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Friday, August 14, 2026

बरसों बरस बनारस

एक गेरुआ सबेरा। कुछ पुराने और आगे आने वाले दिन।
बरसों से बनारस जाता रहा हूं, अब की कुछ बरस बाद गया, किस बरस? महाकाल की नगरी, कालातीत!

सुबह-ए-बनारस
पौने सात बजे
लंका चौमुहानी
ट्रैफिक जाम
लोग सौहार्दपूर्ण, धीरज धरे
दो पुलिस वाले और तीन नागरिक
व्यवस्था बनाने में सक्रिय।

तुलसी घाट, कबीरचौरा और भारतेन्दु भवन के बाद 
सुंघनी साहू,           बाबा जी दांत वाले में सांप्रदायिक जोग

किसी साथी ने कहा था- ‘ऐसा नहीं लगता कि बनारस ओवर रेटेड है?‘
किसी ने कहा था, ‘बनारस का एक हिस्सा बदलाव को अपना कर मर रहा है और एक हिस्सा उसे न अपना कर।‘

मृत्यु की प्रतीक्षा में जीवन, बेखबर जीवंत। लोक और शास्त्र, शाश्वत और नश्वर की संधि पर स्थित सनातन आनंद कानन काशी। श्रद्धा और भय के बीच अनुशासित बाबा कीनाराम की गद्दी।

गोपालजी, प्रधानमंत्री वाला ऑटो चलाते हैं। उनके भाड़ा बताने पर बिना मोल-भाव हम तैयार हो गए, तो शायद उन्हें लगा कि 50 के बदले 60 कहना था, कहने लगे जो मुनासिब है वही कहेंगे, आगे आपकी मर्जी। हमने सोचा कि रिजर्व जा रहे हैं, 60 ही दे देंगे। लंका चौमुहानी पर पहलवान लस्सी की अब चार दुकानें हैं, सवारी से आपसदारी न हो तो क्या बनारस? उन्होंने लस्सी की रिपोर्ट ले ली। उनके पूछने पर हमने बताया कि दही कुछ खट्टी थी, अब सामने मथकर भी नहीं देते, रेडीमेड है, उन्होंने आटो मोड़ते हुए दुकान के सामने रोका और चलते-चलते हमारी तरफ से लस्सी वाले से शिकायत दर्ज कराई। हॉस्पिटल गेट वाले सीताराम को याद किया तो उन्होंने कहा कि आप तो सब जानते ही हैं, मिश्राम्बु, केसरिया, रामनगर, कचौड़ी गली की लस्सी अब भी वैसी ही है। फिर बताया खोजवां में रहते हैं, मेरी जिज्ञासा का पहला शब्द ‘खराद‘ सुनते ही वहां बनने वाले लकड़ी के खिलौने और खराद के इतिहास पर संक्षिप्त प्रकाश डाला। भाड़ा देते हुए मेरे पास 100 का नोट था, उनके पास फुटकर न था, इसलिए अपने पास फुटकर टटोला, चार 10 के नोट और एक 5 का सिक्का था, उन्होंने राजी-खुशी न सिर्फ स्वीकार किया, मुझे आश्वस्त भी किया कि बाकी के 5 फिर कभी।

दीक्षितजी टैक्सी वाले मिले। किसी को फोन पर समझाने लगे- मोड़वा पर, मनोजवा क दुकनिया... वा और या उपसर्ग-प्रत्यय के साथ अपनी बातों में लय रचते, पता लग जाता, समझाइश है, मार्गदर्शन या फटकार। अपनी बात उन्हें पांच बार दुहरानी पड़ी, मगर सुर में दुहराव नहीं, हर बार नयापन, ताजगी। उनसे संकटमोचन संगीत समारोह का सुझाव भी मिला। ट्रैफिक और भीड़ पर कहते हैं, दो-तीन कट्ठा जमीन यहां हर कोई लेना चाह रहा है, राजधानी बनेगा। और सब भीड़ टूरिस्ट की है, ये दर्शनार्थी थोड़े न हैं। मेरे लिए वाहन का इंतजाम करने बेताब, बाबतपुर रास्ते में दो किलो लाल पेड़ा दिलवाने का आग्रह। जब कभी आएं याद कीजिएगा का वादा लिया। 

गोदौलिया से दशाश्वमेध। सड़क, पर दुकानों, पैदल के लिए बचते-संभलते...पेनको और जहरलाल-पन्नालाल को कोई कैसे भूल सकता है। मोंगा अब रहा न होगा, मगर यह जान कर अच्छा नहीं लगेगा, इसलिए पता नहीं किया। काली-मंदिर, दशाश्वमेध से प्रवेश वाली गली ज्यों की त्यों मिली। मान लिया कि काली मंदिर के बगल वाली मिष्ठी दही और लकड़ी के ठप्पे से कपड़े पर छपाई काम वाली दुकान भी जस की तस होगी। गली की दुकान पर मैंने पूछा, चौड़ी मोहरी वाला पाजामा, कर्मचारी ने पाजामा दिखाया, समझ में आया कि उसके लिए चौड़ा यानी जो चूड़ीदार न हो, मैंने खड़े हो कर अपना पाजामा दिखाया, मुस्कुरा कर उसने बुजुर्ग दुकानदार की ओर इशारा कर के कहा, बाबूजी की तरह, लिफाफा! बस एक पीस ही रह गया है, देख लीजिए। बात आगे बढ़ी। दुकानदार से मैंने कहा, पहले एक बंगाली दादा होते थे, आपकी जगह बैठते थे। कहा, हमारे मामा, अब नहीं रहे। उनसे कहा, लखनऊ चिकन का कुरता दिखाइए, उन्हें बात पसंद नहीं आई, मैंने भांप कर कहा अच्छा, बनारसी सिल्क होगा, वे दिखाने लगे, मेरे ऐसा वैसा कहते, ठीक न बता पाने पर सुझाया कि जो बांस कागज वाले रंग का आता है, वो? मेरी हामी पर कहा, फिर ऐसे कहिए कि काशी सिल्क चाहिए। 

ज्ञानवापी (अब गेट नं 4) पर पांडेयजी मिले, मेहरबान थे, 1769 और 1777 का रानी अहिल्याबाई के साथ का बाबा विश्वनाथ का इतिहास बताया। दर्शन के लिए जाएं तो क्या देखें, ध्यान दें, समझाया। मस्जिद में 1990 के बाद जाने की मनाही हो गई, बताया। ड्यूटी पर बड़ी संख्या में तैनात पुलिस बल। एक युवा सिपाही के माथे पर संक्षिप्त त्रिपुंड, उस पर ऊँ छाप। सूने कोने पर तैनात वाले मोबाइल स्क्रीन पर व्यस्त। पांडेय, तिवारी, मिश्रा, चौबे, एकाध सिंह, सोनकर, यादव भी।

एक खास दुकान होती थी, टिकठी-गोटेदार चुनरी सजी। पहले-पहल ध्यान जाने पर कभी वहां ठिठका था। अंतिम संस्कार की सजी दुकान, बस एक मुरदे की कमी। ‘मौत और ग्राहक का कोई भरोसा नहीं, कब आ जाए’, लेकिन यहां तो ग्राहक आएगा किसी मौत के साथ, मौत का ही भरोसा। मेरे मन में ‘किं आश्चर्यम्।‘ इसमें नाम तो मजेदार है ही Pandit Readymade छपा है, जिसके वास्तविक आशय का अनुमान शायद ही कोई लगा सके।

Pandit Readymade का मतलब तो यही समझ में आता है, लेकिन है कुछ अलग. ऐसी एक पुरानी दुकान इसके बगल में है और यह पहले रेडीमेड वस्त्रों की दुकान हुआ करती थी, बगल की दुकान की बिक्री देख कर इस दुकानदार को एक और ऐसे दुकान की संभावना दिखी, तब रेडीमेड कपड़ों की दुकान इसमें बदल लिया। दुकान का पुराने नाम, प्रतिष्ठा से पहचान भी बनाए रखना था फिर दुकानदार ने माना कि यह भी तो रेडीमेड तन-आवरण की दुकान है, पहले जीते-जागते के लिए अब मुरदों के लिए, तो फिर क्यों न नाम यही चलने दिया जाय। फ्यूनरल पार्लर! अंतिम क्रिया/दाह संस्कार के साथ पार्लर शब्द का प्रयोग कोई फक्कड़ भारतीय चेतना ही कर सकती है।

प्रवास के दौरान दिल्ली के विपिन गर्ग जी मिले, बनारस असर श्रद्धा-सिक्त। बड़ा गणेश-लोहटिया की गली में व्योमेश के लिए भटकते, ठक-ठुक-ठन-भड़ाम की ताल सुनते निराला, नागरी प्रचारिणी और रूपवाणी के युवा साथी। व्योमेश को शायद नहीं जाना है, मगर आसन लगाए हैं, मैं बातें जल्दी समेटने की कोशिश में कि उनके निर्धारित कार्यक्रम का समय हो रहा है। मेरी बेचैनी भांप कर बताया कि तापस को रवाना कर चुके हैं, बस हो गया, बैठकी निर्विघ्न। पुरातत्व वाले अपने जात-सगा कौशाम्बी वाले जी.आर. शर्मा जी (के सुपुत्र के साथ उन) की स्मृतियां। पुरातत्व की नई पीढ़ी सुनीता, रूपनारायण, शंभू, नीलम मिले। दिवाकर, गायत्री जी, लक्ष्मण जी से मिलना, इस बीच कलापिनी जी यहां है, बात हुई, मगर उनको सुनना रह गया।

बनारस से लौटते, चाह कि बहुत कुछ छूटा रहे, अगली बार के लिए।

बनारस पर और भी-