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Friday, July 10, 2026

नकटी के क्लॉड

मुक्तिबोध की कहानी है ‘क्लॉड ईथरली‘। कहानी हिरोशिमा, नागासाकी पर परमाणु बम गिराने वाले पायलट की है। कर्तव्यनिष्ठ क्लॉड अपने काम को सफलतापूर्वक अंजाम देता है, मगर उसका जीवन आत्मग्लानि से नर्क बन जाता है। मोटी सी बात इतनी है, मुक्तिबोध इस वास्तविक पात्र को ले कर जो बुनते हैं, जादुई है। सभ्यता, विभीषिका और संवेदनाओं का विचलित कर देने वाला चित्रण। नकटी घटना के साथ ऐसी और भी बातें याद आती रहीं।

घटना 29 जून 2026 की है, जिस दिन सुबह-सुबह ‘प्रस्तावित? विधायक कालोनी‘ के लिए रायपुर विमान तल के पास स्थित इस गांव के पीएम आवास वाले घरों सहित लगभग 80 घर, सरकारी जमीन पर अतिक्रमण मान कर बुलडोजर-जेसीबी से ढहा दिए गए। ‘गांव‘ नकटी, जिसका नाम ‘सज्जनपुर‘ बदलने की बात आई, तब तक गांव-बस्ती के हालात ही बदल गए। शासन-प्रशासन द्वारा पुनर्वास हेतु नया रायपुर में फ्लैट आवंटन बताया गया, ग्रामवासियों द्वारा उसे अपर्याप्त और सुविधा रहित बताया गया।

भला करना किसे नहीं भाता। अनुमान होता है कि यहां भी भर-भर भलाई की जाती रही होगी, योजना, लक्ष्य की पूर्ति के आंकड़े सुधरे होंगे। अपना कुछ भला लोगों ने खुद से कर लिया होगा। बहती गंगा में हाथ भी धुले होंगे, नियमों-प्रावधानों पर जन-सेवा हावी-प्रभावी हुआ होगा। गेहूं में घुन पिसा होगा और कुछ घुन, गेहूं के आड़ में रख कर खुद को वाजिब साबित कर रहे होंगे। यह सारी ‘भलाई‘ इकट्ठे बुराई का फोड़ा बन कर अब फूटा है। प्रजातांत्रिक व्यवस्था की खासियत यही है कि कोई एक मनमाना निर्णय नहीं ले सकता। इसके चलते व्यवहार में श्रेय की होड़ लग जाती है और विपरीत स्थिति में संयुक्त जिम्मेदारी होने के कारण, जो चाहे मुंह बचा सकता है। भारतेन्दु के नाटक ‘अंधेर नगरी‘ की तरह। यह भी ध्यान रहे कि सरकार द्वारा समय-समय पर कब्जे को नियमित करना, पट्टा देना, कर्ज की माफी जैसे अनुग्रह किए जाते रहते हैं। ऐसे मौकों पर जिन्होंने नियम-विरुद्ध लाभ नहीं उठाया, कर्ज नहीं लिया, अफसोस करते हैं। उन्हें लगता है कि उन्होंने नासमझी कर दी। इसे दूसरे उदाहरण में देखें, किसी आयोजन में निर्धारित समय पर पहुंच जाने वाले को तब अफसोस होता है, जब कार्यक्रम समय से आरंभ नहीं होता, अतिथियों तथा अन्य आमंत्रितों, संभावितों के आ जाने की प्रतीक्षा की जाती है।

तोड़फोड़ की घटना के बाद प्रभावितों की पहली प्रतिक्रिया में जनप्रतिनिधियों विधायक और सांसद के प्रति रही, ध्यान देने पर समझ में आया कि उनके प्रति आक्रोश इसलिए नहीं है कि उन्होंने घर तुड़वाया, बल्कि इसलिए है कि आश्वासन के बावजूद भी बचा क्यों नहीं पाए? गुस्सा उचित पुनर्वास न होने के कारण भी था। इस जद में प्रशासन और अन्य जनप्रतिनिधि-मंत्री भी आ गए, जिन्हें घरों को तुड़वाने के लिए जिम्मेदार माना गया। दलगत के साथ अंदरूनी गुटीय राजनीति गरमाने लगी, परतें खुलने लगीं, गांव के सरपंच, पंचायत सचिव, चरागन, पट्टा, प्रधानमंत्री आवास, बेजा-कब्जा। फिर वित्त मंत्री, राजस्व मंत्री, आवास एवं पर्यावरण विभाग, छत्तीसगढ़ गृह निर्माण मंडल, नवा रायपुर अटल नगर विकास प्राधिकरण, जिला प्रशासन निशाने पर आते गए। घटना छोटी-मोटी नहीं थी, लेकिन यह भी ध्यान में आता रहा कि संवेदनशील क्षेत्र की और मीडिया के पहुंच के करीब की है। ऐसा भी नहीं कि पीड़ितों की व्यथा कमतर है, मगर धरना, आंदोलन-प्रदर्शन के लिए संगठन कौशल और क्षमता की आवश्यकता होती है, इस प्रकरण में मुझे पीड़ितों का नेतृत्त्व करने वाले चेहरे या नाम नहीं दिखाई पड़े। संभव है कि परोक्ष प्रभावित हित-साधन करने वाले वाह्य उत्प्रेरक रहे हों।

# मेरठ के पुश्तैनी जल्लाद पवन, जिन्हें फांसी देता है, उसको क्या लगता होगा, शायद अपने मन को समझा लेता हो कि भले ही उस अपराधी ने उसके लिए कुछ गलत न किया हो, दुर्दांत अपराधी है, जिसको मौत दी जा रही है। ज्यों ‘एनकाउंटर‘ में अपराधियों को मार गिराने वालों को लगता होगा।
# 2013 में बिहार में एक रेल की पटरी पार करते, बड़ी संख्या में तीर्थयात्री कट-मरे थे। घटना के बाद ट्रेन में आग लगा दी गई थी और ड्राइवर के साथ मरपीट की खबरें आई थीं। दशहरा 2018 के अमृतसर हादसे में रेल पटरी पर आए लोगों की कट कर मौत हुई थी। घटना में ड्राइवर पर आरोप था कि उसने न तो गति धीमी की, न ही हॉर्न बजाया, जबकि ड्राइवर ने आपात ब्रेक का प्रयास किया और हॉर्न भी बजाया था। बाद में यह बात सामने आई कि जलते रावण की ओर ध्यान होने, पटाखों के शोर और धुएं के कारण ऐसा हुआ। घटना में दशहरा आयोजकों, रेल प्रशासन और ड्राइवर को दोषी मानते कार्यवाही की मांग उठी थी। ऐसी मिलती-जुलती घटना-खबर की जानकारी आती रहती है। 
# दूसरी तरफ नानावटी का मुकदमा याद आता है या फिल्म ‘अचानक‘, जिसमें ऐसा फौजी जो सीमा पर जिन्हें मार गिराता है, जिनसे उसका सीधे कोई लेना-देना नहीं, उन्होंने फौजी का कुछ नहीं बिगाड़ा, फौजी उन्हें कतई नहीं जानता, व्यक्तिगत स्तर पर उसके प्रति जिन्होंने कुछ भी नहीं किया है, उन्हें मारने पर पदक मिलता है। वहीं दूसरी तरफ पत्नी के विश्वासघात के कारण स्वयं सीधे आहत होने के कारण की गई हत्या के अपराध में फांसी की सजा सुनाई गई है।
# वाल्मीकि की कथा में वाल्मीकि निरपराधों से लूट-मार करता है, यह मानते कि वह यह खुद के लिए नहीं, बल्कि अपने आश्रित परिवार-जन के लिए कर रहा है, जबकि उसका परिवार उसके कृत्य के फल में खुद को भागी मानने से इंकार करता है।

नकटी की घटना में मेरा कोई व्यक्तिगत फायदा-नुकसान नहीं हुआ है। घटना से जुड़ी खबरों को पढ़ते-देखते प्रभावितों के प्रति अन्य किसी नागरिक जैसी मानवीय संवेदना मेरे मन में भी है। घटना से जुड़े पक्षों से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रभावित नहीं हूं। शायद इसलिए तटस्थ उन पक्षों की ओर भी सोच पा रहा हूं, जो नजर-अंदाज हैं। इस सारी भूमिका के बाद स्पष्ट हो गया होगा कि मेरे मन में चल रहा है कि नकटी-क्लॉड यानी जेसीबी-बुलडोजर ऑपरेटरों द्वारा अपना काम करते और काम के बाद उसका प्रभाव देखते-सुनते कैसा महसूस होता होगा। एक तरफ उन्हें सौंपे हुए काम को कर्तव्य-निष्ठा, सारे कौशल के साथ तत्परता से पूरा करना होता है, वहीं ऐसे किसी का घर ढहाना, जिसे वे जानते भी नहीं, कैसा लगता होगा। किसी घटना में उपकरण, साधन या औजार इस्तेमाल हुआ तो किस-किस को और कितना-कितना जिम्मेदार माना जाए, औजार-अविष्कारक, उसे बनाने वाला, बेचने वाला, चलाने वाला, चलवाने वाला ... ?

देवदत्त के तीर से घायल हुए हंस और बचाने का प्रयास करने वाले सिद्धार्थ की कहानी के अंत में नीति वाक्य होता था- ‘मारने वाले से बचाने वाला बड़ा‘। किसी घटना पर सोचते हुए मन में आता है निमित्त कौन? कौन कर्ता, किसका कर्म, किस करण के द्वारा ... व्याकरण का कारक-पाठ याद आ जाता है- कर्ता-ने, कर्म-को, करण-से(के द्वारा) ... बात पाप-पुण्य की हो तो किसके खाते क्या आएगा!

Monday, March 21, 2022

कविताई

आज ‘कविता दिवस‘ पर मन का मैल-मलाल।

कला, साहित्य, संस्कृति- एक होती है समझ में आने वाली और दूसरी समझने-समझाने वाली। अमूर्त कला, कुछ खास संगीत और अधिकतर कविता के लिए मेरी संकीर्ण सीमा है कि वह व्याकरण, नियम, सिद्धांत के आग्रह बिना सहज बोध से समझ में आए। इसलिए रथन्तर-मार्गी के बजाय वृहत्साम-देशी तक सीमित रहना भाता है। छंद-लय तो स्वाभाविक होता है, मात्रा गिन की गई (अजीब, चौंकाने वाली बेतुकी) तुकबंदी या जोड़-तोड़ कर बिठाए गए शब्दों से, कविता नहीं हो जाती। अपरा से भ्रम होता है कि जीवन की कविता के परा को, उसके व्याकरण और विन्यास सहित सीख-समझ/पा लिया है।

बकौल प्लेटो, सुकरात का संवाद है- ‘ये (कवि) उन दिव्यदर्शी तथा भविष्यवक्ताओं जैसे ही हैं, जो बहुत-सी गूढ़ बातें कहते हैं, परन्तु स्वयं उनका अर्थ नहीं जानते।‘ या दूसरे शब्दों में ‘कवि ऐसी महान और ज्ञान भरी बातें कहते हैं जो वो खुद नहीं समझते।‘ यह कम रोचक नहीं कि स्वयं ‘कवि‘ प्लेटो कहता है कि आदर्श गणतंत्र में कवियों का कोई स्थान नहीं है। दूसरी तरफ प्लेटो के प्रति अरस्तू की अनेक शिकायतों में एक यह भी थी कि प्लेटो कवि था।

रेणु, त्रिलोचन में शमशेर-नागार्जुन के जोड़-घटाव का हिसाब बिठाते हैं, मगर यह भी कहते हैं कि- 'मुझे यह कबूल करने में कभी लाज-शर्म नहीं आयी कि मैं कविता नहीं समझता। मेरे लिए कविता समझने की चीज कभी नहीं रही। इसीलिए अपने मन में उठनेवाले इस सवाल का जवाब- शमशेर-त्रिलोचन-नागार्जुन की कविताओं में मैं कभी नहीं ढूँढ़ता।'

यों तो तुलसी स्वयं के लिए ‘कबि न होउं ...‘ और ‘कबित बिबेक एक नहीं मोरें ...‘ कहते हैं, शायद यही कारण है कि कभी न अबूझ लगे, न कठिन। तब भी जब शिव से कहलाते हैं- ‘सत हरि भजनु जगत सब सपना।‘ यह भी कहा गया है कि ‘शास्त्र केवल इंगित-भर करते रहते हैं। स्वयं तो वे केवल शब्दजाल हैं। . . . अपनी कल्पनाओं को ही तार्किक लोग ‘शास्त्र‘ माना करते हैं।‘ प्रस्थान-त्रयी में ‘स्मृति‘ महाभारत युद्ध के आरंभ में कही गई गीता है। युद्ध के पश्चात आश्वमेधिक पर्व में गीता से भी विस्तृत अनुगीता है, जिसकी भूमिका रोचक है। अर्जुन कृष्ण से कहते हैं कि आपने ज्ञान का उपदेश दिया था, वह भूल गया, अतः पुनः सुना दीजिए। कृष्ण कहते हैं कि तुमने अपनी नासमझी के कारण उसे याद नहीं रखा, यह मुझे अप्रिय है, तुम श्रद्धाहीन हो, तुम्हारी बुद्धि बहुत मंद जान पड़ती है। फिर मानों स्वयं भी स्वीकार कर रहे हों, कहते हैं- अब पूरा-पूरा स्मरण होना संभव नहीं जान पड़ता। उसको ज्यों का त्यों नहीं कह सकता, फिर से दुहरा देना मेरे वश की बात भी नहीं है। यहां अर्जुन का स्मृति-प्रस्थान श्रीमद्भगवतगीता का उपदेश भूल जाना, उसे कृष्ण का न दुहरा पाना, मानों ज्ञान का रहस्य रचते, श्रुति-स्मृति-न्याय की परतें भी खोल देता है।

महाभारत के एक प्रसंग में गंधर्व चित्रांगद, शांतनु पुत्र चित्रांगद से कहता है- राजकुमार! तुम मेरे सदृश नाम धारण करते हो, . . . नाम की एकता के कारण ही मैं तुम्हारे निकट आया हूं। मेरे नाम द्वारा व्यर्थ पुकारा जाने वाला मनुष्य मेरे सामने से सकुशल नहीं जा सकता। इस प्रसंग में व्यक्ति के अहम् और नाम-रूप को दुहरे चरित्र के सहज सूत्र से उजागर किया गया है। वाल्मीकि रामायण में केकय नरेश समस्त प्राणियों की बोली समझते हैं, तिर्यक् योनि में पड़े हुए प्राणियों की बातें भी उनकी समझ में आ जाती थीं। मेरे लिए इसका मर्म भी सहज ग्राह्य है, मगर . . .

अधिकतर आदरणीय कवियों से ले कर आधुनिक वालखिल्य-व्यास-वाल्मीकियों के मुझ प्रमाता-पाठक को कई बार ऐसा लगता है कि अजीब सी गुलजारनुमा बातें कहने का आत्मविश्वास भी कविताओं को जन्म दे सकता है। प्रेमचंदों को तो कोई ऐरा-गैरा भी पढ़ लेता है मगर मुक्तिबोध, श्रीकांत वर्मा और विनोद कुमार शुक्ल ऐसे नाम हैं, जिनका पाठक हो कर ही गौरवान्वित महसूस करता हूं, पसंद हैं ही, उनके प्रति आदर है, किंतु कई-कई बार आतंकित भी कम नहीं करते। ‘चांद का मुंह टेढ़ा है‘ की वक्रता मेरे लिए आज तक ज्यों की त्यों है, क्योंकि वहां ‘लटकी है पेड़ पर/ कुहासे के भूतों की सॉंवली चूनरी-/ चूनरी में अटकी है कंजी ऑंख गंजे सिर/ टेढ़े-मुॅंह चॉंद की।‘ चांद की सुंदरता में रोटी, हंसिया, बुढ़िया, खरगोश देखा जाता रहा है, मगर मुंह टेढ़ा यानि चांद को कुछ नापसंद है, मानव के चंद्र अभियान से रूसा-फूला है, या उसकी बनावट में ही कुछ गड़बड़ हो गई है, सीधे मुंह वाला चांद कैसा होता है! यह प्लास्टिक सर्जरी वाले डॉक्टर का विज्ञापन तो नहीं या ...! ‘कोसल में विचारों की कमी है‘ पढ़ कर सोच में पड़ जाता हूं कि विचारों में कमी की नाप कैसे संभव हुई होगी, क्या यह समूचे कोसलवासियों के लिए कही गई है या नियंता-नायकों के लिए। उस दौर में कहीं काशी, मगध, अवंती में विचारों की अधिकता भी रही होगी? क्या विचारों की कमी घातक होती है, तो विचारों की अधिकता कर्मनाशा तो नहीं हो जाएगी, फिर विचारों का सम क्या है? विचारों का सम, क्या सभ्यता को जड़ न कर देगा!

कई कवि और उनकी कुछ कविता, आपको रसिक पाठक होने की खुशफहमी से वंचित कर देने के लिए पर्याप्त होती हैं। ऐसी कविताओं का रस, समीक्षक ले पाते हैं या उनका जात-भाई, कोई अन्य कवि। कविता को हमारे शरीर जैसा होना चाहिए। शरीर में जिगर, गुर्दा न जानने वाला भी स्वस्थ, आनंदित रह सकता है और जानकार डाक्टर भी अपने शरीर के लिए समस्या पैदा कर लेता है। इसलिए बिंब, प्रतीक, रस, छंद, व्याकरण के शास्त्र से अनभिज्ञ, सामान्य समझ के पाठक भी रस पा ले वही सच्ची कविता अन्यथा एलीट साहित्य। 

अपनी कविता ‘नासमझी‘ के सिलसिले मे सर्वेश्वरदयाल सक्सेना‬ की कविता याद आती है। ‘धीरे-धीरे रे मना ...‘ और ‘शनैः कंथा शनैः पंथा ...‘ के साथ कैसा लगेगा जब पढ़े-
'धीरे-धीरे'
मुझे सख़्त नफ़रत है‪
इस शब्द से।
‪धीरे-धीरे ही घुन लगता है
अनाज मर जाता है,‪
धीरे-धीरे ही दीमकें सब-कुछ चाट जाती हैं‪
साहस डर जाता है।‪
धीरे-धीरे ही विश्वास खो जाता है‪
संकल्प सो जाता है।

इसी तरह कुँवर नारायण‬‬ के लिए मन में बात आती है कि ‘यह भी कोई कविता है महराज‘- ‪
कभी-कभी टहलते हुए निकल जाता हूँ‪
बाज़ारों की तरफ़ भी:‪
नहीं, कुछ ख़रीदने के लिए नहीं,
‪सिर्फ़ देखने के लिए कि इन दिनों
‪क्या बिक रहा है किस दाम
‪फ़ैशन में क्या है आजकल‬‬।

समझ नहीं पाता कि शमशेर बहादुर की इन पंक्तियों में आह-वाह वाली क्या बात है-
‘‘वकील करो-
अपने हक के लिए लड़ो।
नहीं तो जाओ
मरो।‘‘

बहरहाल, विचारों के साथ यह भी होता है कि ‘वह आदमी नया गरम कोट पहिनकर चला गया विचार की तरह‘, जहां आदमी के धब्बे के अंदर आदमी है, पेड़ का धब्बा बिलकुल पेड़ की तरह है और रद्दी नस्ल के घोड़े का धब्बा रद्दी नस्ल के घोड़ा की तरह, पढ़ कर घबराहट होती है मगर ‘हताशा से बैठ गया व्यक्ति‘ और ‘अपनी भाषा में शपथ‘ जैसी सीधी बात, पसंद आती है। अज्ञेय और नागार्जुन जैसे दिग्गज शब्दों से खेल-खिलवाड़ करते रहे हैं, उससे आगे निराला की कवितानुमा ‘उटपटांग‘ पंक्तियों को माना जाता है कि मानसिक असंतुलन का परिणाम है, जबकि मुझे लगता है कि निराला ऐसी रचना से बताना चाहते थे कि कई बार वैसा ही प्रलाप, कविता मान ली जा सकती है।

अब, मेरी ऐसी कुछ पंक्तियां, जिन्हें कविताई के दावे की तरह रख रहा हूं-

निन्यानबे के अधूरेपन
और एकसौएक के पूरेपन के दौरान
सदी, शतक, सौ, 'K' का सपना।
आभासी क्षितिज सा
सपना-
अपूर आकांक्षा का,
अधमुंदी स्मृति का और
आगत-अनागत के बीच
आशा का।

***
पेड़, चिड़िया, तितली
नदी, बच्चे, मछली
बादल, चांद
आदिवासी, स्त्री, अल्पसंख्यक
दलितों, तुम्हें मालूम न होगा
क्या बेमानी और बेहूदा
खपाई जाती हैं तुम्हारे नाम पर
रूपक, बिंब, प्रतीक के साथ
कविता और विमर्श कह कर

रोटी, गरीब, भूख
शोषण, दोहन, उत्पीड़न का छौंक
कितना लजीज बनाता है।
कविता की तरह पेश
चटखारेदार बलात्कार
सैनिक, देशप्रेम और मां हो तो,
लिजलिजी सी बात के भी क्या कहने
किसकी मजाल है कि
आह-वाह न करे।

***

वृक्षारोपण!

पेड़!
कैसे जंगली हो,
फैलते हो मनमाना, बेतरतीब
जहां चाहे उग जाते हो
इसीलिए कटते हो
माना कि बोल नहीं सकते,
मगर हो तो चेतन
सोच सकते होगे,
फिर भी दोयम दर्जे के,
मजबूर अपनी जड़ों से बंधे
उसी के भरोसे पलते-बढ़ते
देखो और कुछ तो सीखो
अपने कुल के परजीवियों से
मनमर्जी उग आते हो,
कहीं भी काबिज हो जाते हो
अड़ते हो अपनी जगह
और एहसान जताते कि
फल, छाया, लकड़ी देते हो।
नहीं चलने देंगे तुम्हारी मनमानी
हम रोपेंगे तुम्हें, पोसेंगे,
प्लांटेशन, ट्रांसप्लांटेशन,प्लांटनेशन
तुम्हें वहां उगना होगा, वैसा रहना है, जैसा हम चाहें, तय करें।
'निशुकरे' कहीं के,
क्यों नहीं समझते कि
तुम्हारे लिए ही है,
यह वृक्षारोपण महाअभियान।
(मानते हुए कि पेड़, बच्चे, चिड़िया, नदी पर कुछ भी लिख मारो, कविता बन जाती है।)


गुरुओं की नसीहत है, जो पसंद हैं, जिनके प्रति आदर हो, उन्हें प्रश्नातीत नहीं मान लेना चाहिए। सवाल और संदेह करते अपने समझ की धूल-गर्द साफ करते रहना चाहिए। यहां इसी का पालन करते हुए छत्तीसगढ़ के तीन कवि, जिनमें दिवंगत मुक्तिबोध और श्रीकांत वर्मा ने कविता के साथ पत्रकारिता और विविध, विपुल गद्य लेखन किया है। रचना-सक्रिय विनोद कुमार शुक्ल, अपने गद्य में भी कवि हैं, तीनों के प्रति आदर सहित यह ‘काव्यशास्त्र विनोदेन‘, कभी केदारनाथ सिंह ने भी प्रश्नाकुल किया था।

Sunday, August 5, 2012

शुक-लोचन

छत्‍तीसगढ़ और छत्‍तीसगढ़ी के आरंभिक साहित्‍यकार पं. शुकलाल प्रसाद पांडेय का जन्म शिवरीनारायण में 19 जुलाई 1885 (कहीं 1886 मिलता है), आषाढ़ शुक्ल अष्टमी संवत 1942, रविवार को तथा मृत्यु रायगढ़ में 2 जनवरी 1951 को हुई। उनकी प्रमुख प्रकाशित रचनाएं 'मैथिली मंगल', 'छत्तीसगढ़ गौरव' और सन 1918 में प्रकाशित 'छत्तीसगढ़ी भूल भुलैया' है, जो शेक्सपियर के 'कॉमेडी ऑफ एरर्स' को आंचलिक परिवेश में ढाल कर किया गया पद्यानुवाद है, और यह छत्तीसगढ़ी साहित्य की पहली अनूदित रचना मानी गई है। पं. शुकलाल प्रसाद पांडेय जी पर रायगढ़ के शत्रुघ्न साहू, भाटापारा के राममोहन त्रिपाठी और बेमेतरा के शत्रुघ्न पांडेय ने शोध किया है।
पं. लोचन प्रसाद पाण्डेय -  पं. शुकलाल प्रसाद पांडेय - रमेश पांडेय जी
यहां पं. शुकलाल प्रसाद पांडेय द्वारा छत्तीसगढ़ के पुराविद-साहित्यकार पं. लोचन प्रसाद पाण्डेय को संबोधित पत्र की प्रस्‍तुति है। इस पत्र की प्रति शुकलाल जी के पौत्र वरिष्‍ठ पुलिस अधिकारी रमेश पांडेय जी ने उपलब्‍ध कराई है।
श्री रामः।
स्वजन-चकोरानन्द-रजनीश-धवल, विधि-कमण्डल-निस्सरित सरितवत विमल, स्वदेशोद्यान-स्थित-प्रभूत-परिमल घृत चन्दन, महितल-विरा-जित-सुकवि-मंडली-मंडन; विश्व-मंदिर-शोभित-दिव्य दीप, निगमाधिक-ग्राम-दाम-अवनीप; धर्म-धुर-न्धर, भूमि-पुरन्दर; अखिल-गुण-गण-मंडित, सकल काव्य-शास्त्र-पंडित; प्रचुर प्रज्ञावन्त, कविता-कामिनी-कंत; यश-धाम, चरित-ललाम; महा महिमा-धृत-पूज्यपाद, श्री र्छ पं. लोचनप्रसाद जी पाण्डेय के त्रि-विध ताप नाशक, सुन्दर-सुशीतल-अमल-कमल-तुल्य शांति-विधायक चरणों में; दीनातिदीन, बुद्धि-विद्या विहीन; पाद-पंकज-मधुकर, दासानुदास; अनुचर; ग्रसित-दुःख-उन्माद, द्विज शुकलाल प्रसाद; भक्ति भरित हृदय-धाम, श्रद्धा-पुष्पांजलि ले ललाम, करता है अनेक अनेकशः दण्डवत-प्रणाम।

देव!
अनेक आधि-व्याधि और उपाधियों के कारण चिरकाल से आपके विपुल विदुषजन-अर्चित, यश-परिमल-पंकचर्चित चारुचरणों में, मैं अपने कुशल-मंगल की मृदुल-मंजुल-पूजा-कुसुमांजलि समर्पित न कर सका। एतदर्थ मुझे बड़ा परिताप है। पर यह सर्वथा सत्य है कि आप के स्मरण-सरोज के अमल आमोद दाम परिमल-प्रवा-ह से मेरा चित्त-चंचरीक यदा कदा आनन्दानु-भव करता ही रहता है। दुर्भाग्य के निकट में इतना सौभाग्य भी बड़ा गर्व मूलक है।

बहुत दिनों से आपलोगों के दर्शनों की हृदय में अतीव लालसा है। प्रजावत्सल महामान्य-वर रायगढ़-नरेश के मंगलमय उद्वाह-कार्य में सम्मिलित हो पूज्यपाद पं. बलदेव प्रसाद जी मिश्र, पूज्यचरण पं. पुरुषोत्तम प्रसाद जी पाण्डेय, श्रद्धास्पद पं. मुकुटधर जी, तथा मनोहरमूर्ति
मनोहरलाल जी सारंगढ़ पधारे थे। दुभार्ग्य से मैं उन दिनों ज्वर ग्रस्त हो शैयाशायी था। अतः उपरोक्त महानुभावों के दर्शनार्थ सारंगढ़ न जा सका। ''मन की मनहीं माहिँ रही।''
मैं आजकल मैथिली-मंगल नामक काव्य का विरचन कर रहा हूँ। दो सर्ग अभी तक बन सके हैं। इसे आपलोगों को दिखा कर कुछ उपदेश ग्रहण करने की मन में बड़ी इच्छा है; पर आपकी अनुमति पाये बिना इसे आप लोगों के पास भेजने से एक प्रकार की असभ्यता होगी, यही सोच मैं इस कार्य से हाथ खींचे बैठा हूं। यदि अवकाश हो, तो कृपया आज्ञा दीजिये।
बद्ध-मुष्ठि रायपुरी काउंसिल शिक्षकों की वेतन-वृद्धि में अनुदारता का प्रयोग चिरकाल से करती आ रही है। मुझे यहाँ ४०/ मासिक मिलता है। बहु कुटुम्बी आश्रम में इतने में जीवन निर्वाह
भली भाँति नहीं हो रहा है। मन सदा उद्विग्न और चिंतित रहता है। अधिक क्या, निम्नलि-खित पद्य मेरी दशा के उज्वल चित्र हैं :-
''मिलता पगार प्रभागार तभी पूर्णिमा है,
ले-दे हुए रिक्त अमावस भय दानी है।
आजतक वेतन के रुपये हजारों मिले;
झोपड़ी बनी न पेट-दरी ही अघानी है॥
पास है न पैसा एक कफन मिलेगा क्या न?
शुकलाल ताक रही मृत्यु महारानी है।
जड़ लेखनी भी रो रही है काले आंसुओं से;
मेरी दुखसानी ऐसी करुण कहानी है॥''
(२)
शिक्षक ने एक रोज पूछा निज बल्लभा से-
''वेतन है अल्प, निरवाह कैसे कीजिये?
अश्रु-ओस-शोभित हो बोली यों कमलमुखी-
''नाथ! मुझे मेरे मायके में भेज दीजिये।
''और इन बालकों को?''(हाय! छाती फट जा तू);
जा अनाथ-आलय को शीघ्र सौंप दीजिये।
कूए में न कूदिएगा चूड़ी मेरी राखिएगा,
बीस दिन खा के शेष दिन व्रत कीजिये।

मैंने सुना है कि हाई स्कूल रायगढ़ में हिन्दी पढ़ाने वाले अध्यापक का स्थान रिक्त है, अथवा उस पद पर किसी अच्छे अध्यापक की नियुक्ति के लिये उस शिक्षा-संस्था के महानुभाव सदस्यगण चिन्ताशील हैं।

मैं नार्मल परीक्षोत्तीर्ण और री-ट्रेंड-टीचर हूं। मेरी सर्विस २२ वर्ष की है। मैं हिन्दी की मध्यमा- परीक्षा में भी उत्तीर्ण हूं। अतः मैं इन्ट्रेन्स कक्षाओं में हिन्दी पढ़ाने का कार्य भलीभाँति कर सकता हूं।

यदि उपरोक्त समाचार सत्य है और यदि वहां मैं सफलता पा अपना हित साधन कर सकूं और आप भी यदि उचित समझें तो रायगढ़ के शिक्षा विभाग के मुख्‍याधिकारी महोदय से
मेरी सिफारिश कर मुझे अपनी अतुलनीया अनुकम्पा से कृतार्थ कीजिएगा।

आशा है, नहीं २, दृढ़ विश्वास है कि मेरी यह विनय-पत्रिका आपके कमनीय कर-क-मलों में समर्पित हो मुझे सफल-मनोरथ कराने में अवश्य सफलता प्राप्त करेगी।

''भिक्षामोघा वर मधि गुणे नाधमे लब्ध कामा।''

विनयाऽवनत
शुकलाल प्रसाद पाण्डेय,
हे.मा. मिडिल स्कूल
भटगांव
आश्विन शुक्ल द्वादशी
८६
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इस तारतम्य में एक अन्‍य पत्र-
हिन्दी व्याख्‍याता पद के लिए मुक्तिबोध जी ने दिनांक 10-5-58 को अंगरेजी में आवेदन किया था, यह भी एक पृथक पोस्ट बना कर प्रकाशित करना चाहता था, किन्तु अपनी सीमाओं के कारण अब तक वह मूल पत्र या उसकी प्रति नहीं देख पाया। विभिन्न स्रोतों से पुष्टि हुई कि यह पत्र टाइप किया हुआ है। यहां इस्‍तेमाल प्रति, सन 1957 में स्थापित शासकीय दिग्विजय महाविद्यालय, राजनांदगांव के 1982 में प्रकाशित रजत जयंतिका अंक से ली गई है। पत्र में मुक्तिबोध अपने तेवर सहित हैं।


पत्र के कुछ खास हिस्से का हिन्‍दी अनुवाद इस तरह होगा- ''मैं हिंदी कविता के वर्तमान साहित्यिक परिदृश्य में प्रभावी आधुनिकतावादी रुझान का अगुवा रहा हूं। ... ... ... मैंने प्राचीन साहित्यिक मूल्यों का पुनर्विवेचन आरंभ किया और कतिपय नये सौंदर्यबोध की अवधारणा सृजित कर इसे व्यष्टि एवं समष्टि की नवीन परिवर्तनशील जीवन शैली से जोड़ा। ... .... ... अब मेरी साहित्यिक प्रतिष्ठा है। प्रायः हिंदी कविता के आलेखों में मेरे उद्धरण लिये जाते हैं।

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छत्‍तीसगढ़ से मेरा लगाव सिर्फ इसलिए नहीं कि यह मेरी जन्‍मभूमि है, यहां गौरव उपादान पग-पग 'जिन खोजा' नहीं 'बिन खोजा' भी पाइयां हैं।

Sunday, October 16, 2011

नाम का दाम

उत्तरप्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ से 1978 में प्रकाशित, हिन्दी समिति प्रभाग ग्रन्थमाला-249 है ''उपनाम : एक अध्ययन'' लेखक हैं, डॉ. शिवनारायण खन्ना। लेखक ने बताया है कि ''व्यंग्य लेख 'कमल, कामिनी और कलकत्ता' शीर्षक से 'साप्ताहिक हिन्दुस्तान' में प्रकाशनार्थ भेजा, जो 12 अप्रैल 1959 के अंक में प्रकाशित हुआ। लगभग तभी से मैं उपनामों तथा प्रच्छन्न नामों का संकलन करता रहा हूं। इस ग्रंथ में उपनामधारी लगभग 2650 साहित्यकारों के 3000 से अधिक उपनाम तथा प्रच्छन्न नाम हैं। ... उपनाम, उपनाम रखने के उद्देश्‍य, उपनाम के आधार, प्रकार तथा विशेषताओं का विवेचन इस ग्रंथ में किया गया है।''

पुस्‍तक में उपनामों संबंधी जो नाम (शब्‍द) गिनाए गए हैं, वे हैं- अपर नाम, अन्‍य नाम, अवास्‍तविक नाम और इसी तरह नाम जोड़ते चलें- असत्‍य, आंशिक, आधा, उपाधि, कल्पित, कार्य, काल्‍पनिक, काव्‍य, कृतक, कृत्रिम, गुप्‍त, गुह्य, गोपन, गौण, घरेलू, छद्म, छोटा, तूलिका, दिखावटी, दुलार का, दूसरा, नकली, नीति, धारित, परिवर्तित, पुकारने का, प्रचलित, प्रच्‍छन्‍न, प्रिय, प्रसिद्ध, बचपन का, बनावटी, भावनात्‍मक, मुंहबोला, लघु, लाक्षणिक, लेखनी, व्‍यंग्‍य, व्‍यवसाय, शिक्षा, संकेत, सम्‍पादकीय और साहित्‍य नाम के साथ इस सूची में छाप (मुहर, चिह्न, निशान), तखल्‍लुस, पदवी भी है।

पुस्‍तक में उपनामों की चर्चा शुरू होती है- बाल्‍मीकि, व्‍यास, चाणक्‍य और कालिदास के क्रम से। लेकिन मुझे याद आ रहे हैं पंडिज्‍जी, यानि आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, जिन्‍होंने व्‍योमकेश शास्‍त्री, प्रचंड, रंजन, द्विरद, राधामाधव शाक पार्थिव, अभिनव तुकाराम नामों से लेखन किया और जिनकी रचनाएं चारुचन्‍द्र का लेखा- 'चारुचन्‍द्रलेख' है और है 'बाणभट्ट की आत्‍मकथा', इससे भी आगे 'अनामदास का पोथा', मानों उनका कुछ नहीं। और याद आते हैं छत्‍तीसगढि़या मुक्तिबोध, जो गजानन माधव के बिना ही अधिक जाने जाते हैं।

मुक्तिबोध कुछ अन्‍य यौगन्‍धरायण, अवन्‍तीलाल गुप्‍ता तथा विंध्‍येश्‍वरी प्रसाद, (छद्म) नामों से भी लिखते थे। मुक्तिबोध रचनावली प्रकाशित हुई, तब छान-बीन करता रहा। उनके कुछ ऐसे लेख जो मेरे पास थे, रचनावली में शामिल न पाकर बेचैनी हुई, पर बात वहीं रह गई। फिर अवसर बना, मुक्तिबोध जी के सुपुत्र दिवाकर जी से मैंने इसका जिक्र किया, उन्‍होंने तुरंत भाई सा‍हब रमेश जी को संदेश दिया और बताया कि मुक्तिबोध जी की ऐसी रचनाओं को प्रकाशित करने की तैयारी है। राजकमल प्रकाशन ने यह पुस्‍तक 2009 में छापी 'जब प्रश्‍नचिह्न बौखला उठे' शीर्षक से। पुस्‍तक की प्रस्‍तावना 'मेरी ओर से' में रमेश गजानन मुक्तिबोध जी ने उल्‍लेख किया है- ''बिलासपुर के राहुल सिंह ने अपने निजी संग्रह से 'सारथी' के कुछ-एक अंक उपलब्‍ध कराए जिनमें निबन्‍ध प्रकाशित थे। उनके सद्भाव के लिए मैं हृदय से आभारी हूं।'' मुझे इस प्रसंग में लेकिन, मुक्तिबोध की कहानी 'ब्रह्मराक्षस का शिष्‍य' वाली राहत हुई।

देखिए पुस्तक चर्चा में आत्‍मश्‍लाघा आने लगी और वह बात रह गई, जिसके लिए पोस्ट लिखने की सोचा। तो हुआ यूं कि पिछले माह एक छोटा सा पुस्तक मेला लगा। पुस्तकों से हमारा रिश्ता काफी समय से जरा नरम-गरम सा हो चला है। चाहे पुस्तक खरीदना हो या पढ़ना। व्यवस्थित रख सकने की चिंता होती है और समय पर किताब न मिले तो चिड़चिड़ाहट। नजर, वय का साथ निभा रही है, बारीक अक्षरों से मुक्ति मिल गई है और चश्मा कहीं भूला-छूटा रह जाता है, शायद चर्म चक्षु से अधिक मन की आंखें खोलने का दैवीय निर्देश है, कब तक रहें कागज की लेखी, अपरा के चक्‍कर में। पुराने पढ़े-पढ़ाए से जमा के ब्‍याज पर अब का काम चल ही जा रहा है, लेकिन सूदखोरी का धर्म निभाते हुए तगादे की तरह भटक लेते हैं, फिर आदत भी तो जाते-जाते जाती है। पुस्तक मेले में पहुंच गए एटीएम, कुछ फुटकर रकम और अपने इस आत्मविश्वास सहित जेब में हाथ डाले कि पुस्तकें लेनी तो हैं नहीं।

समाज को प्रतिबिंबित करती, ब्लाग पर पसरी, महरिन की गैरहाजिरी और सड़क पर छेड़खानी, ऐसे बिगड़ते रिश्‍ते जो बने ही नहीं थे, पंचायतीय और मुन्सीपाल्टीय-वार्ड स्‍तरीय आफतों से ले कर अन्ना, भ्रष्टाचार, देश का पैसा विदेशों में, टाटा-बाटा के शाब्दिक जूतम-पैजार में अलविदा टाइप 'घनघोर संकट' वाली पोस्‍टों के साथ ढेर साथी हैं जो यहां अपनी चिंता और दुख बांटते समाज की तस्‍वीर बदलने में निरंतर जुटे हैं जी-जान से। मनोहर श्याम जोशी के शब्‍दों के सहारे कहना चाहूं तो त्रासद होते हास्य और हास्यास्पद बन जाने वाले त्रास के बीच छोटे-छोटे सुख मुझसे टकराते रहते हैं इसलिए लगा कि पुस्‍तक मेला की किताब के बहाने 'महंगाई डायन' और 'हाय पेट्रोल' के दौर में एक अच्छी खबर क्‍यों न बांट ली जाय।

इस सजिल्द 562+14 पृष्ठ की किताब का मूल्य है, उन्नीस रुपये। मेला छूट (या फुटकर की समस्‍या) के कारण मुझसे लिए गए पन्द्रह रुपये और हां, बारीक हिसाब करूं तो मेले में प्रवेश के पांच रुपये। फिर तो ले ही आया अच्‍छे अच्‍छों पर बीस पड़ने वाली उन्‍नीस की यह किताब, चश्मा मिल गया है, पढ़ने के बाद यह पुस्तक भी अपनी जगह पा ही लेगी। कुल जमा बात इतनी, उपनाम की इस पुस्तक का दाम तो बस नाम का हुआ।
(समाचार पत्र 'आज की जनधारा', रायपुर के ब्‍लॉगकोना स्‍तंभ में 27 नवंबर 2011 को प्रकाशित)