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Monday, April 13, 2026

हिंदी साहित्य के प्रेरक विवाद

नन्ददुलारे बाजपेयी की किताब ‘हिन्दी साहित्य की बीसवीं शताब्दी‘ किताब देखते हुए बार-बार ध्यान जाता है कि कृति और रचनाकार का महत्व रेखांकित करते, उसे पूरा सम्मान देते, गंभीर और स्पष्ट असहमतियों वाले समीक्षक हैं। उनकी इस किताब का संशोधित और परिवर्धित संस्करण 1987 देख रहा हूं। 1.1.1993 तिथि अंकित पुस्तक के आरंभिक ‘वक्तव्य‘ में उल्लेख है कि आज से 20-22 वर्ष पहले यह पुस्तक प्रथम बार प्रकाशित हुई थी। इस वक्तव्य में वे लिखते हैं कि इसकी अमित प्रशंसा हुई थी और दूसरी ओर इसका प्रबल विरोध हुआ था ... इसकी-सी स्पष्टभाषिता मेरी परवर्ती पुस्तकों में इस मात्रा में नहीं पाई जाती। ‘विज्ञप्ति‘ में स्वयं पर टिप्पणी करते हैं कि ‘महत्त्वाकांक्षावश मैंने इसका नाम ‘हिन्दी साहित्य: बीसवीं शताब्दी‘ रख दिया है ... अभी तक इस शताब्दी के आधे वर्ष भी व्यतीत नहीं हुए हैं।‘ इसी विज्ञप्ति में वे सूत्ररूप में साहित्य-समीक्षा संबंधी अपनी प्रयास-दिशा के सात बिंदुओं का उल्लेख महत्व-क्रम में करते हैं, जिनमें सबसे प्रमुख ‘रचना में कवि की अन्तर्वृत्तियों (मानसिक उत्कर्ष-अपकर्ष) का अध्ययन और अंतिम सातवां ‘काव्य के जीवन संबंधी सामंजस्य और संदेश का अध्ययन‘ को रखा है।

पुस्तक का विशेष उल्लेखनीय अध्याय ‘प्रेमचंद‘, चौंकाने वाला है, उनकी समीक्षा-तेवर के कुछ अंश, जिसका आरंभ इस प्रकार होता है- ‘प्रेमचन्दजी की निन्दास्तुति तो एक अच्छी मात्रा में की जा चुकी है, पर उनकी साहित्यकला का अध्ययन करके अभी किसी ने नहीं देखा। यह प्रेमचन्दजी का दुर्भाग्य है कि वे हिन्दी के ऐसे युग में उत्पन्न हुए हैं, जिसने उन्हें उपन्यास सम्राट् की उपाधि दे रखी है, पर शास्त्र की विधि से उनका अभिषेक नहीं किया। यह विडंबना आधुनिक ‘राजबहादुर‘ आदि की आनरेरी डिग्री से कम व्यंगपूर्ण नहीं है, अपितु यह दुखद और ग्लानिजनक भी है। यह एक अच्छा खासा प्रहसन है कि लोग आपको उपाधि देकर चुपचाप खिसक गये हैं और दबककर आपका तमाशा देख रहे हैं। इससे तो आपके विरोधी ही अच्छे, जो आपके साथ विश्वासघात तो नहीं करते। उन्होंने कहा कि आपको स्त्री-चरित्र का चित्रण करने में सफलता नहीं मिली, आप अपने उपन्यासों के अन्त में प्रचारक बन जाते हैं, जिसमें पाठक कृत्रिमता का अनुभव करता है, आप ब्राह्मणों के विपक्षी है, आपको भाषा का बहुत ही साधारण ज्ञान है, आदि आदि।‘ ... ऐसे ही समीक्षकों ने प्रेमचन्दजी को उपन्यास सम्राट् का खिताब देकर उनका उपकार करना चाहा और प्रेमचन्दजी भी फिलहाल उनके कृतज्ञतापाश में बंधे हुए हैं।‘

इस अध्याय में आगे ‘आत्म-कथा - एक विवाद‘ वाले पन्ने हैं। जिसका अंश- ‘प्रेमचन्दजी के उपन्यास उनकी प्रोपेगेण्डा-वृत्ति के कारण काफी बदनाम हैं और हिन्दी के बड़े-से-बड़े समीक्षक ने उसकी शिकायत की है। वही वृत्ति उनके इस लेख में भी प्रसार पा रही है। यद्यपि प्रेमचन्दजी लिखते हैं कि श्हमने तो कभी प्रोपेगेण्डा नहीं किया, हमारा बड़ा-सा बड़ा दुश्मन भी हमारे ऊपर यह आक्षेप नहीं कर सकता; पर प्रेमचन्दजी के सभी समीक्षक जानते हैं कि उनका सबसे बड़ा दोष जो उनकी साहित्य-कला को कलुषित करने में समर्थ हुआ है यही प्रोपेगेण्डा है। यदि प्रेमचन्दजी बिल्कुल ही भोले-भाले न बनें, तो वह अपने विरुद्ध इस प्रकार का आरोप एक नहीं अनेक बार सुन चुके होंगे, पढ़ चुके होंगे और हृदय की थाह लगाकर देख भी चुके होंगे।‘ पाद टिप्पणी में बताया गया है कि आप दोनों के बीच साहित्यिक उत्तर-प्रत्युत्तर हुआ था, जिससे प्रेमचन्दजी के साहित्य संबंधी विचारों पर प्रकाश पड़ता है। उसके आवश्यक अंश दिये जा रहे हैं।

आगे ‘उत्तर-प्रत्युत्तर है, जिसका समापन नन्ददुलारे जी इस तरह करते हैं- ‘अन्त में मुझे यह समझकर मनोरंजनयुक्त विस्मय होता है कि जिस मूल-वस्तु को लेकर यह सम्पूर्ण विवाद हुआ, वह ‘हंस‘ का तथाकथित ‘आत्मकथांक‘ वास्तव में ‘आत्मकथा‘ नहीं ‘संस्मरणांक‘ के रूप में निकला है। यदि इसका विज्ञापन करनेवाले इस विभेद का ध्यान रखकर ‘संस्मरणांक‘ के नाम से विज्ञापन करते तो शायद इतना तूफ़ान उठने की नौबत ही न आती। तथापि ‘आत्मकथा‘ के विषय में प्रेमचन्दजी की बातें सुनने, अपनी बातें कहने और अनेक आदरणीय हिन्दी-लेखकों और कवियों की बातें जानने का मुझे जो सुअवसर प्राप्त हुआ, उसका श्रेय 'हंस' के तथाविज्ञापित ‘आत्मकथांक‘ को ही है। हिन्दी-जनता का इस कहा-सुनी से जो मनोरंजन हुआ और मुझे सूचना मिली है कि उसका पर्याप्त मनोरंजन हुआ हैं वह अलग।

व्यक्तिगत सम्बन्ध का विचार कर ऊपर मैं जो कुछ कह चुका है, आशा है, उसके बाद अब मुझे प्रेमचन्दजी से क्षमा-प्रार्थना की आवश्यकता नहीं रही। मैं तो उस दिन की प्रतीक्षा कर रहा हूँ, जब पिछली बार लखनऊ में दिए हुए अपने वचन के अनुसार प्रेमचन्दजी प्रयाग आकर मुझे दर्शन देंगे और मेरे अथिति बनेंगे।’ 

प्रसंगवश-

दौर था जब विवाद कोई भी हो, गांधीजी की ‘अदालत‘ में पहुंच जाता था। इनमें से एक, बच्चन की ‘मधुशाला‘ का बताया जाता है कि गांधी ने इसकी आलोचना के बजाय यह कहते हुए समर्थन दिया था कि साहित्य पैम्फलेट नहीं होता, वह तो ऐसी ही होता है। इसी तरह एक प्रसिद्ध विवाद उग्र के ‘चाकलेट-घासलेट‘ वाला था, बनारसीदास चतुर्वेदी ने इससे गांधीजी को अवगत कराते हुए टिप्पणी की अपेक्षा की थी। गांधीजी ने उन्हें 10 अक्टूबर 1928 को पत्र लिखा, कुछ इस तरह-

भाई बनारसीदास,
आपके दो पत्र मेरे पास है। 
‘चाकलेट‘ नाम पुस्तक पर जो पत्र था उसको मैने ‘यं. इं.‘ के लिये नोट लीखकर भेज दीया। पुस्तक तो नहि पढा था। टीका केवल आपके पत्र पर निर्भर थी। मैंने सोचा इस तरह टीका करना उचित नहि होगा। पुस्तक पढना चाहीये, मैंने पुस्तक आज खतम की। मेरे मन पर जो असर आप पर हुआ नहि हुआ है। मैं पुस्तकका हेतु शुद्ध मानता हूं। इसका असर अच्छा पड़ता है या बूरा मुझे मालम नहि है। लेखकने अमानुषी व्यवहारपर घृणा ही पैदा की है।

Thursday, April 28, 2011

रामकोठी

कटहल और आम, पलाश और सेमल, कोयल की कूक के साथ महुए की गंध का मधु-माधव मास। चैती-वैशाखी का महीना, धर्म-अर्थ और काम से गदराया हुआ। खरीफ जमा है और रबी की आवक हो रही है। मेलों में मनोरंजन, खरीद-फरोख्‍त हुई। मेल-जोल में बात ठहरी, वह अब रामनवमी और अक्ती-अक्षय तृतीया की मांगलिक तिथियों पर वैवाहिक संबंधों के साथ रिश्तों तक आ गई, नई गृहस्थी जमने लगी है। खेती-बाड़ी का भी नया कैलेंडर शुरू हो रहा है।

रायपुर से उत्‍तर में 25 किलोमीटर दूर मोहदी के 1 मई, मजदूर दिवस का रंग लाल नहीं, बल्कि हरित होता है। 15 अप्रैल से 15 दिन की छुट्‌टी के बाद 'सौंजिया' फिर सालाना काम पर लगेंगे। कोई 15 साल पहले वैशाख अधिक मास होने से समस्या आई कि बढ़े महीने का हिसाब कैसे हो, तब आपसी मशविरे से यह काम-काज अंगरेजी तारीख से चलने लगा। सौंजिया, किसानी की अलिखित संहिता का पारिभाषिक शब्द है, जिसकी व्याख्‍या में कृषक जीवन के विभिन्‍न पक्ष उजागर हो सकते है। सामुदायिक जीवन की कल्‍पना सी लगने वाली हकीकत गांवों में सहज रची-बसी है, जिसकी शब्‍द-रचना भी मुझ जैसे के लिए कठिन है, लेकिन तोतली भाषा में स्‍तुति करते हुए संक्षेप में सौंजिया (सउंझिया- साझीदार/साझा) यानि खेती में श्रम भागीदारी से उपज के एक चौथाई का अधिकारी। बाकायदा सौंजिया संगठन है यहां, जो इसी दौरान अपनी कमाई के दम पर सांस्‍कृतिक आयोजन करता है।

लगभग 4000 आबादी वाला छोटा सा गांव, मोहदी। अब एटीएम, मोबाइल, मोटर साइकिल, भट्‌ठी, सरपंची, गरीबी रेखा, नरेगा के चटख रंग ही दिखाई पड़ते हैं, पड़ोसी लोहा कारखाने का भी असर हुआ है, फिर भी गांव की संरचना के ताने-बाने को कसावट देने वाले कई समूह-वर्ग ओझल-से लेकिन सक्रिय हैं। पारा-मुहल्ला, टेन (गो-धन स्वामी आधारित वर्ग), पार (जाति आधारित वर्ग), दुर्गा मंदिर समिति और सबसे खास ग्रामसभा, गांव के पंच-सरपंच और प्रमुख नागरिकों की 25 सदस्यीय समिति, जो रामकोठी का संचालन करती है।

पुरानी बात, गांव में दशहरे का उत्साह है। भजन, माता सेवा, रामायण तो चलता ही रहता है, लेकिन अब की झांकी और लीला की खास तैयारी है। धूमधाम से त्यौहार मना। रामलीला की चढ़ोतरी में इकट्‌ठा हुआ धान इस बार किसी गांवजल्ला काम में खर्च नहीं किया जा रहा है, उसे जमा कर दिया गया है। अब मोहदी में भी रामकोठी है। 85 बरस पहले और आज भी। 'कोठी' यानि कोष्‍ठ या भण्‍डार और 'राम' विशेषण-उपसर्ग का यहां आशय होगा- शुभ, वृहत् और निर्वैयक्तिक। पुरानी रामकोठी छोटी पड़ने लगी तो बड़ा भवन बन गया।

छत्तीसगढ़ में देशज ग्रामीण बैंक जैसी संस्था रामकोठी कांकेर, धमतरी, दुर्ग, राजनांदगांव, कवर्धा और रायपुर जिले में अधिक प्रचलित है। दुर्ग जिले के तेलीगुंडरा की रामकोठी प्रसिद्ध है। आसपास के गांवों गोढ़ी, नगरगांव में भी रामकोठी है, लेकिन मोहदी की बात कुछ और है। यहां आज भी लगभग डेढ़-दो सौ क्विंटल धान क्षमता यानि कम-से-कम दो लाख रूपए मूल्‍य की जमा-पूंजी है। सवाया बाढ़ी (ब्याज) पर दिये जाने वाले कर्ज की दर अब 15 प्रतिशत सालाना कर दी गई है। त्रुटि और समस्या रहित ग्रामीण प्रबंधन। गांव में रामलीला मंडप भी बन गया। गांव के लोग मिलकर ही रामलीला करते थे, लेकिन चटख रंगों का असर हुआ और पिछले दशहरा में एक सप्ताह के लिए लीला पार्टी पड़ोसी गांव कचना से आई।
रामलीला मंडप पर नाम लिखा है- श्री मुकुंदराव। इस मंच के सामने बछरू (बछड़ा) बंधा दिखा। मेरा देहाती मन भटक जाता है। भंइसा, बइला-बछरू, किसान की ताकत। बछड़े के गले में लदका है, गर्दन पर हल का जुआ रखने का अभ्यास कराया जा रहा है। नाक नाथने का काम किसान कर लेता है, लेकिन सबसे जरूरी बधिया, अब गांव में कोई नहीं कर पाता, पास के पशु औषधालय में जाना पड़ता है। लदका, नथना और बधिया, किसान के जवान होते, मचलते पुत्र के साथ जुड़ रहा है, चाहें तो आप अपनी तरह से सोच कर देखें।

वापस, मुकुंद नाम पर। इसका खास महत्व है, रायपुर और छत्तीसगढ़ के लिए। वैसा ही जो 'शिकागो' नाम का है, दिल्ली और देश के लिए। यानि वह नाम, जो महान व्यक्तियों, नेताओं-अभिनेताओं की आवाज दूर-दूर पहुंचाने का साधन रहा है।
मोहदी में रामकोठी की तलाश करते हुए जो सूत्र मिला, उससे रास्ता तय हुआ मुकुंद रेडियो तक का। यह इतिहास की रामकोठी, खजाने जैसा ही है, जहां रायपुर और छत्तीसगढ़ पधारी हस्तियों की सचित्र स्‍मृति जतन कर रखी है।
रामकोठी की इस रामकहानी में एक रावण भी है, लेकिन यह रावण खलनायक नहीं, बल्कि सहनायक जैसा है और ग्राम देवताओं की तरह सम्मान पाता है।
82 वर्षीय इस रावण प्रतिमा की प्रतिदिन पूजा होती है, मनौती मानी जाती है, नारियल भी रोज ही चढ़ता है। इस क्षेत्र के अन्य ग्रामों की तरह पड़ोसी गांव बरबन्दा में भी रावण प्रतिमा है। गांववासियों से पूछता हूं- 'कस जी, तू मन रावन के पूजा करथव ग।' मेरे सवाल में जिज्ञासा के साथ चुभने वाली फांस भी है, लेकिन जवाब सपाट है- 'हौ, वहू तो देंवता आए एक नमूना के बपुरा (बेचारा) ह।' सटपटा कर, सभी ग्राम देवताओं सहित रावण को हमारी राम-राम।

हड़प्पायुगीन विशाल अन्नागारों को सामुदायिक प्रयोजन का माना गया है। नियमित लेखन के सबसे पुराने, चौबीस सौ साल पहले के दोनों नमूने इस संदर्भ में उल्लेखनीय हैं। महास्थान (बांग्लादेश) के मागधी प्रभावित प्राकृत लेख में धान्य और कोठागल (कोष्ठागार) शब्द मौर्यकालीन ब्राह्मी में उत्कीर्ण है, जिसमें कर्ज लेन-देन का भी उल्लेख है। इसी तरह सोहगौरा, उत्तरप्रदेश वाले ताम्रपत्रलेख में भी ‘दुवे कोट्ठागालानि‘ (दो कोष्ठागार) अंकित है। छत्तीसगढ़ में बिलासपुर जिले के मदकू घाट (मदकू दीप) से मिले अट्‌ठारह सौ साल पुराने शिलालेख में अक्षयनिधि का उल्लेख भी इसी परंपरा का आरंभिक प्रमाण माना जा सकता है। छत्‍तीसगढ़ की प्राचीन राजधानी सिरपुर की खुदाई से हाल ही में बारह सौ साल पुराने अन्‍नागार प्रकाश में आए हैं।

अक्षय तृतीया पर परिशिष्‍टः

1 मई, श्रम दिवस है। 2 मई, सत्‍यजित राय की जन्‍मतिथि और इस वर्ष आज 6 मई को अक्षय तृतीया, इन तीन तिथियों का संयोग, छत्‍तीसगढ़ और रावण के साथ जुड़ कर पंचमेल बन रहा है, यह भी देखते चलें।

महेन्‍द्र मिश्र ने 'सत्‍यजित राय पथेर पांचाली और फिल्‍म जगत' पुस्‍तक में बताया है- ''1981 में राय ने दूरदर्शन के लिए प्रेमचन्‍द की कहानी सद्गति पर एक लघु फिल्‍म बनाई। 25 अप्रैल 1982 को सद्गति के प्रदर्शन के साथ दूरदर्शन का रंगीन प्रसारण प्रारंभ हुआ।'' 'सद्गति' छत्‍तीसगढ़ में फिल्‍माई गई, जिसमें ओम पुरी, स्मिता पाटिल, मोहन अगाशे और गीता सिद्धार्थ के साथ यहां के भैयालाल हेड़उ और बाल कलाकार ऋचा मिश्रा ने अभिनय किया है। फिल्‍म की शूटिंग छतौना-मंदिर हसौद, पलारी (बलौदा बाजार) और महासमुंद के पास केसवा, मोंगरा गांवों में हुई बताई जाती है। फिल्‍म में प्रेमचन्‍द की कहानी में उकेरे जाति-प्रथा, श्रम-शोषण के प्रभावी चित्रांकन में गांव की रावण मूर्ति का इस्‍तेमाल, रूढ़ प्रतीक के रूप में है।

कहानी की पृष्‍ठभूमि इस उद्धरण से स्‍पष्‍ट है- ''दुखी ने सिर झुकाकर कहा- बिटिया की सगाई कर रहा हूं महाराज। कुछ साइत-सगुन विचारना है। कब मर्जी होगीॽ'' लेकिन छत्‍तीसगढ़ में रामनवमी और अक्‍ती (अक्षय तृतीया), ऐसा साइत-सगुन है, जिस पर कोई भी शुभ कार्य किया जा सकता है। यह भी उल्‍लेखनीय है कि छत्‍तीसगढ़ में जाति-सौहार्द की परम्‍परा और तथ्‍यों के ढेर उदाहरण हैं (रावण भी देव-तुल्‍य है), लेकिन सद्गति में अनुसूचित जाति के लिए प्रयुक्‍त शब्‍द अब न सिर्फ निषिद्ध है वरन विस्‍फोटक हो सकता है। इन सब बातों का सार यह कि प्रेमचन्‍द और सत्‍यजित राय जैसे पंडितों के सामने हमारी स्थिति कहानी के 'दुखी' की नहीं तो चिखुरी गोंड़ से अधिक भी नहीं और इस दृष्टि से कहानी और फिल्‍म 'सद्गति' की देश-काल प्रासंगिकता प्रश्‍नातीत नहीं।

प्रेमचंद पर टिप्‍पणी करते हुए बख्‍शी जी के निबंध 'छत्‍तीसगढ़ की आत्‍मा' का उद्धरण तलाश रखा है- ''जो सामाजिक समस्‍या प्रेमचन्‍द जी की ग्राम्‍य-कहानियों में विद्यमान है, उनके लिए यहां स्‍थान नहीं है।''