मेरी शतकीय पोस्ट, मेरे सैकड़ा फालोअर, सौ पार टिप्पणियां, ऐसा कुछ भी नहीं है इस पोस्ट के साथ, इसलिए यह क्या खाक पोस्ट, यह तो अपोस्ट है, लेकिन अपनी है इसलिए मान लिया कि 'अ' जुड़कर, पोस्ट से एक कदम आगे है, सो आगे बढ़ें। पोस्ट, फालोअर, फीड बर्नर पाठक, टिप्पणी के शतक और विजिट संख्या पर पोस्ट लगाने का चलन रहा है। हिंदी ब्लागिंग के उज्ज्वल भविष्य को देखते हुए आशा की जा सकती है कि आने वाले समय में अर्द्धशतक पर और दशक पर भी पोस्ट लगा करेगी। गहन चिंतन कर रहा हूं मैं। सिर खुजाने की मुद्रा से आगे, ठुड्ढी पर हाथ देने की नौबत आने लगी है।
मुझ चिंतित-भ्रमित जिज्ञासु की मुलाकात ब्लागाचार्य पं. चतुरानन शास्त्री 'दशरूप' जी से हो गई। उन्होंने समझाया कि जमाना क्रिकेट का है, देखते हो क्रिकेट का क्रेज, हर रन पर रिकार्ड और रन न बने तो भी रिकार्ड। इसी तरह हर पोस्ट रिकार्ड और पोस्ट न लिखो तो भी पोस्ट। आगे आने वाले कुछ दिनों में कोई पोस्ट न लिखनी हो तो उसकी पोस्ट। कुछ दिनों का अंतराल रहा तो उस पर पोस्ट, लौटे तब तो पोस्ट की बनती ही है, उसकी गिनती भी ब्लाग पेज पर और चर्चा-वार्ता, संकलक मंच पर भी। क्यों न रहे रिकार्ड इनका। रिकार्ड न रखने के कारण ही हम पिछड़ जाते हैं। आंकड़े तो जरूरी हैं, जनगणना से मतगणना तक। इसी के दम पर चलती है देश-दुनिया। चांदनी की ठंडक और उजास, नदी की धारा, फूलों का रंग और खुशबू, बच्चे की खिलखिलाहट, मुंह में घुलता स्वाद सब डिजिटलाइज हो रहा है और अब तो तुम्हारा अस्तित्व ही यूआइडी का अंक होगा। लगता है अपनी परम्परा का ढाई आखर का प्रेम भी याद नहीं तुम्हें।
निजी आक्षेप होता देख, हम भी उतारू हो गए और बात का रूख मोड़ना चाहा। पूछा- लेकिन ब्लाग पर रोज-ब-रोज पोस्ट, सार्थकता..., औचित्य..., स्तर..., विषय कहां से आएंगे। थोड़ा चिढ़ाया भी, तुकबंदी नमूना बात कह कर कि-
यहां अखबारी खबरों की तरह रोज इतिहास बन रहा है,
और महीना बीतते-बीतते हर महान रद्दी में बिक रहा है।यहां अखबारी खबरों की तरह रोज इतिहास बन रहा है,
वे पहले तो उखड़े, नश्वरता का सिद्धांत निरूपित किया, फिर धारा-प्रवाह शुरू हो गए। ब्लागर के लिए हर दिन नया दिन, हर रात नई रात होनी चाहिए। अंतःदृष्टि, चर्म-चक्षु और मोबाइल कैमरे की आंख, बस, अगर प्रतिभा हो तो दिन भर में एक पोस्ट तो बनती ही है। ब्लागरी का सार्थक जीवन व्यतीत करते, दृष्टि-संपन्न ब्लागर के लिए ऐसा दिन हो ही नहीं सकता, जो पोस्ट-संभावनायुक्त न हो। घर से बाहर निकलो तो पोस्ट, घर में ही बने रहो तो पोस्ट। जिस तरह मछली अपने तेल में ही पक सकती है वैसे ही कुछ न हो तो ब्लाग, ब्लागर, ब्लागरी, ब्लागर सम्मेलन, ब्लागर मिलन या टिप्पणियों और पोस्ट पर भी तो पोस्ट बनती है। फिर भी कसर रहे तो जयंती, जन्मतिथि, पुण्यतिथि, श्रद्धांजलि, बधाई, शुभकामनाएं, और कुछ नहीं तो पता कर लो साल के 365 में 465 नमूने के डे होने लगे हैं आजकल...। निरर्थक प्रश्नों में मत उलझो, वृथा ही दिग्भ्रमित होते हो। बस, अंतर्जालीय महाजाल के असीम को असीम से पूर्ण करते चलो। ब्लाग साहित्य का भंडार समृद्ध करो, तथास्तु।
हम तो यों ही अपना ब्लाग पेज बना कर कभी-कभार, नया-पुराना कुछ डालते रहे हैं। लगा कि ब्लागरी के ऐसे संस्कार नहीं मिल पाए हमें, क्या करें। लेकिन यह समझ में आया कि ऐसे ब्लाग, जिसके फालोअर या फीड बर्नर पाठकों की संख्या चार-पांच शतक पार हो, ऐसी पोस्ट, जिस पर टिप्पणियां सैकड़ा पार करती हों, अथवा पेज विजिट हजार से अधिक हों, (चाहे जितने आरोप लगते रहें लेन-देन, खुजाल-खुजाई के) इससे हिंदी ब्लॉगिंग के भविष्य का संकेत मिल सकता है और इतिहास की तस्वीर साफ हो सकेगी। ब्लागाचार्य जी के इस 'पोस्टमार्टम' का असर है, अपोस्ट जैसी यह ब्लागरी पोस्ट, उन्हीं को समर्पित..., तेरा तुझको सौंपता...।
पुनश्च- विशेषज्ञों ने टिप्पणियों का परीक्षण 'दाढ़ी में तिनका' तर्ज पर करने का आश्वासन दिया है।
