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Saturday, April 25, 2026

पलाश की तलाश - बेरास्ते एआइ

पलाश पर लिखना है। पहली चुनौती है कि न जाने कब से ‘पलाश‘ पर लिखा जाता रहा है, उस पर अब क्या ही लिखा जा सकता है, जो उस सबसे चाहे बेहतर न हो मगर कुछ अलग-सा तो हो। यों परंपरा भी रही है कि कुछ लिखने-करने के पहले मंगलाचरण हो, देव-पूर्वजों, पूर्वाचार्यों का स्मरण कर लेना चाहिए। यह शायद इसलिए कि आप जो कहने जा रहे हैं, पहले कहे जा चुके से कुछ अलग और आगे की बात कहें, ‘वही ढाक के तीन पात‘ न हो, और अनूठा कहने के चक्कर में बेढंगा न हो जाए, कुछ सार्थक भी हो। इसके लिए पहले जरूरी है कि कब-किसने क्या-क्या कहा है, पता कर लें, मुश्किल यहीं से शुरू होती है। इस पर याद आया कि यह भी तो कहा गया है कि मुश्किल जहां से पैदा हो, हल भी वहीं से निकलता है, तो ...

असमंजस है, मंगलाचरण क्या हो, कैसे करें? कालिदास के ‘कुमारसंभवम्‘ का आरंभ होता है- ‘अस्त्युत्तरस्यां दिशि ...‘ इसमें कहां है मंगलाचरण। संस्कृत पंडितों की बात निराली। सवाल किया जाता है कि क्या मंगलाचरण के बिना भी महाकाव्य आरंभ किया जा सकता है? क्या कालिदास से चूक हुई? पंडित हल भी सुझा देते हैं- यहां एकशब्दीय ‘अस्ति‘ ही मंगलाचरण है। अस्ति यानी ईश्वर, क्योंकि ईश्वर के बाहर सब कुछ नास्ति है। और बात पलाश की, तो इस महाकाव्य में उन्हें पलाश, बालचंद्र के समान वक्र और अतिलोहित लाल दिखता है। फिर हमारा मंगलाचरण? क्या परवाह, यह तो फुटकर लिखावट है, कोई उदार समीक्षक भूले-भटके इसे ही ‘ललित निबंध‘ ठहरा दे तो उसकी जै-जै। फिर भी आग्रह हो, कोई ढूंढने पर ही उतारू हो जाए तो पंडितों पर भरोसा कि पलाश भी एकशब्दीय मंगलाचरण साबित हो सकता है।

सोचा, पता करूं, वेदों में ‘पलाश‘ पर क्या कहा गया है? लेकिन क्या वेदों में पलाश शब्द आया होगा। वैदिक कवि इस शब्द से, इस पेड़ और फूल से परिचित थे? ऐसा तो नहीं कि वे इसे ‘किं-शुक‘ कहते रहे हों। ढाक या टेसू, जैसा देशज तो नहीं कहते रहे होंगे। ढाक, सुनते ही लगता है कि पलाश को इस नाम से जानने-पुकारने वाले ने या तो इसके पेड़ को देखा है या फल को और ‘वही ढाक के तीन पात‘ कहते उसका ध्यान गया है पत्तों पर। उसने फूल खिला पलाश देखा होता तो ‘टेसू‘ जैसा ही कुछ नाम देता। मगर फूल तो मौसमी है- ‘कूलन में केलिन में..‘ बसंत हमेशा तो नहीं बगरा रहता। ढाक और टेसू शब्द कहां से आते हैं, तलाश के लिए सूत्र पकड़ कर आगे बढ़ सकते हैं कि दोनों शब्दों में ‘ट‘ वर्ग है, लेकिन बस अटकना है। बहकना-भटकना, जहां-तहां मुंह मारना और बात-बेबात सिर घुसेड़ना समीचीन नहीं, अस्तु ...

पूर्ववर्तियों को याद करता चलूं, शायद कोई बात बने। पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, न कि ‘पद्मलाल-पन्नालाल‘, उन्होंने अपने इस तरह नाम पर भी निबंध लिखा है। हमने स्कूल के दिनों में उनका निबंध पढ़ा था- ‘क्या लिखूं?‘। मन ही मन मदद की गुहार, वह याद करता हूं। निबंध आरंभ होता है- ‘मुझे आज लिखना ही पड़ेगा ...‘ कहते हुए बताते हैं कि ‘दूर के ढोल सुहावने‘ और ‘समाज सुधार‘ पर निबंध लिखना है ... उनकी बात यहां से शुरू हो कर, आगे ‘क्या खूब‘ होते कहां से कहां पहुंच जाती है। अब सोचता हूं कि क्या उन्होंने इस निबंध में यह भी कहना चाहा है कि समाज-सुधार पर बात दूर के ढोल की तरह हैं, इसे अपनी ढपली अपना राग की तरह गाने-बजाने से काम नहीं बनता, इसके लिए कुछ सकारात्मक-सार्थक करना होता है। तो ऐसा न हो कि पलाश पर साहित्य रच, प्रकृति-प्रेम यहीं तक सिमट कर रह जाए।

कबीर कहते हैं- ‘मसि कागद छुयौ नहीं, कलम गह्यौ नहीं हाथ‘, अब कौन मसि-कागद-कलम छूता है, अब ‘कलम के सिपाही‘, कम से कम शाब्दिक रूप में तो अप्रासंगिक ही हो गए। टच-स्क्रीन मोबाइल और ‘स्पीच टू टेक्स्ट‘ के बाद यों की-बोर्ड भी, बीती बात हो रहा है। दूसरी तरफ कुछ सोचने-याद करने या किताबें पलटने के पहले एआइ-एलएलएम ललचा रहा है, ‘मैं हूं ना‘ की तरह हर मौके पर साथ देने को तैयार, मगर डिस्क्लेमर के साथ कि ‘एआई गलत जानकारी दे सकता है, इसलिए, इसके जवाबों की दोबारा जांच कर लें‘। अब कुछ लिखना हो तो यह भी ध्यान रखना होता है कि ऐसा क्या लिखे जो एआइ के लिए संभव न हो। चोर-मन, एआइ की याद दिलाता रहता है। इस पर सोचा कि उसे कमांड क्या दूंगा- शायद यह कि ‘मुझे पलाश पर लेख लिखना है, इसके समानार्थी शब्द बता दो, वे शब्द मुख्यतः कहां-कहां इस्तेमाल हुए हैं, यह भी बता दो और यह भी बता दो कि सर्च के लिए इसके अलावा ‘की-वर्ड‘ क्या होगा, यानि यह भी बता दो कि मैं क्या पूछूं‘। अनुमान कर रहा हूं कि ‘वाल्मीकि, व्यास, कालिदास, भारवि ...‘ आदि तो बता ही देगा। फिलहाल, अपनी यादों की उधेड़बुन के सहारे ...

कबीर-पलाश के साथ हजारी प्रसाद द्विवेदी के ललित निबंधों की युति स्वाभाविक है। रामचंद्र शुक्ल के तुलसी तो हजारी प्रसाद द्विवेदी के कबीर। द्विवेदीजी की ललित लेखनी, आम-अशोक से ले कर कुटज पर तक चली है, फिर क्या पलाश उनसे छूटा रह गया। छूटा तो नहीं, मगर वे पलाश के लिए कबीराना हो गए। उन्हें ‘शिरीष के फूल‘ के साथ पलाश और उससे जुड़ कर कबीर-वाणी याद आ जाती है- ‘दिन दस फूला फूलि के, खंखड़ भया पलास‘। फिर ‘बसन्त आ गया है‘ में मानो सांत्वना देते कहते हैं ‘पलाश ऐसा फूला है कि ईर्ष्या होती है।‘ धुंधली सी याद विद्यानिवास मिश्र के निबंध की, जिसमें विंध्य के दिनों के साथ ‘पलासनि ...‘ लिखा है, तब पढ़ते हुए लगा था कि हजारी प्रसाद द्विवेदी ने इसे इन्हीं के लिए छोड़ रखा था। फिर सोचता हूं कि ऐसी क्या बात है कि वसंत-वनशोभा वाले इस वृक्ष का दंड ब्रह्मचारी धारण करते हैं। अब इन सब से बचते-बचाते आगे बढ़ना है। ध्यान रखना है कि अप्रासंगिक-सा होने लगे तो ललित निबंध बता देने पर बात बन सकती है, बशर्ते कुछ लालित्य हो, ललित के नाम पर ‘गलित-पलित‘ न हो।

कभी बड़ौदा गया था, वहां जिन सज्जन से मेरी पहली मुलाकात हुई, उन्हें मैंने अपना नाम-परिचय बताया, ‘राहुल‘, वे गर्मजोश मुस्कान सहित हाथ मिलाते हुए बोले- ‘आई एम केतुल, वेलकम!‘, कुछ खिसियानी कुछ मुस्कानी, मैंने पूछा आप कवि हैं?, तुक अच्छा मिला लेते हैं, राहुल-केतुल। बातचीत होने लगी, पता लगा कि यह नाम गुजरात में आम है, मैंने यह नाम पहली बार सुना था। वे पंडित निकले, राहु-केतु पर बात होने लगी। उन्होंने पूछा, आप पुरातत्व, मूर्तिविज्ञान से जुड़े हैं, आप ‘पलाशपुष्पसंकाशं‘ से परिचित नहीं हैं? प्रसिद्ध नवग्रह स्तोत्र में केतु का रंग, पलाश पुष्प जैसी कांति वाला, लाल कहा गया है। मैंने अपनी नासमझी पर परदा डालने मौका निकाला कि मंदिरों के प्रवेश-द्वार में सिरदल के नवग्रह पट्ट पर राहु-केतु को तो देखा है, किंतु पाषाण-कृति होने के कारण मेरा ध्यान उनके अंग-लक्षण, आकार-बनावट तक सीमित रहा। फिर पलाश के लाल को लाल कहना भी कोई कहना हुआ! बानगी स्वरूप पेश, कुन्तक (वक्रोक्तिजीवित में) अपने प्रयत्न की उपादेयता प्रतिपादित करते हुए कहते हैं- ‘यथातत्त्वं विवेच्यन्ते भावास्त्रैलोक्यवर्तिनः। यदि तन्नाद्भुतं नाम दैवरक्ता हि किशुकाः।।‘ त्रिलोकी में स्थित पदार्थों का यदि यथातथ्य रूप में विवेचन किया जाता है तो उसमे अद्भुतता नहीं होगी क्योकि किंशुक तो स्वभावतः लाल हुआ ही करता है (अतः यदि कवि यह वर्णन करे कि किंशुक लाल होता है तो उसे हम अ‌द्भुत न होने के कारण साहित्य या काव्य नहीं कहेंगे)।

पलाश/पलास, टेसू या रक्तपुष्प, इस पेड़ और फूल दोनों के लिए कहा जाता है पर किंजुल, किंशुक, केसू सामान्यतः फूल को कहा जाता है, इसी तरह पेड़ के लिए नाम मिलता है- काष्ठद्रु, ढाक, छिवला, त्रिपर्ण, ब्रह्मद्रुम और यूप्य। रोचक कि पत्र-पत्ता यानी ‘पर्ण‘ शब्द भी पलाश का समानार्थी है। इसके वनस्पति वैज्ञानिक नाम ‘ब्यूटिआ मोनोस्पर्मा‘ नाम में मोनोस्पर्मा तो समझ में आता था कि इसकी फली एकल-बीजी है, लेकिन ब्यूटिआ को ब्यूटी, सुंदर ही मानता था। पता चला कि यह अंगरेज वनस्पति विज्ञानी, जॉन स्टुअर्ट, अर्ल द ब्यूट से आया है, एकबारगी मन उदास हुआ, कुछ अपनी नासमझी, गलतफहमी पर और उससे कुछ अधिक यह जान कर कि ब्यूटिआ, ब्यूटी नहीं ब्यूट है, फिर याद कर लिया कि नाम में क्या रखा है, नाम-रूप से गुण-भाव तो नहीं बदल जाते। और क्या नाम भी नहीं बदल जाते, बातचीत में एक साथी आपत्ति कर रहे हैं ‘ब्यूटिआ मोनोस्पर्मा‘ नहीं ‘ब्यूटिआ फ्रोंडोसा‘। बस यह ध्यान रहे कि पलाश ‘फारेस्ट फायर‘ नहीं है, ‘फ्लेम ऑफ द फारेस्ट‘ है, पंचतत्व, महाभूतों में से एक। कवि नरेन्द्र शर्मा फागुनी-बसंती हो, लिखते हैं- ‘लग गयी आग; बन में पलाश, नभ में पलाश, भू पर पलाश। लो, चली फाग; हो गयी हवा भी रंगभरी छू कर पलाश।‘ अज्ञेय का ‘टेसू‘ भी कहता है- ‘इस वनखंडी में आग लगा दूं।‘ 

कभी बांग्ला गीत सुना था, जिसमें सीधे कमलनयन या पद्मलोचन के बजाय कहा गया है- ‘दाओ दरशन पद्म-पलाश लोचन‘। पलाश-लोचन यानि?, सोच में पड़ गया हूं- आंखें, मृगनयनी, खंजन-नयन या जैसा किसी ताम्रपत्र उत्कीर्ण लेख में आता है- ‘चकोरनयनं लिखितं सुवाक्यैः‘, और आंखें सिर्फ नेत्र-गोलक ही तो नहीं हैं, नीली, फीरोजी, बिल्लौरी, कजरारी आंखों के साथ भौंह/पलक, बरौनी!, किसे जोड़ कर कहा गया होगा पलाश-लोचन!, भेद नहीं पाता तब ‘संवेदनात्मक ज्ञान‘ से ‘ज्ञानात्मक संवेदना‘ की ओर बढ़, भाव में उतर गुनगुना सकते हैं?- ‘हमको तो जान से प्यारी हैं पलाशी आंखें!‘ बुद्धि तो काव्य-रस में बाधक हो जाती है- किसी कवि ने पलाश को मानों गुलाब के टक्कर में खड़ा कर रहा हो, कहता है- ‘जब जब मेरे घर आना तुम, फूल पलाश के ले आना तुम‘। ओ कवि! ऐसा कह कर तो तुम रास्ता ही बंद कर दे रहे हो, पलाश तो ‘दिन दस फूला ...‘ है।

रामविलास शर्मा नाम से आगरा वाले आलोचक पर ही ध्यान जाता है, उन्होंने कविताएं भी लिखीं, ‘तार सप्तक‘ के कवि हैं, यद्यपि उन्होंने कहा था- ‘पता नहीं कविता पढ़ कर अपरिचित मित्र मेरे बारे में किस तरह की कल्पना करेंगे। मैं उन्हें एक बात का आश्वासन देना चाहता हूं,- जैसे वे मेरी कविताओं के बारे में ‘सीरियस‘ नहीं हैं, वैसे मैं भी नहीं हूं।‘ फिर इसी नाम के साथ कभी दो कविता, ‘छत्तीसगढ़ की शाम‘ मिली थीं, उसी के साथ एक कविता ‘टेसू फूले भी थी। अनुमान हुआ यह कोई अन्य रामविलास शर्मा, प्रकृति का चितेरा कवि है। उनकी खोज-खबर मिली कि शायद मालवा निवासी थे, स्टेट ट्रांसपोर्ट वाले। लाल बस, स्टेट ट्रांसपोर्ट के कुछ बुजुर्ग परिचित बताने लगे कि 1963 में सड़क परिवहन के राष्ट्रीयकरण से मध्यप्रदेश राज्य परिवहन निगम बना, जो पूर्ववर्ती ‘मध्यभारत रोडवेज‘ और ‘सीपी ट्रांसपोर्ट सर्विसेज‘ के एकीकरण का परिणाम था। ये रामविलास मध्यभारत रोडवेज होते मध्यप्रदेश राज्य परिवहन निगम में आए, डिपो मैनेजर रहे। वे छत्तीसगढ़ में रहे या आना-जाना रहा। पिछली सदी के सातवें-आठवें दशक के भोपाल के साहित्यिक-सांस्कृतिक माहौल के लिए विश्वसनीय स्रोत डॉ. सुशील त्रिवेदी हैं, उन्होंने याद किया कि ये रामविलास शरद जोशी के करीबी थे, भगवत रावत, सोमदत्त गर्ग और घनश्याम ‘मधुप‘ के साथ होते थे। उनका संग्रह ‘कविता में सुबह‘ 1978 में साहित्य परिषद भोपाल से छपा था, तब चर्चित था, अब शायद ही कोई याद करता है। नाम पर अटक-भटक कर फिर पलाश पर आएं, उनकी कविता ‘टेसू फूले‘ की पंक्ति है- ‘अंग अंग में टेसू फूले, आँखों में रंगीन सपन‘। मित्र महेश भोपाल के दिनों को याद करते रहते हैं। वे ‘प्राच्य निकेतन‘, बिरला मंदिर के सहपाठी, वहां तब पर्यटन की भी पढ़ाई होती थी। इसी क्रम में बात निकली मध्यप्रदेश पर्यटन के होटल ‘पलाश‘ की। मैंने पर्यटन मंडल के अधिकारी से पूछ लिया था, कि क्या ऐसे पर्यटक-सैलानी भी आते हैं, जो पूछते हों कि ‘पलाश‘ क्या होता है। वे मुस्कुराए, होटल आने का न्योता दिया और पहुंचने पर होटल के सामने, परिसर में लगा पलाश का पेड़ दिखाया। कहा, सिर्फ नाम का नहीं, यहां सचमुच पलाश है और अंदर फागुनी-बासंती माहौल भी।

1757 वाली प्लासी की लड़ाईं के साथ देश का इतिहास तो बदला ही, पश्चिम बंगाल के पलाश-बहुल स्थान के नाम ‘पलाशी/पलासी‘ को भी बदल कर प्लासी हो गया। अब शेखर बंद्योपाध्याय की किताब के अंग्रेजी मूल में शीर्षक Plassey है, मगर उसके हिंदी अनुवाद ‘पलासी से विभाजन तक‘ में वह वापस आया है। छत्तीसगढ़ में पचासों गांव होंगे, जिन्हें पलाश/परसा से नाम मिला है। सिर्फ ‘परसा‘ नामधारी गांव तो हैं ही, परसाही, परसहा, परसदा भी कई-कई हैं। इसके अलावा परसा के साथ पानी, मुड़ा, बुड़ा, पारा, टोला, पाली, गुड़ी, डीह, खोर, खोल, खोला, भांठा, कांपा जैसे प्रत्यय जुड़ कर गांवों के नाम बने हैं। इनमें एक नाम परसाभदार भी है। गांव न बस पाया हो, गांवों के साथ जुड़ा ‘परसाभदेर‘ भूखंड अब भी सुनने मिल जाता है।

छत्तीसगढ़ में भदार/भदेर, परसा के समूह वाले इलाके के लिए कहा जाता है, ज्यों आम की अमरइया, महुआ की मउहारी, बांस की बंसवार, कउहा का रवार या बोइर का खोर। मेरे गांव का दक्षिणी भाग, जो सीमेंट फैक्ट्री आ जाने के कारण सीसीआइ भांठा कहलाने लगा, परसाभदेर था। भरकहा-भांठा, जहां परसा बहुतायत में, कहीं-कहीं बनबोइर और मकोइया। आजादी के बाद तक यहां कृष्णसार मृग होते थे, और आसपास हुम्मा यानी ग्रेट इंडियन बस्टर्ड भी। तीतुर, भठतीतुर, लमहा और कभी-कभी बरहा अब भी दिख जाते हैं। औषधीय उपयोग और उसके लाभ से कोई भी वनस्पति अछूती नहीं, फिर पलाश की क्या बात। औषधि रूप में प्रयोग और उससे लाभ-हानि का जिम्मा लेने से बचते, इसे गूगल के मत्थे छोड़ आगे बढ़ें। एक तरफ यज्ञ के लिए हवन-श्रुवा तो गंवई जीवन में दोना-पत्तल बनाने के लिए परसा के पत्ते और चूना-पोताई के लिए परसा-जरी की कूंची काम आती रही। पलाश की जड़ से निकाली रस्सी- ‘बांख‘, हल-नांगर का नहना-जोता के अलावा सुहाई, सींका के भी काम आती थी। और होली के लिए टेसू-फूलों से रंग बनाने का उद्यम, मेरे हमउम्र बचपन में अधिकतर ने किया है।

आधी सदी पुराने दिन। जांजगीर निवासी ख्यातनाम अधिवक्ता विजय कुमार दुबे जी ने हमें स्कूल में विज्ञान पढ़ाया, उनका स्नेह यथावत है। फोन पर प्रणाम कर लेता हूं। सुयोग बना है उनसे आशीर्वाद लेने का। उनका ललित निबंध संग्रह ‘पलाश‘ (सन 1993) है। पर्यावरण से प्रेरित इस संग्रह में विद्यानिवास मिश्र, प्रधान सम्पादकः नवभारत टाइम्स का संदेश प्रकाशित है, जिसमें वे लिखते हैं कि ‘... हर निबंध को सहज प्रकृति के सौंदर्य और उस सौंदर्य के मनुष्य मन पर पड़ते प्रभाव इसमें ऐसा अंकित है कि प्रकृति मनुष्य से अलग दिखाई नहीं पड़ती।‘ संग्रह में ‘टप टप टपके महुआ, मेरी धरती कहां गई, यह धरती कितना देती है, बह रहे जहां उन्चास पवन, माटी कहे कुम्हार से‘ जैसे पर्यावरण पर आधारित निबंध हैं। रचनाकार ने इन निबंधों के लिए कहा है कि ‘... पलाश के इन अनिंद्य पुष्पों को लोक-मानस की पूजा में समर्पित ...‘ मानों प्रकृति और पर्यावरण पर आधारित सारे निबंधों के लिए एक शब्द में पर्याय ‘पलाश‘ ही हो सकता है।

‘धर्मयुग‘ 19 मार्च 1978 के अंक में कैलाश गौतम की कविता ‘फागुनी दोहे‘ छपी, हमलोगों ने पढ़ी और रट ली। इसके दसेक साल बाद वे मल्हार आए, अपने मित्र रामप्रताप सिंह ‘विमल‘ जी के बुलावे पर, तब यह उनसे प्रत्यक्ष सुनी, इन दोहों में आम के बौर, कचनार, गुलमोहर, महुआ तो है, पलाश नहीं। मगर उनकी एक अन्य कविता में पलाशी फगुनाहट इस तरह है- ‘भीतर से खिड़कियाँ खुलेंगी, बौर आम के महकेंगे/ आंच पलाशों पर आयेगी, सुलगेंगे कुछ दहकेंगे/ घर का महुआ रंग लाएगा, चूना जैसे पान में। ‘कैलाश गौतम के ‘फागुनी दोहे‘ का पहला दोहा है- ‘लगे फूंकने आम के बौर गुलाबी शंख, कैसे रहें किताब में हम मयूर के पंख‘। ऐसी ही बात कही जाती है- ‘अबकी बिछड़े तो मुमकिन है ख्वाबों में मिलें, जैसे सूखे हुए कुछ फूल किताबों में मिले‘ इसी तर्ज पर अपनी पत्र-डायरी में पुराने मगर अब भी ताजा कुछ पलाश-स्मृतियां जतनी हुई हैं- 

दिनांक 23-2-1988 - ताला में धीरे-धीरे पलाश फूलने लगे हैं, दोपहर की चुभती धूप में नदी की ओर पहुंच जाने पर खिलते जा रहे पलाश और नदी में बनती उनकी परछाईं देखकर धूप की तेजी महसूस नहीं होती और पूरे वातावरण में भोर की खिलती धूप जैसी लालिमा बिखरती दिखाई देती है - होली की शुभकामनाएं।

दिनांक 3-3-1988 - ताला का नजारा अब कुछ तेजी से बदलने लगा है। पलाश खिलने में भी तेजी आ गई है, चारों ओर खुशी की लाली छाने लगी है। रास्ते में सेमल के सूखे बेजान से पेड़ों पर बड़े-बड़े लाल फूल लगे हैं और कुछ नीचे भी टपकने लगे हैं, जो हमसे जल्दी संवेदना ग्रहण कर बता रहे हैं कि वातावरण में गरमी घुलने लगी है। आम के बौर का तो हाल ही मत पूछो। महुआ के भी फूल आ गए हैं और हवा में इनकी गंध भी घुल गई है।

दिनांक 17-3-1988 - लगभग दस दिन पहले बिलासपुर से अम्बिकापुर के रास्ते में और अम्बिकापुर से यहाँ (डीपाडीह) आते हुए रास्ते में सेमल के पेड़ों को देख रहा था। लकादक फूलों से भरे पेड़। 7-8 फुट से 40-50 फुट तक के पेड़। सभी पर मस्ती का वही आलम। सेमल का पेड़ ध्यान से देखा है? बिना पत्तों के कांटेदार तो कभी उबड़-खाबड़ तनों वाले लम्बे-ऊंचे पेड़। एकदम सूने-सूने से, पर मनहूस नहीं और इनके फूलों को देखकर लगता था कि यह ला‌ली पूरे पेड़ की, साल भर की शुष्कता को अचानक प्रकट करने लगी हो, लगने लगता कि सेमल सिर्फ पेड़ ही नहीं पूरा का पूरा जिन्दा चरित्र है। अपने इस कमरे से साइट तक जाते हुए भी रास्ते में सेमल का एक ऊँचा पेड़ है, पर अब उसके सब फूल झड़ गये हैं, सेमल ने जैसे फिर से मानो मौन धारण कर लिया हो। यह मंभीरता उसके फलों के कारण भी हो सकती है, फल या सृजन के संग गंभीरता तो आती ही है। (दहकते दोपहर का फ्लेम आफ द फारेस्ट- ‘किं शुक?’ शुक जैसा। मगर इस मौसम में सेमल पर भी शबाब है और उसके फूल झड़ने के बाद हरे तोते की तरह फल लटकने लगते हैं, जो गरमी बढ़ने पर बिखर, फाहे बन उड़न-छू हो लेंगे।)

दिनांक 30-3-1988 - कल (बिलासपुर से डीपाडीह) रास्ते में आते हुए खूब पलाश के फूल दिखे। अभी बेतहाशा खिले हैं और नीचे झड़ने भी लगे हैं। जादुई चांदनी रात, जंगल के बीच में इनकी लाली देख कर लगता है कि जैसे पूरे जंगल पर सुहाग बगर गया हो - वनश्री सुहागन हो गई हो ... नटखट बसंत ने मांग भरते सिंदूर बिखरा दिया हो ... मंगलमय सुंदरता का झीना आवरण।

हाजिर नाजिर, ‘अकलम-खुद‘ यह लेखन, स्मृति-जन्य विभिन्न संदर्भों युक्त मौलिक, एआई मुक्त है। यह अवश्य संभव है कि इस लेख के ऑनलाइन होने के बाद यह एलएलएम-कंटेट बन कर, एआइ को समृद्ध करे। तो जैसी परंपरा मंगलाचरण की है, वैसी ही समापन पर कामना- ‘बेबी बूमर्स‘ पीढ़ी के इस अकलतरावासी, इन दिनों ‘प्रमुख, धरोहर परियोजना, बायोडायवर्सिटी एक्सप्लोरेशन एंड रिसर्च सेंटर‘ की ओर से- ‘जा एआइ, पलाश तेरी वंश-वृद्धि में सहायक हो, बाल-बच्चे सुखी रहें, तूने जेन-जी की सोच बदली, वे तेरी हैसियत बदल कर अल्फा-बीटा पैदा कर रहे हैं, गामा, डेल्टा, पाई होते ओमेगा से भी आगे निकल जाएं, एल्फाबेट, अलिफ-बे और अपना ककहरा भी जानें। पलाश की आवाजाही बरास्ते मन, साहित्य में, रन-बन में भी बनी रहे। स्क्रीन से बाहर मौसम न हो तो भी चित्त में पलाश की लहक-बहक रहे।
-राहुल कुमार सिंह

पुनश्च- 

आदरणीय सतीश जायसवाल जी का संदेश तथा प्रत्यक्ष में हुई चर्चा के तारतम्य में यह लेख लिखा गया है। सतीश जी का संदेश इस प्रकार था- 

पलाश : दृश्य में, संवेदनाओं में! एक गद्य संचयन की योजना ... 

पलाश अदम्य जिजीविषा का ग्रीष्मकालीन फूल है। धूप जितनी प्रखर होती है पलाश उतना ही दमकता है। सूर्य को चुनौती देता है। यह जितना जंगली है उतना ही घरेलू भी है। घर के आंगन तक चला आता है। पलाश पेंटिंग्स में मिलता है, फोटोग्राफी में मिलता है। इसके पौराणिक संदर्भ हैं। तो इससे जुड़ी कथा, किंवदंतियां भी जनजातीय समाज में व्याप्त हैं। औषधीय गुणों के साथ साथ लोक व्यवहार में भी पलाश के उपयोग बताए जाते हैं। 

पलाश को कविता में अच्छा विस्तार मिला है लेकिन गद्य में इसकी जरूरत है। एक सुगठित कथेतर में इस जरूरत के अनुकूल होगा। इसे ध्यान में रखकर एक संचयन की योजना आपके सामने रख रहा हूं। आपसे एक आलेख का आग्रह है। सामान्य तौर पर अढ़ाई, तीन हजार शब्दों को एक आलेख के लिए आदर्श माना जाता है। लेकिन "पलाश" की अपनी जरूरत और आपके मन का फैलाव शायद इस सीमा के बाहर भी जा सकता है। अलबत्ता हमारे पास समय की थोड़ी बंदिश होगी। ... 

इस पर मेरी अपनी मौज- हजारी प्रसाद द्विवेदी कहते हैं- जो कोई भी लिखता-पढ़ता है वह कर्मणा ब्राह्मण है। यहां सतीश जी ने लिखने को कहा है, लिख कर कर्मणा ब्राह्मण बनने का अवसर दिया है। आगे वे यह भी कह देते हैं कि दूसरे के इशारे पर कलम घसीटते हैं वे ‘शूद्र‘-ब्राह्मण हैं और खुद को इसी श्रेणी में रखते हैं। सतीश जी के इशारे पर लिखना और पंडित जी का फैसला, एक तरफ ब्राह्मण बनने का मौका दूसरी तरफ शूद्र ही सही, पंडितजी की जमात में शामिल, कौन शिरोधार्य न कर लेगा।

Tuesday, February 20, 2024

निगम सर को पत्र-1986

1986 का साल। तब न मेल, न मोबाइल। पत्र माध्यम होता था, अब लगता है कि ‘वे दिन भी क्या दिन थे‘ आदरणीय डॉ. लक्ष्मीशंकर निगम (पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर में विभागाध्यक्ष रहे, श्री शंकराचार्य व्यावसायिक विश्वविद्यालय, भिलाई के संस्थापक कुलपति), जिन्हें संबोधित यह पत्र है, बस इतना ही कहना है कि उनसे जितना पाठ-मार्गदर्शन कक्षा में मिलता था, शासकीय सेवा के दौरान मिलता रहा और अब भी मिलता रहता है। और खास कि यह पुर्जानुमा यह कागज उनके पास सुरक्षित था, उन्होंने मुझे वापस सौंप दिया। आगे पत्र का मजमून, जो अपना बयान खुद है-

आदरणीय गुरुदेव,

व्यग्रता के फलस्वरूप इस कागज पर पत्र लिख रहा हूँ, प्रथम समाचार ताला से प्रतापमल्ल का ताम्बे का एक सिक्का मिला है, ऐसे सिक्के बालपुर और संभव है अन्य sites से भी मिले हों.
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दूसरा यह कि पीछे मुण्डेश्वरी मंदिर का plan है जिसमें नीली स्याही से regular lines वाला हिस्सा वास्तविक plan है, पेन्सिल से भरा हिस्सा, एक तरफ मात्र दिखाई गई दीवाल है, जबकि काली स्याही से बनाई गई टूटी रेखाएँ extension हैं, जिनके द्वारा इस मंदिर को भी ताराकृति भू-योजना बनाने के इरादे में हूँ, निःसंदेह आपकी स्वीकृति एवं अनुमति के बाद, मंदिर का काल भी इधर के ‘कोसली‘ के कालों का ही है, अंतर यह है कि इनमें बाहिरी भाग पर plan है, मुण्डेश्वरी में भीतरी भाग पर, जैसा नीचे चित्र से स्पष्ट है। जोना विलियम्स ने कुछ अन्य प्रकार से इसे अष्टकोणीय, ताराकृति, पंचरथ, आदि कहते हुए एक अन्य नाम कश्मीर के ‘शंकराचार्य‘ का दिया है. 

कोसली → मुंडेश्वरी 

मेरे extension हेतु सचिवालय की विशेष सहृदयता देखने को मिली, और उन्होंने बहुत सामान्य से प्रयास के फलस्वरूप स्वतः ही 8.10.86 से अर्थात् लगभग 15 दिनों पूर्व extension order भेज दिया वह मुझे मिला, पिछले दिनों ही. इसमें आगे के लिए सुरक्षित मार्ग क्या हो सकता है, इसकी राय के लिए में स्वयं रायपुर उपस्थित होऊंगा, आपका मार्गदर्शन मूल्यवान होगा. 

इसी बीच आपका पत्र मिला, इसके लिए किसी टिप्पणी की स्थिति में मैं स्वयं को नहीं समझता, इतनी अतिरिक्त सूचना और देना चाहता हूँ कि इन सिक्कों पर जिस प्रकार का चक्र बनाया गया है ठीक वैसा ही, उतना ही सुन्दर colour polished terracotta चक्र हमलोगों को ताला से प्राप्त हुआ है, मैं उसके फोटोग्राफ व आकार आदि आपको लिख भेजूंगा, paper पढ़ने के समय आप वह भी प्रदर्शित कर सकते हैं या जिस तरह से आप उपयोगी मानें. 

श्री नगायच जी व आपको संयुक्त दीपावली शुभकामना नगायच जी के पते पर ही भेज चुका हूँ मिला होगा, सूचनाएं एवं अभिवादन से नगायच जी को भी अवगत कराइयेगा. हमारी नयी findings (ताला की) संबंधी समाचार chronical में प्रकाशित होगा, cuttings नगायच जी को भेज दूंगा. 

सपरिवार कुशलता की कामना सहित रायकवार जी का अभिवादन भी ग्रहण करेंगे। 

राहुल 

पुनश्चः बस्तर में (जगदलपुर) हो रहे परिषद के seminar के लिए मेरी कोई आवश्यकता समझें तो सेवा हेतु याद कीजिएगा. 

पत्र कार्यालय के पते पर भी भेज सकते हैं- 
Office of the Registering Officer (Arch.) 
Rajendra Nagar 
Bilaspur (M.P.)

Tuesday, July 11, 2023

देव-द्यूत

पिछले कुछ दिनों से जुए के फेर में पड़ गया हूं। मन ही मन पासे फेंकता, दांव-लगाता, जीत-हार का मनोराज्यं। वेद-पाठ, कला-रस और देव-आराधन का आनंद भी है इस मनोद्यूतं में। तिरी-पग्गा, तिरी-पच्चा, तिरी-पांचा, जैसे जाने कितने शब्द ‘जुआ-चित्ती‘ के लिए इस्तेमाल होते हैं। इनके करीबी है ‘तिया-पांचा‘ या ‘तीन-पांच‘, जो शायद जुए-पासे के खेल में छल-कपट के लिए ही प्रयुक्त होता है, ऐसे संकेत भी वैदिक साहित्य में मिल जाते हैं और गीता में कृष्ण ‘द्यूतं छलयतामस्मि‘ बताते हैं।

वैदिक साहित्य में ‘अक्ष‘ शब्द, पासा या गोटी के अर्थ में आता है। ऋग्वेद के दशम मंडल का चौंतीसवां सूक्त कवष ऐलूष का है। 14 मंत्रों के इस सूक्त में दुर्व्यसन जुआ का आकर्षण, उसके दुष्परिणाम और जुआरी की व्यथा फिर जुए का त्याग कर कृषि अपनाने की बात है- ‘हे द्यूतव्यसनी! जुए के पाशों से मत खेल, कृषि को जोत-खेती कर-अन्न उपजा, खेती से प्राप्त अन्न-धन-भोग से आनन्द ले, अपने को धन्य मानता हुआ प्रसन्न रह ...।‘ अथर्ववेद में ‘सं-रुध्‘ और ‘सं-लिखित‘ शब्दों का प्रयोग पासे के संदर्भ में हुआ है। वैदिक साहित्य में ‘त्रिपंचाश‘ शब्द भी आया है, जिसका सीधा मतलब तिरपन समझ में आता है, मगर विद्वान एकमत नहीं हैं और एक बड़ी संख्या का अभिव्यंजक भी माना है। याद कीजिए- ‘जाओ, तुम्हारे जैसे बहुत देखे हैं‘ वाली बात ‘... पचीसो देखे हैं‘ भी कहा जाता है। पौ-बारह, जैसे शब्द भी बाजी मार लेने के लिए आते हैं। फेंके गए पासों पर आई संख्या चार से विभाजित हो ऐसी संख्या ‘कृत‘, चार से विभाजित करने पर तीन शेष रहे तो ‘त्रेता‘, दो बचे तो ‘द्वापर और एक बच जाए तो ‘कलि‘ कहे जाने का भी उल्लेख मिलता है। छान्दोग्य उपनिषद के शंकर भाष्य में रैक्व प्रसंग में कृत-विजय का और तीन, दो, एक- क्रमशः त्रेता, द्वापर और कलि को संबद्ध किया है।

वाल्मीकि रामायण, बालकांड के चौथे सर्ग में अयोध्या का वर्णन में ‘चित्रामष्टापदाकारां‘ शब्द आया है। इस अष्टापद का अर्थ द्यूतफलक, जिस पर पासा बिछाया-खेला जाता है, बताया गया है। यहां ‘अष्टापदाकारा‘ का भाव, कि नगर के बीच राजमहल था, जिसके चारों ओर बीथियां और बीच में खाली जगहें थीं। जैन आगमों के बहत्तर कलाओं की सूची में द्यूतकला और बौद्धग्रंथ ललितविस्तर की कला सूची में अक्षक्रीड़ा भी है। इसी तरह वात्स्यायन ‘कामशास्त्र‘ और ‘शुक्रनीतिसार‘ की कलासूचियों में भी द्यूतक्रीड़ा को शामिल किया गया है। ‘मृच्छकटिकम‘ और ‘चतुर्भाणी में वेश्या, मद्यपान और द्यूतक्रीड़ा आमोद-प्रमोद के मुख्य साधन दिखते हैं। जैन प्राकृत ग्रंथ ‘वसुदेवहिण्डी‘ में द्यूत के कई अनूठे और रोचक प्रसंग हैं।

‘विधुर जातक‘ (545) में द्यूत-प्रसंग है, जहां द्यूतशाला तैयार कराई जाती है, चांदी के फलक पर सोने के पासे रखे जाते हैं। इसकी अतीत कथा में कहा गया है कि पूर्व समय में कुरु राष्ट्र में इंद्रप्रस्थ नगर में धनंजय नाम का कौरव्य राज्य करता था। विधुर-पंडित नाम का उसका अमात्य था, अर्थ-धर्मानुशासक ... इससे यह महाभारत के द्यूत-प्रसंग की याद दिलाता है। महाभारत के आरंभ में ही आदिपर्व के द्यूतपर्व में विदुर द्वारा जुए का घोर विरोध किया जाता है। स्वयं को हारने के बाद युधिष्ठिर कहते हैं- यद्यपि ऐसा करते हुए मुझे महान कष्ट हो रहा है, मगर विवेकशील धर्मराज द्रौपदी को दांव पर लगाते हैं, बड़े-बूढ़े धिक्कारते हैं। आगे चलकर वनपर्व के ‘नलोपाख्यान‘ आता है, जिसमें द्यूत प्रसंग को पिछले संदर्भ से जोड़ने का संकेत भी नहीं है मगर मानों पांडवों-युधिष्ठिर के बहाने पाठकों को बताया जाता है। कथा चलती है कि अवसर पा कर नल के शरीर में कलियुग प्रवेश करता है, इधर राजा नल का रिश्ते में भाई पुष्कर, कलियुग के ही उकसावे में उसे धर्मपूर्वक जुआ खेलने को बार-बार कह कर राजी कर लेता है। पुष्कर और नल के बीच कई महीनों तक जुआ चलता रहा। लगातार हारते नल से अंत में पुष्कर ने पत्नी-दमयंती को दांव पर लगाने के लिए कहा। किंतु कलियुग के प्रभाव में होने के बावजूद भी नल ने ऐसा नहीं किया।

मनु ने द्यूत को बुरा खेल माना है। राजा के अधीन खेलने का उल्लेख और व्यवस्था मिलती है। यहां दो शब्दों से परिचय कर लें- पहला ‘सभिक‘ यानी जुए का अड्डा चलाने वाला और ‘कलह‘ का सामान्य अर्थ लड़ाई-झगड़ा के अलावा जुए में लगाया गया दांव है। समझाइश दी जाती है कि जुआ तो हार-जीत का, खेल भावना वाला है, उसका दांव लगाने वाला ‘कलह‘ बस बुरा है। जुआड़ियों के जीत साधने के लिए एक ‘अक्षहृदय‘ मंत्र भी है। कात्यायन ने लिखा है कि यदि द्यूत की छूट मिले तो वह खुले स्थान में द्वार के पास खिलाया जाना चाहिए, जिससे भले व्यक्ति धोखा न खाएं और राजा को कर मिले। नारद, बृहस्पति, कौटिल्य, याज्ञवल्क्य जैसे विभिन्न ग्रंथों और महाभारत में भी द्यूत की निन्दा और व्यवस्था संबंधी उल्लेख मिलते हैं। 'कंब रामायण के बालकांड, अध्याय 10- मिथिला-दर्शन पटल में नगर प्रवेश पर राम-लक्ष्मण ने- ‘कई द्यूतशालाएँ भी देखी, जहाँ माले-जैसी नुकीली आँखों वाली सुन्दर वेश्याएँ चौसर खेलती थी। वे अपने हाथ के कंगन, कर्णाभरण, रत्नहार, कलिंगदेश की बनी अमूल्य चादर, मकरवीणा आदि को भी दाँव पर रख देती थी। (खेलते-खेलते थक जाने से) उनके पुष्पालंकृत केशपाश शिथिल हो जाते थे और स्फटिक के बने कुत्ते के आकार की मुहरें उनकी हथेली की छाया से लाल दिखाई देती थी।‘ चौदहवीं सदी ईस्वी के जैन ग्रंथ ‘प्रबंधचिंतामणि' की रोवक उक्ति है- ‘ग्रहों रूपी कौड़ियों से जब तक द्युलोक में सूर्य और चंद्रमा, जुआड़ी की तरह क्रीड़ा करते रहें तब तक आचार्यों द्वारा उपदिष्ट होता हुआ यह ग्रंथ विद्यमान रहे।'

ध्यान रहे कि शास्त्रीय ग्रंथों में द्यूत पर दी गई व्यवस्था, प्रतिद्वंन्दियों के बीच होने वाले खेल के लिए है, न कि पति-पत्नी के बीच के खेल के लिए। विवाह संस्कार पूरे हो जाने के बाद बारात वापस आने पर कंकण छुड़ाने की रस्म में नवदंपति के बीच जुआ-खेल खेला जाता है। एक कथा पासे या शतरंज जैसे खेल में विश्वामित्र का पत्नी से हारने पर पत्नी के हंसने से क्रुद्ध हो कर पासा तोड़ देने की भी है। वैष्णव परंपरा में कृष्ण लीला पुरुष हैं तो इधर शिव की लीलाएं भी कम नहीं। शिल्पशास्त्रीय या प्रतिमाविज्ञान का आधार नहीं मिलता मगर शिव-पार्वती के उमा-महेश विग्रह को शिल्प में चौसर खेलते दिखाया जाता हैै, ऐसी दुर्लभ शिल्प-कृतियां कलात्मक और रोचक कल्पनाशील हैं।

उमा, पार्वती है, पर्वत-पुत्री, नगाधिराज-सुता, ऐश्वर्यशाली। उमा के पास दांव लगाने के लिए क्या कमी। मगर औघड़-फक्कड़ शिव के पास भांग-चिलम के अलावा उनके आयुध त्रिशूल, डमरू, नाग, खट्वांग ही हैं, वे सब उमा के लिए बेमतलब, किसी काम के नहीं, इसलिए जिनका दांव पर लगाया जाना, उमा को मंजूर न हुआ हो। नन्दी, कुछ काम के हो सकते थे, तो महेश की ओर से वही दांव के लिए प्रस्तुत और स्वीकृत हुए। शिल्प में नन्दी को हार जाना रूपायित किया जाता है।

छत्तीसगढ़ में अब तक ज्ञात मुख्यतः ताला-6 वीं सदी इस्वी, सिरपुर-8 वीं सदी इस्वी, भोरमदेव-11 वीं सदी इस्वी, मल्हार-12 वीं सदी इस्वी और डमरू-13 वीं सदी इस्वी की शिल्प-कृतियां हैं।

तालाएवं सिरपुर

ताला और मल्हार के ऐसे शिल्प खंडों के तीन कोष्ठों से पूरे कथानक को न सिर्फ समझा जा सकता हैै, बल्कि ध्यान देने पर, पूरे प्रसंग और पात्रों का हाव-भाव और वह क्षण भी जीवंत हो उठता है। मुख्य पात्र उमा और महेश हैं, नन्दी हैं और हैं शिवगण समूह और पार्वती परिचारिकाएं। ताला में देवरानी मंदिर के प्रवेश द्वार के अंतः-पार्श्व के शिल्पखंड के मध्य में उमा-महेश चौपड़ खेल रहे हैं। बायें कोष्ठ में शिवगण प्रदर्शित हैं और दायें कोष्ठ में पार्वती की परिचारिकाएं विजित नन्दी को खींच कर ले जाने का प्रयास कर रही हैं और अनिच्छुक नन्दी अड़ा हुआ है। सिरपुर की प्रतिमा में उपर चौपड़ के एक-एक ओर सम्मुख शिव-पार्वती को दिखाया गया है और नीचे नन्दी को हांक कर ले जाया जाना अंकित है।
मल्हार, भोरमदेव एवं डमरू

मल्हार में कथानक तीन लंबवत कोष्ठों में है, जिनमें से प्रथम में चौपड़ खेलते उमा-महेश, दूसरे में शिवगण और पार्वती की परिचारिका के बीच नन्दी के लिए विवाद हो रहा है। तीसरे कोष्ठ के अंकन से स्पष्ट अनुमान होता है कि इस विवाद में दोनों उलझ जाते हैं और नन्दी बाबा मौका पा कर सरक जाते हैं। भोरमदेव मंदिर के पूर्वी मुख्य प्रवेश पर दक्षिणी शाखा पर शैव द्वारपाल और नदी देवी के ऊपर दो कोष्ठों में शिल्पांकन है। पहले में उमा-महेश को चौकोर चौपड़ और परिचारिका-गण के साथ दिखाया गया है। इसके पार्श्व खंड में पीछे की ओर सिर घुमाए प्रतिरोध करते नंदी, दंड लिए शिव गण और पार्वती-परिचारिका को दोनों हाथ उठा कर दंड-प्रहार को रोकने का प्रयास करते दिखाया गया है। डमरु की प्रतिमा में चौपड़ खेलते शिव-पार्वती और दाहिनी ओर गणेश को पहचाना जा सकता है।

श्री जी. एल. रायकवार ने सागर-जबलपुर अंचल की ऐसी तीन प्रतिमाओं की पहचान पहले-पहल की थी और 1984 के ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान‘ दीपावली विशेषांक में इस पर रोचक लेख प्रकाशित कराया था। उन्होंने यह भी बताया कि ऐसी स्तुतियां हैं, जिनमें पार्वती और शिव के बीच द्यूत क्रीड़ा और पार्वती का गंगा के प्रति डाह उजागर होने का संवाद है। इसी प्रकार कुछ शिलालेखों की स्तुतियों में भी द्यूत-क्रीड़ारत शिव-पार्वती की वंदना की गई है।

क्षेपक की तरह एक कथा सुनने को मिली है कि जुए में नन्दी को हारने के बाद हुआ यह कि भटकते रहने वाले भोला-भंडारी वाहन-विहीन हो गए और घर पर ही पार्वती के पास रहने लगे। कुछ दिन इसी तरह बीते। पार्वती को अपनी पुरानी शिकायत याद आई कि शिव ने गंगा को सिर पर बिठा रखा है, जबकि वह किसी काम-धाम की नहीं है, और कैलाश पर पानी की समस्या होती है तो उन्होंने इस शर्त पर नंदी को वापस लौटाया कि शिव, गंगा को रोज घर का पानी भरने के काम पर लगा दें। की तरह एक कथा सुनने को मिली है कि जुए में नन्दी को हारने के बाद हुआ यह कि भटकते रहने वाले भोला-भंडारी वाहन-विहीन हो गए और घर पर ही पार्वती के पास रहने लगे। कुछ दिन इसी तरह बीते। पार्वती को अपनी पुरानी शिकायत याद आई कि शिव ने गंगा को सिर पर बिठा रखा है, जबकि वह किसी काम-धाम की नहीं है, और कैलाश पर पानी की समस्या होती है तो उन्होंने इस शर्त पर नंदी को वापस लौटाया कि शिव, गंगा को रोज घर का पानी भरने के काम पर लगा दें। प्रसंगवश, निबंध ‘गंगा-यमुना-सरस्वती‘ में कुबेरनाथ राय किसी पौराणिक संदर्भ का हवाला नहीं देते, मगर लिखते हैं- ‘रुद्र की अलका में भटकती हुई प्रेमिका। रुद्र के सिर पर चढ़ी हुई प्रेमिका! इस प्रकार पुरानी गौरी गंगा अब नयी गौरी पार्वती की सौत बन गयी। ... द्वितीय सांस्कृतिक विकास में यह मकरवाहनी भगवती ‘गंगा‘ बन गयी और रुद्रपत्नी नयी ‘गौरी‘ की सौत बन गयी।

इस नोट को तैयार करने में सर्वश्री रायकवार, डॉ. के पी. वर्मा, श्री हयग्रीव परिहार, श्री प्रभात सिंह, श्री अमित सिंह ठाकुर ने सहयोग किया है।

Monday, July 3, 2023

गंगा - गिरधारी

‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान‘ पत्रिका के पुस्तक विशेषांक, 3 से 9 मई 1987, पेज-15 पर गिरधारीलाल रायकवार जी का प्रकाशित लेख-  

गंगावतरण का शिल्पांकन: देवरानी मन्दिर 
जी.एल. रायकवार 

दक्षिण कोशल के ज्ञात मन्दिरों की शृंखला में ताला का देवरानी मंदिर सर्वाधिक प्राचीन है। बिलासपुर-रायपुर सड़क मार्ग पर मनिहारी नदी के तट पर स्थित इस मन्दिर में गुप्तकालीन कला परम्परा की छाप स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। ऊंचे आयताकार अधिष्ठान पर निर्मित यह पूर्वाभिमुखी शिव मन्दिर वास्तु-कला की विलक्षणता से परिपूर्ण है। इस मन्दिर की बाह्य संरचना तथा प्रवेश द्वार मूल रूप से अवशिष्ट हैं। प्रवेश द्वार पर बने विविध शिव-कथानक एवं अलंकरणात्मक कला के उत्कृष्टतम नमूने हैं। 

स्थानीय लाल बलुआ प्रस्तर से निर्मित आयताकार यह मन्दिर अर्धमंडप, प्रवेश द्वार-अंतराल तथा गर्भगृह में विभक्त है। मन्दिर में प्रवेश करने के लिए चन्द्रशिला से संयुक्त ऊंची चौड़ी सीढ़ियां निर्मित हैं, जिसके दोनों ओर बौने आकृति के तुण्डिल शिवगण द्वारपाल के रूप में प्रदर्शित हैं। अर्धमंडप पर दो विशाल आकार के तोरण स्तंभ अवशिष्ट हैं, इनके शीर्ष भाग पर शिल्प पट्ट अथवा प्रतिमा प्रस्थापित रहे होंगे। इस मन्दिर की वास्तु-योजना में गंगा-यमुना मंडप की आंतरिक पार्श्वभित्तियों में ऊपर की ओर आमने-सामने प्रदर्शित हैं। गंगा-यमुना के सतत् प्रवाहिणी रूप को प्रदर्शित करने के लिए शिल्पियों ने द्विभंग-भंगिमा, तरंगवत पारदर्शी वस्त्र विन्यास तथा जलज पादपों को लहरों के साथ चित्रित कर सहज सौंदर्य को प्रस्फुटित किया है। 

मन्दिर का प्रमुख प्रवेश द्वार कला के इस माधुर्य से सम्पृक्त शृंगार तथा तप पूरित पौराणिक कथानकों एवं जटिलतम सूक्ष्म अलंकरणों से सम्पन्न है। द्वार-शाखा की अलंकरण योजना में केंद्र से निःसृत जालिकावत वृतों में शुक, सारिका, मयूर, नर आदि का कलात्मक अंकन है। प्रवेश द्वार की बाह्य शाखा विविध प्रकार की पुष्पीय आकृतियों से उत्खचित तथा शृंखलाबद्ध हारों की आवृति से बटी हुई रस्सी के समान गुंफित हैं। प्रवेश द्वार के सिरदल पर समुद्र मंथन से उद्भूत गजाभिषेकित पद्मासनस्थ लक्ष्मी तथा उसके दोनों ओर शूंड से कुंभ देते हुए गज, मानवीय रूप से अवतरित होती हुई नदी-देवियां तथा मूर्त रूप धारण किए हुए विभिन्न तीर्थ-सरोवर अभिषेक में तन्मय हैं । इस पट्ट में सरिताओं के प्रवाह रूप में धारा के मध्य मीन कच्छप आदि जलचरों को रूपायित कर शिल्पी ने दृश्य योजना में गति अवर्णनीय कौशल से संचरित किया है। प्रवेश द्वार पर अंत पार्श्व भित्तियों पर शिव से संबंधित कथा तथा अलंकरण प्रतीक भिन्न-भिन्न प्रकोष्ठों पर प्रदर्शित हैं। बायें तरफ आलिंगनरत उमा-महेश्वर, कीर्तिमुख, चौसर खेलते हुए उमा-महेश्वर तथा गंगावतरण प्रदर्शित हैं। इनमें से चौसर क्रीड़ा तथा गंगावतरण का शिल्पांकन भारतीय कला में सर्वप्रथम ताला में रूपायित हुआ है। इस प्रकार की प्रतिमाएं बहुत ही कम मात्रा में उपलब्ध हैं। चौसर खेलते हुए शिव दांव में नंदी को हार चुके हैं। शिव के समीप खड़े हुए गण अपने स्वामी के हारने से विचलित तथा चिन्तातुर हैं। 

इस मन्दिर के गर्भगृह की मूल प्रतिमा अद्यावधि अप्राप्त है। गर्भगृह में विभिन्न खंडित प्रतिमाओं के अवशिष्ट भाग रखे हुए हैं। इनमें से एक अधिष्ठाननुमा पट्ट पर भावविभोर नृत्यरत तीन शिवगणों का अंकन अत्यंत कलात्मक है। अन्य प्रतिमाओं में से चतुर्मुखी दुर्गा तथा खंडित नवगृह पट्ट उल्लेखनीय हैं। मन्दिर की खोज के समय से प्राप्त अन्य प्रतिमाएं तथा स्थापत्य खंड परिसर में ही रखी हुई हैं। इनमें से सूर्य, चतुर्भुजी प्रतिमा (संभवतः शिव), नारी प्रतिमा का अधोभाग, आदि महत्वपूर्ण हैं। अत्यंत भग्न होने के कारण यहां पर रखी हुई कुछ प्रतिमाओं का अभिज्ञान नहीं किया जा सका है। इसके अतिरिक्त विविध पुष्पीय तथा ज्यामितीय आकृतियों से अलंकृत विशाल आकार के स्थापत्य खंड इस मन्दिर की भव्यता तथा स्वर्णिम गौरवपूर्ण अतीत को मुखरित करते हैं। 

दक्षिण कोशल (वर्तमान छत्तीसगढ़) का यह सर्वाधिक प्राचीन मन्दिर विशिष्ट वास्तु तथा मूर्तिशिल्प के कारण भारतीय कला में अद्वितीय है। तथापि समुचित प्रकाशन के अभाव में यह अल्प चर्चित है। इस मन्दिर की स्थापत्य योजना में तल-विन्यास, नदी-देवियों की पृथक आवृत्तियां, अलंकरण तथा शाखा योजना एवं मंडप के तोरण स्तंभ आदि विलक्षण हैं। मन्दिर के बाह्य भित्ति कोष्ठ पर प्रदर्शित प्रतिमाएं अब अवशिष्ट नहीं हैं। 

इस मन्दिर के निर्माण काल के सम्बन्ध में निश्चित अभिलेखीय प्रमाण अनुपलब्ध हैं। देवरानी मन्दिर में स्थापत्य तथा मूर्तिकला का अत्यंत विकसित तथा परिष्कृत रूप प्राप्त होता है। प्रस्तर निर्मित इस मन्दिर की रचना में शिखर का भाग संभवतः ईंटों से निर्मित था। वास्तुगत तथ्यों से इस मन्दिर का निर्माणकाल पांचवीं शती ई. निश्चित होता है । 

 - राजेन्द्र नगर, बिलासपुर (म.प्र.)

Friday, April 1, 2022

Classical Icon

पुरातात्विक स्थल पर कराए गए कार्यों के आवश्यक संदर्भ, जानकारियों सहित प्रतिमा-विज्ञान के जानकार जी.एल. रायकवार का शोध-लेख, ‘रूद्र शिव‘ के अभिज्ञान में शास्त्रीय आधार की दृष्टि से तो महत्वपूर्ण है ही, रायकवार जी की विशेषज्ञता के स्तर को समझने में भी सहायक है।इस प्रतिमा पर एक अन्य शोध-लेख यहां है।यह ‘रूद्र शिव‘ प्रतिमा पर केंद्रित एल.एस. निगम संपादित पुस्तक में शामिल है, प्रस्तुत-



A Classical Icon from Tālā
G.L. RAIKWAR

Tālā is the most recently known archaeological site of Dakṣiṇa Kosala, yet is most important and famous for its masterly art and architectural heritage in the history of Indian art. Tālā is the name of the site which is situated on the left bank of Maniyārī river, a tributary of Śivanāth, near village Amerikāṁpā in Bilaspur district. By road Tālā is only 28 kms. from Bilaspur, the district headquarters and 6 kms. from Dagori railway station on Howrah-Bombay line. Part of the land where Tālā and its neighbouring villages situated, is full of natural beauty which is enhanced by a profusion of wild trees and shrubs, cultivated lands and water courses of Maniyārī river. The people of the related villages generally belong to Kewat (Fisherman), Telī (Oil-merchant) and Yādav (Milkman) castes, a conglomeration of semi-warrior merchant and cultivator classes of society. Most of them are cultivators and partly engaged in local stone quarries as quarry-men.

The site of Tālā is known for two temple remains namely- Devarānī and Jethānī, meaning younger and elder co-sisters. Actually in the Ardha maņdapa of Devrānī temple, two female deities are depicted on the North and South walls. The local people identify and call them, Deorānī and Jethānī. These female deities are represented as Nadī-Mātŗkās (minor river goddesses) and here they are shown without their vehicle, but the depiction of the waves and lotus motifs are sufficient evidence for their identification. The best example of the two river goddesses in this region is depicted in Siddheśvara temple, Palārī (Raipur district). It is suggested that these two river-goddesses can be identified as Nadī-mātŗkā and Saramātŗkā.

The temple remains of Tālā are very close to the bank of Maniyārī. The habitational part of that time also is located on its left bank and now used for agriculture purpose. Maniyārī is a modern Hindi name. In Sanskrit it seems to be Maņihāravalī, which means a series of Jewel-necklaces. It is supposed that the necklaces of Satī (consort of Śiva) fell on the ground and took the shape of a river. Maniyārī flows to the west of the site of Tālā towards south. Śivanāth flows to the south of the site from west to east. It is a task before us to conclude the reason of Jethānī temple facing south and also the therio-anthropomorphic deity tentatively named as Rudra Śiva. The tortoise shaped raised land (Kūrmapŗștha bhūmī), culture of the primitive people, the south flow river and its junction glorify the site and its nature, the art centre and devotional rituals of Śaiva tantra respectively. The site of Tālā is supported with nature and in favour of the activities of tantra and yoga.

The first chapter of clearance work at Tālā1
The temple remains of Tālā- Devarānī and Jethānī temples were declared protected by the Deptt. of Archaeology, Government of Madhya Pradesh in 1984. In the year 1977-78 the Department of Archaeology and Museums, conducted debris clearance work at Devarānī temple, under supervision of Shri A.K. Risbud, Registering Officer, Arch. & Museums, Bilaspur. In this session the work was executed in the front portion of the temple which exposed the Candrașilā, flight of stairs, dwarf door keepers in original position and a number of mutilated sculptures with other architectural fragments. Some representative examples of sculptures, which were revealed from the debris are- Śiva, Surya, four armed broken deity, pedestal part, human figure, Gaņa and architectural part. These materials are displayed at the site and some better sculptures are transferred to the District Archaeological Museum, Bilaspur for display. 

The second chapter of clearance work at Tālā2
In the Year 1985-86 the clearance work was conducted on the mound of totally dilapidated Jețhānī temple by Registering Officer, Archaeology & Museums, Bilaspur, who successfully unearthed the ruined temple with its remains. The Jețhānī temple was built on uncommon ground plan with three entrance gateways. The main entrance is towards south and two others are on east and west directions. The ground plan is based on Ardhamaņdapa, Maņdapa and Garbhagŗha. The Ardhamaņdapa and Maņdapa are supported by massive decorated pillars. The large sized sculptures were erected in the inner wall of Mandapa, Ardhamaņdapa and around the pillars with great skill. The river goddesses are installed at the entrance of garbhagŗha but unfortunately only their vehicle were revealed in original position, some rare remaining sculptures of Jethānī temple have not yet been identified, because of their unorthodox signification. One of them is unique in Indian art and narrate the story based on Dhana-Yakşinī (Yakșinī of wealth). In this sculpture a gigantic male deity is upholding the small size Yakşinī, up in his hands and pressing her body. The Yakṣinī is vomiting a bulk of coins. The fall of coins is depicted in the shape of date stem very artistically. On the lower part of aforesaid sculpture two human figures are shown holding a big opened bag in which the coins are being collected. The other sculpture is related with an ox and an ugly Yaksa is traced out on the stone beam of this temple again associated with the same story.

The clearance work of Jețhānī temple yielded a large number of rare sculptures and other minor antiquities in which Śālabhañjikā, Ardhanārīśvara, Kārttikeya, torso of female deity, a head of Saivācārya, a lion faced head, Gaurī plaque, silver coin of Prasannamātra, terracotta wheel and other objects are the best examples of art treasure. These objects are preserved in the office of the Registering Officer, Archaeology & Museum, Bilaspur.

The third chapter of clearance work at Tālā3
In the Year 1987-88 a minor clearance work was again conducted in the Devarānī temple by the Registering Officer, Archaeology & Museums, Bilaspur for conservation purpose. During the extension of work on south-east corner (left side of the wall of stairs) this image was exposed which has been given a tentative name “Rudraśiva”. The deity was lying down on its ventral surface which is full of high relief carving. The dorsal surface of the sculpture is plain. The deity was buried under the debris and was covered from all sides. After cleaning the site the deity was made to stand up on 17th January 1988 with the mechanical and manual power. The size of the deity is 254x100 cms. and its weight is about 8 ton. The other important remains—a large size Śiva head, pedestal part with gaņa figure, a human figure and other architectural pieces were exposed on the same spot side by side.

It is surprising that among the remains of Tālā only the deity discussed above is almost intact and comparatively partly mutilated. The missing parts of the deity are as follws : 

1. Broken part of Daņda.
2. A Snake near the right leg. 
3. Pedestal part. 
4. Folded hands of the deities shown on the thigh. 

The broken parts- Nāga-hood on right shoulder and Naga-hood near left ieg are chemically joined. 

For better preservation of the Icon from weather effect and erosion it was installed and saved in the newly constructed room on the same spot. 

A Review on the Original Position of the Deity 

The partly ruined Devarānī temple was built on rectangular ground plan and consists of ardhamaņdapa, antarāla and garbhagrha. The door-jamb of the temple is an excellent example of its plastic art depicting mythological and traditional divine deities which are unique examples in the art of Dakșiņa Kosala region. The presentation of therio-morphic and botanical art motifs are uncomparable and unchallengeable in any contemporary art centres. 

The Devarānī temple is a partly ruined temple. This stone built shrine is an early type of temple of Dakșiņa Kosala. It is difficult to say about its sikhara and to say whether it was flat roofed or brick built. It is also interesting that the first renovation and extension work was executed in the site during the rule of Somavaṁśī kings of Dakșiņa Kosala at about 9th-10th Cent. A.D. But it does not match with the original plan of the temple. This extra extension of the plan towards north-east of the Devarānī temple was unartistically combined with old structure. This further extension partly covered the original plan of the Devarāni temple and also the installed (displayed) deity. Some part of this renovation was exposed due to its unbalanced character during the clearance work conducted in the year 1987-88. On this occasion a huge size Gaņeśa was unearthed from the north, which is a sufficient evidence in itself that the act of extension took place in the past. Gaņeśa is the guardian and gaņa of north direction of the temple here and was worshipped in good condition eventhough packed with structure and debris. 

The original position of the discussed deity is not finally confirmed. Although it was unearthed from adjoining part of the Devarānī temple but there is no sufficient evidence for its proper position. The question is whether the said deity was an original sculpture of Devarānī temple? It is very difficult to say conclusively. All the facts are controversial and challengeable. Here some problems regarding the position of the said deity are discussed 

1. The Jețhānī temple is very close to Devarānī temple and when it collapsed the said deity was carried from there to the Devarānī temple. 

2. The said deity is a semi-god and characteristically is a guardian of the posted direction of the temple. There is no recess in the elevation of Devarānī temple where it could have stood. 

3. The furious appearance of the deity is full of Tāntric impact. The south faced Jethānī temple was built on the discipline of the Tântric rituals. The said deity might have been originally displayed in the Jețhānī temple. 

4. Some gigantic weathor-worn court deities (dvārapāla-deities) are located originally in the east entrance of the Jethānī temple. The said deity was posted as a guardian and dvārapāla of the particular direction in the above temple. 

5. A big sized lion-head of a gaña was unearthed from the Jețhānī temple. This example proves the variety and gigantic size of the gaņas particularly.

6. The deity is not in the posture of dhyāna, yoga or any particular action. It is in aggressive mood. The hand poses of the two armed deity are not in abhaya or varada mudrā (posture). 

In these different aspects, regarding the position of the said deity, the problems can not be solved untill the rest covered part of the Devarānī temple in north direction is again excavated properly. This is my presumption that next left counter part of the mysterious deity may be revealed incidentally in future, just as it happened in past.

Iconographical Description of the Deity
 
The said deity is a unique specimen of therio-anthropomorphic Śaiva cult god. But there is no evidence in any iconographical text in relation to the discussed deity which could be applied accordingly, by the sculptor also. The purāņas describe the various incarnations and forms of Śiva but say nothing new which could solve the problem of identity of this recently discovered classical Icon. In this way the deity is interpreted mostly as a Śaiva cult icon. 

This ugra (terrific) form of unparalleled deity is associated with Śiva in the literary aspects of Mahābhārata, where Śiva is described in multi-species and some time interfused manner. The icon is shown in sthānaka (standing) pose. It has two arms and holding a small but stout Daņda in its right hand (now broken and not conserved). The deity is nude with erect phallus which indicates him as a Mahāyogī. The deity wears simple ornaments such as graiveyaka, vakṣabandha, katibandha and kaṁkaņa which take those shapes by the coils of the parikara (attendants) nāga. Other human heads have also been sculpted on the body of the deity wearing ghanţā (bell) and oyster-shaped ear ornaments. A turban of nāga are vertically arranged over the head. The chameleon, peacock, frog, fish, crab, crocodile, snakes, tortoise, leech, elephant, lion, Yakşa, Rākṣasa, Gandharva, Vidyādhara and symbols of different Deva-Yonis (spécies) are depicted as organs and serve the purpose of the divinity. The club feet with pedestal part unfortunately has crumbled. The composition of the body of the deity with creatures is presented separately. (See Appendix). 

The proper identification of the deity can not be solved by mere arguments as each argument, contradicts the fact because its iconographical appearance and symbols are general and they can be associated with the form of Siva also. Therefore the identification of the deity can be presumed by some literary source, particularly according to the Mahābhārata- Śiva has been conceived as the lord of all created beings and is often described as 'Pasupati' and Bhūtánātha. The various aspects and attributes related to the said deity are described very comprehensively in the Mahābhārata specially and they are carefully analysed to achieve the aim. 

The polymorphic and polynominal praises of Śiva are being compared with the character of the discussed deity accordingly. A few selected slokas of the Mahābhārata (Anušāsana parva, chapter-14) are being considered for this purpose. Here such relevant slokas are quoted for examples. 

1. As a water creature- 
Kirāta sabarāņāṁ ca jalajānāma nekaśaḥ. 141. 
He assumes the forms of Kirata and Savaras and of all aquatic animals. 

2. As a tortoise and a fish- 
Kūrmormatsyastathā sarkha pravālāñkura bhūşanah. 142.
He assumes the forms of tortoise and fishes and conchs. He it is that assumes the forms of those coral sprouts that are used as ornaments by men. 

3. As a lion and a bird- 
Vyāghrasimha mrgānāṁ ca taraksvíkşapatatriņām. 144.
 He assumes the forms of tiger and lions and deer, of wolves and bears and birds.

4. As a peacock and a chameleon- 
Haṁsa kāka mayūrāņaṁ Kļkalāsasakasārasāṁ. Rūpaņi ca balākānāṁ grdhracakrāṁgayorapi. 145. 
He it is that assumes the forms of swans and crows and peacocks, of chameleons and lizards and storks. He it is that assumes the forms of cranes and vultures and chakravakas. 

5. As an elephant- 
Gorūpam ca mahādevo hastyasvoştrakharākſtiḥ. 146. 
Mahadeva, it is that assumes the forms of kine and elephants and horses and camels and asses. 

6. As a bird- 
Aņdajānāṁ ca divyānāṁ vapurdhārayate bhavaḥ. 147. 
It is Bhava who assumes the forms of diverse kinds of birds of beautiful plumage. 

7. As poly-faced and poly-headed- 
Şaņmukho vai bahumukhastrinetro bahusīrşakaḥ, 148. 
He some time becomes six-faced and some time becomes multifaced. He some times assumes forms having three eyes and forms having many heads. 

8. With many waists and faces- 
Aneka katipādasca anekodara vaktradhrk. 149. 
He some times assumes forms having many waist, many legs and forms having innumerable stomachs and faces. 

9. With Nāga-mekhalā (Snake waist band)- 
Bhūdharo nāga mauñjī ca nāgakuņdalakuņdalī. 155. 
He is that assumes the forms of Sesha who sustains the world on his head. He has snakes for his belt and his ears are adorned with ear rings made of snakes. 

10. With Urdhvalinga (Penis erectus)- 
Urdhvakeso mahāśeso nagnā vikſtalocanaḥ. 161. 
His hair is long and stands erect. He is perfectly naked, for he has the horizon for his garments. He is endowed with terrible eyes. 

11. With furious eyes- 
Vikrtakso visālākṣo digvāsāḥ sarvavāsakah. 162. 
He is possessed of eyes that are large and terrible. He has empty space for his covering and he it is that covers all things. 

12. With many number of head- 
Ekavaktro dvivaktrasca trivaktro-anekavaktraḥ. 165. 
He has one mouth, he has two mouths, he has three mouths, and he has many mouths. 

This challenging icon of Tālā is a riddle for iconographists. Regarding the proper identification of the discussed deity, the above quoted slokas of the Mahābhārata help us only on theoretical aspects but not in practical (practise). The iconographic and iconometric canons are also necessary for comparison between theory and practise. Here I would like to refer to a peculiar Vişņu image of Malhar specially, which is earlier and unique for its iconographical features. This yakșa type icon in skilfully exercised with the canons of the iconographical texts. 

In the art history of Dakșiņa Kosala from very beginning a different school of art and sect flourished. An existence of another school of art, parrallel to Gupta art is traced in this region particularly in Malhār and Tālā. Unfortunately there are no corresponding iconographic texts of that period which support the stylistic iconography and architecture of Tālā. Therefore it has been suggested that the demonstration of the discussed deity was based on the Saiva-cult, tantra, ritual and doctrine of the yoga simultaneously. Sculptors were aware of the iconographic texts and were also bounded with the discipline and they could not ignore the tradition, but applied their own imagination supported by mythology and basic story. 

Again I would like to point out that the other characteristic of the deity is that the two Mahā-Nāgas (large snakes) are flanked over its shoulders as a decorative motif and also functioning as a pārsva-rākasaka (body guard). The two other Mahā-Nāgas are shown near the legs in unnatural action. They lower down their heads and lift up the neck towards the face of the deity for obeisance. This interesting depiction of Nāgas is being compared with the particular exercise of yogāsana known as a sarvāngāsana. 

Among the art treasure of Tālā the scholars pay attention only to the said deity. There are other various important unidentified therio-anthropomorphic and other minor icons located on the site and waiting for the discovery of their roles in Indian art. Regarding the mysterious aspects of Tālā including art and architecture, there must be some corresponding text relating to the present and outdated discipline which was the root and which is still unknown. The paradoxical artistic beauty of the sculpture produces mesmeric effect on ones senses and one becomes enraptured and transfixed by the complicated details and they cast a kind of magical and hypnotic spell on the observer. Hence the Indologists should try to search out the discussed imaginary demonstration on the basis of the classical texts, folk rituals and belief. So as to enable us to meet the challenge. 

REFERENCES

1. Puratan, Vol. 1, No. 1 year 1984, pp. 58-61 & 111. 

2. A departmental report of office of the Registering Officer, Arch. & Museums, Bilaspur–A Completition Report of Debris clearance work of Jethani temple Tala Year 1985-1986, (Unpublished); Indian Archaeology-1985-86, A Review, p. 48.

3. A departmental report of the office of the Registering Officer, Arch.& Museums, Bilaspur-A Completition Report of Debris clearance and conservation work of Devarani temple Tala Year 1987-88 (Unpublished)

4. A small variety of the fish which is similar to upper lip in a form and size is described as a ytosî (Proșthī) means a upper lip. The upper lip and a moustache of the deity is formed with the Prosthi (प्रोष्ठी). 
(a) प्रोष्ठी तु शफरी द्वयोः। 
-अमरकोषः, प्रथम काण्डम् वारिवर्ग: 10, श्लोक 18. 
(b) सहस्त्रदंष्ट्रः पाठीनः प्रोष्ठी च श्फरी स्मृता।। 
-हलायुध कोषः तृतीयं पातालकाण्डम्, श्लोक 658.

5. Yaksa, Raksasa, Gandharva and Vidyadhara are generally treated as a Deva Yoni. 
(a) यक्ष राक्षस गन्धर्व सिद्ध किन्नर गुह्यकाः विद्याधराप्सरो भूत पिशाचा देवयोनयः।। 
-हलायुधकोशः प्रथमकाण्डम्, श्लोक 87. 
(b) विद्याधरोप्सरो-यक्ष-रक्ष्यो-गन्धर्व-किंनराः। पिशाचो गुह्यकः सिद्धो भूतो मी देवयोनयः।। 
-अमरकोषः, प्रथमकाण्डम् स्वर्गवर्गः।




शोधादि संदर्भों के लिए मूल ग्रंथ से मिलान अपेक्षित होगा।

Saturday, January 29, 2022

देवरानी जेठानी मंदिर, ताला

पुरातात्विक स्थल ताला पर मुख्यतः 1986 से 1988 तक विभिन्न पुरातात्विक कार्य राज्य शासन के बिलासपुर कार्यालय के माध्यम से श्री जी.एल. रायकवार के उत्तरदायित्व पर कराए गए, इस पूरे दौर में मेरी सहभागिता रही। ताला के विभिन्न पक्षों पर लिखने के अवसर बने, इस क्रम में मेरे द्वारा तैयार किया गया एक संक्षिप्त नोट तथा उसके पश्चात वार्ता के लिए आलेख- 

देवरानी-जेठानी मंदिर, ताला (ग्राम अमेरीकांपा) बिलासपुर से लगभग 30 किलोमीटर दूर, बिलासपुर-रायपुर मार्ग बायें व्यपवर्तन पर तथा पुनः दगोरी मार्ग पर दायें व्यपवर्तन पर मनियारी नदी के बायें तट पर स्थित छठी सदी ईस्वी के दो भग्न शिव मंदिर है। निकट ही मनियारी-शिवनाथ संगम है, जबकि मंदिर के सन्निकट एक बरसाती नाला बसंती, मनियारी में मिलता है । 

इन मंदिरों के प्रथम उल्लेख की जानकारी आर्क्यालाजिक सर्वे ऑफ इंडिया रिपोर्ट, खंड- 7 पेज- 168 पर सन 1873-74 में डिप्टी कमिश्नर, रायपुर मि. फिशर के हवाले से जे.डी. बेग्लर ने किया। छठे दशक में अंचल के प्रसिद्ध पुरातत्वविद पं. लोचन प्रसाद पाण्डेय ने इन्हें देखकर, अपने व्यक्तिगत नोट्स में दर्ज किया। सातवें दशक में डा. विष्णु सिंह ठाकुर ने इन्हें देखकर मंदिरों की जानकारी सार्वजनिक कर, चर्चा में लाया । मल्हार उत्खनन (1974-78) के दौरान प्रो. के.डी. बाजपेयी तथा श्री एस.के. पांडे ने भी इनका अवलोकन किया। 

नवें दशक में (दिनांक 9.3.84) यह राज्य संरक्षित स्मारक घोषित किया गया, इसी बीच एक विदेशी शोध छात्र डोनाल्ड स्टेडनर ने आर्काइव्स आफ एशियन आर्ट में 1980 में छायाचित्र व रेखाचित्र सहित इसे प्रकाशित कराया। नवें दशक के आरंभ में राज्य शासन के कार्य आरंभ किया और 1985-86 से व्यवस्थित मलबा सफाई, अनुरक्षण, रसायनिकरण आदि कार्य हुए। वर्ष 87-88 में तत्कालीन संस्कृति सचिव के विशेष आग्रह पर श्री के.के. चक्रवर्ती की देखरेख में विभागीय कार्य हुए। नवें दशक में अत्यंत महत्वपूर्ण प्रकाशन श्री कृष्णदेव लिखित अध्याय, इनसाक्लोपीडिया आफ इण्डियन टेेम्पल आर्कटेक्चर का अमेरिकन इन्स्टीट्यूट आफ इंडियन स्टडीज द्वारा हुआ। 

स्थापत्य की दृष्टि से जेठानी मंदिर दक्षिणाभिमुख तथा पूर्व व पश्चिम से पार्श्व प्रवेश के लिए सोपान व्यवस्था वाला, विशिष्ट भू-योजना का मंदिर है, जिसमें शास्त्रीय योजना के विकास के स्थान पर शिलोत्खात वास्तु योजना की झलक है। देवरानी मंदिर गर्भगृह, अन्तराल व मुखमंडप वाला पूर्वाभिमुख मंदिर है, जिसका प्रवेश द्वार संरक्षण की अपेक्षाकृत अच्छी दशा में तथा अत्यंत आकर्षक है। कला के आधार पर मंदिरों को परवर्ती गुप्तकालीन माना गया है, किन्तु प्रतिमाशास्त्र व अलंकरण की दृष्टि से शास्त्रीय प्रतिमानों के साथ मौलिक प्रयोग भी परिलक्षित होता है। 

देवरानी मंदिर के परिसर से प्राप्त ‘रूद्र शिव’ की लगभग आठ फुट ऊंची और छह टन भारी प्रतिमा, भारतीय कला में अब तक प्राप्त उदाहरणों में विशिष्टतम है। प्रतिमा के पूरे शरीर तथा घुटनों, जंघाओं, उदर व वक्ष पर मानव मुख है तथा मुख व शरीर के अंगों को मोर, गोधा, मत्स्य, कर्क, कच्छप से समाकृत किया गया है। इसी प्रकार देवरानी द्वार शाखा पार्श्व पर कीर्ति मुखों में पत्र-पुष्पीय अभिकल्प का संयोजन है। 

स्थल से 12-13 सदी ई. के कलचुरी शासकों रत्नदेव व प्रतापमल्ल के ताम्र्र सिक्के तथा शरभुरीय प्रसन्नमात्र का छठी सदी ई. का रजत सिक्का प्राप्त हुआ है, जो सुुनिश्चित तौर पर ज्ञात प्रसन्नमात्र का एक रजत सिक्का है। 

देवरानी मंदिर के प्रवेश द्वार पर
विनोद जी, नामवर जी, आयुक्त मदनमोहन उपाध्याय जी और अशोक जी

इसी क्रम में ‘इतिहास के झरोखे से‘ शीर्षक वार्ता के लिए सन 1991 में तैयार यह आलेख- 

दक्षिण कोसल, ईसा की छठी सदी का आरंभ। शिवनाथ की सहायक नदी मनियारी के बायें तट पर विशाल अनुष्ठान जैसा दृश्य। हजारों कामगर हाथ व्यस्त थे। गुप्त वंश का स्वर्णकाल देखकर, स्थानीय शरभपुरीय राजवंश ने यह स्थान चुना था दो मंदिरों के निर्माण के लिए। वैष्णव धर्मावलम्बी राजवंश की यह शैव स्थापत्य, संरचना, इतिहास में उनकी धार्मिक सहिष्णुता और कलाप्रियता का प्रमाण साबित होने वाली थी। स्थल को मानो चिन्हांकित करने के लिए बसंती नाला और थोड़ी दूर पर ही मनियारी और शिवनाथ नदी का पवित्र संगम स्थल। नदी तट पर स्तरित चट्टानों का विपुल भंडार सहज उपलब्ध था। मंदिर निर्माण के लिए इससे उपयुक्त स्थान और क्या हो सकता था। इतिहास के पिछले पन्नों पर इसी भू-भाग में पाषाणयुगीन मानव की उपस्थिति भी दर्ज है, जिसके प्रमाण स्वरूप लघु पाषाण उपकरण ही अब मिलते हैं। 

बिलासपुर जिला मुख्यालय से 30 किलोमीटर दूर यह स्थल अब ‘ताला’ नाम से जाना जाता है, जो वस्तुतः ग्राम अमेरीकांपा का वीरान हिस्सा है, यहीं दो प्राचीन मंदिर भग्नप्राय स्थिति में, महत्ता के चिन्ह संजोये, विद्यमान हैं, जो स्थानीय लोगों में ‘देवरानी-जेठानी’ कहे जाते हैं। इन मंदिरों ने उपेक्षा का लम्बा दौर गुजारा है। शताधिक वर्षों में इक्का-दुक्का पुरातात्विक ही, इसकी खोज खबर लेने पहुंच सके थे। 

1873-74 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पहले महानिदेशक, सर अलेक्जेंडर कनिंघम के सहयोगी जे.डी. बेग्लर इस क्षेत्र में सर्वेक्षण के लिए आए। उन्हें रायपुर के तत्कालीन असिस्टेन्ट कमिश्नर मि. फिशर द्वारा इस स्थल की सूचना मिली। बेग्लर ने स्वयं इन मंदिरों को नहीं देखा, लेकिन भविष्य के लिए, रायपुर-बिलासपुर मार्ग के पुरातात्विक स्थलों में, ‘जेठानी-देवरानी’ मंदिर, नामोल्लेख मात्र प्रकाशित किया। वर्षों बीत गए। इन मंदिरों की खबर किसी ने नहीं ली। 

तकरीबन सौ साल बीतने को थे। शायद इन मंदिरों का आकर्षण प्रबल हुआ। सातवें दशक में दुर्गा महाविद्यालय, रायपुर के डॉ. विष्णु सिंह ठाकुर, अनुमान करते सरगांव से पैदल, अकेले, मनियारी के किनारे-किनारे बढ़ चले। रास्ते में उन्हें टीले और पुराने मिट्टी के खिलौने, पात्र खंड, मनके मिले। कदम तेजी से उठने लगे और वे मंजिल पर पहुंच ही गए। अजीब रोमांच था, स्तंभित रह गए डॉ ठाकुर, उन्हीं के शब्दों में -‘मैं गुप्तों के समकालिक स्मारकों की कला प्रत्यक्ष कर रहा था।’ वे पूरा दिन स्थल पर गुजारकर वापस आये और पुरातत्व में रूचि लेने वालों के लिए एक नयी राह खोज दी। 

आठवें दशक में मध्यप्रदेश शासन तथा एक अमरीकी शोधार्थी ने इस राह का अनुगमन किया और पुरातत्व के क्षेत्र में एक नयी सुगबुगाहट हुई। छत्तीसगढ़ में पहली बार गुप्तकालीन मंदिर अवशेषों की जानकारी उजागर हुई। कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय के छात्र डोनाल्ड, स्टेडनर ने देवरानी मंदिर को अत्यंत विशिष्ट संरचना माना और स्थल के गंभीर अध्ययन का पहला प्रयास किया। स्टेडनर के अध्ययन के आधार पर कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय की ही विदुषी प्रोफेसर जोना जी. विलियम्स ने इसे छत्तीसगढ़ का ऐसा एकमात्र महत्वपूर्ण स्थल माना, जो गुप्तकला के प्रभाव से जीवन्त है। 

इस दौरान राज्य पुरातत्व विभाग द्वारा स्थल संरक्षण आदि प्रक्रिया की पहल हुई। 1985 में पुरातत्व विभाग के तत्कालीन मानसेवी सलाहकार, हार्वर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ प्रमोदचन्द्र स्थल पर आए। उनकी सम्मति थी- ‘अद्भुत छठी सदी की भारतीय कला का चरम उत्कर्ष यहां घटित हुआ।’ ताला का महत्व पहचाना जाने लगा, किन्तु इसके बाद भी यह स्थल पुराविदों की चर्चा तक सीमित रहा। विदेशी शोधार्थी और विशेषज्ञ टिप्पणीकारों का कार्य-विवरण, जनसामान्य की बात तो दूर, क्षेत्रीय पुरातत्व में रूचि रखने वालों को भी सहज उपलब्ध नहीं हुआ, लेकिन राज्य शासन ने स्थल के महत्व के अनुरूप कार्य आरंभ कर दिया और एक-एक परत खुलती गई, एक बेतरतीब टीला खोदकर साफ किया गया और स्पष्ट हुआ जेठानी मंदिर का भव्य और अनूठा अभिकल्प, ढेरों प्रतिमाएं साथ ही सर्वाधिक चर्चा और महत्व की आठ फुट ऊंची, पांच टन से भी अधिक भारी अद्भुत प्रतिमा रूद्र शिव, देवरानी मंदिर के पास से प्राप्त हुई, जिसने पूरी दुनिया के समाचार जगत में स्थान पाया। 

आइये, देखें कि वस्तुतः इस स्थल में ऐसा क्या है, जो दर्शक को स्तब्ध कर देता है और पुरातत्वविदों के लिए भी पहेली है। कथित देवरानी और जेठानी मंदिर वस्तुतः शिवमंदिर है जिनमें, देवरानी अधिक सुरक्षित स्थित में है, लेकिन जेठानी लगभग ध्वस्त होकर टीला बन चुका था। दोनों मंदिरों के बीच सिर्फ 15 मीटर का फासला है। पुरातात्विक अध्ययनों से ये मंदिर, स्थापत्य व कला में छत्तीसगढ़ के एकमात्र और देश के विशिष्टतम गुप्तकालीन कला केन्द्र के रूप में मान्य हुए हैं। 

पुरातत्वीय कार्याें से जेठानी मंदिर का स्वरूप उजागर हुआ, यह मंदिर पश्चिम पार्श्ववर्ती नदी के समानान्तर, विलक्षण रूप से दक्षिणाभिमुख है, इस प्राचीन टीले की सफाई के फलस्वरूप जेठानी मंदिर की अनूठी स्थापत्य-योजना स्पष्ट हुई, पूर्व और पश्चिम से सोपानयुक्त पार्श्व प्रवेश, उत्तरी पृष्ठ में दो विशाल गजाकृतियों का अग्रभाग तथा सुदीर्घ स्तम्भों और प्रतिमाओं के पादपीठ सहित विभिन्न आकार की ईंटें व विशाल पाषाण खंडो से निर्मित संरचना स्पष्ट हुई। महत्वपूर्ण पुरावशेषों में, शरभपुरीय शासक प्रसन्नमात्र का चांदी का सिक्का मिला, कलचुरियों की रत्नपुर शाखा के शासकों रत्नदेव और प्रतापमल्ल के सिक्के भी मिले जो लगभग बारहवीं सदी ई. तक जनजीवन से इस क्षेत्र की संबद्धता प्रमाणित करते हैं। 

मूल मंदिर संरचना के भाग के रूप में अर्द्धनारीश्वर, उमा-महेश, गणेश, कार्तिकेय, नायिका, नागपुरूष आदि विभिन्न प्रतिमाएं एवं स्थापत्य खंड प्राप्त हुए हैं, इन प्रतिमाओं में शास्त्रीय विलक्षणता तो है ही इनका आकार भी उल्लेखनीय है। कुछ प्रतिमाएं तो 3 मीटर से भी अधिक लम्बी हैं। स्थापत्य और मूर्तिकला, तत्कालीन प्रचलित सामान्य प्रतिमानों के अनुरूप नहीं है। इसलिए इनका अध्ययन और शोध अधिक आवश्यक है। इनमें शास्त्रीय निर्देशों के साथ-साथ स्थानीय परम्परा और मौलिक चिन्तन को भी जोड़ने का प्रयास दिखता है। प्रतिमाओं में भव्यता, अलौकिक सौन्दर्य, आकर्षक अलंकरण तका कमनीयाता का संतुलित प्रदर्शन है। दो अन्य पाषाण प्रतिमाएं लघु फलक है, इनमें से एक विष्णु तथा दूसरी गौरी अंकित है। लघु फलक लगभग 8वीं सदी ईस्वी के हैं। इनका उपयोग प्रतिमा अनुकृति अथवा चल प्रतिमाओं के रूप में होता था। 

ताला में हुए विभिन्न चरणों के कार्यों ने देश के शीर्ष पुरातत्वविदों का ध्यान आकर्षित किया है। स्थल संबंधी खेज, अध्ययन, शोध तथा व्याख्या यद्यपि प्राथमिक स्तर पर है, किन्तु भविष्य की पुरातत्विक गतिविधियों के फलस्वरूप यह स्थल कला स्थापत्य के पहलू तो उजागर करेगा ही। शैव धर्मदर्शन के नए आयामों को उद्घाटित करते हुए यहां क्षेत्रीय कला परम्परा की पृष्ठभूमि भी उजागर होगी। आरंभिक अवलोकन मात्र से यह निःसंदेह है। 

देवरानी मंदिर की निर्माण योजना में आरंभिक चन्द्रशिला और सोपान के साथ अर्द्धमंडप, अन्तराल और गर्भगृह; तीन मुख्य भाग हैं। पूरी संरचना चबूतरे पर निर्मित है। मंदिर की बाहरी दीवार पर खुर और कुंभ के समानान्तर मकर मुख बने हैं और जंघा अर्द्धस्तंभों से विभक्त है। प्रवेश में दोनों ओर शिवगण है; अर्द्धमंडप के पार्श्वों में नदी देवी प्रतिमाएं हैं। 

मुख्य प्रवेश द्वार का सिरदल दो भागों में विभक्त है, ऊपरी हिस्से में गजाभिषिक्त लक्ष्मी, नदी-देवता, परिचारकों और गंधर्वों के अंकन की अभिकल्पना और गत्यात्मक चित्रण में कलाकार की समग्रकला साधना की गहराई दिखती है, निचले हिस्से में शिव-पार्वती विवाह का मंगल दृश्य है, सिरदल के भीतरी पार्श्व पर बीच में पन्द्रह ऋषियों को विशिष्ट मुद्रा में संयोजित कर वृत्त का आकार दिया गया है और दोनों पार्श्व अर्द्धपद्म से पूरित है। प्रवेश द्वार सम्मुख चार पुष्पीय लड़ियों के आकर्षण संयोजन अलंकृत है। प्रवेशद्वार के भीतरी पार्श्वों में उमा-महेश का लास्य, द्यूत प्रसंग में हारे शिव के वाहन नन्दी का पार्वती गणों के अधिकार में होना, भगीरथ अनुगामिनी गंगा स्पर्श से सगर वंशजों की मुक्ति, मौलिकता युक्त अनुभव सम्पन्न सृजन का परिणाम है, विशेष उल्लेखनीय कीतिमुख के रौद्रभाव संयोजन के लिए कोमल पत्र-पुष्प दलों का उपयोग, भारतीय कला का अद्वितीय प्रतिमान है। 

सर्वाधिक चर्चित और महत्वपूर्ण प्रतिमा रूद्रशिव है। इसे महाशिव परमशिव या पशुपतिनाथ नाम भी दिया गया है। सिर पर नागयुग्म की भारी पगड़ी है। पूरे शरीर पर मानव और सिंह मुख तथा विभिन्न अंगों का रूपान्तरण जीव-जन्तुओं में हुआ है। दाढ़ी पर केकड़ा, मंूछ के स्थान पर दो मछलियां तथा नाक व भौंह का रूप गृहगोधा का है। आंख की पलकें दानव का मुखविवर हैं कान के स्थान पर मोर और कंधे मकर मुख है। चूंकि शिव का पशुपतिरूप, स्वाधिष्ठित संयमी पुरूष का है, अतः कछुए के गर्दन और सिर को उर्द्धरेतस आकार दिया गया है। श्री के.के.चक्रवर्ती व्याख्या करते है कि ‘जो रूद्र है व शिव भी है, जो अशुभ दूर करते हैं वह शुभ भी लाते हैं, जो ध्वंस करते है वही सृजन करते हैं; इस तरह यह रूद्र और शिव का समाहार का चिन्तन है।‘

Friday, January 28, 2022

ताला की विलक्षण प्रतिमा

छत्तीसगढ़ राज्य गठन के अवसर पर मध्यप्रदेश शासन, उच्च शिक्षा विभाग एवं मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रन्थ अकादमी का समवेत उपक्रम, द्विमासिक ‘रचना‘ के अंक-27, नवंबर-दिसंबर 2000 में मुखपृष्ठ पर ताला, अमेरीकांपा, बिलासपुर की प्रसिद्ध प्राचीन प्रतिमा ‘रूद्र शिव‘ का चित्र प्रकाशित हुआ था। अंक के अतिथि संपादक डॉ. राजेन्द्र मिश्र थे। इस अंक के विभिन्न महत्वपूर्ण लेखों में एक लेख ‘ताला की विलक्षण प्रतिमा‘ मुखपृष्ठ के चित्र से संबंधित यानि ताला की इस प्रतिमा पर भी था। इसमें किसी एक मूर्ति पर एकाग्र पुस्तक ‘रिडिल ऑफ इण्डियन आइकनोग्राफी‘ का उल्लेख है, यहां प्रस्तुत लेख डॉ. लक्ष्मीशंकर निगम ने लिखा है साथ ही उक्त पुस्तक के संपादक के रूप में इस प्रतिमा का परिचय भी उन्होंने पुस्तक में दिया है, जो यहां अंत में प्रस्तुत है। चित्र में दोनों प्रकाशन दृष्टवय हैं। 


सभ्यता के विकास के साथ ही मानव में कलात्मक प्रवृत्तियों का विकास भी स्पष्टतः दृष्टिगत होता है। गायन, वादन, नृत्य, संगीत के साथ-साथ अभिनय, चित्रकला और मूर्तिकला को कलात्मक प्रवृत्तियों के रूप में स्वीकृत किया जाता है। कालान्तर में कला के अन्तर्गत अनेक विषयों को सम्मिलित कर दिया गया और साहित्य में सामान्यतः 64 कलाओं का उल्लेख होने लगा। वात्स्यायन के कामसूत्र में 66 कलाओं का विवरण मिलता है। इसके अन्तर्गत ललित अथवा शिल्प कला के साथ ही दैनिक जीवन, पारम्परिक व्यवसाय आदि से सम्बन्धित विषयों को भी समाहित किया गया है।

कला के विभिन्न रूपों में मूर्तिकला का एक विशिष्ट स्थान रहा है। शिल्प शास्त्रीय परम्परा में मूर्तियों अथवा प्रतिमाओं का उल्लेख मिलता है। सामान्यतः प्रतिमा और मूर्ति में कोई विशेष अन्तर नहीं माना जाता। ‘प्रतिमा‘ शब्द का अर्थ, ‘प्रतिरूप‘ होता है, अर्थात किसी आकृति की प्रतिकृति को प्रतिमा कहा जा सकता है, किन्तु शास्त्रीय परम्परा में प्रतिमा को ‘अर्चा‘ से जोड़ दिया गया है। इस प्रकार प्रतिमा को किसी धार्मिक अथवा दार्शनिक सम्प्रदाय से सम्बन्धित होना आवश्यक माना जाने लगा। मूर्ति के लिए इस प्रकार की बाध्यता नहीं रही। इसीलिए प्रतिमा निर्माण में निश्चित नियमों तथा लक्षणों का पालन आवश्यक होता है, जबकि मूर्ति निर्माण में शिल्पी को अधिक स्वतंत्रता होती है।

भारतीय शिल्प में मूर्ति तथा प्रतिमा निर्माण की दीर्घकालीन परम्परा रही है। कला इतिहास के विद्वानों ने इन प्रतिमाओं की उनके लक्षणों एवं शैलियों के आधार विवेचनाएँ प्रस्तुत की हैं किन्तु कभी-कभी ऐसी विलक्षण प्रतिमाएँ प्राप्त हो जाती हैं, जो पुरातत्ववेत्ताओं और कला-इतिहासज्ञों के लिए समस्या बन जाती हैं, ऐसी ही एक प्रतिमा लगभग ग्यारह वर्ष पूर्व मध्यप्रदेश के बिलासपुर जिले में प्राप्त हुई है।

बिलासपुर से लगभग 30 किलोमीटर की दूरी पर, मनियारी नदी के तट पर, अमेरी काँपा नामक ग्राम के निकट ‘ताला‘ नामक स्थल पर दो प्राचीन भग्न मंदिर स्थित हैं, जो देवरानी-जेठानी मंदिर के नाम से प्रख्यात हैं। रायपुर-बिलासपुर मार्ग पर भोजपुरी नामक ग्राम से इसकी दूरी लगभग छह किलोमीटर है। जेठानी मंदिर अत्यन्त ध्वस्त अवस्था में है, जबकि देवरानी मंदिर अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में है। देवरानी और जेठानी मंदिर अपनी विशिष्ट कला के कारण देश-विदेश के कला प्रेमियों के लिए आकर्षण का केन्द्र हैं, मध्यप्रदेश शासन के पुरातत्व विभाग ने यहाँ समय-समय पर मलबा सफाई तथा संरक्षण का कार्य कराया है। इसी क्रम में भारतीय में प्रशासनिक सेवा के एक वरिष्ठ अधिकारी डॉ. के.के. चक्रवर्ती के मार्गदर्शन में इस स्थल की मलबा सफाई का कार्य, उस समय बिलासपुर में पदस्थ पुरातत्व विभाग के अधिकारी द्वय सर्वश्री जी.एल. रायकवार तथा राहुल सिंह द्वारा कराया गया, जिससे 17 जनवरी 1988 को एक विलक्षण प्रतिमा यहाँ से प्रकाश में आई।

यह विशाल प्रतिमा लगभग 9 फीट ऊँची तथा 5 टन वजनी तथा शिल्प की दृष्टि से अद्भुत है। इसमें शिल्पी ने प्रतिमा के शारीरिक-विन्यास में विभिन्न पशु-पक्षियों का संयोजन किया है। प्रतिमा के शीर्ष भाग में पगड़ीनुमा सर्प-युग्म का अंकन मिलता है। नासिका और आँखों की भौंह का निर्माण उतरते हुए छिपकली सदृश्य प्राणी से किया गया है। मूछों के अंकन में मत्स्य-युग्म प्रयुक्त है, जबकि ठुड्डी का निर्माण कर्क (केकड़ा) से किया गया है। कानों को मयूर-आकृतियाँ सदृश्य चित्रित किया गया है। सिर के दोनों पार्श्वों में फणयुक्त सर्प का चित्रण है। कंधों को मकर-मुख सदृश्य बनाया गया है, जिससे दोनों भुजाएँ निकलती हुई दिखाई देती हैं। शरीर के विभिन्न आंगों में सात-मानव-मुखों का चित्रण मिलता है। वक्ष-स्थल के दोनों ओर दो छोटे मुखों को अंकित किया गया है। उदर का निर्माण एक बड़े मुख द्वारा किया गया है। यह तीनों मुख मूछों से युक्त हैं। जंघाओं में सामने की ओर अंजलिबद्ध दो मुख तथा दोनों पार्श्वों में दो अन्य मुख अंकित हैं। दो सिंह-मुख घुटनों में प्रदर्शित किए गए हैं। उर्ध्वाकर लिंग के निर्माण के लिए मुँह निकाले कच्छप (कछुए) का प्रयोग है। घण्टा की आकृति के अण्डकोष कछुवे के पिछले पैरों से बने हैं। सर्पाे का प्रयोग उदर-पट्ट तथा कटिसूत्र के लिए किया गया है। हाथों के नाखून सर्प-मुख जैसे हैं। बायें पैर के पास भी एक सर्प का अंकन मिलता है।

इस प्रकार की प्रतिमा देश के किसी भाग से नहीं मिली है और न ही शिल्प-शास्त्रों में इसका उल्लेख मिलता है। प्रतिमा के लक्षणों के आधार पर इस सम्बन्ध में निम्नलिखित अनुमान व्यक्त किया जा सकता है:

1. यह प्रतिमा शैव परम्परा से संबंधित प्रतीत होती है। विभिन्न पशु-पक्षियों का चित्रण इसके पशुपति रूप का परिचायक कहा जा सकता है, शिव प्रतिमा के लक्षणों, यथा डमरू, त्रिशूल, नंदी आदि का यद्यपि इसमें अभाव है फिर भी सर्पों की उपस्थिति एवं उर्ध्वाकार लिंग, इसे शैव-परम्परा से सम्बद्ध करता है। 
2. यह प्रतिमा देवरानी मंदिर के प्रवेश-द्वार के निकट से प्राप्त हुई है तथा आकार-प्रकार में द्वारपाल सदृश्य दिखाई पड़ती है, अतः इसके द्वारपाल परम्परा से सम्बन्धित होने का अनुमान किया जा सकता है,
3. विशालकाय शरीर, सिर पर पगड़ी तथा उन्नत उदर के आधार पर यह यक्ष मूर्तियों के सदृश्य दिखाई पड़ती है।

कला-इतिहासकारों ने इस प्रतिमा के विभिन्न पक्षों का अध्ययन करते हुए इसे लकुलीश, रूद्र-शिव, द्वादशमुख-शिव, यक्ष रूप में शिव आदि से समीकृत करने का प्रयास किया है। कुछ विद्वान इसमें तांत्रिक प्रभाव देखते हैं तथा कुछ इसमें अभिचारिक परम्परा का समावेश होने की सम्भावना व्यक्त करते हैं, इस प्रतिमा को लगभग छठवीं शताब्दी ई. के मध्य का माना जाता है। कलाशैली की दृष्टि से इस प्रतिमा की तुलना नागपुर के निकट मांडल से प्राप्त शिव प्रतिमाओं से की जा सकती है, मांडल से चतुर्मुखी, अष्टमुखी एवं द्वादशमुखी शिव प्रतिमाएँ प्राप्त हुई हैं किन्तु ताला की प्रतिमा शिल्पांकन एवं प्रतीक की दृष्टि से अद्भुत एवं मौलिक कही जा सकती है। ऐसा प्रतीत होता है कि विभिन्न प्राणियों यथा-जलचर (मछली, मकर आदि), थलचर (सिंह, छिपकली आदि), उभयचर (कछुवा, केकड़ा, सर्प आदि) तथा नभचर (मयूर) का अंकन समस्त चराचर जगत का परिचारक कहा जा सकता है। इसी आधार पर इस प्रतिमा को शिव के ‘विश्व-रूप‘ से अभिज्ञानित करने का प्रयास भी किया गया है।

इस प्रतिमा में अंकित विभिन्न पशु-पक्षियों का अंकन किस उद्देश्य से किया गया है? वर्तमान में निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता। इसमें अंकित विभिन्न प्रतीकों का अर्थ निकालने के लिए इतिहासकार एवं पुरातत्ववेत्ता प्रयत्नशील हैं। प्रसिद्ध कला-समालोचक एवं हार्वर्ड विश्वविद्यालय में भारतीय कला इतिहास के प्रोफेसर डॉ. प्रमोद चन्द्र, जो इस मूर्ति की खोज के समय ताला में उपस्थित थे, ने विचार व्यक्त किया है कि यह प्रतिमा कला-इतिहासकारों के लिए कम से कम एक शताब्दी तक समस्या बनी रहेगी। भारतीय कला के देश-विदेश के अध्येता इस प्रतिमा के रहस्य की खोज में लगे हुए हैं। इन पंक्तियों के लेखक के सम्पादन में एक पुस्तक ‘रिडिल ऑफ इण्डियन आइकनोग्राफी‘ का प्रकाशन हुआ है, जिसमें विश्व के पन्द्रह अध्येताओं ने अपने विचार व्यक्त किए हैं। किसी एक मूर्ति पर केन्द्रित एकाग्र प्रकाशन पहली बार किया गया है। यद्यपि इस अध्ययन से इस मूर्ति के अभिज्ञान की दिशा में नए आयाम मिले हैं तथापि अन्तिम निष्कर्ष अभी तक नहीं निकल पाया है।

प्रतिमा के अभिज्ञान तथा प्रतीकों के संबंध में भले ही मतभेद हों किन्तु इस तथ्य में कोई सन्देह नहीं है कि शिल्पी ने मूर्ति के संयोजन में अपनी मौलिक कल्पना का अद्भुत परिचय दिया है और साथ ही भारतीय परम्परा के विभिन्न आयामों को समेकित रूप में प्रदर्शित करने का अनोखा प्रयास भी किया है। 

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The image under discussion is 2.70 metre in height and approximately five tonnes in weight. This two-armed image standing in samapāda posture is massively built with emphasis on muscular strength. It has unusual iconographic features depicting various animals alongwith human and lion heads components. The description of the image is interesting enough. A turban made of a pair of snakes. The serpent is probably a favourite depiction of the artist. Therefore, the waist band and finger nails are also designed like snake. Apart from these, a pair of serpent-hood figures on either side of the head above the shoulders. A snake is also shown entwining the left leg. Among other animals, peacock is depicted ornamenting ears. Eyebrows and nose are made of a descending lizard. Eyelash are either in the pattern of an open mouth of a frog or the mouth of a roaring lion. Two figures of fish form moustaches of the image alongwith the upper lip, while the lower lip and the chin are shaped like a crab. Both the shoulders have depiction of makara (crocodile). Seven human heads as body are engraved in various parts of the body. Of these a pair of small heads may be seen on either side of the chest. A bigger face forms the abdomen. These three faces have moustaches. Each thigh consists of a pair of heads of which two smiling faces are carved on the front side in añjali-baddha posture, while the other two are carved on sides. Heads of lion are depicted on each knee. The ūrdhvamedhra (penis-erectus) is made of head and neck of a tortoise. Two bell-like testicles are designed as forelimbs of the same animal. The legs of the icon are formed in the shape of elephant's legs.

प्रसंगवश- धमनी, चकरभाठा निवासी पं. अजय शर्मा का ताला से घनिष्ठ लगाव रहा है, उनमें काव्य प्रतिभा तो है ही, लोकमन के भावों को सहज अभिव्यक्त करने का कौशल भी है, उनकी काव्य पुस्तिका ‘गाथा बगरे नता‘ में एक तरह से इस प्रतिमा से अपना नाता रेखांकित किया है-

रूद्र शिव सिंगार
(तालागांव)

भोलेबाबा, भोलेबाबा, तोर लीला अपरमपार।
तालागांव म खड़े, जीव जंतु के करे सिंगार।।

रूद्र रूप के बाना म, तय महा बिकराल।
भक्त रक्षा करथस, बारो मास आठो काल।।

उँगरी म पहिरे, नाग लोक के कतको सांप।
दरसन भर म, तनधारी के, भसम होथे पाप।।

नाक भऊँ छिपकिल्ली, पूँछी तिलक लगाये हस।
बिखहर राज के बांधे पागा, अद्भुत रूप बनाये हस।।

दुनो कान म, होके मस्त, नाचय मन मजूर।
हमरो सुन ले बबा, कर दे जमो दुःख दूर।।

खांध म बईठे मंगरा, मच्छरी के मेंछा अईठे।
जऊन रूप म भजथे तोला, दिखथस तेला तईसे।।

हिरदय म मनखे, पेट हवय महाकाल।
जेती देखबे तोर रूप, हवय बिकराल।।

थोथना म केकरा ओरमे, झपकी मारथे बेंगवा।
कऊँवा, गरूड़, कम्मर ओरमे, माड़ी गरजथे बघवा।।

कुकरी अड़वा के बट बट ले आंखी लक-लक लउकथे।
पहिली कोन आईस, घट घट वासी पूछत हे।।

नारी महिमा हवय अपार तोर गोदी म पाथे दुलार।
तंय ओला अइसे संवारे, उही बने हे श्रृष्टि अधार।।

अवतारी कच्छप ल लिंग रूप बइठारे।
आदि अनादि के संघरा पूजा बने जोग बइठारे।।

तालागांव के रूद्रशिव, तंय अद्भुत रूप धरे।
जल, थल नभचर के सिंगारी, विश्व रूप तय धरे।।

Sunday, December 12, 2021

लोचन नोट

शिलालेख
गांव - कोनी, अरपा किनारे, पास सरवानी शार...
बिल्हा से पूर्व करीब ७ मील, गांव के बाहर नदी
के किनारे खंडहर, मन्दिर में १ शिलालेख ६४ लकीर
का है। भाषा संस्कृत (देववाणी) अज्ञात

खंडहर
स्थान- बिलासपुर से १५ मील रेलवे स्टेशन शिव-
नाथ बृज से पश्चिम करीब ३ मील मनियारी
नदी के किनारेखंडहर मन्दिर हैं जो कि बड़े-
पत्थर से बने हैं, जिसमें गारा आदि का पता
याने जोड़ाई का पता नहीं लगता, जिसे देवरानी
जेठानी का मन्दिर कहते हैं वहीं से कोई एक
मूर्ति जांच के लिये ले गया है। यह गांव -
ताला के खार में है। ताला के पास पंवसरी वा दगौरी है।

अशोक चक्र
बिल्हा से ५ मील दूर मूरु गांव में पास खर-
केना में नये मन्दिर में अशोक चक्र १ है। वह
३ हाथ करीब लम्बा, १ हाथ चौड़ा अन्दाजी।



पं. लोचन प्रसाद पांडेय का हस्तलिखित यह नोट, बिलासपुर के श्री महेशचंद्र वर्मा के पास सुरक्षित दस्तावेजों में (जिसकी छायाप्रति तैयार कराने की अनुमति उन्होंने दी थी) मैंने 1987-88 में देखा था, यह 1957 का बताया गया। उक्त नोट के तीन में से पहला ‘शिलालेख‘ बिलासपुर-शिवरीनारायण मार्ग पर दर्रीघाट-लिमतरा के आगे लावर-कोनी का है, कलचुरिकालीन इस शिलालेख का वाचन-प्रकाशन हो चुका है। दूसरा ‘खंडहर‘ में ताला, ग्राम- अमेरीकांपा के देवरानी-जिठानी का उल्लेख है, यह स्थान शिवनाथ और मनियारी नदी के संगम के पहले मनियारी में बसंती नाला के संगम पर है तथा अब रूद्र शिव मूर्ति के कारण विख्यात है। तीसरा ‘अशोक चक्र‘ तलाश का प्रयास खरकेना गांव के मंदिरों और उसके आसपास किया गया किन्तु सफलता नहीं मिली।

महेश जी, जगदलपुर वाले शरद जी, पं. सत्यदेव दुबे के वकील हरीश जी और मीडिया-विज्ञापन से जुड़े शिरीष जी के भाई थे। महेश जी शिक्षक थे और अधिकतर समय पेन्ड्रा, धनपुर क्षेत्र में शासकीय सेवा में रहे। छत्तीसगढ़ के प्राचीन व्यापारिक मार्गों की अच्छी-खासी जानकारी उन्हें थी। अधिकतर रास्ते उनके स्वयं चले-देखे हुए थे और बहुतेरी जानकारियां उन्होंने मवेशी बाजार करने वाले व्यापारियों से जुटाई थीं।

Monday, July 19, 2021

ताला

इन मंदिरों पर से सदियां गुजर चुकी हैं 

मध्यप्रदेश में शिवनाथ की सहायक नदी मनियारी के बायें तट पर गुप्तकाल में निर्मित दो शैवमंदिर आज भी पांचवीं-छठी शताब्दी के मूक साक्षी बने खड़े हैं। ये मंदिर तत्कालीन शरभपुरीय शासकों के स्थापत्य प्रेम का प्रतीक तो हैं ही, साथ ही वैष्णव शासकों की धार्मिक सहिष्णुता का प्रतीक भी हैं। कभी इस भू-भाग ने पाषाणयुगीन मानव को भी आकर्षित किया था। यहां पाये गये लघु पाषाण उपकरण इस बात का प्रमाण हैं। 

बिलासपुर जिला मुख्यालय से 30 किलोमीटर दूर यह स्थान ‘ताला‘ नाम से जाना जाता है, जहां ये दो स्मारक भग्नप्राय स्थिति में विद्यमान है। स्थानीय लोगों में ये मंदिर ‘देवरानी-जिठानी के मंदिर‘ नाम से जाने जाते हैं। यह इन मंदिरों का दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है कि इक्का-दुक्का ही पुरातत्वविदों ने इनकी खोज-खबर ली। सन् 1873-74 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के प्रथम महानिदेशक ए. कनिंघम के सहयोगी जे.डी. बेग्लर को इनकी सूचना रायपुर के तत्कालीन असिस्टेंट कमिश्नर मि. फिशर द्वारा मिली थी। बेग्लर ने स्वयं तो इन स्मारकों को नहीं देखा, मगर रायपुर-बिलासपुर मार्ग पर पुरातात्विक महत्व के स्थल के रूप में ‘जिठानी-देवरानी का मंदिर‘ नाम दर्ज कर दिया गया। इसी शताब्दी के सातवें दशक के अंत में दुर्गा महाविद्यालय, रायपुर के डॉ. विष्णु सिंह ठाकुर ने इस स्थान की खोज-खबर ली। 

कुछ वर्ष पहले अमेरिकी शोधार्थियों और मध्यप्रदेश शासन ने इस स्थान की छानबीन की और छत्तीसगढ़ में पहली बार गुप्तकालीन मंदिरों की उपस्थिति का आभास लोगों को हुआ। इसी समय राज्य पुरातत्व विभाग ने इसके संरक्षण की चिंता पहली बार की। 1985 में राज्य पुरातत्व विभाग के तत्कालीन सलाहकार और संप्रति हॉर्वर्ड विश्वविद्यालय के डॉ. प्रमोदचंद्र ने इस स्थान का निरीक्षण किया, लेकिन इस सबके बाद भी यह स्थान मामूली चर्चा का ही विषय बन सका। 

कथित देवरानी और जिठानी मंदिर में, देवरानी अधिक सुरक्षित स्थिति में है। दोनों मंदिरों के बीच की दूरी मात्र 15 मीटर है और ये मंदिर वस्तुतः शिव मंदिर हैं। देवरानी मंदिर के तलविन्यास में आरंभिक चंद्रशिला और सीढ़ियों के पश्चात अर्द्धमंडप, अंतराल और गर्भगृह तीन प्रमुख भाग हैं। गर्भगृह का तल अंतराल से कुछ बड़ा है।

मंदिर की सीढ़ियों में शिवगण व अन्य देवियों तथा गंधर्वों की मूर्तियां बनाने में अनूठी कलात्मकता के दर्शन होते हैं। निचले हिस्से पर शिव-पार्वती विवाह दृश्य अंकित है और उभय पाश्र्वों पर गज, द्वारपाल व मकरमुख उत्कीर्ण है। प्रवेशद्वार के उत्तरी और दक्षिणी दोनों पाश्र्व चार-चार भागों में विभक्त हैं, जिनमें उत्तरी पाश्र्व में ऊपरी क्रम से उमा-महेश, कीर्तिमुख, द्यूत-प्रसंग व गंगा-भगीरथ का अंकन है। उमा-महेश प्रतिमा का लास्य, द्यूत प्रसग में हारे हुए शिव के नंदी का पार्वती-गणों के अधिकार में होना व भगीरथ अनुगामिनी गंगा स्पर्श से समर- वंशजों की मुक्ति, कलाकार की मौलिकता और कुशलता का परिचायक है। अत्यंत कलात्मक और बारीक पच्चीकारी वाले प्रवेश द्वार पर गजाभिषिक्त लक्ष्मी और शिव-कथानक का अंकन है।

जिठानी मंदिर तो अब लगभग ढह चुका है। इसमें ध्वस्त मंदिर से अत्यंत महत्वपूर्ण सामग्री उपलब्ध हुई है। जिठानी मंदिर में पूर्व व पश्चिम की सीढ़ियों से प्रवेश किया जा सकता है। उत्तर की ओर दो विशाल हाथियों का अग्र भाग है। विशाल स्तंभों व प्रतिमाओं के पादपीठ सहित विभिन्न आकार की ईंटों व विशालकाय पाषाणखंडों से निर्मित संरचना आकर्षित करती है। यहां प्रसन्नमात्र नामक शरभपुरीय शासक की उभरी हुई रजत मुद्रा भी प्राप्त हुई है, जिस पर ब्राह्मी के क्षेत्रीय रूप, पेटिकाशीर्ष लिपि में शासक का नाम अंकित है। शासक की यह एकमात्र रजत मुद्रा प्राप्त हुई, जबकि ऐसी स्वर्ण मुदाएं बहुतायत में मिली हैं। कलचुरियों की रतनपुर शाखा के दो शासक, रत्नदेव व प्रतापमल्ल की भी एक-एक मुद्रा प्राप्त हुई है, जिससे अनुमान होता है कि यह क्षेत्र लगभग बारहवीं सदी ई. तक निश्चय ही जनजीवन से संबद्ध रहा। इस बात की पुष्टि यहां प्राप्त अन्य सामग्री, मिट्टी के खिलौने व पात्र, टिकिया, मनके लौह उपकरण से होती है। 

मदिर में अर्द्धनारीश्वर, उमा-महेश, गणेश, कार्तिकेय, नायिका, नागपुरुष आदि विभिन्न प्रतिमाएं एवं स्थापत्यखंड प्राप्त हुए है। प्रतिमाओं का आकार भी उल्लेखनीय है। इनमें कुछ तो तीन मीटर से भी अधिक लबी हैं। प्रतिमाओं में अलौकिक सौंदर्य, आकर्षक अलंकरण तथा कमनीयता का संतुलित प्रदर्शन है। दो अन्य पाषाण प्रतिमाएं विष्णु और गौरी की हैं, इनका काल लगभग आठवीं सदी ई. है। ताला के इन मंदिरों पर गभीर शोध की आवश्यकता है।
यह लेख, ‘हिंदी का पहला साप्ताहिक अखबार‘ टेग लाइन और संतोष भारतीय के संपादन वाले, दिल्ली से प्रकाशित ‘चौथी दुनिया‘ के 16 से 22 अगस्त 1987 अंक के पृष्ठ 10 पर आया था। यह लेख छपने पर, सरसरीपन के कारण मुझे अच्छा नहीं लगा था, स्वीकार करते हुए सार्वजनिक करना आवश्यक समझता हूं, इसलिए यहां प्रस्तुत किया है।