कुबेरनाथ राय रचनावली के 13 खंडों का प्रकाशन, मेरी जानकारी में दिसंबर 2024 में वाणी प्रकाशन द्वारा किया गया। इसके सम्पादक नर्मदा प्रसाद उपाध्याय और मुहम्मद हारून रशीद ख़ान हैं। उपाध्याय जी के काम और उनकी साहित्यिक प्रतिष्ठा से परिचित हूं। हारून जी से दूरभाष पर परिचय है, उन्होंने कुबेरनाथ जी से संबंधित कुछ जानकारियां मेरे अनुरोध पर उपलब्ध कराई थीं। कुबेरनाथ जी से उनकी पारिवारिक निकटता की जानकारी भी उनसे मिलती रही है।
इस बीच जानकारी मिली कि 12 खंडों में एक अन्य ‘कुबेरनाथ राय रचनावली‘ का प्रकाशन पिछले दिनों प्रतिश्रुति प्रकाशन, कोलकाता से हुआ है। वेबसाइट की जानकारी के अनुसार प्रथम संस्करण 2023 में तथा संशोधित-परिवर्धित संस्करण 2026 का, कापीराइट कौशलेन्द्र राय का है। इसके संपादक द्वय अवधेश प्रधान तथा लक्ष्मण केडिया हैं। लक्ष्मण जी से प्रत्यक्ष परिचय रहा है इसलिए इस रचनावली की तैयारियों की जानकारी मुझे रही है।
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| कुबेरनाथ राय 1933/35 - 1996 |
इन दोनों रचनावलियों के खंडों को मैंने अभी तक नहीं देखा है, इसलिए टिप्पणी नहीं कर सकता, मगर इन दोनों की खंड योजना की जानकारी मिली है, जिसमें वाणी के पहले 10 खंडों में उनकी 20 प्रकाशित पुस्तकें तथा खंड 12 में 21 वीं प्रकाशित पुस्तक आगम(न?) की नाव शामिल है। प्रतिश्रुति के पहले 7 खंड उनकी सभी प्रकाशित 21 पुस्तकें हैं। इन दोनों में लगभग संग्रहों के प्रकाशन कालक्रम को मुख्य आधार बनाया गया जान पड़ता है, जो मेरी दृष्टि से कतई उपयुक्त नहीं है। इस संबंध में मेरी टिप्पणी आगे है।
पिछले लगभग पंद्रह वर्षों में जिन प्रकाशकों/प्रकाशन संस्थाओं के जिम्मेदारों से मेरी मुलाकात होती थी, उनसे कुबेरनाथ राय समग्र छापने की चर्चा अवश्य करता था। इस क्रम में मेरे द्वारा योजना भी बनाई गई थी, जिसे मेरे द्वारा उपयुक्त व्यक्तियों को अवगत कराते, प्रेषित भी किया गया था। साथ ही कंथा-मणि की जानकारी कम मिल पाती थी, इसलिए ललित कुमार जी से आग्रह कर मेरे द्वारा स्वयं फीड कर ‘कविता कोश‘ के लिए प्रेषित किया गया, जो वहां उपलब्ध है।
इस दौरान अवधेश प्रधान जी से फोन पर बात कर खंड योजना पर अपनी प्रतिक्रिया से उन्हें अवगत कराया, साथ ही अन्य बिंदुओं का संक्षिप्त उल्लेख कर, अपनी मंशा बताई कि यह मैं सार्वजनिक करना चाहता हूं, उन्होंने कृपापूर्वक इसे स्वागतेय कहा। इस तारतम्य में मेरे द्वारा बनाई गई योजना और टिप्पणी इस प्रकार रही है-
कुबेरनाथ राय की पुस्तकों की मेरी जानकारी के अनुसार सूची निम्नानुसार है, इसमें साहित्य अकादेमी द्वारा प्रकाशित पुस्तक (सरल क्र. 23) में दी गई सूची की मदद ली गई है। इस सूची के अनुसार अन्य को छोड़कर, 21 प्रकाशित पुस्तकों की कुल पृष्ठ संख्या 3916 है। इस प्रकार योजना आठ या उससे अधिक खंडों की ही उपयुक्त होगी, क्योंकि इसमें पत्र, संपादकीय, परिचय, लेख सूची/अनुक्रमणिका तथा अन्य सामग्री शामिल होने पर पृष्ठ 4500 से कम न होंगे। नीचे सूची में पुस्तक का नाम-प्रकाशन वर्ष साहित्य अकादेमी के अनुसार है, आगे इन पुस्तकों के मेरे पास उपलब्ध संस्करण तथा उसके बाद पृष्ठ संख्या है।
क्र. पुस्तक-प्रकाशन वर्ष मेरे पास उपलब्ध संस्करण पृष्ठ संख्या
01 प्रिया नीलकंठी-1969? (1968, 1974) तृतीय-1978 172
02 रस आखेटक-1971? प्रथम-1970 292
03 गंधमादन-1972 (1972) द्वितीय-1974 323
04 निषाद बाँसुरी -1973? प्रथम-1974 235
05 विषाद योग-1974 (0000) द्वितीय-1976 250
06 पर्ण मुकुट-1978 प्रथम-1978 224
07 महाकवि की तर्जनी-1979 प्रथम-1979 223
08 पत्र मणिपुतुल के नाम-1980 (1980) द्वितीय-2004 101
09 मन पवन की नौका-1982 प्रथम-1982 170
10 किरातनदी में चंद्रमधु-1983 प्रथम-1983 156
11 दृष्टि अभिसार-1984 प्रथम-1984 175
12 त्रेता का वृहत्साम-1986 प्रथम-1986 206
13 कामधेनु-1990 प्रथम-1990 151
14 मराल-1993 प्रथम-1993 168
15 उत्तरकुरु-1993 प्रथम-1994? 132
16 चिन्मय भारत-1996 (1996) द्वितीय-2006 201
17 वाणी का क्षीरसागर-1998 प्रथम-1998 116
18 कंथामणि-1998 प्रथम-1998 110
19 अंधकार में अग्निशिखा-2001 प्रथम-1998 160
20 रामायण महातीर्थम्-2002 तीसरा-2007 351
21 आगम की नाव-2005 प्रथम-2008 126
अन्य -
22 निवेदिता रजत जयंती अंक-1997 स्वामी सहजानंद स्नातकोत्तर महाविद्यालय, गाजीपुर
23 साहित्य अकादेमी का प्रकाशन - कुबेरनाथ राय (2007) पुनर्मुद्रण 2014
खंड बनाते हुए प्रकाशन वर्ष को आधार बनाना उचित नहीं होगा, क्योंकि यह स्वयं स्पष्ट है कि महाकवि की तर्जनी-1979, त्रेता का वृहत्साम-1986 और रामायण महातीर्थम्-2002 को एक ही खंड में रखना होगा। राय साहब ने स्वयं निषाद बांसुरी -1973?, किरातनदी में चंद्रमधु-1983 और मन पवन की नौका-1982 को त्रिवर्ग (ट्रिओलोजी) बताया है। मेरे विचार से उत्तर कुरु भी इसमें शामिल होगा, इस प्रकार 4 पुस्तकें। इसी प्रकार उन्होंने स्वयं प्रिया नीलकंठी-1969?, गंधमादन-1972 और पर्ण मुकुट-1978 को एक ही रस परंपरा के अंतर्गत रखा है। इसमें रस आखेटक भी जुड़ जाएगा, (4 पुस्तकें) क्योंकि कामधेनु प्रथम संस्करण की भूमिका में कहा गया है कि प्रिया नीलकंठी, रस आखेटक और गंधमादन एक प्रकार की तो विषाद योग और कामधेनु (2 पुस्तकें) दूसरे प्रकार की। पत्र मणिपुतुल के नाम-1980 और कंथामणि-1998 उनकी अन्य सभी रचनाओं से अलग हैं।
संपादकीय दायित्व होगा कि निबंधों के प्रथम प्रकाशन का संदर्भ, पत्र-पत्रिका में हो तो नाम, वर्ष और अंक सहित दिया जाए। समग्र/ रचनावली में किस पुस्तक/संग्रह के अब तक कितने संस्करण आ चुके हैं, संस्करण में कुछ जोड़-घटाव हुआ हो, तो उसकी जानकारी सहित, ध्यान रखना होगा कि संस्करण और प्रकाशन वर्ष में विसंगतियां हो सकती है, जैसा कामधेनु के नेशनल पब्लिशिंग वाले संस्करण में है। इसमें यह भी उल्लेख है कि इस, द्वितीय संस्करण में पर्याप्त संशोधन और संवर्धन हुआ है और कुछ नये निबंध भी जोड़े गए हैं।
उनके द्वारा अप्रचलित शब्दों के प्रयोग पर टीप या ऐसे सौ-एक शब्द, जो यों अप्रचलित है, लेकिन उनके लेखन में अक्सर आए हैं, की अर्थ-व्याख्या सहित सूची होनी चाहिए। अज्ञात, अल्पज्ञात शब्दों के बारे में उन्होंने स्वयं रामायण महातीर्थम के ‘अपने लेखन के बारे में‘ में बात की है। जैसे स्यंदन या वर्म (हथियारबंद, जिरह-बख्तर?), कुहक, ना-धर्मी और हां-धर्मी तथा अस्ति-भवति का भी प्रयोग उनके लेखन में अक्सर है, जो यों अन्यत्र सामान्यतः नहीं होता।
इटैलिक पर, इन्वर्टेड पर, हलन्त पर, बिंदी और चंद्र बिन्दी का निर्णय लेना होगा, ङ ञ वाले शब्द संस्कृत उद्धरण में तो ठीक हैं, किंतु हिंदी (को हिन्दी लिखेंगे?) में अनुस्वार रखने पर विचार करना होगा। उसी तरह १-२ आदि के स्थान पर 1-2 का प्रयोग, जो भी निर्धारित हो उसका उल्लेख संपादकीय लेख-टीप में देना होगा और एकरूपता रहे इसका ध्यान रखना होगा। इसी तरह ‘आया‘ तो ठीक है किंतु- ‘आए‘ (न कि आये), आई (न कि आयी), तात्पर्य कि ऐसे शब्दों में जहां स्वर का प्रयोग हो सकता है, व्यंजन-मात्रा का प्रयोग न हो।
इस प्रकार के और ढेरों विचार मन में आ रहे हैं, यदि उपयोगी लगें तो अधिक समय दे कर ध्यान से करूंगा। यह काम मेरे लिए आनंद और आत्मसंतोष का होगा, बशर्ते कि यह आपके काम में मददगार और उपयोगी हो।
कुबेरनाथ जी के पूरे लेखन में से यदि एक पेज ही चुनना हो तो मेरा चयन होगा कामधेनु संग्रह के ‘दिवस का महाकाव्य‘ निबंध का आरंभ। मेरी पसंद का सबसे ललित अंश है। मानता हूं कि इस लालित्य के आगे और कुछ भी फीका पड़ जाएगा।

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