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Thursday, December 2, 2010

दिनेश नाग


'फॅंस गए रे ओबामा' सुनकर एकबारगी लगता है कि अमरीकी राष्‍ट्रपति की पिछले दिनों भारत यात्रा का कोई संदर्भ है, लेकिन ऐसा कतई नहीं। फिल्‍म की कहानी है आर्थिक मंदी की, जिसे अपहरण के साथ लपेट कर, मजेदार ढंग से दिखाया गया है।


फिल्‍म में एक तरफ भारत लौटे अमरीकावासी एनआरआइ ओम शास्‍त्री (नायक रजत कपूर) हैं तो दूसरी तरफ मुम्‍बई अंडरवर्ल्‍ड की रानी फिमेल गब्‍बर सिंह (नायिका नेहा धूपिया) और इन दोनों के बीच है, ओम शास्‍त्री का भांजा कन्‍हैया लाल, यानि हमारा हीरो, छत्‍तीसगढ़ का दिनेश नाग। दिनेश ऐसा अभिनेता है, जिसकी आंखें तो क्‍या चेहरा भी बोलता है।


छत्‍तीसगढ़ को आदिम संस्‍कृति के चर्चित (जनजाति और उनके घोटुल) केन्‍द्र, बस्‍तर और अबुझमाड़ के कारण भी जाना जाता है। अबुझमाड़-ओरछा का मुहाना है अब का जिला मुख्‍यालय नारायणपुर। इसीसे लगा गांव है गढ़ बेंगाल, जो सन 1957 में पूरी दुनिया में जाना गया था दस वर्षीय बालक चेन्‍दरू के साथ। चेन्‍दरू नायक था, अर्न सक्‍सडॉर्फ की स्‍वीडिश फिल्‍म 'एन डीजंगलसागा' ('ए जंगल सागा' या 'ए जंगल टेल' अथवा अंगरेजी शीर्षक 'दि फ्लूट एंड दि एरो') का। फिल्‍म में संगीत पं. रविशंकर का है, उनका नाम तब उजागर हो ही रहा था। सन 1998 में अधेड़ हुए चेन्‍दरू और इस पूरे सिलसिले को नीलिमा और प्रमोद माथुर ने अपनी फिल्‍म 'जंगल ड्रीम्‍स' का विषय बनाया। चेन्‍दरू, इन दिनों अपने गांव में 'गैर-फिल्‍मी' दिनचर्या बसर कर रहा है, किन्‍तु फिल्‍मों का पहला छत्‍तीसगढ़ी सुपर स्‍टार वही है।

नारायणपुर से लगे गांव माहका का निवासी है दिनेश नाग। स्‍कूली शिक्षा रामकृष्ण मिशन, विवेकानन्द विद्यापीठ, नारायणपुर से 2001 में पूरी हुई, आगे की पढ़ाई के लिए दिनेश भिलाई आ गए लेकिन उनका मन रमने लगा नाटकों में। 2004 में रायपुर में राष्‍ट्रीय नाट्य विद्यालय की कार्यशाला हुई। दिनेश की मानों मुराद पूरी हुई। कार्यशाला में उनकी अभिनय प्रतिभा को अमिताभ श्रीवास्तव, विनोद चोपड़ा और विभा मिश्रा ने पहचाना। इसी क्रम में दिनेश को अपनी प्रतिभा निखारने का मौका मिला, भोपाल की कार्यशाला में, जहां उन्‍हें देवेन्द्र राज अंकुर, राजेन्द्र गुप्ता, भानु भारती और रतन थियम जैसे गुरु मिल गए। इसके बाद 2005 में दिनेश ने मुंबई की राह पकड़ ली।


बॉलीवुड के खट्टे (-मीठे की शुरुआत शायद अब हो) अनुभवों के साथ दिनेश इडियट बॉक्स, रन भोला रन और स्‍ट्राइकर फिल्‍मों से जुड़े रहे, लेकिन इनसे उनकी पहचान न बनी।

दिनेश बताते हैं 8 नवम्‍बर को फिल्‍म के म्‍यूजिक रिलीज के अवसर पर उन्‍हें कन्‍हैया लाल के रूप में पहचाना गया इससे उन्‍हें भरोसा है कि 3 दिसम्‍बर को फिल्‍म रिलीज के साथ उनकी पहचान बनने लगेगी, हमारी भी यही कामना है। उनकी आने वाली फिल्‍म कॉल सेंटर पर आधारित 'तीस टका' होगी।

दिनेश नाग का फोन नं. +919867745061 है। इस पोस्‍ट के लिए जानकारी और फोटो का सहयोग अभिषेक झा (फोन नं.- +919424287102) और सोमेश (फोन नं.- +919993294086) से मिला है।



परिशिष्‍टः

रामकृष्‍ण मिशन, विवेकानंद आश्रम, रायपुर के संस्‍थापक प्रातः स्‍मरणीय स्‍वामी आत्‍मानंद जी ने बिलासपुर व अमरकंटक आश्रम सहित नारायणपुर आश्रम, विवेकानंद विद्यापीठ की नींव रखी, जिसके माध्‍यम से अबुझमाड़ इलाके में मुख्‍यतः चिकित्‍सा और शिक्षा की नई अलख जगी। इस यज्ञ में उनके सहयोगी संतोष भैया, देवेन्‍द्र भैया, राजा भैया, शत्रुघ्‍न भैया, सतीश भैया, चटर्जी सर याद आ रहे हैं।

गढ़ बेंगाल, चेन्‍दरू के साथ बेलगुर, पंडी, जैराम द्वय, शंकर द्वय, बुधसिंह, रूपसिंह, सोबराय, मनीराम, पिसाड़ू कचलाम जैसे अनेकों कलाकार-शिल्‍पकारों का सभ्‍य-सुसंस्‍कृत गांव है और यहां किसी सियान को ढुसीर बजाकर घोटुल पाटा और लिंगोपेन की महान गाथा गाते देख-सुन सकते हैं।

नारायणपुर के पास कोई 40 साल पहले सोनपुर के अपने प्रवास के बाद वहां से 30 किलो मीटर दूर कोई 20 साल पहले, घनघोर अंदरूनी इलाके का डेढ़ हजार साल पुराना बौद्ध अवशेषों सहित प्राचीन स्‍थल भोंगापाल का उत्‍खनन कैम्‍प, वहीं बांसडीह, बलिया के सिंह गुरुजी का संग व मार्गदर्शन, खुदाई के साथी चेलिक और मोटियारी के साथ घोटुल संस्‍था को पहली बार करीब से देखने-समझने का अवसर बना।

याद कर रहा हूं, भोंगापाल में स्विस युवा पर्यटक से मुलाकात हुई और फिर सन 1990-91 में रेनॉल्‍ड पेन नया-नया था, जिसके साथ बहुतों की बालपेन से लिखने की आदत बनी और फाउन्‍टेन पेन छूटा। लेकिन पहली खेप के बाद रायपुर के बाजार में इसकी कमी हो गई। नारायणपुर के इतवार बाजार से कैम्‍प के सौदा-सुलुफ के बाद बस स्‍टैंड पर पान की दुकान में रेनॉल्‍ड पेन दिख गया और एक साथ पेन की जोड़ी खरीद लिया।

अब सोचता हूं ''नारायणपुर में रेनॉल्‍ड पेन और भोंगापाल में स्विस युवा'' शीर्षक से उदारीकरण और वैश्‍वीकरण पर महसूस किए, याद रहे, पहले-पहल अनुभवों पर एक पोस्‍ट लिखूं, गल्‍फ-वार के चलते कैम्‍प के लिए किरोसीन और सफर के लिए डीजल संकट से मुकाबले को जोड़कर, जो समाप्‍त हो अंकल सैम के नारे के साथ।

इन सबका साक्षी और कुछ हद तक सहभागी रहने के चलते गौरव अनुभव कर रहा हूं और नक्‍सलवाद की याद अब आई, लेकिन 'बाबू ले बहुरिया गरू झन हो जाय' इसलिए फिलहाल बस इतना ही।

पुनश्‍चः 5 दिसंबर को ''आज की जनधारा'' समाचार पत्र ने स्‍तंभ 'ब्‍लॉग कोना' में इस पोस्‍ट को साभार प्रकाशित किया है।