Friday, October 28, 2022

कथा गढ़ते झारा-शिल्पी

एकताल, रायगढ़ जिले का अनूठा गांव है। छोटी सी आबादी वाले गांव में बहुत से राष्ट्रपति पुरस्कृत शिल्पी और शिल्प गुरु गोविंदराम झारा का गांव। मोमक्षय विधि से पीतल की आकृतियां गढ़ने वाले शिल्पी कथाएं भी गढ़ते हैं। पायली, दिया जागर और लक्ष्मी बनाने वाले कलाकार, करम झाड़ के बाद कथाओं को शिल्प का रूप देने लगे और शिल्प की कथा भी गढ़ने लगे। ‘विद्वान कला समीक्षकों‘ के सवालों के साथ धीरे-धीरे, उन ‘विशेषज्ञों‘ का मन पढ़ना भी इन शिल्पियों ने सीख लिया। शिल्प-कृति कोई भी हो, हर-एक आ कर पूछता है, इसकी कहानी क्या है। सरकारी मुलाजिमों की पूछ-परख का ध्यान रखते कुछ वैसी योजनाओं को भी आकार देने का प्रयास। शिल्पियों ने जान लिया कि सिर्फ कथाओं को शिल्प में गढ़ने से काम नहीं सधेगा, कलाकृति की कथा भी सोचनी, गढ़नी, कहनी पड़ेगी।

गोविंदराम झारा, जैसे हुनरमंद शिल्पी हैं, उतने ही किस्सागो और लोक गायक भी कम नहीं। अब बाकी ने भी कथाकारी सीख ली है और कई तो शिल्पी से अधिक कथाकार हो गए हैं। शंकरलाल, पुन्नीबाई, पटेल कुमार, संतोसिनी, शत्रुघन से बातें करता हूं, वे अब लिखा प्रिंट आउट किस्सा सौंप देते हैं, दसेक साल पुरानी बात। मैं फिर भी उनसे मुंह-अखरा किस्सा सुनने का आग्रह करता हूं। वे किस्सा सुनाते हैं, कागज की लेखी और कही-सुनी ...

शंकरलाल-पुन्नीबाई और पटेल सपरिवार

शंकरलाल चौथी कक्षा तक पढ़े भजन गायन भी करते हैं। गायकी और शिल्पकारी माता-पिता से सीखी। उड़िया, छत्तीसगढ़ी और हिन्दी बोलते हैं। ‘संसार सार गीता‘ का विशेष अध्ययन किया है। अपने शिल्प के बारे में बताते हैं-

सतयुग में विष्णु का अवतार से शेषनाग के उपर में अनंत सज्या समुद्र के उपर में साथ में आदि माता की कहानी प्रस्तुत करता हूं। 

नाभि कमल से ब्रम्हा निर्माण, 
साथ वाहन गरूड़ जी,
मधु और कैटप नामक राक्षस विष्णु जी के मैल से जन्म की कहानी, 
शंखासुर नामक राक्षस का जन्म और उसका उपद्रव।

इसके साथ उन्हीं के शब्दों में-


विष्णु भगवान के दस अवतार

(1) मत्स्य अवतार में जन्म और उनके द्वारा शंखासुर का अंत।
(2) कछप अवतार में पृथ्वी को अपने पीठ पर धारण करना। 
(3) वराह अवतार में अपने खीशे से पृथ्वी को धारण करना।
(4) नरसिंह अवतार में हिरण्यकश्यप राक्षस का वध।
(5) वामन अवतार में बली राजा से तीन पग भूमि दान का याचना करना।
(6) परशुराम अवतार में 21 बार पृथ्वी को निःक्षत्रिय करना। 
(7) राम अवतार में रावण का वध।
(8) कृष्ण अवतार में कंश का वध। 
(9) बुद्ध अवतार में मौन रूप धारण। 
(10) कलंकी अवतार का कलीयुग में जन्म।


भगवान विष्णु का ‘‘मतस्य अवतार और शंखासुर का वध’’ की कहानी-

अनंत कोटी कोटी कल्प युग के बाद धरती की युग अनुसार अनंत कोटी जीव जन्तु ज्ञात हुआ और बहुत सारे पशु पक्षी कीट पंतग जीव दानव-मानव तथा राक्षसों का जन्म हुआ और सागर में शंखासुर नामक राक्षस का जन्म हुआ और वह राक्षस अपने बाहुबल से ब्रम्हा आदि सभी दवताओं एवं सुर साधुओं के वेद पुराण शास्त्र सर्व सम्पद का हरण कर लिया। ब्रम्हा ने वेद पुराण के बिना हवन पूजा-पाठ आदि सभी कार्य करना बंद कर दिया। हवन न होने के कारण गंधर्व, नारद ऋषि मुनियो का जीना मुश्किल हो गया। ऋषि मुनी वर्ग में देवताओं ने एक साथ मिलकर बैकुण्ठ में जाने का प्रस्ताव किया। उस समय भगवान विष्णु अनंत शयन में थे। लक्ष्मी माता चरण चाप कर रही थी। शंखासुर का अत्याचार और देवताओं का कष्ट भगवान विष्णु को दिव्य ज्ञान से ज्ञात हो गया था। और इस बात को लेकर भगवान विष्णु ने लक्ष्मी माता पर ध्यान देकर ब्रम्हा आदि ऋषियों के बारे में सोच रहे थे। इसी समय ब्रम्हा अपने साथ सब ऋषि और देवताओं को लेकर बैकुण्ठ पहुंच गये। और भगवान विष्णु को जगाने का प्रयास किया लेकिन भगवान विष्णु खुद जाग गये और कहने लगे कि अब तुम्हारा सब दुख दूर हो जाएगा। अब चिंता की कोई बात नही। मैं छल-बल से शंखासुर का वध करके आपका वेद पुराण वापस लाउंगा। यह कहकर ब्रम्हा जी ने सबको आराम से विश्राम करने को कहा।

दक्षिण समुद्र के पास सरस्वती नामक नदी थी। उस नदी के पास विध्य नामक पर्वत था। उस पर्वत में कश्यप नामक ऋषि रहते थे। कार्तिक मास में ऋषि प्रतिदिन नदी में स्नान करने जाते थे। एक दिन ऋषि प्रातः स्थान करके अपने पितृ पिता को अर्ध्य देकर सूर्य देवता के लिये अंजलि कर में जल का अर्पण कर रहे थे। उस समय प्रभु नरसिंह भगवान ने छोटा सा मत्स्य रूप धारण कर ऋषि के हाथ में आ गये उसे देखकर ऋषि ने उसे अपने कंमडल पर रख दिये। उस छोटे से मत्स्य के रूप स्वयं विष्णु भगवान थे। ऋषि को उसका ज्ञान नही था। कमंडल में रहते हुए मछली ने कहा कि मुझे सारस खा जाएंगे, मेरा काया बड़ा होने जा रहा है मुझे बड़ा जघा चाहिए। ऋषि ने सोचा कि मछली सारसों के डर से मेरे शरण में आ गया है, इसे सुरक्षित रखना चाहिए। ऋषि ने अन्य सभी ऋषि-मुनियों को बुलाया और कहा कि इस मत्स्य ने कमंडल में रहते हुए कह रहा है कि यह जगह छोटा पड़ रहा इसलिये मुझे रहने के लिये बड़ा जगह चाहिए। ऋषियों ने विचार कर कहा कि इसे सरोवर में छोड़ देना चाहिए। मत्स्य सरोवर से भी बड़ा होने लगा, कहा मुझे और भी बड़ा जगह चाहिए। सब ऋषियों ने विस्मित होकर सोचने लगे कि यह भगवान विष्णु की लीला है, इसे समुद्र में छोड़ देना चाहिए। फिर सबने मिलकर मत्स्य को समुद्र मे छोड़ दिया। मत्स्य ने अपना स्वरूप धारण करके काया विस्तार करने लगा और स्वर्णमय मत्स्य रूप धारण करके सब देवताओ को बुलाया। छोटा बड़ा मीन का रूप लेकर समुद्र में प्रलय किये। मत्स्य ने उथल पुथल कर हुंकार करके छलांग लगाकर समुद्र का पानी खत्म कर दिये। जल खत्म होने के कारण सब मछलियों इकट्ठा होकर सोचने लगे शंखा मछलियों के साथ बहुत गाभिर में छुपा था। उसे देखकर भगवान विष्णु ने उसके पास पहुंच स्वंय रूप धारण किया शंखासुर को लेकर बद्रिका चल पड़े। गोविंद ने उसका भुजा पकड़ करके शंखासुर को पटक दिया शंखा चुर्ण चुर्ण होकर इधर उधर चारों दिशाओं में बिखर गया, धरती डगमगाने लगा, पर्वत हिलने लगे, भगवान विष्णु ने सांत्वना देकर कहा कि डरने की कोई बात नहीं मैने शंखासुर का वध कर दिया है। सब खुशी से झुमने लगे स्वर्ग से देवताओं ने पुष्प वृष्टि की। ब्रम्हा विष्णु आदि सभी देवताओं ने अपना अपना वेद पुराण, शास्त्र पाकर बहुत खुश हुए और अपना-अपना हवन शुरू किया। तत्पश्चात सभी देवगण अपने-अपने धाम पहुंच गये। संसार में सभी सुखपूर्वक रहने लगे।

इसलिये लोग कार्तिक माह में एकादशी के दिन विष्णु जी की पूजा सत्यनारायण निराकार के रूप में उपवास करके ब्रत किया जाता है। भगवान विष्णु शंखासुर को कार्तिक माह में मारकर बैकुण्ठ का उद्धार किये।

आद्य अवतार भगवान विष्णु जी की जय।

पटेल झारा के पिता, भाई और भाभी यानि घर के तीन सदस्य राष्ट्रपति पुरस्कृत हैं, उनकी लेखी कहानी, उनकी जबानी- 

धरती सृजना और पृथ्वी जन्म एवं मानव जन्म, मानव उधार - 
दुखयारी मां और दुखयारी चटीयन पक्षी की कहानी


धरती सृजना एवं धरती उधार -

जिस समय धरती विनाशकारी प्रलय से घिरा हुआ था। वह समय राजा सत्यवर्त एक दीन गनडूकी नामक नदी में स्नान कर सूर्य को जल दे रहे थे, तभी हाथ में एक छोटी-सी मछली हाथ में आ गयी और बोलने लगी की हे राजा! मुझे समुद्र एवं नदियों में बडे़-बड़े मछली और मगरमच्छ खा जायेेंगे मेरी रक्षा करो तभी राजा मछली को पकड़ कर महल पर ले गया और एक छोटे से कटोरी में रखा और राजा आगे बढ़ा पलट कर देखा तो मछली बहुत बड़ी हो गयी, और मछली, राजा को बोली कि मुझे इसमें घुटन एवं चलने-फिरनें के लिये दिकतें हो रही है। तभी राजा और उससे भी बड़ा-सा कटोरा मंगावा कर मछली को रखा और फिर मछली देखते ही देखते और अधिक बड़ी हो गयी, इतने में राजा सत्यवर्त को समझने में देर नहीं लगा, राजा बोला हे मछली तु कौन है, कृपा कर आप सही रूप में दर्शन देने का कष्ट करें। तभी मछली के रूप में भगवान विष्णु राजा सत्यवर्त को दर्शन दिया । और कहा हे! राजन् आज से सात दिन बाद धरती विनाश प्रलय में डूब जायेगा। तुम समस्त ऋषि मुनि जीव-जन्तु को नाव पर सवार करना जब धरती प्रलय के समीप होगा तभी मैं मछली के रूप नाव पर सवार ऋषि मुनि जीव-जन्तु का रक्षा करूंगा। यह कहकर अतर्ध्यान हो गये, देखते ही देखते धरती प्रलय से डूबने लंगा और धरती का विनाश हो गया। उस समय ब्रम्हा, विष्णु, महेश चारों वेद पुराण से धरती का निर्माण हुआ साथ हि साथ मानव का भी जन्म हुआ, यह सही एवं सत्य है। इस प्रकार है।

वासुकी धरती माता -

यह इस प्रकार है कि भगवान सर्वत्र हैं अर्जुन भगवान के स्थान के खोज में निकले तभी अर्जुन वासुकी धरती माता के पास पहुंचे और बोला की हे नागवली मुझे अंदर जाने दो तभी नागवली अंदर जाने के लिये मना कर दिया। अर्जुन गुस्से में बोला कि मैं सारे नागवली मेरे एक ही तीर में विनाश कर दूंगा। तभी वासूकी धरती माता बोली हे अर्जुन तुझमें इतना साहस है मैं यह धरती को सुख एवं दुःख भरी समस्त प्राणी सहित धरती को अपनी सिर में उठाई हूं, अगर तूझमें साहस है तो इस धरती को सात दिन तक उठा कर देख तभी अर्जुन अपने धनुष के टंकक से धरती को उठाया और अंत में अर्जुन नागवली के साथ विवाह किया।

दसावतार

मछावतारः- मच्छ रूप में जब शंकासूर ने पृथ्वी सहित चारों वेद पुराण को लेकर समुद्र के अंदर छिपा तभी भगवान मच्छ अवतार लिये शंकासूर का वध किया।

कछवतारः- जिस समय देव और दानव मिलकर समुद्र मंथन किया उसमें लक्ष्मी, अयरावती, अष्टापसरा का जन्म हुआ साथ-साथ हलाल से निकला व विष को पीकर भगवान शंकर नीलकंठ कहलाये एवं सारंग धनुष का जन्म हुआ। जिससे शिव प्राप्त किया, लक्ष्मी को विष्णु ने विवाह किया। 

बराहावतारः- इस अवतार में पृथ्वी उधार एवं हिराणाक्ष का वध किया। 

परशुरामावतारः- इस अवतार में अपने अस्त्र-शस्त्र से अनेकों राजाओं एवं क्षत्रियों को अपनी खड़क से सिर काटा एवं देवों का उध्धार किया। 

नरसिंहावतारः- नरसिंह अवतार में हिरणकस्यपू का उध्धार एवं भक्त प्रहलाद को राजा। 

बावनोवतारः- जब बली नामक का एक राजा था जो धर्मिक राजा के साथ-साथ चक्रवर्ती भी थे एवं सत्यवंत राजा थे, जब बलीराजा ब्रम्हयंज्ञ कर रहे थे तब वहां भगवान ब्राम्हण के रूप में पहुंचा और देखा कि राजा तीन सत्य कर रहे हैं तभी राजा देख ब्राम्हण को बोले आपको क्या चाहिये उन्होने बोले कि मुझे आपसे तीन पांव जमीन चाहिये, जब ब्राम्हण एक पैर आगे बढ़ाया तो एक ही पैर से पूरे धरती को नापा और दूसरा पैर स्वर्ग में रखा एवं तीसरे पैर बली राजा के सिर में रखा।

रामअवतारः-इस अवतार में राम 14 वर्ष बनवाश एवं रावण व और राक्षसों का विनाश किया। इस प्रकार रामअवतार है। 

कृष्णावतारः- इस रूप में गीता भगवत् प्रेम सागर के प्रेम से लीन राधा कृष्ण का मिलन एंव आजीवन करावास कंश वध देवकी उद्धार। 

बुधावतारः- बुध रूप में दुनिया के शांति के लिये एवं ऋषि मुनियांे के रक्षा के लिये भगवान बुधावतार में बैठे। 

कलंकी अवतारः- कलंक में भाई-भाई में दूश्मन एवं एक-दूसरे में नफरत माता-पिता का न ही आदर-सम्मान और न ही विश्वास करते है। यह कलंकी अवतार है। 

मानव शादी-विवाह पति-पत्नि के जीवन कई जन्म का बंधन इस प्रकार है- 

समाज में लड़की पुरया घर की होती है, जब लड़की 18-19 वर्ष का हो जाती हैं तो दूर-दूर के रिस्तेदार जाति-समाज के लोग आते हैं। जाति वर्ग सुलझाते हैं। दोनों लड़का-लड़की का विवाह पक्की कराते हैं। मांगनी (सगाई) करते हैं आदिवासी क्षेत्र में शादी चार लकड़ी के खंबा को चारों दिशा में गाड़ते हैं और बीच में एक मौउहा के पेड़ के डाल को गाड़ते हैं और चारों दिशा में कलश रखते हैं। ऊपर में जामुन के टहनीयं को बिछाते हैं शादी में चूरका को शाम के समय करते हैं। जिसमें देवुल गुड़ी में जाकर पूजा करतें हैं वहां जूठन चावल हल्दी को लाकर लड़का-लड़की के शरीर में लीप करते हैं। शादी में तीन दिन तक लिप किया जाता हैं। लड़का-लड़की एक दिन के लिये उपासना रहते हैं। लगातार तीन दिन शादी के उत्सव में खाना-पिना एवं मास-मदिरा कर समाज के बुजूर्ग महिला एवं पुरूष नाच-गान करती हैं जिसमें पुरूष वादयंत्र ढोलक बजाते हैं और एक ओर महिला समूह में नृत्य करते हैं। लड़का अपनी विवाहित कन्या को अपनी गोद में बैठाकर लड़का को साथ दोनो को नहलाते हैं, कपड़ा के जरीये तब दोनों को नये वस्त्र पहनाकर शादी मंडप में बैठा कर दोनों को जीवन भर के लिये पति-पत्नि बना देते हैं। वहीं पर लड़का और लड़की विवाह के कई जन्मो के लिये बंधन में बंध जाते हैं वहीं से दोनों की नई जीन्दगी शुरूवात हो जाती है। सही एवं सत्य है।

जेजकी महिला

जब महिला गर्भवती होती है तो शिशु को जन्म देती है। 

गर्भवती महिला की दर्द भरी कहानी इस प्रकार है। लड़का हो तो दस महिना दस दिन मां अपनी पेट में रखती हैं वह महिला न तो ठीक से सो पाती है और न ही पेट भर खा नहीं पाती और ठीक से रह नहीं पाती। दसवां महिना दसों दिन तक तखलीफ झेलती है। जब दसवां महिना और दस दिन पूरे होते हैं तब महिला शिशु को पैदा करने के लिये घर में महिला उसकी सहायता के लिये आ जाते हैं। गर्भवती महिला को एक महिला सामने और दूसरी महिला पिछे कमर को दबाती हैं। जब महिला को अधीक तखलीफ होती है तो अपनी मन में हे धरती माता हे भगवान मुझे तकलीफ न दो कह कर सहन करती है। इसके बाद शिशु को खून में लतपत धरती में गिराती है। एक दो मिनिट बाद महिलाएं एक कांसे के बर्तन को लेकर बजाते हैं खून में लतपत लांभी को काटकर शिशु के स्नान करते हैं और पहली मां का दूध अमृत दूध कहलाता है। जब तक अपने परिवार को कोई भी महिला नहीं बताती है कि उसकी बेटा या बेटी हुई है। इसके बाद 10 मिनिट बाद बताते है कि लड़का है या लड़की। 

जेजकी महिला को कपड़ा पहनाते हैं इसके सात दिन तक देख-भाल में 3-4 महिलाये गर्भवती महिला के पेट को जारा नामक पत्ता को आग में सेंक कर पेट की सिकाई करते हैं। जेजकी महिला को केवल सुबह खाना दी जाती है, ताकि किसी प्रकार के बीमार में ना पड़े तब 21 दिन बाद या सात दिन बाद जन्म शिशु का नामकरण एवं नया जीवन नाम रखने के लिये दूध दही दारू घांस चावल एवं नये वस्त्र पहनाकर शिशु के शिर के बाल मुंडन कर उसे जाति समाज के बैठे के बुजूर्गों के सामने शिशु को लाया जाता है और कांसे के बर्तन में रखी पानी बच्चे के हाथ-पैर धोते हैं इसके बाद कांसे के बर्तन में रखी पानी में घांस और चावल को छोड़कर बुजूर्ग बोलते हैं कि नाति-पाति छन्ति यह तीन पार्ट बाद आया शिशु को बोलकर पानी में तैरते हुए घांस के पिछे चावल को छोड़कर घांस को दौड़ने के लिये बोलते है। जब चावल घांस को पकड़ लेता हैं तो उसे अपने पिता के तीन पाठ कहकर कोई अच्छा सा नाम देते हैं। तब खुसी-खुसहाली में बुजूर्ग गीत गोविंद कर नृत्य करते हैं। यह सारी तखलीप को मां सहन करती है। और कहती है कि मार खुद कुड़ा बापर सुनामुड़ अर्थात मां कहती है 10 महिना 10 दिन बच्चे को पेट में रखते है। और बच्चे को जन्म देती है और कहती है, कि तू 40 या 50 साल का भी हो तो मेरे लिए लाल बेटा एवं कलेजे का टुकटा ही होगा। इस प्रकार का कहानी सही एवं सत्य है।

छोटा परिवार सुखी परिवार 

इस प्रकार है कि छोटा परिवार सुखी परिवार अत्यन्त सुखमय परिवार है एक विवाहित पती-पत्नि के दो बच्चे थे। जिसमें एक लड़का और लड़की जो खुशी परिवार सुख शान्ति से रहने खाने पिने आंनद जींदगी व्यतीत करती है । इस प्रकार माता कहते है कि हम दो हमारे दो। सही एवं सत्य है। पिता - कहते हैं कि हम दो हमारे दो। सही एवं सत्य है।

बड़ा परिवार दुखी परिवार 

इस प्रकार है कि बड़ा परिवार में दुख के सिवाय कुछ भी नही है बड़ा परिवार न तो चैन से रह सकते है न तो अपने आप को शान्ति से रहना पड़े। एक ऐसे परिवार जिसमें 6 बच्चे और माता-पिता सहित 8 परिवार में परेशानी ही परेशानी है। बड़ा परिवार के सदस्य अर्थाथ बच्चों की सुख सुविधा के लिए अधिक परिश्रम करनी पड़ती है। बच्चों की आवश्यकताओं को पूरा करने नही पाते है। अशिक्षित परिवार जो शान्ति से जीवन व्यतीत नही कर पाते हैं। बच्चों की आवश्यकता के लिए माता-पिता मजदूरी से पेट भरने के लिए परिश्रम करते है परन्तु समाज में उनका कोई महत्व नही रहता इनको सहारागी नही मिलता व बीमारी तथा तंगी से परेशान रहते है इनकें बच्चे न तो ठीक से पढ़ लिख सकते है और चिथड़े में पड़े रहते हैं। उनके बच्चे आगे बढ़ने के लिए कुछ भी उन्निती कर नही पाते उनके बच्चे चोरी, चपाटी कर एवं मार पिट, गाली गलौच का सामना ग्लाज करना पड़ता है। उनका पिता इन सब बच्चों के कार्य को परेशानी को देखकर परेशान और तखलीव होकर सिर पकड़ कर बैठे सोच में डूबे रहते है। मन ही मन हम दो और हमारे दो होते वो यह सुखमय जीवन में हमारे नसीब होता बड़ा परिवार में दुखी एंव अशान्तिय परिवार होती है। अर्थाथ बड़ा परिवार दुखी परिवार एवं छोटा परिवार यह सही एवं सत्य है।

मां और एक गोरियान (चोटिया) पक्षी

दोनों की अत्यन्त दुख दर्द भरी कहानी इस प्रकार है कि एक छोटा सा सुखमय परिवार रहते थे उनके छोटे छोटे दों बच्चे थे उसमें एक लड़का और एक लड़की थी। उनके माता-पिता खेती किसानी का कार्य करते थे वह दोनो पति-पत्नि खुशी-खुशियाली एवं शांति से रहते थे एक दिन गरीब किसान की पत्नि घर के अंदर अपनी बच्चों को खाना खिला रही थी उसी समय उनके घर में में दरवाजे के सामने दो गोरियान पक्षी (चाटिया और चटियन) एक एक घास एवं तिनका से उनके रहने एवं बसने के लिए एक घोसला बनाये और अंत में दोनों पक्षी (पति पत्नि) सुख जीवन बिताते थे। गोरियान (चटियन) पक्षी ने गर्ववर्ती हुई और दो पक्षी गोरयान पक्षी ने दो पक्षी बच्चों को जन्म दिया उन दोनों पक्षी पति-पत्नि सुखमय जीवन बिताते थे। उन दोनों पक्षी को गरीब किसान की पत्नि और उसकी पति दोनों, रोज सुबह शाम पक्षी परिवार को देखकर बहुत ही आंनद से रहते थे। एक दिन अचानक किसी शिकारी ने गोरियान पक्षी (चोटियन) को मार दिया। तो चटिया ने अपनी पत्नि के वियोग में इधर-उधर रोते विलकते रो रही थी गरीब किसान की पत्नि अपने बच्चें को खाना खिला रही थी तभी किसान की पत्नि की नजर पक्षीयों पर पड़ा और रोते विलकते पक्षीयों को देख किसान की पत्नि सोचा की चटिया की चुटियन को किसी ने दुष्ट शिकारी ने मार दिया। इसके बाद उसने सोचा बच्चों के लिए दूसरी मां शादी की बच्चों के लिए वह दूसरी मां लाया तथा अपने लिए प्रमिका लाया। किसान की पहली वगवास पत्नि के दो बच्चे थे जो सौतेली मां रोज उन बच्चों के साथ गाली-गलौच मार पिट कर दोनों बच्चो को दुख देती थी। उन दो बच्चो सौतेली मां भर पेट खाना नही देती है। एक दिन दोनों बच्चो को खाने में जहर मिलाकर बड़े लाड़ प्यार से गोद में उठाकर खिलाने की कोशिश की परन्तु दोनों बच्चों ने अपने स्वर्गवास मां की याद में खाना नही खाये और इस प्रकार बिना मां बाप के बच्चे पूरे संसार में जीवन जीने के लिए अत्यन्त कठिनाई एवं दुख दर्द सहन करना पड़ता है।

प्रौढ़ शिक्षा अभियान

आज से 40-50 साल पहले प्रौढ़ शिक्षा अभियान लागू किया गया था। उस समय गांव-गांव में न स्कूल था इसलिए गांव के लोग साक्षर नहीं थे। अशिक्षित लोग पढ़ने वाले 30-40 साल के महिला एवं पुरुष और बुर्जग पढने के लिए पेड़ पौधों के नीचे बैंठकर पढ़ते थे, तथा रात में लालटेन के नीचे पढ़ा करते थे। भारत में अशिक्षित से शिक्षित बनने के साथ साथ भारत के उन्नती थोड़ा बहुत भी विकास हुआ इस प्रकार कहानी है। जो सही एवं सत्य है।

आंगनबाड़ी कार्यालय

घर में बच्चे मां से सबसे पहले मां शब्द कहने के लिए सीखते है। इसके साथ साथ बच्चों को एक बूंद जीदंगी के लिए अर्थात् पल्स पोलियो पिलाया जाता है। एक साल के बच्चे को केवल पांच बार पिलाया जाता है। चार साल बाद आंगनबाड़ी में जाकर अपनी गुरु माता से अ, आ, इ, ई पढ़ते है, और इसके बाद ही आगे उनकी पढ़ाई करने को जाते है। यही आंगनवाड़ी का कार्य है।

कामकाजी शिल्पियों के किस्सों का खजाना अकूत है। अब वापस दुनियादार में जुटने का समय, उनका और मेरा भी। अगली किश्त तक के लिए। कही-सुनी है, इसलिए शोध प्रयोजन के लिए उपयोगी नहीं। शोध हेतु प्राथमिक स्रोतों पर अर्थात सीधे इन शिल्पियों से सुनना चाहिए।

Thursday, October 27, 2022

शिवरीनारायण

महानदी, शिवनाथ और जोंक संगम पर बसा नगर शिवरीनारायण, मेरी दृष्टि में छत्तीसगढ़ की नाभि है। छत्तीसगढ़ का महत्वपूर्ण धार्मिक केंद्र, वैष्णव मठ है। 1891 तक तहसील रहे इस स्थान में महंतपारा और भोगहापारा शामिल थे। माना जाता है कि माघ पूर्णिमा से लगने वाले मेले के पहले दिन जगन्नाथपुरी के ‘नील-माधव‘ यहां विराजते हैं। जानकारी मिलती है कि शबरीनारायण-सिंदूरगिरि क्षेत्र से नील-माधव को पुरी ले जा कर भगवान जगन्नाथ के रूप में स्थापित किए जाने का उल्लेख 14 वीं सदी के उड़िया कवि सरलादास द्वारा किया गया है। 

निकट स्थित प्राचीन नगरी खरौद के साथ इस स्थान का महत्वपूर्ण उल्लेख आर्क्यालाजिकल सर्वे आफ इंडिया रिपोट के वाल्युम 7, 1873-74 में मेजर जनरल ए. कनिंघम के सहायक जे.डी. बेगलर द्वारा बलौदा शीर्षक के अंतर्गत किया गया है। 
मुख्य मंदिर तथा मंडप में रखी
गरुड़ासीन लक्ष्मीनारायण प्रतिमा

प्रसिद्ध साहित्यकार ठाकुर जगमोहन सिंह, 1882-85 के बीच शिवरीनारायण में तहसीलदार पदस्थ रहे। इस दौरान 1885 में महानदी में आई बाढ़ की विभीषिका को उन्होंने अपनी कविता ‘प्रलय‘ में दर्ज किया है। सज्जनाष्टक में यहां के यदुनाथ भोगहा, महंत अर्जुनदास, महंत गौतमदास, ऋषिराम शर्मा, माखन साव, हीराराम त्रिपाठी, मोहन पुजारी और रमानाथ पर कवित्त की रचना की। साथ ही श्यामास्वप्न, श्यामसरोजनी और श्यामालता की रचना भी शिवरीनारायण में रहते हुए की। 

1910 में ए.ई. नेलसन संपादित बिलासपुर डिस्ट्रिक्ट गजेटियर शिवरीनारायण का विवरण मिलता है। इसमें बताया गया है कि नदी के पास स्थित छोटे से तालाब ‘रोहिणी कुंड‘ में लोग अस्थि विसर्जन करते हैं, जबकि मुख्य मंदिर के गर्भगृह की प्रतिमा के चरणों के पास जलराशि का छोटा सा कुंड है, जिसे इस नाम से जाना जाता है। साथ ही उल्लेख आता है कि यहां महंत गद्दी की स्थापना दयारामदासजी ने की थी। इस परंपरा में सर्वस्वामी कल्याणदासजी, हरिदासजी, बालकदासजी, महादासजी, मोहनदासजी, सूरतरामदासजी, मथुरादासजी, प्रेमदासजी, तुलसीदासजी, अर्जुनदासजी और गौतमदासजी हुए। गौतमदासजी के गुरु अर्जुनदासजी 44 वर्ष महंत की गद्दी पर रहे, उनकी मृत्यु 75 वर्ष की आयु में हुई। गौतमदासजी निहंग गद्दी के बारहवें महंत हैं, इस समय वे 74 वर्ष के हैं और मठ की व्यवस्था का जिम्मा 29 वर्षीय लालदास को सौंप दिया है। 

केशव नारायण मंदिर के प्रवेश द्वार पर
जतिन दास के साथ मेरी यह फोटो
रघु राय ने ली है।

1923 में प्यारेलाल गुप्त द्वारा बिलासपुर डिस्ट्रिक्ट गजेटियर, हिंदी में ‘बिलासपुर वैभव‘ तैयार किया गया। इसमें उल्लेख आया है कि ‘निहंगोंका एक मठ शिवनारायणमें है। इस मठमें कुल 18 गांव लगे हुए हैं जिनमें 6 गांव माफी हैं। इस समय इस मठके महंत लाल दासजी बड़े सज्जन पुरुष हैं। शिवरीनारायण के रहने वाले योग्य कवि पं. शुकलालप्रसाद पाण्डेय का उल्लेख है। 1885 के बाढ़ में तहसील आफिस बह जाने, जगन्मोहनसिंह तहसीलदार की पुस्तिका ‘प्रलय‘ और ‘शिवनारायण?‘ का उल्लेख है। प्रमुख ठौर शीर्षक अंतर्गत शिवरीनारायण का विवरण है। 

1955 में वी.वी. मिराशी द्वारा किए गए कलचुरि अभिलेखों का अध्ययन ‘कार्पस...‘ प्रकाशित हुआ, जिसमें शिवरीनारायण के तीन अभिलेख सम्मिलित हैं। इनमें रत्नदेव द्वितीय का कलचुरि संवत 878 (1127) का ताम्रपत्र, मूर्तिलेख कलचुरि संवत 898 (1146) तथा जाजल्लदेव द्वितीय का चंद्रचूड़ मंदिर शिलालेख चेदि संवत 919 (1167-68) है, जिस शिलालेख में कलचुरियों की आनुषंगिक शाखा पृथ्वीदेव प्रथम के छोटे भाई सर्वदेव के अलावा अन्य राजपुरुषों आमणदेव, राजदेव, तेजल्लदेव, उल्हणदेव, गोपाल और विकण्णदेव के नाम मिलते हैं। 

शिवरीनारायण के पुरातत्व पर राय बहादुर हीरालाल, पं. लोचनप्रसाद पांडेय, बालचन्द्र जैन, डॉ. सुधाकर पांडेय जैसे विद्वानों ने भी शोध-लेखन किया है। 

2011 में प्रो. अश्विनी केशरवानी के संपादन में ‘श्री शिवरीनारायण माहात्म्य‘ का प्रकाशन हुआ है। इसके पहले उनकी पुस्तक ‘शिवरीनारायण देवालय और परम्पराएं‘, 2007 में प्रकाशित हुई, जिसमें स्थानीय जानकारियों का पर्याप्त रोचक संग्रह है। इस पुस्तक में आभार सहित शिवरीनारायण के एक परवर्ती काल के शिलालेख के मेरे पाठ को पेज-152 पर प्रकाशित किया है। 


छत्तीसगढ़ में अठारहवीं-उन्नीसवीं सदी के अभिलेख, दस्तावेज गिने-चुने हैं। इस दृष्टि से इनका विशेष महत्व है। यह शिलालेख शिवरीनारायण के ‘सिंदुरगिरि‘, वर्तमान जोगीडीपा या जनकपुर के नाम से ज्ञात क्षेत्र के मंदिर में जड़ा हुआ है। शिलालेख का पाठ इस प्रकार है- 

श्री गणेशायनमः। गौरी सुत गज वदन पग वंदि गुरुहि सिर नाय लिषेण सुकीरति सफल कै सारद आज्ञा पाय।।1।। दोहा ।। सिंदुरगिरि परि थल सुभग चित्रोत्पल तीर। सीध तपोवन रहत जहं सेवत सिअ रघुवीर।।2।। कल्प -- कै चरित अति गावत विविध प्रकारा।। शंकर सहसानन सहित लहै न सारद पारा।।3।। द्वापर चौथे पाद मा वह थल अति -काता। तपी तपोनिधि रहत नित तपत नीस दिन रात।।4।। मोरध्वज महिपाल मनि विदित रत्नपुर ग्राम।। सो सिुदंरगिरि में रच्यो बहु तपसिन कै धाम।।5।। काल पाअ पुनि लुप्त भे रह्यो कछुक नहि चीन्हा। तब रघुपति निज दास केै मन इच्छा करि दीन्हा।6।। सुचि संवक श्रीराम के तान भक्ति युत संता। सो पुनि इह थल उदित किये अर्जुनदास महंता।7।। उनविस सत के उूपरे अष्टाविंसति अंका। संवत विक्रम भूप के सर्व सुफल अकलंका।8।। कृष्ण पक्ष आषाढ़ कै तेरस - गुरुवारा। भयो प्रतिष्ठा साम कै अति रमनिक सु प्रसारा।9।। मति गति विद्याहीन है नारायणपुर धामा। दोहा ----- हीरारामा।10।। मीती आसाढ़ कृष्न 13 गुरुवासर संवत 1928. 

राम-जानकी मंदिर का गर्भगृह तथा मंडप में लगा शिलालेख, 
जिसका आशय स्वयं स्पष्ट है। इसमें आया नाम ‘सत्येन्द्र कुमार सिंह‘ 
मेरे (यानि राहुल कुमार सिंह और अग्रज राजेश कुमार सिंह) के पिता हैं। 
अश्विनी जी ने अपनी पुस्तक में इस श्रीराम जानकी मंदिर को
महंत अर्जुनदासजी की प्रेरणा से
संवत 1927 (सन 1870)? में बनवाया जाना लिखा है।

Wednesday, October 26, 2022

पुनः खरौद

खरौद, पुनः खरौद और शिवरीनारायण। उन्नीस सौ अस्सी आदि दशक के दौरान इन दोनों स्थानों पर बार-बार जाते हुए, नोट्स लेता रहा था, वह सब मिला-जुला कर एक विस्तृत लेखनुमा शोधपत्र की तैयारी थी। अब जो, जितना, जैसा था, उनमें से दूसरा, ‘पुनः खरौद‘ प्रस्तुत-

घुमक्कड़राम की डायरी

मंदिरों के कस्बे - खरौद में

बिलासपुर-शिवरीनारायण मार्ग पर शिवरीनारायण से तीन किलोमीटर पहले बाईं ओर सड़क व्यपवर्तन है। यह पक्की सड़क ढाई किलोमीटर दूर तक चली जाती है। इस सड़क पर चलते हुए, खरौद कस्बे को पार करते हुए खरौद के एक छोर, मिसिर तालाब तक पहुंचा जा सकता है, यहीं तालाब के किनारे सड़क के बाईं ओर पत्थर की ऊंची चहारदीवारी दिखलाई पड़ती है इसके अंदर है प्रसिद्ध लक्ष्मणेश्वर मंदिर, जो इस क्षेत्र के पांच प्राचीन और प्रसिद्ध शिवलिंग मंदिरों में से एक है; अन्य है- फिंगेश्वर के फिंगेश्वर, राजिम के कुलेश्वर, सिरपुर के गंधेश्वर और रतनपुर के बूढ़ा महादेव (बेगलर रिपोर्ट 1873-74)।

यह स्थान और इसका निकटवर्ती क्षेत्र दंतकथाओं में रामकथा के पात्रों और स्थानों नामों से संबंधित किया जाता है खरौद के साथ एक रोचक दंतकथा भी प्रचलित है, जिसमें इस स्थान का नाम रावण के भाइयों, खर और दूषण से व्युत्पन्न माना जाता है। प्राचीन स्मारक उसके अवशेष और तत्संबंधी जिज्ञासा विभिन्न दन्तकथाओं को जन्म देते हैं, एक दत्तकथा लक्ष्मणेश्वर मंदिर के निर्माण के साथ भी जुड़ी है, जिसमें बताया जाता है कि लक्ष्मण के क्षयरोग की मनौती के फलस्वरूप, उन्होंने इस मंदिर का निर्माण कराया। इसी प्रकार यह भी कहा जाता है कि जिस प्रकार राम ने रामेश्वरम स्थापित किया, उसी तरह लक्ष्मण ने यहां लक्ष्मणेश्वर स्थापित किया था।

यह मंदिर लगभग 12 फुट ऊंचे चबूतरे पर निर्मित है चबूतरे से इसकी प्राचीन का अनुमान होता है किन्तु मंदिर अपनी बाहिरी संरचना से सर्वथा नवीन जान पड़ता है। पूर्वाभिमुख इस मंदिर तक पहुंचने के लिए पूर्व की ओर सीढ़ियां हैं। चबूतरे पर पहुंच कर स्पष्ट अनुमान होता है मंदिर और उसकी चतुर्दिक रचनाएं पुनर्संरचित हैं और इन्हीं पुनर्संरचनाओं के आधार पर मंदिर के पंचायतन होने का भी अनुमान होता है। पंचायतन अर्थात ऐसा मंदिर, जिसमें मुख्य मंदिर के चारों किनारों पर चार उप-मंदिर हों। मंदिर की दशा अब ऐसी है, जिससे प्राचीन या वास्तविक मंदिर के रूप का क्षीण अनुमान ही हो पाता है। उप-मंदिरों, जो संख्या तीन हैं, में विभिन्न मूर्तियां बाद में लाकर जड़ी गई हैं। इनमें एक जैन मूर्ति पटल, कुछ अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां तथा उपासक की एक रोचक मूर्ति है। उपासक की मूर्ति के नीचे पादपीठ पर मूर्तिलेख है, जिसमें व्यक्ति नाम ‘दामोदर‘ स्पष्ट पढ़ा जा सकता है। बताया जाता है कि ये प्रतिमाएं किसी व्यक्ति को गढ़ के अंदर खुदाई करते हुई प्राप्त हुई थीं।

मंदिर के अंदर जाने पर मंडप की बाईं दीवार पर सूचना की दृष्टि से महत्वपूर्ण अभिलेख है जिस पर 933 चेदि संवत (सन 1182) अंकित है, जिसमें कलचुरि नरेश रत्नदेव तृतीय और उसके प्रधानमंत्री गंगाधर का उल्लेख है। मंडप की दाहिनी दीवार पर भी अभिलिखित प्रस्तर खण्ड जड़े हैं, जिसकी लिखावट अस्पष्ट है। कहा जाता है कि गोरा साहबों को मंदिर के खजाने का पता न मालूम हो जाए इस उद्देश्य से छेनी का प्रहार कर उसे अस्पष्ट कर दिया गया, किन्तु उसमें पाण्डुवंशी दो राजाओं इन्द्रबल और ईशानदेव का नाम पढ़ लिया गया है, जो लगभग छठीं-सातवीं शताब्दी के नृपति माने जाते हैं।

मंदिर में गर्भगृह के प्रवेश द्वार पर दोनों पार्श्वों में दो मूर्तियां हैं, जो अपने वाहनों मकर व कच्छप से गंगा और यमुना के रूप में पहचानी जा सकती है। मंदिर का गर्भगृह अष्टकोणीय है, जिसमें अष्टकोणीय लिंग स्थापित है, किन्तु इसका रूप छिद्रयुक्त है, जिससे पानी भरा रहता है। इसे लिंग के रूप में पहचाना जा सकना कठिन है। कहा जाता है कियह लिंग लक्षरंध्रयुक्त है, लगभग 75 सेंटीमीटर व्यास वाले इस लिंग व छिद्रों को अनन्त बताया जाता है। ये छिद्र प्राकृतिक परिवर्तन के फल जान पड़ते हैं।

मंदिर अब तक पूजित है, महाशिवरात्रि को आराधक ‘लाख चाऊर‘ अर्थात एक लाख चावल के अक्षत दाने चढ़ाते हैं। महाशिवरात्रि के दिन ही सुहागन स्त्रियां परिक्रमा करते हुए अपने सुहाग की परीक्षा भी करती हैं। इसके लिए वे, गर्भगृह की पश्चिमी दीवार के देवकोष्ट-आले में कंकड़ फेंकती है, जिसकी कंकड़ आले में रुक जाता है, वह स्त्री अखंड सुहागवती मानी जाती है। मंदिर में गणेश, उमामहेश्वर, गरुड़ तथा राजा रानी की मूर्तियां भी हैं, जो 11-12 शताब्दी की प्रतीत होती हैं। मंदिर का निर्माण काल पुरातत्व विभाग की सूचना के अनुसार 8 वीं शताब्दी है।

इस विस्तृत कस्बे के अन्य छोर पर भैरवाइन डबरी है, जिसके किनारे एक मंदिर है, यह मंदिर, एक मूर्ति को सुरक्षित करने हेतु ग्रामवासियों द्वारा कुछ वर्षों पूर्व ही बनवाया गया है। मूर्ति ग्रामवासियों द्वारा भैरव बाबा के रूप में पूजित है। खड़ी हुई- स्थानक यह प्रतिमा, दिगम्बर है, और अजानबाहु है, मूर्ति के ऊपर छत्र है, जिसमें दो हाथी अभिषेक करते दिखाए गए हैं। सिर के पीछे पद्मपत्र-सदृश प्रभामण्डल है, मानवाकार यह प्रतिमा संभवतः किसी जैन मुनि या तीर्थंकर की है।

इसके बाद मैं इन्दल देव मंदिर की ओर प्रस्थान करता हूं, संभव है यह नाम इन्द्रबलदेव से व्युत्पन्न हो। यह मंदिर भी कस्बेके एक छोर पर स्थित है और पश्चिमाभिमुख है, ईटों के इस मंदिर की रचना अत्यंत आकर्षक दिखाई देती है, यह मंदिर भी एक ऊंचे चबूतरे पर निर्मित है। इसके प्रवेश द्वार का अलंकरण नयनाभिराम है। पार्श्वों पर लगभग पूरे द्वार के आकार की गंगा-यमुना को सुदर मूर्तियां हैं। प्रवेश द्वार के उपर नाग-कन्याएँ व नाग-पुरुष हैं। दो नागकन्याएं हाथ जोड़े, उपासना की मुद्रा में हैं, साथ ही ब्रह्मा, शिव-पार्वती और गरुड़ारूढ़ विष्णु हैं। गर्भगृह में कोई मूर्ति स्थापित नहीं है, किंतु संभवतः यह मंदिर शिव को समर्पित रहा होगा। गभगृह से शिखर की अंदरी बनावट, जो स्तूप कोणाकार है, स्पष्ट होती है। मंदिर की परिक्रमा करते हुए ईंटों पर बारीक उकेरन का काम दिखलाई पड़ता है। चैत्यगवाक्ष बनाए गए हैं, और कुछ आकृतियां ही स्पष्ट हो पाती हैं, जिसमें एक लम्बोदर गणेश की व कुछ अन्य गजारोही व अश्वारोही मानव आकृतियां हैं। 

कस्बे के लगभग प्रारंभ में ही सौंराई मंदिर है, मैं पुनः उसी ओर वापिस होता हूं। रास्ते में दाहिनी ओर एक गली में मेरी निगाह जाती है, और मैं ठिठक जाता हूं। पत्थर पर उकेरे सिंदूर लगे तीन सर्प-युग्म दिखाई पड़ते हैं। पास पहुंचने पर यह ज्ञात होता है कि यह महामाई मंदिर है। मंदिर का दरवाजा बंद है, फलस्वरूप में अंदर प्रविष्ट नहीं हो पाता, किन्तु बाहर ही मुझे कुछ रुचिकर पाषाण-खंड दिखाई दे जाते हैं। इनमें से एक, किसी स्तंभ का खंड है, जिस पर अत्यंत बारीक अलंकरण है, कुछ अन्य मूर्तियां हैं, जो मानव-वक्ष और आसन प्रतीत हो रही हैं। 

पुनः, सौंराई मंदिर की ओर अग्रसर होता हूं। यह भी ईंटों से निर्मित मंदिर है, और सौंराई देवी के रूप में पूजित है। मंदिर के सामने कुछ सुंदर किंतु खंडित मूर्तियाँ छोटे से खुले मंडप में रखी हुई हैं। मंदिर के अंदर प्रविष्ट होने पर स्तंभयुक्त मंडप दिखलाई पड़ता है। संभवतः इन स्तंभों की संख्या सोलह रही होगी। इनमें से मात्र तीन स्तंभ ही प्राचीन जान पड़ते हैं। स्तंभों पर नारी मूर्तियाँ तथा धनुर्धारी, जो द्वारपाल जान पड़ते हैं, लगी हैं। एक मूर्ति के पादपीठ के नीचे कुबेर व कौबेरी स्पष्ट पहचान में आ रहे हैं। प्रवेश द्वार के उपर आकर्षक अंकन है जिसमें गरूड़ को दोनों हाथों से सर्प पकड़े दिखाया गया है। गरुड़ के पंख स्पष्ट दिखाई पड़ते हैं, और अनुमान होता है कि मंदिर विष्णु या विष्णु परिवार के किसी देवता का रहा होगा। गर्भगृह की मूर्ति को आवरण पहना दिया गया है, जिससे अब उसकी पहचान कर पाना कठिन है। मंदिर के बाहर एक आकर्षक मूर्ति अर्धनारीश्वर की है। मंदिर की बाहिरी दीवार पर इन्दलदेव की भांति ही उकेरन रहा होगा पर वर्तमान में अलंकारण की बारीकियां स्पष्ट नहीं हैं। 

कई टीले हैं और कुछ घरों में मूर्तियां हैं, जो चबूतरे में स्थापित कर ली गई हैं, पुरातत्व की दृष्टि से यह कस्बा सम्पन्न तो है ही किन्तु यदि इन टीलों की खुदाई हो और कस्बे में बिखरी विभिन्न मूर्तियों का विधिवत अध्ययन हो तो संभव है। इस क्षेत्र के प्राचीन इतिहास पर और भी प्रकाश पड़ेगा। 

इस कस्बे के अपने सहयोगी शेखर जी से मैं विदा लेता हूं और अपने सहयात्री रवीन्द्र जी के साथ खरौद की स्मृति लिए वापस लौट आता हूं।

Tuesday, October 25, 2022

खरौद

खरौद, पुनः खरौद और शिवरीनारायण। उन्नीस सौ अस्सी आदि दशक के दौरान इन दोनों स्थानों पर बार-बार जाते हुए, नोट्स लेता रहा था, वह सब मिला-जुला कर एक विस्तृत लेखनुमा शोधपत्र की तैयारी थी। अब जो, जितना, जैसा था, उनमें से पहला, ‘खरौद‘ प्रस्तुत-

सदियों से मानव के जीवन यापन का क्षेत्र, और वह भी यदि ऐतिहासिक कला-साधना की तपोभूमि भी रहा हो, अवश्य ही सहज आकर्षण का केन्द्र होगा। वर्तमान खरौद ऐसी ही पवित्र भूमि पर बसा है और इसका आकर्षण भौगोलिक स्थिति के कारण और भी प्रबल हो जाता है। अन्य लोगों सहित मेरी भी यह धारणा है कि नदी तट का क्षेत्र व निवासी, विशेषकर यदि वह संगम क्षेत्र का हो, मनो-भौगोलिक कारणों से स्वाभाविक ही उसका विकास उदारचेता व्यक्ति के रूप में होता है। विशालता, उदात्तता और विस्तृत सोच का समावेश उसके व्यक्तित्व में सरलता से दिखाई देता है और ऐसे व्यक्तियों का कृतित्व अपनी कला-संस्कृति को अभिव्यक्त व विकसित कर, सुदीर्घं अवधि तक युग चेतना को आह्लाद और दिशा-निर्देश प्रदान करता है। इस क्षेत्र का विशिष्ट पुरातात्विक स्थल खरौद भी ऐसा ही स्थान है। 

यों तो खरौद में इतिहास की झांकी अत्यंत प्राचीन काल से मिलने लगती है। यहाँ के ध्वस्त-उजड़े गढ़ के धरातल की ही प्राप्तियों के आधार पर उस भूमि पर सभ्यता का इतिहास २६०० साल से भी अधिक पुराना माना जाता है, किन्तु व्यवस्थित उत्खनन अथवा विशिष्ट प्राप्तियों जैसे- सिक्के, ठीकरे आदि के लगभग अभाव के कारण, इसकी तिथि-सीमा निश्चित किया जाना संभव न हो सका है। परन्तु साथ ही यह भी संभावना है कि संबंधित संस्थाओं, व्यक्तियों एवं ग्रामवासियों की जागरुकता व प्रयास से निश्चय ही ऐसे प्रमाण प्रकाश में आ सकते हैं, जिससे खरौद तथा साथ ही साथ इस क्षेत्र के ऐतिहासिकता की स्पष्ट रूपरेखा निर्धारित की जा सके।

पुरातत्व की दृष्टि से खरौद के गढ़ का विशेष महत्व है। यह इस क्षेत्र के लगभग सौ गढ़ों में से एक है, जिनकी स्पष्ट विवेचना अब तक नहीं हो सकी है तथा छत्तीसगढ़ के पुरातल में जिनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण समझी जाती है। लक्ष्मणेश्वर मंदिर के निकट का विशाल भू-भाग खाई से घिरा हुआ है यद्यपि वर्तमान में यह खाई स्थान-स्थान पर टूट गई है, किन्तु खाई (परिखा) की वृत्ताकार रेखा का अनुमान अब भी स्पष्टतः होता है। गढ़ क्षेत्र में पुरातात्विक दृष्टि से महत्वपूर्ण, उन्नत व विस्तृत टीले हैं तथा पूरे गढ़ क्षेत्र के धरातल पर टूटे-फूटे मिट्टी के बर्तन, धातु मल व कहीं-कहीं किसी संरचना के अस्पष्ट चिन्ह देखे जा सकते हैं। लगभग इसी क्षेत्र से सागर विश्वविद्यालय के सर्वेक्षण दल को मिट्टी के बर्तन का विशिष्ट टुकड़ा प्राप्त हुआ था, जिसके आधार पर डा. श्यामकुमार पान्डेय ने इस क्षेत्र की प्राचीनता chalcolithic होने की संभावना व्यक्त की है, किन्तु ऐसे अन्य प्रभावों की अभी भी प्रतीक्षा है, जिनसे यह संभावना, निश्चय में परिवर्तित हो सके। 

‘खरौद‘ शब्द की व्युत्पत्ति एवं गढ़ के अस्तित्व में घनिष्ट संबद्धता मानी जा सकती है। इस शब्द का विग्रह ‘खर+उद्‘ किया जा सकता है, यहां ‘उद‘ शब्द का विशेष महत्व है। इस क्षेत्र के विभिन्न सर्वेक्षणों तथा बन्दोबस्ती व जनगणना रपटों आदि में उदश् अन्त वाले ग्राम नामों को विश्लेषित करने का प्रयास किया गया है, जहाँ ‘उद‘ का तात्पर्य ‘जल‘ से है। खरौद निवासी पं. नन्हेंप्रसाद द्विवेदी ने भी लगभग यही व्युत्पत्ति सुझाई है। इस संदर्भ में इस विशेष संयोग की ओर ध्यान देना आवश्यक हो जाता है कि ‘उद्‘ अन्त नाम वाले ग्रामों से अधिकांशतः मिट्टी के गढ़ों (धूलि दुर्ग) की सूचना प्राप्त होती है। सागर विश्वविद्यालय ने अपने सर्वेक्षणों के आधार पर पूर्व में इन गढ़ों को ‘आटविक‘ प्रकार के दुर्ग ठहराया था, किन्तु अब डा. पान्डेय ने स्वयं अपने मत में परिवर्तन करते हुए उन गढ़ों का ‘औद्यक दुर्ग‘ होना स्वीकार किया है। डा. पान्डेय अपने हाल के सर्वेक्षणों से इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि इन गढ़ों की प्राचीनता २६००-२७०० साल की है, अपने मत की प्रामाणिकता हेतु उन्होंने भी गढ़ क्षेत्रों का उत्खनन आवश्यक माना है।

‘खरौद‘ की उपर्युक्त व्युत्पत्ति यदि मान्य होती है और ‘उदान्त‘ नाम वाले ग्रामों की संबद्धता ‘औद्यक दुर्गों‘ से स्वीकार कर ली जाती है, तो प्रचलित ‘खर$दूषण‘ से व्युत्पत्ति का मत स्वतः अमान्य करना होगा। वैसे भी धर्म-पुराणों पर आधारित दन्तकथाओं की तुलना में प्रत्यक्ष पुरातात्विक प्रमाण की मान्यता ही अधिक श्रेयस्कर है, किन्तु पुरातात्विक विवेचना में भी गढ़ों का शास्त्र सम्मत पूर्ण परीक्षण आवश्यक है।

खरौद गढ़ का व्यवस्थित इतिहास प्रकाश में नहीं आया है अतः यहां के मंदिरों के निर्माता शासकों व गढ़ प्रशासन की सम्बद्धता पर निश्चित टिप्पणी संभव नहीं है, किन्तु बाद के काल (लगभग अठारहवीं सदी ई.) में खरौद गढ़ के महत्व की सूचना प्राप्त होती है, जो अंग्रेजी शासन के आरंभ तक रही, जब खरौद छत्तीसगढ़ (तब छत्तीसगढ़ का मुख्यालय क्रमशः रतनपुर व बिलासपुर तथा रायपुर रहा, बाद में दो भिन्न जिला मुख्यालय बिलासपुर व रायपुर बने) का प्रमुख परगना था। तत्कालीन खरौद व अन्य प्रशासनिक ईकाइयों पर डा. प्रभुलाल मिश्र ने सविस्तार विवेचना की है। अंग्रेजी शासन के दौरान ही खरौद की प्रशासनिक इकाई के स्थान पर शिवरीनारायण तहसील मुख्यालय बनाया गया, जो सन् 1885 की बाढ़ के पश्चात् जांजगीर स्थानान्तरित हो गया।

इस प्रकार दो निकटस्थ प्राचीन धार्मिक स्थलों खरौद व शिवरीनारायण की महत्ता में महानदी की भूमिका अनुमानतः निर्णायक रही। महानदी को बहाव, प्राचीन काल में वर्तमान की अपेक्षा संभवतः बायीं ओर हटकर था अथवा बाढ़ के बहुधा प्रकोप से नदी के निकटतम स्थल शिवरीनारायण के स्थान पर खरौद धार्मिक स्थल के रूप में स्थापित हुआ और संभवतः भौगोलिक परिवर्तनों से अनुकूल स्थिति बनने पर नदी के निकटतम स्थल, शिवरीनारायण का विकास हुआ। यही कारण हो सकता है, जिसके फलस्वरूप खरौद में सातवीं-आठवीं सदी ई. के पुरावशेष बहुलता से प्राप्त होते हैं जबकि शिवरीनारायण की ज्ञात लगभग समस्त सामग्रियों की प्राचीनता दसवीं सदी ई. से अधिक नहीं। इसी संदर्भ में यह उल्लेख भी आवश्यक है कि खरौद-शिवरीनारायण, जगन्नाथ पुरी, प्राचीन तीर्थयात्रा मार्ग का महत्वपूर्ण पड़ाव था।

संगम क्षेत्र और उसकी धार्मिक महत्ता के विकास में इस स्थल का इतिहास सोमवंशी काल (लगभग सातवीं सदी ई.) से आरंभ हुआ माना जा सकता है। सोमवंशी शासकों द्वारा इस स्थान पर अनेक मंदिरों का निर्माण कराया गया, जिनमें से मात्र लक्ष्मणेश्वर, इन्दल देउल व शबरी ही विद्यमान हैं। खरौद के शेष स्मारक जो स्थानीय पिछली पीढ़ी की स्मृतियों में है अथवा बेग्लर की रिपोर्ट (सन् 1873-74) में उल्लिखित हैं, वर्तमान में नष्टप्राय हैं। इनमें से एक, कथित सूर्य मंदिर का उल्लेख अवश्य किया जा सकता है। इन मंदिरों को दृष्टिगत करते हुए, यह कहना अत्युक्ति नहीं होगी कि खरौद तत्कालीन, अत्यंत विशिष्ट धार्मिक स्थल तो था ही, जो कोसली (तारकानुकृति) मंदिर स्थापत्य शैली के ईंटों के मंदिर-केन्द्र के रूप में आज भी देश का अद्वितीय केन्द्र है।

खरौद के तीन प्रमुख मंदिरों का काल अब तक सुनिश्चित नहीं हो सका है। इनमें से लक्ष्मणेश्वर मंदिर आठवीं सदी ई. का माना गया है। अन्य दो मंदिरों का काल सातवीं सदी ई. माना जाता है, किन्तु इनमें कौन सा अधिक प्राचीन है, यह निर्विवाद नहीं है। एक अमरीकी शोधकर्ता डोनाल्ड एम. स्टेडनर ने इन्दल देउल का काल ई. सन 650-660 तथा शबरी मंदिर का काल ई. सन् 700-710 निर्धारित किया है। लक्ष्मणेश्वर मंदिर के मंडप में जड़े एक सोमवंशी अभिलेख से यह सूचना प्राप्त होती है कि ईशानदेव ने लक्ष्मणदेव के मंदिर का निर्माण कराया और महामहोपाध्याय वासुदेव विष्णु मिराशी ने इस मंदिर को वर्तमान लक्ष्मणेश्वर मंदिर मानते हुए ईशानदेव की तिथि ई. सन् 540 निर्धारित की है। इस प्रकार इस मंदिर का निर्माण काल छठीं सदी ई. में पड़ता है। लक्ष्मणेश्वर मंदिर के उक्त शिलालेख में एक अन्य शासक इन्द्रबल का नाम प्राप्त हुआ है इस व्यक्ति नाम से इन्दल देडल की नाम-व्युत्पत्ति की समीक्षा भी रोचक आधार बन सकती है।

इन मंदिरों के काल निर्धारण संबंधी मतों की सूक्ष्म विवेचना भविष्य के शोध का विषय हो सकता है किन्तु यहां इतना कहना कि इन मंदिरों का निर्माण क्रम शबरी, इन्दल देऊल, लक्ष्मणेश्वर मंदिर, अधिक विश्वसनीय प्रतीत होता है।

क्रमानुसार विवरण में प्रथमतः शबरी मंदिर, जिसके संबंध में मान्यता स्वरूप शबरी और राम के जूठे बेर का प्रसंग, प्रचलित है अतः यह आदिवासी देवता से संबंधित माना जाता है किन्तु मंदिर के गर्भगृह में स्थापित प्रतिमा की पहचान अत्यधिक, वस्त्र अलंकरण के कारण निश्चित नहीं हो पाती किंतु यह अनुमानतः महिषासुरमर्दिनी की प्रतिमा का खंड है और प्रतिमा का शीर्ष भाग ही संभवतः मंदिर के बाहर एक छोटे से छतयुक्त चबूतरे पर स्थापित है। मंदिर का प्रवेश द्वार अत्यंत आकर्षण है। नाग- युग्म अलंकरण से रचे अभिकल्प का संतुलन देखते ही बनता है। प्रवेश द्वार के बीचों बीच ललाट-बिंब पर गरुड़ की आकृति उत्कीर्ण है। ललाट-बिंब पर गरुड़ की उपस्थिति से मंदिर वास्तु के शास्त्रीय निर्देशों के अनुसार संभव है कि मंदिर मूलतः वैष्णव रहा हो। प्रवेश द्वार पर ही उपर दोनों पार्श्वों में दो नारी आकृतियां हैं, एवं द्वार पार्श्वों पर ही मूल में भी दो नारी आकृतियां है। इन आकृतियों की पहचान आसानी से नदी-देवियों, गंगा एवं यमुना के रूप में की जा सकती है। इसके पश्चात मंडप की संरचना की चर्चा में पहले पर स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि मंदिर का यह भाग पुनर्संरचित है।

मंडप में अर्द्धस्तंभों पर विभिन्न प्रतिमाएं उत्कीर्ण हैं, जिनमें से दो प्रतिमाएं शिव गण अथवा शैव द्वारपाल के रूप में पहचानी जा सकती हैं। एक प्रतिमा सिंहवाहिनी दुर्गा की है। एक अन्य नारी प्रतिमा पादपीठ पर मकर अंकित होने के कारण गंगा के रूप में पहचानी जा सकती है। शेष तीन प्रतिमाएं, जिनमें दो पुरुष व एक नारी प्रतिमा है, की पहचान राम, लक्ष्मण व सीता के रूप में की गई है। कथित राम-लक्ष्मण की प्रतिमाओं को सूक्ष्मता से देखने पर प्रतिमाओं के वक्ष पर कवच व पैर उपानहयुक्त (जूतों से ढके) दिखाई पड़ते हैं, जिनसे संभावना प्रकट की जा सकती है कि ये प्रतिमाएं सूर्य के अनुचर या पार्श्व देवता हो सकते हैं। यदि इन प्रतिमाओं को सूर्य परिवार से संबंधित माना जाता है तो खरौद में सूर्य मंदिर की उपस्थिति तथा शबरी मंदिर का लोक प्रचलित नाम ‘सौंराई‘ जो ‘सौर‘ शब्द का अपभ्रंश हो सकता है, आदि अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाते हैं। इससे खरौद सौर सम्प्रदाय के एक विशिष्ट स्थल के रूप में दर्ज किया जा सकता है।

मंदिर के बाहर रखी व्याघ्रचर्मधारी अर्द्धनारीश्वर प्रतिमा संतुलित और आकर्षक है। मंदिर, भू-योजना में ताराकृति तथा ईंटों से निर्मित होने के कारण भारतीय स्थापत्य कला का विशिष्ट उदाहरण माना जाता है। संदर्भवश शिवरीनारायण की दो प्रतिमाओं की विवेचना भी आवश्यक है, जो वहां मुख्य मंदिर के अन्तराल में दोनों पार्श्वों में स्थापित हैं। ये दोनों आदमकद प्रतिमाएं, विष्णु के आयुध पुरुष अर्थात शंख एवं चक्र पुरुष हैं। शिरोभाग पर शंख व चक्र का अंकन अत्यंत रोचक है। ये प्रतिमाएं शबरी मंदिर के उक्त गण या द्वारपाल प्रतिमाओं के ही समरूप है।

इन्दल देउल मंदिर की योजना भी ताराकृति है और यह मंदिर भी ईंटों से निर्मित है, किन्तु मंदिर के चारों ओर आलों (चैत्य गवाक्ष अथवा कुडु) में विभिन्न प्रतिभाएं यथा- गणेश, नरसिंह आदि अब तक स्पष्ट पहचान में आती हैं। इन्दल देउल मंदिर का चबूतरा अथवा जगती, शबरी मंदिर की तुलना में भिन्न है। शबरी मंदिर को चबूतरे की ऊंचाई कम व विस्तार अधिक है जबकि इन्दल देउल का चबूतरा अधिक ऊंचा व कम विस्तृत है। इस मंदिर में विशेष महत्व की गंगा-यमुना की प्रतिमाओं का है, जो तत्कालीन भारतीय कला में अपना विशिष्ट स्थान रखती हैं। इन प्रतिमाओं का प्रवेशद्वार की तुलना में आकार और अलंकरण सौंदर्य, दोनों ही विशिष्ट प्रकार का है। अतः भारतीय कला की प्रामाणिक पुस्तकों में इनकी चर्चा की गई है। भारतीय मंदिर वास्तु पर स्टेला क्रैमरिश ने स्तुत्य कार्य किया है, इनकी पुस्तक ‘द हिन्दू टेम्पल्स‘ में इन प्रतिमाओं का उल्लेख करते हुए लिखा है कि खरौद के इन्दल देउल की गंगा यमुना प्रतिमाएं पूरे प्रवेश द्वार की ऊंचाई की हैं और उन्होंने इसे विशिष्ट माना है। भारतीय हिन्दू प्रतिमा शास्त्र पर प्रामाणिक कार्य टी.ए. गोपीनाथ राव का माना गया है। उन्होंने अपनी पुस्तक में चित्र सहित इन प्रतिमाओं का विवरण दिया है। इस पुस्तक में अधिकांश दक्षिण भारत के ही प्रतिमा उदाहरणों का समावेश किया गया है। शेष भारत के ऐसे ही अद्वितीय उदाहरणों को सम्मिलित किया गया है। नदी देवियों की इन प्रतिमाओं के पार्श्व से भित्ति बाहर की ओर निकलती है जो वर्तमान में अंशतः शेष है किन्तु इससे अनुमान होता है कि मंदिर संरचना में मंडप आदि उपांग भी थे, जो अब नष्ट हो गये हैं।

लक्ष्मणेश्वर मंदिर का मंडप भी शबरी की भांति पुनर्संरचित है, जिसमें दो प्राचीन शिलालेख जड़े हैं। गर्भगृह का हिस्सा भी परवर्ती काल में अंशतः परिवर्तित है। इसी तरह अनुमान होता है कि यह मंदिर भी मूलतः ईंटों से निर्मित संरचना है जिसे बाद के काल में प्लास्टर से ढक दिया गया है। मंदिर के गर्भगृह में अष्टकोणीय शिवलिंग मूलतः विद्यमान है किन्तु ‘लैटराइट‘ पत्थर का होने के कारण जलवायुगत प्रभाव के कारण रन्ध्रयुक्त हो गया है और इसके संग लक्षरंध्रयुक्त होने की मान्यता जन-विश्वास में प्रबल हो गई है। गर्भगृह के प्रवेश द्वार पर अन्य दोनों मंदिरों की भांति किन्तु भिन्न प्रकार से नदी देवियों का अंकन है। यहां प्रवेशद्वार की ऊंचाई दो भागों में विभक्त है, जिसके निचले भाग पर द्वारपाल व उपरी भाग पर गंगा व यमुना को उनके वाहनों क्रमशः मकर व कच्छप पर स्थित दिखाया गया है। मंदिर के प्रवेश द्वार के समक्ष मंडप दो स्तम्भ है। इनमें से एक स्तंभ पर रामकथा के दृश्य व सर्प अलंकरण युक्त है। जबकि दूसरे स्तंभ पर शैव धर्म से संबंधित उकेरन है। यह मंदिर धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्व है।

Monday, October 24, 2022

मड़वा महल शिलालेख

अलेक्जेंडर कनिंघम ने 1881-82 की रिपोर्ट में इस शिलालेख का संक्षिप्त विवरण दिया है। राय बहादुर हीरालाल ने पर्याप्त विस्तार से चर्चा करते हुए, अभिलेख के मुख्य आशय को स्पष्ट किया है, जिनका उल्लेख यहां प्रस्तुत मसौदे में भी आया है। डॉ. विष्णु सिंह ठाकुर ने अभिलेख के आवश्यक हिस्से का पाठ तैयार किया था, वे पुटिकापुर की चर्चा किया करते हुए मानते थे कि कवर्धा का नागवंश, बस्तर के छिंदक नागों से भिन्न फणिनागवंश है और पुटिका, फणि का पर्याय है।

बालचन्द्र जैन जी (20 नवंबर 1924 - 06 जून 1995) सेवानिवृत्ति के पश्चात विरक्त अपरिग्रह भाव से ऐसी सामग्री, 'आपलोग इसका उपयोग अपने लिए कर लीजिएगा', कहते हुए सौप देते थे। रायकवार जी के साथ मैं उनके स्नेह का भागी रहा। यह पेपर मुझे 1986-87 में उनसे प्राप्त हुआ था। इस दीर्घ शिलालेख का पाठ व संपादन उन्होंने किया था और संभवतः प्रकाशित नहीं करा पाए, इसमें अन्य जानकारियां शामिल कर इसे अद्यतन होना है, फिलहाल यहां प्रस्तुत वह लेख-


Mandawa Mahal Inscription of Ramachandra 
V.S. 1406 
By: BALCHANDRA JAIN 

The inscription was found in the mandapa of a ruined temple known as Mandawa Mahal, about 15 Km. from Kawardha in the Durg Rajnandgaon district of Madhya Pradesh. It was removed from there and kept under a tree near that temple. In 1963, the inscription was brought to Raipur under my directions and deposited in the local Mahant Ghasidas Memorial Museum. 

The inscription has been noticed by Cunningham in his Archaeological Survey Reports (Vol- XVII pp- 40-41). Rai Bahadur Hiralal gave an account of the same in his list of inscriptions in Central Provinces and Berar (Second Edition, No- 305). But, the inscription remained unedited so far. I take this opportunity to edit it from the original stone and an ink-impression from the Chief Epigraphists' office. 

The stone slab bearing this long record is in two pieces. The right piece is about three times bigger than the left one and is in a better state of preservation than the other one. Left piece is damaged at its top and bottom both. Further, the inscription has also suffered a great deal by exposure to weather, particularly in its lower part. 

The writing covers a space measuring about 160 cms. broad and 70 cms. high. The record consists of 37 lines. In addition, four letters are engraved above the first line; of them three belong to line 3 where in they were omitted. The average size of the letter is 1.5 cm. but the letters in line 1 are comparatively larger and measure about 2 cm. each. 

The characters are Nagari of the fourteenth Century A.D. Form of Ksh and dh is developed, and prishthamatras are absent. Language is Sanskrit and the record is metrically composed through-out. There are in all 96 verses in the record which are numbered. But because the writer made mistake in numbering, the verse 23 as 22 and continued his mistake onwards, the last number of the verses as given in the inscription is 95 which in fact should be as 96. The record shows the usual orthographical peculiarities such as substitution of v for b, s for s, kh for sh and sh for kh. Ri has been substituted for ri and gga is written as gra. 

The inscription is dated in the last line which is too much damaged. It mentions Vikrama Saka 1406 bearing the name Jaya. Cunningham suggested that the year is clearly intended for the era of Vikrama and is therefore equivalent to A. D. 1349 which corresponded in its latter half with the samvatsara Jaya of the 60 years cycle of Jupiter, according to the northern reckonings (A.S.R. Vol XVII p. 40). Rai Bahadur Hiralal accepted it and expressed that the word 'saka' used in the phrase is merely an equivalent of a year and because the prasasti was composed by a southerner, the era is indicated in a curious way (Hiralal's list, Sec. ed. p. 177). The name of the composer is mentioned in verse 86. He was Vitthala a dakshinatya. The name of the engraver was possibly mentioned in verse 94 but the same is now lost. 

The object of the inscription is to record the construction of a temple of Ramesvara Siva (same as Mandawa Mahal), to the east of the city of Chaturapura Standing on sankari river, by Ramachandra, a king of Phanipativansa who also built a vapika and granted village of Rajapura rich in money and rice for the arrangements of the offerings of the god, Bhogisvarabhushana. The architect of the temple was Mahadeva who was well-versed in the silpa sastras. The architect is mentioned in verse - 94, and the temple itself is described in verse 77. The day and month of the pratishtha of the temple were probably given in verse 88 but now lost. The king is also said to have sanctioned agraharas and granted ... a village named kumbhipur to Mahesawho was best among the dvijas, from verse 83, appears that one of the sons of king Ramchandra (name lost) also granted ... some village. Names of Voparaja (v.86), Gopaladeva (v.90), Lakshmanadeva (v.91) and -himadeva (v.91) are also mentioned but the context is not clear. King Ramachandra's prime minister was Ramadeva who is said to have been born in the family of Narayana. The purohita was Harihara. He had mastered the magical arts of sanstambhana, uchchatana, mohans, vidravana, akarshana and va-ikriya etc. (v. 70-71). Verse 73 mentions one Jagajjyoti. A preacher of the Pasupati sect whose name seems to be Ihunbhira is refered to in verse 79. Names of the queens and sons of king Ramachandra as known from the inscription are as below - 

1. Queen Subhambika. She gave birth to three sons, 1. [Kanha] dadeva, 2 Chandana and 3 name lost (v. 62-63). 
2. Queen Dhanyambika. She was born in the family of Haihaya. She also gave birth to three sons, one of them being Arjuna (V. 64-65). 
3. Queen Ramambika. Her son was Lakshi-Brahma ? (v. 66). 
4. Queen Bhil-amba. Her son was Harshapala (v. 67). 
5. Queen Padma born in Kamalajavamsa (v.68). 
6. Sixth queen whose name started with the letter bha was perhaps born in the family of the Nagas (v. 69). 
7. Queen Vachamba. She donated something to the temple built by her husband (v. 82). 

The inscription gives the genealogy of the / Phanivamsa to which king Ramachandra belonged. The accuracy of the genealogy is however doubtful and it appears that a number of fictitious names have been inserted to swell it (Hiralal's list, p. 176). 

The legend of the origin of the family is also narrated. It is stated that on the southern bank of the river Narmada in Vindhya mountain, there lived a Brahmana sage named Jatukarna. His wife was Vrata. They had two sons called Susarman and Devsharman and a daugher named Mithila. Verse 10 tells us that in due course of time, a small town was inhabited there and the same was called to Parnaputi or Patraputi. 

After having taught all the fourteen Vidyas to his sons, the sage left the daughter in their charge and along with his wife went to the heaven (v. 11). A servant of the serpent king saw Mithila when she was playing in the courtyard of her cottage with dolls. The servant informed his master. The serpent-king became eager to see the daughter of the sage. He assumed form of a brahmana youth and went to her cottage: He fell in love with her. They were married and their issue was Ahiraja (v. 16-2). 

Ahiraja conquered the armies of neighboring chiefs and founded the dynasty of Ahikula. His son was Rajalla. Dharani Dhara was the son of Rajall Deva but at the time of his fathers' death he was a minor and was therefore put in the charge of one Dharalla (v. 33) who appears to be a brother of Rajalla. Dharalla was conquered by Mahimadeva (v. 34). The identity of Mahimadeva is not disclosed in the verse but it seems that he was none but Dharani Dhara himself who was compelled to fight against his uncle perhaps because the lattar was not willing to handover the kingdom to the nephew even after his attaining the major hood. 

Son of Mahimadeva was Sakti Chandana? The latter's son was Gopaladeva who is stated to have been a powerful ruler of the dynasty. It cannot be said in definite terms whether this Gopal deva is identical with Ranak Gopal deva, during whose reign the Chhapari statue of umamaheśvara was set up in (Kalachuri) samvat 8-40 or 1048-49 A.D. CII Vol. IV pp. 580 ff., but Gopals of Pujaripali inscription. ibid pp. 588 ff. and Seorinarayana inscription of Jajalladeva II dated K.S. 919 ibid pp. 519 ff. cannot, in any way, be identified with this Gopal deva because of the developed script of the undated Pujaripali inscription and the other Gopala belonging to a branch of the Kalachuris. 

Gopaladeva was succeeded by his son, Naladeva who was again followed by his son Bhuvanpala. After Bhupanapala, his two sons, Kirtipala and Jaitrapala ascended the royal throne in order of seniority. Jaitrapala was followed by his son Mahipala. After Mahipala, his son Vishamapala as ascended throne. His son was Jahuna who became an ascetic after handing over the kingdom to his son Jagapala, whose son was Yasoraja (v. 45). He is also called Jasaraja in next verse 46 wherein it is stated that he had many sons including Chandana and Khadgadeva. Chandana succeeded his father and assumed the name of the Kanhadadeva. After him, Yuvaraja Khadgadeva got the kingdom and was known by the name of Lakshmavarman. 

We know that the Sahaspur Statue inscription of K.S. 934 (1182 A.D.) (C.I.I. Vol. IV pp. 595-96.) and the Boria statue inscription of K.S. 910? were inscribed during the reign Maharanaka Jasarajadeva and Yasoraja respectively. In Sahaspur inscription, his queen Lakshmadevi, two sons Bhojadeva and Rajadeva and one daughter Jasalladevi are mentioned. But we do not find the names of Chandana or Khadgadeva who according to the present inscription were his elder sons. This again throws a doubt on the accuracy of the genealogy given in the present inscription. The question of identification of Yasoraja is however discussed below while dealing with Malugi deva and Bhojadeva. 

Son of Khadgadeva was Bhuvanaikamalla. He is stated to have built the fortified city of Chaturapuri, to the south of which the river Sankari flowed. A temple of Hattakesvara stood on the bank of that river. The king is stated to have worshipped the goddess Brahmani in that temple (v. 49-50). Bhuvanaikamalla also built a high temple of Siva to the north of the city and excavated a large tank (v. 51). The temple has been identified with the ma magnificent Bhoramedeva temple which stands on a large tank. It was repaired in V. S. 1608 by Maharajadhiraja Sri Ghaghuji whose inscription states that the temple was of Bhuvanapala . (I.H.Q. XXXVI, Nos 2 and 3, 1960, pp. 85), which as suggested by Dr. S.L.Katare may be a mistake for Bhuvanaikamalla. But the view of Dr. Katare that the temple was constructed in 1280 A.D (Ibid, page 90.)is not agreeable, because the monument cannot be assigned to a period later than the 12th Century A. D. Most probably the temple of Bhoramadeva was constructed in Circa 1140 (Journal of Indian History Vol XL, part II, p. 256). 

The inscription informs that Vijjana, son of Chandana, the elder brother of Khadgadeva was appointed as Yuvaraja during the reign of Bhuvanaikamalla. It further tells that after Bhuvanai kamlla, his son Arjuna become king and Vijjana son of Vijjana was appointed Yuvaraja (v.53). Son Arjuna was Bhima who succeeded his father. Malugideva who seems to be the son of Vijjana was then given the post Yuvaraja. 

Bhima was followed by his son Bhoja, during his reign, Lakshmana son of Malugideva acted as Yuvaraja (v.55). From verse 56, we know that Bhoja died issueless. And, therefore, Ramachandra either son or son-in-law of Lakshmana was selected for the royal throne, by the ministers (v.x 57-58). The inscription was set up during the time of this Ramachandra. 

Both the ancestors of Ramachandra, Malugideva and Bhojadeva are known from two copper plates ((Journal of Indian History Vol XL, part II, p. 253 ff) obtained from village Kotera in the Balod Tahsil of Durg district, M.P. The plates are dated in Saka years 1106 and 1126 respectively, corresponding to 118 4-85 and 1204 A. D. In those records, both Malugideva and Bhojadeva are styled as Maharanaka, from these we came to know that Malugideva was a Paramamahesvra and that Bhojdeva had attained the five great sounds. It is true that the genealogy of those two kings is not given in those records because of their being merely business documents, but the use of the title Maharanaka indicates that they were feudatories and acknowledged the sovereignty of some other mightier kings who may be the Kalachuri rulers. Among the Kalachuris, Ratnadeva III is known to have been ruling in Chedi Samvat 933 or 1181-82 (C.I.I. Vol. IV, pp. 533 ff) while the first known date of his son Pratapmalla is K.S. 965 or 1214 A.D. (Ibid, Vol. IV, pp. 543 ff.) 

I have shown my inclination (Journal of Indian History, Vol XL part II, p. 255) to identify maharanaka Bhojadeva of Kotera C.P. inscription with Kumara Bhojadeva of Sahaspur statue inscription of K. S. 934 or A.D. 1182 and with Bhoja, son of Bhima of the present inscription. As Yasoraja is known to have been ruling in 1182 A.D., his elder son Bhojadeva seems to have succeeded him in about 1200 A. D. This finds support from the Kotera copper plate which was written in A.D. 1204. But, in the present inscription, Bhoja is said to be the son of Bhima, who was great grandson of Khadgadeva, grandson of Bhuvanaikamalla and son of Arjuna. This again throws a doubt on the accuracy of the genealogy. 

The known date of Malugi deva is 1184-85 A. D. (Kotera plate, Saka Samvat 1106) This suggests that Bhoja's father was a contemporary of Malugideva, and since a king named Yasoraja whose elder son was one Bhojadeva was actually ruling in 1182 A. D. (C.I.I. Vol IV, pp. 595-66), it is evident that Bhima of this inscription and Yasoraja of Sahaspur statue inscription are identical. Jasarajadeva of the Boria statue inscription may also be identified with Yasoraja of Sahaspur statue if the date 1110 on the former as read by Cunningham in one place (A. S. R. Vol XVII p. 45) is correct and is referred to in terms of Saka era. In that case the period would be equivalent to 1188 A. D. But if the date is read as 910 and is referred to in terms of K. S. (A.S.R. Vol. XVII, p. 44; C.I.I. Vol. IV, p. 585) correspond to 1158-59 A. D. This would be too early for it would Yasoraja whose known date is 1182 A.D. However, this is all conjecture, and unless fresh evidence is coming forth-with, we can not say anything definitely. 

The genealogical table as known from the inscription is given below (The present table differs at certain places from the table given in Hiralal's list (p. 175). It seems that the king and Yuraraja both possessed powers of ruling chief and were styled as Ranaka or Maharanaka as evidenced by other inscriptions.) – 

The geographical names mentioned in the record are Vindhya mountain, Narmada river, Parnaputi, Chaturapuri, river Sankari, Rajapura and Kumbhipuri. Of these, Vindhya and Narmada are well known. The site of Parnaputi can not be identified. However, in the Puranas, the name of Purikä as the capital of the Nagas occurs (Dyn. of Kali age p. 49 दौहित्रः शिशुकोनाम पु-रकायां नृपोSभवत्।). Chaturapuri or Chaturapura is undoubtedly village Chaura within whose limits the inscription was originally found. Sankari is the same river which is less than a Km. from the findspot of the inscription. Rajapura may be identified with the village of same name about 5 Km. from Chaura. Kumbhipuri is not traceable.

Wednesday, October 19, 2022

धर्मधरा रायपुर

छत्तीसगढ़ के उत्तर में चांगदेवी, कुदरगढ़िन, महामाया, खुड़ियारानी हैं, पश्चिम में बमलेश्वरी, पूर्व में चंद्रहासिनी और दक्षिण में दंतेश्वरी। शैव पूजा-उपासना केंद्र अनेक हैं तथा मध्य छत्तीसगढ़ में राजिम का राजीवलोचन मंदिर, बिलासपुर अंचल का शिवरीनारायण मठ और रायपुर का दूधाधारी मठ, वैष्णव परंपरा के महत्वपूर्ण केंद्र हैं।

इस परिप्रेक्ष्य में महंत श्रीवैष्णवदासजी, महंत श्रीलक्ष्मीनारायणदासजी तथा महंत श्रीरामचरणदासजी, रायपुर के साक्षात्कार की यह जानकारी बहुत पहले यथास्मृति डॉ. विष्णुसिंह ठाकुर जी के माध्यम से आई थी। इसमें मेरे द्वारा वर्तनी आदि का आंशिक संशोधन मात्र किया गया है, इससे अधिक इसमें मेरी कोई भूमिका नहीं है, न ही मेरे द्वारा इसके तथ्यों का परीक्षण किया गया है। मेरी जानकारी में यह कहीं प्रकाशित नहीं है तथा महत्व की है, अतएव यहां प्रस्तुत-

साक्षात्कार - महंत श्रीवैष्णवदासजी, 14.10.1984,श्रीदूधाधारी मठ, रायपुर

# श्रीदूधाधारी मठ - (रामानंदी सम्प्रदाय)

रायपुर के वर्तमान मंदिरों में श्रीदूधाधारीमठ निश्चित रूप से प्राचीनतम है। ‘दूधाधारी मठ’ की स्थापना विक्रम संवत् 1610 ई. में हुई। मध्यप्रदेश में रामानंदी सम्प्रदाय के पांच मठ हैं। इनमें से एक श्रीदूधाधारी मठ है। इसकी स्थापना श्रीगरीबदासजी के शिष्य श्रीबलभद्रदासजी (श्रीदूधाधारी) द्वारा की गई। इसके वर्तमान महंत राजेश्रीवैष्णवदासजी हैं।

‘सी.पी.बगट’ के अनुसार छत्तीसगढ़ के इस अंचल को धार्मिकता से ओतप्रोत करने का विचार राजस्थान के जोधपुर के पास ‘झीथड़ा’ नाम स्थान पर हुआ। ‘संतकुवरजी महाराज’ ने अपने शिष्य श्रीगरीबदासजी और उनके शिष्य श्रीबलभद्रदासजी जो बाद में श्रीदूधाधारीजी के नाम से सुविख्यात हुए, को आज्ञा दी कि जहां लोग हरिपद विमुख है तथा बाहर से आने वाले धर्म प्रचारक उनमें ही समाहित हो जाते हैं। वहां के लोगों को ज्ञान-भक्ति का उपदेश देकर, उनके विवेक को जागृत करो और उन्हें सर्वशक्तिमान ईश्वर के प्रति आस्थावान बनाओ। गुरु आज्ञा को शिरोधार्य करके संत श्रीगरीबदास एवं उनके शिष्य श्रीदूधाधारी महाराज ने पुष्कर, मथुरा, अयोध्या, वाराणसी, प्रयाग, वैनगंगा नदी के किनारे भंडारा जिले के पौनी नामक स्थान को अपना वास्तव्य बनाया और गुरु-शिष्य दोनों ने मिलकर जनता की विभिन्न प्रकार से सेवा करते हुए वहां के वातावरण को भगवतमय कर दिया। गुरु और शिष्य दोनों को हनुमान जी का इष्ट था उनके आशीष से उन्होंने पौनी में रहते हुए कुछ ऐसे कार्य किए जिनसे न केवल सामान्य जनता अपितु राजे-महाराजे और उच्च अधिकारी उनके शिष्य बन गये।

एक दिन उन्होंने ‘श्रीदूधाधारी बलभद्रदासजी’ को आदेशित किया कि तुम सब तरह से योग्य हो और हमारी गुरू की इच्छा को पूरी करो। ‘श्रीदूधाधारीजी’ उनके इस वाणी को सुनकर तत्काल छत्तीसगढ़ के लिए रवाना हुए। गोंदिया, डोंगरगढ़ होते हुए बलौदा बाजार तहसील में स्थित ‘तुरतुरिया’ नाम वनस्थली में पहुंचे और वाल्मीकि आश्रम को अपना निवास स्थान बताया। कंकपुर नरेश जो कुष्ठ से पीड़ित थे और जीवन से निराश होकर मरण के अभिलाषी थे, स्वामीजी से मिले उनके द्वारा बताई गई विधि से कुष्ठ मुक्त हुए। उन्होंने इस सिद्ध संत की चर्चा रायपुर के तत्कालीन नरेश सोमदत्त सिंहदेव से किया जो संतानहीन थे। सपत्निक अपने हितेषियों के साथ तुरतुरिया पहुंच स्वामी जी की पूजा अर्चना कर अपने कष्ट का निवेदन किया। श्रीदूधाधारी जी के आशीष से राजा पुत्रवान हुए उन्होंने स्वामीजी से रायपुर में रहने का अनुरोध किया। पहले अस्वीकार कर बाद में राजा का अनुरोध स्वीकार कर रायपुर पधारे।

आज जिस स्थान पर किले का अवशेष दिखाई देता है और जहां दूधाधारी मठ हैं उसके चारों ओर घनघोर जंगल था। जिस समय श्रीदूधाधारीजी इस स्थान पर आये यह बात सन् 1650 के बाद की है। पूर्व में अपने काका श्रीरामानुजदासजी के विश्राम स्थली को अपना कार्यस्थ बनाया। संवत् 1973 कार्तिक सुदी एकादशी को 153 वर्ष की आयु में परम पद को प्राप्त हुए। इनकी परंपराओं का अनुसरण करते हुए इनके पश्चात् श्रीसीतारामदासजी, श्रीसरयूदासजी, श्रीरामचरणदासजी, श्रीलक्ष्मणदासजी, श्रीबजरंगदासजी एवं श्रीवैष्णवदासजी, इस मठ के मठाधीश हुए हैं।

मंदिर के विकास में श्रीरामचरणदासजी ने भी कार्य किया। श्री रामजी के मंदिर का निर्माण इनके द्वारा ही कराया गया। यह मंदिर पुरी के ‘जगन्नाथ मंदिर’ की शैली में निर्मित कराया गया। यह ऊंचा शिखरदार है, इसकी भीतरी बनावट और परिक्रमा में बने 24 अवतारों का मंगल विग्रह निश्चय ही दर्शनीय है। यह दक्षिणात्य प्रथानुसार निर्मित है। मंदिर को वर्तमान बाह्य स्वरूप में पहुंचाने का श्रेय महाराज श्रीबजरंगदासजी को है। श्रीदूधाधारीजी द्वारा बालाजी और लक्ष्मणजी के मंदिर का निर्माण कराया गया। इस मंदिर के सामने संकटमोचन पवनसुत हनुमानजी के पावन स्वरूप की स्थापना हुई। हनुमानजी यहीं से प्रगट हुए हैं उन्होंने बाल रूप रवि को भक्षण किया था। दूधाधारी मंदिर के अंदर गर्भगृह में रामायण कथा का चित्र, गजमोक्ष, धेनुका-वध, वकासुरवध का अति सुन्दर चित्रण है। रामचंद्रजी के मंदिर में सफेद रंग का ध्वज तथा हनुमानजी के मंदिर में लाल रंग का ध्वज लगा हुआ है। प्रमुख मंदिर के चारों तरफ बुर्ज है। मंदिर के अधीन भगवान के नाम पर 20 गांव की जमीन है। मंदिर में 75 विद्यार्थी रहते हैं। दूधाधारी बाबा की समाधि के पास 2 बड़े नीम के वृक्ष हैं किंवदन्ती है कि ये वृक्ष दूधाधारी बाबा दातौन फेंकने पर हुए थे।

इस मठ के द्वारा केवल धर्म का प्रचार नहीं हुआ अपितु उसने संपूर्ण मध्य भारत को धर्ममय बना दिया। रायपुर नगर के वातावरण में आज भी ‘धारयते स धर्मः’ की अनुगूंज गोपाल मंदिर प्रभृति मंदिरों की निर्मिति के साथ सुनने को मिल रही है।

साक्षात्कार - महंत श्री लक्ष्मीनारायणदासजी, 13.10.1984,श्रीजैतूसाव मठ, रायपुर

# श्रीजैतूसाव मठ

जैतूसाव नाम एक श्रेष्ठि द्वारा इस मठ का निर्माण सन् 1877 में उमाबाई द्वारा कराया गया। यह मठ श्री सम्प्रदाय परम्परा से सम्बद्ध है। मंदिर का निर्माण जलकी के पत्थर से हुआ है। 

मुख्य मंदिर के गर्भगृह में राम, जानकी व लक्ष्मणजी की प्रतिमा प्रतिष्ठित है। मुख्य मंदिर के प्रवेश द्वार पर द्वारपाल जय-विजय की प्रतिमा है। प्रवेश द्वार के चौखट पर ऊपर शेषशायी विष्णु विराजमान हैं तथा सबसे ऊपर सप्तर्षि की मूर्तियां बनी हुई है। प्रवेश द्वार के चौखट पर तीन ओर नाग कन्याओं की प्रतिमाएं बनी हुई है। जैतू साव मठ के प्रथम पुजारी महंत श्रीबिहारीदासजी हुए। वर्तमान में महंत श्रीलक्ष्मीनारायणदासजी हैं। ये सन् 1908 में महंत बने जिनके उत्तराधिकारी महंत श्रीरामभूषणदासजी हैं।

# मच्छी तालाब मंदिर (निम्बार्क सम्प्रदाय)

मंदिर के पुजारी व महंत, पास के तालाब की मछलियां मारने नहीं देते थे। अतः इस तालाब का नाम मच्छी तालाब तथा उससे संलग्न इस मंदिर का नाम मच्छी तालाब मंदिर पड़ा। यह मंदिर निम्बार्क सम्प्रदाय का है। मुख्य मंदिर के गर्भगृह में राधा-कृष्ण की मूर्ति है। निम्बार्क मत के परमोपास्य तथा परमाराध्य युगल स्वरूप श्री राधा-कृष्ण हैं। युगल मूर्ति के प्रतीक सर्वेश्वर शालिग्राम की प्रमुख रूप से सेवा का यहां विधान है।

मंदिर में अभी तक 4 महंत हुए हैं। श्रीनरसिंहदासजी प्रथम महंत थे। उसके पश्चात् उनके उत्तराधिकारी क्रमशः श्रीपूरनदासजी एवं श्रीसुदर्शनदासजी हुए। वर्तमान में श्रीदयालदासजी महंत हैं। हनुमान मंदिर से संलग्न 25 एकड़ जमीन भगवान के नाम है। मंदिर के ऊपर लाल रंग का झंडा लगा हुआ है क्योंकि यह मंदिर बजरंगबली के नाम का मंदिर है। 

# सुहागा मंदिर (निम्बार्क सम्प्रदाय)

1935 में इस मंदिर की प्रतिष्ठा श्री मनोहरलाल तिवारी की धर्मपत्नी सुहागाबाई द्वारा हुई। जिनके नाम पर इस मंदिर का नाम पड़ा। मुख्य मंदिर के गर्भगृह में राधा-कृष्ण की प्रतिमा प्रतिष्ठित है। कृष्ण की प्रतिमा काले रंग की है। प्रवेश द्वार के दायीं ओर द्वारपाल जय तथा बांयी ओर द्वारपाल विजय की मूर्ति है। मंदिर में कुल 16 स्तंभ लग हुए हैं जिनमें 8 स्तंभ बीच में तथा 8 स्तंभ दीवारों से लगे हुए हैं।

मंदिर में प्रवेश करते ही जगमोहन, हाल की दीवारों पर बायीं ओर दत्तात्रेय भगवान उसके ऊपरी दीवार पर पूतना तथा दत्तात्रय भगवान के बायीं ओर परशुराम, शेषशायी श्री विष्णु लक्ष्मी तथा शिव परिवार के खूबसूरत रंगीन चित्र अलंकारिक दृश्यों से पूर्ण चित्रित किये गये हैं। द्वारपाल विजय के बायीं ओर की दीवार पर क्रमशः कालिया-दमन, श्रीरामदरबार, गजेन्द्र-मोक्ष का अति सुन्दर चित्रण है। उन चित्रों से संबंधित दोहे दीवारों पर लिखे हुए हैं। मंदिर के सामने गरूड़जी की मूर्ति है। गर्भगृह के प्रवेश द्वार के चौखट पर गणेशजी की प्रतिमा है। मंदिर के अंदर प्रवेश करने के लिए 4 द्वार बनाये गये हैं। 2 दरवाजे पीछे की ओर से एक दरवाजा मंदिर के बायीं ओर तथा एक मुख्य द्वार है। मंदिर के बाहरी ओर पीछे दीवार पर बायें कोने में वामन अवतार बीच में नृसिंह अवतार तथा दाहिनी तरफ वाराह अतवार की प्रतिमा है। मंदिर के चारों तरफ लगे फर्श में से बायीं ओर मगर की आकृति बनी हुई है जिससे मंदिर के भीतर का जल बाहर निकलने की सुविधा है। मंदिर के ध्वज का रंग सफेद है तथा मंदिर के तीन तरफ ऊपर में त्रिशूल टंगे हुए हैं। मंदिर के सामने दाहिनी ओर एक छोटा सा मंदिर हनुमानजी का है। हनुमान मंदिर के दाहिने बाजू छोटा सा शिव मंदिर है जिसमें शिवलिंग के पीछे गणेशजी की फोटो व सामने नंदी की फोटो व उनकी दाहिनी ओर पीछे हटकर कीर्तिमुख की प्रतिमा है।

मंदिर में सुहागाबाई के रहते ही प्रथम महंत श्रीरामचरणदासजी हुए जिनके उत्तराधिकारी महंत श्रीमधुसूदनदासजी हैं। मंदिर की महंत परम्परा रामानंदी है।

साक्षात्कार - महंत श्रीरामचरणदासजी, 17.10.1984, सुहागा मंदिर, रायपुर

# नागरीदास मंदिर (निम्बार्क सम्प्रदाय)

लगभग 200 वर्ष पूर्व निम्बार्क परम्परा के संतों को आश्रय देने के लिए भोंसले वंश के राजाओं द्वारा इस मंदिर की स्थापना करायी गई। गर्भगृह में राम, लक्ष्मण व सीताजी की प्रतिमा प्रतिष्ठित है। प्रवेश द्वार के चौखट पर नौ ग्रह बने हुए हैं। मंदिर की तीन दिशा में भगवान वराह, पीछे नृसिंह अवतार तथा बांयी ओर वामन अवतार है। मंदिर का जगमोहन हाल 6 खंभों पर आधारित है, जगमोहन हाल के दोनों तरफ दीवार है, जिस पर 92 स्तंभ दीवार से लगे हुए हैं। यह मंदिर दक्षिण की शैली का छोटा नमूना है।

मंदिर के सामने सती मंदिर है, जिनमें मंदिर के संस्थापक मधुकरसाव की पत्नी के सती होने पर उनकी मूर्ति प्रतिष्ठित है। इन्हें सती हुए लगभग 150 वर्ष हुए। सती मंदिर के समीप उनके छोटे भाई व उनकी पत्नी का मंदिर है। जिसके पीछे हनुमानजी का तथा बायें कोने में शंकरजी की मंदिर है। इस मंदिर में अभी तक कुल 5 महंत हुए जिनके नाम क्रमशः श्रीगुलाबदास, श्रीआरतीदास, श्रीनागरीदास, श्रीराधिकादास तथा श्रीगोविन्दशरणदास हैं।

# हनुमान मंदिर, पुरानी बस्ती (निम्बार्क संप्रदाय)

यह मंदिर, जैतू साव मठ से भी अधिक प्राचीन है। प्रमुख मंदिर निम्बार्क संप्रदाय के परमाराध्य तथा परामोपास्य युगल स्वरूप श्रीराधाकृष्ण से संबंधित है। मंदिर की स्थापना लगभग 200 वर्ष पूर्व दानी परिवार द्वारा की गई थी। मुख्य मंदिर के गर्भगृह में कृष्ण के बायीं तरफ राधा तथा दायीं तरफ बलदाऊजी की प्रतिमा प्रतिष्ठित है।

# जगन्नाथ मंदिर (रामानंदी सम्प्रदाय)

इस मंदिर का निर्माण तरेंगा के मालगुजार दाऊ कल्याणसिंह द्वारा लगभग 150 वर्ष पूर्व कराया गया। मुख्य मंदिर कक्ष में बायीं तरफ जगन्नाथजी, बीच में सुभद्रा तथा दाहिनी ओर बलभद्रजी की प्रतिमा प्रतिष्ठित है। मुख्य मंदिर के द्वार के दाहिनी ओर द्वारपाल जय तथा बायीं ओर द्वारपाल विजय की प्रतिमा है। बायीं ओर क्रमशः हनुमान जी व गरूड़ जी की प्रतिमा स्थापित है। मुख्य मंदिर के सामने तथा बायीं ओर हनुमानजी का मंदिर है तथा दाहिनी ओर राम, लक्ष्मण, सीताजी का मंदिर है।

# गोपाल मंदिर (वल्लभ सम्प्रदाय)

यह मंदिर मर्यादा मिश्रित पुष्टिमार्गी है। मुख्य मंदिर के गर्भगृह में सफेद संगमरमर की राधा-कृष्ण की प्रतिमा प्रतिष्ठित है। मंदिर की दाहिनी दीवार पर लेख है जिसमें लिखा है कि निज मंदिर के अंदर का मारबल मूर्ति तथा प्राण प्रतिष्ठा का कार्य स्व. मूलचंद जी वागड़ी तथा उनके पौत्र स्व. रमेश कुमार बागड़ी की स्मृति में उनके परिवार द्वारा 9001/- लगाकर कराया गया। संवत 2025 मिती माघ सुदी 13 दिनांक 31.1.1969.

# गोकुलचन्द्रमा मंदिर (वल्लभ सम्प्रदाय)

यह मंदिर पुष्टिमार्गी का है, इसमें वल्लभ कुल के परिवार है। वल्लभाचार्यजी, जिनका चंपारण्य में प्रागट्य हुआ, उनके 2 पुत्र गोपीनाथजी तथा गोस्वामी श्रीविट्ठलनाथजी थे। गोपीनाथजी का वंश 2 पीढ़ी के बाद न चलने के कारण संप्रदाय के उत्तराधिकारी श्रीविट्ठलनाथजी हुए, जिनके 6 पुत्रों ने ही पुष्टि संप्रदाय को आगे बढ़ाकर उसका प्रचार किया। इस समय भारत में अकबर का शासन था। विट्ठलनाथजी के वंश में हरिरायजी खिन्नौर में रहकर पुष्टि धर्म का प्रचार किया। उनके सेवक काबुल, कान्धार, अफगानिस्तान इत्यादि में था।

हरिरायजी के सेव्य स्वरूप श्रीगोकुलचन्द्रमा जी वर्तमान में रायपुर में विराजमान है। इसके पहले ये कान्धार देश में विराजमान थे। मुगलों के उत्पात के समय उन्होंने कान्धार से सुखपाल को अपने कंधों पर उठाकर रायपुर के पुरोहित परिवार श्रीजगमनदासजी पुरोहित, किशन दास जी पुरोहित व उनके भाई श्रीगोकुलचन्द्रमाजी को बीकानेर पधराया, वहां से वे लोग व्यापार हेतु रायपुर आए और श्रीगोकुलचन्द्रमाजी के सदर बाजार स्थित घर में ही सेवा करने लगे। गुरू धर वंश परम्परा में चलते हैं।

वल्लभाचार्यजी के वंशज चतुर्थ पीठाधीश्वर श्रीदेवकीनंदन आचार्यजी, श्रीगोकुल के यहां पधारे, उन्होंने श्रीगोकुलचन्द्रमाजी को निधि (धन) स्वरूप बताकर उन्हें मंदिर में पधारने की आज्ञा दी। उसी समय प्रथम पीठाधेश्वर ‘नरसिंगलालजी आचार्य’ रायपुर पधारे। उन्हें भगवत् आज्ञा हुई कि चंपारण्य में श्रीमहाप्रभुजी का प्रागट्य हुआ था, उस बैठक का प्रागट्य करो। उन्हें आज्ञा हुई थी कि नदी से कुछ दूरी पर घनघोर नव में जहां वे वल्लभाचार्यजी का ज्ञान करेंगे, वहां उन्हें श्रीमहाप्रभुजी के झारी बंटा, जनेऊ और कंछी जीव उर्पना प्राप्त होंगे। तदानुसार चंपारण्य में पधारकर श्रीनरसिंगलालजी ने उस स्थान की खोज की। रात्रि में उन्हें स्वप्न द्वारा अग्नि स्वरूप श्रीवल्लभाचार्यजी के दर्शन हुए और जिस स्थान पर उपरोक्त वस्तुएं थी, वह स्थान उन्हें स्वप्न में दिखा। दूसरे दिन प्रातः काल उन्होंने उस स्थान की खुदाई करवाई। 17 फीट खोदने के बाद भोजपत्र पर रखी उपरोक्त वस्तुएं उन्हें प्राप्त हुई। इस प्रकार 125 वर्ष या 150 वर्ष पूर्व चंपारण्य की बैठक का प्रागट्य हुआ। पुरोहित परिसर के लोग श्री नरसिंहलालजी के सेवक थे अतः देवकीनंदन आचार्यजी ने श्रीगोकुलचन्द्रमाजी को श्री नरसिंहलालजी के यहां पधराने की आज्ञा दी क्योंकि चंपारण्य की बैठक उन्हीं द्वारा प्रगट हुई थी। गोस्वामी बालकों व श्रद्धालु वैष्णवों के आने जाने, ठहरने की उत्तम व्यवस्था हो सके, यह विचार कर श्रीगोकुलचन्द्रमाजी की हवेली श्री नरसिंहलालजी को पुरोहित परिवार द्वारा संपूर्ण वैभव के साथ श्रीठाकुरजी सहित समर्पित की गई।
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Tuesday, October 11, 2022

संत बाबू - जाज्वल्या 2008

आंचलिक प्रकाशनों का अपना खास महत्व होता है, यथा- स्कूल-कॉलेज की वार्षिक पत्रिकाएं, कस्बा-नगर, व्यक्ति अथवा अवसर/आयोजन-विशेष पर संयोजित अंक। एक खासियत, इनकी कुछ-कुछ अनगढ़ता होती है। समय और संसाधनों की सीमा के साथ (अक्सर भारी-भरकम) संपादकीय टीम की समझ, रुचि और पक्षधरता का असर होता है। इन सबके बावजूद ऐसे प्रकाशन उन तथ्यों, जानकारियों, सूचनाओं, भावनाओं और अभिव्यक्ति का अमूल्य दस्तावेज होते हैं जो अन्यथा दुर्लभ हैं। इस क्रम में जिला- जांजगीर-चांपा से प्रति वर्ष आयोजित ‘जाज्वल्यदेव लोक महोत्सव एवं एग्रीटेक कृषि मेला‘ की स्मारिका ‘जाज्वल्या‘ का विशेष महत्व है।

जनगणना और गजेटियर के अंतराल में कई बार ऐसे प्रकाशन ही काम आते हैं। स्मारिका ‘जाज्वल्या‘, संभवतः छत्तीसगढ़ के किसी भी जिले से लंबे समय (2002) से प्रतिवर्ष प्रकाशित होने वाली एकमात्र स्मारिका है। ऐसी सामग्री को डिजिटाइज कर, वेब पर अपलोड किया जाना आवश्यक है। इस उद्देश्य की आंशिक पूर्ति की दृष्टि से यहां अर्थात इस ब्लॉग ‘सिंहावलोकन‘ पर, समय-समय पर ‘जाज्वल्या‘ के चयनित लेखों को प्रस्तुत करने की तैयारी है, इसी क्रम में मेरे पिता सत्येन्द्र कुमार सिंह जी पर रविन्द्र कुमार सिंह बैस का लेख। 

लेखक रविन्द्र जी, स्थानीय विभूतियों के महत्व को पहचानने और उनके अभिलेखन के लिए सदैव प्रयासरत रहते हैं। बुजुर्गों की सोहबत की मानों धुन है, उन्हें। अभिलेखन का उद्यम उन्होंने विकसित किया है, मगर संस्मरण की अनमोल वाचिक परंपरा उन्हें अपने पिता भद्दर डाक्टर के नाम से ख्यात, बलभद्र सिंह जी से मिली है। मैं याद कर पाता हूं कि इस लेख की तैयारी में रवि, लंबे समय तक घंटों, पिताजी के साथ, उनकी बातें सुनते बैठा करते थे। तब शायद ही उनके मन में कभी संस्मरण लिखने की बात रही हो, क्योंकि बुजुर्गों की बातों में डूबे रहना, मानों उनका शगल है और उनके संस्मरण सुनकर मैंने जाना है कि बुजुर्ग, खुलकर अपने अंतरंग प्रसंग उनसे कह-बोल लेते हैं, जैसे अपने अभिन्न मित्रों के साथ। यह रवि गुरु जी की शालीन गंभीरता है कि वे इन संस्मरणों को सुनाते हुए कुछ प्रसंगों को हल्के-फुल्के ढंग से बता दिया करते हैं, लेकिन लिखते हुए किसी कठोर संपादक की तरह अनुशासित रहते, जानकारी और सूचनाओं का सजग-सावधान चयन मर्यादापूर्वक करते हैं। रविन्द्र जी की सहमति से छपाई की कुछ अशुद्धियों को ठीक करते, आगे यह लेख-

व्यक्तित्व

निष्काम कर्मयोगी स्व. सत्येन्द्र कुमार सिंह (संत बाबू)

दूर हजारों की भीड़ में अलग एवं विशेष दिखने वाले, जिनकी ऊँचाई 6 3, गौरवर्ण, जिनकी भव्य एवं आकर्षक शारीरिक बनावट जो एकदम सरल, सहज, एवं निर्विवाद ‘जीनियस‘ हो। हम बातें कर रहे हैं, अकलतरा के प्रतिष्ठित एवं सुशिक्षित सिसोदिया परिवार में 17 फरवरी 1927 को पिता डॉ. इन्द्रजीत सिंह (लाल साहब) एवं माता शांति देवी के कोख से अवतरित हुये सत्येन्द्र कुमार सिंह जी। जिन्हें घर में संत, बाहर में संत महाराज एवं मित्रों के बीच सत्येंद्र, नाम से पुकारने थे। उनके अग्रज राजेन्द्र कुमार सिंह, अनुज डॉ. बसंत कुमार सिंह, श्री धीरेन्द्र कुमार सिंह (पूर्व विधायक एवं साडा अध्यक्ष, कोरबा) एवं बहन श्रीमती बीना देवी हैं। उनके पिता डॉ. इन्द्रजीत सिंह सी.पी. एंड बरार के पहले डॉक्टरेट मानवशास्त्री हुये, जिन्होंने बीहड़ बस्तर, अबूझमाड़ एवं सरगुजा में जाकर जनजातियों के जीवन पर, लखनऊ विश्वविद्यालय से शोध कार्य ‘द गोंड एंड द गोड़वाना‘ की रचना कर समूचे छत्तीसगढ़ का नाम रोशन किया।

नागपुर स्कूल से रिटायर्ड मास्टर शेख सुल्तान एवं नूर मोहम्मद से घर में ही शिक्षा पाये, पं. गुनाराम एवं अयोध्या दीक्षित के सानिध्य में उनकी प्रारंभिक शिक्षा उनके जन्म स्थान अकलतरा में सम्पन्न होने के पश्चात् आगे अध्ययन के लिये बिलासपुर रेलवे कालोनी स्थित यूरोपियन स्कूल में दाखिला लिया, तब यूरोपियन स्कूल केवल एंग्लो इंडियन बच्चों की पढ़ाई के लिये खुला था। उसमें भारतीय बच्चों के लिये भर्ती होना आसाधारण घटना थी। वहॉं बालक सत्येन्द्र कुमार सिंह को पढ़ने का अवसर मिला।

जहाँ अंग्रेजी, विज्ञान में विशेष दक्षता हासिल कर क्रिश्चियन शिक्षक स्टीफन टीडू के प्रिय पात्र बने रहे। हालांकि उनके कथनानुसार बाल्यकाल में उन्हें पढ़ने-लिखने की रुचि बिल्कुल नहीं थी। यूरोपियन स्कूल के बाद बिलासपुर नगर की सुप्रसिद्ध ‘मल्टीपरपस गौरमेंट हाईस्कूल‘ में इन्होने सन् 1947 में मैट्रिक की परीक्षा पास की। अध्ययन के दौरान बी.एन. डे एवं प्रख्यात शिक्षाविद् लाला दीनानाथ के कुशल एवं प्रभावी अध्यापन कौशल के वे कायल हो गये। सक्रिय खेलकूद गतिविधियों में हिस्सा लेकर वालीबाल के उदीयमान खिलाड़ी साबित हुये। गुजरे जमाने के बिलासपुर जिले में इनकी टीम का मुकाबला सिर्फ पुलिस टीम ही कर पाती थी। इनके बैच में प्रतिभाशाली सहपाठियों की भरमार थी। जबलपुर के ख्यातिप्राप्त अधिवक्ता श्री सतीशचंद्र दत्त, पूर्व कलेक्टर स्वरूपसिंह पोर्ते, पुरातत्वविद् डॉ. शंकर तिवारी, नेत्ररोग विशेषज्ञ, डॉ. आर.के. मिश्रा के अलावा अनेक विद्वान एवं बुद्धिजीवी इनके मित्र रहे हैं।

बिलासपुर से मेट्रिक उत्तीर्ण कर नागपुर के ख्यातिप्राप्त ‘विक्टोरिया कॉलेज आफ साइन्स‘ में प्रवेश लेकर, उच्च शिक्षा हेतु आगरा प्रस्थान हुए, जहाँ 1952 में बी. ए. और 1955 में अंग्रेजी साहित्य में एम.ए. की डिग्री ‘हीवेट हॉस्टल‘ में रहकर हासिल की। यहाँ अकलतरा के प्रख्यात जनप्रिय चिकित्सक डॉ. सी. बी. सिंह का उन्हें मार्गदर्शन मिला, पारिवारिक पृष्ठभूमि, शारीरिक आकर्षण, खेल, व्यवहार एवं कार्यशैली से प्राध्यापकों एवं सहपाठियों में वे काफी लोकप्रिय हुये।

1952 में पिता डॉ. इन्द्रजीत सिंह के निधन के बाद उनका अकलतरा में स्थायी रूप से रहना हुआ। 1953 में आशा देवी से इनका विवाह बनारस में हुआ, जो शादी के बाद फाइन आर्टस् एवं पेंटिंग्स में स्नातक हुई। 1956 में प्रथम पुत्र रत्न राजेश एवं तीन वर्ष पश्चात् द्वितीय पुत्र रत्न राहुल का जन्म, मिशन अस्पताल बिलासपुर में ऑपरेशन के फलस्वरूप हुआ। श्री राजेश सिंह चिंतक, विचारक एवं सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में सक्रिय हैं। श्री राहुल सिंह, छ.ग. शासन के संस्कृति विभाग में उपसंचालक (पुरातत्व) के पद पर रायपुर मुख्यालय में पदस्थ हैं।

सत्येन्द्र कुमार सिंह, अकलतरा एजुकेशन ट्रस्ट की रूपरेखा, सी.सी.आई. कारखाना के लिये पत्र व्यवहार एवं अन्य बौद्धिक विकास कार्य हेतु उनके हमउम्र राणा चितरंजन सिंह का मार्गदर्शन लेकर अनेक लोकहित के चुनौतीपूर्ण कार्य को अंजाम देकर आधुनिक अकलतरा की बुनियाद रखी। ट्रस्ट द्वारा स्थापित हाईस्कूल संयुक्त बिलासपुर जिले का ही नहीं वरन् समूचे छत्तीसगढ़ के अग्रणी शिक्षा केन्द्र के रूप में विख्यात हुआ।

वैसे तो वे सक्रिय राजनीति से दूर रहते थे, किन्तु जनता की मांग पर जरूरत पड़ने पर ग्राम पंचायत अकलतरा (1976) एवं जनपद पंचायत अकलतरा के अध्यक्ष (1978) निर्वाचित हुये। जिसे उन्होंने चुनौती के रूप में स्वीकार कर आदर्श स्थापित किये। उनके कार्यकाल का स्कूल भवन ग्राम अमलीपानी व कटघरी में देखने योग्य है। आज के पंचायत प्रतिनिधियों को उक्त दोनों ग्रामों क भवनों का अवलोकन कर उन्हें आत्मसात करने का प्रयत्न करना चाहिए। 

अकलतरा में बंगलादेशी शरणार्थियों के लिये भोजन, कपड़ा, स्नान, साबुन, सिंदूर, कुमकुम, चूड़ी यहॉ तक की कफन के लिये कपड़े, बच्चों के लिये फल एवं दूध की व्यवस्था अकलतरा के संवेदनशील नागरिकों ने राजेन्द्र कुमार सिंह एवं सत्येन्द्र कुमार सिंह के सहयोग से यह अद्भुत एवं अपूर्व मानवीय कार्यों को अंजाम दिया।

मानव सेवा सुश्रुषा को स्थायित्व प्रदान करने के लिये सत्येन्द्र कुमार सिंह ने ‘मानव कल्याण समिति‘ की स्थापना की थी। इस संस्था के माध्यम से लगभग 500 नेत्ररोग निदान एवं महिला रोग निदान शिविर आयोजित किया गया था। वे लायंस क्लब अकलतरा के संस्थापक थे। उनकी रुचि भ्रमण, ललितकला, पुरातत्व, ऐतिहासिक स्थलों, छत्तीसगढ़ के लोकजीवन एवं संस्कृति से उनका निकट का जीवंत संपर्क रहा। मशीनों से उनका विशेष अनुराग जग-जाहिर था। मोटर, प्रोजेक्टर, ग्रामोफोन, रेड़ियो, सायकल, गैसबत्ती, कैमरा अन्य इलेक्ट्रानिक उपकरणों में विशेष दक्षता हासिल थी। फोटोग्राफी एवं पत्रकरिता में उनकी दिलचस्पी सर्वविदित थी। सामयिकी ंएवं पशु-पक्षियों के बारे में उनकी लेखनी खूब धारदार थी जो जनजीवन को प्रभावित किये बिना नहीं रहती थी। उन्होंने बिलासपुर टाइम्स के स्थायी स्तंभ ‘तिराहे से‘ के लिये काफी कलम चलाई, वे दैनिक नवभारत एवं भास्कर में भी छपते रहे हैं।

सत्येन्द्र कुमार सिंह का निधन बिलासपुर में 13.07.1999 में हुआ था। अद्भुत स्मरणशक्ति के स्वामी महान चिंतक एवं विचारक सत्येन्द्र कुमार सिंह, गीता के निष्काम कर्मयोग के सिद्धांत को जिये, नेपथ्य में रहकर नींव का पत्थर बनकर कर्तव्य के पथ पर चलने वालों के लिये उनका सारा जीवन अनुकरणीय है।

रविन्द्र कुमार सिंह बैस
पोस्ट - अकलतरा (आजाद चौक)
जिला - जॉजगीर चांपा