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Thursday, June 18, 2026

छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता

कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय, रायपुर छत्तीसगढ़ के अंतर्गत स्थापित, माधवराव सप्रे राष्ट्रवादी पत्रकारिता शोध पीठ द्वारा (2011? में) ‘छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता‘, हमारे पुरोधा: खण्ड-2 का प्रकाशन किया गया था। पुस्तिका के संपादक परितोष चक्रवर्ती, अध्यक्ष, माधवराव सप्रे राष्ट्रवादी पत्रकारिता शोध पीठ हैं। इसके पहले खंड की जानकारी पुस्तिका के निम्नलिखित ‘प्रस्तावना‘ में है, जो यथावत यहां प्रस्तुत है। इसके पश्चात इस खंड की परिचयात्मक जानकारी दी जा रही है।

प्रस्तावना

छत्तीसगढ़ की पावन धरा आदिकाल से ही आध्यात्मिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक चेतना से परिपूर्ण रही है। इस धरा पर जन्में और पुष्पित पल्लवित हुए सामाजिक, सांस्कृतिक आंदोलन पूरे भारत वर्ष के लिए प्रेरणा के स्रोत बने और इसी से मार्गदर्शन प्राप्त कर देश के अन्य भागों में सामाजिक उन्नयन और सांस्कृतिक समुच्चयन के कार्य हुए। आधुनिक भारत के नवजागरण में भी छत्तीसगढ़ की रचनात्मक ऊर्जा एवं अस्मिता की महत्वपूर्ण भागीदारी रही है। यही कारण है कि छत्तीसगढ़ की पहचान सदा से ही अनोखी और निराली रही। अनादिकाल से छत्तीसगढ़ रचनात्मक ऊर्जा से परिपूर्ण एक ऐसे भूभाग के रूप में आलोकित रहा जिसका प्रकाश यत्र-तत्र सर्वत्र फैलता रहा।

छत्तीसगढ़ की इसी रचनात्मक ऊर्जा और सामाजिक उन्नयन का परिचय यहां की पत्रकारिता में भी देखने को मिलता है, जिसका अस्तित्व इसके प्रारब्ध से ही निराला रहा। छत्तीसगढ़ के पहले समाचार पत्र के रूप में ख्यात और सर्वज्ञात ‘छत्तीसगढ़ मित्र‘ सन् 1900 में पेंड्रा रोड से पं. माधवराव सप्रे द्वारा अपने दो अन्य मित्रों पं. रामराव चिंचोलकर और पं. वामनराव लाखे के सहयोग से निकाला गया। इस पत्र का नाम छत्तीसगढ़ मित्र होना ही इस राज्य की रचनात्मक मेधा और अस्मिता का परिचायक है। उसके बाट कबीर पंथी (रायपुर, 1913), कान्यकुब्ज नायक (रायपुर, 1919), विकास (बिलासपुर, 1925), ‘उत्थान‘ और ‘आलोक‘ (1925), ‘सरगुजा संदेश‘, ‘कांग्रेस पत्रिका‘ और ‘सचेत‘ (1937), अग्रदूत (1942), महाकौशल (1935) पत्रकारिता की अनवरत् श्रृंखला को रेखांकित करते दीप स्तंभ है। 

समाचार पत्रों की इस यात्रा के दौरान इस धरा पर कलम के अनेक योद्धा पैदा हुए जिन्होंने अपनी धारदार लेखनी के जरिये समाज में नई चेतना और ऊर्जा का संचार किया। वे ऐसे महामना थे जिन्होंने अपने निजी स्वार्थ और निजी विकास को परे रखकर देशहित और समाज हित के प्रति अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर दिया।

विश्वविद्यालय द्वारा विगत वर्ष पत्रकारिता के ऐसे पुरोधाओं का स्मरण करते हुए पहला मोनोग्राफ ‘हमारे पुरोधा‘ खण्ड-1 निकाला था, जिसमें पं. माधवराव सप्रे, पं. रविशंकर शुक्ल, बैरिस्टर ठाकुर छेदीलाल, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, कुलदीप सहाय, यदुनंदन प्रसाद श्रीवास्तव, केशव प्रसाद वर्मा, गजानन माधव मुक्तिबोध, पं. स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी, चंदूलाल चंद्राकर, मायाराम सुरजन और हरि ठाकुर का समावेश था। ऐसे ही कुछ और पुरोधाओं पर केन्द्रित दूसरा खण्ड अब सादर समर्पित है। हमारा प्रयास है कि और अधिक जानकारी एकत्रित कर हम ऐसे ही पुरोधाओं पर कुछ और खण्ड प्रकाशित करें। हमने यथासंभव अधिक से अधिक जानकारी एकत्रित करने का प्रयास किया है, फिर भी किसी महत्वपूर्ण जानकारी अथवा ऐसे कुछ महानुभावों का उल्लेख अवश्य छूट गया होगा, जिसका समावेश होना चाहिये था। इसके लिए सभी पुरोधाओं का श्रद्धापूर्वक स्मरण कर उनके प्रति हम क्षमा याचना अर्पित करते हैं।

यह मोनोग्राफ हमारी विनम्र श्रद्धांजलि हैं, रचनात्मकता के उन वीरों के नाम जिनके आशीर्वाद से आज छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता नई ऊंचाईयों को छू रही है और नवगठित राज्य की विकासयात्रा में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रही है।
सच्चिदानंद जोशी
कुलपति

हमारे पुरोधा: खण्ड-2 में 12 पुरोधाओं की संक्षिप्त जानकारी इस प्रकार है-
नाम - जन्म/मुख्य कर्मभूमि, जन्म-निधन तिथि

# बारीन्द्रनाथ बैनर्जी - /रायगढ़, 19.11.1916-20.09.2006 
# पं. रामाश्रय उपाध्याय ‘वक्रतुण्ड‘ - बिहार/रायपुर, 02.08.1917-05.02.2005
# पं. शिवनारायण द्विवेदी - उत्तरप्रदेश/रायपुर, 20.07.1920-20.01.1999
# मधुकर खेर - रायपुर, 21.02.1928-31.03.1996
# केशवलाल मेहता - /कोरबा, 01.02.1929-05.02.2009
# कुमार साहू - मध्यप्रदेश/रायपुर, 22.10.2029-22.05.2008
# श्रीकांत वर्मा - बिलासपुर/दिल्ली, 18.12.1931-1986(25 मई)
# डी.पी. चौबे - बिलासपुर, 05.02.1935-19.06.1988 
# रम्मू श्रीवास्तव - लोहारा, कवर्धा/रायपुर, 19.12.1936-09.02.2006
# किरीट दोशी - /जगदलपुर, 29.11.1939-17.11.2009
# बसंत अवस्थी - रायपुर, 05.08.1940-11.07.2008
# सत्येन्द्र गुमास्ता - महासमुंद/रायपुर, 05.12.1940-13.06.1997

टीप -
0 पुस्तिका में प्रकाशन वर्ष अंकित नहीं है, यहां कोष्ठक में दर्शाया गया वर्ष 2011, अंतिम पृष्ठ पर छपे छत्तीसगढ़ संवाद के विज्ञापन February 2011 के आधार पर है।
0 पुस्तिका संपादक परितोष चक्रवर्ती स्वयं बिलासपुर से करीब से जुड़े रहे, मगर पुस्तिका में श्रीकांत वर्मा के निधन का वर्ष दिया गया है, तारीख नहीं। यहां कोष्ठक में दी गई तारीख अन्य स्रोत से ली गई है।
0 स्वयं पत्रकार रहे, परितोष जी की पहचान वामपंथी रुझान के साहित्यकार की रही। स्वाभिमानी परितोष कुछ समय भिलाई इस्पात संयंत्र में जनसंपर्क अधिकारी रहे, बाद में लंबे समय तक बिलासपुर एसइसीएल में जनसंपर्क विभाग प्रमुख का दायित्व निर्वाह किया। इस विश्वविद्यालय में उस दौर में इनकी नियुक्ति, विचारधारा के स्तर पर मेल नहीं खाती थी, चर्चा का विषय थी।
0 इस श्रृंखला का खण्ड-1 उपलब्ध नहीं हुआ है। प्राप्त होने पर वहां शामिल पत्रकार पुरोधाओं की इसी प्रकार संक्षिप्त जानकारी जोड़ी जाएगी।

Friday, March 6, 2026

छत्तीसगढ़ : पत्र-पत्रकारिता

1982 में मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, भोपाल से पुस्तक ‘मध्यप्रदेश में पत्रकारिता का इतिहास‘ छपी। विजय दत्त श्रीधर, संपादक और संयोजक, म.प्र. आंचलिक पत्रकार संघ ने ‘आभार‘ लिखा साथ ही पुस्तक में उनके लेख ‘मध्य प्रदेश में पत्रकारिता: उद्भव और विकास‘ तथा ‘ग्वालियर अंचल की पत्रकारिता‘ (ग्वालियर, मुंरैमा, भिण्ड, शिवपुरी, गुना, राजगढ़ और विदिशा जिले) शामिल हैं। अन्य लेख हैं- 

मालवा की पत्रकारिता (इन्दौर, रतलाम, उज्जैन, शाजापुर, झाबुआ, धार, मन्दसौर, देवास और खरगोन जिले) - शिव अनुराग पटैरिया, राजेश बादल 

भोपाल अंचल की पत्रकारिता (भोपाल, सिहोर और रायसेन जिले) -भाई रतनकुमार 

महाकौशल की पत्रकारिता (जबलपुर, दमोह, सागर, नरसिंहपुर, बालाघाट, मण्डला, छिन्दवाड़ा, होशंगाबाद, खण्डवा और बैतूल जिले) - गंगाप्रसाद ठाकुर 

छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता (रायपुर, बिलासपुर, सरगुजा, रायगढ़, दुर्ग, राजनाँदगाँव और बस्तर जिले) - स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी 

विध्य की पत्रकारिता (रीवा, सीधी, पन्ना, शहडोल, छतरपुर, टीकमगढ़ और दतिया जिले) - अम्बाप्रसाद श्रीवास्तव

‘छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता‘ लेख में स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी के साथ, प्रस्तुति-डा. सुशील त्रिवेदी, नाम भी है। पुस्तक का यह अंश- लेख, यहां प्रस्तुत है। 

छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता
-स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी
प्रस्तुति-डा० सुशील त्रिवेदी

छत्तीसगढ़ (रायपुर, बिलासपुर, सरगुजा, रायगढ़, दुर्ग, राजनाँदगाँव और बस्तर जिले।) में पत्रकारिता का इतिहास अपेक्षाकृत अधिक पुराना नहीं है। इसका एक कारण तो यह है कि यह इलाका बीहड़ जंगलों और पहाड़ों से भरा हुआ रहा और दूसरा यह कि यहाँ आवागमन के साधन बीसवीं शताब्दी के प्रथम चरण तक अत्यन्त न्यून थे। शिक्षा का कोई प्रसार नहीं था। ऐसी स्थिति में समाचार-पत्रों का प्रकाशन इस क्षेत्र में विलम्ब से शुरू होना स्वाभाविक ही है। 

अभी तक मिली जानकारी के अनुसार वर्तमान राजनाँदगाँव जिले (तत्कालीन राजनाँदगाँव रियासत) से 1889-90 में श्री भगवानदीन सिरौठिया ने ‘प्रजा हितैषी‘ नामक पहला पत्र निकाला था। यह पत्र रियासत के तत्कालीन शासक राजा बलरामदास के संरक्षण में प्रकाशित होता था। दुर्भाग्य से इस पत्र के अंक उपलब्ध नहीं हैं। इस पत्र को रियासती संरक्षण मिला हुआ था, इससे यह अनुमान किया गया है कि इसकी शैली और विचार पर रियासत की छाप थी और यह जनभावनाओं का सच्चा प्रतीक नहीं था। 

छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता का प्रारंभ ‘छत्तीसगढ़ मित्र‘ से माना जाता है। जनवरी 1900 में इस मासिक पत्रिका का प्रकाशन पेण्डरा (बिलासपुर जिला) से प्रारंभ हुआ था। इसके प्रकाशक रायपुर के प्रसिद्ध जनसेवी स्वर्गीय पण्डित वामनराव लाखे और सम्पादक पं० माधवराव सप्रे तथा पं० रामराव चिंचोलकर थे। चिंचोलकर जी बिलासपुर के रहने वाले थे और वकालत करते थे। (उनका स्वर्गवास 1906 में हो गया था)। ‘छत्तीसगढ़ मित्र‘ का मुद्रण पहले रायपुर के कय्यूमी प्रेस से होता था। बाद में वह देशसेवक प्रेस, नागपुर से छपता रहा। 32 पृष्ठ की यह पत्रिका 1/8 डिमाई आकार की थी। इसका वार्षिक शुल्क केवल डेढ़ रु० था। इसके प्रथम और अंतिम 4 पृष्ठ रंगीन कागज के होते थे।

‘छत्तीसगढ़ मित्र‘ के प्रथम अंक में इसके प्रकाशन के उद्देश्यों को बताते हुए संपादक-द्वय ने लिखा ‘सम्प्रति छत्तीसगढ़ विभाग को छोड़ ऐसा एक भी प्रान्त नहीं है जहाँ दैनिक, साप्ताहिक, मासिक या त्रैमासिक पत्र प्रकाशित न होता हो। इसमें कुछ सन्देह नहीं कि सुसम्पादित पत्रों के द्वारा हिन्दी भाषा की उन्नति हुई है, अतएव यहाँ भी ‘छत्तीसगढ़ मित्र‘ हिन्दी भाषा में उन्नति करने में विशेष प्रकार से ध्यान दे। आजकल भाषा में बहुत सा कूड़ा-कर्कट जमा हो रहा है, वह न होने पावे इसलिए प्रकाशित ग्रन्थों पर प्रसिद्ध मार्मिक विद्वानों के द्वारा समालोचना भी कहे।‘

‘छत्तीसगढ़ मित्र‘ हिन्दी को भारत की राष्ट्रभाषा मानता था। यह पत्र हिन्दी को ठोस, सुरुचिपूर्ण, प्रगतिशील साहित्य देना चाहता था। ‘मित्र‘ ने हिन्दी में आलोचना की शुरूआत की थी और क्रमशः उसके स्तर को ऊपर उठाया था। अपने छोटे से काल में उसने तत्कालीन पत्रिकाओं में काफी ऊँचा स्थान अर्जित कर लिया था। देश के प्रायः सभी पत्रों ने उसकी नीति की प्रशंसा की थी और सभी प्रसिद्ध साहित्यकारों ने अपनी रचनाएँ इसमें प्रकाशनार्थ दीं। ‘मित्र‘ के स्तम्भ थे- प्रेरित पत्र, हितबोध, सुभाषित संग्रह, समाचार प्राप्त, नारी धर्म और नारी शिक्षा, लोकोक्ति और कहावत, समालोचना तथा जीवनी। इसमें घारावाहिक लेख भी छपते थे। 

सप्रे जी ने ‘मित्र‘ के माध्यम से लेखकों की एक पीढ़ी तैयार की। इस पत्र में पं० महावीर प्रसाद द्विवेदी, पं० श्रीधर पाठक, पं० कामता प्रसाद गुरु, पं० गंगा प्रसाद अग्निहोत्री, पं० जगन्नाथ प्रसाद शुक्ल जैसे अनेक शीर्षस्थ लेखकों की प्रारम्भिक रचनाएँ छपीं। अर्थाभाव के बाद भी मित्र का प्रकाशन होता रहा। सत्रे जी का अपने पाठकों पर पूरा विश्वास था। फिर भी यह पत्र स्वावलम्बी न बन सका। जनवरी 1902 के अंक में सम्पादकों ने घोषणा कर दी कि ‘यदि इस वर्ष भी घाटा रहा तो समझ लीजिए आपके प्रिय ‘मित्र‘ के 100 वर्ष पूरे हो चुके और फिर यही इसकी आयु का अंतिम वर्ष भी होगा।‘ अंततः दिसम्बर 1902 में इसका प्रकाशन बंद हो गया।

‘छत्तीसगढ़ मित्र‘ का प्रकाशन बन्द होने के बाद एक दीर्घ अन्तराल आया। इसी बीच छत्तीसगढ़ में राजनीतिक सक्रियता आयी। कांग्रेस द्वारा संचालित कार्यक्रम तेजी से चल पड़े। समाज सुधार की और जन नेताओं का ध्यान आकर्षित हुआ। सन् 1914 में रायपुर जिले में पत्रकारिता के क्षेत्र में एक प्रयास हुआ जिसके जरिये ‘कबीर पंथी‘ मासिक का प्रकाशन शुरू हुआ। परंतु यह पत्रिका ज्यादा चल नहीं सकी।

सन् 1919 में रायपुर से कान्यकुब्ज सभा द्वारा ‘कान्यकुब्ज नायक‘ मासिक पत्रिका का प्रकाशन पं० रघुबर प्रसाद द्विवेदी के सम्पादन में किया गया। यह प्रयास भी अल्पजीवी रहा और एक वर्ष चलकर इसका प्रकाशन बन्द हो गया। पत्र का वार्षिक मूल्य दो रुपये था। इस पत्र की व्यवस्था पं० मातादीन शुक्ल के जिम्मे थी।

सन् 1920 से 1930 तक की अवधि पत्रकारिता के विकास की दृष्टि से महत्वपूर्ण रही। इस दौरान महात्मा गांधी का सत्याग्रह आन्दोलन देशव्यापी हो चुका था। विदेशी शासन के प्रति आम जनता का विरोध मुखर हो चला था। कांग्रेस ने आजादी के लिए दो-आयामी कार्यक्रम संचालित किये थे। पहले के द्वारा स्थानीय शासन संस्थाओं और धारा सभाओं के चुनाव लड़ने का निश्चय किया गया और दूसरे कार्यक्रम के तहत सत्याग्रह संचालित करने और सामाजिक उत्थान के रचनात्मक कार्यक्रमों को क्रियान्वित करने को प्राथमिकता दी गयी। पत्रकारिता की दृष्टि से उल्लेखनीय बात यह भी थी कि छत्तीसगढ़ से बाहर जाकर पं० माधवराव सप्रे ने हिन्दी ग्रन्थमाला की नींव डाली और फिर हिन्दी ‘केसरी‘ का सम्पादन किया। ‘कर्मवीर‘ और ‘श्री शारदा‘ के संस्थापन में भी सप्रे जी का प्रमुख प्रभाव था। 1920 में छत्तीसगढ़ के ईसाई समाज ने मसीही मासिक ‘भानूदय‘ मुंगेली से निकालना शुरू किया। इसके सिर्फ चार अंक छपे थे।

तीसरे दशक में बिलासपुर डिस्ट्रिक्ट कौंसिल ने श्री कुलदीप सहाय के सम्पादन में ‘विकास‘ मासिक का प्रकाशन किया था। श्री सहाय ‘विकास‘ के अलावा ‘कर्मवीर‘ तथा ‘महाकोशल‘ के सम्पादन से भी जुड़े थे। 

रायगढ़ जिले के चन्द्रपुर स्थान से 1923 में मनोहर प्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित हिन्दी मासिक ‘छत्तीसगढ़‘ का प्रकाशन आरम्भ हुआ।

सन् 1930 से 1940 तक की अवधि में जैसे-जैसे राष्ट्रीय गतिविधियाँ तेज हुई, वैसे-वैसे छत्तीसगढ़ में पत्रिकारिता का स्वरूप भी पल्लवित-पुष्पित होता गया। रायपुर के वयोवृद्ध पत्रकार श्री कन्हैयालाल वर्मा ने सन् 1934 में नागपुर से प्रकाशित होने वाले पत्र ‘हिन्दवासी‘ का सम्पादन किया। 

सन् 1935 में डिस्ट्रिक्ट कौंसिल, रायपुर द्वारा ‘उत्थान‘ मासिक पत्रिका का प्रकाशन आरम्भ किया गया। इसके सम्पादक पं० सुन्दरलाल त्रिपाठी थे। पत्र इण्डियन प्रेस से प्रकाशित होता था। छपाई अत्यन्त सुन्दर थी। इसमें शिक्षा और साहित्य से संबंधित विषयों पर समानुपात में लेख प्रकाशित होते थे। शिक्षा संस्थाओं और आम लोगों, दोनों के ही बीच यह पत्र बहुत लोकप्रिय था। इसमें छत्तीसगढ़ की राजनीतिक, सामाजिक, साहित्यिक, शैक्षणिक और सांस्कृतिक चेतना प्रतिबिम्बित होती थी। जब सरकार ने रायपुर डिस्ट्रिक्ट कौंसिल को भंग कर दिया तब ‘उत्थान‘ को 1937 के बाद बन्द कर दिया गया। छत्तीसगढ़ का यह महत्वपूर्ण मासिक-पत्र लगभग साढ़े तीन वर्ष तक प्रकाशित हुआ। पण्डित नेहरू तथा डा० राजेन्द्र प्रसाद जैसे शीर्ष नेताओं ने भी इस प्रकाशन को सराहा था। 

सन् 1935 में रायपुर से मासिक पत्रिका ‘आलोक‘ का प्रकाशन आरम्भ हुआ। इसका प्रकाशन हिन्दी साहित्य मण्डल द्वारा किया जाता था और श्री केशव प्रसाद वर्मा तथा श्री स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी इसका संपादन करते थे। इस पत्रिका ने छत्तीसगढ़ की साहित्यिक सक्रियता को बढ़ाने में उल्लेखनीय योगदान किया था। श्री केशव प्रसाद वर्मा के संपादकत्व में पटेरिया बुक डिपो, रायपुर, ने शैक्षणिक पत्रिका ‘शिक्षा‘ के भी कुछ अंक प्रकाशित किये। 

सन् 1936 में धारा सभा के चुनाव के बाद प्रथम बार सन् 1937 में तत्कालीन मध्य प्रान्त और बरार में कांग्रेसी मंत्रिमण्डल बना था। कांग्रेस के उद्देश्यों के प्रचार-प्रसार के लिए रायपुर से पहली बार साप्ताहिक ‘कांग्रेस पत्रिका‘ का प्रकाशन शुरू किया गया। इसके संपादक सर्वश्री नन्द कुमार दानी, गौरीशंकर आगम तथा स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी थे। 

सन् 1936 में दुर्ग से ‘हैहयवंश‘, सन् 1937 में सरगुजा से ‘सरगुजा सन्देश‘ और धमतरी से ‘नवयुवक‘ पत्रों का प्रकाशन हुआ। 1940 में राजकुमार कालेज ने अर्द्धवार्षिक पत्र ‘मुकुट‘ का प्रकाशन शुरू किया। 

वर्ष 1941 से शुरू होने वाले दशक में छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता का विकास ज्यादा तेज गति से हुआ। दैनिक, साप्ताहिक और मासिक पत्रों के प्रकाशनों की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि हुई। 

रायपुर जिला 
छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता को ‘अग्रदूत‘ के प्रकाशनारम्भ से जबरदस्त शक्ति मिली थी। विदेशी हुकूमत के विरुद्ध इस साप्ताहिक अखबार (सम्पादक केशव प्रसाद वर्मा और श्री स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी) ने जबरदस्त अभियान चलाया। छत्तीसगढ़ का यह पहला राष्ट्रवादी समाचार पत्र 20 जून 1942 से रायपुर में छपना शुरू हुआ था। सन् 1943 में प्रांतीय प्रेस सलाहकार समिति के संयोजक ने इसके सम्पादकों को ‘आपत्तिजनक सामग्री के प्रकाशन‘ के लिए दो बार चेतावनी दी थी। सितम्बर 1943 में इसके सम्पादकों को तीन माह के लिए जाँच आदेश दिये गये। 1943 की अंतिम तिमाही में श्री केशव प्रसाद वर्मा के गिरफ्तार होने पर इस अखबार का प्रकाशन अस्थायी तौर पर स्थागित कर दिया गया जो 1944 में फिर शुरू हुआ। यह साप्ताहिक अभी भी प्रकाशित हो रहा है। सम्पादक हैं श्री विष्णु सिन्हा। ‘अग्रदूत‘ में प्रकाशित होने वाली राजनीतिक डायरी बहुत लोकप्रिय हुआ करती थी। 

सन् 1943-44 में श्री शिवनारायण द्विवेदी के सम्पादन में ‘सावधान‘ साप्ताहिक का रायपुर से कुछ समय तक प्रकाशन हुआ था। श्री द्विवेदी हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार हैं और वर्तमान में ‘नवभारत‘ (नागपुर) से जुड़े हुए हैं। ‘नवभारत‘ का रायपुर संस्करण उन्हीं के संपादकत्व में आरंभ हुआ था। 

पंडित रविशंकर शुक्ल द्वारा नागपुर से साप्ताहिक ‘महाकोशल‘ का प्रकाशन किया जाता था। इसके सम्पादक श्री सांताचरण दीक्षित और श्री कुलदीप सहाय जैसे वरिष्ठ पत्रकार थे। बाद में, मार्च 1946 में यह पत्र रायपुर आ गया और श्री स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी के संपादन में प्रकाशित होने लगा। 

साप्ताहिक ‘महाकोशल‘ शीघ्र ही छत्तीसगढ़ का प्रमुख समाचार-पत्र बन गया। वर्ष 1948 में श्री श्यामाचरण शुक्ल भी ‘महाकोशल‘ के सम्पादन कार्य में सहयोगी बन गये। 

वर्ष 1951 में ‘महाकोशल‘ दैनिक हो गया। छत्तीसगढ़ से प्रकाशित होने वाला यह पहला दैनिक है। छत्तीसगढ क्षेत्र के प्रायः सभी वरिष्ठ पत्रकार अपने प्रारंभिक समय में इससे जुड़े रहे। सन् 1954 में जब श्री त्रिवेदी शासकीय सेवा में चले गये तब विश्वनाथ वैशम्पायन इसके सम्पादक बने। उनके बाद सर्वश्री विष्णुदत्त मिश्र तरंगी, गुरुदेव कश्यप, कमल दीक्षित इसके सम्पादक रहे। शासकीय सेवा से निवृत्त होने पर श्री स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी 1979 में पुनः इसके सम्पादक बने। सम्प्रति श्री कमल ठाकुर इसके सम्पादक हैं। 

सन् 1947 में ‘छत्तीसगढ़ केशरी‘ का प्रकाशन शुरू हुआ। 1952 में इसका नाम ‘हिन्द केशरी‘ कर दिया गया। इस नाम से यह तीन वर्ष तक निकलता रहा। सन् 1948 में ‘श्री‘ नाम की साहित्यिक मासिक पत्रिका का प्रकाशन शुरू हुआ। यह पत्रिका 1952 में बन्द हो गयी । 

1948 में श्री घनश्याम प्रसाद ‘श्याम‘ के सम्पादन में ‘नव ज्योति‘ मासिक का प्रकाशन शुरू हुआ। श्री श्याम सुकवि थे और उनके सम्पादन में ‘नव ज्योति‘ एक अच्छी साहित्यिक पत्रिका के रूप में कुछ वर्षों तक प्रकाशित होती रही। 
छत्तीसगढ़ के एक प्रमुख राजनीतिक नेता ठाकुर प्यारेलाल सिंह ने 4 सितम्बर 1950 से ‘राष्ट्रबन्धु‘ नामक समाचार-पत्र का प्रकाशन शुरू किया। यह अर्द्धसाप्ताहिक था और तत्कालीन शासन की नीतियों का कटु आलोचक था। 1953 में ठाकुर साहब सर्वाेदय आंदोलन में चले गये तो यह पत्र एक स्वतंत्र साप्ताहिक बन गया। अगले वर्ष इसका प्रकाशन बन्द हो गया। 1961 में फिर शुरू हुआ और बन्द हो गया। किन्तु 1967 में श्री हरि ठाकुर के सम्पादन में ‘राष्ट्रबन्धु‘ पुनः प्रकाशित होने लगा। 

सन् 1950 के पहले गास मेमोरियल सेन्टर, रायपुर, से ‘मसीही आवाज‘ का प्रकाशन शुरू हुआ। इसी के आसपास ‘साथी‘ नामक साप्ताहिक पत्र भी प्रकाशित हुआ था। इसके संपादक श्री राजेन्द्र कुमार चौबे थे। कबीर पंथियों ने रायपुर से ‘वंश प्रताप मणि माला‘ का प्रकाशन मासिक के रूप में शुरू किया। 

सन् 1950 में महासमुन्द से मासिक ‘सेवक‘ का प्रकाशन हुआ किन्तु एक वर्ष चल कर यह बन्द हो गया। इसी वर्ष रायपुर से श्री घनश्याम प्रसाद ‘श्याम‘ ने साप्ताहिक ‘नव राष्ट्र‘ निकाला। यह स्वतंत्र विचारधारा का पत्र था। इसकी प्रसार संख्या सीमित थी किन्तु प्रभाव अच्छा था। यह समाचार-पत्र लगभग ग्यारह वर्ष तक निकलता रहा। इस अवधि में कई बार उसका प्रकाशन स्थगित भी हुआ। रायपुर से वर्ष 1951 में ‘रायपुर समाचार‘ निकला। यह साप्ताहिक था, जो सिर्फ एक साल चला। 

रायपुर जिले से पहला अंग्रेजी पत्र 1953 में जगदीशपुर से प्रकाशित हुआ। मेनोनाइट मिशन की सामान्य सभा द्वारा प्रकाशित इस त्रैमासिक पत्र का नाम था, ‘इण्डिया कालिग‘। वर्ष 1953 में इसका सिर्फ एक अंक प्रकाशित हुआ, फिर इसका प्रकाशन बन्द हो गया। वर्ष 1956 में इसका पुनः प्रकाशन हुआ। रायपुर से 27 नवम्बर 1959 से ‘प्रिज्म‘ नामक अंग्रेजी साप्ताहिक कुछ समय के लिए निकला। दिसम्बर 1960 में रायपुर से श्री क्रांति कुमार द्विवेदी ने अंग्रेजी साप्ताहिक ‘वाल्कैनो‘ शुरू किया। पर यह पत्र ज्यादा समय तक चल नहीं सका। 

1954 में गास मेमोरियल सेंटर, रायपुर ने हिन्दी और सिधी में ईसाई धर्म की पत्रिका ‘प्रकाश‘ निकालना शुरू किया। इसका प्रकाशन 1958 में बन्द हो गया। सिन्धी पाठकों के लिए 1955 में निर्दलीय साप्ताहिक ‘लोक सेवा‘ का प्रकाशन शुरू किया गया। किन्तु एक अंक के बाद ही इसका प्रकाशन बन्द हो गया। इसी वर्ष महासमुन्द से ‘लोकसेवा‘ नामक हिन्दी पत्र निकला जो 1956 तक चला। धमतरी के पास शांतिपुर के मेनोनाइट चर्च ने 1956 में हिन्दी साप्ताहिक ‘मेनोनाइट पत्रिका‘ का प्रकाशन शुरू किया। यह पत्रिका कुछ वर्षों तक चली। 

वर्ष 1956 में श्री खूबचन्द बघेल ने ‘छत्तीसगढ़‘ साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन आरम्भ किया जो प्रजा सोशलिस्ट पार्टी का प्रवक्ता पत्र था। इसका प्रकाशन जनवरी 1958 में बन्द हो गया। भारत सेवक समाज की रायपुर जिला शाखा ने 1956 में ‘भारत सेवक‘ नामक मासिक पत्रिका निकाली जो 1960 तक चली। महासमुन्द में आर्य समाज ने आदर्श भारती‘ नामक मासिक का प्रकाशन 1957 में शुरू किया। यह पत्रिका रायपुर जिले में ईसाई मिशन के अभियान की कटु आलोचक थी। इसी वर्ष रायपुर से हिन्दी साप्ताहिक ‘रायपुर टाइम्स‘ का प्रकाशन शुरू हुआ। 

वर्ष 1959 पत्रकारिता के इतिहास की दृष्टि से उल्लेखनीय है। इस वर्ष चार सामयिकी के अतिरिक्त यहाँ से दो दैनिक पत्रों का प्रकाशन आरम्भ हुआ। 9 अप्रैल 1959 को ‘नवभारत‘ श्री शिवनारायण द्विवेदी के सम्पादकत्व में और 19 अप्रैल 1959 को ‘नई दुनिया‘ श्री मायाराम सुरजन के संपादन में निकलने लगा। बाद में ‘नई दुनिया‘ ने दैनिक ‘देशबन्धु‘ नाम ग्रहण कर लिया। 

1960 से श्री गोविन्दलाल वोरा ‘नवभारत‘ के सम्पादक हैं। श्री वोरा रायपुर विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग के अध्यक्ष भी रहे। अब यह जिम्मेदारी ‘नवभारत‘ की उप-संपादक श्रीमती आशा शुक्ला सम्हाल रही हैं। ‘नवभारत‘ के नरेन्द्र पारख ने गत वर्ष वीरनारायण सिंह पुरस्कार पाया। 

ग्रामीण पत्रकारिता को नये आयाम देने वाले ‘देशबंधु‘ का सम्पादन श्री ललित सुरजन कर रहे हैं। एक लम्बी अवधि तक श्री रामाश्रय उपाध्याय इसके स्थानीय सम्पादक रहे। ग्रामीण पत्रकारिता का स्टेट्समैन पुरस्कार स्थापना के प्रथम वर्ष ही ‘देशबंधु‘ के श्री राजनारायण मिश्र ने जीता। दूसरे और तीसरे साल भी क्रमशः श्री गिरिजा शंकर और श्री जिया उल हुसैनी ने यह गौरव पाया। ललित जी पत्रकारिता विभाग के अध्यक्ष भी रहे। 

साप्ताहिक ‘ठोकर‘ का प्रकाशन 23 जनवरी 1959 को शुरू होकर 1961 में बन्द हो गया। 

रायपुर का पहला सांध्य दैनिक ‘मध्यप्रदेश‘ 4 अक्टूबर 1959 को निकला, पर शीघ्र ही यह बन्द हो गया। इसी वर्ष दो पाक्षिकों, ‘नया कदम‘ और ‘रिपब्लिक‘ का प्रकाशन शुरू हुआ। 

वर्ष 1960 में ग्यारह समाचार पत्र निकले। इनमें 26 नवम्बर 1960 से शुरू हुआ सांध्य दैनिक ‘विचार और समाचार‘ उल्लेखनीय था। इसके सम्पादक श्री विश्वनाथ वैशम्पायन थे। बाद में यह साप्ताहिक के रूप में प्रकाशित होने लगा। सुसम्पादन के लिए यह प्रशंसित हुआ था। इसका प्रकाशन लगभग सात वर्ष तक हुआ। अर्द्ध साप्ताहिक पत्र ‘रायपुर न्यूज‘ का प्रकाशन 30 अप्रैल 1960 से शुरू हुआ था। श्री किशोरीलाल मिश्र इसके सम्पादक थे। ‘एम०पी० टाइम ऐण्ड टाइड‘ नामक अंग्रेजी साप्ताहिक भी इसी समय निकला। फरवरी 1960 से ‘राय चक्र‘ नामक साप्ताहिक निकलना शुरू हुआ परन्तु आपत्तिजनक सामग्री का प्रकाशन करने के कारण इसका प्रकाशन स्थगित हो गया। इसी अवधि में महासमुन्द से ‘छत्तीसगढ़ समाचार‘, ‘श्यामसुन्दर‘ और ‘तहलका‘ साप्ताहिक निकला। रायपुर से ‘बढ़ते चलो‘, ‘हमराही‘, ‘सिने तरंग‘ और ‘ग्राम दर्शन‘ का प्रकाशन हुआ। 

रायपुर से एक अन्य दैनिक ‘युगधर्म‘ का प्रकाशन 26 जनवरी 1961 से शुरू हुआ। प्रथम संपादक श्री पद्माकर भाटे थे। बीच में श्री रामावतार शर्मा भी संपादक रहे। अब इसके सम्पादक श्री बबन प्रसाद मिश्र हैं। इसी वर्ष ‘अनमोल‘, ‘जननाद‘, ‘जागते रहो‘, ‘भारत टाइम्स‘ साप्ताहिक पत्रों और ‘सहयोग दर्शन‘ मासिक का प्रकाशन शुरू हुआ। 26 जनवरी 1962 से साप्ताहिक ‘नभ‘ का प्रकाशन शुरू हुआ। श्री मधुकर खेर इसके सम्पादक थे। 5 अंकों के बाद ‘नभ‘ बन्द हो गया। 

वर्ष 1964 और 1970 के बीच रायपुर से एक सांध्य दैनिक, दो अर्द्ध साप्ताहिक, पन्द्रह साप्ताहिक, तीन पाक्षिक, दो मासिक, एक द्वैमासिक और एक त्रैमासिक का प्रकाशन शुरू हुआ। इनमें से ‘समाचार दर्पण‘ नियमित रूप से साप्ताहिक के रूप में दो वर्ष (1964-65) तक प्रकाशित हुआ। श्री कुमार साहू इसके सम्पादक और श्री कनक राम कोठारी प्रकाशक थे। इसी तरह ‘रायपुर सन्देश‘ सांध्य दैनिक भी मई 1966 में निकला जो 25 अक्टूबर 1967 को बन्द हो गया। जुलाई 1966 से निकलने वाला साप्ताहिक ‘स्नातक‘ विद्यार्थियों के बीच बहु-प्रसारित था किन्तु इसका प्रकाशन भी अक्टूबर 1969 में बन्द हो गया। अक्टूबर 1965 से ‘साजना‘ मासिक का प्रकाशन शुरू हुआ। यह साहित्यिक पत्रिका थी। इसका प्रकाशन डेढ़ वर्ष तक हुआ। 1964 में विवेकानन्द आश्रम ने त्रैमासिक ‘विवेक ज्योति‘ का प्रकाशन शुरू किया। यह पत्रिका आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विषयों की है। 

रायपुर के अन्य पत्रों में स्वर्गीय गजानन माधव मुक्तिबोध तथा जयनारायण पांडे की स्मृति में अक्टूबर, 1965 से श्री हरि ठाकुर के संपादन में मासिक ‘संज्ञा‘, ‘हस्ताक्षर‘ (विभु खरे), ‘छत्तीसगढ़ी‘ (दयाशंकर शुक्ल), ‘छत्तीसगढ़ केसरी‘ (दीपचन्द डागा), ‘जवाहर ज्वाला‘ (साप्ताहिक), ‘छत्तीसगढ़ सेवक‘ (पाक्षिक), ‘लोकशक्ति‘ (सांध्य दैनिक), ‘प्रजापुकार‘ (साप्ताहिक), ‘गाइड‘ (उर्दू साप्ताहिक), ‘आजाद कलम‘ (साप्ताहिक), ‘सन्मार्ग‘ (साप्ताहिक), ‘कमलनंद‘ (पाक्षिक), ‘विजेता‘ (साप्ताहिक), ‘पहरेदार‘ (साप्ताहिक), ‘विजययंत‘ (साप्ताहिक), ‘तिनका‘ (साप्ताहिक), ‘सम्वाददाता‘ (साप्ताहिक), ‘कुरुद केसरी‘ (पाक्षिक), ‘गोंडवाना‘ (साप्ताहिक), ‘पुष्पहार‘ (साप्ताहिक), ‘अपने ग्रन्थ‘ (मासिक), शामिल हैं। भाटापारा से ‘भाटापारा टाइम्स‘ (साप्ताहिक) 1972 में निकलना शुरू हुआ। 

रायपुर से 5 अगस्त, 1974 को श्री गोविन्दलाल वोरा के सम्पादकत्व में आंग्ल दैनिक ‘मध्यप्रदेश क्रानिकल‘ निकला। दूसरा अंग्रेजी दैनिक ‘हितवाद‘ सितम्बर 1974 में निकला (सं० श्री रामचन्द्र संगीत) जो 1974 में ही बंद हो गया। 

रविशंकर विश्वविद्यालय ने 1968-69 में पत्रकारिता के अध्ययन की विशेष व्यवस्था की और स्नातक उपाधि (बी० जे०) पाठ्यक्रम शुरू किया। 

रायपुर के वरिष्ठ पत्रकारों में श्री मधुकर खेर का उल्लेखनीय स्थान है। वे प्रेस ट्रस्ट आव् इंडिया, ‘टाइम्स आव् इंडिया‘, ‘इंडियन एक्सप्रेस‘ आदि के सक्रिय सम्वाददाता हैं। 

आज भी रायपुर मध्यप्रदेश का प्रमुख समाचार केन्द्र है और यहाँ के दैनिक पत्र अत्यन्त सम्मानित और बहुप्रसारित हैं। तीनों प्रमुख समाचार पत्रों- ‘नवभारत‘, ‘देशबन्धु‘ और ‘युगधर्म‘ ने मुद्रण की आफसेट पद्धति अपनाई हुई है। प्रसार संख्या की दृष्टि से रायपुर ‘नवभारत‘ का मध्यप्रदेश में दूसरा स्थान है। 

दुर्ग-राजनाँदगाँव 
जिला सन् 1947 में खैरागढ़ से ‘प्रजा बन्धु‘ पाक्षिक का प्रकाशन आरंभ हुआ परन्तु अगले वर्ष ही वह बन्द हो गया। अक्टूबर 1947 में दुर्ग से ‘जिन्दगी‘ साप्ताहिक निकलना शुरू हुआ। यह स्वतन्त्र रीति नीति का पत्र था। इसके प्रकाशक और सम्पादक श्री केदारनाथ झा ‘चन्द्र‘ थे। 1954 तक यह तीन बार बन्द हुआ और निकला, फिर 1961 में अंतिम रूप से इसका प्रकाशन बन्द हो गया। अगस्त 1948 में राजनाँदगाँव से पाक्षिक ‘स्वतन्त्र भारत‘ का प्रकाशन शुरू हुआ। यह भी बहुत कम समय तक चला। राजनाँदगाँव से ही मार्च 1950 में मासिक ‘चित्र संसार‘ निकला। इसका प्रकाशन उसी वर्ष अक्टूबर माह में बन्द हो गया। 

राजनाँदगाँव से 26 जनवरी 1951 से ‘जनतन्त्र‘ साप्ताहिक का प्रकाशन आरम्भ हुआ। प्रख्यात साहित्यकार डा० बलदेव प्रसाद मिश्र इसके संरक्षक और सम्पादक थे। इसी केन्द्र से 15 अगस्त 1956 को साप्ताहिक ‘सबेरा‘ का प्रकाशन शुरू हुआ और 1962 तक चला। इसके सम्पादक श्री शरद कोठारी थे। अब वे दैनिक ‘सबेरा संकेत‘ निकाल रहे हैं जो जिले का प्रमुख पत्र है। 

दुर्ग से 1958 में ‘ज्वालामुखी‘ का प्रकाशन हुआ जो 1967 तक चला। इसके प्रकाशक श्री कपिलनाथ ब्रह्मभट्ट थे। 1959 में ‘भारत केसरी‘ साप्ताहिक राजनाँदगाँव से निकला जो 1961 तक चला। श्री ब्रह्मभट्ट बड़े जीवट के पत्रकार थे और अनेक पत्रों से सम्वाददाता के रूप में जुड़े रहे। 

सन् 1958 के बाद दुर्ग-राजनाँदगाँव से बहुत से समाचार पत्र निकले किन्तु उनका अस्तित्वकाल अत्यन्त अल्प रहा। ऐसे पत्रों में ‘प्रेरणा‘, ‘अभियान‘ और ‘चेतावनी‘ प्रमुख थे। 1960 में दुर्ग से ‘साहू सन्देश‘ निकलना शुरू हुआ। भिलाई से 1962 में हिन्दी और अंग्रेजी में ‘भिलाई समाचार‘ निकलने लगा। 1963 में दुर्ग से ‘छत्तीसगढ़ सहयोगी‘ (साप्ताहिक), ‘भिलाई श्रमिक आह्वान‘ (साप्ताहिक) और दुर्ग से ही ‘शांति की देवी‘ (मासिक) निकले। 

सन् 1965-67 के दौरान ‘चिन्तक‘ साप्ताहिक (दुर्ग), ‘अग्रवाल जगत‘ साप्ताहिक (दुर्ग), ‘अनन्त‘ मासिक (भिलाई), ‘पञ्च निर्मित‘ साप्ताहिक (बालोद), ‘कामगार मित्र‘ साप्ताहिक (दुर्ग), ‘छत्तीसगढ़‘ अर्द्ध साप्ताहिक (दुर्ग), ‘श्रमदेव‘ (दुर्ग), ‘दुर्ग टाइम्स‘ साप्ताहिक (दुर्ग) और ‘सोशलिस्ट वर्कर‘ अंग्रेजी साप्ताहिक (दुर्ग) प्रकाशित हुए। 

दुर्ग जिले के दो पत्रकारों ने राजनीति में भी अच्छा स्थान बनाया। श्री चन्दूलाल चन्द्राकर राष्ट्रीय दैनिक ‘हिन्दुस्तान‘ के प्रधान सम्पादक रहे और बाद में केन्द्रीय मन्त्रिमण्डल में राज्य मन्त्री रहे। ‘नवभारत‘, ‘नव-भारत टाइम्स‘ तथा अन्य समाचार पत्रों के सम्वाददाता रहे श्री मोतीलाल वोरा ने प्रदेश के जागरूक विधायक के रूप में स्थान बनाया है और सम्प्रति उच्च शिक्षा राज्य मन्त्री हैं। 

बस्तर जिला 
आजादी के पहले जगदलपुर एक छोटा सा कस्बा था। पूरे जिले में आदिवासी निवास करते थे। करीब 14,000 वर्गमील की लम्बाई-चौड़ाई बाले इस जिले में कुल 40-45 प्राथमिक शालाएँ थीं। एक अंग्रेजी मिडिल स्कूल सिर्फ जगदलपुर में था। जगदलपुर में ब्रिटिश राज्य का प्रशासक रहता था। उनके सुख सुभीते के लिए पानी का नल था और कस्बे में बिजली भी थी। सरकारी खबरों के लिए दूसरे विश्वयुद्ध के पहले से ही ‘बस्तर समाचार‘ नाम का एक साप्ताहिक अखबार सरकारी इन्तजाम में प्रकाशित किया गया था। यह सरकारी अखबार जगदलपुर के सरकारी प्रेस में छपता था। 

1947 के बाद बस्तर में पत्रकारिता का नया युग शुरू हुआ। वहाँ के प्रमुख पत्रकार थे पं० सुन्दरलाल त्रिपाठी और स्वर्गीय मतीश बनर्जी। एक दक्षिण भारतीय शर्मा जी भी थे। पूर्वी पाकिस्तान (आज के बाँगला देश) के लोग जब बस्तर में आने को हुए तब बोस बन्धुओं का भी यहाँ आगमन हुआ। पुनर्वासियों के सुख-सुभीतों की ओर उनका ध्यान था। श्री मतीश बनर्जी और पं० सुन्दरलाल त्रिपाठी द्वारा उत्साहित करने पर बोस बन्धुओं ने ‘दण्डकारण्य समाचार‘ 1948 के लगभग प्रकाशित करना शुरू किया, जो आजतक चल रहा है। इसके सम्पादक मतीश बनर्जी थे। अखबार 8 पृष्ठों का था। इसके चार पृष्ठ हिन्दी में और चार अंग्रेजी में छपते थे। ‘दण्डकारण्य समाचार‘ जिले के बाहर भी प्रसारित रहा। अब इसके सम्पादक श्री तुषार कान्ति बोस हैं। 

श्री रविशंकर वाजपेयी के सम्पादकत्व में साप्ताहिक ‘बस्तर टाइम्स‘ निकल रहा है। 

बिलासपुर जिला 
पहले उल्लेख किया जा चुका है कि पेन्ड्रा रोड से प्रकाशित होने वाले ‘छत्तीसगढ़ मित्र‘ ने बिलासपुर ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण मध्यप्रदेश में पत्रकारिता के इतिहास को एक नया मोड़ दिया था। श्री माधवराव सप्रे के सम्पादन में निकला यह समाचार-पत्र हिन्दी साहित्य के संवर्द्धन में भी बहुत सहायक सिद्ध हुआ था। 

सन् 1920 के बाद बिलासपुर डिस्ट्रिक्ट कौंसिल ने ‘विकास‘ नामक पत्रिका निकाली थी। सन् 1937 में ‘सचेत‘ साप्ताहिक का प्रकाशन हुआ था, पर वह थोड़े समय तक ही चला। 

सितम्बर, 1941 में बिलासपुर से एक साप्ताहिक निकलना शुरू हुआ ‘पराक्रम‘, जिसके सम्पादक श्री रामकृष्ण पाण्डेय थे (उन्हें लोग पराक्रमी पांडे कहने लगे थे)। सितम्बर 1952 में इसका प्रकाशन स्थगित हो गया था जो मार्च 1953 में पुनः प्रारम्भ हुआ। इसी तरह 1955 में कुछ समय बन्द रहने के बाद यह फिर चालू हो गया था, पर ज्यादा चल नहीं सका। 

सन् 1950 में ‘प्रकाश‘ साप्ताहिक निकला जो 1952 में बन्द हो गया। ‘लोकमित्र‘ साप्ताहिक श्री वृन्दावन बिहारी मिश्र के सम्पादन में 1953 से निकलना शुरू हुआ। बाद में श्री बृजराय नारायण मिश्र के सम्पादन में चलता रहा। इन दिनों यह श्री अवध किशोर मिश्र के सम्पादन में निकल रहा है। 

सन् 1953 में एक निर्भीक साप्ताहिक ‘तूफान‘ श्री काले के सम्पादन में निकलना शुरू हुआ किन्तु 1962 में श्री काले के असामयिक निधन से इसका प्रकाशन बन्द हो गया। इसी वर्ष यहाँ से ‘नव समाज‘ साप्ताहिक, ‘नई दिशा‘ त्रैमासिक और ‘मुक्ति‘ साप्ताहिक निकले। ‘नई दिशा‘ के सम्पादक श्री श्रीकान्त वर्मा और श्री रामकृष्ण श्रीवास्तव थे। इसके सलाहकार थे श्री गजानन माधव मुक्तिबोध, श्री प्रभाकर माचवे और श्री नरेश मेहता। मई 55 में आरम्भ हुई इस पत्रिका का वार्षिक मूल्य 4 रु० और एक प्रति का मूल्य 1 रु० था। यह विशुद्ध साहित्यिक पत्रिका थी। श्री वर्मा बाद में ‘दिनमान‘ के विशेष सम्वाददाता के रूप में प्रतिष्ठित हुए और सम्प्रति राज्यसभा के सदस्य हैं। 

सन् 1959 में सक्ति से ‘अवतार‘ पाक्षिक निकलने लगा पर शीघ्र ही बन्द हो गया। इसी वर्ष चाँपा से ‘सक्ति टाइम्स‘ पाक्षिक निकलना शुरू हुआ। सन् 1960 में छत्तीसगढ़ हिन्दी साहित्य सम्मेलन ने साहित्यिक त्रैमासिक ‘क्षितिज‘ का प्रकाशन प्रारम्भ किया। सन् 1960 में बिलासपुर से ‘मुक्ति दूत‘ दैनिक का प्रकाशन प्रारम्भ किया गया, पर वह चल नहीं पाया। इसी समय सहकारी संस्था ने ‘छत्तीसगढ़ सहकारी समाज‘ मासिक निकालना शुरू किया। सन् 1961 में बिलासपुर से ‘नया तूफान‘ साप्ताहिक, ‘छत्तीसगढ़ सह गौरव‘ मासिक, ‘ज्ञान यज्ञ‘ मासिक और ‘बवंडर‘ साप्ताहिक निकले। 

वास्तव में जिले की पत्रकारिका को निश्चित दिशा देने में ‘बिलासपुर टाइम्स‘ का योगदान महत्वपूर्ण रहा है। श्री डी० पी० चौबे ने इसे एक साप्ताहिक के रूप में निकालना शुरू किया था। वर्ष 1974 में उन्होंने श्री बी० आर० यादव के सहयोग से उसे दैनिक के रूप में स्थापित कर दिया। प्रखरता और स्वच्छता के लिए ‘बिलासपुर टाइम्स‘ उल्लेखनीय है। श्री यादव लम्बे अरसे तक ‘नवभारत‘ के बिलासपुर सम्वाददाता रहे हैं और वर्तमान में मध्यप्रदेश शासन के काबीना मन्त्री हैं। ‘बिलासपुर टाइम्स‘ में श्री गुरुदेव कश्यप तथा श्री कमल ठाकुर सम्पादक रहे। 

बिलासपुर में ‘बूंद और मोती‘ श्री के० भगवान के सम्पादन में, हसदेव टाइम्स‘ श्री कृष्ण कुमार शर्मा के संपादन में तथा ‘सेन्ट्रल टाइम्स‘ 1966 से श्री कृष्णमूर्ति टाह के नेतृत्व में निकल रहे हैं। कोरबा से सन् 1966 साप्ताहिक ‘वक्ता‘ श्री राजेन्द्र गुप्त के सम्पादकत्व में नियमित रूप से निकल रहा है। 

सन् 1977 से बिलासपुर से दैनिक ‘लोक स्वर‘ का प्रकाशन शुरू हुआ। श्री श्यामलाल चतुर्वेदी, डा० सच्चिदानन्द पाण्डे और श्री रमेश नैयर ने भी इसका सम्पादन किया है। वर्तमान में श्री बजरंग केडिया संपादक हैं। 

बिलासपुर महत्वपूर्ण समाचार केन्द्र है किन्तु यहाँ रायपुर से निकलने वाले समाचार पत्रों का प्रभाव छाया हुआ है। 

रायगढ़ जिला 
समाचार-पत्र-प्रकाशन की दृष्टि से रायगढ़ जिला काफी पिछड़ा रहा है। सन् 1923 में श्री मनोहर प्रसाद मिश्र द्वारा रायगढ़ से ‘छत्तीसगढ़‘ नामक पत्रिका का प्रकाशन हुआ। इसका आकार 10X7 इंच और वार्षिक मूल्य 2 रु० था। 

एक लम्बे अन्तराल के बाद 1950 में रायगढ़ से ‘अधिकार‘ नामक साप्ताहिक का कुछ समय तक प्रकाशन हुआ। सन् 1951 में ‘बापू‘ नामक हिन्दी मासिक रायगढ़ से निकला जिसके संपादक स्वामी गौरीशंकर थे। बाद में ‘राष्ट्र केसरी‘ नामक हिन्दी साप्ताहिक भी यहीं से निकला। जनवरी 1956 में इन दोनों समाचार पत्रों को मिलाकर ‘नई बात‘ नामक नया हिन्दी साप्ताहिक निकाला गया, परन्तु यह नवम्बर 1958 में बन्द हो गया। 

सन् 1953 में रायगढ़ से ‘भूचाल‘ साप्ताहिक निकाला गया, जो अगले वर्ष ही बन्द हो गया। 

सन् 1957 में ‘महाभारत‘ हिन्दी मासिक प्रकाशित हुआ। सन् 1959 में ‘नई बात‘ साप्ताहिक का पुनः प्रकाशन हुआ और 1965 तक चलता रहा। 

सरगुजा जिला 
छत्तीसगढ़ के उत्तरी क्षेत्र में आवागमन के साधनों से दूर स्थित सरगुजा जिले में पत्रकारिता की गतिविधियाँ अत्यन्त अल्प रही हैं। सन् 1960 के आसपास यहाँ से श्री समर बहादुर सिंह के सम्पादन में ‘राष्ट्रवाणी‘ निकलता रहा है। फिर श्री रवीन्द्र प्रताप सिंह के संपादन में ‘सरगुजा सन्देश‘ निकला। यह पत्र आज भी निकल रहा है और साफ सुथरा है। सन् 1978 में ‘सरगुजा वाणी‘ का प्रकाशन शुरू हुआ। 

छत्तीसगढ़ अंचल के रायपुर जिले से इस समय 6 दैनिक, 15 साप्ताहिक, 1 पाक्षिक और 1 त्रैमासिक पत्र निकल रहे हैं। दुर्ग जिले से 6 साप्ताहिक, बस्तर जिले से 6 साप्ताहिक, राजनाँदगाँव जिले से 3 दैनिक, 7 साप्ताहिक और 1 पाक्षिक पत्र का प्रकाशन हो रहा है। बिलासपुर जिले से 2 दैनिक, 11 साप्ताहिक और 1 मासिक पत्र प्रकाशित हो रहे हैं। सरगुजा जिले से 1 साप्ताहिक और 2 पाक्षिक तथा रायगढ़ जिले से 3 साप्ताहिक और 1 त्रैमासिक पत्र निकलते हैं। 

पश्चलेख- 
इस क्रम में उल्लेखनीय कि जिला गजेटियरों के अध्याय 18 में जिले के समाचार पत्रों की जानकारी होती थी। संभवतः उक्त पुस्तक के लिए सामग्री उसी के आधार पर विकसित की गई है। अगले क्रम में दो, लगभग एक जैसे प्रकाशनों का उल्लेख प्रासंगिक होगा। इनमें माधवराव सप्रे स्मृति समाचार पत्र संग्रहालय एवं शोध संस्थान, भोपाल से 2002 (नवंबर?) में प्रकाशित पुस्तिका, डॉ. मंगला अनुजा ‘छत्तीसगढ़ पत्रकारिता की संस्कार भूमि‘ तथा इसी संस्था की जनसंचार माध्यमों पर केन्द्रित शोध पत्रिका ‘आंचलिक पत्रकार‘ के दिसंबर 2002 अंक में डा. मंगला अनुजा का ही इसी यानी ‘छत्तीसगढ़ पत्रकारिता की संस्कार भूमि‘ शीर्षक से प्रकाशित लंबा लेख है। इन लेखों का आधार पूर्व उल्लिखित पुस्तक ‘मध्यप्रदेश में पत्रकारिता का इतिहास‘ का लेख ‘छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता‘ जान पड़ता है, मगर इसमें चित्रों सहित जानकारियां 2002 तक अद्यतन कर दी गई हैं और पुस्तिका के आरंभ में अनुक्रम है, जिसमें 375 पत्र-पत्रिकाओं का नाम, पृष्ठ संख्या के साथ है, जिससे इसकी उपादेयता बढ़ गई है। 

इसी प्रकार छत्तीसगढ़ राज्य हिंदी ग्रंथ अकादमी से 2011 में ‘हिदी पत्रकारिता का इतिहास छत्तीसगढ़‘ प्रकाशित हुआ है। यह माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय की स्वतंत्र भारत में भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता शोध परियोजना के अंतर्गत विभाष झा द्वारा तैयार की गई है। इसमें यहां आए पूर्व प्रकाशनों का उल्लेख नहीं है। पुस्तक में पत्रकारिता के संक्षिप्त इतिहास के अलावा प्रमुखतः विभिन्न विश्लेषणात्मक शीर्षकों में वरिष्ठ पत्रकारों से हुई बातचीत है।

आंचलिक पत्रकार के उक्त अंक में विजयदत्त श्रीधर ने ‘सम्पादकीय‘ में लिखा है कि ‘छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता का व्यापक अध्ययन, गहन विश्लेषण और व्याख्या होनी चाहिए। वहां के विश्व विद्यालय यदि ऐसा कोई गहन गंभीर-व्यापक शोध करा सकें, तब वे छत्तीसगढ़ के सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक इतिहासक्रम की विश्रृंखलित कड़ियां भी जोड़ पाएंगे, इसमें सन्देह नहीं।‘

रायपुर, छत्तीसगढ़ में सन 2005 में ‘कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय की स्थापना हुई। जानकारी मिली है कि विश्वविद्यालय द्वारा माधवराव सप्रे के ‘छत्तीसगढ़ मित्र‘ के सभी 36 अंकों का पुनर्प्रकाशन किया गया है। इस क्रम में छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता का- बीसवीं सदी का पहला, दूसरा और तीसरा चतुर्थांश, यानी 1900 से 1925, 1926-1950, 1951-1975 तथा इसके पश्चात के लिए प्रत्येक दशक और फिर पृथक राज्य गठन के बाद प्रत्येक पंचवर्षीय कालखंड में अध्ययन, अभिलेखन हेतु प्रयास समीचीन होगा। इस अध्ययन में पत्र-पत्रिका, संपादक, प्रमुख संवाददाता-पत्रकार, उल्लेखनीय घटना, विकास और उपलब्धियां शामिल हों। साथ ही डिजिटल अभिलेखन, जिसमें पत्र-पत्रिकाएं, चित्र, संबंधित दस्तावेज तथा इसके पश्चात संभव हो तो महत्वपूर्ण आडियो-वीडियो फाइल्स भी हों। आशा है कि पत्रकारिता और जनसंचार का यह विश्वविद्यालय ऐसी सारी संभावनाओं की दिशा में अग्रसर होगा।

यह दौर तो अपनी निजी खास रुचि से चुने गए, सतही जानकारी और अनावश्यक दुहराव वाले खर्चीले कॉफी टेबल बुक का है, जो प्रकाशन से जुड़े लोगों/संस्थानों के लिए फायदेमंद होता है मगर अपने वास्तविक लक्ष्य, पाठकों के लिए अक्सर उपयोगी नहीं होता और अधिकतर भ्रामक भी होता है। मानता हूं कि ऐसी जानकारियां, मूल स्रोत के उल्लेख सहित सार्वजनिक, निःशुल्क और सहज नेट पर उपलब्ध होनी चाहिए। अपने स्तर पर पिछले वर्षों से मेरा यही प्रयास है। जिसका एक उदाहरण यह है। इसके लिए मूल स्रोतों की तलाश और जानकारी जुटाना, पढ़ कर फीड करना एवं नेट पर अपलोड कर सार्वजनिक करना, यह सभी काम मेरे स्वयं द्वारा यथासंभव सावधानी और जिम्मेदारी से किया गया है।

यह प्रस्तुति सामान्य जानकारी के लिए तैयार की गई है, किंतु शोध-संदर्भों के लिए मूल स्रोतों को देखना चाहिए।

Thursday, March 28, 2013

एक पत्र


आदरणीय सर,

लिखना-पढ़ना तो सीख ही लिया था काम भर, लेकिन जिन गुरुओं से संदेह, सवाल और जिज्ञासा के स्वभाव को बल मिला, सिखाया, उनमें आप भी हैं। इस भूमिका पर कहना यह है कि ज्ञानपीठ से प्रकाशित परितोष चक्रवर्ती की ''हिन्दी'' पुस्तक 'प्रिंट लाइन' के फ्लैप पर नाम देखा, डॉ. राजेन्द्र मिश्र। आपकी समझ पर कैसे संदेह कर सकता हूं, लेकिन आपके माध्यम से पढ़ने की जो थोड़ी समझ बनी थी, उस पर संदेह हुआ, बावजूद कि यह आपकी नसीहतों पर भी संदेह माना जा सकता है। 

आजकल पढ़ना संभल कर और चुन कर ही करता हूं। आपका नाम देख कर किताब पढ़ना शुरू किया। पूरी पुस्तक पढ़ने में लगभग एक घंटे समय लगा, जबकि इतनी मोटी ठीक-ठाक किताब के लिए मुझे आम तौर पर छः-सात घंटे तो लगते ही और कोई अधिक गंभीर किस्म का काम हो तो इससे भी ज्यादा, खैर। किताब पढ़ कर मेरी जो राय बनी उसे जांचने के लिए दुबारा-तिबारा फ्लैप पढ़ा। ध्यान गया कि इसे आपने 'एकरैखिक', 'इकहरेपन' और 'काला सफेद के बीच के रंग' वाला कहा है। आपके इन शब्दों का प्रयोग, जैसा मैं समझ पा रहा हूं, वही है तो मेरे सारे संदेह दूर हो जाते हैं।

आत्म-साक्ष्य पर रचा गया यह उपन्यास, आत्मग्रस्तता के सेरेब्रल अटैक से कोमा में पड़े अमर का एकालाप बन गया है। नायक अमर व्यवस्था और परिस्थिति को दोष देते हुए आत्म-मुग्ध है, उसके नजरिए में तटस्थता का नितांत अभाव है। अमर उनमें से है जो चाहते हैं कि समाज उन पर भरोसा करे, लेकिन जिन्हें खुद के करम का भरोसा नहीं। जिसे खूंटे बदलते रहना हो, ठहर कर काम न करना हो, अपने संकल्पों को मुकाम तक पहुंचाने की प्रतिबद्धता न हो, उसके लिए क्रांति के नारे बुलंद करते रहना आसान और उसका बखान और भी आसान होता है। नायक की पत्रकारिता ऐसी क्रांति है, जो अन्य करें तो शाम के अखबार की सनसनी या सत्यकथा, मनोहर कहानियां। यह भी हास्यास्पद है कि अमर की पत्रकारिता में जिन और जैसे रोमांच का बखान है, वह इन दिनों टेबुलायड पत्रकारिता में नये लड़के रोज कर रहे हैं।

पेन से लिखे और हाथों-हाथ सौंपे पत्र की प्रति

यह चुके हुए ऐसे नायक की कहानी बन पड़ी है, जिसके जीवन का क्लाइमेक्स शराब और शबाब ही है। पत्रकार अमर की कलम औरों के सान पर घिस कर नुकीली होती है और यह लेखन किसी कलम के सिपाही का नहीं, वाणीवीर (जबान बहादुर) का लगता है, क्योंकि यहां जो सरसरी और उथलापन है, वह डिक्टेशन से आया लगा (अज्ञेय जी के लेखन में कसावट और नागर जी की किस्सागोई का वक्तव्य)। इस उपन्यास के साथ अगर सचमुच लेखक और अमर का कुछ 'आत्मगाथा या आत्मसाक्ष्य' जैसा रिश्ता है फिर तो परितोष जी के बारे में अब मुझे अपनी धारणा के बदले आम तौर पर उनके बारे में लोगों की राय विश्वसनीय लगने लगी है।

आपका नाम होने के कारण ही प्रतिक्रिया लिख रहा हूं। बाजार में लगभग महीने भर से बिकती पुस्तक के विमोचन का आमंत्रण पा कर आश्चर्य हुआ था। विमोचन में छीछालेदर, परन्तु मुख्‍यमंत्रीजी का शालीन जवाब... क्या कहूं, सब आपके सामने घटित हुआ। आम आदमी भी आचरण के इस छद्‌म को देखता समझ लेता है। हां, किताब में अधिकतर निजी किस्म की चर्चाएं, पढ़ने-लिखने वालों का जिक्र है, सो किताब बिकेगी, इसलिए इसे बिकाऊ (बिकने योग्य/उपयुक्त) साहित्य कहा जा सकता है, बाजार में सफलता की कसौटी के अनुकूल। फ्लैप पर आपके नाम के बावजूद इस लेखन के साथ परितोष जी और ज्ञानपीठ के नाम पर जिज्ञासा, सवाल और संदेह बना हुआ है। निजी तौर पर मेरी शुभकामनाओं के अधिकारी परितोष जी रहे हैं, इस सब के बावजूद भी हैं।

राहुल सिंह

वैसे तो यह मेरी निजी प्रतिक्रिया है, राजेन्‍द्र मिश्र सर के प्रति, लगा कि पुस्‍तक पर एक पाठक की टिप्‍पणी भी है यह, इसलिए यहां सार्वजनिक किया है।

Wednesday, July 18, 2012

बस्तर पर टीका-टिप्पणी

एकबारगी लगा कि यह मार्च महीने में लक्ष्य प्राप्त कर लेने की आपाधापी तो नहीं, जब वित्‍तीय वर्ष 2012 की समाप्ति के डेढ़ महीने में बस्तर पर चार किताबें आ गईं। 15 फरवरी को विमोचित राजीव रंजन प्रसाद की 'आमचो बस्तर' इस क्रम में पहली थी। फिर 26 फरवरी को संजीव बख्‍शी की 'भूलनकांदा', इसके बाद 2 मार्च को ब्रह्मवीर सिंह की 'दंड का अरण्य' और अंत में 31 मार्च को अनिल पुसदकर की 'क्यों जाऊँ बस्तर? मरने!' विमोचित हुई। चारों पुस्तकों पर एक साथ बात करते हुए इस संयोग पर बरबस ध्यान जाता है कि ठेठ बस्तर पर हल्बी शीर्षक वाली आमचो बस्तर का विमोचन दिल्ली में हुआ तो अन्य तीन का रायपुर में और इन चार में, मुख्‍यमंत्री, छत्तीसगढ़ के संयुक्त सचिव संजीव बख्‍शी की कृति का विमोचन विष्णु खरे ने किया तो बाकी तीन का मुख्‍यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने।

क्यों जाऊँ बस्तर? मरने!' - अनिल पुसदकर
मंजे पत्रकार, स्वयं लेखक के शब्दों में उनकी ''किताब में ढेरों सवाल हैं, व्यवस्था पर, सरकार पर, मीडिया पर और मानवाधिकार पर भी सवाल उठाये गये हैं। किताब में बस्तर का नक्सलवाद और उससे जूझते पुलिस वालों की स्थिति का हाल सामने रखा गया है।'' इस किताब विमोचन में हर क्षेत्र के प्रतिष्ठित नागरिकों की बड़ी संख्‍या में उपस्थिति पूरे मन से है, दिखाई पड़ रही थी और ज्यादातर लोग पूरे समय शाम 4 से 7 बजे तक बने रहे। अविवाहित अनिल जी की कृति का विमोचन था, कल्पना हुई कि वे बिटिया ब्याहते तब ऐसा माहौल होता।

कार्यक्रम आरंभ होने में विलंब के दौरान पुस्तक अंश के वाचन की रिकार्डिंग बज रही थी। यह अविस्मरणीय प्रभावी था और लगा कि एकदम बोलचाल की शैली में लिखी इस पुस्तक को सुने बिना, सिर्फ पढ़ने से काम नहीं चलेगा। यानि पुस्तक के साथ इसकी आडियो सीडी भी होती तो बेहतर होता। आयोजन के मंच पर लिखे- क्यों जाऊँ बस्तर? मरने! को देखकर साथी बने अष्‍टावक्र अरुणेश ने कहा कि क्या शीर्षक में चिह्नों को बदल देना उचित नहीं होता, यानि क्यों जाऊँ बस्तर! मरने?, मुझे उनका सुझाव सहमति योग्य लगा।

दंड का अरण्य - ब्रह्मवीर सिंह
युवा पत्रकार-लेखक के मन में सवाल है- आदिवासियों की हित रक्षा की बात सभी करते हैं तो आखिर उनके विरोध में कौन है? लगभग इसी मूलभूत सवाल के लिए की गई हालातों की जमीनी तलाश में उपजा जवाब है यह रचना। अखबारी दफ्तरों की उठापटक के हवाले हो गए इस छोटी सी किताब के शुरुआती 10-12 पेज अनावश्यक विस्तार से लगते हैं। ऐसा लगता है कि यह पुस्तक बस्तर पर होने वाले लेखन में साहित्यिक अभिव्यक्तियों के प्रति गंभीर रूप से असहमत है शायद इसीलिए साहित्यिक होने से सजग-सप्रयास बचते हुए, परिस्थिति और समस्या को यहां तटस्थ विवरण, वस्तुगत रिपोर्ताज की तरह प्रस्तुत किया गया है और वह असरदार तो है ही।

भूलनकांदा - संजीव बख्‍शी
खैरागढ़-राजनांदगांव के, पदुमलाल पुन्नालाल बख्‍शी परम्परा वाले संजीव जी से मैंने 14-15 साल पहले रमेश अनुपम, आनंद हर्षुल, जयप्रकाश के साथ कांकेर में पहली बार कविताएं सुनीं और तब से उनकी कवि-छवि ही मेरे मन में जमी हुई है। बस्तर में पदस्थ रहे इस राजस्व-प्रशासनिक अधिकारी की कविताओं में अपना जिया परिवेश और संदर्भ- खसरा नंबर दो सौ उनासी बटा तीन (क), मुख्‍यधारा, मौहा जाड़ा, हफ्ते की रोशनी, बस्तर का हाट और कांकेर के पहाड़, जैसे कविता-शीर्षकों के साथ आते रहे हैं।

भूलनकांदा उपन्‍यास का विमोचन, मंच पर उपस्थित लेकिन अनबोले से विनोद कुमार शुक्ल और अपनी जवाबदारी निभाते डॉ. राजेन्द्र मिश्र के वक्तव्य सहित हुआ। मुख्‍य अतिथि विष्णु खरे का व्याख्‍यान, इस लिंक पर शब्दशः सुना भी जा सकता है, 'वागर्थ' के मई 2012 अंक में प्रकाशित हुआ है, जिसके कुछ अंश हैं-
यह गांव का उपन्यास है, पर ऐसे यथार्थ मानवीय गांव का, जो मैं नहीं समझता कि हिन्दी में इसके पहले कहीं आया हो। ... संजीव बख्‍शी ने जो भाषा बुनी है वह ऐसी नहीं है जो फणीश्वरनाथ रेणु की है। रेणु बड़े उपन्यासकार हैं, इसमें शक नहीं, लेकिन उनके यहां बहुत शोर है, तुमुल कोलाहल है, बहुत ज्यादा साउंड इफेक्ट है। ... कुल मिलाकर यह उपन्यास विनोद जी से थोड़ा हट कर, लेकिन कुछ आगे जाता नजर आता है। ... विजयदान देथा के होते हुए भी, आज तक ऐसा उपन्यास नहीं आया है। ... ऐसी सार्वजनीनता इससे पहले और कहीं नहीं आई थी, शायद प्रेमचंद के यहां भी नहीं।

प्रसंगवश, पिछले सालों में केदारनाथ सिंह ने इस रचनाकार के कविता संग्रह को कविवर विनोद कुमार शुक्ल की काव्य-परंपरा की अगली कड़ी कहा था। लेकिन यह भी जोड़ा है कि इस कवि ने विनोद जी की शैली को इस तरह साधा है कि जैसे यह कवि का अपना ही 'स्वभाव' हो। इन उद्धरणों के बीच मेरी दृष्टि में यह उपन्यास व्यवस्था से विसंगत हो जाने की जनजातीय समस्या, जिसमें धैर्य की ऊपरी झीनी परत के नीचे गहरी जड़ों वाला द्रोह सुगबुगाता रहता है, का विश्वसनीय चित्रण है।

आमचो बस्तर - राजीव रंजन प्रसाद
लंबे समय बाद इतनी भारी-भरकम, 400 से अधिक पृष्ठों की इस पुस्तक को पेज-दर-पेज पढ़ा। पुस्‍तक में (पृष्ठ 314 पर) कहा गया है कि ''मुम्बई-दिल्ली-वर्धा से बस्तर लिखने वालों ने कभी इस भूभाग को समग्रता से प्रस्तुत ही नहीं किया।'' निसंदेह, यहां बस्तर के देश-काल को जिस समग्रता के साथ प्रस्तुत करने का प्रयास किया है, उसके लिए यह आकार उपयुक्त ही नहीं, आवश्यक भी है। बस्‍तर इतिहास के प्रत्‍येक महत्‍वपूर्ण कालखंड, आदि काल से अब (पृष्ठ 331 पर 6 अप्रैल 2010) तक, को विस्तृत फलक पर प्रस्तुत इस कृति में काल-पात्रों के अलग-अलग स्तर का समानान्तर निर्वाह होता है।

मिथकीय चरित्र गुण्डा धूर और भूमकाल विद्रोह, दंतेश्‍वरी में नरबलि आदि प्रसंगों की चर्चा पर्याप्‍त विस्तार से है। पात्रों, शैलेष और मरकाम की बातचीत के माध्‍यम से बस्‍तर की समस्‍याओं, परिस्थितियों से लेकर संस्‍कृति, कहावत-मुहावरे तक का अंश भी यथेष्‍ट है। इन सब के बीच लेखक किसी दृष्टिकोण-मान्‍यता का पक्षधर नहीं दिखाई पड़ता, इससे पात्रों के विचार और कथन, उनकी अपनी विश्वसनीय और स्वाभाविक अभिव्यक्ति जान पड़ते हैं। प्रस्‍तुति में प्रवाह का ध्‍यान रखा गया है न कि कालक्रम का, लेकिन प्रवीरचंद्र भंजदेव और उनके निधन का विवरण अंत में लाना एकदम सटीक है, क्‍योंकि यही वह बिन्‍दु है, जिसके पूर्वापर संदर्भों बिना बस्‍तर के रहस्‍य का अनुमान कर पाना भी कठिन होता है।

संक्षेप में पुस्‍तक पढ़ते हुए भरोसा होता है कि लेखक न सिर्फ गंभीर और सावधान है, बल्कि उसने इस कृति में निष्ठा सहित अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। प्रूफ शुद्धि भी उल्‍लेखनीय और प्रशंसा-योग्‍य (वैसे पुस्‍तक में बार-बार 'प्रसंशा' मुद्रित) है। एक स्‍थान पर ''जहाज डूबने से पहले चूहे ही भागने लगते हैं'' (पृष्ठ 172) कहावत का प्रयोग भैरमदेव से कराया जाना जमा नहीं। आलोचना के कुछ और छिटपुट उल्‍लेख किए जा सकते हैं, लेकिन इस पुस्‍तक की सब से बड़ी कमजोरी, परिशिष्ट का अभाव, माना जा सकता है। इतिहास और तथ्‍यों को औपन्‍यासिक शैली में प्रस्‍तुत करते हुए यह उपयुक्‍त होता कि परिशिष्‍ट के कुछ और पेज जोड़ कर बस्‍तर इतिहास का कालक्रम, ऐतिहासिक पात्रों के नाम की सूची और संक्षिप्‍त परिचय भी दिया जाता, इससे पुस्‍तक की उपयोगिता और विश्‍वसनीयता बढ़ जाती। बस्‍तर पर कुछ लिखते-पढ़ते इस पुस्‍तक में आई टिप्‍पणी याद आ जाती है कि- ''इन दिनों बस्तर शब्द में बाजार अंतर्निहित है। (पृष्ठ 326) और ''अब बस्तर शब्द का लेखन की दुनिया में बाजार है।'' (पृष्ठ 337) अखिलेश भरोस द्वारा लिये चित्र का आवरण के लिए चयन, सार्थक और सूझ भरा है।

इन चारों साहित्‍य-पत्रकारिता की रचनाओं को एक साथ मिलाकर देखते हुए धारणा बनती है कि- अशांति और विद्रोह का इतिहास पढ़ते हुए महसूस होता है कि आम तौर शांत, संस्कृति संपन्न, उत्सवधर्मी लेकिन अपने में मशगूल (बस्तर का) वनवासी, अस्तित्व संकट से मुकाबिल होता है तो जंगल कानून पर अधिक भरोसा करता रहा है।

बस्तर और उसकी परिस्थितियों को समाज-ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य के साथ समझने के लिए (कम से कम) जो प्रकाशन देखना मुझे जरूरी लगता है, वे हैं- डब्ल्यूवी ग्रिग्सन, वेरियर एल्विन, केदारनाथ ठाकुर, प्रवीरचंद्र भंजदेव, लाला जगदलपुरी, डॉं. हीरालाल शुक्ल, डॉ. कृष्‍ण कुमार झा, हरिहर वैष्णव, डॉं. कामता प्रसाद वर्मा की पुस्तकें/लेखन और मार्च 1966 के जगदलपुर गोलीकांड पर जस्टिस केएल पांडेय की रिपोर्ट।

बस्तर को उसकी विशिष्टता के साथ पहचानते हुए, शोध-अध्ययन दृष्टि से महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय कार्य हैं- छत्तीसगढ़ के पहले मानवविज्ञानी डॉ. इन्द्रजीत सिंह का लखनऊ विश्वविद्यालय से किया गया गोंड जनजाति पर शोध, जो सन 1944 में The Gondwana and the Gonds शीर्षक से पुस्तक रूप में प्रकाशित हुआ। पुस्तक, बस्तर के जनजातीय जीवन की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के साथ उनके आर्थिक परिप्रेक्ष्य का तटस्थ लेकिन आत्मीय विवरणात्मक दस्तावेज है, जिसका निष्कर्ष कुछ इस तरह है- जनजातीय समुदाय के उत्थान और विकास का कार्य ऐसे लोगों के हाथों होना चाहिए, जो उनके ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य और सामाजिक व्यवस्था को पूरी सहानुभूति के साथ समझ सकें। इसी प्रकार दूसरा कार्य है, सागर विश्वविद्यालय से किया गया डॉ. पीसी अग्रवाल का शोध Human Geography of Bastar District, जो सन 1968 में पुस्तकाकार प्रकाशित हुआ और तीसरा, मध्यप्रदेश राज्य योजना मंडल द्वारा Bastar Development Plan वर्किंग ग्रुप के चेयरमैन आरसी सिंह देव के निर्देशन में सन 1984 में योजना आयोग के लिए तैयार, बस्तर विकास योजना, जिसे देख कर महसूस होता है कि इस प्रतिवेदन के अनुरूप तब इसका उपयुक्त क्रियान्वयन हो पाता तो आज शायद बस्तर कुछ और होता।


यहां आए सभी नामों के प्रति यथायोग्‍य सम्‍मान।

Friday, February 24, 2012

कैसा हिन्‍दू... कैसी लक्ष्‍मी!

देश के पुराने अंगरेजी अखबार ने हिन्‍दू नाम के साथ प्रतिष्‍ठा अर्जित की है, पिछले दिनों इस हिन्‍दू पर लक्ष्‍मी नामधारी पत्रकार ने ऐसा धब्‍बा लगाया है, जिस पर अफसोस और चिन्‍ता होती है। इस मामले का उल्‍लेख मेरी पिछली पोस्‍ट 36 खसम पर है।

रायपुर से प्रकाशित समाचार पत्र दैनिक 'छत्‍तीसगढ़ वॉच' ने इसकी सुध ली है।
20 फरवरी, मंगलवार को मुखपृष्‍ठ पर प्रकाशित समाचार 
21 फरवरी, बुधवार को अंतिम पृष्‍ठ पर प्रकाशित समाचार 
इसके अलावा ललित शर्मा जी ने फेसबुक पर तथा वरुण कुमार सखाजी ने भड़ास पर इसकी चर्चा अपने-अपने ढंग से की है। इस बीच पूरे मामले को गंभीरता से लेते हुए अध्‍यक्ष, छत्‍तीसगढ़ राज्‍य महिला आयोग के हस्‍ताक्षर युक्‍त प्रेस विज्ञप्ति में उल्‍लेख है कि आयोग, लेखिका को नोटिस जारी कर स्‍पष्‍टीकरण मांगेगा और कार्यवाही करेगा।
इस संचार युग में यह खोज-खबर 'द हिन्‍दू' को होगी ही, लेकिन शायद बड़े पत्र-पत्रकार को 'छोटी-मोटी' बात की परवाह कहां... सवाल कि ये कैसा हिन्‍दू और ये कैसी लक्ष्‍मी है?

Saturday, February 18, 2012

36 खसम

छत्‍तीसगढ़ से जुड़ी किंवदंती? पर दो स्‍थानीय लोगों की उत्‍तेजक बातचीत से आह्लादित पत्रकार सुश्री लक्ष्‍मी शरथ (Lakshmi Sharath) ने बस्‍तर, छत्‍तीसगढ़ पर यात्रा-वृत्‍तांत लिखा है, शीर्षक है - CHATTISGARH: Watching in delight as two locals heatedly discuss the legend associated with the State

लेख में कहा गया है- The local women saw Sita with two men and exclaimed she had two husbands. “Sita immediately retorted that each of these women will have Chattison (36) husbands,” says Mumtaj as we break into laughter. Toppoji and Mumtaj continue to discuss how most women in Chhattisgarh do have multiple husbands, although Mumtaj adds hurriedly: “Not everybody though.

अनुवाद कुछ इस तरह होगा- ''स्थानीय महिलाओं ने दो पुरुषों के साथ सीता को देखा और कहा कि इसके तो दो पति हैं, सीता ने तत्‍क्षण व्‍यंग्‍यपूर्वक कहा, इनमें से प्रत्येक औरत के छत्‍तीसों (36) पति हों। मुमताज के ऐसा कहते ही हम ठठाकर हंस पड़े । टोप्‍पोजी और मुमताज आगे बात करते रहे कि कैसे छत्‍तीसगढ़ की अधिकतर महिलाओं के बहुत सारे खसम होते हैं यद्यपि, मुमताज ने जल्‍दी से कहा, सबके साथ नहीं।''
सुश्री शरथ ने लांछनापूर्ण लेखन कर, बरास्‍ते विवाद, धार्मिक भावना और छत्‍तीसगढ़ की अस्मिता को चोट पहुंचाने का भर्त्‍सना-योग्‍य तथा अभद्र कार्य किया है। पाश्‍चात्‍य बौद्धिक जगत से प्रेरित, भ्रमित और गैर-जिम्‍मेदार लेखक, तात्‍कालिक प्रसिद्धि और बिकाऊपने के लिए ईश निन्‍दा का भी रास्‍ता अपना लेते हैं, उनका यह लेखन चर्चित होने का ऐसा ही ओछा और सस्‍ता हथकण्‍डा दिखता है।

'द हिन्‍दू' जैसे अखबार में ऐसी सामग्री प्रकाशित होना चिंताजनक है और इस पूरे मामले में मुझे (बस्‍तर, छत्‍तीसगढ़ में रहे श्री पा ना सुब्रहमनियन तथा छत्‍तीसगढ़ में रचे-पचे डा. बी के प्रसाद सहित), हम सबके मर्यादित बने रहने पर अफसोस हो रहा है।

Sunday, October 30, 2011

हमला-हादसा

18 अक्टूबर की शाम लखनऊ में घटित, अरविंद केजरीवाल वाली घटना के बाद समाचारों में हमला और हादसा शब्द बार-बार आने लगा।
घटना, हमला और हादसा न कही जाए तो समाचारों की दुनिया सूनी होने लगती है शायद, क्योंकि बात चप्पल-जूते चलने तक हो तो यह कोई समाचार हुआ, वह तो कहीं भी, कभी भी हो जाता है।
अखबारों में यह खबर मुखपृष्ठ पर प्रमुखता से छापी गई थी, लेकिन (गनीमत रही कि) एक अखबार जो हमला-हादसा शब्द से बच रहा था, वह 'चप्पल चला दी' और 'चप्पल फेंक कर मारी' तक सीमित रहा, किन्‍तु इस अखबार में खबर एक कालम में सिमट गई है।

खबरों में बताया गया है कि अन्ना ने इसे लोकतंत्र पर हमला कहा है। यह भी कि श्री केजरीवाल पर हमले के बाद जितेंद्र की इंडिया अगेंस्ट करप्शन के सदस्यों ने जम कर पिटाई की। बाद में श्री केजरीवाल ने हमलावर को माफ भी कर दिया।
इस संदर्भ में कुछ सवाल हैं-
? हमला, हादसा और हमलावर शब्द का इस्तेमाल,
? घटना को लोकतंत्र पर हमला कहा जाना,
? इंडिया अगेंस्ट करप्शन के सदस्यों द्वारा जितेंद्र की जम कर पिटाई,
? पीटने वाले सचमुच इंडिया अगेंस्ट करप्शन के सदस्य थे,
? ऐसी जम कर पिटाई भी 'हमला' कही जा सकती है,
? जितेंद्र की पिटाई पर वक्‍तव्‍य/कार्रवाई।

ऐसा हर ''हमला-हादसा'' मेरी दृष्टि में असहमति-योग्‍य है।

इस बीच यह भी खबर है कि 6 नवम्‍बर 2001 को नागपुर में अरविंद केजरीवाल का भाषण हुआ और इस मौके पर 'घंटानाद' संस्‍था के कार्यकर्ताओं द्वारा विरोध किए जाने पर उनके कार्यकर्ताओं ने विरोधियों की जम कर पिटाई की है।
(समाचार पत्र 'आज की जनधारा', रायपुर के ब्‍लॉगकोना स्‍तंभ में 27 नवंबर 2011 को प्रकाशित)

Friday, July 22, 2011

सूचना समर

सूचना का महत्व सदैव रहा है, किन्तु सूचना और सूचक की भूमिका ने जैसा रुख पिछले दशकों में अख्तियार कर लिया है, उसे सूचना समर कहा जाना ही उपयुक्त लगता है। सूचकों द्वारा बरते जा रहे शब्दों में यह पूरी तरह से साफ-साफ दिखाई पड़ता है। सद्‌भावना विकसित और स्थापित करने के उद्देश्य से आयोजित खेल की खबरों में पहले तो पहलवानी अखाड़े के मुहावरे इस्‍तेमाल होते रहे- दूसरे दल, विरोधी को पछाड़ा जाता, पटखनी दी जाती, चारों खाने चित्‍त कर धूल चटाया जाता। अब खेल-खबरों में दुश्‍मन को दांत खट्टे कर मजा तो चखाया ही जाता है, टांग और कमर तोड़ते हुए फतह भी होती है, रौंदकर मटियामेट किया जाता है, भारत और श्रीलंका के मैच राम-रावण युद्ध बन जाता है। इस दौर में संजय द्विवेदी का संकलन 'इस सूचना समर में' मीडिया की नब्ज पर रखी वह उंगली है, जो पाठक को सहज ही बीमार का हाल बता देती है। संकलन की सभी 66 टिप्पणियां, मूलतः 5-6 वर्षों में अलग-अलग लिखी गई सूचना की आवश्यकता-पूर्ति के लिए की गई रचनाएं हैं।
इस समर के और दो पहलुओं का उल्लेख प्रासंगिक होगा। कबीर कहते थे- 'तू कहता कागज की लेखी, मैं कहता आंखन की देखी'। ताल-ठोंक, ठेठ लहजे में कही गई बात अब उलटबांसी लगती है। कुछ वर्षों पूर्व समाचार के रूप में पढ़े और सुने जाने वाले शब्दों को विश्वसनीय बनाने के लिए तथ्य-सूचना एकत्र कर खबर गढ़ी जाती थी लेकिन अब, जब खबरों के दृश्य माध्यम का चलन बढ़ गया है, 'आंखन देखी' के लिए फाइल चित्र भी सहज-सच्चे बन जाते हैं या किसी घटना के दौरान संयोगवश विसंगत कोई दृश्य मिल जाने पर वह समाचार को एक्सक्लूसिव बना देता है और ऐसे दृश्य से बहुधा घटना की अविश्वसनीय व्याख्‍या भी हो जाती है। समाचार दर्शक को इस पर विश्वास करना ही पड़ता है, 'आंखन देखी' जो है।

विचारणीय पहलू यह भी है कि आतंक, हिंसा और दंगा क्षेत्रों से सनसनीखेज खबरें ही आती हैं, सौहार्द-प्रसंग नहीं, अगर आए तो समाचार का वैसा दर्जा उन्हें नहीं मिल पाता क्‍योंकि वह समाचार नहीं, साफ्ट स्टोरी है। रिपोर्टर भी क्या करे, कंपनी ने उसे खर्च कर मौके पर इसलिए तो भेजा नहीं है कि वह दंगा क्षेत्र से अमन का पैगाम ले कर आए, वह तो आया है अधिक से अधिक क्रूर और वीभत्स, उन्माद और हिंसा के जीवंत दृश्य के फुटेज इकट्ठा करने। अन्ततः, रोमांचक नजारों के साथ सनसनीखेज खबरें, साम्प्रदायिक खतरनाक स्थितियों सहित आशंकापूर्ण भविष्य की झांकी गढ़ डालती हैं और ऐसे परिणाम लाती हैं, जो लक्षित कतई नहीं होता।

पुस्तक के दो खण्डों में 'राजनीति' और 'लोग' हैं। 'राजनीति' में, तत्कालीन राजनैतिक स्थितियों और दलों पर न सिर्फ बेलाग टिप्पणी है, बल्कि सटीक विश्लेषण भी किया गया है। यह विश्लेषण अखबारी होते हुए भी तत्कालीन परिस्थितियों से उपजी प्रतिक्रिया का 'हॉट केक' नहीं है, इसलिए समय बीत जाने पर भी प्रासंगिक और पठनीय है। 'लोग' खण्ड विशेष उल्लेखनीय है, जिसमें राजनीतिज्ञों के साथ-साथ, सामाजिक सरोकार रखने वाले अन्य चरित्रों का भी चित्रण है। व्यक्तित्वों में सुभाषचंद्र बोस और राममनोहर लोहिया से लेकर निर्मल वर्मा और अरूंधती राय सहित टी.एन. शेषन और राष्ट्रीय प्रमुख नेताओं को एक साथ रखना अपने आप में उल्लेखनीय है। इन सभी व्यक्तित्वों के मूल्यांकन का आधार मुख्‍यतः उनकी कथनी नहीं, बल्कि उनकी करनी को बनाया गया है इसलिए यह न्यायोचित हो जाता है, विशेषकर इसलिए भी, जब उनके मानवीय सकारात्मक पक्षों पर अधिक बल देते हुए उस पर गंभीरता से विचार किया गया हो।

'राजनीति' खण्ड के कुछ शीर्षकों का उल्लेख आवश्यक है, जो आकर्षक तो हैं ही अर्थवत्ता और रचना की गहराई का आभास कराने में भी समर्थ हैं। यह एक ऐसा महत्वपूर्ण बिन्दु है जहां संजय की लेखनी पत्रकारिता और साहित्य की रूढ़ सीमा को झुठलाती हुई, पाठक को इस भेद के मात्र आभासी होने का विश्वास दिला देती है। इस खण्ड के कुछ शीर्षक हैं- लालकिला केसरिया होगा, सोनिया को सराहौं या सराहौं सीताराम को, कौरवों ने फिर किया अभिमन्यु वध या कौन काटेगा नफरत के ये जंगल; किन्तु एक संवेदनशील पत्रकार की उकताहट 'इस फिजूल बहस से फायदा क्या है ?' जैसे शीर्षक में झलक जाती है।

कुछ शब्द और जुमलों की आवृत्ति बार-बार हुई है। अलग-अलग प्रकाशित होने पर यह रचनाकार की शैली या उसे आकर्षित करने वाले शब्द माने जाते और खटकते भी नहीं, किन्तु संकलन में पढ़ते हुए, इनका दुहराया-तिहराया जाना, बाधा डालता है। संभवतः इन रचनाओं को संकलन के लिए संपादित करने के बजाय यथावत रखे जाने से ऐसा हुआ है।

संक्षेप में 'समर' के इस माहौल में भी टकसाली शब्दों के साथ संतुलित विश्लेषण और संयत रचनात्मक दृष्टि के कारण संकलन प्रभावित करता है। राष्ट्र और राजनीति के ऐसे 'टर्निंग प्वाइन्ट', जो सूचना समर में 'बैनर' न बनें, लेकिन दूरदर्शी के लिए विचारणीय बिन्दु होते हैं और उनका महत्व भी दीर्घकालिक होता है, ऐसी सामग्री का समावेश ही इस पुस्तक को पठनीय और संग्रहणीय बनाता है।

2003 में प्रकाशित इस पुस्तक को पढ़ कर, मेरे द्वारा उसी समय लिया गया नोट, जिसमें पुस्‍तक पर कम और पुस्‍तक के बहाने मीडिया पर अपनी सोच की बात अधिक है, मेरी जानकारी में अब तक अप्रकाशित भी है, इसकी प्रति संजय जी को दी थी या नहीं, याद नहीं।

Friday, March 11, 2011

सबको सन्मति ...

राष्ट्रीय स्तर पर उपजी विसंगत स्थितियों का विचार करते हुए ईश्वर के बहाने गांधी ही याद आते हैं, यही कारण होगा कि मायाराम सुरजन जी के संकलन का शीर्षक है-'सबको सन्मति दे भगवान', मानों गांधीजी की प्रार्थना सभा । पुस्तक में अस्सी के दशक और नब्बे के शुरूआती वर्षों में हुई सामाजिक उथल-पुथल की पड़ताल करते लेख हैं। यह कालखण्ड है- अयोध्या विवाद, शहबानो, काश्मीर, सिख और तथाकथित ईशपुरूषों का, साथ ही रायपुर से जुड़े तत्कालीन कुछ प्रसंग, जो भारतीय सामाजिक दशाओं की निगरानी के लिए 'इण्डेक्स' माने जा सकते हैं, ऐसे ही मुद्‌दों पर वैचारिक विमर्श, इस पुस्तक में संग्रहित है। इस तरह पुस्तक की प्रकृति स्वयं 'विश्लेषण और टिप्पणी' की है, अतः अब टिप्पणी के बजाय इसकी अंतरधारा पर चर्चा अधिक समीचीन होगी।

फ्लैप का वाक्य है- ''सारी सांस्कृतिक परम्पराएं जैसे राजनीतिक एवं सामाजिक वहशीपन का शिकार होती जा रही है।'' तल्ख लगने वाली यह टिप्पणी गंभीर विचार के लिए उकसाती है। धर्म निरपेक्ष राष्ट्र, भारत- धर्म प्रधान देश है, जिसका इतिहास धार्मिक-सामाजिक समरसता के प्रमाणों से सराबोर है, किन्तु इतिहास और परम्पराओं की चर्चा में तथ्यों का चयन और उनकी व्याख्‍या, बहुधा युगानुकूल और जरूरतों के अनुसार ही होती है। यही कारण है कि 'सत्यार्थ प्रकाश', अपने प्रकाशन काल में धर्मों के तार्किक विश्लेषण का महत्वपूर्ण ग्रंथ, आज कथित उदारता और विकास के दौर में खतरनाक विस्फोटक सामग्री जैसा माना जा सकता है।

'धर्म' की पृष्ठभूमि पर रचित कौटिल्य का 'अर्थशास्त्र', वस्तुतः 'राजनीति' का ग्रंथ है। यह अपने आप में स्पष्ट करता है कि यदि समाज का ढांचा आपसी मानवीय संबंध के ताने-बाने पर खड़ा होता है तो वृहत्तर सामाजिक प्रसंग, धर्मसत्ता, अर्थसत्ता और राजसत्ता के माध्यम से आकार लेते हैं, इसलिए इन तीनों सत्ताओं का आपसी तालमेल स्वाभाविक है। पुस्तक में विश्लेषण के ऐसे संकेत लगातार विद्यमान हैं और जहां भी विशेषकर राजसत्ता और धर्मसत्ता का घालमेल हुआ है, उसे प्रखर टिप्‍पणी सहित रेखांकित किया गया है। 'अर्थ' की जमीन पर खड़े 'राज' के सिर पर 'धर्म' का वितान होता है, यह समाज की सम्यक दशा भी मानी जा सकती है, किन्तु इसका व्यतिक्रम कैसे बखेड़े पैदा करता है, उसका दस्तावेज यह पुस्तक है।

पुस्तक का एक महत्वपूर्ण और विचारणीय पक्ष विधायिका, कार्यपालिका से आगे न्यायपालिका और सबसे ऊपर जनता की आवाज पर बातें हैं। प्रजातंत्र के चौथे स्तंभ, अखबार से यह अपेक्षा भी स्वाभाविक है। न्यायपालिका के हस्तक्षेप की स्थिति निर्मित होना या अनावश्यक न्यायपालिका का मुंह ताकना, इस पर उच्चतम न्यायलय द्वारा एकाधिक बार टिप्पणी की जा चुकी है। इस दौर में यह भी गंभीर विचारणीय प्रश्न है कि घटनाएं और मीडिया की खबरें यदि झुठलाई नहीं जा सकती, तो क्या वे इतनी भी सच होती हैं कि उसे जनता की आवाज मान लिया जाय ॽ हाल के अनुभव से तो घटनाएं, और विशेषकर मीडिया में स्थान प्राप्त घटनाएं, जनता की आवाज का सच नहीं मानी जा सकतीं। यदि एक हकीकत यह है कि घटनाओं का विस्तार अक्सर आयोजित-प्रायोजित होता है, स्वाभाविक नहीं, तो दूसरी तरफ मीडिया के लिए 'उन्माद' की तुलना में 'सद्‌भाव' के खबर बनने की संभावनाएं भी कम होती हैं, यह संकट भी दिनों-दिन गहरा रहा है। धर्मरहित व्यक्ति के लिए धर्म-निरपेक्षता का ढोंग आसान होता है और गैर के धर्म की निंदा के लिए भी यही नकाब काम आसान करता है। मीडिया की तटस्थता और निष्पक्षता का नकाब, रोमांचक और आकर्षक खबर परोसने की राह आसान बना देता है। (बड़े खर्च के साथ मौके पर पहुंच कर सनसनी वाली खबर न निकले, तो बात कैसे बनेगी ॽ)

धर्म की उत्पत्ति भय से हुई है, इस पर मतैक्य नहीं है, किन्तु इसमें कोई दो मत नहीं कि इतिहास में बारम्बार और इस दौर में विशेषकर धर्म के साथ संकट, आशंका और भयोन्माद का माहौल रचकर धर्म के फलने-फूलने की तैयारी दिखायी देती है। ऐसा लगता है मानों हमारे देश में दैनंदिन जीवन की आवश्यकताओं के लिए सभी संतुष्ट हैं, अन्यथा मानसिक रूप से स्वावलम्बी स्थिति है, क्योंकि ऐसे कारक सामाजिक स्तर पर संवेदना के कारण नहीं बन पाते, किन्तु धार्मिक मामलों में पूरा देश बहुत जल्दी आश्रित होकर किसी व्यक्ति, किसी मुद्‌दे, किसी अफवाह की गिरफ्त में आ जाता है। यदि सामाजिक गतिशीलता के मुद्‌दे रोजमर्रा की जरूरतें हों, तब शायद स्थिति बदल सकती है।

फिर भी जैसा कि पुस्तक के आरंभ में कहा गया है कि इसमें सांप्रदायिकता और धर्मांधता के खिलाफ लिखे गए लेख संकलित हैं। समाचार पत्र में समय-समय पर छपे इन लेखों की अंतरधारा स्पष्ट है और इसका पुस्तकाकार प्रकाशित होना स्वागतेय है, क्योंकि इन लेखों का महत्व दैनिक और स्फुट मात्र नहीं, बल्कि दीर्घकालिक और स्थायी स्वरूप का है।

सन 2002 में पाठक मंच, बिलासपुर के लिए मेरे द्वारा तैयार की गई, अब तक अप्रकाशित पुस्‍तक चर्चा। लगा कि पुस्‍तक न पढ़ पाए हों, उनके लिए स्‍वतंत्र लेख की तरह पठनीय है, सो अब यहां प्रस्‍तुत।

Monday, December 6, 2010

खबर-असर

खबरदार, आपके आस-पास खबरी हैं तो आप, आपकी हरकत या ना-हरकत भी खबर बन सकती है, क्योंकि खबरें वहां बनती हैं जहां खबरी हों जैसे पोस्ट वहां बन सकती है जहां ब्लॉगर हो। खबरों के लिए घटना से अधिक जरूरी खबरी हैं और कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि ब्लॉगर की तो पोस्ट अच्छी बनती ही तब है जब कोई मुद्‌दा न हो, वरना 'मीनमेखी' (सुविधानुसार इसे 'गंभीर टिप्पणीकार' पढ़ सकते हैं) पोस्ट को पूर्वग्रह से ग्रस्त अथवा बासी मान लेते हैं।

यह सूक्ति या थम्ब रूल बनाने का प्रयास नहीं, एक सचित्र खबर को पढ़ते हुए लगा कि कोई ब्लॉग पेज तो नहीं देख रहा हूं फिर इसका कैप्‍शन सोचते-सोचते इसकी लंबाई बढ़ गई, बस। पहले यह देखें-

अब सीधे विकल्प पर आइए-

1/ खबर पर ब्लॉग का असर है,
2/ किसी ब्लॉगर की लिखी खबर है,
3/ यह खबर कम ब्लॉग पोस्ट अधिक है,
4/ ब्लॉग पोस्ट और खबर के बीच का फर्क कम हो रहा है।

असमंजस है कि क्या चारों सही या सभी गलत का विकल्प भी दिया जाना चाहिए। अपनी भूमिका भी आप ही चुनें- बिग बी, हॉट सीट या क्विज मास्टर। हां! लेकिन किसी ईनाम-इकराम की गुंजाइश नहीं है, यहां।

यहां किसी ब्लॉगर सम्मेलन के लिए टॉपिक तय करने की कवायद भी नहीं है, यह तो यूं ही, कुछ भी, कहीं भी टाइप है, लेकिन खबरों पर नजर रखने वाले और खबरों की खबर लेने वालों के साथ सभी पहेली-बुझौवलियों को विशेष आमंत्रण।