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Friday, February 7, 2025

शब्दों से परे कविता

कविताओं की मेरी समझ और रुचि संकीर्ण है, मगर परिचितों की कविता पढ़ने को अवश्य उत्सुक रहता हूं। एक खेल-सा होता है कि रचनाकार का व्यक्तित्व जैसा प्रकट है और जिस तरह परिचित हूं, उसकी रचनाओं की संगति कितनी बैठती है और फिर वह ऐसा कवि हो, जो प्रशासनिक अधिकारी हो और जिसके मातहत काम किया हो तब यह खेल और भी रोचक हो सकता है, कुछ-कुछ रोमांचक भी, मगर अंतराल लंबा हो तो यह रोमांच वैसा नहीं रह जाता और कवि-पाठक के रिश्ते का सहज निर्वाह संभव हो जाता है। यही स्थिति बनी त्रिलोक महावर जी की पुस्तकें पा कर। 

उनकी चार पुस्तके हाथ में हैं- ‘शब्दों से परे‘-2018, कविता का नया रूपाकार‘-2020, ‘नदी के लिए सोचो‘-2021 दूसरा संस्करण, ‘आज के समय में कविता‘-2022। 

‘शब्दों से परे‘ उनकी चयनित कविताएं हैं, आवरण शशांक का है, जिन्होंने उनकी कविताओं पर विमर्श की पुस्तक कविता का नया रूपाकार‘, जिसमें उनके संग्रह ‘शब्दों से परे‘ और ‘हिज्जे सुधारता है चाँद‘ पर केंद्रित विमर्श हैं, के लिए चयन किया है, संभव है कि ‘शब्दों से परे‘ की कविताओं के चयन में भी उनका मशविरा रहा हो। ‘आज के समय में कविता‘ भी उनके संग्रह ‘शब्दों से परे‘ से संबंधित है, जो उसके विमोचन पर एक सत्र में आयोजित परिचर्चा का दस्तावेज है, जबकि ‘नदी के लिए सोचो‘, उनका अन्य कविता संग्रह है। 

‘नदी के लिए सोचो‘ की कुछ कविताएं ‘शब्दों से परे‘ में भी हैं। कविताओं में बेतवा, इंद्रावती, तमसा, यमुना, बैनगंगा आदि नदी है, चांद के साथ और जंगल-दरख्त भी। नदी दुबलाती है, सिकुड़ती है, मौन रहती है, उसकी कमर कुछ ज्यादा ही झुक जाती है, कभी नवयौवना भी है, नदी रोती भी है, नदी सिसकती है, अब सपने में आती है, जैसे शब्द, पाठक को शब्दों से परे सहज ले जाते हैं। पर्यावरण के हालात भी कवि को रचने के लिए बाध्य करते हैं। ‘शब्दों से परे‘ में रूमानी कविताएं भी हैं और कम शब्दों में बात कहने के हुनरमंद, इस संग्रह की अंतिम और लंबी कविता ‘सिक्के की आखिरी साँस में मानों अपनी स्मृति के सारे पड़ाव को चवन्नी के बरअक्स देख-दिखा लेना चाहते हैं। 23 पाद टिप्पणियों वाली कविता, बस्तरिया भाषा-संस्कृति के शब्दों से अभिव्यक्त, कवि की तरल स्मृति का प्रवाह जैसा है। 

सीधे, सपाट बात कह कर असर पैदा करना, जैसे स्वयं शीर्षक ‘नदी के लिए सोचो‘ भी, इसे समीक्षकों द्वारा कितना काव्य माना जाता है, पता नहीं, लेकिन मन को छूता जरूर है। मगर नामवर सिंह, विनोद कुमार शुक्ल, राजेश जोशी, सतीश जायसवाल, राधेलाल विजघावने, राम अधीर, तेजिन्दर, शशांक, रामकुमार तिवारी, रमेश अनुपम, संजीव बख्शी, रऊफ परवेज, लक्ष्मीनारायण पयोधि, नारायण लाल परमार, विजय सिंह, सतीश कुमार सिंह नथमल शर्मा, सुधीर सक्सेना, शाकिर अली जैसे मर्मज्ञ और सुधिजन, इन कविताओं का मूल्यांकन कर चुके हैं, फिर और कुछ कहने को बस इतना कि मेरा भी वोट, इन कविताओं को। 

कविता ‘कहि देबे संदेश‘ की आखिरी पंक्तियां हैं- रोटी की आस है/ पानी की प्यास है/ धरती उदास है‘ मगर कवि यह भी मानता है कि- ‘ठिठुरती हुई जिजिविषा को भरोसा है/ एक दिन नदी फिर बहेगी/ धूप के साथ-साथ‘।

Wednesday, March 23, 2022

अर्द्धबृगल

अर्द्धबृगल* : चार कविताएं

(एकाकी प्रजापति भी रमा नहीं, दूसरे की इच्छा की- बृहदारण्यकोपनिषद)

तुम

तुम
भूला सा पाठ
और खोई पुस्तक,
वह जिसे बार-बार दुहराने का मन करे।
तब परीक्षा पास कर,
जाने कहां रख गई किताब,
स्मृति में फड़फड़ा रहे पन्ने अब।


तुम-मैं
 
तुम मेरे लिए
अपवाद की तरह जरूरी।
अपवाद, नई संभावना।
आपका, आप से अब तुम हो जाना,
तुम का मैं हो लेना।
तुम की जगह मैं,
मेरे के बदले तुम्हारे,
अपवाद या सिद्धांत,
जरूरी या गैरजरूरी।
दो नायिका, एक नायक अथवा
एक नायिका दो नायक के त्रिकोण
और कोणों पर बारी-बारी खड़े हो
समग्र समेट लेने की आतुर व्यथा।


तेरा होना

तेरा होना
हो ना में
तेरे ‘न होने‘ में
न ही तेरे ‘होने‘ में
तेरा होना, तेरे हो जाने में।
तेरा होना तेरे आने में,
तेरे आने से पहले।
तेरा होना तेरे जाने में,
तेरे जाने के बाद भी।
भूत और भविष्य के रिक्त में
वर्तमान के आभास में।
तेरा होना, हर हाल में होना है।
हो जाने या न जाने
तू माने या न माने
तेरा आना, तेरा जाना
हमने माना,
तेरा होना।


तेरा साथ

साथ चलना है तो-
मैं तुम्हारी बात मान लूं,
या तुम्हें समझा कर सहमति बना सकूं,
यदि नहीं तो-
तुम मेरी बात मान लो,
या मुझे अपनी बात समझाओ।
हम यह भी तय कर सकते हैं कि
जो तुम में है, मुझ में नहीं
और मुझ में है, वो तुम में नहीं।
फिर चलो, एक दूसरे के पूरक बनते,
साथ चलना यूं ही सही।

*अर्द्धबृगल-द्विदल अन्न का एक दल।


चतुष्पदी

एक साधे सब,
सधता है तब,
वह एक जब,
निराकार, शून्य।

भूख लगे, खा सकें।
नींद आए, सो सकें।
हंस सकें, रो सकें।
और चाहिए भी क्या!

सोमरसी चार‘वाक -
नींद आए, सो सकें,
हंस सकें, रो सकें।
खा सकें, पी सकें,
जीते भर, जी सकें।

Monday, March 7, 2022

शब्देश्वर

शब्द पसंद आते हैं 
क्योंकि बेजान हैं, अपेक्षारहित 
परवाह नहीं करनी पड़ती 
उनकी कोई पसंद या नापसंद। 

उनके साथ मनमानी हो सकती है 
कर सकते हैं खिलवाड़ 
स्मृति में अटके, अड़े-जड़े 
और कभी पिघल कर 
साबित हो जाता है उनसे 
लेख, कहानी, कविता 
और न बन सके तो 
अकहानी, अकविता 
पारंपरिक, आधुनिक, उत्तर आधुनिक 
पूर्वज-वंशज मुक्त! 
सबसे अलग, अनूठी, अनहोनी। 

बातें, कभी बेतुकी, तुक बिठाकर 
बहकने लगे, न संभले 
तो कभी विराम से रोक कर 
जान फूंकने की कोशिश 
तुमसे ही, 
कभी मार डाले जाते तुमसे ही तुम 
सीखने की चाह में 
अक्षर-अक्षर तोड़े गए 
फिर से शब्द-शब्द जुड़ते तुम। 

शब्द 
गूढ़ गंभीर मंत्र, ऋचाएं, स्तुति, सूक्तियां 
करुणा-सागर, क्रोध की ज्वाला, प्रेम का दरिया 
नारे, भाषण, आश्वासन 
इन्हीं बेजान निरर्थक शब्दों से 
कोई पैदा कर देता है भरोसा 
किसी और के पैदा किए उसी भरोसे के भरोसे 
कितने नाजायज, पलते-बढ़ते, फलते-फूलते हैं। 
बेजान ही होते हैं, 
वरना घबरा कर पूछ बैठते 
क्या हो गया हूं, कौन अब हूं। 

तड़पते नहीं कोशों में जिल्दबंद, 
न छटपटाते व्याकरण में लिपटे-बंधे, सहेजे 
रस, छंद, अलंकार में सजे 
मरी हुई भाषाओं में ही शब्द 
ज्यों के त्यों जिन्दा रह सकते हैं। 
जिन्दा भाषाओं में बदलते रहते हैं 
घिसते, पनपते 
कभी उच्चारण, ध्वनि, भाव, 
मुद्रा, भंगिमाएं 
पूरा उलट-फेर कभी। 

आवारा, बेगाने, निरर्थक 
अर्थ पाने भटकते 
बेवजह यहां-वहां टकराते 
तुम टकसाली और ये 
तुम्हारे जात-भाई 
वे भी कैद होने वाले हैं 
इन्हीं जिल्दों में तुम्हारे साथ 
जन्मना शूद्र, संस्कारित द्विज 
झूठ को सच बनाते कभी सोचा है 
तुम तो सच को भी सच नहीं बना पाते। 

शब्दों के साथ किया गया खिलवाड़ 
कविताई की आड़ में 
सम्मानित नहीं हो सकता 
अक्सर 
माफ करने लायक भी नहीं होता। 

सारा कुछ 
कहा, बोला, लिखा, सुना गया 
आखिर 
उसी अव्यक्त के लिए ही तो है 
इन बेजान शब्दों के बीच 
कितना सार्थक हो जाता है मौन। 

ईश्वर 
अपने सभी समानार्थियों सहित 
पसंद किया जाता है ऐसे ही 
शब्दों की तरह। 

यह रचना, कविता की प्रौढ़ समझ वालों के लिए है। अच्-हल् सूत्र, अपरा-परा-पश्यन्ती, क्षर-अक्षर, अक्षमालिकोपनिषद, नागकृपाणिका-सर्पबंध परमार शिलालेखों से सरसरी परिचय अपेक्षित है।

Monday, March 29, 2021

जन्म-जन्मांतर

एक बच्चा है।
बचपन में पूर्व जन्म की यादें ताजा रहती हैं।
बड़े होने पर धुंधली पड़ती जाती हैं, खोने लगती हैं।
कथावाचक कहानी सुना रहे हैं।
बच्चा कहानी सुन रहा है।
तैंतीस कोटि योनियां हैं।
मनुष्य तन बड़े भाग्य से मिलता है।
पंचतंत्र की कहानियां।
गज-ग्राह, मगर-बंदर।
बुद्ध के पूर्वजन्म की कहानियां सुनता है।
जातक कथा सुनता है।
अब बच्चा असमंजस में है।
उसके मन में दुविधा होने लगी है।
उसे कभी लगता कि पंछी है, तितली है, शेर है।
चींटी, मधुमक्खी, चूहा, हाथी।
कभी लगता मछली है, सांप है।
सांप-सीढ़ी का खेल है।
यह मेरे पूर्वजन्मों के कारण है।
मानव तन मिला है, लेकिन पूर्वजन्मों से मुक्त न हुआ।
पिछले जन्म की योनियों का असर इस जन्म में भी बाकी रह गया है।
वह कोतवाल चिड़िया की कहानी पढ़ता है।
उसे आकाश में उड़ते चील का पीछा करते देखता है।
कभी वह बड़ों से झगड़कर भी छोटों को बचा लेने की बात सोचता है।
क्रेस्टेड सर्पेंट ईगल, हनी बजार्ड, फिशिंग आउल, किंगफिशर।
क्या ऐसा औरों को भी लगता है।
साथी बच्चे उसकी हंसी उड़ाते।
हर दिन ऐसा होता।
संयुक्त परिवार है।
स्कूल जाता है।
किसी ने डांटा, किसी ने पुचकारा।
झगड़ा होते देखा, भागमभाग देखा।
सजा मिली, नजर बचा लिया।
अपनी किसी पूर्व योनि में भटकने लगता।
अपने खुद की खोज में भटकने लगता है।
मेरे साथ क्या होता है और मैं हूं कौन?
आत्म संधान, स्व की खोज, अपने आप की तलाश।
जीव, आत्मा, देह।
संचित, क्रियमाण, प्रारब्ध का ऋत।

Monday, August 27, 2018

केदारनाथ सिंह के प्रति


‘‘शुरू करो खेला/पैसा न धेला/जाना अकेला।‘‘ कहने वाले केदारनाथ सिंह बलिया जनपद के तुक मिलाते से नाम वाले गांव चकिया में पैदा हुए। अब उनके न होने पर उन्हीं के शब्दों में- ‘‘मेरा होना/सबका होना है/पर मेरा न होना/सिर्फ होगा मेरा।‘‘ जो कहते हैं- ‘‘पर मृत्यु के सौन्दर्य पर/संसार की सर्वोत्तम कविता/अभी लिखी जानी है।‘‘ वे पाठक को संबोधित कहते हैं- ‘‘जा रहा हूं/लेकिन फिर आऊंगा/आज नहीं तो कल/कल नहीं तो परसों/परसों नहीं तो बरसों बाद/हो सकता है अगले जनम में ही‘‘ ऐसे स्मृतिशेष केदारनाथ पर, धतूरे का कांटेदार फल और फूल की अंजुरी अर्पित-

उनके न रहने पर उनकी एक कविता ‘हाथ‘- ‘‘उसका हाथ/अपने हाथ में लेते हुए मैंने सोचा/दुनिया को/हाथ की तरह गर्म और सुंदर होना चाहिए।‘‘ और दूसरी ‘जाना‘- ‘‘मैं जा रही हूँ- उसने कहा/जाओ- मैंने उत्तर दिया/यह जानते हुए कि जाना/हिंदी की सबसे खौफनाक क्रिया है‘‘ (‘तेरा जाना, दिल के अरमानों का लुट जाना‘ टाइप), सबसे अधिक उद्धृत हुईं। मुझे लगता है कि इन कविताओं में ऐसी कोई बात नहीं है, जो कवि का नाम हटा लेने के बाद भी खास या महत्वपूर्ण मानी जाय। यहां ‘धीरे धीरे हम‘ शीर्षक कविता को भी याद किया जा सकता है। घर उल्लेख वाली उनकी चर्चित कविता है- मंच और मचान। इस कविता के साथ '(उदय प्रकाश के लिए)' उल्लेख है, इसलिए बरबस ध्यान जाता है ‘विद्रोह‘ पर, जिसमें मूल की ओर लौटने, ‘वापस जाना चाहता हूं‘ का भाव है। ऐसा ही भाव ‘मातृभाषा‘ में हैं, जहां वे चींटियों, कठफोड़वा, वायुयान और भाषा के लौटने की बात करते हैं, लेकिन ये कविताएं वैसी असरदार नहीं जैसी उदय प्रकाश की ‘मैं लौट जाऊंगा‘।

अंतिम दो पड़ाव सन 2014 में प्रकाशित ’सृष्टि पर पहरा’ संग्रह और इंडिया टुडे, साहित्य वार्षिकी 2017-18 के आधार पर उनका कवि-मन की छवि कुछ इस तरह दिखती है- अजित राय से बात करते हुए उन्होंने बताया था कि- तोलस्तोय अपने गांव के लोगों से बहुत प्यार करते थे... गांव वालों के लिए तरसते थे। और फिर सवाल पर कि- क्या आपके चाचा या चकिया (बलिया जिले का उनका गांव) वालों को पता है कि आप देश के सबसे महत्वपूर्ण कवियों में से एक हैं? उन्होंने परेशान होकर टालने की गरज से कहा, ‘ए भाई, तू बहुत बदमाश हो गइल बाड़अ, पिटइबअ का हो? इसी बातचीत में उन्होंने ‘बनारस‘ कविता सुनकर रोने लगी महिला के बारे में बताया कि- ‘वह कविता के लिए नहीं बनारस के लिए रो रही है जहां वह कभी नहीं जा पाएगी। ... यह जादू बनारस का है मेरी कविता का नहीं।‘

’सृष्टि पर पहरा’ का ब्लर्ब विचारणीय है जहां कहा गया है कि- केदारनाथ सिंह का यह नया संग्रह कवि के इस विश्वास का ताजा साक्ष्य है कि अपने समय में प्रवेश करने का रास्ता अपने स्थान से होकर जाता है। यहां स्थान का सबसे विश्वसनीय भूगोल थोड़ा और विस्तृत हुआ है, जो अनुभव के कई सीमांत को छूता है। ... ये कविताएं कोई दावा नहीं करतीं। वे सिर्फ आपसे बोलना-बतियाना चाहती हैं- एक ऐसी भाषा में जो जितनी इनकी है उतनी ही आपकी भी। और दूसरी तरफ यह भी कि- कार्यक्षेत्र का प्रसार महानगर से ठेठ ग्रामांचल तक। इस संग्रह की कविता ‘घर में प्रवास‘ का अंश है- ‘अबकी गया तो भूल गया वह अनुबंध/जो मैंने कर रखा था उनके साथ/जब अन्दर प्रवेश किया/जरा पंख फड़फड़ाकर/उन्होंने दे दी मुझे अनुमति/कुछ दिन उस घर में रहा मैं उनके साथ/उनके मेहमान की तरह/यह एक आधुनिक का/आदिम प्रवास था/अपने ही घर में।‘

’सृष्टि पर पहरा’ का समर्पण भी गहरे अर्थ वाला है- “अपने गांववालों को, जिन तक यह किताब कभी नहीं पहुंचेगी।“ इसकी भूमिका उनकी कविता ‘चिट्ठी‘ में पहले ही बन गई थी कि- ‘‘मुझे याद आई/एक और भी चिट्ठी/जो बरसों पहले/मैंने दिल्ली में छोड़ी थी/पर आज तक/ पहुंची नहीं चकिया‘‘ या ‘गांव आने पर‘ कविता के इन शब्दों में- ‘‘जिनका मैं दम भरता हूं कविता में/और यही यही जो मुझे कभी नहीं पढ़ेंगे‘‘ केदार जी का आशय क्या है? उनके गांव वालों तक किताब-चिट्ठी पहुंचना, ऐसा कौन सा मुश्किल था, जो नहीं हो सकता था? फिर गांव वालों तक किताब न पहुंच पाने में कारक कौन? केदारजी, गांववाले या स्वयं किताब (उसमें कही गई बात)? दिवंगत केदार जी के प्रति पूरी श्रद्धा के बावजूद- क्या उन्हें लगने लगा था कि उनकी बात साहित्य प्रेमियों, समीक्षकों, साहित्य अकादमी, ज्ञानपीठ पुरस्कार देने वालों के समझ में तो आती है लेकिन इस भाषा-शैली में कही गई कविता की बातें उनके गांववालों तक पहुंच पाएगी? (उनकी कई बातें-कविताएं मुझे भी अबूझ लगीं तब सोचा कि क्या मैं भी उनके गांववालों की तरह हूं?) उनकी कविताई बातें अपने ही गांववालों के लिए बेगानी होती चली गई है? क्या इस समर्पण-कथन में उन्हें यही अफसोस साल रहा है? अपने पर इस तरह का भरोसेमंद संदेह, केदार जी जैसा कवि ही कर सकता है। साहित्य अकादमी पुरस्कार के अवसर पर उनके वक्तव्य में भी उल्लेख है कि अपने गांव के अनुभव में पके कर्मठ किसान के ‘कुछ सुनाओ‘ कहने पर वे अवाक रह गए थे और कहते हैं- ‘मैं जानता हूं कि यह आज की कविता की एक सीमा हो सकती है, पर कोई दोष नहीं कि वह बूढ़े किसान को सुनायी नहीं जा सकती।‘

मनोहर श्याम जोशी कहते थे- ‘हर व्यक्ति के वास्तविक संसार और काल्पनिक या आदर्श संसार में गहरा अंतर होता है। वह जो होता है, वही तो नहीं होता जो होना चाहता है या जो उसने चाहा था। जो उसने होना चाहा, उसकी कविताएं हो जाती हैं।‘ शायद ऐसी ही होने लगी थीं उनकी कविताएं। ‘बंटवारा‘ की पंक्तियां हैं- ‘‘कि यह जो कवि है मेरा भाई/जो बरसों ही रहता है मेरी सांस/मेरे ही नाम में/अच्छा हो, अगली बरसात से पहले/उसे दे दिया जाय/कोई अलग घर/कोई अलग नंबर।‘‘ स्वयं को निरस्त करने का दुर्लभ साहस लेकिन उनमें दिखता है, जब वे कहते हैं- ‘‘जो लिखकर फाड़ दी जाती हैं/कालजयी होती हैं/वही कविताएं।‘‘ या ‘‘कविताएं करा दी जाएं प्रवाहित/किसी नाले में‘‘ और मानों वसीयत लिख रहे हों- ‘‘और सबसे बड़ी बात मेरे बेटे/कि लिख चुकने के बाद/इन शब्दों को पोंछकर साफ कर देना‘‘ लेकिन उन्हें उम्मीद है कि- ‘‘पर मौसम/चाहे जितना खराब हो/उम्मीद नहीं छोड़ती कवितायें‘‘।

बहरहाल उनकी पुण्य स्मृति को समर्पित- ‘‘मेरे गांव की मतदाता सूची में/नहीं है आपका नाम/न था, न होगा/इसलिए/आपका राशन कार्ड भी/यहां नहीं है/न आधार कार्ड/इस मामले में आप वैसे ही हैं/जैसा किसी चकिया के लिए मैं/न रहने के बाद भी/मैं हूं कही न कहीं/और कुछ न कुछ/वहां भी/ठीक वैसे ही/जैसे न होने के बाद भी/आप अपनी कविताओं में हैं, वैसे के वैसे।‘‘ उन्हें समर्पित मेरी ये पंक्तियां, मात्र संयोग है कि उनके द्वारा तैयार की गई अंतिम पांडुलिपि, जो अब प्रकाशित है, का शीर्षक ‘मतदान केन्द्र पर झपकी‘ है। इसी शीर्षक वाली कविता की अंतिम पंक्तियां है- मैंने खुद से कहा/अब घर चलो केदार/और खोजो इस व्यर्थ में/नया कोई अर्थ।

समाचार पत्र ‘नवभारत‘, रायपुर में
इस प्रकार प्रकाशित हुआ।


Monday, August 22, 2016

त्रयी


रहस्य को भेदने का अपना आकर्षण होता है और रोमांच भी, इसलिए खतरों, चुनौतियों, आशंकाओं के बावजूद व्‍यक्ति अनदेखे, अनजाने, अंधेरे, उबड़-खाबड़ रास्तों को चुन लेता है, कुछ नया, अलग, खास, ‘बस अपना’ पा लेने के लिए, भले यह सफर 'तीर्थ नहीं है केवल यात्रा' साबित हो।

इतिहास में कालक्रम और वंशानुक्रम की सीढ़ी पर घटित जय-पराजय, निर्माण-विनाश और मलिन-उज्ज्वल कहानियों को महसूस कर सकें तो यही अनगढ़ कविता भी है। यह कविता पढ़ लिये जाने पर काल और पात्र के भेद को मिटाती, इतिहास का शुष्क विवरण न रह कर मानव-मन का दस्तावेज बन जाती है। प्राचीन इतिहास की टोही सुस्मिता, शोध-अध्येता के रूप में काल की परतों में दबे इतिहास में झांकते हुए भूत के अंधे-गहरे कुएं में थाह लगाने के पहले से उतरने को उद्यत रहती हैं और वह भी बिना कमंद के।

मानव-मन, जीवन-निर्वाह करते तर्क और खोया-पाया में ऐसा मशगूल होता है कि अपने अगल-बगल बहती जीवन धारा से किनाराकशी कर लेता है। इस धारा को स्पर्श करने या देखने का भी साहस वह नहीं जुटा पाता, इसमें उतर जाने की कौन कहे। ऐसा करना अनावश्यक, कभी बोझिल और कई बार खतरनाक जान पड़ता है, लेकिन व्यक्ति का कवि-मन बार-बार इस ओर आकृष्ट होता है। सुस्मिता की कविताएं, साहित्यिकता के दबाव से मुक्त, किसी कवि नहीं बल्कि एक ऐसे आम व्यक्ति की अन्तर्यात्रा और महसूसियत की लेखी है, जिसने इस धारा को भी समानान्तर अपना रखा है।

एक तरह का संकट यह भी है कि साहित्य की भाषा अधिक से अधिक टकसाली होने लगे और मनोभाव रेडीमेड-ब्रांडेड, जब कविताएं शब्दकोश और तुकांतकोश के घालमेल का परिणाम दिखें, ऐसे दौर में सुस्मिता की कविताओं का साहित्यिक मूल्यांकन सिद्धहस्त समीक्षक करेंगे, हो सकता है ये कविताएं 'अकवि की गैर-साहित्यिक सी रचनाएं' ठहराई जाएं लेकिन इसमें दो मत नहीं कि 'कविता में गढ़ने का उद्यम जितना कम हो और सृजन की सहज निःसृति जितनी स्वाभाविक, कविता उतनी ही ईमानदार होती है', जो इन कविताओं में है, इसलिए पाठक के लिए इनमें अपनेपन के साथ ताजगी तो है ही, गहरी उम्मीदें भी।

'एक टुकड़ा आसमां' शीर्षक कविता की कुछ पंक्तियां इस तरह हैं-
छत से सूखे हुए कपड़े उतार लाते हुए
एक टुकड़ा आसमां भी तोड़ लाये हम ... ... ...
सितारे थककर एक दिन
जुगनू बनकर उड़ गए

'जामदानी' शीषर्क कविता की कुछ पंक्तियां-
घरों में उनके रोटियों के लाले हैं
हाथों में उनके सिर्फ छाले हैं
पहनने वालों को कभी न समझ आएगा
इन फूल पत्तों में छिपे कितने निवाले हैं

आज बुन रहा है वो जामदानी
दो महीने बुनने पर होगी आमदनी... ... ...
आँखों की रौशनी से नींद में उसने
मांगा सिर्फ एक वादा है
और कुछ दिन रोक ले मोतियाबिंद को
बेटे ने अब शहर का रुख साधा है

और 'हिसाब के कच्चे हैं हम (२)' शीर्षक कविता की पंक्ति है-
चाँद जोड़ा आज हमने, सूरज घटाकर
तेरे इंतज़ार में

एक कविता है- 'मन बावरा', जो पढ़ने से अधिक सुनने की है, (नाम पर ऑडियो-विजुअल लिंक है.)

सुरुचिपूर्ण छपाई वाली पुस्तक "TRIANGULAM", ISBN 978-93-5098-112-2 सुस्मिता बसु मजुमदार, राजीव चक्रवर्ती और सुष्मिता गुप्ता की क्रमशः हिन्दी, बांग्ला और अंगरेजी कविताओं का संग्रह है, उक्त टिप्पणी हिन्दी कविताओं के लिए है। इस पुस्तक में मेरे नाम का भी आभार-उल्लेेख है।

Wednesday, January 11, 2012

कवि की छवि

कवि के साथ छवि का तुक यहां संयोग से ही बैठ गया वरना कविता तो अतुकी-बेतुकी सी लगने वाली बातों में भी होती है- खुदबुदाते, मचलते भावों के सामने कब लाचार नहीं पड़ते शब्द, कभी जबान तोतली होने लगती है, तो कभी सघन मौन-चुप्पी। ... घना अंधेरा और तरल रोशनी ... ।
क्यों नदी खामोश है?
दहाड़ क्यों है, पहाड़ के चुप्प्प्प में
जंगल लील जाने को आतुर
चिड़िया टंगी सी, पेड़ अनमने!

कवि मन के भाव-बिंबों को समझने के प्रयास में यह बेतुकी सी बात बन गई। कविताओं के प्रति अपनी रुचि और समझ सीमा के कारण, ऐसा कुछ पढ़ते हुए असमंजस होता है, गद्यार्थी पाठक को घबराहट-सी भी होती है। लेकिन इस संकीर्णता में आसानी से समा जाए ऐसी भी कविता यदा-कदा मिल जाती है।

बात है बिलासपुर, छत्‍तीसगढ़ के युवा रचनाकार मनीष श्रीवास्तव के काव्य संग्रह 'अवलंबन' की। 1974 में जन्मे मनीष नब्बे के दशक से लिख रहे हैं और इस संग्रह में सन 2006 तक की अनुक्रमित (सरल क्रमांक वाली), बिना शीर्षक वाली 1 से 109 तक रचनाएं शामिल हैं, जिनमें अधिकतर का रचना काल 1999 और 2000 दर्शाया है। (रचनाओं को यहां कोष्‍ठक में उनका अनुक्रम देते हुए उद्धृत किया गया है।)

संग्रह से गुजरते हुए ऐसा लगता है कि रचनाकार फिलहाल अपनी कवि-छवि से मुक्त है, उसे पता नहीं है कि वह जो कुछ लिख रहा है, वह कविता है, यानि वह एक तरह से कुंवारा-कवि है। कवि (की छवि) बन जाने के बाद, ऐसा भान, अपनी यह पहचान उसे बनाए-बचाए रखने का जतन, रचना-प्रक्रिया के दौरान भी साथ बना रहा तो यह कविता पर भारी पड़ने लगता है। फिलहाल इससे लगभग मुक्त दिखते मनीष, संग्रह के आरंभ में कहते हैं- ''मैंने '97 से '07 तक काफ़ी कुछ कहा। चंद तो यूँ ही बातों में बह गया। जो कुछ मैंने याद रखा, जो कुछ कविता-स्वरूप था, वह संकलित है।''
लक्षण अच्छे कहे जा सकते हैं क्योंकि यह युवा कवि, शब्दों और भाषा को खिलौने की तरह खेलता दिखता है। काश, आकाश और अवकाश पर कविता (2) है तो एक रचना (12) में मोहन, वशीकरण, आकर्षण, द्रावण, उन्मोदन, दीपन, स्तंभन, जृम्भण, उच्चाटन, मारण शब्दों को अपनी तरह से व्यक्त किया है और द्योतक, मोदक, उद्‌घोषक, प्रेरक, धावक जैसे तुक मिले शब्दों के साथ रची गई कविता (26) भी है।

शब्दों से खेल, कहीं भाव से दर्शन तक पहुंच जाता है जैसे (54) एक क्षण, युति का // एक प्रहर, उल्लास का // एक दिवस, आवेगपूर्ण // संध्या एक, आह्लादमयी // एक पक्ष, सान्निध्यरत // एक मास, सहयोग का // एक ऋतु, प्रतीक्षा की // एक वर्ष, प्रयास का // एक दशक, संतुष्टि का // एक जीवन, पूर्णतः परिभाषित!!! और (105) प्रातः उठो, गाओ कुछ पंक्तियाँ, पूरा गीत नहीं // मध्याह्न तक, चलो कुछ कोस, पूरा पथ नहीं // संध्या बैठो, इक नदी किनारे, न, रोओ नहीं // रात सोने दो, आँखों को खेलने दो, एक नए सपन संग, न, खोलो नहीं // हर सुबह नवजीवन का आरंभ, हर रात इक ज़िंदगी ख़त्म, जीवन की अवधि, सिर्फ़ एक दिन!

इस कवि को अपनी बात कहने के लिए कामचलाऊ से लेकर अंगरेजी से भी परहेज नहीं है, लेकिन कमाल तो वहां दिखता है, जब वह शास्‍त्रीय संस्‍कृत के शब्‍द और मनोभूमि में विचरते हुए (15) मंत्रोपलों, ईक्षण, ष्‍ठीवन, लोय, जोय, प्रीत्‍योदधि, व्रण, बैंदव, त्रायमाण, विवक्षा, अमिष जैसे शब्‍दों का सहज इस्‍तेमाल करता है तब कुछ अन्य कविताओं की तरह यहां भी लगता है कि वह सिर्फ संस्कृत भाषा का अभ्यासी नहीं, बल्कि पौराणिक-औपनिषदिक मनोभाव का भी अभ्‍यस्‍त है। जब वह क्‍लासिक उर्दू को पकड़ कर बढ़ता है तो (28) ग़ज़ीर, मुबर्हन, तस्‍ख़ीर, शाबदा, रू-ए-तिला, लज़्ज़ते-गिर्या (77) यूज़क, मिक़्यासुलहरारा, सीमाब, मिक़्यासुलमौसिम, दिनाअत (78) बिफ़ज़िल्ही, चर्बक़ामत, नौख़ास्‍ता, रू-ए-शोरीदा, नैरंगसाज़े-शैदा लफ़्ज आते हैं और (79) में काफिया मिलान के शब्‍द हैं- शुस्‍तोशू, दू-ब-दू, मू-ब-मू, सू-ए-सू, ज़ुस्‍तजू, कू-ब-कू, जू-ब-जू, हू-ब-हू, रू-ब-रू के साथ शेर है- न होते अंग्रेज न 'यू-यू' होती, हिंदी होती तो तुम से तू होती।

आपकी जांच-परख के लिए इस संग्रह के कुछ नमूने-

7 शेरों वाली ग़ज़ल (6) में काफ़िया खींच कर मिलाया गया लगता है, लेकिन बात असरदार बनी है-
माशूक है रोटी यहाँ बच्चे रक़ीब हैं
चूल्हे की वस्लगाह के क़िस्से अजीब हैं
शायर के पेट दौड़ती बहती हुई शराब
कुर्ता-ए-ज़र की ज़ेब में मुद्दे ग़रीब हैं
ये प्यार काग़ज़ी है सो दो लफ़्ज़ हुए हम
मानी हैं जुदा शुक्र है हिज्जे करीब हैं

संग्रह की सबसे छोटी, स्वाभाविक कविता (18) है-
ज़िन्दगी की बिसात पे
जब भी शह देता हूँ...
...तुम मोहरे बदल देती हो!

15 अगस्त 2006 को लिखी कुछ अलग मिजाज की कविता (24) है-
शब्द-विवर में अर्थ-मंडूक // जब मौन व्रत धर लें // अंतरात्मा के झींगुर // परकोलाहलवश सुनाई न दें // चकाचौंध में भावों के मृदु तारागण // जब दिखाई न दें ...
... ... ... ... ... ... ... ... ...
(कहूँ सुप्रीम कोर्ट को इंप्यूडेंट, फिर भले भुगते मुआ ये आदिवासी
मैं और मेरा (लेस्बो) एडवेंचर तो मजे में हैं 'बस मॉस्किटो हैं')
जब कम्युनिज़म पटुओं की ललनाओं को हड़पने की
तानाशाही का जरिया बने, समाधिकार के नाम पर
जब कॅपिटलिज़म का ठेठ अर्थ ही हो जाए
अक्षम से भेदभाव या अपमान या उसे खर समझना
जब सेक्युलर का मतलब दाढ़ी
औ' नेशनलिस्ट सुसंस्कृत हो चले चोटी
सोशलिस्ट (यदि बचा हो) माने झोले में कट्टा
जब टॅररिज़म का मुकाबला करे जिंगोइज़म,
वो भी ख़ाली हाथ!
... ... ... ... ... ... ... ... ...
मौन-कंदरा में विचार शरभ निर्दोष // जब हिमनिद्रालीन हों अनिमेष ही // प्रीत्याभिषेक स्नात मृडमुख से // फूटे ''युद्धं शरणं गच्छामि!'' // कलाश्री के इक्षुचाप में दंत-अंकुश // सुमनशर बद्ध हों जब मायापाश में // तब, ममप्रिय हे अदिति, // तू मुझे अभीष्ट है!

संग्रह की एकदम सहज-स्वाभाविक सी कविता (50) है-

ओह, मैं अश्वमेध कर बैठा!

हृदय-तुरंग से ये कह बैठा
कि जा, जहाँ तक तू दौड़ेगा
वहाँ तक मेरा साम्राज्य होगा

इक नन्हीं बाला ने ऐसा पकड़ा
कि अश्व बेचारा अब तक
उसका बंदी है, वो लालन-पालन
करती है, सो ख़ुश भी है

अश्व छुड़ाने की कोशिश में
राजा से भिक्षु बन बैठा
सुनने में तो ये भी आया
कि उस हय ने संतति की है
दो बछेड़े विश्वास और संयम
और एक नन्हीं घोड़ी प्रतीक्षा
को भी जन्म दिया है!

क्यूँ नृप हारा, बाला जीती?
मैंने अश्व को दमन का अस्त्र बनाया
उसने उसे प्रेम-प्रतीक बना
जीना सिखलाया!

...धरा रह गया यज्ञ
मुझे अश्व की सेवा ही करने दो!

छोटे बहर और 29 शेरों वाली प्रयोगात्मक ग़ज़ल (27) का एक शेर है- खिलौना हूँ मैं दोनों का, करम उसका दुआ उसकी। ऐसी ही 28 शेरों वाली ग़ज़ल (59) शुरू होती है- मुझसे न लिखा जाएगा, ये वर्क़ सफ़ा जाएगा। एक शेर (34) में है- सुबू दो, इक खयाल, काफिए चार, मगर रदीफ बनाई नहीं जाती। एक और ग़ज़ल (38) के कुछ शेर देखते चलें-
भूत है वाचाल चंचल वर्तमान
क्यूँ है रहता लृटलकार मौन
गणपति, मुझ कंठकेतु पर कृपा हो
है तू सक्षम कर मेरा उद्धार मौन
तुझसे गतिमय है मेरी यौवनकथा
न रहेगा इस कथा का सार मौन।
कवि यह भी कहता है- (52) ''हां, मैं विशेषज्ञ नहीं पर, जीवन का हठी विद्यार्थी अवश्य हूँ!'' फिर यह कि- (10) ''सीख लेंगे लब ये जब क़िस्साबयानी, लस्म में, आँखों से तब इरशाद मिलेगी।'' और फिर मानों घोषणा कि- (23) ''ग़ज़लगोई ये चुप नहीं होगी, मुहब्बत तुंदख़ू से है।'' लेकिन बात यहां तक पहुंचती है- (76) ''तम्दीद-ए-ग़ज़ल में है महारत मुझे मगर, यीमन फ़ यौमन ख़ुद को घटाता रहूँ।''

रचनाओं में व्‍यापक भाव और समृद्ध बिंब का जैसा सहज प्रयोग हुआ है, वह कवि की अकूत संभावना का अनुमान कराने के लिए पर्याप्‍त है, लेकिन वह जिस भाषा का प्रयोग करता है, उसके लिए आम पाठक कवि के शब्दों में (37) ही कह सकता है-
... सुनूँ मैं तुम्हारे दिल की बात
और समझ भी पाऊँ! प्रिये यह सरल नहीं है!

राजकमल प्रकाशन की इस पुस्‍तक का आइएसबीएनः 978-81-267-1717-0 है।

Friday, October 8, 2010

बिटिया


किसी पेड़ की इक डाली को,
नव जीवन का सुख देने
नव प्रभात की किरणों को ले,
खुशियों से आंचल भर देने
दूर किसी परियों के गढ़ से, नव कोंपल बन आई बिटिया।
सबके मन को भायी बिटिया, अच्छी प्यारी सुन्दर बिटिया॥

आंगन में गूंजे किलकारी,
जैसे सात सुरों का संगम
रोना भी उसका मन भाये,
पर हो जाती हैं, आंखें नम
इतराना इठलाना उसका,
मन को मेरे भाता है
हर पीड़ा को भूल मेरा मन,
नए तराने गाता है
जीवन के बेसुरे ताल में, राग भैरवी लायी बिटिया।
सप्त सुरों का लिए सहारा, गीत नया कोई गाई बिटिया॥

बस्ते का वह बोझ उठा,
कांधे पर पढ़ने जाती है
शाम पहुंचती जब घर हमको,
आंख बिछाए पाती है
धीरे-धीरे तुतलाकर वह,
बात सभी बतलाती है
राम रहीम गुरु ईसा के,
रिश्‍ते वह समझाती है
कभी ज्ञान की बातें करती, कभी शरारत करती बिटिया।
एक मधुर मुस्कान दिखाकर हर पीड़ा को हरती बिटिया॥

सुख और दुख जीवन में आते,
कभी हंसाते कभी रुलाते
सुख को तो हम बांट भी लेते,
दुख जाने क्यूं बांट न पाते
अंतर्मन के इक कोने में,
टीस कभी रह जाती है
मैं ना जिसे बता पाता हूं,
ना जुबान कह पाती है।
होते सब दुख दूर तभी, जब माथा सहलाती बिटिया।
जोश नया भर जाता मन में, जब धीमे मुस्काती बिटिया॥

लोग मूर्ख जो मासूमों से,
भेदभाव कोई करते हैं
जिम्मेदारी से बचने को
कई बहाने रचते हैं
बेटा-बेटी दिल के टुकड़े,
इक प्यारी इक प्यारा है
बेटा-बेटी एक समान,
हमने पाया नारा है
घर की बगिया में जो महके, सुन्दर कोमल फूल है बिटिया।
पाप भगाने तीरथ ना जा, सब तीरथ का मूल है बिटिया॥

मान मेरा सम्मान है बिटिया, अब मेरी पहचान है बिटिया।
ना मानो तो आ कर देखो, मां-पापा की जान है बिटिया॥
मेरी बिटिया सुन्दर बिटिया,
मेरी बिटिया प्यारी बिटिया॥

कई क्षेत्रों में सक्रिय जयप्रकाश त्रिपाठी जी (+919300925397) स्टेट बैंक से जुड़े हैं, यह 'बिटिया' उनकी रचना है। बहुमुखी जयप्रकाश जी की प्रतिभा के अन्य रूपों को अच्छी तरह पहचान पाने में मेरी रूचि-सीमा आड़े आती रहती है। लेकिन पद्य पढ़ने से बचने वाला मैं, उनकी यह कविता बार-बार पढ़ता हूं। 'बिटिया' की वेब पर विदाई के लिए उन्होंने सहमति दी, उनका आभार।

नाम-लेवा पानी-देवाः

पुंसंतति के लिए कहा जाता है कि कोई तो होना चाहिए नाम-लेवा पानी-देवा जिससे वंश चले, आशय तर्पण से होता है, लेकिन पुत्री द्वारा मुखाग्नि और श्राद्ध-तर्पण की खबरें भी आजकल मिलने लगी हैं। बात आती है नाम-लेवा की तो कहा जाता है-
'नाम कमावै काम से, सुनो सयाने लोय। मीरा सुत जायो नहीं, शिष्‍य न मूड़ा कोय।'

बिलासपुर का एक किस्सा भी याद आ रहा है। मैंने सचाई तहकीकात नहीं की, किस्सा जो ठहरा। न सबूत, न बयान, कोई साखी-गवाही भी नहीं। आप भी बस पढ़-गुन लीजिए। तो हुआ कुछ यूं कि एक थे वकील साहब, खानदानी। अंगरेजों का जमाना। सिविल लाइन निवासी इक्के-दुक्के नेटिव। हर काम कानून से करने वाले और कानून से हर कुछ संभव कर लेने वाले। कहा तो यह भी जाता है कि उनकी जिरह-पैरवी सुन जज भी घबरा जाते थे। फिर मामला कोई भी हो, मुकदमा हारें उनके दुश्‍मन।

उच्च कुल के इन वकील साहब को कुल जमा एक ही पुत्री नसीब हुई। इंसान का क्या वश, यह फैसला तो ऊपर वाले का था। वंश परम्परा के रक्षक, पुश्‍तैनी वकील ने बेटे-बेटी में कोई फर्क न समझा। बिटिया को भी वकालत पढ़ाया। बिटिया काम में हाथ बंटाने लगी। कानून की किताबें, केस ब्रीफ और कागजात सहेजने लगी। वकील साहब निश्चिंत।

चिंता हुई, जब पत्नी ने बिटिया के हाथ पीले कर, उसे विदा करने का जिक्र छेड़ा। वकील साहब सन्न। किताबों की ओर देखने लगे इनका क्या होगा, मुवक्किल कहां जाएंगे, यह तो कभी सोचा ही नहीं। पति की चुप्पी भांपते हुए पत्नी तुरंत आगे बढ़ी, बोली बाकी तो जो रामजी की मरजी, लेकिन आप तो कोट-कछेरी में ही रमे रहे, कभी सोचा, कुल-खानदान का क्या होगा, वंश कैसे चलेगा। वकील साहब ने फिर किताबों की आलमारी की तरफ देखा और अब आसीन हो गए अपनी स्प्रिंग-गद्दे वाली झूलने वाली कुरसी पर। कुछ लिखते, कुछ पढ़ते, कुछ सोचते, झूलते-झालते रात बीत गई। ऐसा केस तो कभी नहीं आया था। लेकिन मामला कोई भी हो, आदमी हल तो अपनी विधा में ही खोजता है। उन्होंने वंश चलाने का रास्ता तलाश ही लिया, विधि-सम्मत।

सुयोग्य वर की तलाश होने लगी। पात्र मिल गया। वकील साहब ने होने वाले समधी से शर्त रखी कि वे भावी दामाद को न सिर्फ बेटा मानेंगे, बल्कि गोद ले लेंगे और अपनी बिटिया को उन्हें गोद देंगे। रिश्‍ता पक्का हुआ। गोदनामा बना, बाकायदा रजिस्टर भी हुआ। बस फिर क्या देर थी, चट मंगनी पट ब्याह। वकील साहब अपनी बेटी को बहू बनाकर, विदा करा अपनी ड्‌योढ़ी में ले आए। घर-आंगन खुशियों से भर गया.....जैसे उनके दिन फिरे .....या जैसे उन्होंने अपने दिन फेरे। वकील साहब का वंश चल रहा है, चलता रहे, 'आचन्द्रार्क तारकाः.....। अब आप ही बताइये, बेटी ही तो मां है, कौन सा वंश है जो बिना मां के चलता है और कौन कहेगा कि बेटी से वंश का नाम नहीं चल सकता।

आज नवरात्रि का आरंभ। या देवि सर्व भूतेषु .....

यह पोस्‍ट तैयार करते हुए मीरा वाली पंक्तियां ठीक याद नहीं कर सका था। यह भी याद नहीं आ रहा था कि यह कब और कहां पढ़ा-सुना। पोस्‍ट लगा दी फिर भी राजस्‍थान के और हिन्‍दी साहित्‍य वाले परिचितों को टटोलता रहा। 8 जनवरी 2011 को कवि उपन्‍यासकार विनोद कुमार शुक्‍ल जी पर केन्द्रित आयोजन में प्रो. पुरुषोत्‍तम अग्रवाल जी रायपुर आए मैंने चान्‍स लिया, उन्‍होंने तुरंत बताया और यह भी जोड़ा कि ये उनकी पसंद की पंक्तियां हैं। सो, अब सुधार दिया है।

Monday, May 3, 2010

सिरजन

छत्‍तीसगढ़ राज्‍य बनने के बाद ही, मार्च 2001 में, महंत घासीदास संग्रहालय परिसर, रायपुर में पारम्‍परिक शिल्पियों की कार्यशाला 'सिरजन−2001' का आयोजन हुआ। कभी−कभार टिप्‍पणी या लेख लिखने वाले मुझ जैसे से कहानी तो बन ही नहीं पाती तो सहजता से गद्य न लिख पाने वाले के लिए कविता की सोचना भी मुश्किल था। लेकिन बतौर ड्यूटी, परिसर पूरने के लिए मैंने कुछ पंक्तियां बनाईं। डॉ. केके चक्रवर्ती और डॉ. एए बोआज अधिकारी थे। पंक्तियां उपयुक्‍त लगीं। उत्‍साहित होकर कुछ और, जिन्‍हें मैंने भावानुवाद माना, छत्‍तीसगढ़ी में भी बना लिया। दोनों का इस्‍तेमाल पोस्‍टर की तरह हुआ। पिछले दिनों में कुछ गंभीर लोगों ने उनकी याद कराते हुए दोनों को कविताओं की मान्‍यता दी तो उन महानुभावों की सहिष्‍णुता और उदारता का कायल होकर याद किया कि एक अंग्रेजी अखबार में तब इसका (छत्‍तीसगढ़ी का) अनुवाद भी छपा था। खोजते हुए अक्‍सर जैसा नहीं होता, बारी−बारी तीनों मिल गए। अब भटके−खोए तो वेब पर, मुझसे और मेरे इर्द−गिर्द नहीं, इसलिए −


सिरजन−1

हुनर ऐसा कि
हवा में हाथ घुमाते ही
बन गई मछलियां
रुपहली, चमचमाती।

तैरती हैं मछलियां
आती हैं, जाती हैं
कारीगर हाथों में
यकीनन, सचमुच।

नदी-नाले, जंगल और पहाड़
और आकाश
स्वच्छंद उन्मुक्त चिड़ियाएं
सिरजती हैं सारी कायनात।

सिरजन−2

रुख-राई, चिरई-चुरगुन
मनिखे बारामिंझरा भइया
पुतरा रचे, पुतरी रचे
अउ रचागे रचइया।

रथिया-बिहनिहा, संझा-मंझनिहा
सुरता सुताथे, सुरता चेताथे
सुरता बिसराथे, माया सिरजाथे।

तओ जै हो, जै हो
जै हो, जै हो
जै हो सिरजनहार।

Sirjan 2001

Trees and saplings
Birds and birdies
Men and icons
Animate and inanimate alike
The Creator created them all
Also did he create
the nights and the dawns
the evenings and the noon's
and other innumerable things
impossible for one to remember
My oblations to that creator of universe
Glory to him
Glory to him
Glory to him.
(The Hitvada, Raipur. Dt. 25.03.2001)