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Monday, February 6, 2012

मेला-मड़ई

विविधतापूर्ण छत्तीसगढ़ राज्य में विभिन्न स्वरूप के मेलों का लंबा सिलसिला है, इनमें मुख्‍यतः उत्तर-पूर्वी क्षेत्र यानि जशपुर-रायगढ़ अंचल में जतरा अथवा रामरेखा, रायगढ़-सारंगढ़ का विष्णु यज्ञ- हरिहाट, चइत-राई और व्यापारिक मेला, कटघोरा-कोरबा अंचल का बार, दक्षिणी क्षेत्र यानि बस्तर के जिलों में मड़ई और अन्य हिस्सों में बजार, मातर और मेला जैसे जुड़ाव अपनी बहुरंगी छटा के साथ राज्य की सांस्कृतिक सम्पन्नता के जीवन्त उत्सव हैं। मेला ‘होता’ तो है ही, 'लगता', 'भरता' और 'बैठता' भी है।

गीता का उद्धरण है- 'मासानां मार्गशीर्षोऽहं ...', अगहन को माहों में श्रेष्ठ कहा गया है और यह व्याख्‍या सटीक जान पड़ती है कि खरीफ क्षेत्र में अगहन लगते, घर-घर में धन-धान्य के साथ गुरुवार लक्ष्‍मी-पूजा की तैयारी होने लगती है, जहां लक्ष्‍मी वहां विष्‍णु। इसी के साथ मेलों की गिनती का आरंभ, अंचल की परम्परा के अनुरूप, प्रथम के पर्याय- 'राम' अर्थात्, रामनामियों के बड़े भजन से किया जा सकता है, जिसमें पूस सुदी ग्यारस को अनुष्‍ठान सहित चबूतरा और ध्वजारोहण की तैयारियां होती हैं, द्वादशी को झंडा चढ़ाने के साथ ही मेला औपचारिक रूप से उद्घाटित माना जाता है, तीसरे दिन त्रयोदशी को भण्डारा होता है, इस हेतु दो बड़े गड्ढे खोदे जाते, जिन्‍हें अच्‍छी तरह गोबर से लीप-सुखा कर भंडारण योग्‍य बना लिया जाता। भक्‍तों द्वारा चढ़ाए और इकट्ठा किए गए चावल व दाल को पका कर अलग-अलग इन गड्ढों में भरा जाता, जिसमें मक्खियां नहीं लगतीं। यही प्रसाद रमरमिहा अनुयायियों एवं अन्य श्रद्धालुओं में वितरित होता। संपूर्ण मेला क्षेत्र में जगह-जगह रामायण पाठ होता रहता है। नख-शिख 'रामराम' गोदना वाले, मोरपंख मुकुटधारी, रामनामी चादर ओढ़े रमरमिहा स्त्री-पुरूष मेले के दृश्य और माहौल को राममय बना देते हैं।
मेले में परिवेश की सघनता इतनी असरकारक होती है कि यहां प्रत्येक व्यक्ति, समष्टि हो जाता है। सदी पूरी कर चुका यह मेला महानदी के दाहिने और बायें तट पर, प्रतिवर्ष अलग-अलग गांवों में समानांतर भरता है। कुछ वर्षों में बारी-बारी से दाहिने और बायें तट पर मेले का संयुक्त आयोजन भी हुआ है। मेले के पूर्व बिलासपुर-रायपुर संभाग के रामनामी बहुल क्षेत्र से गुजरने वाली भव्य शोभा यात्रा का आयोजन भी किया गया है। इस मेले और समूह की विशिष्टता ने देशी-विदेशी अध्येताओं, मीडिया प्रतिनिधियों और फिल्मकारों को भी आकर्षित किया है।

रामनामी बड़े भजन के बाद तिथि क्रम में पौष पूर्णिमा अर्थात्‌ छेरछेरा पर्व पर तुरतुरिया, सगनी घाट (अहिवारा), चरौदा (धरसीवां) और गोर्रइया (मांढर) का मेला भरता है। इसी तिथि पर अमोरा (तखतपुर), रामपुर, रनबोर (बलौदाबाजार) का मेला होता है, यह समय रउताही बाजारों के समापन और मेलों के क्रम के आरंभ का होता है, जो चैत मास तक चलता है। जांजगीर अंचल की प्रसिद्ध रउताही मड़ई हरदी बजार, खम्हरिया, बलौदा, बम्हनिन, पामगढ़, रहौद, खरखोद, ससहा है। क्रमशः भक्तिन (अकलतरा), बाराद्वार, कोटमी, धुरकोट, ठठारी की रउताही का समापन सक्ती के विशाल रउताही से माना जाता है। बेरला (बेमेतरा) का विशाल मेला भी पौष माह में (जनवरी में शनिवार को) भरता है। 'मधुमास पुनीता' होते हुए '...ऋतूनां कुसुमाकरः', वसंत ऋतु-रबी फसल तक चलने वाले मेलों के मुख्‍य सिलसिले का समापन चइत-राई से होता है, सरसींवां और भटगांव के चैत नवरात्रि से वैशाख माह के आरंभ तक चलने वाले चइत-राई मेले पुराने और बड़े मेले हैं। सपोस (चंदरपुर) का चइत-राई भी उल्लेखनीय है। चइत-राई का चलन बस्‍तर में भी है।

सिद्धमुनि आश्रम, बेलगहना में साल में दो बार- शरद पूर्णिमा और बसंत पंचमी को मेला भरता है। शरद पूर्णिमा पर ही बरमकेला के पास तौसीर में मेला भरता है, जिसमें अमृत खीर प्रसाद, शरद पूर्णिमा की आधी रात से सूर्योदय तक बंटता है। मान्यता है कि जो तीन साल लगातार यह प्रसाद खाता है वह आजीवन रोगमुक्त रहता है। यह उड़िया-छत्तीसगढ़ी सांस्कृतिक मेल-जोल का मेला है। कुदरगढ़ और रामगढ़, उदयपुर (सरगुजा) में रामनवमी पर बड़ा मेला भरता है। शंकरगढ़ का घिर्रा मेला पूस सुदी नवमी को होता है, जिसमें विभिन्न ग्रामों के रंग-बिरंगे ध्वजों के साथ 'ख्‍याला' मांगने की परम्परा है। लाठी और ढाल लेकर नृत्य तथा 'कटमुंहा' मुखौटेधारी भी आकर्षण के केन्द्र होते हैं। सरगुजा का 'जतरा' यानि घूम-घूम कर लगने वाला मेला अगहन मास के आरंभ से उमको होता हुआ सामरी, कुसमी, डीपाडीह, भुलसी, दुर्गापुर होकर शंकरगढ़ में सम्पन्न होता है। कुंवर अछरिया (सिंघनगढ़, साजा) और खल्लारी का मेला चैत पूर्णिमा पर भरता है।

भौगोलिक दृष्टि से उत्तरी क्षेत्र में सरगुजा-कोरिया अंचल के पटना, बैकुण्‍ठपुर, चिरमिरी आदि कई स्थानों में गंगा दशहरा के अवसर पर मेला भरता है तो पुराने रजवाड़े नगरों में, विशेषकर जगदलपुर में गोंचा-दशहरा का मेला प्रमुख है, किन्तु खैरागढ़ के अलावा खंडुआ (सिमगा), ओड़ेकेरा और जैजैपुर में भी दशहरा के अवसर पर विशाल मेला भरता है और भण्डारपुरी में दशहरा के अगले दिन मेला भरता है। सारंगढ़ अंचल के अनेक स्थलों में विष्णु यज्ञों का आयोजन होता है और यह मेले का स्वरूप ले लेता है, जिन्हें हरिहाट मेला कहा जाता है और मकर संक्रांति पर जसपुर कछार (कोसीर), सहजपाली और पोरथ में मेला लगता है। मकर संक्रांति पर एक विशिष्‍ट परम्‍परा घुन्‍डइया मेला, महानदी में बघनई और सूखा नाला के संगम की त्रिवेणी के पास हथखोज (महासमुंद) में प्रचलित है। यहां भक्‍त स्‍त्री-पुरुष मनौती ले कर महानदी की रेत पर लेट जाते हैं और बेलन की तरह लोटने लगते हैं फिर रेत का शिवलिंग बना कर उसकी पूजा करते हैं। संकल्‍प सहित इस पूरे अनुष्‍ठान को 'सूखा लहरा' लेना कहा जाता है।

क्वांर और चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवरात्रियों पर भी मेला भरने का चलन पिछले सालों में बढ़ा है, इनमें झलमला (बालोद) में दोनों नवरात्रि पर बड़े मेले भरते हैं और रतनपुर में इस अवसर पर प्रज्‍ज्वलित होने वाले ज्योति कलशों की संख्‍या दस हजार पार कर जाती है। अकलतरा के निकट दलहा पहाड़ पर नागपंचमी का मेला होता है, जिसमें पहाड़ पर चढ़ने की प्रथा है। विगत वर्षों में कांवड़िया श्रद्धालुओं द्वारा सावन सोमवार पर शिव मंदिरों में जल चढ़ाने की प्रथा भी तेजी से बढ़ी है। पारम्परिक तिथि-पर्वों से हटकर सर्वाधिक उल्लेखनीय कटघोरा का मेला है, जो प्रतिवर्ष राष्ट्रीय पर्व गणतंत्र दिवस पर 26 जनवरी को नियत है। रामकोठी के लिए प्रसिद्ध तेलीगुंडरा, पाटन में भी इसी अवसर पर मेला होता है।

आमतौर पर फरवरी माह में पड़ने वाला दुर्ग का हजरत बाबा अब्दुल रहमान शाह का उर्स, राजनांदगांव का सैयद बाबा अटल शाह का उर्स, लुतरा शरीफ (सीपत), सोनपुर (अंबिकापुर) और सारंगढ़ के उर्स का स्वरूप मेलों की तरह होता है। रायगढ़ अंचल में पिछली सदी के जनजातीय धार्मिक प्रमुख और समाज सुधारक गहिरा गुरु के मेले चिखली, सूरजगढ़, रेंगापाली, लेंध्रा, बरमकेला आदि कई स्थानों पर भरते हैं, इनमें सबसे बड़ा माघ सुदी 11 को ग्राम गहिरा (घरघोड़ा) में भरने वाला मेला है। इसी प्रकार कुदुरमाल (कोरबा), दामाखेड़ा (सिमगा) में माघ पूर्णिमा पर कबीरपंथी विशाल मेले आयाजित होते हैं तथा ऐसे कई अन्य कबीरपंथी जुड़ाव-भण्डारा सरगुजा अंचल में होते रहते हैं। दामाखेड़ा, कबीरपंथियों की महत्वपूर्ण गद्दी है, जबकि कुदुरमाल में कबीरदास जी के प्रमुख शिष्य धरमदास के पुत्र चुड़ामनदास एवं अन्य दो गुरूओं की समाधियां है। मेले के अवसर पर यहां धार्मिक अनुष्ठानों के साथ कबीरपंथी दीक्षा भी दी जाती है। गुरु घासीदास के जन्म स्थान गिरोदपुरी के विशिष्ट और विस्तृत पहाड़ी भू-भाग में फाल्गुन सुदी 5 से भरने वाले तीन दिवसीय विशाल मेले का समापन जैतखंभ में सफेद झंडा चढ़ाने के साथ होता है। एक लोकप्रिय गीत 'तूं बताव धनी मोर, तूं देखा द राजा मोर, कहां कहां बाबाजी के मेला होथे' में सतनामियों के गिरौदपुरी, खडुवापुरी, गुरुगद्दी भंडार, चटुआ, तेलासी के मेलों का उल्लेख है। 

शिवनाथ नदी के बीच मनोरम प्राकृतिक टापू मदकूघाट (जिसे मनकू, मटकू और मदकूदीप/द्वीप भी पुकारा जाता है), दरवन (बैतलपुर) में सामान्यतः फरवरी माह में सौ-एक साल से भरने वाला इसाई मेला और मालखरौदा का क्रिसमस सप्ताह का धार्मिक समागम उल्लेखनीय है। मदकूदीप में एक अन्य पारम्परिक मेला पौष में भी भरता है। दुर्ग जिला का ग्राम नगपुरा प्राचीन शिव मंदिर के कारण जाना जाता है, किन्तु यहां से तीर्थंकर पार्श्वनाथ की प्राचीन प्रतिमा भी प्राप्त हुई है। पिछले वर्षों में यह स्थल श्री उवसग्गहरं पार्श्व तीर्थ के रूप में विकसित हो गया है। यहां दिसम्बर माह में शिवनाथ उत्सव, नगपुरा नमस्कार मेला का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें जैन धर्मावलंबियों की बड़ी संख्‍या में उपस्थिति होती है। इसी प्रकार चम्पारण में वैष्णव मत के पुष्टिमार्गीय शाखा के अनुयायी पूरे देश और विदेशों से भी बड़ी तादाद में आते हैं। यह स्थान महाप्रभु वल्लभाचार्य का प्राकट्‌य स्थल माना जाता है, अवसर होता है उनकी जयंती, वैशाख बदी 11 का।

आमतौर पर प्रति तीसरे साल आयोजित होने वाले 'बार' में तुमान (कटघोरा) तथा बसीबार (पाली) का बारह दिन और बारह रात लगातार चलने वाले आयोजन का अपना विशिष्ट स्वरूप है। छत्तीसगढ़ी का शब्द युग्म 'तिहार-बार' इसीसे बना है। इस आयोजन के लिए शब्द युग्म 'तीज-तिहार' के तीज की तरह ही बेटी-बहुओं और रिश्तेदारों को खास आग्रह सहित आमंत्रित किया जाता है। गांव का शायद ही कोई घर छूटता हो, जहां इस मौके पर अतिथि न होते हों। इस तरह बार भी मेलों की तरह सामान्यतः पारिवारिक, सामाजिक, सामुदायिक, आर्थिक आवश्यकता-पूर्ति के माध्यम हैं। इनमें तुमान बार की चर्चा और प्रसिद्धि बैलों की दौड़ के कारण होती है। कटघोरा-कोरबा क्षेत्र का बार आगे बढ़कर, सरगुजा अंचल में 'बायर' नाम से आयोजित होता है। 'बायर' में ददरिया या कव्वाली की तरह युवक-युवतियों में परस्पर आशु-काव्य के सवाल-जवाब से लेकर गहरे श्रृंगारिक भावपूर्ण समस्या पूर्ति के काव्यात्मक संवाद होते हैं। कटघोरा क्षेत्र के बार में गीत-नृत्य का आरंभ 'हाय मोर दइया रे, राम जोहइया तो ला मया ह लागे' टेक से होता है। बायर के दौरान युवा जोड़े में शादी के लिए रजामंदी बन जाय तो माना जाता है कि देवता फुरमा (प्रसन्‍न) हैं, फसल अच्‍छी होगी।

रायगढ़ की चर्चा मेलों के नगर के रूप में की जा सकती है। यहां रथयात्रा, जन्माष्टमी और गोपाष्टमी धूमधाम से मनाया जाता है और इन अवसरों पर मेले का माहौल रहता है। इस क्रम में गणेश चतुर्थी के अवसर पर आयोजित होने वाले दस दिवसीय चक्रधर समारोह में लोगों की उपस्थिति किसी मेले से कम नहीं होती। छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के बाद इसका स्वरूप और चमकदार हो गया है। इसी प्रकार सारंगढ़ का रथयात्रा और दशहरा का मेला भी उल्लेखनीय है। बिलासपुर में चांटीडीह के पारम्परिक मेले के साथ, अपने नए स्वरूप में रावत नाच महोत्सव (शनिचरी) और लोक विधाओं के बिलासा महोत्सव का महत्वपूर्ण आयोजन होता है। रायपुर में कार्तिक पूर्णिमा पर महादेव घाट का पारंपरिक मेला भरता है।

छत्तीसगढ़ राज्य गठन के पश्चात्‌ आरंभ हुआ सबसे नया बड़ा मेला राज्य स्थापना की वर्षगांठ पर प्रतिवर्ष सप्ताह भर के लिए आयोजित होने वाला राज्योत्सव है। इस अवसर पर राजधानी रायपुर के साथ जिला मुख्‍यालयों में भी राज्योत्सव का आयोजन किया गया है। इसी क्रम में विभिन्न उत्सवों का जिक्र उपयुक्त होगा। भोरमदेव उत्सव, कवर्धा (अप्रैल), रामगढ़ उत्सव, सरगुजा (आषाढ़), लोककला महोत्सव, भाटापारा (मई-जून), सिरपुर उत्सव (फरवरी), खल्लारी उत्सव, महासमुंद (मार्च-अप्रैल), ताला महोत्सव, बिलासपुर (फरवरी), मल्हार महोत्सव, बिलासपुर (मार्च-अप्रैल), बिलासा महोत्सव, बिलासपुर (फरवरी-मार्च), रावत नाच महोत्सव, बिलासपुर (नवम्बर), जाज्वल्य महोत्सव (जनवरी), शिवरीनारायण महोत्सव, जांजगीर-चांपा (माघ-पूर्णिमा), लोक-मड़ई, राजनांदगांव (मई-जून) आदि आयोजनों ने मेले का स्वरूप ले लिया है, इनमें से कुछ उत्सव-महोत्सव वस्तुतः पारंपरिक मेलों के अवसर पर ही सांस्कृतिक कार्यक्रमों के रूप में आयोजित किए जाते हैं, जिनमें श्री राजीवलोचन महोत्सव, राजिम (माघ-पूर्णिमा) सर्वाधिक उल्लेखनीय है।

राजिम मेले की गिनती राज्य के विशालतम मेलों में है। विगत वर्षों में राजिम मेले का रूप लघु कुंभ जैसा हो गया है और यह 'श्री राजीवलोचन कुंभ' के नाम से आयोजित हो रहा है। मान्‍यता है कि चारों धाम तीर्थ का पुण्‍य-लाभ, राजिम पहुंचकर ही पूरा होता है। मेले के दौरान कल्पवास और संत समागम से इसके स्वरूप और आकार में खासी बढ़ोतरी हुई है। माघ-पूर्णिमा पर भरने वाले इस मेले का केन्द्र राजिम होता है, महानदी, पैरी और सोंढुर त्रिवेणी संगम पर नदी के बीचों-बीच स्थित कुलेश्‍वर महादेव और ठाकुर पुजारी वाले वैष्‍णव मंदिर राजीवलोचन के साथ मेले का विस्तार पंचक्रोशी क्षेत्र में पटेवा (पटेश्वर), कोपरा (कोपेश्वर), फिंगेश्वर (फणिकेश्वर), चंपारण (चम्पकेश्वर) तथा बम्हनी (ब्रह्मणेश्वर) तक होता है। इन शैव स्थलों के कारण मेले की अवधि पूरे पखवाड़े, शिवरात्रि तक होती है, लेकिन मेले की चहल-पहल, नियत अवधि के आगे-पीछे फैल कर लगभग महीने भर होती थी।
राजिम मेला के एक प्रसंग से उजागर होता मेलों का रोचक पक्ष यह कि मेले में एक खास खरीदी, विवाह योग्‍य लड़कियों के लिए, पैर के आभूषण-पैरी की होती थी। महानदी-सोढुंर के साथ संगम की पैरी नदी को पैरी आभूषण पहन कर पार करने का निषेध प्रचलित है। इसके पीछे कथा बताई जाती है कि वारंगल के शासक अन्‍नमराज से देवी ने कहा कि मैं तुम्‍हारे पीछे-पीछे आऊंगी, लेकिन पीछे मुड़ कर देखा तो वहीं रुक जाऊंगी। राजा आगे-आगे, उनके पीछे देवी के पैरी के घुंघरू की आवाज दन्‍तेवाड़ा तक आती रही, लेकिन देवी के पैर डंकिनी नदी की रेत में धंसने लगे। घुंघरू की आवाज न सुन कर राजा ने पीछे मुड़ कर देखा और देवी रुक गईं और वहीं स्‍थापित हो कर दंतेश्‍वरी कहलाईं। लेकिन कहानी इस तरह से भी कही जाती है कि देवी का ऐसा ही वरदान राजा को उसके राज्‍य विस्‍तार के लिए मिला था और बस्‍तर से चल कर बालू वाले पैरी नदी में पहुंचते, देवी के पैर धंसने और आहट न मिलने से राजा ने पीछे मुड़ कर देखा, इससे उसका राज्‍य विस्‍तार बाधित हुआ। इसी कारण पैरी नदी को पैरी पहन कर (नाव से भी) पार करने की मनाही प्रचलित हो गई। संभवतः इस मान्‍यता के पीछे पैरी नदी के बालू में पैर फंसने और नदी का अनिश्चित प्रवाह और स्‍वरूप ही कारण है।
राजिम मेले में कतार से रायपुर के अवधिया-धातुशिल्पियों की दुकान होती। वे साल भर कांसे की पैरी बनाते और इस मेले में उनका अधिकतर माल खप जाता, बची-खुची कसर खल्‍लारी मेला में पूरी हो जाती। विवाह पर कन्‍या को पैरी दिया जाना अनिवार्य होने से इस मौके पर अभिभावक लड़की को ले कर दुकान पर आते, दुकानदार पसंद करा कर, नाप कर लड़की को पैरी पहनाता। पसंद आने पर अभिभावक लड़की से कहते कि दुकानदार का पैर छूकर अभिवादन करे, उसने उसे पैरी पहनाया है। लड़की, दुकानदार सहित सभी बड़ों के पैर छूती और दुकानदार उसे आशीष देते हुए पैरी बांध-लपेट कर दे देता, पैरी के लिए मोल-भाव तो होता है लेकिन फिर पैरी पहनाने के एवज में दुकानदार को रकम (मूल्‍य नहीं) भेंट-स्‍वरूप दी जाती और यह पैरी अगली बार सीधे लड़की के विवाह पर खोल कर उसे पहनाया जाता। इसी के साथ रायगढ़ अंचल के मेलों के 'मान-जागर' को याद किया जा सकता है। यहां के प्रसिद्ध धातु-शिल्‍पी झारा-झोरका, अवधियों की तरह ही मोम-उच्छिष्‍ट (lost-wax) तकनीक से धातु शिल्‍प गढ़ते हैं। इस अंचल में लड़कियों को विवाह पर लक्ष्‍मी स्‍वरूप धन-धान्‍य का प्रतीक 'पैली-मान' (पाव-आधा सेर माप की लुटिया) और आलोकमय जीवन का प्रतीक 'दिया-जागर' (दीपदान) देना आवश्‍यक होता, जो झारा बनाते।

राजिम मेला का एक उल्‍लेखनीय, रोचक विस्‍तार जमशेदपुर तक है। यहां बड़ी तादाद में छत्‍तीसगढ़ के लोग सोनारी में रहते हैं। झेरिया साहू समाज द्वारा यहां सुवर्णरेखा और खड़खाई नदी के संगम, दोमुहानी में महाशिवरात्रि पर एक दिन का राजिम मेला-महोत्‍सव आयोजित किया जाता है। पहले यह आयोजन मानगो नदी के किनारे घोड़ा-हाथी मंदिर के पास होता था, लेकिन 'मैरिन ड्राइव' बन जाने के बाद इस आयोजन का स्‍थल बदल गया है।

शिवरीनारायण-खरौद का मेला भी माघ-पूर्णिमा से आरंभ होकर महाशिवरात्रि तक चलता है। मान्यता है कि माघ-पूर्णिमा के दिन पुरी के जगन्नाथ मंदिर का 'पट' बंद रहता है और वे शिवरीनारायण में विराजते हैं। इस मेले में दूर-दूर से श्रद्धालु और मेलार्थी बड़ी संख्‍या में पहुंचते हैं। भक्त नारियल लेकर 'भुंइया नापते' या 'लोट मारते' मंदिर तक पहुंचते हैं, यह संकल्प अथवा मान्यता के लिए किये जाने वाले उद्यम की प्रथा है। प्रतिवर्ष होने वाले खासकर 'तारे-नारे' जैसी लोक विधाओं का प्रदर्शन अब नहीं दिखता लेकिन उत्सव का आयोजन होने से लोक विधाओं को प्रोत्साहन मिल रहा है। छत्तीसगढ़ में शिवरीनारायण की प्रतिष्ठा तीर्थराज जैसी है। अंचल के लोग सामान्य धार्मिक अनुष्ठानों से लेकर अस्थि विसर्जन तक का कार्य यहां सम्पन्न होते हैं। इस अवसर पर मंदिर के प्रांगण में अभी भी सिर्फ ग्यारह रुपए में सत्यनारायण भगवान की कथा कराई जा सकती है।

यह मेला जाति-पंचायतों के कारण भी महत्वपूर्ण है, जहां रामनामी, निषाद, देवार, नायक और अघरिया-पटेल-मरार जाति-समाज की सालाना पंचायत होती है। विभिन्न सम्प्रदाय, अखाड़ों के साधु-सन्यासी और मनोरंजन के लिए मौत का कुंआ, चारोंधाम, झूला, सर्कस, अजूबा-तमाशा, सिनेमा जैसे मेला के सभी घटक यहां देखे जा सकते हैं। पहले गोदना गुदवाने के लिए भी मेले का इंतजार होता था, अब इसकी जगह रंग-छापे वाली मेहंदी ने ले लिया है। गन्ने के रस में पगा लाई का 'उखरा' प्रत्येक मेलार्थी अवश्य खरीदता है। मेले की चहल-पहल शिवरीनारायण के माघ पूर्णिमा से खरौद की शिवरात्रि तक फैल जाती है। ग्रामीण क्षेत्र में पिनखजूर खरीदी के लिए आमतौर पर उपलब्ध न होने और विशिष्टता के कारण, मेलों की खास चीज होती थी।

उखरा की तरह ही मेलों की सर्वप्रिय एक खरीदी बताशे की होती है। उखरा और बताशा एक प्रकार से कथित क्रमशः ऊपर और खाल्हे राज के मेलों की पहचान भी है। इस संदर्भ में ऊपर और खाल्हे राज की पहचान का प्रयास करना आवश्यक प्रतीत होता है। इसके अलावा एक अन्य प्रचलित भौगोलिक नामकरण 'चांतर राज' है, जो निर्विवाद रूप से छत्तीसगढ़ का मध्य मैदानी हिस्सा है, किन्तु 'ऊपर और खाल्हे' राज, उच्च और निम्न का बोध कराते हैं और शायद इसीलिए, उच्चता की चाह होने के कारण इस संबंध में मान्यता एकाधिक है।

ऐतिहासिक दृष्टि से राजधानी होने के कारण रतनपुर, जो लीलागर नदी के दाहिने स्थित है, को ऊपर राज और लीलागर नदी के बायें तट का क्षेत्र खाल्हे राज कहलाया और कभी-कभार दक्षिणी-रायपुर क्षेत्र को भी पुराने लोग बातचीत में खाल्हे राज कहा करते हैं। बाद में राजधानी-संभागीय मुख्‍यालय रायपुर आ जाने के बाद ऊपर राज का विशेषण, इस क्षेत्र ने अपने लिए निर्धारित कर लिया, जिसे अन्य ने भी मान्य कर लिया। एक मत यह भी है कि शिवनाथ का दाहिना-दक्षिणी तट, ऊपर राज और बायां-उत्तरी तट खाल्हे राज, जाना जाता है, किन्तु अधिक संभव और तार्किक जान पड़ता है कि शिवनाथ के बहाव की दिशा में यानि उद्‌गम क्षेत्र ऊपर राज और संगम की ओर खाल्हे राज के रूप में माना गया है।

छत्तीसगढ़ का काशी कहे जाने वाले खरौद के लक्ष्मणेश्वर महादेव मंदिर में दर्शन और लाखा चांउर चढ़ाने की परंपरा है, जिसमें हाथ से 'दरा, पछीना और निमारा' गिन कर साबुत एक लाख चांवल मंदिर में चढ़ाए जाने की प्रथा है। इसी क्रम में लीलागर के नंदियाखंड़ में बसंत पंचमी पर कुटीघाट का प्रसिद्ध मेला भरता है। इस मेले में तीज की तरह बेटियों को आमंत्रित करने का विशेष प्रयोजन होता है कि इस मेले की प्रसिद्धि वैवाहिक रिश्तों के लिए 'परिचय सम्मेलन' जैसा होने के कारण भी है। बताया जाता है कि विक्रमी संवत की इक्कीसवीं शताब्दी आरंभ होने के उपलक्ष्य में रतनपुर में आयोजित श्री विष्णु महायज्ञ के पश्चात्‌ इस क्षेत्र में सांकर और मुलमुला के साथ कुटीघाट में भी विशाल यज्ञ आयोजित हुआ जो मेले का स्वरूप प्राप्त कर प्रतिवर्ष भरता आ रहा है।

'लाखा चांउर' की प्रथा हसदेव नदी के किनारे कलेश्वरनाथ महादेव मंदिर, पीथमपुर में भी है, जहां होली-धूल पंचमी पर मेला भरता है। इस मेले की विशिष्टता नागा साधुओं द्वारा निकाली जाने वाली शिवजी की बारात है। मान्यता है कि यहां महादेवजी के दर्शन से पेट के रोग दूर होते है। इस संबंध में पेट के रोग से पीड़ित एक तैलिक द्वारा स्वप्नादेश के आधार पर शिवलिंग स्थापना की कथा प्रचलित है। वर्तमान मंदिर का निर्माण खरियार के जमींदार द्वारा कराया गया है, जबकि मंदिर का पुजारी परंपरा से 'साहू' जाति का होता है। इस मेले का स्वरूप साल दर साल प्राकृतिक आपदाओं व अन्य दुर्घटनाओं के बावजूद भी लगभग अप्रभावित है। कोरबा अंचल के प्राचीन स्थल ग्राम कनकी के जांता महादेव मंदिर का पुजारी परंपरा से 'यादव' जाति का होता है। इस स्थान पर भी शिवरात्रि के अवसर पर विशाल मेला भरता है।

चांतर राज में पारम्परिक रूप से मेले की सर्वाधिक महत्वपूर्ण तिथियां माघ पूर्णिमा और महाशिवरात्रि (फाल्गुन बदी 13) हैं और इन्हीं तिथियों पर अधिकतर बड़े मेले भरते हैं। माघ पूर्णिमा पर भरने वाले अन्य बड़े मेलों में सेतगंगा, रतनपुर, बेलपान, लोदाम, बानबरद, झिरना, डोंगरिया (पांडातराई), खड़सरा, सहसपुर, चकनार-नरबदा (गंड़ई), बंगोली और सिरपुर प्रमुख है। इसी प्रकार शिवरात्रि पर भरने वाले प्रमुख मेलों में सेमरसल, अखरार, कोटसागर, लोरमी, नगपुरा (बेलतरा), मल्हार, पाली, परसाही (अकलतरा), देवरघट, तुर्री, दशरंगपुर, सोमनाथ, देव बलौदा और किलकिला पहाड़ (जशपुर) मेला हैं। कुछेक शैव स्थलों पर अन्य तिथियों पर मेला भरता है, जिनमें मोहरा (राजनांदगांव) का मेला कार्तिक पूर्णिमा को, भोरमदेव का मेला चैत्र बदी 13 को तथा लटेश्वरनाथ, किरारी (मस्तूरी) का मेला माघ बदी 13 को भरता है।


रामनवमी से प्रारंभ होने वाले डभरा (चंदरपुर) का मेला दिन की गरमी में ठंडा पड़ा रहता है लेकिन जैसे-जैसे शाम ढलती है, लोगों का आना शुरू होता है और गहराती रात के साथ यह मेला अपने पूरे शबाब पर आ जाता है। संपन्न अघरिया कृषकों के क्षेत्र में भरने वाले इस मेले की खासियत चर्चित थी कि यह मेला अच्छे-खासे 'कॅसीनो' को चुनौती दे सकता था। यहां अनुसूचित जाति के एक भक्त द्वारा निर्मित चतुर्भुज विष्णु का मंदिर भी है। कौड़िया का शिवरात्रि का मेला प्रेतबाधा से मुक्ति और झाड़-फूंक के लिए जाना जाता है। कुछ साल पहले तक पीथमपुर, शिवरीनारायण, मल्हार, चेटुआ आदि कई मेलों की चर्चा देह-व्यापार के लिए भी होती थी। कहा जाता है कि इस प्रयोजन के मुहावरे 'पाल तानना' और 'रावटी जाना' जैसे शब्द, इन मेलों से निकले हैं। रात्रिकालीन मेलों का उत्स अगहन में भरने वाले डुंगुल पहाड़ (झारखंड-जशपुर अंचल) के रामरेखा में दिखता है। इस क्षेत्र का एक अन्य महत्वपूर्ण व्यापारिक आयोजन बागबहार का फरवरी में भरने वाला मेला है।

धमतरी अंचल को मेला और मड़ई का समन्वय क्षेत्र माना जा सकता है। इस क्षेत्र में कंवर की मड़ई, रूद्रेश्वर महादेव का रूद्री मेला और देवपुर का माघ मेला भरता है। एक अन्य प्रसिद्ध मेला चंवर का अंगारमोती देवी का मेला है। इस मेले का स्थल गंगरेल बांध के डूब में आने के बाद अब बांध के पास ही पहले की तरह दीवाली के बाद वाले शुक्रवार को भरता है। मेला और मड़ई दोनों का प्रयोजन धार्मिक होता है, किन्तु मेला स्थिर-स्थायी देव स्थलों में भरता है, जबकि मड़ई में निर्धारित देव स्थान पर आस-पास के देवताओं का प्रतीक- 'डांग' लाया जाता है अर्थात्‌ मड़ई एक प्रकार का देव सम्मेलन भी है। मैदानी छत्तीसगढ़ में बइगा-निखाद और यादव समुदाय की भूमिका मड़ई में सर्वाधिक महत्वपूर्ण होती है। बइगा, मड़ई लाते और पूजते हैं, जबकि यादव नृत्य सहित बाजार परिक्रमा, जिसे बिहाव या परघाना कहा जाता है, करते है। मेला, आमतौर पर निश्चित तिथि-पर्व पर भरता है किन्तु मड़ई सामान्यतः सप्ताह के निर्धारित दिन पर भरती है। यह साल भर लगने वाले साप्ताहिक बाजार का एक दिवसीय सालाना रूप माना जा सकता है। ऐसा स्थान, जहां साप्ताहिक बाजार नहीं लगता, वहां ग्रामवासी आपसी राय कर मड़ई का दिन निर्धारित करते हैं। मोटे तौर पर मेला और मड़ई में यही फर्क है।

मड़ई का सिलसिला शुरू होने के पहले, दीपावली के पश्चात यादव समुदाय द्वारा मातर का आयोजन किया जाता है, जिसमें मवेशी इकट्‌ठा होने की जगह- 'दइहान' अथवा निर्धारित स्थल पर बाजार भरता है। मेला-मड़ई की तिथि को खड़खड़िया और सिनेमा, सर्कस वाले भी प्रभावित करते थे और कई बार इन आयोजनों में प्रायोजक के रूप में इनकी मुख्‍य भागीदारी होती थी। दूसरी तरफ मेला आयोजक, खासकर सिनेमा (टूरिंग टाकीज) संचालकों को मेले के लिए आमंत्रित किया करते थे और किसी मेले में टूरिंग टाकीज की संख्‍या के आधार पर मेले का आकार और उसकी महत्ता आंकी जाती थी। मेला-मड़ई के संदर्भ में सप्‍ताह के निर्धारित वार पर भरने वाले मवेशी बाजार भी उल्लेखनीय हैं। मैदानी छत्तीसगढ़ की पृष्ठभूमि में व्‍यापारी नायक-बंजारों के साथ तालाबों की परम्परा, मवेशी व्यापार और प्राचीन थलमार्ग की जानकारी मिलती है। कई पुस्‍तकें ऐसे ठिकानों पर ही आसानी से मिल पाती हैं और जिनसे लोकरुचि का अनुमान होता है।
बस्तर के जिलों में मड़ई की परम्परा है, जो दिसम्बर-जनवरी माह से आरंभ होती है। अधिकतर मड़ई एक दिन की ही होती है, लेकिन समेटते हुए दूसरे दिन की 'बासी मड़ई' भी लगभग स्वाभाविक अनिवार्यता है। चूंकि मड़ई, तिथि-पर्व से संलग्न सप्ताह दिवसों पर भरती है, इसलिए इनका उल्लेख मोटे तौर पर अंगरेजी माहों अनुसार किया जा सकता है। केशकाल घाटी के ऊपर, जन्माष्टमी और पोला के बीच, भादों बदी के प्रथम शनिवार (सामान्यतः सितम्बर) को भरने वाली भंगाराम देवी की मड़ई को भादों जात्रा भी कहा जाता है। भादों जात्रा के इस विशाल आयोजन में सिलिया, कोण्गूर, औवरी, हडेंगा, कोपरा, विश्रामपुरी, आलौर, कोंगेटा और पीपरा, नौ परगनों के मांझी क्षेत्रों के लगभग 450 ग्रामों के लोग अपने देवताओं को लेकर आते है।
भंगाराम देवी प्रमुख होने के नाते प्रत्येक देवी-देवताओं के कार्यों की समीक्षा करती है और निर्देश या दंड भी देती है। माना जाता है कि इस क्षेत्र में कई ग्रामों की देव शक्तियां आज भी बंदी है। यहां के मंदिर का सिरहा, बंदी देवता के सिरहा पुजारी से भाव आने पर वार्ता कर दंड या मुक्ति तय करता है। परम्परा और आकार की दृष्टि से भंगाराम मड़ई का स्थान विशिष्ट और महत्वपूर्ण है।

मड़ई के नियमित सिलसिले की शुरूआत अगहन पूर्णिमा पर केशरपाल में भरने वाली मड़ई से देखी जा सकती है। इसी दौर में सरवंडी, नरहरपुर, देवी नवागांव और लखनपुरी की मड़ई भरती है। जनवरी माह में कांकेर (पहला रविवार), चारामा और चित्रकोट मेला तथा गोविंदपुर, हल्बा, हर्राडुला, पटेगांव, सेलेगांव (गुरुवार, कभी फरवरी के आरंभ में भी), अन्तागढ़, जैतलूर और भद्रकाली की मड़ई होती है। फरवरी में देवरी, सरोना, नारायणपुर, देवड़ा, दुर्गकोंदल, कोड़ेकुर्से, हाटकर्रा (रविवार), संबलपुर (बुधवार), भानुप्रतापपुर (रविवार), आसुलखार (सोमवार), कोरर (सोमवार) की मड़ई होती है।

संख्‍या की दृष्टि से राज्य के विशाल मेलों में एक, जगदलपुर का दशहरा मेला है। बस्तर की मड़ई माघ-पूर्णिमा को होती है। बनमाली कृष्णदाश जी के बारामासी गीत की पंक्तियां हैं-
''माघ महेना बसतर चो, मंडई दखुक धरा। हुताय ले फिरुन ददा, गांव-गांव ने मंडई करा॥'' बस्तर के बाद घोटिया, मूली, जैतगिरी, गारेंगा और करपावंड की मड़ई भरती है। यही दौर महाशिवरात्रि के अवसर पर महाराज प्रवीरचंद्र भंजदेव के अवतार की ख्‍यातियुक्‍त कंठी वाले बाबा बिहारीदास के चपका की मड़ई का है, जिसकी प्रतिष्ठा पुराने बड़े मेले की है तथा जो अपने घटते-बढ़ते आकार और लोकप्रियता के साथ आज भी अंचल का अत्यधिक महत्वपूर्ण आयोजन है। मार्च में कोंडागांव (होली जलने के पूर्व मंगलवार), केशकाल, फरसगांव, विश्रामपुरी और मद्देड़ का सकलनारायण मेला होता है। दन्तेवाड़ा में दन्तेश्वरी का फागुन मेला नौ दिन चलता है।
अप्रैल में धनोरा, भनपुरी, तीरथगढ़, मावलीपदर, घोटपाल, चिटमटिन देवी रामाराम (सुकमा) मड़ई होती है। इस क्रम का समापन इलमिड़ी में पोचम्मा देवी के मई के आरंभ में भरने वाले मेले से होता है।

मेला-मड़ई के स्वरूप में समय के कदमताल, परिवर्तन अवश्य हुआ है, किन्तु धार्मिक पृष्ठभूमि में समाज की आर्थिक-सामुदायिक आवश्यकता के अनुरूप इन सतरंगी मेलों के रंग की चमक अब भी बनी हुई है और सामाजिक चलन की नब्ज टटोलने का जैसा सुअवसर आज भी मेलों में मिलता है, वैसा अन्यत्र कहीं नहीं।

मेला के अलावा तालाब और ग्राम देवता, दो अन्‍य ऐसे विषय हैं, बचपन से ही जिनकी बातें करते-सुनते मेरा मन कभी नहीं भरता। वैसे तो मैंने तालाब तथा ग्राम देवता पर भी कुछ-न-कुछ लिखा है लेकिन यहां प्रस्‍तुत मेला सहित उन विषयों पर लिखा मेरा लेख हमेशा अधूरा, कच्‍चा-सा लगता है।

यह लेख मेरे द्वारा, 'अस्मिता शंखनाद' मासिक पत्रिका के फरवरी-मार्च-अप्रैल 2006 अंक मड़ई-मेला-पर्यटन के लिए अतिथि संपादक श्री राम पटवा और डॉ. मन्नूलाल यदु जी के कहने पर तैयार किया गया। इसके बाद यह विभिन्न स्थानों पर, ज्यादातर मेरी बिना जानकारी के और बेनामी, जिसमें विकीपीडिया भी है, इस्तेमाल हुआ। कुछ कद्रदानों ने इसे अपने नाम से भी छपा लिया, इन सभी योगदान को छत्‍तीसगढ़ की संस्‍कृति के प्रचार के रूप में देखता हूं, अतः किसी के प्रति कोई शिकायत नहीं, यह जिक्र इसलिए है क्‍योंकि यह एक प्रमुख कारण भी बना, अपनी लिखी नई-पुरानी सामग्री के साथ यह ब्लाग 'सिंहावलोकन' आरंभ करने का।

Tuesday, October 4, 2011

लोक-मड़ई और जगार

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सांस्कृतिक अस्मिता के गौरव-प्रदेश छत्तीसगढ़ में इस वर्ष (सन 2004) का नवम्बर-दिसम्बर माह एक विशेष संदर्भ में उल्लेखनीय है। छत्तीसगढ़ राज्य की चौथी वर्षगांठ पर राज्‍य स्‍थापना दिवस 1 नवंबर, राज्योत्सव से आरंभ होकर वैसे तो यह मड़ई-मेला और जगार का समय है, लेकिन लोक-मड़ई और जगार का जिक्र यहां उत्सव-मात्र के संदर्भ में नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ में लोक संस्कृति और परम्परा पर केन्द्रित प्रकाशन के गम्भीर प्रयासों के लिए है।

रावत नाच महोत्सव का आयोजन बिलासपुर के शनिचरी में पारंपरिक रूप से आयोजित होने वाले मातर-मड़ई का परिष्कृत रूप है। यह आयोजन रावत नाच महोत्सव समिति, बिलासपुर द्वारा प्रतिवर्ष किया जाता है। आयोजन समिति द्वारा महोत्सव के साथ 10वें वर्ष 1987 से 'मड़ई' पत्रिका का प्रकाशन आरंभ किया गया।

'मड़ई' के आरंभिक अंकों में अधिकतर यादव कुल की संस्कृति और परंपरा, रावत नाच और उससे संबद्ध विभिन्न पक्षों पर स्थानीय और आंचलिक लेखकों की रचनाएं हैं, किन्तु साल में एक बार प्रकाशित होने वाली इस निःशुल्क पत्रिका ने छत्तीसगढ़ की संस्कृति के विभिन्न पक्षों को गंभीरता से उजागर करने में धीरे-धीरे अपना महत्वपूर्ण स्थान बना लिया। आगे चलकर पत्रिका में छत्तीसगढ़ के अलावा अन्य क्षेत्रों से संबंधित लेख और लोक संस्कृति के महत्वपूर्ण अध्येताओं, विशेषज्ञों के लेखों का समावेश होने लगा और लोक संस्कृति पर गम्भीर विमर्श भी 'मड़ई' में प्रकाशित हुए।

'मड़ई' के ताजे 18वें अंक (वैसे इसे वर्ष-6, अंक-1 बताया गया है) का कलेवर पिछले अंकों से भिन्न है। इसका स्वरूप राष्ट्रीय लोक संस्कृति की पत्रिका का हो गया है, जिसमें देश के विभिन्न अंचल की लोक-सांस्कृतिक परम्पराओं से संबंधित लेख प्रदेशवार शामिल किए गए हैं और एक रचना 'वेस्‍टइंडीज की कविताएं' भी है, जिससे मड़ई का वितान अब छत्तीसगढ़ तक सीमित नहीं रहा, लेकिन मड़ई के अंकों में प्रकाशित छत्तीसगढ़ लोक संस्कृति की रचनाओं के कारण अब सुलभ न होने के बावजूद आरंभिक अंक पठनीय, उपयोगी और संग्रहणीय हैं। इस अंक के संपादक के रूप में डॉ. कालीचरण यादव और संपादन में डॉ. राजेश्‍वर सक्‍सेना के अलावा 10 और नाम हैं।

लोक मड़ई उत्सव समिति, आलीवारा, राजनांदगांव द्वारा 'लोक मड़ई' का प्रकाशन सन्‌ 2000 से आरंभ हुआ। प्रतिवर्ष प्रकाशित होने वाली यह निःशुल्क पत्रिका, उत्सव आयोजन के साथ जुड़ी है। पत्रिका के आरंभिक अंकों में लोक संस्कृति के विभिन्न वैचारिक पक्षों के साथ छत्तीसगढ़ की लोक-कला के कलाकारों, विधाओं, संस्कृति और शिल्प पर अंचल के महत्वपूर्ण हस्ताक्षरों की भागीदारी रही। 'लोक मड़ई' लगातार निखरती गई और 2002 के अंक से नई लीक पड़ी। इस अंक में स्फुट रचनाओं के साथ पत्रिका का महत्वपूर्ण भाग, 'विवाह' के सांस्कृतिक पक्ष पर पठनीय रचनाएं हैं।

'लोक मड़ई' का पिछले साल का अंक 'हरियाली' पर केन्द्रित रहा। ठेठ कृषक संस्कृति के त्यौहारों का विशिष्ट छत्तीसगढ़ी स्वरूप सावन अमावस्या की 'हरेली' जैसे एक विषय पर केन्द्रित पत्रिका का यह स्वरूप निःसंदेह अब अधिक उपयोगी हो गया है और इस वर्ष समिति के सदस्य और रचनाकारों के लगभग पूरे साल भर के उद्यम के परिणामस्वरूप पत्रिका का ताजा अंक तैयार हुआ है जो देश के विभिन्न अंचलों में प्रचलित प्रसिद्ध लोकगाथा जसमा ओड़न के छत्तीसगढ़ के अपने निजी लोकगाथा स्वरूप दसमत ओड़निन, 'दसमत कैना' पर एकाग्र है। इसकी तैयारी के पीछे की दृष्टि और मेहनत, अंक में स्वयं उजागर है।

जगार का तात्कालिक संदर्भ है कि बस्तर के पारंपरिक 'लछमी जगार' का आयोजन, इस वर्ष के अंतिम सप्ताह में कोण्डागांव क्षेत्र में खोरखोसा ग्राम में किया जा रहा है। एक सप्ताह तक चलने वाले इस जगार का सबसे महत्वपूर्ण अंश 'नारायण राजा और महालखी का विवाह' 30 दिसम्बर को दोपहर 12 बजे से रात 9 बजे तक चलेगा। बस्तर की लोक गाथाओं के गंभीर अध्येता श्री हरिहर वैष्णव द्वारा कराया जा रहा यह आयोजन अपने आपमें विशिष्ट है, क्योंकि यह संकल्प ऐसे व्यक्ति का है जो इस परंपरा के द्रष्टा ही नहीं, भोक्ता भी हैं।

प्रसंगवश बस्तर में तीन अन्य गाथाएं भी प्रचलित हैं- 'तिजा जगार' 'आठे जगार' और 'बाली जगार'। इस परिप्रेक्ष्य में 'लछमी जगार' की मौखिक परम्परा का लिप्यंतर और प्रकाशन का महत्वपूर्ण कार्य हुआ है। बस्तर की धान्य देवी की कथा 'लछमी जगार' का संक्षेपीकरण, अनुवाद, एवं संपादन हरिहर वैष्णव द्वारा सी.ए.ग्रेगॅरी के सहयोग से किया गया है। जिसके प्रकाशन में आस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी का सहयोग है।

इस ग्रंथ में पूरी गाथा को 4 खण्ड और 36 अध्यायों में समेटा गया है। ग्रंथ का परिचय हिन्दी और अंग्रेजी में है और गाथा हल्बी, हिन्दी व अंग्रेजी में समानान्तर रूप से तीन कॉलम बनाकर छापी गई है। ग्रंथ परिचय में जगार अनुष्ठान, उसके आयोजन भूगोल, गायक, वाद्ययंत्र, गीत, कथा, प्रतीक/मिथक, मूल्य और आनुष्ठानिक स्वरूप की चर्चा है। ककसाड़ प्रकाशन, सरगीपालपारा, कोण्डागांव जैसे अजाने से स्थान से प्रकाशित यह सचित्र ग्रंथ छत्तीसगढ़ में हो रहे गम्भीर, स्तरीय और सुरूचिपूर्ण प्रकाशन का मानक स्थापित करता है। बस्तर की संस्कृति और परम्पराओं के प्रलेखन-प्रकाशन में हरिहर वैष्णव द्वारा संपादित 'बस्तर का लोक साहित्य' भी विशेष उल्लेखनीय है, जिसमें मिथक, कथा, गीत, गाथा, मुहावरे और पहेलियां मूल रूप में हिन्दी अनुवाद सहित प्रकाशित हैं।

छत्तीसगढ़ की संस्कृति के अध्ययन और प्रकाशन के दौर में यह चर्चा इस क्षेत्र में हुए और हो रहे अन्य कामों को खारिज करने के लिए कतई नहीं है, बल्कि यह रेखांकित करने के लिए है कि छपाई आसान हो जाने के दौर में छत्तीसगढ़ की संस्कृति के कथित विशेषज्ञ और स्वयंभू दावेदारों के संख्‍या-बल, उस भीड़ और उसके दबाव में गुम होने से मुकाबिल कोशिशों में से कुछ-एक मड़ई, लोक मड़ई और जगार हैं।

टीप -
ब्‍लाग युग में लिखने, काट-छांट, फेयर करने, छपने भेजने, न छपने, रचना वापस आने- न आने का अनुभव कैसे हो। अपनी कहूं तो न छपने का अनुभव, छपने की तुलना में कम से कम दस गुना अधिक है। रचना न छपती, वापस आती, तो पहला हफ्ता संपादक को गरियाने में बीतता, अगले कुछ दिन 'जुगाड़ का जमाना है' पर विशद चर्चा होती, इसी तरह कोई महीने भर बाद ध्‍यान जाता कि रचना फिर से पढ़ ली जाए, तब ज्‍यादातर समझ में आ जाता कि संपादक का निर्णय गलत न था। फिर अक्‍सर रचनाएं फाड़ कर फेंक दी जातीं और कुछ मोहवश या यूं ही बची रह जातीं। अब ऐसा भी होने लगा है कि अपना लिखा कुछ, जो कहीं छपने लायक नहीं लगता लेकिन ब्‍लाग के लिए अनुकूल जान पड़ता है। रचना, किसे और कैसे भेजें, उसे ही क्‍यों यह भी प्रश्‍न होता और कुछ रचनाएं इस उधेड़बुन में भी छूटी रह जातीं। कम्‍प्‍यूटर पर लिखी, अब तक अप्रकाशित पड़ी रह गई यह समीक्षा, बस मोहवश, अब अपने ब्‍लाग पेज पर प्रकाशित करने की सुविधा के कारण इरादा बना कि इस्‍तेमाल कर ली जाए। बताने का एक कारण कि कई बार रचना तैयार होने के पहले समीक्षा-समीक्षक तय होते हैं लेकिन यहां अब कहने की जरूरत नहीं रही कि इन तीनों प्रकाशन से जुड़े लोगों से परिचित अवश्‍य हूं, पर कोई वादा नहीं था कि ऐसा कुछ लिखूंगा।