Showing posts with label सतीश जायसवाल. Show all posts
Showing posts with label सतीश जायसवाल. Show all posts

Saturday, April 25, 2026

पलाश की तलाश - बेरास्ते एआइ

पलाश पर लिखना है। पहली चुनौती है कि न जाने कब से ‘पलाश‘ पर लिखा जाता रहा है, उस पर अब क्या ही लिखा जा सकता है, जो उस सबसे चाहे बेहतर न हो मगर कुछ अलग-सा तो हो। यों परंपरा भी रही है कि कुछ लिखने-करने के पहले मंगलाचरण हो, देव-पूर्वजों, पूर्वाचार्यों का स्मरण कर लेना चाहिए। यह शायद इसलिए कि आप जो कहने जा रहे हैं, पहले कहे जा चुके से कुछ अलग और आगे की बात कहें, ‘वही ढाक के तीन पात‘ न हो, और अनूठा कहने के चक्कर में बेढंगा न हो जाए, कुछ सार्थक भी हो। इसके लिए पहले जरूरी है कि कब-किसने क्या-क्या कहा है, पता कर लें, मुश्किल यहीं से शुरू होती है। इस पर याद आया कि यह भी तो कहा गया है कि मुश्किल जहां से पैदा हो, हल भी वहीं से निकलता है, तो ...

असमंजस है, मंगलाचरण क्या हो, कैसे करें? कालिदास के ‘कुमारसंभवम्‘ का आरंभ होता है- ‘अस्त्युत्तरस्यां दिशि ...‘ इसमें कहां है मंगलाचरण। संस्कृत पंडितों की बात निराली। सवाल किया जाता है कि क्या मंगलाचरण के बिना भी महाकाव्य आरंभ किया जा सकता है? क्या कालिदास से चूक हुई? पंडित हल भी सुझा देते हैं- यहां एकशब्दीय ‘अस्ति‘ ही मंगलाचरण है। अस्ति यानी ईश्वर, क्योंकि ईश्वर के बाहर सब कुछ नास्ति है। और बात पलाश की, तो इस महाकाव्य में उन्हें पलाश, बालचंद्र के समान वक्र और अतिलोहित लाल दिखता है। फिर हमारा मंगलाचरण? क्या परवाह, यह तो फुटकर लिखावट है, कोई उदार समीक्षक भूले-भटके इसे ही ‘ललित निबंध‘ ठहरा दे तो उसकी जै-जै। फिर भी आग्रह हो, कोई ढूंढने पर ही उतारू हो जाए तो पंडितों पर भरोसा कि पलाश भी एकशब्दीय मंगलाचरण साबित हो सकता है।

सोचा, पता करूं, वेदों में ‘पलाश‘ पर क्या कहा गया है? लेकिन क्या वेदों में पलाश शब्द आया होगा। वैदिक कवि इस शब्द से, इस पेड़ और फूल से परिचित थे? ऐसा तो नहीं कि वे इसे ‘किं-शुक‘ कहते रहे हों। ढाक या टेसू, जैसा देशज तो नहीं कहते रहे होंगे। ढाक, सुनते ही लगता है कि पलाश को इस नाम से जानने-पुकारने वाले ने या तो इसके पेड़ को देखा है या फल को और ‘वही ढाक के तीन पात‘ कहते उसका ध्यान गया है पत्तों पर। उसने फूल खिला पलाश देखा होता तो ‘टेसू‘ जैसा ही कुछ नाम देता। मगर फूल तो मौसमी है- ‘कूलन में केलिन में..‘ बसंत हमेशा तो नहीं बगरा रहता। ढाक और टेसू शब्द कहां से आते हैं, तलाश के लिए सूत्र पकड़ कर आगे बढ़ सकते हैं कि दोनों शब्दों में ‘ट‘ वर्ग है, लेकिन बस अटकना है। बहकना-भटकना, जहां-तहां मुंह मारना और बात-बेबात सिर घुसेड़ना समीचीन नहीं, अस्तु ...

पूर्ववर्तियों को याद करता चलूं, शायद कोई बात बने। पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, न कि ‘पद्मलाल-पन्नालाल‘, उन्होंने अपने इस तरह नाम पर भी निबंध लिखा है। हमने स्कूल के दिनों में उनका निबंध पढ़ा था- ‘क्या लिखूं?‘। मन ही मन मदद की गुहार, वह याद करता हूं। निबंध आरंभ होता है- ‘मुझे आज लिखना ही पड़ेगा ...‘ कहते हुए बताते हैं कि ‘दूर के ढोल सुहावने‘ और ‘समाज सुधार‘ पर निबंध लिखना है ... उनकी बात यहां से शुरू हो कर, आगे ‘क्या खूब‘ होते कहां से कहां पहुंच जाती है। अब सोचता हूं कि क्या उन्होंने इस निबंध में यह भी कहना चाहा है कि समाज-सुधार पर बात दूर के ढोल की तरह हैं, इसे अपनी ढपली अपना राग की तरह गाने-बजाने से काम नहीं बनता, इसके लिए कुछ सकारात्मक-सार्थक करना होता है। तो ऐसा न हो कि पलाश पर साहित्य रच, प्रकृति-प्रेम यहीं तक सिमट कर रह जाए।

कबीर कहते हैं- ‘मसि कागद छुयौ नहीं, कलम गह्यौ नहीं हाथ‘, अब कौन मसि-कागद-कलम छूता है, अब ‘कलम के सिपाही‘, कम से कम शाब्दिक रूप में तो अप्रासंगिक ही हो गए। टच-स्क्रीन मोबाइल और ‘स्पीच टू टेक्स्ट‘ के बाद यों की-बोर्ड भी, बीती बात हो रहा है। दूसरी तरफ कुछ सोचने-याद करने या किताबें पलटने के पहले एआइ-एलएलएम ललचा रहा है, ‘मैं हूं ना‘ की तरह हर मौके पर साथ देने को तैयार, मगर डिस्क्लेमर के साथ कि ‘एआई गलत जानकारी दे सकता है, इसलिए, इसके जवाबों की दोबारा जांच कर लें‘। अब कुछ लिखना हो तो यह भी ध्यान रखना होता है कि ऐसा क्या लिखे जो एआइ के लिए संभव न हो। चोर-मन, एआइ की याद दिलाता रहता है। इस पर सोचा कि उसे कमांड क्या दूंगा- शायद यह कि ‘मुझे पलाश पर लेख लिखना है, इसके समानार्थी शब्द बता दो, वे शब्द मुख्यतः कहां-कहां इस्तेमाल हुए हैं, यह भी बता दो और यह भी बता दो कि सर्च के लिए इसके अलावा ‘की-वर्ड‘ क्या होगा, यानि यह भी बता दो कि मैं क्या पूछूं‘। अनुमान कर रहा हूं कि ‘वाल्मीकि, व्यास, कालिदास, भारवि ...‘ आदि तो बता ही देगा। फिलहाल, अपनी यादों की उधेड़बुन के सहारे ...

कबीर-पलाश के साथ हजारी प्रसाद द्विवेदी के ललित निबंधों की युति स्वाभाविक है। रामचंद्र शुक्ल के तुलसी तो हजारी प्रसाद द्विवेदी के कबीर। द्विवेदीजी की ललित लेखनी, आम-अशोक से ले कर कुटज पर तक चली है, फिर क्या पलाश उनसे छूटा रह गया। छूटा तो नहीं, मगर वे पलाश के लिए कबीराना हो गए। उन्हें ‘शिरीष के फूल‘ के साथ पलाश और उससे जुड़ कर कबीर-वाणी याद आ जाती है- ‘दिन दस फूला फूलि के, खंखड़ भया पलास‘। फिर ‘बसन्त आ गया है‘ में मानो सांत्वना देते कहते हैं ‘पलाश ऐसा फूला है कि ईर्ष्या होती है।‘ धुंधली सी याद विद्यानिवास मिश्र के निबंध की, जिसमें विंध्य के दिनों के साथ ‘पलासनि ...‘ लिखा है, तब पढ़ते हुए लगा था कि हजारी प्रसाद द्विवेदी ने इसे इन्हीं के लिए छोड़ रखा था। फिर सोचता हूं कि ऐसी क्या बात है कि वसंत-वनशोभा वाले इस वृक्ष का दंड ब्रह्मचारी धारण करते हैं। अब इन सब से बचते-बचाते आगे बढ़ना है। ध्यान रखना है कि अप्रासंगिक-सा होने लगे तो ललित निबंध बता देने पर बात बन सकती है, बशर्ते कुछ लालित्य हो, ललित के नाम पर ‘गलित-पलित‘ न हो।

कभी बड़ौदा गया था, वहां जिन सज्जन से मेरी पहली मुलाकात हुई, उन्हें मैंने अपना नाम-परिचय बताया, ‘राहुल‘, वे गर्मजोश मुस्कान सहित हाथ मिलाते हुए बोले- ‘आई एम केतुल, वेलकम!‘, कुछ खिसियानी कुछ मुस्कानी, मैंने पूछा आप कवि हैं?, तुक अच्छा मिला लेते हैं, राहुल-केतुल। बातचीत होने लगी, पता लगा कि यह नाम गुजरात में आम है, मैंने यह नाम पहली बार सुना था। वे पंडित निकले, राहु-केतु पर बात होने लगी। उन्होंने पूछा, आप पुरातत्व, मूर्तिविज्ञान से जुड़े हैं, आप ‘पलाशपुष्पसंकाशं‘ से परिचित नहीं हैं? प्रसिद्ध नवग्रह स्तोत्र में केतु का रंग, पलाश पुष्प जैसी कांति वाला, लाल कहा गया है। मैंने अपनी नासमझी पर परदा डालने मौका निकाला कि मंदिरों के प्रवेश-द्वार में सिरदल के नवग्रह पट्ट पर राहु-केतु को तो देखा है, किंतु पाषाण-कृति होने के कारण मेरा ध्यान उनके अंग-लक्षण, आकार-बनावट तक सीमित रहा। फिर पलाश के लाल को लाल कहना भी कोई कहना हुआ! बानगी स्वरूप पेश, कुन्तक (वक्रोक्तिजीवित में) अपने प्रयत्न की उपादेयता प्रतिपादित करते हुए कहते हैं- ‘यथातत्त्वं विवेच्यन्ते भावास्त्रैलोक्यवर्तिनः। यदि तन्नाद्भुतं नाम दैवरक्ता हि किशुकाः।।‘ त्रिलोकी में स्थित पदार्थों का यदि यथातथ्य रूप में विवेचन किया जाता है तो उसमे अद्भुतता नहीं होगी क्योकि किंशुक तो स्वभावतः लाल हुआ ही करता है (अतः यदि कवि यह वर्णन करे कि किंशुक लाल होता है तो उसे हम अ‌द्भुत न होने के कारण साहित्य या काव्य नहीं कहेंगे)।

पलाश/पलास, टेसू या रक्तपुष्प, इस पेड़ और फूल दोनों के लिए कहा जाता है पर किंजुल, किंशुक, केसू सामान्यतः फूल को कहा जाता है, इसी तरह पेड़ के लिए नाम मिलता है- काष्ठद्रु, ढाक, छिवला, त्रिपर्ण, ब्रह्मद्रुम और यूप्य। रोचक कि पत्र-पत्ता यानी ‘पर्ण‘ शब्द भी पलाश का समानार्थी है। इसके वनस्पति वैज्ञानिक नाम ‘ब्यूटिआ मोनोस्पर्मा‘ नाम में मोनोस्पर्मा तो समझ में आता था कि इसकी फली एकल-बीजी है, लेकिन ब्यूटिआ को ब्यूटी, सुंदर ही मानता था। पता चला कि यह अंगरेज वनस्पति विज्ञानी, जॉन स्टुअर्ट, अर्ल द ब्यूट से आया है, एकबारगी मन उदास हुआ, कुछ अपनी नासमझी, गलतफहमी पर और उससे कुछ अधिक यह जान कर कि ब्यूटिआ, ब्यूटी नहीं ब्यूट है, फिर याद कर लिया कि नाम में क्या रखा है, नाम-रूप से गुण-भाव तो नहीं बदल जाते। और क्या नाम भी नहीं बदल जाते, बातचीत में एक साथी आपत्ति कर रहे हैं ‘ब्यूटिआ मोनोस्पर्मा‘ नहीं ‘ब्यूटिआ फ्रोंडोसा‘। बस यह ध्यान रहे कि पलाश ‘फारेस्ट फायर‘ नहीं है, ‘फ्लेम ऑफ द फारेस्ट‘ है, पंचतत्व, महाभूतों में से एक। कवि नरेन्द्र शर्मा फागुनी-बसंती हो, लिखते हैं- ‘लग गयी आग; बन में पलाश, नभ में पलाश, भू पर पलाश। लो, चली फाग; हो गयी हवा भी रंगभरी छू कर पलाश।‘ अज्ञेय का ‘टेसू‘ भी कहता है- ‘इस वनखंडी में आग लगा दूं।‘ 

कभी बांग्ला गीत सुना था, जिसमें सीधे कमलनयन या पद्मलोचन के बजाय कहा गया है- ‘दाओ दरशन पद्म-पलाश लोचन‘। पलाश-लोचन यानि?, सोच में पड़ गया हूं- आंखें, मृगनयनी, खंजन-नयन या जैसा किसी ताम्रपत्र उत्कीर्ण लेख में आता है- ‘चकोरनयनं लिखितं सुवाक्यैः‘, और आंखें सिर्फ नेत्र-गोलक ही तो नहीं हैं, नीली, फीरोजी, बिल्लौरी, कजरारी आंखों के साथ भौंह/पलक, बरौनी!, किसे जोड़ कर कहा गया होगा पलाश-लोचन!, भेद नहीं पाता तब ‘संवेदनात्मक ज्ञान‘ से ‘ज्ञानात्मक संवेदना‘ की ओर बढ़, भाव में उतर गुनगुना सकते हैं?- ‘हमको तो जान से प्यारी हैं पलाशी आंखें!‘ बुद्धि तो काव्य-रस में बाधक हो जाती है- किसी कवि ने पलाश को मानों गुलाब के टक्कर में खड़ा कर रहा हो, कहता है- ‘जब जब मेरे घर आना तुम, फूल पलाश के ले आना तुम‘। ओ कवि! ऐसा कह कर तो तुम रास्ता ही बंद कर दे रहे हो, पलाश तो ‘दिन दस फूला ...‘ है।

रामविलास शर्मा नाम से आगरा वाले आलोचक पर ही ध्यान जाता है, उन्होंने कविताएं भी लिखीं, ‘तार सप्तक‘ के कवि हैं, यद्यपि उन्होंने कहा था- ‘पता नहीं कविता पढ़ कर अपरिचित मित्र मेरे बारे में किस तरह की कल्पना करेंगे। मैं उन्हें एक बात का आश्वासन देना चाहता हूं,- जैसे वे मेरी कविताओं के बारे में ‘सीरियस‘ नहीं हैं, वैसे मैं भी नहीं हूं।‘ फिर इसी नाम के साथ कभी दो कविता, ‘छत्तीसगढ़ की शाम‘ मिली थीं, उसी के साथ एक कविता ‘टेसू फूले भी थी। अनुमान हुआ यह कोई अन्य रामविलास शर्मा, प्रकृति का चितेरा कवि है। उनकी खोज-खबर मिली कि शायद मालवा निवासी थे, स्टेट ट्रांसपोर्ट वाले। लाल बस, स्टेट ट्रांसपोर्ट के कुछ बुजुर्ग परिचित बताने लगे कि 1963 में सड़क परिवहन के राष्ट्रीयकरण से मध्यप्रदेश राज्य परिवहन निगम बना, जो पूर्ववर्ती ‘मध्यभारत रोडवेज‘ और ‘सीपी ट्रांसपोर्ट सर्विसेज‘ के एकीकरण का परिणाम था। ये रामविलास मध्यभारत रोडवेज होते मध्यप्रदेश राज्य परिवहन निगम में आए, डिपो मैनेजर रहे। वे छत्तीसगढ़ में रहे या आना-जाना रहा। पिछली सदी के सातवें-आठवें दशक के भोपाल के साहित्यिक-सांस्कृतिक माहौल के लिए विश्वसनीय स्रोत डॉ. सुशील त्रिवेदी हैं, उन्होंने याद किया कि ये रामविलास शरद जोशी के करीबी थे, भगवत रावत, सोमदत्त गर्ग और घनश्याम ‘मधुप‘ के साथ होते थे। उनका संग्रह ‘कविता में सुबह‘ 1978 में साहित्य परिषद भोपाल से छपा था, तब चर्चित था, अब शायद ही कोई याद करता है। नाम पर अटक-भटक कर फिर पलाश पर आएं, उनकी कविता ‘टेसू फूले‘ की पंक्ति है- ‘अंग अंग में टेसू फूले, आँखों में रंगीन सपन‘। मित्र महेश भोपाल के दिनों को याद करते रहते हैं। वे ‘प्राच्य निकेतन‘, बिरला मंदिर के सहपाठी, वहां तब पर्यटन की भी पढ़ाई होती थी। इसी क्रम में बात निकली मध्यप्रदेश पर्यटन के होटल ‘पलाश‘ की। मैंने पर्यटन मंडल के अधिकारी से पूछ लिया था, कि क्या ऐसे पर्यटक-सैलानी भी आते हैं, जो पूछते हों कि ‘पलाश‘ क्या होता है। वे मुस्कुराए, होटल आने का न्योता दिया और पहुंचने पर होटल के सामने, परिसर में लगा पलाश का पेड़ दिखाया। कहा, सिर्फ नाम का नहीं, यहां सचमुच पलाश है और अंदर फागुनी-बासंती माहौल भी।

1757 वाली प्लासी की लड़ाईं के साथ देश का इतिहास तो बदला ही, पश्चिम बंगाल के पलाश-बहुल स्थान के नाम ‘पलाशी/पलासी‘ को भी बदल कर प्लासी हो गया। अब शेखर बंद्योपाध्याय की किताब के अंग्रेजी मूल में शीर्षक Plassey है, मगर उसके हिंदी अनुवाद ‘पलासी से विभाजन तक‘ में वह वापस आया है। छत्तीसगढ़ में पचासों गांव होंगे, जिन्हें पलाश/परसा से नाम मिला है। सिर्फ ‘परसा‘ नामधारी गांव तो हैं ही, परसाही, परसहा, परसदा भी कई-कई हैं। इसके अलावा परसा के साथ पानी, मुड़ा, बुड़ा, पारा, टोला, पाली, गुड़ी, डीह, खोर, खोल, खोला, भांठा, कांपा जैसे प्रत्यय जुड़ कर गांवों के नाम बने हैं। इनमें एक नाम परसाभदार भी है। गांव न बस पाया हो, गांवों के साथ जुड़ा ‘परसाभदेर‘ भूखंड अब भी सुनने मिल जाता है।

छत्तीसगढ़ में भदार/भदेर, परसा के समूह वाले इलाके के लिए कहा जाता है, ज्यों आम की अमरइया, महुआ की मउहारी, बांस की बंसवार, कउहा का रवार या बोइर का खोर। मेरे गांव का दक्षिणी भाग, जो सीमेंट फैक्ट्री आ जाने के कारण सीसीआइ भांठा कहलाने लगा, परसाभदेर था। भरकहा-भांठा, जहां परसा बहुतायत में, कहीं-कहीं बनबोइर और मकोइया। आजादी के बाद तक यहां कृष्णसार मृग होते थे, और आसपास हुम्मा यानी ग्रेट इंडियन बस्टर्ड भी। तीतुर, भठतीतुर, लमहा और कभी-कभी बरहा अब भी दिख जाते हैं। औषधीय उपयोग और उसके लाभ से कोई भी वनस्पति अछूती नहीं, फिर पलाश की क्या बात। औषधि रूप में प्रयोग और उससे लाभ-हानि का जिम्मा लेने से बचते, इसे गूगल के मत्थे छोड़ आगे बढ़ें। एक तरफ यज्ञ के लिए हवन-श्रुवा तो गंवई जीवन में दोना-पत्तल बनाने के लिए परसा के पत्ते और चूना-पोताई के लिए परसा-जरी की कूंची काम आती रही। पलाश की जड़ से निकाली रस्सी- ‘बांख‘, हल-नांगर का नहना-जोता के अलावा सुहाई, सींका के भी काम आती थी। और होली के लिए टेसू-फूलों से रंग बनाने का उद्यम, मेरे हमउम्र बचपन में अधिकतर ने किया है।

आधी सदी पुराने दिन। जांजगीर निवासी ख्यातनाम अधिवक्ता विजय कुमार दुबे जी ने हमें स्कूल में विज्ञान पढ़ाया, उनका स्नेह यथावत है। फोन पर प्रणाम कर लेता हूं। सुयोग बना है उनसे आशीर्वाद लेने का। उनका ललित निबंध संग्रह ‘पलाश‘ (सन 1993) है। पर्यावरण से प्रेरित इस संग्रह में विद्यानिवास मिश्र, प्रधान सम्पादकः नवभारत टाइम्स का संदेश प्रकाशित है, जिसमें वे लिखते हैं कि ‘... हर निबंध को सहज प्रकृति के सौंदर्य और उस सौंदर्य के मनुष्य मन पर पड़ते प्रभाव इसमें ऐसा अंकित है कि प्रकृति मनुष्य से अलग दिखाई नहीं पड़ती।‘ संग्रह में ‘टप टप टपके महुआ, मेरी धरती कहां गई, यह धरती कितना देती है, बह रहे जहां उन्चास पवन, माटी कहे कुम्हार से‘ जैसे पर्यावरण पर आधारित निबंध हैं। रचनाकार ने इन निबंधों के लिए कहा है कि ‘... पलाश के इन अनिंद्य पुष्पों को लोक-मानस की पूजा में समर्पित ...‘ मानों प्रकृति और पर्यावरण पर आधारित सारे निबंधों के लिए एक शब्द में पर्याय ‘पलाश‘ ही हो सकता है।

‘धर्मयुग‘ 19 मार्च 1978 के अंक में कैलाश गौतम की कविता ‘फागुनी दोहे‘ छपी, हमलोगों ने पढ़ी और रट ली। इसके दसेक साल बाद वे मल्हार आए, अपने मित्र रामप्रताप सिंह ‘विमल‘ जी के बुलावे पर, तब यह उनसे प्रत्यक्ष सुनी, इन दोहों में आम के बौर, कचनार, गुलमोहर, महुआ तो है, पलाश नहीं। मगर उनकी एक अन्य कविता में पलाशी फगुनाहट इस तरह है- ‘भीतर से खिड़कियाँ खुलेंगी, बौर आम के महकेंगे/ आंच पलाशों पर आयेगी, सुलगेंगे कुछ दहकेंगे/ घर का महुआ रंग लाएगा, चूना जैसे पान में। ‘कैलाश गौतम के ‘फागुनी दोहे‘ का पहला दोहा है- ‘लगे फूंकने आम के बौर गुलाबी शंख, कैसे रहें किताब में हम मयूर के पंख‘। ऐसी ही बात कही जाती है- ‘अबकी बिछड़े तो मुमकिन है ख्वाबों में मिलें, जैसे सूखे हुए कुछ फूल किताबों में मिले‘ इसी तर्ज पर अपनी पत्र-डायरी में पुराने मगर अब भी ताजा कुछ पलाश-स्मृतियां जतनी हुई हैं- 

दिनांक 23-2-1988 - ताला में धीरे-धीरे पलाश फूलने लगे हैं, दोपहर की चुभती धूप में नदी की ओर पहुंच जाने पर खिलते जा रहे पलाश और नदी में बनती उनकी परछाईं देखकर धूप की तेजी महसूस नहीं होती और पूरे वातावरण में भोर की खिलती धूप जैसी लालिमा बिखरती दिखाई देती है - होली की शुभकामनाएं।

दिनांक 3-3-1988 - ताला का नजारा अब कुछ तेजी से बदलने लगा है। पलाश खिलने में भी तेजी आ गई है, चारों ओर खुशी की लाली छाने लगी है। रास्ते में सेमल के सूखे बेजान से पेड़ों पर बड़े-बड़े लाल फूल लगे हैं और कुछ नीचे भी टपकने लगे हैं, जो हमसे जल्दी संवेदना ग्रहण कर बता रहे हैं कि वातावरण में गरमी घुलने लगी है। आम के बौर का तो हाल ही मत पूछो। महुआ के भी फूल आ गए हैं और हवा में इनकी गंध भी घुल गई है।

दिनांक 17-3-1988 - लगभग दस दिन पहले बिलासपुर से अम्बिकापुर के रास्ते में और अम्बिकापुर से यहाँ (डीपाडीह) आते हुए रास्ते में सेमल के पेड़ों को देख रहा था। लकादक फूलों से भरे पेड़। 7-8 फुट से 40-50 फुट तक के पेड़। सभी पर मस्ती का वही आलम। सेमल का पेड़ ध्यान से देखा है? बिना पत्तों के कांटेदार तो कभी उबड़-खाबड़ तनों वाले लम्बे-ऊंचे पेड़। एकदम सूने-सूने से, पर मनहूस नहीं और इनके फूलों को देखकर लगता था कि यह ला‌ली पूरे पेड़ की, साल भर की शुष्कता को अचानक प्रकट करने लगी हो, लगने लगता कि सेमल सिर्फ पेड़ ही नहीं पूरा का पूरा जिन्दा चरित्र है। अपने इस कमरे से साइट तक जाते हुए भी रास्ते में सेमल का एक ऊँचा पेड़ है, पर अब उसके सब फूल झड़ गये हैं, सेमल ने जैसे फिर से मानो मौन धारण कर लिया हो। यह मंभीरता उसके फलों के कारण भी हो सकती है, फल या सृजन के संग गंभीरता तो आती ही है। (दहकते दोपहर का फ्लेम आफ द फारेस्ट- ‘किं शुक?’ शुक जैसा। मगर इस मौसम में सेमल पर भी शबाब है और उसके फूल झड़ने के बाद हरे तोते की तरह फल लटकने लगते हैं, जो गरमी बढ़ने पर बिखर, फाहे बन उड़न-छू हो लेंगे।)

दिनांक 30-3-1988 - कल (बिलासपुर से डीपाडीह) रास्ते में आते हुए खूब पलाश के फूल दिखे। अभी बेतहाशा खिले हैं और नीचे झड़ने भी लगे हैं। जादुई चांदनी रात, जंगल के बीच में इनकी लाली देख कर लगता है कि जैसे पूरे जंगल पर सुहाग बगर गया हो - वनश्री सुहागन हो गई हो ... नटखट बसंत ने मांग भरते सिंदूर बिखरा दिया हो ... मंगलमय सुंदरता का झीना आवरण।

हाजिर नाजिर, ‘अकलम-खुद‘ यह लेखन, स्मृति-जन्य विभिन्न संदर्भों युक्त मौलिक, एआई मुक्त है। यह अवश्य संभव है कि इस लेख के ऑनलाइन होने के बाद यह एलएलएम-कंटेट बन कर, एआइ को समृद्ध करे। तो जैसी परंपरा मंगलाचरण की है, वैसी ही समापन पर कामना- ‘बेबी बूमर्स‘ पीढ़ी के इस अकलतरावासी, इन दिनों ‘प्रमुख, धरोहर परियोजना, बायोडायवर्सिटी एक्सप्लोरेशन एंड रिसर्च सेंटर‘ की ओर से- ‘जा एआइ, पलाश तेरी वंश-वृद्धि में सहायक हो, बाल-बच्चे सुखी रहें, तूने जेन-जी की सोच बदली, वे तेरी हैसियत बदल कर अल्फा-बीटा पैदा कर रहे हैं, गामा, डेल्टा, पाई होते ओमेगा से भी आगे निकल जाएं, एल्फाबेट, अलिफ-बे और अपना ककहरा भी जानें। पलाश की आवाजाही बरास्ते मन, साहित्य में, रन-बन में भी बनी रहे। स्क्रीन से बाहर मौसम न हो तो भी चित्त में पलाश की लहक-बहक रहे।
-राहुल कुमार सिंह

पुनश्च- 

आदरणीय सतीश जायसवाल जी का संदेश तथा प्रत्यक्ष में हुई चर्चा के तारतम्य में यह लेख लिखा गया है। सतीश जी का संदेश इस प्रकार था- 

पलाश : दृश्य में, संवेदनाओं में! एक गद्य संचयन की योजना ... 

पलाश अदम्य जिजीविषा का ग्रीष्मकालीन फूल है। धूप जितनी प्रखर होती है पलाश उतना ही दमकता है। सूर्य को चुनौती देता है। यह जितना जंगली है उतना ही घरेलू भी है। घर के आंगन तक चला आता है। पलाश पेंटिंग्स में मिलता है, फोटोग्राफी में मिलता है। इसके पौराणिक संदर्भ हैं। तो इससे जुड़ी कथा, किंवदंतियां भी जनजातीय समाज में व्याप्त हैं। औषधीय गुणों के साथ साथ लोक व्यवहार में भी पलाश के उपयोग बताए जाते हैं। 

पलाश को कविता में अच्छा विस्तार मिला है लेकिन गद्य में इसकी जरूरत है। एक सुगठित कथेतर में इस जरूरत के अनुकूल होगा। इसे ध्यान में रखकर एक संचयन की योजना आपके सामने रख रहा हूं। आपसे एक आलेख का आग्रह है। सामान्य तौर पर अढ़ाई, तीन हजार शब्दों को एक आलेख के लिए आदर्श माना जाता है। लेकिन "पलाश" की अपनी जरूरत और आपके मन का फैलाव शायद इस सीमा के बाहर भी जा सकता है। अलबत्ता हमारे पास समय की थोड़ी बंदिश होगी। ... 

इस पर मेरी अपनी मौज- हजारी प्रसाद द्विवेदी कहते हैं- जो कोई भी लिखता-पढ़ता है वह कर्मणा ब्राह्मण है। यहां सतीश जी ने लिखने को कहा है, लिख कर कर्मणा ब्राह्मण बनने का अवसर दिया है। आगे वे यह भी कह देते हैं कि दूसरे के इशारे पर कलम घसीटते हैं वे ‘शूद्र‘-ब्राह्मण हैं और खुद को इसी श्रेणी में रखते हैं। सतीश जी के इशारे पर लिखना और पंडित जी का फैसला, एक तरफ ब्राह्मण बनने का मौका दूसरी तरफ शूद्र ही सही, पंडितजी की जमात में शामिल, कौन शिरोधार्य न कर लेगा।

Saturday, December 10, 2022

पीथमपुर - सतीश जायसवाल

लीलागर-महानदी-हसदेव तट के मेलों में पीथमपुर की खास पहचान है। होली-धूल पंचमी पर भरने वाला यह मेला मौसम और भूगोल की संधि पर होता है। यह मेला छोटी-मोटी फौजदारी से ले कर कभी हत्या तक की घटनाओं के लिए बदनाम रहा हैं। यह भी देखा गया है कि इस दौरान आंधी-तूफान से एक बार मेला उजड़ कर फिर जमता है। यहां कलेश्वरनाथ मंदिर के पुजारी साहू जाति के हैं। इस अंचल में कनकी के जांता महादेव मंदिर के पुजारी यादव होते हैं और राजिम के राजीव लोचन मंदिर के पुजारी क्षत्रिय हैं।

पीथमपुर पर अश्विनी केशरवानी जी ने कलम चलाई है और यहां सतीश जायसवाल जी की लेखनी का प्रवाह है। सतीश जी कविता-कहानी वाले साहित्य में रमे रहते हैं, लंबे समय तक पत्रकारिता भी की है, अवसर अनुकूल अपनी भूमिका निर्धारित कर लेते हैं। कथा और कथेतर के भेद को जोड़ते-मिटाते अपनी धारणा को साहित्यिक रंग देते, खतरनाक प्रयोग करना उन्हें आनंदित करता है, जो उनके पात्रों के लिए हमेशा सहज नहीं होता। ऐसे ही कुछ विवादित प्रयोग मुक्तिबोध का ‘विपात्र‘ और हबीब तनवीर का नाटक ‘हिरमा की अमर कहानी‘ है। इस शैली में उनके कुछ संतुलित प्रयोग भी हैं, जैसे ‘मछलियों की नींद का समय‘। कहानी के नायक डॉ. शंकर शेष हैं और एक पात्र सतीश (कहानी के लेखक स्वयं) भी।

मेरी दृष्टि में उनका महत्वपूर्ण काम यात्रा-संस्मरण और छत्तीसगढ़ की संस्कृति, कला, इतिहास और परंपरा के विशिष्ट आयाम को बेहद सजग और संवेदनशील देखना-समझना और संजीदगी से अभिव्यक्त-दर्ज करना है। भाट चितेरे, नरसिंहनाथ, बालपुर, जयरामनगर और जनजाति, बस्तर, महानदी जैसे विषयों से जुड़े उनके लेख छत्तीसगढ़ की अस्मिता और गौरव के ऐसे दस्तावेज हैं, जो अन्यथा दुर्लभ हैं। बातचीत के दौरान हां-हूं करते वे अपनी इस खासियत के प्रति रूखे की हद तक उदासीन रहते हैं। आभार कि ऐसी टिप्पणी की छूट, इतना अधिकार उन्होंने मुझे दे रखा है या कहें मैंने ले रखा है।

नवभारत, बिलासपुर में 14-3-93, पृष्ठ -7 पर प्रकाशित रपट, यहां प्रस्तुत-

पीथमपुर मेला: भीड़ कम और धार्मिकता ज्यादा 
मान्यता: रोगियों की पीड़ा का हरण
कलेश्वरनाथ की कृपा

(पीथमपुर से सतीश जायसवाल की रपट)


बिलासपुर. महानदी के तट पर भरने वाले शिवरीनारायण के मेले में घटित घटना का जो असर हसदो तट पर भरने वाले पीथमपुर मेले में पड़ना आशंकित था, वैसा ही हुआ। धूलि- पंचमी के दिन, शिव-बारात के उठने के समय, पिछले वर्ष के मुकाबले इस वर्ष शिव बारात के प्रमुख बाराती नागा-साधुओं की संख्या अधिक थी, लेकिन इस बारात को देखने के लिये दूर-दूर से आने वाले दर्शनार्थियों की संख्या कम थी और शिव-बारात की व्यवस्था के लिये नियुक्त किये जाने वाले नियमित पुलिस बल के मुकाबले विशेष सशस्त्र बल के सिपाहियों की संख्या अधिक थी, जो किसी भी आशंकित स्थिति के लिये पूरी तरह तैयार थे, लेकिन सौभाग्य से कोई भी अप्रिय स्थिति निर्मित नहीं हुई।

पीथमपुर के पुराने मेले की याद रखने वालों का कहना है कि जिस समय शिव जी का बारात लेकर नागा साधू चलते है, उस समय एक लाख लोगों तक की भीड़ जुड़ जाया करती थी, लेकिन इस वर्ष यह भीड़ २५ से ३० हजार के बीच सिमट कर रह गई। लोगों ने बताया कि शाम होने के साथ-साथ भीड़ यहां जिस हिसाब से बढ़ती है, उस हिसाब से दिया-बत्ती के बाद भी वह भीड़ ४० हजार लोगों को पार नहीं कर पायेगी। बताया गया कि शिवजी की बारात के साथ चलने वाले नागा साधुओं की संख्या पिछले वर्ष १४-१५ से अधिक नहीं थी, लेकिन इस वर्ष ३५-३६ से अधिक साधू शिवजी की बारात के साथ नजर आये। इस वर्ष ये साधू दक्षिण में केरल से लेकर, जूनागढ़ (गुजरात) गोरखपुर तथा वाराणसी (उ.प्र.) अमरकंटक (म.प्र.) और हिमाचल प्रदेश आदि के अखाड़ों से आये। एक शताब्दि से भी अधिक पुराना होने जा रहा यह पारम्परिक मेला, भीड़ के अतिरिक्त भी अपने बिखराव की तरफ दिखाई दे रहा है। शिवजी की बारात के आगे-आगे चलने वाले पटे बाज, तलवार के हुनर दिखाने वाले, रंगे-चंगे नंदी, झांकी के साथ चलने वाले हनुमान, शिव-पार्वती आदि अब नहीं दिखते, लेकिन कुछ नई धार्मिक परम्पराएं स्थापित होती भी दिखाई दीं। चांपा के करीब तपसी बाबा आश्रम से लगभग दो-अढ़ाई सौ कांवड़ियों ने यहां शिवजी को जल अर्पित किया। नई मनोकामना लेकर अथवा पुरानी मनौतियां पूर्ण होने पर, जमीन पर लेटते हुये पीथमपुर पहुंच कर भगवान कलेश्वर नाथ (शिवजी) को नारियल चढ़ाने वाले आस्थावादी भी बढ़ रहे हैं। चांपा से पीथमपुर तक, लगभग ८ किलोमीटर की दूरी, जमीन पर लेटकर नापती हुई पहुंची एक महिला श्याम बाई ने बताया कि उसके पांच वर्षीय नाती को गंभीर खूनी पेचिश थी और उसकी जान बचाने के लिये बिलासपुर के सरकारी अस्पताल में २ बोतल खून मांगा गया। दो बोतल खून के लिये श्याम बाई के पास न तो पैसे थे, न परिचय, लेकिन पता नहीं कहां से एक अपरिचित युवक आया, जिसे श्याम बाई नहीं जानती कि वह मनुष्य था या देवता, दो बोतल खून दे गया। उसके नाती की जान बच गई। श्याम बाई ने तभी मनौती मांगी थी कि जमीन पर लेटते हुये पीथमपुर आयेगी तथा भगवान कलेश्वर नाथ को नारियल चढ़ायेगी।

पुरानी मान्यता है कि भगवान कलेश्वर नाथ की कृपा से पेटदर्द के रोगियों की पीड़ा का हरण होता है इसलिये पेट दर्द से छुटकारा पाने की आस लिये आने वाले दर्शनार्थियों की संख्या बढ़ रही है। इन आस्था वादियों में चांपा के एक पत्रकार भी भगवान कलेश्वरनाथ के दर्शन के लिये पहुंचे। पीथमपुर का धार्मिक महत्व अब होली या धूलि पंचमी के दो दिनों में केन्द्रित न होकर, शिवरात्रि से शुरू होने लगा है। लोगों बताया कि पिछले वर्षों के मुकाबले इस वर्ष पीथमपुर में महाशिवरात्रि पर सर्वाधिक चढ़ाये गये। दरअसल, पीथमपुर का कुल महत्व उसके धार्मिक तथा व्यावसायिक पक्षों में बंटा हुआ है। भगवान कलेश्वर नाथ की अर्चना-पूजा महाशिवरात्रि पर्व से प्रारंभ हो जाती है और वस्तुतः पीथमपुर मेले की धार्मिक शुरूआत महाशिवरात्रि पर्व से ही प्रारंभ होती है, जबकि पारम्परिक मेले की व्यावसायिक शुरूआत होली के दिन से होती है, जब दूर-दूर से यहां पहुंची दुकानों में लेन-देन प्रारंभ होता है।

इस वर्ष मेले की जगह भी बदली गई है। एक सीध वाली लम्बाई में भरने वाला मेला अब चौड़ाई में फैला है और दुकानों की कतारें नदी तट की ओर उतरी है। जिन दुकानदारों ने पहले की तरह, लम्बी सीध से अपना शामियाना लगाया, उनकी दुकानदारी कमजोर रही। पहुंच की दृष्टि से पीथमपुर, जांजगीर, चांपा तथा सारागांव से लगभग बराबर-बराबर दूरी पर है। लगभग ८ किलोमीटर, लेकिन चांपा और सारागांव की तरफ से यहां आने वालों का रास्ता नदी की तरफ से है इसलिये इस वर्ष नदी तट की तरफ वाले दुकानदारों को अधिक ग्राहकों का लाभ मिला।

स्थानीय लोगों ने शिकायत की कि मध्यप्रदेश राज्य परिवहन निगम पीथमपुर मेला को फायदे का सौदा नहीं मानता। एक दिन में, न्यूनतम १० हजार से लेकर अधिकतम १ लाख तक यहां पहुंचने वाले दर्शनार्थियों के लिये या तो तांगों का सहारा है अथवा निजी टैक्सियां। गांवों के लोग गाड़ा-गाड़ी से आ जाते है और बकाया के लिये यहां पैदल ही जाना है ... पुलिस सुरक्षा व्यवस्था के साथ साथ दीगर प्रशासनिक व्यवस्था भी इस वर्ष पहले के मुकाबले बेहतर है। एक प्रशासनिक आदेश के जरिये, मेला-अवधि के दौरान, मध्य भारत पेपर मिल को हसदो नदी में जल प्रवाहि करने पर पाबंदी लगा दी गई। हसदो नदी उस तट पर स्थित, मिल द्वारा रसायनिक द्रव युक्त प्रदूषित पानी के नदी में प्रवाहित किये जाने से यहां जल प्रदूषण की शिकायतें आसपास के गावों से की जाने लगी है। अपने सार्वजनिक कल्याण कार्यक्रम के तहत पेपर मिल ने अपनी ओर से मेले में पेयजल के लिये ‘प्याऊ‘ लगाया है। विभिन्न शालेय तथा विश्वविद्यालयीन परीक्षाओं को ध्यान में रखकर लाउडस्पीकरों के उपयोग पर लगे प्रतिबंध का असर मेले में देखने मिला। लाउडस्पीकर पर बजने वाले फिल्मी गीतों के अभाव में मेला सूना- सूना लगा।

एक जनश्रुति के अनुसार, यहां के स्वयंभू शिव की मूल प्रतिमा जिस तेली हीरा साय के घर घूरे के नीचे से मिली थी, उस परिवार के लोगों को शिव बारात प्रस्थान से पूर्व पूजा का प्रथम अधिकार प्राप्त है तथा उस परिवार के पुरुष सदस्य शिवजी की पालकी उठाकर चलना अपना गौरव मानते हैं। इस परिवार की महिलाएं आज भी यही मानती और बतलाती है कि शिवजी का मूल स्थान उनका घर है, इसलिये उनके घर को शिव गद्दी होने का महत्व है। पत्रकारों के एक दल ने पीथमपुर और आसपास, से मेले में आयी हुई तेली युवतियों की भूरी-हरी आंखों चमत्कारिक सौदर्य को देखा और तथ्यों की पुष्टि की। इस पत्रकार दल ने राष्ट्रीय सेवा योजना की चांपा इकाई के समक्ष प्रस्ताव रखा है कि इस नृतत्व शास्त्रीय विशिष्टता का प्रारंभिक अध्ययन करें। अनुमान किया जा रहा है कि आगामी वर्षों में, यह विशिष्टता, पीथमपुर के मेले में आने वाले दर्शनार्थियों के लिये आकर्षण का मुख्य केन्द्र होगी। 
---

Sunday, September 22, 2019

सतीश जायसवाल: अधूरी कहानी

वह पहला ‘रविवार‘ था, किसी वर्ष-माह का नहीं, आनंद बाजार पत्रिका समूह के हिन्दी साप्ताहिक का अंक। ‘सतीश जायसवाल‘ नाम बिलासपुर के लिए घर का जोगी... था। चालीस-एक साल पुरानी बात। ‘दिनमान‘ ने जमीन बना दी थी कि यहां हिन्दी पाठकों के बीच भी समाचार पत्रिका के लिए गुंजाइश है और अब बात यहां तक आ पहुंची थी कि साहित्यिक-सांस्कृतिक पत्रिकाओं के दिन लद रहे हैं। इस दौर के लिए मील का पत्थर बनी ‘रविवार‘।

इस प्रवेशांक में अधूरी आजादी जैसा एक लेख आया, लेखक का नाम था- सतीश जायसवाल। इसमें बात बिल्हा से संबंधित थी, इसलिए संदेह नहीं हुआ कि ये अपने ‘आन गांव के सिद्ध’ सतीश जायसवाल हैं। बाद में इसी पत्रिका में उनका एक लेख शीर्षक ‘काम की बात‘ जैसा कुछ था, छपा। इस दौरान मैं एक स्मारिका के संपादन से जुड़ा था। संयोग बना कि उनका लेख और स्मारिका का अंश, साथ-साथ कुछेक की राजनीतिक रोटी सेंकने का माध्यम बना। इस क्रम में रविवार के बप्पादित्य राय और संपादक एसपी यानि सुरेन्द्र प्रताप सिंह बिलासपुर आया करते और हम सबका दिन इकट्ठे, बिलासपुर न्यायालय में कोर्ट के सामने ढाई फुट उंची डेढ़ ईंट की दीवार पर बैठे हुए बीतता।

बिल्हा की कहानी छपी तो संदर्भ बना कि इस क्षेत्र के विधायक चित्रकांत जायसवाल उनके चाचा हैं। बिलासपुर के प्रमुख राजनीतिज्ञों मथुरा प्रसाद दुबे, श्रीधर मिश्रा, राजेन्द्र प्रसाद शुक्ला, रोहिणी प्रसाद बाजपेयी के बीच वे अकेले ‘जायसवाल‘ थे, चित्रकार तो थे ही, जोड़ा हंस वाला हिन्द प्रकाशन, जहां से बलदेव प्रसाद मिश्र की प्रसिद्ध पुस्तक ‘छत्तीसगढ़ परिचय‘ छपी थी, वही उनका निवास था, शिक्षा मंत्री रहते हुए छात्रों के हड़ताल पर उनका गांधीवादी प्रतिरोध उनकी पहचान बन गया था। इन नेताओं का जन-सरोकार तो था ही, संगीत, साहित्य, विधि, विज्ञान, पुरातत्व, इतिहास की समझ भी कम न थी, उन्हें इस माहौल का लाभ मिला। उनके बौद्धिक व्यक्तित्व में अब भी देखा जा सकता है कि वे, विधा कोई भी हो, उसके व्याकरण पर कम ध्यान देते हैं, गोया, संवेदनात्मक ज्ञान और कई बार व्याकरण वे स्वयं विकसित कर लेते हैं। उनके लेखन में यही, संस्कृति-परम्परा के साथ उनकी मौलिकता का सहज समन्वय, अनूठा रस पैदा करता है। उन पर शोध होगा तो निष्कर्ष अध्याय का आशय इसके करीब ही होगा।

चित्रकांत जी से रिश्ते के सिलसिले में उनकी एक पुरस्कृत कहानी याद आती है, जो साप्ताहिक हिन्दुस्तान में प्रकाशित हुई थी। कहानी के पात्रों को जानने वालों में से जिसने भी यह कहानी पढ़ी, उनके गले मुश्किल से उतरी। बिलासपुर के कुछ अन्य राजनैतिक व्यक्तियों और प्रतिष्ठित परिवारों के नाजुक-अंतरंग प्रसंगों में भी उन्हें कहानी दिखी और इस तरह की कहानियों लिखने-छपने के कारण वे खासे चर्चित होते रहे, जिसकी उन्होंने खुद शायद ही कभी परवाह की। इसी तरह संस्मरण-लेख के नारी पात्रों के रागात्मक विवरण उनके और अनजान पाठकों के लिए काव्यात्मक साहित्य, तो उन पात्रों के लिए असमंजस का कारण बनते रहे। वास्तविक व्यक्ति को पात्र बनाकर, उनके साथ अपने संस्मरण को कहानी बना देने का सफल प्रयोग उन्होंने ‘मछलियों के नींद का समय‘ में किया है, जिसमें डॉ. शंकर शेष, एक पात्र हैं और कहानी उनकी पत्नी के वाक्य से समाप्त होती है कि ‘‘यह मछलियों की नींद का समय है और लोग शिकार पर निकले हैं।‘‘

छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद वे बख्शी सृजन पीठ के पहले अध्यक्ष नियुक्त हुए। मध्यप्रदेश में संस्कृति विभाग की लगभग सभी गतिविधियां विभिन्न परिषद, अकादमी, केन्द्र और पीठ के माध्यम से संचालित होती थीं, जिनका मुख्यालय भोपाल था। बख्शी सृजन पीठ, संभवतः भिलाई इस्पात संयंत्र के सहयोग और प्रथम अध्यक्ष डॉ. प्रमोद वर्मा की सुविधा अनुरूप भिलाई में था और बंटवारे में बस एक यही छत्तीसगढ़ के हिस्से आया। डॉ. प्रमोद वर्मा के बाद लंबे समय से खाली पड़े पीठ में उन्होंने नई जान फूंकी, नियमित गतिविधियां आरंभ हुई और संस्कृति विषयक कई क्षेत्रों यथा क्षेत्रीय सांस्कृतिक केन्द्र की दोहरी सदस्यता के लिए भी उन्होने पहल की।

कवि, कहानीकार वे हैं ही, यात्रा-संस्मरणों में उनकी दृष्टि, संवेदना और शैली का जवाब नहीं। उनके रिपोर्ताज संस्कृति के पक्षों को रेखांकित करने वाले हैं वहीं पत्रकारिता को भी उन्होंने आजमाया है। नरसिंहनाथ, बस्तर, चितेरे, रामनामी जैसे विषयों पर उनका लेखन, दस्तावेज की तरह है। लेकिन उनकी कलम में मुझे तलवार कभी नहीं दिखा, खासकर संस्मरणों और कहानियों में भी, वह छुरी-कटारी की तरह, बल्कि अक्सर नश्तर की तरह चलती है, नासूर पर चीरा लगाती है और परदानशीनी को तार-तार भी करती है। कील, कांटे और कमंद उनके उपकरण हैं, जिनका इस्तेमाल वे बड़ी चतुराई से और कई बार निर्ममतापूर्वक करते हैं।

उनके साथ का एक यादगार अभियान कोई बीस बरस पहले ‘सतगढ़ा राज‘ का था। आकाशवाणी वाले संजय रंजन भी साथ थे। छत्तीसगढ़ के इतिहास का हजार साल मानों हमलोगों के सामने खुल गया। सतगढ़ा राज की बैठक तुमान में हो रही थी, जो छत्तीसगढ़ में कलचुरियों की पहली राजधानी थी और यह वस्तुतः सात पुराने जमींदार प्रमुखों का अधिवेशन था, यही सात, कभी छत्तीस-अड़तालिस गढ़ों में भी शामिल थे और रतनपुर के कलचुरि शासकों का खालसा क्षेत्र पश्चिम, उत्तर और पूर्व में इनसे घिरा था। पूरे दिन की लंबी बातचीत और साक्षात्कार का सिलसिला हम सबके लिए अपनी समझ साफ करने का अवसर बना। इस दौरान उनकी योजना और कार्यशैली मेरे लिए सबक थी। उनके आयोजन-प्रभुत्व का एक प्रसंग ताला में किरातार्जुनीय नाटक का प्रदर्शन, जिसके किस्से मैंने सुने और एक अन्य, तत्कालीन बिलासपुर आयुक्त मदन मोहन उपाध्याय जी की अगुवाई और आपके संयोजकत्व में बिलासपुर में कहानी-99 का आयोजन था, जिसमें कमलेश्वर जी की विशेष उपस्थिति थी और मुझे उनसे लंबी बातचीत का अवसर मिला था।

खाने और पहनने में सलीका और तमीज, जिसके मानक कई बार उनके खुद के तय किए होते हैं, शास्त्रीय शैली में अनूठे मानक और व्याकरण निर्धारित करते हुए उनकी रचनात्मक प्रतिभा और सक्रिय-गति देखते ही बनती है। अपने तय तौर-तरीकों के प्रति वे बेहद आग्रही होते हैं। खाने-पहनने को ग्रहण-धारण करने, बरतने के अलावा इन विषयों के बतरस का भी आनंद लेते हैं, इसलिए, इस अवसर पर जाहिर कर रहा हूं कि पीठ पीछे मैं उन्हें सुरुचि भोजनालय, सुरुचि वस्त्रालय कहा करता हूं। मजेदार कि उन्हें जितना और जैसा ताल्लुक अपने रोटी-कपड़े के लिए है, मकान के लिए कतई नहीं। अब तक मेरी जानकारी में उनके ठिकाने किराये के मकान ही रहे हैं, उनके ये डेरे बेशक साफ, सुघड़ होते हैं।

वे जितने यात्रा-लोलुप हैं, उतना ही रेल स्टेशनों (और रेल अधिकारियों) को भी पसंद करते हैं, उनमें यह विशिष्ट रस-बोध है। छोटे-छोटे सूने से स्टेशन, रसमड़ा हो, पाराघाट से बदलकर जयरामनगर, उस्लापुर, खोड़री-खोंगसरा-भनवारटंक या फिर सिन्नी, इन सबके साथ आप उनका रोमांस पढ़-सुन सकते हैं और रोमांच महसूस कर सकते हैं। बिलासपुर स्टेशन का अंगरेजी तहजीब की याद दिला सकने वाला रेस्टोरेंट या एएचव्हीलर तो उनके ठिकाने रहे ही। दरअसल वे यात्रा के साथ पड़ाव, सांसारिकता और विरक्ति, वार्ता के दौरान मौन जैसे द्वैत को साध सकने में माहिर हैं। हर बार अगली मुलाकातों के लिए योजना बनाते, उनकी ‘आपस-दारियां‘ कब दूरियां बन जाए, वे भी नहीं जानते।

उन्हें ज्यादातर लोग, मेरी तरह ‘आगे नाथ न पीछे पगहा‘ जानते हैं, उनसे अपने परिवार, रिश्तेदार, विवाह-जन्म-मृत्यु की बातें शायद ही किसी ने सुनी हों, लेकिन कुछ, खासकर एक प्रसंग को बस ‘छू‘ रहा हूं कि वे विवाह कर रायपुर से लौटने वाले थे तब टिकरापारा के अभ्यंकर बाड़ा में मैं नवविवाहित दम्पति के स्वागत की प्रतीक्षा कर रहा था और बाद में श्रीमती जायसवाल के हाथों की चाय भी पी है। यहां चर्चा सिर्फ इसलिए कि वे अपने रागात्मक संबंधों को साहित्यिंक परदे और अतिशयोक्ति के साथ उजागर करने को जितने बेताब रहते हैं, अपने विवाह की चर्चा के प्रति उतने ही संकोची।

वे मदद-सहयोग तो ले सकते हैं, लेकिन स्वाभिमान बनाए रखते हुए। सहानुभूति उन्हें बरदाश्त नहीं। उनकी यह खुद्दारी और स्वयंभू-सा चरित्र। जब वे सेल्यूलाइटिस की चपेट में आए, तो इसकी खबर भी कम लोगों को होने दी, कोई उन्हें बेबस और लाचार समझ सहानुभूति प्रकट करे, यह उन्हें मंजूर नहीं होता। अपने इलाज के बाद वे मंगला में रहे, तब पता लगा कि बिलासपुर में उनके लिए एक ऐसा भी घर है। ठंड के दिन थे और वे खुद को घर से अलग, अधिकतर छत पर स्थापित रखते थे। उस दौरान प्रकट नहीं करें, पर सबसे मिलना-जुलना पसंद नहीं कर रहे थे। मेरी लगभग नियमित मुलाकात उनसे होती, हर मुलाकात पर अगला एजेंडा तय कर देते थे, शायद इसलिए कि मैं बेतकल्लुफ बना रहा, उनके सामने उनके तबियत की परवाह कभी नहीं की। स्वाभाविक-सहजता को इस तरह बेलाग स्वीकार कर सकने वाले वे दुर्लभ व्यक्तित्व हैं।

श्यामलाल चतुर्वेदी, श्रीकांत वर्मा, सत्यदेव दुबे, शंकर तिवारी और शंकर शेष, बिलासपुर के इन पांच ‘एस‘ के बाद यही नाम सतीश जायसवाल ध्यान में आता है। एक ऐसी खास बात जो शायद सिर्फ मेरे साथ है- उनकर कर बाता-चिती होथन, गोठ-बात होथे अउ कइ पइत नइ भी होवय, फेर जब भी होथे छत्तीसगढ़ी म ही होथे। उनसे जुड़े लोगों में मैं शायद एक अकेला हूं, कि हमारी बातचीत हमेशा छत्तीसगढ़ी में होती है, हिन्दी में एक बार भी, कभी भी नहीं। आत्मीयता महसूस कराने के लिए वे बहुत सजग और तत्पर रहते हैं, यथासंभव परिचितों को घरूनाम से याद करते और पुकारते हैं, मैं उनके लिए मुन्ना हूं।

पत्रिका का अंक,
जिसमें यह लेख छपा है.
सतीश जी कई मायनों में खुद रोचक मुसलसल कहानी की तरह हैं, इसलिए यह जो, जैसा याद है, वही लिखने का प्रयास है। पहले-पहल जब लिखने की बात आई तो हफ्ते भर यही लगता रहा कि खेद व्यक्त करना पड़ेगा, लेकिन सुधीर-सतीश जी ‘एस-द्वय‘ के लिहाजवश, अनिच्छापूर्वक नोट्स लेना शुरु किया, तो पता ही नहीं चला कि दिन कैसे बीते और यह लिखना मेरे लिए कितना मजेदार अनुभव रहा। अब जब समय-सीमा के कारण इस अधूरे को पूरा बनाकर प्रस्तुत कर रहा हूं, मानता हूं कि उन पर कभी शोध होगा तो मैं सबसे जरुरी रिसोर्स पर्सन्स में एक नाम मेरा भी होगा। 

आमतौर पर कृतित्व-व्यक्तित्व वाला पत्रक साथ आ जाता है कुछ बचे तो गूगल-नेट किसी भी किस्से को इतिहास बनवा डालते हैं। इस अंक की तैयारी की जानकारी के साथ ऐसा कुछ नहीं आया, इसलिए भी लिखना मजेदार रहा। इस कहानी ‘सतीश जायसवाल‘ में तथ्य-इतिहास की अपेक्षा न करें, इसे संस्मरण भी न मानें। कहानी भी मानने लायक यह न हो तो इस लेखन को उद्देश्य में सफल मानूंगा। बहरहाल, शीर्षक सोचा है- एक अधूरी कहानी, असमाप्त कविता, ‘तीर्थ नहीं केवल यात्रा ...‘