Sunday, February 27, 2022

एक चिड़िया अनेक चिड़िया

पक्षी, हमारे देश के साहित्य और संस्कृति का अभिन्न हिस्सा रहे हैं। हंस के नीर-क्षीर विवेकी होने का मूल शुक्ल यजुर्वेद है, जिसमें उसे पानी से सोम अलग कर सकने की क्षमता वाला बताया गया है। चक्रवाक यानि चकवा-चकवी जोड़े के दाम्पत्य प्रेम का आधार भी वैदिक साहित्य से आया है। ‘उल्लू‘ के लिए वक्र दृष्टि वैदिक काल से रही है, संभवतः उसकी बोली के कारण। वैदिक संहिता, ब्राह्मण और आरण्यक, उपनिषदों में एक तैत्तिरीय है, जो तीतर पक्षी के नाम पर है और इस तरह वैदिक साहित्य में तित्तिर, तित्तिरि (कपिंजल) अर्थात तीतर के नाम का महत्व सबसे अधिक है। उपनिषद में एक डाल पर बैठे, कर्ता और भोक्ता रूप वाले दो पक्षियों का उल्लेख आता है, इसी प्रकार शिकारी के बाण से बिंधे पक्षी को देख, व्यथा से महाकाव्य का जन्म होता है। गीता में कृष्ण स्वयं को पक्षियों में वैनतेय- विनतानंदन गरुड़ बताते हैं। इसी गरुड़ का वामपक्ष, बायां डेना, वृहत्साम-लोक है और दायां दक्षिणपक्ष रथन्तर-शास्त्र। यों भी, शुक और काकभुशुंडी के बिना कौन सी कथा संभव है! 

रामचरित मानस अरण्यकाण्ड में राम की विरह-व्यथा के चित्रण में कहा गया है कि ‘कोयलें कूज रही हैं। वही मानों मतवाले हाथी हैं। ढेक और महोख पक्षी मानों ऊँ और खच्चर हैं। मोर, चकोर, तोते, कबूतर और हंस मानों सब सुंदर अरबी घोड़े हैं। तीतर और बटेर पैदल सिपाहियों के झुंड हैं। पपीहे भाट हैं, जो विरुद गान करते हैं। जलमुर्गे और राजहंस बोल रहे हैं। चक्रवाक, बगुले आदि पक्षियों का समुदाय देखते ही बनता है। सुंदर पक्षियों की बोली बड़ी सुहावनी लगती है, मानों राहगीरों को बुला रही हों। कोयलों की कुहू कुहू रसीली बोली सुनकर मुनियों का भी ध्यान टूट जाता है। इसी तरह किष्किन्धाकाण्ड में चक्रवाक, चकवा, चातक, चकोर जैसे पक्षियों के साथ ऋतु, मनोभाव और पक्षियों के व्यवहार-लक्षणों का रोचक उल्लेख- 'जानि सरद ऋतु खंजन आए। पाइ समय जिमि सुकृत सुहाए।।' आया है। 

जातक कथा में तीसरे परिच्छेद के अंतर्गत द्वितीय-कोसिय वर्ग का अंतिम जातक, उलूक जातक है, जिसमें उल्लू और कौवों के बैर की कहानी बताई गई है। उल्लू को पक्षियों का राजा चुने जाते हुए एक कौवा टोक कर कहता है- 
न मे रुच्चति भद्दं वो उलुकस्साभिसेचनं, अकुद्धस्स मुखं पस्स, कथ कुद्धो करिस्सति।। अर्थात, 
हे भद्रों! उल्लू का अभिषेक मुझे अच्छा नहीं लगता। अभी क्रुद्ध नहीं है तब इसका मुख देखिए, क्रुद्ध होने पर क्या करेगा?, इस आपत्ति से उल्लू के बजाय हंस पक्षियों का राजा बनता है और उल्लू, कौवों से बैर ठान लेते हैं।

छायावाद के प्रवर्तक पद्मश्री सम्मानित छत्तीसगढ़ के कवि मुकुटधर पांडेय थे, जिन्होंने यहां आने वाले प्रवासी पक्षी ‘डेमाइजल क्रेन‘ पर ‘कुररी के प्रति‘ शीर्षक से कविता रची थी-
‘बता मुझे ऐ विहग विदेशी अपने जी की बात, पिछड़ा था तू कहां, आ रहा जो इतनी रात।‘ 
खरौद के पं. कपिलनाथ मिश्र द्वारा छत्तीसगढ़ी कविता ‘खुसरा चिरई के बिहाव‘ रची गई थी, जो मानों पूरा पक्षीकोश ही नहीं, उनके व्यवहार-स्वभावगत आचरण का मानवीकरण भी है। खुसरा गीत अन्य कई तरह से भी गाया-सुनाया जाता है। छत्तीसगढ़ में पंडकी के साथ कलां, खुर्द, डीह, पाली, पारा, डीपा, भाट, पहरी जुड़कर, इसी तरह कुकरा के साथ झार, पानी, चुंदा जुड़कर और परेवा के साथ पाली, डोल, डीह जुड़कर ग्राम नाम बने हैं। गरुड़डोल, चिड़ियाखोह, चिरई, चिरईपानी, चिरईखार, सोन चिरइया, रनचिरई, हंसपुर, लवा, गुंडरू, घुघुवा, मंजूर पहरी, चिरहुलडीह, लिटिया, गिधवा, छछान पैरी जैसे पक्षियों पर आधारित नाम वाले अनेक ग्राम हैं ही, महासमुंद जिले में मुख्य राजमार्ग पर नवागांव में पहाड़ी पर छछान माता का मंदिर है। छत्तीसगढ़ में पक्षियों की लगभग 450 प्रजातियां और उनकी बड़ी संख्या है। 
सभी तस्वीरें रायपुर-बिलासपुर के आसपास,
कैनन-पावर शाट या निकान-प्वाइंट एंड शूट से, ली गई हैं।
कैमरे का उपयोग मेरे लिए
फोटोग्राफी से कहीं अधिक डाक्यूमेंटेशन के लिए
और बॉयनाकुलर जैसा है।

राज्य के विभिन्न स्थानों में इस क्षेत्र में स्वैच्छिक रुचि से कार्य कर रहे लोगों, शासकीय, अशासकीय संस्थाओं, संगठनों, समूहों जैसे वन विभाग, संग्रहालयों के साथ साथ प्रकाशित साहित्य आदि स्रोतों में उपलब्ध जानकारियों का लगातार संकलन अपेक्षित है। इसके तहत पक्षियों के विभिन्न आवासीय क्षेत्र, जैसे वन, दलदली भूमि, जलाशयों, बंजर मैदान, घास के मैदान, उद्यान, खेत आदि जगहों से पक्षियों की उपस्थिति और उनकी जानकारी, स्थानीय स्वैच्छिक रुचि वाले लोगों की मदद से संभव है। पंछी-निहारन, सर्वेक्षण का समय बरसात, ठंड और गरमी, तीनों ऋतुओं को ध्यान में रखा जाता है, ताकि स्थानीय पक्षियों के साथ साथ ऋतुओं के अनुरूप प्रवास पर आने वाले सभी पक्षियों की जानकारी भी एकत्र हो।

पक्षी, हमारे पर्यावरण के अभिन्न आवश्यक अंग हैं साथ ही कृषि-वनस्पति को नुकसान पहुंचाने वाले कीट-पतंगे, पक्षियों के भोजन हैं, जिससे ये हमारे लिए अत्यंत उपयोगी हैं। वनस्पतियों में फूलों के परागण, निषेचन तथा बीजों को फैलाने में भी पक्षियों की भूमिका होती है। पक्षियों में रुचि का आम जन समुदाय तक विस्तार होने से पक्षियों की तथ्यात्मक स्थिति के साथ साथ उनके संरक्षण एवं संवर्धन की दिशा में भी मदद होती है और यह पर्यावरण की ओर जागरूकता के लिए बड़ा योगदान साबित होता है, इस दृष्टि से इसमें समाज के सभी वर्गों का जुड़ाव अपेक्षित है।

कुछ वर्ष पूर्व मेरे द्वारा तैयार किया गया नोट
- - - - 

छत्तीसगढ़ में पक्षी-प्रवास और नवा रायपुर 

‘बता मुझे ऐ विहग विदेशी अपने जी की बात, पिछड़ा था तू कहां, आ रहा जो इतनी रात।‘ मुकुटधर पांडेय की, छत्तीसगढ़ आने वाले प्रवासी पक्षी पर रची छायावाद की आरंभिक कविता ‘कुररी के प्रति‘ जुलाई 1920 में हिन्दी की प्रसिद्ध साहित्यिक पत्रिका सरस्वती में प्रकाशित हुई थी। कवि फिर से कहता है- ‘ विहग विदेशी मिला आज तू बहुत दिनो के बाद, तुझे देखकर फिर अतीत की आई मुझको याद।‘ खरौद के पं. कपिलनाथ मिश्र की छत्तीसगढ़ी कविता ‘खुसरा चिरई के बिहाव‘ एक दौर में लोगों की जबान पर चढ़ी कविता थी। शीतकाल में प्रवासी, खासकर जलीय पक्षियों की विभिन्न प्रजाति राज्य के जलाशयों में डेरा डाले होते है, इस समय नवा रायपुर के पुराने अड्डों में भी ये रंग-बिरंगे प्रवासी मेहमान देखे जा सकते हैं। इस परिप्रेक्ष्य में राज्य के राजधानी क्षेत्र के बदलते नक्शे के साथ जैव-विविधता और खास कर पक्षियों की दृष्टि से रोचक और समृद्ध इस क्षेत्र पर दृष्टिपात प्रासंगिक है।

छत्तीसगढ़ में गिधवा और रायपुर के परसदा तथा मांढर के इलाके को पक्षी संरक्षण क्षेत्र घोषित करने पर विचार होता रहा है। यह भी विचार होता रहा है कि पक्षी संरक्षण क्षेत्रों सहित नवा रायपुर में भी ऐसी प्रजातियों के वृक्ष लगाए जाएं, जिनके फलों और फूलों की ओर पक्षी आकर्षित होकर बसेरा बना सकें। नया रायपुर सुनियोजित, हरित एवं आधुनिक शहर कहा जाता है। यहां 55 से अधिक तालाबों के गहरीकरण और सौंदर्यीकरण की योजना है। नवा रायपुर के ग्राम झांझ (नवागांव) में लगभग 270 एकड़ जलाशय के मध्य में पक्षियों के लिए छोटे-छोटे नेस्टिंग आइलैण्ड बनाने पर विचार किया गया है। झांझ और सेंध जलाशय का क्षेत्र लगभग 100 हेक्टेयर का है।

नवा रायपुर के सेंध जलाशय और किनारा, पक्षियों की दृष्टि से महत्वपूर्ण है, साथ ही खडुआ तालाब तथा आसपास के क्षेत्र में विभिन्न पक्षियों का डेरा रहता है। राजधानी सरोवर और कया बांधा भी पक्षियों के निर्वाह केंद्र हैं। 230 हेक्टेयर क्षेत्र में विकसित जंगल सफारी के 18 हेक्टेयर क्षेत्र में जलीय पक्षी विहार का है। जंगल सफारी के पास केन्द्री गांव का मैदान-भांठा और तेंदुआ भी पक्षियों के लिए उपयुक्त है, जहां मौसम अनुकूल पक्षी देखे जा सकते हैं। सामान्यतः न दिखने वाली कुछ पक्षी प्रजातियां स्टार्क, आइबिस, प्रेटिनकोल, सैंडग्राउज, कोर्सर आदि नवा रायपुर में आसानी से दिख जाती हैं, इसी प्रकार शीतकालीन प्रवासी पक्षी भी यहां जलाशयों में आते हैं। अन्य पक्षियों की विभिन्न प्रजातियां, बड़ी संख्या में यहां हैं और आसानी से दिखती हैं। 

नवा रायपुर पर्यावरण अनुकूल शहर के रूप में विकसित किया जा रहा है, आधारभूत संरचनाओं और अन्य विकास कार्यों के साथ पर्यावरणीय स्थितियों को सहेजना, बनाए रखना, एक चुनौती है। ध्यान रखना होगा कि यहां विकास-निर्माण के बावजूद खुले मैदान, जलराशि और हरियाली बनी रहे। यह इस क्षेत्र की जैव-विविधता को बचाए रखने के साथ इसे एक आदर्श आधुनिक बसाहट के रूप में विकसित और स्थापित करने में सहायक-आवश्यक होगा। 

कुछ वर्ष पूर्व मेरे द्वारा तैयार किया गया यह एक अन्य नोट, आंशिक संशोधन सहित 
- - - - 

छत्तीसगढ़ में पक्षियों के साथ बीता साल-2015 

फेसबुक पेज BIRDS & WILDLIFE OF CHHATTISGARH के सदस्यों की संख्या इस साल 2015 में तेजी से बढ़ कर 1350 पार कर गई है और इसके सार्थक और उत्साहवर्धक परिणाम भी आए हैं। छत्तीसगढ़ के पक्षियों पर केएनएस चौहान और इला फाउंडेशन की पुस्तकों का जिक्र होता रहा, लेकिन पक्षी-प्रेमियों को ये आसानी से उपलब्ध नहीं हुई, यही स्थिति डा. एससी जेना की पुस्तक के साथ रही।

सत्तर पार कर चुके अरुण एम के भरोस और भरोस परिवार की सक्रियता हमेशा उल्लेखनीय रही है, वह वैसी ही बनी हुई है और छत्तीसगढ़ के पक्षी जगत की शोध स्तरीय अधिकृत जानकारियां, उनके माध्यम से गंभीर प्रकाशनों में शामिल हो रही हैं। ‘छत्तीसगढ़ वाइल्ड लाइफ सोसाइटी’ के सौरभ अग्रवाल की गतिविधियों की जानकारी सोशल मीडिया पर कम रही, लेकिन मोहित साहू और अमित खेर के साथ मयूर रायपुरे भी जुड़े और उनकी पक्षी-तस्वीरों की प्रविष्टियां आती रहीं।

रायपुर में सोनू अरोरा तस्वीरों, जानकारियों और फेसबुक जिम्मेदारियों में पहले की तरह महत्वपूर्ण भूमिका में रहे। युवा अविजीत जब्बल के बाद पहल करते दसवीं कक्षा के छात्र सिफत अरोरा ने डबलूआरएस से यूरेशियन रोलर की तस्वीर ला कर सब को चौंकाया और आठवीं कक्षा के आर्यन प्रधान ने भी आशाजनक दस्तक दी।

इसी तरह बस्तर से सुशील दत्ता ने हिल मैना के झुंड की फोटो ला कर नई और ठोस उम्मीद जगाई, उनके साथ पीआरएस नेगी का भी उल्लेेखनीय योगदान रहा और छत्तीसगढ़ में पक्षियों की कई अल्पज्ञात प्रजातियों की प्रामाणिक उपस्थिति दर्ज कराई। डेमोसिल क्रेन यानि कुररी, मलाबार पाइड हार्नबिल, डेजर्ट व्हीटियर, ब्लैक/ब्राउन हेडेड गल की उपस्थिति और अपमार्जक यानि स्केवेन्जर इजिप्शियन वल्चर की बढ़ती संख्या ने नई उम्मीदें जगाई हैं। बेलमुंडी के रोजी स्टर्लिंग का एयर शो इस साल भी आकर्षण का केन्द्र बना।

उधर जांजगीर के कुमार सिंह लगभग पूरे साल कम दिखने वाली पक्षियों की तस्वीरें ले कर आते रहे। नबारुण साध्य के छत्तीसगढ़ में होने से अधिकृत और महत्वपूर्ण जानकारियां आती रहीं। पिथौरा के जोगीलाल श्रीवास्तव, टीकमचंद पटेल, विजय पटेल, चरनदीप आजमानी, गौरव श्रीवास्तव के माध्यम से भी अच्छी सचित्र जानकारियां आईं और भागवत टावरी के पक्षी कैलेंडर के अलावा भी बेहतरीन तस्वीरें आती रहीं। 

बिलासपुर के राम सोमावार, डॉ. चंद्रशेखर रहालकर, डॉ श्रुतिदेव मिश्रा, विवेक-शुभदा जोगलेकर की गतिविधियों की नियमित जानकारियां नहीं मिलीं, लेकिन प्राण चड्डा सक्रिय रहे और अनिल पांडेय, शशि चौबे, सौरभ तिवारी, मजीद सिद्दिकी, शिरीष दामरे, सत्यप्रकाश पांडेय, अपूर्व सिसौदिया, नवीन वाहिनीपति, जितेन्द्र रात्रे सक्रिय रहे और श्याम कोरी ने अपनी देखी और ली गई तस्वीरों के साथ पक्षियों को सूचीबद्ध किया। 

साथ ही समय-समय पर डा. राहुल कुलकर्णी, विकास अग्रवाल, रिशी सेन, जगदेवराम भगत, रूपेश यादव, मनीष यादव, प्रदीप जनवदे, कुंवरदीप सिंह अरोरा, पंकज बाजपेयी, रवीश गोवर्धन, दिव्येन्दु मुखर्जी, विवेक शुक्ला, यश शुक्ला, कमलेश वर्मा, संजीव तिवारी, ललित शर्मा, डा. विजय आनंद बघेल, डा. सुरेश जेना, प्रदीप गुप्ता, वी एस मनियन, मत सूरज, रवीन्दर सिंह सैंडो, राजेन्द्र प्रसाद गुप्ता, शिशिर दास, बाला सुब्रमण्यम, विशाल त्रेहन, अनुभव शर्मा, शैलेन्द्र सदानी, डा जयेश कावड़िया, निकष परमार आदि की ली हुई पक्षी-तस्वीरों से सामने आने वाली जानकारियों की लंबी सूची है।

मैंने पक्षियों और पक्षियों पर नजर रखने वालों पर पूरे साल नजर रखने की कोशिश की है. यहां प्रत्येक सुझाव का हार्दिक स्वागत रहेगा। 

‘बर्ड्स एंड वाइल्ड लाइफ आफ छत्तीसगढ़’ समूह के लिए  02 जनवरी 2016 की फेसबुक पोस्ट  

पुनश्च- अब इस समूह के सदस्यों की संख्या 9600 पार कर गई है। 2021 तक इस ओर कई पक्षी-प्रेमी सक्रिय हुए हैं, जिनमें रवि नायडू, सौरभ सिंह, डॉ. दिलीप वर्मा, सौमित्र शेष आर्य, डॉ. हिमांशु गुप्ता, हैप्पी सिंह, अविनाश भोई, फर्गुस मार्क एन्थनी जैसे कुछ सदस्यों से कई विशिष्ट जानकारियां आईं। साथ ही डॉ. मधुकर टिकास, डॉ. कपिल मिश्रा, अविरल जाधव, अशोक अग्रवाल, अनिल अग्रवाल, विकास अग्रवाल, हकीमुद्दीन सैफी, आलोक सिंह, महेश कुमार, संदीपन अधिकारी, पारुल परमार, चंदन त्रिपाठी, गोपा सान्याल, मंजीत कौर बल, हर्षजीत सिंह बल, अभिनंदन तिवारी, प्रसेनजित मजुमदार, राहुल गुप्ता, रत्नेश गुप्ता, देव रथ, श्रेयांस जैन, संतोष गुप्ता, गौरव उपाध्याय, दिनेश कुमार पाण्डेय, राजू वर्मा, आनंद करांबे, राधाकृष्ण, दानेश सिन्हा, प्रतीक ठाकुर, रवि ठाकुर, नरेन्द्र वर्मा, विजय जादवानी, जागरूक दावड़ा जैसे कई सदस्य सक्रिय रहे। (यहां नाम बतौर सूची नहीं, बल्कि उदाहरण के लिए आए हैं।)
- - - - 

अपने लिखे उपरोक्त के अलावा पक्षियों पर एक अलग नजरिया, पुस्तक ‘शिकार के पक्षी‘ से, जिससे वन्य प्राणी संरक्षण अधिनियम-1972 के पहले की स्थिति और दृष्टिकोण को समझने में मदद होगी। लेखक श्री सुरेश सिंह की पुस्तक ‘शिकार के पक्षी‘, हिन्दी समिति, सूचना विभाग, उत्तर प्रदेश शासन, लखनऊ द्वारा 1971 में प्रकाशित की गई थी। इस पुस्तक की ‘भूमिका‘ ध्यान देने योग्य, इस प्रकार है- 

शिकार के पक्षियों को अन्य पक्षियों से अलग कर के एक पुस्तक के रूप में देने का तात्पर्य यही है कि हम अपने देश के उन पक्षियों से भली भांति परिचित हो जायें जो शिकार के पक्षी कहे जाते हैं और जिनके मांस के लिए लोग उनका शिकार करते हैं। 

शिकार के पक्षियों का सबसे बड़ा गुण, उनका स्वादिष्ठ मांस है और सबसे बड़ी विशेषता उनकी तुरन्त छिपने की आदत और तेज उड़ान मानी जाती है। दूसरे शब्दों में शिकार के पक्षियों की श्रेणी में वे स्वादिष्ठ मांस वाले पक्षी आते हैं जिनका शिकार आसान नहीं होता और जिसमें शिकारी को काफी परिश्रम करना पड़ता है। लेकिन इस परिभाषा को आधार मान लेने से शिकार के पक्षियों की संख्या बहुत सीमित रह जाती है और इस पुस्तक के लिखने का उद्देश्य पूरा नहीं होता। इस पुस्तक में तो उन सभी पक्षियों को एकत्र किया गया है जिनका शिकार किया जाता है और जिनका मांस खाने के काम आता है, जिससे हम सब उन पक्षियों से भली भांति परिचित हो जायें और यह जान जाये कि किस पक्षी का मांस खाद्य है और किसका अखाद्य है।

इतना ही नहीं, इस पुस्तक में हमें शिकार के प्रत्येक पक्षी के शिकार के बारे में भी थोड़ी-बहुत जानकारी हो जायेगी जो साधारणतया पक्षियों का परिचय देने वाली पुस्तकों से नहीं प्राप्त हो सकती, क्योंकि पक्षियों के बारे में जो पुस्तकें लिखी जाती है वे प्रायः इस दृष्टिकोण से नहीं लिखी जाती कि उनका शिकार कैसे किया जाता है बल्कि उनके लिखने का तात्पर्य यही रहता है कि उन पक्षियों के स्वभाव, बोली, निवास, रंग रूप, रहन-सहन, तथा अंडे और घोंसले के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकें। इसी कारण शिकार के प्रेमी पाठक उनसे लाभ नहीं उठा पाते। प्रस्तुत पुस्तक उसी कमी को पूरा करने के लिए लिखी गयी है जिससे साधारण पाठकों का मनोरंजन तो होगा ही, साथ ही साथ शिकार से प्रेम करने वाले सज्जनों को इसमें बहुत-सी ऐसी बातें मिलेंगी जो उनके शिकार को सफल बनाने में सहायक सिद्ध होंगी। 
- - - - 

और एक खबर, जो 29 अगस्त 1995 को दैनिक भास्कर, बिलासपुर में ‘अज्ञेय नगर में पक्षियों का जलविहार‘ शीर्षक से प्रकाशित, इस तरह- 

बिलासपुर। पक्षियों की प्रजातियां नगरीकरण के साथ-साथ मानव से दूर हो रही हैं। वहीं बिलासपुर के अज्ञेयनगर में एक पांच-सात एकड़ के जलकुम्भी वाले तालाब में अनेक प्रजातियों की पक्षी जल किलोल कर अपने वंश की वृद्धि कर रहे हैं। यदि इस स्थल को संरक्षित किया गया तो शहर के मध्य प्रवासी पक्षियों का डेरा इसी शीतकाल में जम सकता है।

अज्ञेय नगर के मध्य और तालापारा से जुड़े इस गंदले से तालाब में निस्तारी के पानी का ठहराव है जिस वजह पूरे साल पानी भरा रहता है। लगभग पांच एकड़ के इस भराव के चारों तरफ मकान भरे हैं। नागरिकों का कहना है कि यह उद्यान स्थली थी परंतु शायद गड्ढे के कारण यहां उद्यान बनाना संभव नहीं हो पाया और निस्तार का पानी एकत्र होते गया। ग्रीष्म ऋतु में भी यहां भराव बना रहता है। जलकुम्भी से यह स्थल लगभग भर चुका है। जलकुम्भी को समुंदर सोख माना जाता है। ऐसी अवधारणा है कि यदि जलकुंभी फैले तो समुद्र को भी अपने आगोश में ले सकती है। ये जल वनस्पति मानव के लिए कोई खास लाभदायक नहीं लेकिन अज्ञेय नगर में जलीय पक्षियों के लिए यह जलस्थल और जलीय वनस्पति तथा बेशरम की झाड़ियों से सुन्दर रैन बसेरा बन गया है।

जलीय पक्षियों के इस बसेरे को महाविद्यालय की एक छात्रा शाहिन सिद्दकी ने खोजा है। उसने पहली बार यहां विभिन्न प्रजातियों के पक्षी देखें और अपने परिचित विवेक जोगलेकर को इसकी जानकारी दी। बस फिर क्या था शाहिन, श्री जोगलेकर, राहुल सिंह ने पक्षियों की शिनाख्त शुरू कर दी। अब तक इस क्षेत्र में लाल बगुला, अंधा बगुला, कांना बगुला, पाइड किंग फिशर, स्माल ब्ल्यू किंग फिशर, व्हाइट ब्रेस्टेड किंग फिशर, राबिन इण्डियन, राबिन मैग पाई, खंजन, ऐशी रेन वार्बलर, बया, फीजेन्ट टेल जकाना, ब्रांज विंग्ड जकाना, कूट, कैम, मूरहेन, टील, लिटिल कारमोरेन्ट, पतरिंगा एवं रेड वेन्टेड बुलबुल हैं।

शरद ऋतु अभी आई नहीं परंतु खंजन पक्षी यहां पहुंच गये हैं। काले रंग के पक्षियों ने तो यहां अपने वंश की वृद्धि भी कर ली है। किलकिला (किंगफिशर) यहां हवा से सीधी गोताखोरी कर मछलियां पकड़ते दिखाई देते हैं। लंबी पूंछ वाली जकाना पक्षी (जलमोर) के यहां जोड़े हैं। जलीय पक्षियों के मध्य मानसून के साथ प्रवास में पहुंचने वाला चातक पक्षी भी यहां जोड़े में दिखाई देता है।

पक्षियों ने तो नगर के मध्य एक सुरक्षित परिवेश मान अपना बसेरा बना लिया। इस बात की आशंका है कि इस क्षेत्र में बढ़ती हुई पक्षियों की संख्या पर चिड़ीमारों की नजर न लग जाए अन्यथा अपने आप विस्तृत हो रहा एक उद्यान अपने पूर्ण विकास के पूर्व ही समाप्त हो जाएगा।
- - - -

Sunday, February 20, 2022

आत्म परिचय - पं. लोचनप्रसाद पांडेय

मेरा जन्म चन्द्रपुर अंचल के बालपुर ग्राम में विक्रम संवत् 1943, पौष शुक्ल दशमी (तदनुसार 4 जनवरी सन् 1887) को हुआ था। चन्द्रपुर अंचल उस समय सी.पी. के छत्तीसगढ़ संभाग में उड़िया भाषी जिले सम्बलपुर में सम्मिलित था। मेरे प्रपितामह पं. शालिग्राम पाण्डेय इस अंचल के जाने-माने प्रतिष्ठित जन सेवी नागरिक थे। उनका निवास स्थान पहले चन्द्रपुर था। उनके पूर्वज अयोध्या सरवार से यहां आये थे। बाद में उन्होंने चन्द्रपुर छोड़ दिया और ग्राम बालपुर चले आये। बालपुर में उनका कृषि फार्म था। यहां वे अपने इकलौते पुत्र चिंतामणि के साथ रहने लगे।

बालपुर ग्राम महानदी के बायें किनारे पर बसा हुआ है। महानदी का दक्षिणी पाट लगभग एक मील तक सारंगढ़ रियासत के ग्रामों की उत्तरी सीमा को छूता हुआ अत्यंत मनोरम दृश्य उत्पन्न करता है। चन्द्रपुर अंचल में पं. शालिग्राम के तीन और ग्राम हैं।

कालांतर में, मैं अपने पिता चिंतामणि द्वारा बालपुर में संस्थापित निजी प्राथमिक पाठशाला में प्रविष्ट हुआ और जनवरी 1898 में प्राथमिक परीक्षा उत्तीर्ण की।

स्वामी रामदास नामक एक वैष्णव मद्रासी साधु हमारे जिले के इस अंचल में भ्रमण करते हुए आ पहुंचे। उन्हीं से मैंने तथा मेरे अग्रज और अन्य लोगों ने अंग्रेजी सीखी। समीपस्थ नगर रायगढ़ में उन दिनों कोई अंग्रेजी-पाठशाला नहीं थी अतः मुझे मेरे मामा (माताजी के चचेरे भाई) पंडित अनंतराम पाण्डेय के पास रखा गया। वे उन दिनों रायगढ़ की माध्यमिक पाठशाला में प्रधान अध्यापक थे। उन्होंने मुझे हिन्दी और अंग्रेजी में शिक्षा दी।

रायगढ़ प्रवास के दिनों में पं. कृपाराम मिश्र, जो मेरे पिता के शिष्य रह चुके थे, ने मेरी विशेष रुप से देखभाल की।

आगामी अध्ययन के लिए मैं शासकीय उच्चतर माध्यमिक शाला, सम्बलपुर में प्रविष्ट हुआ।

मैंने माध्यमिक अंग्रेजी की परीक्षा फरवरी 1902 में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। सम्पूर्ण जिले में मेरा स्थान प्रथम रहा।

मैने एन्ट्रेंस परीक्षा कलकत्ता विश्वविद्यालय से 1905 में द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण की। परीक्षा केन्द्र मिदनापुर (बंगाल) था। शासकीय उच्च शाला सम्बलपुर के अपने विद्यार्थी जीवन में मैं ‘म्युचुअल इम्प्रूवमेंट सोसायटी‘ का अवैतनिक मंत्री था। इस सोसायटी के अध्यक्ष पद पर रेव्हरेंड हेवरलेट मिशनरी दो वर्षों तक रहे। मेरा पहला अंग्रेजी लेख ‘टोबैको एण्ड स्टूडेंट्स‘ 1904 में सेन्ट्रल हिन्दू कॉलेज बनारस की पत्रिका, जिसकी संपादिका महान विदुषी श्रीमती एनी बिसेन्ट थीं, में प्रकाशित हुआ था।

हिन्दी भाषा में ‘धर्म‘ पर लिखा गया मेरा पहला लेख सरस्वती-विलास प्रेस नरसिंहपुर सी.पी. से प्रकाशित होने वाली मासिक पत्रिका ‘हिन्दी मास्टर‘ में छपा था।

उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए मैं सेन्ट्रल हिन्दू कॉलेज बनारस गया था, पर घर की विषम परिस्थितियों के कारण मुझे बीच में ही पढ़ाई छोड़ कर घर लौटना पड़ा। मैने पिताजी द्वारा संचालित पाठशाला का कार्यभार अपने ऊपर लिया और अपने चार अनुजों सहित कुछ अन्य लड़कों को अंग्रेजी, हिन्दी के साथ-साथ पढ़ाने लगा। इन दिनों मैं अपने फुरसत के समय को स्वाध्याय तथा अंग्रेजी व हिन्दी में लेख लिखने में व्यतीत करता था।

‘लेटर्स टू माई ब्रदर्स‘ और ‘दि वे टू बी हैप्पी एण्ड गे‘ मेरे द्वारा क्रमशः 1909 तथा 1911 में लिखे और प्रकाशित किये गये। 1911 में ही मैंने राधानाथ राय का, अंग्रेजी भाषा में एक छोटा सा जीवन चरित लिखा और उसे ‘राधानाथ, दि नेशनल पोयेट ऑफ उड़ीसा‘ के नाम से अपने ही खर्च पर प्रकाशित किया। मेरा पहला हिन्दी उपन्यास ‘दो मित्र‘ 1906 में लक्ष्मीनारायण प्रेस मुरादाबाद (उ.प्र.) से प्रकाशित हुआ। कालांतर में इस उपन्यास को, सी.पी. की पाठ्यपुस्तक समिति ने, सी.पी. एवं बरार की हिन्दी पाठशालाओं में बच्चों को पुरस्कृत करने के लिए तथा पुस्तकालयों में रखने के लिए स्वीकृत किया। 

खड़ी बोली में लिखी गई मेरी लघु-कविताओं का संग्रह ‘नीति-कविता‘ शीर्षक से मेरे मित्र श्री रामनारायण राठी द्वारा अपने मारवाड़ी प्रेस, नागपुर से 1909 में प्रकाशित किया गया। यह संग्रह भी सी.पी. एवं बरार की पाठ्य पुस्तक समिति द्वारा स्वीकृत किया गया। नागरी प्रचारणी सभा बनारस ने इसे ‘उत्तम-प्रकाशित-उपयोगी-पुस्तक‘ निरूपित किया। शिक्षाविद् व विद्वान रायबहादुर हीरालाल एवं छत्तीसगढ़ संभाग के एजेन्सी इन्सपेक्टर ऑफ स्कूल श्री गणपति लाल चौबे के द्वारा भी यह पुस्तक प्रशंसित हुई।

हिन्दी कविता संग्रह - ‘बालिका विनोद‘, ‘बाल विनोद‘ तथा ‘कृषक बाल सखा‘ - युवा विद्यार्थियों के उपयोग के लिए लिखे गये। मेरे पिता उड़िया एवं बंगला जानते थे। काशीराम दास लिखित बंगला-महाभारत की कुछ पंक्तियों (जैसे)

‘महाभारत कथा अमृत समान,
काशीराम दास कहे, सुने पुण्यवान‘ 

को पढ़ने व सुनने में बड़ा आनंद आता है। मेरे अग्रज को उड़िया भाषा के (ग्रंथ) ‘विचित्र- रामायण‘ तथा ‘मथुरा मंगल‘ (लोकप्रिय गीति पुस्तिका) बहुत प्रिय थे। जब मैं सम्बलपुर में, अपने सहपाठी नारायणनन्द के घर पर रहता था तब उनसे राधानाथ राय की उड़िया कविताएं, विशेषकर ‘दरबार‘ सुनता था । इन्हीं नारायणनन्द से मुझे उड़िया भाषा में रचना करने की प्रेरणा मिली।

मेरे मित्र प्रसन्न कुमार पुजारी ने (जो सम्बलपुर के प्रसिद्ध पुजारी घराने के थे) मेरी उड़िया कविताओं के संग्रह की पाण्डुलिपि को उड़िया भाषा के प्रसिद्ध कवि गंगाधर मेहर जी को दिखाया। गंगाधर मेहर जी सौभाग्य से हिन्दी लिपि (देवनागरी) जानते थे। मैं अपनी उड़िया कविताएं उड़िया लिपि की अपेक्षा हिन्दी लिपि (देवनागरी) में लिखना अधिक पसंद करता था। गंगाधर मेहर ने मुझे उत्साहित किया और मेरी कविताओं को सराहा। उन्हीं के उत्साहित किये जाने पर मैने अपना उड़िया कविता संग्रह ‘कविता- कुसुम‘ 1910 में प्रकाशित किया। यह संग्रह उड़ीसा के महत्वपूर्ण कवियों, जैसे- फकीर मोहन सेनापति, भक्त कवि मधुसूदन दास, श्री शशिभूषण राय (काली गली, कटक) तथा बाबू अखिल चन्द्र पालित (कूच बिहार, बंगाल) के द्वारा बहुत प्रशंसित हुआ। जागरूक एवं सुसंस्कृत राजा सच्चिदानंद त्रिभुवन देव, फ्यूडटरी चीफ, बामरा स्टेट (जो पहिले छत्तीसगढ़ संभाग में था) ने इन रचनाओं पर मुग्ध होकर मुझे ‘काव्य विनोद‘ की उपाधि प्रदान की। यह, मुझे प्राप्त हुई पहली साहित्यिक उपाधि थी। इस समय तक मेरी कविताएं तथा लेख- ‘हिन्दी प्रदीप‘ (प्रयाग), ‘सरस्वती‘ (आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा संपादित), ‘कमला‘ (कलकत्ता से प्रकाशित होने वाली मासिक पत्रिका) और ‘देवनागर‘ (जो कलकत्ता से ‘लिपि, विस्तार परिषद‘ के द्वारा प्रकाशित तथा कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश शारदा चरण मित्र के द्वारा नियंत्रित होता था) में प्रकाशित होने लगे थे।

‘देवनागर‘ में मेरी उड़िया कविताएं ‘प्रार्थना सप्तक‘, ‘भारत वंदना‘ तथा ‘हिन्दी र विनय‘ पहले-पहल 1907-1908 में प्रकाशित हुई। इसके तुरंत बाद मेरी उड़िया कविता ‘महानदी‘ पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुई। इस पुस्तक को मैंने बामरा नरेश, राजा सच्चिदानंद त्रिभुवन देव को समर्पित किया था।

सन् 1905-1906 में मैंने रे. लाल बिहारी डे-कृत ‘फोक टेल्स ऑफ बंगाल‘ का हिन्दी में अनुवाद करना प्रारंभ किया, जिसके कुछ अंश हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं में छपे और कुछ बाद में ‘हरिदास एण्ड कंपनी लिमिटेड कलकत्ता‘ के द्वारा सन् 1910 में प्रकाशित मेरी रचना ‘आनंद की टोकनी‘ में समाविष्ट किये गये। इसी प्रकाशक ने ही मेरी रचनाओं- ‘मेवाड़ गाथा‘, ‘माधव मंजरी‘ एवं ‘चरित माला‘ को भी प्रकशित किया तथा मेरे पूज्य पिता पं. चिन्तामणि के जीवन वृत्तांत ‘मेरे पूज्यपाद पिता‘, का सन् 1914 में सचित्र प्रकाशन कर मेरी बड़ी मदद की। इस पुस्तक में मेरे पूज्य पिता की संक्षिप्त जीवनी सरल हिन्दी में लिखी गई है। उनका दुखद निधन सन् 1907 में हमारे ग्राम बालपुर में हुआ। उस समय उनके न केवल वृद्ध पिता पं. शालिग्राम एवं माता जीवित थीं बल्कि उनकी शतवर्षीया प्रपितामही भी जीवित थीं। उनके वृद्ध माता-पिता को अनेक वर्षों तक अपने इकलौते पुत्र के निधन की विरह-व्यथा को सहन करना पड़ा। 

मैं अपने अनेक मित्रों के साथ अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अधिवेशन दे(ख?)ने कलकत्ता गया था। प्रसिद्ध राष्ट्रभक्त दादाभाई नौरोजी इस अधिवेशन का सभापतित्व कर रहे थे। मेरे पूज्यपाद पिता पं. चिन्तामणि पाण्डेय, पं. कृपाराम मिश्र तथा अनंतराम पाण्डेय भी हम लोगों के मार्गदर्शक के रूप में हमारे साथ थे। वहाँ मुझे बड़े-बड़े देशभक्तों एवं वक्ताओं के दर्शन प्राप्त करने का सौभाग्य मिला। यह, कलकत्ता की मेरी दूसरी यात्रा थी। (मैं पहली बार मार्च 1905 में, सम्बलपुर निवासी मेरे मित्र नारायणनंद व पं. प्रसन्न कुमार पुजारी के साथ यहां आया था)। जिनं देशभक्तों व वक्ताओं के दर्शन का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ उनमें अखिल भारतीय ख्याति प्राप्त बाबू एस.एन. बैनर्जी, सर फिरोजशाह मेहता, विपिनचन्द्र पाल, लाला लाजपत राय, पं. मदन मोहन मालवीय, गोपालकृष्ण गोखले आदि बंगाल तथा अन्य प्रान्तों के नेतागण थे। 

मेरी पुस्तक ‘स्वदेशी-पुकार‘, जिसमें स्वदेशी आंदोलन तथा बहिष्कार पर लिखे गये राष्ट्रीय गीतों का संग्रह था, उस समय तैयार थी, यह संग्रह ‘भारत जीवन प्रेस, बनारस‘ को छापने के लिए भेजा गया, पर कोई प्रकाशक उसे छापने के लिए तैयार नहीं था। मुझे सलाह दी गई कि मैं उसके प्रकाशन के लिए कष्ट न उठाऊं। मेरे द्वारा लिखित नाटक ‘छात्र-दुर्दशा‘ और प्रहसन ‘साहित्य-सेवा‘ किसी प्रकार प्रकाशित हुए। 

सन् 1908 में मैंने कालीदास के मेघदूत में वर्णित ‘रामगिरी‘ के स्थान के निर्णय के सम्बन्ध में विचार किया और इस संदर्भ में श्री हीरालाल बी.ए. (बाद में रायबहादुर हीरालाल, डी. लिट्.) से पत्र व्यवहार किया। उस समय डॉ. हीरालाल, नागपुर में असिस्टेंट सुपरिन्टेन्डेन्ट, गजेटिर सी.पी., के पद पर कार्यरत थे। उन्होंने बड़ी तत्परता से इस संबंध में मुझे वांछित जानकारियां दीं। मेरा आलेख ‘छत्तीसगढ़ में मेघदूत-वर्णित रामगिरी‘ शीर्षक से, सितम्बर 1914 में मासिक पत्र ‘इन्दु‘ (काशी) में प्रकाशित हुआ। इस मासिक पत्रिका के संपादक थे-श्री अंबिकाप्रसाद गुप्त। मेरा दूसरा लेख ‘छत्तीसगढ़ में रावण की लंका‘, जिसे मैंने इन्दौर के, सरदार कीबे के लेख के उत्तर में लिखा था, लखनऊ की मासिक पत्रिका ‘माधुरी‘ में छपा। ‘माधुरी‘ में ही मेरा एक अन्य लेख- ‘मेघदूत में पुरातत्व‘ भी प्रकाशित हुआ। सन् 1910 में मेरी प्रतिनिधि हिन्दी कविताएं ‘कविता कुसुममाला‘ के रूप में ‘इण्डियन प्रेस‘, इलाहाबाद से प्रकाशित हुई। आम जनता तथा प्रेस ने इस पुस्तक का हार्दिक स्वागत किया। इंडियन प्रेस ने इस पुस्तक के तीन संस्करण प्रकाशित किये। चौथा संस्करण जबलपुर के मिश्र बंधु-कार्यालय ने 1932 में प्रकाशित किया। 

सन् 1915 में ‘पद्य-पुष्पांजलि‘ में मेरी जन उपयोगी और सुधारवादी कविताएं छपी। इस संग्रह में महात्मा गांधी पर मेरी कविता ‘कर्मवीर मिस्टर गांधी‘ भी संकलित थी। संभवतः यह महात्मा गांधी पर लिखी गई प्रथम हिन्दी कविता है। इस संग्रह का प्रकाशन श्री नारायण प्रसाद अरोड़ा, बी.ए. कानपुर ने किया था। श्री अरोड़ा ‘कानपुर का इतिहास‘ के रचयिता थे।

राजा भूपदेव सिंह, रायगढ़ स्टेट (छत्तीसगढ़) ने सितम्बर 1911 में मुझे अपने निजी सचिव और संदेशवाहक की हैसियत से रीवां दरबार में भेजा। मुझे इस अनुमति के साथ भेजा गया था कि राजा साहब का पत्र, रीवां महाराज सर वेंकटरमण सिंह को देकर मैं इलाहाबाद में हो रहे हिन्दी साहित्य सम्मेलन के द्वितीय अधिवेशन में सम्मिलित हो सकता हूं। किन्तु रीवां नगर में अचानक बीमार हो जाने के कारण मैं अधिवेशन में सम्मिलित होने से वंचित रह गया। मेरी अनुपस्थिति में मेरे द्वारा खड़ी बोली में लिखित- ‘स्वागतम गान‘ (कविता), मेरे मित्र पं. जगन्नाथ प्रसाद शुक्ल, आयुर्वेद पंचानन, संपादक मासिक पत्रिका ‘सुधांशु‘ द्वारा पढ़ा गया। मेरी कविता, अन्य कविताओं के साथ, अधिवेशन के विवरण (रिपोर्ट) में समाविष्ट की गई।

सन् 1913 में अखिल भारतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन के तीसरे अधिवेशन का केन्द्र बनी प्रसिद्ध कलकत्ता नगरी। मैं, इस अधिवेशन में मध्य प्रांत (सेंट्रल प्राविंस) के प्रतिनिधि के रुप में अपने चतुर्थ भ्राता बंशीधर पाण्डेय तथा एक अन्य सम्बन्धी शुक्लाम्बर प्रसाद पाण्डेय के साथ सम्मिलित हुआ। यहां मुझे हिन्दी मां के दो सपूतों- बाबू राजेन्द्र प्रसाद, एम.ए. एम.एल., जो इस अधिवेशन की स्वागत समिति के मंत्री थे तथा बाबू पुरुषोत्तम दास टंडन, एम.ए., एल.एल.बी. जो इस अधिवेशन के महामंत्री थे, से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। स्वागत समिति ने मेरा स्वागत गीत अधिवेशन में पढ़ने के लिए स्वीकार कर लिया। उचित समय पर मुझे विशिष्ट विशाल श्रोता समुदाय के सम्मुख स्वागत गीत पढ़ने के लिए बुलाया गया। यह मेरे जीवन का एक अपूर्व अनुभव था। कलकत्ता के आंग्ल दैनिक समाचार पत्रों ने अधिवेशन के प्रथम दिन की रिपोर्ट में मेरे नाम का उल्लेख किया। बंगीय साहित्य समाज ने, ‘हिन्दी साहित्य सम्मेलन‘ में पधारे प्रतिनिधियों की अभ्यर्थना हेतु स्वागत समारोह का भी आयोजन किया। इस समारोह में मुझे बंगाल के बहुत से साहित्यिक जनों के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ। प्रथम बार मेरी भेट महाकवि अयोध्या सिंह उपाध्याय, व्याकरणाचार्य पंडित रामावतार पाण्डेय ‘शर्मा‘, एम.ए., बाबू शिवनंदन सहारा, स्वामी सत्यदेव, पं. शकल नारायण शर्मा, पं. अम्बिका प्रसाद बाजपेई और बाबू गोपालराय गहमर से हुई। प्रो. विनय कुमार सरकार, एम.ए. ने कृपा कर अपनी बंगला एवं अंग्रेजी पुस्तकों का सेट अधिवेशन के अधिकांश प्रतिनिधियों को भेंट किया मुझे भी एक सेट प्राप्त हुआ। मेरा इनसे पत्र-व्यवहार पूर्व से था तथा मैं उनके ‘गृहस्थ-जर्नल‘ का नियमित ग्राहक भी था। प्रो. सरकार वर्षों तक अमेरिका में रहने के बाद जब भारत लौटे तब मेरी उनसे भेंट 1938 में कलकत्ता में हुई। उनके साथ उनकी अमेरिकन पत्नी व बेटी भी थीं। 

दिसम्बर 1913 के अंतिम सप्ताह में मेरा पुनः कलकत्ता जाना हुआ। इसी सप्ताह ठाकुर रवीन्द्रनाथ (टैगोर) शांतिनिकेतन, बोलपुर, से के.सी.आई.ई. की उपाधि लेने कलकत्ता आये हुए थे। इस बात की जानकारी मुझे एक युवक कलाकार से मिली, जिससे बामरा (उड़िसा) के राजा सच्चिदानंद त्रिभुवन देव, चित्रकला सीख रहे थे। राजा साहब उस समय पार्क-स्ट्रीट की एक विशालकाय इमारत में ठहरे हुए थे। वहीं उस युवक कलाकार से मेरी भेंट हुई। उसका टैगोर बंधुओं से घनिष्ठ सम्बन्ध था। उसने मुझे शांति निकेतन के गुरुदेव के दर्शन करने को प्रोत्साहित किया। उसी की सलाह पर मैं 25 दिसम्बर 1913 को गुरुदेव से मिलने उनके ‘जोरासांको‘ राजवाड़ी में गया। गुरुदेव ने कृपा कर मुझे भेंट का समय दिया। उनके पुत्र रथिन्द्रनाथ भी उनेक साथ थे। गुरुदेव का मैंने अभिवादन किया और अपनी हिन्दी, अंग्रेजी और उड़िया की रचनाएं उन्हें भेंट करने की अनुमति मांगी। उनकी आज्ञा मिलने पर मैंने अपनी रचनाएं- ‘रघुवंश सार‘, ‘वीर भ्राता लक्ष्मण‘, राधानाथ राय- ‘दि नेशनल पोयेट आफ उड़ीसा‘, ‘दि वे टू बी हैप्पी एण्ड गे‘ एवं ‘कविता-कुसुम माला‘ उन्हें भेंट स्वरुप दी, जिन्हें उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर लिया। मेरी उस उड़िया कविता को जिसे मैंने एक माह पूर्व उनके पास भेजा था, उन्होंने याद किया और मुझसे मेरी उड़िया रचनाओं के विषय में पूछताछ की। हिन्दी और उड़िया में, उनको बधाई के रुप में लिखी और भेजी गई मेरी कविताओं पर उनका पत्र देवनागरी लिपि में, मेरे जन्म ग्राम बालपुर में दि. 3 दिसम्बर 1913 को मिला। हिन्दी जगत ने इसका बड़ा स्वागत किया, क्योंकि गुरुदेव के द्वारा हिन्दी में लिखित यह प्रथम पत्र था। 

कांग्रेस का जो अधिवेशन सन् 1917 में कलकत्ता में हुआ, वह अपने आप में बड़ा महत्वपूर्ण था। इस अधिवेशन की अध्यक्षता डॉ. एनी बिसेन्ट ने की। इस अधिवेशन में लोकमान्य तिलक, महामना मालवीय, भारत कोकिल सरोजनी नायडू, व्याख्यान वाचस्पति दीनदयाल शर्मा (झामर) और कर्मवीर महात्मा गांधी तथा अन्य नेताओं ने भाग लिया। महात्मा गांधी ने ‘सोशल सर्विस कान्फेरेन्स‘ में अपना भाषण अंग्रेजी में, हिन्दी के सवाल की वकालत करते हुए दिया। राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, कलकत्ता ने लोकमान्य तिलक की अध्यक्षता में बैठक की, जिसमें मैं भी सम्मिलित हुआ। इस बैठक में महामना मालवीय, महात्मा गांधी तथा सरोजनी नायडू ने भी भाग लिया। राष्ट्रकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर ने जो अपने आकर्षक गाउन और टोपी से सज्जित थे, कांग्रेस के खुले अधिवेशन में राष्ट्र को संदेश दिया। यह भारत के विभिन्न क्षेत्रों से आये प्रतिनिधियों और संपूर्ण श्रोता समुदाय के लिए एक अपूर्व दृश्य था। 

पं. शकल नारायण पाण्डेय ने एन.पी. साहा (आरा) के जरिए मेरे प्रथम उपन्यास ‘दो मित्र‘ की पाण्डुलिपि का संशोधन, प्रेस में जाने के पूर्व किया था। उनकी मुझ पर बड़ी कृपा थी। उन्हीं के द्वारा उत्साहित होकर मैं उनके बताए हुए मार्ग पर चलता रहा। इसी प्रकार स्व. श्री गंगा प्रसाद अग्निहोत्री (तिभुरनी), पं. श्यामबिहारी मिश्र, एम.ए. डी.लिट. तथा राय देवी प्रसाद ‘पूर्ण कवि‘, हाईकोर्ट वकील कानपुर, ने भी समय समय पर मेरी कविताओं की पाण्डुलिपियों का अवलोकन कर मेरा बड़ा उपकार किया। मैं इन सभी महानुभवों का अत्यंत अभारी हूं। राय देवी प्रसाद ‘पूर्ण कवि‘ ने मेरे तथा मेरे प्रकाशक के अनुरोध पर मेरी काव्यकृति ‘पद्य-पुष्पांजलि‘ (जो सन् 1915 में प्रकाशित हुई थी) की भूमिका लिखने की कृपा की। 

श्री काशीप्रसाद जायसवाल से सन् 1908 से मेरा पत्र व्यवहार था। तब वे लन्दन के आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में कानून पढ़ रहे थे। उस समय मैंने उनसे अनुरोध किया था कि वे इंग्लैण्ड व यूरोप में हिन्दी में समाचार पत्र निकालें। मैंने सत्यदेव जी से भी ऐसा ही अनुरोध तब किया था जब वे सन् 1907-08 में शिकागो (अमेरिका) में विद्याध्ययन कर रहे थे। मैंने उन्हें अपनी एक लंबी हिन्दी कविता ‘स्वराज लेंगे, स्वराज लेंगे‘ भी भेजी थी। इन दोनों महानुभावों की मुझ पर बड़ी कृपा थी। जब वे अपने-अपने विश्वविद्यालयों से घर लौटे तब कलकत्ते में मेरी उन दोनों से भेंट हुई। 

एक समय मैं श्री जायसवाल जी के यहां उनके अमर स्ट्रीट (कलकत्ता) स्थित निवास में ठहरा था, स्वामी सत्यदेव की सहायता से मुझे, सन् 1907 में प्रकाशित, थामस पैनर की पुस्तक ‘मानव-अधिकार‘ (Rights of man) प्राप्त हुई। इस पुस्तक के आधार पर हिन्दी में एक पुस्तक लिखने का विचार किया गया। स्वामी सत्यदेव द्वारा लिखित पुस्तक ‘मनुष्य के अधिकार‘ का प्रकाशन, बाद में, उनके अमेरिका प्रवास से लौटने पर हुआ। 

सन् 1909-10 में हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए एक हिन्दी सम्मेलन शुरु करने का निर्णय लिया गया। हिन्दी के प्रसिद्ध लेखक पं. गंगाप्रसाद अग्निहोत्री ने मुझे इस प्रकार के संस्थान की आवश्यकता को प्रतिपादित करने के उद्देश्य से छोटे-छोटे लेख लिखने का दायित्व सौंपा। खंडवा के बाबू माणिक्य चन्द्र जैन ने इस कार्य के लिए स्वेच्छा से अपनी सेवाएं हिन्दी साहित्य सम्मेलन को देने की इच्छा प्रकट की। ‘सम्मेलन‘ का प्रथम अधिवेशन काशी में महामना पं. मालवीय जी की अध्यक्षता में हुआ। बाद में जबलपुर सम्मेलन के लिए हम लोगों ने छत्तीसगढ़ में कठिन परिश्रम किया। पं. रविशंकर शुक्ल ने अपनी ओर से रायपुर जिले तथा पड़ोसी फ्यूडटरी रियासत के नवजवानों का ध्यान इस ओर आकर्षित किया। छत्तीसगढ़ में हम लोग पं. विष्णुदत्त शुक्ल, बी.ए., सीहोर वाले के मार्गदर्शन में कार्य कर रहे थे। बाद में वे, सी.पी. से प्रथम व्यक्ति के रुप में पटना अधिवेशन का सभापतित्व करने के लिए आमंत्रित किए गए। अपने परिवार में बीमारी के कारण, बड़ी इच्छा रखते हुए भी मैं शुक्ल जी के साथ पटना नहीं जा सका। ‘पाटली-पुत्र‘ देखने की मेरी बड़ी इच्छा थी।

नागपुर के रामनारायण राठी, हिन्दी के ही प्रेमी सज्जन थे। उनके ‘मारवाड़ी‘ साप्ताहिक का मैं नियमित ग्राहक था। उन्होंने ही मेरी लघु पुस्तिका ‘लेटर्स टू माई ब्रदर्स‘ का प्रकाशन सन् 1909 में अपने मारवाड़ी प्रेस नागपुर से किया। जब काशी के मेरे परम मित्र बाबू गंगाप्रसाद गुप्त जी को नागपुर ‘मरवाड़ी‘ का संपादन करने के लिए बुलाया गया तब उन्होंने बड़ी इच्छा जाहिर की कि मैं उनके संपादक-मंडल में सम्मिलति हो जाऊं। गुप्त जी हिन्दी के प्रमुख लेखकों में से थे। हिन्दी में उनकी अनेक पुस्तकें हैं। उन्होंने झांसी की महारानी की जीवनी का भी हिन्दी में अनुवाद किया था। नागपुर में जब प्लेग का प्रकोप था तब उन्हें मजबूरी में एक दूर-दराज के गांव में रहना पड़ता था। यहां उनके 17-10-1909 के पत्र का एक अंश उद्धृत है -

“मैं तो आपको यहां आने का कष्ट देना चाहता था, परन्तु भयंकर प्लेग के कारण यह विचार त्याग देना पड़ा। उपर्युक्त योजना की आशा में ही मैंने आपके काव्य, लेखादि संपादकीय स्तंभों में छापना शुरु कर दिया था। कहिए, प्लेग कम होने पर आप यहां आ सकते हैं? या वहीं से सहायक संपादक के रुप में ‘मारवाड़ी‘ को अपना समझ कर इसकी सहायता कर सकते हैं?“ 

प्रसिद्ध विद्वान पं. गंगाप्रसाद अग्निहोत्री (नागपुर वाले) आगरा से मासिक पत्र ‘स्वदेश बांधव‘ निकालते थे। इस पत्र के 5 एवं 8 नवम्बर 1909 के अंकों में मेरी कृति ‘बालिका विनोद‘ (जो बालिकाओं के लिए लिखी गई थी) की समालोचना जब श्री गुप्ता जी ने पढ़ी तब वे स्वयं को, अपना अभिमत, अंग्रेजी में प्रकट करने से न रोक सके, जो कि निम्नानुसार था -

"The lethargy and negligence shown by sons of C.P. in the matter should be abhored in the face of your disinterested services and enthusiasm for Hindi"

इसके साथ इस आत्मकथा के कुछ अन्य महत्वपूर्ण प्रसंगों में एक, सारंगढ़ के प्रहलाद दुबे द्वारा रचित एक अप्रकाशित ग्रंथ्ज्ञ ‘जयचंद्रिका‘ को सारंगढ़ से तथा सम्बलपुर के गंगाधर मिश्रा द्वारा रचित एक संस्कृत रचना ‘कोशलानंद काव्यम‘ (जिसमें संबलपुर और पटना के राजाओं का इतिहास वर्णित है) की उनके द्वारा खोज का उल्लेख है। इसी प्रकार ब्राह्मी लिपि उत्कीर्ण किरारी के काष्ठ स्तंभ के बारे में स्पष्ट किया है कि ‘रासायनिक परीक्षण से ज्ञात हो गया है कि स्तंभ की लकड़ी मधुक (महुआ) है न कि साल या सरई- जैसा कि किरारी ग्राम के लोगों की धारणा थी।‘ एक अन्य प्रसंग पुरी और कोणार्क मंदिरों की मूर्तियों के बारे में है, जिसके संदर्भ में वे याद करते हैं- ‘महाकोशल स्थित बिलासपुर जिले के कवर्धा राज्य का एक राजा, ऐसे अश्लील चित्रों को भोरमदेव के मंदिर में देख कर इतना विचलित हुआ कि उसने इन चित्रों को नष्ट करने का आदेश ही दे डाला था।‘ गनीमत कि यह आदेश कार्यरूप में परिणित नहीं हुआ औैर भोरमदेव के मंदिर की मिथुन प्रतिमाओं के कारण ही उसकी प्रसिद्धि, मिनी खजुराहो या छत्तीसगढ़ का खजुराहो के रूप में हुई। एक अन्य महत्वपूर्ण उल्लेख है कि शांति निकेतन में हिन्दी अध्यापक के रूप में कार्य करने के लिए उन्हें, प्रयाग के पं. रामनरेश त्रिपाठी का तार मिला था, किंतु स्वास्थ्य संबंधी तथा पारिवारिक समस्याओं के कारण उन्होंने असमर्थता व्यक्त की। ‘कालांतर में बनारसीदास चतुर्वेदी शांति निकेतन में प्रथम हिन्दी अध्यापक हुए। बाद में पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी उनके उत्तराधिकारी हुए।‘ 1939 के त्रिपुरी कांग्रेस से संबंधित एक रोचक और महत्वपूर्ण उल्लेख यहां है।

जानकारी मिलती है कि पं. लोचन प्रसाद पांडेय जी की जन्मशती आयोजन समिति ने तय किया था कि उनके पुरातत्व पक्षों का संकलन और प्रकाशन पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर द्वारा किया जाएगा, जिसके अनुरूप 1988 में ‘कोसल कौमुदी‘ का प्रकाशन में हुआ। और उनके साहित्यिक अवदान तथा व्यक्तिगत पक्षों पर गुरु घासीदास विश्वविद्यालय, बिलासपुर द्वारा प्रकाशन किया जाएगा, इस क्रम में ‘समय की शिला पर ....‘ (पं. लोचनप्रसाद पाण्डेय की आत्मकथा)का प्रकाशन, उनकी 110 वीं जयंती पर पर स्मरणांजलि, 4 जनवरी 1997 को प्रकाशित हुआ। इस पुस्तक में आयोजन समिति या ऐसे किसी निर्णय का उल्लेख तो नहीं है किंतु भूमिका में कहा गया है- ‘कौशल कौमुदी‘ का प्रकाशन कर रविशंकर विश्वविद्यालय रायपुर ने पं. लोचनप्रसाद पाण्डेय के पुरातात्विक तथा इन्डोलॉजी सम्बन्धी कार्य को सुधी पाठकों तक पहुंचाया था।

पं. लोचनप्रसाद पाण्डेय की आत्मकथा उनकी हस्तलिखित अंग्रेजी पांडुलिपि, जिसका हिंदी में शाब्दिक अनुवाद उनके ज्येष्ठ पुत्र श्री प्यारेलाल पांडेय द्वारा किया गया था, उसका यह हिन्दी भावानुवाद ‘समय की शिला पर‘ उनके ‘साहित्यकार‘ से पाठकों का साक्षात्कार करायेगा, उनकी समाज सापेक्षता का परिचय देगा। यह प्रकाशन गुरु घासीदास विश्वविद्यालय, बिलासपुर के तत्कालीन कुलपति श्री रामकृपाल सिंह की अगुवाई में, डॉ. बी.एम. मुखर्जी, प्रो. सरोजकुमार मिश्र, प्रो. डी.एस. बल, प्रो. हेमलता महिस्वर के संपादन में हुआ था। इसके लिए सामग्री संकलन विनोद कुमार पाण्डेय ने तथा अनुवाद ईश्वरशरण पाण्डेय व हेमचंद्र पाण्डेय ने किया था।


यहां प्रस्तुत अंश ‘समय की शिला पर‘ पुस्तक का प्रथम अध्याय है।

Friday, February 18, 2022

भरदाः एक गांव

16 फरवरी 2022, ग्राम- भरदा, तहसील- बेरला, जिला- बेमेतरा, सहयात्री- श्री वृत्तांत गर्ग

भरदा, खारुन नदी के बांयें तट पर स्थित है। गांव के हाई स्कूल में पर्यावरण और उसमें विशेष रूप से पक्षियों पर चर्चा के लिए सभा का आयोजन किया गया। शाला में दो कक्षाएं नवमी और दसवीं हैं, जिसमें लगभग 80 दर्ज संख्या है। इनमें बालिकाओं की संख्या अधिक है। भवन, फर्नीचर, साफ-सफाई आदि अन्य व्यवस्था अच्छी है। आयोजन के सूत्रधार शाला के शिक्षक श्री विकेश यादव थे। गांव के वरिष्ठ, प्रतिष्ठित नागरिक श्री परगनिहा भी शामिल हुए। प्रधान अध्यापक बैठक में अन्यत्र गए थे। अन्य स्टाफ सर्व सुश्री मिश्रा, यादव, वर्मा की सक्रिय उपस्थिति थी। शाला के विद्यार्थियों के अलावा शाला के पूर्व छात्र और ग्राम के ही माध्यमिक शाला के आठवीं कक्षा के विद्यार्थी भी शामिल हुए।

श्री विकेश ने आयोजन और अतिथियों, अर्थात् श्री वृत्तांत गर्ग और राहुल कुमार सिंह का रोचक ढंग से परिचय दिया। उन्होंने गांव के पर्यावरण और जीव-जंतुओं के बारे में बात करते हुए विशेष रूप से उल्लेख किया कि गांव में कछुए आमतौर पर दिख जाते हैं। इस प्रकार आयोजन की भूमिका के रूप में गांव के पर्यावरण, जीव-जगत की उनकी बातों को विद्याार्थियों ने रुचिपूर्वक सुना। श्री वृत्तांत ने पर्यावरण के महत्व की संक्षिप्त भूमिका के साथ आगामी दिनों में बैकयार्ड बर्ड काउंट के बारे में बताया कि यह किस प्रकार उपयोगी और आवश्यक है साथ ही स्पष्ट किया कि इस दौरान अवलोकन पर ध्यान दें और अपनी जानकारी संभव हो तो फोटो, अन्यथा विवरण तैयार कर लें। मैंने ग्राम के नाम भरदा, साथ के गांव लवातरा की चर्चा के साथ बात आरंभ की, जो दोनों या अन्य भरर, भरुही जैसे नाम लार्क पक्षियों से संबंधित हैं और इन्हें नाइट जार से भी जोड़ा जाता है। पक्षियों के चित्र वाले, पिक्चर पोस्ट कार्ड विद्यार्थियों ने रुचि ली और पक्षियों के पहचान, स्थानीय नाम आदि सभी चर्चाओं में उत्साहपूर्वक भाग लिया। श्री परगनिहा ने गांव और जीव-जंतुओं, पक्षियों की चर्चा की। स्थानीय नाम, उनकी पहचान, आवास, स्वभाव को रोचक ढंग से बताया, जिससे स्पष्ट हुआ कि वे कितनी बारीकी और सजगता से अपने पर्यावरण पर नजर और समझ रखते हैं।

पूरे कार्यक्रम के दौरान विद्यार्थी अनुशासित रहे। उनमें कुछ संकोच अवश्य था, किंतु उत्सुक और सजग थे, ध्यान से सभी बातें सुनते रहे और बातचीत में हिस्सा भी लिया। विकेश यादव जी जैसे सक्रिय और उत्साही व्यक्ति शिक्षक के रूप में किस तरह विद्यार्थियों को पाठ्यक्रम की शिक्षा के साथ जानकारी और ज्ञान के सभी पक्षों के लिए प्रोत्साहित करते हैं, यह उल्लेखनीय है। परगनिहा जी स्कूल, ग्राम विकास, शिक्षा, समाज कल्याण के साथ पर्यावरण के प्रति उत्तरदायित्व महसूस करने वालों में से हैं। वृत्तांत जी शालीन और समझदार हैं, अपनी बात जिम्मेदारी सहित, स्पष्ट रूप से दूसरों के सामने सहज रूप से रखते हैं।

पुल, नदी के दोनों किनारों को जोड़ता है
और कभी इस तरह बांटता भी है.

विभाजक नदी के कारण रायपुर से करीब होने के बावजूद भी यह गांव, पहले दुर्ग जिले में था, अब बेमेतरा में है। जिला मुख्यालय से दूरी, गांव वालों के लिए अड़चन की बात है। अब पुल बन जाने से रायपुर आवागमन आसान हो गया है। कुछ और बातें रोचक मिलीं, जैसे गांव अनंदगांव, आनंद ग्राम। भेरवा ग्राम में भाट चितेरों की चित्रकारी का नमूना, जिनकी परंपरा क्षीण हो रही है और उनकी ओर ध्यान नहीं जाता और भी ऐसी कई बातें। रास्ते में ऐसे बहुत से खेत मिले, जिनमें हरियाली थी। खेतों में पम्प से पानी आ रहा था, कुछ खेतों में नमी थी, तो कई में पानी भरा हुआ था। संभवतः नदी पास होने के कारण भूमिगत जल पर्याप्त है। ऐसे सभी खेत तार घेराबंदी किए हुए थे। यह मवेशियों के प्रबंधन की स्थिति बदल जाने के कारण आवश्यक हो गया है, इस बदली हुई परिस्थिति में रोका-छेंका और गौठान आवश्यक हो गया है। इससे यह स्पष्ट हुआ कि इस क्षेत्र में उद्यमशील और सक्षम किसान हैं, जिसके कारण क्षेत्र धन-धन्य वाला होगा। रास्ते में खारुन नदी के पुल के पहले दाहिनी ओर विस्तृत क्षेत्र में बबूल के पेड़ फैले हुए हैं। नदी का किनारा, थोड़ी नमी और कुछ छाया है और चिड़ियों के लिए कीड़े-मकोड़ों का भरपूर चारा होने के कारण, यह स्थान उनको प्रिय है। दोपहरी धूप और गर्मी के बावजूद यहां लार्क, पिपिट, प्रीनिया, बुश चैट, हुप्पू, कोकल, कौआ, पंडुक, नीलकंठ, ड्रोंगो जैसी चिड़िया सक्रिय थीं और तीतर की पुकार लगातार सुनाई पड़ रही थी।

निषादराज बेनीराम भाट,
जजमान के घर की दीवार पर
चित्र बना कर चले गए हैं,
वापसी में यथामति-यथाशक्ति विदाई स्वीकार करेंगे.

ग्यारहवीं और बारहवीं की पढ़ाई के लिए बच्चे पास के एक बड़े गांव में जाते हैं, उस गांव का नाम है अनंदगांव। हमने जानना चाहा कि यह तो बड़ा सुंदर नाम है, किसने यह नाम रखा, यह कितना पुराना है। बताया गया कि यह नाम पुराना ही है, बल्कि मूल नाम आनंदग्राम था। हमें आश्चर्य हुआ, कि ऐसे नाम का कोई खास कारण? तब बताया गया कि वहां के लोग नैतिक, धर्मप्राण हैं, कथा-वार्ता का आयोजन होता रहता है। सभी जाति के लोग हैं, मिंझरा आबादी, लेकिन भेद-भाव नहीं, आपसी सौहार्द है। झगड़ा-झांसा नहीं होता, कोई मन‘मुटाव हो तो आपस में सुलझा लिया जाता है। बड़े-बुजुर्ग फैसला कर देते थे, वह सब लोग मानते थे। अभी भी वहां लोग अच्छे हैं।

सत्र के दौरान मेरे लिए कई रोचक और मजेदार अवसर बने। इनमें से उदाहरण के लिए एक- पक्षियों के चित्र दिखाते हुए उनकी पहचान, स्थानीय और अंग्रेजी नाम, उनके स्वभाव की बात हो रही थी, विद्यार्थी उत्साह से भाग ले रहे थे। आधे से अधिक कार्ड दिखाए जा चुके थे, तब ब्लैक ड्रोंगो के चित्र वाला कार्ड आया। इस पर जोर दिया कि इसका नाम विद्यार्थियों को बताना है। कोई जवाब नहीं आया। इस पर पूछा कि किसने-किसने यह देखा है साथ ही हम बताने लगे कि अभी आपके गांव आते-आते इन्हें तार पर बैठे देखा है। कई बच्चों सकारात्मक प्रतिक्रिया दे रहे थे, कि वे इससे परिचित हैं, इसे देखा है, मगर नाम नहीं बता पा रहे थे। तब हमने कहा कि इसका नाम तो आपलोगों को ही बताना है, चाहे गलत नाम बताओ, और कि फिर यहां गलत नाम बताने पर नंबर तो कटेंगे नहीं। फिर हमने कहा कि अगर इसका नाम आपलोगों ने नहीं बताया तो आगे कार्ड नहीं दिखाएंगे, दूसरी कोई बात करेंगे, जबकि अभी कई अच्छे सुंदर पक्षियों के कार्ड और हैं। विकेश जी ने भी प्रोत्साहित किया। एक किनारे से खुसफुसाहट हुई और कुछ बच्चे हंसने लगे। हमने कहा कि क्यों हंस रहे हो?, कोई हंसी की बात है तो हम सब लोग हंसेंगे, हमें भी बताओ। तब किसी ने कहा कि ये नाम बता रही है ‘करोना‘। हमने पूछा कि किसने यह बोला, उससे पूछा तो उसने धीमी आवाज में सही स्थानीय नाम बताया, हमने उसे शाबासी दी और अन्य बच्चों को बताया कि वह ठीक बता रही है, इस चिड़िया का नाम कर्राैआं है। इसे कोतवाल भी कहते हैं और फिर कोतवाल चिड़िया की खासियत बताई। सभी बच्चों ने इसका बहुत आनंद लिया।

विद्यार्थियों से पूछने पर कि जिस तरह तुम्हारे गांव कर नाम चिड़िया वाला है, आसपास और कौन सा गांव है, जो किसी जीव-जंतु पर है, एक बालिका ने तुरंत ही जवाब दिया 'भैंसबोड़'। हम भरदा जाते हुए कुछ दूर रास्ता भटककर भैंसबोड़ पहुंच गए थे और इस गांव का नाम हमारे ध्यान में था। जीव जगत के अन्य सदस्यों के आंचलिक-छत्तीसगढ़ी नाम, हिन्दी, अंग्रेजी और वैज्ञानिक नामों की बात होने लगी। हमने बच्चों से यह स्पष्ट करने के लिए उदाहरण लिया मेढक का, बच्चों ने तुरंत बता दिया राना टिग्रीना। यह उदाहरण लेने का एक कारण यह था कि शाला भवन के प्रवेश द्वार के दाहिनी ओर विद्यार्थियों द्वारा बनाए गए चार्ट थे, जिनमें एक चार्ट वैज्ञानिक नामों का था तथा इस चार्ट में सबसे ऊपर यही यानि मेढक-राना टिग्रीना था। ऐसे चार्ट की उपयोगिता रेखांकित हुई। बात आगे बढ़ी। हमलोगों के स्वागत में फूलों का गुलदस्ता था, उनकी ओर ध्यान दिला कर गुड़हल पूछा, जिसे छत्तीसगढ़ी में मंदार भी कहा जाता है, बच्चे नहीं बता पाए, उन्हें बताया गया हिबिस्कस रोजा। फिर गुलदस्ते से ही बात आगे बढ़ी। गुलदस्ते के बोगन वेलिया का फूल दिखा कर उसका नाम पूछने पर कई बच्चों ने एक साथ जवाब दिया- कागज फूल। हमने बोगन वेलिया नाम बताया, इससे कम ही बच्चे परिचित थे। फिर हमने कहा कि विज्ञान मैडम से पूछना कि यह कैसा फूल है? फूल है भी या नहीं, और इसकी खासियत क्या है। इस पर वर्मा मैडम ने अपनी ओर से रोचक सवाल किया कि हम मानव का वैज्ञानिक नाम क्या है? कईयों ने एक साथ जवाब दिया होमो सेपियन। बच्चों से उदाहरण पूछने पर उन्होंने गौरैया, बाम्हन चिराई और स्पैरो तुरंत रच लिया।

सभा के पहले शाला की कक्षाओं का अवलोकन करते हुए हमने ई-क्लास रूम देखा। यहां इतिहास विषय की मिश्रा मैडम क्लास में लैपटाप, मोबाइल और प्रोजेक्शन के माध्यम से बच्चों से रूबरू थीं। कक्षा की बैठक व्यवस्था पारंपरिक कतारवार के बजाय समूहवार थी, ई-क्लास और बैठक व्यवस्था के बारे में उन्होंने हमें बताया। यादव मैडम पूरे आयोजन की पृष्ठभूमि में व्यवस्थाओं में लगी थीं। विद्यार्थी उत्साहित थे, और संवाद-उत्सुक भी। सभी अपनी-अपनी भूमिका अनुरूप सक्रिय रहे।

ई-क्लास रूम और पाठ,
अब बच्चों के लिए अजूबा नहीं रहा.

स्पष्ट हुआ, ऐसा नहीं कि कमियां नहीं हैं, लेकिन नजरिया कि कमियां हमेशा बुराई नहीं होतीं, वे कई बार नई पैदा हुई और कभी समय के साथ बदली परिस्थितियों के कारण बनी आवश्यकताएं होती हैं, इसलिए कमियों को नकारात्मक मानते हुए उनकी उपेक्षा या बचने का नहीं बल्कि इस दृष्टि से उनके प्रति, परिवर्तन या पूर्ति का प्रयास ही श्रेयस्कर है। जिनसे भी मिले, सम-विषम परिस्थितियों के बावजूद वे अपनी भूमिका में सकारात्मक और उद्यमशील थे। हम वापस लौटते हुए अवचेतन में समृद्ध महसूस कर रहे थे, उसके पीछे ऐसी क्या बातें थीं, सोचते हुए अभिव्यक्ति का यह एक प्रयास।

सिंहावलोकन‘ में चिड़ियों पर अन्य पोस्ट के लिंक- 

Wednesday, February 16, 2022

सिंहावलोकन-अभिलेखागार

सिंहावलोकन‘ वेब-लॉग (ब्लॉग), मुख्यतः संस्कृति संबंधी जानकारियों को सुलभ सार्वजनिक करने के साथ, दस्तावेजों को डिजिटाइज कर संरक्षित करने प्रयास है। इस उद्देश्य की पूर्ति पिछले 11 साल, 11 महीने में, इसके 300 पोस्ट से हो रही है, जिसकी सूची यहां है, इन पंक्तियों के लिखे जाने तक 469500 पार, यानि औसतन प्रतिदिन 100 से अधिक बार देखी गई है। कुछ सम्मान, पुरस्कार मिले, प्रशंसा मिलती रही, वह काम की दिशा निर्धारित करने में मददगार रही।

21 अप्रैल 2010 से ‘यूनिक आईडी‘ पोस्ट के साथ आरंभ ‘सिंहावलोकन‘ पर अब तक के पोस्ट के चार दौर हैं। पहला, अप्रैल 2010 से जनवरी 2013 तक, प्रति माह 4 पोस्ट का क्रम, दो-एक अपवाद के साथ चलता रहा, जिस दौरान 134 पोस्ट आए। दूसरा, फरवरी 2013 से जनवरी 2020 तक यह क्रम सुस्त रहा और 43 पोस्ट आए। तीसरा, कोरोना का दौर आया मार्च 2020 से अक्टूबर 2020 तक, जिसमें 16 पोस्ट और फिर चौथा, नवंबर 2020 में सेवानिवृत्ति के बाद दिसंबर 2020 से 194 से आगे, 11 फरवरी 2022 तक 107 पोस्ट मिला कर कुल 300 पोस्ट हो गए। इस तरह पहले दौर के 34 महीने में 134 पोस्ट, दूसरे 84 महीने के दौर में 43, तीसरे 8 महीने में 16 और ‘अनमोल दस्तावेज‘ पोस्ट के साथ 300 पहुंचने का यह चौथा दौर 15 महीने में 107 पोस्ट का रहा। लगा कि कुछ ठहर कर देख लिया जाय कि हो क्या रहा है, जो हो रहा है, क्या वही करना चाह रहा हूं?

अपने स्तर पर इसी तरह आगे बढ़ते रहने का प्रयास रहेगा, लेकिन विचार है कि राज्य का अधिकृत डिजिटल प्लेटफार्म होना चाहिए, जिसे ‘छत्तीसगढ़ वेब-अभिलेखागार Chhattisgarh Web Archive‘ जैसा नाम दिया जा सकता है। शासकीय सेवा में रहते हुए तथा उसके बाद भी मेरे द्वारा विभिन्न मंचों पर इस संबंध में अपनी बातें रखने का प्रयास किया जाता रहा है, जिसे नीचे संयोजित किया गया है-

छत्तीसगढ़ की संस्कृति, साहित्य और इतिहास के प्रामाणिक और प्राथमिक स्रोतों को एकत्रित और सुरक्षित करते हुए इंटरनेट के माध्यम से सर्वसुलभ बनाने की दृष्टि से वेब-अभिलेखागार आवश्यक है जो राज्य के गौरव की तथ्यात्मक और ऐतिहासिक जानकारी, हमारे समकालीन जीवन की समग्रता में (राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक) जानकारी उपलब्ध हो जो भविष्य में इस कालखंड पर शोध एवं लेखन करने वालों के लिए आधार उपलब्ध कराएं।

● वेब-अभिलेखागार में अंगरेजी, हिन्दी, छत्तीसगढ़ी तथा अन्य आंचलिक भाषा-बोली की पुरानी पुस्तकें, जो अब सहज उपलब्ध नहीं हैं, शासकीय पत्राचार, रिपोर्ट-प्रतिवेदन, शोधपत्र, डायरियां व अन्य उक्त प्रयोजन के अपुरूप निजी पत्र जेसी सामग्री को डिजिटाइज कर नेट पर अपलोड किया जाए।
● वर्तमान में विभिन्न स्तरों पर ऐसे प्रयास हुए हैं, जैसे संस्कृति विभाग द्वारा सहपीडिया के माध्यम से छत्तीसगढ़ की संस्कृति से संबंधित 60 माड्यूल्स तैयार कर अपलोड कराए गए हैं। पं. रविशंकर विश्वविद्यालय द्वारा शोध-प्रबंधों को डिजिटाइज किया गया है। कुछ निजी वेबसाइट जैसे आरंभ एवं गुरतुर गोठ पर ऐसी सामग्री अपलोड की गई है। 
● राज्य का अभिलेखागार संस्कृति विभाग के अधीन है। मध्यप्रान्त और बरार, नागपुर के अभिलेखागार की सामग्री, सन 1956 में मध्यप्रदेश, भोपाल में स्थानांतरित की गई, जहां छत्तीसगढ़ से संबंधित लगभग 6 लाख पृष्ठ सामग्री होने का अनुमान है। ऐसी सभी सामग्री को वर्गीकृत, सूचीकरण कर अपलोड करना, औचित्यपूर्ण और सार्थक होगा। 
● इसके अतिरिक्त राज्य में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र, नई दिल्ली के मैन्युस्क्रिप्ट मिशन के तहत कराए गए सर्वेक्षण से ऐसी महत्वपूर्ण सामग्री की जानकारी एकत्र की गई है। राज्य के पुराने शासकीय कार्यालयों, (जिला कार्यालय, स्कूल, वन विभाग, पुलिस थाना आदि) संस्थाओं तथा निजी संग्रहों में अब भी ऐसी सामग्री है, जिसकी जानकारी एकत्र कर उसे डिजिटाइज कर सर्वसुलभ कराया जाना आवश्यक है। 
● वर्तमान डिजिटल युग की स्थितियों और आवश्यकता को देखते हुए अभिलेखागार के लिए विशाल भवन की तुलना में प्राथमिक रूप से एक अच्छे समृद्ध और व्यवस्थित वेब-पोर्टल की आवश्यकता है, यह ‘सूचना के अधिकार‘ की मंशा के भी अनुरूप होगा, जहां राज्य के गौरव की तथ्यात्मक और ऐतिहासिक जानकारी और दस्तावेजों के मूल की डिजिटल प्रतियां उपलब्ध हो, जो शोधकर्ताओं, अध्येताओं, राज्य में रुचि रखने वालों के लिए आधारभूत विश्वसनीय जानकारी सर्वसुलभ उपलब्ध कराए तथा ऐसी जानकारी जो पहले से किसी अन्य प्लेटफार्म पर उपलब्ध है, उनका लिंक हो।

वेब-अभिलेखागार की वेबसाइट के लिए सामग्री- दस्तावेजों/ अभिलेखों/ चित्र, छायाचित्र (फोटोग्राफ) को सर्च में आसानी और उपयोगकर्ता की सुविधा की दृष्टि से निम्नानुसार बिंदुओं में वर्गीकृत-सूचीकरण होना चाहिए- 

● भाषा- छत्तीसगढ़ी, हिन्दी, अंगरेजी, अन्य आंचलिक भाषा-बोली 
● सामग्री- शासकीय पत्र (हस्तलिखित, टाइप, कम्प्यूटर प्रिंट), शासकीय प्रतिवेदन, आदेश, राजनेताओं-जनप्रतिनिधियों के पत्र, देशी रियासतों के पत्र, प्रतिवेदन, आदेश, पुस्तकें, पत्र-पत्रिकाएं, शोधपत्र, लेख, डायरी, परचे, चित्र, छायाचित्र (फोटोग्राफ) अन्य।
● व्यक्ति नाम- स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, शहीद, अंगरेज अधिकारी, भारतीय अधिकारी, रियासतों, जमींदारियों के प्रमुख, नागरिक अन्य।
● स्थान नाम- प्रशासनिक इकाई, ग्राम नाम, अंचल-क्षेत्र का नाम, भौगोलिक इकाई का नाम, अन्य। 
● काल- सन् वर्षवार (यथाआवश्यक कालक्रम में मास एवं तिथिवार) के साथ/अतिरिक्त दशक, सदी के चतुर्थांश, आधी सदी में तथा सदी में विभक्त हो।
● घटना- यथाआवश्यक ऐतिहासिक महत्वपूर्ण घटनाओं यथा कंडेल नहर सत्याग्रह, बीएनसी मिल हड़ताल, रायपुर षड़यंत्र केस इसी प्रकार अन्य उल्लेखनीय घटनाओं, जिसमें प्राकृतिक आपदा, उपलब्धि आदि हों, को पृथक लेबल में। 
● इसी प्रकार विशिष्टता, विषय-क्षेत्र यथा भूगोल, प्राकृतिक संसाधन, वन-वन्य जीवन, जनजातीय समुदाय, पुरातत्व, लोक-जीवन, समाजार्थिक गतिविधियां आदि।

प्राथमिकता- सन 1950 तक की काल-अवधि तथा छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण से संबंधित सामग्री के डिजिटाइजेशन-स्कैन एवं अपलोड करने की प्राथमिकता हो, किन्तु इस क्रम में उपलब्ध होने वाली अन्य उपयुक्त सामग्री को भी यथा-अवसर अपलोड करने हेतु डिजिटाइज किया जाना। यह ध्यान रखना होगा कि दुर्लभ, जिसकी अन्य/अधिक प्रतियां होने की संभावना न हो, वलनरेबल सामग्री के डिजिटाइजेशन को उच्च प्राथमिकता में रखना होगा। यह भी ध्यातव्य होगा कि छत्तीसगढ़ की भौगोलिक और प्रशासनिक सीमाएं बदलती रही हैं, इसलिए छत्तीसगढ़ से संबंधित संलग्न क्षेत्रों की सामग्री भी इसमें होना उपयुक्त होगा। 
ऐसे प्रकाशन भी अब
दस्तावेजी महत्व के हैं।

इसके साथ राज्य की लोक एवं जनजातीय सांस्कृतिक पहचान के विभिन्न पक्ष, रामलीला, नवधा, रामसप्ताह, रहंस आदि परंपरागत प्रस्तुतिपरक विधाएं, लोकगीत, प्राचीन साहित्य, स्वाधीनता संग्राम से संबंधित दस्तावेज आदि तथा इससे संबंधित उपलब्ध तथा एकत्र की गई जानकारी को निर्घारित वर्गीकरण के अनुरूप अपलोड किया जाना उपयोगी और आवश्यक होगा।

इसी प्रकार, उदाहरणस्वरूप- छत्तीसगढ़ी दानलीला, खुसरा चिराई के बिहाव, छत्तीसगढ़ी मेघदूत, छत्तीसगढ़ के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, छत्तीसगढ़ के जिला गजेटियर 1910, फ्युडेटरी स्टेट गजेटियर तथा मध्यप्रदेश में तैयार किए हुए, रतनपुर गुटका, वीर नारायण सिंह की फांसी आदेश की प्रति, जगन्नाथ प्रसाद भानु, ठाकुर जगमोहन सिंह, लोचन प्रसाद पांडेय के प्रकाशन, ए. कनिंघम की रिपोर्ट, प्रथम सेटलमेंट रिपोर्ट आदि जैसी सामग्री प्राथमिकता से अपलोड किया जाना उचित होगा।

साथ ही ध्यातव्य कि वर्तमान के दस्तावेज ही भविष्य में अभिलेख होंगे, ऐसे दस्तावेजों का अभी संकलन आसान होगा। अतएव इस दृष्टि समकालीन महत्वपूर्ण दस्तावेजों को डिजिटाइज कर, एकत्रित रखना उचित होगा, जिसे यथोचित अवसर पर अपलोड किया जाना। उदाहरणस्वरूप शासन के राजपत्रों को प्रकाशन के साथ इस प्लेटफार्म पर अपलोड करना उपयोगी होगा। इसी प्रकार वेब-अभिलेखागार के निर्माण संबंधी आरंभिक आदेश आदि भी ऐसे दस्तावेज हैं, जिन्हें आरंभ में ही अपलोड किया जा सकता है।

अन्य स्रोत- छत्तीसगढ़ से संबंधित ऐसी सामग्री, जो अन्य किसी वेबसाइट, प्लेटफार्म पर उपलब्ध है, उसके लिए संदर्भ खंड बना कर लिंक दिया जा सकता है, किन्तु यह निर्भरता की स्थिति होगी अर्थात् अन्य स्रोत के निष्क्रिय हो जाने अथवा बाधित हो जाने अथवा सामग्री हटा लिये जाने की स्थिति में ऐसी सामग्री की उपलब्धता नहीं रहेगी, इसलिए ऐसी संबंधित समस्त सामग्री, जो अन्य स्रोतों पर हैं, उन्हें भी छत्तीसगढ़ वेब-अभिलेखागार पर ला कर, इसे सर्वाधिक संपन्न और विश्वसनीय ‘वन स्टॉप साइट‘ बनाने का प्रयास किया जाना। 

मूल स्रोत और योगदानकर्ता- सामग्री के साथ यह जानकारी भी एकत्र कर आंतरिक स्तर पर रखनी होगी कि डिजिटाइज सामग्री का मूल किस व्यक्ति, संस्था, कार्यालय, स्थान में संधारित है और उसके संरक्षण की स्थिति कैसी है। इसी प्रकार डिजिटाइज करने वाले शासकीय/अशासकीय, जन-सामान्य, स्वयं संधारक आदि श्रेणी में जानकारी रखनी आवश्यक होगा।

प्रत्याख्यान (डिस्क्लेमर)- वेब-अभिलेखागार में अपलोड कर, सार्वजनिक की जाने वाली सामग्री ऐतिहासिक दस्तावेज-अभिलेखों का पुनः प्रकटीकरण मात्र है न कि नई मौलिक जानकारी। यह दस्तावेजों को सुरक्षित रखते हुए, मानव सभ्यता और राज्य के इतिहास, संस्कृति संबंधी जानकारी को अक्षुण्ण बनाए रखने का प्रयास होगा, जिसका उद्देश्य गैर-व्यावसायिक, शोध-अकादमिक, सभ्यता के विभिन्न पड़ाव के तथ्यों एवं विकास की रूपरेखा के लिए आधार सामग्री है। संभव है कि इसमें कुछ सामग्री कॉपीराइट सीमा में हो, तथा ऐसी ऐतिहासिक जानकारी, शब्द, कथन, अभिव्यक्ति हो, जो किसी वर्ग, समूह, व्यक्ति द्वारा आपत्तिजनक मानी जावे, किंतु दस्तावेज-अभिलेखों के ऐतिहासिक, मात्र पुनः प्रकट किए जाने तथा उद्देश्यों को दृष्टिगत रखते हुए ही इनकी प्रस्तुति होगी, फिर भी आपत्ति होने पर सक्षम स्तर पर विचार किया जा सकेगा। 

प्रसंगवश- मीडिया के हवाले से जानकारी मिली थी कि इस संबंध में राज्य के मुख्यमंत्री जी के स्तर पर अप्रैल 2021 में सकारात्मक निर्णय ले लिया गया है, जिसमें उल्लेख है कि ‘संस्कृति विभाग से हाल ही में सेवानिवृत्त अधिकारी श्री राहुल सिंह की सहायता इस कार्य में ली जाये‘ किंतु आगामी कार्यवाही अब तक विचाराधीन है अथवा इसमें प्रगति की सूचना मुझे किसी स्रोत से प्राप्त नहीं हुई है। 

अब मानता हूं कि अपने समय को, संचित और प्रारब्ध की दृष्टि से क्रियमाण रखना, स्वयं के लिए आवश्यक है, शायद लोगों-समाज के लिए भी काम का हो। ऐसी स्थिति में अपने स्तर पर जो संभव है, वह मेरे ब्लॉग ‘सिंहावलोकन‘ पर ऐसी जानकारी-सामग्री लाना, जो छत्तीसगढ़ के इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति, साहित्य, कला से संबंधित है, अल्पज्ञात हो, सुलभ न हो, उसे प्रकट कर, सार्वजनिक करते हुए संरक्षित करना। इसके अतिरिक्त ऐसे प्रकाशन का पीडीएफ तैयार करना, प्राप्त करना और उसे समान रुचि वालों के बीच बांट कर फैलाना। प्रयास होगा कि ‘वय-वानप्रस्थ‘ से आरंभ यह क्रम ‘वय-संन्यास‘ तक तो निरंतर रहे ही।

आभार- ‘सिंहावलोकन‘ की शुरुआत पा.ना. सुब्रह्मनियन जी ने कराई। उस दौर के धाकड़ ललित शर्मा जी, संजीव तिवारी जी, जी.के. अवधिया जी और बी.एस. पाबला जी, तकनीकी सहयोग और मार्गदर्शन देते रहे। 

Friday, February 11, 2022

अनमोल दस्तावेज

पांडुलिपियों के संरक्षण और अध्ययन के लिए किए जा रहे प्रयासों का लेखा-जोखा, बकलम राजेश गनोदवाले, इंडिया टुडे के 21 नवंबर 2007 अंक में प्रकाशित हुआ था, इसमें आई जानकारी संदर्भ हेतु सुलभ रहे और इस दिशा में रुचि लेने वालों, काम करने के लिए आधार बने, इस दृष्टि से उपयोगी मानते, यहां प्रस्तुत- 



प्राचीन ज्ञान की नई रोशनी 

छत्तीसगढ़ में 2000 से अधिक दुर्लभ पांडुलिपियां मिलीं- इससे 
यह मिथक भी टूटा कि यह आदिवासी इलाका सदियों से निरक्षरता 
और अज्ञानता के अंधकार में डूबा था 

यह ज्ञान का ऐसा पुराना और धुंधला हो उठा खजाना है जिसके लिए राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन (रापांमि) संजीवनी बनकर उभरा है। भावी पीढ़ी को इतिहास, पुरातत्व, आयुर्वेद, लोक संस्कृति और पौराणिक आख्यानों से परिचित कराने में समर्थ इस विरासत को जीवनदान देने का विचार देर से आया लेकिन दुरुस्त आया। क्या इस खजाने की जीवनरेखा फिलहाल मिटने मुहाने पर खड़ी है। शायद इसी संकट को भांपकर रापांमि देशभर के ऐसे राज्यों को खंगालने निकल पड़ा जहां से ऐसी संपदा मिलने का भरोसा है। रापांमि का मंसूबा वर्ष भर में 10 लाख से अधिक पांडुलिपियों को इलेक्ट्रॉनिक कैटलॉग में दर्ज करने का है। उसके इरादों को कहीं और कितनी तवज्जो हासिल हुई, इसे उसके आला अफसरान ही बता सकते हैं। अलबत्ता नए राज्य छत्तीसगढ़ में इस रचनात्मक काम का खासा स्वागत हुआ। इससे बेहतर नतीजा क्या होगा जो खोजबीन के प्रथम तीन माह में, जबकि योजना का प्रथम चरण चल रहा है, कुल 2,000 दुर्लभ बेशकीमती पांडुलिपियों को चिन्हित कर लिया गया। 

जीर्ण-शीर्ण हालत में इन पांडुलिपियों को देखने के बाद राज्य सरकार का प्रसन्न होना स्वाभाविक था। इस ऑपरेशन के राज्य समन्वयक जी.एल. रायकवार इसे अच्छी उपलब्धि करार देते है। छत्तीसगढ़ में इसकी बहुतायत के साथ राज्य को पांडुलिपियों का गढ़ मानने में भी उन्हें संकोच नहीं है। इस उपमा में अतिशयोक्ति ढूंढना इसलिए निरर्थक होगा क्योंकि प्रदेश के लगभग आधे जिलों से ऐसी पांडुलिपियां बाहर निकल आईं जिनका काल 200 से 400 साल पुराना बताया जा रहा है। रायकवार की राय में आगे पड़ताल करने पर यहां वे चीजें मिलेंगी जिससे पाडुलिपियों की देशव्यापी पट्टी में नए सूत्र जुड़ सकते हैं। प्रदेश के संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री बृजमोहन अग्रवाल पांडुलिपियों को पूर्वजों के पगचिन्ह कहते हैं, उनके मुताबिक संग्रहालय में इनका एक अलग प्रकोष्ठ बनेगा। उन्होंने अधिकारियों को इनके अध्ययन-चिन्हांकन की व्यवस्था करने के अलावा इस दुर्लभ धरोहर को बेहद गंभीरता से लेने के निर्देश दिए है। संस्कृति मंत्री की मानें तो इस नए काम में छत्तीसगढ़ का अलग-सा चेहरा बाहर आएगा। 

यकीनन, दुर्लभ पांडुलिपियों में दर्ज ज्ञान को सुरक्षित रखने की योजना के लिए रापांमि ने जब छत्तीसगढ़ को इस मुहिम में लग जाने को कहा था तो इसके नतीजों के बारे में सब अनजान थे, पर भरोसा जरूर था। करीब 10 जिलों में जिलाधीशों द्वारा मनोनीत संयोजक विश्वस्त मंडली के साथ गांव-गलियों में बिखर गए। इनमें बढ़त ली महासमुंद जिले ने। 853 पांडुलिपि देने वाले इस जिले के मिशन प्रभारी लेखराज शर्मा शहरी क्षेत्रों की बजाए ग्रामीण इलाकों में मिले प्रतिसाद को सकारात्मक मानते हैं। इससे यह मिथक भी टूटा कि आदिवासी निरक्षर हैं। शर्मा के मुताबिक पूर्वजों की सैकड़ों वर्ष पुरानी इन पांडुलिपियों का मिलना इस बात का सबूत है कि उस दौर में साक्षरता का बेहतर बोलबाला था वरना पूर्वजों की पेटियों में ज्ञान का यह कोश कहां से और कैसे आया। सचमुच छत्तीसगढ़ में अविभाजित म.प्र. के दौर में ऐसी पड़ताल कभी नहीं हुई। इसलिए जिलाधीशों का फरमान कहीं उत्साह पैदा करता रहा तो अपनी कीमती विरासत के खो जाने का भय पालने वाले लोग भी सर्वे दल से टकराए। अंबिकापुर के परियोजना संचालक दिनेश कुमार झा को याद है कि सामान्य-से नजर आने वाले गंवई नागरिकों ने से बड़े जतन से संभालकर रखा है। पहले तो वे संदेह से देखते थे कि उनकी इस पुरखा धरोहर का शासन क्या करेगा, लेकिन मन से मन मिला तो सहयोग करने वाले आगे आने लगे। 

इस तरह बने लिपि, ग्रंथ और पुस्तक 
राहुल कुमार सिंह इस विषय के गहन जानकारों में से हैं. वे बताते हैं, ‘लिख‘ का अर्थ कुरेदना है. ‘लिप‘ स्याही के लेप के कारण प्रचलित हुआ. ‘पत्र‘ या ‘पत्ता‘ भूर्जपत्र और ‘तालपत्र‘ से आया. पत्रों  के मध्य धागा पिरोना ‘सूत्र मिलाना‘ है और सूत्र ग्रंथित होने के कारण पुस्तक ‘ग्रंथ‘ है, जबकि ‘पुस्त‘ का अर्थ पलस्तर या लेप करना है. ग्रंथ बनने की प्रक्रिया में पत्रों पर लौह शलाका से अक्षर कुरेदे जाते थे. स्याही का लेप करने से अक्षर उभरते थे. 

उधर, दुर्ग जिले के, जिसने 575 के लगभग पांडुलिपियां चिन्हित की, प्रमुख संयोजक रामकुमार वर्मा नागरिकों को समझाते थे कि शासन इन्हें छीनने या राजसात करने नहीं वरन् यह बताने आया है कि वे इन्हें और लंबे समय तक कैसे सुरक्षित रख सकते हैं। जब ग्रामीणों ने बेहतर रख-रखाव का सूत्र जाना तो संदेह का संकट विश्वास में बदल गया। झा बताते हैं कि जब गृह स्वामियों ने संदूकों में सिमटी से जर्जर वस्तु की उपयोगिता को समझा तो वे खुद के खर्च से शासन के पास चलकर आए और पांडुलिपियों से भरी गठरी सामने धर दी। कांकेर जिले में अंतागढ़ इलाके से 112 पांडुलिपियां खोजने वाले राम विजय शर्मा बताते हैं, ‘‘प्रारंभिक दौर सचमुच मुश्किल भरा था। विश्वास जीतने में काफी समय लगता था। कई घरों में तो ऐसे हालात ये कि घर के सदस्यों ने 40-50 वर्षों बाद पहली दफा पांडुलिपियां देखीं।‘‘ वैसे ये पांडुलिपियां ग्रामीण भागों के अलावा घनी आबादी वाले शहरी क्षेत्रों में भी मिलीं। इन्हें जतनपूर्वक रखने वाले लोगों से भी सामना हुआ। थोड़ा-बहुत तो शासन के अपने रिकॉर्ड में भी यह मिला। प्रदेश के एकमात्र संस्कृत महाविद्यालय में 1,100 के करीब पांडुलिपियां लाल कपड़े के गट्ठे में सुरक्षित हैं। वहीं महंत घासीदास संग्रहालय का अपना खंड भी इस मायने में समृद्ध है। 

खोजबीन की इस कवायद ने विभाग में आशा की किरण को उभार दिया है। वजह है उन चीजों का मिलना जिसकी उसे सपने में भी उम्मीद नहीं थी। मिसाल के तौर पर अंबिकापुर इलाके ने बौद्ध साहित्य दिया तो रायकवार प्रदेश में आए रिफ्यूजी परिवारों के पास बंग साहित्य मिलने का संकेत मानते हैं। रायगढ़ के संयुक्त कलेक्टर संतोष देवांगन को जिले में इस मिशन को अंजाम देने के दौरान ताड़पत्रों वाली 500 ऐसी पांडुलिपियां मिलीं जो विषय के मामले में बेजोड़ साबित हुई जैसे ‘सिकलिन बीमारी का निदान‘, ‘गौ चिकित्सा‘, तालाब का महत्व बताती ‘तालाब प्रतिष्ठा‘ एवं मानव जीवन में कौवे की उपस्थिति का अर्थ खोलती ‘काकदूलन‘ आदि उपलब्ध हुईं। देवांगन 400 बरस उम्र वाली इस धरोहर को मानव जीवन के विकास का एक पड़ाव मानते हैं। विभागीय अधिकारी या जमीनी कार्यकर्ता इस काम के सिलसिले में जहां-जहां गए, सबने लोगों को यही समझाया कि सरकार की नजर उनकी इस विरासत पर नहीं है। सरकार का मकसद उपलब्ध पांडुलिपियों का चिन्हांकन कर सिर्फ यह पता लगाना है कि अगर कहीं ऐसी चीजें हैं तो किस हाल में हैं। ऑपरेशन पांडुलिपि में लगे अधिकारियों ने जर्जर होती पांडुलिपि एवं उसमें दर्ज ज्ञान से बेखबर उनके मालिकों को बताया कि न तो उन पर पानी के छींटे मारने चाहिए, न चंदन-कुमकुम आदि लगाएं। उन्होंने सीलन से सुरक्षित रखने का तरीका भी सिखाया। शासन को इस काम में निरंतर सफलता मिल रही है, जैसे कुछ जागरूक नागरिक अपने निजी संग्रह की जानकारी विभाग को आकर दे रहे हैं, डॉ. भानुप्रताप सिंह, डॉ. दीपक शर्मा ऐसे ही हैं जिन्होंने पांडुलिपि का पंजीयन कराने में खुद दिलचस्पी दिखाई। 

भाषा, माध्यम और विषय 
अब तक मिली अधिकांश पांडुलिपियां ताड़पत्रों वाली हैं. इसके अलावा तामपत्र, कपड़े, चमड़ा, कागजों वाली भी नजर आईं. इनमें संस्कृत, देवनागरी, उड़िया, लरिया, तमिल, तेलुगु का प्रयोग है. आकर्षक चित्रों से युक्त पांडुलिपि भी मिली. अध्यात्म, पुराण, ज्योतिष, फलादेश, कर्मकांड, वेद-पुराण, आयुर्वेद, वैद्यक, संगीत कला, तंत्र-मंत्र विषय हैं. पांडुलिपि लेखन उपकरण भी साथ में मिले. 

यह तो था खोजबीन, चिन्हांकन एवं ज्ञान का दस्तावेजीकरण। दूसरे दौर में बेशकीमती धरोहरों का क्रमवार विषय, लिपि, लेखक, कृतिकार एवं संवत् की पड़ताल करने का अध्ययन होगा। इनका प्रकाशन भविष्य की योजना रहेगी। भोपाल के लोक अध्येता बसंत निरगुणे कहते हैं, ‘ज्ञान पांडुलिपियों को छलनी की मदद से देखना होगा वरना भावुकता कहीं ऐसी चीजों की भीड़ न बढ़ा दे जो हर नजरिए से गैर-उपयोगी है।‘‘ झा को भी ऐसा ही अंदेशा है, ‘‘रापांमि को इसका फालोअप करना चाहिए। ऐसा न हो कि कुछ रोज के उत्साह के बाद आंखें मींचकर सो जाएं।‘‘ रापांमि के डाक्यूमेंटेशन प्रभाग में स्टेट कोऑर्डिनेटर की हैसियत से यह काम देख रहे डॉ. डी.के. कर इस धरोहर को संग्रहालय या पुस्तकालय में रखने का सुझाव देते हैं। देवांगन को तो ग्रामीणों ने इसे निःशुल्क सौंपना चाहा, बशर्ते रख-रखाव में सरकार ईमानदारी बरते। यानी रास्ते खुले हैं। 

और अंत में, रासायनिक परीक्षण, लेपन के बाद ये पांडुलिपियां डिजिटल रूप में परिवर्तित होंगी जो कि रापांमि की इस महती कार्ययोजना का अगला चरण है। जाहिर है, तब इन पांडुलिपियों के दर्शन का सुख उस तरह से नहीं बचेगा जो दरअसल इनका वैभव है। फिर भी इतना क्या कम है कि पत्तों में दर्ज विषय और ज्ञान की यह दुर्लभ दुनिया देर से ही सही, डगमगाते, ठिठकते सतह पर उभर आई। 

-राजेश गनोदवाले

Thursday, February 10, 2022

कलचुरि राज परिवार

बात यही कोई 25-30 साल पुरानी है। हमारे बिलासपुर आफिस में एक सज्जन पधारे। दुआ-सलाम के बाद मैंने आने का प्रयोजन पूछा। उन्होंने कहा कि कलचुरियों का इतिहास जानना चाहते हैं। इतने संक्षिप्त के बावजूद समझ में आ रहा था कि ये न पत्रकारों वाली पूछताछ है, न शोधकर्ता की, कोई किताब लिखने वाला प्राणी भी नहीं लगा, प्रश्न करने का ढंग संयत और शालीन था। मैंने जवाब दिया, ढेरों जानकारियां हैं, मगर बिखरी हुई, आपको किस तरह की जानकारी (क्यों?) चाहिए। इस पर जवाब आया, वह चौंकाने वाला था। उन्होंने कहा मैं रतनपुर कलचुरि परिवार का वंशज बड़गांव वाला राजेश्वर सिंह हूं। मेरे सामने हजार साल का इतिहास जीवंत हो गया। बातें होने लगीं, मैंने कहा कि मुझे तो आपसे अपेक्षा है कि आपके परिवार संबंधी इतिहास की कुछ ऐसी जानकारी मिल जाएगी, जिससे हम अभी तक अपरिचित हैं। उन्होंने बताया कि उनके पास ऐसा कुछ नहीं है। मैंने तत्काल, प्रकाशित सामग्री की जो छायाप्रति दी जा सकती थी, उन्हें सौंपा। फोन नं., पता लेन-देन हुआ फिर चाय-पान और विदा। कभी यह किस्सा मंजुसांईनाथ को सुना रहा था, उन्हें इन बातों में कुछ खास दिखा और वे तैयारी में जुट गए, फिर एक दिन बताया कि वे सबसे मिल कर आ गए हैं और इतिहास की बारीकी टटोलने लगे। थोड़े दिन बाद इंडिया टुडे के 12 अक्टूबर 2005 अंक में यह छपा, स्थायी संदर्भ जैसे महत्व का मान कर, सुरक्षित और सार्वजनिक करने हेतु यहां यथावत- 


विरासत  छत्तीसगढ़/कल्चुरी राजवंश 

काल की मार से चूर 

भारत में संभवतः सबसे लंबे समय तक राज करने और छत्तीसगढ़ की संस्कृति तथा जीवन शैली पर 
अपनी अमिट छाप छोड़ने वाले कल्चुरी राजवंश का अब क्रूर नियति से सामना 

भारत में कभी सबसे लंबे समय तक राज करने वाले परिवारों से एक सूर्यवंशी राज परिवार अंधेरों में खोता जा रहा है। लेकिन अटूट आस्था राजेश्वर सिंह को उनके पुश्तैनी गांव महासमुंद जिले के राजा बडगांव में चंडी देवी के उस मंदिर में आशीर्वाद के लिए ले आती है जिनके प्रताप से यह परिवार सदियों तक चमकता रहा।

59 साल की उम्र में भी राजेश्वर सिंह अपने परिवार के अनुकूल प्रतिष्ठा पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। वे छत्तीसगढ़ के भाग्य निर्माता और राज्य के बाशिंदों की जीवन शैली पर अमिट छाप छोड़ने वाले कल्चुरी राजवंश का इकलौता जाना-पहचाना चेहरा हैं। छत्तीसगढ़ की संस्कृति और विशिष्ट जीवन शैली पर यह कल्चुरी प्रभाव ही था कि यह क्षेत्र बहुत पहले शेष मध्य प्रदेश से अलग हो गया था।

कल्चुरी महाभारत काल में हैहयवंशी माने जाते थे। वे चेदि देश के शासक भी थे और संभवतः महाभारत का शिशुपाल उनका पुरखा था। हैहयवंशियों के बारे में अधिकृत प्रमाण दूसरी सदी के बाद तब मिलते हैं, जब वे इंदौर के पास महिष्मती, जो अब महेश्वर कहलाता है, से उभरे। कृष्णराज कल्चुरी वंश का सबसे ताकतवर राजा था और उसी ने इस राजवंश को स्थापित किया।

कल्चुरी राज की सीमाओं के विस्तार का श्रेय कोकल्ल प्रथम को जाता है जिसने अपने राज्य को फैलाया और 8वीं सदी में जबलपुर के पास त्रिपुरी में अपनी राजधानी स्थापित की। इस अवधि के दौरान बाण शासक, जो पल्लवों के सामंत थे, छत्तीसगढ़ में राज कर रहे थे और बिलासपुर के पास पाली उनकी राजधानी थी। इतिहास बताता है कि कल्चुरी वंश के मुग्धतुंग ने छत्तीसगढ़ पर हमला किया और 10वीं सदी में बाण शासकों को पराजित किया। मगर इसके पहले कि कल्चुरी पाली में सुख लूटते, प्रतिशोध से भरे बाण शासकों ने कल्चुरियों पर हमला कर उन्हें हरा दिया और अपने हारे हुए इलाके फिर जीत लिए। मुग्धतुंग के एक उत्तराधिकारी कलिंगराज ने फिर बाण शासकों पर हमला किया और उन्हें छत्तीसगढ़ से खदेड़ दिया। उसने तुम्माण (वर्तमान में बिलासपुर के पास तुम्मान) को राजधानी बनाया। कल्चुरी वंश का सबसे प्रतिभावान शासक कलिंगराज का पौत्र रतनदेव था जिसने बिलासपुर के पास रतनपुर में राजधानी बनाई। यह स्थान आज भी कल्चुरियों की कुलदेवी देवी महामाया के निवास रतनपुर के रूप में मशहूर है। इस वंश का एक और प्रतापी राजा जाजल्लदेव था जिसके नाम से राज्य में जांजगीर जिले का नाम पड़ा था। कल्चुरियों की एक शाखा ने 14वीं सदी में रायपुर की स्थापना की।

मगर 1740 ईस्वी में जब मराठों ने रतनपुर पर हमला कर उन्हें हरा दिया। उस समय रघुनाथ सिंह रतनपुर का राजा था। हार के बाद कल्चुरियों को बड़गांव में जमींदार के रूप में रहना पड़ा। ऐशो-आराम के अभ्यस्त कल्चुरियों को बडगांव से मिल रहे राजस्व से मुश्किल हो रही थी। उन पर तरस खाकर मराठों ने उन्हें पांच गांव गोइंदा, मुढ़ेना, नांदगांव, भालेसर और बडगांव दे दिए और उन्हें कर न चुकाने की भी छूट दे दी। यह व्यवस्था देश के आजाद होने तक जारी रही। भारत के अन्य राजाओं या जमींदारों की तरह बड़गांव के कल्चुरियों के लिए भी आजादी खुश होने का सबब नहीं थी क्योंकि उनके सारे अधिकार छीन लिए गए और उन्हें प्रजा के बराबर कर दिया गया था।

पुरातत्व के उपनिदेशक राहुल कुमार सिंह दावा करते हैं कि कल्चुरी भारत में एकमात्र राजवंश है जिसने सबसे लंबे समय तक शासन किया। उन्होंने 10वीं सदी से 1740 ईस्वी तक यानी करीव 740 वर्ष तक राज किया। छत्तीसगढ़ के नामी इतिहासकार प्रभुलाल मिश्र की राय है, ‘‘कल्चुरी इसलिए सबसे लंबे समय शासक बने रहे क्योंकि उनके पास प्रशासन का बड़ा तामझाम नहीं था और वे सार्वजनिक जीवन में सबसे कम दखल देते थे। सो, लोग भी खुश थे।

मिश्र जोर देकर कहते हैं कि कल्चुरियों ने अपने राज में जातिवाद को कभी भी बढ़ावा नहीं दिया और समाज में मेलजोल की परंपरा बढ़ाई। वे कहते हैं, ‘‘मितान या महाप्रसाद की परंपरा कल्चुरी काल में ही शुरू हुई। छत्तीसगढ़ में ही मिलने वाली मितान परंपरा अनूठी है जिसमें दो भिन्न जातियों के लोग महाप्रसाद में बंधते हैं और मरते दम तक इसे निभाते हैं। इस संबंध को खून के रिश्ते से भी ज्यादा पवित्र माना जाता है।‘‘

छत्तीसगढ़ को उन्होंने अच्छी प्रशासनिक प्रणाली, सांस्कृतिक विकास, मंदिर निर्माण और जलप्रबंधन जैसा बड़ा योगदान दिया। पुरातत्वविद् डॉ. शिवकांत वाजपेयी कहते हैं, ‘अगर हमें छत्तीसगढ़ के गांवों-शहरों में कई तालाब मिलते हैं तो इसकी वजह कल्चुरी है।‘‘

इतने शानदार अतीत वाला यह परिवार आज बडगांव के एक कोने और मुढ़ेना गांव में एकांत जीवन जी रहा है। मुढ़ेना के एक जीर्ण-शीर्ण घर में राजेश्वर सिंह पत्नी, दो बेटों और 94 वर्षीया मां तथा भतीजे के साथ रहते हैं। उन्होंने अब गरीबी को ही अपनी नियति मान लिया है। राजेश्वर कहते हैं, ‘‘निश्चित ही हमें हमारा अतीत कचोटता है। पर हमारे पुरखे छत्तीसगढ़ के राजा थे, इस तथ्य से हमें रोटी नहीं मिलती। हमें संघर्ष करना पड़ता है, इसलिए संघर्ष कर रहे हैं। मौजूदा हालात हमारे अतीत के अनुसार नहीं हैं मगर इसे हमने अपनी जिंदगी का तरीका मान लिया है।‘‘

संपत्ति के नाम पर राजेश्वर के पास 30 एकड़ जमीन और महानदी के तट पर एक खान का पट्टा है। वे भी अन्य कल्चुरियों की तरह हैं जो शासक से किसान बन गए हैं। रायपुर के साइंस कॉलेज से स्नातक राजेश्वर ने एक बार राजनीति में भी भाग्य आजमाया मगर उसने साथ नहीं दिया। वे कहते हैं, ‘‘मैं कांग्रेस का कार्यकर्ता और विद्याचरण-श्यामाचरण शुक्ल का समर्थक था पर जब 1985 में मुझे टिकट नहीं दिया गया तो मैं निर्दलीय लड़ा।‘‘ नतीजा. वे भारी वोटों से हारे और इस हार से करीब दो लाख रु. की चपत लगी। इस नुक्सान ने उन्हें तोड़ दिया। फिर भी राजनीति से उनका प्रेम खत्म नहीं हुआ है। समय-समय पर उन्होंने पंचायत तथा अन्य स्थानीय निकायों के चुनाव लड़े। पर एक मामले में कल्चुरियों ने समझौता नहीं किया है, वह यह कि वे अभी भी अतीत के शाही परिवारों से ही वैवाहिक रिश्ते रखते हैं।

हैहयवंशी कल्चुरी परिवार अब बिखर गया है। राजेश्वर के बड़े भाई दलगंजन सिंह सहायक खाद्य अधिकारी पद से रिटायर होकर रायपुर में रह रहे हैं। रिटायर्ड स्कूल इंस्पेक्टर मनोरंजन सिंहदेव कांकेर में हैं, आदिमजाति कल्याण विभाग से सेवानिवृत्त एकाउंटेंट बसुरंजन सिंह महासमुंद में रहते हैं जबकि भूपेंद्र सिंह बड़गाव में किसान हैं। कल्चुरी वंश के एक सदस्य चंद्रध्वज सिंह एक प्राइवेट फर्म में सुपरवाइजर हैं। सत्यवान सिंह बडगांव के पास अच्छीडीह में किसानी करते हैं और लाल शिवकुमार सिंह बैंक अधिकारी पद से सेवामुक्त होकर भालेसर में बसे हैं। परिवार के एक और वंशज शिवनारायण सिंह ओडीसा के बलांगीर की एक फैक्टरी में हैं जबकि दो भाई नरेंद्र सिंह तथा महादेव सिंह बडगांव के पास गोइंदा में कृषक हैं।

राजेश्वर सिंह तथा कल्चुरी वंश के दूसरे उत्तराधिकारियों के लिए इतिहास प्रेरणास्पद, प्रसन्न करने वाला और क्रूर भी है।
-जी. मंजूसाईनाथ

परिशिष्ट- 
यह पोस्ट लगाते हुए कुछ संकोच हो रहा था, क्योंकि इस राज परिवार के 700 वर्ष के इतिहास और स्थिति की वर्तमान से कोई तुलना नहीं हो सकती, इसका औचित्य भी नहीं है। परिवार के लाल विजय सिंहदेव जी से मेरा परिचय रहा है और इस पोस्ट के बाद अन्य सदस्यों से भी संपर्क हुआ। महसूस हुआ कि व्यवहार में अब भी गरिमा और शालीनता के साथ सहज-सरलता की कोई कमी नहीं है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि संभवतः छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान में परिवर्तन, इस परिवार के आधिपत्य के बाद तेजी से आया, इसलिए परिवार के सदस्यों से मिलना और बात करना, ऐसा महसूस होता है कि छत्तीसगढ़ के गरिमामय और सौहार्द के सदियों पुराने, प्रतिष्ठापूर्ण इतिहास से जुड़ना है। इस दौरान पोस्ट पर ललित शर्मा जी की महत्वपूर्ण टिप्पणी आई है, जो वस्तुस्थिति को तार्किक ढंग से स्पष्ट और अद्यतन करती है, यहां जोड़ी जा रही है-

स्व: राजेश्वर जी सम्पन्न थे, तभी 1986 में 2 लाख रुपये खर्च कर निर्दलीय चुनाव लड़े थे। इनके पास सबसे बड़ी फर्शी माइंस थी, तब 300 लेबर काम करते थे। आज भी सबसे बड़ी माइंस उन्हीं की है मूढ़ेना में। उनमे दो खानों में लगभग 150 लोग काम कर रहे होंगे। आज 4 फैक्टरी और सबसे बड़ी 2 खदान मूढ़ेना का उन्ही के भतीजों और उनकी पत्नी की है। इनके भतीजे रायपुर देवेन्द्र नगर में हैं। लाल विजय सिंह की एक फैक्ट्री कलचुरी स्टोन नाम से है पर्याप्त जमीन भलेसर में है। 20 एकड़ खेती व 5 एकड़ आम जाम सीताफल का है बड़ा घर है। राजेश्वर सिंह जी का भी मूढ़ेना में बड़ा घर है।। लेकिन एकदम ही हालत बुरी है करके छपा है। स्थिति उतनी भी खराब नही थी जितना इन्होंने कहा। इस परिवार से 1 ibm में स्वीडन में है 2 सॉफ्टवेयर में, मेट्रो सिटी पुणे बंगलोर में हैं एक कांकेर नरहर देव में व्याख्याता हैं, एक sdo रैंक नगर निगम रायपुर में हैं, देवगढ़, सरायकेला, चिल्कीगढ़,पालकोट, चंद्रपुर और अम्बिकापुर के शंकरगढ़ लगभग हर जगह रिश्तेदारी है। कुल मिलाकर वर्तमान में स्थिति अच्छी है।

Wednesday, February 9, 2022

घर पड़ोस देश - राजेन्द्र मिश्र

डॉ. राजेन्द्र मिश्र
17.9.1937 - 23.1.2022
सन 1980, शासकीय दूधाधारी वैष्णव संस्कृत महाविद्यालय, रायपुर। डॉ. राजेन्द्र मिश्र सर हिंदी के प्राध्यापक थे और मैं पुरातत्व का विद्यार्थी। किसी प्रसंग में डॉ. निगम सर ने परिचय कराया, मानों रुचि अनुकूल व्यक्ति के सुपुर्द कर रहे हों। उन दिनों सर अपने व्यक्तित्व के चकाचौंध सहित आते तो हिन्दी के कम अंग्रेजी विभाग के अधिक लगते। कक्षाओं से कहीं अधिक समय चर्चाओं के लिए देते और कोई भी छात्र, जिसे साहित्य में रुचि हो, उसे बराबरी का अवसर देते हुए बात करने को हमेशा तैयार रहते। अच्छा साहित्य पढ़ने का संस्कार डालने के उनके निरन्तर उद्यम में उनका व्यक्तित्व और वक्तृत्व प्रभावी होता। बातों-बातों में खुद साथ पुस्तकालय ले जाते, अपने नाम से पुस्तक ले कर देने में उन्हें हिचक न होती।

छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद संस्कृति विभाग की गतिविधियों में मार्गदर्शन के लिए तैयार रहते। डॉ. कल्याण चक्रवर्ती, डॉ. इंदिरा मिश्र, प्रदीप पंत जी और राकेश चतुर्वेदी जी जैसे अधिकारी साहित्यिक आयोजनों के लिए उनसे अवश्य परामर्श करते। मुझे व्यक्तिगत स्तर पर भी उनका मार्गदर्शन और स्नेह मिलता रहता। सन 2013, किसी प्रसंग में मैंने उन्हें एक पत्र लिखा और उनके हाथ में सौंपा, कुछ बातें फोन पर हो चुकी थीं, उन्होंने कहा, पढ़ कर सुनाओ। मैंने लिखा था- लिखना-पढ़ना तो सीख ही लिया था काम भर, लेकिन जिन गुरुओं से संदेह, सवाल और जिज्ञासा के स्वभाव को बल मिला, सिखाया, उनमें आप भी हैं। इस भूमिका पर कहना यह है कि ... ... ... नाम देखा, डॉ. राजेन्द्र मिश्र। आपकी समझ पर कैसे संदेह कर सकता हूं, लेकिन आपके माध्यम से पढ़ने की जो थोड़ी समझ बनी थी, उस पर संदेह हुआ, बावजूद कि यह आपकी नसीहतों पर भी संदेह माना जा सकता है। ... सुनते रहे, खुश हुए, आशीर्वाद दिया, मानों मेरा दीक्षांत हो गया। सन 2015, एक दिन फोन कर ‘जरूरी काम से‘ घर बुलाया और पुस्तक ‘घर पड़ोस देश‘ दी। लिखा- ‘प्रिय राहुल के लिए- सप्रीत‘ और हस्ताक्षर। जरूरी काम का इंतजार करते, विदा लेने का समय होने लगा, तो मैंने पूछ लिया, आपने कुछ काम के लिए कहा था, उन्होंने कहा, यही, किताब तुम्हें देनी थी। पुस्तक पर हस्ताक्षर करते हुए उन्हें तारीख डालने की याद दिलाया, तो मुस्कुराए, कुछ देर रुककर बोले- साथ रखना, जब समय मिले पढ़ते रहना। ... कुछ स्मृतियां कालातीत होती हैं।

पुस्तक के मुखपृष्ठ पर ‘घर पड़ोस देश‘ शीर्षक के साथ राजेन्द्र मिश्र छपा देख कर अनुमान होने लगता है कि पुस्तक खुलते ही आगे साहित्य बिरादरी या साहित्य समाज विद्यमान होगा, पुस्तक पलटते ही भरोसा हो जाता है कि यह प्रकाशक ‘सूर्य प्रकाशन मन्दिर‘ उज्ज्वल-पवित्र और मुद्रक के नाम अनुरूप, ‘सत्यम् शिवम् सुन्दरम्‘ होगी। अंदर इसे ‘(संस्मरण संचयन)‘ कहा गया है। पढ़ते हुए यह ‘चुनी हुई रचनाएं‘ या षष्ठिपूर्ति का खंड बन जाता है।

किसी सजग, संवेदनशील का जीवन भी वही होता है, जैसा अन्य किसी का, लेकिन उसके जीवन में बीतता-घटता कुछ अलग ढंग से दर्ज होता रहता है, यह ढंग शायद थोड़ा अलग होता है देखने का और लिखें तो शायद कुछ कहने का, इसलिए। राजेन्द्र मिश्र जी को पिछले 40 साल से सुनता-पढ़ता रहा हूं। बार-बार पढ़ना कभी तो मनोरंजक होने के कारण, लेकिन यह इसलिए कि हर बार नया लगता है, मानों मेरी समझ को अलग-अलग ढंग से टटोल रहा हो, सक्रिय कर रहा हो, आचार्यवत्।

25 साल की उम्र से आरंभ गृहस्थ-जीवन में घर जुड़ कर घर-गिरस्ती बनती है। यह घर, कभी पड़ोस में तो कभी दूर-देश, एक और घर की रचना है। मजेदार कि कई बार अपने ही घर में, एक और घर के बीज पड़ जाते हैं, तब स्वाभाविक ही एक पड़ोस भी बनने लगता है। जब लेखा-जोखा, खाता-बही, जमा-नामे, पावती-देनदारी बनती है तो कभी बैंलेंस शीट का सब बराबर हो गया हिसाब लगता है तो कभी लगता है कि हासिल आया शून्य, ऐसा शून्य जो आसानी से हासिल होता है।

पुस्तक पढ़ते हुए ध्यान गया कि लेख आरंभ करने की राहुल सांकृत्यायन या पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी की शैली मुझे बहुत अच्छी लगती है, सीखने लायक, किस सहजता से पाठक को विषय प्रवेश कराया जाए। पता भी नहीं चलता कि बातों-बातों में कब भूमिका से गहन विषय में पहुंच गए हैं। इस पुस्तक में ध्यान गया कि लेख को पूरा किस खास अंदाज से किया जाता है। कुछ नमूने देखिए- ‘कविता को पांडुलिपि में पढ़ने और फिर उसे प्रकाशित पुस्तक में पढ़ने का अनुभव, मुझे लगता है, एक-सा नहीं हो सकता।‘ डॉम मोरैस पर नोट को उन्हीं की टिप्पणी के साथ पूरा किया था कि ‘आदिवासी नृत्य और संगीत में परंपरा इतनी है कि वह मिटाई नहीं जा सकती सिवाय उन लोगों के जो उसे सुरक्षित रखना चाहते हैं।

पुस्तक से बाहर, सर ने कभी टोका था, ये ‘मौलिक संस्कृति‘ क्या हुआ!, संस्कार हुआ वही तो संस्कृत हुआ, संस्कृति हुआ, फिर मौलिक क्या। मुलाकातों में शब्द-चर्चा जरूर होती, बताते थे- अज्ञेय के शब्द विमोचन नही लोकार्पण, पूर्वग्रह न कि पूर्वाग्रह। अशोक बाजपेयी द्वारा प्रचलित पड़ताल, सरोकार, उत्कट और शायद विमर्श के ‘देश‘ से ‘घर-पड़ोस‘ में लौट आते हैं, मां को याद करते हैं पपीता नहीं अरमपपई, के साथ फिर ऐसे गढ़े आधुनिक शब्दों की चर्चा होती है। फिर जो सिर्फ छत्तीसगढ़ी में हैं, मगन मन याद करते- ‘लपक-झपक आवत होही मोर अलबेला, खिरकी ले झांकय त एक डांग बेरा‘। ‘दसमत‘ पर उन्होंने अपने खास अंदाज में टिप्पणी की थी। छत्तीसगढ़ी का ढिंढोरा उन्होंने कभी नहीं पीटा, लेकिन शब्दों के उस मर्म तक सहज पहुंच जाना और बात की बात में ऐसे मुकाम तक पहुंचा देना, जो उनके साथ बिना शायद संभव होता।

छत्तीसगढ़ राज्य गठन के दौर में द्विमासिक ‘रचना‘ का विशेष अंक, नवंबर-दिसंबर 2000 प्रकाशित हुआ था, वे इस अंक के अतिथि संपादक थे। सम्पादकीय ‘रचना का जनपथ: जनपथ की रचना‘ में उन्होंने लिखा- ‘हम उम्मीद व्यक्त करते हैं कि छत्तीसगढ़ की राजसत्ता एवं वैचारिक पहल के साथ यहां के सांस्कृतिक जीवन और उसे, संभव बनाने वाले संस्कृति कर्मियों से एक सम्मानजनक संवाद बनाए रखने का उद्यम करेगी।‘ ऐसी पहल करने से वे स्वयं कभी नहीं चूके। रचना के इस अंक के आमुख-लेख के लिए उन्होंने मेरे ‘छत्तीसगढ़, छत्तीसगढ़ी और छत्तीसगढ़िया‘ का चयन किया था।

लगभग 25 बरस पहले ताला देवरानी मंदिर पर की तस्वीर,
जिसमें मिश्र सर के साथ सुश्री वीणा वर्मा, विनोद जी,
बिलासपुर के तत्कालीन आयुक्त श्री मदन मोहन उपाध्याय
और अशोक जी दिखाई पड़ रहे हैं, नामवर जी पिछड़े हुए बातें सुन रहे थे।

विनोद कुमार शुक्ल जी, यों उनके करीब थे ही, लगभग पड़ोसी भी थे। मिलने जाने पर, पहुंचते-निकलते हमेशा पूछ लेते, विनोद जी के यहां गए?, विनोद जी के यहां जाओगे? सर और विनोद जी पढ़ने-लिखने, सार्थक बातचीत का हाल, शहर की ऐसी खबरें, पूछते रहते थे, इसी क्रम में मैंने उनसे ‘नुक्कड़‘ चलने का प्रस्ताव रखा। अगस्त 2018, विनोद जी और सर शाम 6 बजे समय नियत कर, ‘कुछ देर‘ के लिए मेरे साथ निकलने को तैयार हो गए और नुक्कड़ की छत पर रात साढ़े नौ बजे तक हम सबके साथ बैठ कर बातें करते रहे थे।
‘नुक्कड़‘ में
गौरव गिरिजा शुक्ला, तरुण गोस्वामी और प्रियंक पटेल के साथ

मेरी पुस्तक पर ठीक साल भर पहले सर का आशीर्वाद ‘नवभारत‘ समाचार पत्र के रविवारीय में 24 जनवरी 2021 को प्रकाशित हुआ था। सर के अवसान की सूचना मिली, महीना भी नहीं बीता था, आलोक जी और सौरभ के साथ उनके निवास पर गया था। अपनी पुस्तक ’छत्तीसगढ़ में मुक्तिबोध‘ को याद करते ‘विनय पत्रिका‘ में रम गए थे। इस साल 2022 में इसी तारीख को उनके अवसान के अगले दिन निर्देश पालन करते ‘छत्तीसगढ़ में मुक्तिबोध‘ की दो प्रतियां, यशस्वी और अनन्या को सौंप कर आया। 

पुस्तक समीक्षा 
विधाओं का अतिक्रमण 

कृति- एक थे फूफा 
लेखक- राहुल कुमार सिंह 
समीक्षक- राजेन्द्र मिश्र 

गति के साथ स्थिति को संभव बनाने वाली यह पुस्तक साहित्य की परिचित विधाओं का अतिक्रमण करती है. यह न तो सुगठित कहानी है और न कोई उपन्यास. भारतीय आख्यान-शिल्प की तरह इसमें भी एक केन्द्रीय चरित्र है, शेष सभी चरित्र भी किसी न किसी तरह उससे जुड़े हुए हैं. अनाम पात्र इस दुनिया में कुछ रूपक भी हैं, जो वस्तुपरक यथार्थ को व्यंजना बहुल बनाते हैं. 

-दो- 
‘बाजन लागे अनंद बधाई, धरती में गड़ा सोना, जागते रहो का लैंडलार्ड, खाता न बही फूफा सही, तोते का पिंजरा में जीव, माई के पेट म, पच्चिस पिला‘ आदि आख्यान के भीतर रचे उपशीर्षक हैं, जो अपने विस्तार में फूफा की परिकल्पना को उचित ब्यौरों के साथ प्रस्तुत करते हैं. फूफा के जीवन जीने का अपना तर्क है. सौंदर्य उपभोग्य है इस तथ्य को अच्छी तरह जानते हैं. जाहिर है इससे संबंधों में एक तरह से सहज नहीं हो पाते. बाबू के साथ भी उनका सम्बंध तनाव भरा है. 

-तीन- ‘संभव है इसका कारण, फूफा की अपनी रामकहानी हो, जिसके कई अध्याय हैं. ये अध्याय वर्ग-प्रकरण हैं तो कहीं कांड जैसे. इस गाथा के बाहर अवांतर, प्रसंग, क्षेपक कथाएं भी है.‘ इस आख्यान में फूफा का एक स्वतंत्र व्यक्तित्व भी है और प्रतीक पात्र के रूप में उसे अपने वर्ग की चिंता, लगाव, द्वन्द और दुविधा को व्यक्त करने वाला प्रतिनिधि चरित्र भी कहा जा सकता है. दोनों ही स्तरों को एक साथ साधना चुनौती भरा काम हो सकता है.

-चार- लिखित शब्द की शक्ति से आप सुन सकें, अनुभव कर सकें और सबसे पहले देख सकें. उसका लक्ष्य केवल ऐन्द्रिय बोध को परिभाषित करना नहीं है. समग्रता आवृत्ति परक न होकर गति परक है. ‘एक थे फूफा‘ की संरचना सगतिक है. वैभव प्रकाशन द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक में रेखाचित्र हैं. कामना करता हूं कि इस पुस्तक को अधिक से अधिक पाठक मिले.

‘घर पड़ोस देश‘ पढ़ते नोट्स लेता रहा, कुछ लिखता रहा, गुनता भी रहा, सर ने कभी समझाया था, लिखने-छपने में जल्दबाजी ठीक नहीं, समाचार तो लिखना नहीं है, सर नहीं हैं, उनकी सीख का संबल है ... 

उनके लेखन में बात पूरी करने का अनूठा तरीका याद आ रहा है, ‘‘यह सच है कि सभी साक्षात्कार अधूरे होते हैं, लेकिन क्या ईमानदारी से उद्वेलित ‘अधूरे साक्षात्कार‘ भी मनुष्य और रचना के भरे-पूरे आख्यान नहीं होते?‘‘ और विसंगतियों पर सर की मुस्कुराहट याद करते हुए मैं खुद भी मुस्कुराना चाहता हूं, उन्होंने लिखा है- ‘ग़ालिब मुस्कुराते हुए रोना खूब जानते हैं।‘