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Saturday, April 17, 2021

अद्वैत का द्वंद्व

‘हैट टांगने के लिए कोई भी खूंटी काम दे सकती है। उसी तरह अपने मनोभावों को व्यक्त करने के लिए कोई भी विषय उपयुक्त है।‘ जी हां, यह पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी के प्रसिद्ध निबंध ‘क्या लिखूं?‘ में आया है। उन्होंने इसमें कहा है कि यह निबंध नमिता के आदेश और अमिता के आग्रह पर लिखा गया, जिन्हें क्रमशः ‘दूर के ढोल सुहावने होते हैं‘ और ‘समाज-सुधार‘ पर आदर्श निबंध लिखना था। इसी तरह हजारी प्रसाद द्विवेदी का ‘नाखून क्यों बढ़ते हैं‘ आरंभ होता है- ‘बच्चे कभी-कभी चक्कर में डाल देने वाले प्रश्न कर बैठते हैं। ... मेरी छोटी लड़की ने जब उस दिन पूछ दिया कि ...‘। बच्चों की फरमाइश या सवाल के जवाब में ऐसे कुछ अनमोल निबंध आए। बड़े लोगों की बड़ी बातें। मगर, कहा जाता है कि आपकी बात 5-6 साल के औसत बच्चे को समझ में आ जाए, समझा सकें, तभी जानिए कि आपने खुद ठीक समझ लिया है।

दो घटनाएं याद आती हैं। पहली, कार्डेटा और नान-कार्डेटा। दो बच्चों में से एक, बड़े को स्कूल में पाठ पढ़ाया गया था, वह छोटे को समझा रहा था, छोटा समझने को तैयार नहीं। मैंने मदद करनी चाही, कहा कि हड्डी वाला, कड़ा हो वह कार्डेटा और मुलायम, लिजलिजा, गिजगिजा है वह नान-कार्डेटा। आई बात समझ में। बच्चे ने अपनी समझ का सबूत देते हुए, मेरे समझाने को ध्वस्त करते हुए उदाहरण से बताया- घोंघी, कार्डेटा और छिपकिली, नान-कार्डेटा। सुधार हुआ, जो उपर मुलायम अंदर कड़ा वह कार्डेटा और उपर कड़ा अंदर मुलायम वह नान कार्डेटा। मजबूत आदमी भी अक्सर बाहर से मुलायम तो, खैर ...। दूसरी कि बच्चों को स्वर और व्यंजन में फर्क बताने का प्रयास किया जा रहा था, और बात बमुश्किल उदाहरणों अ, आ, इ, ई और ए, ई, आई, ओ, यू पर आ कर अटक जा रही थी। एक बच्चे को सूझा, मतलब यह कि जो आवाज गले से आए वह स्वर और जिसमें जीभ और होंठ के साथ दांत और तालू में भी हरकत हो वह व्यंजन।

बच्चों के प्रश्नों में जिज्ञासा, तर्क और समझ की तलाश के लिए होती है। कभी इसलिए भी कि स्वाभाविक सी क्रिया, परिस्थिति, घटनाओं में भी कार्य-कारण संबंध तो होता है, लेकिन वह अक्सर स्पष्ट-प्रकट नहीं होता, बच्चे उसे जानना-समझना चाहते हैं। प्रसंगवश बाथरूम सिंगिंग और टायलेट थिंकिंग की तरह एक अदा होती है, प्लेटफार्म चिंतन। ऐसा तब होता है, जब स्टेशन पर पहुंचने के बाद पता लगे कि गाड़ी लेट है और लेट होती जा रही है। ऐसा ही कुछ हुआ, जिसमें बच्चे की पार्श्व सोच यानि लैटरल थिंकिंग का एक उदाहरण आया।

एक सज्जन बताने लगे कि उनकी बच्ची जब भी स्टेशन से वापस लौटती, तो पूछती कि हर गाड़ी सड़क के ऊपर चलती है, लेकिन रेलगाड़ी क्यों नहीं। उसे समझाया जाता कि रेलगाड़ी की सड़क पटरी है, वह पटरी पर चलती है, लेकिन उसकी जिज्ञासा शांत नहीं होती। बात आई गई। प्लेटफार्म चिंतन में चर्चा होने लगी कि बच्ची ऐसा क्यों पूछती थी। बच्ची अब युवती थी और खुद भी यह भूल चुकी थी। अलग-अलग संभावनाओं पर विचार होता रहा और उसे सुझाया जाता रहा, बात नहीं बनी। एक बात आई, कहीं ऐसा तो नहीं कि वह प्लेटफार्म को सड़क मानती थी और सोचती थी कि यही एक ऐसी गाड़ी है जो सड़क के ऊपर नहीं, नीचे चलती है। युवती ने सुना और दस साल बाद जिज्ञासा के उसी उम्र में पहुंच गई, चहक पड़ी, यूरेका।

आगे बातों की राह तो सूझ रही है किंतु बहकने-भटकने की मान्य सीमा तक छूट लेते हुए ...। कहा जाता है कि पैडगरी (पांव-पांव रास्ता), सीधी-सरल हो तो वह मवेशी के चलने का रास्ता और टेढ़ी-मेढ़ी हो तो मानुस की। उसमें भी राह राह कपूत और राह छोड़ सपूत। तो, याद आ रहा है कि एक मास्टर साहब के पुत्र ने प्रथम श्रेणी में भौतिकशास्त्र स्नातकोत्तर की परीक्षा पास की, साहबजादे यानि मास्टरजादे फूले नहीं समाते, मानों सब कुछ पा लिया। लेकिन पिता को उनके रोजगार की चिंता सताती रहती। पीढ़ी की सोच और यों भी पिता-पुत्र का रिश्ता सार्थक तभी होता है, जब शाश्वत मतभेद सतह पर आने लगे। पुत्र, अपनी प्रथम श्रेणी स्नातकोत्तर उपाधि की शान में रहते, पिता से भिड़ गए। पिता ने कहा- घर का पंखा बिगड़ा हुआ है, बना सकता है तो सुधार, नहीं तो कम से कम मिस्त्री ही बुला ला।

इसी तरह दो व्यवसायी पिता, जिनमें एक का साबुन कारखाना था और दूसरे का बर्तन की दुकान। संयोग से दोनों के बच्चे पढ़ाई में तेज निकले। बी स्कूल और एम स्कूल का जमाना नहीं आया था। अच्छे नंबर आए तो इंजीनियरिंग कालेज में दाखिला मिल गया। बात आई ब्रांच की। पिता-पुत्र ‘द्वन्द्व समास‘ के ‘शाश्वत भाव‘ को प्राप्त न हुए थे। पुत्र, अब तक आज्ञाकारी थे, पिता से आदेश मांगा। साबुन वाले पिता ने समझा कि केमिकल ब्रांच सही होगा और बर्तन वाले ने ताड़ा कि मेटलर्जी ब्रांच हो तो खरीदी-बिक्री में कोई ठग न सकेगा। आगे की कहानी है दर्दनाक, लेकिन लोग उनकी हंसी उड़ाते ‘ट्रेजिकॉमेडी‘, इसलिए यहीं रुक कर, वापस पटरी पर।

जशपुर की अंकिता जैन लेखिका हैं। फेसबुक पर उनकी रोचक पोस्ट यहां खूंटी बनी, जिसमें उनके लाड़ले अद्वैत ने जिज्ञासा की- ‘सब्जी और फल में क्या अंतर होता है?‘ अंकिता जी ने समझने की कोशिश करते, समझा, समझाया, बहलाया। लेकिन बात नहीं बनी। फिर टाला मौसी पर। मौसी का वनस्पतिशास्त्रीय जवाब कि लौकी, कद्दू आदि भी तकनीकी रूप से फल ही हैं। मगर अंकिता जी की समस्या बनी हुई है, कहती हैं- फिलहाल उसे समझाकर सुला दिया है कि ‘सब्जी मतलब जो किसी के साथ खाते हैं, और फल मतलब जो अकेले खा लेते हैं‘।

कुछ गफलत है, खेंढ़ा, इसके पत्ते, तना और जड़ को भी पका कर खाया जाता है और इस तरकारी को सिर्फ ‘जड़ी या जरी‘ भी कहा जाता है। छत्तीसगढ़ी गीतों में खान-पान और साग-सब्जी के कई गीत हैं, इनमें एक मजेदार गीत है- ‘रमकेरिया म राजा राम बिराजे, जरी म/सेमी म सीता माई।‘ छत्तीसगढ़ में महिलाओं के आपसी मुलाकात पर औपचारिक आरंभिक वाक्य होता है- का साग रांधे, दीदी/गोई?

सुमित्रानंदन पंत की कविता ‘ग्राम श्री‘ के अंश, जिसमें फल-सब्जियों को, बिना भेदभाव एक साथ समेटा है, को याद कर लेने का यहां अवसर बना है-

अब रजत-स्वर्ण मंजरियों से
लद गईं आम्र तरु की डाली।
झर रहे ढाँक, पीपल के दल,
हो उठी कोकिला मतवाली।
महके कटहल, मुकुलित जामुन,
जंगल में झरबेरी झूली।
फूले आड़ू, नीबू, दाड़िम,
आलू, गोभी, बैंगन, मूली।

पीले मीठे अमरूदों में
अब लाल लाल चित्तियाँ पड़ीं,
पक गये सुनहले मधुर बेर,
अँवली से तरु की डाल जड़ीं।
लहलह पालक, महमह धनिया,
लौकी औ' सेम फली, फैलीं,
मख़मली टमाटर हुए लाल,
मिरचों की बड़ी हरी थैली।

फिर भी कह सकते हैं कि अधिकतर सीधे खाने वाले फल के बहुवर्षीय वृक्ष होते हैं जबकि सब्जी वाले फलों के मौसमी, कम आयु वाले पौधे होते हैं। खाने वाला फल सामान्यतः मीठा होता है। पकने के पहले कसैला, खटमिट्ठा फिर मीठा, या खटमिट्ठा या खट्टा। लेकिन पका कर सब्जी के रूप में खाए जाने वाले फल फीके स्वाद वाले होते हैं। खाने वाले फल सामान्यतः सीधे, बिना नमक-शक्कर, मसाले के खाया जाता है या खाया जा सकता है, उन्हें पकाने यानि कुक करने की आवश्यकता नहीं होती। सीधे खाने वाले फल और सब्जी पका कर (यानि राइप नहीं कुक) खाए जाने वाले फल में यह अंतर भी बताया जा सकता है कि ऐसे दोनों फलों का आकार तो बदलता है लेकिन सीधे खाने वाले फल का रंग और स्वाद बदल जाता है, जबकि सब्जी वाले फलों का रंग और स्वाद लगभग वैसा ही बना रहता है। कुछ खास उदाहरणों में टमाटर, जो चटनी, प्यूरी, केचप या सपोर्ट, टेस्ट मेकर होता है, स्वयं पूरी तरह स्वतंत्र सब्जी नहीं। इसी तरह नीबू, करौंदा, मिर्च आदि सब्जी के बजाय मुख्यतः शर्बत, अचार, चटनी, मुरब्बा बनते हैं, उन्हें खींच-तान कर सब्जी बनाया जा सकता है और कान पकड़ कर किसी को खिलाया भी जा सकता है, लेकिन ये सब टमाटर की तरह स्वतंत्र और बिना सहयोगी के, आत्मनिर्भर सब्जी में शामिल नहीं हो सकते।

खान-पान की बात हो तो मुंह में पानी आ जाता है, मगर सब फीका, बात तब तक नहीं बनती, जब तक मीठा-नमकीन न हो। ध्यान रहे कि मीठा यानि नमकीन? छत्तीसगढ़ी में कहा जाता है- ‘मिठात नइ ए, नून बने नइ जनाए हे।‘ मारवाड़ी में नमक फीका होने पर कहने का प्रचलन है- थोड़ा मीठा (जी हां, यानि नमक) और डालो। गुजरात का मीठापुर तो नमक उत्पादक है ही। वस्तुतः मीठा यानि स्वाद, स्वाद यानि षटरस का संतुलन। हमारी जिह्वा, स्वाद इंद्रिय ही ऐसी है, जो जन्म के साथ सक्रिय हो कर मृत्यु तक क्षीण नहीं होती। यह व्यक्ति के संयम-अनुशासन की सहज और सबसे विश्वसीय चुगली भी कर सकती है।

बात की बात, यह कि अंकिता जी की किसानों पर एक पुस्तक ‘ओह रे! किसान‘ है। अब फल-सब्जी पर कम से कम पूरा लेख उनकी ओर से आना रोचक होगा। आवश्यकता अविष्कार की जननी है और ऐसी जिज्ञासा, जहां सुई अटक जाए फिर तो देर-सबेर बात बननी ही है। उनकी एक पुस्तक ‘ऐसी-वैसी औरत‘ है, लेकिन वे ऐसी वैसी नहीं, समर्थ जीवन साथी वाली, अद्वैत की जननी और ‘मैं से मां तक‘ पुस्तक की भी लेखिका हैं।

Saturday, April 3, 2021

जगन्मिथ्या

(‘हंस‘ पत्रिका के नवंबर 2020 में प्रकाशित कहानी)

अम्मां ने टीवी म्यूट कर दिया। दीवार पार मुझ तक आवाज आ रही थी। मैं आवाज कम करने को कहता हूं। एक बार, दूसरी बार, तीसरी बार ...। इससे अधिक ऊंची आवाज में कहना नहीं चाहता। शायद टीवी की आवाज में मेरी आवाज खो जा रही है या वह मान ले रही होंगी कि टीवी पर चल रहे दृश्य में पृष्ठभूमि से आवाज आ रही है। कई बार ऐसा होता है कि वे बिना किसी को संबोधित किए, 'जो चाहे सुन ले', वाले स्वर में पुकारती हैं- देखो, दरवाजे पर कौन आया है, जबकि काल-बेल टीवी में बजा होता है। वे यह भी जानती हैं कि इस समय कोई नहीं आने वाला। बस कोरियर वाला है, जो कभी भी आ जाता है। हर हफ्ते मेरे लिए कोरियर आना ‘शायद‘ उन्हें पसंद नहीं। शायद, क्योंकि उनकी पसंद-नापसंद का अंदाजा लगाना आसान नहीं। इस बारे में कोई राय पुख्ता होने लगे तब तक ऐसा कुछ सामने आ जाता है कि उस पर टिका रहना मुश्किल होता है। शायद वे नहीं चाहती कि हमेशा कोरियर से कुछ मंगाया जाता रहे, फिर भी कौन आया है, के साथ क्या आया है? यह उन्हें बेचैन करता है। कई बार लगता है कि वे ‘देखो, कौन है‘ कहने का बहाना खोजती हैं और अपना होना, मेरा होना के अलावा दरवाजे पर किसी और के होने का आभास एक साथ टटोल लेना चाहती हैं। उनका ‘देखो, कौन है‘ कहने का अंदाज, संभावित आने वाले के प्रति अस्वागत की चुगली कर देता है। ऐसा करना उन्हें अभ्यास से आया है, वे ऐसा करना जानबूझ कर करना चाहती हैं या ऐसा हो जाता है, जैसा वे करना नहीं चाहती, तय नहीं हो पाता। कभी ऐसा भी होता है कि मैं किताब पर निगाह टिकाए, अपना मोबाइल टटोलने लगता हूं। दरअसल यह घंटी मेरे फोन की नहीं, टीवी के किसी दृश्य के साथ बज रही होती है।

अम्मां ने अब टीवी म्यूट कर दिया है। मुझे लगता है कि उन्होंने मेरी बात सुन ली है और शायद थोड़ा चिढ़ कर टीवी को म्यूट किया है। छोटा सा सन्नाटा। और फिर खुद बात करने लगी हैं। किससे बात कर रही हैं? किसी से फोन पर? मेरा ध्यान किताब से उचट गया है। आवाज, जो साफ सुनाई नहीं दे रही है, सुनकर समझना चाह रहा हूं। दीवार पार ‘देखने‘ की कोशिश कर रहा हूं। समझ नहीं पा रहा। अम्मां दूसरी भाषाओं, अंगरेजी या किसी भी भाषा का कार्यक्रम देख सकती हैं, देखती हैं। बिल्कुल समझ में न आती हो ऐसी दूसरी भाषा की फिल्में, सीरियल और कई बार समाचार भी देखना उन्हें भाता है। यह शायद इस सुविधा के कारण कि पात्र, परदे पर अपनी मनमानी करते रहें, लेकिन वे क्या कहेंगे, उन्हें क्या कहना चाहिए यह तय करने की छूट वे अपने हिस्से में ले लेती हैं। कई बार पात्रों की भाव-भंगिमा, उनके सोचे, मन में चल रहे संवादों के अनुरूप न हो तो मान लेती कि उसका अभिनय अच्छा नहीं है। ऐसा भी होता है कि किसी पात्र की बातें उन्हें पसंद न आ रही हों तो वे अपने को रोक नहीं पातीं, दृश्य चलने देती हैं और म्यूट कर उसे समझाइश देती हैं, कभी डांट-फटकार लगाती हैं तो कभी अफसोस जताने या संवेदना प्रकट करने के लिए भी टीवी म्यूट कर देती हैं।

टीवी जब तक म्यूट नहीं होता, अपनी आवाज के साथ कमोबेश पूरे घर में बिखरता रहता है। म्यूट होता तो सिमट जाता, तब कुछ देर के लिए, मानों अचानक, नल से पानी टपकने की आवाज, घड़ी की टिक-टिक और पंखे का घट्ट-घट सुनाई पड़ने लगता। आंख की अपनी सीमा है, टीवी देखना हो तो सामने रहना जरूरी। न देखना हो तो बस पलकें मूंद ली, नजरें घुमा ली, मुंह फेर लिया। देख कर अनदेखा भी किया जा सकता है। आंखें, आईना ही तो हैं। आंखों में बनी तस्वीर को दिमाग उल्टाल-सीधा करता रहता है। मगर कान हमेशा जागता रहता है। उसे हमारे जागे-सोए होने से फर्क नहीं पड़ता। इयरफोन लगा कर कान मूंद लो, कुछ और सुनने लगो फिर भी टीवी की आवाज आती रहेगी, जेसे रेडियो पर दो स्टेशन एक साथ बज रहे हों।

दीवारों के कान होते हों या न हों, कान की पहुंच दीवारों के पार भी होती है। ऐसा आंखों के साथ नहीं होता। इसलिए रेडियो के साथ उससे दूर जाने की छूट है, लेकिन टीवी अपने पास, अपने सामने बिठाए रखता है। अम्मां पुकारतीं- सुनो तो। उस पुकार के जवाब में सिर्फ हां कहने से बात न बनती, अम्मां हां का जवाब सुन लेतीं फिर भी आवाज देती रहतीं। उनकी पुकार सुन कर कोई उन तक पहुंच जाए, उनके पास खड़ा हो तब भी बात नहीं बनती। उनकी नजरें टीवी पर जो होती हैं। बात तब बनती, जब अम्मां मुड़ कर देख लें या वह उनकी आंखों के सामने पहुंच जाए। सामने आने पर नजर भर देख लेतीं, तब मानतीं कि सुन लिया है। फिर समझाना शुरू करतीं- देखो! इस ‘देखो‘ का मतलब होता, ध्यान से सुनो। अम्मां की आंखों सुनी, कानों देखी दुनिया।

कभी अम्मां कहती रहती थीं, उन्हें टीवी देखना पसंद नहीं और दिन भर मोबाइल हाथ में लिए रहना, चोचले से भी उन्हें कोफ्त होती है। काम-धाम छोड़ कर टीवी से चिपके रहना, जैसी निठल्लाई कुछ नहीं। बेमतलब के समाचार, जिनसे कोई लेना-देना नहीं, देखते रहो। उस पर भी बकवास बहसें। खुद भी उलझ पड़ो। खेल कोई खेलना नहीं और घर बैठे क्रिकेट, फुटबाल करते रहो। घर-घर और सास-बहू, एक पर एक बंड, एक से एक डग आगे कुलटा। बड़े बनने वालों की फूहड़ बातें और हरकत। मोबाइल ने सब का दिन-रात हराम किया हुआ है। बात सिर्फ बातों तक थी, तब तक तो फिर भी गनीमत थी। अब तो सब कुछ मोबाइल। यहां तक कि बच्चों को मोबाइल छोड़ पढ़ने को नहीं कह सकते। पढ़ने को कहा कि बस मोबाइल हाथ में। कान में इयर-फोन, फिर बच्चे कहां किसी की सुनने वाले। क्या जमाना आ गया।

सचमुच, क्या जमाना आ गया। घर में बच्चे पढ़ने वाले। सब औरत-मर्द कामकाजी। सुबह होते एक-एक कर अपने काम पर निकलने लगते और बारी-बारी काम वाली बाई आने लगतीं। एक झाड़ू-पोंछा के लिए। एक कपड़ा-बर्तन के लिए। एक खाना बनाने के लिए। और एक, अब हो गई थी मालिश वाली, अम्मां की चहेती। अम्मां और उसकी बातें, दरयाफ्त, पड़ोसियों और मुहल्ले भर की खोज-खबर, फुटकर सामान लाना-ले जाना, कुल मिला कर उसके इतने काम होते थे कि उसे किस काम वाली कहा जाए, तय नहीं हो पाता था। अब मालिश भी करने लगी थी, इसलिए नाम हुआ मालिश वाली। घर के बाकी लोग, इन सबको इसी तरह जानते-पुकारते थे। अम्मां सबका नाम जानती थीं और उनके नाम से बुलाती थीं।

अम्मां को इन काम वाली बाइयों के असली नाम, यानि मायके वाले, पुराने, शादी के पहले वाले नाम भी पता थे। मगर वे उन्हें उनके गांव पर बने नाम से पुकारती थीं। मालिश वाली बेलसपुरहिन थी। झाड़ू-पोंछा वाली ने काम छोड़ा और उसकी जगह नई, उम्रदराज बाई आई, यह भी बेलसपुरहिन थी। अम्मां ने रास्ता निकाला, पहले तो कुछ दिन उसे असली नाम ‘मंगली‘ कह कर पुकारा। वैसे यह भी उसका असली नाम न था। वह बिलासपुर के मंगला की रहने वाली थी। ‘मंगली‘ यों तो छोटा नाम था, मगर इस नाम से बुलाना उन्हें सहज नहीं लगता था। इसी बीच किसी ने उनसे कह दिया कि रोज-रोज, बार-बार मंगली-मंगली क्यों उचारती रहती हो। बेवजह मंगल-अमंगल का फेरा। उस दिन से बूढ़ी बेलसपुरहिन, नवेली हो कर छोटी कहाई और मालिश वाली युवा, घर में पहले आमद दर्ज, बड़ी कहाने लगी, दोनों के नाम के साथ का बेलासपुर कुछ ही दिनों में जाता रहा।

नापसंद के बावजूद अम्मां टीवी के सामने बैठने लगी। रिमोट हाथ में, चैनल भी खुद से बदलने लगीं। क्या करें! ‘इस घर‘ में तो किसी के पास समय नहीं, कोई खाली नहीं बात सुनने को। अम्मां कहतीं। इस घर पर इतना जोर होता, मानों उन्हें पता हो कि बाकी पारा-पड़ोस में क्या होता है। या शायद वे इस बहाने उस घर, अपने घर यानि मायके को, मायके के दिनों को याद कर लेती थीं। उनका ऐसा कहना सपाट-सा होता कि उसमें कोई कुढ़न-अफसोस नहीं पकड़ा जा सकता था। अम्मां ठीक ही कहती हैं, कहानी कहने को नानी-दादी हैं तो बच्चे कहां रह गए सुनने वाले। यहीं प्रवेश होता है, मालिश वाली का। वह मालिश वाली तो बाद में हुई। पहले वह कहानी सुनने वाली बन कर आई थी। जब उसका महीना तय हुआ कि वह रोज शाम एक घंटे के लिए आएगी और अम्मां से कहानी सुनेगी। सिलसिला चल निकला। अम्मां कहतीं- सबकी अपनी रामकहानी।

अम्मां शाम की चाय पी कर बरामदे में आ जाती थीं। ठीक समय पर मालिश वाली आती। जै-जोहार के बाद अम्मां की कहानी कथावाचक-सूत्रधार घोषणा के साथ शुरू होती- ‘आज हम अमुक की कहानी कहेंगे‘, कहानी सुनाएंगे नहीं, कहानी कहेंगे। अमुक होते- राजा हरिश्चन्द्र, भक्त प्रहलाद, लक्ष्मीबाई, शिवाजी महराज, भीष्म पितामह, महाराणा प्रताप, मीराबाई ... ...। महीना तय हुआ, उसमें मालिश वाली के लिए चाय की शर्त नहीं थी। मगर कहानी सुनते-सुनते वह ऊंघने लगती। अम्मां ने इसका बुरा नहीं माना, बल्कि बीच में पांच मिनट का इंटरवल होने लगा, जिसमें मालिश वाली के लिए चाय आ जाती। मालिश वाली जो ठीक चार बजे आती और पांच बजे, चाहे कहानी अधूरी रहे, लौट जाती थी, अब चाय के एवज में कुछ देर होने पर भी न सिर्फ रुकी रहती, अड़ोस-पड़ोस का बुलेटिन सुना जाती। छोटे-मोटे सौदा-सुलुफ निपटा देती। इस तरह वह कहानी सुनते, निठल्ली पगार पाने वाली से, काम कर पैसा कमाने वाली बन गई।

पुरुष विभाग में दूध वाला, पेपर वाला, धोबी और माली थे। इनका नाम रामू या छोटू होता। बालिग हो तो रामू और कमसिन हो तो छोटू। कभी-कभी ऊंचाई में कम हो वह भी छोटू हो जाता था। इन सबके आने का समय अलग-अलग था। पहले अखबार वाला, फिर दूध वाला रोजाना। माली उसके बाद, हफ्ते में एक बार दोपहर तक और शाम को धोबी, हफ्ते में दो बार। इनके आने का समय अलग-अलग और इतना निश्चित था कि इनमें से कोई भी शायद एक-दूसरे को न जानता हो और जानता भी हो तो यह नहीं जानता होगा कि इस घर में जहां उसका आना-जाना है, दूसरा भी इसी घर में आता है। धोबी खुद आता या उसका लड़का छोटू। फिर भी नागा बस उसी का होता था। उसके बढ़ते नागे को देखते हुए दूसरे धोबी पर भी समानांतर विचार होने लगा था।

माली, देस जाता तभी नागा होता। ऐसा हर साल और साल में बस दो बार होता। पूरे साल में कुल दो नागा। साल की बावन में से पचास हाजिरी। इसलिए उसे नागा नहीं माना जाता। दूध वाला और पेपर वाला खुद नहीं आते, तो उनके बदले कोई दूसरा आता होगा। दूध वाला, ऊंची आवाज में ‘दूध‘ कहता और लापता हो जाता। पेपर वाला, चुपचाप पेपर फेंक जाता, ध्यान रहे तभी थोड़ी आहट पता लगती। कभी-कभार ही उसे देख पाते, उसके अस्तित्व में उस खुद से ज्यादा उसका फेंका हुआ पेपर होता। इसलिए उसके बदले कोई और पेपर फेंक जाता तो भी फर्क न पड़ता। पेपर वाला पहली तारीख को नियम से बिल ले कर आता, मान लेते कि वही ‘पेपर वाला‘ है। अम्मां पेपर को गजट कहतीं और बाबूजी से सुना था 'अखबार'। इस तरह समाचार-पत्रों से हमारा रिश्ता भी कुछ-कुछ फर्क था। अम्मां कहतीं- सबहिं नचावत राम गोसाईं।

एक सदस्य डागी था। घर में चली आ रही पिछली कई पीढ़ियों का वंशज। यह एक ऐसा था जिसका नाम हमारे, अम्मां के और सभी के लिए एक ही, ‘डागी‘ था। उच्चारण में जरूर फर्क होता। वह अंतर डा से डॉ होते डो के बीच का। इस तरह वह डागी, डोगी और इसके बीच वाले उच्चारणों से चार-पांच नाम वाला माना जा सकता था। डागी बहुत छोटा था, शायद उसे ठीक से मालूम भी न रहा हो कि उसका नाम भी है तब इस प्रस्ताव पर विचार हुआ था कि इसका नाम बदल कर शेरू कर दिया जाय। अधिकतर को यह नाम पसंद आ गया था। वह भी इस नाम पर पूंछ हिलाने लगा था। तब तक तर्क आ गया कि यह शेर की इज्जत का सवाल होगा, उसकी भी कोई औकात होती है। वितर्क हुआ कि कौन सा शेर को पता लगना है और वह इतनी सी बात का क्यों बुरा मानने लगा। रंगरूट-मजूर को मेठ-मुंशी जी कह देने पर भला कौन सा मुंशी जी की इज्जत में बट्टा लग जाता है।

आखिरकार माना गया कि नाम का असर तो होता है और नाम शेरू हुआ तो वह खूंखार हो जाएगा, इसलिए परंपरा का निर्वाह करते हुए नाम डागी ही चलने दिया जाए। डागी, डागी ही रह गया। इसके असल नस्ल के होने का पुराना पैडिगरी रिकार्ड, घर के अन्य जरूरी दस्तावेजों के साथ रखा था, जिससे पता चलता था कि इसका पुरखा, जर्मन शेफर्ड-जीएसडी, अलसेशियन, जमाने पहले किसी अंगरेज अफसर के घर आया था। इतिहास रूप बदल कर अपने को इस तरह दुहराता है, कि पता न लगे, दुहरा रहा है, नकल कर रहा है। वैसे भी खुद की नकल, नकल कैसे हो सकती है। खैर, यह शेफर्ड कुत्ताग ‘जर्मन‘ कहा गया, जिस तरह अब ट्रंप कोरोना वायरस को चाइना वायरस कहते हैं, कोई वुहान वायरस और बाकी दुनिया चाहे कोविड-19 कहती रहे।

पीढ़ी-दर-पीढ़ी यदि इन्हें डागी प्रथम, डागी द्वितीय, डागी तृतीय कहा जाता तो यह गिनती पंद्रह-बीस तक पहुंच गई होती। रिकार्ड अब गुम हो गया था और ठीक याद रख पाने वाला इस पीढ़ी में कोई नहीं रहा, जो बता सके कि यह डागी की कौन सी पीढ़ी है। यह ठीक उतना ही गैर-जरूरी हो गया था जितना खुद अपनी पांचवी पीढ़ी के ऊपर मातर और सातवीं पीढ़ी के ऊपर के पितर-पुरखों का नाम जानना, मगर अब इतना भी कौन याद रखता है। डागी को अम्मां नापसंद करती थीं, लेकिन अम्मां के व्यवहार से यहां भी तय कर पाना संभव नहीं होता कि वे उसे कितना और कैसे नापसंद करती हैं या पसंद।

चुनावों में वोट किसे देना है, अम्मां यह खुद तय करतीं। उन्होंने वोट किसे दिया, हम कभी ठीक अंदाजा नहीं लगा पाते। पूछने पर कहतीं, गुप्त मतदान। चुनाव कोई भी हो, परिणाम आने पर खुश होतीं, और कुछ दिन बाद नाराज होती रहतीं। बहरहाल, अपनी नापसंद के बावजूद डागी को दोनों समय खाना देना, उसका टीका, तबियत खराब होने पर इलाज और ठंड में उसके लिए गुदड़ी का इंतजाम वही करती थीं। अम्मां ध्यान देती रहतीं कि उसके नाक पर नमी है या नहीं। नाक सूखी दिखती, तो बुदबुदाने लगती कि इसकी तबियत ठीक नहीं है और खाने के समय उसके सामने मठा रख देतीं। मठा की ओर वह ध्यान नहीं देता और भूखा होने पर भी नहीं पीता तो अम्मां मान लेती कि उसकी तबियत ठीक है और उसे दूसरे समय सामान्य खाना दिलवा देतीं। पूछने पर बतातीं कि मठा से डागी के तबियत की जांच भी होती है, न पिये तो तबियत ठीक है, पी ले तो खराब और पिया तो यही दवा और इलाज भी। डागी को टीका लगवाने के अलावा उसके लिए कभी डाक्टर की जरूरत नहीं पड़ी। अम्मां की ऐसी बहुत सारी ज्ञान की बातों का स्रोत क्या है, पता नहीं लगता। मठा-कल्प वाले फार्मूले पर उन्हें टोक दें कि यह तो देसी कुत्तों वाला तरीका है तो वे समभाव से अभिधा में तर्क करते हुए कहतीं, कुत्ता तो कुत्ता ही होता है, फिर यह हमारा कुत्ता है और हम ही कौन से विदेशी ठहरे।

अम्मां एकादशी का व्रत रखतीं और तीज-त्यौहार की तिथियों का ध्यान रखतीं। अम्मां को शायद यही एक बात पसंद आई थी कि डागी ने जब से होश संभाला है, वह एकादशी का व्रत रखता है। न जाने उसे कैसे पता चलता, एकादशी के दिन सुबह आठ बजे वाली खुराक सूंघता भी नहीं, उस दिन एक बार, एकजुनिया रहता। शाम पांच बजे दूध-रोटी। अम्मां का स्नान-ध्यान सुबह दस बजे तक चलता रहता। कभी ऐसा भी होता कि एकादशी की तिथि ध्यान में नहीं रहती। उन्होंने नियम बना लिया था कि खुद मुंह जूठा करने के पहले जा कर डागी का कटोरा देख लेतीं।

डागी, अम्मां के साथ टीवी देखता, ब्रेक में दरवाजे तक चक्कर लगा आता। घुरघुरा कर, गुर्राकर या खंखारते, धीमी आवाज में भूंकते अपनी टीवी पर चल रहे कार्यक्रम के लिए पसंद-नापसंद जाहिर करता। वह जानता था कि अम्मां उसे पसंद नहीं करतीं, अम्मां उसे डांटती, लेकिन चैनल बदल देतीं। वह फिर से दोनों पैरों पर थूथन टिकाए, आंखें मिचमिचाते टीवी देखने लगता। कौन सा न्यूज चैनल देखना है, के मामले में अम्मां डागी की राय को अधिक तरजीह देतीं। अन्य चैनलों के लिए अम्मां की पसंद से डागी की नाइत्तिफाकी कभी-कभार ही होती। डागी का व्यवहार, घर के बोनाफाइड सदस्य सा हो गया था। शायद यह पीढ़ियों का असर था। अपनी उम्र के सात-आठ सालों में ही उसने यह प्रतिष्ठा अर्जित कर ली थी। लगता है कि उसकी अगली पांच-सात पीढ़ियां इसी तरह रहीं तो सेपियन भले न बन पाएं, बंदर जरूर बन सकते हैं। यों भी तो वह अपने भेड़िया पुरखों की कुत्ता संतान था।

अम्मां ने नापसंद के बावजूद मोबाइल युग में प्रवेश कर लिया था। अम्मां का मोबाइल बटन वाला है। उसके फोन बुक में सिर्फ एक नंबर है, मौसी का। नाम की जगह भी नंबर ही लिखा है। इस तरह मौसी का नंबर दुहरा कर लिखा गया है। बाकी के नंबर अम्मां की उस डायरी में हैं, जिसे वह अक्सर यहां-वहां रख कर भूल जाती हैं। इस डायरी में कुछ भजन लिखे हुए हैं, जो सब के सब अम्मां को जबानी याद हैं। इसमें काशी, प्रयागराज, गयाजी, पुरी और बदरी-केदार के पंडाजी महराजों का अता-पता दर्ज था, तीर्थ जाने की बात आए तो कहतीं, अभी तो यहीं हमारे चारों धाम। उनकी इस बात के कई मतलब निकाले जा सकते थे। काम वालियों के नाम और काम पर लगने की तारीख के अलावा इसमें कई डाक-पते लिखे हुए हैं, जिन पर अब चिट्ठियां नहीं भेजी जातीं। इन पतों की जरूरत तभी होती है, जब गमी-खुशी का कार्ड भेजना हो। अम्मां की डायरी का एक-एक हर्फ उनका लिखा हुआ था, लेकिन उसे पढ़ कोई भी सकता था। वह खुली किताब थी, खोया-पाया जैसी। डायरी की जरूरत यदा-कदा ही होती, मगर अम्मां चाहतीं कि डायरी का पता-ठिकाना मालूम रहे। डायरी कहीं भी रखकर भूल जाती, ऐसा अक्सर होता है, उस दिन सारी काम वालियों को डायरी खोजने का अतिरिक्त काम करना होता है।

झाड़ू-पोंछा वाली का चटक-मटक अम्मां को एक नहीं सुहाता। आए दिन नागा भी करती है। टच स्क्रीन, नया मोबाइल खरीद लिया है। अम्मां झिड़कती हैं, नागा हुआ तो फोन कर बताना चाहिए, कि नहीं आ पा रही है। बहाना एक से एक। आने पर कहती है, पानी बरस रहा था, छाता महंगा हो गया है, आप ही खरीद कर दे दो। अम्मां बड़बड़ाती, फोन तो जैसे मुफ्त में आया होगा। फोन डायरी खोज कर लाई और हाथ में पकड़ाते हुए कहा- आप भी स्मार्ट फोन ले लो अम्मां। कुछ दिनों बाद अम्मां उसकी नापसंदगी वाली इस बात को बार-बार याद करने लगीं। पूछतीं कि इसका वाला फोन कितने में आता होगा, स्मार्ट फोन लेने वाली उसकी बात दुहरातीं, मुझे कहती है, आप भी ले लो, इसकी ऐसी ही बेकार की बातें मुझे एकदम पसंद नहीं। लगने लगा है कि उनके लिए टच स्क्रीन लाना, हो सकता है उन्हें पसंद नहीं आने वाला, फिर भी अब मंगाना होगा।

अम्मां के हिसाब से उनका मोबाइल ‘आडियो चैनल‘, सच्चा है। यह बात अलग है कि मोबाइल वार्तालाप में टीवी पर देखी-दिखाई बातें भी होती हैं। मोबाइल वाले चैनलों में से मामा-मायका चैनल में अक्सर बाधा आती रहती थी, नानी के जाने के कुछ दिनों बाद से बंद ही पड़ा है और इसकी जगह मौसी चैनल ने ले लिया है, यह इनकमिंग और आउटगोइंग दोनों है और हर दिन देर-देर तक सक्रिय रहता है। मोबाइल का एक सहेली चैनल है, लेकिन वह तभी जुड़ता है, जब इनकमिंग हो। कभी-कभी एक मामी चैनल भी सक्रिय होता है, वह भी सिर्फ इनकमिंग है। दोनों बुआ के चैनल आउटगोइंग हैं, इस दोनों पर कॉलर ट्यून की तरह स्वागत वाक्य है- ‘आप तो हमें भूल ही गईं।‘ सत्य-आग्रही अम्मां को यह सुनना तनिक भी बुरा नहीं लगता।

अम्मां , टीवी के इंटरटेनमेंट चैनलों को खबरों की तरह और खबरिया चैनलों को इंटरटेनमेंट की तरह देखती हैं। आस्थाय, सास-बहू, तारक मेहता तो चलता ही रहता है। कोरोना, राम मंदिर, एनकाउंटर मामले, मैचमेकिंग भी इन दिनों जोर पर है। अम्मां को दुनिया-जहान की सारी कच्ची-पक्की खबर होती है। टीवी पर सब झूठा-सच होता है, ऐसा अम्मां का दृढ़ विश्वास है, इसलिए सभी चैनल उनके लिए भेदभाव मुक्त, एक जैसे असर वाले हैं। अम्मां, इस स्रोत से मिली खबरें काम वालियों के लिए जारी करती हैं, अलावे मालिश वाली के। मालिश वाली खुद एक बहुरंगी फ्री टू एयर चैनल है।

मेरी आदत बन गई थी कि अब टीवी की आवाज न सुनाई दे, म्यूट हो जाए तो ध्यान भटक जाता था। टीवी की आवाज, तानपूरा हो गया था। टीवी म्यूट में अक्सर अम्मां के मोबाइल चैनल चालू हो जाते थे। दूसरी तरफ मौसी होतीं, तब मालिश वाली का शामिल हो जाना, अम्मां को असहज न करता और मौसी ने भी उसकी उपस्थिति और भागीदारी को जान-मान लिया था। त्रिकोणीय वार्तालाप का चौथा कोण, श्रोता मैं हूं, जिसने इस वार्तालाप में अनजाने ही, अप्रस्तुत मौसी की ओर से आने वाली टिप्पणियां, मन ही मन पूरी करने की जिम्मेदारी ले ली है। बातचीत में ‘सबके जाने का दिन तय है, जिसका जब लिखा हो, मौत का क्या ठिकाना, कब आ जाए‘ जैसे आप्त वचन होते। निश्चित करना आसान नहीं होता कि ऐसा किसी टीवी शो में हुआ है, खबरिया चैनल में या सचमुच। इसी तरह ‘जोड़ियां तो ऊपर से बन कर आती है‘, सुन कर लगता कि मौसी के यहां किसी मांगलिक कार्यक्रम की तैयारी है, पर कुछ देर बाद यह मैचमेकिंग शो के पात्रों में बदल जाते। मौसी की तबियत बिगड़ने पर बातें कम होती और बात के मसले भी कुछ अलग, यानि डॉक्टर, दवाएं, अस्पताल होते। मौसी की ओर से अपनी बहू का दुखड़ा आने लगता, तो पता लग जाता कि फिर लंबी बात होगी, मौसी की तबियत सुधर गई है।

फिल्मी चैनल और गॉसिप क्या, आजकल तो सब कुछ सिनेमा-सिनेमा हो रहा है। अमुक हीरो कैसे मरा? कोरोना से, नहीं बीमारी से। और फलां कैसे मरा? कोरोना से, नहीं अपनी मौत से। वह कैसे मरा? करोना से, नहीं, फांसी लगाकर, नहीं जहर से, नहीं नहीं ड्रग से। मरा या मारा गया। महिला मित्र, स्टाफ, मित्र, भाई, वकील। टीवी के पात्रों का आह्वान-अनुष्ठान ऐसा कि म्यूट हो तो भी लगता है कि छिटक कर स्क्रीन से बाहर आ रहे हैं। घर में चहलकदमी करते आगंतुक घुसपैठिए। अपनी आवाज के पीछे-पीछे घर में बसेरा करने लगे हैं। तमाशा और तमाशबीन लोग। फिल्म वाले मर कर भी फिल्म बन जाते हैं। बायोपिक, रियलिटी शो। सीन क्रिएट, रिक्रिएट किया जा रहा है। दृश्य गढ़े जा रहे हैं। मालिश वाली याद दिला रही है कि अंगरेज लोग मरते हैं उसे सुसाइड कहते हैं, वैसे ही फिल्म वालों की अचानक मौत का सीन हो यानि फिल्मी मौत, उसे ऑटोप्सी कहते हैं। मौसी को कलाकार पर लाड़ आता है। मौसी के लाड़ का तो तकिया-कलाम ही है- मुई, मुआ। अम्मां वचन- होइहि सोइ जो राम रचि राखा।

दीवार के पार दृश्य बन रहा है, एक ऊंची मीनार है, जिस पर कोई चढ़ता जा रहा है, बिना एहसास कि गिरने का खतरा है। कुछ समय बाद वही मीनार, दूरबीन बन कर उसके हाथों में आ गई है। वह दूरबीन पर आंख सटाए चांद-सितारों को छू लेना चाहता है, उन्हीं में समा जाना चाहता है। हमलोग टीवी के फ्रेम में समाए हैं, ग्रुप फोटो बनकर और वह अब दूरबीन लिए टीवी देखते अम्मां की कुरसी पर आ बैठा है।

टीवी, म्यूट है। टप-टप टप-टप, टिक-टिक-टिक, घट्ट-घट।

Monday, March 29, 2021

जन्म-जन्मांतर

एक बच्चा है।
बचपन में पूर्व जन्म की यादें ताजा रहती हैं।
बड़े होने पर धुंधली पड़ती जाती हैं, खोने लगती हैं।
कथावाचक कहानी सुना रहे हैं।
बच्चा कहानी सुन रहा है।
तैंतीस कोटि योनियां हैं।
मनुष्य तन बड़े भाग्य से मिलता है।
पंचतंत्र की कहानियां।
गज-ग्राह, मगर-बंदर।
बुद्ध के पूर्वजन्म की कहानियां सुनता है।
जातक कथा सुनता है।
अब बच्चा असमंजस में है।
उसके मन में दुविधा होने लगी है।
उसे कभी लगता कि पंछी है, तितली है, शेर है।
चींटी, मधुमक्खी, चूहा, हाथी।
कभी लगता मछली है, सांप है।
सांप-सीढ़ी का खेल है।
यह मेरे पूर्वजन्मों के कारण है।
मानव तन मिला है, लेकिन पूर्वजन्मों से मुक्त न हुआ।
पिछले जन्म की योनियों का असर इस जन्म में भी बाकी रह गया है।
वह कोतवाल चिड़िया की कहानी पढ़ता है।
उसे आकाश में उड़ते चील का पीछा करते देखता है।
कभी वह बड़ों से झगड़कर भी छोटों को बचा लेने की बात सोचता है।
क्रेस्टेड सर्पेंट ईगल, हनी बजार्ड, फिशिंग आउल, किंगफिशर।
क्या ऐसा औरों को भी लगता है।
साथी बच्चे उसकी हंसी उड़ाते।
हर दिन ऐसा होता।
संयुक्त परिवार है।
स्कूल जाता है।
किसी ने डांटा, किसी ने पुचकारा।
झगड़ा होते देखा, भागमभाग देखा।
सजा मिली, नजर बचा लिया।
अपनी किसी पूर्व योनि में भटकने लगता।
अपने खुद की खोज में भटकने लगता है।
मेरे साथ क्या होता है और मैं हूं कौन?
आत्म संधान, स्व की खोज, अपने आप की तलाश।
जीव, आत्मा, देह।
संचित, क्रियमाण, प्रारब्ध का ऋत।

Tuesday, March 23, 2021

राग मारवा

‘राग मारवा‘ संग्रह की कहानियों का विराग-अनुराग अपनेपन से बांध लेता है। इन कहानियों की कमी या खूबी यही है कि यहां कुछ भी नया और अलग नहीं जान पड़ता। रचनाकार का अनुभव संसार उसका अपना निजी होते हुए भी, इतना आत्मीय और समावेशी है कि वह अगल-बगल घटते जान पड़ता है। खास यह कि भाव ऐसी न्यायपूर्ण संगति से शब्दों में बदलते हैं, वह रस-सृष्टि अपने साथ चलने के लिए रोक रखती है।

संग्रह की पहली दमदार कहानी ‘राग मारवा‘ और आगे भी पढ़ते हुए लगा कि बगल से गुजरती कोई जिंदगी, समानांतर अक्सर ओझल रह जाती है, लेकिन एक धीमी कराह पर ध्यान अटके, तो वह राग मारवा की तरह मन में झरने लगता है। मनोहर श्याम जोशी की कहानी, ’सिल्वर वेडिंग’ याद आती है। पता हो कि यह रचनाकार का पहला संग्रह है तब शायद पाठक का नये परिचित लेखन पर ध्यान अलग ढंग का होता है और बुक मार्क लगाते हुए दीख पड़ता है कि कहानियों में भाषा, भाव, अनुभव, सजग दृष्टि, अवलोकन, संवेदनशील मन और अभिव्यक्ति, यह सब किसी प्रौढ़ रचनाकार की कलम की तरह सधा हुआ है, जिसमें संतुलन ऐसा कि सहज प्रवाह बना रहे। पहला संग्रह है लेकिन अनगढ़ता कहीं नहीं। रचनाएं, अभ्यस्त लेखन की करीने से प्रस्तुति है।

कहानी में अरमानों का ‘गुलाबी दुपट्टा‘ इस तरह लहराता है कि त्रास का सपाटपन, बयां करते और भी त्रासद हो जाता है। कहानी में सुघड़ परिपक्वता है। ‘जनरल टिकट‘ में भाषा का बढ़िया इस्तेमाल, कहानी के मूड को संभाले हुए है। ‘फैमिली ट्री‘, बच्चे के मन में बच्चों-सा सहज हो कर उसमें उतरा-पढ़ा गया है। कहानी का शीर्षक जरूर मिसमैच लगता है। कहानी ‘आवाज में ...‘ तसल्ली से की गई महीन बुनावट, जिसके चलते इस प्रेम कहानी में दरार भी, तल्खी के साथ नहीं, स्वाभाविक आता दिखता है।

कहानी ‘धुँध‘, मन में बसा घर, समय के साथ टू बीएचके और फिर कम्पार्टमेंट होता जाता है। तीन अलग सेट के टुकड़ों वाला जिगसा पजल। बच्चों में बंटवारा तो करना ही होता है, लेकिन वह मां-पिता को कैसे मंजूर हो। बुकमार्क लगाते हुए ध्यान जाता है कि किस तरह अगल-बगल से गुजरती जिंदगी, नजर भर देखा, नब्ज टटोला कि अफसाना बन जाती है। कहानी ‘आसमानी कागज...‘ और ‘सुरमई‘ में कहे-अनकहे के बीच पनपते-मुरझाते रिश्ते हैं तो ’विदाई’ में भी सीमित पात्रों से बुना गया सघन समीकरण है। ‘पानी पे लिखा...‘ मन में फूटा-बहता यादों और भाव का सोता, न जाने क्या और कहां बहा ले जाए, कब किनारे टिका दे।

विविध भारती की रेडियो सखी ममता सिंह की कहानियां, महानगर, रेडियो, विविध भारती, गीत-संगीत से सराबोर हैं। राग मारवा में डूबते-उतराते कहानी ‘आखिरी कॉन्ट्रैक्ट‘ के आखिरी शब्दों के साथ, रुपहला ख्वाब मानों बदल जाता है सुनहरा सबेरा में- ‘...उसमें हम घोलेंगे प्यार का गुलाबी रंग... ।‘

Saturday, February 20, 2021

बिलासपुर की त्रिवेणी-1966

छत्तीसगढ़ की पुरानी और प्रतिष्ठित संस्था ‘भारतेन्दु साहित्य समिति, बिलासपुर द्वारा पुस्तक प्रकाशन माला के पंचदश पुष्प के रूप में साहित्यिक त्रिमूर्ति अभिनंदन समारोह पत्रिका का प्रकाशन महाशिवरात्रि सं. 2022 यानि 18 फरवरी 1966 को किया गया था।
इसमें जिन तीन साहित्यिक विभूतियों का अभिनंदन हुआ, उनके बारे में पुस्तिका के आरंभ में कहा गया है-
जिन तीनों ने किया पल्लवित साहित्यिक उद्यान।
वे तीनों हैं ‘विप्र‘ के काव्य रसिक भगवान।।

इस पुस्तिका में छपा छायाचित्र और स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी जी का लेख प्रस्तुत है। पुस्तिका, प्रातःस्मरणीय हरि ठाकुर के संग्रह से उनके पुत्र आशीष सिंह द्वारा उपलब्ध कराई गई है।


।। बिलासपुर की त्रिवेणी ।।

[द्वारा- स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी]

बिलासपुर की साहित्यिक त्रिवेणी का यह सम्मान लगता है कि जैसे पुण्य तीर्थराज प्रयाग यहां साकार हो उठा है। आदरणीय मधुकर जी, प्यारेलाल जी गुप्त तथा यदुनन्दन प्रसाद जी श्रीवास्तव ने अपनी अकथ तपस्या और अपनी बहुमुखी प्रतिभा के बल पर छत्तीसगढ़ के साहित्य जगत का सदैव ही पथ प्रदर्शन किया है।

आदरणीय मधुकर जी को काव्य शक्ति तो पैतृक विरासत में मिली है। मुझे स्मरण है कि मधुकर जी के पुण्य स्मरणीय पिता जी बिलाईगढ़ में चाकरी की अवधि में रायपुर आकर जब अपने सहयोगी के यहाँ जो मेरे किरायेदार थे, ठहरते थे तब हम बालकों का मनोरंजन यह कहकर किया करते थे “पुरानी है पुरानी है। मेरी डिबिया पुरानी है। जमाने भर की नानी है” आदि आदि। वयस्क होने पर जब मुझे ज्ञात हुआ कि वे मधुकर जी के पिता श्री थे तो मेरा मन अकस्मात ही उनके प्रति श्रध्दावनत हो गया। ऐसे मधुकर जी ७५ वर्ष पार कर साहित्य साधना में यदि आज भी युवकों को मात दे रहे हैं, तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं है। 

आदरणीय गुप्त जी कवि, आलोचक, पुरातत्वज्ञ, इतिहासकार आदि क्या नहीं है? को-आपरेटिव्ह बैंक की सेवा करते हुए जमा खर्च के शुष्क आंकड़ों में व्यस्त रहते हुए भी उनका हृदय साहित्य की अमृतधारा से परिपूरित है। 

और यदुनन्दन प्रसाद जी श्रीवास्तव तो “कलम के जादूगर“ हैं ही। अपनी सशक्त लेखनी के द्वारा पत्रकारिता के क्षेत्र में तथा अपनी वाणी और सक्रियता के द्वारा राजनीति के क्षेत्र में उनका योगदान स्मरणीय रहेगा। 

आज उनके अभिनन्दन के अवसर पर इस त्रिवेणी-स्वरूपा त्रिमूर्ति की सेवा में पुष्पान्जलि अर्पित कर कौन अपने को धन्य नहीं समझेगा?

Thursday, February 11, 2021

भानु जी के पत्र-2

भानु जी के दो पत्रों में से दूसरा पत्र यहां और भूमिका सहित पहला इस लिंक पर है।

दूसरा पत्र

बिलासपुर 26।2।12

प्रियवर सेठजी - जयगोपाल

आपका पत्र हस्तगत हुआ। परमानंद हुआ। छंदःप्रभाकर की तृतीयावृत्ति शोधकर छपने को तय्यार है आपने ठीक समय पर उसका स्मरण किया एतदर्थ आपको धन्यवाद देता हूं हमें कल्यान वालों ने बहुत धोखा दिया और हमारा एक बड़ा भारी ग्रंथ 500 से अधिक पृष्ठ वाला ‘‘मधुबन चरितामृत‘‘ तीन बरस से लापता कर दिया कई पत्र लिखे कि उसको वापिस ही कर देव परंतु कोई जवाब नहीं देवे इसके लिये उनके साथ खास कारवाई करना होगी हमारा उनका अब कोई संबंध नही रहा. यदि आपकी सहायता से हमें वह ग्रंथ ही वापिस मिल जायगा अथवा आप ही छापें तो विषेष कृपा होगी आशा है आप इसमें हमारी सहायता करेंगे

छंदःप्रभाकर के विषय में काशी और प्रयाग में लिखा पढ़ी चल रही है परंतु आप हतारे प्राचीन स्नेंही हैं आप ही के यहां शीघ्र छपे तो अत्युतम है परंतु आप यह लिख भेजिये कि किस शर्त से आप उसे छापेंगे. इस तृतीयावृति का आप स्वत्व लेने को प्रसन्न हैं तो हमें क्या प्रदान करेंगे और मूल्य ले कर छापेंगे तो किस निरख से छापेंगे.

कहना नही होगा कि इस ग्रंथ की बहुत मांग हिंदुस्थान के प्रत्येक नगर में है और सरकार से भी यह मंजूर हो चुका है शीघ्र पत्रोत्तर प्रदान करने की कृपा करें।। और भी ग्रंथ छापने को तयार हैं जैसे -

काव्य प्रभाकर (भाषा द्वितीयावृति) पृष्ठ 800
शुद्ध सप्तशती सान्वय भाषा टीका ‘‘ 400
रसिक प्रमोद ‘‘ 200
नवपंचामृत रामायण ‘‘ 70
काल प्रबोध ‘‘ 60
तुम्ही तो हो (श्रीकृष्णाष्टक) ‘‘ 10

मेरी हार्दिक इच्छा यही है कि हमारा और आपका जैसा प्रेम चला आया है वैसा ही बना रहे कोइ अंतर न पड़े वरन वृद्धिगत होता रहै. 

आपकी सेवा में गत वर्ष एक कापी काव्य प्रभाकर की भेजी गई थी परंतु आज तक समालोचना की कृपा न हुई अस्तु इस बात की जल्दी नही 

आशा है छोटे सेठ कुशल होंगे.

आपका परम स्नेही
जगन्नाथ प्रसाद
भानुकवि
छोटेसाहीब
बंदोबस्त

प्रसंगवश-

भानु जी के सबसे लोकप्रिय ग्रंथ छन्दःप्रभाकर की दसवीं आवृत्ति सन 1960 में पूर्णिमा देवी, धर्मपत्नि स्वर्गीय बाबू जुगल किशोर द्वारा प्रकाशित कराई गई, जिसके अंतिम कवर पृष्ठ पर भानु-कवि विरचित ग्रंथों की सूची दी गई है, जिसका चित्र यहां दिया गया है।  


भानु जी के पत्र-1

जगन्नाथ प्रसाद ‘भानु कवि‘ का बिलासपुर में निवास चांटापारा यानि तिलक नगर में था। उनके पुत्र जुगल किशोर हुए, जिनके निधन के बाद उनकी धर्मपत्नी पूर्णिमा देवी ने जगन्नाथ प्रिंटिंग प्रेस और प्रकाशन का काम संभाला। इनके पुत्र मोहन, स्वयं को मोहन मस्ताना या मोहन कवि कहलाना पसंद करते थे। मोहन कवि को हाथी पांव था। यही कोई 30 साल पहले वे यदा-कदा हमारे घसियापारा यानि राजेन्द्र नगर स्थित दफ्तर में मुझसे मिलने आते थे। उनके निवास की पहली मंजिल पर भानु जी की मेज-कुरसी, पुस्तके आदि धूल-गर्द भरी, लेकिन सुरक्षित थीं।

हरि ठाकुर के परिवार से जुगल किशोर के सपरिवार करीबी संबंध थे, जिनके माध्यम से भानु जी के दो पत्र उन्हें प्राप्त हुए, जो अब हरि ठाकुर के पुत्र आशीष सिंह के पास सुरक्षित हैं। आशीष जी ने इन पत्रों की जानकारी दी, दिखाया, प्रतिलिपि बनाने के साथ सार्वजनिक करने की अनुमति दी है। अनुमान होता है कि भानु जी ऐसे पत्र दो प्रतियों में लिखते और दूसरी प्रति संदर्भ हेतु अपने पास सुरक्षित रखते थे, जैसा उस जमाने का आम चलन था।

इनमें से पहला पत्र सन 1907 का खंडवा से तथा दूसरा 1912 का बिलासपुर से लिखा गया है। दोनों ही पत्र बंबई के प्रकाशक को लिखे गए हैं। यहां पत्र का मजमून दिया जा रहा है, जिसमें मूल से मामूली अंतर हो सकता है। शोधकर्ता और बारीकी से समझने का उद्यम करने वालों की सुविधा के लिए, सामग्री के मूल स्वरूप से मिलान हो सके, इसलिए पत्र की प्रति भी यहां लगाई जा रही है।

पत्रों को पढ़ते और प्रस्तुत करने के लिए फीड करते कई स्थानों पर टिप्पणी का विचार बना, किंतु वह फिर कभी। अभी कुछ छोटी-छोटी बातें। पत्रों में अनुस्वार के लिए चंद्र बिंदु के बजाय मात्र बिंदु का प्रयोग हुआ है। पहले पत्र का भारत वर्ष दूसरे पत्र में हिंदुस्थान हो गया है। दोनों पत्रों में प्रकाशक को पुराने नहीं बल्कि प्राचीन स्नेही कहा गया है। ग्रन्थों के लिए कम से कम दस हजार रुपये की अपेक्षा की गई है, जिनका व्यय सार्वजनिक कार्य में किए जाने और पुस्तक बाइ-बैक यानि वापस खरीदी (इस दौर में विनोद कुमार शुक्ल और पेंगुइन बुक्स विवाद याद आता है।) की बात कही गई है। साथ ही हिन्दी पाठकों की दशा का उल्लेख ध्यान देने योग्य है।

इन दोनों पत्रों में से पहला पत्र यहां और दूसरा इस लिंक पर है।

पहला पत्र

खंडवा. म. प्र.
21-7-07 

श्रीमान् सेठ खेमराज श्रीकृष्णदास जी, जयगोपाल! 

कृपा पत्र ताः 17-7 का मिला, समाचार जाने। इन ग्रन्थों को उत्तम बनाने में हम ने कोई कसर नहीं छोड़ी है। ईश्वर चाहेगा तो ये ग्रन्थ थोड़े ही काल में भारत वर्ष में घर 2 व्याप्त हो जावेंगे। हमने अनुमान किया था कि, इन ग्रन्थों के उपलक्ष में हमें कम से कम दश हजार रुपैये मिलेंगे, तथा उन रुपैयों को हम अपने व्यवहार में न लाकर सार्वजनिक काय्र्य में व्यय करेंगे। किन्तु भाषा काव्य के दुर्भाग्य से कहो, किवां हिन्दी पाठकों के अभाव से कहो, अभी इतर देशों के समान यहां के कवि, लेखकों तथा विद्वानों का उतना मान नहीं है अस्तु चिन्ता नहीं, आप हमारे प्राचीन स्नेही तथा शुभचिन्तक हैं। अतएव हमने भी आप ही के यहां छपाना निश्र्चय किया है आपके लिखे अनुसार हम सब पुस्तकों का सत्त्व आपको दिये देते हैं। इस पर चाहे आप हमें इसके उपलक्ष में अपनी इच्छा अनुसार जो कुछ देंगे, सहर्ष स्वीकृत किया जायगा और वह परोपकार ही में लगाया जायगा। साथ में यह भी विदित हो कि अभी छन्दःप्रभाकर की पांच सौ प्रतियां शेष है यदि उन्हें भी आप अर्ध मूल पर खरीद लें तो छन्दःप्रभाकर का भी सत्त्व आप को दे देंगे। मूल्य जब चाहे तब भेजें कोई जल्दी नहीं है। इतनी काॅपी बचे रहने का कारण हमारे सात चर्ष से कोई विज्ञापन न देने का है। दूसरे अन्तिम प्रूफ शोधन के लिये हमें भी यहां पर एक कर्मचारी 25/ माहवार पर रखना पड़ेगा और बम्बई में भी यदि हम एक कर्मचारी रखें तो दुहरा खर्च हम को पड़ेगा। अतएव वहां के लिये दो प्रूफ जांचने तक का प्रबन्ध अपनी ओर से कर लेवें और अन्तिम प्रूफ पास करने को हमारे पास भेजें व जब तक हम पास न कर लेवें तब तक छापना ठीक नहीं है परन्तु छपाई के काम में ढील न हो। जहां तक हो ग्रन्थ शीघ्र छप जाना चाहिये। कागज तो आप उत्तम लगावेंगे ही, किन्तु काल प्रबोध व नव पंचामृत रामायण को छोड़कर शेष ग्रन्थों का उत्तम बाईडिंग अवश्य ही करना होगा। इन पुस्तकों की भविष्यावृत्तियों में भी शोधने तथा रदबदल करने का हमको पूर्ण अधिकार होगा। इन सब प्रश्नों का उचित उत्तर आते ही ग्रन्थ भेज दिये जावेंगे। पत्रोत्तर तफसीलवार शीघ्र देवें। इति.

कापीराइट इस प्रकार देंगे।

1 काव्य प्रभाकर ..... कापीराइट 100 जिल्द लेकर देवेंगे।
2 शुद्ध सप्तशती ..... तथा 100 ..... तथा,
3 छन्दःप्रभाकर ..... तथा 200 ..... तथा
4 मधुबनचरित्रामृत ..... तथा 50 ..... तथ
5 नव पंचामृत रा. ..... तथा 100 ..... तथा
6 काल प्रबोध ..... तथा 100 ..... तथा
यह आप ही के लेखानुसार है 

आपका कृपाअभिलाषी
(हस्ताक्षर)
असिटन्ट सेटल्मेन्ट आफीसर

Wednesday, February 3, 2021

गिधवा में बलही

तीन दिवसीय पक्षी महोत्सव का कल 2 फरवरी 2021 को समापन हुआ और इसके साथ एक नई शुरुआत हुई, जिसकी जानकारी विस्तार से अखबारों आदि में आई है।

यहां इस पर कुछ अलग बातें।

गिधवा सामान्यतः गिद्ध, चील अर्थात ब्लैक काइट, जिसे पड़िया काइट कहा जाता था, का समानार्थी है और इससे मिलती-जुलती अन्य को भी गिधवा कह दिया जाता है, लेकिन छत्तीसगढ़ी में इजिप्शियन वल्चर के लिए गुकोड़ी और अन्य वल्चर के लिए रौना शब्द का प्रयोग होता है। यह संयोग है कि शिवनाथ नदी के बायीं ओर जितनी दूर गिधवा है, दाहिनी ओर लगभग उतनी ही दूर दरचुरा-विश्रामपुरी है, जो गिधवा-रौना का पुराना अड्डा है, क्योंकि यहां हड्डी गोदाम और किसी जमाने में बोन मिल हुआ करता था। मगर यह ग्राम नाम ‘गिधवा‘ पक्षी के नाम का द्योतक है यह निश्चित नहीं कहा जा सकता। छत्तीसगढ़ में एकाधिक गिधवा, गिधौरी, गीधा, गिधली, गिधनी, गिधापाली, गिधामुड़ा, गिधडांड, गिधपुरी जैसे ग्राम नाम सामान्यतः मिलते हैं और संभव है कि यह सिर्फ संयोग हो ऐसे ग्राम अधिकतर नदियों के आसपास हैं। अतएव गिधवा शब्द को नदी से जोड़कर भी समझने का प्रयास होना चाहिए। ऐसे स्थानों को रामकथा और जटायु से भी संबद्ध कर दिया जाता है। ऐसा ही एक शब्द, स्थल नाम सिंघल या सिंघुल है, जो नदी के साथ ही मिलता है, जिसे सिंहल द्वीप या श्रीलंका, रामकथा की लंका से जोड़ दिया जाता है।

मोहित साहू और जीत सिंह आर्य मेरे साथ थे। गिधवा बांध पर आसपास गांवों के लोग इकट्ठे थे। मेले का माहौल था। इस मौके पर मेरे लिए पक्षी-दर्शन के बजाय ग्रामवासियों की बातचीत अधिक दिलचस्प थी। पक्षियों को लोग अपने ढंग, अपनी भाषा और शब्दों में पहचान-बखान रहे थे। इसमें मुझे एक बुजुर्ग के मुंह से ‘बलही‘ शब्द सुनाई पड़ा। अन्य लोग कह रहे थे अइरी, पनबुड़ी, बदक, उन्होंने सुधारा और कहा ‘बलही आय‘। इस शब्द ने स्मृति का द्वार खटखटाया तो याद आया कि पोटिया, दुर्ग निवासी झुमुकलाल यादव के पुत्र गन्नू यादव से मुलाकात के अवसर पर पंक्तियां सुनी थी-
‘‘पड़की कमावे रनबन रनबन, परेवना कमावे मनचीते।
बलही बैठगे भरा सभा में, झड़े भड़ौनी गीदे।।‘‘

और इसी तरह की पंक्तियां किसी समय आकाशवाणी, रायपुर से बजने वाले बेहद लोकप्रिय गीत खुसरा चिरई के बिहाव में होती थीं, इस गीत के गायक आसाराम-झल्लूराम की जोड़ी थी। पता लगा कि इस जोड़ी के 68 वर्षीय आसाराम वल्द झाड़ूराम निषाद, बालोद जिला के रनचिरई के पास के गांव ठेठवार परसाही में रहते हैं, फरवरी 2018 में उनसे मिल कर उनसे यह गीत सुना था। एक अन्य ‘खुसरा चिरई के ब्याह‘ खरौद के बड़े पुजेरी कहे जाने वाले पं. कपिलनाथ मिश्र की लगभग सौ साल पुरानी प्रकाशित रचना, खूब सुनी-सुनाई जाने वाली, मेलों में बिकने वाली, लेकिन लगभग इस पूरी पीढ़ी के लिए सुलभ नहीं रही है। अनूठी आरनिथॉलॉजी है यह।

फिलहाल बलही। मवेशियों, विशेषकर गाय-बैल के लिए बलही के अलावा लाखी, चितकबरी, टिकलाही जैसे शब्द भी हैं। टिकलाही यानि सामान्यतः खैरी या धूसर काली गाय, जिसके माथे पर छोटा सा सफेद चिह्न हो और बलही, जिसके माथे पूनम का पूरा चांद खिला हो। तब समझ में आया कि वे यूरेशियन कूट की पहचान करा रहे हैं।
अकलतरा के पुरेनहा तालाब में बलही-नांदुल

इस पक्षी की एक उपजाति यहां निवासी है और एक ठंड के महीनों में आने वाली प्रवासी। काले रंग की इस चिड़िया की चोंच और माथा सफेद होता है, इसलिए इस चिड़िया को भी, आमतौर पर मवेशी के लिए प्रयुक्त बलही नाम दे दिया गया है, लेकिन टिकरी भी कहा जाता है। संस्कृत साहित्य में इसका नाम कारण्डव और कहीं सहचारी सुमुख भी मिलता है। छत्तीसगढ़ में इसका एक अन्य नाम नांदुल प्रचलित है। इसी तरह गडवाल का स्थानीय नाम कबरा है। छत्तीसगढ़ के तालाबों में सामान्यतया ओड़केर्री, नांदुल, चिरहुल, केंवटपदरा, पनबुड़ी, पनबुड़ा, तेलसरा, पनखौली, कोवा, लमगोड़ा, लमपुच्छा, कैम, जलमुर्गी चिड़िया होती हैं। सुरखाब, नकटा और गोनिन-गोना भी कहीं कहीं दिख जाती हैं। अइरी या ऐरी किसी भी पानी की चिड़िया को नाम दे दिया जाता है।

प्रसंगवश, छत्तीसगढ़ के कुछ ग्राम नाम पंडकी के साथ कलां, खुर्द, डीह, पाली, पारा, डीपा, भाट, पहरी जुड़कर, इसी तरह कुकरा-कुकरी के साथ झार, झरिया, बहरा, पानी, दह, टोला, चोली, चुंदा जुड़कर, कोन्हा और परेवा के साथ पाली, डोल, डीह जुड़कर बने हैं। ग्राम नामों में जिन चिड़ियों के नाम मिलते हैं, उनमें से कुछ हैं- चिड़ियाखोह, चिरई, चियाडांड, चिरईपानी, चिरईखार, गदेलाभंठा, चेपा, मैनी, मैना, सोन चिरइया, सारसडोल, सरिसमार, रनचिरई, हंसपुर, धनेसपुर, नीलकंठपुर, किलकिला, टिहली, लवा, गुंडरू, बटई, घघरी, घुघुवा, तितुरगहन, चिरहुलडीह, तेलसरा, लिटिया, पुटकी, छछान पैरी, गरुड़डोल, रौनाभांठा, कोकड़ी, कुर्री, भरदा, बटेर, गौरैया, सुआचुंदी, सुआबहरा, सुआभोंडी, सुआताल, तोताकांपा, कौंआझार, कौआताल, कौआडीह, मंजूरपहरी, मयूरडोंगर, मंजूरपाली, मयूरनाचा, कोयलीबेड़ा, कोइलबहाल, कोइलीकछार आदि। किसी भलेमानस को ईर्ष्याा हो सकती है कि मुझे इनमें से अधिकतर गांवों या उनके आसपास से गुजरने का मौका मिला है।

और इसके बिना तो बात पूरी न होगी कि छायावाद के प्रवर्तक छत्तीसगढ़ के कवि पद्मश्री मुकुटधर पांडेय थे, जिन्होंने यहां आने वाले प्रवासी पक्षी ‘डेमाइजल क्रेन‘ पर ‘कुररी के प्रति‘ शीर्षक से कविता रची थी-
‘बता मुझे ऐ विहग विदेशी अपने जी की बात, पिछड़ा था तू कहां, आ रहा जो इतनी रात।‘

ये कुछ बातें और अब गिधवा-परसदा पक्षी महोत्सव की सफलता के साथ भविष्य की आशा भी जुड़ी है।