8 अगस्त 1956 बुधवार, शुक्ल पक्ष की द्वितीया को सुबह 09 बज कर 41 मिनट के बाद तृतीया तिथि आरंभ हो गई थी, बच्ची जन्मी, नाम हुआ तीजन। घरों में रखे जाने के लिए ‘निषिद्ध‘ मान लिए गए महाभारत की दूसरी परंपरा पंडवानी हुई तो इसकी तीसरी परंपरा को यही तीजन जन्म देने वाली है, मानों नियति ने तय किया था। इस तीजन ने महाभारत के भजन-पंडवानी को अंगीकार कर लिया, घर-समाज से स्वयं निष्कासित होने का जोखिम उठाते। स्वयं तीजन का महाकाव्य जैसा जीवन, पंडवानी के लोक का शास्त्र बना। उन्होंने पंडवानी की प्रचलित शास्त्र-शब्दावली और व्याकरण की सीमा का अतिक्रमण कर, उसका नया शास्त्र रचा। (कुछ स्रोतों में उनकी जन्म तिथि 24 अप्रैल 1956 मिलती है, इस तारीख को तिथि चतुर्दशी थी, अतएव आसानी खारिज की जा सकती है।) श्रीमती तीजनबाई, छत्तीसगढ़ की अब तक की ऐसी अकेली विभूति हैं, जो पद्मविभूषण से सम्मानित हुईं। यह सम्मान उन्हें 2019 में दिया गया। इसके पहले उन्हें 1988 में पद्मश्री और 2003 में पद्मभूषण से सम्मानित किया गया। इस तरह वे तीनों पद्म से सम्मानित हुईं। उन्होंने इकतारे को तीन तार वाले तंबूरे में बदला, जिसके लिए गीत भी गाया- ‘तैं मोर प्रान के अधारा तमूरा भइया ...‘ और पूरे अट्ठारह दिन वाली महाभारत कथा-पंडवानी सुनाने का कुल तीन अवसर ही बने (जैसा उन्होंने मुझे बताया), जबकि चंदखुरी, चंगोरी, गुजरा और पाटन, ऐसे चार अवसरों की चर्चा भी मिलती है।
नैसर्गिक प्रतिभा-संपन्न तीजनबाई की इस यात्रा में भिलाई स्टील प्लांट के निकट स्थित ग्राम गनियारी में जन्म और मध्यप्रदेश आदिवासी लोककला परिषद (संस्कृति विभाग के सचिव रहे अशोक बाजपेयी का जन्मस्थान दुर्ग, छत्तीसगढ़ से लगाव) का संयोग उल्लेखनीय है, और यही दौर था जब हबीब तनवीर के नया थियेटर के माध्यम से छत्तीसगढ़ कलाकर-लोकमंच और छत्तीसगढ़ी धूम होने लगी थी। जिसमें 1969-70 में चंदखुरी, दुर्ग में पहला मुख्य सार्वजनिक प्रदर्शन, 1971-72 के ‘भिलाई मड़ई‘ में प्रस्तुति के बाद भारत-भवन, भोपाल के ‘पंडवानी प्रसंग‘ में 14 जून 1983 को प्रस्तुति और 1985 में पेरिस यात्रा, महत्वपूर्ण पड़ाव था। इस क्रम में विमल कुमार पाठक, दानेश्वर शर्मा और निरंजन महावर के लेखन-प्रोत्साहन भी उल्लेखनीय हैं।
तीजनबाई की पंडवानी, महाभारत के साथ कालजयी कथा ... श्रीमती तीजनबाई की जीवन-कथा महाकाव्यात्मक है या उनके सुनाने का ढंग ... अंवतरे, तहां ले कूकुर मो ल धर के लेग गये रहिस ... किस तरह जन्म के बाद उन्हें कपड़े में लपेट कर सुलाया गया था। आसपास कोई नहीं था, तभी एक कुतिया आई और कपड़े में लिपटी शिशु-तीजन को दांतों में दबा, उनके घर से कुछ दूर ले गई थी। शास्त्र कहता है- ‘जन्मना जायते शूद्रः ...‘ पर छत्तीसगढ़ी में जन्म लेना, ‘अंवतरना‘, अवतार लेना है, किसी खास प्रयोजन को सिद्ध करने के लिए जन्म। तीजनबाई ने ‘अपनी पंडवानी‘ से यह सार्थक किया। मैंने टिप्पणी की- आपके साथ तो जन्म से ही महाकाव्यों के पात्र की तरह घटना होने लगी थीं, प्रतिक्रिया में उनकी मुस्कुराहट में बहुत कुछ बूझा-अनबूझा होता। उल्लेख मिलता है कि श्रीमती इंदिरा गांधी ने मुलाकात में उनसे पूछा था- ‘महाभारत करती हैं?‘, तीजनबाई ने सहज जवाब दिया- पंडवानी कथा सुनाती हूं, महाभारत नहीं करती‘। इसी तरह इतिहास के कालक्रम की तरह परत-दर-परत नहीं, बल्कि आत्मीय स्मृतियां अनुभूति में बन कर कपसीले ढेर की तरह हो जाती हैं। वे कहतीं- ‘वास्तव में मेरे मन में श्री कृष्ण जी और सरस्वती का वास था।‘
पंडवानी को परम्परा से कहीं अधिक संबल सबलसिंह चौहान कृत महाभारत से मिला, माना जा सकता है, जिसे आधार बनाकर गायन होता रहा और उसे सुनकर भी सिलसिला आगे बढ़ा। परम्परा में ‘पण्डुवानी‘ मंडला के परधानों के साथ भी जुड़ी है। परधान, गायक जनजातीय पुरोहित हैं। परधानों की ‘शैली‘ में मुख्यतः कथा-वाचन अधिक है, प्रदर्शन कम। यद्यपि छत्तीसगढ़ की पंडवानी-कथा पर उसका असर नहीं है, शैली पर प्रभाव अवश्य माना जा सकता है। छत्तीसगढ़ में पंडवानी गायक ‘भजनहा‘ कहे जाते थे और कथा ‘महाभारत‘। बाद में ‘पंडवानी‘ नाम प्रचलित हुआ और इसमें तीजनबाई के पदार्पण से ‘वेदमती‘ और ‘कापालिक‘ शब्दावली की आवश्यकता प्रबल हुई। तीजनबाई की पंडवानी-प्रस्तुति की शैली, उनकी स्वयं की विकसित की हुई है, मगर कथा-कहन पर सबलसिंह चौहान, देवारों और यादवों के बांसगीत- गाथा-गायन का प्रभाव है। उनकी पंडवानी-यात्रा की शुरुआत के क्रम में उनके नाना-गुरु बिरिजलाल या रागी उमेद सिंह की चर्चा मिल जाती है, लेकिन यह उल्लेख कम हुआ है कि वे अपने माता-पिता से बांसगीत, जिसमें गाथाएं होती हैं, सुना करती थी। बहरहाल, निरक्षर तीजनबाई ने महाभारत की संपूर्ण अठारह अध्याय-कथा, सुन-सुन कर कंठस्थ कर ली।
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| मंच पर ‘महाभारत‘ बैनर |
‘पंडवानी‘ शब्द को ‘पांडव-वाणी‘ बताया जाता है, जो संस्कृतनिष्ठता के कारण है, जबकि वस्तुतः पंडवानी का शाब्दिक अर्थ 'पांडवों की' गाथा का गायन, कथा-वाचन है, जैसाकि ‘रमायनी‘ (रामायणी) का मतलब राम-रामायण की वाणी नहीं, रामायण कथावाचन है। पंडवानी-गायन में शैलीगत विभेद और नामकरण ‘कापालिक‘ के पीछे, तीजनबाई की गायकी-प्रस्तुति को मुख्य माना जा सकता है। दूसरी शैली कही गई ‘वेदमति‘ अर्थात् शास्त्रीय-पारंपरिक ढंग से गायन। ‘कापालिक‘, कपाल यानी अपनी बुद्धि-कल्पना का समावेश करते हुए दी जाने वाली प्रस्तुति। वेदमती और कापालिक को ले कर विभिन्न बातें कही गई हैं। एक व्याख्या में यह भी कहा गया कि बैठ कर प्रस्तुति ‘वेदमति‘ और खड़े हो कर ‘कापालिक‘। स्वयं तीजनबाई ने पवन कुमार सिंह से साक्षात्कार में कहा वेदमती शैली के अंतर्गत गायक केवल पाण्डवों की कथा को साधारण रूप से बताता है जबकि कापालिक शैली में कलाकार पाण्डवों की कथा को नाच-गाकर मुद्रा और अभिनय के माध्यम से बताता है। मेरी शैली कापालिक कहलाती है। कुछ इसी प्रकार का मंतव्य डॉ. बलदाऊ प्रसाद निर्मलकर का है। शास्त्र-सम्मत कथाओं के गायन को वेदमती और जनश्रुति पर आधारित दंतकथाओं का गायन कापालिक कहा जाता है।
वेदमति-कापालिक पर निरंजन महावर के अनुसार पंडवानी की दो शैलियां हैं- कापालिक, जिसका कोई पाठ नहीं है और महाभारत कथा, शास्त्र पर आधारित ‘वेदमती‘।' आगे वे यह भी लिखते हैं कि ‘चूंकि पंडवानी की यह शैली अधिक पुरानी नहीं है अतः इसकी प्रस्तुति के अनेक पक्ष अभी पूर्णतः रूढ़ नहीं हुए हैं, इसलिए इस शैली के और विकास की संभावनाएं बनी हुई हैं। रामहृदय तिवारी इसकी बारीकी में नहीं जाते, लिखते हैं- ‘ ‘वेदमती‘ और ‘कापालिक‘ शाखाओं के नाम से विभक्त इस पंडवानी के जिस स्वरूप से हम सब ज्यादा परिचित हैं वह ‘कापालिक शाखा‘ की विख्यात शैली है, जो शास्त्रीय कथा को लोकरंग के नए परिधान देकर पूरे आत्म विश्वास के साथ हमारे सामने लाती है। ऐसा कहा जाता है कि कापालिक शाखा का अभ्युदय ‘वेदमती‘ शाखा की पारंपरिकता के विरोध स्वरूप हुआ। कापालिक शाखा के गायकों ने समयानुकूल लोकरूचि के वाद्यों का समावेश अपनी प्रस्तुति में किया। गायकी की नई आक्रामक शैली का अविष्कार किया। गाथा को अंचल की प्रचलित लोक धुनों में बाँधा और पूरी सजधज के साथ प्रसंगानुकूल ‘एकल अभिनय‘ की शुरूआत हुई, जिसका चरमोत्कर्ष आज की विश्व विख्यात पंडवानी गायिका पद्मश्री तीजन बाई में देखा जा सकता है।
रमाकांत श्रीवास्तव की टिप्पणी से ‘वेदमती-कापालिक‘ को समझना मददगार है, जिसमें वे लिखते हैं- ‘ ... रही सही कसर इस प्रचार ने पूरी कर दी कि सबल सिंह के महाभारत के आधार पर प्रस्तुत की जाने वाली पंडवानी वेदमती शैली है और पुरानी पंडवानी कापालिक शैली। इस विभाजन का न तो कोई आधार है और न ही इसके पीछे कोई तर्क है। ‘वेदमती‘ पद ‘कापालिक‘ शब्द से अधिक आदर के योग्य माना गया क्योंकि समाज में कापालिक परंपरा का स्थान नगण्य हो गया है। तार्किक दृष्टि से सोचें तो कापालिक एक भिन्न मत है और महाभारत की कथा से उसका सम्बन्ध दूर-दूर तक नहीं है। अपनी कथा गायन शैली को लोक मानस में उच्चासीन करने के लिये ये नाम प्रचारित किये गये है। न केवल जन सामान्य ने बल्कि लोक संस्कृति के कई शोधार्थियों ने इन नामों को जस का तस स्वीकार भी कर लिया है।‘ तीजनबाई ने पीसी लाल यादव को साक्षात्कार में बताया- ‘जो बैठकर गाते हैं एकतारा में गाते हैं और जो कापालिक शैली है उसमें तंमूरा में तीन तार लगाते हैं। कापालिक शैली में तंबूरा को झुनकी से बजाते हैं और वेदमती शैली के गायक नारद की तरह एक उंगली से बजाते हैं। लोगों ने अलग-अलग चीजें अपनाईं और अलग-अलग वाद्य बनाये। मैंने कापालिक शैली अपनाई तो अपने ढंग का वाद्य अपनाया। श्री नारायण ने पंडवानी गायन शुरू किया तो एक हाथ में करताल और दूसरे में तंबूरा लिया।‘
तीजनबाई की प्रस्तुतियों में कमाल का होता था ‘कीचक वध‘ प्रसंग। इसके साथ मुझे याद आ रहे बहुत सारे प्रसंगों में से एक ‘द्रौपदी चीरहरण‘, जिसमें दुःशासन के थक-हंफर‘ कर लस्त-पस्त हो जाने के लिए वे जोड़ती ‘दिन भर कमा के घर लहुटत, चढ़ाउ म सैकिल आंटत, हंकरत-हंफरत ...‘, वे उस दृश्य में डूब जातीं और उनकी कल्पना में भिलाई के थके-मांदे घर लौटते श्रमिक का रूपक बनता। तमूरा वह कितना बजाती पता नहीं लगता, मगर वही तमूरा, धनुष-तीर-तलवार बन जाता। उसे गदा की तरह कंधे पर ले कर, मर्दानी चाल में मंच पर दाएं-बाएं फिरती तो दर्शक के लिए भीम मानों साक्षात अवतरित हो जाते। किसी विदेशी प्रस्तुति, संभवतः पेरिस में, प्रस्तुति के लिए गई थीं, याद करतीं कि भारी भीड़ के बीच से निकल कर जाना था। उन्होंने गदा की तरह तमूरा उठाया और ‘दंगरस-दंगरस‘ चलने लगीं, पूरी भीड़ छंट गई और उनके पीछे-पीछे सारे कलाकार आ गए।
खुद पर और दूसरों के प्रति भी भरोसा बनाए रखना, उनका खास गुण था। शुरुआती दिनों में दिल्ली, रेल्वे स्टेशन के पास पहाड़गंज के जिस ‘नीलम‘ होटल में रुका करती थीं, अपनी प्रतिष्ठा और नाम-यश के बाद भी दिल्ली प्रवास पर उनकी प्राथमिकता वही होती। उनके रागी-संगतकार भी लगभग वे ही बने रहे। नवंबर 2001 में दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय आडिटोरियम में उनकी प्रस्तुति थी। कार्यक्रम शुरु होते ही मैंने हॉल की बत्तियां बुझवा दीं। मगर कुछ ही देर में हॉल की बत्तियां फिर से जल गईं। मैंने जा कर पूछताछ की, पता चला कि उन्होंने ही बत्तियां जलाए रखने के लिए कहा है। प्रस्तुति के बाद उनसे जा कर मिला और पूछा कि हॉल की बत्तियां जलते रखने के लिए आपने कहा था, क्यों? उन्होंने बताया कि सामने दर्शकों के हाव-भाव न दिखें तो उन्हें अपनी प्रस्तुति का उत्साह नहीं होता। दर्शकों की मुख-मुद्रा देखते, अपनी प्रस्तुति को ‘इम्प्रोवाइज‘ करती चलती हैं। उस दिन उनके जवाब से मंचीय प्रस्तुतियों की फोर्थ वाल कही जाने वाली खासियत से परिचित हुआ। भरत मुनि के नाट्य शास्त्र, थियेटर के ब्रेख्तियन या शेक्सपियरियन प्रपंचों से उनका कोई रिश्ता न रहा हो, मगर ‘ब्रेकिग द फोर्थ वॉल‘, अकेली विभिन्न पात्रों को जीवंत कर, जताती कि यह अभिनय है, दर्शकों को भी प्रस्तुति के अभिन्न अंग की तरह जोड़ लेतीं। प्रस्तुति के बाद नेपथ्य में आ कर कुछ देर शांत बैठ जातीं, मानों मंच पर आह्वान किए, उनमें अवतरित पात्रों को एक-एक कर विदा कर रही हों, विसर्जन-विषाद के साथ आत्मस्थ होते भाव, लगता कि रघु राय होते तो इसी क्षण को कैद करते। प्रस्तुति के पहले की तैयारी हो या उसके बाद, उन्हें नेपथ्य में देखना, मंच पर देखने से कम सम्मोहक न होता।
एक तरफ पीटर ब्रुक्स का भारी ताम-झाम वाला ‘महाभारत‘ होता तो उसके बरअक्स अपने रागी-साजिंदों के साथ अकेली तीजनबाई की पंडवानी। गद्य-पद्यात्मक चम्पू शैली में वे सूत्रधार-कथावाचक भी होतीं और प्रसंगानुसार विभिन्न पात्र भी। एकल मंचीय प्रस्तुति देते कलाकार मात्र की तरह कभी रागी से संवाद भी कर लेतीं। छत्तीसगढ़ के लोकमंच के खड़े साज के साथ इसमें घोड़ा नाच यानी तारे-नारे की झलक मिलती, जिसमें कलाकार, बीच में उत्तम पुरुष बन कर, अन्य पुरुष (जिस पात्र का अभिनय कर रहा है) भी हो जाता है। यही कारण है कि श्याम बेनेगल ने बहुप्रशंसित टी.वी. धारावाहिक ‘भारत एक खोज‘ के महाभारत काल के लिए तीजनबाई को चुना, एक कमाल श्याम बेनेगल के चयन का तो दूसरा उनकी सोच से आगे, कहीं बेहतर उसे तीजनबाई ने साकार कर दिखाया।
तीजनबाई की पंडवानी के संदर्भ में छत्तीसगढ़ी की संप्रेषणीयता और उसके भाषा-भूगोल के विस्तार पर विचार किया जाना प्रासंगिक होगा। उन्नीस सौ अस्सी की दहाई का दौर तीजनबाई की पंडवानी और हबीब तनवीर के छत्तीसगढ़ी वाले नाटकों का था। माना जाता है कि इस प्रसार के साथ पंडवानी प्रस्तुतियों में छत्तीसगढ़ी काव्य-‘भाषा‘ में हिंदी का अंश भी बढ़ा। जबकि पंडवानी की आरंभिक प्रस्तुतियों की रिकार्डिंग में खास कर, गेय अंशों में कहीं-कहीं छत्तीसगढ़ी के शब्द पकड़ने में कठिनाई होती है। तीजनबाई की संप्रेषणीयता में उनका अभिनय, पात्रों के नाम सहित महाभारत के आम तौर पर ज्ञात प्रसंग सहायक होते, जिससे भाषा की बाधकता कम हो जाती थी।
इसके साथ छत्तीसगढ़ में प्रचलित गाथा-काव्यों की भाषा, हिंदी की पूर्वी और पश्चिमी दोनों उपभाषाओं से लोग परिचित रहे हैं। इसे स्पष्ट देखा जा सकता है कि सबल सिंह चौहान के महाभारत को ‘भाषा‘ कहा गया है, जो हिंदी की पश्चिमी उपभाषा में ‘ब्रज-बुंदेली‘ है, जबकि छत्तीसगढ़ी, अवधी और बघेली के साथ पूर्वी उपभाषा में शामिल की जाती है। छत्तीसगढ़ में अवधी तुलसी रामायण का प्रचलन रहा है। रहंस और बाबू रेवाराम के गुटके ‘रतनपुरिहा गम्मत‘ से ब्रज भी सहज घुला-मिला रहा हैै। बुंदेली ‘आल्हा‘ का गायन छत्तीसगढ़ के गांव-गांव में होता रहा है। मंडला-बालाघाट में प्रचलित बोली, विशेषकर काव्यभाषा, पश्चिमी-पूर्वी, ब्रज-अवधी या बुंदेली-बघेली का प्रभाव है, जिसमें छत्तीसगढ़ी विशेषता भी घुली-मिली है। मंडला के परधानों के ‘पण्डुवानी‘ की कथा मुख्यतः महाभारत के पात्रों पर आधारित, मगर स्थानीयता के प्रभाव-प्रसंगों वाली है, जिसकी भाषा छत्तीसगढ़ी के बहुत करीब है। इस तरह पंडवानी की संप्रेषणीयता से यह और भी पुष्ट हुआ कि हिंदी की उपभाषा-बोलियां आपस में काफी हद तक घुली-मिली हैं। छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद राकेश तिवारी का छत्तीसगढ़ी नाटक ‘राजा फोकलवा‘ के सौ से अधिक मंचनों में से कई गैर-हिंदीभाषी प्रदेशों में हुए और सफल रहे। इसके साथ एक रोचक उल्लेख कि गाथा-गायन की भाषा को ‘फारसी‘ कह दिया जाता है, जिसका तात्पर्य है- ‘खालिस, शुद्ध-पारंपरिक, ठेठ-ठाट की भाषा‘, जो आम बोलचाल से कुछ हटकर हो।
एक प्रसंग, विश्व व्यापार मेला, प्रगति मैदान के ‘लाल चौक‘ एम्फी-थियेटर में ‘छत्तीसगढ़ दिवस‘ सांस्कृतिक संध्या प्रस्तुति के दौरान हुआ। बड़े मीडिया हाउस के एक नामचीन पत्रकार आए और ठाट से कहने लगे तीजनबाई को बुलाओ, हमें उनको कवर करना है। बॉडी लैंगुएज की समझ एक कलाकार से अधिक किसको हो सकती है और वह भी तीजनबाई जैसी कलाकार। उनकी विनम्रता में स्वाभिमान की गरिमा होती। प्रशंसा के जवाब में मासूम मुस्कुराहट, जिसमें संकोच और कही गई बात का सम्मान रखते, उसे स्वीकार कर लेने का भाव होता। पत्रकार महोदय का रवैया देख कर उन्होंने भोलेपन से कहा- साहब लोगों से पूछ लेती हूं और मेरे पास आ कर उन पत्रकार के रवैये के बारे में बताया। मैंने पूछा, आपको उनसे बात करना जम रहा है, जवाब में अपने चेहरे के भाव पर्याप्त थे। मैंने सलाहियत की तरह उनसे कहा, मुझे लगता है कि उन्हें आपकी जरूरत हो सकती है आपके लिए छपने-छपाने की चिंता करना उतना जरूरी नहीं लगता, वैसे आपको जैसा उचित लगे, हमलोगों को कोई आपत्ति नहीं है। इस पर पूरी अदा के कहा- हौ! फेर अब तो टेम भी हो गए हे, संभरे-पखरे म भी बेरा लागिही और अपने सहायक को भेज दिया। पत्रकार महोदय मुझसे लगभग झगड़ पड़े कि लोक-कलाकारों को इस तरह बंधन में रखने की ज्यादती कर रहे हैं आपलोग, आदि इत्यादि। उनके मंजीरा-सहयोगी मनहरन सार्वा, सचिव की तरह काम करते थे। ऐसे आमंत्रण, जिनमें सलाह की जरूरत होती, तय करने के पहले सार्वा जी को मुझसे बात कर समझ लेने को कहतीं या उस दौरान रायपुर आतीं तो स्वयं मिल कर चर्चा करतीं।
छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद आरंभिक तीन-चार साल संस्कृति विभाग को मजबूत आधार देने वाले थे। इसका श्रेय तत्कालीन मंत्री श्री धनेन्द्र साहू, वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी डॉ. के.के. चक्रवर्ती और डॉ. इंदिरा मिश्र तथा विभागाध्यक्ष श्री प्रदीप पंत को है। इसी दौर में पंडवानी की परंपरा और अगली पीढ़ी की चर्चा में पंडवानी के विभिन्न कलाकारों की प्रस्तुतियां और साथ ही तीजनबाई की पंडवानी प्रशिक्षण कार्यशाला रायपुर और बिलासपुर में कराई गई। इस दौरान उनके सत्रों के आगे-पीछे खाली समय में बातचीत के दौरान मैंने उनसे पूछा कि छत्तीसगढ़ी में पारंपरिक सोहर गीत नहीं हैं? इस पर उन्होंने छत्तीसगढ़ी सोहर गीत गाना शुरू किया। बातचीत के क्रम में पता लगा कि वे भरथरी, चंदैनी आदि अन्य लोकगीत गाथाओं की जानकार हैं। मैंने कहा इतने दिनों में आपसे यह तो कभी नहीं सुना था, आप सुनाती क्यों नहीं। इस पर उन्होंने कहा कि पंडवानी चलने लगी तो तीजनबाई पंडवानी वाली ही हो कर रह गई, अब हर कोई पंडवानी ही चाहता है।
मार्च 86 वाले दौर में तीजनबाई की भोपाल में प्रस्तुति पर रामचन्द्र शर्मा की टिप्पणी देखने लायक है- ‘इसमें दो मत नहीं हो सकते कि श्री झाड़ूराम देवांगन या श्री पुनाराम निषाद की तुलना में श्रीमती तीजनबाई की पण्डवानी आकर्षित नहीं करती। ... पण्डवानी के कई शौर्य-प्रसंग एक महिला-गायिका के लिए जटिल हो सकते हैं। खास तौर पर आंगिक हाव-भाव के माध्यम से कथा को संपूर्णता देने का प्रयास प्रायः महिला गायक से सफल हो पाना कठिन होता है। फिर भी तीजनबाई ने भरसक चेष्टा कर ...द्रौपदी प्रसंग में ...सीधी और सपाट छत्तीसगढ़ी में यह पद सुनाया ... कुल मिलाकर श्रीमती तीजनबाई की पण्डवानी सामान्य रही।’
जिस तीजनबाई की पंडवानी के लिए लोककला के गंभीर समीक्षक कहा करते थे कि यह दुबली-पतली लड़की है, इसका पंडवानी गाना नहीं जमता ... यह पंडवानी की परंपरा और उसकी गंभीरता को नहीं समझती ... बहुत प्रभावी नहीं है ... आदि। उन्हीं तीजनबाई ने पंडवानी के मानक तय किए। उनकी कथा समाप्त होती, जयकारे के साथ- ‘बोलो बृंदाबन बिहारीलाल की ...। (निधन 5 जुलाई 2026)
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| जुलाई 2019, रायपुर में ‘इंडिया टुडे‘ के आयोजन में सुश्री तीजनबाई और श्री विनोद कुमार शुक्ल (चित्र में उनके पुत्र श्री शाश्वत) के साथ सम्मान ग्रहण करते उनके साथ का संयोग बना था। |
स्वर्गीय श्रीमती तीजनबाई की स्मृति में शासकीय हाई स्कूल, गनियारी का नामकरण और राज्य अलंकरण की घोषणा हुई है। सभी जिलों में उनकी प्रतिमा स्थापना, जिला मुख्यालयों में चौक, भारत रत्न, पीठ की स्थापना जैसी चर्चा हो रही है। उनकी जन्मतिथि, पुण्यतिथि पर अवकाश की मांग भी की जा सकती है। मगर मैं मानता हूं कि इससे कहीं अधिक जरूरी है कि उनके जितने भी साक्षात्कार प्रिंट या इलेक्ट्रानिक मीडिया पर उपलब्ध हैं, एकत्र कर इंटरनेट पर उपलब्ध कराया जाए साथ ही उन पर प्रकाशित स्तरीय सामग्री, अभिनंदन-सम्मान और प्रशस्ति पत्र, साइटेशन्स को भी संग्रहित कर, उनकी अधिकृत जीवनी, जिसमें यथासंभव उनकी सभी प्रस्तुतियों के आयोजक, स्थान, दिनांक, अवधि, प्रसंग आदि की जानकारी इंटरनेट पर सर्वसुलभ कराया जाए। इसके अलावा ‘पंडवानी‘ जैसी पारंपरिक लोककलाओं के माध्यम से छत्तीसगढ़ की संस्कृति को जीवंत बनाए रखने के उपाय किए जाएं।
प्रसंगवश-
पंडवानी कथा प्रचारक संस्थापक गायक झीपन निवासी नारायण प्रसाद वर्मा को माना जाता है, उनका जन्म 1884 में हुआ। 12 वर्ष की उम्र में पंडवानी गायन आरंभ कर दिया था। पंडवानी गायक गुरु की तरह उनकी पूजा-स्मरण करते हैं। उनके साथ रिश्ते के भाई, 1903 में जन्मे बोड़तरा के सूबेदार आडिल भी शामिल होते थे। बाद में दाउ सूबेदार भजनहा ने अपने भांजे किरीतराम और शालिगराम को साथ ले कर मंडली बनाई।
1927 में जन्मे बासिन, भिलाई के झाड़ूराम देवांगन ने 1945 में पंडवानी गायन आरंभ किया, 1964 में पहली बार इनकी पंडवानी का प्रसारण भोपाल, आकाशवाणी से हुआ। झाड़ूराम जी एक साक्षात्कार में बताया कि तम्बूरा और खंझेरी के अलावा उन्होंने तबला, हारमोनियम और मंजीरे का प्रयोग शुरू किया तथा उनके कार्यक्रमों में श्रोताओं की भीड़ का कारण, नये वाद्यों का प्रयोग था।
कुछ प्रमुख पंडवानी गायक- पूनाराम निषाद, रिंगनी, दुर्ग (1939), लक्ष्मीबाई बंजारे, कातुलबोड़, दुर्ग (1944), रेवाराम साहू, देवरी, दुर्ग (1946), तीजनबाई, गनियारी-अटारी (1956), चेतन देवांगन, पहन्दा, दुर्ग (1956), शांतिबाई चेलक, पिरदा, दुर्ग (1963), सामे शास्त्री देवी, जोगीपुर, दुर्ग (1963), मीना साहू, रनचिरई, दुर्ग (1964), प्रभा यादव, बंगोली, रायपुर (1970), ऋतु वर्मा, रुआबांधा, भिलाई (1979), उषा बारले, पावर हाउस, भिलाई (1989)।
इसके अतिरिक्त- पंडरिया, गंडई के श्री बोधीराम यादव (1915), बिसौहादास, बहेरा, दुर्ग (1933), रामनाथ यादव, सेनभांठा, महासमुंद (1942), अघनूराम निषाद, छाटा, दुर्ग (1950), भागवत प्रसाद साहू, कुरलू, कवर्धा (1953), मनमोहन सिन्हा, डोंडकी, रायपुर (1954), खम्हन लाल अस्तुरे, झलमला, बेमेतरा (1955), दयाबाई ध्रुव, दुपचेरा, दुर्ग (1957), ईश्वरी प्रसाद चंद्राकर, कुरुद, रायपुर (1960), पुनीत राम साहू, नेवारी, रायपुर (1960), पुनीत राम साहू, नेवारी, रायपुर (1960), परसराम धीवर, ससहा, बलौदा बाजार (1961), परसराम धीवर, ससहा, बलौदा बाजार (1961), चैतीबाई साहू, कुरुद, दुर्ग (1967), सुशीला ठाकुर, रायपुर (1968), प्रहलाद निषाद, सिंघनगढ़, कवर्धा (1971), सावित्री ठाकुर, रुआबांधा, भिलाई (1981) ... यह सूची विस्तृत है, मगर और कलाकार-नामों के साथ, उनका स्थान और जन्म की जानकारी के बिना उल्लेख अधूरा होगा, और वह फिलहाल मुझे उपलब्ध नहीं है। कोष्ठक में दी गई संख्या (. . . .) उपलब्ध हुई जानकारी के आधार पर जन्म वर्ष है।
उक्त जानकारी मुख्यतः डॉ. बलदाऊ प्रसाद निर्मलकर की पुस्तक ‘पांडव गाथा पंडवानी और महाभारत‘, डॉ पीसी लाल यादव की पुस्तक ‘पंडवानी परम्परा और प्रयोग, निरंजन महावर की पुस्तक ‘पंडवानी महाभारत की एक लोक नाट्य शैली‘, डॉ. रमाकान्त श्रीवास्तव की पुस्तक ‘छत्तीसगढ़ी कथा-गीत, सामाजिक-सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य‘, जमुना प्रसाद कसार संपादित ‘छत्तीसगढ़ी गीत लोक कंठ का कलकल निनाद', आदिवासी लोकला परिषद की पत्रिका ‘चौमासा‘, तथा मोनोग्राफ्स, श्री विमल पाठक, श्री परदेशीराम वर्मा, डॉ. सत्यभामा आडिल, श्री प्रकाशन, दुर्ग के महावीर अग्रवाल के प्रकाशन और उनसे हुई चर्चा, आदि के आधार पर तैयार की गई है।


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