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Wednesday, September 2, 2026

विविध रामायण

आनंद नीलकंठन के जितने काम की सूची मिलती है, वह सारा काम नाम करने वाला है। उनका लक्ष्य और प्रयास दिखता है कि किस तरह धर्मग्रंथों को लोकप्रिय स्वरूप में लाया जा सकता है। वे अध्येता, संकलक-संयोजक हैं, अपने सारे उद्यम को किताब, फिल्म, टेलीविजन धारावाहिक, ऑडियो बुक में परिणत कर देने वाले। इसी क्रम में उनकी पुस्तक का अनुवाद ‘विविध रामायण विविध पाठ‘ आया है।

यह शीर्षक देखते ही पहले ए.के. रामानुजन के चर्चित लेख, वस्तुतः लंबे शोध-पत्र ‘थ्री हंड्रेड रामायण्स ...‘ की ओर ध्यान जाता है और दूसरा कामिल बुल्के की ओर। नीलकंठन, अपनी इस किताब के ‘कथोपरांत‘ में लिखते हैं- ‘ए.के. रामानुजन ने अपने विद्वत्तापूर्ण लेख में 300 रामायणें गिनाई हैं।‘ यह भी कहा जाता रहा कि तीन सौ की यह संख्या कामिल बुल्के से ली गई है, मगर मुझे उपलब्ध रामानुजन के किसी मूल या अनुवाद और संपादकीय टिप्पणी सहित प्रकाशित संस्करणों में अब तक ऐसी कोई गिनती नहीं गिनाई मिली। दूसरी तरफ बुल्के ने 600 ई.पू. से 1600-1700 तक की रामकथाओं की सूची दी है, जिसकी संख्या 300 नहीं है। ऐसा लगता है कि यह बात चल पड़ी, तो चल पड़ी वाली है। रामानुजन के लेख पर हुई उग्र प्रतिक्रिया के दौरान यह टिप्पणी होती थी कि विरोध करने वालों में शायद ही किसी ने वह लेख ठीक से पढ़ा है। यह उल्लेख इसलिए कि या तो इन्हें पढ़ा नहीं जाता या एजेंडा बनाने का इरादा नहीं किया जाता, वरना यह किताब, ऐसे विरोध का शिकार रामानुजन से अधिक हो सकती है। इतना ही क्यों मूल वाल्मीकि रामायण के कुछ ऐसे अंश है, जो आपत्तिजनक माने जा सकते हैं और गंभीर विवाद का कारण बन सकते हैं।

रामकथा की आधुनिक पुस्तकों में एक साहित्यिक वर्ग है, जिसमें नरेन्द्र कोहली की रामकथा श्रृंखला से आशुतोष राना की ‘रामराज्य‘ से शैलेन्द्र तिवारी की 'मेरे राम' तक है। चक्रवर्ती राजगोपालाचारी, प्रेमचंद और रस्किन बॉन्ड ने भी रामकथा प्रस्तुत की है। दूसरा फैंटेसी वाला अमीश त्रिपाठी वर्ग है। इसके अलावा गंभीर अध्येताओं- बलदेव प्रसाद मिश्र, राधावल्लभ त्रिपाठी, कुबेरनाथ राय, भगवान सिंह का काम है। ऐसा एक कम चर्चित मगर महत्वपूर्ण प्रकाशन डॉ. शोभा निगम का ‘वाल्मीकि-कथा‘ है। शास्त्रीय-गंभीर कामों में डोंगरे जी महराज और करपात्री जी के साथ ‘मानस पीयूष‘ जैसी टीका भी है। एक काम माताप्रसाद गुप्त के पाठालोचन का है तो दूसरी तरफ पं. रामकिंकर जी महराज जैसे कथावाचक हैं। नीलकंठन की इस किताब को देवदत्त पटनायक वाले समूह में रखा जा सकता है। वे स्वयं कहते हैं कि इस पुस्तक को अकादमिक तरीके से नहीं देखा जाना चाहिए।

नीलकंठन की कुछ टेक है, जिससे वे न सिर्फ रामायणों, बल्कि दूसरे महाकाव्य महाभारत और पुराण आदि अन्य ग्रंथों को देखते हैं, इस क्रम में भटके से सांख्य दर्शन पर गंभीरता से विचार करने लगते हैं, वहीं सवाल उठाते हैं कि अंतिम बार आपने बिना मोबाइल की ओर देखे या बिना किसी से बात किए या बिना कोई किताब पढ़े कब खाना खाया था। वे टिप्पणी करते चलते है- ‘जीवन दरअसल कर्म और नियति दोनों से मिलकर बना होता है ... परिस्थितियों को ही चयन करने के लिए छोड़ देना भी एक प्रकार का चयन है ... कोई भी चीज पूर्णतः अच्छी या बुरी नहीं होती ... परिस्थितियों के अनुसार धर्म की परिभाषा बदल जाती है ... किस जीवन शैली को हम गलत, पापपूर्ण मानते हैं और किसे सही, यह हमारे नजरिए पर निर्भर करता है ... स्वधर्म का अर्थ है- धर्म के बारे में आपकी अपनी व्याख्या और समझ ... नैतिकता और नियम दूसरों पर नियंत्रण करने के लिए बनाए जाते हैं ... न मैं अच्छा हूं, न बुरा। मैं रावण हूं। ... परम सत्य नाम की कोई चीज नहीं होती ... जीवन को समझना एक जटिल कार्य है। जीवन जीना सरल है। बस जीते रहिए। ...

कार्य-कारण और परिणाम। जिसमें परिणाम, पुनः कारण बन सकता है। यह तय करना भी आसान नहीं होता कि कौन सा कार्य है, कौन कारण और क्या परिणाम, क्योंकि परिणाम जान पड़ना एक अनंतिम सी दशा है। यह ऐसी धारा है, जिसे किसी भी जगह रोक कर देखें, अपने आगे-पीछे का प्रभाव दिखेगा। नीलकंठन जो बार-बार दुहराते हैं, वह है- विकल्पों का चयन और परिणाम, कर्म का फल, कर्मों के चयन के लिए मूल्य चुकाना, उन्हीं के शब्दों में- ‘प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्मों और उनके फल के लिए जिम्मेदार होता है और उसे विकल्पों के बीच चयन का मूल्य अदा करना होता है, यह भाव भारतीय मानस में रचा-बसा है। चाहे पवित्र धर्मग्रंथ हों या लोक कथाएँ, इस विचार को बार-बार दोहराया जाता है।‘

अध्याय 32- ‘राम के पाले में विभीषण‘ में रामेश्वरम शिवलिंग स्थापना का प्रसंग आया है, जिसमें बताया गया है कि इस अवसर पर रावण पुरोहित बनता है, जो कथा आनंद रामायण के अलावा और कहीं नहीं मिलती। मगर आनंद रामायण के गीता प्रेस वाले संस्करण में मुझे ऐसा कुछ नहीं मिला। इसी तरह अध्यात्म रामायण को हर बार आध्यात्म रामायण और बिरहोर रामायण को बिहोर रामायण लिखना, अखरने वाला है। कुछ शब्द सामान्य से भिन्न प्रयुक्त हुए हैं, दक्षिण भारतीय प्रचलन के कारण, या अंगरेजी-हिंदी के कारण, जैसे- आजीविक न कि आजीवक, अहिल्या न कि अहल्या, क्षीरध्वज-सीरध्वज, विभांतक-विभांडक, कार्तिवीरार्जुन-कार्तवीर्यार्जुन, द्वैवायन-द्वैपायन, अनारण्य-अनरण्य, कुंब-निकुंब न कि कुंभ-निकुंभ, मायन-मय।

सामान्य पाठक कुवेंपु का आशय शायद ही समझ सके, जो वस्तुतः कुप्पल्ली वेंकटप्पागौड़ा पुटप्पा हैं। इसी प्रकार कुछ शब्द, जिनमें कर आता है, को जोड़ कर- धारणकरते, अपहरणकरवाकर, निर्धारणकरेगा, लिखे जाने पर ध्यान अटकता है। कुछ मशीनी अनुवाद वाली चूक है, जैसे- ‘हनुमान घायल अवस्था में खून से लथपथ सुग्रीव को उसके छिपने की जगह पर ...‘ इसमें हनुमान के बाद विराम नहीं है, वैसे भी सीधा वाक्य होता- घायल अवस्था में खून से लथपथ सुग्रीव को हनुमान, उसके छिपने की जगह पर ...‘

पुस्तक के शीर्षक Lesson का यहां अनुवाद पाठ किया गया है। हिंदी का पाठ, पढ़ना तो है ही, वह एक ओर उच्चारण करते हुए दुहराने अर्थ देता है वहीं दूसरी ओर किसी रचना का दो व्यक्तियों का पाठ भिन्न हो सकता है, इतना ही नहीं एक व्यक्ति के अलग-अलग समय में पाठ/ पुनर्पाठ (समझा जाने वाला आशय)अलग हो सकते हैं। पाठ का एक विशिष्ट प्रयोग अपरिचित लिपि के लेख को पढ़ने के अर्थ में भी प्रयोग होता है, ज्यों किसी पुराने अभिलेख के लिप्यंतर को पाठ कहा जाता है। यों पाठ का आशय पाठ्य-पुस्तक का अध्याय, सीख, सबक, नसीहत, चेतावनी भी हो सकता है। मुझे लगता है हिंदी के पाठ का आशय, अंगरेजी के Lesson से अधिक व्यापक है, बेहतर भी माना जा सकता है।

नीलकंठन निष्कर्ष की तरह लिखते हैं- 'हालाँकि एक हद तक मैं कर्म और कर्मफल के सिद्धांत को समझता हूँ जो इस महाकाव्य के आधार हैं, लेकिन मैं यह भी जानता हूँ कि जीवन में घटने वाली हर घटना की व्याख्या कर्म के आधार पर करना संभव नहीं।' और यह भी- ‘मैंने एक लोक गायक के मुँह से इसकी बड़ी सटीक व्याख्या सुनी- जीवन का बहुत गहरा अर्थ होता है लेकिन जैसे ही हम उस अर्थ को समझ लेते हैं, यह अर्थहीन हो जाता है। जीवन के अर्थ की खोज ही इसकी विचित्रताओं को इतना सुंदर बनाती है।‘

यह किताब मेरे लिए विंडो शॉपिंग जैसी साबित हुई, मगर उपर उल्लेखित पुस्तकों से अच्छी तरह परिचित नहीं हैं और रामकथा की रोचक विविधता को फटाफट देख लेना चाहें, उनके लिए यह बहुत उपयोगी हो सकती है। इसकी एक खासियत यह भी कि लेखक ने लोकप्रिय पठनीयता के लिए गंभीरता से समझौता नहीं किया है। उनकी इस किताब के लिए एक वाक्य कहना हो तो मैं कहूंगा- ‘आनंद नीलकंठन अपनी इस पुस्तक में समूचे भारतीय चिंतन में ‘विकल्पों के चयन और उनके परिणाम, कर्म और उसके फल के बीच चलने वाले अनंत चक्र‘ को देखते हैं।‘

Thursday, May 9, 2013

लघु रामकाव्‍य

''रामकथा की ऐसी पाण्डुलिपि प्राप्त हुई है जिसमें 32 पंक्तियों में रामायण के समस्त सर्गों को छंदबद्ध किया गया है। रामकथा पर उपलब्ध यह सबसे लघुकाय कृति है। यह रचना खैरागढ़, सिंगारपुर ग्राम में अगहन सुदी 07 संवत 1945 को जन्मे भक्त कवि गजराज बाबू विरचित है, जो पदुमलाल पुन्नालाल बख्‍शीजी के सहपाठी थे।'' यह जानकारी दैनिक नवभारत समाचार पत्र में 28 जनवरी 1981 को प्रकाशित हुई थी, जिसमें उल्लेख था कि डॉ. बृजभूषण सिंह आदर्श को यह कृति मिली है। मुझे इसकी प्रति राम पटवा जी के माध्‍यम से (वाया डॉ. जे.एस.बी. नायडू) मिली, जिसके दूसरे पेज पर लंका कांड की चौपाई व अन्‍य कुछ हिस्‍सा क्षत, इस प्रकार है-
श्री गणेशाय नमः
अथ रामायणाष्टक प्रारंभः
चौपया छंद
शंकर मन रंजन, दुष्ट निकंदन, सुन्दर श्याम शरीरा।
सुर गण सुखदायक, खल गण घाय(ल)क, गुण नायक रघुबीरा॥
मुनि चित रोचक, सब दुःख मोचक, सुखधामा रणधीरा।
बिनवै गजराजा, हे रघुराजा, राखहु निज पद तीरा॥१॥
जन्मे रघुनाथा, शक्तिन साथा, दशरथ नृप गृह आई।
करिमख रखवारी, खलगण मा(री) ताड़कादि दुखदाई॥
तारी रिषि नारी, भंजि धुन भारी, व्याह्यो सिय जग माई।
विनवै गजराजा, सिय रघुराजा, देहु परम पद साईं॥२॥ (इति बालकांड)
कुबरी मति मानी, दशरथ रानी, दियो राम बन राजा।
सीता रघुराई, सह अहिराई, गये बनहि सुर काजा॥
त्यागा नृप प्राना, भरत सुजाना, गये निकट रघुराजा।
समुझाय खरारी, अवध बिहारी, सह पांवरिं गजराजा॥३॥ (इति अयोध्या कांड)
तजि जयन्त नैना, सुखमा ऐना, पंचवटी पुनि धारी।
खर भगनी, आई, नाक कटाई, मारयो खर दनुजारी॥(मारे खर भुवि भारी)
कंचन मृगमारी, अवध बिहारी, खोयो जनक दुलारी।
भाखत गजराजा, पुनि रघुराजा, गीध अरु शबरी तारी॥४॥ (इति आरण्यकांड)
सुग्रीव मिताई, करि रघुराई, हते बालि कपि भारी।
हनुमत चित दीन्हा, लै प्रभु चीन्हा, खोजन जनक दुलारी॥
नारी तपधारी, सिय सुधि सारी, कही वास बन चारी।
खोजत गजराजा, तट नदराजा, आये वानर सारी॥५॥ (इति कृषकिंधा कांड)
सुरसा मद भाना, कपि हनुमाना, आयो सागर पारा।
लखि रमा दुखारी, गिरिवर धारी, धरि लघुरूप निहारा॥
सब बाग उजारी, अच्छहि मारी, कियो लंकपुर छारा।
तरि निधि बारी, सह कपि सारी, वन गजराज सिधारा॥६॥ (इति सुन्दरकांड)
.............................................
..........................................-धारी।
मुर्छित अहिराया, हनुमत लाया, द्रोणाचल ...
लखन मुरारी, रिपु हति अवध सिधारी ॥७॥ (इति लंका कांड)
सिय हरि अहिनाथा, सब कपि साथा, पहुंचे अवध मुरारी।
मिलि भरत सुजाना, राम सयाना, मिले सकल महतारी॥
राजे रघुराया, मंगल छाया, टारि सब दुख भारी।
विनवै गजराजा, वसु रघुराजा प्रियसः जनक दुलारी॥८॥ (इति उत्तर कांड)
 नृप दशरथ लाला, मख रखवाला, शिव धनुभंजन हारी।
पितु आज्ञा धारी, बनहि सिधारी, खरदूषण दनु जारी॥
शबरी गिध तारी, रावण मारि, पुर गजराज निहारी।
यह अष्टक गावे, प्रभु पद पावे, कटैं पाप कलि भारी॥

''इति गजराजकृत रामायणाष्टक सम्पूर्णम्‌॥

कुछ अन्‍य भी मिले, जिनमें श्री परमहंस स्वामी ब्रह्मानंद विरचित श्रीरामाष्टकम् का पहला श्लोक है-
कृतार्तदेववन्दनं दिनेशवंशनन्दनम्‌। सुशोभिभालचन्दनं नमामि राममीश्वरम्‌॥
और आठवां श्लोक है-
हृताखिलाचलाभरं स्वधामनीतनागरम्‌। जगत्तमोदिवाकरं नमामि राममीश्वरम्‌॥

इसी प्रकार श्रीव्यास रचित श्रीरामाष्टकम्‌ का पहला श्लोक है-
भजे विशेषसुन्दरं समस्तपापखण्डनम्‌। स्वभक्तचित्तरंजनं सदैव राममद्वयम्‌॥
और आठवां श्लोक है-
शिवप्रदं सुखप्रदं भवच्छिदं भ्रमापहम्‌। विराजमानदेशिकं भजे ह राममद्वयम्‌॥

एक रामायणाष्टकम्‌, स्तुतिमंडलसंकलन से, जिसके कवि के रूप में अनिमेष नाम मिला, इस प्रकार आरंभ होता है-
रामं संसृतिधामं सर्वदनिष्कामं जगदारामं क्षीरे पंकजमालाशोभितश्रीधामं भुवनारामम्‌। मायाक्रीडनलोकालोकतमालोकस्वननारम्भं वन्देऽहं भुजगे तल्पं भुवनस्तम्भं जगदारम्भम्‌॥
और अंतिम पंक्ति है-
वन्देऽहं श्रुतिवेद्यं वेदितवेदान्तं हरिरामाख्‍यम्‌॥

अब आएं एकश्लोकि रामायणम्‌ पर-
आदौ रामतपोवनादिगमनं हत्वा मृगं कांचनं, वैदेहीहरणं जटायुमरणं सुग्रीवसम्भाषणम्‌।
बालीनिग्रहणं समुद्रतरणं लंकापुरीदाहनं, पश्चाद्रावणकुम्भकर्णहननमेतद्धि रामायणम्‌॥

एक छत्‍तीसगढ़ी बुजुर्ग ने शायद किसी मालवी की पंक्तियां सुन कर, अपने ढंग से रामायण याद रखा था, सुनाया-
एक राम थो, एक रावन्नो।
बा ने बा को तिरिया हरी, बा ने बा को नास करो।
इतनी सी बात का बातन्नो, तुलसी ने कर दी पोथन्नो।

भदेस सी लगने वाली इन पंक्तियों का भाव राममय तो है ही।