Tuesday, March 10, 2026

श्रीराम-राज्य-वियोग

‘जाज्वल्या‘ पत्रिका का प्रकाशन जांजगीर-चांपा जिला से विगत वर्षों से किया जा रहा है। इस संबंध में पत्रिका के मुख्य संपादक, कलेक्टर, जिला जांजगीर-चांपा श्री जनमेजय महोबे ने संपादकीय में लिखा है-... जाज्वल्यदेव लोक महोत्सव एवं एग्रीटेक कृषि मेला जिले की सांस्कृतिक चेतना का प्रतिनिधि बन चुका है।

यह महोत्सव शासन, प्रशासन, जनप्रतिनिधियों, कलाकारों, कृषकों एवं आम नागरिकों की सहभागिता से साकार होने वाला एक सामूहिक सांस्कृतिक अनुष्ठान है। तीन दिवसीय इस आयोजन में छत्तीसगढ़ के सुप्रसिद्ध लोक कलाकारों के साथ-साथ स्थानीय कलाकारों, विद्यालयीन एवं महाविद्यालयीन छात्र-छात्राओं की प्रस्तुतियाँ लोक संस्कृति की विविध छवियों को मंच प्रदान करती हैं। यह मंच नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य भी करता है।
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इस अवसर पर प्रकाशित जाज्वल्या स्मारिका जिले की साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं वैचारिक चेतना का दर्पण है। इसमें जिले के पर्यटन, ऐतिहासिक, पुरातात्विक एवं सांस्कृतिक स्थलों पर आधारित लेख, कविताएँ एवं रचनाएँ नए दृष्टिकोण के साथ पाठकों के समक्ष प्रस्तुत की गई हैं ...

‘जाज्वल्या 2026‘ में प्रकाशित मेरे लेख को समय-सीमा के कारण इसे वांछित रूप नहीं दे सका था, मगर पत्रिका के संपादक मंडल ने इसे पत्रिका में प्रमुखता से स्थान दिया, इसके लिए आभार। वह लेख अब कुछ आवश्यक संवर्धन सहित यहां प्रस्तुत- 

श्रीराम-राज्य-वियोग की काव्य-करुणा और जीवन-उमंग 

वैष्णवी भक्ति में वियोग को भी कृपा की तरह देखा गया है, क्योंकि वियोग में जैसी उद्दाम भावना और विकल स्मृति होती है, वह संयोग में नहीं। संभवतः यही भावधारा प्रवाहित हुई होगी शिवरीनारायण सज्जनाष्टक के पं. मालिकराम भोगहा जी के मन में, जिसका परिणाम हुआ ‘श्रीराम-राज्य-वियोग नाटक‘ की रचना। इस महत्वपूर्ण नाटक की प्रति दुर्लभ होने के कारण इसकी चर्चा कम ही हुई है। यह रचना छत्तीसगढ़ की आरंभिक महत्वपूर्ण नाट्य-कृति है, जिसे पढ़ कर कोई संदेह नहीं रह जाता कि यह अपने दौर के राम-साहित्य की एक अनुपम और बेजोड़ रचना है। इस पुस्तक के आरंभ में पं. लोचनप्रसाद पांडेय जी ने ग्रन्थकार पण्डित मालिकराम त्रिवेदी भोगहा (द्विजराज) की संक्षिप्त जीवनी लिखी है, जिसका एक अंश इस प्रकार है-

12 जनवरी सन् 1910 के मारवाड़ी (नागपुर) के अंक में, पं. मालिकरामजी की सचित्र, संक्षिप्त, जीवनी प्रकाशित हुई थी और उक्त पत्र के 22 दिसंबर 1909 के अंक के सम्पादकीय स्तम्भ में उनपर एक नोट छपा था। हम उसे नीचे उद्धृत करते हैं- ‘छत्तीसगढ़ के एक गुप्त हिन्दी साहित्यसेवी पं. मालिकराम त्रिवेदी भोगहा की असामयिक मृत्य से हिन्दी माता को बड़ी क्षति पहुंची है। पं. मालिकराम सुप्रसिद्ध ठाकुर जगन्मोहनसिंह के प्रवीण और प्रियतम शिष्य थे। वर्षों तक आप ठाकुर साहब के साथ रहे थे और देशाटन भी किया था। बिलासपुर ज़िले के अन्तर्गत शबरीनारायण क्षेत्र में आप निवास करते थे। शबरीनारायण मन्दिर के पुजारी (भोगहा) और कई गाँवों के अधिकारी थे। आप हिन्दी के उत्कृष्ट लेखक और कवि थे। रामराज्य-वियोग (नाटक); सुलोचना सती (नाटक); स्वप्नसम्पत्ति (नवन्यास); पद्यबद्ध शबरीनारायण महात्म्य; मालती (काव्य); सुरसुन्दरी (काव्य); आदि कई एक ग्रन्थ आपने रचे हैं। अफसोस आप अपने ग्रन्थों को प्रकाशित न कर सके। हिन्दी के सिवा, आप संस्कृत, प्राकृत, उर्दू, उड़िया, बँगला, मराठी और अँगरेज़ी भी जानते थे। गान और संगीत विद्या के बड़े प्रेमी और बड़े ईश्वर-भक्त थे। आपकी मृत्यु 30 नवम्बर 09 को हुई। आपकी उम्र 37-38 वर्ष की थी। आपके वियोग से आपके वृद्ध पिता और कुटुम्ब के लोगों के साथ साथ हिन्दी को भी बड़ी हानि पहुंची है। ईश्वर आपके कुटुम्बियों को धैर्य और मृत आत्मा को शान्ति प्रदान करे।‘
पं. मालिकराम भोगहा

इस कृति पर आगे चर्चा के पहले स्मरण करते चलें कि शिवरीनारायण न सिर्फ जिले का, बल्कि संपूर्ण छत्तीसगढ़ का पुराना वैष्णव मठ है। जिले के लक्ष्मणेश्वर मंदिर, खरौद और जांजगीर के विष्णु मंदिर में रामकथा के प्रसंगों का सुंदर शिल्पांकन है। हमारा जिला रामनामी समुदाय की भक्ति से ओतप्रोत है, जहां अकलतरा में रामलीला की ऐतिहासिक परंपरा रही है। साथ ही रामकथा वाचकों की परंपरा अब तक निरंतर है।

यहां छत्तीसगढ़ के राम-साहित्य का संक्षिप्त उल्लेख प्रासंगिक होगा। छत्तीसगढ़ के कवि शुकलाल प्रसाद पांडेय (1885-1951) की रचना है ‘मैथिली मंगल‘। उन्होंने सरल भाव से व्यक्त किया है कि जबलपुर के राजा गोकुलदास के यहां विवाह का कल्पनातीत वृहद आयोजन देख कर उनके मन में आया कि राम-सीता का विवाह कितना दिव्य रहा होगा और उसे किस तरह से शब्दों में, काव्य में उतारा जा सकता है। इसी प्रकार छत्तीसगढ़ की ही एक अन्य उल्लेखनीय और मनोरम रचना गिरधारीलाल रायकवार जी रचित हल्बी नाटक ‘सीता बिहा नाट‘ है। इस नाटक के संदर्भ में 1998 में मध्यप्रदेश के जनसंपर्क विभाग से प्रकाशित (तत्कालीन मंत्री हमारे गृह जिले के डॉ. चरणदास महंत) डॉ. हीरालाल शुक्ल संपादित-संयोजित हल्बी, माड़िया और मुरिया रामकथा के तीन भारी-भरकम खंडों का उल्लेख आवश्यक है, जिनमें गिरधारीलाल जी की यह रचना शामिल है। एक अन्य उल्लेख, छत्तीसगढ़ सम्मिलित मध्यप्रदेश के दौरान भोपाल में 1970 में ‘रामचरित मानस चतुश्शताब्दी समारोह समिति’ का गठन किया गया। इस समिति के संस्थापक हमारे गृहग्राम अकलतरा निवासी पं. रामभरोसे शुक्ल के मानस-मर्मज्ञ पुत्र पं. गोरेलाल शुक्ल जी (आईएएस) थे। समिति के मानस भवन से ‘तुलसी मानस भारती (मासिक)‘ पत्रिका का प्रकाशन पं. शुक्ल के प्रधान संपादकत्व में आरंभ हुआ। इसी क्रम में छत्तीसगढ़ के राम-साहित्य साधकों का स्मरण आवश्यक है, उन बहुतेरों में से कुछेक-

बिलासपुर निवासी महामहोपाध्याय जगन्नाथ प्रसाद ‘भानु‘ अल्प-चर्चित राम-रसिक हैं। उन्होंने तुलसी रामायण का अनुशीलन करते हुए महत्वपूर्ण मीमांसक कृतियों का प्रणयन किया, जो नवपंचामृत रामायण (1896), ‘तुम्हीं तो हो‘ का पहला भाग ‘रामाष्टक‘ (1914), श्रीतुलसी तत्वप्रकाश, रामायण प्रश्नोत्तरमाला सहित (1931), श्रीरामायण वर्णावली (1936), श्रीतुलसी भावप्रकाश (1937) हैं। डॉ. बलदेव प्रसाद मिश्र, मानस में रामकथा (1952), भारतीय संस्कृति को गोस्वामी तुलसीदास का योगदान (चार व्याख्यानों का संग्रह 1953), मानस-माधुरी (1958), खंड काव्य राम-राज्य (1960, पाठ्य संस्करण 1972), तुलसी-दर्शन (1938-39 में डी. लिट्. के लिए हिंदी में प्रस्तुत प्रथम शोध-प्रबंध, सातवां संस्करण 1967 में प्रकाशित) जैसी पुस्तकों के लेखक हैं।

हरि ठाकुर ने ‘छत्तीसगढ़ में रामकथा का विकास‘ शीर्षक लेख द्वारा इस विषय का विस्तार से परिचय दिया था। उनकी 1990 की डायरी में 47 रामकथा-साहित्य की सूची है, जो महाकवि नारायण के रामाभ्युदय महाकाव्य से आरंभ होती है, मगर क्रमांक में आरंभिक 10 इस प्रकार हैं- 1 राम प्रताप-महाकवि गोपाल, 2 तास रामायण-ठाकुर भोला सिंह बघेल, 3 छत्तीसगढ़ी रामचरितनाटक- उदयराम, 4 मैथिली मंगल-शुकलाल प्रसाद पाण्डेय, 5 कोशल किशोर-डा. बलदेव प्रसाद मिश्र, 6 छत्तीसगढ़ी रामायण-पं. सुन्दरलाल शर्मा, 7 वैदेही-विछोह- कपिलनाथ कश्यप, 8 राम विवाह- टीकाराम स्वर्णकार, 9 राम केंवट संवाद-पं. द्वारिका प्रसाद तिवारी विप्र 10 राम बनवास- श्यामलाल चतुर्वेदी आदि। इस क्रम में हमारे जिले के मेरे गृह-ग्राम अकलतरा निवासी गुलाबचंद देवांगन का ‘छत्तीसगढ़ी रमायेन‘ उल्लेखनीय प्रकाशन है। यह क्रम लंबा है, इसे यहां विराम देते हुए वापस श्रीरामराज्यवियोग नाटक पर आते हैं।

श्रीरामराज्यवियोग नाटक की प्रकाशित पुस्तक में भूमिका स्वयं भोगहा जी ने लिखी है, इससे स्पष्ट होता है कि इस नाटक के प्रकाशन की योजना तैयार हो गई थी, मगर प्रकाशन-पूर्व उनका निधन हो गया। भूमिका में वे लिखते हैं- कई वर्षों के कठिन परिश्रम से आज इसकी भूमिका लिखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। लोक प्रसिद्ध है,- ‘कोई भी वृहत् कर्म काल पा-कर, अवशेष पावे, तो उस कर्मकर्त्ता का हृदय अमित आनन्द का आगार बन जाता है।‘ उसी तरह मैं भी आज प्रफुल्ल हृदय हो, इस हर्ष से नहीं अघा सकता। इसका प्रारम्भ विचारने में एक कल्प बीत गया। अनेक आधि, व्याधि और उपाधियों से मन को कई बार समाधि देनी पड़ी थी। परन्तु दृढ़ साहस से अनेक असह्य दुःख रूपी पर्वत को लांघते आज अकस्मात् आनन्द-सागर के पुण्य-तट पर आ पहुँचा। ... ... ... इस पुस्तक की पूर्ति सात अंकों में हुई है। गर्भांकों की संख्या बीच बीच में मिलेगी। जिस प्रकार प्रस्तावना में प्रतिज्ञा है उसी रीति पर रचना की गई है। प्रत्येक रस को यथामति उनके स्वरूप ही में वर्णन किया है। यों तो इस में शक्तिभर प्रत्येक रस का विवरण है, परन्तु करुणा रस प्रधान है। इसी से मुझे सुदृढ़ आशा है कि, पाठक गण इसे आदर देंगे। ... ... ... इस कहावत से- परको अवगुण देखिये, अपनो दृष्टि न होय। करै उजरो दीप पै, तरे अँधेरो होय।। मैं अपना दोष नहीं देख सकता। आशा है कि, क्षमाशील पाठक गण कृपापूर्वक सूचित करेंगे, तो दूसरी आवृत्ति में अशुद्धियां शुद्ध कर दी जावेंगी। नाटक के पूर्व कवित्त है, जिसका अंतिम पद है- ‘धर्म चाहो कर्म चाहो वेदहू के मर्म चाहो, तो हे मीत! चाहो नित रामायण देखनो।‘ - रामायण में धर्म, कर्म और वेद का मर्म भी है। जैसाकि वाल्मीकि ने भी अपने ग्रंथ को ‘वेदोपबृंहणार्थाय‘ बताया है। शांत रस प्रधान, यथार्थपरक महाभारत का मूल स्वर वैराग्य है तो आदर्शपरक रामायण को करुणा-शोक का महाकाव्य निरूपित किया गया है। वाल्मीकि रामायण बालकांड द्वितीय सर्ग में ‘शोकार्तस्य प्रवृत्तो मे श्लोका ...‘ कहा गया है। 

आनंदवर्धन, ध्वन्यालोक के प्रथम उद्योत की कारिका-5 में ‘मा निषाद ...‘ पर कहते हैं- ‘नाना प्रकार के शब्द, अर्थ और संघटना के प्रपंच से मनोहर काव्य का सारभूत वही अर्थ है। तभी सहचरी के वियोग से कातर कौंच के क्रंदन से उत्पन्न आदिकवि वाल्मीकि का शोक श्लोक रूप में परिणत हुआ है- ‘... शोकः श्लोकत्वमागतः‘। आगे चतुर्थ उद्योत की कारिका-5 में कहा है- ‘रामायणे हि करुणो रसः स्वयमादिकविना सूत्रितः ‘शोकः श्लोकत्वमागतः‘ इत्येवंवादिना।‘ इस तरह रामायण में स्वयं कवि ने करुण रस का प्राधान्य सूचित किया है। 

श्रीराम-राज्य-वियोग नाटक में वही करुणा, वैसी ही दारुण व्यथा उभरती है, भोगहा जी ने स्वयं लिखते है- ‘मैं यह नहीं कह सकता कि, इस नाटक की रचना का अन्त, महाराज दशरथ के अन्त तक ही क्यों रखा गया?‘ ऐसा जान पड़ता है कि भोगहा जी की यह कृति उनके स्वयं के जीवन की रामायणमय-करूणा और व्यथा से उपजी है, उनके एक पत्र का हवाला पंडित लोचनप्रसाद जी ने दिया है, यह पत्र अपने अंतिम दिनों में उपचार के लिए प्रयाग के राजवैद्य पंडित जगन्नाथ शर्मा के यहां से उन्हें लिखा था- ‘मेरी दशा शोचनीय है। एक ईश्वर ही अवलम्ब है। कहो, कि यहाँ क्यों आये? मनमें निश्चय करके कि- डूब गये तो डूबगे, पार भये तो पार। पिता एक तरफ रोते रहते, स्त्री एक तरफ रोती रहती. प्रिय परिवार सब अपनी अपनी ओर खींचते। इससे निश्चिन्त यहाँ अटल समाधि लगा कर सो जाने का सानन्द समय मिलेगा।‘ क्या अपने नवजात पुत्र की मृत्यु के पश्चात से अस्वस्थ रहने लगे, मरणासन्न हाल में पहुच गए भोगहा जी का जीर्ण तन और व्यथित मन, अपने पिता के पुत्र-विछोह की आशंका महसूस कर रहा था? 

वियोग की करुणा और विराग की निष्काम तटस्थता में भी काव्य-रस का अविरल-प्रवाह, जीवन के उमंग को अनुप्राणित करता रहता है। 

(श्रीराम-राज्य-वियोग नाटक की प्रति का अवलोकन भोगहा जी के वंशज श्री वीरेन्द्र तिवारी जी एवं श्री हर्षवर्धन तिवारी जी के अनुग्रह से तथा श्री रवीन्द्र सिसोदिया जी के मार्गदर्शन और श्री रमाकांत सिंह जी के सहयोग से संभव हुआ।)

राहुल कुमार सिंह अकलतरा,
प्रमुख, धरोहर परियोजना,
बायोडायवर्सिटी एक्सप्लोरेशन एंड रिसर्च सेंटर

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