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Friday, November 26, 2021

जशपुर

जशपुर जिला जनजातीय संस्कृति तथा विशिष्ट भौगोलिक संरचना के कारण प्रसिद्ध है। इस जिले की प्रमुख नदियां शंख तथा ईब है। पुरातत्वीय साक्ष्यों के अभाव के कारण इस अंचल का प्राचीन राजनैतिक इतिहास, अभिलेख-सूचनाओं की दृष्टि से समृद्ध नहीं है, किंतु परंपरा और मौखिक इतिहास की दृष्टि से उतना ही संपन्न। प्रागैतिहासिक संस्कृति के स्फुट अवशेष शंख तथा ईब नदी के तटवर्ती क्षेत्रों में मिलते हैं।

ईब नदी के तट पर सोने के कण मिलते हैं, स्थानीय झारा जनजाति के लोग इन कणों को एकत्र करते हैं। यहां की मुख्य जनजातियों में उरांव, कंवर, गांड़ा, खैरवार, पंडो, पहाड़ी कोरबा, बिरहोर, चिकवा आदि हैं। पहाड़ी वन्य भूमि और ऊंचे पाट के कारण यहां की जलवायु सुखद है। शरद ऋतु में यहां के पाटों में अत्याधिक शीत पड़ती है। कुनकुरी, तपकरा, बागबहारा, कांसाबेल, बगीचा तथा पत्थलगांव जशपुर जिले के महत्वपूर्ण नगर तथा प्रशासनिक केन्द्र हैं। जनजातीय समाजोद्धारक गहिरागुरू के सामजिक नवोत्थान केन्द्र के रूप में बगीचा स्थित आश्रम, जिले का सांस्कृतिक तथा धार्मिक केन्द्र हैं। पंडरापाट स्थित खुड़िया रानी, कोरवा जनजाति का प्रमुख आस्था केंद्र है। वहीं कुनकुरी का इसाई गिरजाघर प्रसिद्ध है।

8 जून 2017, दिन गुरुवार। शंख नदी के बाएं किनारे जशपुर जिले का गांव पिल्खी। यह छोटी पहाड़ी श्रृंखला और वन क्षेत्र में है। स्थानीय किंवदंती के अनुसार यहां डोम राजा का राज्य था। बाद में डोम राजाओं के इलाके को स्थानीय राजवंश के पूर्व पुरुषों द्वारा जीत लिया गया। गांव के पास जतरा पहाड़ (डोंगुल पहाड़) स्थित है। सामने गांव दिख रहा है, ढोलडुबा। पास ही एक और गांव, नाम बताया गया मांदरटंगा। यानि ताल वाद्य ढोल डूबा हुआ और मांदर टंगा हुआ?

पिलखी ग्राम की पहाड़ी तलहटी में समतल मैदान में जला हुआ तथा कोयले के रूप में परिवर्तित जमाव है। ग्रामवासियों के द्वारा चिह्नांकित इस स्थल पर कोयले के रूप में परिवर्तित चांवल के दानों के साथ अल्प मात्रा में खपरे तथा ईंट के टुकड़े मिलते हैं। स्थल अवलोकन कर, आसपास के मिट्टी के जमाव को खोद-खुरच कर परीक्षण किया गया। परीक्षण से ज्ञात हुआ कि इस स्थल के एक निश्चित भाग पर सतह से लगभग छः इंच की गहराई में जली मिट्टी के साथ चांवल के दाने मिल रहे हैं। 

स्थल पर किसी सांस्कृतिक स्तर का प्रमाण स्पष्ट न होने से इन जले हुये चांवल के दानों की प्राचीनता निश्चित नहीं होती है। स्थानीय सूचनाओं के अनुसार पास की पहाड़ी पर डोम राजाओं का गढ़ स्थित था। इस आधार पर इन जले हुए चांवल के दानों का काल लगभग 200-300 वर्ष प्राचीन अनुमानित है। स्थानीय युद्ध, आखेट अथवा उजाड़ स्थिति में इस स्थल पर अग्निकांड होने से चावल के दाने जलकर मिट्टी के साथ मिल गए होने का अनुमान है। 

हल्की बारिश के साथ खेती का काम शुरू हो गया है। आज बतर भी है, यानि खेती के काम के लिए एकदम उपयुक्त समय। यों यह क्षेत्र पिछड़ा माना जाने वाला जनजातीय बहुल है। खेती के कामकाज के लिए ट्रेक्टर का उपयोग कम दिखा है। सीमित जोत वाले किसान, हल-बैल/भैंस से खेती का काम करते हैं। इस अंचल की सभ्यता में अभी कृषि-गोप संस्कृति के दर्शन आसानी से हो जाते हैं।

किसान खेतों में व्यस्त हैं, लेकिन हल जुते बैल-भैंस कहीं नहीं दिख रहे। बातचीत में पता लगा कि इस पूरे अंचल में गुरुवार का दिन गोवंश के अवकाश का दिन होता है, उनसे काम नहीं लिया जाता। अनुमान हुआ कि इस अंचल में वनवासी सेवा आश्रम, जशपुर रियासत- दिलीप सिंह जूदेव और सोगड़ा आश्रम वाले अवधूत श्री राम का व्यांपक प्रभाव रहा है, इनमें से कोई कारक संभव है, जिस कारण गो-धन के प्रति ऐसी व्यवस्था अपनाई गई होगी। पूछने पर बताया गया कि यह इन सब से पुरानी परम्परा है।

यों हरेली और अन्नूकूट जैसे सालाना पर्व पर गोवंश की पूजा की जाती है, लेकिन गाय-भैंस के लिए साप्ताहिक अवकाश का चलन संभवतः अन्यन कहीं नहीं। गोवंश के अवकाश के लिए तय दिन गुरुवार है, यह लक्ष्मी का दिन माना गया है। अगहन माह में जब फसल कट कर आने लगती है और किसान का घर धन-धान्य से भरपूर होता है तब प्रत्येक गुरुवार को लक्ष्मी-पूजा की जाती है। प्राचीन काल में गौ के मुद्रा की तरह उपयोग की जानकारी मिलती है। वैदिक परम्परा से ले कर कृषक संस्कृति में गौ, लक्ष्मीस्वरूपा तो है ही।

जशपुर से चरईडांड (कुनकुरी) अप्रचलित निर्माणाधीन सड़क मार्ग पर स्थित स्थानीय पर्यटन स्थल दमेरा के पास सड़क पर लगभग 6 फीट लंबा, एवं चार फीट मोटा पत्थर का बेलन (रोलर) रखा है। यह रोलर कठोर पत्थर का है, जिसके दोनों ओर केन्द्र में लोहे का मोटा राड फंसाने के लिए छेद है। जिस चट्टान से इस विशाल आकार के बेलन को तराश काटकर बनाया गया है, उस पाषाण खंड के दोनों ओर के मूल भाग समीप में रखे हुए हैं। पत्थर का यह रोलर असामान्य बड़े आकार का है। इस रोलर का निर्माण रिसायत काल में क्षेत्रीय राजाओं के द्वारा सुरक्षा कार्य के लिए अथवा सड़क/मैदान समतल करने के लिए करवाया गया होगा। यह रोलर आकार के कारण उल्लेखनीय है।

कांसाबेल तहसील के बागबहार ग्राम में स्थानीय परंपरा एवं मान्यताओं वाला विशिष्ट मंदिर है- पीपलदेवधाम मंदिर, पीपलधाम, या पीपलदेव। मैनी और कुरकुट नाला के तट पर बागबहार, जशपुर के फरसाबहार से 12 किलोमीटर। कोई सौ साल पहले यहां के जमींदार ने मांस-मदिरा त्याग के लिए पूरे इलाके को प्रेरित किया था। अब, पांच-सात साल पहले लोगों ने बस्ती के बाहर विशाल पीपल पेड़ को अपना देव मान लिया, यही धाम बन गया। पीपल का यह वृक्ष 100 वर्ष से भी अधिक पुराना जान पड़ता है। इस वृक्ष के चारों ओर चबूतरा तथा साथ में लोहे का जालीदार सुरक्षा घेरा और लोहे का गेट है। गेट के बाहर एक छोटा सा आधुनिक शिवलिंग स्थापित है।

सरना की परम्परा वाले छत्तीसगढ़ का उत्तर-पूर्वी हिस्सा, यानि मुख्यतः सरगुजा, जशपुर और झारखंड का सीमावर्ती इलाका। इस अंचल की संस्कृति का अंग, सरना पूजा है। सरना- सरई यानि शाल का पवित्र वनखंड। सरना क्षेत्र विभिन्न आस्थामूलक परंपराओं का आयोजन तथा आराधना स्थल होता है। इस पूरे क्षेत्र में रास्ते के साथ-साथ आम के पेड़ भी कम नहीं और अमराई भी। यहां ‘पर्यावरण जागरूकता अभियान‘ का नारा नहीं है, न ही ऐसा कोई ‘बौद्धिक विमर्श‘।

देवता के नाम पर कोई मूर्ति नहीं, सिर्फ पीपल का पेड़ और संरचना के नाम पर कोई मंदिर नहीं, बस चबूतरा। सरपंच रवि कुमार परहा (कंवर) जी ने गांव वालों की अगुवाई की और पूजा-सेवा का जिम्मा लिया गुलाब साय यादव जी ने। अब यही पीपल बाबा देव है, यही मंदिर और यही धाम। बताया गया कि इस पेड़ पर कभी-कभी एक पत्रवृंत पर जुड़वा पत्ते भी आते हैं। यानि गुरुवार के दिन मवेशी को खेती के काम से साप्ताहिक अवकाश देने वाले किसानों के इस अंचल में स्वर्ण, सर्प, हाथी और टमाटर के अलावा भी बहुत कुछ है।

प्रकृति, वृक्षपूजन की ऐसी व्यवस्था अपने में अकेली-अनूठी होने का रिकार्ड बनाए, न बनाए, प्रेरक और उल्लेखनीय अवश्य है। और जो न अभिव्यक्त हो सकता, न महसूस कराया जा सकता, वह है यहां का समूचा परिवेश, दिव्य।

कांसाबेल तहसील के ग्राम रेड़े से तीर्थंकर की प्राचीन भग्न प्रतिमा, आवासीय स्थल के चिन्ह एवं प्राचीन सरोवर की जानकारी प्राप्त हुई है। शीर्षविहीन तीर्थंकर की स्थानक प्रतिमा ग्राम के बाह्य भाग में सरोवर के समीप निर्माणाधीन सड़क मार्ग पर पीपल पेड के नीचे प्रस्तर खंडों के साथ अपूजित स्थिति में रखी हुई है। तीर्थंकर प्रतिमा का आकार 80X40X18 सेंटीमीटर है। इस प्रतिमा का शीर्ष भाग तथा ऊपरी तोरण अनुपलब्ध है। इस प्रतिमा के साथ यक्ष-यक्षिणी/ आराधक-पूजक अंकित नहीं है। इस प्रतिमा खंड के रिक्त भाग तथा अधिष्ठान में सर्वत्र कमल पत्र निर्मित हैं। तीर्थंकर की ऐसी प्रतिमा छत्तीसगढ़ अंचल में अज्ञात है। अधिष्ठान पर धर्मचक्र निर्मित है। इस प्रतिमा का निर्माण काल लगभग 12वीं-13वीं सदी ईसवी अनुमानित है।

ग्राम रेड़े में एक प्राचीन वृत्ताकार गहरा सरोवर है। ग्रामवासी इसे असुर तालाब कहते हैं। गरमियों में भी इसमें पानी रहता है। असुर तालाब के एक ओर कृषि भूमि के रूप मे परिवर्तित मैदानी क्षेत्र के बीच उभरे सतह पर मृदभांड के टुकड़े बिखरे हुए हैं। ये ठीकरे 12वीं-13वीं सदी ईसवी के ज्ञात होते हैं। इसी स्थल पर पत्थर से निर्मित प्रणालिका के आकार लगभग ढेड़ से दो फुट लंबा प्रस्तर खंड है। ऐसी अनेक प्रणालिकाओं के अवशेष ग्रामवासियों के कथनानुसार मैदान के मेड़ में दबे हुए हैं।

साथ के गांव बसंतपुर ग्राम में परवर्ती काल का जगन्नाथ मंदिर व शिवमंदिर भी स्थित हैं। जशपुर अंचल में ग्राम रेड़े पुरातात्विक दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थल है। अब तक इस जिले में तीर्थंकर प्रतिमा अन्य स्थलों से जानकारी में नहीं है। संभवतः यह स्थल जैन धर्मावलंबियों द्वारा निवेशित तथा अंचल का व्यापारिक केंद्र रहा होगा।

मई 2017 में अपने अंबिकापुर प्रवास और जशपुर के तत्कालीन अधिकारियों से हुई चर्चा के अनुक्रम में जून 2017 को जशपुर प्रवास पर रहा था। इस बीच बलरामपुर जिले की सीमा के निकट जशपुर जिले में स्थित बगीचा विकासखंड के नन्हेसर स्थित देउरकोना प्राचीन मंदिर तक भी गया। इस मंदिर की जानकारी 1989-90 में डीपाडीह में खुदाई काम के दौरान मिली तब यहां आ चुका था। उस दौरान रानीझूला पहाड़, पहाड़ी कोरवा समुदाय, कुसमी सामरी पाट का उल्टा पानी और झारखंड के नेतरहाट, महुआडांड, टांगीनाथ तक भी हो आया था, ताकि डीपाडीह के प्राचीन संदर्भों को समझने में मदद हो।

जून 2017 में जशपुर और आसपास भ्रमण-अवलोकन के दौरान जिला प्रशासन के डिप्टी कलेक्टर, पुरातत्व शाखा के प्रभारी अधिकारी श्री एन.एस. भगत के अलावा, तहसीलदार, श्री शेखर मंडाई, डॉ. विजय रक्षित, श्री शशिकांत पांडेय, श्री विश्वबंधु शर्मा व स्थानीय ग्रामवासियों का सहयोग मिला। विभागीय सहयोगी श्री जी.एल. रायकवार तथा श्री प्रवीण तिर्की रहे। वनमंडलाधिकारी, श्री मनोज पाण्डेय तथा कलेक्टर, जशपुर डॉ. प्रियंका शुक्ला द्वारा उत्साहवर्धक रुचि ली गई। लोग अब भी पुराने अधिकारियों में मनोज श्रीवास्तव जी को याद करते हैं और नयों में नीलेश क्षीरसागर जी को। इसी क्रम में लिए गए नोट्स पढ़ते हुए याद आ रही कुछ बातें।

कुछ और यादें- 

मुख्यतः रायगढ़ और जशपुर के रहवासी सोनझरों का काम रेत से तेल निकालने सा असंभव नहीं तो नदी-नालों और उसके आसपास की रेतीली मिट्टी को धो-धो कर सोने के कण निकाल लेने वाला श्रमसाध्य जरूर है। इन्हें महानदी के किनारे खास कर मांद संगम चन्दरपुर और महानदी की सहायक ईब व अन्य सहायक जलधाराओं के किनारे अपने काम में तल्लीन देखा जा सकता है। बस्तर में भी इन्द्रावती नदी में बाढ़ का पानी उतरने के बाद झिलमिल सुनहरी रेत देख कर इनकी आंखों में चमक आ जाती है। इन्हें शहरी और कस्बाई सराफा इलाकों की नाली में भी अपने काम में जुटे देखा जा सकता है।

सोना झारने यानि धोने के लिए सोनझरा छिछला, अवतल अलग-अलग आकार का कठौता इस्तेमाल करते हैं। इनका पारंपरिक तरीका है कि जलधाराओं के आसपास की तीन कठौता मिट्टी ले कर स्वर्ण-कण मिलने की संभावना तलाश करते हैं, इस क्रम में सुनहरी-पट्टी मिलते ही सोना झारते, रास्ते में आने वाली मुश्किलों को नजरअंदाज करते, आगे बढ़ने लगते हैं। ऐसी मिट्टी को पानी से धोते-धोते मिट्टी घुल कर बहती जाती है और यह प्रक्रिया दुहराते हुए अंत में सोने के चमकीले कण अलग हो जाते हैं।

कोई तीस साल पहले हथगढ़ा, कुनकुरी में सोनझरों को काम करते पहली बार देखा था। हथगढ़ा की प्रसिद्धि कथित प्राचीन स्तूप और कांस्य प्रतिमा के लिए सुन चुका था। पता लगा कि सोने के सिक्के मिले हैं, जो पुलिस द्वारा जब्त किए जा कर, जशपुर में फौजदारी मामले में अदालत में सीलबंद पेश किए गए हैं। हमलोग, यानि मैं और रायकवार जी को मिलने स्थल निरीक्षण के लिए जाना था। रायगढ़ पहुंचकर कलेक्टर जे.पी राय जी से मिले। उनका निवास कार्यालय देर रात तक चलता था, हमें यह कहते हुए कि आराम से बात होगी, समय दिया गया रात 9 बजे का। दूसरे दिन सुबह हथगढ़ा जाना तय हुआ, हमारे साथ कलेक्टर साहब भी जाने वाले थे, कुछ और भी लोग।

अन्य प्राथमिकताओं के चलते कलेक्टर साहब का जाना टला, तो एक-एक कर सवारी कम होने लगी। हमारे साथ आखीर तक मोरचे पर बारेन दा यानि बारेंद्रनाथ बैनर्जी जी डंटे रहे। हमलोग समय-साध्य सफर तय कर कुनकुरी पहुंचे, फिर पूछताछ करते हथगढ़ा। निसंदेह यह एक प्राचीन स्थल है। यहीं सोनझरों से मुलाकात हुई फिर सोने के सिक्के मिले स्थान का मौका-मुआयना और उसकी दास्तान। बताया गया कि जिन्हें यह मिला था, उसके अलावा इसकी खबर किसी को नहीं थी। फिर पता कैसे चला? हुआ यह था कि सिक्के मिलने के बाद उस परिवार के लोग कुनकुरी गए और लाउड स्पीकर किराए पर ले कर आए। लगातार रोज लाउड स्पीकर पर गाने बजते थे। पीना-खाना भी बदस्तूर हो रहा था। गांव वालों ने पूछा, क्या हुआ है? कोई गमी-खुशी, छट्ठी-बरही? कुछ भी नहीं, बस मौज। बात गले नहीं उतर रही थी, कुनकुरी पुलिस तक पहुंच गई। पुलिस ने दबिश दी और पूछा कि यह रोज-रोज क्या चल रहा है। देर नहीं लगी और बात खुल गई कि सोने का हंडा मिला है।

इस सिलसिले के अगले चरण में दूसरी बार फिर जाना हुआ। अबकी बार जशपुर तक। निर्देश था, सिक्कों का परीक्षण कर उनकी प्राचीनता, पुरातात्विक महत्व निर्धारित करना है। रायगढ़, फिर छात्र जीवन के साथी रहे, तब वहां पदस्थ अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक एन.के.एस. ठाकुर जी मिल गए, उनके सहयोग से पत्थलगांव तब अगले दिन जशपुर पहुंचा। न्यायाधीश महोदय से मिला, उनके इतिहास-पुरातत्व ज्ञान से प्रभावित होता रहा, किंतु मेरा ध्यान सिक्कों के परीक्षण का काम पूरा करने की ओर था। मेरे दुबारा-तिबारा आग्रह पर न्यायाधीश महोदय ने सिक्कों के परीक्षण की मेरी बात पर ध्यान दिया और शायद खिन्न हो कर कहा कि अभी इसकी जरूरत नहीं है, आप जा सकते हैं। जब जरूरत होगी, आपको बुलवा लिया जाएगा। बस फिर तो ‘लौट के बुद्धू घर को आए‘।

दसेक साल पहले बगीचा में महादेव डांड के पास बोडापहरी पंचायत में छिरोपरा में छछान यानि शिकरा पाले हुए कुछ लोग हैं। वहां शिकरा पाले एक युवक से मुलाकात हुई। लोगों ने बताया कि यह शिकारी चिड़िया है, इसे छोटी चिड़िया का शिकार कराने के लिए पाला जाता है। युवक ने बताया कि ऐसा कुछ नहीं है, उसने इसे शौक से पाला है। मुझे उसकी बात में संदेह हुआ, क्योंकि बचपन में पाला हुआ छछान लिए बगेरी चिड़िया बेचने वालों से मैं औरंगाबाद, बिहार में मिला था। लेकिन उसकी बात पर विश्वास भी हो रहा था, क्योंकि ऐसा अजीब लगने वाला शौक मैंने और भी देखा है। सरगुजा, कलचा भदवाही कैंप के दौरान कौआ पाले व्यक्ति से मिला हूं, रोज मिलता था। वह हमारे कार्य स्थल और डेरे के बीच रास्ते में था। कागा, अपने आका की आवाज पहचानता था। उसके कागा-कागा पुकारने पर जवाब देता था।

आगे उस रास्ते से गुजरते हुए सन्ना रुका। वहां अगहन नवमी से पूर्णिमा तक का मेला पूरे शबाब पर था। पता लगा कि जतरा के सिलसिलेवार ठौर हैं, जिनमें गढ़वा, झारखंड से बलरामपुर जिले में प्रवेश होता है, पौष पूर्णिमा पर तातापानी में स्नान, पूजा के बाद नारियल फोड़ा जाता है और फिर उमको, दीवाली के आसपास चांदो, सामरी, कुसमी, भुलसी, डीपाडीह, दुर्गापुर, शंकरगढ़, बगीचा। साप्ताहिक बाजार के दिनों में इस दौरान जतरा का सालाना बड़ा मेला होता है। जशपुर पहुंच कर पूछताछ करने पर क्रम बताया गया- सन्ना, छिछली, कूटनी, डीपाडीह, शंकरगढ़, तातापानी, गोविंदपुर, मनोरा, जशपुर, दुलदुला, रायकेरा, केराडीह, नारायणपुर, गोरिया, रनपुर, कलिबा, सहीडांड, बगीचा, महादेवडांड, मरोल, कांसाबेल, जुमईकेला, दोकड़ा, बंदरचुंवा, कुनकुरी, कुंजारा, तपकरा, अंकिरा और पंडरीपानी।

आगे पूछताछ करने पर उस अंचल के साथियों ने बताया कि जतरा मेला की यात्रा से पूरे जिले के सभी अंचलों की भी परिक्रमा होती है। झारखंड के सीमावर्ती क्षेत्रों से मेले का दल जशपुर जिले में प्रवेश करता है। जतरा मेला की पहली यात्रा डुमरी क्षेत्र से होते हुए जिले के मनोरा, सन्ना होते हुए जशपुर पहुंचती है। वहीं दूसरी यात्रा सरगुजा के सीतापुर होते हुए बगीचा पहुंचती है। दोनों यात्राएं बगीचा में मिलती हैं। सबसे बड़ा मेला जशपुर का होता है। दोनों यात्राओं के द्वारा प्रमुख रूप से मनोरा, सन्ना, बगीचा, जशपुर, दुलदुला, कुनकुरी, तपकरा व पत्थलगांव में मेले का आयोजन किया जाता है। जतरा मेला का दल यहां के बाद झारखंड व उड़ीसा के सीमावर्ती धार्मिक स्थलों पर मेले का आयोजन करता है। यह अब मीनाबाजार नाम से जाना जाने लगा है। इसे प्रारंभ करने की तिथि माघ चतुर्थी होती थी।

कुनकुरी से आगे जशपुर की ओर बढ़ते हुए लोरो घाट के बाद जशपुर की ओर उंच घाट और कुनकुरी की ओर नीच घाट, जिसे हेंट घाट भी कहते हैं। यह हेंट शब्द, सूचक जैसा भी है। इसका सामान्य उच्चारण करने वाले का गैर होना, सादरी जबान के अभ्यस्त कान, आसानी से पकड़ लेते हैं। हेंट के सादरी उच्चारण में ‘हें‘ पर खिंचाव वाला जोर और ‘ट‘ ‘ठ‘ के करीब सुनाई पड़ता है। ठीक वैसे ही खल्खो या खेस के उच्चारण से कुड़ुख, अपने और गैर का फर्क आसानी से कर लेते हैं, जिसके ‘ख‘ में ‘क‘ की ध्वनि कम और ‘ह‘ पर हल्के झटके वाला जोर होता है। वे आपस में बात करते हुए आसानी से समझ लेते हैं कि अगला ‘सरना‘ है या नहीं।
विशिष्ट आकृतियां, देसदेखा पहाड़ी पर
(वस्तुतः दसदेखा, कहा जाता है कि इस पहाड़ी पर से
दस गांव या दस कोस दूर तक दिखाई पड़ता है,इसलिए यह नाम है।)
ऐसी आकृतियां दमेरा पहाड़ी पर भी बताई जाती हैं।
यह चित्र परिचितों ने उपलब्ध कराया है।


आगे कुछ और बातें फिर कभी।

Thursday, March 17, 2016

सोनाखान, सोनचिरइया और सुनहला छत्तीसगढ़

'अमीर धरती के गरीब लोग' जुमला वाले छत्तीसगढ़ का सोनाखान, अब तक मिथक-सा माना जा रहा, सचमुच सोने की खान साबित हुआ है। पिछले दिनों सोनाखान के बाघमड़ा (या बाघमारा) क्षेत्र की सफल ई-नीलामी से छत्तीसगढ़, गोल्ड कंपोजिट लाइसेंस की नीलामी करने वाला पहला राज्य बन गया है। बलौदाबाजार जिले के सोने की खान, बाघमड़ा क्षेत्र 608 हेक्टेयर में फैला है और आंकलन है कि यहां लगभग 2700 किलो स्वर्ण भंडार है। इस क्षेत्र का एक्सप्लोरेशन 1981 में आरंभ किया गया था और मध्य भारत के इस महत्वपूर्ण और पुराने पूर्वेक्षित क्षेत्र के साथ, अधिकृत जानकारी के अनुसार, रोचक यह भी कि इस क्षेत्र में प्राचीन खनन के चिह्न पाए गए हैं। इसके अलावा मुख्यतः कांकेर, महासमुंद और राजनांदगांव जिला भी स्वर्ण संभावनायुक्त है।
बाघमड़ा (या बाघमारा) गांव के पास की पहाड़ी की वह छोटी गुफा,
जिसे स्‍थानीय लोग बाघ बिला यानि बाघ का बिल या निवास कहते है,
माना जाता है कि इसी के आधार पर गांव का नाम बाघमड़ा पड़ा है.
चित्र सौजन्‍य- डॉ. के पी वर्मा
इस सिलसिले में छत्तीसगढ़ के कुछ महत्वपूर्ण स्वर्ण-संदर्भों को याद करें। मल्हार में ढाई दिन तक हुई सोने की बरसात से ले कर बालपुर में पूरी दुनिया के ढाई दिन के राशन खर्च के बराबर सोना भू-गर्भ में होने की कहानियां हैं। दुर्ग जिले में एक गांव सोनचिरइया है तो सोन, सोनसरी, सोनादुला, सोनाडीह, सोनसिल्ली, सोनभट्ठा, सोनतरई, सोनबरसा जैसे एक या एकाधिक और करीब एक-एक दर्जन सोनपुर और सोनपुरी नाम वाले गांव राज्य में हैं। कुछ अन्य नाम सोनसरार, सोनक्यारी हैं, जिनसे स्वर्ण-कणों की उपलब्धता वाली पट्‌टी का अर्थ ध्वनित होता है और दुर्गुकोंदल का गांव सोनझरियापारा भी है, जिसका स्पष्ट आशय सोनझरा समुदाय की बसाहट का है।

छत्तीसगढ़ के सोनझरा, अपने सूत्र बालाघाट और उड़ीसा से जोड़ते हैं। एक दंतकथा प्रचलित है, जिसमें कहा जाता है कि पार्वती के मुकुट का सोना, इन सोनझरों के कारण नदी में गिर गया था, फलस्वरूप इनकी नियति उसी सोने को खोजते जीवन-यापन की है। जोशुआ प्रोजेक्ट ने छत्तीसगढ़ निवासियों को कुल 465 जाति-वर्ग में बांटा है। इसी स्रोत में देश की कुल सोनझरा जनसंख्या 17000 में से सर्वाधिक उड़ीसा में 14000, महाराष्ट्र। में 1500, मध्यप्रदेश में 400 और छत्तीसगढ़ में 700 बताई गई है।
सुनहली महानदी 
चित्र सौजन्‍य- श्री अमर मुलवानी
मुख्यतः रायगढ़ और जशपुर के रहवासी इन सोनझरों का काम रेत से तेल निकालने सा असंभव नहीं तो नदी-नालों और उसके आसपास की रेतीली मिट्‌टी को धो-धो कर सोने के कण निकाल लेने वाला श्रमसाध्य जरूर है। इन्हें महानदी के किनारे खास कर मांद संगम चन्दरपुर और महानदी की सहायक ईब और मैनी, सोनझरी जैसी जलधाराओं के किनारे अपने काम में तल्लीन देखा जा सकता है। बस्तर की कोटरी, शबरी और इन्द्रावती नदी में बाढ़ का पानी उतरने के बाद झिलमिल सुनहरी रेत देख कर इनकी आंखों में चमक आ जाती है। इन्हें शहरी और कस्बाई सराफा इलाकों की नाली में भी अपने काम में जुटे देखा जा सकता है।
सोनझरा महिला के कठौते में सोने के चमकते कण
चित्र सौजन्‍य- श्री जे आर भगत
सोना झारने यानि धोने के लिए सोनझरा छिछला, अवतल अलग-अलग आकार का कठौता इस्तेमाल करते हैं। इनका पारंपरिक तरीका है कि जलधाराओं के आसपास की तीन कठौता मिट्‌टी ले कर स्वर्ण-कण मिलने की संभावना तलाश करते हैं, इस क्रम में सुनहरी-पट्‌टी मिलते ही सोना झारते, रास्ते में आने वाली मुश्किलों को नजरअंदाज करते, आगे बढ़ने लगते हैं। ऐसी मिट्‌टी को पानी से धोते-धोते मिट्‌टी घुल कर बहती जाती है और यह प्रक्रिया दुहराते हुए अंत में सोने के चमकीले कण अलग हो जाते हैं।

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मिथक-कथाएं, अक्सर बेहतर हकीकत बयां करती हैं, कभी सच बोलने के लिए मददगार बनती हैं, सच के पहलुओं को खोलने में सहायक तो सदैव होती हैं। वैदिक-पौराणिक एक कथा है राजा पृथु वाली और दूसरी, मयूरध्वज की। पृथु को प्रथम अभिषिक्त राजा कहा गया है, यह भी उल्लेख मिलता है कि इसका अभिषेक दंडकारण्य में हुआ था। यह पारम्परिक लोकगाथाओं से भी प्रमाण-पुष्ट हो कर सच बन जाता है, जब देवार गायक गीत गाते हैं- ''रइया के सिरजे रइया रतनपुर। राजा बेनू के सिरजे मलार।'' यानि राजा (आदि राजा- पृथु?) ने रतनपुर राज्य की स्थापना की, लेकिन मल्हार उससे भी पुराना उसके पूर्वज राजा वेन द्वारा सिरजा गया है।

पृथु की कथा से पता लगता है कि उसने भूमि को कन्या मानकर उसका पोषण (दोहन) किया, इसी से हमारे ग्रह का नाम पृथ्वी हुआ। वह भूमि को समतल करने वाला पहला व्यक्ति था, उसने कृषि, अन्नादि उपजाने की शुरूआत करा कर संस्कृति और सभ्यता के नये युग का सूत्रपात किया। इसी दौर में जंगल कटवाये गए। कहा जाता है कि सभ्यता का आरंभ उस दिन हुआ, जिस दिन पहला पेड़ कटा (छत्तीसगढ़ी में बसाहट की शुरुआत के लिए 'भरुहा काटना' मुहावरा है, बनारस के बनकटी महाबीरजी और गोरखपुर में बनकटा ग्राम नाम जैसे कई उदाहरण हैं।) और यह भी कहा जाता है कि पर्यावरण का संकट आरे के इस्तेमाल के साथ शुरू हुआ।

बहरहाल, एक कथा में गाय रूप धारण की हुई पृथ्वी की प्रार्थना मान कर, उसके शिकार के बजाय पृथु ने उसका दोहन किया, (मानों मुर्गी के बजाय अंडों से काम चलाने को राजी हुआ)। भागवत की कथा में पृथु ने पृथ्वी के गर्भ में छिपी हुई सकल औषधि, धान्य, रस, रत्न सहित स्वर्णादि धातु प्राप्त करने की कला का बोध कराया। राजकाज के रूपक की सर्वकालिक संभावना वाली इस कथा पर जगदीशचन्द्र माथुर ने 'पहला राजा' नाटक रचा है।

मयूरध्वज की कथा जैमिनी अश्वमेध के अलावा अन्य ग्रंथों में भी थोड़े फेरबदल से आई है। कथा की राजधानी का नाम साम्य, छत्तीसगढ़ यानि प्राचीन दक्षिण कोसल की राजधानी रत्नपुर से है और अश्वमेध के कृष्णार्जुन के युद्ध प्रसंग की स्मृति भी वर्तमान रतनपुर के कन्हारजुनी नामक तालाब के साथ जुड़ती है। कथा में राजा द्वारा आरे से चीर कर आधा अंग दान देने का प्रसंग है। रेखांकन कि पृथु और मयूरध्वज की इन दोनों कथाओं का ताल्लुक छत्तीसगढ़ से है।

मयूरध्वज की कथा का असर यहां डेढ़ सौ साल पुराने इतिहास में देखा जा सकता है। पहले बंदोबस्त अधिकारी मि. चीजम ने दर्ज किया है कि अंचल में लगभग निषिद्ध आरे का प्रचलन मराठा शासक बिम्बाजी भोंसले के काल से हुआ और तब तक की पुरानी इमारतों में लकड़ी की धरन, बसूले से चौपहल कर इस्तेमाल हुई है। परम्परा में अब तक बस्तर के प्रसिद्ध दशहरे के लिए रथ निर्माण में केवल बसूले का प्रयोग किया जाता है। अंचल में आरे का प्रयोग और आरा चलाने वाले पेशेवर को, लकड़ी का सामान्य काम करने वाले को बढ़ई से अलग कर, 'अंरकसहा' नाम दिया गया है और निकट अतीत तक आवश्यकता के कारण, उनकी पूछ-परख तो थी, लेकिन समाज में उनका स्थान सम्मानजनक नहीं था।

कपोल-कल्पना लगने वाली कथा में संभवतः यह दृष्टि है कि आरे का निषेध वन-पर्यावरण की रक्षा का सर्वप्रमुख कारण होता है। टंगिया और बसूले से दैनंदिन आवश्ययकता-पूर्ति हो जाती है, लेकिन आरा वनों के असंतुलित दोहन और अक्सर अंधाधुंध कटाई का साधन बनने लगता है। यह कथा छत्तीसगढ़ में पर्यावरण चेतना के बीज के रूप में भी देखी जा सकती है।

सोनझरा की परंपरा और पृथु, मयूरध्वज की कथाभूमि छत्तीसगढ़, स्वर्ण नीलामी वाला पहला राज्य है। पहल करने में श्रेय होता है तो लीक तय करने का अनकहा दायित्व भी। इन कथा-परंपराओं के बीच सुनहरे सच की पतली सी लीक है- सस्टेनेबल डेवलपमेंट (संवहनीय सह्‌य या संपोषणीय विकास) की, जिसकी अवधारणा और सजगता यहां प्राचीन काल से सतत रही है। हमने परंपरा में प्राकृतिक संसाधनों के दोहन को आवश्यक माना है लेकिन इसके साथ ''समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमण्डले। विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्व मे॥'' भूमि पर पैर रखते हुए, पाद-स्पर्श के लिए क्षमा मांगते हैं। अब सोने की खान नीलामी के बाद उत्पादन का दौर शुरू होने के साथ याद रखना होगा कि संसाधन-दोहन का नियमन-संतुलन आवश्यक है, क्योंकि मौन और सहनशील परिवेश ही इस लाभ और विकास का पहला-सच्चा हकदार है, लाभांश के बंटवारे में उसका समावेश कर उसका सम्मान बनाए रखना होगा और यही इस नीलामी की सच्ची सफलता होगी।

पुछल्‍ला- सोनाखान के साथ वीर नारायणसिंह, बार-नवापारा, तुरतुरिया, गुरु घासीदास और गिरौदपुरी, महानदी-शिवनाथ और जोंक की त्रिवेणी को तो जोड़ना ही चाहता था, विनोद कुमार शुक्‍ल के 'दीवार में एक खिड़की रहती थी' की सोना छानती बूढ़ी अम्‍मां भी याद आ रही है और छत्‍तीसगढ़ की पड़ोसी सुवर्णरेखा नदी भी। लेकिन इन सब को जोड़ कर बात कहने की कोशिश में अलग कहानी बनने लगी, इसलिए फिलहाल बस यहीं तक।