Sunday, October 22, 2023

संग्रहालय विज्ञान

संचालनालय, संस्कृति एवं पुरातत्च, छत्तीसगढ़ की शोध पत्रिका ‘कोसल‘ की जिक्र पहले किया है। कोसल के अंक-10, वर्ष 2017 में पुस्तक समीक्षा- ‘संग्रहालय विज्ञान का परिचय‘ मेरी पुस्तिका संबंधी है। समीक्षा, वरिष्ठ संग्रहालय विज्ञानी अशोक तिवारी जी ने लिखी है,यहां प्रस्तुत है-

संग्रहालय विज्ञान का परिचय 

लेखक - राहुल कुमार सिंह 
प्रकाशक - छत्तीसगढ़ राज्य हिन्दी ग्रंथ अकादमी, रायपुर, 2017 
मुद्रक - महावीर ऑफसेट, रायपुर, छत्तीसगढ़ 
पृष्ठ संख्या - 59 (श्वेत - श्याम चित्र-27) मूल्य-50 रूपये ISBN-978-93-82313-26-7 

‘‘किसी देश अथवा काल की संस्कृति का प्रतिनिधित्व करने वाली मानव निर्मित अथवा प्राकृतिक, जड़ या चेतन वस्तुओं का संग्रह, संग्रहालय में हो सकता है। ये वस्तुएं जहां भूत व वर्तमान संस्कृति का प्रतिनिधित्व करती हैं वहीं सांस्कृतिक अभिरूचि की परिचायक भी होती हैं। संग्रहालय एक आदर्श एवं सर्वांग संपूर्ण सांस्कृतिक केन्द्र होता है। संग्रहालय का प्रमुख कार्य व उद्देश्य संस्कृति की पहिचान है। संस्कृति जो मानव की अस्मिता, अस्तित्व व उपलब्धि का रेखांकन होती है।‘‘

उपरोक्त वाक्य ‘‘संग्रहालय विज्ञान का परिचय‘‘ शीर्षक पुस्तक के प्रथम अध्याय के अंश हैं, जिसमें संग्रहालयों से संबंधित तमाम किस्म की जानकारियों को समेट कर उपलब्ध कराने की उद्देश्यपूर्ण और सुन्दर कोशिश की गई है। संग्रहालय विज्ञान पर हिन्दी में बहुत सारी पुस्तकें तो नहीं लिखी गई है, और खासकार ऐसा हैण्डबुक जैसी छोटी पुस्तिका, का तो लगभग अभाव सा है। लेखक श्री राहुल कुमार सिंह ने इस पुस्तक में संग्रहालयों के उद्देश्य एवं कार्य, संग्रहण व अधिग्रहण, भवन, पंजीकरण, प्रदर्शन, संरक्षण, सुरक्षा आदि विविध अध्यायों में संग्रहालय प्रबंधन से संबंधित विविध आयामों को जिस तरह से वर्णित किया है, वह इस विषय को पढ़ने वाले विद्यार्थियों तथा संग्रहालयों में कार्य करने वाले कर्मियों के लिए संक्षेप में सभी बातों को दृष्टिगोचर करता है। संग्रहालय प्रबंधन की विधा यूं तो संग्रहालय में कार्य करने वाला व्यक्ति, खुद काम करते हुए अपने अनुभव से रचता है किन्तु यदि इस पुस्तक में लिखी गई बातों को भी संग्रहालय कर्मी संदर्भित करते हुए कार्य करे तो निश्चित ही उसके प्रबंधन में अधिक गुणवत्ता आयेगी। 

छत्तीसगढ़ राज्य हिन्दी ग्रंथ अकादमी जिन्होंने इसका प्रकाशन किया है और श्री राहुल कुमार सिंह जिन्होंने इसे लिखा है, दोनों ही इस हेतु बधाई के पात्र हैं। यद्यपि इस पुस्तक में संग्रहालय विज्ञान के विविध आयामों का संक्षिप्त वर्णन किया गया है एवं जो बातें कही गई हैं वे पुरातात्विक संग्रहालयों से अधिक संबंधित हैं, तथापि लेखक ने अन्य विशेषीकृत संग्रहालयों जिसमें मुक्ताकाश संग्रहालय भी सम्मिलित हैं, को भी स्पर्श की सार्थक कोशिश की है। लेखक ने जहां संग्रहालय को संस्कृति पर ज्ञान का भण्डार निरूपित किया है, वहीं इस ज्ञान को दर्शकों तक संप्रेषित करने के तरीकों का भी बखूबी उल्लेख किया है। हालाकि वर्चुअल म्यूजियम, इन्टरेक्टिव डिस्पले, रेडियो टूर, नव संग्रहालयवाद तथा संग्रहालय विज्ञान से संबंधित आधुनिक तकनीक नवाचार आदि पर विस्तारण नहीं किया गया है तथापि इस क्षेत्र में थोड़ा सा झरोखा को लेखक ने खोला ही है। अपेक्षा है जब इसका दूसरा संस्करण आएगा तो लेखक इन सभी के साथ संग्रहालय शिक्षा, संग्रहालय आऊटरीच तथा संस्कृतियों के ‘इन सीटू‘ परिरक्षण पर भी प्रकाश डालेंगे। 

पुस्तक के अंत में संलग्न परिशिष्ट छत्तीसगढ़ राज्य में स्थित संग्रहालयों के बारे में परिचयात्मक जानकारी उपलब्ध कराता है। छत्तीसगढ़ के लिए यह गौरव की बात है कि यहां पर आज से 140 वर्ष से भी पहले एक संग्रहालय की स्थापना की गई थी, तब शायद पूरे देश में एक दर्जन संग्रहालय नहीं रहे होंगे। पुस्तक में ‘महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय‘ के नाम से इस संग्रहालय के बारे में पढ़ना एक सुखद अनुभूति है। छत्तीसगढ़ में पुरातात्त्विक उत्खनन स्थलों पर विकसित स्थल संग्रहालय तथा रायपुर शहर में लगभग 200 एकड़ में निर्मित किये जा रहे ‘पुरखौती मुक्तांगन‘ नामक मुक्ताकाश संग्रहालय के साथ ही राज्य के अनेक जिला मुख्यालयों और अन्य स्थानों पर स्थापित किये गये संग्रहालयों पर उपलब्ध कराई गई जानकारी इस पुस्तक की महत्ता में अभिवृद्धि करता है। अपेक्षा है कि पाठक इस पुस्तक से संग्रहालय विज्ञान पर संक्षिप्त किन्तु सटीक और समेकित जानकारी प्राप्त कर सकेंगे । 

-अशोक तिवारी, रायपुर 
(इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय, भोपाल के सेवानिवृत्त अधिकारी)

Saturday, October 21, 2023

बेलदार सिवनी

छत्तीसगढ़ राज्य गठन के साथ पुरातत्व, संस्कृति विभाग के अंतर्गत, संचालनालय सस्कृति एवं पुरातत्व के रूप में आया। संचालनालय द्वारा पत्रिका ‘बिहनिया‘ का प्रकाशन आरंभ हुआ, जो मुख्यतः संस्कृति से संबंधित थी, वहीं शोध पत्रिका ‘कोसल‘ का भी प्रकाशन किया जाने लगा, जो पुरातत्व की प्रतिष्ठित शोध पत्रिका के रूप में स्थापित हुई। विभागीय दायित्वों के निर्वाह के क्रम में शोध पत्रिका ‘कोसल‘ के संपादक के रूप में मेरा नाम होता था, यह मुख्यतः विभागीय उत्तरदायित्व की दृष्टि से होता था। पत्रिका के संपादन में प्रो. ए.एल. श्रीवास्तव, प्रो. लक्ष्मीशंकर निगम और श्री जी.एल. रायकवार जैसे विद्वानों की मुख्य भूमिका होती थी।

यह भूमिका शोध पत्रिका ‘कोसल‘ के अंक-10, वर्ष 2017 में प्रकाशित दो प्रविष्टियों के संदर्भ में है। पत्रिका के इस अंक के संपादन में उक्तानुसार नाम हैं, जिसमें पुस्तक समीक्षा- ‘संग्रहालय विज्ञान का परिचय‘ मेरी पुस्तिका संबंधी है तथा इसी अंक में एक अन्य लेख मेरे द्वारा किए गए ग्राम बेलदार सिवनी के स्थल निरीक्षण से संबंधित है। प्रसंगवश ‘बेलदार‘ में मेरी जिज्ञासा लंबे समय से रही है। कुछ गांवों में बेलदारपारा तो है, मगर वहां बेलदार समुदाय का कोई नहीं। यह भी जानकारी मिलती है कि बेलदार, तालाब निर्माण के विशेषज्ञ, राजमिस्त्री होते हैं और इन्हीं में एक वर्ग सैनिेक-योद्धा भी है। सिरपुर में बेलदार समाज के आराध्य मंदिर होने की भी जानकारी मिलती है। बहरहाल, यहां इस स्थल निरीक्षण का प्रतिवेदन, जिसके आधार पर लेख रूप में प्रस्तुति के लिए श्री रायकवार का सहयोग मिला-

बेलदार सिवनी (तिल्दा नेवरा) से ज्ञात प्रतिमाएं
राहुल कुमार सिंह 

छत्तीसगढ़ में अनेक स्थलों से संयोग अथवा आकस्मिक रूप से प्राप्त होने वाले पुरावशेषों के वर्ग में आहत सिक्कों से लेकर विभिन्न राजवशों के सिक्के, मृणमयी मुद्रायें, ताम्रपत्र तथा प्रतिमायें आदि पुरावशेष गैर पुरातत्त्वीय स्थलों से प्राप्त हुये हैं। विगत वर्षों में छत्तीसगढ़ में सिरपुर, मल्हार, महेशपुर, लीलर, सिली पचराही, तरीघाट, मदकूद्वीप, डमरू, राजिम, आदि स्थलों से सम्पन्न उत्खनन कार्य से अज्ञात तथा दुर्लभ प्रकार के अनेकानेक पुरावशेषों की उपलब्धि हुई है जिनसे प्रदेश का सांस्कृतिक एवं राजनैतिक इतिहास समृद्ध हुआ है। 

छत्तीसगढ़ के एक अत्यंत महत्वपूर्ण पुरास्थल मल्हार (बिलासपुर) से कृषकों को भू-सतह से आकस्मिक रूप से विभिन्न प्रकार के लघु पुरावशेष प्राप्त होते रहे हैं। इस ग्राम के एक कृषक श्री गुलाब सिंह ठाकुर द्वारा भू-सतह से संग्रहीत विविध प्रकार के लघु पुरावशेषों का अच्छा संग्रह किया गया है। इनमें से कुछ विशिष्ट अवशेषों का विद्वानों के द्वारा अध्ययन कर शोध ग्रंथों में प्रकाशन भी किया गया है। प्राचीन बसाहटों के भू-सतह से लघु पुरावशेषों का संग्रहण धैर्यपूर्ण तथा उबाऊ शौक के साथ-साथ एक कला भी है जिसके लिए रूचिसम्पन्न होना एक अनिवार्य गुण है। पुरावशेषों के महत्व से परिचित तथा खोज के क्षेत्र में समर्पित व्यक्ति अपने धैर्यपूर्ण परिश्रम तथा लगन से संकलित सिक्कों, अभिलिखित ठीकरों, पकी मिट्टी से निर्मित खिलौनों, मुहरों तथा प्रतिमा फलकों के माध्यम से संबंधित स्थल के विस्मृत वैभव को उजागर करने इतिहासकारों तथा पुराविदों को स्थल के अध्ययन, प्रकाशन तथा पुरातत्त्वीय कार्य के लिये उत्प्रेरित करते हैं। कालान्तर में मल्हार (बिलासपुर) में उत्खनन का सबसे ठोस आधार भू-सतह से विभिन्न प्रकार के प्रचुर पुरावशेषों की उपलब्धि रही है। 

गैर पुरातत्त्वीय स्थलों में उपलब्ध होने वाले प्राचीन लघु प्रतिमाओं की दृष्टि से रायपुर जिले के ग्राम हीरापुर (रायपुर नगर का विस्तारित आवासीय क्षेत्र) तथा ग्राम बेलदार-सिवनी (तिल्दा नेवरा) उल्लेखनीय है। उपरोक्त दोनों स्थलों के प्रतिमाओं की कलाशैली तथा प्राप्त होने की स्थिति में पर्याप्त समानताएं है। वर्ष 2010 में हीरापुर में नाली निर्माण के लिए की जा रही खुदाई के समय एक कच्चे मकान से संलग्न भाग पर लगभग पांच फीट की गहराई में मजदूरों को लघु आकार की कुछ प्रतिमाएं दबी हुई स्थिति में प्राप्त हुई थीं। इन प्रतिमाओं में कार्तिकेय, एकमुख लिंग, लज्जागौरी तथा विष्णु प्रतिमा उल्लेखनीय हैं। ये प्रतिमाएं चारों ओर से कोर कर निर्मित की गई हैं। इन पुरावशेषों को कुछ समय तक एक स्थानीय मंदिर में पूजा उपासना हेतु संग्रह कर रखा गया था। स्थानीय प्रशासन के सहयोग से इन्हें संग्रहालय हेतु अवाप्त कर लिया गया है। 

ग्राम बेलदार सिवनी के चतुर्दिक दस किलोमीटर के क्षेत्र में ऐतिहासिक स्मारक स्थल नहीं है। तथापि ग्राम में स्थित आधुनिक शिव मंदिर में पूजित प्राचीन शिवलिंग तथा अन्य क्षरितप्राय प्रतिमाखंड रखे हुये हैं। ग्राम में प्रवेश करते ही बायीं ओर एक प्राचीन सरोवर है जिसके चारों ओर पक्का घाट निर्मित है। अनुमानतः यह सरोवर कलचुरि-मराठा काल में निर्मित है। विगत वर्ष स्थानीय सरपच श्री विजय वर्मा के माध्यम से आवासीय उद्देश्य से निर्माण कार्य के समय प्राचीन प्रतिभाए उपलब्ध होने की जानकारी प्राप्त होने पर विभाग के सेवानिवृत्त उप संचालक श्री जी. एल रायकवार, तकनीकी कर्मचारी सर्वश्री प्रभात कुमार सिंह, पर्यवेक्षक तथा प्रवीन तिर्की, उत्खनन सहायक के साथ स्थल निरीक्षण किया गया। विवेच्य प्रतिमाओं का प्राप्ति स्थल (चित्र क्र. 1) श्रीमती गीता वर्मा, पंच, वार्ड क्रमांक 9 के स्वामित्व का आवासीय मकान है। इस मकान से संलग्न बाड़ी में शौचालय निर्माण हेतु गड्ढा खोदने के दौरान भू-सतह से लगभग नौ फीट की गहराई में लघु आकार की प्रस्तर निर्मित 9 प्राचीन प्रतिमाएं व अन्य अवशेष उपलब्ध हुये (चित्र क्र. 2)। 

उपलब्ध पुरावस्तुओं के संबंध में संक्षिप्त जानकारी निम्नानुसार है- 

क्र. - पुरावशेष का नाम - सामग्री - आकार - चित्र संख्या

1- एकमुख लिंग - प्रस्तर - 17.5X8X5 सेमी. - 3 
2- एकमुख लिंग - प्रस्तर - 20X7.5X6.5 सेमी. - 4 

3 - पार्वती - प्रस्तर - 10.5X5X3.5 सेमी - 5 
4 - कार्तिकेय - प्रस्तर - 15.5X8X3.5 सेमी. - 6
5 - कार्तिकेय - प्रस्तर - 17.5X7.5X3 सेमी.-7 
6 - मानवाकृति नंदी - प्रस्तर - 11.5X10X4.5 सेमी. - 8 

7 - कुबेर -प्रस्तर - 13X9X6 सेमी. - 9 
8 - कुबेर -प्रस्तर - 12X9X3.5 सेमी. - 10 
9 - सिंह - प्रस्तर - 10.5X6.5X3.5 सेमी. - 11 
10 - पायेदार सिलबट्टा - प्रस्तर 17.5X145X13 सेमी. - - 

प्राप्त मूर्तियाँ शैव एवं शाक्त धर्म से संबंधित हैं तथा बलुआ प्रस्तर से खिलौनानुमा लघु आकार में निर्मित हैं। आकार की दृष्टि से विवेच्य प्रतिमाएं चल विग्रह हैं तथा मुख्यतः तीर्थ यात्रियों, दीर्घकाल तक यात्रा करने वाले व्यवसायियों तथा राजकीय शिविरों में प्रवास काल में अर्चना के लिये उपयोग में लायी जाती रही होंगी। लघु आकार की धातु तथा प्रस्तर प्रतिमाएं, गृहस्थों के पूजा घरों में भी उपयोग में लायी जाती थीं। छत्तीसगढ़ अंचल में घरो के आंगन में तुलसी चौरा पर शालग्राम अथवा शिवलिंग की पिंडी रखे जाने की परंपरा अद्यतन दिखाई पड़ती है। सूर्य को जल अर्पण, शिवलिंग का जलाभिषेक तथा तुलसी के बिरवा की पूजा एक साथ सम्पन्न करने की यह सुंदर और सरल देशज विधि है। एक ही जगह पर गहराई में हंडा (दफीने) के सदृश्य लघु आकार की प्रतिमाओं को दबा कर गुप्त रूप से रखे जाने की प्रथा के संबंध में यह भी अनुमान होता है कि संबंधित स्थल में प्रस्तर शिल्पकार निवास करते थे तथा व्यवसायिक प्रयोजन से प्रतिमाओं का निर्माण करते थे अथवा अन्यत्र स्थल के व्यवसायी विक्रय करने के लिए इन्हें लाया करते। किसी आकस्मिक दुर्घटनाजन्य परिस्थिति के कारण इन प्रतिमाओं को सुरक्षित रखने, अपवित्र अथवा दूषित होने से बचाने के उद्देश्य से अथवा अज्ञानतावश अमंगलजनक समझकर किसी निश्चित एकांत स्थल पर भूमि के भीतर गहराई में दबा दिये जाते रहे होंगे। गैर पुरातत्त्वीय स्थलों से क्षेत्रीय कला शैली से पृथक कला शैली की लघु प्रतिमाओं/सिक्कों/मृत्पात्रों, पकी मिट्टी की मुहरों आदि की उपलब्धि से सांस्कृतिक एकता, परस्पर प्रभाव तथा तद्युगीन यात्रा पथों का एक संकेत प्राप्त होता है। 

संक्षेप में पृथक कला शैली के लघु पुरावशेषों की उपलब्धियों के निम्न कारण हो सकते हैं- 

1. तीर्थयात्रियों के द्वारा पडाव स्थलों में नित्य पूजा आराधना के लिए लघु प्रतिमायें साथ में रखी जाती रही होंगी। 
2. तीर्थ स्थल अथवा किसी अन्य कला केन्द्रों प्रत्यावर्तन के समय यात्रियों के द्वारा अल्पमूल्य, अल्पभार, आकर्षक एवं लघु आकृति के कारण पूजा-आराधना अथवा स्मृति चिन्ह के रूप में क्रय कर नियत गन्तव्य तक ले जाया जाता रहा होगा। 
3. लघु प्रतिमाओं का निर्माण प्राप्ति स्थल में ही यायावर शिल्पी समुदाय द्वारा किया जाता रहा होगा। किसी दुर्घटना के कारण इन्हीं शिल्पियों के द्वारा निर्मित लघु कलाकृतियाँ बाद में दबी हुई स्थिति में प्राप्त होती हैं। 

विवेचित कला शैली की लघु आकार की प्रतिमाएं छत्तीसगढ़ के मल्हार, हीरापुर तथा बेलदार सिवनी से उपलब्ध हुयी हैं। इन प्रतिमाओं के आकार, बनावट तथा कला शैली में समानताएं हैं। इनमें अलंकरण अत्यल्प हैं। रूपाकृति मूल विषयवस्तु पर केन्द्रित है। अतिरिक्त पौराणिक अथवा अलंकरणात्मक विस्तार का अभाव है। यक्ष आकृतियों के स्थूल सौंदर्य के सदृश्य प्रतिमालक्षण से परिपूर्ण हैं। इन कलाकृतियों में मूर्ति शिल्प के विकास, क्षेत्रीय परंपरा तथा तद्युगीन लुप्त प्रचलित संप्रदाय भी आभासित होता है। यक्ष परंपरा के संवाहक लघु आकार की देव आकृतियों की आराधना विशिष्ट साधना पथ का संकेतक है। 

बेलदार सिवनी से प्राप्त एकमुख लिंग प्रतिमाओं के बनावट में समरूपता नहीं है। मुख तथा शीर्ष के केश विन्यास में अंतर है तथापि दोनों प्रतिमाओं के ग्रीवा में ग्रैवेयक प्रदर्शित हैं। एक किंचित बड़े आकार के मुखलिंग में प्रौढ़ता तथा दूसरी प्रतिमा में सौम्यता प्रदर्शित है। कार्तिकेय की प्राप्त दोनों स्थानक प्रतिमायें दंडधर के सदृश्य दायें हाथ में शूल (शक्ति) धारण किये हैं। उनके शीर्ष में त्रिशिखी केश विन्यास है। ललितासन में आसनस्थ कुबेर के दायें हाथ में पात्र (चषक) तथा बायें हाथ में नकुली है। उनके शिरोभाग पर आकर्षक केश विन्यास है। पार्वती के दायें हाथ में स्थूल शूल है। मानव रूप में वज्रासन में बैठे हुये नंदी दोनों हाथ जोड़े हुये हैं। पिछले दोनों पैरों पर बैठे तथा अगले पैरों पर भार देकर उन्नत ग्रीव सिंह का मुख किंचित खंडित है। बेलदार सिवनी से प्राप्त लघु आकार की प्रतिमाओं में कला की प्रौढ़ता, सौष्ठव तथा सौंदर्य की अपेक्षा क्षेत्रीय प्रभाव अधिकतम प्रदर्शित है। इन प्रतिमाओं का काल लगभग 7वीं से 8वीं सदी ईसवी प्रतीत होता है। 
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Monday, October 16, 2023

रायपुर का गभरापारा

रायपुर में गभरापारा का पता करने निकले, जल्दी और आसानी से कुछ हासिल होने की संभावना बहुत कम है, लेकिन लगे रहें तो कई दिशाएं, परतें खुल सकती हैं। मेरे लिए अपना-पराया का द्वंद्व है, रायपुर। अपना हो तो जाना पहचाना, पराया हो तो जान-पहचान के लिए मौन आग्रह, आपके लिए कोई न कोई भेद-रहस्य सामने आते रहेंगे और अपने-पराये इस शहर को जानने-पहचानने की रोमांचक-जिज्ञासा, इसलिए आकर्षण बना रहेगा। शहर आपको तभी अपनाता है, जब आप शहर को अपना लें। मुनीर की बात थोड़े फेर-बदल से ‘जिस शहर में भी रहना अपनाए (न कि उकताए) हुए रहना।‘

बहरहाल, गभरापारा की तलाश क्यों? जवाब सीधा सा है, पता लगता है कि 1867 में रायपुर म्युनिसिपल बना, इसमें रायपुर के साथ चिरहुलडीह, डंगनिया और गभरापारा बस्ती शामिल थी। चिरहुलडीह और डंगनिया तो सारे बाशिंदों के लिए सहज है, मगर गभरापारा लगभग भुला दिया गया, इसलिए पहेली बन जाता हैै और बूझना जरूरी, क्योंकि यह रायपुर नगरपालिका की बुनियाद में है, अपनी जड़ों से कौन अनजान रहना चाहेगा।

टिकरापारा, मठपारा के लोग अपने इस पड़ोस के न सिर्फ नाम से परिचित हैं, उन पुरानी स्थितियों को भी याद करते हैं कि कुछ नीची-गहरी भूमि वाला क्षेत्र था, टिकरा के साथ तुक मिलाते, उसका युग्म शब्द- गभरा। टिकरा-गभरा जोड़े के साथ ध्यान रहे कि टिकरा की तरह का एक प्रकार है, थोड़ी ऊंचाई वाली कृषि भूमि टिकरा कहलाती है तो गभरा या गभार का आशय गहरी उपजाऊ भूमि होता है।

गभरा या गभार, गर्भ से बना जान पड़ता है। रायपुर गजेटियर 1909 के अनुसार गभार का मतलब flat land (सपाट भूमि) है। अनुमान होता है कि आसपास की उच्च-असमतल भूमि की तुलना में यह अर्थ आया है। डॉ. पालेश्वर शर्मा के अनुसार ‘गर्भ धारण की क्षमता के कारण खेत गभार कहलाते हैं। इन खेतों का मूल्य अधिक होता है।‘ चन्द्रकुमार चन्द्राकर के शब्दकोश में ‘गभार‘ का अर्थ ‘खेत का गर्भ स्थल‘, ‘खेत का गहरा भाग‘ और ‘वह खेत जिसके गर्भ से अच्छी फसल हो, उपजाऊ भूमि‘ बताया गया है। इस मुहल्ले के आसपास के बाशिंदों की याद में भी यह ऐसी ही भूमि वाला क्षेत्र रहा है।

गभरा-गभार से जुड़े या इसके आसपास के शब्द, जो कभी सुना था याद आने लगे। सरगुजा कुसमी-सामरी में कन्हर के दाहिने तट पर प्राचीन स्मारक अवशेषों वाला गांव ‘डीपाडीह‘ स्थित है। डीह, पुरानी बसाहट के अवशेष वाली टीलानुमा भूमि और डीपा, संस्कृत का डीप्र या छत्तीसगढ़ी का डिपरा, जो खंचवा का विपरीतार्थी यानि उच्चतल भूमि का द्योतक है। कन्हर के बायें यानि डीपाडीह के दूसरी ओर गांव है गभारडीह, जिसका उच्चारण गम्भारडीह जैसा होता है। यहां कन्हर का दाहिना तट डीपा-ऊंचा है और बायां तट गभार-नीचा।

इसी तरह टटोलते-खंगालते याद करते बगीचा का हर्राडीपा-गभारकोना मिला। जशपुर का डीपाटोली-गम्हरिया और जिले का ऊंच घाट-नीच/हेंठ घाट तो है ही। बिलाईगढ़ के जोगीडीपा का जोड़ा धनसीर बनाता है। धन, समृद्धि या धान ध्वनित करता है और सीर का एक अर्थ हल होता है, राजा जनक का एक नाम सीरध्वज भी है, जिनकी ध्वजा पर हल हो। सीर का एक अन्य अर्थ, गांव की सबसे उपजाऊ भूमि, जिस पर गौंटिया का ‘पोगरी‘ अधिकार होता था और जो गांव में खेती की जमीन के कुल रकबे का छठवां हिस्सा होता था। रायपुर के आसपास के जोगीडीपा की जोड़ी तरीघाट यानि डीपा-तरी बनती है।

इन सबके साथ एक सफर महासमुंद, बागबहरा का, जहां एक हिस्सा डांगाडिपरा है। बागबहरा का बाग, संभवतः ‘बाघ‘ है। छत्तीसगढ़ में बगदरा, बगदेवा, बगदेई जैसे नाम का बग, वस्तुतः बघ-बाघ ही है और बहरा, गहरी या बरसाती जल-प्रवाह के रास्ते वाली भूमि, जहां पानी ठहरता हो, धान की खेती के लिए उपयुक्त भूमि। बहरा का जोड़ा यहां डिपरा है और वह भी डांगा, यानि डांग- बांस की तरह, लंबा-ऊंचा।

डांग के साथ प्रचलित शब्द डंगनी, डांग कांदा या डंगचगहा को याद कर लें। उूंचाई तक पहुंचने के लिए बांस का डंडा डंगनी तो उूंची लता वाला कांदा, डांग कांदा है और बांस पर चढ़ कर करतब दिखाने वाले डंगचगहा। इसी से जुड़कर वापस रायपुर नगरपालिका के डंगनिया में, जो बांस की अधिकता वाला या ऊंचाई वाला क्षेत्र होगा। इसी तरह चिरहुलडीह में चिरहुल, सिलही चिड़िया, Lesser whistling Teal है। बात रह गई रायपुर के राय की, तो ‘राय‘, मुख्य, महत्वपूर्ण, खास, बड़ा आदि अर्थ देता है। जामुन के दो प्रकारों में एक चिरई जाम, छोटे आकार का, जिसकी गुठली, बमुश्किल चने के बराबर होती है और दूसरा बड़ा, राय जाम। राय-रइया रतनपुर या ‘राय-रतन दुनों भाई‘ के साथ रायपुर के संस्थापक माने गए ब्रह्मदेव, जैसा उन्हें रायपुर शिलालेख संवत 1458 में संबोधित किया गया है- ‘महाराजाधिराजश्रीमद्रायब्रह्मदेव‘, राय ब्रह्मदेव का तो रायपुर है ही।

Saturday, October 14, 2023

जाना-अनजाना रायपुर

खारुन के मंथर प्रवाह के साथ मानव सभ्यता को कई ठौर ठिकाने मिले- कउही, परसुलीडीह, तरीघाट, खट्टी, खुड़मुड़ी, उफरा और जमरांव में सदियों की बसाहट के प्रमाण हैं। यह क्रम नदी के दाहिने तट पर मानों ठिठक गया, महादेव घाट-रायपुरा पहुंचते। हजार साल से भी अधिक पुराने अवशेष इतिहास को रोशन करते हैं। बसाहट को आकर्षित किया पूर्वी जल-थल ने। सपाट ठोस-मजबूत थल और उसके बीच जगह-जगह पर भरी-पूरी जलराशि। यही बसाहट- रायपुर, तीन सौ तालाबों का शहर बना। 

मैदानी-मध्य छत्तीसगढ़, लगभग बीचों-बीच शिवनाथ से दो हिस्सों में बंटता है। छत्तीस गढ़ों के लिए कहा गया है, शिवनाथ नदी के उत्तर में अठारह और शिवनाथ नदी के दक्षिण में अठारह। ये सभी गढ़ राजस्व-प्रशासनिक केंद्र थे। कलचुरि शासकों के इन सभी छत्तीस गढ़ों का मुख्यालय रतनपुर था, किंतु अनुमान होता है कि शिवनाथ नदी के कारण और दक्षिणी अठारह गढ़ों की सीमा नागवंशियों से जुड़ी होने के कारण, इस अंचल में एक अन्य मुख्यालय आवश्यक हो गया। 

कलचुरि शासक ब्रह्मदेव के दो शिलालेख पंद्रहवीं सदी के आरंभिक वर्षों के हैं, जिनसे ब्रह्मदेव के वंश में उसके पिता रामचंद्र के क्रम में सिंहण और लक्ष्मीदेव की जानकारी मिलती है। लक्ष्मीदेव को रायपुर शुभस्थान का राजा बताया गया है। शिलालेख से सिंहण द्वारा अठारह गढ़ जीतने और फिर उसके पुत्र रामदेव/रामचंद्र द्वारा नागवंशियों को आहत करने की जानकारी मिलती है। शिलालेख में रोचक उल्लेख है कि ‘नायक हाजिराजदेव ने हट्टकेश्वर मंदिर बनवाया ... रायपुर में रहने वाली सुंदर स्त्रियां जो कामदेव को जीवित करने के लिए स्वयं संजीवनी औषधियां हैं, यहां के सुखों के कारण कुबेर की नगरी को मन में तुच्छ समझती हैं।‘ कलचुरि शासकों के पुराने केंद्र रतनपुर की बुढ़ाती जड़ों के समानांतर रायपुर शाखा की नई पौध-रोपनी ताकतवर होती गई, और सन 1818 में छत्तीसगढ़ का मुख्यालय रतनपुर से रायपुर स्थानांतरित हो गया।

बाबू रेवाराम की पंक्तियां हैं- 
मोहम भये सुत जिनके, सूरदे नृप नायक तिनके। 
ब्रह्मदेव तिनके अनुज, मति गुण रूप विशाल। 
दायभाग लै रायपुर, विरच्यो बूढ़ा ताल। 

मुख्य सड़क से जुड़े होने के कारण अब बूढ़ा तालाब और तेलीबांधा सामान्यतः जाने-पहचाने जाते हैं, मगर इनके साथ आमा तालाब, राजा तालाब, कंकाली तालाब, महाराजबंद सहित मठपारा के तालाब आदि कई जलाशयों का अस्तित्व अभी बचा हुआ है, जबकि पंडरीतरई, रजबंधा का नाम ही रह गया है और लेंडी तालाब अब शास्त्री बाजार है। 

उन्नीसवीं सदी में रायपुर के विकास के कुछ मुख्य कार्यों की जानकारी मिलती है, जिनमें 1804 में भोसलों और अंग्रेजों के मध्य संधि के फलस्वरूप डाक सेवा का आरंभ हुआ। 1820-25 के दौरान रायपुर-नागपुर सड़क निर्माण कराया गया। राजकुमार कालेज परिसर का लैंप पोस्ट, जिस पर ‘नागपुर 180 मील‘ अंकित है, अब भी सुरक्षित है। 1825 में सदर बाजार मार्ग निर्माण हुआ। 1825-30 के बीच मिडिल तथा नार्मल स्कूल और दो अस्पतालों का निर्माण हुआ। बाबू साधुचरणप्रसाद ने ‘भारत-भ्रमण में लिखा है- ‘सन 1830 में रायपुर का वर्तमान कसबा बसा। पुराना कसबा इससे दक्षिण और पश्चिम था।‘ 1860 में रायपुर से बिलासपुर और रायपुर से धमतरी के लिए सड़क बनी। रायपुर में म्युनिसिपल कमेटी का गठन 1867 में हुआ। 1868 में केंद्रीय जेल भवन, गोल बाजार तथा दो सार्वजनिक उद्यानों का निर्माण हुआ। 1875 में राजनांदगांव के महंत घासीदास के दान से संग्रहालय का निर्माण हुआ, जो जनभागीदारी से बना देश का पहला संग्रहालय है। 

1887 में टाउन हॉल, सर्किट हाउस, अस्पताल भवन बना तथा इसी दौरान लेडी डफरिन जनाना अस्पताल भी खुला। 1888 में रायपुर तक आई रेल की बड़ी लाइन, आगे खड़गपुर होते 1900 में कलकत्ता से जुड़ गई। 1890 में रायपुर-कलकत्ता सड़क, रायपुर-बलौदा बाजार सड़क और धमतरी रेल लाइन बनी। 1892 में ‘बलरामदास वाटर वर्क्स‘ नाम से खारुन से जल-प्रदाय आरंभ हुआ। सरकारी मिडिल स्कूल 1887 में गवर्नमेंट हाई स्कूल का दरजा पा गया, तब यह कलकत्ता विश्वविद्यालय से फिर 1894 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से संबद्ध हुआ। 1894 में राजकुमार कॉलेज जबलपुर से रायपुर आ गया, 1939 तक यहां सिर्फ राजकुमारों को प्रवेश दिया जाता था। महाविद्यालयीन शिक्षा के लिए 1938 में दाऊ कामता प्रसाद के दान, शिक्षाशास्त्री जे. योगानंदम की इच्छा-शक्ति और तत्कालीन नगर पालिका अध्यक्ष ठा. प्यारेलाल सिंह के सद्प्रयासों से रायपुर में छत्तीसगढ़ कॉलेज की स्थापना हुई।

1867 में म्युनिसिपल बना, जिसकी सीमा में रायपुर के साथ चिरहुलडीह, डंगनिया और गभरापारा बस्ती शामिल थी। टिकरापारा से संलग्न गभरापारा लगभग भुला दिया गया नाम हैै। गभरा शब्द भी सामान्य प्रचलन में अब नहीं है। टिकरा-गभरा जोड़े के साथ ध्यान रहे कि गभरा या गभार, टिकरा की तरह कृषि भूमि का एक प्रकार है, जिसका आशय गहरी उपजाऊ भूमि होता है। रायपुर की शान रहे, रजवाड़ों और जमींदारों के बाड़े- खैरागढ़, रायगढ़, खरियार, छुईखदान, छुरा, कवर्धा, फिंगेश्वर, बस्तर, कोमाखान आदि अधिकतर अब स्मृति-लोप हो रहे हैं। और बीसवीं सदी के आरंभ में सिंचाई विभाग की स्थापना और नहर निर्माण के साथ महानदी का पानी खेतों तक पहुंचने लगा। तब तक रायपुर की जनसंख्या 30000 पार कर चुकी थी।

सबसे पुरानी कामर्शियल बैंक, 1912 में स्थापित इलाहाबाद बैंक है। को-ऑपरेटिव बैंक 1913 में और इंपीरियल बैंक 1925 में स्थापित हुआ। बिजली अक्टूबर 1928 में आई, मगर व्यवस्थित होने में समय लगा, जब 1939 में 240 किलोवॉट का पावर हाउस स्थापित हो गया। 1950-51 में ईस्टर्न ग्रिड सिस्टम के अंतर्गत रायपुर पायलट स्टेशन बना, तब रायपुर पावर हाउस का काम शासकीय विद्युत विभाग द्वारा किया जाने लगा।

पुराने रायपुर को इन शब्द-दृश्यों में देखना रोचक है- 1790 में आए अंग्रेज यात्री डेनियल रॉबिन्सन लेकी बताते हैं- यहां बड़ी संख्या में व्यापारी और धनाढ्य लोग निवास करते हैं। यहां किला है, जिसके परकोटे का निचला भाग पत्थरों का और ऊपरी हिस्सा मिट्टी का है। किले में पांच प्रवेश द्वार हैं। पास ही रमणीय सरोवर है। पांच साल बाद आए कैप्टन जेम्स टीलियर? ब्लंट गिनती में बताते हैं कि नगर में 3000 मकान थे। नगर के उत्तर-पूर्व में बहुत बड़ा किला है, जो ढहने की स्थिति में है। 

सन 1893 का विवरण यायावर बाबू साधुचरण ने दिया है, जिसके अनुसार रेलवे स्टेशन से एक मील दूर पुरानी धर्मशाला से दक्षिण गोल नामक चौक (गोल बाजार) में छोटी-छोटी दुकानों के चार चौखूटे बाजार हैं। गोल चौक से दक्षिण दो मील लंबी एकपक्की सड़क है। जिसके बगलों में बहुतेरे बड़े मकान और कपड़े, बर्तन इत्यादि की दुकानें बनीं हैं। ... प्रधान सड़कों पर रात्रि में लालटेने जलती हैं। ... एक पुराना जर्जर किला देख पड़ता है, जिसको सन् 1460 ई. में राजा भुवनेश्वर देव ने बनवाया था। ... किले के दक्षिण आधा वर्ग मील में फैला महाराज तालाब है। तालाब के बांध के निकट श्रीरामचंद्र का मंदिर (दूधाधारी) खड़ा है। जिसको सन् 1775 में रायपुर के राजा भीमाजी (बिंबाजी) भोंसला ने बनवाया।‘ इस विवरण में कंकाली तालाब, आमा तालाब, तेलीबांधा, राजा तालाब का भी उल्लेख है। कोको तालाब के लिए बताया गया है कि इसमें गणेश चौथ के अंत में गणपति जी की मूर्तियां विसर्जित होती हैं, (ध्यान देने वाली बात कि इसी विवरण-वर्ष यानि 1893 में तिलक ने गणेशोत्सव को सार्वजनिक उत्सव का स्वरूप दिया था।) व्यापार संबंधी जानकारी आई है कि गल्ले, कपास, लाह (लाख) और दूसरी पैदावार की सौदागरी बढ़ती पर है। साथ ही यह भी बताया गया है कि वर्तमान कस्बे के दक्षिण और पश्चिम छोटी नदी के किनारे महादेव घाट तक रायपुर का पुराना कस्बा बसा था। 

रायपुर की जनांकिकी की दृष्टि से 2011 की जनगणना में 10 लाख आबादी का आंकड़ा पार यह बसाहट, यही कोई 500 साल बीते, खारुन नदी के किनारे का रायपुरा फैलकर पुरानी बस्ती के साथ रायपुर बनने लगा। कलचुरी आए और राजधानी की नींव पड़ी। अब तक सरयूपारी ब्राह्मण आ चुके थे। राजपूत, पहले कलचुरियों के साथ और बाद में गदर के आगे-पीछे आए। वैश्य, यहां रहते छत्तीसगढ़िया दाऊ बन चुके थे। राजधानी ने अन्य को भी आकर्षित किया। मठपारा, कुम्हारपारा, बढ़ईपारा, अवधियापारा, गॉस मेमोरियल, ढीमरपारा, मौदहापारा, यादवपारा, सोनकर बाड़ा, बूढ़ा तालाब, तेलीबांधा वाले इस शहर में चौबे कालोनी, शंकर नगर, सुंदर नगर और विवेकानंद नगर भी बसा। रजबंधा का शहीद स्मारक, प्रेस काम्प्लेक्स तक सफर तो पूरा अध्याय है। 

इसी दौरान अठारहवीं सदी के मध्य में भोंसलों के साथ मराठी परिवार आ गए। अन्य में मोटे तौर पर डॉक्टर, वकील पेशे में और रेलवे के काम में बंगाली आए। रेलवे ठेकेदारी, तेंदू पत्ते और लकड़ी के व्यवसाय के लिए गुजराती आए। बुंदेलखंडी जैनों की बड़ी खेप की आमद मारवाड़ियों के बाद हुई। स्वाधीनता-विभाजन के दौर में सिंधी, पंजाबी आए। रोटी, कपड़ा और मकान के मारे, इन्हीं का व्यवसाय यानि गल्ला-राशन, होटल-रेस्टोरेंट, कपड़े की दूकान और बिल्डर-रियल स्टेट का काम करते, दूसरों को मुहैया कराते, अपने लिए इसका पर्याप्त इंतजाम कर लिया। इस क्रम में टुरी हटरी पर गोल बाजार और सदर फिर इन सब पर मॉल हावी हो गया। शहर अब नवा रायपुर तक फैल कर अटलनगर अभिहित है। उसके आर्थिक परिदृश्य में, व्यवसायिक प्रभुत्व सिंधी-पंजाबी और जैनों का है तो कामगारों में उड़िया और तेलुगू पैठ न सिर्फ नगर, बल्कि घर-घर में बन गई है। नगर में सामान्यतः आपसी भाईचारा बना रहा है, छत्तीसगढ़ी सहज स्वीकार्यता का यह सबल उदाहरण है और इस दृष्टि से रायपुर, राज्य की राजधानी के साथ अपने स्वाभाविक औदार्य में छत्तीसगढ़ का प्रतिनिधि शहर भी है।

पुनश्च- दैनिक भास्कर, रायपुर के 35 स्थापना दिवस पर रायपुर के लिए लिखना था। रायपुर के इतिहास से वर्तमान तक का सफर सीमित शब्दों में लिखना चुनौती जैसा था, यह भी कि अब तक जो लिखा जाता रहा है, उससे अलग और क्या हो सकता है। फिर भी प्रयास किया कि नये-पुराने रायपुर के लिए अपनी समझ को झकझोर कर देखा जाए कि क्या निकलता है, जो बना वह ऊपर है, जो समाचार पत्र में आया, वह आगे है-
(यहां आए पुराने तथ्यों को एकाधिक और यथासंभव मूल-स्रोतों से लिया गया है। डॉ. लक्ष्मीशंकर निगम जी ने उनके लेखन में आई जानकारियों के उपयोग की अनुमति दी तथा हरि ठाकुर जी की सामग्री से कुछ महत्वपूर्ण दुर्लभ जानकारियां, उनके पुत्र आशीष सिंह जी के माध्यम से मिलीं। अपने दौर की जानकारी और उनकी व्याख्या मेरी है।)