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Wednesday, May 13, 2026

गुरुदेव काश्यप

छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता पर ‘छत्तीसगढ़‘ सांध्य दैनिक के सुनील कुमार से मुलाकात में बात चली, तृप्ति सोनी की किताब ‘छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता, चार पीढ़ियों की स्याही की विरासत‘ की और पहुंची, गुरुदेव काश्यप तक। मैं उनसे और उनके पत्रकार-संपादक होने से परिचित रहा हूं, मगर उनकी कविताई से बहुत कम। सुनील कुमार जी ने उनकी किताब ‘धूप का एक दिन‘ (1972) पढ़ने को दे दी। यह जानकारी न होने से अपनी चिढ़ का बदला खुद से लेने के लिए आते ही काम में लगा, पूरे संग्रह की वर्ड फाइल तैयार कर ली और ललित कुमार के ‘कविता कोश‘ में भेज दिया।

गुरुदेव काश्यप जी के साथ रायगढ़ के उन दिनों से ले कर अब तक को याद करता रहा जब सर्व माननीय किशोरी मोहन त्रिपाठी, बारेन दा, अनुपम दासगुुप्ता, प्रभात त्रिपाठी, देवेंद्र प्रताप सिंह, हरिहर सिंह, अतुल श्रीवास्तव, हरकिशोर दास, रवि मिश्रा, विनोद पांडेय, रमेश शर्मा, स्वराज करुण, शिव राजपूत, राजू और हेमचंद्र पांडेय, बिहारीलाल साहू, डॉ. बल्देव, बसंत राघव, अशोक अग्रवाल, अनिल रतेरिया, प्रमोद ब्रह्मभट्ट, गोपाल पटेल, राकेश शर्मा, अजय अटापट्टू, चंडीप्रसाद गुप्ता, अंबिका वर्मा, राजेश डेनियल, अबरार हुसैन ..., बहरहाल वापस गुरुदेव काश्यप की कविता। उनकी कविताएं पढ़ते हुए तात्कालिक पाठकीय प्रतिक्रिया बनी-

वे रविशंकर विश्वविद्यालय के मानवशास्त्र के संभवतः पहले बैच के विद्यार्थी थे छुईखदान वाले राघवेंद्र त्रिपाठी, बाद में इसी विभाग में सेवाएं देने वाले सरोज बाजपेयी भी संभवतः इस बैच में थे। उन्होंने भाषा की भी पढ़ाई की। यायावरी- गुरुदेव काश्यप की कविताओं में झलकती है मगर उनके संग्रह ‘धूप का एक दिन‘ का लगभग सारा लेखन अखबार-समाचार के बीच पनपा है, जिसमें शहर का माहौल-पर्यावरण, देश की दशा और संविधान तथा वैश्विक परिस्थितियां, अमरीका हावी है। देखा जा सकता है कि समाचार-सूचना के संवेदनशील प्रस्तोता को उस माध्यम की सीमा बेचैन करती है, तथ्यों के साथ विचार और भावनाओं के बिंब-प्रतिबिंब के लिए वहां जगह नहीं होती, वह समाचार-गद्य में लिख-चुक जाता है लेकिन शुष्क, असम्बद्ध-सी घटना और परिस्थिति के समाचारों के पीछे मानवीय रिश्ता तो महसूस होता ही है। इसलिए ऐसे गद्य-अभिलेखन समाचारों के अंदर सहज कविता प्रवाहित होती रहती है, संवेदनशील मन उसे महसूस करता सुन लेता है और भाषा-कलम पर अधिकार हो तो अभिव्यक्त कर पाता है, ऐसी ही है इस पुस्तक की कविताएं, जिसकी पहली कविता का शीर्षक है ‘भूमिका: हम ऋग्वेदपदी‘, जिससे समझा जा सकता है कि यह कवि समष्टि से एकाकार हो कर रचना कर रहा है। उनकी कुछ कविताएं-


भूमिका: हम ऋग्वेदपदी 

आहुति दो पितरों, देवताओं को। 
हे पवित्राप्रद अग्नियो, 
स्तवन करो 

हम ऋग्वेदपदी सौ हेमन्तों को लांघते 
बांहों में समेट आत्मजों को 
ऋषि-आयु भोगेंगे। 

वरणीय पृथिवी का आलिंगन करें 
स्वागत करें 
अंतरिक्ष से उभरते सूर्य का 
यह सोमधारी 
प्रजाओं के लिये 
अमृत किरणें उछालता आया है। 

आयुष्मान् बंधु, 
दाब दो किसी पत्थर के नीचे 
अपनी अकारथ मृत्यु को 

धूप का एक दिन 

धूप है-सीपी है 
सूरज एक मोती है 
कानों के रिंग में बड़ा भला लगता है 
(क्या करें, कीमती है) 

धूप है-लहरें हैं 
दिन एक समुन्दर है 
नारियल की छांव में 
नाव बने लेटे हैं 
(पाल है, मछलियां हैं, लंगर है) 

धूप है-चुम्बन है 
फेनदार किरने हैं 
लथपथ हैं ओंठ 
पैर डगमग हैं 
(शाम के कंधे हैं, शिथिल-शिथिल झरने हैं) 

सुबह की बौछार 

सुबह-सुबह 
मुक्तक-सा बरस गया पानी। 

भीग गए अधजागे फूल-पत्र 
भीग गए छत-छज्जे, गलियारे 
बिजली की कुमकुम, 
तांबे के तार, नरम अंधियारे 

पुल की वह रेलिंग भी भीग गई 
भीग गई नहर, मुरम भीग गई 
खिड़की का कासनी परदा कुछ सिमट गया 
सन्नाटा चौक के पास कहीं ठिठक गया। 

सुगबुग दरवाजे की 
कड़ी-कड़ी जगती है 
टिक कर दीवारों से 
धूप खड़ी होती है 
धुले-धुले गागर में 
सूर्य समा जाता है 
ईंधन के बोझ लिए 
दिवस चला आता है 

रात का अनबोला आंगन में सोया है 
पास का गजरा भी दबे-दबे रोया है 
दुखा गया जी को यह ऐसा अभिमानी है 
सुबह-सुबह मुक्तक-सा बरसा जो पानी है। 

दिन 

नंगे पांव फुटपाथ पर दौड़ता 
मूंगफली के छिलके बटोरता 
आहिस्ता कुछ सोच कर 
पार्क के चकेदार दरवाजे पर झूलता 
म्यूजियम की मुंडेर से झाँकता 
सिनेमा घर के सामने 
कागज के रंगीन टुकड़े बटोरता 
कभी किसी रंगीन बोर्ड को खुरचता 
फव्वारे पर 
पानी के छींटे बिखेरता 

दोपहर- 
किसी बबूल की टहनी से 
धूप की उलझी हुई पतंग को निकालता 
फेरी वालों के पीछे भागता 
रेल की पाँतों को पार करता 
नदी की रेत को रौंदता 
किसी हरवाहे की पगड़ी उछालता 
कभी दो बूढ़े बैलों को पुचकारता 

शाम- 
किसी खोमचे के नजदीक 
उदास मुंह लिये 
खाली जेबें टटोलता 
सूरज डूबे 
इसी गली की मोड़ पर 
हर रोज घेर कर 
मुझे आखरी सलाम करता 

बस यूं ही हाथ पीछे बाँधे 
अकेले किसी कोने में 
दुबक कर बैठ जाता 
उदास मन, खिन्न: 
सोचता हूं- 
किस विधवा का बेटा है 
आवारा-आवारा सा 
नाबालिग दिन। 

शाम 

जी चाहता है- 
बादलों की ऐंठी हुई पगड़ी में 
सूरज का एक दूध-मोंगरा 
खोंप दूं। 

धरती के भरे-भरे गालों से 
छाछ सी धूप छितर जाती है 
घूंघट में छांव नई ब्याही-सी 
आंगन के बाहर जो 
नजर नहीं आती है। 

पिंजड़े में सुग्गे सी 
शाम फुदक जाती है 
नई-नई बछिया सी 
हवा बिदक जाती है। 

रात की मचिया पर 
चांद बैठ जाता है 
बूंद-बूंद अमरस-सी 
चांदनी टपक गई 
कांस की कटोरी-सा 
पोखर भर जाता है 
भरे-भरे महुए से 
तारे टपका किए 
पगडंडी बैठी है 
खाली डलिया लिए। 

पुस्तक के फ्लैप पर परिचय, जो संभवतः स्वयं उन्होंने लिखा है, इस प्रकार है- 

जीवन को प्रथम तिथि पंक्ति, रायगढ़ दिनांक 15 अगस्त 1935। एक निम्न मध्यमवर्गीय संयुक्त परिवार के सारे अभिशापों को वर्षों तक झेलने की विवशता। वह त्रासदायी परिवेश जो शैशव में हो रीढ़ की हड्डियों को प्रौढ़ बना जाता है। शिक्षा- एम. ए., मानव शास्त्र और भाषा विज्ञान में डिप्लोमा। व्यवसाय- पत्रकारिता। विगत 20 वर्षों में अनेक क्षेत्रीय पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन एव सम्पादन। पिछले कुछ वर्षों में दैनिक ‘महाकोशल‘ रायपुर के संपादक। अभिरुचि क्रमांक 1- यायावरीः डोनापाल से डीफू तक। ‘भटक चुके आगे और भटकेगे।‘ क्र. 2- असफल प्रकाशनों के लिए सफल योजनायें तैयार कर उन्हें क्षेत्रीय प्रतिभाओं के बीच खपाना। सन 1958 से 1966 के बीच अनेक पुस्तकों का प्रकाशन, संपादन। सहयोगी काव्य संग्रह नये स्वर-3, छत्तीसगढ़ का प्रथम कहानी संग्रह, ‘मीठे कनेर का दरख्त‘, काव्य संग्रह ‘नैवेद्य‘, ब्लादीमीर नाबोकोव के चर्चित उपन्यास ‘लोलिता‘ का अनुवाद और हिन्दी मे वियतनाम संबंधी प्रथम काव्य संग्रह ‘आहत सूर्य देश में‘। उपलब्धि- मित्रों का स्नेह, नवागतुकों की श्रद्धा और यह अटूट विश्वास कि समूचे भविष्य पर अधिकार हमारा है। मध्यप्रदेश में नई कविता का सूत्रपात करने वाले प्रथम सहयोगी काव्य संकलन नये स्वर-1 (1956) के सहयोगी कवि। प्रचार प्रसार के मंच पर उपस्थित होने से सदैव भयभीत। 22 वर्षों के रचना-काल में अंततः यह प्रथम व्यक्तिगत काव्य संग्रह ‘धूप का एक दिन‘। आगामी अभिशप्त उत्कल।

Wednesday, March 4, 2026

कुबेरनाथ राय

कुबेरनाथ राय रचनावली के 13 खंडों का प्रकाशन, दिसंबर 2024 में वाणी प्रकाशन द्वारा किया गया। इसके सम्पादक नर्मदा प्रसाद उपाध्याय और मुहम्मद हारून रशीद ख़ान हैं। उपाध्याय जी के काम और उनकी साहित्यिक प्रतिष्ठा से परिचित हूं। हारून जी से दूरभाष पर परिचय है, उन्होंने कुबेरनाथ जी से संबंधित कुछ जानकारियां मेरे अनुरोध पर उपलब्ध कराई थीं। कुबेरनाथ जी से उनकी पारिवारिक निकटता की जानकारी भी उनसे मिलती रही है।

इस बीच जानकारी मिली कि 12 खंडों में एक अन्य ‘कुबेरनाथ राय रचनावली‘ का प्रकाशन पिछले दिनों प्रतिश्रुति प्रकाशन, कोलकाता से हुआ है। वेबसाइट की जानकारी के अनुसार प्रथम संस्करण 2023 में तथा संशोधित-परिवर्धित संस्करण 2026 का (लक्ष्मण जी के फेसबुक पर की सूचना के अनुसार लोकार्पण 20 फरवरी! को, साथ की तस्वीरों पर 22 फरवरी 2026 अंकित) है। इसके संपादक द्वय अवधेश प्रधान तथा लक्ष्मण केडिया हैं। लक्ष्मण जी से प्रत्यक्ष परिचय रहा है इसलिए इस रचनावली की तैयारियों की जानकारी मुझे रही है। उन्होंने भी कुछ पठन-सामग्री, जो यों अनुपलब्ध-अप्रकाशित थी, मेरी रुचि जान कर, मुझे भेजी थी। हारून जी और लक्ष्मण जी का उदार-अनुग्रह रहा है।

इन दोनों रचनावलियों के खंडों को मैंने अभी तक नहीं देखा है, इसलिए विस्तृत टिप्पणी नहीं कर सकता, मगर इन दोनों की खंड योजना की जानकारी मिली है, जिसमें वाणी के पहले 10 खंडों में उनकी 20 प्रकाशित पुस्तकें तथा खंड 12 में 21 वीं प्रकाशित पुस्तक आगम(न?) की नाव शामिल है। प्रतिश्रुति के पहले 7 खंड उनकी सभी प्रकाशित 21 पुस्तकें हैं। इन दोनों में लगभग संग्रहों के प्रकाशन कालक्रम को मुख्य आधार बनाया गया जान पड़ता है, जो मेरी दृष्टि से कतई उपयुक्त नहीं है। इस संबंध में मेरी टिप्पणी आगे है।

पिछले लगभग पंद्रह वर्षों में जिन प्रकाशकों/प्रकाशन संस्थाओं के जिम्मेदारों से मेरी मुलाकात होती थी, उनसे कुबेरनाथ राय समग्र छापने की चर्चा अवश्य करता था। इस क्रम में मेरे द्वारा योजना भी बनाई गई थी, जिसे मेरे द्वारा उपयुक्त व्यक्तियों को अवगत कराते, प्रेषित भी किया गया था। साथ ही कंथा-मणि की जानकारी कम मिल पाती थी, इसलिए ललित कुमार जी से आग्रह कर मेरे द्वारा स्वयं फीड कर ‘कविता कोश‘ के लिए प्रेषित किया गया, जो वहां उपलब्ध है।

इस दौरान अवधेश प्रधान जी से फोन पर बात कर खंड योजना पर अपनी प्रतिक्रिया से उन्हें अवगत कराया, साथ ही अन्य बिंदुओं का संक्षिप्त उल्लेख कर, अपनी मंशा बताई कि यह मैं सार्वजनिक करना चाहता हूं, उन्होंने कृपापूर्वक इसे स्वागतेय कहा। इस तारतम्य में मेरे द्वारा बनाई गई योजना और टिप्पणी इस प्रकार रही है-

कुबेरनाथ राय की पुस्तकों की मेरी जानकारी के अनुसार सूची निम्नानुसार है, इसमें साहित्य अकादेमी द्वारा, भारतीय साहित्य के निर्माता श्रृंखला में उन पर प्रकाशित पुस्तक में दी गई सूची की मदद ली गई है। इस सूची के अनुसार उनकी कुल प्रकाशित पुस्तकों की संख्या 21 है। अपने संग्रह की इन 21 पुस्तकों की पृष्ठ संख्या का जोड़ कुल 3916 है। इस प्रकार समग्र प्रकाशन की योजना आठ या उससे अधिक खंडों की ही उपयुक्त होगी, क्योंकि इसमें पत्र, संपादकीय, परिचय, लेख सूची/अनुक्रमणिका तथा अन्य सामग्री शामिल होने पर पृष्ठ 4500 से कम न होंगे। नीचे सूची में पुस्तक का नाम-प्रकाशन वर्ष साहित्य अकादेमी के अनुसार है, आगे इन पुस्तकों के मेरे संग्रह में उपलब्ध संस्करण तथा उसके बाद पृष्ठ संख्या है।

क्र. पुस्तक-प्रकाशन वर्ष            मेरे संग्रह के संस्करण             पृष्ठ संख्या
 
01 प्रिया नीलकंठी-1969?             (1968, 1974) तृतीय-1978            172 
02 रस आखेटक-1971?               प्रथम-1970                                   292 
03 गंधमादन-1972                       (1972) द्वितीय-1974                     323 
04 निषाद बाँसुरी -1973?              प्रथम-1974                                  235 
05 विषाद योग-1974                    (0000) द्वितीय-1976                     250 
06 पर्ण मुकुट-1978                      प्रथम-1978                                  224 
07 महाकवि की तर्जनी-1979        प्रथम-1979                                   223 
08 पत्र मणिपुतुल के नाम-1980     (1980) द्वितीय-2004                     101 
09 मन पवन की नौका-1982         प्रथम-1982                                  170 
10 किरातनदी में चंद्रमधु-1983     प्रथम-1983                                   156 
11 दृष्टि अभिसार-1984                 प्रथम-1984                                  175 
12 त्रेता का वृहत्साम-1986            प्रथम-1986                                  206 
13 कामधेनु-1990                        प्रथम-1990                                   151 
14 मराल-1993                            प्रथम-1993                                   168 
15 उत्तरकुरु-1993                      प्रथम-1994?                                  132 
16 चिन्मय भारत-1996                (1996) द्वितीय-2006                       201 
17 वाणी का क्षीरसागर-1998        प्रथम-1998                                    116 
18 कंथामणि-1998                      प्रथम-1998                                    110 
19 अंधकार में अग्निशिखा-2001    प्रथम-1998                                   160 
20 रामायण महातीर्थम्-2002        तीसरा-2007                                  351
21 आगम की नाव-2005              प्रथम-2008                                    126
अन्य - 
#निवेदिता रजत जयंती अंक-1997 स्वामी सहजानंद स्नातकोत्तर महाविद्यालय, गाजीपुर
#साहित्य अकादेमी का प्रकाशन - कुबेरनाथ राय (2007) पुनर्मुद्रण 2014

खंड बनाते हुए प्रकाशन वर्ष को आधार बनाना उचित नहीं होगा, क्योंकि यह स्वयं स्पष्ट है कि महाकवि की तर्जनी-1979, त्रेता का वृहत्साम-1986 और रामायण महातीर्थम्-2002 को एक ही खंड में रखना होगा। राय साहब ने स्वयं निषाद बांसुरी -1973?, किरातनदी में चंद्रमधु-1983 और मन पवन की नौका-1982 को त्रिवर्ग (ट्रिओलोजी) बताया है। मेरे विचार से उत्तर कुरु भी इसमें शामिल होगा, इस प्रकार 4 पुस्तकें। इसी प्रकार उन्होंने स्वयं प्रिया नीलकंठी-1969?, गंधमादन-1972 और पर्ण मुकुट-1978 को एक ही रस परंपरा के अंतर्गत रखा है। इसमें रस आखेटक भी जुड़ जाएगा, (4 पुस्तकें) क्योंकि कामधेनु प्रथम संस्करण की भूमिका में कहा गया है कि प्रिया नीलकंठी, रस आखेटक और गंधमादन एक प्रकार की तो विषाद योग और कामधेनु (2 पुस्तकें) दूसरे प्रकार की। पत्र मणिपुतुल के नाम-1980 और कंथामणि-1998 उनकी अन्य सभी रचनाओं से अलग हैं।

संपादकीय दायित्व होगा कि निबंधों के प्रथम प्रकाशन का संदर्भ, पत्र-पत्रिका में हो तो नाम, वर्ष और अंक सहित दिया जाए। समग्र/ रचनावली में किस पुस्तक/संग्रह के अब तक कितने संस्करण आ चुके हैं, संस्करण में कुछ जोड़-घटाव हुआ हो, तो उसकी जानकारी सहित, ध्यान रखना होगा कि संस्करण और प्रकाशन वर्ष में विसंगतियां हो सकती है, जैसा कामधेनु के नेशनल पब्लिशिंग वाले संस्करण में है। इसमें यह भी उल्लेख है कि इस, द्वितीय संस्करण में पर्याप्त संशोधन और संवर्धन हुआ है और कुछ नये निबंध भी जोड़े गए हैं। इसी तरह ‘विषाद योग‘ संग्रह के ‘अन्त में, अपनी बात‘ में उन्होंने स्पष्ट किया है कि इस संग्रह के निबंध सात-आठ वर्षों में लिखे गए हैं, इनमें से अधिकांश का रचनाकाल 1970-71 है। तथा द्वितीय संस्करण में चार पुराने संस्करण के निबंध अनुपस्थित हैं। प्रथम संस्करण में रामायण-प्रसंग पर पांच ललित निबंध थे। उनमें दो को इसमें रखकर शेष तीन को निकाल दिया गया है। इन चार निबंधों के बदले में हम इसमें चार टिप्पणियां या लेख, चाहे जो कहें, जोड़ रहे हैं। वैसे ही काल के उल्लेख की आवश्यक पर उन्होंने स्वयं बल दिया है, ‘पर्ण-मुकुट‘ के एक निबंध ‘आभीरिका‘ के लिए ठोस उदाहरण दिया है कि यह निबंध सामयिक कालखंड 1977 की राजनीति, तो कुछ को ‘भारतीय लोकदल‘ का पोषक लग सकता है, जबकि यह निबंध 1974 में लिखा गया था और 1975 में ‘मधुमती‘ में छप चुका था।

उनके द्वारा अप्रचलित शब्दों के प्रयोग पर टीप या ऐसे सौ-एक शब्द, जो यों अप्रचलित है, लेकिन उनके लेखन में अक्सर आए हैं, की अर्थ-व्याख्या सहित सूची होनी चाहिए। ‘गन्धमादन‘ संग्रह के निबंध ‘जल दो, स्फटिक जल दो!‘ का आरंभिक अंश उल्लेखनीय है, जहां वे श्वेत-श्याम को सृष्टि के मौलिक वर्ण कहते हुए इसके विपर्यय चौबीस सोपानबद्ध भूमियां, इन चौबीस रंगों के अपरा इंद्रधनुष का आदि अननुभूत निरंजन और अवसान दृष्टिभक्षी, तमोगुणी महातमस बताते हैं। इसके अलावा अज्ञात, अल्पज्ञात शब्दों के बारे में उन्होंने स्वयं रामायण महातीर्थम के ‘अपने लेखन के बारे में‘ में बात की है। जैसे स्यंदन या वर्म (हथियारबंद, जिरह-बख्तर?), कुहक, ना-धर्मी और हां-धर्मी तथा अस्ति-भवति का भी प्रयोग उनके लेखन में अक्सर है, जो यों अन्यत्र सामान्यतः नहीं होता। भाषा के लिए उन्होंने ‘निषाद बांसुरी‘ में यह भी कहा है- 'परन्तु समग्र जीवनव्यापी भाषा बनने के लिए इसे ब्रज-अवधी-भोजपुरी-मगही-मैथिली-छत्तीसगढ़ी के "जानदार-पानीदार" शब्दों को लेना ही होगा, इसमें कोई विवाद ही नहीं, क्योंकि यह तो 'घर' की निधि है। मेरी धारणा है कि जरूरत पड़ने पर एक ओर पंजाबी-गुजराती और दूसरी ओर बांग्ला-असमीया-उड़िया की शब्दश्री से भी सहायता लेने में संकोच नहीं करना चाहिए। अवश्य ही जरूरत पड़ने पर ही । अन्यथा हिन्दी के रूप में एक नयी 'बदअमली' की सृष्टि होगी जो कदापि वांछनीय नहीं।"

इटैलिक पर, इन्वर्टेड पर, हलन्त पर, बिंदी और चंद्र बिन्दी का निर्णय लेना होगा, ङ ञ वाले शब्द संस्कृत उद्धरण में तो ठीक हैं, किंतु हिंदी (को हिन्दी लिखेंगे?) में अनुस्वार रखने पर विचार करना होगा। उसी तरह १-२ आदि के स्थान पर 1-2 का प्रयोग, जो भी निर्धारित हो उसका उल्लेख संपादकीय लेख-टीप में देना होगा और एकरूपता रहे इसका ध्यान रखना होगा। इसी तरह ‘आया‘ तो ठीक है किंतु- ‘आए‘ (न कि आये), आई (न कि आयी), तात्पर्य कि ऐसे शब्दों में जहां स्वर का प्रयोग हो सकता है, व्यंजन-मात्रा का प्रयोग न हो।

इस प्रकार के और ढेरों विचार मन में आ रहे हैं, यदि उपयोगी लगें तो अधिक समय दे कर ध्यान से करूंगा। यह काम मेरे लिए आनंद और आत्मसंतोष का होगा, बशर्ते कि यह आपके काम में मददगार और उपयोगी हो।

कुबेरनाथ जी को पढ़ना, पढ़ते रहना, मेरे लिए ‘माघे मेघे गतं वयः‘ जैसा ही है, मगर मुझे उनके पूरे लेखन में से एक अंश चुनना हो तो वह होगा, कामधेनु संग्रह के ‘दिवस का महाकाव्य‘ निबंध का आरंभ। इस लालित्य के आगे और कुछ भी फीका। ... और उनके लिए मुझे कुछ कहना हो तो यह उन्हीं से शब्द लेकर संभव होगा, सो ... जैसा वे ‘गंधमादन‘ के निबंध ‘शब्द-श्री‘ में कहते हैं- 'पर मैं तो साठोत्तरी का कामुक यक्ष-मेघ हूं और भाषा के 'दिङ्नागानाम्' के स्थूल हस्त-चपेटों से बच-बचाकर शब्दरूपा श्री का 'चाक्षुष-यज्ञ' भोग कर रहा हूँ। मेरे जीवन का क्षण-प्रतिक्षण इसीके यश का मन्त्रगान बनना चाहता है, मेरे 'अ' से 'ह' तक सारे वर्णोच्चार, मेरे सारे उच्चारण, मेरा सारा 'अहं', इसी की भाषामयी आरती है। यही सारी विद्याओं की अभिव्यक्ति का आधार है।' या जैसा वे ‘महाकवि की तर्जनी‘ में लिखते हैं- ‘मुझे लगा कि मैं बीसवीं शती का एक मामूली मृदंग-वादक अपनी नीरस गद्य-मृदंग लेकर कालनदी के कई हजार वर्ष पुराने घाट पर पहुंच गया हूं और इस वाङ्मनस-अगोचर संबंध को सुन रहा हूं। वह मरा हुआ पक्षी उत्तर-काव्य का वाहन बनकर लौट आया और इस प्रकार बोला ‘बंधु, मैं लौट आया हूं शब्द बनकर, भाव बनकर। मैं अपने कल-कूजन द्वारा तुम्हारे अंदर असंख्य वर्षा-शरद और असंख्य वसंतों की रचना करता रहूंगा।‘

पुनश्च-

प्रतिश्रुति प्रकाशन के लक्ष्मण केड़िया जी ने 14 मार्च की फेसबुक पोस्ट में उनके द्वारा प्रकाशित ‘कुबेरनाथ रचनावली‘ का संक्षिप्त परिचय दिया है। साथ ही पोस्ट की टिप्पणी में मेरे लिए उल्लेख किया है- 
'रचनावली-कार्य से आप युक्त रहे हैं। आपके सहयोग ने मुझे समृद्ध किया है। आभार पृष्ठ में आपका उल्लेख भी किया है। 
रचनावली के संपादन में समय अधिक लगा, क्योंकि रचनाएं मुझे शेष तक मिलती रही हैं। 
खुशनसीब हूं कि स्पर्धात्मक वातावरण मुझे आधी-अधूरी रचनावली के लिए विवश न कर सका। 
आप कुबेरनाथ जी के उत्कट प्रेमी हैं। आपकी टिप्पणी मेरे लिए पुरस्कार है। 
पुनः आभार व्यक्त करता हूं। धन्यवाद।

लक्ष्मण जी के प्रति आभार। 'कुबेरनाथ राय जैसे जरूरी हिंदी-सेवक की रचनावली, जो बहुत आवश्यक थी, देर से छपी और छपी तो दो-दो। अब सुनने में आया है कि इस मुकदमेबाजी भी हो रही है। कुबेरनाथ जी होते तो इस पर शायद वही कहते, जो उन्होंने ‘उत्तरकुरु‘ की भूमिका में कहा है। पहले तो वे लिखते हैं- ‘... इसके बाद इस क्षेत्र की महाविद्या की शयन आरती!‘ और फिर भूमिका के अंत में- ‘अन्त में मैं प्रकाशक को धन्यवाद देना चाहूंगा। मेरी किताबें प्रकाशकों के पास दो-तीन वर्ष सड़कर के प्रकाशन का सौभाग्य पाती हैं। परन्तु बाल-बच्चेदार प्रकाशकों को इसका क्या दोष दूं? वे प्राथमिकता देते हैं उन प्रकाशनों को जिनकी आशुबिक्री संभव हो सके। इस हालत में साहित्य-प्रेम के नाम पर मेरे लिए वे जो कुछ कर रहे हैं, उसी से मैं संतुष्ट हूं।‘