Tuesday, December 28, 2021

भारत के रत्न

कला-साहित्य के क्षेत्र में छत्तीसगढ़ पुलिस के राजीव श्रीवास्तव जी, मुख्यतः संगीत और फिल्मों से जुड़े रहे। संस्कृति आयुक्त भी रहे और राज्य पुलिस सेवा के संभवतः एकमात्र ऐसे अधिकारी, जो पुलिस महानिदेशक पद तक पहुंचे। शशि मोहन सिंह जी का लगाव, अभिनय और फिल्मों से है। अपने इस ‘पैशन‘ के लिए लंबी छुट्टी पर रहे, अब भी अपने इस शौक और क्षमता का प्रदर्शन करते रहते हैं। पिछले वर्षों में अभिषेक सिंह जी की पुस्तक ‘बैरिकेड‘ आई, रायपुर किताब मेला-2021 में इसके विमोचन में शामिल होने का संयोग बना। इसी तरह नीरज चंद्राकर जी की पुस्तक ‘भारत के रत्न‘ है, जिसके प्रकाशन के लिए अंतिम स्वरूप में आने से ले कर, विमोचन तक जुड़ा रहा। नीरज जी ने पुस्तक के लिए ‘संदेश‘ लिखने के लिए भी मुझे चुना। 7 मार्च 2020 को विमोचन के अवसर पुस्तक में प्रकाशित अपने ‘संदेश‘ के साथ मैंने अपनी बात इस तरह रखी थी- 

ऐसी संतान, जिसे आप जन्म से देख रहे हों, पलते-बढ़ते वह अपने एक मुकाम तक पहुंच जाए, उसका पीओपी- पासिंग आउट परेड हो, उसके बढ़ने-गढ़ने में सारी मेहनत उसकी हो, लेकिन अपनी छाती गर्व से फूल जाती है, नीरज चन्द्राकर की इस पहली कृति के लोकार्पण पर कुछ ऐसा ही महसूस हो रहा है, मोह ऐसा कि अपना सीना भी चौड़ा हो रहा है। 

पहली पुस्तक छपने-छपाने का हाल नीरज बताएंगे ही, जो ऐसा प्रयास कर रहे हों, उनके लिए यह जरूर उपयोगी होगा, थोड़ी सी बात इस पुस्तक ‘भारत के रत्न‘ पर- 


सफलता का पैमाना अलग-अलग होता है। समाज की नजरों में पद-प्रतिष्ठा, नाम-काम-दाम सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। समाज का यह नजरिया, समाज के सदस्यों की सोच का ही प्रतिबिंब होता है। इस सोच और नजरिये का स्वाभाविक असर मध्यवर्ग के किशोरों पर भी होता है। 

ऐसा नहीं कि प्रतिस्पर्धा अब अधिक है, कमोबेश वह तो हमेशा से है, लेकिन इस दौर में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा की नैतिकता और उसके आदर्श धूमिल हैं, गलाकाट का बोलबाला है। युवकों के सपने, उनकी महत्वाकांक्षा में अवसर, प्रतिभा और परिश्रम के साथ संयोग की भूमिका निर्णायक होती है। इस क्रम में अपने लक्ष्यों की प्राप्ति और स्वयं को मुकाम पर बनाए रखने के लिए, साध्य के लिए साधन की शुचिता गौण मान ली जाती है। 

गौतम-गांधी और विवेकानंद की सनातन परंपरा के उत्तराधिकारी भी भौतिकवादी आंकाक्षाओं के मोहपाश में बंधे हुए हैं। जैसा कि किसीने कहा है मानों पूरी सभ्यता ही भौतिक समृद्धि के नर्क में जाने को उतावली है। हमारा वर्तमान समाज और पूरी पीढ़ी इससे अछूती नहीं है, लेकिन आशा की किरण भी यहीं हैं। 

कैरियर का ऐसा कोई क्षेत्र नहीं, जहां अपवाद न हों, लेकिन समाज की सोच को रेखांकित करने के लिए फिल्मी दुनिया, क्रिकेट, राजनीति चकाचौंध के ऐसे क्षेत्र हैं, जिनका आकर्षण सर्वाधिक है, जो आज समाज में सर्वाधिक सम्मानित हैं, इसलिए यह हमारी आशाओं-आकांक्षाओं को उभार कर दिखा पाती है। इसके विपरीत फौजी सैनिक, कहीं अधिक विपरीत परिस्थितयों से जूझता, अपना अनिश्चय भरा भविष्य गढ़ने का प्रयास करता रहता है। अनिश्चय सिर्फ सफलता-असफलता का नहीं, बल्कि जीवन-मृत्यु का। 

समाज के सच का, ओझल सा, किन्तु दूसरा सकारात्मक पहलू भी है। निष्ठा, कर्तव्यपरायणता, देशप्रेम जैसी भावना, जो पुरस्कार-प्रसिद्धि के महत्व को स्वीकारते हुए भी उसे प्राथमिक नहीं मानती। ऐसे युवा भी कम नहीं जो त्याग, समर्पण, सेवा को सर्वस्व मानते हुए अपने क्षणिक सुखों को ही नहीं, जीवन भी न्यौछावर करने को तैयार रहते हैं। समाज और ‘बाजार‘ के लिए सफलता की चकाचौंध का बोलबाला चहुं ओर दिखाई देता है, मगर हमारा समाज सकारात्मक सोच और कर्म से ही टिका हुआ है, जिसका प्रतीक हमारे फौजी सैनिक, कर्मयोद्धा हैं, जिनके साथ भविष्य की पवित्र और उज्ज्वल आशा-संभावना भी है। जीवन के अनुभवों का सच, लेखनी से अभिव्यक्त हो कर कहानी बने तो वह मन बहलाव नहीं, बल्कि ऐसी हकीकत होता है, जिसमें परिस्थितियों के झंझावात से जूझती आशा की लौ, न जाने कितनों के जीवन-पथ को आलोकित कर सकती है। भाई नीरज की लेखनी ताजी होते हुए भी प्रामाणिकता, विश्वसनीयता के साथ आस्था से सराबोर है, जिसमें अपेक्षित भविष्य की संभावना अंकुरा रही है।¬¬ 

नीरज चंद्राकर जी की अगली पुस्तक लगभग तैयार थी, अब उसके लिए शुभकामनाओं सहित प्रतीक्षा है।

Sunday, December 26, 2021

‘छत्तीसगढ़ परिचय‘ का परिचय

राजनांदगांव-रायगढ़ के साथ जिन विभूतियों का नाम जुड़ा है, उनमें डा. बलदेव प्रसाद मिश्र हैं। मिश्र जी के विपुल लेखन में एक खास ‘छत्तीसगढ़ परिचय‘ है। पुस्तक का पहला संस्करण संभवतः 1955 में आया। छत्तीसगढ़ की अन्य विभूतियों और कृतियों की तरह, इस पुस्तक पर ढेरों बातें पढ़ने-जानने को मिलती रहीं थीं, लेकिन पुस्तक देखने का अवसर नहीं मिला था। यह पुस्तक चौथी बार हिन्द प्रकाशन (मध्यप्रदेश सरकार में मंत्री रहे, गांधीवादी चित्रकांत जायसवाल जी के परिवार का जूनी लाइन, बिलासपुर स्थित छापाखाना) से 1960 में छपी, जिसकी प्रति देखने को मिली, तब इस कृति से मेरा वास्तविक परिचय हुआ। मिश्र जी की पूरी पुस्तक भी यही एक मैंने पढ़ी है। अन्यथा उन पर संस्मरण, जीवनी, टीका-टिप्पणी, जै-जैकार तो देखने को मिल जाता है, उनका लिखा मूलतः सहज उपलब्ध नहीं होता। 1928 में प्रकाशित उनकी पुस्तक ‘जीव विज्ञान‘ के लिए पं. महावीर प्रसाद द्विवेदी की प्रतिक्रिया थी- ‘पुस्तक के अवलोकन से मुझे अनेक तत्व रत्नों की प्राप्ति हो गई। ... आप धन्य हैं।‘ इसी प्रकार 1938-39 के उनके डी.लिट. शोध-प्रबंध ‘तुलसी दर्शन‘ के लिए परीक्षक पं. रामचंद्र शुक्ल ने इसे ‘महान अध्यवसाय और व्यापक अध्ययन का परिणाम‘ बताया था। पं. महावीर प्रसाद द्विवेदी ने ‘तुलसी दर्शन‘ की प्रति पा कर लिखा कि ‘आपने मुझे संजीवनी का दान दे डाला।‘

पिछले दिनों चर्चाओं के दौरान यह अनुमान हुआ कि मिश्र जी को जानने वाले, इस पुस्तक के नाम से तो परिचित हैं, उनकी कृतियों की सूची में इसे शामिल करते हैं, लेकिन पुस्तक देखा-पढ़ा नहीं है, इसलिए आवश्यक माना कि इस पुस्तक ‘छत्तीसगढ़ परिचय‘ का संक्षिप्त परिचय देने का प्रयास करूं। यह भी ध्यान में आया कि राजनांदगांव की त्रिवेणी के बख्शी जी और मुक्तिबोध जी का लगभग संपूर्ण लेखन, रचनावली-समग्र के माध्यम से प्रकाशित हो चुका है, मिश्र जी का महत्व उनसे कम नहीं, इसके बावजूद उनका समग्र, हम उनके उत्तराधिकारी, अभी तक नहीं तैयार कर पाए हैं, उनका साहित्य राजनांदगांव की त्रिवेणी में अब भी सरस्वती की तरह लुप्त जैसा ही है, बहरहाल ...

‘छत्तीसगढ़ परिचय‘ के 128 पृष्ठों में कुल 25 शीर्षक हैं, जिनमें 24 लोक कथाएं हैं, तथा पचीसवां लेख परिचय (इतिहास) शीर्षक से है। ‘इतिहास‘ की ऐसी रोचक प्रस्तुति, जिसमें उत्तर छत्तीसगढ़ का रामगिरि तो दक्षिण छत्तीसगढ़ का दन्तेवाड़ा भी शामिल है, अनूठी है। अनूठी इस अर्थ में कि अक्सर छत्तीसगढ़ की बात करते हुए राज्य का उत्तरी हिस्सा, सरगुजा और दक्षिणी हिस्सा, बस्तर पूरी तरह छूट जाता है। अधिकतर मध्य मैदानी छत्तीसगढ़ को ही समग्र मान लिया जाता है। साथ ही स्थानीय मान्यताओं, दंतकथाओं के साथ इतिहास को प्रस्तुत करने की शैली रायबहादुर हीरालाल और लोचन प्रसाद पांडेय की थी उसी तरह वह यहां भी पूरे सम्मान सहित दर्ज है। साथ ही इसमें किसी सजग इतिहासकार की तरह तथ्यों और विश्वास-मान्यता को स्पष्ट रखा गया है इसलिए जहां आवश्यक हो, ‘बताया जाता है‘, ‘कहा जाता है‘, ‘इतिहास प्रसिद्ध है‘, ‘स्पष्ट संकेत‘, ‘रहा होगा‘, ‘जान पड़ता है‘ जैसा प्रयोग है।

पुस्तक के बारे में बताया जाता है कि यह स्कूल के पाठ्यक्रम में भी शामिल रही है। पाठ के रूप में ऐसी सामग्री हो तो विद्यार्थी-पाठक सहत ही आत्मीय रूप से अपने राज्य से जुड़ जाता है और संस्कारित होता है। मेरा मानना है कि यही छत्तीसगढ़ से परिचित होने का सही तरीका है। आगे सीधे परिचित होने के लिए पुस्तक के कुछ अंश-

दो शब्द

इस ‘परिचय‘ का उद्देश्य है छत्तीसगढ़ के विद्यार्थियों को अपने अतीत की उज्वलता के प्रति उत्साहित बनाना और अपने वर्तमान के प्रति व्यापक राष्ट्रीयतायुक्त देखना। इसकी कहानियां विविध जिलों के हिन्दी तथा अंग्रेजी ‘गजेटियरों और सुनी सुनाई किम्वदन्तियों के आधार पर पल्लवित की गई हैं। मनोरंजन के साथ ही उपर्युक्त उद्देश्य को ध्यान में रख कर ही ये लिखी गई हैं। इनके शीर्षक प्रायः स्थानपरक ही हैं और इन कहानियों में छत्तीसगढ़ जिलों का समावेश हो जाता है आशा है छत्तीसगढ़ के बाहर भी इन रचनाओं का स्वागत होगा। ।

-बलदेव प्रसाद मिश्र
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विषय सूची

१-सिंहनपुर (रायगढ़), २-सिहावा, ३-रतनपुर (१) ४-रामगिरि (सुरगुजा), ५-विमलामाता (डोंगरगढ़), ६-रतनपुर (२), ७-शिवरीनारायण, ८-राजिम, ९-दुर्ग, १०-बनबरद, ११-देव बलौदा, १२-पाटन, १३-दन्तेवाड़ा, १४-खलारी, १५-माली घोड़ी, १६-गुंडरदेही, १७-विंद्रा नवागढ़, १८-उपरौड़ा, १९-सोरर, २०-सक्ती, २१-शिवनाथ नदी, २२-अम्बागढ़ चौकी, २३-ओड़ार बांध, २४-भंडार, २५-परिचय (इतिहास)
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इसी विंध्याचल के समीप भारत का केन्द्र बनकर उसके मध्य में अपना ‘मध्यप्रदेश‘ बसा हुआ है। इसी का बहुत सा भाग पहिले दण्डकारण्य के नाम से विख्यात था जो रामायण में प्रसिद्ध है। इस अरण्य का पूर्वी भाग पुराण-प्रसिद्ध नर्मदा नदी से और पश्चिमी भाग चित्रोत्पला गंगा (महानदी) से प्रभावित है। इन दोनों नदियों के किनारे अनेक ऋषि मुनि रह चुके हैं। नर्मदा किनारे का भेड़ाघाट भृगु ऋषि का आश्रम कहा जाता है जिनके वंश में परशुरामजी हुए। कार्तवीर्य सहस्रार्जुन की लीला भूमि भी नर्मदा के किनारे ही मण्डला या माहिष्मती के आसपास बताई जाती है। लङ्का का राजा रावण भी इसी क्षेत्र के चक्कर लगाया करता था और उसने इस ओर अपने सैनिक आदि नियुक्त कर रखे थे यह भी इतिहास प्रसिद्ध है। नर्मदा और महानदी के आसपास की कई अनार्य जातियाँ अब तक अपने को रावणवंशी कहती हैं। महानदी के उद्गम के पास शृङ्गी ऋषि, अंगिरा ऋषि, मुचकुन्द आदि के आश्रम बताये जाते हैं। बस्तर के समीप अब भी धर्मशाला का स्थान बताया जाता है जहाँ, भगवान राम ने विश्राम किया था और जहाँ से सीता हरण हुआ था। बिलासपुर का शवरी नारायण स्थल इस बात का स्पष्ट संकेत करता है कि राम की शवरी से भेंट वहाँ कहीं हुई होगी। खरोद खरदूषण का स्थान है। लवन और महासमुन्द उस खारे सागर की याद दिलाते हैं जो भगवान राम के समय इधर रहा होगा। वन्य आदि निवासियों के गीतों में रावण की गाथा सुनकर और खरौद, लवन, शवरी नारायण सरीखे स्थान देखकर रायबहादुर हीरालाल सरीखे विद्वान तो यहाँ तक मान चुके हैं कि रावण भी नर्मदा के उद्गम स्थल अमरकंटक पहाड़ के आस-पास कहीं रही होगी।

दण्डकारण्य का यह इलाका दक्षिण कोसल कहाता था। कवि कालिदास ने, जो आज लगभग दो हजार साल पहिले हो चुके हैं, अयोध्या के राज को उत्तर कोसल लिखा है। ‘उत्तर कोसल‘ शब्द ही बताता है कि उस समय ‘दक्षिण कोसल‘ नाम भी जरूर चलता होगा। इसका ‘महाकोसल‘ नाम कब से और किसके कारण चल पड़ा इसका कोई पक्का पता नहीं। जान पड़ता है कि कार्तवीर्य सहस्त्रार्जुन के वंशज चेदि हैहयों ने जिनका कि इस ओर लगभग डेढ़ हजार वर्षों तक राज्य रहा, इसकी महत्ता बढ़ाने के लिये इसे महाकोसल कहना प्रारम्भ कर दिया हो-ठीक उसी तरह जैसे नदी का नाम महानदी हो गया, छोटे इलाके का नाम महासमुन्द हो गया, आराध्या देवी का नाम महामाया हो गया और राजाभों का नाम भी ‘महाशिवगुप्त‘ आदि हो गया। इस दक्षिण कोसल अथवा महाकोसल का विशेष भाग इस समय छत्तीसगढ़ कहाता है। वास्तव में छत्तीसगढ़ की बोली भी उत्तर कोसल की अवधी से विशेष मेल खाती है और यही नर्मदा तथा महानदी दोनों के उद्गम हैं। यहाँ का क्षेत्रफल भी बहुत बड़ा है और प्राचीन चिन्ह तथा सांस्कृतिक समन्वय के उदाहरण भी महत्वपूर्ण हैं। महाकोसल का शेष अंश है बुन्देल खन्ड तथा मालवा का कुछ कुछ भाग।
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विभिन्न संस्कृतियों का जैसा मजेदार संगम छत्तीसगढ़ में देखने को मिल सकता है वैसा भारत के अन्य स्थल में बहुत कम मिलता है।
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शरीरश्रम और स्वच्छता के विषय में तो उनके नियम अनुकरणीय हैं। सामाजिक नियमों के सम्बन्धों में उनकी सादगी कई दृष्टियों से सुग्राह्य है। उनका सामाजिक संगठन भी देखने और सीखने की वस्तु है। जिस प्रांत में साहित्य-वाचस्पति लोचन प्रसाद पांडेय और साहित्य वाचस्पति पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी के समान महानुभाच विद्यमान हों उसकी साक्षरता के विषय में अब कहना ही क्या है? यहाँ के नर रत्नों ने न केवल भारत में वरन् विदेशों में भी नाम किया है और नाम करते जा रहे हैं अतः हम सभी दृष्टियों से कह सकते हैं कि जिस प्रकार छत्तीसगढ़ का अतीत उज्ज्वल रहा है उसी प्रकार उसका भविष्य भी उज्ज्वल होकर रहेगा। अतीत के समान ही नहीं वरन् उससे बहुत बढ़कर।

प्रसंगवश स्मरण कि राजनांदगांव जिले के निर्माता के रूप में किशोरी लाल शुक्ल का नाम आता है। किंतु राजनांदगांव जिला निर्माण समिति के पदाधिकारियों की 1952 की सूची में खैरागढ़ की श्रीमती रानी पद्मावती देवी का नाम दूसरे क्रम पर और डा. बलदेव प्रसाद मिश्र का नाम सर्वोपरि है। एक अन्य तथ्य कि राजनांदगांव जिले की मांग किस तार्किक ढंग से की गई थी, (स्पष्ट अनुमान होता है कि मजमून भी मिश्र जी ने ही तैयार किया होगा।) कि बस्तर और कांकेर स्टेट को मिलाकर बस्तर जिला बनाया गया है, सरगुजा, कोरिया और चांगभखार को मिलाकर सरगुजा जिला तथा रायगढ़, सारंगढ़, सक्ती(?), उदयपुर और जशपुर को मिला कर रायगढ़ जिला बनाया गया है। इसी प्रकार नांदगांव, खैरागढ़, छुईखदान और कवर्धा (शिवनाथ स्टेट्स) को मिलाकर राजनांदगांव को जिला मुख्यालय घोषित किया जाना चाहिए।
गणेश शंकर शर्मा जी,
निवासी ‘हर्रा गोदाम‘ भरकापारा नांदगांव द्वारा
उपलब्ध कराई छायाप्रति

कामना कि इतने विस्तृत फलक पर, विविध आयाम उद्घाटित करने वाली छत्तीसगढ़ की ऐसी महान विभूति का समग्र लेखन, संकलित-प्रकाशित हो कर शीघ्र सुलभ उपलब्ध हो।

Saturday, December 25, 2021

गुरु घासीदास बाबा

सन 2006 गुरु घासीदास जी की 250वीं वर्षगांठ का अवसर था। इस वर्ष 18 से 31 दिसंबर तक संस्कृति विभाग, छत्तीसगढ़ शासन द्वारा पूरे राज्य में विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए गए साथ ही परिचयात्मक पुस्तिका प्रकाशित की गई। आयोजन तथा पुस्तिका प्रकाशन में भूमिका निर्वाह के सुअवसर का स्मरण करते हुए, पुस्तिका के अंश की प्रस्तुति-

गुरु बाबा घासीदास जी की 250वीं वर्षगांठ
लोक कला महोत्सव
(18 से 31 दिसंबर 2006)

राज्य शासन द्वारा गुरु घासीदास जी की 250वीं वर्षगांठ के अवसर पर जिला एवं राज्यस्तरीय वृहद लोक कला महोत्सव आयोजित करने का निर्णय लिया गया। इसके अंतर्गत रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग, राजनांदगांव, जांजगीर एवं कवर्धा जिले में 3 दिनों, महासमुंद, धमतरी, रायगढ़, कोरबा में 2 दिनों का तथा बस्तर, कांकेर, दंतेवाड़ा, कोरिया, सरगुजा, एवं जशपुर में 1 दिन का कार्यक्रम आयोजित किया जायेगा, जिसमें प्रदेश के सतनामी समाज के प्रशंसित लोक कलाकार अपनी प्रस्तुतियां देंगे। इन कार्यक्रमों में पंथी नृत्य प्रतियोगिता के साथ अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किये जायेंगे।

राष्ट्रीय स्तर के कलाकार दलों का चयन कर प्रत्येक दल को तीन जिले में सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुतीकरण का अवसर प्राप्त होगा। ये दल संत कबीर, संत रैदास आदि के भजन एवं गुरु घासीदास जी का महिमामय उपदेशों का गायन प्रस्तुत करेंगे। इन कार्यक्रमों के अंतर्गत जिला स्तरीय समिति द्वारा अनुशंषित सतनामी समाज के प्रतिष्ठित नागरिकों का श्रीफल, शाल एवं जैतखाम स्मृति चिन्ह भेंटकर जिला स्तरीय कार्यक्रम में सम्मान किया जायेगा।

राज्य स्तरीय समारोह का आयोजन रायपुर में 30 व 31 दिसंबर को किया जायेगा जिसमें पंथी नृत्य प्रतियोगिता के पुरस्कार के साथ-साथ संस्कृति विभाग द्वारा स्थापित स्व. देवदास बंजारे स्मृति पुरस्कार भी दिया जायेगा। पुरस्कृत पंथी दलों को जिला स्तर पर 50, 25 व 15 हजार तथा राज्य स्तर पर एक लाख, 75 हजार व 50 हजार रूपये की पुरस्कार राशि के साथ पंथी नृत्य की प्रतिकृति (ढोकरा शिल्प) प्रदान की जायेगी। इस समारोह में सतनामी समाज के राजगुरूओं का सम्मान किया जायेगा।

पूज्य संत गुरु बाबा घासीदास 
सत्-नामी वसुंधरा के अनमोल रत्न

पूज्य गुरु घासीदास का अवतरण 1756 में सत् की पुर्नस्थापना एवं समाज में उपेक्षितों को सामाजिक न्याय के द्वारा एकात्मता एवं समरसता स्थापित करने के लिए हुआ था। यही उद्देश्य, सतनाम के रूप में प्रचलित हुआ। इस पंथ का अभ्युदय समाज एवं संस्कृति के नव जागरण की एक अलौकिक घटना है। इस महान संत के अवतरण से छत्तीसगढ़ की धरा आत्मगौरव सम्पन्न हुई। समरसता के इस अग्रदूत की जीवनगाथा, उनके उपदेश आज भी समाज के लिए अनुकरणीय हैं। उनके उपदेशों में आध्यात्मिकता, दार्शनिकता, सामाजिक चिंतन और जीवन दर्शन का विशाल भण्डार समाहित है। सतनाम पंथ के प्रवर्तक गुरु घासीदास एक महामानव थे, जिनमें मानवता, प्रेम, दया, क्षमा, करुणा, समता, सामाजिक समरसता भरी बड़ी थी। वे सभी जीवों को समान समझते थे।

पूज्य गुरु घासीदास सन् 1807 में सत्य की खोज में जगन्नाथ पुरी की यात्रा पर निकल पड़े अपने साथियों के साथ। सारंगढ़ तक ही पहुंच पाये और कि उन्हें आत्मबोध हुआ और सत्यनाम की मणि मिली। यहीं से सत्नाम, सत्नाम का उच्चारण करते वापस लौट आए और लोक मंगल में लीन हो गए।

युगप्रवर्तक संत गुरु घासीदास गिरौदपुरी से सोनाखान के जंगल छातापहाड़ में 6 माह के लिए अंर्तध्यान हो गये तथा जंगल के एकांत में चिंतन और तपस्या करते-करते, औंरा-धौंरा, तेन्दू वृक्ष के नीचे आत्मज्ञान की अनुभूति में लीन हो गये। छातापहाड़ के सघन वन के बीच स्थित विशाल शिला के ऊपर बैठकर वे ध्यानमुद्रा में ध्यानस्थ हो गये। इसी बीच संतगुरु को सत्यपुरुष साहेब के दर्शन हुए। वे बाबा को सत्य का संदेश देकर, सतनाम के प्रचार हेतु आदेशित कर अंर्तध्यान हो गये। पूज्य गुरु घासीदास को उसी समय सत्य की अनुभूति हुई और नई चेतना ऊर्जा प्राप्त करके तप समाप्त कर 28 दिसम्बर 1820 को प्रतीक्षारत् अनुयायियों के समक्ष उन्होंने ‘सतनाम‘ का दिव्य संदेश दिया।

सत्य ही ईश्वर है, सत्य ही मानव का आभूषण है, मांसाहार पाप है, सभी जीव समान हैं, पशुबलि, जीवहत्या है, मादक पदार्थ का सेवन मत करो, मूर्तिपूजा बंद करो, इससे जड़ता आती है, गायों को हल में मत जोतो, दोपहर में हल चलाना अथवा भोजन ले जाना बंद करो, निराकार सतनाम साहेब का जप करो, पर नारी को माता मानो, सूर्य के समक्ष, सुबह-शाम सतनाम का जप करने से मन पवित्र होगा, मानव जाति के नाम यही उनके जीवन का मूल संदेश है ।

इसी दिव्य संदेश को सुनने एवं उनके दर्शन पाने के लिए असंख्य भक्तजन गिरौदपुरी में एकत्र होने लगे। उनके दर्शन पाकर, उनके उपदेश सुनकर, भक्तजन भाव-विभोर एवं मुग्ध हो जाते थे। पूज्य गुरु घासीदास जी ने सतनाम का गांव-गांव भ्रमण कर लोकभाषा छत्तीसगढ़ी में उपदेश दिए। उनके उपदेशों से जनजागृति एवं जनचेतना का विकास हुआ। इससे विशाल जनसमूह उनके अनुयायी बनने लगे। आज भी उनकी यशगाथा और उपदेशों को मानने वाले लाखों अनुयायी देश भर में फैले हुए हैं।

आपने सत्नाम पंथ के अनुयायियों को जैतखाम स्थापित करने का संदेश दिया। शुभ्र वस्त्र, धवल, उज्जवल झंडा आकाश में फहराये, जो विश्वशांति, सत्य व अहिंसा का संदेश देता रहे। जैतखाम समाज में फैली हुई बुराई, अंधविश्वास, रूढ़िवाद, अज्ञान पर विजय का प्रतीक है जो धरा से ऊर्जा लेकर सूर्य, चन्द्र से किरण लेकर समाज को शक्तिशाली, ऊर्जावान बलशाली और प्रज्ञावान बनाता है।

पूज्य गुरू घासीदास का जीवन दर्शन युगों-युगों तक मानवता का संदेश देता रहेगा । राष्ट्रीय चेतना को विकसित करने में आपका अतुलनीय योगदान रहा है। आप वर्तमान युग के सशक्त क्रांतिदर्शी गुरू हैं, आपका व्यक्तित्व एक ऐसा प्रकाश स्तम्भ है, जिसमें सत्य, अहिंसा, करूणा तथा जीवन का ध्येय उदांत रूप से प्रकट है। आपके उपदेशों की विशेषता यह है कि आपने अपने संपूर्ण उपदेश छत्तीसगढ़ी में ही दिए आपके उपदेशों का सार पंथी गीतों व मंगल गीतों में मिलता है।

पंथी में प्रमुख रूप से बाबा घासीदास के जीवन चरित्र पर केंद्रित इन गीतों में जहां एक ओर प्रेम, करूणा, श्रद्धा और शांति जैसे भावों की मोतियां पिरोई होती हैं वहीं दूसरी ओर अहिंसा, सद्भावना, एकता, मानवता आदि के संदर्भ में तार्किक, मूल्यपरक और शिक्षा संपन्न संदेशों के नगीने भी जुड़े हुए हैं। 

अमर वाणी
संत गुरु के दिव्य संदेश

  • सत्य ही ईश्वर है, ईश्वर ही सत्य है।
  • ब्रम्ह निर्गुण निराकार है।
  • सत्य को आचरण पर उतारें।
  • जीव हत्या पाप है।
  • सभी जीव समान है।
  • मांस भक्षण पाप है।
  • पशु बलि अंधविश्वास है।
  • मूर्ति पूजा जड़ता लाती है। मूर्ति पूजा निषेध है।
  • शराब, धूमपान करना मानव के लिए अहितकर है।
  • नारी एवं पुरूष समान है, पर नारी को माता जानो।
  • चोरी करना पाप है।
  • समाज को शिक्षित, संगठित करो।
  • जात पात, छुआछूत मानव द्वारा बनाया गया है।
  • सत्पुरूष सतनाम साहेब के सभी संतान है।
  • सभी धर्मों का आदर करो।
  • गुरु एवं अतिथियों का सम्मान करो।
  • सादा जीवन व्यतीत करो।
  • जैतखाम प्रत्येक शिष्यों के लिए पूज्यनीय एवं आदर्श है।
  • विधवा विवाह नारियों के लिए समाज में लागू करो, नारी समाज में सहभागी बनाकर जी सके।
  • समाज में महंत, भंडारी, छडीदार का पद रखें जो समाज का उच्च व्यक्ति होगा, गुरु के बताए मार्ग पर चलेगा।
  • सतनाम धर्म का पालन गृहस्थ में रहकर भी किया जा सकता है।
  • मानव, काम क्रोध, लोभ, मोह का परित्याग करे।
  • सभी मानव को भाई चारे का संदेश दें।
  • सत्य अहिंसा मानवता का संदेश है।
  • कंठी धारण करो।
  • नाम की कमाई करके, आत्मा को परमात्मा से मिलाय करके सतनाम साहेब के पास जाने का प्रयास करे।

Thursday, December 23, 2021

स्वच्छ राजनांदगांव-1930

स्वच्छ भारत मिशन और छत्तीसगढ़ को स्वच्छता की विभिन्न श्रेणियों में प्राप्त हो रहे पुरस्कारों के साथ एक नजर।
5 मई 1930 को राजनांदगांव के राजा महंत सर्वेश्वरदास का म्यूनिस्पल कमेटी को संबोधित पत्र।
नगर की स्वच्छता की परवाह और उसके प्रति उनका रवैया स्पष्ट करने वाला दस्तावेज। उल्लेखनीय है कि नगर में पानी और बिजली की व्यवस्था की दृष्टि से राजनांदगांव अग्रणी रहा है।
नांदगांव के ‘हर्रा गोदाम‘ भरकापारा निवासी श्री गणेश शंकर शर्मा जी के दस्तावेज खजाने में सहेजी छायाप्रति के आधार पर 
पत्र का चित्र, पाठ और सुगमता के लिए मजमून का हिंदी अनुवाद


Raj Nandgaon
5th May 1930

Municipal Committee, 
                            I have written more than once and pointed
out that the town should be kept clean and the sanitation
improved. I had been this morning and I am really sorry to
have to write that I found the town in a much poorer con-
dition than last time. This morning even the roads were not
cleaned. The drains are in a filthy condition. The rubbish is
lying in places without being removed out of town. I cannot
see any progress with the drainage scheme. In short after I
finished my round of the town I came to the conclusion that
this part of the work has not worried the municipality very
much. I had given instructions to the municipal Secretary
personally more than once that the people building houses
must not collect material near the road. I find that even this
has not been stoped. The roads are far from wide and if this 
sort of collection is allowed It is very difficult to drive,
especially if there is a cart or a car coming from the other
side. This is the last time I am writing about this subject
and if I find that there is no improvement it will be my
painful duty to take such steps as I think proper.

Ruling Chief.

अनुवाद-
मैंने एकाधिक बार लिखा है और इंगित किया है कि शहर को साफ रखा जाना चाहिए और स्वच्छता में सुधार होना चाहिए। मैं आज सुबह निकला था और मुझे यह लिखते हुए सचमुच खेद हो रहा है कि मैंने पिछली बार की तुलना में शहर को अधिक दयनीय स्थिति में पाया। आज सुबह सड़कों की भी सफाई नहीं की गई। नालियां गंदी हालत में हैं। कूड़ा, बाहर हटाए बिना, शहर में ही जगह-जगह पड़ा हुआ है। जल निकासी योजना में भी मुझे कोई सुधार नहीं दिखा। संक्षेप में, नगर भ्रमण पूरा कर मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि नगर पालिका इन कामों की बहुत परवाह नहीं है। मैंने स्वयं म्यूनिस्पल सचिव को एकाधिक बार निर्देश दिए थे कि घर बनाते हुए लोग सड़क के पास सामग्री इकट्ठा न करें। मैंने पाया कि यह भी नहीं रुका है। सड़कें चौड़ी नहीं हैं और अगर इस तरह के संग्रह स्वीकृत हो तो वाहन चलाना बहुत मुश्किल है, खासकर यदि कोई गाड़ी या कार दूसरी तरफ से आ रही हो। मैं इस विषय मैं आखिरी बार लिख रहा हूं और अगर मुझे लगता है कि कोई सुधार नहीं हुआ है तो यह मेरा पीड़ादायी कर्तव्य होगा कि मैं ऐसे कदम उठाऊं, जो मुझे उचित लगे।

Wednesday, December 22, 2021

रामः मूर्त और अमूर्त

‘छत्तीसगढ़ में रामः मूर्त और अमूर्त स्वरूप‘ राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन संस्कृति विभाग, छत्तीसगढ़ शासन द्वारा 5 से 7 फरवरी 2021 को किया गया था। संगोष्ठी के साथ श्रीराम यात्रा स्थलों की छायाचित्र प्रदर्शनी, रामनामी भजन तथा रामकथा के प्रसंगों की सांस्कृतिक प्रस्तुति के साथ स्थल भ्रमण का कार्यक्रम हुआ। शनिवार, 6 फरवरी के एक अकादमिक सत्र का दायित्व मुझे सौंपा गया, उस अवसर पर अध्यक्षीय वक्तव्य के रूप में कही गई बातें, मुख्यतः रिकार्डिंग तथा अपने नोट्स और स्मृति के आधार पर संशोधित कर यहां प्रस्तुत है-

राम-राम, जय जोहार। आप सबसे दुआ सलाम होती रही है, लेकिन औपचारिक तौर पर माइक्रोफोन पर आकर अब फिर से एक बार राम-राम। ‘राम वन-गमन पथ’ जिसकी बात आज यहां हो रही थी, राज्य में हो रही है, हम यहां प्रदर्शनी में देख रहे हैं और संगोष्ठी का विषय भी है- राम: मूर्त और अमूर्त। यहीं से अपनी बात शुरू करता हूं। दरअसल राम के मूर्त और अमूर्त दोनों पक्षों के बीच अगर हम कोई समन्वय देख पाते हैं, उसे देख पाने का, समन्वय का, महसूस कर पाने का ही, यह आयोजन है। कई शोध-पत्रों में, और उनमें आई बहुत सारी जानकारियों से स्पष्ट हो रहा है कि यह राम के नाम का ही प्रभाव है कि यहां पढ़े जा रहे परचों में शोध तो है ही लेकिन साथ-साथ उसमें अपनी अमूर्त-आस्था की बात भी कही गई है।

इस सत्र के संयोजक डॉ. ब्रजकिशोर प्रसाद, तथा प्रतिवेदक डॉ. रामकिंकर पाण्डेय का अभिवादन करते हुए, शैलेश कुमार मिश्रा जी का अंगरेजी परचा, जिसमें छत्तीसगढ़ की संस्कृति में भगवान श्री राम और रामकोठी की चर्चा हो रही थी, रामकोठी के बारे में बहुत सारी जानकारियां आई हैं और यह हमारे लिए गौरव का विषय है कि यह सामुदायिक सहकारिता की व्यवस्था है, बैंकिंग की, ऋण की व्यवस्था है, वह राम के नाम पर पारंपरिक रूप में छत्तीसगढ़ में अभी भी विभिन्न स्थानों में है। ललित शर्मा जी ने शुभ्रा रजक जी के साथ, छत्तीसगढ़ के रामनामी पंथ को रामभक्ति की पराकाष्ठा निरूपित करते हुए बहुत विस्तार से बातें रखीं। उनके परचे पर एक दो बात कहना चाहूंगा कि रामनामियों पर बहुत गंभीर शोध हुए हैं, जिनमें खासकर, एक शोध हुआ था, अमेरिकी शोधार्थी थे, डॉ. लैम्ब, उन्होंने अपना नाम बदलकर रामदास कर लिया था डॉ. रामदास लैम्ब। ‘रैप्ट इन द नेम: द रामनामीज, रामनाम एण्ड अनटचेबल रिलीजन इन सेन्ट्रल इंडिया‘ नामक उनकी पुस्तक है। दूसरी शोधार्थी दक्षिण भारतीय महिला हैं, जो भोपाल में रहती थी और अब इंग्लैंड में हैं सुन्दरी अनीथा, उनका भी रामनामियों पर शोधकार्य है- डॉमिनेंट टेक्स्ट्स, सबआल्टर्न परफारमेंसेजः टू टेलिंग्स आफ द रामायण इन सेंट्रल इंडिया। रामनामियों पर ये दो पुराने काम बहुत महत्वपूर्ण हैं और अब भी अध्ययन-प्रलेखन हो रहा है, फिल्म्स डिवीजन ने वृत्त-चित्र तैयार कराया है, इस विशिष्ट परंपरा का, हमारी धरोहर का, इस तरह सम्मान, यह सब आवश्यक और बहुत महत्वपूर्ण है।

पीयूष कुमार पाण्डेय जी ने छत्तीसगढ़ में राम और जनजातीय समाज की चर्चा, सरगुजा के संदर्भ में की है। आज ही मैं याद कर रहा था, समरबहादुर सिंह जी की बहुत प्रसिद्ध पुस्तक है ‘सरगुजा एक अध्ययन’, उन्होंने सरगुजिया रामायण पर भी गंभीर काम किया है। रामकथा पर सरगुजा में और भी काम इस तरह के हुए हैं। चंद्रशेखर शर्मा जी ने छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति में राम के व्यापक संदर्भों को रेखांकित किया। अयोध्या शोध संस्थान के निदेशक आदरणीय योगेन्द्र प्रताप सिंह जी, तथा संजीब कुमार सिंह जी, डा. रामवतार शर्मा जी यहां हैं, जिनकी सार्थक भागीदारी से इस आयोजन की गरिमा बढ़ी है।

कुछ बातें संक्षेप में कहूंगा। राम के नाम पर जितनी बातें होती हैं, ‘बौद्धिक विमर्श‘ होते हैं, राम की सत्ता, वन-गमन पथ, उसकी ऐतिहासिकता आदि के संबंध में, उसके लिए एक बात याद आती है कि, यूं बड़े हल्केपन से कहा जाता था उस चुटकुले का मर्म मुझे बहुत बाद में समझ में आया। एक मरीज आपरेशन थियेटर में है, आपरेशन होता है और डाक्टर कहता है ‘ओह गॉड, सारी, ही इज नो मोर‘ और अपना छुरा, चाकू, कैंची, छोड़़कर, दस्ताने उतार कर, बाहर जाने लगता है। सिस्टर सब सामान इकट्ठा करने लगती है, मरीज कहता है कि सिस्टर मैं अभी जिंदा हूं। सिस्टर उससे कहती है ‘चुप रहो तुम डाक्टर से ज्यादा जानते हो क्या?‘ दरअसल हम उस युग में जी रहे हैं। ‘उस युग में जी रहे हैं‘ का आशय था कि, मैं किसी का नाम नहीं लूंगा, संदर्भ बार-बार आपके सामने आते होंगे, जाति प्रमाण-पत्र, जन्म प्रमाण-पत्र, मृत्यु प्रमाण-पत्र के अभाव में किसी तरह से किसी व्यक्ति के होने का अस्तित्व नकार या स्वीकार करने की स्थिति बन जाती है और वह विवादित हो जाता है। हमारे अब के समकालीन साथ के लोगों में जिनको हम जन्मना जान रहे हैं, उनकी जाति उनका जन्म, विवादित हो जाता है। फिर यह, यानि राम वन-गमन पथ, राम की ऐतिहासिकता, तो सदियों पुरानी बात है, उसका कभी मूर्त होना अब हमारी सामूहिक चेतना में अमूर्त सुरक्षित है। हमारी आस्था, हमारी परंपरा और हमारे विश्वास से संपृक्त।

मेरे सामने एक अवसर आया पासपोर्ट बनाने का, आवश्यक दस्तावेजों की सूची मिली, उसमें जन्म प्रमाण-पत्र भी था, मेरा जन्म प्रमाण-पत्र था नहीं, मैं घबरा गया, अब क्या करूंगा, मेरा अस्तित्त्व ही नहीं, ऐसी पासपोर्ट वाली दुनिया में। फिर ध्यान गया, कोई ‘कट आफ डेट‘ थी कि अगर अमुक सन के पहले पैदा हुए हों तो स्कूल के प्रमाण-पत्र में दर्ज जन्मतिथि से काम हो जाएगा, तब जाकर राहत हुई। हम इस युग में जी रहे हैं, जब राम की बात करते हैं तब वह बीती हुई, भूतकाल की बात है और भूतकाल की बात अनुमान होती है, वहां सिर्फ दस्तावेज और इतिहास के भरोसे नहीं, बहुत कुछ आस्था से चलता है। आप यहां जिस आधार पर आमंत्रित किये गये उस नस्ती पर जिसने दस्तखत किए, जिसके कारण आदेश जारी हुआ, वे इस विभाग के संचालक हैं। जब आपको आमंत्रण पहुंचा, हो सकता है कि आप नाम से परिचित हों, लेकिन शायद ही जानते हों, कि हस्ताक्षरकर्ता पदाधिकारी वास्तव में कौन है? और सोचिए उस अनजान के दस्तखत के भरोसे आप यहां पधारे। दुनिया इसी तरह चलती है। एक दूसरे के विश्वास के आधार पर। पूरा का पूरा एक नक्शा बन जाता है, कागज पर, एक प्लान, एलिवेशन बन जाता है, और वही मूर्त रूप लेता है, किसी भवन का, किसी मंदिर का। मूर्त और अमूर्त की आवाजाही, अभेद।

राम के बारे में एक प्रसंग रोचक लगता है। डा. के.पी. वर्मा जी के परचे का संदर्भ ले रहा हूं, शंभू यादव जी ने भी प्रकाश डाला था। विष्णु के दशावतार प्रतिमाओं की चर्चा थी। दशावतारों में, सातवें राम हैं। मूर्ति शिल्प में कई बार बलराम एक लिंक-संयोजक पात्र हैं। वे देवकी और रोहिणी के भी संयोजक हैं। एक में गर्भ, जन्म कहीं और। एक जगह वो सहोदर हैं एक जगह सयोनिज हैं। वे जिस तरह दो मांओं को आपस में जोड़ते हैं, उसी तरह कृष्ण और राम को भी जोड़ते हैं। विकास क्रम की बात ध्यान करा रहा हूँ, कहा जाता है परशुराम, सभ्यता के उस चरण के हैं जो आखेट का, आखेटजीवी युग था, परशु ले कर चलते हैं, शिकारी मानव के प्रतिनिधि हैं, जो गुफावासी मानव था। जब मानव सभ्यता मुख्यतः शिकार पर आश्रित थी। उसके बाद धनुर्धारी राम आते हैं, शिकार वे भी कर रहे हैं, लेकिन परशु वाला आदिम शिकार नहीं, धनुष-बाण से शिकार कर रहे हैं। वे कृष्ण से जुड़ते हैं, कृष्ण गो-पालक हैं, राम और कृष्ण, दोनों के बीच हलधारी, हलधर बलराम हैं। इस तरह परशुराम, राम और बलराम तीनों के नाम में राम तो हैं ही लेकिन कृष्ण और राम के बीच यानि धनुर्धारी शिकारी, और गोपालक के बीच, हलधारी कृषक बलराम इनमें संयोज्य, देखा जा सकता है। यों लक्ष्मण और बलराम दोनों, शेषावतार ही हैं।

एक और बात। हास्यास्पद लगने वाला विवाद होता है, कोई कथा ऐसी आई जो प्रचलित स्थापनाओं से कुछ अलग है, तो कहा जाता है कि बदमाशी है उस जर्मन मैक्समूलर की, आकर उसने सब वेद-शास्त्रों की तबाही कर दी, सब सत्व निकाल लिया। हमारे धर्म-ग्रंथ फिरंगियों के हाथ में पड़े, और उन लोगों ने गड़बड़ कर दी। लेकिन कथाओं का भिन्न पाठ गीता प्रेस के संस्करण में भी हो, तब बात बनाई जाती है, वह तो क्षेपक है। हम अपनी उदार परंपरा के विपरीत, अपनी मान्यता, अपनी धारणा से अलग किसी बात को स्वीकार करने में कई बार बहुत संकीर्ण होने लगते हैं। ए. के. रामानुजन बड़े अध्येता हैं शास्त्रों के, उनकी प्रसिद्ध पुस्तक, वस्तुतः एक छोटा सा शोध-पत्र है ‘थ्री हंड्रेड रामायणाज ...’। इसी तरह फादर कामिल बुल्के, यानि बाबा बुल्के का रामकथा पर शोध है, उस काम के आधार पर 300 रामायणों की बात कही है, वैसे रामायण और रामकथा उससे भी अधिक हैं। इनमें अलग-अलग कथा-क्रम और कथा का विन्यास, विकास है, अलग-अलग मान्यताएं हैं, जो क्षेपक मान ली जाती हैं वह भी कम रोचक, कम महत्वपूर्ण नहीं है, कम आस्था पैदा करने वाली नहीं है, वह भी कम रसमय नहीं हैं, इसलिए राम को कोई भी मन, उसे उतनी ही आसानी से स्वीकार कर सकता है, रम सकता है, अड़चन रूढ़िग्रस्त को ही हो सकती है, उदारचेता को नहीं।

दूसरी छोटी सी बात, हम पंचक्रोशी यात्रा की बात करते हैं। आज सुबह राकेश चतुर्वेदी जी ने की, वे ‘राम वन-गमन पथ‘ के चप्पे-चप्पे से परिचित हैं। उन्होंने सिल्क रूट की चर्चा की है, उस मार्ग पर की जाने वाली यात्रा या पंचक्रोशी यात्रा है, ठीक उसी तरह ‘राम वन-गमन पथ‘ है, वह भी वैसी ही यात्रा है। मराठी मित्र बताते हैं कि शिवाजी ने जो पन्हालगढ़ यात्रा की थी, उस विशाल गढ़ की यात्रा पर आज भी अनुकरण करते हुए लोग जातेे हैं और उस काल का स्मरण कर रोमांचित होते हैं, गौरव-बोध होता है, आनंद लेते हैं। पंचक्रोशी या ‘राम वन-गमन पथ‘ जैसे निर्धारित पथों पर चलना, ठीक वैसे ही उस पावन जातीय-स्मृति को जीना है।

राम वनगमन पथ, शिवरीनारायण
के राम-जानकी मंदिर में लगा शिलालेख

एक आखरी बात जो इस तरह के विवादों, कथाओं और काल निर्धारण को ले कर, वर्मा जी के परचे के संदर्भ में कहना चाहूंगा कि सीतामढ़ी गुफा में माना जाता है कि सीता ने विश्राम किया था, तो फिर इतिहास वालों को थोड़ी परेशानी होती है। आस्था है कि ऐसा हुआ था, फिर इसमें काल का विवाद अनावश्यक है। सीतामढ़ी का निर्माण काल 8वीं शताब्दी है, और उसी गुफा में सीता आई थीं, मतलब 8वीं शताब्दी के बाद? फिर तो इतिहास कालक्रम सीता का काल 8वीं सदी के बाद का हुआ। मगर कहें कि सीता किसी काल में यहां आई थीं, उनकी स्मृति में यह गुफा बनाई गई, तब तो कोई समस्या नहीं होगी, अन्यथा इतिहास की बात आती है और तब आस्था के साथ उसका घालमेल नासमझी होगी। कई बार ऐसा संकीर्ण दृष्टि के कारण होता है। उसके निराकरण के लिए, जो कुछ मैंने पढ़ाई की है, उसमें वासुदेव शरण अग्रवाल जी का उल्लेख करते अपनी बात पूरी करता हूँ। वासुदेव शरण अग्रवाल जी ने कहा है- ‘पुराण-निर्माता सुधी जनों ने भी वैदिक तत्वों को ही लोकोपकार के लिए अनेक तरह से कथा और गल्पों का आश्रय लेकर वर्णित किया है, . . . कितनी ही कथाएं श्रुतिवर्णित रहस्यों के विस्तार-मात्र हैं‘ मुख्य बात अब यहां आती है ‘साधारण लोग कथा में ही भटके रहते हैं, एक वे हैं, जो कथाओं को सत्य मानते हुये भी अनेक तत्व को नहीं जानते, दूसरे वे हैं जो तत्व को न देखते हुए कथाओं को असत्य मानते हैं, दोनों की बात एक सी है। ज्ञानी जन कथा से ऊपर उठकर इसके रहस्य को समझते हैं, और अनेक भांति से मूल सिद्धांत को ही पल्लवित देख आनंदित होते हैं।

मैं मानता हूं कि आप सभी के मन में वही आनंद, रस-संचार हो, धन्यवाद।

Monday, December 20, 2021

मनु नायक और महेश कौल

1948 में महेश कौल की फिल्म आई थी, गोपीनाथ। फिल्म में रायपुर और बूढ़ा तालाब का जिक्र आता है, स्वाभाविक ही महेश कौल से रायपुर, छत्तीसगढ़ के रिश्ते की खोज-खबर करना चाहा। मुझे कभी मनु नायक जी से हुई बातचीत याद आई, जिसमें उन्होंने बताया था कि वे काफी समय महेश कौल के साथ जुड़े रहे थे। मगर अनुमान हुआ कि महेश कौल से मनु नायक का रिश्ता इतना पुराना तो नहीं होगा। इसलिए मनु नायक जी से आग्रह किया, उनके बंबई दौर की शुरुआत और उस दौर की बातें याद करने का।

मनु नायक का जन्म 11 जुलाई 1937 का है, अब वे 84 वर्ष के हो गए हैं, रायपुर आते-जाते रहते हैं, मगर इन दिनों बंबई में हैं। फोन पर बातें होने लगीं तो मानों स्मृति पटल पर सतरंगी तस्वीरें उभरने लगी। कुछ पूरक शब्द अपनी ओर से जोड़ कर उन्हीं की जुबानी-
मनु नायक जी के साथ मैं
कुछ बरस पहले

1955 में ग्यारहवीं पास किया, उसके बाद 1957 में मैं भी एक्टर बनने ही बंबई गया था। महेश कौल जी की फिल्म का विज्ञापन आया था तो मैंने उन्हें एप्लाई किया था। मगर उनसे मेरी जान पहचान हुई पंडित मुखराम शर्मा की वजह से। लंबी कहानी है। दुर्ग का ड्राइवर था नारायण राव नाम का, एन.आर. मास्टर। लालाराम चन्द्राकर थे एक रईस आदमी, दुर्ग जिला के उन्होंने एक बार मुलाकात कराई थी। मोहन स्टूडियो के मालिक के ड्राइवर थे एन.आर. मास्टर। उसके साथ स्टूडियो में गए, कोई सीन था, उसे हिंदी में कापी करने को था, वहां हिंदी लिखने वाला कोई नहीं था, सब उर्दू वाले थे तो मैंने कहा सर आप मुझे परमिशन देंगे तो मैं एक कापी कर देता हूं अच्छे से। उस समय पढ़ते-लिखते थे तो हैंडराइटिंग भी अच्छी बनती थी। मैं लिख दिया पूरा सीन, दो पेज था, साफ अक्षर में। पंडित मुखराम शर्मा वहां आए थे, किसी से मिलने। उन्होंने देखा तो एकदम खुश हो गए। पूछा, कहां के हो, कौन हो।

इसके बाद मैं एयरपोर्ट घूमने गया, दसेक दिन बाद। और लड़के थे, स्टूडियो में सो जाते थे तो मैं भी वहीं सो जाता था, लड़कों से एन.आर. मास्टर ने मुलाकात करा दी थी। उनलोगों के साथ एयरपोर्ट देखने गया तो देख रहा हूं कि एनाउंसमेंट हो रहा था कि मद्रास की फ्लाइट आ रही है। उस जमाने में इतना रिस्टिक्शन नहीं था। अंदर तक जा सकते थे। मैं चला गया अंदर देखने कि कैसे लैंड होता है। एकदम आगे तक बढ़ गए, जहां सिक्योरिटी वाले होते हैं वहां तक पहुंच गए। देखा कि सब लुंगी वाले मद्रासी आ रहे हैं, पैंट का चलन कम था उस जमाने में। उसके बाद देखता हूं तो पंडित मुखराम शर्मा चले आ रहे हैं। मैंने उनको प्रणाम किया और उसके बाद वे पूछने लगे अरे तुम कहां से आ गए। मैंने कहा, सर एयरपोर्ट देखने आए थे। पूछने लगे, क्या कर रहे हो। मैंने कहा कुछ काम नहीं करता, काम खोज रहा हूं। बोले मेरे आफिस में चले आना कल 4 बजे के बाद, रंजीत स्टूडियो में।

मैं वहां पहुंच गया। मुझे पंडित मुखराम शर्मा ने कौल साहब से मुलाकात कराई और बोला, लड़का अच्छा है, हिंदी में लिख लेता है, सब अच्छे से। रायपुर का है, तो कौल साहब ने तुरंत ओके कर दिया, कहा कि रख लीजिए अच्छा है तो। उन्होंने और मुझे रख लिया अपने साथ। इस तरह से मेरा एप्वाइंटमेंट हो गया तुरंत, फटाफट। 1957 से महेश कौल साहब के साथ था, फिल्म तलाक से ले कर दीवाना तक, तलाक फिल्म हिट हुई थी, जिस दिन मैं ज्वाइन किया उस दिन गाने की रिकार्डिंग थी (रौ में बहते सुनाया)-
बिगुल बज रहा आजादी का, गगन गूजता नारों से 
मिला रही है आज हिन्द की, मिट्टी नजर सितारों से 
एक बात कहनी है लेकिन, आज देश के प्यारों से 
जनता से नेताओं से, फौजों की खड़ी कतारों से 
कहानी है इक बात हमें इस, देश के पहरेदारों से 
संभल के रहना अपने घर में, छिपे हुए गद्दारों से।

महेश कौल जी ने मुझसे कभी रायपुर की चर्चा नहीं की। वे व्यस्त रहते थे, हमेशा लोगों से घिरे रहते थे। मेरा काम मामूली था, क्लर्क की तरह, उन्होंने जो कहा कर दो, वह कर दिया। एन.सी. सिप्पी से मिलवाया, एक्जीक्यूटिव थे वे कंपनी के। मुझे लगा दिया उनके साथ। आफिस का, स्टूडियो का जो भी काम होता था फिल्म से संबंधित, जो एन. सी. सिप्पी करते थे वह मुझे करना पड़ता था, ऐसा चालू हुआ तो चलता रहा इसी तरह। एन सी सिप्पी को असिस्ट करता था मैं, प्रोडक्शन के काम में उनको हेल्प करना, शूटिंग में भी जाना पड़ता था कई बार। किसी सामान की जरूरत हो तो उसकी पूर्ति करना हमारी ड्यूटी था।

‘कहि देबे संदेश‘ के लिए कौल साहब मना करते रहे कि तुम बरबाद हो जाओगे, मारकेट था नहीं, इसलिए वे मना कर रहे थे, आखिरी दम तक मना किया था उन्होंने। मैं जब बंबई से वापस आया और अपने स्कूल कचहरी के पास राष्ट्रीय विद्यालय में जा कर बताया, उस जमाने में प्रिंसिपल थे रामानंद कन्नौजे, कि वहां मैं महेश कौल के यहां काम कर रहा हूं। तब कन्नौजे सर ने बताया कि कौल साहब उनके क्लास फेलो थे मॉरिस कालेज, नागपुर में।

मुझे पहले पता नहीं था कि रायपुर से उनका कोई ताल्लुक है। पता चला कि पंडित भोलानाथ कौल थे, महेश उनके (दत्तक) लड़के हैं। लोग बताते हैं कि उस जमाने में रायपुर में उनकी भोला फिनाइल फैक्ट्री थी, गुढ़ियारी में। बाबूलाल टाकीज के सामने खादी भंडार था, उसके मालिक राजदान थे, उनलोगों के रिश्तेदार थे भोलानाथ, उस दुकान में मैं भी गया हूं एक बार। शायद यही आधार होगा।

बहरहाल, देखना-सुनना चाहें तो लिंक पर फिल्म गोपीनाथ है। पूरी फिल्म के बजाय बूढ़ा तालाब, रायपुर वाला अंश देखना हो तो वह फिल्म के आरंभ में ही 9.20 वें मिनट से 12.10 वें मिनट पर है।

Sunday, December 19, 2021

डिडनेश्वरी प्रतिमा की चोरी

1984 से 2020 तक मेरी शासकीय सेवा अवधि में मल्हार की डिडिन दाई या डिडनेश्वरी प्रतिमा की चोरी सबसे हाहाकारी घटना है। घटना के दौरान मैं फेलोशिप, अध्ययन अवकाश पर बनारस में था। विभागीय अधिकारी श्री जी. एल. रायकवार जी ने तब इस घटना का विवरण तैयार किया था, वह लगभग यथावत यहां प्रस्तुत है।छायाचित्र और परिशिष्ट की जानकारियों के लिए मल्हार के श्री संजीव पांडेय तथा श्री हरिसिंह क्षत्रिय से सहयोग लिया गया है।
चोरी के पहले का चित्र

डिडनेश्वरी प्रतिमा, ग्राम मल्हार, जिला- बिलासपुर (मध्यप्रदेश)

(1) अपराध क्रमांक 82/91 धारा 458/380, ता.हि. 30, पुरातत्व स्मारक अधिनियम, दिनांकः 19-4-91.
पुलिस थाना- मस्तूरी, जिला बिलासपुर, राज्य- मध्यप्रदेश
(2) वस्तु- प्रस्तर प्रतिमा
सामग्री- काला ग्रेनाईट प्रस्तर
माप- 100X63X26 सेंटीमीटर
भार- 175 से 250 किलोग्राम अनुमानित
काल- 11वीं 12वीं सदी ईसवी, रतनपुर कलचुरि शैली।
(3) अनुमानित मूल्य- रुपये 50000/-
(4) वस्तु का विवरण- पद्मासन में आसनस्थ अंजलीबद्ध नारी प्रतिमा प्रभामंडल, दत्र, मालाधारी विद्याधर एवं अप्सरा शिरोमाग पर दृष्टव्य है। मध्य पार्श्व में चंवरधारिणी परिचारिका द्विभंग में स्थित है। अधिष्ठान भाग पर उभय कोनों पर सिंह तथा बीचोंबीच नृत्यरत तीन नृत्यांगनाएं अंकित हैं। प्रतिमा शिरोभाग पर अलंकृत मुकुट, गले में हारावली, भुजाओं में केयूर, कलाई में कंकण तथा पैरों में नूपुर है।
(5) प्रतिमा का नाम-अवस्थान- डिडनेश्वरी मंदिर, मल्हार
(अ) स्थानीय नाम- डिडनेश्वरी.
(ब) प्रतिमा शास्त्रीय नाम- उपासना रत राजमहिषी.
(स) डिडनेश्वरी मंदिर के नाम से ज्ञात मंदिर के गर्भगृह में पूजित स्थिति में स्थापित प्रतिमा.
(6) रजिस्ट्रेशन विवरण- यह प्रतिमा पुरावशेष तथा बहुमूल्य कलाकृति अधिनियम 1972 के अंतर्गत रजिस्ट्रीकरण अधिकारी कार्यालय (पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग), बिलासपुर म.प्र. के द्वारा रजिस्टर्ड है। रजिस्ट्रेशन नंबर- बी.एल.आर./एम.पी./198 दिनांक 17-1-77
(7) रजिस्ट्रेशन धारक- श्री लैनूराम, कैवर्त समाज मल्हार.
(8) राजवंश/कलाशैली- रतनपुर कलचुरि कला शैली।
(9) अन्य विशेष विवरण- यह प्रतिमा काले ओपदार ग्रेनाईट प्रस्तर से निर्मित होने के कारण अत्यन्त आकर्षक है।
(10) प्रतिमा चोरी दिनांक- 19-4-91 को एक बजे से दो बजे रात के बीच, रिपोर्ट दिनांकः 19-4-91 के 4 बजे थाना मस्तूरी।
(11) प्रतिमा बरामदी दिनांक- 21-5-91.
(12) वर्तमान स्थिति एवं सुरक्षा- प्रतिमा बरामदी के पश्चात यह रजिस्ट्रेशन धारक श्री लैनूराम कैवर्त समाज मल्हार को सौंप दी गई है। यह प्रतिमा पूर्ववत उक्त मंदिर में मूल स्थान पर प्रदर्शित की गई है। प्रतिमा के बरामदी के पश्चात इस मंदिर की व्यवस्था स्थानीय ट्रस्ट के अधीन है। मध्यप्रदेश शासन के पुरातत्व विभाग के द्वारा देखरेख हेतु एक चौकीदार प्रारंभ से नियुक्त है। मंदिर परिसर का पर्याप्त विकास कर दिये जाने के कारण अब यह स्थल धार्मिक देवालय के रूप में परिवर्तित हो चुका है। वर्ष के नवरात्र-शरद (आश्विन) एवं बसंत (चैत्र) पर्व पर यहां ज्योति कलश स्थापित किये जाते हैं तथा मेला के सदृश दृश्य रहता है।

स्थल विवरण- 
बिलासपुर जिले में स्थित मल्हार दक्षिण कोसल का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पुरातत्वीय स्थल है, यह स्थान मौर्य काल से लेकर निरंतर 16 वीं शती ईसवी तक अनवरत रूप से सांस्कृतिक गतिविधियों का साक्षी बना रहा है। मराठों के शासन काल में यह सांस्कृतिक दृष्टि से उपेक्षित रहा।

मल्हार, बिलासपुर-मस्तूरी-जोंधरा सड़क मार्ग पर जिला मुख्यालय बिलासपुर से 33 कि.मी. की दूरी पर बसा हुआ है। निजी साधन अथवा नियमित बस से यहां आसानी से पहुंचा जा सकता है। मल्हार से ताला (अमेरीकांपा) ग्राम की आकाश मार्ग से दूरी लगभग 20 कि.मी. है। प्राचीन काल में मल्हार का आवासीय क्षेत्र अरपा तथा लीलागर नदी के तट तक विस्तृत रहा है। जैतपुर, बेटरी, भरारी, चकरबेढ़ा आदि इसके समीपस्थ उपनगर/ग्राम रहे हैं।

पुरातत्वीय महत्व-
मल्हार की प्राचीनता के द्योतक, धरातल पर बिखरे असंख्य पुरावशेष रहे हैं। मिट्टी के प्राकार तथा परिखायुक्त विशाल गढ़, ब्राह्मी लिपि में अभिलिखित विष्णु की द्विभुजी प्रारंभिक प्रतिमा तथा अन्य अभिलेख, सोमवंशी शासकों के काल के मंदिरों के अवशेष एवं कलचुरि युगीन भग्न देवालय अद्यावधि यहां बच रहे हैं। विविध प्रकार के मृदभांड, सिक्के, पकी मिट्टी की मुहरें, मनके, प्रतिमा फलक, तामपत्र, खंडित प्रतिमाएं आदि प्रकार के पुरावशेष यहां प्रचुरता से प्राप्त हुए हैं। स्थानीय ग्रामवासियों के द्वारा ये पुरावशेष संग्रहित कर रखे गये हैं। मघ, सातवाहन, कुषाण, गुप्त, शरभपुरीय तथा कलचुरि शासकों के सिक्के तथा अन्य विविध प्रकार की अभिलिखित मुद्राएं विशेष उल्लेखनीय हैं। वर्ष 1974 से 1978 तक सागर विश्वविद्यालय, सागर के द्वारा यहां उत्खनन कार्य करवाया गया था। जिससे मल्हार की प्राचीनता पर पर्याप्त प्रकाश पड़ा है।

मल्हार शैव, वैष्णव, शाक्त, बौद्ध एवं जैन धर्म का महत्वपूर्ण केन्द्र रहा है। यहां उक्त सभी सम्प्रदाय की सभी प्रतिमाएं विपुलता से प्राप्त हुई हैं। संभवतः सोमवंशी शासकों के काल में बौद्ध विहार भी स्थापित था । कलचुरियों के काल में भी यह धार्मिक तथा वाणिज्य के केन्द्र के रूप में विकसित था। कलचुरियों के पराभव के पश्चात मल्हार की सांस्कृतिक गरिमा घटने लगी, तथापि यह व्यवसायिक केन्द्र के रूप में स्थापित रहा।

मल्हार के विपुल पुरातत्वीय वैभव की ओर ध्यान आकृष्ट होने के उपरांत भारतीय पुरातत्वीय सर्वेक्षण विभाग की ओर से इस स्थल के अवशेषों को संरक्षित घोषित किया गया जिनमें से प्राचीन गढ़, देउर मंदिर तथा पातालेश्वर मंदिर प्रमुख है। मध्यप्रदेश शासन पुरातत्व विभाग के द्वारा डिडनेश्वरी मंदिर को संरक्षित घोषित किया गया है। मल्हार के विपुल पुरातत्वीय धरोहर की स्मृति तथा प्रचार प्रसार के उद्देश्य से शासन के सहयोग से यहां त्रिदिवसीय मल्हार उत्सव भी आयोजित होता रहा है।

पुरातत्वीय संरक्षण/अनुरक्षण- 
मल्हार में पुरातत्वीय अनुरक्षण से संबंधित प्रारंभिक कार्य मल्हार के मालगुजार तथा स्थानीय ग्रामवासियों के द्वारा पातालेश्वर मंदिर में वर्ष 1940 के लगभग करवाया गया था। तथा मलबे में दबे ध्वस्त पातालेश्वर मंदिर के गर्भगृह को अनावृत किया गया था। बाद में केन्द्रीय पुरातत्व विभाग द्वारा इस भग्न मंदिर को पूर्णतः अनावृत कर अनुरक्षण कार्य सम्पन्न किया गया। 2- वर्ष 1977-78 के लगभग केन्द्रीय पुरातत्व विभाग के द्वारा भग्न तथा टीले के रूप में परिवर्तित मंदिर को मलबा सफाई कार्य के पश्चात अनावृत किया गया। बाद में अनुरक्षण कार्य की करवाया गया है। 3- वर्ष 1987-80 में म.प्र. शासन पुरातत्व विभाग के रजि. अधिकारी कार्यालय बिलासपुर के द्वारा डिडनेश्वरी मंदिर में अनुरक्षण का कार्य सम्पन्न किया गया। जिसके दौरान कलचुरि कालीन मंदिर का अधिष्ठान प्रणालिका तथा अन्य खण्डित प्रतिमाएं प्रकाश में आए। इसी अधिष्ठान के उूपर लगभग 70-80 वर्ष ईंट-प्रस्तर की दीवार बनाकर मंदिर का रूप प्रदान कर दिया गया है।

वर्ष 1987-88 से अनुरक्षण कार्य के पश्चात ही यह मंदिर विशेष रूप से जनश्रद्धा का केन्द्र बना। अनुरक्षण कार्य से इसका मूल स्वस्म अनावृत हो जाने से 70-80 वर्ष पूर्व निर्मित इस आधुनिक मंदिर का स्वरूप पुरातत्वीय महिमामंडित हो गया। तथा ग्राम में प्रभावशील वर्ग के द्वारा इस स्थल से धार्मिक लाभ लेने के उद्देश्य से मंदिर समिति का गठन कर हस्तक्षेप की प्रक्रिया भी आरंभ हुई।

मल्हार से डिडनेश्वरी देवी की ऐतिहासिक प्रतिमा चोरी की घटना के समाचार 20.4.91 से 31.5.91 तक नवभास्कर, नवभारत, दैनिक भास्कर, देशबंधु, अमृत संदेश व अन्य अखबारों में प्रमुखता से प्रकाशित होते रहे। इन समाचारों का मसौदा/शीर्षक होता था- पुजारी पर संदेह, पुजारी व अन्य गवाहों के विरोधाभास बयान, 1 करोड़ की मूर्ति, ग्रामीण उत्तेजित, चक्का जाम, सघन नाकेबंदी, मल्हार में मातम का माहौल, चूल्हे नहीं जले, मिलने की पूरी संभावना, पुजारी, पुत्र, दामाद, बंबई के व्यापारी व तांत्रिक पर संदेह, प्रतिमा उत्तरप्रदेश में बरामद, दर्शन के लिए जनसमूह उमड़ा, पुलिस ने अपने प्रति भरोसा जुटाया, डिडनेश्वरी बिलासपुर पहुंची, दो गिरफ्तार, तीन फरार, 14 करोड़ की डिडनेश्वरी प्रतिमा उत्तरप्रदेश से आई, डिडनेश्वरी मूर्ति की कीमत 50 हजार (14 करोड़ और 50 हजार का समाचार, देशबंधु में क्रमशः 26 व 28 मई 1991 को प्रकाशित हुआ।), पुरातत्व विभाग के अनुसार मूर्ति दुर्लभ नहीं और डिडनेश्वरी देवी की मूर्ति मल्हार के निषाद समाज को सौंपने न्यायालय ने निर्देश दिए।

प्रतिमा चोरी की घटना विवरण- 
राज्य शासन द्वारा संरक्षित स्मारक डिडनेश्वरी देवी मंदिर के गर्भगृह में रखी प्राचीन प्रतिमा की दिनांक 19.09.91 को रात्रि में एक-दो बजे के बीच चोरी हुई।

चोरों ने मंदिर में सोये हुए पुजारी से देवी के दर्शन के बहाने मंदिर खुलवाया। मंदिर में घटना की रात्रि में पुजारी तथा उसके दामाद सोये हुये थे। चोरों की संख्या लगभग छह थी। इन्होंने पुजारी को बहाने से बाहर बुलाकर कुछ दूरी पर बलपूर्वक उसे उसकी धोती से कसकर बांध दिया। मंदिर में स्थित पुजारी के दामाद को पिस्तौल अड़ाकर विवश कर मूर्ति उठाकर सफेद रंग की मारुति वैन में भरकर ले गये। पुजारी के दामाद को मंदिर के भीतर बंद कर ताला लगाकर चाबी फेंक दिये। बाद में किसी प्रकार से पुजारी अपने बंधन खोलकर दौड़ते हुये मंदिर तक आया तथा बदहवास स्थिति में चोरी की घटना की जानकारी ग्रामवासियों को दी।

घटना की जानकारी होते ही स्थानीय निवासी सर्वश्री डा. शंकर चौबे, रामवल्लभ पांडे, कौशल पांडे आदि ने मस्तूरी थाना पहुंचकर घटना की सूचना दी जिसके आधार पर अपराध क्रमांक 82/91 धारा 458/380 ताजीरात हिन्द 30, पुरातत्व स्मारक अधिनियम दर्ज किया गया। ग्रामवातियों के द्वारा तुरंत रात्रि में ही थाना प्रभारी को रिपोर्ट करने पश्चात जिला मुख्यालय बिलासपुर पहुंच कर वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को अवगत कराया गया। यदि घटना के तुरंत पश्चात ही वायरलेस से सभी थानों को अवगत करा दिया जाता तो चोरी गई प्रतिमा अतिशीघ्र प्राप्त करने की पर्याप्त संभावना थी।

घटना की जानकारी प्राप्त होते ही पुलिस उपमहानिरीक्षक श्री पिप्पल, पुलिस अधीक्षक श्री पासवान, फोरेन्सिक साइंस विशेषज्ञ एवं अन्य स्थानीय अधिकारियों ने स्थल का निरीक्षण कर कार्यवाही आरंभ की। 

ग्रामवासियों का विरोध तथा प्रतिक्रिया-
मूर्ति चोरी की घटना से व्यथित मल्हार तथा आसपास के ग्रामों में सशक्त विरोध एवं प्रदर्शन हुआ। जुलूस के रूप में एकत्र होकर उन्होंने प्रतिमा बरामदी की शीघ्र मांग करते हुये मस्तूरी तथा मल्हार में सड़क पर चक्का जाम किया। पुलिस के द्वारा समझाने बुझाने के पश्चात ही चक्का बंद समाप्त किया गया। मल्हार में तनाव की स्थिति देखते हुये पर्याप्त संख्या में पुलिस बल की व्यवस्था कर दी गई।

डिडनेश्वरी प्रतिमा की चोरी से अवसाद में डूबा मल्हार-
डिडनेश्वरी प्रतिमा के चोरी की जानकारी होते ही मल्हार तथा समीपस्थ आसपास के ग्रामों में शोक छा गया। अनेक स्त्री पुरुष रोते देखे गये। दुकान तथा हाट बंद रहे। और तो और मल्हार के अधिकांश घरों में शोक के कारण चूल्हे भी नहीं जले। चोरों के इस दुस्साहस की निंदा करते हुए ग्रामवासियों ने मंदिर व्यवस्था में परिवर्तन को उत्तरदायी ठहराते हुए आलोचना की। मल्हार के लोगों की डिडनेश्वरी देवी से जुड़ी हुई यह आस्था आत्मिक है। पुरातत्वीय वस्तुओं से उन्हें आत्मिक अनुराग है चाहे वह किसी मूर्ति का बेडौल अंग अथवा घिसा-पिटा सिक्का ही क्यों न हो। डिडनेश्वरी को वे अपनी आराध्य कुल देवी तथा माता के सदृश्य मानते हैं। उनका विश्वास है कि यह जगतजननी सती माता पार्वती की प्रतिमा है। जो शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए आराधना कर रही है। ग्रामवासियों का विश्वास है कि डिडनेश्वरी देवी की पूजा मान्यता से अविवाहित नारियां शीघ्र अपने अनुकूल वर प्राप्त कर लेती हैं।

पुलिस का जांच प्रणाली-
डिडनेश्वरी प्रतिमा चोरी जांच हेतु मल्हार में पांच वरिष्ठ थाना प्रभारियों का दल कैम्प स्थापित कर जांच कर रहे थे। जांच कार्य के अवसर पर समीपस्थ ग्रामों के साधारण चोर तथा निरपराध व्यक्ति भी प्रताड़ित हुये। शक के आधार पर पकड़े गये अनेक व्यक्ति जांच पीड़ित होते रहे। पुलिस विभाग ने जांच का कार्य करते हुए पुरातत्व में विशेष रुचि रखने वाले स्थानीय ग्रामवासियों के उूपर शक करते हुए अनावश्यक रूप से पूछताछ करते रहे तथा अपमानित भी करते सर्वश्री डा. शंकर चौबे, राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित शिक्षक श्री रघुनंदन पांडे, श्री गुलाब सिंह ठाकुर आदि ने पुलिस के रवैये के प्रति अपनी व्यथा प्रकट की। कुछ ग्रामवासियों के अनर्गल बयान पर ध्यान केन्द्रित कर पुलिस पुरातत्व से अभिरुचि रखने वाले स्थानीय नागरिक तथा पुरातत्व विभाग के अधिकारियों पर भी दोष मढ़ कर हतोत्साहित करते रहे। इस जांच कार्य से मल्हार में पर्यटन की दृष्टि से आये हुए निरपराध व्यक्ति भी प्रताड़ित हुए तथा पुलिस ने कठोरता का व्यवहार किया। फलस्वरूप इस अवधि में मल्हार में काफी त्रासदायक स्थिति रही तथा पुरातत्व से अभिरुचि रखने वाले व्यक्तियों को तुच्छ दृष्टि से देखा जाने लगा था। राज्य शासन के बिलासपुर स्थित अधिकारी को यथा अवसर मल्हार में उपस्थित रह कर पुरावशेष रजिस्ट्रेशन की जानकारी प्रक्रिया आदि से जांच अधिकारियों को अवगत कराकर समाधान करवाया जाता रहा है। गलत सूत्रों के आधार पर शक के दायरे में फंसे प्रतिष्ठित नागरिकों की जांच करने पुलिस को बंबई जैसे महानगर में अन्वेषण कर बैरंग लौटना भी पड़ा है।

बिलासपुर सांस्कृतिक मंच और अपवाद- 
डिडनेश्वरी प्रतिमा चोरी होने की घटना के कुछ माह पूर्व बिलासपुर में शासन के सहयोग से अखिल भारतीय शैलचित्र परिषद तथा म.प्र. इतिहास परिषद का आयोजन संपन्न हुआ था। आयोजन पश्चात आगंतुक विद्वान मल्हार भ्रमण के लिए गये हुये थे। चोरी के पश्चात कुछ तत्वों ने इस प्रतिमा की चोरी में इस आयोजन को भी एक कारण सिद्ध करने का प्रयास करते हुये मंच के पदाधिकारियों पर दोषारोप में लगे थे।

डिडनेश्वरी और ज्योतिष गणना-
डिडनेश्वरी देवी प्रतिमा की चोरी के पश्चात दोषारोपण एक सामान्य घटना होने लगी थी। बिलासपुर सांस्कृतिक मंच के द्वारा पुरातत्व एवं इतिहास के सफलता पूर्वक आयोजन और व्यापक संवाद प्रचार के फलस्वरूप अखबारों में इस कार्यक्रम को पर्याप्त रूप से प्रकाशित किया गया था। बिलासपुर नगर के एक प्रतिष्ठित चिकित्सक डॉ गिरीश पाण्डे, एम.बी. बी.एस. जो डॉ. श्याम कुमार पाण्डे (प्रा.भा.इति. एवं पुरातत्व सागर, वि.वि. सागर) के लघु भ्राता हैं संदेहास्पद होने लगे थे। इनके सहयोग से ज्योतिष को आधार बनाकर इस प्रतिमा का जन्मांक, कुल, वर्ण, जाति, राशि आदि निर्धारित की जाकर योगों की गणना की गई एवं ज्योतिषानुसार मत भी प्रकाशित किया गया जिसके अनुसार इस प्रतिमा की शीघ्र प्राप्ति के पश्चात और ख्याति प्राप्त होने की भविष्यवाणी भी की गई थी जो सत्य घटित हुआ।

डिडनेश्वरी प्रतिमा चोरी और समाचार पत्र-
क्षेत्रीय समाचार पत्र डिडनेश्वरी प्रतिमा की चोरी और बरामदगी विषयक खबर समाचार पत्रों में प्रमुखता से प्रकाशित कर पुरातत्व के प्रचार प्रसार में परोक्ष रूप से संलग्न रहे। जांच से संबंधित प्रगति तथा तथ्य अंतिम दिनों तक समाचार पत्र में छपते रहे। यह एक संयोग रहा कि समाचार पत्रों में पुरातत्व विभाग के प्रति दुर्भावना अथवा दुष्प्रचार प्रकाशित नहीं हुआ।

डिडनेश्वरी प्रतिमा और पुरातत्व कार्यालय- 
डिडनेश्वरी प्रतिमा की चोरी में स्थानीय रजिस्ट्रीकरण अधिकारी कार्यालय बिलासपुर को भी लांछन तथा निंदा का सामना करना पड़ा। प्रतिमा के महत्व के अनुरूप चोरी की घटना की जानकारी भारतीय पुरातत्वीय सर्वेक्षण नई दिल्ली तथा सी.बी.आई. (पुरावशेष) को अवगत कराते हुए विस्तृत रिपोर्ट भेजी जाती रही है। जांच कार्य में कार्यालय से छायाचित्र तथा विवरण सदैव उपलब्ध कराये जाते रहे हैं।

डिडनेश्वरी प्रतिमा की उपलब्धि-
डिडनेश्वरी देवी की चोरी गई प्रतिमा की उपलब्धि एक सुंदर संयोग के रूप में बिलासपुर के इतिहास में स्मरणीय रहेगा। इस प्रतिमा की प्राप्ति से पुलिस को भी अप्रत्याशित ख्याति प्राप्त हुई। पुरातत्व विभाग के अधिकारियों तथा मल्हार निवासियों के कलंक का परिहार हुआ। यह प्रतिमा पुलिस के द्वारा अनवरत प्रयास के फलस्वरूप अंतिम क्षणों में प्राप्त हुआ। इस प्रतिमा चोरी में किसी सिद्ध गैंग का हाथ नहीं था। यह चोरी प्रकार से अनाड़ी चोरों के द्वारा की गई थी। जो न प्रतिमा महत्व जानते थे, न ही इस प्रकार की चोरी से पूर्व में संबद्ध रहे थे। चोरी के पश्चात प्रतिमा को छिपाये रखना इसी तथ्य का सूचक है। इस प्रतिमा की प्राप्ति से मल्हार के ग्रामवासियों को सर्वाधिक संतोष तथा हर्ष हुआ।

डिडनेश्वरी प्रतिमा तथा राजनीति- 
डिडनेश्वरी प्रतिमा की चोरी के कुछ समय पश्चात भूतपूर्व प्रधानमंत्री माननीय राजीव गांधी के हत्या के कारण विधान सभा चुनाव स्थगित कर दिया गया था। मूर्ति चोरी की इस घटना का राजनीतिक लाभ उठाने में राजनीतिक दल भी पीछे नहीं रहे हैं। मूर्ति चोरी के जांच हेतु धरना, प्रदर्शन, जुलूस आदि आयोजित कर ग्रामवासियों को अपने पक्ष में करने का प्रयास किये जाने पर भी ग्रामवासी विचलित नहीं हुए। चोरी की घटना से मतदान बहिष्कार करने की स्थिति भी निर्मित करने के प्रयास की गूंज सुनाई पड़ती रही।

डिडनेश्वरी की वापसी- 
डिडनेश्वरी देवी प्रतिमा की चोरी एक निंदनीय अपराध के रूप में लोकमानस में घर कर गया था। देवी की प्रतिमा की चोरी से अपराधियों को कुछ भी हासिल नहीं हो सका। जनसामान्य में यह प्रचलित विश्वास कि पुरातत्वीय धरोहरों की चोरी तथा विक्रय के दुष्कर्म में लिप्त व्यक्तियों का हमेशा अमंगल ही हुआ है। पुरातत्वीय धरोहर तथा पूजित प्रतिमा की चोरी एक दुस्साहसिक अपराध है जो कभी भी सफल नहीं हो सका है।

डिडनेश्वरी देवी की प्रतिमा मल्हार से दिनांक 19-4-91 को चुराई गई तथा बिलासपुर, मण्डला, जबलपुर, सागर, ललितपुर, झांसी होती हुई यह मैनपुर (उत्तर प्रदेश)प्रमाण पहुंची, तथा दिनांक 31-5-91 को वापस बिलासपुर पहुंची। बिलासपुर में इसे सिविल लाइन थाना में पंडाल बनाकर सार्वजनिक प्रदर्शन में रखा गया। सिविल लाईन थाना परिसर में इस प्रतिमा को देखने तथा पूजा करने वालों का अनियंत्रित तांता लगा रहा। व्यवस्था हेतु पुलिस कर्मियों को पुजारी का कर्तव्य निर्वहन करना पड़ा। बिलासपुर नगर में पुलिस के संरक्षण में रखी इस प्रतिमा का दर्शन करने वालों की संख्या तथा चढ़ोत्री एक किवदंती बन चुकी है।

डिडनेश्वरी की मल्हार यात्रा-
डिडनेश्वरी की प्रतिमा की बरामदगी के पश्चात शासकीय कार्यवाही पूर्ण करने के पश्चात न्यायालयीन आदेश से यह प्रतिमा पूर्व धारक भी लैनूराम कैवर्त समाज मल्हार को एक लाख रुपये की जमानत पर सौंपी गई। प्रतिमा प्राप्त करने के पश्चात एक विशाल जुलूस के रूप में इसे मल्हार ले जाया गया। बिलासपुर से मल्हार की 33 कि.मी. दूरी तय करने में इस प्रतिमा को लगभग 8 घंटे लग गये। रास्ते भर जगह-जगह पूजा तथा स्वागत से इस प्रतिमा के प्रति स्थानीय जनता का हार्दिक लगाव तथा भक्ति भावना का अनुमान होता है।

डिडनेश्वरी प्रतिमा की पुनः प्रतिष्ठा-
मल्हार ग्राम में डिडनेश्वरी देवी की पुनःप्रतिष्ठा मूल स्थान पर की गई। सुरक्षा की दृष्टि से इस मंदिर के बाहरी दरवाजों का लोहे के गेट लगवाये गये तथा अतिरिक्त सुरक्षा की दृष्टि से इसे भी लोहे के सीखचों से घेर कर प्रदर्शन किया गया है। प्रतिमा के पूर्व प्रतिष्ठा के समय समस्त ग्रामवासियों, प्रमुख शासकीय अधिकारी, जन प्रतिनिधियों आदि को आमंत्रित किया गया था। इस आयोजन में समस्त धार्मिक अनुष्ठान अभिषेक, गोदान आदि कृत्य संपादित किये गये तथा समस्त ग्रामवासी एवं अतिथियों के लिये लंगर स्थापित किया गया था। डिडनेश्वरी देवी को पुनर्प्रतिष्ठा से मल्हार का धार्मिक महत्व अब द्विगुणित हो गया है। इस स्थल पर समाज की ओर से धर्मशाला, ज्योतिकलश भवन आदि निर्माण किये गये हैं। मंदिर परिसर की भूमि दान अथवा क्रय से प्राप्त कर पर्याप्त विकसित कर ली गई।

शासकीय सहयोग तथा विकास- 
डिडनेश्वरी देवी मंदिर के विकास हेतु शासन द्वारा मंदिर स्थल तक पक्का डामर रोड बनवा दिया गया है। जिससे पर्यटक आसानी से वहां पहुंच सके। स्थल पर पानी की व्यवस्था तथा सड़क के दोनों और बिजली के खंभे भी लगवा दिये गये हैं। इस मंदिर के सामने स्थित सरोवर को गहरा तथा स्वच्छ कर स्थल के सौंदर्य में वृद्धि की गई है। अब यह स्थल एक प्रसिद्ध देवी मंदिर के रूप में दर्शनार्थियों को आकृष्ट करने में निरंतर प्रगति करता जा रहा है।

मेरी स्मृतियों के झरोखे में मल्हार-
पुरातत्व विभाग में कार्यरत होने से मेरा संबंध मल्हार से बना रहा। वर्ष 1976 में मैं सागर में रजिस्ट्रीकरण अधिकारी (पुरावशेष) के पद पर कार्यरत था। सागर में पदस्थ रहते हुये भी मुझे मल्हार उत्खनन कार्य में सागर वि.वि. सागर तथा म.प्र. शासन पुरातत्व विभाग के सहयोग से करवाये जा रहे उत्खनन कार्य शासकीय प्रतिनिधि के रूप में नियुक्त किया गया था। यह मेरी प्रथम मल्हार यात्रा थी। वर्ष 1986 में मेरी पदस्थापना बिलासपुर में हुई जिससे मुझे मल्हार से अभिन्न रूप से जुड़ने का अवसर प्राप्त हुआ। डिडनेश्वरी देवी मंदिर का अनुरक्षण कार्य भी मेरे कार्यकाल में संपन्न हुआ तथा स्थल का ख्याति की ओर क्रमशः चरण बढ़ना प्रारंभ हुआ। वर्ष 1991 में डिडनेश्वरी प्रतिमा की चोरी और उपलब्धि में परोक्ष रूप से प्रासंगिक अथवा अप्रासंगिक होने पर भी मेरा नाम पद गुरुता के कारण जुड़ा रहा है। 

1976 की स्मृति में डिडनेश्वरी देवी के साथ-साथ उनके निष्कपट तथा सरल स्वभाव के पुजारी दिवंगत श्री खुलुराम जी साथ-साथ उभरते हैं। श्री खुलुराम जी के बिना देवी की महिमा उद्घाटित नहीं होती थी। देवी प्रतिमा के महत्व तथा महिमा का वर्णन करते हुये वे अघाते नहीं थे तथा मी पर चड़े हुये लाल जसवंत का पुष्य अत्यन्त श्रद्धा के साथ दर्शकों को भेंट करते थे। उस समय घंटो बैठकर प्रतिमा के सम्मुख ध्यान करने पर कोई व्यवधान नहीं होता था। अब स्थिति विपरीत हो चुकी है। देवी को अपने हाथों से पुष्प, चंदन, रोली अर्पित करना असम्भव है। लोहे के सीखचों के मध्य प्रतिमा का दर्शन मात्र किया जा सकता है। ऐसा लगने लगा है कि देवी अब अपने भक्तों से दूर कर दी गई हैं। उनका वात्सल्य प्राप्त करना अब कठिन हो गया है। कहीं न कहीं से भय का भूत अथवा विकारों का किटाणु प्रवेश कर गया है जिससे मातृ स्वरूपा देवी को भी सीखचों के भीतर सुरक्षित रखना पड़ रहा है। ऐसी स्थिति समाज के दूषित मनोविकारों को प्रकट करती है, इसे दूर किया जाना आवश्यक है।

कलाकृतियों की सुरक्षा आवश्यक है परन्तु उतनी ही जिससे मनोभाव मृत न हो सके। अपने द्वारा पोषित वृक्ष के फल का एकाकी उपभोग अवश्य किया जा सकता है। परन्तु पक्षियों को बसेरा करने से रोकना आवश्यक नहीं है। वृक्ष के छांव के उपयोग का अधिकार सार्वजानिक है क्योंकि छांव मनुष्य की संपति नहीं है, उससे उसे वंचित करना मानव के अधिकार का हनन है।

डिनेश्वरी देवी की महिमा में एक यही स्थिति बाधक है। पूजित देवी के पाषाण प्रतिमा को सुरक्षित रखने की यह व्यवस्था भावनाओं को हमेशा भग्न करती रहेगी।

-जी एल रायकवार, पुरातत्ववेत्ता, रायपुर

परिशिष्ट-
श्री रायकवार के इस लेखे का महत्व स्पष्ट है। इसके साथ कुछ बातें जोड़ना मुझे आवश्यक लगा। अवकाश के दौरान मुझे घटना के समाचार मिलते रहे, यह भी कि पुलिस मुझसे पूछताछ के लिए बनारस पहुंच सकती है। वापस आने पर लोगों से हुई चर्चा और समाचार पत्रों की खबर के आधार पर तब मिली कच्ची-पक्की जानकारियां, अब जैसा याद कर पाता हूं कि चोरी में इस्तेमाल वाहन आगरा के किसी ‘ट्रेवल्स‘ से किराए पर ली गई थी, चुनावी माहौल में वाहन किराए पर लेने में मुश्किल आई थी। अपराधी संभवतः मूर्ति चोरी, स्मगलिंग आदि की कहानियां और फिल्मों से प्रभावित थे, कि मूर्ति मिली कि मालामाल होते देर नहीं। तब चर्चा में मूर्ति की कीमत करोड़ों, 14 करोड़ तक कही जा रही थी। पत्रिका ‘अगासदिया‘-32, अक्टूबर-दिसम्बर 2008 अंक के मुखपृष्ठ पर डिड़िनदाई प्रतिमा का चित्र प्रकाशित हुआ था। पत्रिका में इससे संबंधित लेख में बताया गया है कि ‘मूर्ति की दुर्लभता का ज्ञान सबको तब हुआ उत्तरप्रदेश मैनपुर से आकर मूर्तिचोर माता की मूर्ति को चुरा कर ले गये। उन्होंने नेपाल के तस्करों से संपर्क कर इस दुर्लभ मूर्ति का सौदा साढ़े चौदह करोड़ में कर लिया।‘

यह तथ्य स्पष्ट करना आवश्यक है कि 1974-75 से पूरे देश में प्राचीन कलाकृतियों के पंजीकरण का कार्य आरंभ हुआ, जिसके बाद चोरी-स्मगलिंग की ऐसी घटनाओं पर नियंत्रण हुआ है, क्योंकि पंजीकृत प्रतिमा, धारक और निर्धारित स्थान के अलावा, देश-विदेश कहीं भी देखी जाती है, तो कार्यवाही की जा कर उसे वापस निर्धारित स्थान, धारक तक वापस लाया जा सकता है। कई ऐसे प्रकरण हैं, जिनमें स्मगल हो कर विदेश चली गई पंजीकृत प्रतिमाओं की वापसी हुई है।

डिडनेश्वरी की यह प्रतिमा पंजीकृत है और ऐसी प्रतिमा का सौदा पंजीकरण से अनजान व्यक्ति ही कर सकता है। चोरी के बाद जिनसे भी प्रतिमा का सौदा हुआ, बात करोड़ों से हजारों में आ जाती, चोर निराश थे और मूर्ति को किसी ग्राहक को न टिका पाने के कारण खेत में गड़ा कर छुपाया था। निराश अपराधी किसी तरह गाड़ी भाड़ा और उस दौरान हुए खर्च की भरपाई हो जाए, सोचकर मूर्ति का सौदा रु. 50000/- में करने को तैयार थे, लेकिन महीना भर समय बीत जाने के बावजूद उन्हें कोई ग्राहक नहीं मिला।

ग्रामवासी कभी सुरागी बन कर महत्व पाने, कभी मौज में, कभी द्वेषवश, कभी यह सोचकर कि छोटी सी सूचना भी काम की हो सकती है, पुलिस को बयान देते रहे। मामला ऐसा संवेदनशील था कि जब तक कोई ठोस सुराग न मिले, पुलिस किसी भी संभावना पर जुट जाती। जैसा मुझे याद है सुराग मिला था अरपा नदी के टोल बैरियर से, जहां गाड़ी के नंबर के साथ रसीद कटी थी। गाड़ी के रजिस्ट्रेशन के आधार पर पता करते हुए पुलिस ‘ट्रेवल्स‘ तक पहुंची और ग्राहक बन कर गाड़ी किराए मांगने लगी। बात निकली कि कुछ दिन पहले अमुक ने गाड़ी किराए पर ली थी, लोग चुनाव के लिए गाड़ी किराए पर ले जाते हैं और हालत बिगाड़ कर लाते हैं। यहां से रास्ता साफ होने लगा, उत्तरप्रदेश पुलिस ने सहयोग किया, चोर पकड़ में आए, पुलिस के लिए प्राथमिकता मूर्ति बरामदगी थी, वह भी योजनाबद्ध, चतुराई पूर्वक निर्विघ्न कर ली गई।

अंत तक बात आती रही कि सरगना कोई राजनैतिक रसूखदार डाक्टर है, जो शायद कभी नहीं पकड़ा गया। मूर्ति सही सलामत वापस आ गई, लेकिन तब एक अफवाह यह भी रही कि मूर्ति बदल दी गई है, नकली है। पुष्टि के लिए पुरातत्व अधिकारियों से परीक्षण कराया गया और अंत भला सो सब भला।

Thursday, December 16, 2021

नारायण दत्त, राय गोविन्द चन्द्र

चिट्ठी-पत्री का दौर था। बड़े और व्यस्त लोग भी पत्रोत्तर जरूरी मानते थे। ऐसे दो महानुभावों के मुझ विद्यार्थी-पाठक के लिए पत्रोत्तर-

2/C कुलसुम टेरेस, 7 वाल्टन रोड,
बंबई 39
4 अक्तूबर 1980

प्रिय श्री राहुल कुमार जी,

आपका २६/९ का कृपापत्र नवनीत से भेजा जाकर मुझे आज मिला। आपने मुझे स्मरण किया और मेरे बारे में जानना चाहा, इसके लिए मैं आपका कृतज्ञ हूं।

नवनीत मैंने यथामति-यथाशक्ति सेवा की थी। आपको और अन्य कई स्नेही पाठकों मेरे परिश्रम के पीछे कोई दृष्टि नजर आती थी, यह मेरे लिए बड़े परितोष की बात है। नवनीत से आप सब पाठकों का स्नेह पूर्ववत् बना रहे, यह मेरी हार्दिक कामना है।

पिछले दिनों महीनों में मुझे आंखों के चार बड़े आपरेशन कराने पड़े। सो थोड़ा-बहुत अर्थोपार्जन करते हुए ज्यादातर समय स्वाध्याय और आराम में व्यतीत कर रहा हूं। हां, उम्र अभी निवृत्त होने योग्य नहीं हुई है। लेखन में मुझे शुरू से बहुत आसक्ति नहीं रही है। यों भी मैं सिर्फ अपने काम से मतलब रखने और जरा अलग-थलग रहने वाला जीव हूं। लिहाज़ा मेरी चर्चा आप कहीं नहीं सुनेगे। चर्चा हो इसकी मुझे चाह भी नहीं।

आपका स्वाध्याय फले-फूले, जीवन में आप सुखी हों। आपने पत्र लिखने का कष्ट किया इसके लिए पुनः धन्यवाद।

आपका
नारायण दत्त
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वाराणसी
दिनांक २३।९।१९८०

महोदय,
नमस्कार।

आपका कृपा पत्र दिनांक १८।९।८० प्राप्त हुआ अनेक धन्यवाद। मुझे बड़ा हर्ष हुआ कि किसी ने मेरी पुस्तक ‘हनुमान के देवत्व‘ का अध्ययन तो किया। जो सामग्री मुझे प्राप्त होगी उसको दुसरे संस्करण में सधन्यवाद प्रकाशित करूॅंगा। यदि आप हनुमान का चित्र भेज सके तो बड़ी कृपा होगी।

आपका

(डा. राय गोविन्द चन्द्र)

सेवा में,
राहुल सिंह, शासकीय संस्कृत महाविद्यालय,
रायपुर (म.प्र.)

Wednesday, December 15, 2021

तुमान सम्मेलन - 1995

नवभारत, बिलासपुर में 14.02.1995 को प्रकाशित सतीश जायसवाल जी की यह रपट लीक से हटकर है। तुमान के भरत सिंह जी के अलावा लाल कीर्तिकुमार सिंह जी और ज्योर्तिभूषण प्रताप सिंह जी से मेरा संपर्क था, और इस ‘सम्मेलन‘ के अवसर पर मैं भी वहां उपस्थित था।

तुम्मान सम्मेलन में नये ऐतिहासिक तथ्य प्रस्तुत
जमींदार के वंशज प्रवासी राजदूत हैं, आदिवासी नहीं


(नवभारत समाचार सेवा)

बिलासपुर. जिले की आठ पुरानी रियासतों के प्रमुखों ने दस फरवरी से १२ फरवरी के बीच तुम्मान में तीन दिवसीय सम्मेलन के दौरान अपने वंश गौरव की पुनर्प्रतिष्ठा के लिये इतिहास पुनर्लेखन की दिशा में पहल की है। सम्मेलन के समापन दिवस पर उक्त प्रमुखों ने यह भी स्पष्ट किया कि उन्हें आदिवासी समझे जाने की भ्रांति दूर की जानी चाहिये, क्योंकि उनके पूर्वज मूलतः क्षत्रिय राजपूत रहे, जो दिल्ली अथवा ग्वालियर से यहां आये.

अपने इस मंतव्य की पुष्टि में इन प्रमुखों ने, इस त्रिदिवसीय सम्मेलन को ‘सतगढ़ क्षत्रिय सम्मेलन‘ कहा है. इस सतगढ़ सम्मेलन में पेण्ड्रा, केन्दा, मातिन, पोंड़ी-उपरोड़ा, लाफा, छुरी तथा कोरबा के अतिरिक्त चांपा जमींदारी के वंशज भी शामिल हुये. सात गढ़ों को मिलाकर गठित जमींदारियों के इस समूह में चांपा का समावेश बाद में हुआ. इसे ‘मदनगढ़‘ के नाम से जाना जाता रहा है. ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार तुम्मान को छत्तीसगढ़ की प्राचीन राजधानी माना जाता रहा है, लेकिन तुम्मान सम्मेलन में लाफा राज्य को विशेष महत्व दिया गया. इस कथित ‘लाफा राज्य‘ के वंशज तथा पूर्व विधायक लाल कीर्ति कुमार सिंह ने बताया कि कल्चुरि राजवंश की ओर से जिन प्रवासी क्षत्रिय राजपूतों को यहां जमींदारी की सनदें की गई, उनमें सबसे पहली मान्यता ‘लाफा गढ़‘ को मिली. इस आधार पर आठ जमींदारियों के समूह में लाफा राज्य को सबसे प्राचीन माना जाता है. लाल कीर्ति कुमार ने बताया कि उनके वंशज ग्वालियर से यहां आये थे. उन्होंने कहा कि उन्हें आदिवासी समझा जाना एक भ्रांत धारणा है. वे मूलतः तोमर राजपूत हैं लेकिन कल्चुरियों द्वारा उनके पूर्वजों को जो जमींदारियां सौंपी गई थीं, वे आदिवासी बहुल जमींदारियां हैं, इसलिये इन जमींदारों को भी आदिवासी समझ लिया गया. आदिवासियों के लिये सुरक्षित तानाखार विधानसभा क्षेत्र से विधायक रह चुके श्री कीर्ति कुमार ने कहा कि वे लोग स्थानीय आदिवासियों से मिलकर उनमें इतना रच-बस गये हैं कि अब उन्हें आदिवासियों से अलग नहीं माना जा सकता, फिर भी यह सच है कि आदिवासियों के साथ उनके ‘रोटी बेटी के रिश्ते‘ नहीं होते. उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जन्म-मरण तथा वैवाहिक संस्कारों से संबंधित उनके रीति-रिवाज स्थानीय आदिवासियों से अलग हैं. लाल कीर्तिकुमार ने कुछ ऐसे ऐतिहासिक तथ्यों को भी चुनौती दी है, जिनसे उनके वंशवृक्ष अथवा उनके वंश की प्राचीनता को लेकर मतभेद की स्थितियां बनती है. तुम्मान सम्मेलन के उत्प्रेरक, पोंड़ी-उपरोड़ा तथा कोरबा जमींदारियों से संबंधित ज्योर्तिभूषण प्रताप सिंह भी इसी मत के हैं कि दिल्ली तथा ग्वालियर से आकर यहां के आदिवासियों पर शासन करने वाले जमींदारों के शौर्य तथा उनके प्रवास से संबंधित घटनाओं का इतिहास में ठीक-ठीक समावेश होना चाहिये. श्री ज्योर्तिभूषण इस दृष्टि से इतिहास लेखन के लिये प्रामाणिक दस्तावेजों को जुटाने के काम में लगे हुए हैं.

तुम्मान से पहले ऐसा सम्मेलन पेंड्रा में सम्पन्न हुआ था. उससे भी पहले श्री ज्योर्तिभूषण ने पूर्व मध्यप्रदेश की बकाया पुरानी रियासतों के वर्तमान प्रमुखों से मिलकर इस विषय में एकमत होने के प्रयास किये थे. ऐसी जानकारी मिली है, लेकिन इसके साथ यह भी पता चला है कि बकाया के जमींदार इस अभियान में शामिल होने के लिये अपने मन नहीं बना पाये. इसका कारण भी समझ में आने वाला है कि उन्हें इस अभियान में वे सुविधाएं तथा वे राजनैतिक प्रावधान खतरे में पड़ते दिख रहे होंगे, जिनके चलते जमींदारियां खत्म हो जाने के बाद भी राजनैतिक सत्ता के केन्द्र में बने रहे हैं. स्वयं श्री ज्योर्तिभूषण प्रतापसिंह को भी अभी तक कांग्रेस (इ) के सत्ता गलियारों में एक आदिवासी नेता के रूप में मान्यता हासिल है.

मान्यता की यह एकतरफा स्थिति है. इसके दूसरे तरफ यह प्रश्न है कि क्या ये जमींदार आज स्थानीय आदिवासियों में भी उतने मान्य हैं? इसके उत्तर में हमें यह ध्यान रखना पड़ता है कि श्री ज्योर्तिभूषण प्रताप सिंह कांग्रेस प्रत्याशी की हैसियत से विधानसभा के लिये लड़े गये चुनाव में (तब) निर्दलीय बोधराम कंवर (आदिवासी) से तथा लाल कीर्ति कुमार सिंह (कांग्रेस इ) भी भाजपा के पूर्व विधायक हीरासिंह मरकाम से चुनाव हार चुके हैं. इधर, पश्चिमोत्तर बिलासपुर जिले में श्री मरकाम ‘गोंडवाना महासंघ‘ के लिये चलाये जा रहे अपने अभियान के जरिये जो जनाधार विकसित कर रहे हैं, वह कहता है कि स्थानीय आदिवासियों ने भी अपने पूर्व प्रमुखों से अपनापन तोड़ लिया है.

तुम्मान सम्मेलन में कुछ संवैधानिक विसंगतियां भी नजर आई. उदाहरण के लिये, इस सम्मेलन में आमंत्रितों का स्वागत लाफा राज्य की ओर से किया जाना आज, जब रजवाड़े नहीं रहे, तब इस लाफा राज्य की संवैधानिक स्थिति को कैसे समझा जाये? यह समझ में नहीं आया. लाल कीर्तिकुमार सिंह ने भी कहाकि लाफागढ़ को जिसे चैतुरगढ़ भी कहा जाता है, वे आज भी अपना ... ... ही मानते हैं, यद्यपि उसकी देखभाल ... ... रखाव के लिये उसे पुरातत्व विभाग के जिम्मे सौंप दिया गया है. इस दुर्ग के साथ आदिवासियों के लोक नायक दामा-धुरवा की शौर्य गाथा जुड़ी हुई है. लाल कीर्ति कुमार सिंह ने बताया कि दामा धुरवा को मारने के एवज में उनके पूर्वजों को लाफा जमींदारी की सनद मिली थी और लाफा का किला इस जमींदारी के आधिपत्य में आया. एक ध्वन्यांकित साक्षात्कार में श्री ज्योर्तिभूषण प्रताप सिंह ने भी यही बताया कि उनके पूर्वजों ने यहां के बागी आदिवासियों को मारकर जिस शौर्य का प्रदर्शन किया था उसके ही एवज में कल्चुरियों से उन्हें जमींदारियां हासिल हुई. अभी ये जमींदार प्रमुख अपने अभियान को प्रचारित प्रसारित नहीं करना चाहते. इसके बदले अपनी ताकत जातीय संगठन तथा सामाजिक बुराइयों के उन्मूलन में लगाना चाहते हैं. तुम्मान सम्मेलन में पेंड्रा जमींदारी के प्रतिनिधि नहीं पहुंच पाये थे तथा श्री ज्योर्तिभूषण प्रताप सिंह ने एक साथ दो जमींदारियों का प्रतिनिधित्व किया, पोंड़ी उपरोड़ा तथा कोरबा. अन्य लोगों में केंदा से श्री दुखभंजन सिंह, चांपा से श्री भिवेन्द्र प्रताप सिंह, छुरी से श्री किशोर चंद्र प्रदाप सिंह तथा मातिन से सूर्य कुमारी देवी ने प्रतिनिधित्व किया. श्री कीर्ति कुमार ने बताया ... ... जमींदारियों का कुल फैलाव बिलासपुर ... ... मात्र १३९ गांवों तक सीमित है, इससे अधिक नहीं.

Tuesday, December 14, 2021

प्रसारिका

छत्तीसगढ़ हिन्दी साहित्य सम्मेलन के पत्र ‘प्रसारिका‘ का संपादन देवीप्रसाद वर्मा जी ‘बच्चू जांजगीरी‘ करते थे। इस पत्र के अप्रैल 1997 अंक के साथ बच्चू जी, शारदा प्रसाद तिवारी जी और बैरिस्टर छेदीलाल जी का पुण्य स्मरण-
देवीप्रसाद वर्मा                  शारदाप्रसाद तिवारी 


देश में गांधी-इरविन पेक्ट के टूटने से व्याप्त हताशा का परिणाम छायावाद काव्य है
- शारदाप्रसाद तिवारी

ठाकुर छेदीलाल के विषय में मेरी व्यक्तिगत मान्यता है कि राष्ट्रीय जीवन में उनका बहुत महत्वपूर्ण स्थान था- उनका अपना विशिष्ट महत्व था उनकी योग्यता, कुशलता तथा पांडित्य की जितनी भी चर्चा की जाए वह कम है। महाकोशल कांग्रेस कमेटी के वे 15 वर्षों तक अध्यक्ष रहे जिसमें उनके संगठन क्षमता तथा कार्य कुशलता का आकलन किया जा सकता है पर मुझे यह कहने में तनिक भी संकोच नही होता है कि राष्ट्रीय जीवन में उन्हें वह स्थान नहीं मिला जिसके वे अधिकारी थे। बिलासपुर जिले ने इस राष्ट्र को दो मेधा सम्पन्न संसदविद् दिए उनमें ई. राघवेन्द्र एवं ठाकुर छेदीलाल का नाम हम सगर्व ले सकते हैं।

उनके परिवार से हमारे परिवार का संबंध मधुर एवं आत्मीय था तथा ये संबंध तीन पीढ़ियों के थे। मेरे पिताजी ठाकुर सहाब के पांडित्य की प्रशंसा करते कभी नही थकते थे। हमारे पिताजी अपने मित्रों से यही कहा करते थे ऐसा राजनेता ढंूढे नहीं मिलेगा जो सब विषयों का प्रकांड पंडित हो, किसी भी विषय में चर्चा कीजिए समस्या रखिए, समाधान मिलेगा। यह घटना सन् 1951-52 की होगी जब मै छत्तीसगढ़ कालेज में प्राध्यापक होकर आया था तब हिन्दी साहित्य के साहित्य परिषद के उद्घाटन के लिए बैरिस्टर छेदीलाल को आमंत्रित किया था। उस अवसर पर उन्होंने जो भाषण दिया वह साहित्य की गहराई को स्पर्श करने वाला था- साथ ही व्यक्तिगत चर्चा के दौरान भी छायावाद के विषय में एक सर्वथा नया विचार का उद्घाटन उन्होेंने किया था। उनकी स्पष्ट मान्यता थी जब हमारे देश में गांधी-इरविन पैक्ट हुआ था तब महात्मा गांधी इस विश्वास के साथ कि गोल मेज कांफ्रेंस में होमरूल को स्वीकार कर ही लेगी, परन्तु मोहम्मद अली जिन्ना अपने 14 शर्तो से हटने के लिए तैयार ही नहीं थे - इस कारण उन्हें निराश होकर लौटना पड़ा। और उन्होंने असहयोग बहुत ही बडे पैमाने से शुरू करने का निर्णय लिया। उस समय लार्ड वेलिंगटन द्वारा असहयोग आन्दोलन को जिस तत्परता एवं बर्बरतापूर्वक कुचला गया। जगह-जगह पर गोलियां चली, लाठी चार्ज हुआ, जेल आन्दोलनकारियों से भरा गया - इसका परिणाम स्पष्ट उभर कर सामने आया- वह था पूरे देश में हताशा उदासी की छाया प्रतिबिंबित होने लगी और इसका सीधा प्रभाव तत्कालीन हिन्दी कविता पर पड़ा जिसे हम छायावाद के नाम से पुकारते हैं। तत्कालीन हिन्दी काव्य में पलायनवादी प्रवृत्ति की भावना जो परिलक्षित हुई वह देश की निराशा, कुंठा और मायूसी के कारण आई थी जिसमें प्रसाद और निराला की कविताओं में अधिक स्पष्ट दिखाई ... है।

छायावाद के विशिष्ट समीक्षकों ने पलायन प्रवृत्ति को बराबर रेखांकित किया है। साथ ही बाबू गुलाबराय छायावाद में लोक पक्ष की चर्चा की है जो वास्तव में जन आन्दोलन के असफलता के कारण हुई थी। प्रसाद के नाटक, कहानी और कविता में इसका प्रभाव देखा जा सकता है - निराला की तत्कालीन कवितायें यही साक्ष्य प्रस्तुत करती हैं। पंत और महादेवी में यह लोक पक्ष नहीं दिखाई देता है।

ठाकुर छेदीलाल की ओजस्वी वाणी को सुनकर आचार्य नरेन्द्रदेव तथा हजारी प्रसाद द्विवेदी का स्मरण हो आता था। बैरिस्टर साहब सहिष्णुता के प्रतीक थे।

बैरिस्टर साहब के प्रकाशित ग्रंथ
एशिया के प्रति यूरोपियनों का बर्ताव का एक अंश-

भारत
भारतवर्ष को यूरोपियन लोगों से क्या क्या लाभ हुए हैं, उनका वर्णन करने की आवश्यकता नहीं। भारत की कथा सब पर विदित ही है। वर्तमान दरिद्र, असहाय और पंगु भारत स्वयं ही अपनी दशा कह देता है। इस सब घटनाओं पर पूर्णदृष्टि से विचार करने पर यही ध्वनि निकलती है कि यूरोप वाले हम काले लोगों से जब-जब संबंध जोड़ते हैं कि यह कार्य संसार को सभ्य बनाने के लिए किया जाता है, किन्तु इनकी करतूत को देख कर कहना पड़ता है कि यह कथन उनका स्वार्थ छिपाने के लिए परदा मात्र है। शुद्ध विजय या व्यापार का प्रचार केवल अपने ही स्वार्थ के लिए किया जाता है। यह सिद्धांत यूरोप पर विशेष रूप से लागू होता है। जहां धन-वृद्धि और बाहरी आडम्बर सभ्यता के मुख्य लक्षण समझे जाते हैं। भारत निवासियों ने इतने समय तक यूरोप वालों के आभ्यान्तरिक विचारों से अपरिचित होने के कारण बहुत धोखा खाया। किन्तु इनके वास्तविक विचारों का ज्ञान हो जाने पर और इनकी सभ्यता से परिचय प्राप्त कर लेने के बाद धोखा खाना, हमारी मूर्खता का ही द्योतक होगा। हमें अपनी स्थिति सुधार कर अपनी अवस्था इतनी दृढ़ कर लेनी चाहिए कि ये लोग भविष्य में हमारे साथ मनमाना बर्ताव न कर सकें। शक्ति के कारण ही आज जापान, ईरान, मिश्र, चीन तथा भारत से सभ्यता में कई दर्जे कम होने पर भी यूरोप संसार में मान पा रहा है और सभ्य समझा जा रहा है। हमें भी उसी का अनुकरण करके अपना कल्याण करते हुए संसार का कल्याण करना चाहिए।

Monday, December 13, 2021

पत्र- 10.10.98

डॉ. कल्याण कुमार चक्रवर्ती जी को मेरे द्वारा यह पत्र लिखा गया था। चक्रवर्ती सर, मध्यप्रदेश के दौरान पुरातत्व के संचालक, फिर आयुक्त रहे। छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद प्रमुख सचिव और अपर मुख्य सचिव रहते हुए संस्कृति विभाग का जिम्मा उनके पास रहा। इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और परंपरा के प्रति उत्तरदायित्व उनमें, बतौर अधिकारी ही नहीं, जिम्मेदार नागरिक जैसा रहा है। सरकार और विभाग अर्थात राज्य हित तथा उसके साथ लोक हित के प्रति, विशेषकर छत्तीसगढ़ के लिए, उनकी परवाह, पद-निरपेक्ष रही है, आज भी है। (इस पत्र में आई बातों पर आगे चर्चा होगी, यह ध्यान में रखते हुए तब छायाप्रति रख लिया था, संयोगवश बची रह गई।)


दिनांक 10-10-98

आदरणीय सर,
सादर प्रणाम

21 अगस्त को विभागीय बैठक के लिए भोपाल का अवसर मिला था, किन्तु उस दौरान आपका प्रवास होने से भेंट न कर सका। इसी बैठक में AVRC, इन्दौर के लिए मुझे ताला पर स्क्रिप्ट लिखने का निर्देश प्राप्त हुआ था, जितना बन पड़ा, कामचलाऊ आलेख तैयार कर पिछले सप्ताह भेज दिया हूं।

डा. शंकर तिवारी जी पर प्रस्तावित प्रकाशन का पत्र मिला था, आपसे भेंट करने का प्रयास इस संबंध में भी जानकारी के लिए था, कि इस हेतु मैं किस प्रकार की सामग्री तैयार कर सकता हूं, आपसे मागदर्शन मिल जाता। पिछले वर्षों में हुई findings पर लिखने का प्रयास कर रहा हूं, किन्तु वह पूरा नहीं हो सका है, इस प्रकार की कोई सामग्री उपयोगी हो सकेगी अथवा नहीं और भेजने की निर्धारित तिथि करीब आ जाने से असमंजस में हूं।

इस बीच बिलासपुर में कुछ विभागीय कार्य कमिश्नर श्री उपाध्याय के मार्गदर्शन में हो रहे हैं, उनके, आदेशानुसार मुझे प्रति सोमवार कार्य की प्रगति की जानकारी देने और मार्गदर्शन प्राप्त करना होता है। कलेक्टर श्री सुशील त्रिवेदी जी भी रुचि लेते हैं, किन्तु इस स्थिति में मैं स्वयं को जिला प्रशासन के नियंत्रण का अंग महसूस करने लगा हूं, इसके लिए विभाग जब तक, उदार बना रहे, तब तक तो यह चल सकता है, अन्यथा खींचातानी की स्थिति बनते देर नहीं लगेगी। श्री उपाध्याय साहब, संचालक महोदय से और साथ-साथ श्री रायजादा जी, श्री अजय शंकर जी, EPCO आदि से लगातार सम्पर्क बनाये रखकर सभी कार्य मेरे माध्यम से कराये जाने के इच्छुक हैं, अभी फिलहाल ताला, जेठानी मंदिर के रसायनिकरण का काम हो रहा है और conservation, development कार्य आरंभ किया जाना है, रास्ते और वृक्षारोपण का कार्य भी कमिश्नर साहब ने करवाया है और नदी घाट निर्माण की भी तैयारियां हैं।

#रतनपुर पुल में लगी प्रतिमाएं निकाली जाकर कुल 88 प्रतिमाएं संग्रहालय हेतु संकलित कर ली गई हैं।

#डिडिनेश्वरी मंदिर, मल्हार का संरक्षण समाप्त कर दिये जाने की अधिसूचना प्रकाशन की जानकारी मिली है ।

#डीपाडीह के तीन कर्मचारियों के इस वर्ष की मजदूरी भुगतान के लिए राशि प्राप्त हो गई है। स्वर्गीय पल्टन राम की विधवा के भुगतान का प्रकरण अभी भी लंबित है।

#रूद्र शिव की फोटो के cover page वाला प्रकाशन किन्हीं नीलिमा चितगोपेकर की पुस्तक की जानकारी सुवीरा जायसवाल की लिखी समीक्षा, HINDU में प्रकाशित हुई, देखने में आई। पुस्तक मध्यप्रदेश में शैव धर्म पर है, मुखपृष्ठ पर रूद्र शिव के साथ इस पर कोई सामग्री है या नहीं, जानकारी नहीं है।

#इसी बीच आपके पत्र की मुझे मेजी गई प्रति (मूलतः रायकवार साहब को संबोधित) मिली। इस संबंध में रायकवार साहब से जानकारी प्राप्त करने का प्रयास कर रहा था, उनसे फोन पर बात हुई, पत्र उन्हें अभी नहीं प्राप्त हुआ है।

#निगम सर के ताला वाले काम के लिए एक प्रस्तावित रूपरेखा बनाकर दिया था, इसी सिलसिले में फोन पर डॉ. प्रमोदचन्द्र जी से भी बात हुई थी, वे दिसंबर में आने की योजना बता रहे थे। रायपुर से नियमित सम्पर्क न रह पाने से आपके पत्र में उल्लिखित बातों को पूरी तरह से नहीं समझ सका हूं। श्री रायकवार जी व डॉ. निगम से आमने-सामने बात होने पर समझने का प्रयास करूंगा और ताला लेख को अंतिम रूप देने का प्रयास करूंगा, उसमें जैसी पहले आपसे चर्चा हुई थी, मैंने प्रतिमा को, क्षेत्रीय स्रोतों से प्राप्त जानकारी के आधार पर, उसे सोम-शैव संप्रदाय की मान्यताओं के आधार पर निर्मित होने की संभावना होने का पक्ष रखने का प्रयास कर रहा हूं।

शेष कुशल है। डा. शंकर तिवारी जी संबंधी आपके प्रकाशन योजना की जानकारी पिताजी को दी है, वे अत्यंत प्रसन्न हुए हैं और इसके लिए विशेष रूप से शुभकामनाओं के लिए मुझे कहा है। कुशलता की कामना तथा सभी के प्रति अभिवादन निवेदन सहित।

पुनश्च- दीपावली की शुभकामनाओं के लिए रूद्र शिव का छायाचित्र (श्री के.पी.वर्मा, रसायनज्ञ द्वारा खींचा गया) साथ है।

Sunday, December 12, 2021

लोचन नोट

शिलालेख
गांव - कोनी, अरपा किनारे, पास सरवानी शार...
बिल्हा से पूर्व करीब ७ मील, गांव के बाहर नदी
के किनारे खंडहर, मन्दिर में १ शिलालेख ६४ लकीर
का है। भाषा संस्कृत (देववाणी) अज्ञात

खंडहर
स्थान- बिलासपुर से १५ मील रेलवे स्टेशन शिव-
नाथ बृज से पश्चिम करीब ३ मील मनियारी
नदी के किनारेखंडहर मन्दिर हैं जो कि बड़े-
पत्थर से बने हैं, जिसमें गारा आदि का पता
याने जोड़ाई का पता नहीं लगता, जिसे देवरानी
जेठानी का मन्दिर कहते हैं वहीं से कोई एक
मूर्ति जांच के लिये ले गया है। यह गांव -
ताला के खार में है। ताला के पास पंवसरी वा दगौरी है।

अशोक चक्र
बिल्हा से ५ मील दूर मूरु गांव में पास खर-
केना में नये मन्दिर में अशोक चक्र १ है। वह
३ हाथ करीब लम्बा, १ हाथ चौड़ा अन्दाजी।



पं. लोचन प्रसाद पांडेय का हस्तलिखित यह नोट, बिलासपुर के श्री महेशचंद्र वर्मा के पास सुरक्षित दस्तावेजों में (जिसकी छायाप्रति तैयार कराने की अनुमति उन्होंने दी थी) मैंने 1987-88 में देखा था, यह 1957 का बताया गया। उक्त नोट के तीन में से पहला ‘शिलालेख‘ बिलासपुर-शिवरीनारायण मार्ग पर दर्रीघाट-लिमतरा के आगे लावर-कोनी का है, कलचुरिकालीन इस शिलालेख का वाचन-प्रकाशन हो चुका है। दूसरा ‘खंडहर‘ में ताला, ग्राम- अमेरीकांपा के देवरानी-जिठानी का उल्लेख है, यह स्थान शिवनाथ और मनियारी नदी के संगम के पहले मनियारी में बसंती नाला के संगम पर है तथा अब रूद्र शिव मूर्ति के कारण विख्यात है। तीसरा ‘अशोक चक्र‘ तलाश का प्रयास खरकेना गांव के मंदिरों और उसके आसपास किया गया किन्तु सफलता नहीं मिली।

महेश जी, जगदलपुर वाले शरद जी, पं. सत्यदेव दुबे के वकील हरीश जी और मीडिया-विज्ञापन से जुड़े शिरीष जी के भाई थे। महेश जी शिक्षक थे और अधिकतर समय पेन्ड्रा, धनपुर क्षेत्र में शासकीय सेवा में रहे। छत्तीसगढ़ के प्राचीन व्यापारिक मार्गों की अच्छी-खासी जानकारी उन्हें थी। अधिकतर रास्ते उनके स्वयं चले-देखे हुए थे और बहुतेरी जानकारियां उन्होंने मवेशी बाजार करने वाले व्यापारियों से जुटाई थीं।