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Tuesday, July 20, 2021

शीर्षक

साहित्य में शीर्षकों का स्थान

पिछले दिनों एक चुटकुला पढ़ने में आया था- एक लेखक महोदय अपने मित्र से अपनी नई कृति के शीर्षक के लिये सलाह मांगते हैं। मित्र महोदय लेखक से प्रश्न करते हैं इस उपन्यास में ‘ढोल‘ शब्द है, लेखक सोचकर जवाब देते हैं- ‘नहीं‘ और ‘मंजीरा‘ मित्र पूछते हैं ‘नहीं‘ लेखक फिर कहते हैं। तब शीर्षक रख दो ‘न ढोल न मंजीरा‘, मित्र महोदय ने सुझाया।

शीर्षक की समस्या ने सचमुच छोटे लेखकों से बड़े साहित्यकारों तक को उलझन में डाला है। संभवतः इसीलिए शेक्सपीयर ने अपने एक नाटक का शीर्षक दिया था ‘एज यू लाईक इट‘ (जैसा तुम चाहो) और यह परेशानी पदुमलाल पुन्नालाल बख्शीजी के सामने भी रही होगी तभी तो उन्होंने अपने एक लेख का शीर्षक दिया था- ‘क्या लिखूं‘।

शीर्षकों की माया प्राचीन काल से ही रही है। प्राचीन साहित्य मे शीर्षकों की परंपरा में शीर्षक के साथ कभी ‘रासो‘ जोड़ा गया, कभी ‘अध्यायी‘ कभी ‘सागर‘ और ‘समुद्र‘ की परंपरा रही तो कभी संख्या-वाचक शीर्षकों की, जैसे ‘वैताल पचीसी‘, सिंहासन बत्तीसी‘, हनुमान चालीसा आदि।

आधुनिक काल में शुक्ल-युग तक तो संभवतः शीर्षक साहित्यकारों के लिये विशेष समस्या नहीं साबित हुए, कितु शुक्लोत्तर-युग के शीर्षकों में नवीनता तो थी ही, विचित्रता भी कम न थी, और वह भी विशेषकर सन ‘40 के बाद के शीर्षकों में।

लंबे शीर्षक रखना इस काल की परंपरा थी। इसी काल के कुछ शीर्षक इस प्रकार थे- ‘इन्द्रधनु रौंदे हुए ये‘ और ‘अरी ओ करूणा प्रभामय‘ (अज्ञेय) लगभग इस काल की रचनाओं के ये शीर्षक भी दृष्टव्य हैं- ‘तुमने क्यों कहा था मैं सुन्दर हूं‘ (यशपाल), ‘चांद का मुंह टेढ़ा है‘ (मुक्तिबोध), ‘एक आदमी दो पहाड़ों को कुहनियों से ठेलता‘ (शमशेर) आदि। इसी संबंध में अज्ञेय की ‘लिखि कागद कोरे‘ की भूमिका ‘सांचि कहऊं‘ के ये वाक्य उल्लेखनीय हैं- ‘असल में मुझे शीर्षक देना चाहिए था ‘अथ सांचि कहऊं मैं टांकि टांकि कागद अध कोरे‘ पर साठोत्तरी उपन्यास के पाठोत्तरी पाठक भी महसूसते (उन्हीं की भाषा है) कि इतने लंबे शीर्षक नहीं चलने के।‘

शीर्षक मे इन विचित्रताओं और नयेपन का आखिर कारण क्या है। आलोचकों का कथन है कि ऐसे शीर्षक उस पुस्तक के प्रति पाठक की उत्सुकता बढ़ाने के लिये होते हैं। सचमुच इन शीर्षकों के प्रति कौन उत्सुक नहीं होता- ‘एक गधे की आत्मकथा‘ (कृश्न चन्दर) ‘क्योंकि मैं उसे जानता हूं‘ और ‘कितनी नावों में कितनी बार‘ (अज्ञेय) ‘आकाश में फसल लहलहा रही है‘ (रामदरश मिश्र) ‘जब ईश्वर नंगा हो गया‘ (शिव शर्मा), ‘थैला भर शंकर‘ (शंकर) आदि।

शीर्षकों की आधुनिक परंपरा में एक प्रमुख है- नामवाचक शीर्षकों की परंपरा। ‘बेबी‘ (विजय तेन्डुलकर), ‘अलका‘ और ‘अर्चना‘ (निराला), ‘नीरजा‘ (रविन्द्रनाथ ठाकुर) ‘दिव्या‘ (यशपाल) आदि । जीवनी में तो नामवाचक शीर्षक होते ही हैं। शीर्षकों में सर्वनाम का भी कभी-कभी जमकर प्रयोग होता है- ‘मेरी, तेरी, उसकी बात‘ (यशपाल), ‘वाह रे मैं वाह‘ (क. मा. मुंशी), ‘हम हशमत‘ (कृष्णा सोबती). ‘मैं‘ (विमल मित्र), ‘उनसे न कहना‘ (भगवती प्रसाद बाजपेयी) ये कुछ इसी तरह के शीर्षक हैं।

कुछ विशेषणयुक्त शीर्षक ये हैं- ‘घासीराम कोतवाल‘ और ‘सखाराम बाइंडर‘ (तेन्डुलकर) ‘पगला घोड़ा‘ (बादल सरकार) ‘मैला आंचल‘ (फणीश्वरनाथ रेणु) ‘लालपीली जमीन‘ (गोविन्द मिश्र) रिश्ते के संबंधों ने भी शीर्षक मे कभी-कभार स्थान पाया। ‘देवकी का बेटा‘ (रांगेय राघव), कनुप्रिया (भारती) ‘रतिनाथ की चाची‘ (नागार्जुन) ‘कैदी की पत्नी‘ (रामवृक्ष बेनीपुरी) आदि इसके उदाहरण हैं। विरोधाभासी और आश्चर्यजनक शीर्षकों की भी आधुनिक हिंदी साहित्य में बहुतायत है। इस तरह के कुछ शीर्षक हैं- ‘झूठा सच‘ (यशपाल), ‘आवारा मसीहा‘ (विष्णु प्रभाकर), ‘जिंदा मुर्दे‘ (कमलेश्वर), एक बिछा हुआ आदमी‘ (विभुकुमार), ‘एक गांधीवादी बैल की कथा‘ (राधाकृष्ण) आदि। संख्यावाचक शीर्षकों की जो रचनायें प्रसिद्ध हुईं, उनमें है- ‘गवाह नम्बर तीन‘, ‘तीस चालीस पचास‘ (विमल मित्र), चार खेमे चौंसठ खूंटे (बच्चन) और ‘अट्ठारह सूरज के पौधे‘ (रमेश बक्षी)।

आंचलिक भाषा का उपयोग शीर्षकों में बहुत कम हुआ है, कभी कभी लोकोक्तियों का भी प्रयोग किया जाता है, उदाहरणस्वरूप ‘फिर बैतलवा डाल पर‘ (डा. विवेकी राय), ‘कागा सब तन खाइयो‘ (गुरुबक्श सिंह), ‘सबहिं नचावत राम गोसाईं‘ (भगवती चरण वर्मा) ‘नाच्यो बहुत गोपाल‘ (अमृतलाल नागर) आदि। अब कुछ संस्कृत शीर्षक वाली कृतियों का नाम पढ़ लीजिए- ‘वयं रक्षामः‘ (आचार्य चतुरसेन) ‘एकोSहं बहुस्याम्‘ (रघुवीर सहाय), मृत्युर्धावति पंचमः (अज्ञेय), ‘धर्मस्य तत्वं निहितं गुहायाम् (हजारी प्रसाद द्विवेदी)।

कभी कभी लेखक अपनी रचना को किसी की डायरी या किसी का पोथा बताते हैं- ‘अनामदास का पोथा‘ (हजारी प्रसाद द्विवेदी), ‘एक साहित्यिक की डायरी‘ (मुक्तिबोध), ‘लफ़्टंट पिगसन की डायरी‘ (बेढब बनारसी), ‘अजय की डायरी‘ (डा. देवराज) आदि इसी प्रकार के उदाहरण हैं। आजकल की डायरियां ज्यादातर नेताओं की ‘मेरी जेल डायरी‘ होती है।

कुछ शीर्षक देख कर ही सामान्य पाठक भयभीत हो जाता है। ‘अस्वीकृति का अकाव्यात्मक काव्यशास्त्र‘ (रमेश कुंतल), एक ऐसा ही शीर्षक है। ऐतिहासिक या पौराणिक नाम, जिनसे पाठक अनजान रहता है, वे भी कुछ ऐसा ही प्रभाव डालते हैं- ‘प्रमथ्यु गाथा‘ और ‘वृहन्नला‘ (भारती), ‘एक और नचिकेता‘ (जी. शंकर कुरुप), ‘संपाति के बेटे‘ और ‘आछी का पेड़, पैशाची; जरथुस्त्र और मैं‘ (कुबेरनाथ राय)।

अब कुछ भ्रामक शीर्षक- इस बारे में श्रीलाल शुक्ल के ये वाक्य प्रसंगानुकूल हैं ‘‘मैंने ‘शेखर एक जीवनी‘ पढ़ी है। वह उपन्यास है। खेती सींखने के लिए मैंने अज्ञेय रचित ‘हरी घास पर क्षण भर‘ पढ़ा। उसमें कविताएं हैं। ... बच्चों के पढ़ने के लिए ‘तितली‘ और लक्ष्मीनारायण लाल का ‘बया का घोंसला और सांप‘ मंगाई पर उन्हें बच्चों ने नहीं, नर-नारियों के संबंधों के ज्ञाता बुजुर्गों ने ही पढ़ा।‘‘
नवभारत, रायपुर का 3 सितंबर 1978 का पृष्ठ-3

लेखन, अभिव्यक्ति के साथ-साथ सार्वजनिक करने के लिए भी हो तो उस पर कुछ न कुछ असर इस बात का होता है कि वह प्रस्तुत-प्रकाशित कहां होगा। मेरी पीढ़ी 20-22 की उम्र में कुछ डायरी में तो कुछ पत्रों में अभिव्यक्त होती थी, लेकिन कुछ सार्वजनिक करना है, छपना-छपाना है तो पत्रिकाओं और समाचार पत्र की ओर देखना होता था कि वहां क्या और कैसा लिखा-छपा होता है। लिखने के बाद छपने के लिए तब अखबारों में जगह होती थी, मिल जाती थी। अखबारों में नाम सहित कुछ छप जाना, चाहे ‘पाठकों पत्र/आपकी चिट्ठी‘ ही क्यों न हो, संग्रहणीय नहीं तो उल्लेखनीय जरूर होता, बधाइयां भी मिल जातीं। स्थानीय अखबारों के कार्यालय तक पहुंच आसान होती थी। इस तरह लेखन का विषय चुनते, उसे अंतिम रूप देते, पत्र-पत्रिका का संपादक पहले और प्रत्यक्ष ध्यान में होता, पाठक उसके बाद, परोक्ष। आम लेखन की शैली, स्तर और टेस्ट इसी के आधार पर तय होता।

आजकल का लोकप्रिय लेखन, अधिकतर पहले फेसबुक-ट्विटर पर उगता है, कुछ-कुछ ब्लाग पर भी। सामान्यतः अनुकरण होता है उनका, जिस पर ढेरों लाइक-कमेंट हों, फिर थोड़ी अपनी पसंद और उसके बाद अपने लेखन-क्षमता, कौशल। इस तरह पहचाने गए नये लेखकों में, लेखन का स्वरूप तय करने का पहला और महत्वपूर्ण कारक लाइक-कमेंट करने वाला पाठक होता है। तब उसके लिए जरूरी होता है कि गंभीर बात भी रोचक-चुटीले अंदाज और बोलचाल की भाषा में कही जाए। बात कहने के लिए लंबी भूमिका भी नहीं चलने की। हर पैरा ऐसा हो, जो आगे पढ़ने की उत्सुकता और रुचि बरकरार रखे। नये वाले अधिकतर लोकप्रिय लेखकों के साथ यह लागू है।

अब के लेखन से तब की कलम-घिसाई का फर्क। यहां आई कुछ पोस्ट, पुराने दौर का लेखन है, यह अभ्यास तब इसी तरह हुआ था।

Monday, July 19, 2021

ताला

इन मंदिरों पर से सदियां गुजर चुकी हैं 

मध्यप्रदेश में शिवनाथ की सहायक नदी मनियारी के बायें तट पर गुप्तकाल में निर्मित दो शैवमंदिर आज भी पांचवीं-छठी शताब्दी के मूक साक्षी बने खड़े हैं। ये मंदिर तत्कालीन शरभपुरीय शासकों के स्थापत्य प्रेम का प्रतीक तो हैं ही, साथ ही वैष्णव शासकों की धार्मिक सहिष्णुता का प्रतीक भी हैं। कभी इस भू-भाग ने पाषाणयुगीन मानव को भी आकर्षित किया था। यहां पाये गये लघु पाषाण उपकरण इस बात का प्रमाण हैं। 

बिलासपुर जिला मुख्यालय से 30 किलोमीटर दूर यह स्थान ‘ताला‘ नाम से जाना जाता है, जहां ये दो स्मारक भग्नप्राय स्थिति में विद्यमान है। स्थानीय लोगों में ये मंदिर ‘देवरानी-जिठानी के मंदिर‘ नाम से जाने जाते हैं। यह इन मंदिरों का दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है कि इक्का-दुक्का ही पुरातत्वविदों ने इनकी खोज-खबर ली। सन् 1873-74 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के प्रथम महानिदेशक ए. कनिंघम के सहयोगी जे.डी. बेग्लर को इनकी सूचना रायपुर के तत्कालीन असिस्टेंट कमिश्नर मि. फिशर द्वारा मिली थी। बेग्लर ने स्वयं तो इन स्मारकों को नहीं देखा, मगर रायपुर-बिलासपुर मार्ग पर पुरातात्विक महत्व के स्थल के रूप में ‘जिठानी-देवरानी का मंदिर‘ नाम दर्ज कर दिया गया। इसी शताब्दी के सातवें दशक के अंत में दुर्गा महाविद्यालय, रायपुर के डॉ. विष्णु सिंह ठाकुर ने इस स्थान की खोज-खबर ली। 

कुछ वर्ष पहले अमेरिकी शोधार्थियों और मध्यप्रदेश शासन ने इस स्थान की छानबीन की और छत्तीसगढ़ में पहली बार गुप्तकालीन मंदिरों की उपस्थिति का आभास लोगों को हुआ। इसी समय राज्य पुरातत्व विभाग ने इसके संरक्षण की चिंता पहली बार की। 1985 में राज्य पुरातत्व विभाग के तत्कालीन सलाहकार और संप्रति हॉर्वर्ड विश्वविद्यालय के डॉ. प्रमोदचंद्र ने इस स्थान का निरीक्षण किया, लेकिन इस सबके बाद भी यह स्थान मामूली चर्चा का ही विषय बन सका। 

कथित देवरानी और जिठानी मंदिर में, देवरानी अधिक सुरक्षित स्थिति में है। दोनों मंदिरों के बीच की दूरी मात्र 15 मीटर है और ये मंदिर वस्तुतः शिव मंदिर हैं। देवरानी मंदिर के तलविन्यास में आरंभिक चंद्रशिला और सीढ़ियों के पश्चात अर्द्धमंडप, अंतराल और गर्भगृह तीन प्रमुख भाग हैं। गर्भगृह का तल अंतराल से कुछ बड़ा है।

मंदिर की सीढ़ियों में शिवगण व अन्य देवियों तथा गंधर्वों की मूर्तियां बनाने में अनूठी कलात्मकता के दर्शन होते हैं। निचले हिस्से पर शिव-पार्वती विवाह दृश्य अंकित है और उभय पाश्र्वों पर गज, द्वारपाल व मकरमुख उत्कीर्ण है। प्रवेशद्वार के उत्तरी और दक्षिणी दोनों पाश्र्व चार-चार भागों में विभक्त हैं, जिनमें उत्तरी पाश्र्व में ऊपरी क्रम से उमा-महेश, कीर्तिमुख, द्यूत-प्रसंग व गंगा-भगीरथ का अंकन है। उमा-महेश प्रतिमा का लास्य, द्यूत प्रसग में हारे हुए शिव के नंदी का पार्वती-गणों के अधिकार में होना व भगीरथ अनुगामिनी गंगा स्पर्श से समर- वंशजों की मुक्ति, कलाकार की मौलिकता और कुशलता का परिचायक है। अत्यंत कलात्मक और बारीक पच्चीकारी वाले प्रवेश द्वार पर गजाभिषिक्त लक्ष्मी और शिव-कथानक का अंकन है।

जिठानी मंदिर तो अब लगभग ढह चुका है। इसमें ध्वस्त मंदिर से अत्यंत महत्वपूर्ण सामग्री उपलब्ध हुई है। जिठानी मंदिर में पूर्व व पश्चिम की सीढ़ियों से प्रवेश किया जा सकता है। उत्तर की ओर दो विशाल हाथियों का अग्र भाग है। विशाल स्तंभों व प्रतिमाओं के पादपीठ सहित विभिन्न आकार की ईंटों व विशालकाय पाषाणखंडों से निर्मित संरचना आकर्षित करती है। यहां प्रसन्नमात्र नामक शरभपुरीय शासक की उभरी हुई रजत मुद्रा भी प्राप्त हुई है, जिस पर ब्राह्मी के क्षेत्रीय रूप, पेटिकाशीर्ष लिपि में शासक का नाम अंकित है। शासक की यह एकमात्र रजत मुद्रा प्राप्त हुई, जबकि ऐसी स्वर्ण मुदाएं बहुतायत में मिली हैं। कलचुरियों की रतनपुर शाखा के दो शासक, रत्नदेव व प्रतापमल्ल की भी एक-एक मुद्रा प्राप्त हुई है, जिससे अनुमान होता है कि यह क्षेत्र लगभग बारहवीं सदी ई. तक निश्चय ही जनजीवन से संबद्ध रहा। इस बात की पुष्टि यहां प्राप्त अन्य सामग्री, मिट्टी के खिलौने व पात्र, टिकिया, मनके लौह उपकरण से होती है। 

मदिर में अर्द्धनारीश्वर, उमा-महेश, गणेश, कार्तिकेय, नायिका, नागपुरुष आदि विभिन्न प्रतिमाएं एवं स्थापत्यखंड प्राप्त हुए है। प्रतिमाओं का आकार भी उल्लेखनीय है। इनमें कुछ तो तीन मीटर से भी अधिक लबी हैं। प्रतिमाओं में अलौकिक सौंदर्य, आकर्षक अलंकरण तथा कमनीयता का संतुलित प्रदर्शन है। दो अन्य पाषाण प्रतिमाएं विष्णु और गौरी की हैं, इनका काल लगभग आठवीं सदी ई. है। ताला के इन मंदिरों पर गभीर शोध की आवश्यकता है।
यह लेख, ‘हिंदी का पहला साप्ताहिक अखबार‘ टेग लाइन और संतोष भारतीय के संपादन वाले, दिल्ली से प्रकाशित ‘चैथी दुनिया‘ के 16 से 22 अगस्त 1987 अंक के पृष्ठ 10 पर आया था। यह लेख छपने पर, सरसरीपन के कारण मुझे अच्छा नहीं लगा था। मगर यह स्वयं स्वीकार करते हुए सार्वजनिक करना आवश्यक समझता हूं, इसलिए यहां प्रस्तुत किया है।

Saturday, July 17, 2021

होली

होली की उमंग
मस्ती के रंग
फाग के संग

खेत खलिहान गर्व से भरे हैं, टेसू के फूल प्रकृति की सुन्दरता द्विगुणित कर रहे हैं, आम के बौर की भीनी सुगंध वातावरण को मादक बना रही है, बसंती झोंके तन मन को गुदगुदा रहे हैं, मदन देवता के धनुष पर पंचशर चढ़े हैं और प्रत्यंचा खिंची हुई है, धूप में कुनकुनाहट आ गई है इन सबका मूक संदेश है- होली आ रही है। होली मस्ती का त्यौहार, फाग का त्यौहार, बड़े-बूढ़े बच्चे सबका त्यौहार, आल्हादकारी और भेदभाव रहित त्यौहार।

होली के स्वरूप में अंतर भले ही हो किन्तु होली का उत्साह और उन्माद भारत भर में सब पर समान रहता है। होली का उन्माद सब पर एक सा क्यों न हो, किसके अंग न कसमसायेंगें इस मौसम में-
अंग-अंग कसमस हुए, कर फागुन की याद। आंखों में छपने लगे फिर मन के अनुवाद।।

होली की स्वरूपों की बात चल पड़ी है तो आइये कुछ प्रमुख और चर्चित होली देखते चलें- होली की चर्चा में पहला नाम फालैन का याद आता है। फालैन में होली मनाने का तरीका कोई विशेष अनोखा नहीं है, चर्चा का कारण है एक पण्डा परिवार। इस परिवार का कोई एक सदस्य हर होली के अवसर पर धधक चुकी होली के अग्निकुंड में से नंगे पांव निकला करता है। इसके लिये उसे अग्निकुंड पर 10-12 कदम चलने होते हैं, जिसमें लगभग आधे मिनट का समय लगता है। और इस समय होली की लपटें कम से कम 4-5 फीट ऊपर उठती रहती हैं। होली के अवसर पर फालैन का यह कार्यक्रम अत्यधिक अनूठा और आश्चर्य का विषय है।

चर्चित होलियों में पहला नाम नंदगांव और बरसाने की लठमार होली का है। फागुन के कृष्ण पक्ष की नवमीं को नंदगांव के हुरिहार और बरसाने की गोपिकायें इस कार्यक्रम का रूप संजोते हैं। नारियां घूंघट की आड़ में पुरुषों पर लाठी का प्रहार करती हैं और नंदगांव के हुरिहार उस प्रहार को ढाल पर रोकते हैं। बरसाने की होली के दूसरे दिन नंदगांव में भी ऐसी ही लठमार होली होती है। फर्क इतना है कि इस होली में बरसाने के गुसाईं हुरिहार होते हैं और नंदगांव की गोपियां प्रहार करती हैं।

मथुरा के निकट एक स्थान है, दाऊजी, यहां के हुरंगा अर्थात वृहद होली का अपना ही अंदाज है। पुरुष पिचकारी से महिलाओं पर टेसू का रंग डालते हैं और रिश्ते के इन देवर पुरुषों के कपड़े फाड़कर स्त्रियां कोड़े बनाती है, पानी में भीगे इन कोड़ों का प्रहार देवरों की पीठ लाल कर डालता है और स्त्री पुरुषों की टोली विदा होते समय पुरूष गाते हैं-
हारी रे गोरी घर, चाली रे कोई जीत चले हैं, ब्रज ग्वाल। स्त्रियों का प्रत्युत्तर कथन होता है- हारे रे रसिया, घर चाले रे कोई जीत चली है, ब्रजनार।

राजस्थान के एक नगर बाड़मेर की होली की अब सिर्फ यादें रह गई हैं। बाड़मेर की 60-70 वर्ष पूर्व की होली पत्थरमार होली हुआ करती थी। धुलेंडी अर्थात होलिका दहन की अगली प्रभात से ही 15 दिन पूर्व से की गई तैयारी वाली पत्थरबाजी प्रारंभ हो जाती थी। किन्तु न तो इसमें वैमनस्यता रहती थी न ही दुश्मनी का भाव। रस्सी अथवा कपड़े के कोड़ो से देवरों की पिटाई का प्रचलन यहां अब भी है। साथ ही एक परंपरा ईलाजी की प्रतिमा बनाने की है, मान्यता है कि ईलाजी बांझ महिलाओं को पुत्र प्रदान करते हैं।

वाल्मीकि रामायण व रामचरित मानस में कहीं भी होली का उल्लेख नहीं है, किंतु अन्य गीतकारों ने अपने प्रिय देवताओं के होली का वर्णन किया है। फाग में होली अवध में राम भी खेलते हैं प्रजाजन और देवी सीता के साथ। शिव खेलते हैं गौरा के साथ, अपनी ही मस्ती में और ब्रज की होली नटवर कृष्ण का क्या कहना वह तो सखाओं, गोप-ग्वालों, राधा सभी के साथ खेलता है। होली के अवसर पर जितने फाग गीत गाये जाते हैं उतने गीत शायद ही किसी अन्य त्यौहारों में गाये जाते होगें। फाग के राम सीता की यह होली देखिये-
होरी खेले रघुबीरा अवध में।
केकरा हाथ कनक पिचकारी, केकरा हाथ अबीर।
राम के हाथ कनक पिचकारी, सीता के हाथ अबीर।

सूर सागर की बसंत लीला का राधा कृष्ण का फाग है-
मैं तो, खेलूंगी, कान्हा तोसे होरी बरजोरी।
हम घनश्याम बनब मथुरा में, तोहे नवल ब्रज वनिता बनाई।
मोर मुकुट कुंडल हम पहिरब, तोहे लला बेनूली पहनाई।
मुरली मधुर लेबि हम अपना, चूड़ी पहनाइब, कान्हा तोहरी कलाई।

बीकानेर में फाग ‘रम्मत‘ के रूप में प्रचलित है। रम्मतों में सास-बहू का ख्याल, देवर-भाभी की रम्मत, बूढ़े बालम की रम्मत और अमर सिंह राठौर की, आदि रम्मत होती है। रम्मत न के बराबर साज-श्रृंगार के बाद मंच पर खेली जाने वाली काव्य नाटिका है। मारवाड़ के गांव में जहां ढोला-मारू की प्रेमगाथा की बहुतायत है वहीं पेशवाओं के महाराष्ट्र में ‘तमाशे‘ का अपना रंग है। तमाशे के लिये मराठी शाहिर खास गीत रचा करते हैं और नर्तकियां उसे गाकर प्रेक्षकों का अनुरंजन करती हैं। एक तमाशे के गीत में मदनविद्ध नायिका अपने प्रेमी से कहती है-
सख्या चला बागामधिं रंग खेलू जरा, सब शिमम्याचा करा गुलाल गोटा घ्यावा
लाल हाती फेकू न मारा छाती, रंगभरी पिचकारी माझपाहाती
हरी करीन या रिती जसा वृन्दावनी खेले श्रीपति गोपी धेऊनी संगानी

कृष्ण प्रेमिका, बाजबहादुर की बेगम रूपमती ने लगभग 1637 विक्रम संवत में अपनी प्रेम कविता को फाग के रूप में लिखा है इसका माधुर्य दृष्टव्य है-
मोर मुकुट कुंडल को अतिछवि आंखन नैन अंजन धरे कोना। ‘रूपमती‘ मन होत बिरागी बाज बहादुर के नन्द दिठौना।।

मध्यप्रदेश में लगभग पूरे बुदेलखंड में प्रचलित चौकड़िया फाग ही गाया जाता है जो ईसुरी कवि की रचनायें मानी जाती हैं। छत्तीसगढ़ के हिस्से में भी विशेषकर श्रृंगारिक फाग का अत्यधिक प्रचलन है किन्तु कभी-कभी यह अश्लील दहकी गीतों की सीमा तक पहुंच जाता है। छत्तीसगढ़ी फागों में होली के त्यौहार को कुंवारों के लिये अनुपयुक्त माना गया है। एक ऋतु गीत की कुछ पंक्तियां उल्लेखनीय है-
माघ महिना राड़ी रोवय होत बिहनियां नहाय हो जाय
नहा खोर के घर म आवय अउ तुलसी हूम जलाय
फागुन महिना डिडवा रोवय गली-गली में खेले फाग।

नवभारत, रायपुर के होली परिशिष्ट, मुख्य लेख के रूप में, पृष्ठ-3 पर रविवार, दिनांक 11 मार्च 1979 को यह प्रकाशित हुआ था। संभवतः यही मेरा पहला लेख है, जिसके लिए समाचार पत्र के रामअधीर जी ने मौखिक रूप से अनुबंधित करते हुए, कुछ संदर्भ-सामग्री पढ़ने को दी। तब गूगल नहीं था। कुछ अपने पुराने नोट्स और याददाश्त काम आया। पारिश्रमिक भी मिला, लेकिन तब नवभारत के ऐसे परिशिष्ट में रविवार को मुख्य लेख छप जाना, छत्तीसगढ़ स्तरीय पुरस्कार से कम न था। अब लेख पढ़ते हुए लगा कि इस लेखक में थोड़ी सांस्कृतिक, साहित्यिक रुचि तब से है और उससे भविष्य में कुछ बेहतर की उम्मीद की जा सकती थी।