Tuesday, September 22, 2026

अपने अपने राम

रामकथा को आधार बना कर अभिव्यक्ति के कौन-कौन से अनूठे आयाम का संधान संभव है इसका उदाहरण है भगवान सिंह की यह पुस्तक ‘अपने अपने राम‘। राम का चरित्र वर्ण कुव्यवस्था के खिलाफ और समावेशी राजनय के व्याख्याकार के रूप में गढ़ा गया है। स्वाभाविक ही युवराज और राजा राम के चारों ओर राजनयिक षडयंत्र का वातावरण बना रहता है। उनके समक्ष (मुख्यतः कैकेयी और वशिष्ठ द्वारा) प्रतिकूल स्थितियां लगातार निर्मित होती हैं, मगर धैर्य, न्यायप्रियता, निष्ठा, सच-ईमान वाले व्यवहार व वाक्-कौशल, मानवीय संवेदना पर कायम रहते राम, मर्यादा पुरुषोत्तम स्थापित होते हैं। 

राज-काज और राजघरानों के प्रसंग में कई बातें बड़े पते की आई हैं, जैसे- ‘राजघरानों में आधे संकट दुस्साहस से पैदा होते हैं, आधे भीरुता से‘ ... ‘रूढ़िग्रस्तता का भी अपना अर्थशास्त्र और मूर्खता का भी अपना तर्कशास्त्र होता है।‘ ... राजा अपने लिए राज्य नहीं करता। राष्ट्रहित के लिए ही वह शासन करता है। राष्ट्रहित से ही राजा मित्रों और शत्रुओं का निश्चय करता है और यह मैत्री और शत्रुता भी स्थायी नहीं होती, प्रासंगिक होती है। ... राज परिवारों में अभिधा से अधिक व्यंजना ही समझ में आती है। यदि कोई बात सहज ढंग से कही गई हो तो भी वे उसमें से व्यंजना की खोज करके ही दम लेते हैं। ... राजनय और व्यक्तिगत गुणों के संदर्भ में लक्ष्मण का विचार है कि अनन्यता और आत्मीयता स्थापित करना राम की शक्ति है। और राम कहते हैं- ‘यदि कोई व्यक्ति या प्राणी तुम्हारे मन में घृणा पैदा करने में सफल हो गया तो समझो, वह जीत गया, तुम हार गए।‘ 

प्रोपोगैंडा और आधुनिक ट्रोल के संदर्भ में इस अंश को पढ़ना रोचक होगा- ‘एक बार विकसित हो जाने पर इस पर उन जनों का अधिकार हो जाएगा जिनके विरुद्ध पण्डितों और पुरोहितों का प्रचारतन्त्र काम करता है। यह है कुशीलवों और गाथाकारों की परम्परा। नाटकों, गायनों और स्वांगों की परंपरा। कथावाचकों और कथाकारों की परंपरा। नर्तकों, विटों और भांड़ों और भाटों की परम्परा। इससे उन सभी सम्भावित दूषकों और दुष्प्रचारों को निरस्त किया जा सकेगा, लक्ष्मण।‘ 

विश्वामित्र जिनका कथन आता है- ‘राजा को अपने गुरु की छाया से, यथासम्भव, दूर ही रहना चाहिए। उसके परामर्श भी आदेशवत हो जाते हैं। इससे राजा को स्वतंत्र निर्णय लेने में बाधा पड़ती है।‘ पुस्तक में औचित्यहीन ब्राह्मणवादी यज्ञ-व्यवस्था के ‘इष्ट‘ के बजाय लोक हितकारी ‘पूर्त‘ प्रतिष्ठा की अंतर्धारा का मद्धिम मगर स्थायी और दृढ़ स्वर है। ऐसा लगता है कि विश्वामित्र का चरित्र स्वयं लेखक के चिंतन का स्वरूप है और राम के कथन, उसकी अभिव्यक्ति। 

सनातन रूढ़ नहीं होता जीवंत होता है। वह सनातन, जो शास्त्रों में ‘एष धर्मः सनातनः‘ है और बुद्ध वचन में ‘एस धम्मो सनंतनो‘ है। यहां लेखक भी उसी सनातनता के पक्षधर है, जो तार्किक, विवेकपूर्ण और वास्तविक यानी सर्वकालिक अतएव युगानुकूल परिवर्तनशील है। वसिष्ठ से राम की असहमति में यह रेखांकित होता है- ‘राम ने हाथ जोड़ लिए थे, जो तर्क की आँच न सह सके उस शास्त्र के विधान से कम से कम राम को बचाए रहें, आचार्य।‘ ... और कहते हैं- ‘शास्त्र और धर्म तो युग के अनुरूप बदलते हैं आचार्य।‘ जिस पर प्रतिक्रिया आती है- ‘राम कुछ भी कर सकते हैं। वह न किसी शास्त्र को मानते हैं, न किसी व्यवस्था को। कहते हैं, मनुष्य को आत्म-प्रमाण होना चाहिए।‘ या यह अंश- ‘कृत्याकृत्य की कसौटी शास्त्र नहीं, मनुष्य का अपना विवेक है।‘ इस क्रम में वे देवताओं के आलोचक और मनुष्यत्व के पक्षधर भी दिखाए गए हैं, कुछ इस तरह- ‘देवता मनुष्य से निकृष्ट होता है और वह कपटी लोगों का मानस पुत्र होता है।‘ 

वर्ण-व्यवस्था की रूढ़ि पर बार-बार आघात है- ‘कितना व्यर्थ है जन्म और रक्त की श्रेष्ठता का दंभ! कितनी मूर्खतापूर्ण है वर्णों की यह सीमा।‘ ... ‘यदि श्रेष्ठता-कनिष्ठता का आधार अलग-अलग अंगों से जन्म लेना हो तो इन वर्णों के लोगों को आज भी उन्हीं-उन्हीं अंगों से जन्म लेना चाहिए।‘ ... ‘आज तो सभी ब्राह्मण, क्षत्रिय उसी रीति से पदा होते हैं जैसे शूद्र। सभी का जन्म माँ के गर्भ से होता है अतः सभी जन्म से शूद्र ही पैदा होते हैं। जिन्हें उचित संस्कार मिल जाता है वे द्विज हो जाते हैं, ब्राह्मण और क्षत्रिय और वैश्य बन जाते हैं, जिन्हें यह सुलभ नहीं वे शूद्र रह जाते हैं। यदि उन्हें भी उचित संस्कार मिलें तो वे भी द्विज बन सकते हैं।‘ ... क्या उस वेद के महात्म्य को स्वीकार किया जा सकता है आचार्य, जो एक शूद्र को पवित्र नहीं कर सकता, पर उसके उच्चारण मात्र से स्वयं अपवित्र हो सकता है? तब तो मानना होगा कि शूद्र वेद से भी अधिक शक्तिशाली है। वेद उसे प्रभावित नहीं कर सकता, पर वह वेद को प्रभावित कर सकता है! 

पुस्तक के ऐसे कई अंश, वस्तुतः तार्किक और शास्त्र-मर्यादित अभिव्यक्तियां, सतही तौर पर धर्म और आस्था विरुद्ध मानी जा कर उद्वेलित कर सकती हैं। मगर उद्भट विद्वान लेखक ने धर्मशास्त्रों का गहराई से अवगाहन किया है, स्पष्टता की चमक उनके लेखन की पहचान है। वैदिक, पौराणिक, महाकाव्यीय और लौकिक प्राचीन संदर्भों के सजग और प्रखरता व्याख्याकार हैं, तभी ऐसी महत्वपूर्ण क्रांतिकारी कृति पाठकों को उपलब्ध हुई है।

Wednesday, September 2, 2026

विविध रामायण

आनंद नीलकंठन के जितने काम की सूची मिलती है, वह सारा काम नाम करने वाला है। उनका लक्ष्य और प्रयास दिखता है कि किस तरह धर्मग्रंथों को लोकप्रिय स्वरूप में लाया जा सकता है। वे अध्येता, संकलक-संयोजक हैं, अपने सारे उद्यम को किताब, फिल्म, टेलीविजन धारावाहिक, ऑडियो बुक में परिणत कर देने वाले। इसी क्रम में उनकी पुस्तक का अनुवाद ‘विविध रामायण विविध पाठ‘ आया है।

यह शीर्षक देखते ही पहले ए.के. रामानुजन के चर्चित लेख, वस्तुतः लंबे शोध-पत्र ‘थ्री हंड्रेड रामायण्स ...‘ की ओर ध्यान जाता है और दूसरा कामिल बुल्के की ओर। नीलकंठन, अपनी इस किताब के ‘कथोपरांत‘ में लिखते हैं- ‘ए.के. रामानुजन ने अपने विद्वत्तापूर्ण लेख में 300 रामायणें गिनाई हैं।‘ यह भी कहा जाता रहा कि तीन सौ की यह संख्या कामिल बुल्के से ली गई है, मगर मुझे उपलब्ध रामानुजन के किसी मूल या अनुवाद और संपादकीय टिप्पणी सहित प्रकाशित संस्करणों में अब तक ऐसी कोई गिनती नहीं गिनाई मिली। दूसरी तरफ बुल्के ने 600 ई.पू. से 1600-1700 तक की रामकथाओं की सूची दी है, जिसकी संख्या 300 नहीं है। ऐसा लगता है कि यह बात चल पड़ी, तो चल पड़ी वाली है। रामानुजन के लेख पर हुई उग्र प्रतिक्रिया के दौरान यह टिप्पणी होती थी कि विरोध करने वालों में शायद ही किसी ने वह लेख ठीक से पढ़ा है। यह उल्लेख इसलिए कि या तो इन्हें पढ़ा नहीं जाता या एजेंडा बनाने का इरादा नहीं किया जाता, वरना यह किताब, ऐसे विरोध का शिकार रामानुजन से अधिक हो सकती है। इतना ही क्यों मूल वाल्मीकि रामायण के कुछ ऐसे अंश है, जो आपत्तिजनक माने जा सकते हैं और गंभीर विवाद का कारण बन सकते हैं।

रामकथा की आधुनिक पुस्तकों में एक साहित्यिक वर्ग है, जिसमें नरेन्द्र कोहली की रामकथा श्रृंखला से आशुतोष राना की ‘रामराज्य‘ से शैलेन्द्र तिवारी की 'मेरे राम' तक है। चक्रवर्ती राजगोपालाचारी, प्रेमचंद और रस्किन बॉन्ड ने भी रामकथा प्रस्तुत की है। दूसरा फैंटेसी वाला अमीश त्रिपाठी वर्ग है। इसके अलावा गंभीर अध्येताओं- बलदेव प्रसाद मिश्र, राधावल्लभ त्रिपाठी, कुबेरनाथ राय, भगवान सिंह का काम है। ऐसा एक कम चर्चित मगर महत्वपूर्ण प्रकाशन डॉ. शोभा निगम का ‘वाल्मीकि-कथा‘ है। शास्त्रीय-गंभीर कामों में डोंगरे जी महराज और करपात्री जी के साथ ‘मानस पीयूष‘ जैसी टीका भी है। एक काम माताप्रसाद गुप्त के पाठालोचन का है तो दूसरी तरफ पं. रामकिंकर जी महराज जैसे कथावाचक हैं। नीलकंठन की इस किताब को देवदत्त पटनायक वाले समूह में रखा जा सकता है। वे स्वयं कहते हैं कि इस पुस्तक को अकादमिक तरीके से नहीं देखा जाना चाहिए।

नीलकंठन की कुछ टेक है, जिससे वे न सिर्फ रामायणों, बल्कि दूसरे महाकाव्य महाभारत और पुराण आदि अन्य ग्रंथों को देखते हैं, इस क्रम में भटके से सांख्य दर्शन पर गंभीरता से विचार करने लगते हैं, वहीं सवाल उठाते हैं कि अंतिम बार आपने बिना मोबाइल की ओर देखे या बिना किसी से बात किए या बिना कोई किताब पढ़े कब खाना खाया था। वे टिप्पणी करते चलते है- ‘जीवन दरअसल कर्म और नियति दोनों से मिलकर बना होता है ... परिस्थितियों को ही चयन करने के लिए छोड़ देना भी एक प्रकार का चयन है ... कोई भी चीज पूर्णतः अच्छी या बुरी नहीं होती ... परिस्थितियों के अनुसार धर्म की परिभाषा बदल जाती है ... किस जीवन शैली को हम गलत, पापपूर्ण मानते हैं और किसे सही, यह हमारे नजरिए पर निर्भर करता है ... स्वधर्म का अर्थ है- धर्म के बारे में आपकी अपनी व्याख्या और समझ ... नैतिकता और नियम दूसरों पर नियंत्रण करने के लिए बनाए जाते हैं ... न मैं अच्छा हूं, न बुरा। मैं रावण हूं। ... परम सत्य नाम की कोई चीज नहीं होती ... जीवन को समझना एक जटिल कार्य है। जीवन जीना सरल है। बस जीते रहिए। ...

कार्य-कारण और परिणाम। जिसमें परिणाम, पुनः कारण बन सकता है। यह तय करना भी आसान नहीं होता कि कौन सा कार्य है, कौन कारण और क्या परिणाम, क्योंकि परिणाम जान पड़ना एक अनंतिम सी दशा है। यह ऐसी धारा है, जिसे किसी भी जगह रोक कर देखें, अपने आगे-पीछे का प्रभाव दिखेगा। नीलकंठन जो बार-बार दुहराते हैं, वह है- विकल्पों का चयन और परिणाम, कर्म का फल, कर्मों के चयन के लिए मूल्य चुकाना, उन्हीं के शब्दों में- ‘प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्मों और उनके फल के लिए जिम्मेदार होता है और उसे विकल्पों के बीच चयन का मूल्य अदा करना होता है, यह भाव भारतीय मानस में रचा-बसा है। चाहे पवित्र धर्मग्रंथ हों या लोक कथाएँ, इस विचार को बार-बार दोहराया जाता है।‘

अध्याय 32- ‘राम के पाले में विभीषण‘ में रामेश्वरम शिवलिंग स्थापना का प्रसंग आया है, जिसमें बताया गया है कि इस अवसर पर रावण पुरोहित बनता है, जो कथा आनंद रामायण के अलावा और कहीं नहीं मिलती। मगर आनंद रामायण के गीता प्रेस वाले संस्करण में मुझे ऐसा कुछ नहीं मिला। इसी तरह अध्यात्म रामायण को हर बार आध्यात्म रामायण और बिरहोर रामायण को बिहोर रामायण लिखना, अखरने वाला है। कुछ शब्द सामान्य से भिन्न प्रयुक्त हुए हैं, दक्षिण भारतीय प्रचलन के कारण, या अंगरेजी-हिंदी के कारण, जैसे- आजीविक न कि आजीवक, अहिल्या न कि अहल्या, क्षीरध्वज-सीरध्वज, विभांतक-विभांडक, कार्तिवीरार्जुन-कार्तवीर्यार्जुन, द्वैवायन-द्वैपायन, अनारण्य-अनरण्य, कुंब-निकुंब न कि कुंभ-निकुंभ, मायन-मय।

सामान्य पाठक कुवेंपु का आशय शायद ही समझ सके, जो वस्तुतः कुप्पल्ली वेंकटप्पागौड़ा पुटप्पा हैं। इसी प्रकार कुछ शब्द, जिनमें कर आता है, को जोड़ कर- धारणकरते, अपहरणकरवाकर, निर्धारणकरेगा, लिखे जाने पर ध्यान अटकता है। कुछ मशीनी अनुवाद वाली चूक है, जैसे- ‘हनुमान घायल अवस्था में खून से लथपथ सुग्रीव को उसके छिपने की जगह पर ...‘ इसमें हनुमान के बाद विराम नहीं है, वैसे भी सीधा वाक्य होता- घायल अवस्था में खून से लथपथ सुग्रीव को हनुमान, उसके छिपने की जगह पर ...‘

पुस्तक के शीर्षक Lesson का यहां अनुवाद पाठ किया गया है। हिंदी का पाठ, पढ़ना तो है ही, वह एक ओर उच्चारण करते हुए दुहराने अर्थ देता है वहीं दूसरी ओर किसी रचना का दो व्यक्तियों का पाठ भिन्न हो सकता है, इतना ही नहीं एक व्यक्ति के अलग-अलग समय में पाठ/ पुनर्पाठ (समझा जाने वाला आशय)अलग हो सकते हैं। पाठ का एक विशिष्ट प्रयोग अपरिचित लिपि के लेख को पढ़ने के अर्थ में भी प्रयोग होता है, ज्यों किसी पुराने अभिलेख के लिप्यंतर को पाठ कहा जाता है। यों पाठ का आशय पाठ्य-पुस्तक का अध्याय, सीख, सबक, नसीहत, चेतावनी भी हो सकता है। मुझे लगता है हिंदी के पाठ का आशय, अंगरेजी के Lesson से अधिक व्यापक है, बेहतर भी माना जा सकता है।

नीलकंठन निष्कर्ष की तरह लिखते हैं- 'हालाँकि एक हद तक मैं कर्म और कर्मफल के सिद्धांत को समझता हूँ जो इस महाकाव्य के आधार हैं, लेकिन मैं यह भी जानता हूँ कि जीवन में घटने वाली हर घटना की व्याख्या कर्म के आधार पर करना संभव नहीं।' और यह भी- ‘मैंने एक लोक गायक के मुँह से इसकी बड़ी सटीक व्याख्या सुनी- जीवन का बहुत गहरा अर्थ होता है लेकिन जैसे ही हम उस अर्थ को समझ लेते हैं, यह अर्थहीन हो जाता है। जीवन के अर्थ की खोज ही इसकी विचित्रताओं को इतना सुंदर बनाती है।‘

यह किताब मेरे लिए विंडो शॉपिंग जैसी साबित हुई, मगर उपर उल्लेखित पुस्तकों से अच्छी तरह परिचित नहीं हैं और रामकथा की रोचक विविधता को फटाफट देख लेना चाहें, उनके लिए यह बहुत उपयोगी हो सकती है। इसकी एक खासियत यह भी कि लेखक ने लोकप्रिय पठनीयता के लिए गंभीरता से समझौता नहीं किया है। उनकी इस किताब के लिए एक वाक्य कहना हो तो मैं कहूंगा- ‘आनंद नीलकंठन अपनी इस पुस्तक में समूचे भारतीय चिंतन में ‘विकल्पों के चयन और उनके परिणाम, कर्म और उसके फल के बीच चलने वाले अनंत चक्र‘ को देखते हैं।‘

Monday, August 31, 2026

बनारस में सिरपुर ज्ञान-प्रवाह

भारतेन्दु परिवार के मोती चन्द्र जी और शांति जी के पुत्र प्रमोद चन्द्र जी, हार्वर्ड विश्वविद्यालय में भारतीय कला के आचार्य रहे। बनारस से उनके रिश्तों के चलते वहां अमेरिकन एकैडमी आया, जो बाद में चीफ कोर्ट हाउस, रामनगर में अमेरिकन इंस्टीट्यूट आफ इंडियन स्टडीज (अब गुड़गांव में) हुआ। इसी तरह वे ‘ज्ञान-प्रवाह‘ से जुड़े रहे। उनसे परिचय और उनका स्नेह होने के कारण इन संस्थाओं और बनारस से मेरा रिश्ता मजबूत होता गया। इस भूमिका के साथ स्मरण सन 2010 का। 

फोन पर विस्तृत चर्चा कर उन्होंने सिरपुर पर आयोजन के लिए सुझाव की जिम्मेदारी मुझपर सौंपी। मुझे सुझाना था कि ज्ञान-प्रवाह में ‘सिरपुर‘ पर आयोजन में कौन कौन विद्वान होंगे और उनके टॉपिक क्या होने चाहिए। इस पूरे दौरान मेरा संपर्क ‘ज्ञान-प्रवाह‘ की सुश्री बिमला पोद्दार जी से बना रहा। प्रमोद चन्द्र जी का ई-मेल 14-06-2010 यह था। बात आगे बढ़ी। आयोजन की पूरी कार्यवाही से मैं जुड़ा रहा और ई-मेल की प्रतियां मुझे भी आती रहीं। यह आयोजन 29-30 जनवरी 2011 को हुआ। निजी कारणों से मैं स्वयं शामिल न हो सका। 

ज्ञान-प्रवाह ने अपनी शोध-पत्रिका के अंक 14 में लेख छापे, जिनमें एक श्री जी. एल. रायकवार का ‘सिरपुर की कला परंपरा में कथा प्रसंग‘ था, उस लेख का चित्र और टेक्स्ट आगे दिया जा रहा है-

सिरपुर की कला परंपरा में कथा प्रसंग 
जी.एल. रायकवार 

दक्षिण कोसल के विशिष्ट स्मारक स्थलों में ताला, मल्हार, सिरपुर, राजिम, डीपाडीह, भोरमदेव आदि सुप्रसिद्ध कला केन्द्र हैं। विपुल स्थापत्य अवशेष तथा दुर्लभ कलाकृतियों के माध्यम से इस अंचल की समृद्ध प्राचीन कला परंपरा का बोध होता है। लगभग 6ठी शती. ई. से 12वीं शती ई. तक दक्षिण कोसल के शरभपुरीय, नल, सोमवंशी, नागवंशी तथा कलचुरि शासकों के प्रश्रय में शैव, वैष्णव, बौद्ध और जैन कला शैली क्रमशः यहाँ पल्लवित होती रही है। इस अंचल के प्रारंभिक काल की मूर्तिकला के केन्द्रों में गुप्तकालीन कला परंपरा के साथ-साथ क्षेत्रिय प्रवृत्तियाँ भी अन्तर्निहित हैं। यहाँ मूर्तिकला में मान्य शास्त्रीय बिम्बों के अतिरिक्त प्रकृति और लौकिक जगत् की रोचक विविधताओं का समावेश है। इस क्रम में देवरानी जेठानी मंदिर एवं ताला से प्राप्त रुद्रशिव की एकाश्म विशाल प्रतिमा में जीव-जगत् और वनस्पति जगत् का समायोजन अद्वितीय है। इसी मंदिर के सिरदल पर गजलक्ष्मी के अभिषेक दृश्य में नदी देवियों के मानव और सरिता रूप साथ-साथ रूपायित हैं। मूर्तिकला में प्रतिमा शास्त्रीय निर्देशों के साथ मनोरंजक, कौतूहलपूर्ण और विनोदात्मक भावों से परिपुष्ट कलाकृतियाँ विशेष रूप से आकृष्ट करती हैं और मौलिक कल्पना युक्त कथाओं का सृजन करती हैं।

सिरपुर का महातीवरदेव विहार (चित्र २६.१-२) 

कलाशैली की दृष्टि से इस विहार का निर्माण काल 530-650 ईसवी के मध्य निश्चित किया जा सकता है। यहाँ प्रवेश द्वार पर संयोजन द्वार शाखा के सम्मुख तथा पार्श्व भाग विविध कलात्मक दृश्यों से रूपायित हैं। रूप शाखा पर पारंपरिक मिथुन आकृतियों के अतिरिक्त विभिन्न जीव-जन्तुओं का अंकन है। ये कथाएँ प्रथमतः जातक तत्पश्चात् पंचतंत्र में उल्लिखित हैं। विहार के प्रवेश द्वार पर मकरारूढ़ वानर, गजयूथ, मेढ़ों की लड़ाई, मूषक पंक्ति, बक-कर्कट, शुक, उलूक, वृश्चिक, सर्प और मेंढक, मधुमक्खी, भौंरा, नीलगाय, महिष एवं कुक्कुट स्पष्टतः विद्यमान हैं तथा कुछ आकृतियाँ क्षरित होने से अस्पष्ट हैं। अर्धमंडप के एक स्तंभ पर श्वान सहित आखेटक दम्पति भी हैं। महातीवरदेव विहार के प्रवेश द्वार पर रूपायित कुछ महत्त्वपूर्ण कथाशिल्पों का परिचय निम्नांकित हैः 

मकरारूढ़ वानर (चित्र 26.3)- इस कथाशिल्प में मूर्ख मकर अपने मित्र वानर को कपटपूर्वक पीठ पर बैठाकर अगाध जलराशि के मध्य पहुँचता है और अपनी पत्नी की इच्छानुसार उसके हृदय का मांस पिंड खाने के लिए अपनी कपट योजना को सविस्तार व्यक्त करता है। आसन्न संकट से अविचलित चतुर वानर मकर को फुसलाकर तट स्थित पेड़ पर वापस पहुँच जाता है तथा मकर की भर्त्सना करता है। कुछ प्रकारान्तर से यह कथा (चूल कुणाल वर्ग), संसुमार्ग जातक एवं वानरेन्द्र जातक में वर्णित है।1 

बक कर्कट-इस शिल्पकलाकृति में धूर्त बगुले द्वारा सरोवर सूखने का भय प्रचारित कर उस सरोवर में रहने वाली समस्त मछलियों को अन्यत्र ले जाकर कपटपूर्वक खाये जाने तथा केकड़े द्वारा मृत मछलियों की एकत्र अस्थियों को देखकर व बगुले की धूर्तता समझ में आने पर उसके गले में अपने धारदार डंक गड़ाकर उसका प्राणान्त करने की कथा है। यह जातक कथा के कुलावक वर्ग में विद्यमान है।2

यहीं पर संकेत रूप में रूपायित अन्य जातक कथाएँ निम्नलिखित हैं- 

0 उलूक का अंकन समस्त पक्षियों द्वारा राजा चयन करने की कथा का प्रतीक है। इस कथा में कौवे के द्वारा विघ्न उत्पन्न किया जाता है; अंततः उलूक राज्याभिषेक से वंचित हो जाता है। यह कथा कोसिय वर्ग अन्तर्गत उलूक जातक में वर्णित है।3 
0 महिष का अंकन शांत महिष तथा एक उत्पाती वानर की कथा से संबंधित है। उत्पाती वानर महिष की पीठ पर चढ़कर उसे अनेक प्रकार से तंग करता था। शांत महिष वानर के उत्पात को सहन करता रहा। किसी दूसरे महिष को इसी प्रकार तंग करने पर उसके सींग के प्रहार से आहत होकर वानर की मृत्यु हो जाती है। यह कथा अरण्य वर्ग के महिष जातक में मिलती है।4 
0 कुक्कुट का रूपांकन रात्रिकाल में असमय बाँग देने वाले कुक्कुट की कथा का परिचायक है। कुक्कुट के अवांछनीय कर्म के कारण गुरुकुल में अध्ययनरत पीड़ित विद्यार्थियों द्वारा उस कुक्कुट की हत्या कर दी जाती है। यह कथा हंसीवर्ग अन्तर्गत अकालरावी जातक में वर्णित है।5 

सिरपुर में अब तक लगभग 8 बौद्ध विहार तथा अनेक शैव एवं वैष्णव मंदिर उत्खनन से प्रकाश में आये हैं। किन्तु महातीवरदेव विहार के अतिरिक्त किसी भी अन्य स्मारक पर इस प्रकार का कथात्मक अंकन नहीं है। अपवाद रूप में मल्हार (जिला बिलासपुर) में एक भग्न स्तंभ पर कच्छप और हंसों का अंकन है। यहाँ दो हंसों को एक लकड़ी को मुँह में दबाये उसके मध्य से लटकते कच्छप को आकाश मार्ग से अन्यत्र ले जाते दिखाया गया है। नीचे स्थित बालक वृन्द इस दृश्य को देखकर हर्षित हो रहे हैं। यह कलाकृति 7 वीं 8वीं शती में निर्मित मानी जा सकती है। यह कथा वीरणत्थम्भक वर्ग में कच्छप जातक के अन्तर्गत वर्णित है।6 

महातीवरदेव विहार के प्रवेश द्वार पर प्रदर्शित विवेच्य कलाकृतियों में जातक कथाओं की उपस्थिति सुसंगत है क्योंकि एक तो वे बौद्ध विहार के प्रवेश द्वार पर अंकित हैं और दूसरे यहाँ बुद्ध के पूर्व जन्म से संबंधित कथाएँ संकेत रूप में प्रदर्शित हैं। 

इसी विहार के सभा मंडप की भित्तियों पर प्रदर्शित एक फलक में प्रणय-अनुराग का रोचक अंकन है। इसमें दो अश्वमुखी यक्षणियों के मध्य एक रूपवान तरुण विवश बैठा है (चित्र 26.4)। दाहिनी ओर स्थित यक्षिणी तरुण की भुजा पकड़कर अपनी ओर खींच रही है तथा बायीं ओर की यक्षिणी उसके गले में लिपटे हुए उत्तरीय को पकड़े है। ऐसा प्रतीत होता है कि युवक साधक को साधना मार्ग से पतित करने के लिये दोनों यक्षणियाँ उद्यत हैं। यह भी कह जा सकता है कि कामुक यक्षणियाँ तरुण के सौंदर्य पर मोहित हो उसे अपने वश में करना चाह रही हैं। इसी के निकट अन्य फलक में चषक पकड़े हुए एक आसनस्थ प्रौढ़ पुरुष (कुबेर?) का अंकन है। उसके बायीं ओर स्थित सेवक सुराही पकड़े चषक भरने के लिए उद्यत है। समीप ही पुरुष के दाहिनी ओर स्थित नारी खिन्न (?) मुद्रा में खड़ी है। पुरुष के शिरोभाग पर अंकित प्रभामंडल देवत्व का द्योतक है। यहीं पर पार्श्व भाग में दो ओर एक-एक वानर भी रूपायित हैं। इन दृश्यों की पहचान अपेक्षित है। 

इसी विहार के अर्धमंडप में स्थित आखेटक युगल का चित्रण अत्यन्त प्रभावोत्पादक और वन्य संस्कृति का परिचायक है। आखेटक के हाथ में धनुष-बाण है जो रस्सी से बंधे श्वान को भी पकड़े हुए हैं। बायीं ओर स्थित उसकी गृहिणी के मस्तक पर टोकरी है तथा बायें हाथ से उसने शिशु को पकड़ा है। विहार के प्रवेश द्वार पर अंकित एक कथा दृश्य में कुएँ के भीतर स्थित विवर से एक सर्प निकल कर मेंढक को खा रहा है। इसका संबंध पंचतंत्र की कथा से जोड़ा जा सकता है (पंचतंत्र, काकोलूकीय तंत्र, मंडूक मंद विष सर्प कथा)। इस कथा के अनुसार एक वृद्ध सर्प कुएं के भीतर रहने वाले मेंढकों को फण पर बैठाकर घुमाता था और खा जाता था। सभी मेंढकों के स्माप्त हो जाने पर वह मेंढकराज के पुत्र को ही निगल गया। कलात्मकता की दृष्टि से गजयूथ विहार तथा मेढ़ों का युद्ध भी दर्शनीय है। पंक्तिबद्ध मूषकों का द्रुतगति से पलायन पंचतंत्र के हिरण्य ताम्रचूड़ कथा से समीकृत किया जा सकता है। 

वैसे महातीवरदेव विहार वाली कथाओं को कुछ विद्वान पंचतंत्र की कथाओं से जोड़ते हैं जो अधिक युक्तिसंगत नहीं लगता।

अन्य कलाकृतियाँ 

सिरपुर से प्राप्त उत्खनित देव प्रतिमाओं में हारीति, कार्तिकेय, नदी देवियां, गौरी, दिक्पाल, चामुंडा आदि विशिष्ट हैं। हारीति की एक सुन्दर प्रतिमा उत्खनित विहार के मंडप की भित्ति में जड़ी हुई मिली है। इससे सिरपुर के समस्त बौद्ध विहारों में हारीति तथा जंभल की स्थापना भी सुनिश्चित है। कार्तिकेय की एक भग्न प्रतिम में वाहन मयूर तीन शीर्षयुक्त प्रदर्शित हैं।7 

एक शैव मंदिर के प्रवेश द्वार पर दोनों ओर की शाखाओं पर नदी देवियों का युग्म प्रदर्शित है। मुख्य नदी देवी के साथ उसी के सदृश्य आकार, परिधान तथा अन्य लक्षणों वाला प्रतिरूप किंचित भेद से रूपयित किया गया है। इस अंचल के इसी कला शैली के सिद्धेश्वर मंदिर, पलारी में भी नदी देवियाँ युग्म रूप से प्रदर्शित है। 

गौरी की एक खंडित पाषाण प्रतिमा लक्षणों की दृष्टि से उल्लेखनीय है (चित्र 26.5)। इस प्रतिमा के वितान पर सूर्य, पंचाग्नि और चन्द्र का अंकन है। इसके नीचे एक ओर शिवलिंग तथा दूसरी ओर गणेश हैं। अन्य लक्षणों में यज्ञवेदी, गोह तथा सर्प अवशिष्ट हैं। दिक्पाल प्रतिमाएँ यहाँ विलग तथा भग्नप्रायः स्थिति में मिली हैं। यहाँ के भग्न बालेश्वर शिव मंदिर के प्रवेश द्वार पर दिक्पाल ऊर्ध्वक्रम में संयोजित रहे हैं। उनमें से ऊपर की ओर भग्न वायु तथा नीचे मेषारूढ़ अग्नि स्पष्ट हैं। इस मंदिर के प्रवेश द्वार पर ऊर्ध्व तथा क्षैत्तिजीय क्रम में दिक्पालों का अंकन महत्त्वपूर्ण है।

इसी सन्दर्भ में शाक्त संप्रदाय से संबंधित षड्‌भुज चामुंडा की प्रतिमा का उल्लेख आवश्यक है (चित्र 26.6)। देवी शीर्ष विहीन शव पर आसीन है, जटाभार पर कुंडलित नाग तथा भालपट्ट पर कपाल अक्ति है, मस्तक पर त्रिनेत्र तथा कर्णलुंबी पर बेलनाकार ताटंक झूल रहे हैं। अस्थिस्तना देवी के बायें कंधे पर नरमुंडों का उपवीत है; ऊपर के दाहिने हाथ में मणिविभूषित नाग तथा बायें हाथ में उलूकदंड (ध्वज) है। शव का विच्छिन्न शीर्ष देवी के निचले बायें हाथ में है। शवासीन देवी शव के अंतड़ियों को उसके उदर से खींचकर भक्षण कर रही हैं। प्रतिमा के अधिष्ठान भाग पर शव का मांस नोचते और भक्षण करते हुए श्रृगाल-श्रृगाली तथा गृद्ध साथ-साथ अंकित हैं। चामुंडा की वीभत्स तथा उग्र मुखाकृति तंत्र शास्त्रों में वर्णित लक्षणों से परिपूर्ण है। कला प्रतिमानों की दृष्टि से यह प्रतिमा दक्षिण कोसल की उत्कृष्ट कलाकृतियों में एक है। 

सिरपुर में कृष्णलीला और महाभारत से संबंधित पात्र भी दर्शनीय हैं। सोमवंशी कलाशैली के वैष्णव मंदिरों में कृष्णलीला से संबंधित दृश्यों में पूतना वध, केशीवध, ऊखल बंधन (यमलार्जुन उद्धार) आदि दृश्य प्राप्त होते हैं। लक्ष्मण मंदिर के प्रवेश द्वार पर भी कृष्ण लीला के अनेक दृश्य रूपायित हैं। संग्रहालय की एक कलाकृति में कृष्ण अश्वरूपधारी केशी दैत्य के साथ युद्ध कर रहे हैं। यह एकाश्म कलाकृति लगभग 4 1/2 फीट ऊँची है तथा विदर्भ के वाकाटक गुप्तयुगीन कलाकृति के समतुल्य है। अन्य प्रदर्शित कलाकृतियों में भग्न धनुर्धर योद्धा का उर्ध्व भाग तथा अवशिष्ट अधिष्ठान पर अश्व सहित रथ रूपायित है। राजीवलोचन मंदिर, राजिम तथा कलचुरि कालीन अन्य स्मारकों से भी ऐसी प्रतिमाएँ प्राप्त हुई हैं। इस वर्ग की प्रतिमाओं की पहचान लक्षणों के आधार पर महाभारत के पराक्रमी योद्धा कर्ण तथा अर्जुन से की जा सकती है। सोमवंशी काल के राजीवलोचन मंदिर के मंडप के अर्धस्तंभ पर एक ओर कर्ण तथा दूसरी ओर अर्जुन की प्रतिमा स्थापित है। एक भग्न स्थापत्य खंड पर शिव-पार्वती के द्यूत क्रीड़ा का अंकन है। यह खंडित भाग किसी शैव मंदिर के प्रवेश द्वार के पार्श्व भाग अथवा मंडप में रहा होगा। यहाँ शिव तथा पार्वती परस्पर सम्मुख बैठे चौसर खेल रहे हैं। दोनों के मध्य लम्बवत ऊर्ध्व स्थिति में चौसर रखा है। द्यूत क्रीड़ा में शिव अपनी संपत्ति के साथ अपने वाहन नंदी को भी हार चुके हैं। विजयिनी पार्वती की सखियाँ नंदी को ढकेलती पीटती हुई पार्वती की ओर ले जा रही हैं। पीछे की ओर स्थित शिवगण व्यथित हैं। परवर्ती काल में गुर्जर प्रतिहार (बिनैका, सागर जिला), परमार और कलचुरि कला शैली में भी चौसर क्रीड़ा विविधताओं के साथ रूपायित है।

सिरपुर की अन्य सामग्री 

श्री अरुण कुमार शर्मा के निर्देशन में सिरपुर उत्खनन से बौद्ध धर्म से संबंधित 86 धातु प्रतिमाएँ मिली हैं (वर्ष 2004 में टीला क्र. एसआरपी 10 से सात एवं वर्ष 2008 में उन्यासी)। ये साँचे में ढालकर बनायी गयी हैं तथा इनके आभूषणों में मूल्यवान रत्नों का उपयोग किया गया है। इनमें बुद्ध, तारा, मैत्रेय, वज्रपाणि, जंभल, वसुधारा, मंजुघोष, प्रज्ञापारमिता आदि महत्त्वपूर्ण हैं। बौद्ध प्रतिमाओं के अतिरिक्त धातु के स्तूप भी उत्खनन से ज्ञात हुए हैं। कुछ बौद्ध प्रतिमाओं के पृष्ठ भाग पर बौद्ध मंत्र युक्त गोलाकार मुहरें जड़ी हुई हैं। जंभल की प्रतिमा निधि पात्र सहित तथा हारीति की प्रतिमा शिशु सहित रूपायित है। उत्खनन से आवासीय संरचना, भूगर्त भंडारण कक्ष, मार्ग-वीथिकाएँ, अभिनय-व्याख्यान मंच, तोरण मंडप, देवालयों के गज-अश्व तथा वृषभों को बांधने के लिए प्रस्तर निर्मित छिद्रयुक्त खूंट आदि की भी जानकारी उपलब्ध है। यहाँ से प्राप्त पाषाण लेख, ताम्रपत्र, अभिलिखित मुहरें तथा अन्य राजवंशों के सिक्के भी उल्लेखनीय हैं। कुछ कलाकृतियाँ शरभपुरीय शासकों के काल में बनी ज्ञात होती हैं। ऐसी प्रतिमाओं में गंधेश्वर मंदिर में रखी वामन और गरुड़ासीन विष्णु (यह प्रतिमा चोरी हो जाने से अब लुप्त है), लक्ष्मण मंदिर के गर्भगृह में रखी नागराज अथवा शेष और केशीवध की शिल्पाकृतियाँ मुख्य हैं। सिरपुर के बौद्ध विहार (आनंदप्रभ कुटी विहार तथा स्वस्तिक विहार) के गर्भगृह में प्रदर्शित विशालकाय प्रतिमाएँ पृथक-पृथक तराशे गये पाषाण खंडों को जोड़ कर निर्मित हैं। यहाँ की अधिकांश बुद्ध प्रतिमाएँ भू-स्पर्श मुद्रा में हैं। व्याख्यान मुद्रा में बुद्ध की मात्र एक प्रतिमा यहाँ से ज्ञात है। मुचलिन्द बुद्ध की एक प्रतिमा स्थानीय संग्रहालय में रखी है। कुछ विद्वान इसे तीर्थंकर पार्श्वनाथ की प्रतिमा मानते हैं। बौद्ध धर्म से संबंधित अन्य अवशेषों में महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय में संग्रहीत मंजुश्री, वज्रपाणि, अवलोकितेश्वर, आयागपट, धातु निर्मित लघु आकार के स्तूप तथा बुद्ध की प्रतिमाएँ, बौद्ध बीजमंत्र तथा आस्वामूलक अन्य सामग्रियाँ उल्लेखनीय हैं।

सिरपुर के अधिकांश बौद्ध विहारों में मुख्य गर्भगृह के साथ दोनों ओर आनुषंगिक पार्श्ववर्ती कक्ष निर्मित हैं। इनमें मुख्य गर्भगृह में बुद्ध तथा पार्श्ववर्ती कक्षों में अवलोकितेश्वर, वज्रपाणि एवं अन्य प्रतिमाएँ संयोजित रही हैं। उत्खनित विहारों की अन्य विशेषता यह है कि सभी विहार ईटों से निर्मित तथा दुमंजिले हैं। बौद्ध विहारों के संकुल से यह स्पष्ट है कि सिरपुर बौद्ध धर्म का एक प्रसिद्ध केन्द्र था। 

सोमवंशी शासक विशेषतः महाशिवगुप्त बालार्जुन के काल में शैव, वैष्णव और बौद्ध धर्म को राजकीय प्रश्रय प्राप्त रहा है तथा दूरस्थ अंचलों में भी मंदिर तथा विहारों के निर्माण होते रहे हैं। सोमवंशी शासकों की राजमुद्रा में वृषभ अथवा नंदी का अंकन धर्म तथा समाज में गोवंश की प्रतिष्ठा का परिचायक है। 

भग्नावशेषों के रूप में सिरपुर के अतीत के गौरवपूर्ण अध्याय की परतें उत्खनन से प्रकाश में आ रही हैं। पुराविदों, कला मर्मज्ञों के शोध और अध्ययन के लिए सिरपुर एक आदर्श पुरातत्त्वीय स्थल के साथ पर्यटन स्थल भी है। संक्षेप में दक्षिण कोसल के धर्म, ज्ञान-विज्ञान और कला का यह तीर्थ है। 

नोट: सिरपुर क्षेत्र से प्राप्त पार्वती तथा चामुण्डा की मूर्तियाँ प्रतिमा लक्षण की दृष्टि से विशेष महत्व की है। 

पार्वती की प्रतिमा में ‘एकपाद तपस्विनी द्विभुज पार्वती‘ तथा केले के वन (रंभावन) में स्थित ‘सिद्ध‘ गौरी की एकरूपता संकेतित हैं। केले के पेड़ पर चढ़ने वाली गोधा, सूर्य-चन्द्र के कीच मुण्डरूप में पञ्चाग्नि, शिवलिंग के नीचे बना चौकोर अग्निकुण्ड, गणेश के नीचे बना कुण्डलित सर्प तया देवी के पैर के पास बना सिंह इस प्रतिमा की अन्य विशेषताएँ हैं। 

चामुण्डा की प्रतिमा में देवी मस्तक विहीन शव के पेट से लंबी आंत खींचकर हाथ से अपने मुँह में ठूँस रहीं हैं। इस रूप में भीषणता की पराकाष्ठा संकेतित है, जिसे शव के पास विद्यमान दो श्रृंगाल तथा गिद्ध अभिवर्धित कर रहे हैं। देवी के बायें घुटने के नीचे बना अतिरिक्त मस्तक तथा शव की दाहिनी भुजा पर बना पंजा भी विचारणीय है। दूसरा वैशिष्ट्य ‘उलूकध्वज‘ है।

प्रतिमाशास्व की दृष्टि से दोनों कलाकृतियाँ अद्वितीय हैं। - संपादक 

संदर्भ 

1. भदन्त आनन्द कौसल्यान, जातक, तृतीय खण्ड, हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग, 1987, पृ. 297 
2. वही, प्रथम खण्ड, पृ. 295 
3. वहीं, तृतीय खण्ड, पृ. 78 
4. वही, पृ. 106 
5. वही, द्वितीय खण्ड, पृ. 43 
6. वही, पृ. 386