढ़ी रामचरित नाटक - उदयराम 
साहूकार से छुटकारा - टिकेन्द्र टिकरिहा 
जले रक्त से दीप- रघुवीर पथिक 
बिन भांडी के अंगना - प्रभंजन शास्त्री 
सब के दिन बहुरे - दाऊ निरंजनसिंह 
बेटी ेचई - मनोहरदास नृसिंह 
छत्तीसगढ़ी के लोक गीत - दानेश्वर शर्मा 
बहराम चोट्टा - विश्वेन्द्र ठाकुर 
मैथली मंगल - सुकलाल प्रसाद पांडेय 
विजय गीत - मावलीप्रसाद श्रीवास्तव 
चन्द्रहास - गेन्दराम सागर 
धान के देश में - हरिप्रसाद अवधिया 
पर्वत शिला पर - हरिप्रसाद अवधिया 
मोक्ष द्वारा - सीताराम शर्मा 
उल्लू के पंख - लतीफ घोंघी 
शतरंज की चाल - लक्ष्मण शाकद्विपीय 
शिव सरोज गोविन्द रोदन - गोविन्दराव बिट्ठल .. 
खुसरा चिराई के बिहाव - कपिल नाथ 
युग मेला - कृष्णकुमार भट्ट 
मन के कलपना - हेमनाथ यदु 
स्वराज्य प्रश्नोत्तरी हमारे नेता - स्व. रामदयाल तिवारी 
गियां - सुकलालप्रमाद पडिय 

प्रकाशन के संकल्प में छत्तीसगढ़ साहित्य संगम दुर्ग का योगदान प्रशंसनीय है। पसर भर अंजोर कृति का प्रकाशन कर छत्तीसगढ़ी साहित्य में एक और कड़ी जोड़ दिया। इस कृति के सम्पादक है हेमनाथ यदु। हिन्दी साहित्य समिति कुरूद द्वारा डा. महेन्द्र कश्यप राही कृत चन्दा (छत्तीसगढ़ी) का प्रकाशन किया गया है। छत्तीसगढ़ विभागीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन रायपुर द्वारा भी कुछ पुस्तकें प्रकाशित हैं। 

१. लोचनप्रसाद पांडेय की जीवनी - स्व० प्यारेलाल गुप्त 
२. समवाय - प्रधान सम्पादक शारदाप्रसाद तिवारी 
३. मिटती रेखाएं - शारदाप्रसाद तिवारी 
४. छत्तीसगढ़ी गीत अऊ कविता - हरि ठाकुर 
५. मड़इया के गीत - देवीप्रसाद वर्मा 
६. कांवर भर धूप - नारायणलाल परमार 
७. रामकथा - कपिलनाथ कश्यप 
८. रोशन हाथों का दस्तकें - स्व० सतीश चौबे 
९. सत्रह कहानियां - स्व० पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी तथा देवीप्रसाद वर्मा 

रविशंकर विश्वविद्यालय रायपुर द्वारा प्रकाशित कृति प्राचीन छत्तीसगढ़ है। इसके लेखक हैं स्व० प्यारेलाल गुप्त। बुनकर सहकारी समिति द्वारा प्रकाशित कृति ठाकुर प्यारेलाल सिंह की जीवनी इस क्षेत्र के लिए अमूल्य निधि है। इस कृति के लेखक है हरि ठाकुर। सुरुज मरे नइय कृति के कृतिकार है नारायणलाल परमार। अभिनन्दन ग्रन्थ में विप्र अभिनन्दन ग्रन्थ एंड जतर अभिनन्दन ग्रंथ उल्लेखनीय है। गौरहा कृत छत्तीसगढ़ी काव्य संकलन रविशंकर विश्वविद्यालय रायपुर की पाठ्य पुस्तक (वैकल्पिक विषय में) स्वीकृत किया गया है। 

छत्तीसगढ़ के कुछ लेखक और कवियों को कृति अन्य स्थानों से प्रकाशित है जिसमें स्व. पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी का नाम विशेष उल्लेखनीय है। इसी तरह स्व० बल्देव प्रसाद मिश्र काी कृति भी अन्य प्रकाशकों के द्वारा प्रकाशित को गई है। श्री लक्ष्मण शाकद्विपीय द्वारा सत्य के अवशेष बोर नन्दकिशोर तिवारी द्वारा मुकुटधर पांडेय व्यक्तित्व एवं कृतित्व अन्य प्रकाशको द्वारा की गई है। कुछ अन्य पठनीय पुस्तकों में गोकुलप्रसाद द्वारा रचित रायपुर रश्मि, और दुर्ग दर्पण है। खण्डहरों का वैभव में मुनि कान्तिसागर के विद्वता का परिचय है। छत्तीसगढ़ परिचय स्व० बल्देव प्रसाद मिश्र की अनमोल कृति है। सन् १८९० में प्रकाशित हीरालाल काव्योपाध्याय द्वारा रचित छत्तीसगढ़ी व्याकरण छत्तीसगढ़ी साहित्य में प्रथम प्रकाशित कृति है।
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Saturday, September 10, 2022

'घर-द्वार' समाचार

छत्तीसगढ़ी फिल्मों के इतिहास में 'घर-द्वार' महत्वपूर्ण पड़ाव है, जिसके बारे में ढेरों जानकारियां असानी से विस्तारपूर्वक मिल जाती हैं। यहां देखने का प्रयास है कि इस फिल्म निर्माण संबंधी माहौल, उस दौर के समाचारों को पढ़कर कैसा महसूस होता है। राष्ट्रबंधु समाचार पत्र को यहां आधार बनाया गया है, जिसके सम्पादक हरि ठाकुर ने इस फिल्म के लिए गीत लिखे थे। 


28-1-71 अंक के सचित्र समाचार का चित्र और टेक्स्ट यहां प्रस्तुत- 

फिल्म-संसार में नयी सम्भावनाओं के साथ प्रस्तुत 
जे.के. फिल्म्स का
घर-द्वार 
छत्तीसगढ़ी में 
एक अभूतपूर्व फिल्म 


छत्तीसगढ़ी में फिल्म व्यवसाय और स्थानीय कलाकारों की प्रतिभा को उजागर करने की नई संभावनाओं के साथ छत्तीसगढ़ी फिल्म ‘घर द्वार‘ का निर्माण कार्य जे.के. फिल्म्स के युवा निर्माता श्री जयकुमार पांडे ने पूरा कर लिया है। इस फिल्म के माध्यम से समर्थ तथा अनुभवी निर्देशक श्री निर्जन तिवारी ने छत्तीसगढ़ की आंचलिक समस्याओं और विशेषताओं को सार्वभौमिक स्तर पर अभिव्यक्ति देने का अद्भुत प्रयास किया है। 

कथा - बिंदु 

छत्तीसगढ़ की धान बहुल शस्य श्यामला धरती के महमहाते ग्रामीण वातावरण में मालगुजारी परंपरा के प्रतीक के रूप में दीनानाथ (भगवतीचरण दीक्षित) का चरित्र अपने समस्त पुरातन संस्कारों और विश्वासों के साथ प्रकट होता है। उनके दो पुत्र हैं- महेश (कान मोहन) और रमेश (शिशिर)। इन तीनों को लेकर आधुनिकता और पुरातन का संघर्ष चित्रित करते हुए कथा का बुनाव चालू होता है। परंपरागत भारतीय परिवार के टूटने बिखरने के मार्मिक प्रसंगों के साथ कथा आगे बढ़ती है और मामा जगत नारायण (शिवकुमार) एक सुखी परिवार की शांति के लिए अभिशाप बनकर पदार्पण करता है। मामा गांव के सेठ (बसंत दीवान) के साथ मिलकर दोनों भाइयों में फूट डालने, उनके परिवार को तबाह करने, गांव में दंगा कराने के षड्यंत्र में सफल होता है। खलनायक मामा ने षड्यंत्र को अपनी हास्यपूर्ण भूमिका के साथ बड़ी विचित्रता के साथ प्रस्तुत किया है। अंत में बड़े भाई को गांव छोड़कर शहर की शरण लेनी पड़ती है। 

फिल्म में हरिठाकुर के मादक गीतों को जमाल सेन ने संगीतबद्ध कर छत्तीसगढ़ी लोक धुनों के माधुर्य में वृद्धि की है। अनिल साहा ने बड़ी सूझबूझ के साथ फोटोग्राफी की है। फिल्म की नायिका नवोदित कलाकार रंजित ठाकुर हैं। अन्य कलाकार हैं दुलारी, गीता कौशल, कालेले, जोगलेकर, बल्लू रिजवी, मीनाकुमारी (जूनियर) नशीने, जे.पी. पांडे, जयकुमार आदि। 

इसके अतिरिक्त ऊपर आए दिनांक 3.12.70 अंक के समाचार ‘निर्देशक श्री निर्जन तिवारी से भेंट-वार्ता‘ में बताया गया है कि फिलहाल फिल्म के केवल 4 प्रिंट तैयार होंगे। ... ... ... श्री तिवारी ने बताया कि उन्हें स्थानीय कलाकारों से जिन्होंने कैमरे का कभी मुंह नहीं देखा था, न केवल सराहनीय सहयोग मिला बल्कि उनके निष्ठा पूर्ण कार्यों से उन्हें भरपूर संतोष भी हुआ। उन्होंने कहा कि कुछ कलाकारों का अभिनय तो इतना मर्मस्पर्शी, नयापन और खुलापन लिए हुए है कि वे अनुभवी, व्यवसायी कलाकारों को भी पछाड़ सकते हैं। निश्चय ही यह फिल्म छत्तीसगढ़ के नये कलाकारों को नई प्रेरणा प्रदान करेगी। ... ... ... दिनांक 29 नवंबर को होटल नटराज में एक प्रेस वार्ता में श्री तिवारी ने बताया कि फिल्म की लागत लगभग दो लाख रुपये है और इसकी लंबाई 14 है। उन्होंने बताया कि वे शीघ्र ही एक हिंदी फिल्म स्थानीय कलाकारों के सहयोग से बनाने की घोषणा करेंगे। पत्रकारों ने फिल्म के गीत सुने और उन्हें पसंद किया। श्री तिवारी ने सराईपाली के कुमार साहबों- श्री बीरेंद्रकुमार सिंह और श्री महेंद्रकुमार सिंह जी के प्रति विशेष आभार व्यक्त किया जिन्होंने शूटिंग के समय हर प्रकार का सहयोग प्रदान किया। ... ... ... फिल्म छत्तीसगढ़ के चार बड़े शहरों में एक साथ रिलीज होगी दयाल फिल्म रायपुर फिल्म के वितरक हैं।

Saturday, September 3, 2022

दानीपारा शिलालेख-1969

पिछली पोस्ट, दानीपारा शिलालेख-2006 की पाद टिप्पणी 6 में विष्णुसिंह ठाकुर की पुस्तक ‘राजिम‘ में आए उल्लेख के आधार पर इस शिलालेख के राष्ट्रबंधु साप्ताहिक के दीपावली विशेषांक में संक्षिप्त प्रकाशन का लेख किया गया है। इस संदर्भ को स्पष्ट करने के लिए राष्ट्रबंधु पत्र के संपादक श्री हरि ठाकुर के पुत्र श्री आशीष सिंह के सत्प्रयासों से उपलब्ध कराई गई सामग्री को उनकी सहमति उपरांत यहां प्रस्तुत किया जा रहा है।

उल्लेखनीय कि राष्ट्रबंधु साप्ताहिक में इस शिलालेख की प्राप्ति पहले समाचार के रूप में प्रकाशित हुई थी और उसके पश्चात लेख के रूप में। राष्ट्रबंधु में प्रकाशित लेख में शिलालेख के चर्चा या प्रकाश में आने की पृष्ठभूमि की भी जानकारी मिलती है। प्रथम दृष्टया लिपि के आधार पर शिलालेख का काल बारहवीं शताब्दी अनुमान किया गया था, किंतु संपादन करते हुए तिथि, पंद्रहवीं शती निर्धारित की गई। यहां प्रस्तुत करते हुए जानकारी अद्यतन करना समीचीन होगा कि लेख में आए नाम श्री कृष्ण कुमार जी दानी, के तीन पुत्र (स्व.) अनिरुद्ध दानी, विजय दानी, अजय दानी (अजय माला प्रकाशन वाले) हुए। अपनी सीमा में मेरे द्वारा शिलालेख की वर्तमान स्थिति जानने और फोटो लेने के प्रयास में पता लगा कि वर्तमान में दानीपारा वाले उक्त मकान में परिवार के सदस्य निवास नहीं कर रहे है। इस भूमिका के साथ, राष्ट्रबंधु में प्रकाशित दोनों अंश-

राष्ट्रबंधु साप्ताहिक, रायपुर के दिनांक 17-4-69 में ‘बारहवीं शताब्दी का महत्वपूर्ण शिलालेख प्राप्त‘ - ‘रायपुर नगर की प्राचीनता पर नया प्रकाश‘ शीर्षक से प्रकाशित समाचार-

रायपुर के दानीपारा में इसी सप्ताह एक ऐसे महत्वपूर्ण शिलालेख को जानकारी मिली है जिसे लिपि के आधार पर बारहवीं शताब्दी का माना जा रहा है। पुरातत्व के प्रकांड विद्वान श्री बालचन्द्र जैन को ज्यों ही इस शिला लेख की सूचना मिली, वे स्थल पर पहुंच गये किन्तु उनके पास उस शिला लेख की छाप लेने की सामग्री नहीं थी। उन्होंने स्थानीय म्युजियम के अधिकारी से इस संबंध में सामग्री मांगी किन्तु उन्होंने अपनी असमर्थता प्रकट कर दी। इस दन्तनिपोरी के पश्चात श्री जैन ने किसी प्रकार शिलालेख का छाप ले ली है और जहां तक वे उसे पढ़ पाने में सफल हुए हैं उससे ज्ञांत होता है कि यह शिलालेख बारहवीं शताब्दी का है। इस शिलालेख में रायपुर, राजिम तथा आरंग में विभिन्न निर्माण कार्याे का उल्लेख है। इस शिलालेख की एक विशेषता यह भी है कि इसमें गोठाली नामक स्थान का भी उल्लेख है। इस स्थान का उल्लेख रतनपुर के शिलालेख में भी मिलता है। शिला लेख में सेनापति तथा प्रमुख वंशों के पुरुषों के नाम भी आये हैं।

शिलालेख के नीचे का भाग टूट गया है और अप्राप्य है। किन्तु जितना भी हिस्सा उपलब्ध है उससे यह स्पष्ट है कि रायपुर नगर चौदहवीं शताब्दी से पूर्व बस गया था। इस सम्बन्ध में जब तक प्राप्त सूचनाओं के आधार पर रायपुर में प्राप्त यह प्राचीनतम शिलालेख कहा जा सकता यदि हरिठाकुर को प्राप्त शिलालेख को छोड़ दिया जाये।

राष्ट्रबंधु साप्ताहिक, रायपुर के दीपावली विशेषांक, दिनांक 6-11.69 में श्री बालचन्द जैन लिखित लेख-

पन्द्रहवीं शताब्दी
रायपुर में प्राप्त
एक अप्रकाशित शिलालेख 
लेखक- श्री बालचन्द्र जैन

प्रस्तुत शिलालेख श्री कृष्ण कुमार जी दानी के दानीपारा (रायपुर) स्थित घर में रखा हुआ है। पहले यह उनके पुराने मकान की एक मोटी दीवाल में जड़ा हुआ था। पर जब उस मकान का पुनर्निर्माण कराया गया तो शिलालेख को वहां से हटाकर मकान के आंगन में लाकर रख दिया गया और तब से वह वही रखा हुआ है। लेखयुक्त प्रस्तर खंड की चौड़ाई 55 से.मी. और ऊंचाई 45 से.मी. है।

लेख में चौदह पंक्तियां हैं जो 40 से.मी. चौड़े और 29 से.मी. ऊंचे स्थान में उत्कीर्ण है। लेख की ऊपरली दो पंक्तियों के प्रारंभ का आधा भाग क्षत हो जाने के कारण वह भाग पढ़ा नहीं जा सकता। उसी प्रकार सबसे नीचे की पंक्ति के लगभग सभी अक्षरों का निचला भाग क्षतिग्रस्त है। बाकी पूरा लेख अच्छी हालत में है। अक्षर साफ, सुडौल हैं।

लेख की लिपि नागरी है। उसमें तिथि तो नहीं पड़ी है पर अक्षरों की बनावट के आधार पर उसे पंद्रहवीं शती ईसवी का अनुमान किया जा सकता है। शिलालेख की भाषा संस्कृत है प्रारंभ में ‘‘श्री गणेशाय नमः‘‘ और अंत में ‘‘मंगल‘‘ को छोड़कर बाकी पूरी रचना छन्दोबद्ध है। कुल श्लोक दस हैं और उन पर क्रमांक पड़े हुए हैं। तीसरे श्लोक के अंत में भूल से क्रमांक 2 पड़ गया है किंतु आगे के श्लोकों में वह भूल सुधार ली गई है। पहले और तीसरे से लेकर आठवें श्लोकों की रचना अनुष्टुप छंद में की गई है। बाकी तीन श्लोक अर्थात 2, 9 और 10 शार्दूलविक्रीड़ित छंद में हैं। ध्यान देने की बात है कि तीसरा श्लोक में छह चरण है। ऐसे उदाहरण पौराणिक काव्यों में पाए जाते हैं। रायपुर में ही प्राप्त हुए एक दूसरे शिलालेख कलचुरी वंश के राजा ब्रह्मदेव के राज्य काल में विक्रम संवत 1458 में लिखा था। प्रस्तुत लेख में ब के स्थान पर सर्वत्र व अक्षर लिखा गया है। पंक्ति 6 में चंद्रशेखर के ख के स्थान पर रट्ट और उसी प्रकार पंक्ति चार में द्वि के स्थान पर द्धि उत्कीर्ण है। श्लोकों के द्वितीय चरणों के अंत में भी दो दण्डों का प्रयोग किया गया है जबकि एक दंड का ही प्रयोग होना चाहिए था। श्लोकों के अंत में आने वाले म् को भी अनावश्यक रूप से अनुस्वार में परिवर्तित किया गया है।

इस प्रशस्ति में पीलाराय नामक व्यक्ति के चार पुत्रों द्वारा विभिन्न स्थानों पर कराए गए पुण्य कार्यों का विवरण दिया गया है। प्रशस्ति के प्रारंभ में गणेश जी को नमस्कार किया गया है। उसके बाद प्रथम श्लोक में किसी देवी की वंदना है। लेख का अंश खंडित हो जाने के कारण देवी का नाम नहीं मिलता पर संभवतः वह सरस्वती है। दूसरे श्लोक में शिवदास का उल्लेख मिलता है। उनके दो पुत्र थे, एक पीलाराय और दूसरा प्राणनाथ। तीसरे श्लोक में पीलाराय के चार पुत्रों के नाम गिनाए गए हैं और बताया गया है कि वे सभी धर्म तत्पर तथा गो-ब्राह्मणों के सेवक थे। पीलाराय के ज्येष्ठ पुत्र दरियाव के गोठाली नाम का एक रमणीक सरोवर खुदवाया था, चंद्रशेखर (शिव) के मंदिर का निर्माण कराया था और अत्यंत मनोहर बगीचा लगवाया था। ये सभी कार्य रायपुर में कराए गए थे जैसा कि पांचवें श्लोक से जान पड़ता है क्योंकि उस श्लोक में बतलाया गया है कि उस ज्ञानी और परमार्थी दरियाव ने ही रायपुर में राम भक्त मारुति (हनुमान) के मंदिर का भी निर्माण कराया था। छठे श्लोक में कहा गया है कि दरियाव से छोटे तेजीराज ने रायपुर में ही पाटी नाम का एक सुंदर स्वच्छ सुविख्यात और भव्य सरोवर खुदवाया था। तीसरे भाई महाराज (शुद्ध नाम महाराज) ने अपने पुण्य कार्यों को राजिम और आरंग में केंद्रित किया। सातवें और आठवें श्लोक से विदित होता है कि उसने राजीवनयन नामक स्थान में एक जगन्नाथ जी का मंदिर और एक खूब मजबूत शिव मंदिर का निर्माण कराया तथा उसी प्रकार का आरिंग ग्राम में प्रफुल्ल कमलों से सुशोभित सरोवर और महामाया का मंदिर बनवाया।

प्रशस्ति के नौवें श्लोक में कनिष्ठ भ्राता मधुसूदन के गुणों की प्रशंसा की गई है। उसके द्वारा कराए गए निर्माण कार्यों का उल्लेख संभवतः दसवें श्लोक में कहा हो पर शिलालेख ही अंतिम पंक्ति अपाठ्य होने के कारण वह ज्ञात नहीं हो सका है। इस प्रशस्ति की रचना महेश्वर नामक पंडित ने की थी। उसने सभी प्रकार की विद्याएं प्राप्त कर ली थीं। दसवें श्लोक में रायपुर नगर की प्रशंसा की गई है। प्रशस्ति का पूरा पाठ नीचे दिया जा रहा है। इसे मैंने रायपुर के सुप्रसिद्ध फोटोग्राफर श्री दिलीप विरदी द्वारा उतारे गए फोटोग्राफ से पढ़ा है।

(प्रशस्ति का पाठ चित्र में देख सकते हैं, पृथक से नहीं दिया जा रहा है।)

बालचन्द्र जैन जी का अंगरेजी में प्रकाशित शोध-लेख