Monday, July 19, 2021

ताला

इन मंदिरों पर से सदियां गुजर चुकी हैं 

मध्यप्रदेश में शिवनाथ की सहायक नदी मनियारी के बायें तट पर गुप्तकाल में निर्मित दो शैवमंदिर आज भी पांचवीं-छठी शताब्दी के मूक साक्षी बने खड़े हैं। ये मंदिर तत्कालीन शरभपुरीय शासकों के स्थापत्य प्रेम का प्रतीक तो हैं ही, साथ ही वैष्णव शासकों की धार्मिक सहिष्णुता का प्रतीक भी हैं। कभी इस भू-भाग ने पाषाणयुगीन मानव को भी आकर्षित किया था। यहां पाये गये लघु पाषाण उपकरण इस बात का प्रमाण हैं। 

बिलासपुर जिला मुख्यालय से 30 किलोमीटर दूर यह स्थान ‘ताला‘ नाम से जाना जाता है, जहां ये दो स्मारक भग्नप्राय स्थिति में विद्यमान है। स्थानीय लोगों में ये मंदिर ‘देवरानी-जिठानी के मंदिर‘ नाम से जाने जाते हैं। यह इन मंदिरों का दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है कि इक्का-दुक्का ही पुरातत्वविदों ने इनकी खोज-खबर ली। सन् 1873-74 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के प्रथम महानिदेशक ए. कनिंघम के सहयोगी जे.डी. बेग्लर को इनकी सूचना रायपुर के तत्कालीन असिस्टेंट कमिश्नर मि. फिशर द्वारा मिली थी। बेग्लर ने स्वयं तो इन स्मारकों को नहीं देखा, मगर रायपुर-बिलासपुर मार्ग पर पुरातात्विक महत्व के स्थल के रूप में ‘जिठानी-देवरानी का मंदिर‘ नाम दर्ज कर दिया गया। इसी शताब्दी के सातवें दशक के अंत में दुर्गा महाविद्यालय, रायपुर के डॉ. विष्णु सिंह ठाकुर ने इस स्थान की खोज-खबर ली। 

कुछ वर्ष पहले अमेरिकी शोधार्थियों और मध्यप्रदेश शासन ने इस स्थान की छानबीन की और छत्तीसगढ़ में पहली बार गुप्तकालीन मंदिरों की उपस्थिति का आभास लोगों को हुआ। इसी समय राज्य पुरातत्व विभाग ने इसके संरक्षण की चिंता पहली बार की। 1985 में राज्य पुरातत्व विभाग के तत्कालीन सलाहकार और संप्रति हॉर्वर्ड विश्वविद्यालय के डॉ. प्रमोदचंद्र ने इस स्थान का निरीक्षण किया, लेकिन इस सबके बाद भी यह स्थान मामूली चर्चा का ही विषय बन सका। 

कथित देवरानी और जिठानी मंदिर में, देवरानी अधिक सुरक्षित स्थिति में है। दोनों मंदिरों के बीच की दूरी मात्र 15 मीटर है और ये मंदिर वस्तुतः शिव मंदिर हैं। देवरानी मंदिर के तलविन्यास में आरंभिक चंद्रशिला और सीढ़ियों के पश्चात अर्द्धमंडप, अंतराल और गर्भगृह तीन प्रमुख भाग हैं। गर्भगृह का तल अंतराल से कुछ बड़ा है।

मंदिर की सीढ़ियों में शिवगण व अन्य देवियों तथा गंधर्वों की मूर्तियां बनाने में अनूठी कलात्मकता के दर्शन होते हैं। निचले हिस्से पर शिव-पार्वती विवाह दृश्य अंकित है और उभय पाश्र्वों पर गज, द्वारपाल व मकरमुख उत्कीर्ण है। प्रवेशद्वार के उत्तरी और दक्षिणी दोनों पाश्र्व चार-चार भागों में विभक्त हैं, जिनमें उत्तरी पाश्र्व में ऊपरी क्रम से उमा-महेश, कीर्तिमुख, द्यूत-प्रसंग व गंगा-भगीरथ का अंकन है। उमा-महेश प्रतिमा का लास्य, द्यूत प्रसग में हारे हुए शिव के नंदी का पार्वती-गणों के अधिकार में होना व भगीरथ अनुगामिनी गंगा स्पर्श से समर- वंशजों की मुक्ति, कलाकार की मौलिकता और कुशलता का परिचायक है। अत्यंत कलात्मक और बारीक पच्चीकारी वाले प्रवेश द्वार पर गजाभिषिक्त लक्ष्मी और शिव-कथानक का अंकन है।

जिठानी मंदिर तो अब लगभग ढह चुका है। इसमें ध्वस्त मंदिर से अत्यंत महत्वपूर्ण सामग्री उपलब्ध हुई है। जिठानी मंदिर में पूर्व व पश्चिम की सीढ़ियों से प्रवेश किया जा सकता है। उत्तर की ओर दो विशाल हाथियों का अग्र भाग है। विशाल स्तंभों व प्रतिमाओं के पादपीठ सहित विभिन्न आकार की ईंटों व विशालकाय पाषाणखंडों से निर्मित संरचना आकर्षित करती है। यहां प्रसन्नमात्र नामक शरभपुरीय शासक की उभरी हुई रजत मुद्रा भी प्राप्त हुई है, जिस पर ब्राह्मी के क्षेत्रीय रूप, पेटिकाशीर्ष लिपि में शासक का नाम अंकित है। शासक की यह एकमात्र रजत मुद्रा प्राप्त हुई, जबकि ऐसी स्वर्ण मुदाएं बहुतायत में मिली हैं। कलचुरियों की रतनपुर शाखा के दो शासक, रत्नदेव व प्रतापमल्ल की भी एक-एक मुद्रा प्राप्त हुई है, जिससे अनुमान होता है कि यह क्षेत्र लगभग बारहवीं सदी ई. तक निश्चय ही जनजीवन से संबद्ध रहा। इस बात की पुष्टि यहां प्राप्त अन्य सामग्री, मिट्टी के खिलौने व पात्र, टिकिया, मनके लौह उपकरण से होती है। 

मदिर में अर्द्धनारीश्वर, उमा-महेश, गणेश, कार्तिकेय, नायिका, नागपुरुष आदि विभिन्न प्रतिमाएं एवं स्थापत्यखंड प्राप्त हुए है। प्रतिमाओं का आकार भी उल्लेखनीय है। इनमें कुछ तो तीन मीटर से भी अधिक लबी हैं। प्रतिमाओं में अलौकिक सौंदर्य, आकर्षक अलंकरण तथा कमनीयता का संतुलित प्रदर्शन है। दो अन्य पाषाण प्रतिमाएं विष्णु और गौरी की हैं, इनका काल लगभग आठवीं सदी ई. है। ताला के इन मंदिरों पर गभीर शोध की आवश्यकता है।
यह लेख, ‘हिंदी का पहला साप्ताहिक अखबार‘ टेग लाइन और संतोष भारतीय के संपादन वाले, दिल्ली से प्रकाशित ‘चैथी दुनिया‘ के 16 से 22 अगस्त 1987 अंक के पृष्ठ 10 पर आया था। यह लेख छपने पर, सरसरीपन के कारण मुझे अच्छा नहीं लगा था। मगर यह स्वयं स्वीकार करते हुए सार्वजनिक करना आवश्यक समझता हूं, इसलिए यहां प्रस्तुत किया है।

2 comments:

  1. हमारे देश में जगह जगह ऐसे खूबसूरत ऐतिहासिक भग्नावशेष बिखरे पड़े हैं ,गाँव के लोग उनकी निर्माण सामग्री निकाल कर घरो में उपयोग करते हैं !मूर्तियों से बच्चे खेलते हैं !
    मगर ASI को उनसे कुछ लेनादेना नहीं उनका काम माह के अंत में अपनी तनख्वाह सुरक्षित रखना ही मुख्य कार्य है ! दुखद है यह सब जानना और देखना

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