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Friday, July 1, 2022

नेताजी

2004 में श्याम बेनेगल की फिल्म ‘नेताजी सुभाष चंद्र बोस: द फारगाटेन हीरो‘ आई। फिल्म में नेताजी के विवाहित होने पा कुछ शोधकर्ताओं ने आपत्ति की थी। उनका कहना था कि 23 जनवरी 1939 में चीन जाने के लिए वीसा आवेदन में नेताजी ने अपनी वैवाहिक स्थिति ‘अविवाहित‘ दर्शाई है। नेताजी की हवाई दुर्घटना में मौत भी संदिग्ध मानी गई है। सितंबर 1985 में फैजाबाद के गुमनामी बाबा के मौत के बाद उनके सामानों में नेताजी संबंधी सामग्री से भी रहस्यों की उधेड़-बुन होती रही। इस सबके साथ नेताजी का चमत्कारी व्यक्तित्व किसी महाकाव्यीय नायक की तरह है, जिसकी निरंतर व्याख्या होती रहती है।

प्रभा खेतान फाउंडेशन के माध्यम से अन्य शहरों की तरह रायपुर में भी स्तरीय साहित्यिक-वैचारिक आयोजन होते रहे हैं, जिनमें ‘आखर‘ और ‘कलम‘ जैसा ही लेखक से मुलाकात और पाठक-श्रोताओं से रूबरू संवाद का कार्यक्रम ‘द राइट सर्किल‘ है, जिसका सुरुचिपूर्ण और व्यवस्थित संयोजन महिलाओं के समूह ‘अहसास‘, रायपुर द्वारा किया जाता है। इसी कड़ी में 30 जून को मिशन नेताजी वाले शोधार्थी-लेखक चंद्रचूड़ घोष आमंत्रित थे। ‘अहसास‘ समूह की सर्व सुश्री आंचल गरचा, सृष्टि त्रिवेदी, कीर्ति कृदत्त तथा उनके सहयोगियों ने इस महत्वपूर्ण सत्र को पूरी गरिमा के साथ अंजाम दिया। आमंत्रित लेखक के साथ बातचीत का जिम्मा समूह की वरिष्ठ सदस्य गांधीवादी शिक्षाविद विदुषी सुश्री कल्पना चौधरी का था।


पूरा सत्र, सुघड़, करीने से, कुशल समय-प्रबंधन और समय-सीमा में अधिकतम संभव निष्पत्तियों के कारण यादगार रहा। चंद्रचूड़ जी की विद्वता और नेताजी के तथ्यात्मक इतिहास को उजागर करने का उद्यम झलकता रहा। प्रश्नोत्तर सत्र के दौरान सुभाष चंद्र बोस की पुत्री अनीता से नेताजी संबंधी जानकारी पूछी जाने पर अनीता द्वारा प्रश्नों के प्रति उपेक्षा-उदासीनता के लिए चंद्रचूड़ जी का स्पष्टीकरण उल्लेखनीय था। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह वैसी ही बात होगी कि राहुल गांधी से राजीव गांधी या इंदिरा गांधी की मृत्यु से जुड़ी बातों की तहकीकात की जाए।

नेताजी संबंधी किसी भी जिज्ञासा, शंकाओं के समाधान के लिए डॉ. ब्रजकिशोर प्रसाद सिंह मुझे सदैव सहज उपलब्ध रहे हैं। नेताजी के प्रसंगों के साथ स्वाधीनता संग्राम, कांग्रेस, नौरोजी, गांधी, नेहरू, जिन्ना के न सिर्फ इतिहास, बल्कि उस दौरान की घटना और परिस्थितियों को संपूर्ण परिप्रेक्ष्य के साथ, उनसे जानना अनूठा अनुभव होता है। इसी क्रम में मध्यकालीन इतिहास के भी रोचक और कम चर्चित किंतु विशिष्ट पक्षों पर उनकी बातें पाठ्य पुस्तकों में मिलना संभव नहीं। फिल्म, हिंदी साहित्य और पौराणिक आख्यान भी उन्हें प्रिय हैं और संदर्भ, उदाहरण के लिए इस्तेमाल किए जाते रहते हैं। पिछले दिनों उत्तरप्रदेश चुनावों के पहले योगी आदित्यनाथ पर उनका लेख, समकालीन या निकट-भूत को वस्तुगत शोध दृष्टि से देखते हुए भविष्य की संभावनाओं को समझने का अनूठा नमूना है। बोस-गांधी मतभेद और मतांतर पर उनका एक लेख यहां है। डॉ. प्रसाद ने 1989 में प्रो. एस.पी. सिंह के निर्देशन में सुभाष चंद्र बोस पर शोध किया है। उनके शोध का शीर्षक ‘भारत के स्वाधीनता संग्राम में सुभाष चंद्र बोस की भूमिका‘ (मूल अंगरेजी में) था, इस कार्य में डॉ. प्रसाद को प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. बिपनचंद्र से भी मार्गदर्शन प्राप्त हुआ था। नेताजी, भारतीय इतिहास और क्षेत्रीय इतिहास के रोचक और महत्वपूर्ण पक्षों पर डॉ. प्रसाद यदा-कदा लिखते रहते हैं। पिछले दिनों गांधी पर लिखे उनके लेखों की श्रृंखला फेसबुक पर आई, जो संभवतः प्रकाशित भी होगी।

सुभाष चंद्र बोस पर डॉ. प्रसाद का एक लेख ‘सुभाष बोस, एमिली और अनिता‘ दैनिक हरिभूमि समाचार पत्र में 29 जनवरी 2006 को प्रकाशित हुआ था। वह लेख यहां यथावत प्रस्तुत-


सुभाष चन्द्र बोस आईसीएस से त्यागपत्र देने के उपरांत अपनी संपूर्ण ऊर्जा और समर्पण के साथ भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में शामिल हुये थे। गांधीवादी कांग्रेस की अहिंसात्मक जन आधारित राजनीति के बावजूद उनकी राजनीतिक विचारधारा तथा कार्यप्रणाली पर बंगाल की सशस्त्र क्रांतिकारी गतिविधियों का भरपूर प्रभाव पड़ा। इस परिवेश में उनके राजनैतिक विचार और कार्यों में राष्ट्रवाद की उग्रतम अभिव्यक्ति हुई। सविनय आंदोलन के दौरान कारावास की सजा भुगतते गंभीर तौर पर अस्वस्थ हुए तो चिकित्सा हेतु यूरोप जाना पड़ा। वियना और बैंडगेस्टीन में स्वास्थ्य लाभ करते हुए उन्होंने महसूस किया कि उनकी गतिविधियों पर खुफिया पुलिस के द्वारा निगरानी रखी जा रही है। आस्ट्रिया से बाहर अन्य देशों की यात्रा के दौरान भी उन पर निगरानी रखी जाती थी क्योंकि ब्रिटिश सरकार उन्हें अपना सर्वाधिक खतरनाक शत्रु मानती थी।

1934 में लंदन के प्रकाशक लॉरेंस विशार्ट ने उन्हें भारतीय राजनैतिक आंदोलन पर पुस्तक लिखने का प्रस्ताव दिया। करार के अनुसार पुस्तक उसी वर्ष पूर्ण की जानी थी। त्वरित लेखन हेतु सुभाष जी ने निजी सचिव रखने का फैसला किया। आस्ट्रिया में रह रहे डा. माथुर ने आस्ट्रिया परिवार की लड़की सुश्री एमिली शेंकल की अनुशंसा की। उनके पिता पशु चिकित्सक थे तथा दादा जी चमड़े के व्यवसाय से संबद्ध थे। उनका जन्म 26 दिसंबर 1910 को हुआ था। पूरा परिवार कैथोलिक मतावलंबी था। अंग्रेजी व्याकरण में एमिली ने प्रशंसा योग्य प्रवीणता प्राप्त की। शार्टहैंड में भी उन्होंने दक्षता हासिल की। 1930 में एमिली की स्कूली शिक्षा पूरी हो गयी तथा धर्म हेतु आजीवन व्रत का विचार छोड़ दिया। वे नौकरी की तलाश कर रही थीं। इसी समय डा. माथुर ने सुभाष चन्द्र बोस के निजी सचिव हेतु उनकी अनुशंसा की। सुभाष बोस को निजी सचिव इस प्रकार का चाहिये था, जो उनके विचार और कार्यों के बारे में सूचनाओं की गोपनीयता बनाये रख सके, क्योंकि ब्रिटिश खुफिया सेवा द्वारा उन पर सतत निगरानी रखी जा रही थी। एमिली इस मापदंड पर खरी उतर रही थीं।

पुस्तक लेखन में बोस स्वयं लिखते तो एमिली पांडुलिपि की टाइप प्रति तैयार करती या फिर बोस बोलते जाते और एमिली शार्टहैंड में नोट्स लेकर टाइप करतीं। सुभाष पहले तो होटल में रह रहे थे परन्तु जल्दी ही उन्होंने घर किराये पर ले लिया। सुभाष बोस के भतीजे अशोक नाथ बोस जर्मनी में पढ़ रहे थे। अवकाश होने पर वे भी आ जाते। चुनिंदा मौकों पर नेता जी स्वयं भोजन बनाते और अशोक के अनुसार वे भारतीय व्यंजन बहुत स्वादिष्ट बनाते थे। घर इस मामले में भी सुरक्षित था कि खुफिया विभाग के लोग होटल की तरह यहां निगरानी नहीं रख सकते थे। 1934 के अंत तक पुस्तक पूरी होने के उपरांत गाल ब्लैडर का आपरेशन होना था पुस्तक की प्रूफ चेकिंग करते-करते पिता को गंभीर रुग्णता की सूचना मिली तो तत्काल भारत लौटे। उन दिनों हवाई जहाज केवल दिन को ही उड़ा करते थे। यात्रा में समय अधिक लगता था करांची हवाई अड्डे पर पहुंचते ही मालूम हुआ कि उनके पिता का स्वर्गवास हो चुका है। कलकत्ते से श्राद्ध के बाद पुनः यूरोप लौटे। क्योंकि अभी उनके गाल ब्लैडर का आपरेशन होना था। उन्होंने एकमात्र नाम सुश्री एमिली शेंकल का लिखा था। संभवतः यह पुस्तक लेखन में की गयी सहायता के कारण कम और उस दौरान उनसे भावनात्मक लगाव का परिचायक अधिक था। 1935-36 के दौरान एमिली से उनकी घनिष्ठता बढ़ती गयी परंतु भारत की आजादी भी दृष्टि से ओझल नहीं हुई थी। बाद में गांधी नेहरू और कांग्रेस के दबाव में उन्हें रिहा किया गया। गांधी जी उन्हें 1938 के कांग्रेस सत्र के लिये अध्यक्ष नियुक्त किया तथा स्वास्थ्य लाभ के लिये यूरोप जाने की सलाह दी। क्योंकि कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर कार्य करने के लिये उन्हें अपने आप को फिट रखना था। इस संक्षिप्त यूरोपीय प्रवास में एमिली नेता जी के साथ रहीं। अब तक एमिली के साथ उनका स्नेह संबंध अत्यंत प्रगाढ़ हो चुका था।

1934 से 42 के आठ वर्षों की अवधि में दोनों के बीच उपजे अंतरंग तथा भावुक संबंधों का पता उनके बीच हुये पत्राचार से चलता है। आज कम से कम 180 पत्र उपलब्ध हैं जिनमें से अधिकांश सिगार के पुराने डब्बे में मिले थे। यह डब्बा 1980 में खोला गया था तथा 1993 में एमिली बोस ने इन पत्र को सार्वजनिक किये जाने की अनुमति दी। 1942 के उपरांत भी नेता जी ने एमिली को पत्र लिखना जारी रखा था। दक्षिण पूर्वी एशिया के विभिन्न हिस्सों से लिखे पत्र एमिली के वियना वाले घर में रखे थे। वियना पर मित्र राष्ट्रों की विजय के उपरांत ब्रिटिश अधिकारियों ने उनके घर की तलाशी ली और इस दौरान जब्त किये कागजातों में ये पत्र भी शामिल हो गये, आज ये पत्र अनुपलब्ध हैं। भारत से बर्लिन पहुंचने पर नेता जी ने एमिली के नाम पत्र लिखा तथा तार भी भेजा। एमिली के परिवार की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ नहीं थी। पिता की मृत्यु के उपरान्त परिवार में मां और बहन ही शेष बची थीं। आजीविका के लिये वे नौकरी कर रही थी। नेता जी ने उन्हें पुनः निजी सचिव के तौर पर रखने की अभिलाषा जाहिर की। पत्र में उन्होंने गुजारिश की थी कि व्यस्त और गोपनीय कार्यक्रम के कारण वे वियना आने में असमर्थ हैं सो एमिली हो बर्लिन आ जायें। जर्मन विदेश सेवा के अधिकारियों के मार्फत भी संदेश भेजा गया। एमिल मिलने आयी और इस बार दोनों ने विवाह कर लिया। 26 दिसंबर 1942 के दिन नवविवाहित दंपत्ति के घर पुत्री का जन्म हुआ। नेता जी इटालियन क्रांतिकारी गैरीबाल्डी को अपना आदर्श मानते थे और उनकी पुत्री एनीटा के नाम पर अपनी पुत्री का नामकरण अनीता किया। पत्नी और पुत्री के साथ वे अधिक समय नहीं बिता पाए क्योंकि दक्षिण पूर्वी एशिया में आजाद हिन्द फौज और सरकार के गठन हेतु उन्हें बर्लिन से जापान जाना पड़ा। एमिली और अनिता के प्रति पिता और पति के रूप में सुभाष बोस अपने आपको जिम्मेदारी से भागते महसूस कर रहे थे। अनिश्चितता की स्थिति में 8 फरवरी 1943 को अपने घनिष्ठ अग्रज और संरक्षक शरत बोस के नाम बंगला में पत्र लिखकर उन्होंने पत्नी को दिया जो जरूरत पड़ने पर उपयोग किया जाना था। पत्र इस प्रकार था,

मेरे प्रिय भाई,

आज मैं फिर से एक बार खतरे की राह पर निकल रहा हूं घर की तरफ। मुझे शायद मंजिल नहीं भी मिल पाए। अगर मुझे किसी खतरे का सामना करना पड़ता है, तो मैं इस जीवन में आगे अपनी खबर नहीं दे पाऊंगा। इसीलिए मैं यह पत्र यहां छोड़ रहा है। जो सही समय पर आप को मिलेगा। मैंने यहां विवाह कर लिया है और मेरी एक बेटी है। मेरी अनुपस्थिति में मेरी पत्नी और पुत्री को वही प्यार दें जो आपने मुझे जीवनभर दिया है। मेरी अंतिम प्रार्थना है कि मेरी पत्नी और पुत्री मेरे अधूरे कार्य को पूरा करें।
-आपका सुभाष

सुभाष के इस पत्र को अपनी थाती बना कर एमिली वियना में रह रही थीं। 1945 के अगस्त महीने तक मित्र राष्ट्रों की जीत हो चुकी थी। शाम का समय था। लगभग तीन साल की हो रही अनिता बेडरूम में सोयी थी और एमिली रसोईघर में ऊन के गोले डब्बे में रख रही थीं। तभी रेडियो पर संध्याकालीन समाचार आया कि वायुयान दुर्घटना में सुभाष चंद्र बोस गई है। सुभाष बोस ने उन्हें पहले एक बार लिखा था,

‘हो सकता है मैं फिर कभी नहीं मिल पाऊं पर मेरा विश्वास करो कि तुम हमेशा मेरे हृदय में, विचारों में और स्वप्न में रहोगी। अगर भाग्य मुझे तुमसे इस जीवन में जुदा कर देता है तो मैं तुम्हें अगले जन्म में मिलूंगा... मेरे देवदूत, मुझे स्नेह करने के लिए और स्नेह करना सिखाने के लिए धन्यवाद‘ एमिली किचेन से चुपचाप निकलीं और बेडरूम गयीं जहां अनिता अनिष्ट से बेखबर सो रही थी। वे बिस्तर के बगल से फर्श पर धीमे से बैठीं और बरबस रुलाई फूट पड़ी।
-डॉ. ब्रज किशोर प्र. सिंह

Monday, March 30, 2020

कौन हूँ मैं

मनोहर श्याम जोशी का उपन्यास ‘कौन हूँ मैं‘, सन 2006 में उनके निधन के बाद आया। 450 से अधिक पेज, शायद उनकी सबसे भारी-भरकम कृति। कथा, प्रसिद्ध और चर्चित भवाल संन्यासी केस की है, जिस पर कई किस्से-कहानी हैं, फिल्में भी बनीं, जिनमें ताजी उल्लेखनीय और पुरस्कृत श्रेष्ठ बंगला फिल्म ‘एक जे छिलो राजा‘ है। जोशी जी अपनी इस कृति को अंतिम स्वरूप दे पाए थे अथवा नहीं? यों कमी कहीं नहीं फिर भी लगता है, विवरण देने का अनन्य धीरज, किस्सागोई पर हावी है। सो, बारीकी और विस्तार की सफाई, बावजूद कुछ अपवाद दुहराव के, लाजवाब है। पुस्तक का प्राक्कथन ‘के? आमि‘ खास जोशी जी वाली शैली में है और यहीं वे इस उपन्यास को लिखने के पीछे अपनी मंशा तरुण भट्टाचार्ज्या से कहलाते हैं कि ‘आपसे अनुमति लिए और परामर्श बगैर अनगिनत छोटी-मोटी पुस्तकें प्रकाशित होती रही हैं पिछले कुछ वर्षों से। मेरी इच्छा है कि आपकी सहायता से इस बार मैं कोई प्रामाणिक और साहित्यिक कृति तैयार करूँ।‘ अदालत में साबित होने वाले ‘सच-झूठ‘ के उल्लेख सहित कि ‘मेरे झूठ के साथ बिभा देबी का झूठ भी सुनते रहिएगा।‘ साथ ही पुस्तक का शीर्षक तय करते हुए योग वशिष्ठ का 'राम स्वात्मविचारोऽयं कोऽहं स्यामितिरूपकः। चित्तदुर्दुमबीजस्य दहते दहनः स्मृतः॥' अर्थात् हे राम! 'मैं कौन हूँ' इस प्रकार निजस्वरूप का अनुसन्धान वासनारूप चित्तबीज को दग्ध कर देता है। चित्त ही सब दुःखों का हेतु है। या 'किमिदं विश्वमखिलं किं' अर्थात् यह जगत् क्या है? मैं ही कौन हूँ ... या चर्पटपंजरिका का 'कस्त्वं कोऽहं कुत आयातः‘ संभवतः उनके ध्यान में रहा होगा।

हिन्दी साहित्य की इस उल्लेखनीय कृति में कुछ अलग-सी बात यह भी है कि पैराग्राफ, अधिकतर आधे-पौने पेज के हैं और कई तो भर पेज के। वाक्यों की लंबाई पर भी ध्यान जाता है, नमूना है यह एक असामान्य लंबा वाक्य- ‘इसलिए छोटोदी से सारा वृत्तान्त सुन लेने के बाद भी मेरे मन के लिए यह मान पाना कठिन हुआ कि स्वभाव से सर्वथा भीरु और अहिंसक साला बाबू ने प्रजाजन का रक्त चूसने वाले मुझ विलासी सामन्त की देह पर फूटते सिफलिस के घावों का अवलोकन करते हुए अपनी बहन को रोग की आशंका से मुक्ति दिलाने के लिए मुझे मृत्युदण्ड देने की बात न केवल सोची होगी बल्कि आशु डॉक्टर की सहायता से उसे मनसा के स्तर से कर्मणा के स्तर पर पहुँचाने का प्रयास भी किया होगा।‘

भवाल संन्यासी मामले का प्लाट उनके लिए एकदम मुआफिक था। एक व्यक्ति, दो किरदार, पहचान की समस्या, मैं कौन? जैसा विचार, इन सब पर सोचना और लिखना उन्हें बहुत भाता, दिखता है। जनवरी 1990 में उन्होंने अपने कॉलम में लिखा था- 'लगभग छह वर्षों से मैं मनोहर श्याम जोशी की नौकरी कर रहा हूं।' उनके रचे (और अक्सर बातों) में बेलाग निर्ममता 'शैतानियत' आती रही है, जिसके चलते अश्लील, घटिया और बकवास, जैसी प्रतिक्रियाओं को उन्होंने अपेक्षित ही माना, अप्रभावित रहे, शायद रस भी लेते रहे। उनके लेखन में आमतौर पर रेखांकित होते दिखता है, न इस पार, न उस पार, 'मज्झिम पटिपदा'। दुविधा की फांक में ही कहीं सच झलकता है। आशा-आकांक्षा से मुक्त, खारिज की आशंका से बेपरवाह, यों निरस्त हो कर भी जो कुछ बचा रहे, अमूर्त ही सही, वही हासिल है। लालसा की हम पुतलियों की हरकतें, आरोपित भूमिका का निर्वाह-मात्र होती है। इसलिए सारे संदेहों के बावजूद अविचलित, अपनी स्वीकृत, मान्य, धारित पहचान को खारिज करने का साहस ही सार्थक हो सकता है। उन्हें मानों ऐसे ही किसी पात्र की तलाश थी।

उनकी कृतियों में ‘कसप‘ का डीडी-देवीदत्त-डेव-देबिया कितना बदल जाता है और बेबी क्या से क्या हो जाती है। बेबी मैत्रेयी से आगे बढ़कर उसका प्रतिरूप, उसकी बेटी गायत्री भी आ जाती है, अबूझ बेबी-मैत्रेयी चरित्र का एक और फांक। हमजाद, कुरु कुरु स्वाहा, हरिया हरक्यूलिस और यहां भी, अलग अलग ढंग से यही बहुरूप या उसका भ्रम-अनिश्चय है। यहां वे लिखते हैं- ‘सृष्टि के आरंभ से लेकर आज तक दो जीवन सर्वथा एक-से नहीं हुए हैं. और इसीलिए किन्हीं दो जनों की स्मृतियाँ एक सी नहीं हो सकतीं।‘ लेकिन एक ही व्यक्ति की स्मृति अलग-अलग हो सकती है, व्यवहार और व्यक्तित्व इतना भिन्न हो सकता है कि वह अलग मान लिया जाए, इसे वह उस आध्यात्मिक स्तर तक ले जाते हैं, जहां उसे 'उत्तर-आधुनिक विमर्श' की तरह भी देखा जा सकता है। लिखते हैं- ’आप जिसे आप कहते हैं वह आपकी अब तक की राम कहानी की स्मृतियों का समग्र प्रभावभर होता है।‘ या ‘स्मृति माया है और स्मृतिहीनता मोक्ष।' या 'संन्यासी को न कब की चिन्ता होती है और न कहाँ की परवाह।‘ या ‘इस मुकदमे में सबका ही चरित्र-हनन किया जा रहा है। उसके अतिरिक्त क्या उपाय बचता है सांसारिक मामलों में।‘

जोशी जी को सच-झूठ का खेल सदा लुभाता है। याद कीजिए ‘कुरु-कुरु स्वाहा‘, जिसमें वे बताते हैं कि ‘स्व. हजारीप्रसाद द्विवेदी मौज में आकर ‘गप्प‘ को गल्प का पर्याय बता देते थे। उनकी इच्छा थी कभी सुविधा से कोई ‘मॉडर्न गप्प‘ लिखने की।‘ या ‘कसप‘ में कहते हैं कि ‘तुम्हें जो कुछ लग रहा है, ठीक इन शब्दों में नहीं। सच तो यह है कि वह तुम्हें शब्दों में लग ही नहीं रहा है। शब्द मैं तुम पर थोप रहा हूं। कथा-वाचक की मजबूरी है। मेरे शब्द ही तुम्हारी व्याख्या करते हैं पाठकों से और नितांत भ्रामक है यह व्यवस्था।‘ या ‘लोगों की बातों का मुझे कोई विश्वास नहीं रह गया है। कभी-कभी तो मुझे अपनी ही बात का विश्वास नहीं होता।‘ और यहां- ‘सच होना और युक्तियुक्त होना सदा पर्यायवाची नहीं होते‘ या ‘किसी एक का सच अनिवार्य रुप से किसी और के लिए झूठ ही होता है।‘ या ‘विश्वसनीय सच कौन-सा होता है जो सर्वथा तर्कसंगत हो अथवा वह जिसमें दाल में नमक बराबर विसंगतियाँ भी उपस्थित हों।‘ या ‘सत्य बहुधा गल्प से भी अधिक अद्भुत होता है।‘ या ‘इस कथा को मात्र इस आधार पर नहीं ठुकराया जा सकता कि यह अत्यंत विचित्र और अविश्वसनीय लगती है।‘

लंबे समय बाद कोरोना ने अवसर दिया इतना बड़ा उपन्यास हाथ में लूं और दो-तीन दिन में पढ़ लूं, खुद को अपने में तलाश करने के दिन हैं ये, और तलाश स्थगित हो जाने के भी। 7/8 मई 1909 को मर कर, जी उठने वाले भवाल संन्यासी की लंबी कहानी बिभा देबी को सुहाग-दुविधा से मुक्ति देते समाप्त हुई थी 3 अगस्त 1946 को, पर फिर-फिर कहानियों को जन्म दिया और इस पूरी-अधूरी कृति, बिना प्रश्नवाचक चिह्न के ‘कौन हूँ मैं‘ शीर्षक, के साथ बहुतेरे सवालों पर जवाब के पूर्ण विराम की तरह जोशी जी अमर हुए।

प्रसंगवश, सुभाषचंद्र बोस ने 29 अगस्त, 1936 को एमिली शेंक्ल को पत्र लिखा था, जिसमें इस भोवाल राजा वाले प्रकरण से संबंधित अखबारों की कटिंग्स, सार-संक्षेप और निर्देश सहित भेजा था। उन्होंने लिखा था कि ‘इसके तथ्य इतने मजेदार हैं कि हम कह सकते हैं कि वास्तविकता कहानी से भी अजीब हो सकती है।‘ और सुझाया था कि इससे उसे यानि एमिली को वहां के लिए लेख लिखने की सामग्री मिल जाएगी। यह कैसा संयोग कि नेताजी की मृत्यु पर रहस्य का परदा पड़ा रहा। फैजाबाद वाले गुमनामी बाबा, शाल्मरी आश्रम, कूच बिहार वाले शारदानंद, अमरावती के सुरेश पाध्ये का दावा, सीतापुर और बुंदेलखंड वाले बाबाओं के साथ नेताजी को जोड़ा जाता रहा। रूस, चीन, तिब्बत, विएतनाम में भी उनके होने की चर्चा रही।

(सन 1975 में हिन्द पॉकेट बुक्स से रामकुमार भ्रमर की पुस्तक ‘भुवाल संन्यासी‘ छपी थी)

30 मार्च, मनोहर श्याम जोशी की पुण्यतिथि है। यह टिप्पणी जानकीपुल पर भी है।

पुनश्चः

जोशी जी की पुस्तकों की सूची में 2008, पुनः आवृत्ति 2014 में प्रकाशित ‘बात ये है कि...‘ का नाम सामान्यतः नहीं होता, जबकि उनकी लेखन-छटा से परिचित होने के लिए यह जरूरी किताब साहित्य, फिल्म, व्यक्तित्व, फैशन, सेक्स-अश्लीलता यानि शब्दों, चित्रों और जीवन-शैली में अभिव्यक्त समाज के समष्टि मन के उलझाव-भटकाव का दस्तावेज भी हैं। यह ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान‘ के स्थायी स्तंभ ‘गपशप‘ में प्रकाशित लेखों का संग्रह है। स्तंभ लेखक में नाम जाता था- शी.ही., इसमें शी, जोशी जी थे और ही, बालस्वरूप राही। इन्हीं ‘ही‘ ने पुस्तक में ‘शी.ही. का मतलब...‘ शीर्षक से भूमिका लिखी है, जिसमें कुछ महत्वपूर्ण और रोचक उल्लेख हैं, जैसे- विज्ञापन आ जाने पर पाठ्य-सामग्री हटा दी जाने के लिए संकेत रूप में लिखा होता- ‘आएगा तो जाएगा‘। जोशी जी की ‘कूर्मांचली‘ छद्म नाम से कविताई की भी चर्चा है। एक अन्य कम चर्चित जोशी जी पर लिखी पुस्तक भूपेन्द्र अबोध की ‘सागर थे आप‘ का उल्लेख है। जोशी जी के पाठकों को याद होगा कि उन्होंने अपनी पुस्तक ‘कुरु कुरु स्वाहा‘ में हजारी प्रसाद द्विवेदी और ऋत्विक घटक की पुण्य स्मृति में निवेदन किया है, ‘सागर थे आप, घड़े में किन्तु घड़े-जितना ही समाया‘। राही जी ने बात समाप्त की है कि ‘इसमें पत्रकारिता के उस दौर की झलक पा सकेंगे जब पत्रकारिता ‘ग्राहक‘-सापेक्ष नहीं, ‘पाठक‘-सापेक्ष होती थी।

पुस्तक के लेखों पर कुछ बातें। वैसे तो तकरीबन सभी कुछ जोशी जी की गंभीर, जिम्मेदार लेकिन मौज के लेखन का नमूना है, लेकिन लगता है कि उन्हें इसमें से कुज्नेत्सोव के ए. आनातोल बन जाने में, उपन्यास लेखन को मूर्खता मानने वाले उपन्यासकार बोर्जे में, कहर ढा रहा था जहर देने वाला, जैसे में खास आनंद आया होगा, लेकिन शायद उनके लिए सबसे मजेदार रहा होगा, हावर्ड ह्यूजेस, क्लिफर्ड इरविंग और एलमर द होरी की अद्भुत कहानी लिखना, जो पुस्तक में ‘साढ़े छह लाख पेशगी पर प्राप्त यह आत्मचरित किस सिद्धात्मा का है? शीर्षक से है, क्योंकि इसमें भी कौन? की खोज और रहस्य, जो कभी न उद्घाटित हो, का किस्सा है। कमोबेश कौन हूं मैं, जैसी ही कहानी यहां ‘कौन था वो‘ के रूप में है।

इसी तरह ‘लखनऊ मेरा लखनऊ‘ में लेखक ‘मैं‘ जोशी जी, जिन्हें कभी मनोहर श्याम या कहीं मनोहर कहलाया गया है, के लखनऊ के दिनों को बयान कर रहे हैं और इसमें कहीं कहीं मैं और जोशी जी से मुखातिब भी होते हैं, जोशी जी ने ‘मैं‘ को बहुत कम संबोधित किया है। 

किताब पढ़ते हुए लगा, जैसा उनके लेखन में होता है- अपनी ऐसी कमजोरियां, जिसे लगता है कि हमारे अलावा कोई नहीं जानता न पकड़ सकता, उसे सार्वजनिक कर देना और अपनी ऐसी ‘खूबियां‘, जो अक्सर पीठ पीछे और कई बार मुह पर भी आपकी हंसी उड़ाने का आसानी से आधार बनती हैं। 

खुद की नजर में जीवन की निरर्थकता देख सकने वाला ही दूसरों की नजर में कुछ सार्थक कर पाता है। दुनिया है, जो अपनी गति से चल रही है, आपके प्रशंसक ही कहते हैं कि समाज पर, लोगों पर आपका बहुत असर है, आपने राह दिखाई है, बहुत कुछ सार्थक किया है। 

इसमें आया हास्यास्पद और त्रासद, कुरु कुरु स्वाहा वाला/डी.डी. द मूडी और मीनिंग सूँ, कसप वाला है? ‘हैरानी पर हैरानी‘ और रेसिंग साइकिल वाले बनाम हरिया? ट टा प्रोफेसर वाला नायक, लखनऊ? ‘घरेलू पालतू बोहेमियन‘ आदि।