Wednesday, May 18, 2022

CONFLICTORIUM

आज 18 मई को अंतरराष्ट्रीय संग्रहालय दिवस पर सुबह-सुबह याद कर रहा हूं 24 फरवरी 2021 को, जिस दिन दो युवतियों ने कन्फ्लिक्टोरियम प्रतिनिधि के रूप में अपना परिचय दिया था। तब उनकी बातचीत का आशय, अगर मैं ठीक समझ सका तो यह था कि रायपुर, छत्तीसगढ़ में ऐसे संग्रहालय की क्या संभावना है? और इसके बारे में मैं उन्हें क्या बता सकता हूं। यानि उन्हें क्या जानना चाहिए यह भी मुझे बताना है। मुझे यह मनोरंजक पहेली जैसा लगा था।

मैंने बताया कि यह तो खल्लारी के देवपाल वाले मंदिर जैसे उदाहरणों वाला छत्तीसगढ़ है। मगर कन्फ्लिक्ट ही ठहराना हो तो वह कहां नहीं, लेकिन अक्सर बिना समझे, जल्दबाजी कर उसमें दखल देना, उसे हवा देने जैसा होता है। इसलिए मैं मानता हूं कि संग्रहालय के बजाय आचरण और व्यवहार हो, वह भी समन्वय का। वैचारिक भिन्नता तो स्वाभाविक है, रहेगी, आवश्यकता उसके प्रति उदारता की हो सकती है, ... आदि कारणों से मैं कन्फ्लिक्टोरियम जैसा कोई संग्रहालय, छत्तीसगढ़ के लिए निरर्थक मानता हूं।

मुझे तब लगा था कि ऐसे संग्रहालय का निर्णय तो किसी स्तर पर हो चुका होगा, बाद में अपनी बात पर खुद विचार करते हुए लगा था कि उसे मेरी असहमति, कन्फ्लिक्ट मान कर यहां कन्फ्लिक्टोरियम की सख्त आवश्यकता, उनके प्रतिवेदन में होगी, इसलिए समझ नहीं पाया था कि मैं इसके लिए स्वयं को सहमत मानूं या असहमत? बहरहाल, यह बात याद रह गई और पिछले दिनों आपसी चर्चा में आई, मगर आई-गई हो गई। आज फिर याद आने पर लगा कि पहले इसकी तलाश कर लेनी चाहिए।

अटकते-भटकते बैरन बाजार के जनता कालोनी में पहुंचा, वहां बोर्ड दिख गया।
तीर की दिशा में ठिठकते आगे बढ़ा, क्योंकि यह घरों के पिछवाड़े वाली गली थी, एक रहवासी गृहणी ने बताया कि सामने जाइए, बड़ा पीपल का पेड़ है, वही म्यूजियम का प्रवेश है, ऐसा लगा कि उनसे म्यूजियम का पता पहली बार किसी ने पूछा है और पता बताने के अलावा इससे उनका कोई ताल्लुक नहीं है। बताए पते पर दरवाजा बंद और उस पर बोर्ड मिला, कुछ आशा बंधी।

एक युवती पीपल के पेड़ पर जल अर्पित कर रही थी, उससे पता पूछा, उसने कहा कि प्रवेश पीछे गली से है। मैंने कहा कि गली से ही लौट कर आ रहा हूं। संयोग कि वही संग्रहालय की प्रभारी थी, इसलिए उसके बताए रास्ते, यानि घरों के पिछवाड़े वाली गली में वापस लौटा, इस बार आगे बढ़ने पर झांकता सा संकेत मिला।

अब मैं आधे बंद दरवाजे के सामने था, झिझकते हुए प्रवेश किया।
मेरा यहां तक पहुंचना उन्हें कुछ अजीब सा लग रहा था, इसलिए मैंने अनपा परिचय देना जरूरी समझा कि मुझे आकस्मिक दर्शक न मान लें। मैं इसकी पृष्ठभूमि से परिचित हूं और स्वयं संग्रहालय विज्ञान का विद्यार्थी हूं साथ ही संग्रहालय से संबंधित कामों से भी जुड़ा रहा हूं। संग्रहालय प्रभारी स्वागत की मुद्रा में तो थीं ही, अब आश्वस्त भी हो गईं। काउंटर पर देखा कि यह 14 अप्रैल 2022 से खुला है।

अंदर जाने के लिए उन्होंने मुझे हैलमेट दिया, मैंने पूछा कि किसी खतरे की आशंका है, सावधानी बरतनी है? उन्होंने आश्वस्त करते हुए टोपी पर लगे बल्व को जला दिया और बताया कि इस बंद दरवाजे के अंदर अंधेरा है, इससे आपको मदद मिलेगी। सुरंगनुमा अंधेरा संकरा गलियारा, थोड़ा उबड़-खाबड़ भी। अलग सा महसूस करते इसे पार कर आगे बढ़ते जिस कक्ष में ठहरा वहां संविधान की प्रति और अंबेडकर जी के चित्र लगे थे। अंबेडकर-संविधान ने द्वंद्व-CONFLICT को रेखांकित कर उसे मिटाने की राह बनाई? इसलिए? मुझे लगा कि इसके साथ संविधान निर्मात्री सभा के छत्तीसगढ़ के सदस्यों का भी नामोल्लेख, परिचय होता! काउंटर पर के चित्र में ‘रायपुर का अपना CONFLICTORIUM‘ लिखा है, मगर इसमें रायपुर या छत्तीसगढ़ का अपना कुछ नहीं दिखा, तो यह ‘अपना‘ बेगाना-सा लगा। अपनी इस बात से प्रभारी को अवगत कराया।
कुछ और प्रादर्श थे, प्रभारी ने उन सबसे परिचित कराया। मैं फिर पूरा समय ले कर आने की बात कहते, दर्शक पंजी पर अपना नाम दर्ज कर वापस निकल आया। इस संग्रहालय दिवस पर, इस संग्रहालय तक पहुंचने वाला मैं शायद अकेला दर्शक रहा।

Monday, April 18, 2022

विरासत और जलवायु

18 अप्रैल को प्रतिवर्ष विश्व विरासत दिवस मनाया जाता है। इस वर्ष थीम है ‘विरासत और जलवायु‘। सामान्यतः विरासत का आशय मानवकृत उदाहरणों से जोड़ लिया जाता है, किंतु इसके साथ प्राकृतिक विरासत, और उसमें भी जल और वायु के महत्व को रेखांकित करने के लिए ही संभवतः यह ‘जलवायु‘ विशेष रूप से है।


यूनेस्को द्वारा विश्व विरासत स्थलों के चयन के लिए मुख्यतः मानव रचनात्मक प्रतिभा, वास्तुकला आदि, मानव-इतिहास के महत्वपूर्ण चरण की उत्कृष्ट कृति/ घटनाओं या परंपराओं, विचारों या विश्वासों के साथ, उत्कृष्ट सार्वभौमिक महत्व के कलात्मक और साहित्यिक कार्यों का प्रत्यक्ष या मूर्त रूप/ पर्यावरण और मानव संपर्क के विशिष्ट उदाहरण/ पारिस्थितिक जैव समुदायों की जैविक प्रक्रिया और विकास का प्रतिनिधित्व करने वाले उत्कृष्ट उदाहरण, प्राकृतिक स्थितियां/ उत्कृष्ट सार्वभौमिक मूल्य की संकटग्रस्त प्रजातियां को शामिल किया जाता है। इस प्रकार विरासत के अंतर्गत प्राकृतिक, मानवकृत-सांस्कृतिक तथा मिश्रित विरासत शामिल है।

इसे यों समझ सकते हैं कि जंगल, नदी, पहाड़, जल-प्रपात आदि नैसर्गिक सौंदर्य स्थल मूर्त विरासत है। साथ ही पुरातात्विक और ऐतिहासिक मंदिर, भवन, संरचनाएं भी मूर्त विरासत हैं। संस्कृति और परंपरा, जिसमें नृत्य, संगीत, खान-पान, जीवन-शैली, लोकाचार, रीति-रिवाज, तीज-त्यौहार आदि सभी शामिल है, अमूर्त विरासत है। दूसरे शब्दों में नदी-पहाड़, पेड़-पौधे, जीव-जन्तु, उनका परिवेश, स्मारक, कला, गीत-संगीत, परंपरा, जीवन-शैली, जिनमें मानव सभ्यता के सुदीर्घ इतिहास और उद्यम की सौंदर्यमूलक अभिव्यक्ति हो, वह सभी विरासत है।

ऐसी विरासत किसी एक व्यक्ति की नहीं, अपितु पूरी सभ्यता और समाज की थाती होती है। यह मात्र पर्यटन और मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि मानवता के उच्चतर मूल्यों और प्रतिमानों की पहचान है। पीढ़ी-दर-पीढ़ी, बरसों से चली आ रही विरासत को आने वाली पीढ़ी के हाथों सौंपना हर पीढ़ी का दायित्व है। ऐसे स्थलों और विरासत के इन उदाहरणों के प्रति जागरूकता और संतुलन आवश्यक है। कई ऐसे विरासत स्थल है, जो महत्वपूर्ण होने के बावजूद भी उपेक्षित रह जाते हैं, वहीं दूसरी तरफ लोकप्रिय स्थलों में पर्यटकों की भारी संख्या पहुंचती है, साथ ही अनियंत्रित विकास के कारण उस विरासत को क्षति पहुंचने की आशंका बनी रहती है। इसलिए इनका ध्यान रखा जाना आवश्यक हो जाता है।

अपनी विरासत की स्थिति, उसके संरक्षण के पक्षों और संभावनाओं पर विचार करते हुए उल्लेखनीय है कि भारतीय पुरातत्तव सर्वेक्षण की 150वीं वर्षगांठ समारोह में प्रधानमंत्री जी ने कहा था- ‘शहरीकरण और जनसंख्या के विस्तार के दबावों से देश भर में हमारे ऐतिहासिक स्मारकों के लिए खतरा पैदा हो गया है।‘ ... इसके लिए दूर दृष्टि, उद्देश्य के प्रति निष्ठा और विभिन्न सम्बद्ध पक्षों के सम्मिलित प्रयासों की आवश्यकता होगी। मुझे उम्मीद है कि आप इस महत्वपूर्ण प्रयास के दायित्व को संभालेंगे।‘ निसंदेह यह बात मात्र पुराने स्मारकों पर ही नहीं, बल्कि समूचे विरासत पर लागू होती है।

इस परिप्रेक्ष्य में उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों समाचार आया कि नीति आयोग के ‘ट्रांसफार्मेशन ऑफ एस्पिरेशनल डिस्ट्रिक्ट प्रोग्राम‘ के अंतर्गत छत्तीसगढ़ के 10 आकांक्षी जिले शामिल हैं, इसके संबंध में मुख्यमंत्री जी ने प्रधानमंत्री जी को पत्र लिखा कर विश्वास व्यक्त किया है कि हमारे वनांचल तथा गांव के जीवन में संस्कृति और परंपराओं का विशेष योगदान होता है, जिससे वहां के लोगों के जीवन में समरसता, उत्साह एवं स्वावलंबन का भाव रहे, इसलिए आकांक्षी जिलों की अवधारणा में सांस्कृतिक उत्थान के बिन्दु को भी यथोचित महत्व एवं ध्यान दिया जाना चाहिए। उपरोक्त इंडीकेटरों को भी जोड़े जाने पर आकांक्षी जिलों के बहुमुखी विकास में किये जा रहे सभी प्रयासों पर भी ध्यान रहेगा और जिस आशा के साथ यह आकांक्षी जिलों की पृथक मॉनीटरिंग व्यवस्था शुरू की गई है वह भी सफल होगी।

दूरद्रष्टा राजनेताओं और नीतियों के कियान्वयन की दृष्टि से उल्लेखनीय है कि 73वें संविधान संशोधन, पंचायती राज अधिनियम के साथ 11वीं अनुसूची को सम्मिलित किया गया, इस अनुसूची में पंचायतों के 29 कार्यकारी विषय-वस्तुओं में से ‘बाजार एवं मेले, सांस्कृतिक गतिविधियां और सार्वजनिक संपत्ति का रखरखाव‘ को सीधे विरासत संरक्षण से जोड़ कर देखा जा सकता है। अधिनियम की विषय-वस्तु से स्पष्ट है कि महान विरासत के साथ, गांव-बस्ती, नगर के पारा-मुहल्ला में आसपास फैली विरासत और उसके संरक्षण का भी अपना महत्व है।

इस दृष्टि से वन-पर्वत क्षेत्रों के साथ-साथ प्रत्येक बसाहट से संबद्ध विशिष्ट प्राकृतिक संरचना, जीव-जंतु, पेड़-पौधे, नदी-नाले का उद्गम, संगम और अन्य जल-स्रोत, नदी-नालों के घाट, गुड़ी आदि स्थानीय आस्था-उपासना स्थल महत्वपूर्ण होते हैं। पुराने तालाब, डीह-टीला आदि की जानकारी के साथ विरासत स्थलों का संकेत मिलता है। कम प्रचलित मार्ग, पैडगरी रास्तों के साथ इतिहास और परंपरा के प्रमाण सुरक्षित रहते हैं। हरेक गांव में घटना, पर्व, परंपरा, संस्था आदि की अपनी विरासत, मान्यताओं, विश्वास और विभूतियों से जुड़ी गौरव-गाथा होती ही है, यही विरासत के विशिष्ट उपादान हैं। स्थानीय निकाय स्तर पर अपनी अस्मिता, गौरव की पहचान और दस्तावेजीकरण कर उनके संरक्षण में स्थानीय सहभागिता और उत्तरदायित्व को महत्व दिया जाना आवश्यक है।

ध्यान रहे कि सरकारों की प्राथमिकता रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, पानी, सड़क और कानून-व्यवस्था है। इसलिए धरोहर की रक्षा के लिए प्रत्येक नागरिक को इसे पुनीत कर्तव्य मानते हुए स्वयं जिम्मेदारी लेनी होगी। जिस प्रकार हम अपनी खुशियों, सुखद स्मृतियों सुंदर वस्तुओं, कलाकृतियों, पुरखों की निशानियों को बचा कर रखना चाहते हैं, उसी प्रकार का लगाव रखते, धरोहर के प्रति सजगता आवश्यक है। इसके संरक्षण में स्वयंसेवी संगठनों, शैक्षणिक संस्थानों, उद्योगों, जन-प्रतिनिधियों तथा आवश्यक होने पर दबावपूर्वक शासन/एजेंसियों का सहयोग लेना होगा, तभी अपनी विरासत पर गौरव और उनका सम्मान करते हुए, उन्हें बेहतर संरक्षित किया जा सकेगा।

Saturday, April 16, 2022

मानवशास्त्र का एक अध्याय

सुश्री सावित्री गिदवानी सूरी, 90 पार कर चुकीं हैं, उन्हीं की जबानी-


पिता गिरधारीलाल मूलचंद गिदवानी, विभाजन के कारण करांची से कलकत्ता आ गए। करांची में इंद्रकुमार गुजराल हमारे घर आया करते थे। कलकत्ता में मेरी पढ़ाई स्कॉटिश चर्च और सांध्यकालीन बंगभाषी महाविद्यालय में हुई। 1956 में मानवशास्त्र से एम. एस-सी. किया।

खितिश बाबू यानि के.पी चट्टोपाध्याय (क्षितिश प्रसाद) गुरु थे, स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया, पक्के वामपंथी विचारों वाले, सी.वी. रमन के शोध-छात्र। कैम्ब्रिज में भौतिक शास्त्र की पढ़ाई करते, मानवशास्त्री डब्लू.एच.आर. रिवर्स के संपर्क में आए और इसी के हो गए। वापस आ कर विभिन्न शैक्षणिक भूमिकाओं का निर्वाह करते, 1962 में कलकत्ता विश्वविद्यालय के मानवशास्त्र विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त हुए।

वे अपने गुरु के बारे में याद करती हैं, ठहर-ठहर कर।

खितिश बाबू, राजा राममोहन राय के पोते, ईश्वरचंद विद्यासागर के दोहिते। टैगोर की भतीजी से विवाह हुआ, वे बहुत मगरूर थीं। खितिश बाबू लंबा कुरता पहनते थे और वही फैला कर चंदा जमा करते थे। पहले मैंने मनोविज्ञान विषय लिया था, लेकिन सीनियर बी.के. रायबर्मन की बातें सुनते मन बदला और मानवशास्त्र में प्रवेश ले लिया। मनोविज्ञान के विभागाध्यक्ष दुखहरन चक्रवर्ती थे, इस पर रुष्ट हो गए, तब खितिश बाबू ने उनसे बस इतना ही कहा, दुखहरन तुम दुखदेवन कैसे हो गए।

आन्द्रे बेते साथ थे, हम दो गैर-बंगाली होते थे। पढ़ाई के दौरान सरईकेला के उरांव जनजाति के मैटीरियल कल्चर के लिए फील्ड वर्क किया। टी.सी. दास भारतीय जनजाति और रायचौधरी विश्व की जनजातियां पढ़ाते थे। बहुत पढ़ाई करनी पड़ती थी। स्नातक तक कक्षा में 12 लड़के और मैं एक अकेली लड़की थी। स्नातकोत्तर में दो और लड़कियां आ गईं, हजारीबाग के प्रसिद्ध शिकारी परिवार की ज्योति सेन, उसकी शादी श्रीरामपुर के टेक्सटाइल मिल के मालिक से हुई, उन्होंने जर्मनी से टेक्सटाइल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की थी, उन दिनों भारतीय टेक्सटाइल उद्योग ढलान पर आ रहा था। दूसरी कलकत्ता के प्रसिद्ध होम्योपैथ डॉक्टर की बेटी गीता मुखर्जी थी, वह फिजिकल एंथ्रोपोलॉजी में थी।

गांधीवादी निर्मल कुमार बोस, गांधी जी के नमक सत्याग्रह में साथ रहे, नोआखली भी गए। पुरातत्व, भूगर्भ विज्ञान और मानव विज्ञान के जानकार, मानव भूगोल विभाग में थे, खितिश बाबू से नहीं पटती थी, फिर भी रोज मानवशास्त्र विभाग में आते थे, शादी नहीं की।

पढ़ाई के बाद 1956 से हाइजीन एंड पब्लिक हेल्थ के लिए प्रोजेक्ट्स पर काम शुरू कर दिया, मुक्ता सेन डाइरेक्टर थीं। रूरल सेंटर सिंगुर में काम होता था। 1962 अक्टूबर में शादी हुई, तब दिल्ली आ गईं। श्री इकबाल सूरी से विवाह, लगभग चार वर्ष मात्र का दाम्पत्य जीवन, पति की कैंसर से मृत्यु। एक बेटा, एक बेटी दोनों अब अमरीका में।

बी.के. रायबर्मन दिल्ली में Census के सोशिया-इकानामिक स्टडीज के रजिस्ट्रार हो गए थे, उनके साथ मुख्यतः ग्रामीण-जनजातीय संस्कृति संबंधी प्रोजेक्ट्स पर काम करने लगी। फरवरी 1967 से AIIMS, दिल्ली के सोशल सेक्शन में सोशल साइंटिस्ट का काम करने लगी। कान्ट्रेक्ट जॉब था। 1977 तक काम किया। रामलिंगास्वामी डाइरेक्टर थे और कर्णसिंह मंत्री। हमलोगों के भुगतान की समस्या प्रधानमंत्री तक पहुंची थी। बाद में मुझे फैमिली प्लानिंग इंस्टीट्यूट में काम करने को कहा गया, मुझे नहीं जमा।

मैं प्लानिंग कमीशन के सचिव एन.के. सेठी और समाज कल्याण की लीला सुमंत मुलगांवकर (टाटा मोटर्स-स्टील वाले) से जुड़ गई। बतौर चीफ कंसल्टेंट बारामूला, पिथौरागढ़, गंगानगर, सुंदरवन में प्रोजेक्ट्स के लिए फील्ड वर्क किया। जम्मू-कश्मीर में टाइम्स ऑफ इंडिया के मुख्य संवाददाता सती साहनी हमारे रिश्तेदार थे, उनका सहयोग मिलता था। पिथौरागढ़ में सुबह साढ़े पांच बजे उठ कर सूर्योदय के साथ बर्फ वाली त्रिशूल की चोटी दिखती थी। रिलीफ में बच्चों के नाश्ते के लिए सिर्फ 50 पैसे तय किया गया था, मुझे बुरा लगा, अपनी रिपोर्ट में यह विशेष रूप से दर्ज किया था।

एक प्रोजेक्ट Census के लिए मोहर्रम पर किया था। इसमें सार्वजनिक और निजी स्तर पर होने वाले आयोजन की जानकारी इकट्ठी करनी थी। जामा मस्जिद, दिल्ली गेट के आसपास का क्षेत्र था। शिया ताजिया निकालते हैं और सुन्नी पानी पिलाते हैं। सार्वजनिक आयोजन की जानकारी जुटाने के लिए सहयोगी भी थे, काम आसान था, मगर निजी तौर पर घरों में होने वाली गतिविधियों के लिए उनका भरोसा जीतकर अकेले ही जाना होता था, काम चुनौती भरा था। यह काम बाद में प्रकाशित भी हुआ।

1985 में देवबंद उत्तरप्रदेश में ह्यूस्टन विश्वविद्यालय की पौलन कोलेंडा के लिए काम करने लगी। दूसरी तरफ सहारनपुर था। वूमन्स कल्चरल वैल्यूज इन रूरल इंडिया प्रोजेक्ट था। इसी दौरान इंदिरा गांधी की मृत्यु पर दंगा भड़का, हम जनपथ में रहते थे, रीगल सिनेमा के आसपास बहुत बुरी स्थिति थी, हमें रुकना पड़ा, तब मैं रनखंडी में थी। एक अन्य प्रोजेक्ट, डब्लू.एच.ओ. का था, कुसुम अरोरा और वीना मजुमदार की सामाजिक संस्था के लिए काम किया। यह काम इटावा के ग्रामीण क्षेत्रों में था। बेटी सोनिया सूरी बोस्टन में है, उनका प्रोजेक्ट राजस्थान में जयपुर के पास था, उसके लिए काम किया। अधिकतर महिला, स्वास्थ्य, मैटीरियल कल्चर से संबंधित सर्वे होता था। सन 1991 तक काम करती रही।

सावित्री जी की मां आर्य समाजी थीं, उन्होंने तय रखा था कि किसी बच्चे को हिंदी जरूर पढ़ाएंगी, बड़ी बहन ने हिंदी पढ़ी और बालीगंज शिक्षा सदन में शिक्षिका रहीं, मन्नू भंडारी उनके साथ वहीं शिक्षिका थीं। सावित्री जी अपनी इन्हीं बड़ी बहन शीला भगवानानी जी के यहां रायपुर आती रही हैं। उनकी बहू जया अधीर भगवानानी जी के साथ यहां ‘आकांक्षा‘ के विशिष्ट बच्चों और रायपुर केन्द्रीय जेल में चित्रकला, कल्याणकारी जैसे कार्यों में सहयोग करती रही हैं। शीला जी अब नहीं रहीं। सावित्री जी की जिंदादिली में इतिहास की धड़कन है, वे इन दिनों भी भगवानानी निवास, सिविल लाइन, रायपुर में हैं।

Tuesday, April 12, 2022

जमाना खराब है!

‘युवा पीढ़ी गुमराह है, भाषा पर संकट है, रसातल में जा रहा है समाज, भ्रष्टाचारियों का राज है, हमारी विरासत नष्ट हो रही है, पर्यावरण खराब हो रहा है, जल-जगल-जमीन कुछ नहीं बचेगा‘ मानों आकाशवाणी हो रही हो या कोई मदारी डुगडुगी बजा रहा हो, बरबादी का मंजर दिखाने वाला हो या धर्मगुरू, जो कहे कि बस अब मेरी शरण में ही आ कर तुम बच सकते हो। वस्तुतः ऐसी सोच थके-पिटे-हारे की लाचार गुहार है। 

संभव है कि उन्हें वास्तव में ऐसा लगता हो, घबरा रहे हों, भयभीत हों, तो स्वाभाविक जिज्ञासा होती है कि इस दिशा में, स्थिति को सुधारने मे लिए वे स्वयं क्या कर रहे हैं। जो बिगड़ते हालात के प्रति सजग है, उसे हालात ठीक रखने के लिए सबसे आगे आ कर पहल करनी चाहिए। मगर शायद बस, जजमेंटल हो कर, जज का महत्व पाने की आकांक्षा, देखो मैंने कहा था न। भाव कुछ इस तरह होता है कि मैं कुछ नहीं कर पा रहा हूं, सजग हूं, देख पा रहा हूं और तुम बेखबर, देख नहीं पा रहे हो, मैं दिखा रहा हूं, तुम जुट जाओ ठीक करने में, मैं देखता रहूंगा और तुम्हें टोकता सुधारता रहूंगा और कुछ सुधरे तो तैयार रहूंगा, यह कहते कि मैं ही वह महान हूं, जिसने इस ओर ध्यान दिलाया था, इसलिए सारा श्रेय मेरा है, मैं ही वह युग-पुरुष हूं, मेरा सम्मान करो।

स्थितियों में बदलाव संभव है। यह मानी हुई बात है कि परिवर्तन लगातार होता रहता है, हो रहा है। भौतिक प्रगति के दौर में इसकी गति तेज हुई है, साधन-माध्यम बदले हैं, इसलिए दैनंदिन जीवन-शैली में परिवर्तन आवश्यक हो गया है। इसमें भी कोई संदेह नहीं कि सब ठीक नहीं चल रहा है। यदि सब ठीक चलता रहे तो फिर हमारी, हमारे उद्यम, हमारे पुरुषार्थ की कोई जरूरत ही नहीं रही। हम स्थिर हो जाएंगे हमारी सार्थकता और प्रासंगिकता इसी में है कि हम जो समझ पाए कि ठीक नहीं चल रहा है उसे ठीक करने में सक्रिय रहें, उसी में जीवन का संगीत सुनें-बुनें। यह भी विचाारणीय होता है कि क्या हम स्वयं से, अपने घर, अपने पास-पड़ोस की व्यवस्था से संतुष्ट हैं?

युवा पीढ़ी के लिए विशेष रूप से कहना चाहूंगा कि मेरी मुलाकात युवाओं से लगभग लगातार होती रहती है या उनके संपर्क में रहता हूं, जिनकी आयु 20 से 40 साल के बीच है। पढ़ने, लिखने और समझ में वे मेरी पीढ़ी या मेरी पिछली पीढ़ी से किसी मायने में कम नहीं हैं। इसे आप अपने घर-परिवार के बच्चों से मोबाइल और कम्प्यूटर के लिए मदद लेते हुए, उनकी प्रशंसा करते हुए महसूस कर सकते हैं। नई पीढ़ी के सामने नई, कई अलग चुनौतियां होती हैं, जिनका सामना पुरानी पीढ़ी को कभी नहीं करना पड़ा होता है। नई पीढ़ी, बदली हुई परिस्थिति के लिए अनुकूल पीढ़ी है। पिछली पीढ़ी को सहज निर्वाह के लिए, खुद पहल कर नई पीढ़ी से तादात्म्य बिठाना होगा, वरना एकाकी रह जाना उसकी नियति होगी।

इसलिए लगता है कि ‘गुमराह, संकट, नष्ट, बरबादी‘ वाली चिंता जाहिर करने, घोषणा करने वाले अपनी सीमाओं में रह गए हैं, ककून-बंद। उन्हें कोई भी परिवर्तन डराता है और उसमें वे बरबादी देखते हैं। ऐसे चुक गए लोगों के प्रति सहानुभूति ही हो सकती है।

पुनश्च- प्रसंगवश, श्रीमद्भागवत के प्रथम अध्याय के श्लोक 28 से 36 का अंश-

अब यहाँ सत्य, तप, शौच (बाहर-भीतर की पवित्रता), दया, दान आदि कुछ भी नहीं है। बेचारे जीव केवल अपना पेट पालने में लगे हुए हैं; वे असत्यभाषी, आलसी, मन्दबुद्धि, भाग्यहीन, उपद्रवग्रस्त हो गये हैं। जो साधु-संत कहे जाते हैं वे पूरे पाखण्डी हो गये हैं; देखने में तो वे विरक्त हैं, किन्तु स्त्री-धन आदि सभी का परिग्रह करते हैं। घरों में स्त्रियों का राज्य है, साले सलाहकार बने हुए हैं, लोभ से लोग कन्या विक्रय करते हैं और स्त्री-पुरुषों में कलह मचा रहता है। महात्माओं के आश्रम, तीर्थ और नदियों पर यवनों (विधर्मियों) का अधिकार हो गया है; उन दुष्टों ने बहुत-से देवालय भी नष्ट कर दिये हैं। इस समय यहाँ न कोई योगी है न सिद्ध है; न ज्ञानी है और न सत्कर्म करनेवाला ही है।

Wednesday, April 6, 2022

शेर राजा

शेर राजा

शेर जंगल का राजा है।
शेर बचेगा तो जंगल बचेगा
जंगल को बचाना है
इसलिए शेर को बचाना है
हमारा सरोकार!
हम पर सारा दारोमदार?

शेर, शिकार करता है
अपनी भूख मिटाने को
अपनी प्राण रक्षा के लिए।
प्रकृति का नियम पालन करते
भोजन चक्र पूरा करते
संतुलन बनाए रखता है।

शेर, रोज शिकार नहीं करता
शिकार करता है,
तसल्ली से उसे सहेजता,
कई दिनों जीमता रहता है
फिर कुछ दिनों सोता है
बचा-खुचा, जूठन-छोड़न
रह जाता है, मुंह मारने
गीदड़, चील, लकड़बग्घों के लिए

इस राजा की प्रजा आखिर कौन है!
न पहेली है, न सवाल
जवाब सीधा सा,
प्रजा है हिरण।
यह प्रजा, कभी हाड़ मांस की
चाहे माया-मृग बनाई जा कर
आखेट-शिकार के लिए हमेशा मुफीद

दिहाड़ी हिरण के लिए
काम के घंटे,
सूर्योदय से सूर्यास्त
सातों दिन, बारहों महीने
काम-कमाई पेट भरना।
पूरे दिन लगातार घास चरना
प्रकृति का नियम पालना-पलना
भीड़ बन, समूह में रहना
और राजा का ग्रास बनना
उसका पेट भरना।

राजा का बचना, राजा को बचाना
हमारा पाठ, सीख, हमारा संकल्प।
एक राजा के लिए
बहुल प्रजा की कुर्बानी
प्रकृति का सं-विधान
पर्यावरण-प्रजातंत्र, नारे और अभियान।

शेर भी नहीं बचेगा
अगर जंगल नहीं बचेगा।
जंगल भी नहीं बचेगा
अगर हिरण नहीं बचेगा।
हिरण भी तभी बचेग
जब घास-पात बचेगा।
घास-पात बचा रहे।

प्रकृति अपने घाव खुद भरती है।
और प्राकृतिक नियम
जैसा हम नियंता बन, जाने-समझे-मानें
मगर वैसा अपवाद?
तदैव सदैव नहीं होता।

‘समाज में सदाचार का बहुमत, बिखरा हुआ होता है और बहुमत का इकट्ठा होना, कभी स्वाभाविक, कभी खतरा आभास कराने पर, प्राण-रक्षा के लिए होता है‘ मेरे ऐसा कहने पर जैव-रूप अध्येता श्री अनुपम सिसोदिया ने मेरी इस बात को दुर्बोध स्थापना कहते, व्याख्या वाली ‘सुबोध‘ निर्मम बात कही, कि यह शिकारी-शिकार जैसा रिश्ता है। शिकारी महत्वपूर्ण माना जाता है और शिकार उनका स्वाभाविक भक्ष्य। शिकारी, शीर्ष पर अल्प और शिकार अंतिम पायदान पर, सीमांत और बहुल। समाज में देखना होता है कि कौन भरा पेट है और किसे अपने पेट के लिए दिन भर भटकना है। इस तरह भटकता, असंगठित बहुमत ही होगा। उसका शिकार होना, ग्रास बन जाना, सहज मान लिया जाता है। इस जगह मानव-समाज ने, उसी ‘बर्बर‘ व्यवस्था को, नियम की तरह स्वीकार कर पालनीय, संहिता की तरह मान्य कर लिया है, आदि ... वही कविता की शक्ल में।

Sunday, April 3, 2022

गरमी के पेय

बड़े-बुजुर्गों के सत्संग के दौरान कभी गरमी के छत्तीसगढ़ी पेय पर बात हुई थी। छत्तीसगढ़ में ऐसे पेय के प्रचलन पर ढेरों जानकारियां मिली थीं, उनमें से कुछ याद रह गई हैं, इस तरह- 

* मेमरी, घास का बीज, सरसों दाने के आकार का काला, पानी में डालने पर सफेद लिसलिसा हो जाता है। पानी अथवा दूध में शक्कर के साथ मिलाकर शर्बत बनाकर पीते हैं। पित्तनाशक है। 

* गिन्दोल लासा या अन्य नाम कतील गोंद, मार्च-अप्रैल में गोंद फूटता है। रात भर भिगाकर सुबह शक्कर मिलाकर पिया जाता है। यह भी पित्तनाशक है। 

* हल्दी फूल को रात में भिगाकर सुबह सिलबट्‌टे में चिकना पीस कर शर्बत बनाकर पिया जाता है। 

* तिखुर शरबत, आम पना, सत्तू, बेल शर्बत, सलफी, छिन्द, ताड़, नगदौना, मड़िया/मड़ुआ आदि।

Friday, April 1, 2022

Classical Icon

पुरातात्विक स्थल पर कराए गए कार्यों के आवश्यक संदर्भ, जानकारियों सहित प्रतिमा-विज्ञान के जानकार जी.एल. रायकवार का शोध-लेख, ‘रूद्र शिव‘ के अभिज्ञान में शास्त्रीय आधार की दृष्टि से तो महत्वपूर्ण है ही, रायकवार जी की विशेषज्ञता के स्तर को समझने में भी सहायक है।इस प्रतिमा पर एक अन्य शोध-लेख यहां है।यह ‘रूद्र शिव‘ प्रतिमा पर केंद्रित एल.एस. निगम संपादित पुस्तक में शामिल है, प्रस्तुत-



A Classical Icon from Tālā
G.L. RAIKWAR

Tālā is the most recently known archaeological site of Dakṣiṇa Kosala, yet is most important and famous for its masterly art and architectural heritage in the history of Indian art. Tālā is the name of the site which is situated on the left bank of Maniyārī river, a tributary of Śivanāth, near village Amerikāṁpā in Bilaspur district. By road Tālā is only 28 kms. from Bilaspur, the district headquarters and 6 kms. from Dagori railway station on Howrah-Bombay line. Part of the land where Tālā and its neighbouring villages situated, is full of natural beauty which is enhanced by a profusion of wild trees and shrubs, cultivated lands and water courses of Maniyārī river. The people of the related villages generally belong to Kewat (Fisherman), Telī (Oil-merchant) and Yādav (Milkman) castes, a conglomeration of semi-warrior merchant and cultivator classes of society. Most of them are cultivators and partly engaged in local stone quarries as quarry-men.

The site of Tālā is known for two temple remains namely- Devarānī and Jethānī, meaning younger and elder co-sisters. Actually in the Ardha maņdapa of Devrānī temple, two female deities are depicted on the North and South walls. The local people identify and call them, Deorānī and Jethānī. These female deities are represented as Nadī-Mātŗkās (minor river goddesses) and here they are shown without their vehicle, but the depiction of the waves and lotus motifs are sufficient evidence for their identification. The best example of the two river goddesses in this region is depicted in Siddheśvara temple, Palārī (Raipur district). It is suggested that these two river-goddesses can be identified as Nadī-mātŗkā and Saramātŗkā.

The temple remains of Tālā are very close to the bank of Maniyārī. The habitational part of that time also is located on its left bank and now used for agriculture purpose. Maniyārī is a modern Hindi name. In Sanskrit it seems to be Maņihāravalī, which means a series of Jewel-necklaces. It is supposed that the necklaces of Satī (consort of Śiva) fell on the ground and took the shape of a river. Maniyārī flows to the west of the site of Tālā towards south. Śivanāth flows to the south of the site from west to east. It is a task before us to conclude the reason of Jethānī temple facing south and also the therio-anthropomorphic deity tentatively named as Rudra Śiva. The tortoise shaped raised land (Kūrmapŗștha bhūmī), culture of the primitive people, the south flow river and its junction glorify the site and its nature, the art centre and devotional rituals of Śaiva tantra respectively. The site of Tālā is supported with nature and in favour of the activities of tantra and yoga.

The first chapter of clearance work at Tālā1
The temple remains of Tālā- Devarānī and Jethānī temples were declared protected by the Deptt. of Archaeology, Government of Madhya Pradesh in 1984. In the year 1977-78 the Department of Archaeology and Museums, conducted debris clearance work at Devarānī temple, under supervision of Shri A.K. Risbud, Registering Officer, Arch. & Museums, Bilaspur. In this session the work was executed in the front portion of the temple which exposed the Candrașilā, flight of stairs, dwarf door keepers in original position and a number of mutilated sculptures with other architectural fragments. Some representative examples of sculptures, which were revealed from the debris are- Śiva, Surya, four armed broken deity, pedestal part, human figure, Gaņa and architectural part. These materials are displayed at the site and some better sculptures are transferred to the District Archaeological Museum, Bilaspur for display. 

The second chapter of clearance work at Tālā2
In the Year 1985-86 the clearance work was conducted on the mound of totally dilapidated Jețhānī temple by Registering Officer, Archaeology & Museums, Bilaspur, who successfully unearthed the ruined temple with its remains. The Jețhānī temple was built on uncommon ground plan with three entrance gateways. The main entrance is towards south and two others are on east and west directions. The ground plan is based on Ardhamaņdapa, Maņdapa and Garbhagŗha. The Ardhamaņdapa and Maņdapa are supported by massive decorated pillars. The large sized sculptures were erected in the inner wall of Mandapa, Ardhamaņdapa and around the pillars with great skill. The river goddesses are installed at the entrance of garbhagŗha but unfortunately only their vehicle were revealed in original position, some rare remaining sculptures of Jethānī temple have not yet been identified, because of their unorthodox signification. One of them is unique in Indian art and narrate the story based on Dhana-Yakşinī (Yakșinī of wealth). In this sculpture a gigantic male deity is upholding the small size Yakşinī, up in his hands and pressing her body. The Yakṣinī is vomiting a bulk of coins. The fall of coins is depicted in the shape of date stem very artistically. On the lower part of aforesaid sculpture two human figures are shown holding a big opened bag in which the coins are being collected. The other sculpture is related with an ox and an ugly Yaksa is traced out on the stone beam of this temple again associated with the same story.

The clearance work of Jețhānī temple yielded a large number of rare sculptures and other minor antiquities in which Śālabhañjikā, Ardhanārīśvara, Kārttikeya, torso of female deity, a head of Saivācārya, a lion faced head, Gaurī plaque, silver coin of Prasannamātra, terracotta wheel and other objects are the best examples of art treasure. These objects are preserved in the office of the Registering Officer, Archaeology & Museum, Bilaspur.

The third chapter of clearance work at Tālā3
In the Year 1987-88 a minor clearance work was again conducted in the Devarānī temple by the Registering Officer, Archaeology & Museums, Bilaspur for conservation purpose. During the extension of work on south-east corner (left side of the wall of stairs) this image was exposed which has been given a tentative name “Rudraśiva”. The deity was lying down on its ventral surface which is full of high relief carving. The dorsal surface of the sculpture is plain. The deity was buried under the debris and was covered from all sides. After cleaning the site the deity was made to stand up on 17th January 1988 with the mechanical and manual power. The size of the deity is 254x100 cms. and its weight is about 8 ton. The other important remains—a large size Śiva head, pedestal part with gaņa figure, a human figure and other architectural pieces were exposed on the same spot side by side.

It is surprising that among the remains of Tālā only the deity discussed above is almost intact and comparatively partly mutilated. The missing parts of the deity are as follws : 

1. Broken part of Daņda.
2. A Snake near the right leg. 
3. Pedestal part. 
4. Folded hands of the deities shown on the thigh. 

The broken parts- Nāga-hood on right shoulder and Naga-hood near left ieg are chemically joined. 

For better preservation of the Icon from weather effect and erosion it was installed and saved in the newly constructed room on the same spot. 

A Review on the Original Position of the Deity 

The partly ruined Devarānī temple was built on rectangular ground plan and consists of ardhamaņdapa, antarāla and garbhagrha. The door-jamb of the temple is an excellent example of its plastic art depicting mythological and traditional divine deities which are unique examples in the art of Dakșiņa Kosala region. The presentation of therio-morphic and botanical art motifs are uncomparable and unchallengeable in any contemporary art centres. 

The Devarānī temple is a partly ruined temple. This stone built shrine is an early type of temple of Dakșiņa Kosala. It is difficult to say about its sikhara and to say whether it was flat roofed or brick built. It is also interesting that the first renovation and extension work was executed in the site during the rule of Somavaṁśī kings of Dakșiņa Kosala at about 9th-10th Cent. A.D. But it does not match with the original plan of the temple. This extra extension of the plan towards north-east of the Devarānī temple was unartistically combined with old structure. This further extension partly covered the original plan of the Devarāni temple and also the installed (displayed) deity. Some part of this renovation was exposed due to its unbalanced character during the clearance work conducted in the year 1987-88. On this occasion a huge size Gaņeśa was unearthed from the north, which is a sufficient evidence in itself that the act of extension took place in the past. Gaņeśa is the guardian and gaņa of north direction of the temple here and was worshipped in good condition eventhough packed with structure and debris. 

The original position of the discussed deity is not finally confirmed. Although it was unearthed from adjoining part of the Devarānī temple but there is no sufficient evidence for its proper position. The question is whether the said deity was an original sculpture of Devarānī temple? It is very difficult to say conclusively. All the facts are controversial and challengeable. Here some problems regarding the position of the said deity are discussed 

1. The Jețhānī temple is very close to Devarānī temple and when it collapsed the said deity was carried from there to the Devarānī temple. 

2. The said deity is a semi-god and characteristically is a guardian of the posted direction of the temple. There is no recess in the elevation of Devarānī temple where it could have stood. 

3. The furious appearance of the deity is full of Tāntric impact. The south faced Jethānī temple was built on the discipline of the Tântric rituals. The said deity might have been originally displayed in the Jețhānī temple. 

4. Some gigantic weathor-worn court deities (dvārapāla-deities) are located originally in the east entrance of the Jethānī temple. The said deity was posted as a guardian and dvārapāla of the particular direction in the above temple. 

5. A big sized lion-head of a gaña was unearthed from the Jețhānī temple. This example proves the variety and gigantic size of the gaņas particularly.

6. The deity is not in the posture of dhyāna, yoga or any particular action. It is in aggressive mood. The hand poses of the two armed deity are not in abhaya or varada mudrā (posture). 

In these different aspects, regarding the position of the said deity, the problems can not be solved untill the rest covered part of the Devarānī temple in north direction is again excavated properly. This is my presumption that next left counter part of the mysterious deity may be revealed incidentally in future, just as it happened in past.

Iconographical Description of the Deity
 
The said deity is a unique specimen of therio-anthropomorphic Śaiva cult god. But there is no evidence in any iconographical text in relation to the discussed deity which could be applied accordingly, by the sculptor also. The purāņas describe the various incarnations and forms of Śiva but say nothing new which could solve the problem of identity of this recently discovered classical Icon. In this way the deity is interpreted mostly as a Śaiva cult icon. 

This ugra (terrific) form of unparalleled deity is associated with Śiva in the literary aspects of Mahābhārata, where Śiva is described in multi-species and some time interfused manner. The icon is shown in sthānaka (standing) pose. It has two arms and holding a small but stout Daņda in its right hand (now broken and not conserved). The deity is nude with erect phallus which indicates him as a Mahāyogī. The deity wears simple ornaments such as graiveyaka, vakṣabandha, katibandha and kaṁkaņa which take those shapes by the coils of the parikara (attendants) nāga. Other human heads have also been sculpted on the body of the deity wearing ghanţā (bell) and oyster-shaped ear ornaments. A turban of nāga are vertically arranged over the head. The chameleon, peacock, frog, fish, crab, crocodile, snakes, tortoise, leech, elephant, lion, Yakşa, Rākṣasa, Gandharva, Vidyādhara and symbols of different Deva-Yonis (spécies) are depicted as organs and serve the purpose of the divinity. The club feet with pedestal part unfortunately has crumbled. The composition of the body of the deity with creatures is presented separately. (See Appendix). 

The proper identification of the deity can not be solved by mere arguments as each argument, contradicts the fact because its iconographical appearance and symbols are general and they can be associated with the form of Siva also. Therefore the identification of the deity can be presumed by some literary source, particularly according to the Mahābhārata- Śiva has been conceived as the lord of all created beings and is often described as 'Pasupati' and Bhūtánātha. The various aspects and attributes related to the said deity are described very comprehensively in the Mahābhārata specially and they are carefully analysed to achieve the aim. 

The polymorphic and polynominal praises of Śiva are being compared with the character of the discussed deity accordingly. A few selected slokas of the Mahābhārata (Anušāsana parva, chapter-14) are being considered for this purpose. Here such relevant slokas are quoted for examples. 

1. As a water creature- 
Kirāta sabarāņāṁ ca jalajānāma nekaśaḥ. 141. 
He assumes the forms of Kirata and Savaras and of all aquatic animals. 

2. As a tortoise and a fish- 
Kūrmormatsyastathā sarkha pravālāñkura bhūşanah. 142.
He assumes the forms of tortoise and fishes and conchs. He it is that assumes the forms of those coral sprouts that are used as ornaments by men. 

3. As a lion and a bird- 
Vyāghrasimha mrgānāṁ ca taraksvíkşapatatriņām. 144.
 He assumes the forms of tiger and lions and deer, of wolves and bears and birds.

4. As a peacock and a chameleon- 
Haṁsa kāka mayūrāņaṁ Kļkalāsasakasārasāṁ. Rūpaņi ca balākānāṁ grdhracakrāṁgayorapi. 145. 
He it is that assumes the forms of swans and crows and peacocks, of chameleons and lizards and storks. He it is that assumes the forms of cranes and vultures and chakravakas. 

5. As an elephant- 
Gorūpam ca mahādevo hastyasvoştrakharākſtiḥ. 146. 
Mahadeva, it is that assumes the forms of kine and elephants and horses and camels and asses. 

6. As a bird- 
Aņdajānāṁ ca divyānāṁ vapurdhārayate bhavaḥ. 147. 
It is Bhava who assumes the forms of diverse kinds of birds of beautiful plumage. 

7. As poly-faced and poly-headed- 
Şaņmukho vai bahumukhastrinetro bahusīrşakaḥ, 148. 
He some time becomes six-faced and some time becomes multifaced. He some times assumes forms having three eyes and forms having many heads. 

8. With many waists and faces- 
Aneka katipādasca anekodara vaktradhrk. 149. 
He some times assumes forms having many waist, many legs and forms having innumerable stomachs and faces. 

9. With Nāga-mekhalā (Snake waist band)- 
Bhūdharo nāga mauñjī ca nāgakuņdalakuņdalī. 155. 
He is that assumes the forms of Sesha who sustains the world on his head. He has snakes for his belt and his ears are adorned with ear rings made of snakes. 

10. With Urdhvalinga (Penis erectus)- 
Urdhvakeso mahāśeso nagnā vikſtalocanaḥ. 161. 
His hair is long and stands erect. He is perfectly naked, for he has the horizon for his garments. He is endowed with terrible eyes. 

11. With furious eyes- 
Vikrtakso visālākṣo digvāsāḥ sarvavāsakah. 162. 
He is possessed of eyes that are large and terrible. He has empty space for his covering and he it is that covers all things. 

12. With many number of head- 
Ekavaktro dvivaktrasca trivaktro-anekavaktraḥ. 165. 
He has one mouth, he has two mouths, he has three mouths, and he has many mouths. 

This challenging icon of Tālā is a riddle for iconographists. Regarding the proper identification of the discussed deity, the above quoted slokas of the Mahābhārata help us only on theoretical aspects but not in practical (practise). The iconographic and iconometric canons are also necessary for comparison between theory and practise. Here I would like to refer to a peculiar Vişņu image of Malhar specially, which is earlier and unique for its iconographical features. This yakșa type icon in skilfully exercised with the canons of the iconographical texts. 

In the art history of Dakșiņa Kosala from very beginning a different school of art and sect flourished. An existence of another school of art, parrallel to Gupta art is traced in this region particularly in Malhār and Tālā. Unfortunately there are no corresponding iconographic texts of that period which support the stylistic iconography and architecture of Tālā. Therefore it has been suggested that the demonstration of the discussed deity was based on the Saiva-cult, tantra, ritual and doctrine of the yoga simultaneously. Sculptors were aware of the iconographic texts and were also bounded with the discipline and they could not ignore the tradition, but applied their own imagination supported by mythology and basic story. 

Again I would like to point out that the other characteristic of the deity is that the two Mahā-Nāgas (large snakes) are flanked over its shoulders as a decorative motif and also functioning as a pārsva-rākasaka (body guard). The two other Mahā-Nāgas are shown near the legs in unnatural action. They lower down their heads and lift up the neck towards the face of the deity for obeisance. This interesting depiction of Nāgas is being compared with the particular exercise of yogāsana known as a sarvāngāsana. 

Among the art treasure of Tālā the scholars pay attention only to the said deity. There are other various important unidentified therio-anthropomorphic and other minor icons located on the site and waiting for the discovery of their roles in Indian art. Regarding the mysterious aspects of Tālā including art and architecture, there must be some corresponding text relating to the present and outdated discipline which was the root and which is still unknown. The paradoxical artistic beauty of the sculpture produces mesmeric effect on ones senses and one becomes enraptured and transfixed by the complicated details and they cast a kind of magical and hypnotic spell on the observer. Hence the Indologists should try to search out the discussed imaginary demonstration on the basis of the classical texts, folk rituals and belief. So as to enable us to meet the challenge. 

REFERENCES

1. Puratan, Vol. 1, No. 1 year 1984, pp. 58-61 & 111. 

2. A departmental report of office of the Registering Officer, Arch. & Museums, Bilaspur–A Completition Report of Debris clearance work of Jethani temple Tala Year 1985-1986, (Unpublished); Indian Archaeology-1985-86, A Review, p. 48.

3. A departmental report of the office of the Registering Officer, Arch.& Museums, Bilaspur-A Completition Report of Debris clearance and conservation work of Devarani temple Tala Year 1987-88 (Unpublished)

4. A small variety of the fish which is similar to upper lip in a form and size is described as a ytosî (Proșthī) means a upper lip. The upper lip and a moustache of the deity is formed with the Prosthi (प्रोष्ठी). 
(a) प्रोष्ठी तु शफरी द्वयोः। 
-अमरकोषः, प्रथम काण्डम् वारिवर्ग: 10, श्लोक 18. 
(b) सहस्त्रदंष्ट्रः पाठीनः प्रोष्ठी च श्फरी स्मृता।। 
-हलायुध कोषः तृतीयं पातालकाण्डम्, श्लोक 658.

5. Yaksa, Raksasa, Gandharva and Vidyadhara are generally treated as a Deva Yoni. 
(a) यक्ष राक्षस गन्धर्व सिद्ध किन्नर गुह्यकाः विद्याधराप्सरो भूत पिशाचा देवयोनयः।। 
-हलायुधकोशः प्रथमकाण्डम्, श्लोक 87. 
(b) विद्याधरोप्सरो-यक्ष-रक्ष्यो-गन्धर्व-किंनराः। पिशाचो गुह्यकः सिद्धो भूतो मी देवयोनयः।। 
-अमरकोषः, प्रथमकाण्डम् स्वर्गवर्गः।




शोधादि संदर्भों के लिए मूल ग्रंथ से मिलान अपेक्षित होगा।

Thursday, March 31, 2022

Tālā Icon

पुरातात्विक स्थल ताला गुप्तोत्तर स्थापत्य संरचनाओं वाला स्थल है। डॉ. प्रमोद चन्द्र की प्रेरणा, श्री कल्याण कुमार चक्रवर्ती के मार्गदर्शन में श्री जी.एल. रायकवार द्वारा मेरे सहयोग से हुए पुरातात्विक कार्यों के दौरान ‘रूद्र शिव‘ प्रतिमा की प्राप्ति हुई, जिसके बाद यह विशेष चर्चित रहा। इस एक प्रतिमा पर केंद्रित पुस्तक प्रकाशित हुई। पुस्तक में उच्चकोटि के विभिन्न शोधपत्र शामिल हैं, जिनमें प्रतिमा के अभिज्ञान पर विचार किया गया है। इसमें एक लेख श्री रायकवार का तथा एक मेरा लिखा हुआ, शामिल है। इन दोनों लेखों का विशेष महत्व इसलिए है, क्योंकि इन लेखों में स्थल और वहां हुए पुरातात्विक कार्यों का विवरण है, जिनका अभिलेखन स्थायी संदर्भ के लिए आवश्यक था। इस दृष्टि से, उन दो में से पहला लेख यहां प्रस्तुत है। एक अन्य शोध-लेख यहां है।


Tālā Icon : A Comprehensive Attempt of Its 
Identification 

RAHUL KUMAR SINGH 

I. The site and its vicinity 
The features of the icon under discussion are unmatched, they have neither resemblance with any other sculpture, nor have satisfactory reference in the texts. The unusualness of the icon would be the justified cause that various legends and other unacademic sounding fables are incorporated in this paper. The details of the description appear in the key paper by Dr. Nigam, hence require no further mention, as that paper supplies adequate data. 

Beside, constantly being present, when the major work at Tālā on Devarānī-Jethānī temple was being done, during the period 1986 to 1988, at the site; I personally had a privilege to have a village to village survey of the area in the year 1993. Around 100 villages of the area were surveyed as a part of my official duty, so I had an opportunity to gather information not generally revealed, about the temple-site and surroundings. A few of these pieces of information could prove an aid in the identification of the icon. 

Though the well-known archaeological site of Malhar is not far from Tālā, yet an almost unnoticed site in village Matiārī is located near the confluence of Sivanāth and Arpā rivers. Spatially and temporally the gap is only 25 kms. and a couple of centuries, respectively. It seems to be of 8th Cent. A.D. as is revealed by its sculptural remains. Even after construction of a modern temple on the mound, its antiquity is quite evident. In the same direction about 5 kms. from Tālā, in the village Udantāl, there are brick remains, rubble mound, but for want of antiquities and absence of clear ideas of structure, its period could not be determined. Besides this, after exploiting all the opportunities and approaching the site from all directions except few minor and stray antiquities, only two more ancient sites could be located, but of later period i.e. of 12th and 13th Cent. A.D. They are within 10 kms. viz. Kirarī Gorhi and Dhūmanāth temple, Sargaon. Both are protected monuments of the State Govt. 

The actual revenue-village, in which this site of Tālā is located, is Ameri kāpa. Ameri is common village name in this area. To distinguish this Ameri from others, Kāpa is suffixed. The adjoining village is Amerī akbari. Amerī is derived from Amerā- a tree with sour fruits. (Spondius mangifera) and suffix kāpa- means, hamlet; Akbari- means the area reserved for local malaguzar (of recent past) for his agricultural uses or otherwise. 

This place lies on the left bank of Maniārī at a reasonable height, like many other religious places, there is a belief, that during floods, the river used to touch only the feet of the deity and recede, that is why the temple is never flooded. While the fact is, that when water level increases in the river, it spreads on the right bank, which is relatively low. Right at the temple site, Basantī nullah, meets Maniarī to the North of the Deorani temple. At around 2 kms. South-East of the temple, Maniārī terminates into Sivanāth river. 

The temple site is located away from the village habitation, but it had not been in isolation from human presence. The shepherds, with their herds, farmers with their agricultural activities and commutation through the river bank, had been very common since then. The site was important to the local people, because of their belief in the village deity Siddha-Bāwā, who is existent now in the form of a Siva-linga, in a small modern shrine, lying to the west of the Jethānī temple. The general trend that prevails in this area, is that of faith in divinity, like Baram, Bhairo, Aghorī, Muria, Biratiā, Munī and the like Bāwās. The concept of Bawas, as explained by village priests suggests, ascetic personality, incorporating divine elements. Alongwith the concepts of Siddha-Bāwā, people were aware about the mounds, they use to address the present Jethānī temple as Deur and the Devrānī temple as Devrānī-Jethānī. 

According to local residents the farm land infront of the present Devrānī temple was originally a pond, which existed recently upto fifties and actually gave the site, its name Tālā. Even today the nearby farms are known as Talakhar, i.e. farms with pond. Possibly the site of temples has been raised by the digging of the land nearby. The depressions created as a consequence of digging might have turned into big tank subsequently. To the west of the monuments lies the rocky left bank of the river. On which the signs of excavations are apparent, presumably the stone for construction of the temple came from here. Pond to the East, river to the West, nullah to the North and Jethānī temple to the south being the constrains and limitations, must have played a crucial role in selection of the site for the Devrānī temple. 

Tālā is synonymous to tal or talāb i.e. Tank. But in this area there is no trend of using tāl independently for a name of village, area or tank itself; rather tāl is used as a suffix to village name like in neighbouring village Udantal. In the plains of Chhattisgarh, ponds are abundant. In ancient places of this district like Malhar and Ratanpur the number of ponds is quoted in a legendary manner as-chhah agar chhah korī meaning 6+ (6 x 20) = 126 ponds. Contrary to the feature, in the area of Tālā, there is a lesser number of ponds. 

In early fifties a Sadhu arrived in here, stayed and worshipped Siddha-Bāwā and later settled permanently. At that time the entire area was full of thorny and big trees large and venomous snakes and scorpions. Even on both of the monuments there were large tamarind trees, while the poisonous reptiles still inhabit the area. This sādhu Purnānand Dās was a shepherd and a native of Orissa. He is recalled as Jatāi Bāwā by the local people because of his long locks of hair-Jațā. It is he, who started observing religious occasions, worshipping and distributing prasād-Khichadī on the occasion of Māgh Pūrņima. It started as a durinal affair and graduated into a full grown three day fair. This fair used to be held on the Deur mound i.e. Jethani temple now. 

II. Discovery of the Icon 
The story of finding of this icon dates back to the year 1977-78, when the stairs, entrance and interior of the Deorani temple were cleaned. The unusual iconographic examples that were found or scattered in the premises were arranged, and a pit in the South-East of the out side of the temple was dug, as the site gave a sense of having much more of hidden treasure, this particular icon was only at a few strokes of pike. 

On the 9th of February 1985, the Honorary Advisor, Culture Department, of the Govt. of Madhya Pradesh, Dr. Pramod Chandra visited the site. There were instructions to select a site which would be as significant as to be visited by him, as he had only that day in his hand. On returing to the office he advised that the site of Tālā be of top priority amongst all the archaeological sites of Madhya Pradesh where prospects of exploration were maximum. 

The work on this part started in the second week of January 1988. On removing a few inches of soil the dorsal side of the icon became visible, which at first seemed to be the floor level, but as the work progressed and the sides were exposed, it appeared to be a huge sculpture having flat back, high relief carving, lying ventral side down. the Deoranī temple is East facing with a flight away of steps. This statue was lying on the South of the steps, with its head from them. The carved ventral side was hidden as the flat dorsal side was up. The statue was lying at right angles to the steps and parallel to the front wall of the temple structure. It is intact to a very great extent even though it was lying on a stone base. Had it been an accidental fall of the carved side of the statue on a rocky surface some major breakage would have been quite obvious; which is not there, rather this is the only intact scuplture obtained from the site. The minor breakage, that is seen is due to the long period of its burial and the fragile quality of the stone. Being stratified stone chipping-off has occured in the sculpture at some places. 

The moment of exposure of the back of the statue was much exciting, as this was considered to be the end of the work, while there was much more to do and know. Precautionwise to have a preview of its form, soil was cleaned from all sides. The experienced and careful labourers, which had worked on Jethani temple in the past session were engaged for this task. Besides being skilled in working on carved structure the labourers were also apt in handling massive stones, as there is a stone quarry nearby where they normally work. 

The cleaning of the icon proceeded with much of labour, more of care and most of patience. Each moment during this period was full of excitement. Out of which attempts of realizing the icon by mere touch were being made during lunch-breaks and evenings, as this was appearing to be a very unusual creation on stone, beyond, everyones imaginations. So it was more than difficult to be patient, yet work progressed. Special tools out of strong branches of Gum Arabic were made, which had pencil points and broad blades, due to this no scratches appeared on the sculpture. At this stage, when these fine tools were being used, even Dr. Pramod Chandra, who had revisited the site to witness the progress of the work, accompanied the officers,1 in the cleaning of statue lying on his back, using brush as the work needed a careful and delicate hand. Dr. Pramod Chandra left on 15.1.88 suggesting a few hints for careful erection of the statue. On the next day under the guidelines given by him and previous experience of work, the process of erection began. During work on the site, handling of ancient stone artifacts is safely and effectively carried out, with the help of crow-bars and wooden-batons, as leverage tools, but looking at the stone quality and enormity of statue, chain-pulley was used as secondary device. Instead of depending upon chain-pulley alone, thick ropes were tied to another two places, with jute padding to prevent any damage, ropes were pulled manually, so as to maintain control and balance. Old types, gunny bags as cushion and wooden-batons for support were placed under the statue during its erection to avoid any mis-hap. At last the statue was erected on 17th of January 1988 and placed at its present location. The underlying soil was collected and rubbles in it were sorted, keeping in mind that they could be the part of the statue: The restoration of the statue with the corresponding pieces was taken up soon. 

The Māgh Pūrnimā fair of 1988, fell soon after finding of this icon, that year the gathering in the fair was a record 50,000 plus, pilgrims kept visiting the site, even after dissolution of the fair, one day a middle aged lady, visited the site, she had a familial look at the icon and suddenly started reciting a prayer loudly in local dialect-Chhattisgarhi. In Chhattisgarh extempore odes are composed for praising the God and for lullabyes in which prevailing conditions are interwoven, they are then sung with a typical rythm. This prayer also was an extempore creation which expressed-You have come to rescue us from our misery. Then she described the form including all the creatures of its structural detail. She further added we are happy to receive you and we bow before you and welcome you. 

III. Identification of the Icon 
Immediately, after the icon was erected and positioned, it was tentatively named "Rūdra Siva". Any conclusive identification of the icon has not comeforth in the decade, although attempts of identification are continuously going on from media like news papers, periodicals, to academics like seminars/paper writings on Śaivism, Dakșina Kosala, iconography and contemporary art. It has been widely discussed sculpture all through. Possibilities of finding connection of the icon with Tantra, Navagrahas, the twelve zodiac signs, Dasāvatārs, Viśvarūpa, Pasupatī, Astamūrti, Yakșa and Gaņa also have been explored. On the basis of morphology it has been compared with sculpture of Māndhal, statue of Lung Man caves of China, warrior in Celtic painting, and the Buddhist paintings of Nepal. 

Whatever, attempts have been made uptill now to identify the icon are thoughtful and logical, yet none of them give due consideration to the regional source material. The regional source material may not lead to any decisive inference but it does indicate significant and obvious correlation with Soma-Siddhanta. 

Before, discussing the Soma-Siddhanta, I would like to emphasize on two points. Firstly, interrelation between the creator and creatures, their unity and diversity with reference to Saiva philosophy.2 Various parts and organs of this icon are composed of different creatures. The body form emerges with the support of filling lines, after the placement of these creatures. Thus it seems to me that the icon is akin to the philosophy refered to above. Secondly not only the icon under consideration, but few other statues viz. Gaņeśa, Meșamukh gana, (both are at present stationed at the North of staircase of Deorani temple) were covered by an additional structure of a later period. It is fascinating that a huge figure of an ascetic was also explored lying down on its ventral in front of the door way of Deorani temple. This was used as a step uptill the clearance work.3 It therefore seems that all the happenings were deliberately conducted by the followers of another ideology, which might have been in conflict with the religious sect refered to above. The later sect had occupied this centre. This type of conflict was common in the days of yore. 

A little is known about the Soma-Siddhanta. As no text of this sect is available so far. This sect has been casually cited in various literary works, which also include the Tantras. In short, the Soma-Siddhanta is a part of Lakulisa-Pasupata sect of Śaivism, and is established prior to 2nd Cent. A.D. by one Soma-Śarmā. The position of the sect is too much complicated within Śaivism. It has been either connected with the Āgamika school or with the Tāntric sect. The Soma-sect was often considered as an unorthodox sect, therefore severest warnings were imposed on them (alongwith Laguda, Pasupata and Kāvya). In this connection it is worth while to note that Āgamic and Tāntric Śaivism were the two ends and the Soma-school was intermediary.4 

The Soma-tradition in Dakșiņa Kosala region is refered to, in the Junwani (Malhar) copper plates of Mahāśivagupta Bālārjuna.5 This inscription mentions the ſaiva-Soma tradition, Aşțamūrti Śiva (Eight forms) Rudrah satsasty-anugrahaka (sixty-six incarnations). Lakuliśanath and Somasarma. This inscription records the donation to an Ācharya of Soma-tradition named Bhimasoma, who was a disciple of Tejasoma, and grand pupil of Rudrasoma. Thus Junwani copper plate is one of the earliest epigraphic records which contains not only the Soma-Siddhanta and its Acharyas, but also registers the establishment of Soma-school in Dakșiņa Kosala region. 

The Junwani copper plate is issued by Mahāśivagupta Bālārjuna, a heir of Vaişņava Paņdu family turned Śaiva. He used the epithet Param-Māheśvara, and he renamed his family only as “Somavamas.6' This change in the name of dynasty must have had a special significance. In this connection I would like to refer to Sirpur stone inscription7, in which Nannarāja has been remembered for “filling the earth with the temples of Śiva”. The father of Nannarāja II Tivaradeva was famous for being a follower of Vaişņavism and he has used the Garuda symbol as his royal emblem. In spite of this fact it is fascinating that he is mentioned as 'Mahāśiva' Tivaradeva. All the examples cited above are sufficient8 enough to prove the influence of Śaivism prior to Mahāśivagupta Bālārjuna in the Vaisnava Pandu family. 

The area of Dakşiņa Kosala and adjoining region of Mekala was ruled by the Pandavas of Mekala during the 6th Cent. A.D. Bamhani and Malhar copper plate inscriptions of Surabala mention the name of family as Somavamsa too. The inscription discovered from Malhar refers to Jayeśvar Bhattāraka (Temple of Śiva) and sangamagrām. The name Jayesvar obviously seems to be the name of the God worshipped by Jayabala,10 the first progenitor of the Paņdava family of Mekala. In this connection the Deorānī temple can be assigned coeval with Jayabala11 and an established centre of Saiva-Soma school. Śūrabala, the great grand son of Jayabala made donation to the temple. 

From the available evidences it can be asserted that the Soma-tradition was at the stage of culmination during the reign of Mahāśivagupta Bālārjuna and after whom it went under oblivion as some other cult overtook it. The Soma-Śaiva tradition in Dakşiņa-Kosala can be traced-back at least from the reign of Jayabala and it becomes evident that Soma-Śaiva school was significant in this region, which was considered to be an unorthodox and extreme sect. The unusual features of Tālā seems to be an expression of the same. The icon under consideration is formed in accordance with prescription of Soma-Saiva cult. 

REFERENCES 

*To introduce the site of Tālā, the contributor has discussed the part I & II of this paper in detail, as asked by me. -L.S. Nigam. 

1. The entire work was conducted by Sri G.L. Raikwar and the author. Sri K.K. Chakravarty, I.A.S. was present at the site during the work of session 1987-88. 

2. Please refer the relevant chapter of R.G. Bhandarkar's Vaisnavism, Saivism and other minor religious systems, 1929. 

3. In this connection, it is notable that Jethani temple consist of south faced main entrance, which has an unorthodox indication. 

4. The Soma-Saiva Siddhanta has been discussed by V.S. Pathak in his monograph entitled History of Saiva cults in Northern India from Inscriptions (700 A.D. to 1200 A.D.), 1980. B. Bhattacharya's, Saivism and the Phallic World, 1975; may also be consulted. 

5. G.L. Raikwar and Rahul Kumar Singh, Mahasivagupta Balarjuna Ka 57ve varsh ka Junawani (Malhar) Tamaralekh [In Hindi], Puratan 1994, Vol. 9, pp. 146-47. It is an interesting coincidence that this inscription was came to light, immediately the next day after the Tālā icon was erected. 

6. We are having references in which the dynasty was described as sasikula, sasivamsa, sitansu-vamasa, chandranvaya, sasadharanvaya, see A.M. Shastri's Inscriptions of Sarabhapuriyas, Pānduvamsins and Somavaṁsis, 1995 (hence after referred to as ISPS) Part-I, pp. 132-33. 

7. Ibid., part II no. III:XIII. 

8. In this connection Sirpur hoard of 9 sets of copper plates and Malhar (Bäsin diprā) stone inscription are noteworthy in which other Saivacharyas are mentioned. The text of these inscription was supplied by the author himself to Dr. A.M. Shastri, who has incorporated the material in his book ISPS, Pt. II as ADDENDA. 

9. Ibid., No. II:I and II:II. 

10. Jayeśvara is one of the names of God Śiva and there was a ruler named Jayarāja amongst the Sarabhapuriya dynasty. This and other similar co-relations are used as chronological frame. No independent proposition is intended. 

11. Though K.D. Bajpai has identified Sangamgrām with Tālā and one of the temple as Jayesvar Bhattāraka, but he has not given any firm evidence in support of his views in ABORI (Diamond Jubilee Volume 1977-78), pp. 433-37. 

** The author is thankful to Mr. & Mrs. Joglekar (Vivek and Shubhda) for their cooperation and intellectual participation rendered by them in each stage of drafting the paper.

शोधादि संदर्भों के लिए मूल ग्रंथ से मिलान अपेक्षित होगा।

Tuesday, March 29, 2022

युवा मीत - YuMetta

अपनी बातचीत में युवा पीढ़ी के प्रति न सिर्फ आश्वस्ति, बल्कि बेहतर भविष्य की संभावना व्यक्त करता रहता हूं। यह कोरा आशावाद नहीं है। ऐसा संयोग लगभग लगातार रहता है कि मेरा संपर्क ऐसे युवाओं से होता है।

पिछले सप्ताह युवाओं से बातचीत के एक कार्यक्रम में गया। YuMetta Foundation संस्था के Go To The People Camp CHHATTISGARH में Journey Outwards के अंतर्गत मेरे लिए Understanding-accepting-editing system of relationships पर बात करना निर्धारित किया गया था। बताया गया कि प्रतिभागियों के लिए एक कैम्प Journey Inwards हो चुका है।


सत्र में लगभग 30 युवा और 10 आयोजक सदस्य थे। मेरे लिए उपलब्धि की तरह था कि परिचय आदि के बाद सुबह 10 बजे से शाम 6 बजे तक लगातार प्रतिभागियों का साथ रहा। भोजन और चाय अंतराल के दौरान भी सत्र से जुड़ी अनौपचारिक चर्चा होती रही। आठ घंटे लगातार एकल वक्ता की भूमिका में, आयोजक सदस्यों के सहयोग से, सत्र पूरा करना सहज संभव इसलिए हुआ कि प्रतिभागी पूरे मन से जुड़े रहे। सवाल, जिज्ञासा, संदेह, आपत्ति करते रहे और मेरी बातों के साथ इत्तिफाक-नाइत्तिफाकी रखते पूरक जानकारी जोड़ते रहे।

सत्र में मैंने मुख्यतः जो बातें कहीं-


* पहले कैम्प में आप अंतर्मुख यात्रा का कठिन रास्ता तय कर चुके हैं, आगे बहिर्मुख यात्रा का रास्ता उसकी तुलना में आसान है, मगर उसमें आने वाली कठिनाइयों को नजरअंदाज नहीं करना है, उन्हें तलाशना है, जिसमें स्थिति के साथ निदानात्मक सामंजस्य बना सकने का आत्मविश्वास हो, उसके लिए कठिनाई को देख पाना और उसे सुलझाने की नीयत और तैयारी के साथ निर्वाह संभव होता है।कहा गया है, दूसरों को समझ लेना ज्ञानी का काम है। स्वयं को समझना प्रदीप्त होना है।

* ध्यान रहे नायक, अगुवा वही होता है, जो पहल करता है और समावेशी होता है। Leadership> initiation+inclusion.

* अपनी पहचान, अपने अभ्यस्त संदर्भों से अलग हटकर संभव है तो अपने परिवेश की पहचान अपने असपास के सभी संदर्भों के अवलोकन से। 

* ‘बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो, बुरा मत कहो‘ का पालन करें, मगर तटस्थ अवलोकन के बाद बुरा-भला तय करें, सिर्फ इसलिए कि बुरा है मान कर आंख, कान, मुंह न बंद कर लें। न ही अच्छा है तय कर आकर्षण में पड़े।

* खुद को पसंद करना और खुद पर भरोसा जरूरी है, मगर आत्म-मुग्ध हो कर आत्मकेंद्रित होने से बचें।

* आप खुद को पसंद करते हैं, मां के हाथ बना खाना पसंद है। अपना परिवार, रिश्तेदार, मित्र प्रिय है तो आप में पसंदगी का गुण है फिर आप परिवेश की निर्जीव वस्तुओं, सजीव वस्तुओं- पेड़-पौधे, जीव-जंतु/ गांव, समाज, इर्द-गिर्द घटित हो रहे से ले कर देश-दुनिया और उसके आगे की भी हलचल पर नजर रखते अपनी पसंद विस्तारित कर सकते हैं।

* स्वभाव (nature) से कोई सही-गलत, अच्छा-बुरा नहीं होता, उसे बदलने की न सोचें, न प्रयास करें। प्रत्येक व्यक्ति अपने मूल स्वभाव के अनुरूप समाज में संतुलित व्यवहार करते हुए उपयोगी और आवश्यक है। व्यवहार (behaviour) भी सही या गलत नहीं होता, बदलता रहता है और परिस्थितियों के संदर्भ में उपयुक्त या अनुपयुक्त हो सकता है, अतएव लचीला हो।

* मन तो अंतरा ही होता है, उसे बार-बार स्थायी पर लाना होता है। अंतरा, मन के भाव हैं और स्थायी, आचरण। अंतरा, जिसमें आचरण से अलग अंतरंग मन की झलक हो। 

* अपनी खुशी के मालिक आप स्वयं बने। व्यक्ति में हंसने और रोने की क्षमता है, परिस्थिति के अनुरूप दोनों आवश्यक भी है। परिस्थितियों पर अवसर अनुरूप किंतु स्थायी निर्भरता अपनी क्षमता पर हो। दिव्यांग, अपने वांछित लक्ष्य प्राप्त कर सकता है फिर सर्वांग क्यों नहीं!

* आंख और कान, अक्रिय और सक्रिय अवलोकन के लिए मुख्य ज्ञानेन्द्रियां हैं। हमारी शारीरिक अनिवार्यता हमारी अनैच्छिक मांसपंशियों के जिम्मे है और ढेर सारी प्रतिक्रियाएं प्रत्युत्पन्न। ज्ञानेन्द्रियों से एकत्र सूचना, मन-मस्तिष्क-विवेक से कर्मेंन्द्रियों को संचालित करती है।

* लक्ष्य-सोच, अपने परिवेश से आरंभ कर समाज के अंतिम व्यक्ति तक। जिस परिवेश-समाज के हम सदस्य हैं, वहां की विसंगति-समस्या, वहां जो कमजोर-लाचार है, वह हमारी प्राथमिकता है।

* तात्कालिक प्रतिक्रिया और निष्कर्ष, आवश्यक हो तभी अन्यथा स्थिति का आकलन - मूल कारण - तात्कालिक कारण तथा उसका तात्कालिक - दीर्घकालिक परिणाम का विचार करें।

* प्राकृतिक विज्ञान में कार्य-कारण संबंध होते हैं, मगर सामाजिक विज्ञान में स्थिति के विभिन्न कारक होते हैं। कई बार मुख्य कारक ओझल से होते हैं और गौण कारण उभरे दिखाई पड़ते हैं, उन्हें ठीक ठीक पहचानने का प्रयास होना चाहिए।

* सामान्यतः भूत कारक, भूगोल और इतिहास की पृष्ठभूमि में होते हैं। वर्तमान कारक, आर्थिक, राजनैतिक और सामाजिक होते हैं तथा भविष्यत कारक वैचारिक, धार्मिक, नैतिक, आस्था और विश्वासगत होते हैं।

* व्यक्ति-स्थिति के नकारात्मक को, स्थिति की समस्या को पहचानना, नकारात्मक दृष्टिकोण मान कर उपेक्षणीय नहीं, बल्कि आवश्यक है किन्तु सकारात्मक अंश को रेखांकित कर उभारने, सक्रिय करने का प्रयास श्रेयस्कर और आवश्यक होता है।

* प्राथमिकताओं का निर्धारण और निराकरण, सामाजिक व्यवस्थागत विसंगतियां। समस्या के लिए पूर्वानुमान, सावधानी, आवश्यक संसाधनों का आकलन, उपलब्धता तथा समस्या के निदान, उपचार और स्थायी निराकरण की समग्र दृष्टि आवश्यक है।

* ऐसी कई बातों की चर्चा के साथ छत्तीसगढ़ को उदाहरण बना कर, उसका इस समग्रता की दृष्टि से परिचय कि किस प्रकार किसी अंचल का भूगोल, मानविकी, शासन व्यवस्था, अर्थशास्त्र, राजनीति, प्रशासन और उसके भविष्य के स्वरूप को निर्धारित करने वाले कारक होते हैं।


सत्र के दौरान मैंने महसूस किया कि वर्तमान और भविष्य की चिंता इन युवाओं को हमसे अधिक है, लेकिन उसमें निदान और निराकरण की संभावना देखने और उद्यम कर सकने का सामर्थ्य है। वे अपने भविष्य/कैरियर की वैकल्पिक संभावना के लिए भी तैयार हैं। हमें तब तक परेशान होने की जरूरत नहीं है, जब तक हम उनके साथ हैं, वे हमारे साथ हैं और हम भी उनकी तरह, उनके नजरिए से समाज और दुनिया की हर ऐसी कमी और जरूरत को देख पा रहे हैं, जिससे मुकाबिल होने का उत्साह उनमें है साथ ही दुनिया को बेहतर कर सकने का जज्बा भी।

Monday, March 28, 2022

सरगुजा - कुन्तल

सरगुजा अंचल की संस्कृति पर डा. कुन्तल गोयल का लेखन महत्वपूर्ण रहा है। राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में उनकी रचनाएं प्रकाशित होती रही हैं। यहां प्रस्तुत उनका लेख ‘मध्यप्रदेश संदेश‘ पत्रिका में प्रकाशित हुआ था। लेख के साथ परिचय दिया गया है कि ‘‘प्रस्तुत लेख में सरगुजा जिले की वन-सम्पदा पर विस्तार से जानकारी दी है. वहीं वृक्षारोपण की ओर भी संकेत किया है. इसके साथ ही सरगुजा जिले का ऐतिहासिक संदर्भ भी प्रस्तुत किया है.“



इतिहास के पृष्ठों को समेटे
सरगुजा की वनश्री

सरगुजा जिले का प्राकृतिक एवं सुरम्य सौन्दर्य सदैव से प्रकृति प्रेमियों के आकर्षण का केन्द्र रहा है. आकाश छूते हरे-भरे पत्तों से लकदक सघन साल वन और उनसे झरती रोशनी का सम्मोहन, खिलते हुए पलाश, रस भरे महुये और दूर-दूर तक फैली उनकी मधुर मादक गंध, खिल-खिल करते गुलमोहर, गगनचुम्बी वृक्षों की सघन पातें, मध्य में हरियाली से आच्छादित पर्वत श्रेणियों से घिरे वर्तुलाकार समतल भूरे मैदान, कहीं-कहीं एक भयावह मायाजाल की अनुभूति देता अभिनव सौन्दर्य, वन्य पशुओं की गर्जन-तर्जन के बेधक स्वर- सचमुच ही सरगुजा जिले के ऊंघते अनमने वनों को एक निराली रहस्यमयता प्रदान करते हैं. साथ ही सुरम्य और रमणीक साल वन ने उनकी रूप-छवि में श्रीवृद्धि कर उसे “स्वर्ग“ बना दिया. वर्ष में संभवतः कुछ ही दिन ऐसे होते हैं जब साल वृक्ष पत्रविहीन होता है. जब इन वृक्षों में नये पुष्प खिलते हैं तब लालिमायुक्त फूलों का आकर्षण दूर से ही हमारी दृष्टि-परिधि को बांध लेता है और मन तरंगित हो उठता है. इन वनों के कारण ही सरगुजा का ग्रीष्मकाल अत्यन्त शीतल रहता है और उसकी रातें बड़ी सुहावनी और मादक होती है. स्वर्गिक विलास के ये अभिन्न सहचर सरगुजा के ये सघन वन और उसका सौन्दर्य अपने आप में एक ऐसा तिलस्म है जिसे देख पाना आसान नहीं है.

यहां की धरती अरबों टन कोयला से समृद्ध है जो इन्हीं वनों की देन है. सरगुजा यदि लम्बे काल तक बाह्य आक्रमणों से सुरक्षित रहा तो उसका एक प्रमुख कारण यही रहा कि सघन साल वनों की ढाल ने उस पर शत्रुओं की नजर नहीं लगने दी. महाकान्तर कहलाने वाले जिस सघन और विशाल वन का उल्लेख उत्तर और दक्षिण भारत के बीच एक विभाजक रेखा के रूप में प्राचीन काल से स्वीकार किया जाता रहा है, सरगुजा के वन उसी का अभिन्न अंग हैं. यद्यपि महाकान्तर जैसी गहनता अब नहीं रह गई है तथापि सरगुजा का सौन्दर्य उसके सघन वनों और उनमें विचरण करने वाले विविध वन्य प्राणियों में आज भी सुरक्षित है.

सरगुजा के साल वन अनेक चिर-स्मरणीय घटनाओं के साक्षी रहे हैं. वे अपने क्रोड़ में न केवल धार्मिक एवं ऐतिहासिक स्थलों को संजोये हुए हैं वरन् पौराणिक आख्यानों के साक्ष्य भी प्रस्तुत करते हैं. पीढ़ियों से इन वनों ने जन-जीवन की गतिविधियों को प्रभावित किया है तथा भारतीय संस्कृति के उन्नयन में उनका प्रेरक योगदान रहा है.

प्राचीन काल में सरगुजा अंचल “दण्डकारण्य“ के अंतर्गत समाविष्ट था. दण्डक के नामकरण के संबंध में यहां एक किंवदन्ती प्रचलित है- कहा जाता है कि एक बार भारी दुर्भिक्ष पड़ने पर सभी ऋषियों ने अपने आश्रमों का त्याग कर महर्षि गौतम के आश्रम में शरण ली. दुर्भिक्ष की समाप्ति पर जब ऋषिगण प्रस्थान हेतु उनसे विदा मांगने आये तो महर्षि ने उनसे वहीं रहने का अनुरोध किया. ऋषियों ने यह स्वीकार तो कर लिया पर उन्होंने मुक्त होने के लिये एक मायावी गाय की रचना की और उसे एक खेत में खड़ा कर दिया. जब महर्षि उसे भगाने के लिये गये तो वह गिर कर मर गई. ऋषियों ने अनुकूल अवसर पाकर गौ-हत्या का पाप लगाया. महर्षि ने अपने योग बल से वस्तु स्थिति की सत्यता भांप ली और ऋषियों को यह श्राप दिया- तुम जहां भी जाओगे, वह स्थान नष्ट-भ्रष्ट होकर वनस्पतियों से विहीन हो जायेगा. तभी से यह स्थान “दण्डकारण्य“ या “दण्डक वन“ नाम से विख्यात हुआ. कहा जाता है कि भगवान राम के दण्डकारण्य में प्रवेश करने पर उनके चरण-स्पर्श से यह क्षेत्र श्रापमुक्त होकर पुनः सौन्दर्यश्री से समृद्ध हुआ.

भगवान राम ने अपने वनवास की कुछ अवधि सरगुजा के इन्हीं सघन वन कांतरों में व्यतीत की थी. जिस पर्वत पर उन्होंने आश्रय लिया था वह पर्वत आज भी उनके कारण “रामगढ़“ या “रामगिरि“ के नाम से विख्यात है. उनके चरण-स्पर्श से यह स्थल हरितिमायुक्त सौन्दर्यश्री से मण्डित हुआ. इसका उल्लेख गोस्वामी तुलसीदास की इन पंक्तियों में भी हुआ है-“दंडक पुहुमि माय परस पुनीत भई उकटे विटप लागे फूलन फलन.“ यहीं पर वह मतंग वन जो अपनी गोद में मातिन पर्वत को समाये हुए है. बाल्मीकि रामायण में भी अनेक स्थलों पर साल वनों का उल्लेख मिलता है. भगवान राम की विशाल मनोहर पर्णकुटी साल पत्तों से ही आच्छादित की गई थी. प्रयाग से चित्रकूट जाने वाला मार्ग भी साल वनों से ही सुशोभित था. कहा जाता है कि भरत की सेना को देखने के लिये लक्ष्मण पुष्पित साल वृक्ष पर चढ़े थे. ये सभी प्रसंग सरगुजा के साल वनों की समृद्धि को रेखांकित करते हैं. यह एक आश्चर्य है कि इस अंचल में आज भी 120 फुट तक आकाश की ऊंचाई छूने वाले साल वृक्षों का सौन्दर्य नितान्त उनका अपना ही है।

सरगुजा के इन्हीं साल वनों में आर्य संस्कृति के प्रचार-प्रसार की दृष्टि से अनेक आर्य ऋषियों ने अपने आश्रमों की स्थापना की थी और आजीवन वहां निवास किया था. रामगढ़ पर्वत पर विद्यमान महामुनि वशिष्ठ का आश्रम आज भी दर्शनीय है. शरभंग, सुतीक्ष्ण आदि ऋषियों के आश्रम भी इन्हीं वनों में थे जहां भगवान राम ने ऋषियों को संत्रस्त करने वाले क्रूर राक्षसों के विनाश की कठोर प्रतीज्ञा ली थी. राक्षसों के बध का प्रमाण यहां का “रकसगण्डा“ नामक वह स्थल है जो राक्षसों की हड्डियों के ढेर के कारण अपने नाम को सार्थक करता है.

महाभारत काल में पाण्डवों ने अपना अज्ञातवास इन्हीं सघन वनों में व्यतीत किया था. उन्हें खोजते हुए कौरव भी इस जनपद में आये थे. कहा जाता है कि कौरवों और पाण्डवों के सम्पर्क से यहां की स्त्रियों को जो सन्तानें उत्पन्न हुई, वे आज भी अपने को “कौरवा“ और “पाण्डो“ कहती हैं तथा कौरव-पाण्डवों को अपना वंशज मानती हैं. ये जातियां बड़ी धनुर्विद, युयुत्सु और दर्पीली हैं कुछ वर्षों पूर्व सरगुजा रियासत में कौरव जाति का इतना आतंक था कि बाहर से पाने वाले यात्री को वे सहज ही लूट लिया करते थे. इस संबंध में यह किंवदन्ती प्रचलित है कि यदि शेर से वे बच भी गये तो कोरवों से बच पाना उनके लिये नितान्त असम्भव था. यहां एक दिलचस्प बात यह है कि ये जातियां भारत के किसी अन्य स्थान में नहीं पाई जाती. यह तथ्य भी उल्लेखनीय है कि महाभारतकालीन विराट नगर सरगुजा के सीमावर्ती शहडोल जिले में स्थित सोहागपुर क्षेत्र है जहां से उन्होंने सरगुजा के सघन वनों में प्रवेश कर अपने को अज्ञात रखा था.

जैन और बौद्ध धर्म का प्रभाव भी इस वन्यांचल पर कम नहीं पड़ा. यहां की जोगीमारा गुफा में प्राप्त तीर्थकर का भित्ति चित्र तथा पहाड़ी पर स्थित मंदिर में जैन तीर्थकरों के चिन्ह जैन धर्म के प्रभाव के साक्ष्य हैं. कहा जाता है कि ये कलिंग नरेश खारवेल के समय के हैं जो जैन धर्मावलम्बी था. सरगुजा में प्राप्त बौद्धकालोन अवशेषों की अपनी कहानी है. भगवान बुद्ध ने अपने अनुयायियों को अपने जीवन काल में पांच वृक्ष लगाने और उनका पांच वर्ष तक संरक्षण करने का उपदेश दिया था. इसके पीछे यह व्यावहारिक सत्य था कि जहां वन हैं वहां जल है, जहां जल है वहां अन्न है और जहां अन्न है वहां जीवन है. डा. शूमाखर ने भी अपने “बौद्ध अर्थशास्त्र“ में लिखा है- “जब तक भारत में पेड़ लगाने और उनका पोषण करने की बौद्ध परम्परा प्रचलित रही, न कभी अकाल पड़ा, न कभी सूखा. बाढ़ें भी नहीं आती थी.“ इस कथन की सत्यता इस काल में यहां चरितार्थ हुई. आज भी सरगुजा में बौद्धकालीन अवशेष सघन वनों के मध्य पाये जाते हैं. प्राकृतिक वैभव से सम्पन्न यहां का मैनपाट बौद्धकालीन गुफाओं एवं मठों के लिये सर्वप्रसिद्ध है. कहा जाता है कि चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भारत यात्रा के दौरान कुछ समय यहां भी व्यतीत किया था. यहां के हरचौका, ग्राम में बौद्ध भिक्षुत्रों के जो 18 मठ मिले हैं. वे सब सुरम्य वनों के मध्य ही स्थापित हैं. सरगुजा के बौद्धकालीन अवशेष वनों के प्रति अपने आत्मीय भाव का परिचय देते हुए यहां की प्राकृतिक सम्पदा को श्रीवृद्धि ही नहीं कर रहे वरन् अपनी बौद्ध परम्परा का भी निर्वाह कर रहे हैं.

सरगुजा के इन वन प्रान्तरों ने हमारी बौद्धिक चेतना को जाग्रत कर हमारी अनुभूतियों का भी सिंचन किया है. आदिकवि बाल्मीक ने अपनी रामायण में सरगुजा के साल वनों की महिमा गाई है. महाकवि कालिदास ने रामगढ़ पर्वत के चारों ओर प्राकृतिक सुषमा और अभिनव सौन्दर्य से प्रभावित होकर राम की विरहावस्था का संकेत लेकर अपनी अमर कृति “मेघदूत“ की रचना की. उन्होंने अपनी प्रिया के विरही यक्ष को सघन छायादार सुशीतल वृक्षों से शोभित इसी रामगिरि में निवास कराया है. भवभूति का “उत्तर रामचरित“ भी यहां की वनश्री के विविध सौन्दर्य छवियों से रूपायित है.

सरगुजा के इन्हीं वनांचलों ने बड़े स्नेह से पशु-पक्षियों को भी आश्रय दिया है. यहां के आदिवासी वृक्षों के ही नहीं वनचरों के भी सहचर रहे हैं. देशी राज्य सरगुजा अपने राज्य काल में विविध वन्य पशुओं का समृद्ध आश्रय स्थल था. यहां के वन शेर, हाथी, चीता, गेंडा, जंगली भैंसा, हिरण, बारहसिंगा, बराह तथा विभिन्न प्रकार के मनोरम पशु-पक्षियों से सुशोभित रहे हैं. शेरों की यहां कई जातियां उपलब्ध थीं. विश्व प्रसिद्ध सफेद शेर मोहन सबसे पहले सीधी-सरगुजा क्षेत्र में ही देखा गया था. चीता नामक शेर की जो नस्ल समाप्त हो गई है, वह यहां 1932 तक जीवित रूप में देखा गया था. कहा जाता है कि रियासत काल में यहां शेरों को संख्या इतनी अधिक थी कि प्रवासियों का इनसे बचकर पा पाना असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य था. इस संबंध में यह लोकोक्ति अत्यन्त प्रचलित थी- “जहर खाय न माहुर खाय, मरे का होय तो सरगुजा जाय.“ आशय यही है कि मरने के लिये जहर खाने की आवश्यकता नहीं है. सरगुजा के हिंस्र पशु ही इसके लिये पर्याप्त है.

सरगुजा के वन प्रान्तर गज-यूथों के लिये भी सुप्रसिद्ध रहे हैं. यहां यह तथ्य उल्लेखनीय है कि प्रत्येक वर्ष विजयादशमी के अवसर पर हाथियों का भव्य जुलूस निकाला जाता था, ऐसी भव्यता कम ही रियासतों में देखने को मिलती होगी. स्वाधीनता संग्राम के अंतिम दिनों में महाराजा रामानुजशरण सिंह देव ने अपनी सेना से 100 हाथी महात्मा गांधी के आयोजन को सफल बनाने के लिये रांची भिजवाये थे. महाराजा द्वारा यहां के हाथी पन्ना, छतरपुर, ग्वालियर, झांसी, आदि बुन्देलखण्ड के महाराजाओं को भेंट स्वरूप भी दिये जाते थे.

सरगुजा के महाराजा विश्व के माने हुए शिकारियों में से एक थे. उन्हें जिम कार्बेट से भी सौ गुना बड़ा शिकारी माना जाता है. वनराज के लिये उनका एक ही अचूक निशाना पर्याप्त होता था. उन्होंने अपने जीवन काल में 1300 शेरों का शिकार कर विश्व कीर्तिमान स्थापित किया था. आज भी महाराजा द्वारा शिकार किये गये अनेक नखी एवं खूंखार वन्य प्राणियों के अवशेष “सरगुजा पैलेस“ में देखे जा सकते हैं. रियासत काल में यहां प्रति वर्ष 20 से 30 शेर मारे जाते थे और 40 वर्षों तक निरन्तर शेरों का इस तरह शिकार किये जाने पर भी उनकी संख्या कम नहीं हुई. इसका एक कारण यही रहा है कि यहां के सघन वनों में उतने शेरों की परवरिश करने की क्षमता थी. यहां कभी मनोरंजन के लिये निरीह पशुओं का शिकार नहीं किया गया. यही वह क्षेत्र है जहां लुप्तप्राय पैंथर का अंतिम शिकार 1932 में किया गया था. इन वन्य पशुओं के अतिरिक्त यहां के वन मयूर नृत्यों से शोभित, कोकिलों की कूक से गुंजित विविध मनोहारी पक्षियों से ही दर्शनीय नहीं है वरन् यहां के लोक गीतों में वे संस्कृति के समृद्धशाली तत्वों के रूप में भी अवतरित हुए है.

सरगुजा एक आदिवासी बहुल क्षेत्र है और यहां के आदिवासी बीहड़ एवं घने वनों क मध्य स्थित छोटे-छोटे ग्रामों में निवास करते ह यहां की आदिवासी संस्कृति मूलतः वन्य संस्कृति है. गौंड, शबर, निषाद, उरांव आदि जातियां यहां के वनों से अभिन्न रूप से जुड़ी हुई हैं. ये वन इनके सामाजिक, धार्मिक एवं आर्थिक जीवन का आधार हैं. वृक्षों से इनके जीवन का लालन-पालन होता है. इनके फल-फूल इनके जीवनयापन के ही नहीं इनकी श्रृंगारिक अभिरुचियों को भी सन्तुष्टि प्रदान करते हैं. इस तरह वन, वन्य पशु और वनवासी प्राकृतिक समग्रता के अंग हैं. वृक्षों में ये अपने कुल देवता के में निवास मानते हैं. अपने शांत, सुखद और समृद्धपूर्ण जीवन के लिये वे इनकी विधिवत पूजा अर्चना करते हैं. अपनी धार्मिक मान्यताओं के कारण ये देवी-देवताओं को भेंट करने के लिये छोटे-छोटे उपवन लगाते हैं जिन्हें “सरना“ कहा जाता है. यह स्थान अत्यंत पवित्र और पूज्य माना जाता है तथा पीढ़ी दर पीढ़ी इसे सुरक्षित रखा जाता है. सरगुजा में सरना प्रथा प्रचलित होने के कारण यहां के वनों को अनजाने संरक्षण मिलता रहा है. साल, महुआ, बड़, पीपल, आंवला आदि वृक्ष इनके जीवन में इतने रच बस गये हैं कि ये उनके लिये उपास्य देव बन गये है. आर्य संस्कृति से प्रभावित इनकी मान्यता के अनुसार वट तथा पीपल की जड़ में ब्रह्म देवता का निवास माना जाता है. सन्तान प्राप्ति के लिये स्त्रियां वट तथा आंवला वृक्ष की पूजा करती हैं. महुआ में महुआ देव का में निवास माना जाता है तथा नीम वृक्ष में आदि शक्ति देवी का पवित्र निवास मानकर बड़ी श्रद्धा से उसकी पूजा-अर्चना की जाती है. नीम, पीपल, वट आदि पवित्र वृक्षों के चारों ओर चबूतरा बनाकर ध्वजा स्थापित कर बड़े विधि-विधान के साथ आदिवासी स्त्री और पुरुष अपनी भावनाओं को अर्पित करते हैं. और इनसे आशीर्वाद की कामना करते हैं. ये वृक्ष, ये वन इन वनवासियों के लिये अपने ही जैसे सजीव और हितकारी हैं. इन वृक्षों की महत्ता इनके लिये सामाजिक कार्यों में भी कम नहीं है. जिस लड़की के विवाह अधिक कठिनाई आती है या जिसका विवाह होता ही नहीं है, उसका विवाह कपड़े में लिपटी महुये की लकड़ी से कर दिया जाता है. इसके बाद उस लकड़ी को वन में किसी वृक्ष से बांध दिया जाता है. जो भी व्यक्ति सर्वप्रथम प्राकर उसे बन्धन मुक्त करता है, उससे उस लड़की का विवाह कर दिया जाता है.

हमारे वेदों और ऋषि मुनियों ने वृक्ष संवर्द्धन को “स्वर्ग का द्वार“ निरूपित किया है. इतिहास की सांस्कृतिक धरोहर के धनी सरगुजा के ये साल वन आज संकट के दौर से गुजर रहे हैं. हम आज उस दिन की प्रतीक्षा कर रहे हैं जब हर सरगुजावासी साल वनों के गौरवपूर्ण इतिहास से गुजर कर सम्राट अशोक की तरह कह सकेगा- “रास्ते पर मैंने वट वृक्ष रोप दिये हैं जिससे मनुष्यों और पशुओं को छाया मिले. अमराइयां लगाई हैं जो फल दें.“ यदि हम ऐसा कर सके जो निश्चित ही सरगुजा कल की तरह आज भी स्वर्ग की सार्थकता सिद्ध कर सकता है.