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Sunday, November 6, 2022

खजानों की खोज

पुरातत्व के साथ रहस्य, गुफा, सुरंग और चमत्कारों की कहानी, उसमें रंग भरती है। खुदाई, हनुमान छाप, राम दरबार सिक्के ठगी के साधन बनते हैं। अभिलेख और चित्रों-आकृतियों को बीजक, गुप्त खजाने का पता मान लिया जाता है। रमल, नजूमी, ज्योतिष, बैगा, आंख में खास तरह का काजल आंज कर जमीन में गड़ा धन देख लेने वालों की भी जाने-अनजाने हवा बनाई जाती है।

पुरातत्व में खजाना, चोरी, ठगी और इससे जुड़े अपराध से दो-चार होना पड़ता है। ऐसे कई प्रकरणों में से एक, 1997 में जबलपुर की घटना है, जिसमें भेड़ाघाट के रास्ते में बड़ी तादाद में गड़ा धन, सिक्के मिले थे। तत्कालीन विभागीय मुद्राशास्त्री जे.पी. जैन जी के द्वारा इस दफीने की सामग्री के परीक्षण में मैं साथ था। ‘कनक कनक ते सौ गुनी...‘ पता लगा कि जिन्हें भी यह सामग्री मिली, बंटवारा हुआ, उसमें से लगभग सभी के साथ कोई न कोई हादसा हुआ और इनमें से एक अनिष्ट आशंकाग्रस्त ने तो कुछ सोने की अशरफियां थाने ला कर खुद जमा कराईं।

ऐसी घटनाओं से पुरातत्व में लोगों की रुचि पैदा की जा सकती है, यह बिलासपुर के वरिष्ठ पत्रकार महेन्द्र दुबे जी ने रेखांकित किया। राजिम अंचल के निवासी दुबे जी, संत कवि पवन दीवान के सहयोगी रहे। छत्तीसगढ़ी अस्मिता के घोर-प्रबल हिमायती। दुबे जी, नवभारत समाचार पत्र से जुड़े रहे, बल्कि तब के संपादक गोविंदलाल वोरा जी से। समय बदल रहा था, बिलासपुर के नवभारत संवाददाता बी.आर. यादव जी विधायक और फिर मंत्री बने। मोतीलाल वोरा जी मुख्यमंत्री बने, तब उनके भाई गोविंदलाल वोरा जी ने अपना समाचार पत्र ‘अमृत संदेश‘ आरंभ किया। दुबे जी ‘अमृत संदेश‘ में आ गए। सामान्यतः कम बोलने वाले, मुस्कुराते दुबे जी की सजगता की चुगली उनकी चंचल आंखें कर देती थीं। मुलाकातों में समाचार, खबर-असर, न्यूज-व्यूज जैसी प्रेस-पत्रकारिता बातों-बातों में कह जाते। ऐसी ही बातों के दौरान कटघोरा में घटी घटना के समाचार एंगल से अलग, उन्हें इसमें एक्सक्लूसिव दिखा। लंबी बैठक की, नोट्स लिए और यह सामने आया-

बिलासपुर अंचल के ऐतिहासिक खजानों की चोरियां इस तरह हुयीं

भाजपा नेता श्री कृष्णकुमार पांडे को कटघोरा पुलिस ने उनके साथियों सहित कल्चुरी शासकों की प्रथम राजघानी तुमान से ५ कि.मी. दूर जटाशंकरी नदी एवं झाबर नाला के संगम पर स्थित नगोई ग्राम के ऐतिहासिक महत्व के टीले में खजाने की खोज में खुदाई करते हुये गिरफ्तार किया है। बताया जाता है कि तुमान में निवास कर रहे एक साधु ने श्री पांडे को उक्त टीले में खजाना होने की जानकारी दी थी। इसके पूर्व भी साधु ने तुमान गांव के एक कृषक को ऐतिहासिक स्थल सतखंडा महल के समीप खजाना होने का संकेत दिया था जहां कृषक को मात्र सूर्य की एक मूर्ति मिली।

ईसा पूर्व ७ वीं शताब्दी से लेकर आज तक की ऐतिहासिक किवदंतियों से भरपूर इस अंचल में खजाने की खोज कोई नयी बात नहीं है। बैगा गुनिया या तथा कथित ग्रामवासियों ने ऐतिहासिक स्थलों की खुदाई की परंतु खजाना उन्हें नहीं मिला। खजाना उन्हीं को मिला जिन्होंने इस के लिये हाथ पैर नहीं मारे। पुरातत्व विभाग के एक संदर्भ ग्रंथ के अनुसार आजादी पूर्व १९३० में सोनसरी ग्राम में सोने के ६०० सिक्के मिलने के प्रमाण मिलते हैं। ये सिक्के त्रिपुरी के कल्चुरी शासक गांगेयदेव, रतनपुर के कलचुरी शासक जाजल्लदेव, रत्नदेव, पृथ्वीदेव, बस्तर के नागवंशी शासक सोमेश्वर एवं गोविंद चंद्र के काल के हैं। तब सभी सिक्के नागपुर संग्रहालय में जमा करा दिये गये। राज्य शासन को चाहिये कि अंचल के सिक्के को नागपुर से यहां स्थानांतरित करे।

अंचल में खजाना मिलने और उसके गायब होने की एक दिलचस्प घटना जांजगीर के समीप पचेड़ा गांव की है जहां एक बैगा की सलाह पर मनहरण बसाइत, गिरजानंद, पंचराम, माखन, शिवनारायण, बुडगा, कौशल, गेंदराम चौहान आदि ९ व्यक्तियों ने घोर अंधेरी रात्रि में एक खेत की खुदाई की। खेत मालिक मनहरण ने पुलिस के समक्ष स्वीकार किया कि खेत की खुदाई में सोने के सिक्कों से भरा हुआ एक बटलोही मिला। रात में ही बटलोही घर लाया गया और बैगा के सामने सिक्कों की गिरजानंद के घर में गिनती प्रारंभ हुयी। अभी वे ४०० सिक्के गिन ही पाये थे कि माखन बैगा ने उसे प्रसाद दिया जिसके खाने से वह मूर्छित हो गया और सारे सिक्के गायब हो गये। पुलिस जांच के दौरान गिरजानंद ने भी स्वीकार किया कि बटलोही में ३६००० सिक्के थे। ये सिक्के कहां गये यह आज तक पता नहीं लग सका है। अलबत्ता पुलिस ने निष्कर्ष निकाला कि शिवनारायण, बुडगा, कौशल, गेंदराम नैला से गायब हैं। ये सभी अपराधी प्रवृत्ति के व्यक्ति हैं। पुलिस ने मनहरण के बड़े भाई गौकरण से भी पूछताछ की थी जिन्होंने स्वीकार किया कि उसकी मां ने खेत में खजाना होने की जानकारी दी थी परंतु हमने कभी खुदाई करने की आवश्यकता नहीं समझी। खेत बंटवारा के समय मनहरण और उसके बीच यह तय हुआ था कि जब कभी भी खजाने की खुदाई की जावेगी प्राप्त धन दोनों के बीच बराबर बंटवारा होगा। बटवारे में खेत मनहरण को मिला था। 

पचेडा गांव के इस रहस्यमय खजाना की प्रथम सूचना २६.१२.७७ को जांजगीर थाने में स्वयं मनहरण ने दर्ज कराई थी। पुलिस अधिकारियों के अतिरिक्त जांजगीर के तत्कालीन अनुविभागीय अधिकारी श्री मित्तल ने भी स्थल का निरीक्षण किया और जिला प्रशासन को प्रेषित रिपोर्ट में स्वीकार किया कि खेत में ७ फीट गड्ढा खोदा गया है। गड्ढे के आकार से आभास मिलता है कि यहां बटलोही रही होगी। परंतु सिक्के के बारे में उन्होंने भी चुप्पी साध ली। इसी तरह बैगा की सलाह पर कमरीद गांव के एक कृषक घसिया कुर्मी ने जमीन की खुदाई की जिसमें एक सोने की मूर्ति एवं सिक्के से भरा एक हंडा निकला। चर्चा रही कि उक्त कृषक ने मूर्ति के मात्र सिर भाग को ही नैला में १३००० रुपये में बेचा इस प्रकरण की भी पुलिस में रिपोर्ट हुयी परंतु खजाना हाथ नहीं लगा। अलबत्ता इस खजाने की एक अन्य जानकार उसी परिवार की एक महिला की रहस्यमय परिस्थितियों में मृत्यु हो गयी।

कहते हैं कि किसी की तकदीर खुलती है कि अनायास खजाना उसके हाथों में आ जाता है। आठ वर्ष पूर्व ऐसे ही शिवरीनारायण के समीप केरा गांव के कुछ लोगों की तकदीर खुली और खजाना उनके हाथों में आ गया। गांव का एक कृषक मकालू पिता बुडगा गढ़ी जाने के रास्ते में स्थित एक झाड़ के नीचे पड़े एक पत्थर के ऊपर २१ अगस्त ७८ को प्रातः दस बजे बैठा हुआ था कि उसको विचार कौंधा कि क्यों न इस गड्ढे बने गोल पत्थर को ढेंकी का बाहना बनाने के लिये घर ले जावे। इस विचार के साथ ही जमीन से करीब ३ ऊपर उठे गोल पत्थर के मुंह में भरे हुये मिट्टी को निकालने के लिये हाथ चलाया तो उसके हाथों में अनायास मिट्टी से सने सोने के सिक्के लग गये। पहले तो उसकी समझ में नहीं आया और सिक्कों को पुनः रगड़ा तो सोने की चमक देख उसकी आंखें चौंधिया गयीं। फिर तो उसने जल्दी जल्दी मिट्टी हटाई और जितना उसकी जेब में आ सकता था खोल से सिक्का निकाला और घर चला गया। इस अनायास हाथ लगे खजाने की जानकारी गांव के अन्य लोगों को मिली तो वे भी तकदीर अजमाने के लिये उस ओर दौड़ पड़े। भय एवं आश्चर्य के वातावरण में जिससे जितना बन पड़ा पत्थर की खोल से सिक्का निकाला और घर की राह ली। इस बीच विद्यानंद ग्रामीण को समझाते रहा कि यह मकालू के भाग से मिला है उसे दे दो परंतु इसे सुनने का समय किसके पास था। सब अपनी जेब गरम करने में लगे हुये थे। मकालू पुनः घर से आया और जेब भरकर पुनः चला गया। इस भाग दौड़ के बीच खजाना मिलने की जानकारी जब गांव के कोटवार को लगी तो वह शिवरीनारायण थाने की ओर दौड़ा। रास्ते में ही उसे थानेदार मिल गया। 

जानकारी मिलते ही थानेदार भी बदहवास तकदीर अजमाने गांव की ओर दौड़ा और घटनास्थल पर १२ बड़े ४२ छोटे सोने के सिक्के जब्त किया। इसी तरह से जांजगीर के तत्कालीन अनुविभागीय अधिकारी श्री पी.सी. जैन को जब इस खजाने की भनक मिली तो वे भी गांव पहुंचे और ग्रामीणों को डांट डपट एवं जमीन देने का लालच देकर मकालू, विद्यानंद, लक्ष्मीप्रसाद, विजय, रमेश, चांदमल, झुमरु, मंगल बाई, जानकीदास, संतोष, मनहर, राजकुमार आदि से ४९ सिक्के बरामद किये। कहते हैं कि थानेदार एवं एस.डी.ओ. के हाथों इससे भी ज्यादा मात्रा में सोने के सिक्के हाथ लगे परंतु अधिकारियों ने इतनी ही बरामदगी बताई। गांव वालों के कथनानुसार एक फीट से अधिक गहरे पत्थर के खोल से करीब १० किलो वजन सोने के सिक्के निकले थे। बहरहाल यहां प्राप्त रतनपुर के कलचुरी शासकों जाजल्वदेव, रत्नदेव एवं पृथ्वीदेव कालीन ११ वीं एवं १२ वीं शताब्दी के २०० ग्राम वजन के १०३ सिक्के आज भी जबलपुर के संग्रहालय में छत्तीसगढ़ के वैभव पूर्ण अतीत को उजागर कर रहे हैं परंतु अतुल संपति को सदियों से अपने में समाहित किया खोल युक्त पत्थर के ढेंकी का बाहना तो नहीं बन सका अलबत्ता जिला कचहरी के नाजरात में पड़ा अपने अतीत पर अवश्य आंसू बहा रहा है।

Tuesday, September 13, 2022

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अपने लिखे में अच्छे का निर्णय और चयन पाठकों पर छोड़ना चाहिए मगर बुरे का फैसला करने के के लिए खुद को पहल करने से नहीं हिचकना चाहिए, ऐसा मानते हुए मेरा लिखा यह एक निरस्त किए जाने लायक। फिर भी इसे क्यों संभाले रखा है और यहां प्रस्तुत कर रहा हूं! सोचते हुए ध्यान आता है कि उस दौर में मुक्तिबोध के वैचारिक गद्य को पढ़ते चकराया हुआ था। बहुत सारी बातें उल-जलूल और दिमागी गुहान्धकार वाली लगती थीं। ऐसा लगा कि विचार-क्रम में जो भी अभिव्यक्त हो, वही शायद अधिक ईमानदार होता है, इसलिए ...

‘बिम्ब‘ परिवार के सचिव नवल जायसवाल, जिनकी तस्वीरों और लेखनी से मेरा परिचय रहा है, ‘परस्पर‘ का सम्पादन एवं आकल्पन किया था। लेख उन्होंने मंगाया था, संभवतः इसीलिए छापा, बल्कि प्रशंसा भी की, यह उनकी उदारता। इस प्रकाशन के लिए मेरे द्वारा लिखा लेख यहां प्रस्तुत-


पहचान की भूमिका

प्रतिरूपण, सदैव सृजनधर्मी होता है। विषय वस्तु की केंद्रीय स्थिति, माध्यम की भिन्नता और दृष्टिकोण से विविधता उत्पन्न होती है। वह अपने मूल भाव का खास, दिमागी आईने से गुजरा प्रतिबिंब होता है। विषयवस्तु वह मूल है जो तार्किक भाव को जन्म देकर आध्यात्मिक निराकार को संवेदन के लिए छोड़ देती है। कल्पना के स्रोत की खोज कर क्षितिज के परे जाने की ज्ञानवस्तु ही प्रतिरूपण का मूर्त रूप है। मानव मन की अभिव्यक्तियों के तरीकों में से एक है छायाचित्र और छायाचित्रों के बारे में सोचते हुए एक विशिष्ट व्यवहार वाक्य ध्यान में आता है कि किसी प्राकृतिक दृश्य या भौतिक दृश्य की प्रशंसा में उसे चित्र जैसा सुंदर कहा जाता है और किसी चित्र की प्रशंसा उसे सजीव जैसा सुंदर कह कर की जाती है। मानव मन में उत्पन्न भाव का वह व्यक्ति स्वयं स्वागत करता है और इसे ही सुखद मानता है, मनोविनोद की परिधि में आता है। मनोविनोद भी प्रतिरूपण का आरंभ मान सकते हैं। मनोविनोद और प्रशंसा एक ही भाव के दो पहलू हैं।

यह खास बिंदु शायद सिर्फ अधिकतम यथावत प्रतिरूपण से जुड़ा होता है और प्रतिरूपण में सृजन का आयाम जुड़कर उसे कला का दर्जा व प्रतिष्ठा देता है। चित्र हो या छायाचित्र दोनों में कला संपन्नता का अस्तित्व अनिवार्य है। छायाकला आधुनिक तकनीक से ओतप्रोत विकास के सौर मंडल से बाहर जाती हुई विधा है।

पुरातत्व विभाग में अन्य अध्ययन क्षेत्रों की भांति प्रलेखन विवरण वर्गीकरण और व्याख्या पृथक-पृथक महत्वपूर्ण खंड है, किंतु प्रलेखन की दृष्टि से छायाचित्र उनका महत्व सर्वाधिक है। यथासंभव अधिकतम प्रतिरूपण और उनका संयोजन पुनः वर्गीकरण कर ही अध्ययन की दिशा और निष्कर्ष में निर्धारित होते हैं। पुरातात्विक अध्ययन में सहायक सामग्री के रूप में छायाचित्रण का इस दृष्टि से भी विशिष्ट स्थान है कि प्रतिमाएं, विशेषकर, जो स्वयं भी मानवीय आकारों, प्रकृति का प्रतिरूपण है उन्हें भिन्न माध्यम अर्थात कैमरे से पुनः प्रतिरूपित किया जाता है किंतु यहां सृजन की संभावना अत्यंत होती है क्योंकि प्रलेखन की दृष्टि से किए गए छायाचित्रण में वस्तुगत गुणों का होना आवश्यक होता है। प्रलेखन की सीमा निश्चित नहीं की जा सकती है किंतु छाया कला का अंश इस प्रकार प्रतिरोपित हो कि वह उवाच की दशा हस्तगत कर ले क्योंकि सौंदर्यात्मक क्रिया बोलने की क्रिया है। भाव-प्रधान प्रलेखन अपना स्थायी बोध प्रदर्शित करते हैं।

पुरातत्वविद बन जाने से अधिक सौभाग्यशाली अवसर मुझे अंचल के पुरातात्विक स्थलों पर कार्यकर्ता बनकर रहने का मिला। ये स्थल अधिकतर अंदरूनी जंगली क्षेत्रों में हैं। इस संदर्भ में एक उल्लेखनीय विचार बिंदु मुझे अनायास प्राप्त हुआ। खुदाई आदि से प्राप्त मूर्तियों के छायाचित्र का काम पूरा हो जाने पर हमने उन स्थलों के कामगारों को दिखाया और आश्चर्यजनक ढंग से उन्होंने अपने गांव की खुद साफ कर निकाली गई मूर्तियों को नहीं पहचाना। मुझे इससे उनके जागरूक और चेतना का स्तर समझकर अत्यधिक निराशा हुई, किंतु यह विचार बिंदु तब बन गया जब उनमें से कुछ लोग अपने साथियों की तस्वीरें भी नहीं पहचान सके, तब मुझे अनुमान हुआ कि संभवतः हम अपनी दृष्टि का विकास व संकोच जिस आसानी से आयामों में कर सकते हैं वह करने का उन्हें अभ्यास नहीं होता। वे उस मांसल और जीवंत गहराई के बिना, जिसमें स्पंदन होता है, उसे पहचान कर स्वीकार करने में कठिनाई महसूस करते हैं। रंग, प्रकाश और आयामों की शास्त्रीय भाषा को पढ़ने का चरित्र वे विकसित नहीं कर पाए हैं। इस दुर्गम पथ का मार्ग प्रशस्त करने में छायाचित्र सहायक हो सकते हैं लेकिन इस दिशा में प्रयास आवश्यक है हमें अपनी संवेदना के धरातल का मानचित्र तैयार करना होगा और उस मानचित्र पर उन कामगारों के अनुभव और अनुभूति को दर्ज करना पड़ेगा। सफलता को एक विशेष दृष्टि का नाम दे सकते हैं।

मैं जब भी अनुभव करता हूं और अतीत में मैंने जो अनुभव किया था या भिन्न भिन्न परिस्थितियों में जो अनुभव करने की मुझे आशा है यदि मैं इनके बीच के संबंध पर बल देता हूं तो मेरा बल देना केवल अनुभव करने पर ही आधारित रहेगा किंतु यह सब आवश्यक प्रक्रिया का पार्श्व है।

गवाहों के संदर्भ में लिखे जा रहे इस लेख का मूल दायित्व यह है कि पुरातत्व से छायाचित्र कितने करीब है यह जाना जा सकता है और इसकी आवश्यकता को महत्व दिया जाना है, माना जाना चाहिए। जहां शब्द समाप्त हो जाते हैं वहां से छायाचित्र का प्रतिरूपण पहलू आरंभ होता है। संभवतः श्रव्य और दृश्य के सामंजस्य को दृष्टि में रखकर ही पुरातत्व सामग्री की समिधा बटोरी गई होगी। यह और भी प्रासंगिक हो जाता है कि छायाचित्र अपनी आवश्यकता दर्ज करने लगे हैं। अब इस बात को भी रेखांकित करना चाहिए कि पुरातत्व से संबंधित छायाचित्र एक साधारण छायाचित्र न हो, बल्कि छाया के उत्कृष्ट नमूने बने।

वस्तुगत छायाचित्रण का कार्य दिन-ब-दिन विकसित तकनीक के उपकरणों के उत्तरोत्तर बेहतर होता जा रहा है लेकिन यह बेहतरी आयाम-सीमा की कमी पूरी नहीं कर सकती। इस कमी को पूरी करने में मांसलता विषयगत छायाचित्रण में दृष्टिकोण की विशेषता से लगभग पूरी हो जाती है। यह गंभीर उद्देश्य संवेदना की आत्मीय दृष्टि से सहज संभव हो सकता है। मुझे चीजें साफ साफ नजर आ रही हैं की छाया कला का समस्त परिवार पुरातत्व के सर्वांगों को दृश्य की संपूर्णता के साथ क्षितिज तक ले जाने में समर्थ है अतः इस नवीनतम तकनीक और कला का भरपूर उपयोग करे।

Monday, November 1, 2021

जांजगीर-चांपा का पुरातत्व

बीसेक वर्ष पहले मेरे द्वारा तैयार किया गया लेख

जिला जांजगीर-चांपा, पुरातात्विक दृष्टि से विशिष्ट और अत्यंत महत्वपूर्ण भू-भाग है। यहां सर्वाधिक उल्लेखनीय अवशेष ‘गढ़’ हैं, इन गढ़ों की चर्चा के पूर्व दो बिन्दुओं पर स्पष्टीकरण आवश्यक है। पहला, गढ़ का शाब्दिक अर्थ- किला, दुर्ग, कोट, घेरा या गड्ढा, जिसके अनुरूप परिखा-खाई और वप्र-प्राकार युक्त भौतिक आकार स्वरूप वाले गढ़ हैं। पुष्ट जानकारी है कि ऐसे गढ़ों की संख्या छत्तीसगढ़ अंचल के इस जिले के सीमित भू-भाग में ही 36 पूरी हो जाती है-

(1) बछौद (2) कोटगढ़ (3) कोटमी (सुनार) (4) कोनार (5) कोसा (6) जेवरा (7) पामगढ़ (8) डोंगा कोहरौद (9) कोड़ाभाठ (10) कोसला (11) खरौद (12) हथनेवरा (13) पिसौद (14) धुरकोट (जांजगीर) (15) अंवरीद (16) भैंसदा (17) सिऊंढ़ (18) टुरी (19) नवागढ़ (20) खपराडीह (21) केरा (22) बाराद्वार (23) सरहर (24) लखुर्री (25) कोटेतरा (26) कांसीगढ़ (27) ओड़ेकेरा (28) अड़भार (29) पोता (30) सिंघरा (31) डभरा (32) धुरकोट (33) बघौत (34) कोटमी (35) सपोस (36) तरौद (अकलतरा)।

इसके अतिरिक्त संलग्न क्षेत्र में बिलासपुर जिले का मल्हार और विजयपुरगढ़, खरसिया के निकट तेलीकोट, सारंगढ़ के निकट उलखर और भेड़वन (तथा कोसीर?), दुर्ग जिले का मारो तथा रायपुर जिले के गढ़ सिवनी, छातागढ़, लीलर आदि स्थान भी गढ़ ग्राम है। इसके साथ ही जांजगीर-चांपा जिले के सर्वेक्षण तथा स्थानीय सूचनाओं द्वारा गढ़ ग्रामों के पहचान की प्रबल संभावना है।

चर्चा का दूसरा बिन्दु या दूसरे प्रकार के गढ़, वस्तुतः केन्द्र का अर्थ प्रकट करते हैं, जो इस अंचल में प्रचलित लगभग 15 वीं सदी ईस्वी के भू-राजस्व व्यवस्थापन से संबंधित है। इस प्रचलन का प्रथम लिखित प्रमाण 15 वीं सदी ईस्वी के अंत में आता है तथा सोलहवीं सदी ईस्वी के मध्य में कलचुरि शासक कल्याणसाय की जमाबन्दी पुस्तक में सर्वप्रथम इन छत्तीस गढ़ों (वस्तुतः 48 प्रशासनिक इकाईयों) या राजस्व व्यवस्थापन केन्द्रों का नाम पृथक-पृथक उल्लेखित है। इसी क्रम में प्राचीन केन्द्रीय सत्ता के उपक्रम, जो भीतरी और दुर्गम भौगोलिक भागों में स्थित जमीन्दारियों के रूप में स्थापित हुए, इनके मुख्यालय की गढ़ नाम से जाने गए।

इस प्रकार यहां गढ़ों को दो वर्गों में विभक्त किया जा सकता है- प्रथम भौतिक स्वरूप वाले प्राचीन गढ़ एवं दूसरे मध्ययुग के बाद कलचुरि काल में राजस्व केन्द्रों के रूप में विकसित गढ़। इनमें खरौद, कोटगढ़ जैसे कुछ उदाहरण हैं, जो दोनों वर्गों में सम्मिलित हो सकते हैं, अर्थात् इन प्राचीन भौतिक स्वरूप वाले गढ़ों में ही कलचुरि और बाद में मराठा प्रशासनिक व्यवस्था में भी केन्द्र के रूप में इस्तेमाल किया गया है, यही कारण है कि कोटगढ़ जैसे गढ़ में प्राचीन अवशेषों के साथ-साथ कलचुरि अभिलेख व प्रतिमाएं तथा मराठाकालीन स्थापत्य के अवशेष भी विद्यमान है।

प्रसंगवश यह उल्लेख भी आवश्यक है कि अंचल के कई ग्रामों में दशहरा पर्व पर मिट्टी के स्तंभ बनाकर उसके ऊपर पहुंचने की प्रतियोगिता और गढ़ विजय का प्रचलन है। खरौद में शबरी मंदिर के निकट ऐसा स्तंभ है तथा सारंगढ़ में यह आयोजन धूमधाम से होता आया है। गढ़ों की पहचान में इस परम्परा के गढ़ों से भ्रम की स्थिति बनती हैं।

जांजगीर-चांपा जिले के संदर्भ में भी भौतिक स्वरूप वाले गढ़ विशेष उल्लेखनीय है। इन गढ़ों की प्राचीनता महाजनपद काल में उत्तर कोसल से भिन्न कोसल (दक्षिण कोसल या महाकोसल जनपद) से सम्बद्ध की जा सकती है। रतनपुर के हैहय (कलचुरि या चेदि) राजाओं की परम्परागत सूची कलियुग संवत् 3958 अर्थात् ईसवी पूर्व 857 से आरंभ होती है। पुराण कथाओं में यादवों द्वारा विजित देशों में नर्मदा-मेकल, शुक्तिमती और ऋक्षवत् के साथ मृत्तिकावती का नामोल्लेख है, जिसका तात्पर्य संभवतः मृद्दुर्ग का सघन क्षेत्र, वर्तमान छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा जिला अंचल से है।

प्राचीन साहित्य जातक कथाओं, रामायण, कौटिल्य अर्थशास्त्र आदि ग्रन्थों में नगर के चारों और परिखा और वप्र बनाय जाने का उल्लेख मिलता है पुरातत्वीय अवशेषों में तक्षशिला में ईसा पूर्व की सदियों में नगर के चतुर्दिक बनाई गई मिट्टी की दीवार मिली है, जिसे स्थानीय लोग धूलकोट कहते हैं। इसी प्रकार अन्य प्राचीन नगरों में मुख्यतः मथुरा और शिशुपालगढ़ में नगर रक्षा के प्राकृतिक साधन के रूप में नदी, जल, पर्वत, प्रस्तर समूह, मरूभूमि तथा अरण्य एवं कृत्रिम साधनों में परिखा, प्राकार और रोपित अरण्य का उल्लेख है। शुक्र नीति के शिल्पकारों की सूची में दुर्गकारिणः नाम आया है। जातक कथाओं में परिखायुक्त मृद्दुर्गों का उल्लेख है, जिनमें जल परिखा या उदक अथवा तोयपूर्ण परिखा, पंक परिखा और रिक्त परिखा, ये तीन प्रकार बताये गये हैं। अर्थशास्त्र मंे घड़ियालयुक्त ग्राहवती परिखा का उल्लेख है। इन उल्लेखों से अनुमान होता है कि ईसवी पूर्व की तीसरी-चौथी सदी में मृद्दुर्गों की व्यवास्थित अवधारणा का पर्याप्त विकास हो चुका था।

जिले व संलग्न क्षेत्रों में मृद्दुर्गों से संबंधित ज्ञात पुरावशेष भी इन गढ़ों की प्राचीनता प्रमाणित करते हैं। कोटगढ़-महमंदपुर तथा आसपास के अन्य गढ़ ग्रामों बछौद, मल्हार आदि से मौर्यकालीन आहत सिक्के प्राप्त होने की जानकारी मिलती है और कोटमी (सक्ती) में किसी साधु द्वारा अपने कमंडल में बिच्छू डालकर चांदी के चौकोर सिक्के निकालने की कथा बताई जाती है, इस तारतम्य में बिच्छू का चांदी के सिक्के में परिवर्तित होना तथा प्राचीन गड़े धन-सिक्कों का बिच्छू के रूप में परिवर्तित हो जाने की प्रचलित मान्यता का अध्ययन रोचक और महत्वपूर्ण हो सकता है। बछौद और कोटगढ़ में बड़े आकार की ईंटें प्राप्त होती है। कोटगढ़ तथा अन्य गढ़ क्षेत्रों से भी नवपाषणयुगीन उपकरण प्राप्त होते हैं।

सागर विश्वविद्यालय के सर्वेक्षणों में खरौद तथा मल्हार से महाजनपद युगीन प्रमाण विशिष्ट मृद्भांड प्राप्त हुए हैं। कोटमी सुनार की खाई और तालाबों में अब भी मगर विद्यमान हैं। अड़भार तथा बाराद्वार क्रमशः अष्टद्वार और द्वादशद्वार के अपभ्रंश माने जा सकते हैं। स्थान नामों की दृष्टि से धुरकोट, कोटमी, कोटगढ़ कोटेतरा जैसे नाम तथा ‘उद्’ अन्त वाले ग्राम नाम, जहां उद् का तात्पर्य ‘जल’ से है, ऐसे कई ग्रामों से मिट्टी के गढ़ की जानकारी मिलती है, इसी प्रकार ग्राम नामों में गढ़ या कोट शब्द महत्वपूर्ण है, संक्षेप में भाषाशास्त्र की दृष्टि से स्थान नामों के अध्ययन के माध्यम से भी इन गढ़ों संबंधी महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त हो सकती है। अन्य संकेतों में रहौद और सिऊंढ़ जैसे गढ़ क्षेत्रों में 4-5 मीटर तक मोटे जमाव हैं। कोनार में अट्टालक (बुर्ज) व्यवस्था के अवशेष व मान्यता है। गढ़ों की वर्तमान स्थिति में इन्हें प्राकार युक्त और प्राकार रहित, वर्गाकार, वृत्ताकार, अण्डाकार, षटकोणीय, अष्टकोणीय आकार-प्रकार और स्वरूप के आधार पर वर्गीकृत किया जा सकता है।

इन गढ़ों में से चूंकि किसी स्थल का वैज्ञानिक पुरातत्वीय उत्खनन नहीं हुआ है अतएव इनकी पृष्ठभूमि तथा व्याख्या के लिए अनुमान का सहारा लेना आवश्यक हो जाता है। यह तार्किक अनुमान किया जा सकता है कि तत्कालीन स्थितियों में छत्तीसगढ़ का यह समतल मैदानी भू-भाग घनी जनसंख्या वाला क्षेत्र रहा होगा। गढ़ों की संख्या, उनका आपस में सामीप्य तथा गढ़ों का विशाल आकार देखते हुए भी यह अनुमान पुष्ट होता है कि गढ़ निर्माण के कार्य हेतु भी बड़ी तादाद में मानव श्रम प्रयुक्त हुआ होगा। इन गढ़ों की सघन निकटता को देखते हुए प्रत्येक गढ़ के साथ किसी शासक या गढ़ों के सामरिक प्रयोजन मात्र का अनुमान उपयुक्त नहीं होता है बल्कि इन्हें छोटे-छोटे नगर राज्य मानना उचित हो सकता है। संभवतः मैदानी भू-भाग में बसने वाली तत्कालीन आबादी को प्राकृतिक एवं राजनैतिक-सामरिक आपदाओं में ‘गढ़’ सुरक्षा प्रदान करने वाली संरचनाएं रही होंगी। इस प्रकार जिले में गढ़ों के पुरातात्विक उत्खननों से भविष्य में आने वाले परिणामों के पूर्व भी इस अंचल के गढ़ शोध अध्ययन संभावनायुक्त, देश के पुरातत्वीय मानचित्र में विशिष्ट स्थान के अधिकारी हैं।

अगले चरण में लगभग दो हजार साल पहले लकड़ी पर लिपि उत्कीर्ण करने का प्रयोग भी इसी जिले में घटित हुआ है, जो पूरी दुनिया में अपनी तरह का अनूठा नमूना है। किरारी (चन्द्रपुर) से प्राप्त अभिलिखित काष्ठ स्तंभ लेख का सुरक्षित अंश, अब रायपुर संग्रहालय में प्रदर्शित है। हीराबंध (अब लगभग पट चुके तालाब) से निकले इस लकड़ी के खंभे पर खुदे अक्षरों को महत्वपूर्ण समझकर स्थानीय पंडित लक्ष्मीधर उपाध्याय ने इसकी यथादृष्टि नकल उतार ली थी और तत्कालीन पुरालिपि विशेषज्ञों ने जांचकर इसे प्रामाणिक पाकर, उसी के आधार पर लेख का अध्ययन किया जिसमें तत्कालीन राज पदाधिकारियों के पदों का उल्लेख कुछ इस प्रकार है - ’नगररक्षी वीरपालित और चिरगोहक, सेनापति वामदेव ... भटकेशव वीथिदकामिक...प्रतिहार खिपत्ति, गणक नाग हेअसि, गृहपतिक धरिक, भाण्डागारिक असाधिय... हस्त्यारोह, अश्वारोह, देवस्थानक, पादमूलिक रथिक सिसार खाखिमल आदि।

इसी प्रकार सक्ती के निकट दमऊदहरा अथवा गुंजी, लगभग दो हजार साल पहले ऋषभतीर्थ के नाम से प्रसिद्ध था। दक्षिण कोसल के इस तीर्थ का उल्लेख महाभारत में भी हुआ है। यहां राजा कुमारवरदत्तश्री, अमात्य गोडछ के नाती अमात्य मातृजनपालित और वासिष्ठी के बेटे अमात्य, दण्डनायक और बलाधिकृत बोधदत्त ने दो बार एक-एक हजार गायों का दान किया। यह अभिलिखित प्रमाण भी अपनी प्राचीनता के कारण दुर्लभ जानकारी और क्षेत्र की सम्पन्नता का द्योतक है तथा यह स्थान आज भी जिले के महत्वपूर्ण धार्मिक तथा प्राकृतिक सौन्दर्ययुक्त प्राचीन स्थल के रूप में प्रसिद्ध है।

जिले का ग्राम अमोदा प्राचीन अभिलेखों की प्राप्ति का महत्वपूर्ण स्थान है, इस ग्राम से सन 1924 एक घर की नींव खोदते हुए रतनपुर कलचुरि शासकों के तीन ताम्रपत्र सेट प्राप्त हुए थे, जो पृथ्वीदेव प्रथम, पृथ्वीदेव द्वितीय और जाजल्लदेव द्वितीय के काल अर्थात् ग्यारहवीं-बारहवी सदी ईस्वी के हैं। पृथ्वीदेव प्रथम के ताम्रपत्र में तुम्माण में वंकेश्वर मंदिर की चतुष्टिका निर्माण व ग्राम दान का उल्लेख है। पृथ्वीदेव द्वितीय के अभिलेख में वंकेश्वर ग्राम दान का उल्लेख है तथा जाजल्लदेव द्वितीय के ताम्रपत्र में राजा पर पड़ी विपत्ति व उससे छुटकारा पाने पर ग्राम दान किए जाने का विवरण आया है।

इसी प्रकार कोटगढ़ (अकलतरा) से प्राप्त शिलालेख भी विशेष उल्लेखनीय है, जिनमें पृथ्वीदेव द्वितीय के शासन काल में उसके मंत्री वल्लभराज के धार्मिक व अन्य कार्य, दान आदि का विवरण मिलता है, जिसके अनुसार उसने वल्लभसागर नामक तालाब खुदवाया तथा शिव एवं रेवन्त के मंदिरों का निर्माण कराया इससे अनुमान होता है कि तत्कालीन कलचुरि राज में वल्लभराज महत्वपूर्ण और लोकप्रिय मंत्री रहा होगा।

जिले के महत्वपूर्ण स्थापत्य उदाहरणों में सर्वप्रमुख जांजगीर का विष्णु मंदिर है, जिसे स्थानीय जन भीमा मंदिर या नकटा मंदिर के नाम से पुकारते हैं। दन्तकथाओं में कहा जाता है कि छोटा मंदिर (वस्तुतः शिव मंदिर) बड़े मंदिर का शिखर है, यह शिखर मंदिर के ऊपर रखा जाता, तभी निर्धारित अवधि रात पूरी हो गई, चिड़िया चहचहाने लगी, पौ फटने लगी और मंदिर अधूरा रहा गया। जांजगीर नगर, रत्नपुर शाखा के कलचुरि शासक जाजल्लदेव प्रथम द्वारा बसाया गया माना जाता है और संभवतः इन मंदिरों का निर्माण भी इसी काल में अर्थात 11-12 वीं सदी ईस्वी में निर्मित हुआ होगा।

शिखर रहित विष्णु मंदिर स्थापत्य की दृष्टि से पूर्ण विकसित एवं तत्कालीन कला का प्रतिनिधि उदाहरण है। मानवाकार प्रतिमाओं युक्त विशाल जगती (चबूतरे) पर मंदिर निर्मित है। चबूतरे पर देव प्रतिमाओं के साथ-साथ कृष्ण कथा एवं रामकथा के कुछ महत्वपूर्ण प्रसंगों का अत्यंत रोचक अंकन है। जगती का अलंकरण व पूरे आकार की प्रतिमाओं की दृष्टि से यह मंदिर संभवतः भारतीय स्थापत्य कला का एकमात्र उदाहरण है। पूर्वाभिमुख मंदिर की बाहरी दीवार पर विष्णु, अवतार, रूप, वैष्णव कथाओं के अंकन के साथ-साथ ब्रह्मा, सूर्य, शिव, देवियां, अष्ट दिक्पाल, मिथुन, अप्सरा व व्याल प्रतिमाओं के अतिरिक्त विभिन्न मुद्राओं में वैष्णव योगियों का महत्वपूर्ण प्रतिमाएं हैं। प्रवेश द्वार पर त्रिमूर्ति-ब्रह्मा, विष्णु, महेश के साथ त्रैलोक्यभ्रमण (गरुड़ासीन) विष्णु, नदी देवियां, द्वारपाल तथा पार्श्व अर्द्धस्तंभों पर कुबेर अंकित हैं।

अन्य मंदिर (छोटा मंदिर) शिव का है, जिसका मूल स्वरूप नवीनीकरण संरक्षण से प्रभावित है किन्तु प्रवेश द्वार यथावत सुरक्षित है। यहां सिरदल के मध्य में नंदी सहित चतुर्भुजी शिव का कलात्मक अंकन हैं द्वार शाखाओं में उभय पार्श्वों पर नदी देवियों और द्वारपाल की प्रतिमाएं रूपायित हैं। बाहरी दीवार पर अपेक्षाकृत कम संख्या में किन्तु शास्त्रीय व कलात्मक सूर्य, हरिहर-हिरण्यगर्भ, शिव-नटराज, गणेश, सरस्वती आदि प्रतिमाएं है। एक अन्य महत्वपूर्ण प्राचीन मंदिर की जानकारी पिछली सदी के भारतीय पुरातत्वीय सर्वेक्षण के प्रतिवेदन से प्राप्त होती है, जिसके अनुसार यह विशाल मंडपयुक्त अंलकृत मंदिर शिव को समर्पित था, किन्तु वर्तमान में इस मंदिर का अस्तित्व विद्यमान नहीं है।

जिले में प्राचीन स्थापत्य का विशेष महत्वपूर्ण केन्द्र खरौद है। यह छत्तीसगढ़ का प्रसिद्ध तीर्थ क्षेत्र है। खरौद के ईंट निर्मित ताराकृति मंदिर विशेष उल्लेखनीय हैं। इनमें शबरी मंदिर चबूतरे पर निर्मित है, गर्भगृह का प्रवेश द्वार आकर्षक है, जिसमें नाग युग्म अलंकरण अभिकल्प का संतुलन देखते ही बनता है। प्रवेश द्वार के बीचों बीच ललाट-बिंब पर गरुड़ की आकृति उत्कीर्ण है, जिसमें मंदिर मूलतः वैष्णव होना संभावित है। प्रवेश द्वार पर दो नारी आकृतियों की पहचान नदी देवी गंगा-यमुना के रूप में की जा सकती है। मंदिर का मंडप पुनर्सरचित है, किन्तु अर्द्धस्तंभों पर शिवगण, द्वारपाल, सिंहवाहिनी दुर्गा तथा मकरवाहिनी गंगा की पहचान की जा सकती है। शेष तीन प्रतिमाएं, जिनमें दो पुरुष व एक नारी प्रतिमा है, की पहचान राम, लक्ष्मण व सीता के रूप में की जाती है, किन्तु इन प्रतिमाओं मे वक्ष पर कवच तथा पैर उपानहयुक्त (जूतों से ढके) दिखाई पड़ते हैं, जिससे इन प्रतिमाओं का सौर परिवार से संबद्ध किया जाना अधिक न्याय संगत है। मंदिर के बाहर एक अन्य महत्वपूण्र अर्द्धनारीश्वर प्रतिमा है, जिसे शास्त्रीय प्रतिमानों के अनुरूप अलंकृत तथा व्याघ्रचर्मधारी प्रदर्शित किया गया है।

इन्दल देउल मंदिर की योजना भी ताराकृति है, यह मंदिर ईंटों से निर्मित है, किन्तु बाह्य भित्ति के आलों में गणेश, नृसिंह आदि आकृतियां प्रदर्शित हैं। मंदिर का विशेष उल्लेखनीय अंग प्रवेश द्वार पर स्थापित गंगा-यमुना की प्रतिमाएं है, मानवाकार इन नदी देवी प्रमिाओं की भंगिमा, अलंकरण तो कलात्मक, सुरूचिपूर्ण व संतुलित है ही, इनका आकार भी द्वारशाखा के बराबर पूर्ण है, यह भारतीय मंदिर वास्तु का विशिष्ट लक्षण है। नदी देवी प्रतिमाओं के पार्श्व से बाहर की आरे प्रदर्शित भित्ति के चिह्न, गर्भगृह के समक्ष मंडप जैसे किसी अंग का अनुमान कराते हैं। खरौद का लक्ष्मणेश्वर मंदिर संरक्षण-सर्वधन कार्यों से अत्यधिक प्रभावित है, किन्तु गर्भगृह में स्थापित मूल अष्टकोणीय शिवलिंग के अवशिष्ट है। यहां प्रवेश द्वार को शाखाएं दो भागों में विभक्त हैं, जिसमें निचले भाग पर द्वारपाल व उपरी आधे भाग पर गंगा-यमुना को उनके वाहनों क्रमशः मकर व कच्छप पर स्थित दिखया गया है। मंदिर के मंडप में राम कथानक युक्त स्तंभ तथा दो प्राचीन शिलालेख भी जड़े है। धार्मिक दृष्टि से इस मंदिर की सर्वाधिक मान्यता है। खरौद के मंदिरों का काल ईस्वी सातवी-आठवीं सदी निर्धारित किया जा सकता है।

अड़भार, जिले का एक महत्वपूर्ण प्राचीन स्थल है, जहां ईस्वी सातवीं-आठवीं सदी के शिव मंदिर के अवशेष तथा अन्य पुरातशेश प्रकाश में आये हैं। अड़भार का मंदिर अष्टकोणीय ताराकृति योजना वाला मंदिर था, जिसमें प्रवेश हेतु दो द्वार अब भी मूलतः विद्यमान हैं। इसमें बाह्य अलंकृत द्वार पर नाग-गरूड़, कार्तिकेय व उमा-महेश का अंकन है। मंदिर परिसर में अत्यंत आकर्षक अष्टभुजी देवी महिषमर्दिनी तथा देगन गुरू के नाम से ज्ञात जैन तीर्थंकर पार्श्वनाथ की प्रतिमा है। मंदिर के सामने नंदी मंडप है, जिसमें अष्टकोणीय नृत्त शिव की प्रतिमा है, जो तत्कालीन कला प्रतिमानों में प्रतिनिधि प्रतिमा मानी जा सकती है।

शिवरीनारायण, खरौद से संलग्न महानदी के तट पर स्थित प्रसिद्ध केन्द्र है, जहां शबरीनारायण, केशवनारायण और चन्द्रचूड़ मंदिर प्राचीनता की दृष्टि से विशेष उल्लेखनीय हैं। इनमें केशवनारायण ईंट-पाषाण मिश्रित ताराकृति संरचना है, जिसके प्रवेश द्वार पर विष्णु के चौबीस रूपों का अंकन अत्यधिक सफाई से किया गया है, अन्य परम्परागत स्थापत्य लक्षणों के साथ गर्भगृह में दशावतार विष्णु की मानवाकार प्रतिमा है। शबरीनारायण या मुख्य मंदिर के प्रवेश द्वार के पार्श्व में शंख पुरूष व चक्र पुरूष की आदमकद मूर्तियां है, द्वारशाखा पर बारीक उकेरन और शैलीगत लक्षण की भिन्नता दर्शनीय है साथ ही मंडप में रखी परवर्तीकालीन गरूड़ासीन लक्ष्मी-नारायण प्रतिमा भी उल्लेखनीय है। चंद्रचूड़ मंदिर में अत्यंत महत्वपूर्ण सूचना युक्त कलचुरि कालीन शिलालेख जड़ा है।

यह जिला प्राचीन सिक्कों की प्राप्ति की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। इस क्रम में सर्वप्रथम ठठारी से प्राप्त चांदी के आहत सिक्के हैं, जिनका काल तीसरी-चौथी सदी ईसा पूर्व निर्धारित किया गया है, कुछ अन्य स्थानों से इस प्रकार के सिक्के प्राप्त होने की अपुष्ट सूचना प्राप्त होती है। बालपुर से प्राप्त एक सिक्का अपिलक (सालिलुक) का माना जाता है, जिसका काल ईस्वी की आंरभिक सदी है। यह सिक्का आन्ध्र शासकों के सिक्कों के समरूप है, बालपुर से ही स्थानीय शासकों के कुछ अन्य तांबे के सिक्के प्राप्त हुए हैं, जिनमें गज तथा देवी अथवा नाग का अंकन है। इसके साथ ही रोम, कुषाण शासकों आदि सिक्के भी जिले के संलग्न क्षेत्र व अंचल से प्राप्त हुए हैं। लगभग पांचवीं-छठीं सदी ईस्वी के शासकों प्रसन्नमात्र और महेन्द्रादित्य के 81 सिक्के बाराद्वार के निकट ग्राम तलवा से प्राप्त हुए हैं, ये सभी स्वर्ण सिक्के ठप्पांकित प्रकार के हैं और इस प्रकार के सिक्कों की यह सर्वाधिक संख्या निधि है। तीन चांदी और एक तांबे का चीनी सिक्का भी बालपुर से प्राप्त हुआ है। रतनपुर के कलचुरि शासकों का भी एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्वर्ण मुद्राओं का संग्रह केरा से प्राप्त हुआ था।

इस प्रकार संक्षेप में कहा जा सकता है कि छत्तीसगढ़ अंचल के जांजगीर-चांपा जिले के मैदानी भू-भाग ने इतिहास में सभ्यता के प्रत्येक चरण में मानव को आकर्षित किया है और नैसार्गिक सम्पदा से परिपूर्ण इस जिले का वैविध्य सांस्कृतिक, धार्मिक, राजनैतिक व कलात्मक गतिविधियों का महत्वपूर्ण केन्द्र रहा है, वर्तमान में अवशिष्ट हमारे अतीत के ये धरोहर हमें आत्म गौरव का बोध कराते हुए उज्जवल भविष्य की ओर अग्रसर रहने की प्रेरणा देते हैं।

Saturday, September 25, 2021

छत्तीसगढ़ का पुरातत्व - 1986

मध्यप्रदेश की स्थापना के तीन दशक अवसर पर 1 नवंबर 1986 को प्रकाशित इस पत्रक का आलेख डा. लक्ष्मीशंकर निगम का है। ऐसे अवसरों पर आयोजन के साथ इस तरह की प्रकाशित सामग्री स्थायी महत्व की, अतएव सदैव प्रासंगिक होती हैं, किंतु सहज उपलब्ध नहीं होती, इस दृष्टि से यहां प्रस्तुत की जा रही है। यह भी उल्लेखनीय है कि उस दौर में पुरातत्व-संग्रहालय की गतिविधियों पर विशेषज्ञों, रुचि रखने वालों की निगरानी, टीका-टिप्पणी और सक्रिय निःशर्त अपेक्षारहित सहयोग विभागीय अधिकारियों को मिलता था। डॉ. विष्णुसिंह ठाकुर, डॉ. लक्ष्मीशंकर निगम जैसे पुराविद, इतिहासकार डॉ. रमेन्द्रनाथ मिश्र तथा छत्तीसगढ़ के इतिहास, साहित्य, संस्कृति के जानकार हरि ठाकुर जैसी विभूतियां विभागीय कार्यालय-संग्रहालय के नियमित संपर्क में रहते, विभागीय अधिकारियों के मान-सम्मान के पात्र होते थे।

छत्तीसगढ़ का पुरातत्व

मध्यप्रदेश के दक्षिण-पूर्वी क्षेत्र में स्थित रायपुर, बिलासपुर और बस्तर संभाग का क्षेत्र छत्तीसगढ़ के नाम से प्रख्यात है। इस भू-भाग का अधिकांश हिस्सा (पूर्व बस्तर रियासत को छोड़कर) तथा पश्चिमी उड़ीसा का क्षेत्र दक्षिण कोसल के नाम से प्रसिद्ध था। भारतीय इतिहास, संस्कृति एव पुरातत्व के क्षेत्र में दक्षिण कोसल का स्थान महत्वपूर्ण रहा है। इस अंचल के पुरातत्व के विषय में उस समय से जानकारी मिलती है, जब मानव-सभ्यता का पर्याप्त विकास नहीं हुआ था तथा मनुष्य पशुओं की भांति जंगलों, पर्वतों और नदियों के तटवर्ती क्षेत्रों में जीवन व्यतीत करता था। अन्य प्राणियों से बुद्धि में श्रेष्ठ होने के कारण मानव ने पत्थरों को नुकीला बनाकर उसे उपकरण (हथियार) के रूप में प्रयुक्त करना प्रारम्भ किया, जिससे भोजन सरलतापूर्वक प्राप्त कर सके। पाषाण के प्रयोग के कारण, यह युग पाषाण-काल के नाम से सम्बोधित किया जाता है। विकास की अवस्था के आधार पर इसे तीन भागों में विभाजित किया जाता है- (१) पूर्व-पाषाण काल, (२) मध्य-पाषाण काल एवं (३) उत्तर-पाषाण काल। पूर्व-पाषाण युग के उपकरण महानदी घाटी तथा रायगढ़ जिले के सिंघनपुर से प्राप्त हुए हैं। मध्य-पाषाण युग की सामग्री रायगढ़ जिले से ही कबरा पहाड के निकट से तथा उत्तर पाषाण काल के औजार महानदी घाटी बिलासपुर जिले के धनपुर, सिंघनपुर आदि स्थलों से मिले हैं। हाल के वर्षों में भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण एवं मध्यप्रदेश संग्रहालय विभाग द्वारा बस्तर जिले के अनेक प्रागैतिहासिक स्थलों की खोज की गई है। पाषाण काल के पश्चात् नव-पाषाण काल आता है। इससे सम्बन्धित अवशेष दुर्ग जिले के अर्जुनी तथा नांदगांव, रायगढ़ जिले के टेरम तथा बस्तर जिले में मिलते हैं। इस काल में मानव, सभ्यता की दृष्टि से विकसित हो चुका था तथा उससे कृषि-कर्म, पशुपालन, गृह निर्माण तथा बर्तनों का निर्माण करना सीख लिया था।

पाषाण युग के पश्चात् ताम्र और लोह युग आता है। इस काल की सामग्री का छत्तीसगढ़ क्षेत्र में अभाव है किन्तु निकटवर्ती बालाघाट जिले के गुंगेरिया नामक स्थान में ताम्बे के औजारों का एक बड़ा संग्रह सन १८७० में प्राप्त हुआ था। लौह-युग में शव को गाड़ने के लिये बड़े बड़े शिलाखण्डों का प्रयोग किया जाता था, अतएव इन्हें महापाषाण स्मारक के नाम से सम्बोधित किया जाता है। दुर्ग जिले के कन्हीभण्डार, चिरचोली. मजगहान एवं सोरर से इस काल के पाषाण घेरों के अवशेष प्राप्त हुए हैं। इसी जिले के कबराहाट नामक स्थल से पाषाण घेरे के साथ लोहे के औजार एवं मृण्मयभाण्ड (मिट्टी के बर्तन) मिले हैं। दुर्ग जिले के धनोरा नामक स्थल में ५०० महापाषाणीय स्मारक स्थित हैं: इस स्थान में सन् १९५६-५७ में मध्यप्रदेश शासन द्वारा उत्खनन शासन कराया गया था।

प्रागैतिहासिक काल में मनुष्य, जब पर्वत की कन्दराओं में निवास करता था, तब उसने कन्दराओं में अनेक चित्र बनाए थे जो उसके कलाप्रिय होने के प्रमाण हैं। इस प्रकार के चित्र रायगढ जिले के सिंघनपुर, कबरा पहाड़, ओंगना, बसनाझर, करमागढ़ लेखामाडा, राजनांदगांव जिले के चितवा डोंगरी तथा बस्तर जिले के गुपनसार आदि स्थलों में प्राप्त हुए हैं।

आर्यों के आगमन के साथ ही भारतीय इतिहास में वैदिक युग प्रारम्भ होता है। इस काल की सामग्री का छत्तीसगढ़ क्षेत्र में अभाव है। रामायण, महाभारत तथा पौराणिक कथानकों से संबंधित अनेक स्थलों के विवरण यहां मिलते हैं। लगभग छठवीं शताब्दी ई.पू. में उत्तर भारत सोलह महाजनपदों में विभाजित था। इस काल के विवरण इस क्षेत्र में उपलब्ध नहीं हैं किन्तु तारापुर और आरंग से प्राप्त आहत मुद्राओं (punch marked coins) से स्पष्ट है कि इस क्षेत्र में नन्द-मौर्य काल के पूर्व, एक पृथक सत्ता स्थापित थी।

मौर्यकालीन पुरातात्विक सामग्रियों में सरगुजा जिले के रामगढ़ की पहाड़ियों में स्थित सीताबेंगा और जोगीमारा नामक गुफाएं अत्यन्त महत्वपूर्ण कही जा सकती है। यहां अशोककालीन ब्राह्मी लिपि में सुतनुका नामक देवदासी तथा उसके कलाकार प्रेमी देवदत्त का उल्लेख है। यहीं भारत की प्राचीनतम् नाट्य शाला भी स्थित है जो पर्वत को खोदकर बनाई गई है। मौर्य-काल की मुद्राए बिलासपुर जिले के अकलतरा /अकलसरा और ठठारी से प्राप्त हुए हैं।

मौर्यों के पश्चात् छत्तीसगढ़ का क्षेत्र संभवतः सातवाहनों के अधिकार क्षेत्र में आ गया था। शिवश्री आपिलक नामक सातवाहन राजा की ताम्र मुदाएं यहां प्राप्त हुई हैं। इसके अतिरिक्त सातवाहन मुद्राओं की अनुकृति में अनेक ताम्बे के सिक्के भी मिलते हैं। सातवाहनकालीन सामग्रियों में बिलासपुर जिले के किरारी नामक स्थान से प्राप्त काष्ठस्तंभ लेख तथा सक्ती के निकट गंुजी (ऋषभ तीर्थ) स्थित कुमारवरदत्त का शिलालेख महत्वपूर्ण माना जा सकता है। चीनी यात्री युवान-च्वांग ने भी यहां के सातवाहन राजा तथा उसके राज्य में रहने वाले भिक्षु नागार्जुन का उल्लेख किया है। बिलासपुर जिले के बुढ़ीखार से एक लेखांकित प्रतिमा मिली है। यह प्रतिमा भारत की प्राचीनतम वैष्णव प्रतिमा स्वीकृत की जाती है। सातवाहन काल में भारत का व्यापार रोम से अत्यन्त विकसित था। संभवतः इसीलिए छत्तीसगढ़ क्षेत्र से अनेक रोमन स्वर्ण मुद्राएं भी प्राप्त हुई हैं।

सातवाहनों के पश्चात भारतीय राजनीति में शक कुषाण आदि विदेशी जातियों का वर्चस्व स्थापित हो गया। छत्तीसगढ़ में इनके अधिकार संबंधी विवरण उपलब्ध नहीं है, फिर भी इनके ताम्बे के सिक्कों की प्राप्ति यहां हुई है। बिलासपुर जिले के पेन्डरवा नामक स्थान से कुषाण सिक्कों के साथ यौधेयगण का एक ताम्बे का सिक्का मिला है।

इसके पश्चात भारतीय इतिहास में स्वर्ण-युग के नाम से विख्यात गुप्त-काल आता है। समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति से ज्ञात होता है कि उसने दक्षिण कोसल के राजा महेन्द्र तथा महाकान्तार (बस्तर) के राजा व्याघ्रराज को पराजित किया तत्पश्चात् उनका राज्य वापस कर दिया। इस प्रकार उनका प्रभाव इस क्षेत्र में स्थापित हो गया। गुप्तकाल की नौ स्वर्ण मुद्राएं दुर्ग जिले के बानबरद नामक स्थल से मिली हैं। इसमें काच, चन्द्रगुप्त द्वितीय तथा कुमार गुप्त प्रथम की मुद्राएं हैं। कुमारगुप्त प्रथम का चांदी का एक सिक्का आरंग से मिला है। गुप्तों के समकालीन वाकाटक नरेश नरेन्द्रसेन का एक अधूरा ताम्रपत्र भी दुर्ग से प्राप्त हुआ है।

गुप्त तथा गुप्तोत्तर काल में इस क्षेत्र में गुप्त वाकाटक वंशों का प्रभाव रहा किन्तु यहां की सत्ता स्थानीय राजवंशों द्वारा संचालित होती थी। यहां नल, राज्यर्षितुल्यकुल, शरभपुरीय, पाण्डुवंशीय शासकों का राज्य रहा। नलवंश का प्रमुत्व मुख्यतः बस्तर क्षेत्र में था इसका संघर्ष वाकाटक राजाओं से था। इस वंश के कुल चार अभिलेख मिले हैं। बस्तर जिले के एडेन्गा एवं दुर्ग जिले के कुलिया नामक स्थानों से प्राप्त उभारदार (repousse) मुद्राओं से इस वंश के पांच राजाओं यथा- वराहराज, भवदत्तवर्मन, अर्थपति, नन्दनराज एवं स्तंभ के विषय में जानकारी मिलती है। इसके अतिरिक्त राजिम से प्राप्त एक ताम्रपत्र में इनकी परवर्ती शाखा के विषय में जानकारी मिलती है।

राज्यर्षितुल्यकुल के राजा भीमसेन द्वितीय का आरंग से प्राप्त एकमात्र ताम्रपत्र ज्ञात है।

शरभपुरीय नाम, इस वंश के संस्थापक शरभ तथा उसकी राजधानी शरभपुर के आधार पर दिया गया है। शरभपुर का अभिज्ञान अभी तक नहीं हो सका किन्तु अधिकांश विद्वानों का मत है कि यह रायपुर-बिलासपुर क्षेत्र में स्थित रहा होगा। शरभ का उत्तराधिकारी नरेन्द्र हुआ। इसके पश्चात् प्रसन्न नामक राजा का उल्लेख परवर्ती अभिलेखों में मिलता है। इसमें स्वर्ण, रजत एवं ताम्बे की उभारदार मुद्राएं प्राप्त हुई हैं जिससे इसका पूरा नाम प्रसन्नमात्र ज्ञात होता है। प्रसन्नमात्र के सिक्कों के सदृश्य महेन्द्रादित्य और क्रमादित्य की भी स्वर्ण मुद्राएं मिलती हैं। इसके प्रचलनकर्ता स्थानीय शासक थे अथवा गुप्त सम्राट, इस विषय में विद्वानों में मतभेद है। शरभपुरीय शासकों की द्वितीय राजधानी कालान्तर में श्रीपुर (वर्तमान सिरपुर, जिला-रायपुर) हो गई। बाद में यह पूर्ण राजधानी में परिवर्तित हो गई। शरभपुरीय स्मारकों का निश्चित अभिज्ञान नहीं हो सका है। किन्तु बिलासपुर जिले के ताला में स्थित देवरानी एवं जेठानी मंदिर इस काल के प्रतीत होते हैं। मध्यप्रदेश पुरातत्व एवं संग्रहालय संचालनालय द्वारा इस स्थान के सफाई तया संरक्षण का कार्य विगत वर्षों कराया गया है, जिससे अनेक महत्वपूर्ण पुरातात्विक सामग्रियां मिली हैं।

शरभपुरियों के पश्चात छत्तीसगढ़ क्षेत्र पाण्डुवंशीय अथवा सोमवशीय शासकों के आधीन आया। यह काल छत्तीसगढ़ के इतिहास का स्वर्ण-काल माना जा सकता है। इस वंश की राजधानी सिरपुर में स्थित थी। महाशिवगुप्त बालार्जुन इस वंश का यशस्वी राजा था। पाण्डु-काल के अनेक अभिलेख, स्मारक एंव मंदिर इस क्षेत्र में मिलते हैं। सिरपुर का ईटों द्वारा निर्मित लक्ष्मण मंदिर इस काल की अनुपम कृति है। इसके अतिरिक्त गंधेश्वर मंदिर का निर्माण भी इसी काल में हुआ था। सिरपुर में उत्खनन कायं १९५३-५४ में सागर विश्व विद्यालय तथा १९५४-५५ एवं ५५-५६ में मध्यप्रदेश शासन द्वारा कराया गया, जिससे पंचायतन शैली का शिवमंदिर एवं दो बौद्ध बिहार और सैकड़ों मूर्तियां एवं पुरातात्विक सामाग्री प्राप्त हुई है। सिरपुर से प्राप्त धातु प्रतिमाएं न केवल छत्तीसगढ़ वरन् सम्पूर्ण भारत की महत्वपूर्ण कलाकृति के रुप, स्वीकृत हैं। सिरपुर के लक्ष्मण मंदिर की शैली के ईटों के मंदिर की परम्परा लगभग ३०० वर्षों तक चलती रही। खरौद, पुजारीपाली, धोबनी, पलारी आदि स्थलों में प्राप्त मंदिरों से इसकी पुष्टि होती है।

छत्तीसगढ़ में पाण्डुवंशियों के पश्चात रतनपुर कलचुरियों, कवर्धा तथा चक्रकोट के नाग तथा कांकेर के सोमवंशियों का शासन रहा। इसमें कलचुरी प्रमुख सत्ता थी। कलचुरियों की प्रारंभिक राजधानी बिलासपुर जिले के तुम्माण में थी कालान्तर में यह रत्नपुर (वर्तमान रतनपुर) में स्थानांतरित हो गई। इस वंश के अनेक अभिलेख, मुद्राएं तथा स्मारक छत्तीसगढ़ में मिलते हैं। कलचुरी अभिलेखों का सम्पादन डा. व्ही. व्ही. मिराशी द्वारा किया गया है। इस वंश के जाजल्लदेव प्रथम की स्वर्ण एवं ताम्र; रत्नदेव द्वितीय की स्वर्ण, रजत और ताम्र तथा प्रतापमल्ल की सिर्फ ताम्बे की मुद्राएं ज्ञात हैं। कलचुरी तथा समकालीन राजवंशों से संबंधित मंदिर एवं प्रतिमाएं रायपुर जिले के राजिम, नारायणपुर, आरंग, सिहावा, खल्लारी; बिलासपुर जिले के तुम्माण, रतनपुर, मल्लार, सलखन, शिवरीनारायण; जांजगीर, कोटगढ़, सरगांव, अडभार; दुर्ग जिले देवबलौदा एवं सोरर; राजनांदगांव जिले के भोरमदेव, घटियारी, गंडई और बस्तर जिले के नारायणपाल बारसूर एव भैरमगढ़ में स्थित हैं। इन स्थानों में शैव, वैष्णव. शाक्त तथा जैन धर्म से सम्बंधित कलात्मक देवालय एवं प्रतिमाएं उपलब्ध हैं। कलचुरियों के पश्चात् छत्तीसगढ़ क्षेत्र मराठों तथा कालान्तर में ब्रिटिश शासन के अधिकार में आ गया।

छतीसगढ़ की पुरातत्व सम्पदा का एक बड़ा संग्रह रायपुर के महन्त घासीदास स्मारक संग्रहालय में संरक्षित है। विगत वर्षों में मध्यप्रदेश शासन द्वारा बिलासपुर में एक संग्रहालय की स्थापना की गई है। यहां की पुरातात्विक सम्पदा के संरक्षण के लिए शासन सतत प्रयत्नशील है अनेक स्मारकों को राज्य शासन द्वारा संरक्षित स्मारक घोषित किया जा चुका है तथा यह क्रम अभी भी जारी है।

पुरातत्व एवं संग्रहालय, मध्यप्रदेश, रायपुर द्वारा प्रकाशित तथा शि. बे. औ सह. संस्था द्वारा मुद्रित। आलेख- डा. लक्ष्मीशंकर निगम।

Saturday, December 21, 2019

हाशिये पर

• हमारे सम्माननीय 80 पार चुके बुजुर्ग हैं शर्मा जी, पिछले दिनों तटस्थ भाव से कहा, पत्नीे बिस्तर पर हैं, मेरे सामने चली जाएं तो ठीक, हमने हंसी की, उन्होंने भी साथ दिया फिर संजीदा हुए, कहा, यदि मैं पहले गया तो उनकी देखभाल कौन करेगा। हम आपस में बात करने लगे कि उनके बच्चे बहू..., सब हैं, 'भरा-पूरा परिवार', दोनों नौकरी-पेशा, किसी और शहर, दूर देश में हैं। मां-बाप का ध्यान नहीं, अपने में ही मगन। मगर बुजुर्गों की सयानी बात। शर्मा जी कहने लगे, जिसका दाना-पानी जहां लिखा। बेटा-बहू, अपने ही बच्चों की देखभाल नहीं कर पा रहे थे सो हास्टल में दाखिला कराया है, मां-सासू मां के लिए क्या और कितना कर पाएंगे। किसी पक्ष की आलोचना की जा सकती है, लेकिन है यह वस्तुतः आज की सहज, सामान्य, स्वाभाविक परिस्थितियां।

• कुछ बरस पहले बिलासपुर में एक अखबार ने जानना चाहा कि ऐसा कौन सा सरकारी दफ्तर है, जो सबसे कम जनोपयोगी है (या जिसे बंद किया जा सकता है), इसमें अव्वल नंबर पर था पुरातत्व विभाग यानि मेरा कार्यालय। मैंने उन पत्रकार महानुभाव का पता करने की कोशिश की, प्रेस ने तो नहीं बताया लेकिन पता लग गया, वे युवा पत्रकार परिचित निकले और स्वयं पहल कर खेद व्यक्त किया। फोन पर धन्यवाद देने पर उन्हें लगा कि मैं व्यंग्य या खीझ में ऐसा कह रहा हूं। बाद में प्रत्यक्ष मुलाकात में मैंने स्पष्ट‍ किया कि यह तो मेरे लिए अपेक्षित था, क्योंकि इस (और ऐसे अन्य सर्वेक्षण संबंधी) कार्यालय का सामान्य-जन से सीधा ताल्लुक कम ही होता है। मैं यह भी मानता हूं कि पुरातत्व‍-संस्कृति जैसी चीज हाशिये पर ही होनी चाहिए। मुख्य धारा में तो रोटी, कपड़ा, मकान, स्वास्य्य, शिक्षा, बिजली, पानी, सड़क और भू-राजस्व के साथ कानून-व्यवस्था को ही होना चाहिए। राग-रंग को हाशिये पर ही होना चाहिए। पुरातत्व-संस्कृति मुख्य धारा में आए तो इनका और समाज दोनों का बंठाधार होते देर नहीं। वैसे भी हाशिया महत्वपूर्ण, विशेष उल्लेखनीय और ध्यान देने योग्य के लिए नियत स्थान है। 

• चर्चित, पुरस्कृत कलाकार-साहित्यकार सब से अच्छे न माने जाएं, लेकिन अधिकतर अच्छे कलाकार जरूर होते हैं और कुछ उदाहरणों में अनूठे और श्रेष्ठ भी। सम्मानित-पुरस्कृत कलाकारों में आमतौर पर (अन्य से अलग) अपनी कला क्षमता के साथ 'नागर समाज या मुख्य धारा' में उपयुक्त साबित हो कर हाशिये पर सुशोभित होने के लिए आवश्यक अतिरिक्त गुण (जागरूकता और उद्यम), अन्य की अपेक्षा अधिक होता है। 

• विनोद कुमार शुक्ल के चर्चित उपन्यास 'नौकर की कमीज' का अंगरेजी अनुवाद, संभवतः 2000 प्रतियों का संस्करण, 'द सर्वेन्ट्स शर्ट' पेंगुइन बुक्स ने 1999 में छापा था, उन्हें 2001 में छत्तीसगढ़ शासन का साहित्य के क्षेत्र में स्थापित पं. सुंदरलाल शर्मा सम्माःन मिला। लगभग इसी दौर में एक विवाद रहा, जैसा मुझे याद आता है- पेंगुइन बुक्स ने श्री शुक्ल को पत्र लिखा कि उनकी पुस्तकें बिक नहीं रही हैं, यों ही पड़ी हैं, जिन्हें वे लुगदी बना देने वाले हैं, लेकिन श्री शुक्ल चाहें तो पुस्तक की प्रतियों को किफायती मूल्य पर खरीद कर पुस्तकों को लुगदी होने से बचा सकते हैं, यह बात समाचार पत्रों में भी आ गई। साहित्य बिरादरी, विनोद जी के प्रशंसकों, और खुद उनके लिए यह अप्रत्याशित था, प्रमाण जुटाने के प्रयास हुए कि किताब खूब बिक रही है और प्रकाशक रायल्टी देने से बचने के लिए ऐसा कर रहा है। 

बहरहाल, इस भावनात्मक उबाल को मेरी जानकारी में, समय और बाजार ने जल्द ही ठंडा कर दिया और अंततः क्या हुआ मुझे पता नहीं, लेकिन लुगदी बना देने वाली बात से यह सवाल अब तक बना हुआ है कि सामाजिक-जासूसी उपन्यास, जो लुगदी साहित्य कह कर खारिज किए जाते हैं, बड़ी संख्या में छपते-बिकते और पढ़े जाते हैं, सहेज कर रखे भी जाते हैं। तब सोचें कि ‍'लुगदी-पल्प' मुहावरा और शब्दशः के फर्क की विवेचना से क्या बातें निकल सकती हैं। लुगदी की तरह मटमैले कागज पर छपने वाला लेखन होने के कारण लुगदी साहित्य कहा जाता है या छपने-पढ़ने के बाद जल्द लुगदी बना दिए जाने के कारण। यह निसंदेह कि प्रतिष्ठित साहित्यकार भी अधिक से अधिक बिकना चाहता है और लुगदी लेखन करने वाले, साहित्यिक बिरादरी में अपने ठौर के लिए व्यग्र दिखते हैं।