Wednesday, September 29, 2021

डॉ. ज्वालाप्रसाद मिश्र

यहां प्रस्तुत लेख, मूलतः स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्व. डॉ. ज्वाला प्रसाद मिश्र जी (जन्म: 18 अगस्त 1902, निर्वाण: 31 जनवरी 1994) के जीवन परिचय के पत्रक से है। पत्रक पर संपर्क का पता में डॉ. प्रभुलाल मिश्र (अब दिवंगत) का नामोल्लेख तथा अंकित है-
 
एकेनापि सुवृक्षेण पुष्पितेन सुगन्धिना। वासितं तद्वनं सर्वं सुपुत्रेण कुलं यथा।। 

डॉ. ज्वाला प्रसाद मिश्र 

बिलासपुर जिले के मुंगेली तहसील के लिम्हा ग्रामवासी ब्राह्मण समाज में प्रतिष्ठित स्व. चन्दूलाल मिश्र के द्वितीय पुत्र थे। डॉ. ज्वाला प्रसाद जी का जन्म 18 अगस्त 1902 रक्षाबंधन के दिन रायपुर जिले के तांदुल ग्राम (ननिहाल) में हुआ था। प्रारंभिक शिक्षा खेड़हा ग्राम मुंगेली तहसील में पूर्ण करने के पश्चात माध्यमिक एवं उच्चतर माध्यमिक शिक्षा रायपुर में हुई। जब वे उच्चतर माध्यमिक स्तर तक पहुंचे थे उसी समय नागपुर अधिवेशन में गांधी जी ने असहयोग आन्दोलन की घोषणा की तथा विद्यार्थियों को यह सन्देश भेजा गया कि वे शासकीय शिक्षण संस्थाओं का बहिष्कार करें। इस आह्वान के फलस्वरुप डॉ. साहब ने अन्य विद्यार्थियों के साथ शासकीय विद्यालय की पढ़ाई छोड़कर राष्ट्रीय स्कूल रायपुर से शिक्षा पूर्ण की। मध्यप्रदेश व बरार में राष्ट्रीय स्कूलों के छात्रों के लिये महाविद्यालयीन शिक्षण संस्थाओं में प्रवेश निषेध था अतः डॉ. साहब सन् 1922 में आयुर्वेदिक एवं यूनानी तिब्बिया कॉलेज दिल्ली में प्रवेश लिया। इस कॉलेज के संचालन समिति के अध्यक्ष हकीम अजमल खाँ तथा ज्येष्ठ मानद शल्य चिकित्सा प्राध्यापक डॉ. अन्सारी थे। ये दोनों राष्ट्रीय आन्दोलन के प्रमुख स्तम्भों में से थे, इनका प्रभाव डॉ. साहब पर भी पड़ा तथा उन्हें राष्ट्रीय आंदोलन के लिये प्रेरित किया। 

अखिल भारतीय कांग्रेस का दिल्ली अधिवेशन 1923 में आयोजित किया गया तथा तिब्बिया कालेज के डॉ. अन्सारी स्वागताध्यक्ष थे अतः डॉ. ज्वाला प्रसाद एवं अन्य विद्यार्थियों को स्वयं सेवकों की भूमिका निभाने का सुअवसर मिला। इसी अधिवेशन में मध्यप्रदेश के वरिष्ठ कांग्रेसी प्रतिनिधियों डॉ. ई. राघवेन्द्र राव, ठा. छेदीलाल बैरिस्टर तथा अन्य लोगों से डॉ. साहब का परिचय हुआ। एक ही जिले के होने से स्वाभाविक रुप से डॉ. साहब तथा ठाकुर साहब एक दूसरे की ओर आकृष्ट हुए तथा डॉ. साहब ने ठाकुर साहब से अकलतरा में आयुर्वेदिक अस्पताल प्रारंभ करने का अनुरोध किया तथा ठाकुर साहब ने इस शर्त पर उनका अनुरोध स्वीकार किया कि अध्ययन पूर्ण करने के पश्चात् उस अस्पताल के प्रथम प्रमुख चिकित्सक का भार उन्हें स्वीकारना होगा। तिब्बिया कॉलेज से भिषगाचार्य धन्वतरी की सनद लेने के पश्चात डॉ. अन्सारी के मातहत में 9 माह शल्य चिकित्सा का स्नातकोत्तर सनद प्राप्त कर अपने ग्राम लिम्हा वापस लौटे। उनके पिता स्व. चन्दूलाल मिश्र चाहते थे की डॉ. साहब मुंगेली में कार्य शुरु करें परन्तु इसी बीच बैरिस्टर साहब का पत्र आया कि वायदा निभाओ, अतः वचन से बंधे डॉ. साहब ने सन् 1926 में अकलतरा आयुर्वेदिक अस्पताल में प्रथम मुख्य चिकित्सक के रुप में अपनी सेवा अर्पित की। चूंकि डॉ. साहब कांग्रेस व गांधी जी के कार्यक्रम में अपने आप को अर्पित कर चुके थे अतः प्रत्येक रविवार तथा अवकाश के दिनों में गाँधीवादी कार्यक्रम में सम्मलित होते थे। 

1930 में डिस्ट्रिक्ट कौंसिल में परिवर्तन हुआ तथा नई डिस्ट्रिक्ट कौंसिल को डाक्टर साहब के इन कार्यक्रमों में भाग लेना अनुचित लगा अतः डाक्टर साहब ने गांधीवादी कार्यों को छोड़ने की जगह चिकित्सक पद छोड़ना उचित माना तथा इस पद से स्तीफा देकर स्वयं का अस्पताल प्रारंभ किया। अब वे राष्ट्रीय कार्यक्रमों में पूर्णरुप से भाग लेने लगे। 

डॉ. साहब की सक्रिय राजनीतिक जीवन अकलतरा सेनीटेशन पंचायत के अध्यक्ष के रुप में शुरु हुई। इसके पश्चात् डॉ. साहब ने पीछे मुड़ कर देखा नही तथा अपने आप को राष्ट्रीय कार्यक्रमों में झोंक दिया। 

गाँधी जी के आह्ववान पर सन् 1941 में 6 माह के लिये तथा 1942 में दो साल 9 माह के लिये जेल यात्रा की। द्वितीय जेल यात्रा के समय 14 दिन का उपवास भी किया। 

1946-51 तक कटघोरा विधान सभा डॉ. साहब विधायक रहे। डॉ. साहब जांजगीर कांग्रेस कमेटी जिला बिलासपुर कांग्रेस कमेटी के कार्य समिति के सदस्य रहे हैं। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य रहे। 

स्वतंत्रता प्राप्ति के कुछ वर्षाें पश्चात् जोड़ तोड़ की राजनीति से ऊब कर सक्रिय राजनीति को अलविदा कहा इसके पश्चात मृत्युपर्यन्त डॉ. साहब का अधिकतर समय खादी ग्रामोद्योग, सहकारिता क्षेत्र, भूदान, भारत सेवक समाज, छत्तीसगढ़ ब्राह्मण समाज, रामकृष्ण आश्रम आदि के कार्यक्रमों में बीतता था। डॉ. साहब छत्तीसगढ़ भ्रात संघ कार्यकारिणी के सदस्य भी रहे। 

जीवन के सोपान 

1920 - दिसम्बर 1920 में राष्ट्रीय कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन में हुए निर्णय का पालन करते हुए शासकीय शिक्षण संस्था का बहिष्कार । 

1923 - अखिल भारतीय कांग्रेस अधिवेशन दिल्ली में कांग्रेस स्वयं सेवक 

1926 - अकलतरा आयुर्वेदिक अस्पताल के मुख्य चिकित्सक 

1928 - कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन कलकत्ता में काम किये 

1930 - स्वयं का आयुर्वेदिक अस्पताल जिले का प्रथम आयुर्वेदिक फार्मेसी खोली। डॉ. चन्द्रभान सिंह आगरा में पदस्थापना के पूर्व अस्पताल में डॉ. साहब के साथ कार्यरत रहे। 

1932-51 - जांजगीर तहसील कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष, एक वर्ष बिलासपुर जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष रहे। 

1941 - वर्धा जेल में 6 माह का कारावास इसी समय उस जेल में महात्मा गांधी का सानिध्य प्राप्त हुआ। 

1942 - अगस्त 1942 में 2 साल 9 माह के लिये कारावास इस कार्यक्रम अवधि में नागपुर केन्द्रीय जेल में इनके साथ पंडित रविशंकर शुक्ला, द्वारिका प्रसाद मिश्र, आचार्य विनोबा भावे, शंकर राव देव, सेठ गोविन्द दास, इत्यादि स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रहे। त्रिपुरी कांग्रेस में ठा. छेदीलाल जी के साथ सक्रिय रुप से भाग लिया। 

1946-51 मध्यप्रदेश विधान सभा में कटघोरा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। 

1947 - से मृत्युपर्यन्त जिला खादी ग्रामोद्योग के सदस्य रहे। जांजगीर भूदान समिति के 2 वर्ष अध्यक्ष रहे। मुंगेली में भूदान संबंधित सभा में आचार्य विनोबा भावे ने डा. साहब को अपने पुराने साथी के रुप में संबोधित किया था। शंकर राव देव भूदान के लिये मुंगेली तहसील के कार्यक्रम के अवसर पर डॉ. साहब के ग्राम लिम्हा में उनके घर में भोजन करने की शर्त रखी थी कि उन्हे भूदान में जमीन देनी होगी। तब डॉ. साहब के परिवार ने अपने एक गांव की 35 एकड़ भूमि दान में दी थी। बिलासपुर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी समिति के अध्यक्ष रहे। 

1954 - से मृत्युपर्यंत अकलतरा हाई स्कूल शिक्षण समिति के कार्यकारणी के सदस्य रहे। 

1955 - संस्कृत परिषद बिलासपुर के संस्थापक सदस्य-इस समय श्री मुकुन्द केशव चितले अध्यक्ष थे। भारत सेवक समाज जिला स्तर के संयोजक रहे। एक वर्ष बिलासपुर भारत सेवक समाज के अध्यक रहे। खादी ग्रामोद्योग अनन्त आश्रम मुलमुला के संस्थापक तथा लगभग दो दशक तक इससे जुड़े रहे। 

जांजगीर को ऑपरेटिव बैंक के बहुउद्देश्यीय सोसाइटी (कृषक शाखा) के अध्यक्ष रहे। ग्राम लिम्हा में बहुउद्देशीय कोआपरेटिव सोसाइटी स्थापित कराई 15 वर्ष तक जनपद सभा जांजगीर के स्वास्थ्य कमेटी के अध्यक्ष रहे। छत्तीसगढ़ वैद्य समाज के दो बार अध्यक्ष रहे। धन्वंतरी महासंघ ने इनका अभिनंदन किया। छत्तीसगढ़ी ब्राह्मण समाज के दो बार अध्यक्ष रहे समाज ने द्विज रत्न से इनका अभिनंदन किया। जांजगीर तहसील में प्लेग की भयंकर महामारी के समय गांव-गांव सायकल से दौरा करते हुए ग्रामीणों की सेवा करते थे। 

1964 - से मृत्युपर्यंत तक रायपुर रामकृष्ण आश्रम में सक्रिय रुप से कार्यरत रहे तथा आश्रम के कार्य समिति के सदस्य रहे पेन्ड्रा में रामकृष्ण आश्रम को जमीन भी दान में दी। 

28.01.1965 में छत्तीसगढ़ बनाने के लिये आमंत्रित छत्तीसगढ़ी महासंघ की सभा राजनांदगांव में हुई थी तथा डॉक्टर साहब भी इसमें भाग लिये थे। छत्तीसगढ़ भ्रातृ संघ के कार्यकारिणी के सदस्य रहे। 

छ.ग. शासन द्वारा उनके नाम पर मुंगेली (जि. बिलासपुर) स्थित शासकीय विज्ञान महाविद्यालय का नामकरण ‘स्व. डॉ. ज्वाला प्रसाद मिश्र शा. विज्ञान महाविद्यालय मुंगेली‘ रखा गया है। वहीं उनके गृहग्राम पंचायत गीधा लिम्हा का नामकरण स्व. ज्वाला प्रसाद मिश्र के नाम पर डॉ. ज्वाला प्रसाद मिश्र गौरव ग्राम पंचायत रखा गया है। 

मेरी स्मृति में डॉ. ज्वालाप्रसाद जी कुछ अर्थों में आजादी के मायने के रूप में दर्ज हैं।

Tuesday, September 28, 2021

छत्तीसगढ़ के बौद्ध स्थल

छत्तीसगढ़ के बौद्ध स्थल प्रदर्शनी का आयोजन, महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय, रायपुर में दिनांक 17 मई से 30 जून 1993 तक आयोजित किया गया था। इस अवसर पर विभागीय अधिकारियों के सहयोग से तत्कालीन कलेक्टर श्री देवराज विरदी द्वारा तैयार आलेख, पत्रक के रूप में प्रकाशित-वितरित किया गया था। इसमें आई जानकारी संदर्भ हेतु उपयोगी, अतएव यहां प्रस्तुत है-

छत्तीसगढ़ के बौद्ध स्थल

मध्यप्रदेश का दक्षिण-पूर्वी अंचल प्राचीन काल में कौशल या दक्षिणी-कौशल के नाम से जाना जाता था। इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व की दृष्टि से यह क्षेत्र अधिक समृद्ध है। बन्धुत्व एवं सहिष्णुता की यहां गौरवशाली परम्परा रही है। ब्राह्मण, बौद्ध, जैन एवं शाक्त मत साथ-साथ फले फूले हैं, उनका प्रचार-प्रसार हुआ है, इतिहास इसका साक्षी है। यह धार्मिक सहिष्णुता एवं समन्वय का प्रमाण है।

विश्व के प्रमुख धर्मों में बौद्ध धर्म का महत्वपूर्ण स्थान है। इसका उद्भव हमारे देश में ही हुआ था। इसके प्रवर्तक थे महात्मा गौतम बुद्ध, जिनका जन्म कपिलवस्तु के शाक्य वंशी राजा शुद्धोदन की रानी महामाया की कोख से सन् ५७६ ई. पूर्व में हुआ था। इनके बचपन का नाम सिद्धार्थ था। १६ वर्ष की आयु में इनका विवाह यशोधरा से हो गया। २९ वें वर्ष में उनका एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका नाम ‘राहुल‘ रखा गया। २९ वें वर्ष में ही सन्यास ग्रहण कर घर का त्याग (महाभिनिष्क्रमण) कर दिया। उरुवेला में पहुँचकर सिद्धार्थ ने घोर तपस्या की, पर उसे ज्ञान की प्राप्ति नहीं हो सकी। एक दिन पीपल के पेड़ के नीचे उन्हें ज्ञान (बुद्धत्व) प्राप्त हुआ और वह यहीं से ‘बुद्ध‘ के नाम से प्रसिद्ध हुए। उस समय उनकी आयु ३९ वर्ष की थी।

ज्ञान-प्राप्ति के पश्चात बुद्ध ने अपना शेष जीवन लोगों के हित में लगाने का निश्चय किया तथा उनने अपना प्रथम धर्मोपदेश बनारस के निकट सारनाथ में दिया, जिसे ‘धर्मचक्र प्रवर्तन‘ की संज्ञा दी गई। अपने जीवन के शेष ४५ वर्ष ग्राम-ग्राम और नगर नगर में उन्होंने घूम-घूमकर अपनी शिक्षाओं का प्रचार-प्रसार किया। ८० वर्ष की आयु में ४८७ ईसा पूर्व में कुशीनगर (कुशीनारा) में उनका निधन हो गया। भगवान बुद्ध के अनुयायी ‘बौद्ध‘ कहलाये। चूंकि इस नये धर्म में परम्परागत रूढ़ियों, कुरीतियों, अन्धविश्वास, जाति प्रथा तथा याज्ञिक, कर्मकाण्ड आदि का विरोध किया तथा इसे नया वैज्ञानिक धरातल पर लाकर खड़ा कर दिया गया था। अतः इसका प्रचार-प्रसार द्रुत गति से होने लगा। बुद्ध के पश्चात मौर्य काल में सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार में नई स्फूर्ति एवं शक्ति का संचार किया। कुषाण काल से गुप्तोत्तर एवं राजपूत काल तक में न केवल दक्षिण भारत एवं लंका अपितु सुदूर दक्षिण-पूर्वी एशिया के सुवर्ण भूमि (बर्मा) थाईलैण्ड, कम्बोडिया, मलाया, जावा, सुमात्रा, बोर्नियो, चीन, जापान, कोरिया तक फैल गया। सम्राट कनिष्क एवं हर्ष के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता।

चूंकि दक्षिण कोशल एवं महाकान्तार मगध एवं दक्षिण भारत के मध्य में स्थित है, अतः अनुमान है कि मौर्य काल में ही इस क्षेत्र में प्रथम बार बौद्ध भिक्षुओं का पदार्पण मगध की ओर से हुआ होगा। तथा जोगीमारा गुफा एवं सीताबेंगरा गुफा बौद्ध भिक्षुओं के निवास गृह के रूप में प्रयुक्त हुई होंगी, इस की संभावना प्रबल है। जोगीमारा गुफा के भित्ति चित्र बौद्धमत से सम्बन्धित प्रतीत होते हैं। इनमें जातक कथाओं के कथानक का अंकन हुआ है। एक चित्र में बुद्ध बैठे हुए हैं तथा दूसरे में नदी एवं हाथियों की पंक्ति का अंकन है। भित्ति एवं छत पर निर्मित रंगीन चित्र अब धूमिल पड़ गये हैं तथा एकाएक दिखलाई नहीं पड़ते।

छत्तीसगढ़ अंचल के सिरपुर एवं मल्हार नामक दो प्रसिद्ध प्राचीन नगर बौद्ध कला के केन्द्र थे। इसी तरह राजिम, तुरतुरिया, एवं भोंगापाल भी अन्य महत्वपूर्ण एवं उल्लेखनीय बौद्ध स्थल थे।

१. सिरपुर -
सिरपुर, रायपुर नगर से ८४ कि.मी. की दूरी पर महानदी के दक्षिण तट पर स्थित है। शरभपुरी एवं सोमवंशी शासकों के अभिलेखों एवं ताम्रपत्रों में उल्लेखित नाम ‘श्रीपुर‘ ही बिगड़कर ‘सिरपुर‘ हो गया है। श्रीपुर का अर्थ लक्ष्मी का नगर अथवा समृद्ध नगर होता है। शरभपुरियों के उपरांत सोमवंशी राजाओं की छत्रछाया में सिरपुर में (जो इस अंचल का सबसे बड़ा केन्द्र था) अनेक बौद्ध विहारों का निर्माण हुआ तथा बहुत बड़ी संख्या में बौद्ध भिक्षु दूर-दूर से यहां आते थे। सोमवंशी बौद्ध धर्म के अनुयायी थे। किन्तु परवर्ती शासक शैव हो गये थे। सांस्कृतिक सह अस्तित्व एवं समन्वय की झांकी बौद्ध धर्म के विहार एवं प्राचीन मंदिरों से मिलती है।

चीनी यात्री ह्वेन सांग ने अपने भ्रमण वृत्तान्त में किया वसलो (कोशल) का ६३९ ई. में वर्णन किया है। उसके अनुसार इस राज्य का क्षेत्रफल ६०० ली तथा राजधानी का क्षेत्रफल ४० ली था युवानच्वाड्ग-२ पृ. २००) राजा क्षत्रिय जाति का था और बौद्ध धर्म को बहुत सम्मान देने वाला था। उसके गुण एवं प्रेम आदि की बड़ी प्रशंसा थी। राजधानी में कोई १०० संघाराम थे और १०००० से कुछ ही कम साधु थे, जो सब के सब महायान सम्प्रदाय का अनुशीलन करते थे। कोई २० देव मंदिर विरोधियों से भरे हुए थे। यहीं पूर्व में नागार्जुन बोधिसत्व सिरपुर में रहा था।

प्रमुख बौद्ध बिहार आनन्दप्रभकुटी विहार के नाम से प्रसिद्ध है, चूंकि इस विहार का निर्माण महाशिवगुप्त के काल में आनन्दप्रभ नामक एक बौद्ध भिक्षु द्वारा कराया गया था। इस विहार के अग्रभाग में एक मण्डप है, जिसमें प्रवेश द्वार के पास विशालकाय द्वार रक्षक एवं यक्ष प्रतिमा है। मध्य भाग में अष्टादश स्तंभों पर आधारित एक सभा मण्डप है, जिसके चारों ओर बरामदे हैं तथा उनके पीछे कुल १४ कोठरियां हैं। इसके पीछे गर्भगह में सिंहासनासीन २ मीटर ऊंची एक बुद्ध प्रतिमा भूस्पर्श मुद्रा में बैठी हुई प्राप्त हुई है, जो आज भी अपने मूल स्थान पर है। इसके वाम भाग में पद्मपाणि अवलोकितेश्वर की स्थानक प्रतिमा है। इस विहार के उत्खनन में तात्कालिक जीवन की झांकी प्रस्तुत करने वाले बर्तन, दिये, ताले, पूजा की मूर्तियां, पूजा-पात्र आदि अनेक पुरावशेष प्राप्त हुए हैं। इस विहार की निर्माण योजना में मंदिर एव विहार की निर्माण योजना का समन्वय दिखलाई पड़ता है।

इसी प्रकार सन् १९५५ में ही इसके समीप एक दूसरा विहार उत्खनित हुआ, जिसे हम स्वस्तिक विहार के नाम से जानते हैं। ईंट निर्मित इस विहार में सभा मण्डप के तीन ओर सामने पूर्व दिशा की ओर छोड़कर कक्ष निर्मित हैं। सभा मण्डप के दाहिनी ओर तीन कक्ष हैं। स्वस्तिक विहार के गर्भगृह में बुद्ध की भूस्पर्श मुद्रा में पद्मासन पर आसीन प्रतिमा सिंहासन पर विराजमान है। यह २.१० मीटर ऊंची है। इसके वाम पार्श्व में पद्मपाणि अवलोकितेश्वर की कट्यवलम्बित प्रतिमा सिंहासन पर विराजमान है।

सिरपुर में परमसुगत के जीवन सम्बन्धी प्रमुख घटनाओं का सूक्ष्म अंकन करने का प्रयास किया गया। धातु-प्रतिमाओं के निर्माण के क्षेत्र में इस अंचल में सिरपुर में प्रारंभिक सक्रियता के दर्शन होते हैं। अवलोकितेश्वर, पद्मपाणि, वज्रपाणि, मैत्रेय, तारा, मंजुश्री एवं बुद्ध के जीवन की भिन्न-भिन्न मुद्राएं रूपांकित हुई हैं। पूर्वी भारत की पाल कला शैली में निर्मित मगध के कुर्कीहार एवं नालन्दा से प्राप्त धातु प्रतिमाओं तथा सिरपुर की धातु-प्रतिमायें समकालीन हैं एवं उनमें अत्यधिक साम्य है। ये धातु प्रतिमायें अद्वितीय कला निधि एवं पुरातत्वीय विरासत हैं।

२. तुरतुरिया -
रायपुर जिले में रायपुर से व्हाया सिरपुर तुरतुरिया रायपुर से ११७ कि.मी. एवं सिरपुर से ३७ कि. मी. की दूरी पर है। कसडोल मार्ग पर स्थित ठाकुरदिया गांव से ४ कि.मी. दूर स्थित इस स्थल पर भी बौद्ध प्रतिमा विद्यमान हैं। किंवदन्ती है कि इसके निकट सघन वन में बौद्ध भिक्षुओं का एक विहार था, जिसको ढूंढा नहीं जा सका है। यहां पर सीता मंदिर में पद्मपाणि की एक प्रतिमा, कुंड के पास एक प्रतिमा एवं जानकी कुटी नामक मढ़िया में बुद्ध की दो एवं पद्मपाणि की दो प्रतिमाएं रखी हैं। ये लगभग ९ वीं शती ई. की हैं। यह स्थान सिरपुर से व्हाया शिवरीनारायण मल्हार के रास्ते में पड़ता है।

३. मल्हार-
छत्तीसगढ़ अंचल का मल्हार तीसरा बौद्ध केन्द्र था। यह प्राचीन ऐतिहासिक नगर, बिलासपुर जिले में बिलासपुर से ३२ कि.मी. दूर स्थित है। सिरपुर की भांति यहां भी शैव, वैष्णव, जैन, बौद्ध लोग मिल जुल कर रहते थे। महाशिवगुप्त के राजत्व काल में जारी किये गये, मल्हार ताम्रपत्र से हमें यह जानकारी प्राप्त होती है कि तरडंशक (आधुनिक तरोद ) भोग में स्थित कैलाशपुर (आधुनिक केसला या कोसला) ग्राम जो मल्हार से १३ कि.मी. आग्नेय कोण में स्थित है, को कोरदेव की पत्नी अलका द्वारा तरडंशक में बनवाये गये विहार में रहने वाले आर्य भिक्षु संघ को मामा भास्कर वर्मन की विज्ञप्ति से आषाढ़ मास की अमावस्या को सूर्य ग्रहण के समय दान में दिया गया था। यह दान बौद्ध भिक्षुओं को दिया गया था। (दे.पृ. ४५ एवं उत्कीर्ण लेख -श्री बी.सी.जैन)

मल्हार में ७ वीं शती ई. से १० शती ई. तक गुप्तकालीन परम्परा में बौद्ध स्मारक एवं प्रतिमाओं का निर्माण हुआ। बुद्ध बोधिसत्व, तारा, मंजुश्री, हेवज्र, आदि अनेक बौद्ध देवी देवताओं की प्रतिमायें मल्हार में प्राप्त हुई हैं। उत्खनन में स्थानीय प्रस्तरों से निर्मित हेवज्र देवता का मंदिर प्राप्त हुआ। यह गर्भगृह के ईंट निर्मित चबूतरे पर प्राप्त हुई। पकी मिट्टी की बहुसंख्यक मुहर की प्राप्ति विशेष उल्लेखनीय है। पकी मिट्टी की अण्डाकार मुहर जिस पर ‘कल्याणार्चि‘ उत्कीर्ण है, (काल-७वीं शती ई.) प्राप्त हुई है। ‘धर्मकारक‘ पात्र भी प्राप्त हुए हैं। मल्हार में सातवीं से लेकर दसवीं शती ई. तक मल्हार में तंत्रयान का विकास परिलक्षित होता है।

४. राजिम-सिरकट्टी (पाण्डुका)
रायपुर जिले में पैरी महानदी के संगम पर बसा राजिम नामक स्थान धार्मिक एवं पुरातत्वीय दृष्टि से महत्वपूर्ण है। यह रायपुर से देवभोग सड़क पर ४५ कि.मी. की दूरी पर है। कनिंघम के मतानुमार सिरपुर के लक्ष्मण मंदिर के मण्डप के स्तंभ नाव द्वारा राजिम लाये गये थे। (आ. सर्वे रिपोर्ट्स भाग - XVII पृ.२३) राजिम के राजीवलोचन मंदिर के परिसर के उत्तरी द्वार के निकट भूस्पर्श मुद्रा में बैठी हुई एक प्राचीन बुद्ध प्रतिमा स्थापित है, जो ८वीं-९वीं शती की है।

राजिम से देवभोग रोड पर २० कि. मी. दूर पाण्डुका ग्राम स्थित है, जहां से २ कि. मी. की दूरी पर सिरकट्टी आश्रम है, यह आश्रम एक प्राचीन टीले पर है। यहां पर चतुर्भुज मंदिर के पास पीपल के पेड़ के नीचे चार प्राचीन प्रस्तर-चौकी रखी हैं। ये बौद्धों की पूजन सामग्री से सम्बन्धित हैं। इन चौकियों पर मकार या नन्दी पाद चिन्ह एवं स्वस्तिक चिन्ह बने हुए हैं। एक चौकी पर बुद्ध जी है, जो मौर्यकालीन प्रतीत होती है। इससे ऐसा अनुमान है कि सिरपुर-राजिम क्षेत्र में बौद्धों का प्रचार मौर्यकाल में हो चुका था। प्राचीन नदी बन्दरगाह के अवशेष पैरी में सिरकट्टी में ही है।

५. भोंगापाल -
एक नये बौद्ध स्थल भोंगापाल, नारायणपुर से ३० कि.मी. उत्तर में सघन वन में स्थित की जानकारी हमें पुरातत्व विभाग मध्यप्रदेश द्वारा १९९०-९१ में कराये गये मलबा सफाई कार्य के परिणाम स्वरूप प्राप्त हुई है। अनुमान है कि यहां पर सिरपुर एवं भद्रावती के समान गुप्त एवं गुप्तोत्तर काल में एक प्राचीन बस्ती थी। भोंगापाल में लसूरा नदी के तट पर एक बौद्ध मठ या बौद्ध विहार के अवशेष एवं एक बुद्ध प्रतिमा प्राप्त हुई है, जो ७वीं शती ई. की है। ईंट निर्मित बौद्ध विहार में मण्डप, प्रदक्षिणापथ, देवपीठिका युक्त गर्भगृह जो अर्द्धवृत्ताकार (apsidal) एवं पूर्व दिशा को छोड़कर शेष तीन दिशाओं के मण्डपों से सम्बद्ध कक्षों के अवशेष प्राप्त हुए हैं। उड़ीसा में बोध नामक स्थान में भी ९वीं शती ई. के बौद्ध विहार के अवशेष प्राप्त हुए हैं। ये हमारे गौरवपूर्ण अतीत के मूक साक्षी हैं।

छत्तीसगढ़ के बौद्ध स्थल प्रदर्शनी में प्रदर्शित सामग्री -

१. आंचलिक बौद्ध स्मारकों एवं प्रतिमाओं के छायाचित्र -
१. जोगीमारा गुफा, रामगढ़, जिला सरगुजा
२. सीताबेंगरा गुफा, रामगढ़, जिला सरगुजा
३. ईंट निर्मित बौद्ध विहार, भोंगापाल, जिला बस्तर
४. ईट निर्मित बौद्ध विहार भोंगापाल के पीछे का दृश्य
५. ध्यानी बुद्ध की पद्मासन में आसीन प्रतिमा, भोंगापाल
६. आनंदप्रभकुटी विहार, सिरपुर, जिला रायपुर
७. स्वस्तिक विहार, सिरपुर, जिला रायपुर
८. गन्धेश्वर मंदिर, सिरपुर के नदी द्वार की बुद्ध प्रतिमा
९. तुरतुरिया के जानकी कुटी की बुद्ध-प्रतिमा
१०. मंजुश्री (धातु प्रतिमा) सिरपुर
११. वज्रपाणि (धातु प्रतिमा) सिरपुर
१२. अलंकृत स्तंभ जिस पर उलूक जातक का दृश्य अंकित है, मल्हार जिला बिलालपुर
१३. बुद्ध प्रतिमा, बूढीखार (मल्हार) जिला बिलासपुर
१४. जम्भल (कुबेर) मल्हार, जिला बिलासपुर

२. सिरपुर से प्राप्त बौद्ध मूल धातु प्रतिमाएं जो विशिष्ट पुरातत्वीय महत्व की हैं -
१. मंजुश्री
२. बोधिसत्व पदमपाणि
३. वज्रपाणि
४ भू-स्पर्श मुद्रा में बैठी हुई बुद्ध प्रतिमा
५. भू-स्पर्श मुद्रा में बैठी हुई बुद्ध प्रतिमा

३. सिरपुर से प्राप्त मृणमय मुहर ईंटें
१. बौद्ध मंत्र युक्त मुहर
२. मृण्मय मुहर, जिस पर स्थानक अवलोकितेश्वर अंकित हैं।
३. बौद्ध मंत्रयुक्त मृण्मय मुहर जिस पर भू-स्पर्श मुद्रा में बैठे हैं।
४. प्राचीन ईंट २ नग

४. सिरपुर से प्राप्त बौद्ध पाषाण-प्रतिमायें -
१. भूस्पर्श मुद्रा में बैठी हुई लघु बुद्ध प्रतिमा
२ मंजुश्री की कृष्ण प्रस्तर निर्मित लघु प्रतिमा जिसमें पीछे अभिलेख है।
३. बुद्ध प्रतिमा
४. मंजुश्री
५. बुद्ध प्रतिमा, लाल बलुआ पत्थर निर्मित
६. बुद्ध पद्मासनस्थ चौकी पर ५ पंक्ति का लेख उत्कीर्ण है।

५. मल्हार, जिला बिलासपुर के ४ पुरावशेष भी प्रदर्शित किये गये हैं -
१. मृण्मय बौद्ध मंत्र युक्त मुहर जिसमें स्तूप के मध्य बुद्ध बैठे हैं।
२. मृण्मय मुहर जिस पर बौद्ध बीज मंत्र अंकित है।
३. मृण्मय मुहर बौद्धमंत्र युक्त (अंशतः खण्डित) श्री गुलाब सिंह, मल्हार के सौजन्य से प्रदर्शनी हेतु ये पुरावशेष प्राप्त हुए हैं।

६. छत्तीसगढ़ के पुरातत्वीय स्मारक स्थल का नक्शा जिसमें बौद्ध स्थल अंकित हैं -

७. सिरपुर के प्राचीन स्थल एवं बौद्ध विहार, भोंगापाल के मानचित्र -

सम्पर्क - महन्त घासीदास स्मारक संग्रहालय रायपुर, स्थित
१. उपसंचालक कार्यालय पुरातत्व एवं संग्रहालय मध्यप्रदेश दक्षिणी क्षेत्र दूरभाष क्रमांक :-२७९७६
२. संग्रहाध्यक्ष कार्यालय दूरभाष क्रमांक - २७९७६
आलेख: देवराज विरदी (आई.ए.एस.) जिलाध्यक्ष एवं अध्यक्ष जिला पुरातत्व संघ रायपुर (म.प्र.)

Sunday, September 26, 2021

छत्तीसगढ़ में पुरातत्व प्रगति - 1986

1986 में प्रकाशित पत्रक की प्रस्तुति

छत्तीसगढ़ में पुरातत्व की प्रगति के तीन दशक

छत्तीसगढ़ भौगोलिक दृष्टि से मध्यप्रदेश का सबसे बड़ा क्षेत्र है। जिसके अन्तर्गत बस्तर, रायपुर, दुर्ग, राजनांदगांव, बिलासपुर, रायगढ़, अम्बिकापुर जिले आते हैं। यह क्षेत्र सांस्कृतिक दृष्टि से भी अत्यन्त सम्पन्न है। यहां प्रागैतिहासिक काल से वर्तमान समय तक के इतिहास और संस्कृति की निरन्तर श्रृंखला मिलती है।

१ नवम्बर १९५६ को नये मध्य प्रदेश राज्य का गठन हुआ। उस समय से अब तक पुरातत्व के क्षेत्र में अनेक उपलब्धियां हुई हैं जो क्षेत्रीय इतिहास के उन्नयन में महत्वपूर्ण सिद्ध हुई हैं। इस क्षेत्र में पुरातत्व की दृष्टि से हुई प्रगति का विवरण निम्नानुसार है-

नवीन उपलब्धियां
(अ) स्मारक एवं प्रतिमाएं-
छत्तीसगढ़ क्षेत्र में अनेक प्रागैतिहासिक चित्रित शैलाश्रय, मंदिर, प्रतिमाएं, अभिलेख एवं मुद्राएं विगत ३० वर्षों में प्राप्त हुई हैं।
(१) चित्रित शैलाश्रय- रायगढ़ जिले में सिंघनपुर एवं कबरा पहाड़ के शैलचित्र अत्यन्त प्रसिद्ध एवं सर्वज्ञात हैं। इसके अतिरिक्त मध्यप्रदेश शासन के पुरातत्व-विभाग के सर्वेक्षण के परिणाम स्वरूप इसी जिले में ओंगना, करमागढ़, लेखामाड़ा तथा दुर्ग जिले में चितवा डोंगरी के चित्रित शैलाश्रय प्रकाश में आये हैं।
(2) मंदिर स्थापत्य- मंदिर स्थापत्य की सुस्पष्ट परम्परा इस क्षेत्र में रही है। अभी हाल के वर्षों में बिलासपुर जिले के ताला नामक स्थान से ५वीं-६वीं शती ई. के देवरानी जेठानी नामक दो मंदिर प्राप्त हुए हैं। राजनांदगांव जिले में बिरखा-घटियारी नामक स्थान में शिवमंदिर, रायपुर जिले में धोबनी ग्राम में ईंटों का बना चितावरी मंदिर, दुर्ग जिले में सरदा नामक स्थान का शिवमंदिर, अम्बिकापुर जिले में देवगढ़, सतमहला, महेशपुर एवं डीपाडीह के मंदिर उल्लेखनीय हैं।
(3) मूर्तियां- छत्तीसगढ़ क्षेत्र में विगत ३० वर्षों में अनेक प्रतिमाएं मिली हैं। मूर्ति शिल्प की दृष्टि से बिरखा-घटियारी ग्राम से मंदिर की सफाई में प्राप्त त्रिपुरान्तक शिव की दो, अंधकासुर वध एवं नटराज की एक-एक प्रतिमा मिली (रायपुर संग्रहालय में रखी है) मठपुरेना (रायपुर) में ब्रह्मा, वज्रपाणि की मूर्तियां, गंगरेल बांध के डूब क्षेत्र में पायी अनन्तशेषशायी विष्णु की प्रतिमा, बस्तर जिले मे इन्द्रावती डूब क्षेत्र में चित्रकूट के समीपवर्ती ग्रामों में विष्णु, उमामहेश्वर, लज्जागौरी, लक्ष्मीनारायण, ब्रह्मा, पार्श्वनाथ आदि की प्रतिमाएं उल्लेखनीय हैं। दुर्ग जिले में नर्राटोला में अनेक गोंडकालीन प्रतिमाएं मिली हैं। ताला (बिलासपुर) में कार्तिकेय, शिवलीला के दृश्य, कीर्तिमुख, मल्हार में अभिलिखित विष्णु, स्कन्दमाता, कुबेर, अड़भार में महिषासुर मर्दिनी, अष्टभुजी शिव आदि की प्रतिमाएं मिली हैं।
(४) अभिलेख- छत्तीसगढ़ क्षेत्र में मौर्यकाल से लेकर १७वीं शती तक के अभिलेख मिले हैं। इस श्रृंखला में विगत तीस वर्षों में प्राप्त अभिलेखों में शरभपुरीय वंश के शासकों में नरेन्द्र का कुरुद और रीवां से प्राप्त ताम्रपत्र, मल्हार से प्राप्त प्रवरराज का एक तथा जयराज के दो तथा व्याघ्रराज का एक ताम्रपत्र, सुदेवराज का महासमुंद ताम्रपत्र, पाण्डुवंशीय शासकों में तीवरदेव एवं महाशिवगुप्त के बोंडा ताम्रपत्र तथा महाशिवगुप्त के ही महासमुन्द तथा मल्हार से प्राप्त ताम्रपत्र उल्लेखनीय हैं। कलचुरि शासकों में पृथ्वीदेव द्वितीय तथा रत्नदेव तृतीय का पासिद ताम्रपत्र तथा प्रतापमल्ल का कोनारीग्राम ताम्रपत्र महत्वपूर्ण है। बिलासपुर जिले में लेंहगाभांठा से प्राप्त शिलालेख तथा मल्हार से पांडववंशीय राजा शूरबल का ताम्रपत्र भी उल्लेखनीय है।
(५) मुद्राएं- महन्त घासीदास स्मारक संग्रहालय में आहत मुद्राओं से लेकर ब्रिटिशकाल तक की मुद्राओं का सुन्दर संग्रह है। विगत तीस वर्षों में इस क्षेत्र से अनेक मुद्राएं प्राप्त हुई हैं। इनमें बानबरद (जिला दुर्ग) से प्राप्त गुप्तकालीन स्वर्ण मुद्राएं अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं। इसके साथ ही उभारदार (repousse) स्वर्ण मुद्राओं की एक लम्बी श्रृंखला विगत वर्षों से मिली है, जिसमें पितईबंध, रीवां तथा कुलिया से प्राप्त मुद्राएं महत्वपूर्ण हैं। पूर्व में प्रसन्नमात्र, महेन्द्रादित्य, वराहराज, भवदत्त तथा अर्थपति नामक राजा उभारदार मुद्राओं द्वारा ज्ञात थे पर इन स्थानों से क्रमादित्य, नन्दनराज और स्तम्भ नामक नए राजाओं का ज्ञान हुआ है। हाल ही में प्रसन्नमात्र के ताला से चांदी तथा मल्हार से ताम्र सिक्के भी मिले हैं। धरसींवा के निकट सोंड्रा ग्राम में सतीमदेव नामक राजा की एक स्वर्ण मुद्रा मिली हैं। इन महत्वपूर्ण मुद्राओं के अतिरिका पूर्व में ज्ञात शासकों की मुद्राएं भी बड़ी मात्रा में मिली हैं। सहसपुर लोहारा (राजनांदगांव) से ३४ स्वर्ण मुद्राएं कलचुरि शासक जाजल्लदेव, पृथ्वीदेव एवं ३ पद्मटंका हाल ही में प्राप्त हुए हैं।

(ब) उत्खनन- इस क्षेत्र में इस अवधि में उत्खनन कार्य अत्यन्त सीमित रूप से हुआ है। सिरपुर में १९५३-५४ में सागर विश्वविद्यालय तथा १९५४-५५ एवं ५५-५६ में तत्कालीन शासन द्वारा कराया गया उत्खनन महत्वपूर्ण है।

जिसमें स्वस्तिक विहार एवं आनन्दप्रभकुटी विहार नामक दो बौद्ध विहार प्रकाश में आए तथा अनेक सिक्के, अभिलेख, सील, मिट्टी के पात्र, मृणमूर्तियां, पाषाण प्रतिमाएं प्राप्त हुयी हैं। 

वर्ष १९५६-५७ में धनोरा नामक स्थान का सीमित उत्खनन कराया गया है, जिसमें हड्डियों के टुकड़े, मनके, कांच की चूड़ियों के टुकड़े तथा ताम्बे के पात्र के खंडित अंश प्राप्त हुए। इसके पश्चात सागर वि. वि. द्वारा मल्हार में १९७५ से ७८ तक उत्खनन कार्य किया गया जिसमें अनेक प्रतिमाएं, सिक्के, मुहरें तथा स्मारकों के अवशेष प्राप्त हुए हैं।

मलबा सफाई एवं अनुरक्षण कार्य- वर्ष १९७७ में राजनांदगांव जिले के बिरखा घटियारी ग्राम में विभाग द्वारा शिवमंदिर का मलबा सफाई कराया गया जिसमें मंदिर के ध्वंसावशेष, विशाल स्तम्भ, चंद्र-शिला, प्रतिमाएं आदि प्राप्त हुईं तथा मंदिर का मंडप, गर्भ-गृह आदि प्रकाश में आए । वर्ष १९७८ में बिलासपुर जिलान्तर्गत ताला (ग्राम-अमेरीकांपा) के मलबा सफाई में देवरानी मंदिर की भू-योजना स्पष्ट हुई। वर्ष १९८५-८६ में यहीं टीले के रूप में जेठानी मंदिर की मलबा सफाई होने से अधिष्ठान, गर्भगृह, मंडप स्पष्ट हुए तथा विशाल स्तम्भ, सिक्के, मनके, पाषाणास्त्र, मृदभाण्ड तथा पंचधातु के आभूषण एवं पाषाण प्रतिमाएं प्राप्त हुई।

इस क्षेत्र के स्मारकों में स्वस्तिक विहार, आनन्दप्रभकुटी विहार, सिरपुर, भोरमदेव, मंडवामहल, चितावरी देवी मंदिर, घोबनी आदि में फेन्सिग कार्य तथा शेड आदि बनवाए गये एवं राजिम, ताला, पलारी, घटियारी आदि में प्रस्तावित है।

सर्वेक्षण- इन तीस वर्षों में यहां की पैरी, सोंढूर, महानदी, इन्द्रावती आदि नदियों पर विविध बांध परियोजनाओं का पुरातत्वीय सर्वेक्षण हुआ है। ये परियोजनाएं हैं- महानदी-गंगरेल बांध, सोंढूर बांध, कोडार बांध, मोगरा बांध, बोधघाट जल विद्युत परियोजना, इन्चमपल्ली, चित्रकूट, कुटरु प्रथम, मटनार जल विद्युत परियोजनाएं आदि। परियोजनाओं में गंगरेल बांध में कई स्थलों पर प्रतिमाएं डूब क्षेत्र के ग्रामों में मिली हैं। इन्चमपल्ली, चित्रकूट, कुटरु प्रथम जल विद्युत परियोजनाओं में १०वीं से लेकर १६-१७वीं शती तक की प्रतिमाएं मिली हैं, जिसका संग्रह किया जाने वाला है। इन्द्रावती नदी पर बनने वाले चित्रकूट जल-विद्युत परियोजना में छिदगांव में छिदक नागवंशीय शासकों का शिवमंदिर वर्ष १९८५-८६ के सर्वेक्षण की नवीन उपलब्धि है। इसी के साथ आदिवासी संस्कृति के स्मारक एवं स्थलों का समुचित रिकार्ड व जानकारी भी संग्रहित की गई है।

संरक्षित स्मारक- इस अवधि में इस क्षेत्र के निम्न १७ स्मारक स्थल संरक्षित किए गये -

रायपुर जिला - १ स्वस्तिक विहार, सिरपुर। २ आनन्दप्रभकुटी विहार, सिरपुर। ३ कुलेश्वर महादेव मंदिर, नवापारा राजिम। ४ सिद्धेश्वर मंदिर, पलारी। ५ चितावरी देवी मंदिर, धोबनी। ६ शिवमंदिर, चंदखुरी।
बिलासपुर जिला - १ देवरानी-जेठानी मंदिर, ताला । २ लक्ष्मणेश्वर मंदिर, खरौद। ३ डिडिनदाई मंदिर, मल्हार। ४ धूमनाथ मंदिर, सरगांव। ५ देव मंदिर, किरारी गोढी। ६ महामाया मंदिर, रतनपुर। ७ कबीर पंथियों की मजार, कुदुरमाल।
राजनांदगांव जिला - १ शिव मंदिर, बिरखा-घटियारी। २ भोरमदेव मंदिर, चौरा। ३ मंडवा-महल एवं छेरकी महल, छपरी।
रायगढ़ जिला - १ चित्रित शैलाश्रय, सिंघनपुर।

इनके अतिरिक्त निम्नलिखित ५ स्मारकों को संरक्षण किए जाने हेतु प्रथम अधिसूचना शासन द्वारा जारी हो चुकी है-
१ गन्धेश्वर मंदिर, सिरपुर (रायपुर), २ रहस्यमय सुरंग, करियादामा (रायपुर) ३ प्राचीन संग्रहालय भवन, रायपुर ४ प्राचीन शिव मंदिर, गनियारी (बिलासपुर) ५ गोपाल मंदिर, बोरासेमी मंदिर, एवं केवटिन मंदिर, पुजारीपाली (रायगढ़)।

इनके अतिरिक्त इस क्षेत्र के करीब १० स्मारक एवं स्थलों के संरक्षित किए जाने के प्रस्ताव शासन के विचाराधीन है। संग्रहालय- इस क्षेत्र के पुरातत्वीय संग्रहालयों में भारत के प्राचीन संग्रहालयों में १०वां स्थान रायपुर स्थित महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय का है। जिसकी स्थापना वर्ष १८७५ है। इसके अतिरिक्त वर्ष १९८२-८३ में जिला संग्रहालय बिलासपुर की स्थापना हुई है। तीसरा संग्रहालय इन्दिरा कला एवं संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़ (राजनांदगांव) में खोला गया है। एक नृतत्वशास्त्रीय संग्रहालय जगदलपुर में हाल के वर्षों में बना है, जिसमें आदिवासी संस्कृति को सुरूचिपूर्ण ढंग से प्रदर्शित किया गया है। 

महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय रायपुर में पाषाण प्रतिमाएं, कांस्य प्रतिमाएं, सिक्के, प्रस्तर अभिलेख, ताम्रपत्र, हस्तलिखित ग्रंथ, मृण्मय मूर्तियां, सील, मनके, पाषाणास्त्र, ताम्रास्त्र आदि का सुन्दर एवं सुरुचिपूर्ण संग्रह है। यह सामग्री छत्तीसगढ़ के ही विविध स्थलों से संग्रहीत की गई है। इनके अतिरिक्त यहां के संग्रहालय में प्राकृतिक इतिहास एवं मानवशास्त्रीय सामग्री भी प्रचुर मात्रा में प्रदर्शित है। यह सारी सामाग्री छत्तीसगढ़ की कला एवं संस्कृति का सच्चा प्रतिनिधित्व करती है तथा इतिहास की कड़ियों का श्रृंखलाबद्ध क्रम यहां पाते हैं। 

जिला संग्रहालय, बिलासपुर का संग्रह अपनी प्रारंभिक अवस्था में है। यहां करीब ८० पुरावशेष संग्रहीत है जिनमें ६० पाषाण प्रतिमाएं रतनपुर, पंडरिया, खैरासेतगंगा, ताला, मदनपुरगढ़, गनियारी, दारसागर, मल्हार आदि से संग्रहीत की गई है। इसके साथ ही करीब १५ सिक्के, एक ताम्रपत्र तथा ३ शिलालेख प्रदर्शित है। 

इन्दिरा कला संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़ के प्राचीन भारतीय कला इतिहास विभाग के अन्तर्गत छोटा सा संग्रहालय है, जिसमें प्रमुख रूप से राजनांदगांव एवं दुर्ग जिले की गोंडकालीन प्रतिमाओं का संग्रह है। 

पंजीयन- छत्तीसगढ़ क्षेत्र के तीन संभागों के अंतगंत रजिस्ट्रीकरण अधिकारी के दो कार्यालय हैं, जिनमें अप्रैल १९७६ से अक्टूबर १९८६ तक जिलेवार पुरावशेषों के पंजीयन की स्थिति निम्नानुसार है- 
(घ) अन्य गतिविधियां- वर्ष १९८४ में दशहरे के पर्व पर जगदलपुर में विभाग द्वारा प्रदर्शनी लगायी गयी। वर्ष १९८५ में खैरागढ़ में नृत्य एवं संगीत विषय के अन्तर्गत एक प्रदर्शनी का सुंदर आयोजन किया गया। बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर वर्ष १९८५ में ही सिरपुर उत्सव मनाया गया जिसमें प्रदर्शनी, सिरपुर यात्रा एवं लोक संगीत के कार्यक्रम हुए। 

रायपुर संग्रहालय में संग्रहीत सिरपुर की धातु प्रतिमाओं का प्रदर्शन जापान, जर्मनी, इंग्लैंड, अमेरिका एवं फ्रांस में हाल के वर्षों में हो चुका है। 

रायपुर संग्रहालय से संबद्ध महंत सर्वेश्वरदास ग्रंथालय है, जिसमें करीब १५ हजार पुस्तकों का सुन्दर संग्रह है जो ज्ञान, विज्ञान, कला, साहित्य, संस्कृति, धर्म, दर्शन आदि पर हैं तथा देश की सभी प्रमुख पत्रिकाएं एंव समाचार पत्र आते हैं जिससे स्थानीय जन लाभान्वित होते हैं । 

(य) प्रकाशन- इन तीस वर्षों में छत्तीसगढ़ से संबंधित विभागीय प्रकाशन निम्नानुसार है-
१. महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय में सुरक्षित उत्कीर्ण लेखों की विवरणात्मक सूची लेखक- बालचन्द्र जैन, मूल्य ००-३१
२. लिस्ट ऑफ क्वाइन्स डिपोजिटेड इन दि एम. जी. एम. म्यूजियम रायपुर (अंग्रेजी में) लेखक- बालचन्द्र जैन, मूल्य - ००-३०
३. महन्त घासीदास स्मारक संग्रहालय (उद्भव इतिहास और प्रवृत्तियां)लेखक- बालचन्द्र जैन, निःशुल्क
४. मानवशास्त्रीय उप विभाग प्रदर्शिका लेखक- बालचन्द्र जैन, मूल्य -१-००
५. प्रकृति इतिहास उप विभाग प्रदर्शिका लेखक- बालचन्द्र जैन मूल्य १-२५
६. पुरातत्व उप विभाग प्रदर्शिका लेखक- बालचन्द्र जैन मूल्य १-५०
७. पुरातत्व विभाग का सूचीपत्र भाग २ पाषाण प्रतिमाएं लेखक- बालचन्द्र जैन मूल्य -१-५०
८. पुरातत्व उप विभाग का सूची पत्र भाग ३ धातु प्रतिमाएं लेखक-बालचन्द्र जैन मूल्य १-००
९. पुरातत्व उपविभाग का सूचीपत्र भाग ६, उत्कीर्ण लेख लेखक- बालचन्द्र जैन मूल्य १३-००
१०. पिक्चर पोस्टकार्ड (म. पा. स्मा. सं.) लेखक-बालचन्द्र जैन मूल्य प्रतिसेट ००-४०
११. भोरमदेव मंदिर प्रदर्शिका लेखक- डा. जी.के. चन्द्रौल, मूल्य ५-४०
१२. सिरपुर लेखक एस.एस. यादव मूल्य ५-००

कार्यालयः
१. संग्रहाध्यक्ष, एम. जी. एम. म्यूजियम रायपुर फोन 26976
२. रजिस्ट्रीकरण अधिकारी, पुरातत्व एवं संग्रहालय, सुभाष स्टेडियम के पीछे, रायपुर (म. प्र.) फोन 27058 
३. पुरातत्ववेत्ता, पुरातत्व एवं संग्रहालय, (रायपुर वृत्त) सुभाष स्टेडियम के पीछे, रायपुर (म.प्र.) फोन 27058
४. रजिस्ट्रीकरण अधिकारी, पुरातत्व एवं संग्रहालय, राजेंद्रनगर, हेड पोस्ट आफिस के पास, बिलासपुर, फोन 4249
५. संग्रहाध्यक्ष, जिला संग्रहालय, टाऊन हाल, बिलासपुर (म. प्र.)
६. उप संचालक, पुरातत्व एवं संग्रहालय का कार्यालय रायपुर में प्रारम्भ किये जाने की वित्तीय स्वीकृति शासन द्वारा प्राप्त हो गई है यह कार्यालय शीघ्र खोला जाना प्रस्तावित है।

पुरातत्व एव संग्रहालय, मध्यप्रदेश रायपुर द्वारा प्रकाशित तथा कृष्णसखा प्रेस द्वारा मुद्रित आलेख- वेदप्रकाश नगायच 1000/... 1986

Saturday, September 25, 2021

छत्तीसगढ़ का पुरातत्व - 1986

मध्यप्रदेश की स्थापना के तीन दशक अवसर पर 1 नवंबर 1986 को प्रकाशित इस पत्रक का आलेख डा. लक्ष्मीशंकर निगम का है। ऐसे अवसरों पर आयोजन के साथ इस तरह की प्रकाशित सामग्री स्थायी महत्व की, अतएव सदैव प्रासंगिक होती हैं, किंतु सहज उपलब्ध नहीं होती, इस दृष्टि से यहां प्रस्तुत की जा रही है। यह भी उल्लेखनीय है कि उस दौर में पुरातत्व-संग्रहालय की गतिविधियों पर विशेषज्ञों, रुचि रखने वालों की निगरानी, टीका-टिप्पणी और सक्रिय निःशर्त अपेक्षारहित सहयोग विभागीय अधिकारियों को मिलता था। डॉ. विष्णुसिंह ठाकुर, डॉ. लक्ष्मीशंकर निगम जैसे पुराविद, इतिहासकार डॉ. रमेन्द्रनाथ मिश्र तथा छत्तीसगढ़ के इतिहास, साहित्य, संस्कृति के जानकार हरि ठाकुर जैसी विभूतियां विभागीय कार्यालय-संग्रहालय के नियमित संपर्क में रहते, विभागीय अधिकारियों के मान-सम्मान के पात्र होते थे।

छत्तीसगढ़ का पुरातत्व

मध्यप्रदेश के दक्षिण-पूर्वी क्षेत्र में स्थित रायपुर, बिलासपुर और बस्तर संभाग का क्षेत्र छत्तीसगढ़ के नाम से प्रख्यात है। इस भू-भाग का अधिकांश हिस्सा (पूर्व बस्तर रियासत को छोड़कर) तथा पश्चिमी उड़ीसा का क्षेत्र दक्षिण कोसल के नाम से प्रसिद्ध था। भारतीय इतिहास, संस्कृति एव पुरातत्व के क्षेत्र में दक्षिण कोसल का स्थान महत्वपूर्ण रहा है। इस अंचल के पुरातत्व के विषय में उस समय से जानकारी मिलती है, जब मानव-सभ्यता का पर्याप्त विकास नहीं हुआ था तथा मनुष्य पशुओं की भांति जंगलों, पर्वतों और नदियों के तटवर्ती क्षेत्रों में जीवन व्यतीत करता था। अन्य प्राणियों से बुद्धि में श्रेष्ठ होने के कारण मानव ने पत्थरों को नुकीला बनाकर उसे उपकरण (हथियार) के रूप में प्रयुक्त करना प्रारम्भ किया, जिससे भोजन सरलतापूर्वक प्राप्त कर सके। पाषाण के प्रयोग के कारण, यह युग पाषाण-काल के नाम से सम्बोधित किया जाता है। विकास की अवस्था के आधार पर इसे तीन भागों में विभाजित किया जाता है- (१) पूर्व-पाषाण काल, (२) मध्य-पाषाण काल एवं (३) उत्तर-पाषाण काल। पूर्व-पाषाण युग के उपकरण महानदी घाटी तथा रायगढ़ जिले के सिंघनपुर से प्राप्त हुए हैं। मध्य-पाषाण युग की सामग्री रायगढ़ जिले से ही कबरा पहाड के निकट से तथा उत्तर पाषाण काल के औजार महानदी घाटी बिलासपुर जिले के धनपुर, सिंघनपुर आदि स्थलों से मिले हैं। हाल के वर्षों में भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण एवं मध्यप्रदेश संग्रहालय विभाग द्वारा बस्तर जिले के अनेक प्रागैतिहासिक स्थलों की खोज की गई है। पाषाण काल के पश्चात् नव-पाषाण काल आता है। इससे सम्बन्धित अवशेष दुर्ग जिले के अर्जुनी तथा नांदगांव, रायगढ़ जिले के टेरम तथा बस्तर जिले में मिलते हैं। इस काल में मानव, सभ्यता की दृष्टि से विकसित हो चुका था तथा उससे कृषि-कर्म, पशुपालन, गृह निर्माण तथा बर्तनों का निर्माण करना सीख लिया था।

पाषाण युग के पश्चात् ताम्र और लोह युग आता है। इस काल की सामग्री का छत्तीसगढ़ क्षेत्र में अभाव है किन्तु निकटवर्ती बालाघाट जिले के गुंगेरिया नामक स्थान में ताम्बे के औजारों का एक बड़ा संग्रह सन १८७० में प्राप्त हुआ था। लौह-युग में शव को गाड़ने के लिये बड़े बड़े शिलाखण्डों का प्रयोग किया जाता था, अतएव इन्हें महापाषाण स्मारक के नाम से सम्बोधित किया जाता है। दुर्ग जिले के कन्हीभण्डार, चिरचोली. मजगहान एवं सोरर से इस काल के पाषाण घेरों के अवशेष प्राप्त हुए हैं। इसी जिले के कबराहाट नामक स्थल से पाषाण घेरे के साथ लोहे के औजार एवं मृण्मयभाण्ड (मिट्टी के बर्तन) मिले हैं। दुर्ग जिले के धनोरा नामक स्थल में ५०० महापाषाणीय स्मारक स्थित हैं: इस स्थान में सन् १९५६-५७ में मध्यप्रदेश शासन द्वारा उत्खनन शासन कराया गया था।

प्रागैतिहासिक काल में मनुष्य, जब पर्वत की कन्दराओं में निवास करता था, तब उसने कन्दराओं में अनेक चित्र बनाए थे जो उसके कलाप्रिय होने के प्रमाण हैं। इस प्रकार के चित्र रायगढ जिले के सिंघनपुर, कबरा पहाड़, ओंगना, बसनाझर, करमागढ़ लेखामाडा, राजनांदगांव जिले के चितवा डोंगरी तथा बस्तर जिले के गुपनसार आदि स्थलों में प्राप्त हुए हैं।

आर्यों के आगमन के साथ ही भारतीय इतिहास में वैदिक युग प्रारम्भ होता है। इस काल की सामग्री का छत्तीसगढ़ क्षेत्र में अभाव है। रामायण, महाभारत तथा पौराणिक कथानकों से संबंधित अनेक स्थलों के विवरण यहां मिलते हैं। लगभग छठवीं शताब्दी ई.पू. में उत्तर भारत सोलह महाजनपदों में विभाजित था। इस काल के विवरण इस क्षेत्र में उपलब्ध नहीं हैं किन्तु तारापुर और आरंग से प्राप्त आहत मुद्राओं (punch marked coins) से स्पष्ट है कि इस क्षेत्र में नन्द-मौर्य काल के पूर्व, एक पृथक सत्ता स्थापित थी।

मौर्यकालीन पुरातात्विक सामग्रियों में सरगुजा जिले के रामगढ़ की पहाड़ियों में स्थित सीताबेंगा और जोगीमारा नामक गुफाएं अत्यन्त महत्वपूर्ण कही जा सकती है। यहां अशोककालीन ब्राह्मी लिपि में सुतनुका नामक देवदासी तथा उसके कलाकार प्रेमी देवदत्त का उल्लेख है। यहीं भारत की प्राचीनतम् नाट्य शाला भी स्थित है जो पर्वत को खोदकर बनाई गई है। मौर्य-काल की मुद्राए बिलासपुर जिले के अकलतरा /अकलसरा और ठठारी से प्राप्त हुए हैं।

मौर्यों के पश्चात् छत्तीसगढ़ का क्षेत्र संभवतः सातवाहनों के अधिकार क्षेत्र में आ गया था। शिवश्री आपिलक नामक सातवाहन राजा की ताम्र मुदाएं यहां प्राप्त हुई हैं। इसके अतिरिक्त सातवाहन मुद्राओं की अनुकृति में अनेक ताम्बे के सिक्के भी मिलते हैं। सातवाहनकालीन सामग्रियों में बिलासपुर जिले के किरारी नामक स्थान से प्राप्त काष्ठस्तंभ लेख तथा सक्ती के निकट गंुजी (ऋषभ तीर्थ) स्थित कुमारवरदत्त का शिलालेख महत्वपूर्ण माना जा सकता है। चीनी यात्री युवान-च्वांग ने भी यहां के सातवाहन राजा तथा उसके राज्य में रहने वाले भिक्षु नागार्जुन का उल्लेख किया है। बिलासपुर जिले के बुढ़ीखार से एक लेखांकित प्रतिमा मिली है। यह प्रतिमा भारत की प्राचीनतम वैष्णव प्रतिमा स्वीकृत की जाती है। सातवाहन काल में भारत का व्यापार रोम से अत्यन्त विकसित था। संभवतः इसीलिए छत्तीसगढ़ क्षेत्र से अनेक रोमन स्वर्ण मुद्राएं भी प्राप्त हुई हैं।

सातवाहनों के पश्चात भारतीय राजनीति में शक कुषाण आदि विदेशी जातियों का वर्चस्व स्थापित हो गया। छत्तीसगढ़ में इनके अधिकार संबंधी विवरण उपलब्ध नहीं है, फिर भी इनके ताम्बे के सिक्कों की प्राप्ति यहां हुई है। बिलासपुर जिले के पेन्डरवा नामक स्थान से कुषाण सिक्कों के साथ यौधेयगण का एक ताम्बे का सिक्का मिला है।

इसके पश्चात भारतीय इतिहास में स्वर्ण-युग के नाम से विख्यात गुप्त-काल आता है। समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति से ज्ञात होता है कि उसने दक्षिण कोसल के राजा महेन्द्र तथा महाकान्तार (बस्तर) के राजा व्याघ्रराज को पराजित किया तत्पश्चात् उनका राज्य वापस कर दिया। इस प्रकार उनका प्रभाव इस क्षेत्र में स्थापित हो गया। गुप्तकाल की नौ स्वर्ण मुद्राएं दुर्ग जिले के बानबरद नामक स्थल से मिली हैं। इसमें काच, चन्द्रगुप्त द्वितीय तथा कुमार गुप्त प्रथम की मुद्राएं हैं। कुमारगुप्त प्रथम का चांदी का एक सिक्का आरंग से मिला है। गुप्तों के समकालीन वाकाटक नरेश नरेन्द्रसेन का एक अधूरा ताम्रपत्र भी दुर्ग से प्राप्त हुआ है।

गुप्त तथा गुप्तोत्तर काल में इस क्षेत्र में गुप्त वाकाटक वंशों का प्रभाव रहा किन्तु यहां की सत्ता स्थानीय राजवंशों द्वारा संचालित होती थी। यहां नल, राज्यर्षितुल्यकुल, शरभपुरीय, पाण्डुवंशीय शासकों का राज्य रहा। नलवंश का प्रमुत्व मुख्यतः बस्तर क्षेत्र में था इसका संघर्ष वाकाटक राजाओं से था। इस वंश के कुल चार अभिलेख मिले हैं। बस्तर जिले के एडेन्गा एवं दुर्ग जिले के कुलिया नामक स्थानों से प्राप्त उभारदार (repousse) मुद्राओं से इस वंश के पांच राजाओं यथा- वराहराज, भवदत्तवर्मन, अर्थपति, नन्दनराज एवं स्तंभ के विषय में जानकारी मिलती है। इसके अतिरिक्त राजिम से प्राप्त एक ताम्रपत्र में इनकी परवर्ती शाखा के विषय में जानकारी मिलती है।

राज्यर्षितुल्यकुल के राजा भीमसेन द्वितीय का आरंग से प्राप्त एकमात्र ताम्रपत्र ज्ञात है।

शरभपुरीय नाम, इस वंश के संस्थापक शरभ तथा उसकी राजधानी शरभपुर के आधार पर दिया गया है। शरभपुर का अभिज्ञान अभी तक नहीं हो सका किन्तु अधिकांश विद्वानों का मत है कि यह रायपुर-बिलासपुर क्षेत्र में स्थित रहा होगा। शरभ का उत्तराधिकारी नरेन्द्र हुआ। इसके पश्चात् प्रसन्न नामक राजा का उल्लेख परवर्ती अभिलेखों में मिलता है। इसमें स्वर्ण, रजत एवं ताम्बे की उभारदार मुद्राएं प्राप्त हुई हैं जिससे इसका पूरा नाम प्रसन्नमात्र ज्ञात होता है। प्रसन्नमात्र के सिक्कों के सदृश्य महेन्द्रादित्य और क्रमादित्य की भी स्वर्ण मुद्राएं मिलती हैं। इसके प्रचलनकर्ता स्थानीय शासक थे अथवा गुप्त सम्राट, इस विषय में विद्वानों में मतभेद है। शरभपुरीय शासकों की द्वितीय राजधानी कालान्तर में श्रीपुर (वर्तमान सिरपुर, जिला-रायपुर) हो गई। बाद में यह पूर्ण राजधानी में परिवर्तित हो गई। शरभपुरीय स्मारकों का निश्चित अभिज्ञान नहीं हो सका है। किन्तु बिलासपुर जिले के ताला में स्थित देवरानी एवं जेठानी मंदिर इस काल के प्रतीत होते हैं। मध्यप्रदेश पुरातत्व एवं संग्रहालय संचालनालय द्वारा इस स्थान के सफाई तया संरक्षण का कार्य विगत वर्षों कराया गया है, जिससे अनेक महत्वपूर्ण पुरातात्विक सामग्रियां मिली हैं।

शरभपुरियों के पश्चात छत्तीसगढ़ क्षेत्र पाण्डुवंशीय अथवा सोमवशीय शासकों के आधीन आया। यह काल छत्तीसगढ़ के इतिहास का स्वर्ण-काल माना जा सकता है। इस वंश की राजधानी सिरपुर में स्थित थी। महाशिवगुप्त बालार्जुन इस वंश का यशस्वी राजा था। पाण्डु-काल के अनेक अभिलेख, स्मारक एंव मंदिर इस क्षेत्र में मिलते हैं। सिरपुर का ईटों द्वारा निर्मित लक्ष्मण मंदिर इस काल की अनुपम कृति है। इसके अतिरिक्त गंधेश्वर मंदिर का निर्माण भी इसी काल में हुआ था। सिरपुर में उत्खनन कायं १९५३-५४ में सागर विश्व विद्यालय तथा १९५४-५५ एवं ५५-५६ में मध्यप्रदेश शासन द्वारा कराया गया, जिससे पंचायतन शैली का शिवमंदिर एवं दो बौद्ध बिहार और सैकड़ों मूर्तियां एवं पुरातात्विक सामाग्री प्राप्त हुई है। सिरपुर से प्राप्त धातु प्रतिमाएं न केवल छत्तीसगढ़ वरन् सम्पूर्ण भारत की महत्वपूर्ण कलाकृति के रुप, स्वीकृत हैं। सिरपुर के लक्ष्मण मंदिर की शैली के ईटों के मंदिर की परम्परा लगभग ३०० वर्षों तक चलती रही। खरौद, पुजारीपाली, धोबनी, पलारी आदि स्थलों में प्राप्त मंदिरों से इसकी पुष्टि होती है।

छत्तीसगढ़ में पाण्डुवंशियों के पश्चात रतनपुर कलचुरियों, कवर्धा तथा चक्रकोट के नाग तथा कांकेर के सोमवंशियों का शासन रहा। इसमें कलचुरी प्रमुख सत्ता थी। कलचुरियों की प्रारंभिक राजधानी बिलासपुर जिले के तुम्माण में थी कालान्तर में यह रत्नपुर (वर्तमान रतनपुर) में स्थानांतरित हो गई। इस वंश के अनेक अभिलेख, मुद्राएं तथा स्मारक छत्तीसगढ़ में मिलते हैं। कलचुरी अभिलेखों का सम्पादन डा. व्ही. व्ही. मिराशी द्वारा किया गया है। इस वंश के जाजल्लदेव प्रथम की स्वर्ण एवं ताम्र; रत्नदेव द्वितीय की स्वर्ण, रजत और ताम्र तथा प्रतापमल्ल की सिर्फ ताम्बे की मुद्राएं ज्ञात हैं। कलचुरी तथा समकालीन राजवंशों से संबंधित मंदिर एवं प्रतिमाएं रायपुर जिले के राजिम, नारायणपुर, आरंग, सिहावा, खल्लारी; बिलासपुर जिले के तुम्माण, रतनपुर, मल्लार, सलखन, शिवरीनारायण; जांजगीर, कोटगढ़, सरगांव, अडभार; दुर्ग जिले देवबलौदा एवं सोरर; राजनांदगांव जिले के भोरमदेव, घटियारी, गंडई और बस्तर जिले के नारायणपाल बारसूर एव भैरमगढ़ में स्थित हैं। इन स्थानों में शैव, वैष्णव. शाक्त तथा जैन धर्म से सम्बंधित कलात्मक देवालय एवं प्रतिमाएं उपलब्ध हैं। कलचुरियों के पश्चात् छत्तीसगढ़ क्षेत्र मराठों तथा कालान्तर में ब्रिटिश शासन के अधिकार में आ गया।

छतीसगढ़ की पुरातत्व सम्पदा का एक बड़ा संग्रह रायपुर के महन्त घासीदास स्मारक संग्रहालय में संरक्षित है। विगत वर्षों में मध्यप्रदेश शासन द्वारा बिलासपुर में एक संग्रहालय की स्थापना की गई है। यहां की पुरातात्विक सम्पदा के संरक्षण के लिए शासन सतत प्रयत्नशील है अनेक स्मारकों को राज्य शासन द्वारा संरक्षित स्मारक घोषित किया जा चुका है तथा यह क्रम अभी भी जारी है।

पुरातत्व एवं संग्रहालय, मध्यप्रदेश, रायपुर द्वारा प्रकाशित तथा शि. बे. औ सह. संस्था द्वारा मुद्रित। आलेख- डा. लक्ष्मीशंकर निगम।

Monday, September 20, 2021

हरि-रामकथा

राम के नाम पर कुछ ऐसे भी काम हुए हैं, होते रहे हैं, जिनके महत्व के अनुरूप चर्चा नहीं होती, इसका एक कारण ऐसी जानकारी का सार्वजनिक, सहज उपलब्ध न होना है। राम वनगमन पथ की योजना मूर्त रूप ले रही है, तो हमारे सामूहिक-चेतना में बसे राम का स्मरण भी आवश्यक है। इस दृष्टि से छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के आरंभिक दिनों तक स्वधारित उत्तरदायित्व वहन करने वाले मनीषी हरि ठाकुर जी का यह लेख और सूची, उनके पुत्र आशीष सिंह जी की अनुमति से प्रस्तुत है-

छत्तीसगढ़ में रामकथा का विकास
- हरि ठाकुर

छत्तीसगढ़ में रामकथा का विकास अत्यंत प्राचीन काल से हो रहा है। रामकथा के रचयिता आदिकवि महर्षि वाल्मीकि का आश्रम तुरतुरिया में था, ऐसा उल्लेख रायपुर जिला गजेटियर तथा अन्य ग्रंथों में है। कुश तथा लव का जन्म स्थान तुरतुरिया को ही माना जाता है। इसी आश्रम में रामकथा का भी जन्म हुआ, ऐसा मानना अनुचित नहीं होगा। वाल्मीकि रामायण के उत्तरकाण्ड में एक प्रसंग का उल्लेख है। भगवान श्रीराम द्वारा आयोजित राजसूय यज्ञ में वाल्मीकि भी आमंत्रित थे। वाल्मीकि सीताजी के साथ कुश तथा लव को भी अपने साथ अयोध्या ले गये थे। वहां कुशल तथा लव ने वाल्मीकि के आदेश पर रामकथा का गायन किया था। भगवान श्रीराम ने इस कथा गायन की भूरि-भूरि प्रशंसा की थी। वाल्मीकि रामायण के उत्तर काण्ड में ही इस बात के भी संकेत हैं कि इस क्षेत्र में राम कथा की एक लोक शैली भी प्रचलित थी। तात्पर्य यह कि छत्तीसगढ़ ही रामकथा की जन्मभूमि है। रामकथा का विकास यहीं से प्रारंभ होता है। इस तथ्य की पुष्टि में म.प्र. संस्कृत अकादमी के सचिव डा. भागचन्द्र जैन भागेन्दु का यह कथन अत्यंत महत्वपूर्ण है - सम्पूर्ण रामायण वाड.मय का अधिकांश छत्तीसगढ़ केन्द्रित है। रायपुर में वाल्मीकि समारोह आयोजित करने के उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा - रायपुर में आयोजन का ध्येय वाल्मीकि की छत्तीसगढ़ से जुड़ी यादों को पुनस्थापित करना था।

प्रसिद्ध इतिहासकार पार्जीटर, राधाकमल मुकर्जी, पं. लोचन प्रसाद पाण्डेय, ठाकुर जगमोहन सिंह, प्रो. के.डी. बाजपेयी, पं. सुंदरलाल त्रिपाठी, डा. हीरालाल शुक्ल, डा. श्याम कुमार पाण्डेय आदि ने इस तथ्य का समर्थन किया है कि भगवान श्रीराम अपने वनवास काल में एक लम्बे समय तक इस क्षेत्र में रहे और यहीं से होते हुए वे आगे दण्डकारण्य गये। वैसे भी भगवान श्रीराम का इस क्षेत्र से रागात्मक संबंध था। उनकी माता महारानी कौशल्या का जन्म छत्तीसगढ़ में ही हुआ था। छत्तीसगढ़ भगवान श्रीराम का मामा घर है।
राम के महतारी कौसिल्या इहें के राजा के बिटिया।
हमर भाग कइसन हे बढ़िया इहें राम के ममिआरो॥

इस छत्तीसगढ़ी गीत में छत्तीसगढ़ के लोगों के पुरातन लोक-विश्वास की अभिव्यक्ति है। वास्तव में भगवान श्रीराम छत्तीसगढ़ की जनता को राक्षसों के उपद्रव और आतंक से मुक्त कराने आये थे। यही कारण है कि उनके जीवन काल में ही श्री राम छत्तीसगढ़ के लोगों के लिये जन-नायक बन गये थे। अपने मुक्तिदाता का चरित गान करना मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है। निश्चय ही यह चरित गान लोक भाषा में मौखिक रूप से प्रचलित रहा होगा। महर्षि वाल्मीकि ने प्रथम बार इस चरित गायन को संस्कृत भाषा में छन्दोबद्ध किया। इसी ग्रंथ के माध्यम से रामकथा का प्रचार उत्तर भारत में हुआ। छत्तीसगढ़ में रामकथा का लोकभाषा में प्रारंभिक स्वरूप क्या था यह कहना कठिन है। ग्यारहवीं शताब्दी में सारंगढ़ से 35 कि.मी. दूर स्थित पुजारीपाली के एक प्राचीन मंदिर में एक शिलालेख प्राप्त हुआ है। इस लेख के रचयिता महाकवि नारायण थे। इस लेख में महाकवि नारायण द्वारा रचित रामाभ्युदय महाकाव्य की सूचना है। इस महाकाव्य की रचना संस्कृत में हुई थी। इस महाकाव्य के विषय में लिखा गया है कि यह काव्य अत्यंत रसमय और भव्य है। इस काव्य रचना से वाग्देवी इतनी प्रसन्न हो उठी कि वे वीणा बन गयी। दुर्भाग्यवश अभी तक न तो रामाभ्युदय महाकाव्य की पाण्डुलिपि प्राप्त हुई है और महाकवि नारायण के विषय में कोई जानकारी प्राप्त है। पं. लोचन प्रसाद पाण्डेय ने संभावना व्यक्त की है - “This Narayan is stated to be the great-grand father of Vishwanath, the author of Santyadarshan."(कोसल कौमुद्री पृ. 332) तोसगांव (सराईपाली) निवासी गजाधर सतपथी द्वारा महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय को प्रदत्त हस्तलिखित ताड़पत्र पर रामायण ग्रंथ के अंश हैं। यह कितना प्राचीन है, यह अभी निश्चित नहीं किया गया है।

ग्यारहवीं शताब्दी के पश्चात् छत्तीसगढ़ में रामकथा पर आधारित किसी ग्रंथ का उल्लेख नहीं मिलता। लिखा भी गया होगा तो उसकी पाण्डुलिपि उपलब्ध नहीं है। किन्तु, छत्तीसगढ़ में गांव-गांव में रामायण मण्डलियों की स्थापना और रामकथा के गायन की परम्परा निर्बाध रूप से चली आ रही है।

सत्रहवीं शताब्दी में रतनपुर के राजा राजसिंह के आश्रित महाकवि गोपाल ने चार महाकाव्यों की रचना की थी। उनमें से एक महाकाव्य राम प्रताप श्रीराम के चरित पर केन्द्रित है। महाकवि गोपाल की गणना आचार्य कवियों की श्रेणी में की जा सकती है। राम प्रताप महाकाव्य कवि के जीवन काल के अंतिम वर्षों की रचना है। ग्रंथ को पूर्ण करने के पहले ही उनका स्वर्गवास हो गया। उसे उनके सुयोग्य पुत्र कवि माखन ने इस खूबी से पूरा किया कि पता ही नहीं चलता कि इस ग्रंथ का प्रणयन दो कवियों ने मिलकर किया है। इस ग्रंथ में 60 प्रकार के छंदों का प्रयोग किया गया है जो गोपाल महाकवि को आचार्य केशवदास के समकक्ष प्रमाणित करता है।

भारतेन्दु युग के पूर्व छत्तीसगढ़ में आचार्य कवि रघुवर दयाल के तीन ग्रंथों का उल्लेख प्राप्त होता है- 1. राम विनोद 2. रामस्तव 3. रामलीलामृत । रामस्तव ग्रंथ में तीन छंद संस्कृत में तथा हिन्दी के दोहा, सांगृत, कवित्त, सवैया, कुंडलिया, झूलना तथा छप्पय छंदों का प्रयोग किया गया था। सुप्रसिद्ध साहित्यकार बाबू पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी के पितामह उमराव बख्शी द्वारा रचित रामकथा पर आधारित चार ग्रंथ -1. कवित्त रामायण 2. रामायण नाटक 3. जानकी पंचाशिका 4. हनुमन्नाटक उल्लेखनीय है। इसी युग के रतनपुर के महाकवि बाबू रेवाराम ने 1. रामाश्वमेध 2. सार रामायण दीपिका का प्रणयन किया। उनका यह दूसरा ग्रंथ संस्कृत में है। गोविद लाल साव (ग्राम सरिया सारंगढ़) ने सन 1867 में रामचरित मानस का उड़िया भाषा में अनुवाद किया था।

भारतेन्दु युग में ठाकुर भोला सिंह बघेल द्वारा रचित सचित्र ताश रामायण तथा तत्व ज्ञान रामायण उल्लेखनीय हैं। सचित्र ताश रामायण की मूल पाण्डुलिपि मैंने देखी थी। ठाकुर जगमोहन सिंह के प्रिय शिष्य पं. मालिकराम त्रिवेदी (भोगहा) शबरीनारायण निवासी थे। उन्होंने राम वियोग नाटक की रचना की थी महापहोपाध्याय बाबू जगन्नाथप्रसाद भानु का तो रामकथा पर अद्भुत अधिकार था। उन्होंने रामायण प्रश्नोत्तरी, श्रीरामायण वर्णमाला. तथा नवपंचामृत रामायण नामक ग्रंथों की रचना की। उनके दो ग्रंथ तुलसी तत्व प्रकाश तथा तुलसी भाव प्रकाश भी रामचरित मानस पर आधारित हैं। रनतपुर निवासी पं. तेजनाथ शास्त्री ने सन 1895 में संस्कृत में रामायण सार संग्रह नामक ग्रंथ का प्रणयन किया।

द्विवेदी युग तथा उसके बाद राम कथा पर आधारित कई ग्रंथों का उल्लेख मिलता है। पं. शिवशंकर दीक्षित, बिलासपुर ने सन 1914 में कौसल किशोर नामक ग्रंथ की रचना की। डा. बलदेव प्रसाद मिश्र द्वारा रचित तीन ग्रंथ कोशल किशोर, साकेत संत, तथा रामराज्य पर्याप्त प्रसिद्ध हुए। उल्लेखनीय है कि तुलसी दर्शन पर डी. लिट. की उपाधि प्राप्त करने वाले डा. बलदेव प्रसाद मिश्र प्रथम व्यक्ति हैं। पं. शुकलाल प्रसाद पाण्डेय का ग्रंथ मैथिली मंगल, कपिल नाथ कश्यप का वैदेही विछोह तथा पं. सरयू प्रसाद त्रिपाठी मधुकर का सीता अन्वेषण विशेष उल्लेखनीय है। पं. सुंदरलाल शर्मा ने भी छत्तीसगढ़ी में रामायण की रचना की थी, ऐसा सुनने में आया है। दुर्ग के उदय प्रसाद उदय ने छत्तीसगढ़ी में रामचरित नाटक की रचना की है। कपिलनाथ कश्यप ने सम्पूर्ण रामकथा पर छत्तीसगढ़ी में प्रबंध काव्य की रचना की है। इस ग्रंथ के प्रमुख अंशों को छत्तीसगढ़ी हिन्दी साहित्य सम्मेलन ने प्रकाशित किया था। उदयप्रसाद 'उदय' ने रामायण-रश्मि नामक ग्रंथ का भी प्रणयन किया है, जो हाल ही में प्रकाशित हुआ है। छुईखदान के धानूलाल श्रीवास्तव ने रामचरित मानस का छत्तीसगढ़ी में अनुवाद किया है। राजनांदगांव के कविराज शीतल प्रसाद का राम रसामृत तथा यहीं के बाबू बसंत लाल का बसंत रामायण भी उल्लेखनीय है। लक्ष्मीनारायण प्रेस से प्रकाशित एक, छत्तीसगढ़ी रामायण की भी सूचना मिलती है। इनके अतिरिक्त कुंवर दलपत सिंह द्वारा रचित रामयश मनरंजन दो खण्डों में है, ध्रुवराम वर्मा द्वारा अलकरहा रामायण, गजराज बाबू द्वारा रामायणाष्टक, दुर्ग के राधिका रमण दुबे द्वारा शबरी वृत्ति, बालमुकुंद द्वारा सीता स्वयंवर, शिव प्रसाद पाण्डेय द्वारा भक्त निषाद, शंकर प्रसाद अकलतरा द्वारा सार रामायण, श्यामलाल पोतदार, रायगढ़ द्वारा बालकाण्ड का नया जन्म, शुकलाल प्रसाद पाण्डेय द्वारा केवट विनय पं. द्वारिका प्रसाद तिवारी 'विप्र' द्वारा राम-केवट संवाद, श्यामलाल चतुर्वेदी द्वारा राम वनवास ग्रंथ रामकथा पर ही आधारित है। ग्राम सावनी, जिला दुर्ग के लक्ष्मण प्रसाद यादव रचित विचित्र रामायण की सूचना भी प्राप्त होती है। यमुना प्रसाद यादव ने भी छत्तीसगढ़ी में रामायण की रचना की। पं. चन्द्रकांत पाठक का रामभक्ति प्रकाश नामक ग्रंथ प्रकाशित है। उन्होंने संस्कृत में रामचरित महाकाव्यम् नामक ग्रंथ की रचना भी की है किन्तु वह अप्रकाशित ही रह गया। हेमनाथ यदु ने रामचरित मानस पर आधारित छत्तीसगढ़ी में सुन्दरकाण्ड तथा किष्किंधा काण्ड की सुंदर रचना की है। गिरधारी लाल श्रीवास्तव ने भी छत्तीसगढ़ी में रामायण की रचना की है। रामकथा (कुडुख), रामनापिटो (मुरिया) रामना बेसोड़ (दण्डामी मारिया) ग्रंथ मानस प्रकाशन, भोपाल द्वारा प्रकाशित हैं । ये रामकथाएं बस्तर के आदिवासियों में प्रचलित हैं। इसके कुछ अंश छत्तीसढ़ सेवक के गणतंत्र अंक सन् 92 में प्रकाशित हैं। श्री पंचराम सोनी ने छत्तीसगढ़ी में रामकथासार लिखा है। यह अप्रकाशित है।

रामकथा पर आधारित और भी ग्रंथ हो सकते हैं जिनकी सूचना हमें नहीं है। उन्हें भी सूचीबद्ध करने का प्रयास किया जाना चाहिए। ऊपर लगभग 40 ग्रंथों का उल्लेख किया गया है। उनके अतिरिक्त छत्तीसगढ़ी में गाये जाने वाले लोक गाथाओं का भी पता चलता है। ऐसी तीन लोक गाथाओं की चर्चा डा. हीरालाल शुक्ल ने रायपुर में म.प्र. संस्कृत अकादमी द्वारा आयोजित वाल्मीकि समारोह में किया था। हलबी में भी राम कथा पर आधारित एक ग्रंथ का पता चला है। शोध करने पर और भी अधिक ग्रंथों का पता चल सकता है।

रामकथा को लेकर इस क्षेत्र में कुछ महत्वपूर्ण शोधकार्य भी हुए है। डा. बलदेव प्रसाद मिश्र का उल्लेख पहले ही किया जा चुका है। श्रीमती डा. शारदा चंदेल (भिलाई) ने रामचरित मानस तथा अध्यात्म रामायण का तुलनात्मक अध्ययन नामक शोध, प्रबंध पर पी.एच.डी. की उपाधि अर्जित की है। डा. रविशंकर व्यास ने रामकथा में हनुमान जी की भूमि का पर शोध प्रबंध लिखा है। डा. हीरालाल शुक्ल ने अपने महत्वपूर्ण ग्रंथ लंका की खोज में भगवान श्रीराम के इस क्षेत्र में वनवास कालीन प्रवास का विस्तारपूर्वक वर्णन किया है। पं. लोचन प्रसाद पाण्डेय ने महाकवि कालिदास के रघुवंश का हिन्दी में सार प्रस्तुत किया है। पद्मश्री मुकुटधर पाण्डेय ने रामकथा पर आधारित छत्तीसगढ़ी में काव्य प्रस्तुत करने का प्रयास अंतिम वर्षों में किया था। उसका एक अंश राष्ट्र बन्धु साप्ताहिक के सन 1977 के एक अंक में प्रकाशित हुआ था किन्तु, अस्वस्थता के कारण उनका प्रयास अधूरा रह गया। रामकथा भारतीय संस्कृति का आधार प्रस्तुत करती है। रामकथा का प्रचार भारतीय संस्कृति और मानवीय मूल्यों का प्रचार है। रामकथा आज भी हमारे लिये अत्यंत प्रासंगिक हैं।

छत्तीसगढ़ में रामकथा का विकास
रामाभ्युदय महाकाव्य- महाकवि नारायण
१. राम प्रताप- महाकवि गोपाल
२. तास रामायण- ठाकुर भोला सिंह बघेल
३. छत्तीसगढ़ी रामचरितनाटक- उदयराम
४. मैथिली मंगल- शुकलाल प्रसाद पाण्डेय
५. कोशल किशोर- डा. बलदेव प्रसाद मिश्र
६. छत्तीसगढ़ी रामायण- पं. सुन्दरलाल शर्मा
७. वैदेही-विछोह- कपिलनाथ कश्यप
८. राम विवाह- टीकाराम स्वर्णकार
९. राम केंवट संवाद- पं. द्वारिका प्रसाद तिवारी विप्र
१०. राम बनवास- श्यामलाल चतुर्वेदी
११. रामकथा- कपिलनाथ कश्यप
१२. सुन्दर काण्ड- हेमनाथ यदु
१३. किष्किंधा काण्ड- हेमनाय यदु
१४. सीता अन्वेषण- सरयू प्रसाद त्रिपाठी मधुकर
१५. राम वियोग- मालिक राम त्रिवेदी
१६. रामस्तव- रघुबर दयाल
१७. रामविनोद- रघुबर दयाल
१८. रामायण नाटक- उमराव बख्शी
१९. लंका की खोज- डा. हीरालाल शुक्ल
२०. छत्तीसगढ़ी रामायण- लक्ष्मीनारायण प्रेस
२१. रामयश मनरंजन- बैजनाथ प्रसाद
२२. सार रामायण दीपिका- रेवाराम बाबू
२३. रामाश्वमेध- बाबू रेवाराम
२४. केंवट विनय- शुकलाल प्रसाद पाण्डेय
२५. अलकरहा रमायन- ध्रुवराम वर्मा
२६. कवित्त रामायण- उमराव बख्शी
२७. श्री रामायण वर्ण माला- जगन्नाथ प्र. भानु
२८. रामायण प्रश्नोत्तरी - ,, ,, ,,
२९. सीता स्वयंर- बाल मुकुन्द
३०. रघुवंशसार- पं. लोचन प्रसाद पाण्डेय
३१. रामायणाष्टक- गजराज बाबू
३२. साकेत संत- डा. बलदेव प्रसाद मिश्र
३३. रामराज्य
३४ रामायण रश्मि- उदय प्रसाद उदय
३५ भक्त निषाद- शिवप्रसाद काशीनाथ पाण्डेय
३६. राम रसामृत- कविराज- शीतल प्रसाद राजनांदगांव
३७. वसंत रामायण- बसंत लाल बाबू ,, ,,
३८. रामचरित मानस छत्तीसगढ़ी अनुवाद (अप्रकाशित)- धानूलाल श्रीवास्तव छुईखदान
३९. सार रामायण- शंकरप्रसाद अकलतरा
४०. बालकाण्ड का नया जन्म- श्यामलाल पोतदार-रायगढ़
४१. शबरी वृत्ति- राधिका रमण दुबे, दुर्ग
४२. विचित्र रामायण- लक्ष्मण प्रसाद यादव सावनी, दुर्ग
४३. उत्तर रामचरित नाटक (गद्य-पद्य)- उदय प्रसाद उदय
४४. वाल्मीकि रामायण (हिन्दी-बालकाण्ड तथा अयोध्याकाण्ड)
४५. वाल्मीकि रामायण की पुष्पांजलि
४६. पं. चन्द्रकांत पाठक काव्यतीर्थ
४७. रामकथा सार- पंचराम सोनी (पाण्डुलिपि)

इन 47 पुस्तकों की सूची 1990 की डायरी में दर्ज की गई है। डॉ. पंचराम सोनी जी की यहां (पाण्डुलिपि) उल्लेख वाली पुस्तक ‘राम कथा सार‘ शीर्षक से वर्ष 2007 में प्रकाशित हुई। इस पुस्तक भूमिका हरि ठाकुर जी ने 19.12.1995 को लिखी थी। इससे अनुमान होता है कि यह सूची और संभवतः लेख भी 1990-95 के बीच का है।

इस सूची में सरगुजा की एक रामायण पुस्तक और बस्तर की तीन रामकथा पुस्तकें जुड़ती हैं। सन 1992-93 में ‘छत्तीसगढ़ी सरगुजिया गीत नृत्य रामायण‘ प्रकाशित हुई, जिसके संगृहिता लेखक समर बहादुर सिंह देव जी हैं, इस पुस्तक की पहली प्रति तत्कालीन राष्ट्पति शंकरदयाल शर्मा जी को प्रेषित की गई थी, जिसकी प्रतिक्रिया में उन्होंने इस संग्रह को महत्वपूर्ण मानते हुए इसकी प्रशंसा की थी। अंबिकापुर के ही रामप्यारे ‘रसिक‘ की पुस्तिका सरगुजिहा रामायण है। इसी प्रकार सन 1998 में बस्तर की रामकथा के तीन ग्रंथों, हलबी रामकथा, माड़िया रामकथा और मुरिया रामकथा का प्रकाशन मध्यप्रदेश के जनसम्पर्क विभाग से हुआ, जिसके सम्पादक प्रोफेसर हीरालाल शुक्ल हैं तथा हलबी रामायण में उनके नाम के साथ संग्राहक और अनुवादक भी उल्लिखित है। इसके अतिरिक्त छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के पश्चात डॉ. मन्नूलाल यदु जी ने रामकथा पर कई छोटी-बड़ी पुस्तकों का प्रकाशन कराया। श्री प्रहलाद विशाल वैष्णव ‘अचिन्त‘ का तीन भागों में ‘रमाएन‘ क्रमशः 2013, 2015 तथा 2016 में प्रकाशित हुआ है, पुस्तक के शीर्षक के साथ जिसे ‘श्रीराम कहानी छत्तीसगढ़ी पद‘ कहा गया है।

Sunday, September 19, 2021

कलाकार शतक

यहां मंचीय प्रस्तुति देने वाले मुख्यतः लोककला से जुड़े छत्तीसगढ़ के 100 प्रमुख कलाकार/ दल की सूची तैयार करने का प्रयास है, कुछ नाम शास्त्रीय और सुगम गायन, वादन, नृत्य के भी हैं। सूची में कलाकारों की लोकप्रियता, प्रतिष्ठा, सक्रियता के अलावा एक आधार, कुछ सीमा तक मेरी पसंद भी है। सुविधा की दृष्टि से इनका नाम अंगरेजी के अकरादि यानि अल्फाबेट क्रम में रखा गया है।

किसी जानकार, प्रशंसक या स्वयं कलाकार को ऐसा लगे कि इस सूची में कोई अन्य नाम जुड़ना चाहिए तो वे यहां कमेंट बाक्स में उल्लेख कर सकते हैं। इसी प्रकार यहां दर्ज कलाकार अपना नाम व जानकारी का संशोधन, निरसन चाहें तो वह भी कमेंट बाक्स में दर्ज कर सकते हैं अथवा यहां मेरे नाम के साथ दर्शित आई-डी पर मेल कर सकते हैं। सभी कलाकारों का सम्मान सहित निवेदन कि सूची, सूचनात्मक होने के कारण नामों के साथ आदरसूचक श्री/सुश्री का प्रयोग नहीं है।

कलाकार/दल - विधा - स्थान/संपर्क - टीप

  • AARU आरु साहू, लोकगीत, धमतरी 9174443963
  • AJAY अजय उमरे, नाचा, दुर्ग 9754450888
  • ALKA अलका चन्द्राकर, गायन, लोकमंच, 9826844477
  • ANUJ अनुज शर्मा, आरूग बैण्ड/अनुज नाईट, लोक एवं छत्तीसगढ़ी फिल्म संगीत, रायपुर 9303309000 पद्मश्री
  • ANUP अनूपरंजन पाण्डेय, बस्तर बैण्ड जनजातीय संगीत, रायपुर 9425501514 पद्मश्री
  • ANURADHA अनुराधा दुबे, कथक, रायपुर 9827166161
  • BALAM बालम साय, सैला नृत्य
  • BASANTI बासंती वैष्णव, कथक, बिलासपुर 9827188698
  • BHARATI भारती बंधु, कबीर, रायपुर 9826113887 पद्मश्री
  • BHUPENDRA भूपेन्द्र साहू, रंग सरोवर, लोकमंच, 9826148518
  • BUTLU बुटलू राम, मांदरी नृत्य
  • CHETAN चेतन देवांगन, पंडवानी, पहन्दा, दुर्ग 9329959009
  • DANI दानीराम बंजारे, गोपी चंदा
  • DAYALU दयालू यादव, राउत नाच, 9753309087
  • DOMAR डोमार सिंह कुंवर, नाचा
  • DILIP दिलीप षडंगी, जगराता, रायपुर 9425230619
  • DINESH दिनेश जांगड़े, पंथी नृत्य, 9630297507
  • DIPAK दीपक चन्द्राकर, लोकरंग, लोकमंच, 9425257304
  • DUKALU दुकालू यादव, जसगीत
  • GARIMA गरिमा-स्वर्णा दिवाकर, लोकगीत, जस, रायपुर 9926848556
  • HRIDAY हृदयराम, रमा, पेन्डरखी, सूरजपुर 9926119719, 9669505970
  • JAINU जैनू सलाम, माओपाटा, 9479241639
  • KASHIRAM काशीराम साहू, नाचा, रतनपुर 9039257122
  • KAVITA कविता वासनिक, अनुराग धारा, लोकमंच, राजनांदगांव 9827106937
  • KRISHNA कृष्ण कुमार सिन्हा, कथक, राजनांदगांव 9424128115
  • KUMAR कुमार पंडित, तबला, रायपुर 7694033993
  • KULESHWAR कुलेश्वर ताम्रकार, लोकमंच,
  • LAKSHMI लक्ष्मी सोरी, गौर नृत्य, पीपी 9301919012
  • LALJI लालजी श्रीवास, लोकमंच, बिलासपुर 9329112308
  • MADAN मदन चौहान, कबीर, भजन, सूफी, रायपुर पीपी 9977208277, 9826608277 पद्मश्री
  • MAHESH महेश वर्मा, नाचा, कुम्हारी 9827400591
  • MAMTA ममता चन्द्राकर, लोकमंच, खैरागढ़ 9425520638,पद्मश्री
  • MAMTA ममता शिंदे, लोकमंच, दुर्ग
  • MANDAVI मांडवी सिंह, कथक, राजनांदगांव 9425560680
  • MANJHI मांझीराम उरांव, सरहुल
  • MANJU मंजू रामटेके, पंडवानी, कांकेर
  • MOHAMMAD मोहम्मद आरिफ खान, गिटार, सैक्सोफोन, रायपुर 9425510956
  • MOHIT मोहित मोंगरे, कमार नृत्य, गरियाबंद 7898881002
  • NILKAMAL नीलकमल वैष्णव, लोकमंच
  • PISI पीसीलाल यादव, दुधमोंगरा, लोकमंच, गंडई 9424113122
  • PANDIT पंडितराम रजवाड़े, करमा नृत्य, 9406459823
  • POONAM पूनम विराट, रंग छत्तीसा, लोकमंच, राजनांदगांव 9340049600
  • PRABHANJAY प्रभंजय चतुर्वेदी, भजन-गजल, भिलाई 9425553235
  • PRABHA प्रभा यादव, पंडवानी, 9009883357
  • RADHE राधेश्याम बारले, पंथी, भिलाई 9827990965, पद्मश्री
  • RAJESH राजेश केशरी, भजन-गजल, रायपुर 9977602111
  • RAJNI रजनी रजक, ढोला मारू, भिलाई 9827948437
  • RAKESH राकेश शर्मा, सूफी, लोकगीत, रायपुर 9826158182
  • RAKESH राकेश तिवारी, चित्रोत्पला लोकमंच, रायपुर 9425510768
  • RAMA रमादत्त जोशी बहनें, लोकगीत, रायपुर 9425203410
  • RAMADHAR रामाधार साहू, चंदैनी, 9993863237
  • REKHA रेखा देवार, देवार नृत्य, कुकुसदा, बिलासपुर, 9754483913
  • REKHA रेखा जलक्षत्री, भरथरी, मांढर, रायपुर 9977533869
  • RESHMA रेशमा पंडित, तबला, रायपुर
  • RIKHI रिखी क्षत्रीय, लोकरागिनी, लोकमंच, भिलाई 9479050129
  • RITU रितु वर्मा, पंडवानी, दुर्ग 9993245716
  • RUPSAI रूपसाय सलाम, गेड़ी नृत्य, 7587284710
  • SADHNA साधना रहटगांवकर, गजल, दुर्ग 9669215157
  • SAKET साकेत साहू, वायलिन रायपुर 9830167875
  • SANJAY संजय सुरीला, सरगुजिहा गीत हाय रे सरगुजा नाचे फेम, 9826934787
  • SHANTI शांतिबाई चेलक, पिरदा, दुर्ग 9893639270
  • SHIV शिवकुमार तिवारी, लोकमंच, 9977049055
  • SIMA सीमा कौशिक, लोकमंच,
  • SOMBALA सोमबाला कुमार, शास्त्रीय गायन, खैरागढ़ 9981696691
  • SUDHIR सुधीर पंडित, सितार, रायपुर
  • SUNIL सुनील मानिकपुरी, सरगुजिहा गीत-तुहर पारा हमर पारा फेम, हर्रा टिकरा, सरगुजा
  • SUNIL सुनील तिवारी, लोकगीत, रायपुर, 9826169690
  • SURESH सुरेश दुबे, भजन, खैरागढ़
  • SURESH सुरेश ठाकुर, भजन, रायपुर,
  • SWAPNIL स्वप्निल कर्महे, कथक, रायपुर 9826232227
  • TIJAN तीजन बाई, पंडवानी, भिलाई 8103024535, पद्मविभूषण
  • VISHNU विष्णु कश्यप, लोकमंच, राजनांदगांव 9617655095
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  • Saturday, September 18, 2021

    सिरपुर-1956

    यह पोस्ट मुख्यतः जनवरी-फरवरी 1956 में प्रगति पत्रिका में प्रकाशित एम.जी. दीक्षित के लेख को उपलब्ध कराने के लिए है। सरल भाषा में आम पाठक के लिए लिखा गया यह लेख आमतौर पर उपलब्ध नहीं है। प्रसंगवश उनके अन्य लेख का अंश, उस दौर के सिरपुर तक पहुंचने और ग्राम का उल्लेख और सिरपुर से धातु-प्रतिमाओं की प्राप्ति से संबंधित महत्वपूर्ण संदर्भ जैसी कुछ अन्य बातें भी प्रस्तुत है।

    सिरपुर में उत्खनन कार्य मोरेश्वर गंगाधर दीक्षित द्वारा 1954-55 में सागर विश्वविद्यालय से इसके बाद मध्यव्रदेश शासन के पुरातत्व विभाग की ओर से कराया गया। उत्खनन का विस्तृत प्रतिवेदन प्रकाशित नहीं हुआ, किन्तु अगस्त 1955 में प्रकाशित श्री रविशंकर शुक्ल अभिनंदन ग्रंथ में श्री दीक्षित का लेख ‘सिरपुर में उपलब्ध प्राचीन अवशेष‘ शीर्षक से प्रकाशित हुआ। लेख का रोचक आरंभिक पैरा इस प्रकार है- ‘‘सिरपुर, प्राचीन श्रीपुर, रायपुर से ३७ मील उत्तर पूर्व में रायपुर जिले की महासमुंद तहसील में महानदी के दाहिने किनारे पर अवस्थित है। वर्तमान सिरपुर नदी और रायकेड़ा तालाब के मध्यवर्ती स्थान में बसा हुआ है। इसमें लगभग ४५ झोपड़ियां हैं, जिनमें लगभग १५० प्राणी रहते हैं; जो अधिकतर खेती तथा धान की फ़सल पर गुजर-बसर करते हैं। प्रतिवर्ष माघ महीने में पूर्णिमा के दिन गांव में एक बड़ा मेला होता है, जिसमें पास-पड़ोस के ५,००० व्यक्ति एकत्र होकर पवित्र महानदी में स्नान करते हैं।‘‘ इसी लेख में बताया गया है कि सन 1929 के वर्ष में सिरपुर में एक टीले की खुदाई करते समय कांस्य पदार्थों का एक बड़ा दफीना अकस्मात ही उपलब्ध हो गया था। इसका विवरण श्री मुनि कान्तिसागर ने अपने ग्रन्थ ‘खण्डहरों का वैभव‘ में दिया है। साथ ही यह भी उल्लेख है कि इन मूर्तियों की प्राप्ति का स्थान अब पता लगा लिया गया है और अब इस स्थान की व्यवस्थित खुदाई की जाएगी।

    सिरपुर उत्खनन के कालक्रम निर्धारण की दृष्टि से इस लेख में जानकारी आई है कि 1954 के ग्रीष्मकाल में लक्ष्मण मंदिर के उत्तर में एक बड़े उंचे टीले की खुदाई में पंचायतन शिव मंदिर मिला और 1955 के प्रारंभिक शीतकालीन महीनों में गांव की दक्षिणी सीमा पर कुछ अधिक व्यापक कार्य आरंभ किया गया (यह लेख अगस्त 1955 में प्रकाशित हुआ है, इससे पता लगता है कि प्रारंभिक कार्य पूर्व में कराया जा चुका था)। लक्ष्मण मंदिर से एक मील दक्षिण में सुरक्षित जंगल के मध्य में अवस्थित मलबे में से उभरी हुई द्वारपालों की दो मूर्तियों के मिलने से यह परिणाम निकाला गया था कि यहां पर भग्नावशेषों में बड़ा मठ (वर्तमान आनंदप्रभकुटी विहार) भूमिगत हुआ है।

    प्रिंस आफ वेल्स म्यूजियम बुलेटिन नं. 5, 1955-57 में सिरपुर की कांस्य प्रतिमाओं पर मोरेश्वर जी. दीक्षित का लेख प्रकाशित हुआ था। इस लेख में बताया गया है कि 1939 में (उपर यह तिथि 1929 बताई गई है।) लक्ष्मण मंदिर के पास पत्थर के लिए खुदाई करते हुई कामगारों को तीन बास्केट में साठ से अधिक मूर्तियां मिली थीं, जो व्राप्तकर्ता के पास छह साल रहीं और इसके बाद 1945 में सिरपुर के स्थानीय मालगुजार को सौंप दी गई। इस विस्तृत लेख के साथ 12 कांस्य प्रतिमाओं के चित्र भी प्रकाशित हैं।

    प्रसंगवश मुनि कांतिसागर की पुस्तक ‘खण्डहरों का वैभव‘, जिसका उल्लेख श्री दीक्षित ने भी किया है, में लेखक ने बताया है कि वे पैदल यात्रा करते 16 दिसंबर 1945 को सिरपुर पहुंचे। उन्होंने लिखा है कि- ‘‘रायपुर से सम्बलपुर जाने वाले मार्ग पर कउवांझर नामक ग्राम पड़ता है। यहां से तेरहवें मील पर सिरपुर अवस्थित है। घनघोर अटवी को पार कर जाना पड़ता है। महानदी के तीर पर बसा हुआ यह सिरपुर इतिहास और पुरातत्व की दृष्टि से कई मूल्यवान सामग्री प्रस्तुत करता है। सिरपुर की धातु प्रतिमाओं की प्राप्ति संबंधी महत्वपूर्ण जानकारी मुनि जी के शब्दों में- ‘‘वर्तमान में यह सब धातु-मूर्तियां वहां के भूतपूर्व मालगुजार श्यामसुन्दरदासजी (खंडूदाऊ) के अधिकार में हैं। वे बता रहे थे कि सिरपुर में सरोवर के तीर पर एक मन्दिर है, उसमें खुदाई का काम चल रहा था, जब ज़मीन में सब्बल लगते ही खनखनाहट भरी ध्वनि हुई, तब वहां के पुजारी भीखणदास ने कार्य रुकवाकर नौकरों को बिदा किया और स्वयं खोदने लगा। काफ़ी खुदाई के बाद, कहा जाता है कि एक बोरे में से ये मूर्तियां निकलीं और उसने उपर्युक्त मालगुजार को सौंप दीं। ... ... ... मुझे बताया गया कि मूर्तियां बोरे में से मिलीं। इसमें सत्यांश कम है; क्योंकि कुछ मूर्तियों पर मिट्टी का जमाव व कटाव ऐसा लग गया है कि शताब्दियों तक भू-गर्भ में रहने का आभास मिलता है, जब कि बोरा इतने दिनों तक भूमि में रह ही नहीं सकता। संभव है किसी बड़े बर्तनों में ये मूर्तियां निकली हों, क्योंकि कभी-कभी बर्तन व सिक्के, वर्षाकाल के बाद साधारण खुदाई करने पर निकल पड़ते हैं।

    पुनः शुक्ल अभिनंदन ग्रंथ में प्रकाशित श्री दीक्षित का लेख जिसके अंत में टीप है- ‘‘सिरपुर के पुरातत्वीय अवशेषों का उत्खनन मध्यप्रदेश शासन के तत्वावधान में सागर विश्वविद्यालय की ओर से लेखक ने सम्पन्न किया है। इस कार्य के श्रीगणेश एवं सम्पन्न करने में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री पं. रविशंकर शुक्ल ने व्यक्तिगत दिलचस्पी दिखलायी है।

    बताया जाता है कि मध्यप्रान्त और बरार से मध्यप्रदेश बनने के क्रम में सिरपुर खुदाई का काम बाधित होते दिखा। श्री दीक्षित इस संबंध में लेख प्रकाशित कराते हुए प्रयासरत रहे कि काम बाधित न हो। इसी क्रम में तत्कालीन मुख्यमंत्री पं. रविशंकर शुक्ल के रायपुर प्रवास के दौरान श्री दीक्षित ने उनसे समय ले कर सिरपुर भ्रमण का कार्यक्रम तय कराया और विभिन्न स्मारकों के साथ नव-उत्खनित आनंदप्रभकुटी विहार का अवलोकन भी कराया, काम की आवश्यकता, महत्व और प्राथमिकता का स्वयं आकलन कर मुख्यमंत्री जी ने सिरपुर खुदाई का काम अबाधित निरंतर रखने के लिए आवश्यक व्यवस्था करा दी।


    उपर का चित्र उसी अवसर का है। स्वाभाविक है कि श्री दीक्षित ने शुक्ल अभिनंदन ग्रंथ वाले अपने लेख के अंत में पं. शुक्ल की व्यक्तिगत दिलचस्पी का उल्लेख किया है और ‘प्रगति‘ में प्रकाशित अपने लेख का आरंभ पं. शुक्ल के प्रोत्साहन उल्लेख के साथ किया है। पूरा लेख इस प्रकार है-

    सिरपुर की खुदाई

    बौद्ध संस्कृति की झलक
    (डॉ. मो. गं. दीक्षित, विशेषाधिकारी पुरातत्व विभाग, म.प्र.)

    राज्य के मुख्य मंत्री तथा सागर विश्वविद्यालय के कुलपति पण्डित रविशंकर शुक्ल के प्रोत्साहन से मध्यप्रदेश में रायपुर से ४७ मील दूर महानदी के तीर पर बसे प्राचीन राजधानी के स्थान सिरपुर ग्राम में विगत दो सालों से खुदाई का काम चल रहा है. इस साल काम शासन द्वारा नव-संगठित पुरातत्व विभाग के तत्वाधान में किया जाएगा.

    गये साल की खुदाई में सिरपुर ग्राम से लगी एक बड़ी टेकड़ी में एक विशाल बौद्ध मंदिर करीब करीब अच्छी हालत में जमीन के नीचे दबा हुआ मिला. इस चौरस मंदिर के अग्रभाग में एक मंडप (पोर्च) उसके पीछे कपाटों में स्थापित एक सुंदर कुबेर की मूर्ति, मध्यभाग में चौरस १८ खंभों का एक भव्य सभामंडप और बिलकुल पार्श्वभाग के गर्भ में अति सुंदर सिंहासन पर विराजमान करीब ७ १/२ फुट ऊंचाई की पद्मासन पर आरूढ़ भूमिस्पर्श मुद्रा की एक भव्य बुद्ध प्रतिमा खुदाई में प्राप्त हुई. इस मूर्ति के बांयें भाग में प्रायः प्रस्तर आकार की अवलोकितेश्वर पद्मपाणि बुद्ध देव की एक छ: फुटी प्रतिमा, गर्भगृह के प्रवेश द्वार से मकररूपी वाहन पर खड़ी गंगा की एक बड़ी मूर्ति संपूर्ण अवस्था में मिली. इसके सिवाय मुख्य प्रवेशद्वार के पास ८ १/२ फुट ऊंची दो विशालकाय द्वारपाल और उसी तरह की यक्ष आदि की दूसरी अनेक प्रतिमायें मिलीं. इस मंदिर में सभामंडप के आसपास बौद्ध-भिक्षुओं के निवास के लिए १३ कमरे बने हुए हैं. इन कमरों की खुदाई के समय, तत्कालीन जीवन की झांकी देने वाले बर्तन, दिये, ताले, पूजा की मूर्ति, पूजापात्र आदि करीब ५,००० के ऊपर चीजें भी यहां प्राप्त हुईं. इसके सिवाय वहीं प्राप्त १४ पंक्तियों के एक सुंदर लेख से ज्ञात हुआ है कि यह मंदिर आनंदप्रभ नामक बौद्ध-भिक्षु ने बालार्जुन नामक राजा के समय बनवाया था और उसमें रहनेवाले भिक्षुओं के लिये उसने एक अन्नछत्र भी चलाया था. यह लेख करीब आठवीं सदी याने १२०० वर्ष पहिले का है.

    सम्पूर्ण मध्यप्रदेश में इतना बड़ा और सुसज्जित बौद्ध मंदिर अभी तक कहीं नहीं मिला. इस कारण हम कह सकते हैं कि हमारे प्राचीन वैभव का एक गौरवस्थान हमें फिर से प्राप्त हुआ.

    ‘जमीन में गड़ी हुई वस्तु प्राचीन दर्शन हमें इस खुदाई में मिले'-- बस इतनी सी सीमित दृष्टि से इस कार्य को देखना गलत होगा. इतिहास की परिभाषा, राजाओं का वंश, उनका राज्यकाल, उनके जमाने में हुई लड़ाइयां, उनकी जय-पराजय ही नहीं है. इतिहास के बारे में हमारी यह अपेक्षा रहती है कि तत्कालीन सामाजिक, आर्थिक वैचारिक परिस्थितियों का यथातथ्य चित्रण होना चाहिए. कागज-पत्र जल्दी नष्ट हो जानेवाली चीजें हैं अतः उपलब्ध चीजों पर से तत्कालीन मानव जीवन की सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों का क्रमानुगत इतिहास तय करना खुदाई का प्रमुख उद्देश्य है. खुदाई का मतलब होता है-मानव संस्कृति का वास्तविक अध्ययन. सिरपुर की खुदाई में एक मंदिर की प्राप्ति के सिवाय हमें और भी अनेक प्रकार के फायदे हुए हैं. सिरपुर में उत्खनित बुद्ध प्रतिमा से मानने में अड़चन नहीं होती कि प्राचीनकाल में सिरपुर बौद्ध धर्मावलंबियों का एक केन्द्र था. चीनी यात्री हयूएनसांग सातवीं शताब्दी में जब भारत आया तो उसने कोशल देश की राजधानी को भेंट दी. वहां का राजा हिन्दू था. फिर भी वह बौद्ध धर्मावलवियों का समर्थक था. उह राजधानी में कुछ बौद्धमठ थे यह जानकारी उसने अपने यात्रा वर्णन में दी है. इस वर्णन में राजधानी का नाम नहीं दिया गया है, परन्तु प्रस्तुत खुदाई से ऐसा निस्संकोच कहा जा सकता है कि यह राजधानी सिरपुर (श्रीपुर) ही है. हयूएनसंग ने अपने वर्णन में कहा है कि यहां महानुयायी बौद्ध रहते थे. इसकी पुष्टि खुदाई में प्राप्त मूर्तियों से होती है. सिरपुर की खुदाई में मिली सभी मूर्तियों पर वज्रयान पंथियों प्रभाव दिखाई देता है तथा ये मूर्तियां तंत्रवाद का प्रतिनिधित्व करती है. हयूएनसांग खुद “सर्वास्तिवादिन" अर्थात् बौद्ध धर्म के कर्मठ अनुयायियों में से थे अतः बौद्ध धर्म में आ मिलने वाले वज्र, तंत्र आदि पर उन्हें कैसे विश्वास होता?

    यदि धार्मिक बातों को छोड़ भी दिया जाये तो अन्य आधिभौतिक शास्त्रों की महाकोशल के लोग उस काल में कितने उन्नत थे, यह बात सिरपुर की खुदाई से अच्छी मालूम होती है. शिल्पकला में वे उत्तम अभियन्ता थे, इस बात की पुष्टि इमारत का कण कण करता है. पानी के निकास के लिये चारों ओर से पत्थरों से बनाई गई नालियां काफी मजबूत थीं और उनका ढाल भी काफी व्यवस्थित था. १२०० साल के बाद खुदाई कर इनका सफलतापूर्वक उपयोग किया गया. इस संबंध में उत्खनित चीजों की सुरक्षा के लिये अलग से संबंध करने की जरूरत महसूस नहीं हुई. ईटों की दीवारों को उभारते समय उसकी नींव खूब गहराई तक ले जाई गई दीख पड़ी. उसकी मजबूती के लिये सभी स्थानों में एक दो फुट तक की गहराई में पक्के पत्थरों से दीवार बनाने का परिपाठ उन्होंने रखा था. यह बात नींव की जांच के समय मालूम हुई. जिन पत्थरों की चौखट पर भारी वजन के पत्थर का खम्भा खड़ा करना है वहां छ: फुट ऊंचाई के काम के लिये छ: फुट से भी ज्यादा गहरा भारी भरकम पत्थर की दीवार का नींव में इस्तेमाल किया गया है. इसके सिवाय अलग से दोनों बाजुओं से आड़ी दीवारें बनाकर उसमें मजबूती लाई गई है पत्थर के गुण अवगुण की ओर भी उन्होंने ध्यान दिया है. दरवाजे की पथरीली चौखट से सहज ही खिल्पी निकाली जा सके ऐसा काला कड़ापा जाति का पत्थर पायरी और जमीन के लिये कभी खराब न होनेवाला लालसर रंग के विंध्य प्रस्तर से बना हुआ दिखता है. महीन कलाकारी के लिये उन्होंने पास के नदी के कछार में दिखाई देनेवाले अत्यंत नरम गठिया नामक पत्थर का इस्तेमाल किया है. कलाकारी के बारीक काम के लिये यह पत्थर उस समय बहुत उपयुक्त जंचने पर भी कालांतर में अनेक सालों तक पानी सोखते रहने पर वह बहुत ज्यादा नरम होकर नष्ट हो गया है, ऐसा खुदाई में मिले अवशेष से मालूम होता है. इन पत्थरों के शिल्प अब तक अच्छी स्थिति में है. सिंह के अयाल का प्रत्येक बालु कुछ मूर्तियों के गलों के हार की नक्शियां बिलकुल ज्यों की त्यों है. इससे यह कहा जा सकता है कि कलाकारी के काम में भी ये लोग पिछड़े हुए नहीं थे.

    सिरपुर की कला के संबंध में एक बात का उल्लेख करना बहुत जरूरी मालूम होता है. वह है बौद्ध मंत्र अंकित छोटी छोटी मुद्रायें. ये मुद्रायें मिट्टी के लोंदे पर उलटे अक्षरों से अंकित पत्थर को दबाकर बनाई गई है. इनमें से कुछ मुद्राओं पर तीन अथवा चार पक्तियों में ''धर्म हेतु प्रभवा--" मंत्र अंकित है. परंतु सबसे आश्चर्य की बात है साधारण रुपये के आकार को इस एक मुद्रा पर १७ पंक्तियो में ३४६ अक्षर अंकित किये जा सके. इतना विस्तृत “धारिणी मंत्र" लिखा हुआ है और इसे आज भी पढ़ा जा सकता है. इन मुद्राओं को देखने पर कोई भी आदमी कह उठेगा, “धन्य है वे कलाकार और उनकी कला". यह मुद्रा प्राचीन महाकोशल के उत्कृष्ट कलाकौशल का एक अच्छा नमूना है.

    सिरपुर की खुदाई में और एक उल्लेखनीय बात नजर आई. स्वर्णकारों का धातु प्रतिमायें ढालने का कौशल बहुत अप्रतिम है. बरसों पहिले सिरपुर में धातु मूर्तियों का एक संग्रह प्राप्त हुआ था. इसमें की कुछ मूर्तियां आज भी नागपुर और रायपुर के संग्रहालय में विद्यमान हैं. इसे महाकोशल की धातु मूर्तिकला का उत्कृष्ट नमूना माना जाता है. खुदाई के पहिले ऐसी कल्पना भी नहीं थी कि इसे सिरपुर में ही बनाया गया होगा. परन्तु इस खुदाई में मठ के एक दालान में जिन हथियारों की सहायता से ये मूर्तियां बनाई गई होंगी, वे सुनारी हथियार भी उपलब्ध हो गये.

    धातु का सांचा, तार काटने की कैंची, तार पकड़ने का चिमटा, तिपाई, छोटी छोटी हथौड़ियां, सुनार को लगनेवाले सब औजार, सोना परखने का कसौटी पत्थर जिस पर सोने के रेशे लगे हुए हैं, ज्यों का त्यों प्राप्त हुआ है. इसके सिवाय असमाप्त टूटी-फटी मूर्ति के अंतरंग को बनाते समय डाली गई रेत वैसी ही चिपटी हुई है. इससे मालूम हुआ है कि मूर्ति की ढलाई का काम इसी मंदिर में होता रहा है. इन मूर्तियों में एक विशिष्ट प्रकार की शैली के दर्शन होते हैं. इन विविध वस्तुओं ने हमारे हाथ में महाकोशल की प्राचीन संस्कृति को समझने की अनेक महत्वपूर्ण कड़ियां उपलब्ध कराई है.

    कुछ अपनी भी-
    सिरपुर खुदाई और एम.जी. दीक्षित जी के बारे में सुनता-पढ़ता रहा था। अपनी शासकीय सेवा के दौरान कोई 30 साल पहले महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय, रायपुर से संलग्न कहंत सर्वेश्वरदास सार्वजनिक ग्रंथालय के भौतिक सत्यापन का काम मुझे सौंपा गया, साथ वेदप्रकाश नगायच जी भी थे। इस दौरान मुझे पता लगा कि इस ग्रंथालय के मुख्यतः तीन हिस्से हैं, सार्वजनिक ग्रंथालय, सी.आर. लाइब्रेरी और ओ.एस.डी. लाइब्रेरी। सार्वजनिक ग्रंथालय के दो भाग थे, जिनमें से एक संदर्भ खंड की पुस्तके सदस्यों को इशू नहीं की जाती थीं, उसे ग्रंथालय, जो वाचनालय भी था, में बैठ कर पढ़ा, संदर्भ लिया जा सकता था। दूसरे खंड की पुस्तकें सदस्यों को इशू हो सकने वाली थीं। सी.आर. लाइब्रेरी, अर्थात क्यूरेटर्स रेफरेन्स, इसी ग्रंथालय में शामिल था, यह संग्रहालय के प्रभारी अधिकारी के लिए होता था। ओ.एस.डी. लाइब्रेरी, अर्थात आफिसर आन स्पेशल ड्यूटी वाली पुस्तके का हिस्सा, वस्तुतः सिरपुर उत्खनन के विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी, जिन्हें तब विशेषाधिकारी कहा गया है, दीक्षित जी के उपयोग के लिए थी। भौतिक सत्यापन के इौरान सिरपुर खुदाई और एम.जी. दीक्षित जी से स्वयं को करीबी जुड़ा हुआ महसूस करता रहा।

    Friday, September 17, 2021

    सिरपुर उत्सव-1985

    4 मई 1985 को बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर, महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय, रायपुर में सिरपुर उत्सव का आयोजन हुआ था। इसका एक हासिल‘Source Materials on Sirpur‘ संकलन था। यह कार्य तत्कालीन मध्यप्रदेश के पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग के रायपुर पदस्थ प्रतिनिधि, संग्रहाध्यक्ष सलीमुद्दीन जी के माध्यम से लक्ष्मीशंकर निगम जी द्वारा तैयार किया गया था।

    इसमें सिरपुर के पुरातत्व से संबंधित महत्वपूर्ण प्रकाशित अंश एकत्र किए गए हैं, इसलिए यह एक स्थायी महत्व का संदर्भ-संकलन है। संसाधनों की सीमा के अनुरूप 280 पेज की सामग्री की छायाप्रति के इस संग्रह की सीमित प्रतियां ही तैयार कराई गई थीं। श्री निगम की गंभीर शोध-दृष्टि, छत्तीसगढ़ के पुरातत्व, कला-संस्कृति के प्रति स्वयं के उत्तरदायित्व और उद्यम का यह एक उदाहरण है।

    इस संकलन के लिए श्री निगम द्वारा लिखा आमुख उल्लेखनीय, अतएव यहां शब्दशः प्रस्तुत है। आमुख में आशा व्यक्त की गई है कि यह संकलन दक्षिण कोसल की कला संस्कृति, और खास कर सिरपुर में रुचि रखने वालों के लिए उपयोगी होगा। इस संकलन के प्रविष्टियों की सूची शोधार्थियों, अध्येताओं और सिरपुर में गंभीर रुचि रखने वालों के लिए उपयोगी होगी, प्रस्तुत है।

    SOURCE MATERIAL ON SIRPUR

    PREFACE

    Sirpur is a one of the most important site of ancient Dakshina Kosala (roughly covering the area of present Chhattisgarh) region. It was capital of Dakshina Kosala during the period of Sarabhapuriya and Somavansis dynasties (5th-7th Cent. A.D.) and was known as Sripur evidentiy proved by the inscriptions. During the rule of Somavamsis King Mahasivagupta Balarjuna, it became a famous centre of Art and Culture. Mahasivagupta, himself was follower of Saivism but all other religious sects such as Vaisnavism, Saktism, Buddhism and Jainism flourished during his reign and an atmosphere of religious harmony and coordination was created. Thus this period may be considered as a "Golden Age" in the history of Chhattisgarh. The famous Lakshman temple was constructed by the mother queen Vasata, who was thedaughter of King Suryavarma of Magadha, during the rule of Mahasivagupta. Lakshman temple is one of the finest example of ancient brick temple architecture and having the influence of Gupta art. Renouned art critic and scholar Dr. A.K. Coomarswamy says, "No sharp line of division can be drawn between late Gupta Art and that of early seventh century. The brick temple of Lakshman at Sirpur, Raipur District, however, One of the most beautiful in all India, may perhaps be assigned to the reign of the Harsh." (Indian and Indonesian Art, P.93). Another important art treasure of Sirpur is its Bronzes", which are best example of the workmanship ofKosalan Art. These bronzes have been exhibited in various national and international festivals and exhibitions as the representative art of India.

    The archeological wealth of Sirpur, thus attracted the attention of State Government and an excavation was conducted in the years 1953, 54 and 55 under the supervision of (late) Dr. M.G. Dikshit. By these excavations, one Saiva temple, two Buddhist monasteries and large number of archeoloical materials, are came into light.

    After a quite long period, this place has again attracted the attention of people when the Directorate of Archaeology and Museum, Madhya Pradesh, has decided to celebrate "SIRPUR UTSAV" at M.G.M. Museum, Raipur on Buddha Jayanti, 4th May, 1985. It has been observed that materials on Sirpur are quite a 1arge but scattered, therefore it is not easily available to the young scholars and person interested in the subject. Therefore it is decided to collect all published material at one place and work should be completed before the Sirpur Utsav. Certainly it was a quite tedious task. We have tried our best to include all published references in present volune, "SOURCE MATERIALS ON SIRUR" but due to shortage of time and certain limitations, we have no option to leave some original source materials. We could not include materials even on Polity, Society, and Religion etc. Actually these aspects may be studied through the original sources. So far the inscriptions are concerned, we have included, only those inscriptions which are found at Sirpur itself. Thus, we are aware with incompleteness of this volume and feel regret for the same. Even then we are hopeful that this volume will be useful for the persons who are interested on the Art and Culture of Dakshina Kosala in general and on Sirpur in particular.

    At the last we express our thanks to Mr. S.P. Bajpai, I.A.S. Director, Archaeolog y and Museum, Madhya Pradesh, for sanctioning the grant for Utsav. We also acknowledge our thanks to Mr. Ranbir Singh, I.A.S., Collector, Raipur who has taken keen interest in this volume.

    (L.S. Nigam)
    Buddha Jayanti,
    4th May, 1985.

    CONTENTS

    (A) GENERAL / SURVEY REPORTS:
    (1) A.S.I.R., Vol. VII By J.D. Beglar
    (2) A.S.I.R., Vol. XVII By A.Cunnigham
    (3) Antiquarian Remains in Central Province and Berar by H,Cousens
    (4) Progress Report, A.S.I. W.C.103-04 By H. Cousens
    (5) Ancient Brick Temples in the Central Provinces By-A.H. Longhust in A.R; A.S.I. 1909-10
    (6) Mukhalingam Temple, Sirpur and Rajim Temples By-Douglas Barratt Moreshwar G. Dikshit
    (7) Raiur District Gazetteer, Ed. R. Verma
    (8) रायपुर रश्मि, गोकुल प्रसाद
    (9) खण्डहरों का वैभव, मुनि कांतिसागर
    (10) मध्यप्रदेश के कला मण्डप, जगदीशचन्द्र चतुर्वेदी

    (B) EXCAVATION AND EXPLORATION:
    (1) Indian Archaeology, 1953-54, A Review
    (2) Indian Archaeology 1954-55 A Review
    (3) Indian Archaeology, 1955-6 A Review
    (4) "Excavation at Sirpur by S.L. Katare in I.H.Q, Vol. XXXV
    (5) Indian Archaeology, 1960-61, A Review
    (6) "Three centuries of Sirpur Revealation by excavation" by A.P. Singhal in Prachya- Pratibha,Vol. V, No. I.
    (7) ‘‘सिरपुर की खुदाई: बौद्ध संस्कृति की झलक‘‘, मोरेश्वर गं. दीक्षित, प्रगति, जनवरी-फरवरी 1956
    (8) ‘‘सिरपुर में उपलब्ध प्राचीन अवशेष‘‘, मोरेश्वर गं. दीक्षित, शुक्ल अभिनंदन ग्रंथ
    (9) मध्यप्रदेश के पुरातत्व का संदर्भ ग्रंथ, राजकुमार शर्मा

    (C) EPIGRAPHY AND NUMISATIC:
    (1) "Sirpur stone Inscription of the time of Mahasivagupta" by Hiralal in E.I, Vol. XI
    (2) "Senakapat Inscription of the time of Sivagupta Balarjuna" by M,G. Dikshitt D.C.Sircar in E.I. Vol. XXXI
    (3) "Sirpur Inscription of the time of Balarjuna", by M.G.Dikshit in E.L, Vol. XXXI.
    (4) "Sirpur Plates of Mahasudevaraja year:7 by S.L.Katare, in E.I.Vol. XXXI
    (5) Sirpur Gandhesvara Temple Inscription by S.L,Katare in I.H.Q., Vol. XXXIII
    (6) "Sirpur Inscription of Acharya Buddhaghosha" by B,C.Jain in E.I., Vol. XXXVIII
    (7) Other Inscriptions from Sirpur by L.S.N.
    (8) "Coins from Sirpur" by L.S.N.

    (D) ART AND ARCHITECTURE:
    (1) "Some Buddhist Bronzes from Sirpur, Madhya Pradesby M,G.Dikshit in Prince of Walse duseum Bulletin, No.5
    (2) Indian Architecture (Buddhist Hindu) by percy Brown.
    (3) Lakshman Temple at Sirpur by Kishna Deva in J.M.P.I.P. Vol, IL.
    (4)The Art of Gupta India, Empire Province by Jonna Gottfried Williams.
    (5) म.घा.स्मा.संग्रहालय, रायपुर, पुरातत्व उपविभाग में संग्रहित वस्तुओं का सूचीपत्र, भाग-3, धातु प्रतिमाएं, ले. बालचन्द्र जैन
    (6) ‘‘शिव नटराज की विलक्षण कृति‘‘ एस.एस.यादव, प्राच्य प्रतिभा, अंक-11

    (E) MISCELLANEOUS:
    (1) 5000 Years_Art from India Villa Hugel Essen.
    (2) Catalouge, 2500th Buddha Jayanti Celebration, 1956 Exhibition on Buddhist art.
    (3) In the image of man, Festival of India, Great Britain. 1982.
    (4) Historical Geography of Madhya Pradesh by P.K. Bhattacharya.
    (5) दक्षिण कोसल का ऐतिहासिक भूगोल, लक्ष्मीशंकर निगम

    कहना आवश्यक नहीं, फिर भी कहना है कि इस पूरे संकलन का प्रकाशन कर, सार्वजनिक किये जाने की आवश्यकता, उपयोगिता समय के साथ बढ़ गई है।

    इसी अवसर पर तत्कालीन रजिस्ट्रीकरण अधिकारी (पुरातत्व), श्री एस. एस. यादव द्वारा सिरपुर पर छोटी सी मार्गदर्शिका तैयार की गई थी, जिसका प्रकाशन जिला पुरातत्व संघ, रायपुर द्वारा किया गया था। पुस्तिका में श्री रणबीर सिंह, कलेक्टर एवं डिस्टिृक्ट मजिस्ट्रेट का संदेश दिनांक 23.4.1985 तथा दिनांक 17.4.1985 को रायपुर प्रवास पर आए डॉ. प्रमोदचन्द्र, बिकफोर्ड प्रोफेसर आफ इंडियन आर्ट, हार्वर्ड यूनिवर्सिटी एवं पुरातात्विक सलाहकार, संस्कृति विभाग, मध्यप्रदेश शासन का संदेश है।

    इस मार्गदर्शिका के परिशिष्ट-3 में आई सूची उपयोगी है, इस प्रकार है-

    संदर्भ - ग्रंथ सूची
    १. कटारे - एक्सकेवेशन एट सिरपुर, ई. हि. क्वा. १९५९.
    २. कनिंघम ए. - आकिलॉजिकल सर्वे आफ इंडिया वाल्यूम-७, देहली-१९६९
    ३. गुप्त, परमेश्वरी लाल - भारतीय वास्तुकला, वाराणसी, १९७७
    ४. जैन, बालचन्द्र - उत्कीर्ण लेख, रायपुर, १९६२
    ५. जैन, बालचन्द्र - धातु प्रतिमाएं, रायपुर, १९६०
    ६. जैन, बालचन्द्र - पाषाण प्रतिमाएं, रायपुर, १९६०
    ७. ठाकुर, डॉ. विष्णु सिंह - राजिम, भोपाल, १९७२
    ८. दीक्षित, एम. जी.- मुखलिंगम.
    ९. ब्राऊन परसी - इन्डियन आर्किटेक्चर, भाग-१, बम्बई, १९७६
    १०. मिश्र डॉ. रमानाथ- भारतीय मूर्तिकला, देहली, १९७७
    ११. मुनि कान्तिसागर- खण्डहरों का वैभव.
    १२. शर्मा, डॉ. राजकुमार- म.प्र. के पुरातत्व का संदर्भ ग्रन्थ, भोपाल, १९७४
    १३. शुक्ल अभिनन्दन ग्रन्थ - म.प्र. हिन्दी साहित्य सम्मेलन
    १४. शुक्ल, द्विजेन्द्रनाथ - भारतीय स्थापत्य.
    १५. हीरालाल रायबहादुर - इन्सक्रिप्सन्स इन दि सेन्ट्रल प्रोविन्सेस एण्ड बरार, नागपुर, १९५२
    १६. ई.आ.रि., १९५३, १९५४-५५, १९५५-५६ .
    १७. प्रगति, म.प्र. शासन - १९५६.
    १८. प्राच्य प्रतिभा, वाल्यूम-५, १९७७
    १९. म.प्र. पुरातत्व अंक - १३ जून, १९७०.
    २०. म.प्र. संदेश, पुरातत्व विशेषांक - २३ जून, १९७०.
    २१. रायपुर रश्मि, रायपुर डिस्ट्रिक्ट गजेटियर - १९२५