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Tuesday, July 20, 2021

शीर्षक

साहित्य में शीर्षकों का स्थान

पिछले दिनों एक चुटकुला पढ़ने में आया था- एक लेखक महोदय अपने मित्र से अपनी नई कृति के शीर्षक के लिये सलाह मांगते हैं। मित्र महोदय लेखक से प्रश्न करते हैं इस उपन्यास में ‘ढोल‘ शब्द है, लेखक सोचकर जवाब देते हैं- ‘नहीं‘ और ‘मंजीरा‘ मित्र पूछते हैं ‘नहीं‘ लेखक फिर कहते हैं। तब शीर्षक रख दो ‘न ढोल न मंजीरा‘, मित्र महोदय ने सुझाया।

शीर्षक की समस्या ने सचमुच छोटे लेखकों से बड़े साहित्यकारों तक को उलझन में डाला है। संभवतः इसीलिए शेक्सपीयर ने अपने एक नाटक का शीर्षक दिया था ‘एज यू लाईक इट‘ (जैसा तुम चाहो) और यह परेशानी पदुमलाल पुन्नालाल बख्शीजी के सामने भी रही होगी तभी तो उन्होंने अपने एक लेख का शीर्षक दिया था- ‘क्या लिखूं‘।

शीर्षकों की माया प्राचीन काल से ही रही है। प्राचीन साहित्य मे शीर्षकों की परंपरा में शीर्षक के साथ कभी ‘रासो‘ जोड़ा गया, कभी ‘अध्यायी‘ कभी ‘सागर‘ और ‘समुद्र‘ की परंपरा रही तो कभी संख्या-वाचक शीर्षकों की, जैसे ‘वैताल पचीसी‘, सिंहासन बत्तीसी‘, हनुमान चालीसा आदि।

आधुनिक काल में शुक्ल-युग तक तो संभवतः शीर्षक साहित्यकारों के लिये विशेष समस्या नहीं साबित हुए, कितु शुक्लोत्तर-युग के शीर्षकों में नवीनता तो थी ही, विचित्रता भी कम न थी, और वह भी विशेषकर सन ‘40 के बाद के शीर्षकों में।

लंबे शीर्षक रखना इस काल की परंपरा थी। इसी काल के कुछ शीर्षक इस प्रकार थे- ‘इन्द्रधनु रौंदे हुए ये‘ और ‘अरी ओ करूणा प्रभामय‘ (अज्ञेय) लगभग इस काल की रचनाओं के ये शीर्षक भी दृष्टव्य हैं- ‘तुमने क्यों कहा था मैं सुन्दर हूं‘ (यशपाल), ‘चांद का मुंह टेढ़ा है‘ (मुक्तिबोध), ‘एक आदमी दो पहाड़ों को कुहनियों से ठेलता‘ (शमशेर) आदि। इसी संबंध में अज्ञेय की ‘लिखि कागद कोरे‘ की भूमिका ‘सांचि कहऊं‘ के ये वाक्य उल्लेखनीय हैं- ‘असल में मुझे शीर्षक देना चाहिए था ‘अथ सांचि कहऊं मैं टांकि टांकि कागद अध कोरे‘ पर साठोत्तरी उपन्यास के पाठोत्तरी पाठक भी महसूसते (उन्हीं की भाषा है) कि इतने लंबे शीर्षक नहीं चलने के।‘

शीर्षक मे इन विचित्रताओं और नयेपन का आखिर कारण क्या है। आलोचकों का कथन है कि ऐसे शीर्षक उस पुस्तक के प्रति पाठक की उत्सुकता बढ़ाने के लिये होते हैं। सचमुच इन शीर्षकों के प्रति कौन उत्सुक नहीं होता- ‘एक गधे की आत्मकथा‘ (कृश्न चन्दर) ‘क्योंकि मैं उसे जानता हूं‘ और ‘कितनी नावों में कितनी बार‘ (अज्ञेय) ‘आकाश में फसल लहलहा रही है‘ (रामदरश मिश्र) ‘जब ईश्वर नंगा हो गया‘ (शिव शर्मा), ‘थैला भर शंकर‘ (शंकर) आदि।

शीर्षकों की आधुनिक परंपरा में एक प्रमुख है- नामवाचक शीर्षकों की परंपरा। ‘बेबी‘ (विजय तेन्डुलकर), ‘अलका‘ और ‘अर्चना‘ (निराला), ‘नीरजा‘ (रविन्द्रनाथ ठाकुर) ‘दिव्या‘ (यशपाल) आदि । जीवनी में तो नामवाचक शीर्षक होते ही हैं। शीर्षकों में सर्वनाम का भी कभी-कभी जमकर प्रयोग होता है- ‘मेरी, तेरी, उसकी बात‘ (यशपाल), ‘वाह रे मैं वाह‘ (क. मा. मुंशी), ‘हम हशमत‘ (कृष्णा सोबती). ‘मैं‘ (विमल मित्र), ‘उनसे न कहना‘ (भगवती प्रसाद बाजपेयी) ये कुछ इसी तरह के शीर्षक हैं।

कुछ विशेषणयुक्त शीर्षक ये हैं- ‘घासीराम कोतवाल‘ और ‘सखाराम बाइंडर‘ (तेन्डुलकर) ‘पगला घोड़ा‘ (बादल सरकार) ‘मैला आंचल‘ (फणीश्वरनाथ रेणु) ‘लालपीली जमीन‘ (गोविन्द मिश्र) रिश्ते के संबंधों ने भी शीर्षक मे कभी-कभार स्थान पाया। ‘देवकी का बेटा‘ (रांगेय राघव), कनुप्रिया (भारती) ‘रतिनाथ की चाची‘ (नागार्जुन) ‘कैदी की पत्नी‘ (रामवृक्ष बेनीपुरी) आदि इसके उदाहरण हैं। विरोधाभासी और आश्चर्यजनक शीर्षकों की भी आधुनिक हिंदी साहित्य में बहुतायत है। इस तरह के कुछ शीर्षक हैं- ‘झूठा सच‘ (यशपाल), ‘आवारा मसीहा‘ (विष्णु प्रभाकर), ‘जिंदा मुर्दे‘ (कमलेश्वर), एक बिछा हुआ आदमी‘ (विभुकुमार), ‘एक गांधीवादी बैल की कथा‘ (राधाकृष्ण) आदि। संख्यावाचक शीर्षकों की जो रचनायें प्रसिद्ध हुईं, उनमें है- ‘गवाह नम्बर तीन‘, ‘तीस चालीस पचास‘ (विमल मित्र), चार खेमे चौंसठ खूंटे (बच्चन) और ‘अट्ठारह सूरज के पौधे‘ (रमेश बक्षी)।

आंचलिक भाषा का उपयोग शीर्षकों में बहुत कम हुआ है, कभी कभी लोकोक्तियों का भी प्रयोग किया जाता है, उदाहरणस्वरूप ‘फिर बैतलवा डाल पर‘ (डा. विवेकी राय), ‘कागा सब तन खाइयो‘ (गुरुबक्श सिंह), ‘सबहिं नचावत राम गोसाईं‘ (भगवती चरण वर्मा) ‘नाच्यो बहुत गोपाल‘ (अमृतलाल नागर) आदि। अब कुछ संस्कृत शीर्षक वाली कृतियों का नाम पढ़ लीजिए- ‘वयं रक्षामः‘ (आचार्य चतुरसेन) ‘एकोSहं बहुस्याम्‘ (रघुवीर सहाय), मृत्युर्धावति पंचमः (अज्ञेय), ‘धर्मस्य तत्वं निहितं गुहायाम् (हजारी प्रसाद द्विवेदी)।

कभी कभी लेखक अपनी रचना को किसी की डायरी या किसी का पोथा बताते हैं- ‘अनामदास का पोथा‘ (हजारी प्रसाद द्विवेदी), ‘एक साहित्यिक की डायरी‘ (मुक्तिबोध), ‘लफ़्टंट पिगसन की डायरी‘ (बेढब बनारसी), ‘अजय की डायरी‘ (डा. देवराज) आदि इसी प्रकार के उदाहरण हैं। आजकल की डायरियां ज्यादातर नेताओं की ‘मेरी जेल डायरी‘ होती है।

कुछ शीर्षक देख कर ही सामान्य पाठक भयभीत हो जाता है। ‘अस्वीकृति का अकाव्यात्मक काव्यशास्त्र‘ (रमेश कुंतल), एक ऐसा ही शीर्षक है। ऐतिहासिक या पौराणिक नाम, जिनसे पाठक अनजान रहता है, वे भी कुछ ऐसा ही प्रभाव डालते हैं- ‘प्रमथ्यु गाथा‘ और ‘वृहन्नला‘ (भारती), ‘एक और नचिकेता‘ (जी. शंकर कुरुप), ‘संपाति के बेटे‘ और ‘आछी का पेड़, पैशाची; जरथुस्त्र और मैं‘ (कुबेरनाथ राय)।

अब कुछ भ्रामक शीर्षक- इस बारे में श्रीलाल शुक्ल के ये वाक्य प्रसंगानुकूल हैं ‘‘मैंने ‘शेखर एक जीवनी‘ पढ़ी है। वह उपन्यास है। खेती सींखने के लिए मैंने अज्ञेय रचित ‘हरी घास पर क्षण भर‘ पढ़ा। उसमें कविताएं हैं। ... बच्चों के पढ़ने के लिए ‘तितली‘ और लक्ष्मीनारायण लाल का ‘बया का घोंसला और सांप‘ मंगाई पर उन्हें बच्चों ने नहीं, नर-नारियों के संबंधों के ज्ञाता बुजुर्गों ने ही पढ़ा।‘‘
नवभारत, रायपुर का 3 सितंबर 1978 का पृष्ठ-3

लेखन, अभिव्यक्ति के साथ-साथ सार्वजनिक करने के लिए भी हो तो उस पर कुछ न कुछ असर इस बात का होता है कि वह प्रस्तुत-प्रकाशित कहां होगा। मेरी पीढ़ी 20-22 की उम्र में कुछ डायरी में तो कुछ पत्रों में अभिव्यक्त होती थी, लेकिन कुछ सार्वजनिक करना है, छपना-छपाना है तो पत्रिकाओं और समाचार पत्र की ओर देखना होता था कि वहां क्या और कैसा लिखा-छपा होता है। लिखने के बाद छपने के लिए तब अखबारों में जगह होती थी, मिल जाती थी। अखबारों में नाम सहित कुछ छप जाना, चाहे ‘पाठकों पत्र/आपकी चिट्ठी‘ ही क्यों न हो, संग्रहणीय नहीं तो उल्लेखनीय जरूर होता, बधाइयां भी मिल जातीं। स्थानीय अखबारों के कार्यालय तक पहुंच आसान होती थी। इस तरह लेखन का विषय चुनते, उसे अंतिम रूप देते, पत्र-पत्रिका का संपादक पहले और प्रत्यक्ष ध्यान में होता, पाठक उसके बाद, परोक्ष। आम लेखन की शैली, स्तर और टेस्ट इसी के आधार पर तय होता।

आजकल का लोकप्रिय लेखन, अधिकतर पहले फेसबुक-ट्विटर पर उगता है, कुछ-कुछ ब्लाग पर भी। सामान्यतः अनुकरण होता है उनका, जिस पर ढेरों लाइक-कमेंट हों, फिर थोड़ी अपनी पसंद और उसके बाद अपने लेखन-क्षमता, कौशल। इस तरह पहचाने गए नये लेखकों में, लेखन का स्वरूप तय करने का पहला और महत्वपूर्ण कारक लाइक-कमेंट करने वाला पाठक होता है। तब उसके लिए जरूरी होता है कि गंभीर बात भी रोचक-चुटीले अंदाज और बोलचाल की भाषा में कही जाए। बात कहने के लिए लंबी भूमिका भी नहीं चलने की। हर पैरा ऐसा हो, जो आगे पढ़ने की उत्सुकता और रुचि बरकरार रखे। नये वाले अधिकतर लोकप्रिय लेखकों के साथ यह लागू है।

अब के लेखन से तब की कलम-घिसाई का फर्क। यहां आई कुछ पोस्ट, पुराने दौर का लेखन है, यह अभ्यास तब इसी तरह हुआ था।

Monday, July 19, 2021

ताला

इन मंदिरों पर से सदियां गुजर चुकी हैं 

मध्यप्रदेश में शिवनाथ की सहायक नदी मनियारी के बायें तट पर गुप्तकाल में निर्मित दो शैवमंदिर आज भी पांचवीं-छठी शताब्दी के मूक साक्षी बने खड़े हैं। ये मंदिर तत्कालीन शरभपुरीय शासकों के स्थापत्य प्रेम का प्रतीक तो हैं ही, साथ ही वैष्णव शासकों की धार्मिक सहिष्णुता का प्रतीक भी हैं। कभी इस भू-भाग ने पाषाणयुगीन मानव को भी आकर्षित किया था। यहां पाये गये लघु पाषाण उपकरण इस बात का प्रमाण हैं। 

बिलासपुर जिला मुख्यालय से 30 किलोमीटर दूर यह स्थान ‘ताला‘ नाम से जाना जाता है, जहां ये दो स्मारक भग्नप्राय स्थिति में विद्यमान है। स्थानीय लोगों में ये मंदिर ‘देवरानी-जिठानी के मंदिर‘ नाम से जाने जाते हैं। यह इन मंदिरों का दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है कि इक्का-दुक्का ही पुरातत्वविदों ने इनकी खोज-खबर ली। सन् 1873-74 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के प्रथम महानिदेशक ए. कनिंघम के सहयोगी जे.डी. बेग्लर को इनकी सूचना रायपुर के तत्कालीन असिस्टेंट कमिश्नर मि. फिशर द्वारा मिली थी। बेग्लर ने स्वयं तो इन स्मारकों को नहीं देखा, मगर रायपुर-बिलासपुर मार्ग पर पुरातात्विक महत्व के स्थल के रूप में ‘जिठानी-देवरानी का मंदिर‘ नाम दर्ज कर दिया गया। इसी शताब्दी के सातवें दशक के अंत में दुर्गा महाविद्यालय, रायपुर के डॉ. विष्णु सिंह ठाकुर ने इस स्थान की खोज-खबर ली। 

कुछ वर्ष पहले अमेरिकी शोधार्थियों और मध्यप्रदेश शासन ने इस स्थान की छानबीन की और छत्तीसगढ़ में पहली बार गुप्तकालीन मंदिरों की उपस्थिति का आभास लोगों को हुआ। इसी समय राज्य पुरातत्व विभाग ने इसके संरक्षण की चिंता पहली बार की। 1985 में राज्य पुरातत्व विभाग के तत्कालीन सलाहकार और संप्रति हॉर्वर्ड विश्वविद्यालय के डॉ. प्रमोदचंद्र ने इस स्थान का निरीक्षण किया, लेकिन इस सबके बाद भी यह स्थान मामूली चर्चा का ही विषय बन सका। 

कथित देवरानी और जिठानी मंदिर में, देवरानी अधिक सुरक्षित स्थिति में है। दोनों मंदिरों के बीच की दूरी मात्र 15 मीटर है और ये मंदिर वस्तुतः शिव मंदिर हैं। देवरानी मंदिर के तलविन्यास में आरंभिक चंद्रशिला और सीढ़ियों के पश्चात अर्द्धमंडप, अंतराल और गर्भगृह तीन प्रमुख भाग हैं। गर्भगृह का तल अंतराल से कुछ बड़ा है।

मंदिर की सीढ़ियों में शिवगण व अन्य देवियों तथा गंधर्वों की मूर्तियां बनाने में अनूठी कलात्मकता के दर्शन होते हैं। निचले हिस्से पर शिव-पार्वती विवाह दृश्य अंकित है और उभय पाश्र्वों पर गज, द्वारपाल व मकरमुख उत्कीर्ण है। प्रवेशद्वार के उत्तरी और दक्षिणी दोनों पाश्र्व चार-चार भागों में विभक्त हैं, जिनमें उत्तरी पाश्र्व में ऊपरी क्रम से उमा-महेश, कीर्तिमुख, द्यूत-प्रसंग व गंगा-भगीरथ का अंकन है। उमा-महेश प्रतिमा का लास्य, द्यूत प्रसग में हारे हुए शिव के नंदी का पार्वती-गणों के अधिकार में होना व भगीरथ अनुगामिनी गंगा स्पर्श से समर- वंशजों की मुक्ति, कलाकार की मौलिकता और कुशलता का परिचायक है। अत्यंत कलात्मक और बारीक पच्चीकारी वाले प्रवेश द्वार पर गजाभिषिक्त लक्ष्मी और शिव-कथानक का अंकन है।

जिठानी मंदिर तो अब लगभग ढह चुका है। इसमें ध्वस्त मंदिर से अत्यंत महत्वपूर्ण सामग्री उपलब्ध हुई है। जिठानी मंदिर में पूर्व व पश्चिम की सीढ़ियों से प्रवेश किया जा सकता है। उत्तर की ओर दो विशाल हाथियों का अग्र भाग है। विशाल स्तंभों व प्रतिमाओं के पादपीठ सहित विभिन्न आकार की ईंटों व विशालकाय पाषाणखंडों से निर्मित संरचना आकर्षित करती है। यहां प्रसन्नमात्र नामक शरभपुरीय शासक की उभरी हुई रजत मुद्रा भी प्राप्त हुई है, जिस पर ब्राह्मी के क्षेत्रीय रूप, पेटिकाशीर्ष लिपि में शासक का नाम अंकित है। शासक की यह एकमात्र रजत मुद्रा प्राप्त हुई, जबकि ऐसी स्वर्ण मुदाएं बहुतायत में मिली हैं। कलचुरियों की रतनपुर शाखा के दो शासक, रत्नदेव व प्रतापमल्ल की भी एक-एक मुद्रा प्राप्त हुई है, जिससे अनुमान होता है कि यह क्षेत्र लगभग बारहवीं सदी ई. तक निश्चय ही जनजीवन से संबद्ध रहा। इस बात की पुष्टि यहां प्राप्त अन्य सामग्री, मिट्टी के खिलौने व पात्र, टिकिया, मनके लौह उपकरण से होती है। 

मदिर में अर्द्धनारीश्वर, उमा-महेश, गणेश, कार्तिकेय, नायिका, नागपुरुष आदि विभिन्न प्रतिमाएं एवं स्थापत्यखंड प्राप्त हुए है। प्रतिमाओं का आकार भी उल्लेखनीय है। इनमें कुछ तो तीन मीटर से भी अधिक लबी हैं। प्रतिमाओं में अलौकिक सौंदर्य, आकर्षक अलंकरण तथा कमनीयता का संतुलित प्रदर्शन है। दो अन्य पाषाण प्रतिमाएं विष्णु और गौरी की हैं, इनका काल लगभग आठवीं सदी ई. है। ताला के इन मंदिरों पर गभीर शोध की आवश्यकता है।
यह लेख, ‘हिंदी का पहला साप्ताहिक अखबार‘ टेग लाइन और संतोष भारतीय के संपादन वाले, दिल्ली से प्रकाशित ‘चैथी दुनिया‘ के 16 से 22 अगस्त 1987 अंक के पृष्ठ 10 पर आया था। यह लेख छपने पर, सरसरीपन के कारण मुझे अच्छा नहीं लगा था। मगर यह स्वयं स्वीकार करते हुए सार्वजनिक करना आवश्यक समझता हूं, इसलिए यहां प्रस्तुत किया है।

Saturday, July 17, 2021

होली

होली की उमंग
मस्ती के रंग
फाग के संग

खेत खलिहान गर्व से भरे हैं, टेसू के फूल प्रकृति की सुन्दरता द्विगुणित कर रहे हैं, आम के बौर की भीनी सुगंध वातावरण को मादक बना रही है, बसंती झोंके तन मन को गुदगुदा रहे हैं, मदन देवता के धनुष पर पंचशर चढ़े हैं और प्रत्यंचा खिंची हुई है, धूप में कुनकुनाहट आ गई है इन सबका मूक संदेश है- होली आ रही है। होली मस्ती का त्यौहार, फाग का त्यौहार, बड़े-बूढ़े बच्चे सबका त्यौहार, आल्हादकारी और भेदभाव रहित त्यौहार।

होली के स्वरूप में अंतर भले ही हो किन्तु होली का उत्साह और उन्माद भारत भर में सब पर समान रहता है। होली का उन्माद सब पर एक सा क्यों न हो, किसके अंग न कसमसायेंगें इस मौसम में-
अंग-अंग कसमस हुए, कर फागुन की याद। आंखों में छपने लगे फिर मन के अनुवाद।।

होली की स्वरूपों की बात चल पड़ी है तो आइये कुछ प्रमुख और चर्चित होली देखते चलें- होली की चर्चा में पहला नाम फालैन का याद आता है। फालैन में होली मनाने का तरीका कोई विशेष अनोखा नहीं है, चर्चा का कारण है एक पण्डा परिवार। इस परिवार का कोई एक सदस्य हर होली के अवसर पर धधक चुकी होली के अग्निकुंड में से नंगे पांव निकला करता है। इसके लिये उसे अग्निकुंड पर 10-12 कदम चलने होते हैं, जिसमें लगभग आधे मिनट का समय लगता है। और इस समय होली की लपटें कम से कम 4-5 फीट ऊपर उठती रहती हैं। होली के अवसर पर फालैन का यह कार्यक्रम अत्यधिक अनूठा और आश्चर्य का विषय है।

चर्चित होलियों में पहला नाम नंदगांव और बरसाने की लठमार होली का है। फागुन के कृष्ण पक्ष की नवमीं को नंदगांव के हुरिहार और बरसाने की गोपिकायें इस कार्यक्रम का रूप संजोते हैं। नारियां घूंघट की आड़ में पुरुषों पर लाठी का प्रहार करती हैं और नंदगांव के हुरिहार उस प्रहार को ढाल पर रोकते हैं। बरसाने की होली के दूसरे दिन नंदगांव में भी ऐसी ही लठमार होली होती है। फर्क इतना है कि इस होली में बरसाने के गुसाईं हुरिहार होते हैं और नंदगांव की गोपियां प्रहार करती हैं।

मथुरा के निकट एक स्थान है, दाऊजी, यहां के हुरंगा अर्थात वृहद होली का अपना ही अंदाज है। पुरुष पिचकारी से महिलाओं पर टेसू का रंग डालते हैं और रिश्ते के इन देवर पुरुषों के कपड़े फाड़कर स्त्रियां कोड़े बनाती है, पानी में भीगे इन कोड़ों का प्रहार देवरों की पीठ लाल कर डालता है और स्त्री पुरुषों की टोली विदा होते समय पुरूष गाते हैं-
हारी रे गोरी घर, चाली रे कोई जीत चले हैं, ब्रज ग्वाल। स्त्रियों का प्रत्युत्तर कथन होता है- हारे रे रसिया, घर चाले रे कोई जीत चली है, ब्रजनार।

राजस्थान के एक नगर बाड़मेर की होली की अब सिर्फ यादें रह गई हैं। बाड़मेर की 60-70 वर्ष पूर्व की होली पत्थरमार होली हुआ करती थी। धुलेंडी अर्थात होलिका दहन की अगली प्रभात से ही 15 दिन पूर्व से की गई तैयारी वाली पत्थरबाजी प्रारंभ हो जाती थी। किन्तु न तो इसमें वैमनस्यता रहती थी न ही दुश्मनी का भाव। रस्सी अथवा कपड़े के कोड़ो से देवरों की पिटाई का प्रचलन यहां अब भी है। साथ ही एक परंपरा ईलाजी की प्रतिमा बनाने की है, मान्यता है कि ईलाजी बांझ महिलाओं को पुत्र प्रदान करते हैं।

वाल्मीकि रामायण व रामचरित मानस में कहीं भी होली का उल्लेख नहीं है, किंतु अन्य गीतकारों ने अपने प्रिय देवताओं के होली का वर्णन किया है। फाग में होली अवध में राम भी खेलते हैं प्रजाजन और देवी सीता के साथ। शिव खेलते हैं गौरा के साथ, अपनी ही मस्ती में और ब्रज की होली नटवर कृष्ण का क्या कहना वह तो सखाओं, गोप-ग्वालों, राधा सभी के साथ खेलता है। होली के अवसर पर जितने फाग गीत गाये जाते हैं उतने गीत शायद ही किसी अन्य त्यौहारों में गाये जाते होगें। फाग के राम सीता की यह होली देखिये-
होरी खेले रघुबीरा अवध में।
केकरा हाथ कनक पिचकारी, केकरा हाथ अबीर।
राम के हाथ कनक पिचकारी, सीता के हाथ अबीर।

सूर सागर की बसंत लीला का राधा कृष्ण का फाग है-
मैं तो, खेलूंगी, कान्हा तोसे होरी बरजोरी।
हम घनश्याम बनब मथुरा में, तोहे नवल ब्रज वनिता बनाई।
मोर मुकुट कुंडल हम पहिरब, तोहे लला बेनूली पहनाई।
मुरली मधुर लेबि हम अपना, चूड़ी पहनाइब, कान्हा तोहरी कलाई।

बीकानेर में फाग ‘रम्मत‘ के रूप में प्रचलित है। रम्मतों में सास-बहू का ख्याल, देवर-भाभी की रम्मत, बूढ़े बालम की रम्मत और अमर सिंह राठौर की, आदि रम्मत होती है। रम्मत न के बराबर साज-श्रृंगार के बाद मंच पर खेली जाने वाली काव्य नाटिका है। मारवाड़ के गांव में जहां ढोला-मारू की प्रेमगाथा की बहुतायत है वहीं पेशवाओं के महाराष्ट्र में ‘तमाशे‘ का अपना रंग है। तमाशे के लिये मराठी शाहिर खास गीत रचा करते हैं और नर्तकियां उसे गाकर प्रेक्षकों का अनुरंजन करती हैं। एक तमाशे के गीत में मदनविद्ध नायिका अपने प्रेमी से कहती है-
सख्या चला बागामधिं रंग खेलू जरा, सब शिमम्याचा करा गुलाल गोटा घ्यावा
लाल हाती फेकू न मारा छाती, रंगभरी पिचकारी माझपाहाती
हरी करीन या रिती जसा वृन्दावनी खेले श्रीपति गोपी धेऊनी संगानी

कृष्ण प्रेमिका, बाजबहादुर की बेगम रूपमती ने लगभग 1637 विक्रम संवत में अपनी प्रेम कविता को फाग के रूप में लिखा है इसका माधुर्य दृष्टव्य है-
मोर मुकुट कुंडल को अतिछवि आंखन नैन अंजन धरे कोना। ‘रूपमती‘ मन होत बिरागी बाज बहादुर के नन्द दिठौना।।

मध्यप्रदेश में लगभग पूरे बुदेलखंड में प्रचलित चौकड़िया फाग ही गाया जाता है जो ईसुरी कवि की रचनायें मानी जाती हैं। छत्तीसगढ़ के हिस्से में भी विशेषकर श्रृंगारिक फाग का अत्यधिक प्रचलन है किन्तु कभी-कभी यह अश्लील दहकी गीतों की सीमा तक पहुंच जाता है। छत्तीसगढ़ी फागों में होली के त्यौहार को कुंवारों के लिये अनुपयुक्त माना गया है। एक ऋतु गीत की कुछ पंक्तियां उल्लेखनीय है-
माघ महिना राड़ी रोवय होत बिहनियां नहाय हो जाय
नहा खोर के घर म आवय अउ तुलसी हूम जलाय
फागुन महिना डिडवा रोवय गली-गली में खेले फाग।

नवभारत, रायपुर के होली परिशिष्ट, मुख्य लेख के रूप में, पृष्ठ-3 पर रविवार, दिनांक 11 मार्च 1979 को यह प्रकाशित हुआ था। संभवतः यही मेरा पहला लेख है, जिसके लिए समाचार पत्र के रामअधीर जी ने मौखिक रूप से अनुबंधित करते हुए, कुछ संदर्भ-सामग्री पढ़ने को दी। तब गूगल नहीं था। कुछ अपने पुराने नोट्स और याददाश्त काम आया। पारिश्रमिक भी मिला, लेकिन तब नवभारत के ऐसे परिशिष्ट में रविवार को मुख्य लेख छप जाना, छत्तीसगढ़ स्तरीय पुरस्कार से कम न था। अब लेख पढ़ते हुए लगा कि इस लेखक में थोड़ी सांस्कृतिक, साहित्यिक रुचि तब से है और उससे भविष्य में कुछ बेहतर की उम्मीद की जा सकती थी।

Friday, July 16, 2021

कठपुतलियां

आइये-आइये आपके शहर में कठपुतलियों का नाच सिर्फ दस पैसे में आइये जल्दी आइये- माधव की बेजान सी आवाज एक पिचके चोंगे से विस्तारित हो रही थी। आज ही इस बस्ती में ये कठपुतली वाले आए, दिन भर जुटकर इन्होंने यह एक खेमा तैयार किया था और इस खेमे के आसपास ही इस बस्ती की लगभग सारी आबादी केन्द्रित थी।

रघु खेमे के अंदर टूटे से तख्ते पर बैठकर कठपुतलियां ठीक कर रहा था। यही तख्ता खेल शुरू होने पर मंच के काम आता था। इनकी बूढ़ी मां खेमे के पीछे आसपास से लकड़ियां चुनकर आग जला चुकी थी और उस पर भात की तैयारी में एक अल्यूमीनियम की पिचकी देगची में पानी रख रही थी। बाहर दरवाजे पर माधव और रमली दस-दस पैसे लेकर दर्शकों को अंदर भेजते जा रहे थे। थोड़ी देर बाद माधव ने अंदर झांककर देखा। भीड़ काफी हो चुकी थी अतः खेल शुरू करने के लिये अंदर जाते जाते रमली से उसने कहा- ‘भाभी खेल शुरू होते होते दरवाजा बन्द कर देना।

अंदर जाकर उसने ढोलक संभाल ली और रघु डोरियों का फंदा अपनी ऊंगलियों में फंसाने लगा। ढोलक पर अब माधव के हाथ चलने लगे। दर्शकों का शोर थम गया और एक एक करके कठपुतलियां मंच पर आती गईं, रघु सीटी बजा बजाकर कठपुतलियां नचाता रहा और माधव तेज आवाज में दृश्य समझाता गया, कभी दर्शक दम साध लेते तो कभी बच्चों के खिलखिलाने की आवाज आने लगती और रघु के हाथों का दर्द तेज हो जाता, रघु के हाथों का बढ़ता हुआ दर्द डोरियों के सहारे उतर कर कठपुतलियों को जीवंत बना रहा था और मानों वे कठपुतलियां रघु की प्राण शक्ति को लेकर ही नाच रही थीं। अंततः ढोलक की एक तेज आवाज के साथ रघु की ऊंगलियों में तनी डोरियां ढीली पड़ गई, कठपुतलियों का यह खेल खत्म हो गया।

रोज ही हरेक तमाशे के बाद रघु और माधव के स्थान परिवर्तित हो जाया करते थे अब रघु बैठ रहा था ढोलक पर और डोरियां थी माधव के जिम्मे। अगले खेल में माधव के साथ ठीक वही हुआ जो पिछले खेल में रघु के साथ हुआ था इस बार खेल के अंतिम दौर में माधव कराह उठा था और उसकी कराह को बड़ी चतुराई से रघु के ढोलक की तेज थापों से दर्शकों तक न पहुंचने दिया था।

तीसरे दिन भी हर दिन की भांति दो खेल हो चुके थे। तीसरा खेल शुरू होना था काफी दर्शक आ चुके थे कुछ लोग तमाशा देखने के लिये आसपास के पेड़ों पर चढ़कर बैठे थे। माधव के मना करने पर उसे धमकी भी दे चुके थे। थोड़ी देर बाद ही खेल शुरू हुआ था। यह क्या हुआ? कठपुतलियों के मरने का दृश्य पांच मिनट बाद ही मंचित हो गया। माधव ने झांककर पर्दे में देखा। रघु ऊंगलियों से डोरियों का फंदा उतार चुका था और मंच के पिछले भाग पर दोनों हाथ, पैरों के नीचे दबाये हुए बैठा था।

माधव यह देख कर समझ गया कि रघु को फिर वही पुराना दौरा आया है, जो पहिले कभी महीनों में आया करता था, किन्तु फिर बीच के दिन कम होते गये और यदि रघु दिन में दो तमाशा दिखाना जारी रखे तो शायद रघु के हाथों का तमाशा ही खत्म हो जाये एक दिन। अचानक दर्शकों का शोर तेज हो गया, दर्शक समूह चूंकि पैसे देने के बाद भी पूरा खेल नहीं देख पाया था अतः उत्तेजित हो रहा था तो कुछ कठपुतलियों मर जाने पर उदास थे किन्तु अन्य सभी चिल्ला रहे थे- स्साले पैसे वापस करो नहीं तो सब पर्दे फाड़कर फेंक देंगे।

माधव ने रघु की सलाह से निर्णय लिया कि पैसे वापस कर दिए जाये नहीं तो हमारी खैर नहीं है। सभी दर्शकों को उनके पूरे पैसे वापस हो गए; इन्हें चिंता हुई दूसरे दिन की, रघु की नसें फूल आई थीं और माधव एक खेल ही दिखा सकता था, दिन में।

दूसरे दिन शाम इनमें फिर वही उल्लास था, नियति ने इनकी समस्या हल कर दी थी। रघु के हाथों की मांसपेशियां ठीक हो गई थीं। रघु सोच रहा था कि शायद आज वह तमाशा दिखाना शुरू करें तो फिर वही कल सा तमाशा न हो जाये खैर। कल पैसे भी कम मिले थे इन कठपुतली वालों को, फिर ऊपर से रघु के तेल पानी का खर्च। आज खाने को इन्हें आधा पेट ही मिल पाता अगर बुढ़िया बीमार न हो जाती। लगातार पिछले दिनों से बुढ़िया का ताप तेज था, फिर भी खाना बनाकर वह लेट रही थी किन्तु आज तो मानों उसका शरीर जल रहा था, खाना नहीं खाया गया उससे और ये तीनों फिर उसी तरह चावल की लेई मिर्च के साथ निगलकर तमाशे की तैयारी में लग गए।

रघु बड़ा प्रसन्न हो रहा था। आज फिर वह दो खेल सकुशल दिखा चुका था। लाख लाख दुआयें दे रहा था ईश्वर को। किन्तु उसकी वह प्रसन्नता टिकी न रह सकी। दूसरे दिन उसका पुराना दौरा पहले ही खेल के अंत में आ गया, उस दिन भी दो ही खेल हो पाये। पेट आज फिर न भर पाया था उनका, यह स्थिति देखकर रघु ने माधव से दो खेल दिखाने को कहा। माधव भी स्वीकृति देने के सिवा और क्या कर सकता था। अब किसी तरह माधव दो खेल दिखाया करता। रघु के हाथों को तो इस दौरे ने मानों नाकाम ही कर दिया था।

जीवन के एक दो दिन फिर शांति से गुजर गए इन यायावरों के किन्तु अब दर्द उठा माघव के हाथों में।

किसी तरह उसी लीक पर इनका जीवन पागे बढ़ता गया, माधव के हाथों ने रघु के हाथों की तेजी ले ली। अब वह किसी तरह दिन में दो खेल दिखा लिया करता था, कभी कमाई अच्छी हो जाती तो वे कुछ पैसे भविष्य के लिये बचा लेते। किन्तु कितने नादान थे ये। इनके भविष्य में कुछ भी तो नही था, आज ऐसी दुर्घटना घटी जिसने इनके जीवन के स्थायित्व को फिर से तितर बितर कर दिया। सबेरे उठकर उन्होंने देखा कि बुढ़िया के मुंह पर मक्खियां भिनक रही थीं। उनके परिवार की इस कठपुतली का नाच खत्म हो चुका था। बुढ़िया की दवा दारू से जो कुछ पैसे बचे रह गए थे उससे इन्होंने दाह संस्कार की सामग्रियां जुटाई। शवयात्रा में कुछ और लोग भी शामिल हो गए थे किन्तु उनमें कोई भी एक दूसरे से परिचित न था। रघु, माधव और इन्हें परिचय का एक ही सेतु जोड़ता था- गरीबी।

शवयात्रा में मनहूस शांति छाई थी। उन्हें अपने खेल की चिंता थी तो किसी को साहूकार के कर्ज की। कोई उस दिन के खाने के इन्तजाम के बारे में सोच रहा था तो किसी को बेटी की शादी की चिंता खाए जा रही थी।

बुढ़िया को जलाकर वे वापस आ गए, और खेमे में वहीं दायरा सा बना कर बैठ गए। तीनों के चेहरों पर कोई भाव न थे, न वे आपस में कुछ बोल ही पा रहे थे। काफी देर तक वे इसी तरह बैठे रहे, फिर तीनों की आंखें मानों आपस में सलाह करने लगीं। अचानक तीनों उठ खड़े हुए, रघु पर्दे गिराने लगा। रमली और माधव बांस पर कठपुतलियां बांधकर और ढोलक पीटते निकल गए।

रात को लोगों ने सुना, माधव की आवाज भोंपू से और तेज आ रही है- आइये आइये आपके शहर में कठपुतलियों का...।

सच्ची घटना पर आधारित, मेरी लिखी यह कहानी, समाचार-पत्र ‘नवभारत‘ रायपुर, दिनांक 13 मई 1979 के पृष्ठ 4 पर प्रकाशित हुई थी। अब इस कहानी का मूल्यांकन करते हुए कह सकता हूं कि प्रयास अच्छा है, किंतु इस लेखक में कहानीकार के लक्षण विरल हैं।

Sunday, July 4, 2021

कोरोना में किताबें

12 जून 2020 की वार्ता पर आधारित।

यश पब्लिकेशंस, दिल्ली के फेसबुक लाइव पर मैं राहुल सिंह, रायपुर, छत्तीसगढ़ से उपस्थित हूं। आप मुझे देख-सुन पा रहे होंगे। मुझे इस दौर में पढ़ी पुस्तकों पर बात करनी है। ऐसे लाइव में अक्सर कहा जाता है, थोड़ा इंतजार करें, कुछ लोग और आ जाएं, यह बात ठीक नहीं लगती, क्योंकि जो समय पर आ गए हैं उनका समय क्यों खराब हो। तो मैं अपनी बात शुरू कर रहा हूं।

थोड़ी सी पृष्ठभूमि रख देना चाहूंगा। याद कर रहा हूं पंडित माधवराव सप्रे को, उनकी ‘एक टोकरी भर मिट्टी‘ हिन्दी की पहली कहानी के रूप में जानी जाती है। पत्रकारिता और स्वतंत्रता संग्राम में भी उनका नाम है। सन 1905 में उनकी पुस्तक आई थी ‘स्वदेशी आंदोलन और बायकाट‘। यह छोटी सी, लेकिन बहुत महत्वपूर्ण पुस्तक है। यहां उनकी चर्चा एक अलग संदर्भ में कर रहा हूं। 1901 में उनके पास समीक्षा के लिए पुस्तक आई, ‘ढोरों का इलाज‘। नाम से स्पष्ट है कि पशु चिकित्सा की पुस्तक थी, किसी अंगरेजी पुस्तक का हिंदी अनुवाद। उन्होंने इस पर टिप्पणी की है कि- डॉक्टर, दवाइयां या इस तरह की पुस्तकें, समालोचना के लिए भेजी जाती हैं। जिस विषय की जानकारी नहीं, उसमें क्या समालोचना कर सकते हैं और संपादक महोदय भी हमको ऐसी पुस्तकें दे देते हैं। उन्होंने चुटकी लेते हुए आखिर में यह भी लिखा है कि- यह विषय मुझे आता नहीं तो आप मान सकते हैं कि एक तरह से इस पुस्तक का यहां विज्ञापन है। यह छपा तो संपादक की नजरों से गुजरा ही होगा।

इसी में एक शब्द आया है- सालोतरी। मेरे लिए यह नया शब्द था। संभव है, आपमें से भी कुछ के लिए यह नया हो। अंग्रेजी और हिंदी के आम शब्दकोशों में यह शब्द नहीं मिलता। गूगल करेंगे तो जरूर मिल जाएगा। यह, पशु चिकित्सक या घोड़ों का इलाज करने वाले डॉक्टरों के लिए इस्तेमाल होने वाला शब्द है। घोड़ों का सामरिक और सफर, यातायात के साधन के रूप में उपयोग था, इसलिए घोड़ों का इलाज करने वाले महत्वपूर्ण होते थे, और इस खास शब्द सालोतरी से जाने जाते थे। सालोतरी की तलाश करते हुए ध्यान, अश्विनी कुमारों की ओर गया। वहां से नकुल और सहदेव तक, जो माद्री के जुड़वा पुत्र थे। माद्री, अश्विनी कुमार का ध्यान करती हैं और नकुल-सहदेव पैदा होते हैं। महाभारत की कथा में पांडव, अज्ञातवास के लिए विराट देश में जाते हैं तो वहां नकुल-सहदेव अश्वशाला का काम देखते हैं, पशुओं के चिकित्सक होते हैं। उन्हें इसका ज्ञान, उनकी विशिष्टता होती है (नाम में ही अश्व है)। अश्विनी कुमार, वैदिक देवता हैं, उनकी भी प्रतिष्ठा इस रूप में रही है। उल्लेख मिलता है कि वे यौवन के लिए भी दवाएं दिया करते थे। आंखों का इलाज करते थे, और बनावटी हाथ-पैर का उल्लेख मिलता है, जिसमें उन्होंने किसी के लिए लोहे का पैर बनाया था।

कोरोना के दौर में लाइव आने लगे, वेबिनार होने लगे। बच्चों की ऑनलाइन क्लास होने लगी मैंने पता करने की कोशिश की, कुछ पैरेंट्स से, बच्चों से, कि यह कैसा अनुभव है। उनमें किसी की मजेदार किंतु तात्विक टिप्पणी थी कि बच्चे को क्लास की पढ़ाई में तो समझ में नहीं आता, मन नहीं लगता तो इस तरह में कितनी पढ़ाई कर पाएंगे। ठीक उसी तरह वेबिनार की बात है कि सेमिनार में, पोस्ट लंच सेशन में लोग झपकी लेते हुए दिख जाते हैं। फिर भी यह परिवर्तन का दौर है जब धीरे-धीरे हम उस काल की ओर बढ़ रहे हैं। जैसे परिवर्तन की संभावनाएं भविष्य में हैं, उसको इस कोरोना संकट ने कुछ करीब ला दिया है। इस माध्यम से अभ्यस्त होने में थोड़ा समय लगेगा, लेकिन यह भविष्य की झांकी है इससे कहीं, किसी को इंकार नहीं हो सकता।

अपनी पढ़ाई की बात पर आते हैं। यश, छत्तीसगढ से जुड़े साहित्य और लेखकों की किताबें छापते रहे हैं। मैं भी जुड़ा रहा, बात हुई तो शर्त रख कर बचना चाहा कि संभव है इसमें आपके द्वारा प्रकाशित किसी पुस्तक, अपनी भी पुस्तक का नाम न लूं, फिर भी वे तैयार हो गए। वार्ता के विषय की बातें होने लगी तो एक बात आई, कि अब पढ़ने के लिए अधिक समय है और इसमें क्या पढ़ रहा हूं। निसंदेह यह दौर अलग किस्म से बीत रहा है। दिनचर्या बदल गई है, यह फर्क समय दे रहा है, आपके पास समय होता है। अन्य दिनों की तुलना में मुझे भी खाली समय अधिक मिला, लेकिन कुछ न कुछ गतिविधियां दूसरे तरह की, कुछ कोरोना रिलीफ के कामों से जुड़ी, कुछ अपने छूटे और नियमित काम, यानि खालीपन नहीं रहा।

यह भी लगता है कि समय निकलना, मानसिक होता है। मैंने महसूस किया कि साढ़े चार-पांच सौ पेज वाली किताब शुरू नहीं कर पाता था, अब ऐसा मौका मिला, खाली समय को अपने ढंग से इस्तेमाल की अधिक संभावना बनी तो मनोहर श्याम जोशी की पुस्तक ‘कौन हूं मैं‘, हाथ में ली। ज्यादातर लोग परिचित होंगे, बहुत प्रसिद्ध केस था बंगाल का भवाल संन्यासी प्रकरण। ‘कौन हूं मैं‘ शीर्षक दिखता है कि सेल्फ एक्सप्लोरेशन, आत्म संधान है। पुस्तक का प्रारंभिक परिचय का हिस्सा देखते ही बनता है कि वे किस आध्यात्मिक, साहित्यिक ऊंचाई तक उसे ले गए हैं। कोऽअहं की बात हमारी परंपरा में, शास्त्रों में है, वह किस तरह यहां घट रही है। भवाल संन्यासी पर अलग-अलग, संन्यासी राजा, एक जे छिलो राजा, फिल्में भी बन चुकी हैं, बांग्ला में कई पुस्तकें लिखी गई हैं। फिर भी यह एक भारी भरकम किताब आई, जिसे शायद जोशी जी पूरी नहीं कर पाए थे। यह उनके अंतिम दिनों की, शायद छपकर निधन के बाद आई थी। लगता है कि उन्होंने ढेर सारे नोट लिए थे और इस स्वरूप के बजाए कुछ और काम करना चाहते, लेकिन स्वास्थ्यगत या जो भी परिस्थितियां रही हों, यह स्वरूप बना। बहरहाल, पुस्तक की पृष्ठभूमि का, उसी बीज का विस्तार, भवाल राजा का आधार ले कर किया गया है, वह अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण और अनूठा है।

इस बीच पढ़ी पुस्तकों को एक साथ मिला कर याद करता हूं तो इसमें दो तरह की किताबें हैं। एक सेल्फ एक्सप्लोरेशन की, स्वयं की तलाश वाली और दूसरी, यात्रा-वृत्तांत, खासकर नदियों के यात्रा-वृतांत। इस संयोग में देख सकते हैं कि घुमक्कड़ी में देश को एक्सप्लोर करते हुए, भूगोल को एक्सप्लोर करते हुए, अपनी तलाश भी होती है। अपने संदर्भों से अलग हो कर, यात्रा में, अनजान जगहों पर, अपने तलाश की बेहतर संभावना होती है। अपने संदर्भों में रहते हुए, हमारे संदर्भ ही हावी हो जाते हैं।

क्षेपक- इस दौर में खोजा-पाया करते हुए मियां की मस्जिद, गूगल है। इसलिए वास्तविक खोज तो वही है, जो गूगल से संभव न हो। गूगल करते हुए हम कितनी भी गहराई में उतर जाने की सोचें वह वस्तुतः सतही विस्तार ही होता है। पैरोडीनुमा बात कुछ यूं हो सकती है- जिन खोजा तिन पाइयां, गहरे पानी पैठ। मैं नादां देखूं इंटरनेट, लिए लैपटाप बैठ।। इसलिए लगता है कि अब कुछ खोजना-पाना रह गया है तो वह है, खोजी-जानी वस्तुओं और शब्दों का स्वयं अनुभूत बोध और इस रास्ते आत्मबोध।

इस क्रम में अमृतलाल बेगड़ को छिटपुट पढ़ता रहा था। बेगड़ जी ने नर्मदा पर किताब लिखी है, ज्यादातर लोग उससे परिचित हैं। अब एक जिल्द में आ गई है ‘तीरे तीरे नर्मदा‘, तो इस दौर में वह सिलसिलेवार पढ़ने का मौका मिला। इसका तो कहना ही क्या, बहुत सारी अनूठी और रोचक बातें हैं। नर्मदा की परिकम्मा, परिक्रमा करने वालों में एक ऐसा भी है, जो कहता है कि मैंने अपनी गाय के साथ परिक्रमा शुरू की थी। गाय का नाम नर्मदा है, रास्ते में उसकी बछिया पैदा होती है, उसका नाम रेवा है और वह बहुत भाव से बताता है कि परिक्रमा का संकल्प तो इस नर्मदा का, गाय का है। मैं इसके साथ परिक्रमा कर रहा हूं। हां! संकल्प जरूर इसके लिए मैंने किया था। नदी के साथ आस्था के रंग हैं, हमारा जीवन है और इस क्रम में आत्म-संधान है, नदी की जीवंत धारा के साथ बहते हुए जिस तरह खुद को देख पाते हैं, वह यों संभव नहीं होता।

एक तरफ इस तरह की आस्था है उससे कुछ अलग ढंग की पुस्तक अभय मिश्र और रामेंदु जी की गंगा यात्रा की है ‘दर दर गंगे‘। पूरी पुस्तक पत्रकार नजरिए से लिखी गई है। एक तरफ जहां तीरे तीरे नर्मदा में आस्था का भाव है, वहां भी यह बात तो बार-बार आती है कि समय बदल रहा है, परिस्थितियां बदल रही हैं, बांध बन रहे हैं, प्रोजेक्ट्स आ रहे हैं तो भविष्य किस तरह का होगा, लेकिन फिर भी उसमें बहुत मजबूत आस्था है। वही यहां टूटते हुए दिखती है, गंगा जैसी आस्था की नदी के साथ यात्रा करते हुए लिखी ‘दर-दर गंगे‘ का, एक तो स्वरुप बहुत अच्छा है। अलग-अलग जगहों की बातें हैं, वहां अलग-अलग पात्र हैं, और उन पात्रों के साथ जो कहानियां कही गई हैं वह मूलतः रिपोर्ताज है। पत्रकारिता का शब्द ‘स्टोरी फाइल करना‘, यानि जो खबरों से आगे की बात होती है, खबरों से ज्यादा गहरी बात, यहां उस तरह की कहानियां है।

नदी यात्रा संस्मरणों में बहुत पहले पढ़ी किताब है देव कुमार मिश्र की ‘सोन के पानी का रंग‘। नदियों पर लिखी गई किताबें और यात्रा संस्मरण में सोन, जो सिंधु या ब्रह्मपुत्र की तरह नद माना गया है, उसकी परिक्रमा उन्होंने की थी। परिक्रमा का हाल-अहवाल इस किताब में जिस तरह से वे कहते हैं, अपने आप में ऐसा सांस्कृतिक दस्तावेज है, मुझे लगता है कि नदियों पर और यात्राओं पर लिखी गई पुस्तकों में जिसकी भी रुचि है अगर वह इस पुस्तक को नहीं पढ़ पाया है तो वह बहुत अमूल्य रीडिंग से वंचित है। इस पुस्तक को जरूर देखना चाहिए।

नदी यात्रा की एक और पुस्तक हमेशा याद आती है। यह बाकी से एकदम अलग ढंग की, राकेश तिवारी जी की लिखी पुस्तक है। और पुस्तक, वह तो कहने ही क्या, नाम है ‘सफर एक डोंगी में डगमग‘। वे भी गंगा यात्रा करते हैं मगर नदी-नदी, धारों-धार और मजे की बात कि डोंगी, चप्पू खुद चलाते हुए यात्रा करते हैं, इस संकल्प के साथ कि वे पूरा सफर, सफर के दौरान रात्रि विश्राम, डोंगी में ही करेंगे। शायद 62 दिन की वह यात्रा है और किस तरह से यात्रा होती है, अनूठा विवरण है। इस किताब की, इसके लेखन की, अभिव्यक्ति की खास बात यह है कि यों पुराविद राकेश जी, उस तरह साहित्यकार नहीं है। कई बार स्थापित साहित्यकारों में ताजगी का अभाव होता है। राकेश जी को जब पढ़ें, भाषा की, भाव की, अभिव्यक्ति की, दृष्टि की ताजगी और कितना ज्यादा वह इन चीजों में इन्वॉल्व हैं, मगर जितने ज्यादा शामिल, उतने ही तटस्थ हैं। उनका ‘मैं‘ कहीं भी लेखन में हावी नहीं होता और इस कारण उनके लिखे से आत्मीय होने में पाठक को देर नहीं लगती।

‘पवन ऐसा डोलै‘ उनकी दूसरी किताब है वह भी मैंने इस बीच पढ़ी, काफी समय से मेरे पास रखी थी। भाषा को ले कर, लोक को, पुरातत्व को, विभिन्न प्रकार के ऐसे क्षेत्रों को ले कर, एक अलग तरह की पुस्तक और जितने विषयों को, जितने क्षेत्रों को एक साथ और जिस क्रम से पिरोया गया है वह पूरी सभ्यता का उद्भव, गुफावासी मानव, आदिमानव, वहां से लेकर सभ्यता के विकास की भी कहानी है, लोक जीवन की भी कहानी है, पुरातत्व के खोज, शोध और उसके विकास की कहानी है तो कहीं न कहीं, जो सबसे कम दिखाई पड़ती है, अंतर्निहित है, वह पूरी पुस्तक राकेश जी के स्वयं की जीवन यात्रा भी है। बहुत महत्वपूर्ण है।

इस सफरनामे की दो पुस्तकें मैंने और पढ़ीं। एक अजय सोडाणी की, वे पेशे से डॉक्टर हैं। घूमने के शौकीन, वह अपने रोजमर्रा से इतर जिन चीजों को देखते हैं, संस्कृति के जिन पक्षों और आयामों को देखते हैं, उन्हें उनकी देख पाने की, पकड़ पाने की और उसे डॉक्यूमेंट करने की, अभिव्यक्त करने की, जैसी उनकी शैली है और उनके पास अपना, अपने पढ़े का, परंपराओं को, लोक को, जीवन को देखने का, अपना नजरिया है, अपनी शैली है। उसके साथ जब ‘दऱकते हिमालय पर दरबदर’ में अपनी बात कहते हैं तो वह कुछ अलग ही, कुछ खास बन जाती है। ठीक वैसी ही एक किताब मनीषा कुलश्रेष्ठ की है। वे जिस प्रोजेक्ट पर काम कर रही हैं, उससे जुड़ी ‘होना अतिथि कैलाश का‘ पुस्तक लिखी है। मनीषा जी जैसी लेखिका है, जैसी साहित्यकार हैं, वैसी ही घुमक्कड़ भी। प्रोजेक्ट का प्रतिवेदन लिखते हुए यह वृतांत, कहां तथ्यात्मक विवरण और कब साहित्य, कब यात्रा संस्मरण, चीजें इतने सुंदर ढंग से एक दूसरे में शामिल होती जाती हैं और वह पूरा का पूरा कैलाश मानसरोवर की उनकी यात्रा में जो भाव उभरा है, उन्होंने गढ़ा है, पढ़ने में रोमांच होता है और रोचक तो है ही।

युवा लेखकों में कुछ मुझे बहुत प्रिय हैं। सिर्फ मुझे प्रिय नहीं है वे इस दौर के गंभीर, उम्र के चौथे दशक वाले, 40 साल से कम उम्र के लेखक हैं, उनमें आशुतोष भारद्वाज हैं। उनकी पुस्तक ‘पितृ-वध‘ आई, वह इस बीच मुझे पढ़ने का मौका मिला। पुस्तक में जितने गंभीर ढंग से हिंदी साहित्य के अलग-अलग लेखकों की, विचारों की विवेचना है, इसे खास बनाती है और जरूरी भी। पितृ-वध शीर्षक ही अपने आप में बहुत रोचक है, उसे रूपक के बतौर देखें तो दरअसल अपनी ऐसी परंपराओं से मुक्त होने का प्रयास, जिससे कुछ नया-ताजा सृजन संभव होता है। यह पितृ वध कंसेप्ट है, चाहे वह अस्तित्ववाद हो, यह आरंभिक काल से चला आता है। हमारे शास्त्रों में भी दिखता है, आधुनिक लेखन में भी है। उसे पीढ़ियां अपने ढंग से अपनाती हैं।

दूसरे युवा व्योमेश शुक्ल हैं। बनारस को लेकर उन्होंने जो बातें कहीं हैं, रंगमंच पर तो वे हैं ही, कवि हैं, ‘काजल लगाना भूलना‘ और ‘कठिन का अखाड़ेबाज‘ उनकी दो पुस्तकें आई हैं। बनारस वाला अंश दोनों पुस्तकों में है। काजल लगाना भूलना, अपने आप में वह कविता है, गद्य है, गद्य-कविता है या पद्य-गद्य है, कुछ इस तरह की है, लेकिन है पठनीय, गंभीरता की मांग करती। उसमें आपको सोचने की खुराक मिलेगी, उसमें दृष्टि है। और तीसरे युवा लेखक सुशोभित, जिनको इस बीच पढ़ता रहा हूं, उनके लिखे गांधी से बहुत प्रभावित हुआ हूं। यह तीन ऐसे युवा लेखक हैं जिनके किसी भी लिखने पर नजर रहती है, प्रयास करता हूं कि इसमें से कुछ ना छूटे।

दो अनुवाद की चर्चा करूंगा। आप मानें कि नसीहत दे सकने जितना बुजुर्ग हो गया हूं तो खासकर युवा साथी अगर यहां है, यह देख सुन रहे हैं तो कहूंगा कि कोई न कोई एक क्लासिक, किसी विदेशी लेखकों की रचना, अन्य भाषाओं की रचना, कुछ पुराना साहित्य, पारंपरिक और समकालीन, इनका काम्बिनेशन अपने पढ़ने में जरूर रखिए। रस्किन बॉन्ड को, अंग्रेजी में छिटपुट पढ़ता रहा था लेकिन इस बीच स्वाति अर्जुन जी वाले हिंदी अनुवाद से जो रस्किन बॉन्ड आए हैं, मूल की तरह स्वाभाविक। उनका हास्य, आपने देखा होगा, अलग तरह का, बड़ा निर्मल हास्य होता है। हमारे भारतीय हास्य से अलग, पाश्चात्य हास्य है, जो मार्क ट्वेन में, जेम्स थर्बर में देख सकते हैं। इस बीच मैंने फकीर मोहन सेनापति को पढ़ा। उन्हें भी छिटपुट ही पढ़ा था, उनके अनुवाद का एक संग्रह मिला। पढ़ कर लगता है कि उस युग में साहित्यकार, अपने को कितना जिम्मेदार मानता था और रोचकता के साथ, समाज सुधार की भावना के साथ, जो बुराइयां है समाज की उसके साथ, वह किस सुंदर ढंग से बातें कहते हैं।

पुराने क्लासिक है भारतेंदु हरिश्चंद्र, गुलेरी, हजारी प्रसाद द्विवेदी, कुबेरनाथ राय, यह कुछ ऐसे लेखक हैं जो हमेशा मेरे आस-पास अगल-बगल होते हैं और किसी भी संदर्भों के लिए मैं उन्हें देखता रहता हूं। अंत में युवा साथियों के लिए दुहरा कर कहूंगा कि पढ़ने में, अन्य भाषाओं की अनूदित चीज, अन्य भाषाओं का अभ्यास हो तो कोई विदेशी भाषा, देश की अन्य भाषा, कुछ क्लासिक, शास्त्रीय रचनाएं, पुराने लेखकों की रचनाएं, कुछ समकालीन, गद्य-पद्य, इस तरह काम्बिनेशन रखें। इस तरह पढ़ना मानसिक स्वास्थ्य के लिए मददगार होगा।

यह पढ़ाई, मैं कर इसलिए पाया क्योंकि मानसिक रूप से लगा कि इस बीच मेरे पास समय है, वरना जिंदगी तो इसी तरह होती है, बस लगता है कि समय नहीं है। आप सब, जो यहां देख रहे हैं, मुझे सुन रहे हैं, शुक्रिया और यश पब्लिकेशन, जिन्होंने मुझे अपने पेज पर जगह दी, उनका भी बहुत-बहुत आभार, धन्यवाद।

Wednesday, June 9, 2021

मेरी पढ़ाई

1967-68, उम्र 10 साल, कक्षा पांचवीं। तब तक स्कूली किताबों के अलावा पढ़े में याद रह गई दो किताबें हैं।

घर में बांस वाले भूरे कागज की जिल्द लगी, बड़े आकार वाली 167 पेज की पुस्तक थी- ‘ये भी मानव हैं‘। (हिन्दी विश्व-भारती, लखनऊ से प्रकाशित) किताब में दुनिया की अलग-अलग ‘विचित्र‘ जनजातियों के बारे में रेखाचित्र सहित जानकारी थी। अपनी स्कूली किताबों के अलावा जो पहली किताब मेरी याद में है, वह यही है। इसे पढ़ते हुए आत्मविश्वास भी आया कि मैं हिज्जे करते खुद से किताबें पढ़ सकता हूं। अब समझ पाता हूं कि वह बच्चों के लिए, या प्राथमिक समझ के लिए बनाई गई नृतत्वशास्त्र-मानव विज्ञान की किताब थी। मनुष्य को, चाहे वह किसी नस्ल, जाति, धर्म का हो, अधिकतर मायनों में अलग न मानना, उसे अपने जैसा मानव मानना, मेरे साथ यह संभवतः संस्कार में उसी किताब से आया। वैसे यह संयोग भी था कि घर के कुछ बड़े-बुजुर्गों ने इस विषय की पढ़ाई की थी, जिस कारण से यह किताब घर में आई।

इसी दौरान हायर सेकेंडरी कक्षा के विद्यार्थी अग्रजों की डॉ. ईश्वरी प्रसाद की लाल रंग के कवर वाली (राय साहब राम दयाल अगरवाला, इलाहाबाद से प्रकाशित) पुस्तक ‘भारतीय संस्कृति‘ दूसरी किताब, जो हमेशा याद आती है। अपने नाम के लिए यह जान चुका था कि राहुल, बुद्ध के पुत्र थे। इस किताब में पढ़ा कि बुद्ध का जन्म 563 में और मृत्यु 483 में हुई। बहुत दिनों तक यही मानता रहा कि जन्म-मृत्यु उल्टा छप गया है। बात होने लगी तो यह मां को बताया। करीब घंटे भर वे धैर्य से समझाती रहीं कि यह ईस्वी सन तो है, लेकिन ईस्वी पूर्व का हिसाब है, सही है। बड़ी मुश्किल से यह बात समझ में आई और पक्की बैठ गई। शायद प्राचीन इतिहास और संस्कृति में रुचि के बीज यहीं से पड़े।

पांचवीं से ग्यारहवीं कक्षा, सन 1973-74 तक स्कूली पढ़ाई की नवीं कक्षा में पीले रंग के कवर वाली बी एल कुलश्रेष्ठ की भौतिक शास्त्र, भाग एक की अपनी प्रति मिली, पढ़ने पर समझ में आए, न आए, पसंद बहुत थी, लगता है वह अब मिले तो भौतिकी और विज्ञान के सारे नियम समझ में आ जाएंगे। इस दौरान चन्दामामा, पराग, नंदन, दीवाना तेज होते धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, नवनीत, कादम्बिनी, दिनमान, सारिका, माधुरी, बहुत बाद में रविवार और सर्वोत्तम। कभी कभार सरिता, मुक्ता और इलस्ट्रेटेड वीकली पत्रिकाओं का साथ होता। इसी दौरान घर में डेढ़-दो साल एक बांग्ला पत्रिका ‘शुकतारा‘ आती थी। इसके साथ बांग्ला ककहरा-पहाड़ा पुस्तक मिल गई। मां सहपाठी होतीं। ‘शुकतारा‘ में एक चित्रकथा होती थी, नायक बांटुल दि ग्रेट की, बेडौल शरीर वाला। चौड़ा सीना, मानों उसकी सारी ताकत सीने की चौड़ाई में हो। इससे कुछ अभ्यास तब बांग्ला पढ़ने-समझने का रहा। शायद इसके कारण अन्य लिपियां पढ़ने में रुचि हुई।

सोवियत संघ और लाइफ देखते आंखें खुलती कि दुनिया हमारी सोच से अधिक रंग-बिरंगी है। सलाह मिलती कि ज्ञानोदय के पुराने अंक मिले तो जरूर पढ़ना। बहुत बाद में बनारस में भेलूपुर से दुर्गाकुंड के रास्ते में दाहिने मुड़कट्टा बाबा और बाएं भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन का आफिस। वहां ज्ञानोदय का श्रेष्ठ संचयन अंक मिल गया। बनारस में चौक पर चित्रा सिनेमा के साथ मोतीलाल बनारसीदास, दूसरी ओर चौखम्बा, कुछ आगे थाने के साथ विश्वविद्यालय प्रकाशन और ढलान पर बढ़ कर नागरी प्रचारिणी सभा। आप ग्राहक नहीं, बस किताबों में रुचि है, इतने पर ही कितनी पूछ-परख हो जाती है, यहीं देखा।

बात कोई पचासेक साल पुरानी है, अकलतरा में स्कूल के दिनों की। घर में हिन्द पाकेट बुक्स की किताबें आती थीं, उनमें कर्नल रंजीत का खास इंतजार रहता था। इब्ने सफी बी.ए., ओमप्रकाश शर्मा और रानू, राजवंश, समीर से लेकर गुलशन नंदा, कुशवाहा कांत तक किताबें सादुल्ला सर, जगदीश देवांगन जी और मोहसिन भाई से पढ़ने को मिल जाती थीं। मिस्टर ब्लैक की जासूसी और बहराम चोट्टा का नाम सुना और विश लिस्ट में रह गया। इस दौरान की पुस्तक पढ़ना, घटना की तरह याद है उनमें से एक है ‘द सेकंड सेक्स‘। घर में पूछा गया कि ये सब क्या पढ़ते रहते हो। मैंने सहज जवाब दिया, अच्छी किताब है। फिर आगे सवाल-जवाब नहीं हुआ। अंगरेजी में मेरी पढ़ी यह पहली पुस्तक थी। इसी क्रम में मास्टर्स-जॉनसन से भी परिचय हो गया। यह सब हुआ सन 1974 तक। लेकिन स्कूली किताबों से भी रिश्ता बना रहा। बाद में चेईज ने बहुतों को फीका कर दिया। सुरेन्द्र मोहन पाठक को पहले, चेईज-अनुवादक के रूप में ही जाना।

चस्का लगा दर्शन और मनोविज्ञान का। नारमन एल मन, मार्कि्वस वुडवर्थ की हिन्दी अनूदित पुस्तकें मिल गईं, साथ ही ग्रीक दर्शन और भारतीय दर्शन। इस तरह की बात लिखने-बताने वाले ने क्या-क्या पढ़ा होगा, थोड़ी ईर्ष्या, थोड़ी चुनौती, शायद कुछ होड़ सी भी होती और पढ़े हुओं के लिखे को पढ लेने से कुछ काम हलका होगा, भी लगता। ज्ञान की बातें करने वालों का भेद पाने के लिए, मन-बहलाव के लिए, इस तरह भी सोचा जा सकता है, या इस तरह भी कहा जा सकता है। अगल-बगल पढ़ने वालों से नये-नये नाम और पुस्तकों की जानकारी मिलती रहती। किसी किताब की तारीफ मुंह से निकली नहीं कि उस पर दूसरी किताब का नाम आ जाता, कि वो क्या, पढ़ना है तो यह पढ़ो, तब समझ में आएगा। इस बीच कई भागों वाली पुस्तक पहले-पहल हाथ आई चंद्रकांता, संतति, भूतनाथ, रोहतास मठ और प्रेमचंद की मानसरोवर, विविध प्रसंग। आजाद कथा को बहुत दिनों तक प्रेमचंद की कुछ अलग मिजाज की कृति मानता रहा।

यह 1974-75 और 1975-76 वह दौर रहा, जिसमें समझ में आया कि कोर्स की पढ़ाई में कोई दम नही, जो कुछ पढ़ना-जानना है वह तो सब का सब पाठ्यक्रम की पुस्तकों के बाहर है। कुछ समय के लिए कालेज वाली पढ़ाई से नाता टूटा रहा। पढ़ाई की ऐसी समझ और रुचि का स्वाभाविक परिणाम कि दो साल फेल हुआ, लेकिन इससे आत्मविश्वास पर कोई असर नहीं पड़ा, बल्कि अपने पर पहली बार ऐसा भरोसा हुआ कि मामूली परीक्षाओं में फेल हो जाना असफलता कतई नहीं। दूसरा कोई हो कौन सकता है, जो हमारी परीक्षा ले और पास-फेल तय करे, जैसा। शिक्षा-पद्धति और परीक्षा-प्रणाली पर भी भोगे हुए यथार्थ वाले चिंतन की परिस्थितियां बनीं। यह अकलतरा-बिलासपुर का दौर था।

फिर रायपुर आ कर कोर्स की किताबों से भी लगाव होने लगा। धीरे-धीरे समझ में आने लगा कि कला-मानविकी की पढ़ाई में समाज विज्ञान की समझ भी है। वरना स्कूल की पढ़ाई तक मानते थे कि गणित यानि इंजीनियर, विज्ञान तो डाक्टर, कला तो मास्टरी या पटवारी बनेंगे, कामर्स तो है ही वाणिज्य-व्यापार। रामनाथ-केदारनाथ और विमलचन्द्र पांडेय वाली पुस्तकें मिलीं। रायपुर में विवेकानंद आश्रम की लाइब्रेरी में हरि द्विवेदी जी और संस्कृत कालेज में छवि चटर्जी मैडम की उदारता रही। पुस्तक प्रतिष्ठान के ठाकुर साहब और काफी हाउस वाली बिल्डिंग में रायपुर बुक डिपो वाले दुबे जी, कड़क दुकानदार, लेकिन ग्राहक से अधिक ध्यान पुस्तक-प्रेमी पर देते थे। फिर पुराना बस स्टैंड पर रामचंद्र बुक स्टाल के हरीश और मुकुंद भाई। हम दुकान पर खड़े खड़े, पत्रिकाएं पढ़ जाते, कभी-कभी किश्तों में पूरी किताब, मुफ्त। वे जानते, लेकिन कभी मना नहीं किया उल्टे बाखबरी, कि किस पत्रिका में छत्तीसगढ़ के किस साहित्यकार की या रुचि की कोई रचना छपी है, पुस्तक आई है।

डिग्री के लिए डगमग, मगर पटरी पर आती पढ़ाई से साबित करने का मौका मिला कि जो मेरा नाम जोकर कर सकता है, उसके लिए बाॅबी में क्या रखा है। ऐसा मेरे साथ किस तरह, यह कुछ आगे। पढ़ाई की गति और अनुपात में खास फर्क नहीं आया लेकिन अब परीक्षा खेल के नियम कुछ-कुछ समझने लगा। स्नातकोत्तर की पढ़ाई के पहले साल परीक्षा में अंक अच्छे आए, कोर्स की पढ़ाई शायद वैसी नहीं की थी, लेकिन परीक्षा, लिखना, नंबर पाने का तरीका, कुछ-कुछ समझ में आने लगा था। एम.ए. फाइनल की परीक्षा, परचों के बीच हफ्ते-हफ्ते का गैप होता। इन्हीं गैप में इस पार या उस पार वाला प्रयोग करने का मन बन गया। गैप में एक-एक किताबें पढ़ीं, चांद का मुंह टेढ़ा है, कुरु कुरु स्वाहा और प्लेग। प्लेग पढ़ते हुए अवसाद ऐसा गहराता कि किताब बंद कर, गहरी सांस लेना होता या उठ कर थोड़ी चहलकदमी, लेकिन मन किताब में ही अटका रहता और वापस पेज खोल लेता। परीक्षा का परिणाम आया प्रावीण्य सूवी में पहला स्थान, स्वर्ण पदक।

सन 1984 में शासकीय सेवा में आने के बाद अपने पद के अनुरूप जानकार होने का दबाव खुद ले लिया। इसलिए कालेज के छह वर्षों में जितना प्राचीन इतिहास, कला, पुरातत्व नहीं पढ़ा था, पहले-दूसरे साल में पढ़ा। मिराशी, बैनर्जिया, गोपीनाथ राव, बाशम, नेहरू, गुणाकर मुले, परमेश्वरी लाल गुप्त, सांकलिया, कुमारस्वामी, वासुदेव शरण अग्रवाल, ढाकी, कृष्णदेव, लोचन प्रसाद पांडेय, काणे, कीथ, मैक्डानल, मैक्समूलर, मानियर विलियम्स, कावेल, कनिंघम, क्रैमरिश, पर्सी ब्राउन, वासुदेव शरण अग्रवाल, बालचंद जैन, आर सी मजूमदार, चाटुर्ज्या, श्यामाचरण दुबे, टैगोर, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के प्रकाशन, अपने विभाग के प्रकाशन और जर्नल्स आदि आदि और इसके साथ स्थानीय इतिहास, परंपरा से संबंधित, जो कुछ भी मिल जाए।

कुछ और यादें। अमेरिकन इंस्टीट्यूट, रामनगर, बनारस लाइब्रेरी के यादव जी। भोपाल, प्राच्य निकेतन की पंडित मैडम और बुक्स वर्ल्ड के जैन साहब। रविशंकर विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी और वहां सेनगुप्ता जी से अब तक सहयोग मिल जाता है। संस्कृति विभाग के महंत सर्वेश्वरदास ग्रंथालय में सबसे यादगार मूलचंद यादव और अब तिग्गा जी, नीलिमा, टल्लू। बिलासपुर में पीयूष और नरेन्द्र भाई का श्री बुक डिपो और मॉल तो मेरे लिए लाइब्रेरी जैसा ही है।

शास्त्रों के साथ भारतेन्दु, गुलेरी, हजारी प्रसाद द्विवेदी, कुबेरनाथ राय, देथा, रेणु, मनोहर श्याम जोशी, मुक्तिबोध, विनोद कुमार शुक्ल, वैद, निर्मल वर्मा जैसे नामों की छोटी सी सूची है, जो पढ़ूं न पढ़ूं, चाहता हूं कि आसपास साथ बने रहें। आप क्या पढ़ें? पर मेरा सुझाव कि कोई शास्त्र, संस्कृत क्लासिक, विदेशी भाषा, अन्य भारतीय भाषा, क्लासिक हिन्दी, समकालीन लेखन का संतुलन-समन्वय बनाए रखें।

एक घोर पढ़ाक समाजवादी बुद्धिजीवी भाई साहब ने डेलरिम्पल की सिटी आफ जिन्स पढ़ने को दे दी, उनका मन रखने, न कि पढ़ने, ले आया। ठीक से खोला भी नहीं। कुछ दिन बाद लगा कि पूछेंगे, जवाब देने लायक उलट-पलट लूं। शुरू करने के बाद जब तक किताब पूरी नहीं हुई, मन इसी में लगा रहा। पढ़ कर जो दिल्ली समझा, उससे अधिक यह समझ में आया कि डेलरिम्पल ने भारत और भारतीय सोच को जिस तरह आत्मसात किया है वह दुर्लभ है। (दूसरी, सिटी आफ जाय ‘आनंद नगर‘, जिसके घबरा देने वाले लिजलिजेपन से उबर नहीं सकते और न ही पुस्तक को नापसंद कर सकते।)

भाई साहब से मुलाकात हुई, किताब का जिक्र आने पर उन्होंने कहा कि वह तुम्हें पसंद आई हो तो रख लो, तुम्हारे पास रहनी चाहिए। (इसी तरह कभी जिक्र हुआ कि मुझे नरोन्हा जी की बहुत पसंद है, अपने संग्रह में रखना चाहता हूं, मिल नहीं रही है। भाई शिवाकांत बाजपेयी तब भोपाल में थे, यह पता लगते ही पुस्तक खरीद कर उपहारस्वरूप भेज दी। बाद में इसका हिन्दी अनुवाद ‘एक अनाड़ी की कही कहानी भी मिल गई।) फिर वे गंभीरता से कहने लगे, कभी ऐसा नहीं लगता कि पढ़ने को बहुत महिमा-मंडित किया जाता है, थोड़ी कामचोरी और आरामतलबी के बावजूद सम्मान रहे ...? इस पर सोचते हुए बार-बार लगा कि लालसा ही तो है पढ़ना, पढ़ते रहना, पढ़ा हुआ बनना।

किताब की दुकानों पर, लाइब्रेरी में और इस बहाने न पढ़ रहे हों तो भी यादों में, किताबों के साथ बने रहने का सुख, बस। ‘माघे मेघे गतं वयः, अब कभी इसका मोह भी छूटता-सा जान पड़ता है तो अचानक आकर्षण की हिलोर भी। सूचना-जानकारी बनाम समझ-बूझ, अपरा-वैखरी-मध्यमा बनाम पश्यंती-परा। सब कुछ ढाई आखर में बदल जाए, अन्यथा निरर्थक। पुस्तकें, जो बहुत पसंद थी, याद रह गई, और जो इससे भी ज्यादा पसंद थी, शायद वह रच-पच गई।

Wednesday, May 12, 2021

कोरोना में गांधी

कोई साल भर से गांधी को पढ़ता रहा हूं। उनकी, उन पर लिखी किताबों से या संपूर्ण वांग्मय से। बीच-बीच में बदलाव के लिए ब्रजकिशोर जी की गांधी वाली पोस्ट। कुछ सुना, कुछ समझा, जो नहीं समझा वह प्रशांत किशोर के शब्दों में- ‘अगर आप उनकी बात को नहीं समझ पा रहे हैं तो इसका मतलब है कि आपमें और पढ़ने की, मेहनत करने की, समझ को डेवलप करने की जरूरत है।‘ फिलहाल जो थोड़ी बात समझ सका वह है, कोई वस्तु/सुविधा आवश्यक न होने पर भी, वह हमें सहज उपलब्ध हो जा रही है और उसे हासिल करने में समर्थ हैं, महज इस कारण, उसके प्रति लालायित न हो जाएं यानि संयम। व्यक्तिगत सत्याग्रह, आत्म-अनुशासन के बाद ही समाज-उन्मुखता। आत्म-निर्भरता, स्वावलंबन, अपने आसपास के छोटे-मोटे काम खुद करना आदि प्रयोग। इसे सार्थक करने का अवसर दिया कोरोना के लाॅकडाउन ने। स्कूली पढ़ाई के दिनों में और फिर बाद में हाॅस्टल में रहते हुए कई ऐसे काम स्वयं करने का अभ्यास था, जो अब छूट गया था। इस दौरान वह सब फिर से शुरू करने और कुछ नये काम सीखने का प्रयास किया।

स्कूली दिनों में आटे की लोई को चपटा कर बेलते हुए, बेलन के नियंत्रण से रोटी को गोल घुमा लेना सीख लिया था, हाॅस्टल में यह सिर्फ मैं कर पाता था, इसलिए मुझे और कोई काम नहीं करना पड़ता था, मसलन झाड़ू, बर्तन मलना आदि। ढेंकी-जांता, चलनी के साथ सूप का काम भी आता था, यानि चालना, पछिनना, फटिकना, हलोरना आदि, जो अब भूल चुका था, अभ्यास तो रहा ही नहीं। थोड़े प्रयास से यह कौशल वापस पा लिया है। कार धोने का काम नया सीखा है, बहुत आनंद का होता है, गांधी जी ने यह आनंद कभी लिया था? पता नहीं।

बर्तन धोना अब बहुत आसान है, कालिख नहीं होती, असरदार साबुन और पानी भी सुलभ है। अपने हाथ के धुले साफ कप में चाय पीने और बर्तन में खाने का स्वाद ही कुछ अलग होता है। एक बार बाथरूम साफ करने जाइए और फिर थोड़ी देर बाद साफ-सुथरे चमचमाते उस कक्ष को इस्तेमाल करने, देखिए क्या आनंद आता है। कोरोना काल में ऐसे ढेरों सत्य के प्रयोग हो रहे हैं। गांधी को पढ़ना सार्थक हो रहा है।

पिछले साल सेवानिवृत्त होने पर लोग पूछते थे, इसके बाद क्या करेंगे, ऐसा कभी सोचा नहीं था, लेकिन पता था कि कुछ न कुछ तो करता ही रहूंगा। हां! लोगों को जवाब के लिए प्रश्नकर्ता के अनुरूप एफएक्यू के चार-पांच एफए जवाब बना रखा था, जिससे इस विषय पर अधिक बात न हो, पूछने वाला संतुष्ट हो जाए और न हो तो कम से कम यह समझ ले कि इस मुद्दे पर इस बन्दे से बात करना निरर्थक है। जैसे, अक्सर बताने के और करने के काम अलग होते हैं, इसलिए अब बताने वाले नहीं, करने वाले काम करूंगा या सेवानिवृत्ति होती ही इसलिए है कि चलो बहुत कर लिया, जो करना था, या देखता हूं कब तक बिना कुछ किए अधीर नहीं होता। या किसी ने कहा है- ‘निष्क्रियता ही उच्चतर बुद्धिमत्ता है और कर्म अधैर्य का सूचक।‘ और फिर ‘कुछ करने की उत्सुकता अधैर्य की निशानी है।‘ आदि। वह दौर तो बीत गया। अब कोई नहीं पूछता, लेकिन सोच में पड़ा रहता हूं कि लाॅकडाउन के बाद यह सब काम छूट जाएगा? फिर करूंगा क्या!

मंजूर न करूं तो भी यह आत्मश्लाघा है ही लेकिन इसे जो सोचकर सार्वजनिक कर रहा हूं उसका कारण कि- मेरे कुछ सच्चे प्रतिस्पर्धी हैं। मेरे साथ उन्हें कुछ ऐसी होड़ है कि मुझे 100 बुखार हो तो वे खुद के लिए 102 चाहेंगे और 101 के बिना तो चैन ही न लें। वे चाहे गांधी न पढ़ें, मगर उसका मुझ पर हो रहे असर के साथ मुकाबिल होने की चुनौती स्वीकार करें, इसी आशा से...

Saturday, April 17, 2021

अद्वैत का द्वंद्व

‘हैट टांगने के लिए कोई भी खूंटी काम दे सकती है। उसी तरह अपने मनोभावों को व्यक्त करने के लिए कोई भी विषय उपयुक्त है।‘ जी हां, यह पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी के प्रसिद्ध निबंध ‘क्या लिखूं?‘ में आया है। उन्होंने इसमें कहा है कि यह निबंध नमिता के आदेश और अमिता के आग्रह पर लिखा गया, जिन्हें क्रमशः ‘दूर के ढोल सुहावने होते हैं‘ और ‘समाज-सुधार‘ पर आदर्श निबंध लिखना था। इसी तरह हजारी प्रसाद द्विवेदी का ‘नाखून क्यों बढ़ते हैं‘ आरंभ होता है- ‘बच्चे कभी-कभी चक्कर में डाल देने वाले प्रश्न कर बैठते हैं। ... मेरी छोटी लड़की ने जब उस दिन पूछ दिया कि ...‘। बच्चों की फरमाइश या सवाल के जवाब में ऐसे कुछ अनमोल निबंध आए। बड़े लोगों की बड़ी बातें। मगर, कहा जाता है कि आपकी बात 5-6 साल के औसत बच्चे को समझ में आ जाए, समझा सकें, तभी जानिए कि आपने खुद ठीक समझ लिया है।

दो घटनाएं याद आती हैं। पहली, कार्डेटा और नान-कार्डेटा। दो बच्चों में से एक, बड़े को स्कूल में पाठ पढ़ाया गया था, वह छोटे को समझा रहा था, छोटा समझने को तैयार नहीं। मैंने मदद करनी चाही, कहा कि हड्डी वाला, कड़ा हो वह कार्डेटा और मुलायम, लिजलिजा, गिजगिजा है वह नान-कार्डेटा। आई बात समझ में। बच्चे ने अपनी समझ का सबूत देते हुए, मेरे समझाने को ध्वस्त करते हुए उदाहरण से बताया- घोंघी, कार्डेटा और छिपकिली, नान-कार्डेटा। सुधार हुआ, जो उपर मुलायम अंदर कड़ा वह कार्डेटा और उपर कड़ा अंदर मुलायम वह नान कार्डेटा। मजबूत आदमी भी अक्सर बाहर से मुलायम तो, खैर ...। दूसरी कि बच्चों को स्वर और व्यंजन में फर्क बताने का प्रयास किया जा रहा था, और बात बमुश्किल उदाहरणों अ, आ, इ, ई और ए, ई, आई, ओ, यू पर आ कर अटक जा रही थी। एक बच्चे को सूझा, मतलब यह कि जो आवाज गले से आए वह स्वर और जिसमें जीभ और होंठ के साथ दांत और तालू में भी हरकत हो वह व्यंजन।

बच्चों के प्रश्नों में जिज्ञासा, तर्क और समझ की तलाश के लिए होती है। कभी इसलिए भी कि स्वाभाविक सी क्रिया, परिस्थिति, घटनाओं में भी कार्य-कारण संबंध तो होता है, लेकिन वह अक्सर स्पष्ट-प्रकट नहीं होता, बच्चे उसे जानना-समझना चाहते हैं। प्रसंगवश बाथरूम सिंगिंग और टायलेट थिंकिंग की तरह एक अदा होती है, प्लेटफार्म चिंतन। ऐसा तब होता है, जब स्टेशन पर पहुंचने के बाद पता लगे कि गाड़ी लेट है और लेट होती जा रही है। ऐसा ही कुछ हुआ, जिसमें बच्चे की पार्श्व सोच यानि लैटरल थिंकिंग का एक उदाहरण आया।

एक सज्जन बताने लगे कि उनकी बच्ची जब भी स्टेशन से वापस लौटती, तो पूछती कि हर गाड़ी सड़क के ऊपर चलती है, लेकिन रेलगाड़ी क्यों नहीं। उसे समझाया जाता कि रेलगाड़ी की सड़क पटरी है, वह पटरी पर चलती है, लेकिन उसकी जिज्ञासा शांत नहीं होती। बात आई गई। प्लेटफार्म चिंतन में चर्चा होने लगी कि बच्ची ऐसा क्यों पूछती थी। बच्ची अब युवती थी और खुद भी यह भूल चुकी थी। अलग-अलग संभावनाओं पर विचार होता रहा और उसे सुझाया जाता रहा, बात नहीं बनी। एक बात आई, कहीं ऐसा तो नहीं कि वह प्लेटफार्म को सड़क मानती थी और सोचती थी कि यही एक ऐसी गाड़ी है जो सड़क के ऊपर नहीं, नीचे चलती है। युवती ने सुना और दस साल बाद जिज्ञासा के उसी उम्र में पहुंच गई, चहक पड़ी, यूरेका।

आगे बातों की राह तो सूझ रही है किंतु बहकने-भटकने की मान्य सीमा तक छूट लेते हुए ...। कहा जाता है कि पैडगरी (पांव-पांव रास्ता), सीधी-सरल हो तो वह मवेशी के चलने का रास्ता और टेढ़ी-मेढ़ी हो तो मानुस की। उसमें भी राह राह कपूत और राह छोड़ सपूत। तो, याद आ रहा है कि एक मास्टर साहब के पुत्र ने प्रथम श्रेणी में भौतिकशास्त्र स्नातकोत्तर की परीक्षा पास की, साहबजादे यानि मास्टरजादे फूले नहीं समाते, मानों सब कुछ पा लिया। लेकिन पिता को उनके रोजगार की चिंता सताती रहती। पीढ़ी की सोच और यों भी पिता-पुत्र का रिश्ता सार्थक तभी होता है, जब शाश्वत मतभेद सतह पर आने लगे। पुत्र, अपनी प्रथम श्रेणी स्नातकोत्तर उपाधि की शान में रहते, पिता से भिड़ गए। पिता ने कहा- घर का पंखा बिगड़ा हुआ है, बना सकता है तो सुधार, नहीं तो कम से कम मिस्त्री ही बुला ला।

इसी तरह दो व्यवसायी पिता, जिनमें एक का साबुन कारखाना था और दूसरे का बर्तन की दुकान। संयोग से दोनों के बच्चे पढ़ाई में तेज निकले। बी स्कूल और एम स्कूल का जमाना नहीं आया था। अच्छे नंबर आए तो इंजीनियरिंग कालेज में दाखिला मिल गया। बात आई ब्रांच की। पिता-पुत्र ‘द्वन्द्व समास‘ के ‘शाश्वत भाव‘ को प्राप्त न हुए थे। पुत्र, अब तक आज्ञाकारी थे, पिता से आदेश मांगा। साबुन वाले पिता ने समझा कि केमिकल ब्रांच सही होगा और बर्तन वाले ने ताड़ा कि मेटलर्जी ब्रांच हो तो खरीदी-बिक्री में कोई ठग न सकेगा। आगे की कहानी है दर्दनाक, लेकिन लोग उनकी हंसी उड़ाते ‘ट्रेजिकॉमेडी‘, इसलिए यहीं रुक कर, वापस पटरी पर।

जशपुर की अंकिता जैन लेखिका हैं। फेसबुक पर उनकी रोचक पोस्ट यहां खूंटी बनी, जिसमें उनके लाड़ले अद्वैत ने जिज्ञासा की- ‘सब्जी और फल में क्या अंतर होता है?‘ अंकिता जी ने समझने की कोशिश करते, समझा, समझाया, बहलाया। लेकिन बात नहीं बनी। फिर टाला मौसी पर। मौसी का वनस्पतिशास्त्रीय जवाब कि लौकी, कद्दू आदि भी तकनीकी रूप से फल ही हैं। मगर अंकिता जी की समस्या बनी हुई है, कहती हैं- फिलहाल उसे समझाकर सुला दिया है कि ‘सब्जी मतलब जो किसी के साथ खाते हैं, और फल मतलब जो अकेले खा लेते हैं‘।

कुछ गफलत है, खेंढ़ा, इसके पत्ते, तना और जड़ को भी पका कर खाया जाता है और इस तरकारी को सिर्फ ‘जड़ी या जरी‘ भी कहा जाता है। छत्तीसगढ़ी गीतों में खान-पान और साग-सब्जी के कई गीत हैं, इनमें एक मजेदार गीत है- ‘रमकेरिया म राजा राम बिराजे, जरी म/सेमी म सीता माई।‘ छत्तीसगढ़ में महिलाओं के आपसी मुलाकात पर औपचारिक आरंभिक वाक्य होता है- का साग रांधे, दीदी/गोई?

सुमित्रानंदन पंत की कविता ‘ग्राम श्री‘ के अंश, जिसमें फल-सब्जियों को, बिना भेदभाव एक साथ समेटा है, को याद कर लेने का यहां अवसर बना है-

अब रजत-स्वर्ण मंजरियों से
लद गईं आम्र तरु की डाली।
झर रहे ढाँक, पीपल के दल,
हो उठी कोकिला मतवाली।
महके कटहल, मुकुलित जामुन,
जंगल में झरबेरी झूली।
फूले आड़ू, नीबू, दाड़िम,
आलू, गोभी, बैंगन, मूली।

पीले मीठे अमरूदों में
अब लाल लाल चित्तियाँ पड़ीं,
पक गये सुनहले मधुर बेर,
अँवली से तरु की डाल जड़ीं।
लहलह पालक, महमह धनिया,
लौकी औ' सेम फली, फैलीं,
मख़मली टमाटर हुए लाल,
मिरचों की बड़ी हरी थैली।

फिर भी कह सकते हैं कि अधिकतर सीधे खाने वाले फल के बहुवर्षीय वृक्ष होते हैं जबकि सब्जी वाले फलों के मौसमी, कम आयु वाले पौधे होते हैं। खाने वाला फल सामान्यतः मीठा होता है। पकने के पहले कसैला, खटमिट्ठा फिर मीठा, या खटमिट्ठा या खट्टा। लेकिन पका कर सब्जी के रूप में खाए जाने वाले फल फीके स्वाद वाले होते हैं। खाने वाले फल सामान्यतः सीधे, बिना नमक-शक्कर, मसाले के खाया जाता है या खाया जा सकता है, उन्हें पकाने यानि कुक करने की आवश्यकता नहीं होती। सीधे खाने वाले फल और सब्जी पका कर (यानि राइप नहीं कुक) खाए जाने वाले फल में यह अंतर भी बताया जा सकता है कि ऐसे दोनों फलों का आकार तो बदलता है लेकिन सीधे खाने वाले फल का रंग और स्वाद बदल जाता है, जबकि सब्जी वाले फलों का रंग और स्वाद लगभग वैसा ही बना रहता है। कुछ खास उदाहरणों में टमाटर, जो चटनी, प्यूरी, केचप या सपोर्ट, टेस्ट मेकर होता है, स्वयं पूरी तरह स्वतंत्र सब्जी नहीं। इसी तरह नीबू, करौंदा, मिर्च आदि सब्जी के बजाय मुख्यतः शर्बत, अचार, चटनी, मुरब्बा बनते हैं, उन्हें खींच-तान कर सब्जी बनाया जा सकता है और कान पकड़ कर किसी को खिलाया भी जा सकता है, लेकिन ये सब टमाटर की तरह स्वतंत्र और बिना सहयोगी के, आत्मनिर्भर सब्जी में शामिल नहीं हो सकते।

खान-पान की बात हो तो मुंह में पानी आ जाता है, मगर सब फीका, बात तब तक नहीं बनती, जब तक मीठा-नमकीन न हो। ध्यान रहे कि मीठा यानि नमकीन? छत्तीसगढ़ी में कहा जाता है- ‘मिठात नइ ए, नून बने नइ जनाए हे।‘ मारवाड़ी में नमक फीका होने पर कहने का प्रचलन है- थोड़ा मीठा (जी हां, यानि नमक) और डालो। गुजरात का मीठापुर तो नमक उत्पादक है ही। वस्तुतः मीठा यानि स्वाद, स्वाद यानि षटरस का संतुलन। हमारी जिह्वा, स्वाद इंद्रिय ही ऐसी है, जो जन्म के साथ सक्रिय हो कर मृत्यु तक क्षीण नहीं होती। यह व्यक्ति के संयम-अनुशासन की सहज और सबसे विश्वसीय चुगली भी कर सकती है।

बात की बात, यह कि अंकिता जी की किसानों पर एक पुस्तक ‘ओह रे! किसान‘ है। अब फल-सब्जी पर कम से कम पूरा लेख उनकी ओर से आना रोचक होगा। आवश्यकता अविष्कार की जननी है और ऐसी जिज्ञासा, जहां सुई अटक जाए फिर तो देर-सबेर बात बननी ही है। उनकी एक पुस्तक ‘ऐसी-वैसी औरत‘ है, लेकिन वे ऐसी वैसी नहीं, समर्थ जीवन साथी वाली, अद्वैत की जननी और ‘मैं से मां तक‘ पुस्तक की भी लेखिका हैं।

Saturday, April 3, 2021

जगन्मिथ्या

(‘हंस‘ पत्रिका के नवंबर 2020 में प्रकाशित कहानी)

अम्मां ने टीवी म्यूट कर दिया। दीवार पार मुझ तक आवाज आ रही थी। मैं आवाज कम करने को कहता हूं। एक बार, दूसरी बार, तीसरी बार ...। इससे अधिक ऊंची आवाज में कहना नहीं चाहता। शायद टीवी की आवाज में मेरी आवाज खो जा रही है या वह मान ले रही होंगी कि टीवी पर चल रहे दृश्य में पृष्ठभूमि से आवाज आ रही है। कई बार ऐसा होता है कि वे बिना किसी को संबोधित किए, 'जो चाहे सुन ले', वाले स्वर में पुकारती हैं- देखो, दरवाजे पर कौन आया है, जबकि काल-बेल टीवी में बजा होता है। वे यह भी जानती हैं कि इस समय कोई नहीं आने वाला। बस कोरियर वाला है, जो कभी भी आ जाता है। हर हफ्ते मेरे लिए कोरियर आना ‘शायद‘ उन्हें पसंद नहीं। शायद, क्योंकि उनकी पसंद-नापसंद का अंदाजा लगाना आसान नहीं। इस बारे में कोई राय पुख्ता होने लगे तब तक ऐसा कुछ सामने आ जाता है कि उस पर टिका रहना मुश्किल होता है। शायद वे नहीं चाहती कि हमेशा कोरियर से कुछ मंगाया जाता रहे, फिर भी कौन आया है, के साथ क्या आया है? यह उन्हें बेचैन करता है। कई बार लगता है कि वे ‘देखो, कौन है‘ कहने का बहाना खोजती हैं और अपना होना, मेरा होना के अलावा दरवाजे पर किसी और के होने का आभास एक साथ टटोल लेना चाहती हैं। उनका ‘देखो, कौन है‘ कहने का अंदाज, संभावित आने वाले के प्रति अस्वागत की चुगली कर देता है। ऐसा करना उन्हें अभ्यास से आया है, वे ऐसा करना जानबूझ कर करना चाहती हैं या ऐसा हो जाता है, जैसा वे करना नहीं चाहती, तय नहीं हो पाता। कभी ऐसा भी होता है कि मैं किताब पर निगाह टिकाए, अपना मोबाइल टटोलने लगता हूं। दरअसल यह घंटी मेरे फोन की नहीं, टीवी के किसी दृश्य के साथ बज रही होती है।

अम्मां ने अब टीवी म्यूट कर दिया है। मुझे लगता है कि उन्होंने मेरी बात सुन ली है और शायद थोड़ा चिढ़ कर टीवी को म्यूट किया है। छोटा सा सन्नाटा। और फिर खुद बात करने लगी हैं। किससे बात कर रही हैं? किसी से फोन पर? मेरा ध्यान किताब से उचट गया है। आवाज, जो साफ सुनाई नहीं दे रही है, सुनकर समझना चाह रहा हूं। दीवार पार ‘देखने‘ की कोशिश कर रहा हूं। समझ नहीं पा रहा। अम्मां दूसरी भाषाओं, अंगरेजी या किसी भी भाषा का कार्यक्रम देख सकती हैं, देखती हैं। बिल्कुल समझ में न आती हो ऐसी दूसरी भाषा की फिल्में, सीरियल और कई बार समाचार भी देखना उन्हें भाता है। यह शायद इस सुविधा के कारण कि पात्र, परदे पर अपनी मनमानी करते रहें, लेकिन वे क्या कहेंगे, उन्हें क्या कहना चाहिए यह तय करने की छूट वे अपने हिस्से में ले लेती हैं। कई बार पात्रों की भाव-भंगिमा, उनके सोचे, मन में चल रहे संवादों के अनुरूप न हो तो मान लेती कि उसका अभिनय अच्छा नहीं है। ऐसा भी होता है कि किसी पात्र की बातें उन्हें पसंद न आ रही हों तो वे अपने को रोक नहीं पातीं, दृश्य चलने देती हैं और म्यूट कर उसे समझाइश देती हैं, कभी डांट-फटकार लगाती हैं तो कभी अफसोस जताने या संवेदना प्रकट करने के लिए भी टीवी म्यूट कर देती हैं।

टीवी जब तक म्यूट नहीं होता, अपनी आवाज के साथ कमोबेश पूरे घर में बिखरता रहता है। म्यूट होता तो सिमट जाता, तब कुछ देर के लिए, मानों अचानक, नल से पानी टपकने की आवाज, घड़ी की टिक-टिक और पंखे का घट्ट-घट सुनाई पड़ने लगता। आंख की अपनी सीमा है, टीवी देखना हो तो सामने रहना जरूरी। न देखना हो तो बस पलकें मूंद ली, नजरें घुमा ली, मुंह फेर लिया। देख कर अनदेखा भी किया जा सकता है। आंखें, आईना ही तो हैं। आंखों में बनी तस्वीर को दिमाग उल्टाल-सीधा करता रहता है। मगर कान हमेशा जागता रहता है। उसे हमारे जागे-सोए होने से फर्क नहीं पड़ता। इयरफोन लगा कर कान मूंद लो, कुछ और सुनने लगो फिर भी टीवी की आवाज आती रहेगी, जेसे रेडियो पर दो स्टेशन एक साथ बज रहे हों।

दीवारों के कान होते हों या न हों, कान की पहुंच दीवारों के पार भी होती है। ऐसा आंखों के साथ नहीं होता। इसलिए रेडियो के साथ उससे दूर जाने की छूट है, लेकिन टीवी अपने पास, अपने सामने बिठाए रखता है। अम्मां पुकारतीं- सुनो तो। उस पुकार के जवाब में सिर्फ हां कहने से बात न बनती, अम्मां हां का जवाब सुन लेतीं फिर भी आवाज देती रहतीं। उनकी पुकार सुन कर कोई उन तक पहुंच जाए, उनके पास खड़ा हो तब भी बात नहीं बनती। उनकी नजरें टीवी पर जो होती हैं। बात तब बनती, जब अम्मां मुड़ कर देख लें या वह उनकी आंखों के सामने पहुंच जाए। सामने आने पर नजर भर देख लेतीं, तब मानतीं कि सुन लिया है। फिर समझाना शुरू करतीं- देखो! इस ‘देखो‘ का मतलब होता, ध्यान से सुनो। अम्मां की आंखों सुनी, कानों देखी दुनिया।

कभी अम्मां कहती रहती थीं, उन्हें टीवी देखना पसंद नहीं और दिन भर मोबाइल हाथ में लिए रहना, चोचले से भी उन्हें कोफ्त होती है। काम-धाम छोड़ कर टीवी से चिपके रहना, जैसी निठल्लाई कुछ नहीं। बेमतलब के समाचार, जिनसे कोई लेना-देना नहीं, देखते रहो। उस पर भी बकवास बहसें। खुद भी उलझ पड़ो। खेल कोई खेलना नहीं और घर बैठे क्रिकेट, फुटबाल करते रहो। घर-घर और सास-बहू, एक पर एक बंड, एक से एक डग आगे कुलटा। बड़े बनने वालों की फूहड़ बातें और हरकत। मोबाइल ने सब का दिन-रात हराम किया हुआ है। बात सिर्फ बातों तक थी, तब तक तो फिर भी गनीमत थी। अब तो सब कुछ मोबाइल। यहां तक कि बच्चों को मोबाइल छोड़ पढ़ने को नहीं कह सकते। पढ़ने को कहा कि बस मोबाइल हाथ में। कान में इयर-फोन, फिर बच्चे कहां किसी की सुनने वाले। क्या जमाना आ गया।

सचमुच, क्या जमाना आ गया। घर में बच्चे पढ़ने वाले। सब औरत-मर्द कामकाजी। सुबह होते एक-एक कर अपने काम पर निकलने लगते और बारी-बारी काम वाली बाई आने लगतीं। एक झाड़ू-पोंछा के लिए। एक कपड़ा-बर्तन के लिए। एक खाना बनाने के लिए। और एक, अब हो गई थी मालिश वाली, अम्मां की चहेती। अम्मां और उसकी बातें, दरयाफ्त, पड़ोसियों और मुहल्ले भर की खोज-खबर, फुटकर सामान लाना-ले जाना, कुल मिला कर उसके इतने काम होते थे कि उसे किस काम वाली कहा जाए, तय नहीं हो पाता था। अब मालिश भी करने लगी थी, इसलिए नाम हुआ मालिश वाली। घर के बाकी लोग, इन सबको इसी तरह जानते-पुकारते थे। अम्मां सबका नाम जानती थीं और उनके नाम से बुलाती थीं।

अम्मां को इन काम वाली बाइयों के असली नाम, यानि मायके वाले, पुराने, शादी के पहले वाले नाम भी पता थे। मगर वे उन्हें उनके गांव पर बने नाम से पुकारती थीं। मालिश वाली बेलसपुरहिन थी। झाड़ू-पोंछा वाली ने काम छोड़ा और उसकी जगह नई, उम्रदराज बाई आई, यह भी बेलसपुरहिन थी। अम्मां ने रास्ता निकाला, पहले तो कुछ दिन उसे असली नाम ‘मंगली‘ कह कर पुकारा। वैसे यह भी उसका असली नाम न था। वह बिलासपुर के मंगला की रहने वाली थी। ‘मंगली‘ यों तो छोटा नाम था, मगर इस नाम से बुलाना उन्हें सहज नहीं लगता था। इसी बीच किसी ने उनसे कह दिया कि रोज-रोज, बार-बार मंगली-मंगली क्यों उचारती रहती हो। बेवजह मंगल-अमंगल का फेरा। उस दिन से बूढ़ी बेलसपुरहिन, नवेली हो कर छोटी कहाई और मालिश वाली युवा, घर में पहले आमद दर्ज, बड़ी कहाने लगी, दोनों के नाम के साथ का बेलासपुर कुछ ही दिनों में जाता रहा।

नापसंद के बावजूद अम्मां टीवी के सामने बैठने लगी। रिमोट हाथ में, चैनल भी खुद से बदलने लगीं। क्या करें! ‘इस घर‘ में तो किसी के पास समय नहीं, कोई खाली नहीं बात सुनने को। अम्मां कहतीं। इस घर पर इतना जोर होता, मानों उन्हें पता हो कि बाकी पारा-पड़ोस में क्या होता है। या शायद वे इस बहाने उस घर, अपने घर यानि मायके को, मायके के दिनों को याद कर लेती थीं। उनका ऐसा कहना सपाट-सा होता कि उसमें कोई कुढ़न-अफसोस नहीं पकड़ा जा सकता था। अम्मां ठीक ही कहती हैं, कहानी कहने को नानी-दादी हैं तो बच्चे कहां रह गए सुनने वाले। यहीं प्रवेश होता है, मालिश वाली का। वह मालिश वाली तो बाद में हुई। पहले वह कहानी सुनने वाली बन कर आई थी। जब उसका महीना तय हुआ कि वह रोज शाम एक घंटे के लिए आएगी और अम्मां से कहानी सुनेगी। सिलसिला चल निकला। अम्मां कहतीं- सबकी अपनी रामकहानी।

अम्मां शाम की चाय पी कर बरामदे में आ जाती थीं। ठीक समय पर मालिश वाली आती। जै-जोहार के बाद अम्मां की कहानी कथावाचक-सूत्रधार घोषणा के साथ शुरू होती- ‘आज हम अमुक की कहानी कहेंगे‘, कहानी सुनाएंगे नहीं, कहानी कहेंगे। अमुक होते- राजा हरिश्चन्द्र, भक्त प्रहलाद, लक्ष्मीबाई, शिवाजी महराज, भीष्म पितामह, महाराणा प्रताप, मीराबाई ... ...। महीना तय हुआ, उसमें मालिश वाली के लिए चाय की शर्त नहीं थी। मगर कहानी सुनते-सुनते वह ऊंघने लगती। अम्मां ने इसका बुरा नहीं माना, बल्कि बीच में पांच मिनट का इंटरवल होने लगा, जिसमें मालिश वाली के लिए चाय आ जाती। मालिश वाली जो ठीक चार बजे आती और पांच बजे, चाहे कहानी अधूरी रहे, लौट जाती थी, अब चाय के एवज में कुछ देर होने पर भी न सिर्फ रुकी रहती, अड़ोस-पड़ोस का बुलेटिन सुना जाती। छोटे-मोटे सौदा-सुलुफ निपटा देती। इस तरह वह कहानी सुनते, निठल्ली पगार पाने वाली से, काम कर पैसा कमाने वाली बन गई।

पुरुष विभाग में दूध वाला, पेपर वाला, धोबी और माली थे। इनका नाम रामू या छोटू होता। बालिग हो तो रामू और कमसिन हो तो छोटू। कभी-कभी ऊंचाई में कम हो वह भी छोटू हो जाता था। इन सबके आने का समय अलग-अलग था। पहले अखबार वाला, फिर दूध वाला रोजाना। माली उसके बाद, हफ्ते में एक बार दोपहर तक और शाम को धोबी, हफ्ते में दो बार। इनके आने का समय अलग-अलग और इतना निश्चित था कि इनमें से कोई भी शायद एक-दूसरे को न जानता हो और जानता भी हो तो यह नहीं जानता होगा कि इस घर में जहां उसका आना-जाना है, दूसरा भी इसी घर में आता है। धोबी खुद आता या उसका लड़का छोटू। फिर भी नागा बस उसी का होता था। उसके बढ़ते नागे को देखते हुए दूसरे धोबी पर भी समानांतर विचार होने लगा था।

माली, देस जाता तभी नागा होता। ऐसा हर साल और साल में बस दो बार होता। पूरे साल में कुल दो नागा। साल की बावन में से पचास हाजिरी। इसलिए उसे नागा नहीं माना जाता। दूध वाला और पेपर वाला खुद नहीं आते, तो उनके बदले कोई दूसरा आता होगा। दूध वाला, ऊंची आवाज में ‘दूध‘ कहता और लापता हो जाता। पेपर वाला, चुपचाप पेपर फेंक जाता, ध्यान रहे तभी थोड़ी आहट पता लगती। कभी-कभार ही उसे देख पाते, उसके अस्तित्व में उस खुद से ज्यादा उसका फेंका हुआ पेपर होता। इसलिए उसके बदले कोई और पेपर फेंक जाता तो भी फर्क न पड़ता। पेपर वाला पहली तारीख को नियम से बिल ले कर आता, मान लेते कि वही ‘पेपर वाला‘ है। अम्मां पेपर को गजट कहतीं और बाबूजी से सुना था 'अखबार'। इस तरह समाचार-पत्रों से हमारा रिश्ता भी कुछ-कुछ फर्क था। अम्मां कहतीं- सबहिं नचावत राम गोसाईं।

एक सदस्य डागी था। घर में चली आ रही पिछली कई पीढ़ियों का वंशज। यह एक ऐसा था जिसका नाम हमारे, अम्मां के और सभी के लिए एक ही, ‘डागी‘ था। उच्चारण में जरूर फर्क होता। वह अंतर डा से डॉ होते डो के बीच का। इस तरह वह डागी, डोगी और इसके बीच वाले उच्चारणों से चार-पांच नाम वाला माना जा सकता था। डागी बहुत छोटा था, शायद उसे ठीक से मालूम भी न रहा हो कि उसका नाम भी है तब इस प्रस्ताव पर विचार हुआ था कि इसका नाम बदल कर शेरू कर दिया जाय। अधिकतर को यह नाम पसंद आ गया था। वह भी इस नाम पर पूंछ हिलाने लगा था। तब तक तर्क आ गया कि यह शेर की इज्जत का सवाल होगा, उसकी भी कोई औकात होती है। वितर्क हुआ कि कौन सा शेर को पता लगना है और वह इतनी सी बात का क्यों बुरा मानने लगा। रंगरूट-मजूर को मेठ-मुंशी जी कह देने पर भला कौन सा मुंशी जी की इज्जत में बट्टा लग जाता है।

आखिरकार माना गया कि नाम का असर तो होता है और नाम शेरू हुआ तो वह खूंखार हो जाएगा, इसलिए परंपरा का निर्वाह करते हुए नाम डागी ही चलने दिया जाए। डागी, डागी ही रह गया। इसके असल नस्ल के होने का पुराना पैडिगरी रिकार्ड, घर के अन्य जरूरी दस्तावेजों के साथ रखा था, जिससे पता चलता था कि इसका पुरखा, जर्मन शेफर्ड-जीएसडी, अलसेशियन, जमाने पहले किसी अंगरेज अफसर के घर आया था। इतिहास रूप बदल कर अपने को इस तरह दुहराता है, कि पता न लगे, दुहरा रहा है, नकल कर रहा है। वैसे भी खुद की नकल, नकल कैसे हो सकती है। खैर, यह शेफर्ड कुत्ताग ‘जर्मन‘ कहा गया, जिस तरह अब ट्रंप कोरोना वायरस को चाइना वायरस कहते हैं, कोई वुहान वायरस और बाकी दुनिया चाहे कोविड-19 कहती रहे।

पीढ़ी-दर-पीढ़ी यदि इन्हें डागी प्रथम, डागी द्वितीय, डागी तृतीय कहा जाता तो यह गिनती पंद्रह-बीस तक पहुंच गई होती। रिकार्ड अब गुम हो गया था और ठीक याद रख पाने वाला इस पीढ़ी में कोई नहीं रहा, जो बता सके कि यह डागी की कौन सी पीढ़ी है। यह ठीक उतना ही गैर-जरूरी हो गया था जितना खुद अपनी पांचवी पीढ़ी के ऊपर मातर और सातवीं पीढ़ी के ऊपर के पितर-पुरखों का नाम जानना, मगर अब इतना भी कौन याद रखता है। डागी को अम्मां नापसंद करती थीं, लेकिन अम्मां के व्यवहार से यहां भी तय कर पाना संभव नहीं होता कि वे उसे कितना और कैसे नापसंद करती हैं या पसंद।

चुनावों में वोट किसे देना है, अम्मां यह खुद तय करतीं। उन्होंने वोट किसे दिया, हम कभी ठीक अंदाजा नहीं लगा पाते। पूछने पर कहतीं, गुप्त मतदान। चुनाव कोई भी हो, परिणाम आने पर खुश होतीं, और कुछ दिन बाद नाराज होती रहतीं। बहरहाल, अपनी नापसंद के बावजूद डागी को दोनों समय खाना देना, उसका टीका, तबियत खराब होने पर इलाज और ठंड में उसके लिए गुदड़ी का इंतजाम वही करती थीं। अम्मां ध्यान देती रहतीं कि उसके नाक पर नमी है या नहीं। नाक सूखी दिखती, तो बुदबुदाने लगती कि इसकी तबियत ठीक नहीं है और खाने के समय उसके सामने मठा रख देतीं। मठा की ओर वह ध्यान नहीं देता और भूखा होने पर भी नहीं पीता तो अम्मां मान लेती कि उसकी तबियत ठीक है और उसे दूसरे समय सामान्य खाना दिलवा देतीं। पूछने पर बतातीं कि मठा से डागी के तबियत की जांच भी होती है, न पिये तो तबियत ठीक है, पी ले तो खराब और पिया तो यही दवा और इलाज भी। डागी को टीका लगवाने के अलावा उसके लिए कभी डाक्टर की जरूरत नहीं पड़ी। अम्मां की ऐसी बहुत सारी ज्ञान की बातों का स्रोत क्या है, पता नहीं लगता। मठा-कल्प वाले फार्मूले पर उन्हें टोक दें कि यह तो देसी कुत्तों वाला तरीका है तो वे समभाव से अभिधा में तर्क करते हुए कहतीं, कुत्ता तो कुत्ता ही होता है, फिर यह हमारा कुत्ता है और हम ही कौन से विदेशी ठहरे।

अम्मां एकादशी का व्रत रखतीं और तीज-त्यौहार की तिथियों का ध्यान रखतीं। अम्मां को शायद यही एक बात पसंद आई थी कि डागी ने जब से होश संभाला है, वह एकादशी का व्रत रखता है। न जाने उसे कैसे पता चलता, एकादशी के दिन सुबह आठ बजे वाली खुराक सूंघता भी नहीं, उस दिन एक बार, एकजुनिया रहता। शाम पांच बजे दूध-रोटी। अम्मां का स्नान-ध्यान सुबह दस बजे तक चलता रहता। कभी ऐसा भी होता कि एकादशी की तिथि ध्यान में नहीं रहती। उन्होंने नियम बना लिया था कि खुद मुंह जूठा करने के पहले जा कर डागी का कटोरा देख लेतीं।

डागी, अम्मां के साथ टीवी देखता, ब्रेक में दरवाजे तक चक्कर लगा आता। घुरघुरा कर, गुर्राकर या खंखारते, धीमी आवाज में भूंकते अपनी टीवी पर चल रहे कार्यक्रम के लिए पसंद-नापसंद जाहिर करता। वह जानता था कि अम्मां उसे पसंद नहीं करतीं, अम्मां उसे डांटती, लेकिन चैनल बदल देतीं। वह फिर से दोनों पैरों पर थूथन टिकाए, आंखें मिचमिचाते टीवी देखने लगता। कौन सा न्यूज चैनल देखना है, के मामले में अम्मां डागी की राय को अधिक तरजीह देतीं। अन्य चैनलों के लिए अम्मां की पसंद से डागी की नाइत्तिफाकी कभी-कभार ही होती। डागी का व्यवहार, घर के बोनाफाइड सदस्य सा हो गया था। शायद यह पीढ़ियों का असर था। अपनी उम्र के सात-आठ सालों में ही उसने यह प्रतिष्ठा अर्जित कर ली थी। लगता है कि उसकी अगली पांच-सात पीढ़ियां इसी तरह रहीं तो सेपियन भले न बन पाएं, बंदर जरूर बन सकते हैं। यों भी तो वह अपने भेड़िया पुरखों की कुत्ता संतान था।

अम्मां ने नापसंद के बावजूद मोबाइल युग में प्रवेश कर लिया था। अम्मां का मोबाइल बटन वाला है। उसके फोन बुक में सिर्फ एक नंबर है, मौसी का। नाम की जगह भी नंबर ही लिखा है। इस तरह मौसी का नंबर दुहरा कर लिखा गया है। बाकी के नंबर अम्मां की उस डायरी में हैं, जिसे वह अक्सर यहां-वहां रख कर भूल जाती हैं। इस डायरी में कुछ भजन लिखे हुए हैं, जो सब के सब अम्मां को जबानी याद हैं। इसमें काशी, प्रयागराज, गयाजी, पुरी और बदरी-केदार के पंडाजी महराजों का अता-पता दर्ज था, तीर्थ जाने की बात आए तो कहतीं, अभी तो यहीं हमारे चारों धाम। उनकी इस बात के कई मतलब निकाले जा सकते थे। काम वालियों के नाम और काम पर लगने की तारीख के अलावा इसमें कई डाक-पते लिखे हुए हैं, जिन पर अब चिट्ठियां नहीं भेजी जातीं। इन पतों की जरूरत तभी होती है, जब गमी-खुशी का कार्ड भेजना हो। अम्मां की डायरी का एक-एक हर्फ उनका लिखा हुआ था, लेकिन उसे पढ़ कोई भी सकता था। वह खुली किताब थी, खोया-पाया जैसी। डायरी की जरूरत यदा-कदा ही होती, मगर अम्मां चाहतीं कि डायरी का पता-ठिकाना मालूम रहे। डायरी कहीं भी रखकर भूल जाती, ऐसा अक्सर होता है, उस दिन सारी काम वालियों को डायरी खोजने का अतिरिक्त काम करना होता है।

झाड़ू-पोंछा वाली का चटक-मटक अम्मां को एक नहीं सुहाता। आए दिन नागा भी करती है। टच स्क्रीन, नया मोबाइल खरीद लिया है। अम्मां झिड़कती हैं, नागा हुआ तो फोन कर बताना चाहिए, कि नहीं आ पा रही है। बहाना एक से एक। आने पर कहती है, पानी बरस रहा था, छाता महंगा हो गया है, आप ही खरीद कर दे दो। अम्मां बड़बड़ाती, फोन तो जैसे मुफ्त में आया होगा। फोन डायरी खोज कर लाई और हाथ में पकड़ाते हुए कहा- आप भी स्मार्ट फोन ले लो अम्मां। कुछ दिनों बाद अम्मां उसकी नापसंदगी वाली इस बात को बार-बार याद करने लगीं। पूछतीं कि इसका वाला फोन कितने में आता होगा, स्मार्ट फोन लेने वाली उसकी बात दुहरातीं, मुझे कहती है, आप भी ले लो, इसकी ऐसी ही बेकार की बातें मुझे एकदम पसंद नहीं। लगने लगा है कि उनके लिए टच स्क्रीन लाना, हो सकता है उन्हें पसंद नहीं आने वाला, फिर भी अब मंगाना होगा।

अम्मां के हिसाब से उनका मोबाइल ‘आडियो चैनल‘, सच्चा है। यह बात अलग है कि मोबाइल वार्तालाप में टीवी पर देखी-दिखाई बातें भी होती हैं। मोबाइल वाले चैनलों में से मामा-मायका चैनल में अक्सर बाधा आती रहती थी, नानी के जाने के कुछ दिनों बाद से बंद ही पड़ा है और इसकी जगह मौसी चैनल ने ले लिया है, यह इनकमिंग और आउटगोइंग दोनों है और हर दिन देर-देर तक सक्रिय रहता है। मोबाइल का एक सहेली चैनल है, लेकिन वह तभी जुड़ता है, जब इनकमिंग हो। कभी-कभी एक मामी चैनल भी सक्रिय होता है, वह भी सिर्फ इनकमिंग है। दोनों बुआ के चैनल आउटगोइंग हैं, इस दोनों पर कॉलर ट्यून की तरह स्वागत वाक्य है- ‘आप तो हमें भूल ही गईं।‘ सत्य-आग्रही अम्मां को यह सुनना तनिक भी बुरा नहीं लगता।

अम्मां , टीवी के इंटरटेनमेंट चैनलों को खबरों की तरह और खबरिया चैनलों को इंटरटेनमेंट की तरह देखती हैं। आस्थाय, सास-बहू, तारक मेहता तो चलता ही रहता है। कोरोना, राम मंदिर, एनकाउंटर मामले, मैचमेकिंग भी इन दिनों जोर पर है। अम्मां को दुनिया-जहान की सारी कच्ची-पक्की खबर होती है। टीवी पर सब झूठा-सच होता है, ऐसा अम्मां का दृढ़ विश्वास है, इसलिए सभी चैनल उनके लिए भेदभाव मुक्त, एक जैसे असर वाले हैं। अम्मां, इस स्रोत से मिली खबरें काम वालियों के लिए जारी करती हैं, अलावे मालिश वाली के। मालिश वाली खुद एक बहुरंगी फ्री टू एयर चैनल है।

मेरी आदत बन गई थी कि अब टीवी की आवाज न सुनाई दे, म्यूट हो जाए तो ध्यान भटक जाता था। टीवी की आवाज, तानपूरा हो गया था। टीवी म्यूट में अक्सर अम्मां के मोबाइल चैनल चालू हो जाते थे। दूसरी तरफ मौसी होतीं, तब मालिश वाली का शामिल हो जाना, अम्मां को असहज न करता और मौसी ने भी उसकी उपस्थिति और भागीदारी को जान-मान लिया था। त्रिकोणीय वार्तालाप का चौथा कोण, श्रोता मैं हूं, जिसने इस वार्तालाप में अनजाने ही, अप्रस्तुत मौसी की ओर से आने वाली टिप्पणियां, मन ही मन पूरी करने की जिम्मेदारी ले ली है। बातचीत में ‘सबके जाने का दिन तय है, जिसका जब लिखा हो, मौत का क्या ठिकाना, कब आ जाए‘ जैसे आप्त वचन होते। निश्चित करना आसान नहीं होता कि ऐसा किसी टीवी शो में हुआ है, खबरिया चैनल में या सचमुच। इसी तरह ‘जोड़ियां तो ऊपर से बन कर आती है‘, सुन कर लगता कि मौसी के यहां किसी मांगलिक कार्यक्रम की तैयारी है, पर कुछ देर बाद यह मैचमेकिंग शो के पात्रों में बदल जाते। मौसी की तबियत बिगड़ने पर बातें कम होती और बात के मसले भी कुछ अलग, यानि डॉक्टर, दवाएं, अस्पताल होते। मौसी की ओर से अपनी बहू का दुखड़ा आने लगता, तो पता लग जाता कि फिर लंबी बात होगी, मौसी की तबियत सुधर गई है।

फिल्मी चैनल और गॉसिप क्या, आजकल तो सब कुछ सिनेमा-सिनेमा हो रहा है। अमुक हीरो कैसे मरा? कोरोना से, नहीं बीमारी से। और फलां कैसे मरा? कोरोना से, नहीं अपनी मौत से। वह कैसे मरा? करोना से, नहीं, फांसी लगाकर, नहीं जहर से, नहीं नहीं ड्रग से। मरा या मारा गया। महिला मित्र, स्टाफ, मित्र, भाई, वकील। टीवी के पात्रों का आह्वान-अनुष्ठान ऐसा कि म्यूट हो तो भी लगता है कि छिटक कर स्क्रीन से बाहर आ रहे हैं। घर में चहलकदमी करते आगंतुक घुसपैठिए। अपनी आवाज के पीछे-पीछे घर में बसेरा करने लगे हैं। तमाशा और तमाशबीन लोग। फिल्म वाले मर कर भी फिल्म बन जाते हैं। बायोपिक, रियलिटी शो। सीन क्रिएट, रिक्रिएट किया जा रहा है। दृश्य गढ़े जा रहे हैं। मालिश वाली याद दिला रही है कि अंगरेज लोग मरते हैं उसे सुसाइड कहते हैं, वैसे ही फिल्म वालों की अचानक मौत का सीन हो यानि फिल्मी मौत, उसे ऑटोप्सी कहते हैं। मौसी को कलाकार पर लाड़ आता है। मौसी के लाड़ का तो तकिया-कलाम ही है- मुई, मुआ। अम्मां वचन- होइहि सोइ जो राम रचि राखा।

दीवार के पार दृश्य बन रहा है, एक ऊंची मीनार है, जिस पर कोई चढ़ता जा रहा है, बिना एहसास कि गिरने का खतरा है। कुछ समय बाद वही मीनार, दूरबीन बन कर उसके हाथों में आ गई है। वह दूरबीन पर आंख सटाए चांद-सितारों को छू लेना चाहता है, उन्हीं में समा जाना चाहता है। हमलोग टीवी के फ्रेम में समाए हैं, ग्रुप फोटो बनकर और वह अब दूरबीन लिए टीवी देखते अम्मां की कुरसी पर आ बैठा है।

टीवी, म्यूट है। टप-टप टप-टप, टिक-टिक-टिक, घट्ट-घट।

Monday, March 29, 2021

जन्म-जन्मांतर

एक बच्चा है।
बचपन में पूर्व जन्म की यादें ताजा रहती हैं।
बड़े होने पर धुंधली पड़ती जाती हैं, खोने लगती हैं।
कथावाचक कहानी सुना रहे हैं।
बच्चा कहानी सुन रहा है।
तैंतीस कोटि योनियां हैं।
मनुष्य तन बड़े भाग्य से मिलता है।
पंचतंत्र की कहानियां।
गज-ग्राह, मगर-बंदर।
बुद्ध के पूर्वजन्म की कहानियां सुनता है।
जातक कथा सुनता है।
अब बच्चा असमंजस में है।
उसके मन में दुविधा होने लगी है।
उसे कभी लगता कि पंछी है, तितली है, शेर है।
चींटी, मधुमक्खी, चूहा, हाथी।
कभी लगता मछली है, सांप है।
सांप-सीढ़ी का खेल है।
यह मेरे पूर्वजन्मों के कारण है।
मानव तन मिला है, लेकिन पूर्वजन्मों से मुक्त न हुआ।
पिछले जन्म की योनियों का असर इस जन्म में भी बाकी रह गया है।
वह कोतवाल चिड़िया की कहानी पढ़ता है।
उसे आकाश में उड़ते चील का पीछा करते देखता है।
कभी वह बड़ों से झगड़कर भी छोटों को बचा लेने की बात सोचता है।
क्रेस्टेड सर्पेंट ईगल, हनी बजार्ड, फिशिंग आउल, किंगफिशर।
क्या ऐसा औरों को भी लगता है।
साथी बच्चे उसकी हंसी उड़ाते।
हर दिन ऐसा होता।
संयुक्त परिवार है।
स्कूल जाता है।
किसी ने डांटा, किसी ने पुचकारा।
झगड़ा होते देखा, भागमभाग देखा।
सजा मिली, नजर बचा लिया।
अपनी किसी पूर्व योनि में भटकने लगता।
अपने खुद की खोज में भटकने लगता है।
मेरे साथ क्या होता है और मैं हूं कौन?
आत्म संधान, स्व की खोज, अपने आप की तलाश।
जीव, आत्मा, देह।
संचित, क्रियमाण, प्रारब्ध का ऋत।

Tuesday, March 23, 2021

राग मारवा

‘राग मारवा‘ संग्रह की कहानियों का विराग-अनुराग अपनेपन से बांध लेता है। इन कहानियों की कमी या खूबी यही है कि यहां कुछ भी नया और अलग नहीं जान पड़ता। रचनाकार का अनुभव संसार उसका अपना निजी होते हुए भी, इतना आत्मीय और समावेशी है कि वह अगल-बगल घटते जान पड़ता है। खास यह कि भाव ऐसी न्यायपूर्ण संगति से शब्दों में बदलते हैं, वह रस-सृष्टि अपने साथ चलने के लिए रोक रखती है।

संग्रह की पहली दमदार कहानी ‘राग मारवा‘ और आगे भी पढ़ते हुए लगा कि बगल से गुजरती कोई जिंदगी, समानांतर अक्सर ओझल रह जाती है, लेकिन एक धीमी कराह पर ध्यान अटके, तो वह राग मारवा की तरह मन में झरने लगता है। मनोहर श्याम जोशी की कहानी, ’सिल्वर वेडिंग’ याद आती है। पता हो कि यह रचनाकार का पहला संग्रह है तब शायद पाठक का नये परिचित लेखन पर ध्यान अलग ढंग का होता है और बुक मार्क लगाते हुए दीख पड़ता है कि कहानियों में भाषा, भाव, अनुभव, सजग दृष्टि, अवलोकन, संवेदनशील मन और अभिव्यक्ति, यह सब किसी प्रौढ़ रचनाकार की कलम की तरह सधा हुआ है, जिसमें संतुलन ऐसा कि सहज प्रवाह बना रहे। पहला संग्रह है लेकिन अनगढ़ता कहीं नहीं। रचनाएं, अभ्यस्त लेखन की करीने से प्रस्तुति है।

कहानी में अरमानों का ‘गुलाबी दुपट्टा‘ इस तरह लहराता है कि त्रास का सपाटपन, बयां करते और भी त्रासद हो जाता है। कहानी में सुघड़ परिपक्वता है। ‘जनरल टिकट‘ में भाषा का बढ़िया इस्तेमाल, कहानी के मूड को संभाले हुए है। ‘फैमिली ट्री‘, बच्चे के मन में बच्चों-सा सहज हो कर उसमें उतरा-पढ़ा गया है। कहानी का शीर्षक जरूर मिसमैच लगता है। कहानी ‘आवाज में ...‘ तसल्ली से की गई महीन बुनावट, जिसके चलते इस प्रेम कहानी में दरार भी, तल्खी के साथ नहीं, स्वाभाविक आता दिखता है।

कहानी ‘धुँध‘, मन में बसा घर, समय के साथ टू बीएचके और फिर कम्पार्टमेंट होता जाता है। तीन अलग सेट के टुकड़ों वाला जिगसा पजल। बच्चों में बंटवारा तो करना ही होता है, लेकिन वह मां-पिता को कैसे मंजूर हो। बुकमार्क लगाते हुए ध्यान जाता है कि किस तरह अगल-बगल से गुजरती जिंदगी, नजर भर देखा, नब्ज टटोला कि अफसाना बन जाती है। कहानी ‘आसमानी कागज...‘ और ‘सुरमई‘ में कहे-अनकहे के बीच पनपते-मुरझाते रिश्ते हैं तो ’विदाई’ में भी सीमित पात्रों से बुना गया सघन समीकरण है। ‘पानी पे लिखा...‘ मन में फूटा-बहता यादों और भाव का सोता, न जाने क्या और कहां बहा ले जाए, कब किनारे टिका दे।

विविध भारती की रेडियो सखी ममता सिंह की कहानियां, महानगर, रेडियो, विविध भारती, गीत-संगीत से सराबोर हैं। राग मारवा में डूबते-उतराते कहानी ‘आखिरी कॉन्ट्रैक्ट‘ के आखिरी शब्दों के साथ, रुपहला ख्वाब मानों बदल जाता है सुनहरा सबेरा में- ‘...उसमें हम घोलेंगे प्यार का गुलाबी रंग... ।‘

Saturday, February 20, 2021

बिलासपुर की त्रिवेणी-1966

छत्तीसगढ़ की पुरानी और प्रतिष्ठित संस्था ‘भारतेन्दु साहित्य समिति, बिलासपुर द्वारा पुस्तक प्रकाशन माला के पंचदश पुष्प के रूप में साहित्यिक त्रिमूर्ति अभिनंदन समारोह पत्रिका का प्रकाशन महाशिवरात्रि सं. 2022 यानि 18 फरवरी 1966 को किया गया था।
इसमें जिन तीन साहित्यिक विभूतियों का अभिनंदन हुआ, उनके बारे में पुस्तिका के आरंभ में कहा गया है-
जिन तीनों ने किया पल्लवित साहित्यिक उद्यान।
वे तीनों हैं ‘विप्र‘ के काव्य रसिक भगवान।।

इस पुस्तिका में छपा छायाचित्र और स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी जी का लेख प्रस्तुत है। पुस्तिका, प्रातःस्मरणीय हरि ठाकुर के संग्रह से उनके पुत्र आशीष सिंह द्वारा उपलब्ध कराई गई है।


।। बिलासपुर की त्रिवेणी ।।

[द्वारा- स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी]

बिलासपुर की साहित्यिक त्रिवेणी का यह सम्मान लगता है कि जैसे पुण्य तीर्थराज प्रयाग यहां साकार हो उठा है। आदरणीय मधुकर जी, प्यारेलाल जी गुप्त तथा यदुनन्दन प्रसाद जी श्रीवास्तव ने अपनी अकथ तपस्या और अपनी बहुमुखी प्रतिभा के बल पर छत्तीसगढ़ के साहित्य जगत का सदैव ही पथ प्रदर्शन किया है।

आदरणीय मधुकर जी को काव्य शक्ति तो पैतृक विरासत में मिली है। मुझे स्मरण है कि मधुकर जी के पुण्य स्मरणीय पिता जी बिलाईगढ़ में चाकरी की अवधि में रायपुर आकर जब अपने सहयोगी के यहाँ जो मेरे किरायेदार थे, ठहरते थे तब हम बालकों का मनोरंजन यह कहकर किया करते थे “पुरानी है पुरानी है। मेरी डिबिया पुरानी है। जमाने भर की नानी है” आदि आदि। वयस्क होने पर जब मुझे ज्ञात हुआ कि वे मधुकर जी के पिता श्री थे तो मेरा मन अकस्मात ही उनके प्रति श्रध्दावनत हो गया। ऐसे मधुकर जी ७५ वर्ष पार कर साहित्य साधना में यदि आज भी युवकों को मात दे रहे हैं, तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं है। 

आदरणीय गुप्त जी कवि, आलोचक, पुरातत्वज्ञ, इतिहासकार आदि क्या नहीं है? को-आपरेटिव्ह बैंक की सेवा करते हुए जमा खर्च के शुष्क आंकड़ों में व्यस्त रहते हुए भी उनका हृदय साहित्य की अमृतधारा से परिपूरित है। 

और यदुनन्दन प्रसाद जी श्रीवास्तव तो “कलम के जादूगर“ हैं ही। अपनी सशक्त लेखनी के द्वारा पत्रकारिता के क्षेत्र में तथा अपनी वाणी और सक्रियता के द्वारा राजनीति के क्षेत्र में उनका योगदान स्मरणीय रहेगा। 

आज उनके अभिनन्दन के अवसर पर इस त्रिवेणी-स्वरूपा त्रिमूर्ति की सेवा में पुष्पान्जलि अर्पित कर कौन अपने को धन्य नहीं समझेगा?

Thursday, February 11, 2021

भानु जी के पत्र-2

भानु जी के दो पत्रों में से दूसरा पत्र यहां और भूमिका सहित पहला इस लिंक पर है।

दूसरा पत्र

बिलासपुर 26।2।12

प्रियवर सेठजी - जयगोपाल

आपका पत्र हस्तगत हुआ। परमानंद हुआ। छंदःप्रभाकर की तृतीयावृत्ति शोधकर छपने को तय्यार है आपने ठीक समय पर उसका स्मरण किया एतदर्थ आपको धन्यवाद देता हूं हमें कल्यान वालों ने बहुत धोखा दिया और हमारा एक बड़ा भारी ग्रंथ 500 से अधिक पृष्ठ वाला ‘‘मधुबन चरितामृत‘‘ तीन बरस से लापता कर दिया कई पत्र लिखे कि उसको वापिस ही कर देव परंतु कोई जवाब नहीं देवे इसके लिये उनके साथ खास कारवाई करना होगी हमारा उनका अब कोई संबंध नही रहा. यदि आपकी सहायता से हमें वह ग्रंथ ही वापिस मिल जायगा अथवा आप ही छापें तो विषेष कृपा होगी आशा है आप इसमें हमारी सहायता करेंगे

छंदःप्रभाकर के विषय में काशी और प्रयाग में लिखा पढ़ी चल रही है परंतु आप हतारे प्राचीन स्नेंही हैं आप ही के यहां शीघ्र छपे तो अत्युतम है परंतु आप यह लिख भेजिये कि किस शर्त से आप उसे छापेंगे. इस तृतीयावृति का आप स्वत्व लेने को प्रसन्न हैं तो हमें क्या प्रदान करेंगे और मूल्य ले कर छापेंगे तो किस निरख से छापेंगे.

कहना नही होगा कि इस ग्रंथ की बहुत मांग हिंदुस्थान के प्रत्येक नगर में है और सरकार से भी यह मंजूर हो चुका है शीघ्र पत्रोत्तर प्रदान करने की कृपा करें।। और भी ग्रंथ छापने को तयार हैं जैसे -

काव्य प्रभाकर (भाषा द्वितीयावृति) पृष्ठ 800
शुद्ध सप्तशती सान्वय भाषा टीका ‘‘ 400
रसिक प्रमोद ‘‘ 200
नवपंचामृत रामायण ‘‘ 70
काल प्रबोध ‘‘ 60
तुम्ही तो हो (श्रीकृष्णाष्टक) ‘‘ 10

मेरी हार्दिक इच्छा यही है कि हमारा और आपका जैसा प्रेम चला आया है वैसा ही बना रहे कोइ अंतर न पड़े वरन वृद्धिगत होता रहै. 

आपकी सेवा में गत वर्ष एक कापी काव्य प्रभाकर की भेजी गई थी परंतु आज तक समालोचना की कृपा न हुई अस्तु इस बात की जल्दी नही 

आशा है छोटे सेठ कुशल होंगे.

आपका परम स्नेही
जगन्नाथ प्रसाद
भानुकवि
छोटेसाहीब
बंदोबस्त

प्रसंगवश-

भानु जी के सबसे लोकप्रिय ग्रंथ छन्दःप्रभाकर की दसवीं आवृत्ति सन 1960 में पूर्णिमा देवी, धर्मपत्नि स्वर्गीय बाबू जुगल किशोर द्वारा प्रकाशित कराई गई, जिसके अंतिम कवर पृष्ठ पर भानु-कवि विरचित ग्रंथों की सूची दी गई है, जिसका चित्र यहां दिया गया है।