Friday, March 6, 2026

छत्तीसगढ़ : पत्र-पत्रकारिता

1982 में मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, भोपाल से पुस्तक ‘मध्यप्रदेश में पत्रकारिता का इतिहास‘ छपी। विजय दत्त श्रीधर, संपादक और संयोजक, म.प्र. आंचलिक पत्रकार संघ ने ‘आभार‘ लिखा साथ ही पुस्तक में उनके लेख ‘मध्य प्रदेश में पत्रकारिता: उद्भव और विकास‘ तथा ‘ग्वालियर अंचल की पत्रकारिता‘ (ग्वालियर, मुंरैमा, भिण्ड, शिवपुरी, गुना, राजगढ़ और विदिशा जिले) शामिल हैं। अन्य लेख हैं- 

मालवा की पत्रकारिता (इन्दौर, रतलाम, उज्जैन, शाजापुर, झाबुआ, धार, मन्दसौर, देवास और खरगोन जिले) - शिव अनुराग पटैरिया, राजेश बादल 

भोपाल अंचल की पत्रकारिता (भोपाल, सिहोर और रायसेन जिले) -भाई रतनकुमार 

महाकौशल की पत्रकारिता (जबलपुर, दमोह, सागर, नरसिंहपुर, बालाघाट, मण्डला, छिन्दवाड़ा, होशंगाबाद, खण्डवा और बैतूल जिले) - गंगाप्रसाद ठाकुर 

छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता (रायपुर, बिलासपुर, सरगुजा, रायगढ़, दुर्ग, राजनाँदगाँव और बस्तर जिले) - स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी 

विध्य की पत्रकारिता (रीवा, सीधी, पन्ना, शहडोल, छतरपुर, टीकमगढ़ और दतिया जिले) - अम्बाप्रसाद श्रीवास्तव

‘छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता‘ लेख में स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी के साथ, प्रस्तुति-डा. सुशील त्रिवेदी, नाम भी है। पुस्तक का यह अंश- लेख, यहां प्रस्तुत है। 

छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता
-स्वराज्य प्रसाद  त्रिवेदी 
प्रस्तुति-डा० सुशील त्रिवेदी

छत्तीसगढ़ (रायपुर, बिलासपुर, सरगुजा, रायगढ़, दुर्ग, राजनाँदगाँव और बस्तर जिले।) में पत्रकारिता का इतिहास अपेक्षाकृत अधिक पुराना नहीं है। इसका एक कारण तो यह है कि यह इलाका बीहड़ जंगलों और पहाड़ों से भरा हुआ रहा और दूसरा यह कि यहाँ आवागमन के साधन बीसवीं शताब्दी के प्रथम चरण तक अत्यन्त न्यून थे। शिक्षा का कोई प्रसार नहीं था। ऐसी स्थिति में समाचार-पत्रों का प्रकाशन इस क्षेत्र में विलम्ब से शुरू होना स्वाभाविक ही है। 

अभी तक मिली जानकारी के अनुसार वर्तमान राजनाँदगाँव जिले (तत्कालीन राजनाँदगाँव रियासत) से 1889-90 में श्री भगवानदीन सिरौठिया ने ‘प्रजा हितैषी‘ नामक पहला पत्र निकाला था। यह पत्र रियासत के तत्कालीन शासक राजा बलरामदास के संरक्षण में प्रकाशित होता था। दुर्भाग्य से इस पत्र के अंक उपलब्ध नहीं हैं। इस पत्र को रियासती संरक्षण मिला हुआ था, इससे यह अनुमान किया गया है कि इसकी शैली और विचार पर रियासत की छाप थी और यह जनभावनाओं का सच्चा प्रतीक नहीं था। 

छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता का प्रारंभ ‘छत्तीसगढ़ मित्र‘ से माना जाता है। जनवरी 1900 में इस मासिक पत्रिका का प्रकाशन पेण्डरा (बिलासपुर जिला) से प्रारंभ हुआ था। इसके प्रकाशक रायपुर के प्रसिद्ध जनसेवी स्वर्गीय पण्डित वामनराव लाखे और सम्पादक पं० माधवराव सप्रे तथा पं० रामराव चिंचोलकर थे। चिंचोलकर जी बिलासपुर के रहने वाले थे और वकालत करते थे। (उनका स्वर्गवास 1906 में हो गया था)। ‘छत्तीसगढ़ मित्र‘ का मुद्रण पहले रायपुर के कय्यूमी प्रेस से होता था। बाद में वह देशसेवक प्रेस, नागपुर से छपता रहा। 32 पृष्ठ की यह पत्रिका 1/8 डिमाई आकार की थी। इसका वार्षिक शुल्क केवल डेढ़ रु० था। इसके प्रथम और अंतिम 4 पृष्ठ रंगीन कागज के होते थे।

‘छत्तीसगढ़ मित्र‘ के प्रथम अंक में इसके प्रकाशन के उद्देश्यों को बताते हुए संपादक-द्वय ने लिखा ‘सम्प्रति छत्तीसगढ़ विभाग को छोड़ ऐसा एक भी प्रान्त नहीं है जहाँ दैनिक, साप्ताहिक, मासिक या त्रैमासिक पत्र प्रकाशित न होता हो। इसमें कुछ सन्देह नहीं कि सुसम्पादित पत्रों के द्वारा हिन्दी भाषा की उन्नति हुई है, अतएव यहाँ भी ‘छत्तीसगढ़ मित्र‘ हिन्दी भाषा में उन्नति करने में विशेष प्रकार से ध्यान दे। आजकल भाषा में बहुत सा कूड़ा-कर्कट जमा हो रहा है, वह न होने पावे इसलिए प्रकाशित ग्रन्थों पर प्रसिद्ध मार्मिक विद्वानों के द्वारा समालोचना भी कहे।‘

‘छत्तीसगढ़ मित्र‘ हिन्दी को भारत की राष्ट्रभाषा मानता था। यह पत्र हिन्दी को ठोस, सुरुचिपूर्ण, प्रगतिशील साहित्य देना चाहता था। ‘मित्र‘ ने हिन्दी में आलोचना की शुरूआत की थी और क्रमशः उसके स्तर को ऊपर उठाया था। अपने छोटे से काल में उसने तत्कालीन पत्रिकाओं में काफी ऊँचा स्थान अर्जित कर लिया था। देश के प्रायः सभी पत्रों ने उसकी नीति की प्रशंसा की थी और सभी प्रसिद्ध साहित्यकारों ने अपनी रचनाएँ इसमें प्रकाशनार्थ दीं। ‘मित्र‘ के स्तम्भ थे- प्रेरित पत्र, हितबोध, सुभाषित संग्रह, समाचार प्राप्त, नारी धर्म और नारी शिक्षा, लोकोक्ति और कहावत, समालोचना तथा जीवनी। इसमें घारावाहिक लेख भी छपते थे। 

सप्रे जी ने ‘मित्र‘ के माध्यम से लेखकों की एक पीढ़ी तैयार की। इस पत्र में पं० महावीर प्रसाद द्विवेदी, पं० श्रीधर पाठक, पं० कामता प्रसाद गुरु, पं० गंगा प्रसाद अग्निहोत्री, पं० जगन्नाथ प्रसाद शुक्ल जैसे अनेक शीर्षस्थ लेखकों की प्रारम्भिक रचनाएँ छपीं। अर्थाभाव के बाद भी मित्र का प्रकाशन होता रहा। सत्रे जी का अपने पाठकों पर पूरा विश्वास था। फिर भी यह पत्र स्वावलम्बी न बन सका। जनवरी 1902 के अंक में सम्पादकों ने घोषणा कर दी कि ‘यदि इस वर्ष भी घाटा रहा तो समझ लीजिए आपके प्रिय ‘मित्र‘ के 100 वर्ष पूरे हो चुके और फिर यही इसकी आयु का अंतिम वर्ष भी होगा।‘ अंततः दिसम्बर 1902 में इसका प्रकाशन बंद हो गया।

‘छत्तीसगढ़ मित्र‘ का प्रकाशन बन्द होने के बाद एक दीर्घ अन्तराल आया। इसी बीच छत्तीसगढ़ में राजनीतिक सक्रियता आयी। कांग्रेस द्वारा संचालित कार्यक्रम तेजी से चल पड़े। समाज सुधार की और जन नेताओं का ध्यान आकर्षित हुआ। सन् 1914 में रायपुर जिले में पत्रकारिता के क्षेत्र में एक प्रयास हुआ जिसके जरिये ‘कबीर पंथी‘ मासिक का प्रकाशन शुरू हुआ। परंतु यह पत्रिका ज्यादा चल नहीं सकी।

सन् 1919 में रायपुर से कान्यकुब्ज सभा द्वारा ‘कान्यकुब्ज नायक‘ मासिक पत्रिका का प्रकाशन पं० रघुबर प्रसाद द्विवेदी के सम्पादन में किया गया। यह प्रयास भी अल्पजीवी रहा और एक वर्ष चलकर इसका प्रकाशन बन्द हो गया। पत्र का वार्षिक मूल्य दो रुपये था। इस पत्र की व्यवस्था पं० मातादीन शुक्ल के जिम्मे थी।

सन् 1920 से 1930 तक की अवधि पत्रकारिता के विकास की दृष्टि से महत्वपूर्ण रही। इस दौरान महात्मा गांधी का सत्याग्रह आन्दोलन देशव्यापी हो चुका था। विदेशी शासन के प्रति आम जनता का विरोध मुखर हो चला था। कांग्रेस ने आजादी के लिए दो-आयामी कार्यक्रम संचालित किये थे। पहले के द्वारा स्थानीय शासन संस्थाओं और धारा सभाओं के चुनाव लड़ने का निश्चय किया गया और दूसरे कार्यक्रम के तहत सत्याग्रह संचालित करने और सामाजिक उत्थान के रचनात्मक कार्यक्रमों को क्रियान्वित करने को प्राथमिकता दी गयी। पत्रकारिता की दृष्टि से उल्लेखनीय बात यह भी थी कि छत्तीसगढ़ से बाहर जाकर पं० माधवराव सप्रे ने हिन्दी ग्रन्थमाला की नींव डाली और फिर हिन्दी ‘केसरी‘ का सम्पादन किया। ‘कर्मवीर‘ और ‘श्री शारदा‘ के संस्थापन में भी सप्रे जी का प्रमुख प्रभाव था। 1920 में छत्तीसगढ़ के ईसाई समाज ने मसीही मासिक ‘भानूदय‘ मुंगेली से निकालना शुरू किया। इसके सिर्फ चार अंक छपे थे।

तीसरे दशक में बिलासपुर डिस्ट्रिक्ट कौंसिल ने श्री कुलदीप सहाय के सम्पादन में ‘विकास‘ मासिक का प्रकाशन किया था। श्री सहाय ‘विकास‘ के अलावा ‘कर्मवीर‘ तथा ‘महाकोशल‘ के सम्पादन से भी जुड़े थे। 

रायगढ़ जिले के चन्द्रपुर स्थान से 1923 में मनोहर प्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित हिन्दी मासिक ‘छत्तीसगढ़‘ का प्रकाशन आरम्भ हुआ।

सन् 1930 से 1940 तक की अवधि में जैसे-जैसे राष्ट्रीय गतिविधियाँ तेज हुई, वैसे-वैसे छत्तीसगढ़ में पत्रिकारिता का स्वरूप भी पल्लवित-पुष्पित होता गया। रायपुर के वयोवृद्ध पत्रकार श्री कन्हैयालाल वर्मा ने सन् 1934 में नागपुर से प्रकाशित होने वाले पत्र ‘हिन्दवासी‘ का सम्पादन किया। 

सन् 1935 में डिस्ट्रिक्ट कौंसिल, रायपुर द्वारा ‘उत्थान‘ मासिक पत्रिका का प्रकाशन आरम्भ किया गया। इसके सम्पादक पं० सुन्दरलाल त्रिपाठी थे। पत्र इण्डियन प्रेस से प्रकाशित होता था। छपाई अत्यन्त सुन्दर थी। इसमें शिक्षा और साहित्य से संबंधित विषयों पर समानुपात में लेख प्रकाशित होते थे। शिक्षा संस्थाओं और आम लोगों, दोनों के ही बीच यह पत्र बहुत लोकप्रिय था। इसमें छत्तीसगढ़ की राजनीतिक, सामाजिक, साहित्यिक, शैक्षणिक और सांस्कृतिक चेतना प्रतिबिम्बित होती थी। जब सरकार ने रायपुर डिस्ट्रिक्ट कौंसिल को भंग कर दिया तब ‘उत्थान‘ को 1937 के बाद बन्द कर दिया गया। छत्तीसगढ़ का यह महत्वपूर्ण मासिक-पत्र लगभग साढ़े तीन वर्ष तक प्रकाशित हुआ। पण्डित नेहरू तथा डा० राजेन्द्र प्रसाद जैसे शीर्ष नेताओं ने भी इस प्रकाशन को सराहा था। 

सन् 1935 में रायपुर से मासिक पत्रिका ‘आलोक‘ का प्रकाशन आरम्भ हुआ। इसका प्रकाशन हिन्दी साहित्य मण्डल द्वारा किया जाता था और श्री केशव प्रसाद वर्मा तथा श्री स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी इसका संपादन करते थे। इस पत्रिका ने छत्तीसगढ़ की साहित्यिक सक्रियता को बढ़ाने में उल्लेखनीय योगदान किया था। श्री केशव प्रसाद वर्मा के संपादकत्व में पटेरिया बुक डिपो, रायपुर, ने शैक्षणिक पत्रिका ‘शिक्षा‘ के भी कुछ अंक प्रकाशित किये। 

सन् 1936 में धारा सभा के चुनाव के बाद प्रथम बार सन् 1937 में तत्कालीन मध्य प्रान्त और बरार में कांग्रेसी मंत्रिमण्डल बना था। कांग्रेस के उद्देश्यों के प्रचार-प्रसार के लिए रायपुर से पहली बार साप्ताहिक ‘कांग्रेस पत्रिका‘ का प्रकाशन शुरू किया गया। इसके संपादक सर्वश्री नन्द कुमार दानी, गौरीशंकर आगम तथा स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी थे। 

सन् 1936 में दुर्ग से ‘हैहयवंश‘, सन् 1937 में सरगुजा से ‘सरगुजा सन्देश‘ और धमतरी से ‘नवयुवक‘ पत्रों का प्रकाशन हुआ। 1940 में राजकुमार कालेज ने अर्द्धवार्षिक पत्र ‘मुकुट‘ का प्रकाशन शुरू किया। 

वर्ष 1941 से शुरू होने वाले दशक में छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता का विकास ज्यादा तेज गति से हुआ। दैनिक, साप्ताहिक और मासिक पत्रों के प्रकाशनों की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि हुई। 

रायपुर जिला 
छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता को ‘अग्रदूत‘ के प्रकाशनारम्भ से जबरदस्त शक्ति मिली थी। विदेशी हुकूमत के विरुद्ध इस साप्ताहिक अखबार (सम्पादक केशव प्रसाद वर्मा और श्री स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी) ने जबरदस्त अभियान चलाया। छत्तीसगढ़ का यह पहला राष्ट्रवादी समाचार पत्र 20 जून 1942 से रायपुर में छपना शुरू हुआ था। सन् 1943 में प्रांतीय प्रेस सलाहकार समिति के संयोजक ने इसके सम्पादकों को ‘आपत्तिजनक सामग्री के प्रकाशन‘ के लिए दो बार चेतावनी दी थी। सितम्बर 1943 में इसके सम्पादकों को तीन माह के लिए जाँच आदेश दिये गये। 1943 की अंतिम तिमाही में श्री केशव प्रसाद वर्मा के गिरफ्तार होने पर इस अखबार का प्रकाशन अस्थायी तौर पर स्थागित कर दिया गया जो 1944 में फिर शुरू हुआ। यह साप्ताहिक अभी भी प्रकाशित हो रहा है। सम्पादक हैं श्री विष्णु सिन्हा। ‘अग्रदूत‘ में प्रकाशित होने वाली राजनीतिक डायरी बहुत लोकप्रिय हुआ करती थी। 

सन् 1943-44 में श्री शिवनारायण द्विवेदी के सम्पादन में ‘सावधान‘ साप्ताहिक का रायपुर से कुछ समय तक प्रकाशन हुआ था। श्री द्विवेदी हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार हैं और वर्तमान में ‘नवभारत‘ (नागपुर) से जुड़े हुए हैं। ‘नवभारत‘ का रायपुर संस्करण उन्हीं के संपादकत्व में आरंभ हुआ था। 

पंडित रविशंकर शुक्ल द्वारा नागपुर से साप्ताहिक ‘महाकोशल‘ का प्रकाशन किया जाता था। इसके सम्पादक श्री सांताचरण दीक्षित और श्री कुलदीप सहाय जैसे वरिष्ठ पत्रकार थे। बाद में, मार्च 1946 में यह पत्र रायपुर आ गया और श्री स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी के संपादन में प्रकाशित होने लगा। 

साप्ताहिक ‘महाकोशल‘ शीघ्र ही छत्तीसगढ़ का प्रमुख समाचार-पत्र बन गया। वर्ष 1948 में श्री श्यामाचरण शुक्ल भी ‘महाकोशल‘ के सम्पादन कार्य में सहयोगी बन गये। 

वर्ष 1951 में ‘महाकोशल‘ दैनिक हो गया। छत्तीसगढ़ से प्रकाशित होने वाला यह पहला दैनिक है। छत्तीसगढ क्षेत्र के प्रायः सभी वरिष्ठ पत्रकार अपने प्रारंभिक समय में इससे जुड़े रहे। सन् 1954 में जब श्री त्रिवेदी शासकीय सेवा में चले गये तब विश्वनाथ वैशम्पायन इसके सम्पादक बने। उनके बाद सर्वश्री विष्णुदत्त मिश्र तरंगी, गुरुदेव कश्यप, कमल दीक्षित इसके सम्पादक रहे। शासकीय सेवा से निवृत्त होने पर श्री स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी 1979 में पुनः इसके सम्पादक बने। सम्प्रति श्री कमल ठाकुर इसके सम्पादक हैं। 

सन् 1947 में ‘छत्तीसगढ़ केशरी‘ का प्रकाशन शुरू हुआ। 1952 में इसका नाम ‘हिन्द केशरी‘ कर दिया गया। इस नाम से यह तीन वर्ष तक निकलता रहा। सन् 1948 में ‘श्री‘ नाम की साहित्यिक मासिक पत्रिका का प्रकाशन शुरू हुआ। यह पत्रिका 1952 में बन्द हो गयी । 

1948 में श्री घनश्याम प्रसाद ‘श्याम‘ के सम्पादन में ‘नव ज्योति‘ मासिक का प्रकाशन शुरू हुआ। श्री श्याम सुकवि थे और उनके सम्पादन में ‘नव ज्योति‘ एक अच्छी साहित्यिक पत्रिका के रूप में कुछ वर्षों तक प्रकाशित होती रही। 
छत्तीसगढ़ के एक प्रमुख राजनीतिक नेता ठाकुर प्यारेलाल सिंह ने 4 सितम्बर 1950 से ‘राष्ट्रबन्धु‘ नामक समाचार-पत्र का प्रकाशन शुरू किया। यह अर्द्धसाप्ताहिक था और तत्कालीन शासन की नीतियों का कटु आलोचक था। 1953 में ठाकुर साहब सर्वाेदय आंदोलन में चले गये तो यह पत्र एक स्वतंत्र साप्ताहिक बन गया। अगले वर्ष इसका प्रकाशन बन्द हो गया। 1961 में फिर शुरू हुआ और बन्द हो गया। किन्तु 1967 में श्री हरि ठाकुर के सम्पादन में ‘राष्ट्रबन्धु‘ पुनः प्रकाशित होने लगा। 

सन् 1950 के पहले गास मेमोरियल सेन्टर, रायपुर, से ‘मसीही आवाज‘ का प्रकाशन शुरू हुआ। इसी के आसपास ‘साथी‘ नामक साप्ताहिक पत्र भी प्रकाशित हुआ था। इसके संपादक श्री राजेन्द्र कुमार चौबे थे। कबीर पंथियों ने रायपुर से ‘वंश प्रताप मणि माला‘ का प्रकाशन मासिक के रूप में शुरू किया। 

सन् 1950 में महासमुन्द से मासिक ‘सेवक‘ का प्रकाशन हुआ किन्तु एक वर्ष चल कर यह बन्द हो गया। इसी वर्ष रायपुर से श्री घनश्याम प्रसाद ‘श्याम‘ ने साप्ताहिक ‘नव राष्ट्र‘ निकाला। यह स्वतंत्र विचारधारा का पत्र था। इसकी प्रसार संख्या सीमित थी किन्तु प्रभाव अच्छा था। यह समाचार-पत्र लगभग ग्यारह वर्ष तक निकलता रहा। इस अवधि में कई बार उसका प्रकाशन स्थगित भी हुआ। रायपुर से वर्ष 1951 में ‘रायपुर समाचार‘ निकला। यह साप्ताहिक था, जो सिर्फ एक साल चला। 

रायपुर जिले से पहला अंग्रेजी पत्र 1953 में जगदीशपुर से प्रकाशित हुआ। मेनोनाइट मिशन की सामान्य सभा द्वारा प्रकाशित इस त्रैमासिक पत्र का नाम था, ‘इण्डिया कालिग‘। वर्ष 1953 में इसका सिर्फ एक अंक प्रकाशित हुआ, फिर इसका प्रकाशन बन्द हो गया। वर्ष 1956 में इसका पुनः प्रकाशन हुआ। रायपुर से 27 नवम्बर 1959 से ‘प्रिज्म‘ नामक अंग्रेजी साप्ताहिक कुछ समय के लिए निकला। दिसम्बर 1960 में रायपुर से श्री क्रांति कुमार द्विवेदी ने अंग्रेजी साप्ताहिक ‘वाल्कैनो‘ शुरू किया। पर यह पत्र ज्यादा समय तक चल नहीं सका। 

1954 में गास मेमोरियल सेंटर, रायपुर ने हिन्दी और सिधी में ईसाई धर्म की पत्रिका ‘प्रकाश‘ निकालना शुरू किया। इसका प्रकाशन 1958 में बन्द हो गया। सिन्धी पाठकों के लिए 1955 में निर्दलीय साप्ताहिक ‘लोक सेवा‘ का प्रकाशन शुरू किया गया। किन्तु एक अंक के बाद ही इसका प्रकाशन बन्द हो गया। इसी वर्ष महासमुन्द से ‘लोकसेवा‘ नामक हिन्दी पत्र निकला जो 1956 तक चला। धमतरी के पास शांतिपुर के मेनोनाइट चर्च ने 1956 में हिन्दी साप्ताहिक ‘मेनोनाइट पत्रिका‘ का प्रकाशन शुरू किया। यह पत्रिका कुछ वर्षों तक चली। 

वर्ष 1956 में श्री खूबचन्द बघेल ने ‘छत्तीसगढ़‘ साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन आरम्भ किया जो प्रजा सोशलिस्ट पार्टी का प्रवक्ता पत्र था। इसका प्रकाशन जनवरी 1958 में बन्द हो गया। भारत सेवक समाज की रायपुर जिला शाखा ने 1956 में ‘भारत सेवक‘ नामक मासिक पत्रिका निकाली जो 1960 तक चली। महासमुन्द में आर्य समाज ने आदर्श भारती‘ नामक मासिक का प्रकाशन 1957 में शुरू किया। यह पत्रिका रायपुर जिले में ईसाई मिशन के अभियान की कटु आलोचक थी। इसी वर्ष रायपुर से हिन्दी साप्ताहिक ‘रायपुर टाइम्स‘ का प्रकाशन शुरू हुआ। 

वर्ष 1959 पत्रकारिता के इतिहास की दृष्टि से उल्लेखनीय है। इस वर्ष चार सामयिकी के अतिरिक्त यहाँ से दो दैनिक पत्रों का प्रकाशन आरम्भ हुआ। 9 अप्रैल 1959 को ‘नवभारत‘ श्री शिवनारायण द्विवेदी के सम्पादकत्व में और 19 अप्रैल 1959 को ‘नई दुनिया‘ श्री मायाराम सुरजन के संपादन में निकलने लगा। बाद में ‘नई दुनिया‘ ने दैनिक ‘देशबन्धु‘ नाम ग्रहण कर लिया। 

1960 से श्री गोविन्दलाल वोरा ‘नवभारत‘ के सम्पादक हैं। श्री वोरा रायपुर विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग के अध्यक्ष भी रहे। अब यह जिम्मेदारी ‘नवभारत‘ की उप-संपादक श्रीमती आशा शुक्ला सम्हाल रही हैं। ‘नवभारत‘ के नरेन्द्र पारख ने गत वर्ष वीरनारायण सिंह पुरस्कार पाया। 

ग्रामीण पत्रकारिता को नये आयाम देने वाले ‘देशबंधु‘ का सम्पादन श्री ललित सुरजन कर रहे हैं। एक लम्बी अवधि तक श्री रामाश्रय उपाध्याय इसके स्थानीय सम्पादक रहे। ग्रामीण पत्रकारिता का स्टेट्समैन पुरस्कार स्थापना के प्रथम वर्ष ही ‘देशबंधु‘ के श्री राजनारायण मिश्र ने जीता। दूसरे और तीसरे साल भी क्रमशः श्री गिरिजा शंकर और श्री जिया उल हुसैनी ने यह गौरव पाया। ललित जी पत्रकारिता विभाग के अध्यक्ष भी रहे। 

साप्ताहिक ‘ठोकर‘ का प्रकाशन 23 जनवरी 1959 को शुरू होकर 1961 में बन्द हो गया। 

रायपुर का पहला सांध्य दैनिक ‘मध्यप्रदेश‘ 4 अक्टूबर 1959 को निकला, पर शीघ्र ही यह बन्द हो गया। इसी वर्ष दो पाक्षिकों, ‘नया कदम‘ और ‘रिपब्लिक‘ का प्रकाशन शुरू हुआ। 

वर्ष 1960 में ग्यारह समाचार पत्र निकले। इनमें 26 नवम्बर 1960 से शुरू हुआ सांध्य दैनिक ‘विचार और समाचार‘ उल्लेखनीय था। इसके सम्पादक श्री विश्वनाथ वैशम्पायन थे। बाद में यह साप्ताहिक के रूप में प्रकाशित होने लगा। सुसम्पादन के लिए यह प्रशंसित हुआ था। इसका प्रकाशन लगभग सात वर्ष तक हुआ। अर्द्ध साप्ताहिक पत्र ‘रायपुर न्यूज‘ का प्रकाशन 30 अप्रैल 1960 से शुरू हुआ था। श्री किशोरीलाल मिश्र इसके सम्पादक थे। ‘एम०पी० टाइम ऐण्ड टाइड‘ नामक अंग्रेजी साप्ताहिक भी इसी समय निकला। फरवरी 1960 से ‘राय चक्र‘ नामक साप्ताहिक निकलना शुरू हुआ परन्तु आपत्तिजनक सामग्री का प्रकाशन करने के कारण इसका प्रकाशन स्थगित हो गया। इसी अवधि में महासमुन्द से ‘छत्तीसगढ़ समाचार‘, ‘श्यामसुन्दर‘ और ‘तहलका‘ साप्ताहिक निकला। रायपुर से ‘बढ़ते चलो‘, ‘हमराही‘, ‘सिने तरंग‘ और ‘ग्राम दर्शन‘ का प्रकाशन हुआ। 

रायपुर से एक अन्य दैनिक ‘युगधर्म‘ का प्रकाशन 26 जनवरी 1961 से शुरू हुआ। प्रथम संपादक श्री पद्माकर भाटे थे। बीच में श्री रामावतार शर्मा भी संपादक रहे। अब इसके सम्पादक श्री बबन प्रसाद मिश्र हैं। इसी वर्ष ‘अनमोल‘, ‘जननाद‘, ‘जागते रहो‘, ‘भारत टाइम्स‘ साप्ताहिक पत्रों और ‘सहयोग दर्शन‘ मासिक का प्रकाशन शुरू हुआ। 26 जनवरी 1962 से साप्ताहिक ‘नभ‘ का प्रकाशन शुरू हुआ। श्री मधुकर खेर इसके सम्पादक थे। 5 अंकों के बाद ‘नभ‘ बन्द हो गया। 

वर्ष 1964 और 1970 के बीच रायपुर से एक सांध्य दैनिक, दो अर्द्ध साप्ताहिक, पन्द्रह साप्ताहिक, तीन पाक्षिक, दो मासिक, एक द्वैमासिक और एक त्रैमासिक का प्रकाशन शुरू हुआ। इनमें से ‘समाचार दर्पण‘ नियमित रूप से साप्ताहिक के रूप में दो वर्ष (1964-65) तक प्रकाशित हुआ। श्री कुमार साहू इसके सम्पादक और श्री कनक राम कोठारी प्रकाशक थे। इसी तरह ‘रायपुर सन्देश‘ सांध्य दैनिक भी मई 1966 में निकला जो 25 अक्टूबर 1967 को बन्द हो गया। जुलाई 1966 से निकलने वाला साप्ताहिक ‘स्नातक‘ विद्यार्थियों के बीच बहु-प्रसारित था किन्तु इसका प्रकाशन भी अक्टूबर 1969 में बन्द हो गया। अक्टूबर 1965 से ‘साजना‘ मासिक का प्रकाशन शुरू हुआ। यह साहित्यिक पत्रिका थी। इसका प्रकाशन डेढ़ वर्ष तक हुआ। 1964 में विवेकानन्द आश्रम ने त्रैमासिक ‘विवेक ज्योति‘ का प्रकाशन शुरू किया। यह पत्रिका आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विषयों की है। 

रायपुर के अन्य पत्रों में स्वर्गीय गजानन माधव मुक्तिबोध तथा जयनारायण पांडे की स्मृति में अक्टूबर, 1965 से श्री हरि ठाकुर के संपादन में मासिक ‘संज्ञा‘, ‘हस्ताक्षर‘ (विभु खरे), ‘छत्तीसगढ़ी‘ (दयाशंकर शुक्ल), ‘छत्तीसगढ़ केसरी‘ (दीपचन्द डागा), ‘जवाहर ज्वाला‘ (साप्ताहिक), ‘छत्तीसगढ़ सेवक‘ (पाक्षिक), ‘लोकशक्ति‘ (सांध्य दैनिक), ‘प्रजापुकार‘ (साप्ताहिक), ‘गाइड‘ (उर्दू साप्ताहिक), ‘आजाद कलम‘ (साप्ताहिक), ‘सन्मार्ग‘ (साप्ताहिक), ‘कमलनंद‘ (पाक्षिक), ‘विजेता‘ (साप्ताहिक), ‘पहरेदार‘ (साप्ताहिक), ‘विजययंत‘ (साप्ताहिक), ‘तिनका‘ (साप्ताहिक), ‘सम्वाददाता‘ (साप्ताहिक), ‘कुरुद केसरी‘ (पाक्षिक), ‘गोंडवाना‘ (साप्ताहिक), ‘पुष्पहार‘ (साप्ताहिक), ‘अपने ग्रन्थ‘ (मासिक), शामिल हैं। भाटापारा से ‘भाटापारा टाइम्स‘ (साप्ताहिक) 1972 में निकलना शुरू हुआ। 

रायपुर से 5 अगस्त, 1974 को श्री गोविन्दलाल वोरा के सम्पादकत्व में आंग्ल दैनिक ‘मध्यप्रदेश क्रानिकल‘ निकला। दूसरा अंग्रेजी दैनिक ‘हितवाद‘ सितम्बर 1974 में निकला (सं० श्री रामचन्द्र संगीत) जो 1974 में ही बंद हो गया। 

रविशंकर विश्वविद्यालय ने 1968-69 में पत्रकारिता के अध्ययन की विशेष व्यवस्था की और स्नातक उपाधि (बी० जे०) पाठ्यक्रम शुरू किया। 

रायपुर के वरिष्ठ पत्रकारों में श्री मधुकर खेर का उल्लेखनीय स्थान है। वे प्रेस ट्रस्ट आव् इंडिया, ‘टाइम्स आव् इंडिया‘, ‘इंडियन एक्सप्रेस‘ आदि के सक्रिय सम्वाददाता हैं। 

आज भी रायपुर मध्यप्रदेश का प्रमुख समाचार केन्द्र है और यहाँ के दैनिक पत्र अत्यन्त सम्मानित और बहुप्रसारित हैं। तीनों प्रमुख समाचार पत्रों- ‘नवभारत‘, ‘देशबन्धु‘ और ‘युगधर्म‘ ने मुद्रण की आफसेट पद्धति अपनाई हुई है। प्रसार संख्या की दृष्टि से रायपुर ‘नवभारत‘ का मध्यप्रदेश में दूसरा स्थान है। 

दुर्ग-राजनाँदगाँव 
जिला सन् 1947 में खैरागढ़ से ‘प्रजा बन्धु‘ पाक्षिक का प्रकाशन आरंभ हुआ परन्तु अगले वर्ष ही वह बन्द हो गया। अक्टूबर 1947 में दुर्ग से ‘जिन्दगी‘ साप्ताहिक निकलना शुरू हुआ। यह स्वतन्त्र रीति नीति का पत्र था। इसके प्रकाशक और सम्पादक श्री केदारनाथ झा ‘चन्द्र‘ थे। 1954 तक यह तीन बार बन्द हुआ और निकला, फिर 1961 में अंतिम रूप से इसका प्रकाशन बन्द हो गया। अगस्त 1948 में राजनाँदगाँव से पाक्षिक ‘स्वतन्त्र भारत‘ का प्रकाशन शुरू हुआ। यह भी बहुत कम समय तक चला। राजनाँदगाँव से ही मार्च 1950 में मासिक ‘चित्र संसार‘ निकला। इसका प्रकाशन उसी वर्ष अक्टूबर माह में बन्द हो गया। 

राजनाँदगाँव से 26 जनवरी 1951 से ‘जनतन्त्र‘ साप्ताहिक का प्रकाशन आरम्भ हुआ। प्रख्यात साहित्यकार डा० बलदेव प्रसाद मिश्र इसके संरक्षक और सम्पादक थे। इसी केन्द्र से 15 अगस्त 1956 को साप्ताहिक ‘सबेरा‘ का प्रकाशन शुरू हुआ और 1962 तक चला। इसके सम्पादक श्री शरद कोठारी थे। अब वे दैनिक ‘सबेरा संकेत‘ निकाल रहे हैं जो जिले का प्रमुख पत्र है। 

दुर्ग से 1958 में ‘ज्वालामुखी‘ का प्रकाशन हुआ जो 1967 तक चला। इसके प्रकाशक श्री कपिलनाथ ब्रह्मभट्ट थे। 1959 में ‘भारत केसरी‘ साप्ताहिक राजनाँदगाँव से निकला जो 1961 तक चला। श्री ब्रह्मभट्ट बड़े जीवट के पत्रकार थे और अनेक पत्रों से सम्वाददाता के रूप में जुड़े रहे। 

सन् 1958 के बाद दुर्ग-राजनाँदगाँव से बहुत से समाचार पत्र निकले किन्तु उनका अस्तित्वकाल अत्यन्त अल्प रहा। ऐसे पत्रों में ‘प्रेरणा‘, ‘अभियान‘ और ‘चेतावनी‘ प्रमुख थे। 1960 में दुर्ग से ‘साहू सन्देश‘ निकलना शुरू हुआ। भिलाई से 1962 में हिन्दी और अंग्रेजी में ‘भिलाई समाचार‘ निकलने लगा। 1963 में दुर्ग से ‘छत्तीसगढ़ सहयोगी‘ (साप्ताहिक), ‘भिलाई श्रमिक आह्वान‘ (साप्ताहिक) और दुर्ग से ही ‘शांति की देवी‘ (मासिक) निकले। 

सन् 1965-67 के दौरान ‘चिन्तक‘ साप्ताहिक (दुर्ग), ‘अग्रवाल जगत‘ साप्ताहिक (दुर्ग), ‘अनन्त‘ मासिक (भिलाई), ‘पञ्च निर्मित‘ साप्ताहिक (बालोद), ‘कामगार मित्र‘ साप्ताहिक (दुर्ग), ‘छत्तीसगढ़‘ अर्द्ध साप्ताहिक (दुर्ग), ‘श्रमदेव‘ (दुर्ग), ‘दुर्ग टाइम्स‘ साप्ताहिक (दुर्ग) और ‘सोशलिस्ट वर्कर‘ अंग्रेजी साप्ताहिक (दुर्ग) प्रकाशित हुए। 

दुर्ग जिले के दो पत्रकारों ने राजनीति में भी अच्छा स्थान बनाया। श्री चन्दूलाल चन्द्राकर राष्ट्रीय दैनिक ‘हिन्दुस्तान‘ के प्रधान सम्पादक रहे और बाद में केन्द्रीय मन्त्रिमण्डल में राज्य मन्त्री रहे। ‘नवभारत‘, ‘नव-भारत टाइम्स‘ तथा अन्य समाचार पत्रों के सम्वाददाता रहे श्री मोतीलाल वोरा ने प्रदेश के जागरूक विधायक के रूप में स्थान बनाया है और सम्प्रति उच्च शिक्षा राज्य मन्त्री हैं। 

बस्तर जिला 
आजादी के पहले जगदलपुर एक छोटा सा कस्बा था। पूरे जिले में आदिवासी निवास करते थे। करीब 14,000 वर्गमील की लम्बाई-चौड़ाई बाले इस जिले में कुल 40-45 प्राथमिक शालाएँ थीं। एक अंग्रेजी मिडिल स्कूल सिर्फ जगदलपुर में था। जगदलपुर में ब्रिटिश राज्य का प्रशासक रहता था। उनके सुख सुभीते के लिए पानी का नल था और कस्बे में बिजली भी थी। सरकारी खबरों के लिए दूसरे विश्वयुद्ध के पहले से ही ‘बस्तर समाचार‘ नाम का एक साप्ताहिक अखबार सरकारी इन्तजाम में प्रकाशित किया गया था। यह सरकारी अखबार जगदलपुर के सरकारी प्रेस में छपता था। 

1947 के बाद बस्तर में पत्रकारिता का नया युग शुरू हुआ। वहाँ के प्रमुख पत्रकार थे पं० सुन्दरलाल त्रिपाठी और स्वर्गीय मतीश बनर्जी। एक दक्षिण भारतीय शर्मा जी भी थे। पूर्वी पाकिस्तान (आज के बाँगला देश) के लोग जब बस्तर में आने को हुए तब बोस बन्धुओं का भी यहाँ आगमन हुआ। पुनर्वासियों के सुख-सुभीतों की ओर उनका ध्यान था। श्री मतीश बनर्जी और पं० सुन्दरलाल त्रिपाठी द्वारा उत्साहित करने पर बोस बन्धुओं ने ‘दण्डकारण्य समाचार‘ 1948 के लगभग प्रकाशित करना शुरू किया, जो आजतक चल रहा है। इसके सम्पादक मतीश बनर्जी थे। अखबार 8 पृष्ठों का था। इसके चार पृष्ठ हिन्दी में और चार अंग्रेजी में छपते थे। ‘दण्डकारण्य समाचार‘ जिले के बाहर भी प्रसारित रहा। अब इसके सम्पादक श्री तुषार कान्ति बोस हैं। 

श्री रविशंकर वाजपेयी के सम्पादकत्व में साप्ताहिक ‘बस्तर टाइम्स‘ निकल रहा है। 

बिलासपुर जिला 
पहले उल्लेख किया जा चुका है कि पेन्ड्रा रोड से प्रकाशित होने वाले ‘छत्तीसगढ़ मित्र‘ ने बिलासपुर ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण मध्यप्रदेश में पत्रकारिता के इतिहास को एक नया मोड़ दिया था। श्री माधवराव सप्रे के सम्पादन में निकला यह समाचार-पत्र हिन्दी साहित्य के संवर्द्धन में भी बहुत सहायक सिद्ध हुआ था। 

सन् 1920 के बाद बिलासपुर डिस्ट्रिक्ट कौंसिल ने ‘विकास‘ नामक पत्रिका निकाली थी। सन् 1937 में ‘सचेत‘ साप्ताहिक का प्रकाशन हुआ था, पर वह थोड़े समय तक ही चला। 

सितम्बर, 1941 में बिलासपुर से एक साप्ताहिक निकलना शुरू हुआ ‘पराक्रम‘, जिसके सम्पादक श्री रामकृष्ण पाण्डेय थे (उन्हें लोग पराक्रमी पांडे कहने लगे थे)। सितम्बर 1952 में इसका प्रकाशन स्थगित हो गया था जो मार्च 1953 में पुनः प्रारम्भ हुआ। इसी तरह 1955 में कुछ समय बन्द रहने के बाद यह फिर चालू हो गया था, पर ज्यादा चल नहीं सका। 

सन् 1950 में ‘प्रकाश‘ साप्ताहिक निकला जो 1952 में बन्द हो गया। ‘लोकमित्र‘ साप्ताहिक श्री वृन्दावन बिहारी मिश्र के सम्पादन में 1953 से निकलना शुरू हुआ। बाद में श्री बृजराय नारायण मिश्र के सम्पादन में चलता रहा। इन दिनों यह श्री अवध किशोर मिश्र के सम्पादन में निकल रहा है। 

सन् 1953 में एक निर्भीक साप्ताहिक ‘तूफान‘ श्री काले के सम्पादन में निकलना शुरू हुआ किन्तु 1962 में श्री काले के असामयिक निधन से इसका प्रकाशन बन्द हो गया। इसी वर्ष यहाँ से ‘नव समाज‘ साप्ताहिक, ‘नई दिशा‘ त्रैमासिक और ‘मुक्ति‘ साप्ताहिक निकले। ‘नई दिशा‘ के सम्पादक श्री श्रीकान्त वर्मा और श्री रामकृष्ण श्रीवास्तव थे। इसके सलाहकार थे श्री गजानन माधव मुक्तिबोध, श्री प्रभाकर माचवे और श्री नरेश मेहता। मई 55 में आरम्भ हुई इस पत्रिका का वार्षिक मूल्य 4 रु० और एक प्रति का मूल्य 1 रु० था। यह विशुद्ध साहित्यिक पत्रिका थी। श्री वर्मा बाद में ‘दिनमान‘ के विशेष सम्वाददाता के रूप में प्रतिष्ठित हुए और सम्प्रति राज्यसभा के सदस्य हैं। 

सन् 1959 में सक्ति से ‘अवतार‘ पाक्षिक निकलने लगा पर शीघ्र ही बन्द हो गया। इसी वर्ष चाँपा से ‘सक्ति टाइम्स‘ पाक्षिक निकलना शुरू हुआ। सन् 1960 में छत्तीसगढ़ हिन्दी साहित्य सम्मेलन ने साहित्यिक त्रैमासिक ‘क्षितिज‘ का प्रकाशन प्रारम्भ किया। सन् 1960 में बिलासपुर से ‘मुक्ति दूत‘ दैनिक का प्रकाशन प्रारम्भ किया गया, पर वह चल नहीं पाया। इसी समय सहकारी संस्था ने ‘छत्तीसगढ़ सहकारी समाज‘ मासिक निकालना शुरू किया। सन् 1961 में बिलासपुर से ‘नया तूफान‘ साप्ताहिक, ‘छत्तीसगढ़ सह गौरव‘ मासिक, ‘ज्ञान यज्ञ‘ मासिक और ‘बवंडर‘ साप्ताहिक निकले। 

वास्तव में जिले की पत्रकारिका को निश्चित दिशा देने में ‘बिलासपुर टाइम्स‘ का योगदान महत्वपूर्ण रहा है। श्री डी० पी० चौबे ने इसे एक साप्ताहिक के रूप में निकालना शुरू किया था। वर्ष 1974 में उन्होंने श्री बी० आर० यादव के सहयोग से उसे दैनिक के रूप में स्थापित कर दिया। प्रखरता और स्वच्छता के लिए ‘बिलासपुर टाइम्स‘ उल्लेखनीय है। श्री यादव लम्बे अरसे तक ‘नवभारत‘ के बिलासपुर सम्वाददाता रहे हैं और वर्तमान में मध्यप्रदेश शासन के काबीना मन्त्री हैं। ‘बिलासपुर टाइम्स‘ में श्री गुरुदेव कश्यप तथा श्री कमल ठाकुर सम्पादक रहे। 

बिलासपुर में ‘बूंद और मोती‘ श्री के० भगवान के सम्पादन में, हसदेव टाइम्स‘ श्री कृष्ण कुमार शर्मा के संपादन में तथा ‘सेन्ट्रल टाइम्स‘ 1966 से श्री कृष्णमूर्ति टाह के नेतृत्व में निकल रहे हैं। कोरबा से सन् 1966 साप्ताहिक ‘वक्ता‘ श्री राजेन्द्र गुप्त के सम्पादकत्व में नियमित रूप से निकल रहा है। 

सन् 1977 से बिलासपुर से दैनिक ‘लोक स्वर‘ का प्रकाशन शुरू हुआ। श्री श्यामलाल चतुर्वेदी, डा० सच्चिदानन्द पाण्डे और श्री रमेश नैयर ने भी इसका सम्पादन किया है। वर्तमान में श्री बजरंग केडिया संपादक हैं। 

बिलासपुर महत्वपूर्ण समाचार केन्द्र है किन्तु यहाँ रायपुर से निकलने वाले समाचार पत्रों का प्रभाव छाया हुआ है। 

रायगढ़ जिला 
समाचार-पत्र-प्रकाशन की दृष्टि से रायगढ़ जिला काफी पिछड़ा रहा है। सन् 1923 में श्री मनोहर प्रसाद मिश्र द्वारा रायगढ़ से ‘छत्तीसगढ़‘ नामक पत्रिका का प्रकाशन हुआ। इसका आकार 10X7 इंच और वार्षिक मूल्य 2 रु० था। 

एक लम्बे अन्तराल के बाद 1950 में रायगढ़ से ‘अधिकार‘ नामक साप्ताहिक का कुछ समय तक प्रकाशन हुआ। सन् 1951 में ‘बापू‘ नामक हिन्दी मासिक रायगढ़ से निकला जिसके संपादक स्वामी गौरीशंकर थे। बाद में ‘राष्ट्र केसरी‘ नामक हिन्दी साप्ताहिक भी यहीं से निकला। जनवरी 1956 में इन दोनों समाचार पत्रों को मिलाकर ‘नई बात‘ नामक नया हिन्दी साप्ताहिक निकाला गया, परन्तु यह नवम्बर 1958 में बन्द हो गया। 

सन् 1953 में रायगढ़ से ‘भूचाल‘ साप्ताहिक निकाला गया, जो अगले वर्ष ही बन्द हो गया। 

सन् 1957 में ‘महाभारत‘ हिन्दी मासिक प्रकाशित हुआ। सन् 1959 में ‘नई बात‘ साप्ताहिक का पुनः प्रकाशन हुआ और 1965 तक चलता रहा। 

सरगुजा जिला 
छत्तीसगढ़ के उत्तरी क्षेत्र में आवागमन के साधनों से दूर स्थित सरगुजा जिले में पत्रकारिता की गतिविधियाँ अत्यन्त अल्प रही हैं। सन् 1960 के आसपास यहाँ से श्री समर बहादुर सिंह के सम्पादन में ‘राष्ट्रवाणी‘ निकलता रहा है। फिर श्री रवीन्द्र प्रताप सिंह के संपादन में ‘सरगुजा सन्देश‘ निकला। यह पत्र आज भी निकल रहा है और साफ सुथरा है। सन् 1978 में ‘सरगुजा वाणी‘ का प्रकाशन शुरू हुआ। 

छत्तीसगढ़ अंचल के रायपुर जिले से इस समय 6 दैनिक, 15 साप्ताहिक, 1 पाक्षिक और 1 त्रैमासिक पत्र निकल रहे हैं। दुर्ग जिले से 6 साप्ताहिक, बस्तर जिले से 6 साप्ताहिक, राजनाँदगाँव जिले से 3 दैनिक, 7 साप्ताहिक और 1 पाक्षिक पत्र का प्रकाशन हो रहा है। बिलासपुर जिले से 2 दैनिक, 11 साप्ताहिक और 1 मासिक पत्र प्रकाशित हो रहे हैं। सरगुजा जिले से 1 साप्ताहिक और 2 पाक्षिक तथा रायगढ़ जिले से 3 साप्ताहिक और 1 त्रैमासिक पत्र निकलते हैं। 

पश्चलेख- 
इस क्रम में उल्लेखनीय कि जिला गजेटियरों के अध्याय 18 में जिले के समाचार पत्रों की जानकारी होती थी। संभवतः उक्त पुस्तक के लिए सामग्री उसी के आधार पर विकसित की गई है। अगले क्रम में दो, लगभग एक जैसे प्रकाशनों का उल्लेख प्रासंगिक होगा। इनमें माधवराव सप्रे स्मृति समाचार पत्र संग्रहालय एवं शोध संस्थान, भोपाल से 2002 (नवंबर?) में प्रकाशित पुस्तिका, डॉ. मंगला अनुजा ‘छत्तीसगढ़ पत्रकारिता की संस्कार भूमि‘ तथा इसी संस्था की जनसंचार माध्यमों पर केन्द्रित शोध पत्रिका ‘आंचलिक पत्रकार‘ के दिसंबर 2002 अंक में डा. मंगला अनुजा का ही इसी यानी ‘छत्तीसगढ़ पत्रकारिता की संस्कार भूमि‘ शीर्षक से प्रकाशित लंबा लेख है। इन लेखों का आधार पूर्व उल्लिखित पुस्तक ‘मध्यप्रदेश में पत्रकारिता का इतिहास‘ का लेख ‘छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता‘ जान पड़ता है, मगर इसमें चित्रों सहित जानकारियां 2002 तक अद्यतन कर दी गई हैं और पुस्तिका के आरंभ में अनुक्रम है, जिसमें 375 पत्र-पत्रिकाओं का नाम, पृष्ठ संख्या के साथ है, जिससे इसकी उपादेयता बढ़ गई है। 

आंचलिक पत्रकार के उक्त अंक में विजयदत्त श्रीधर ने ‘सम्पादकीय‘ में लिखा है कि ‘छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता का व्यापक अध्ययन, गहन विश्लेषण और व्याख्या होनी चाहिए। वहां के विश्व विद्यालय यदि ऐसा कोई गहन गंभीर-व्यापक शोध करा सकें, तब वे छत्तीसगढ़ के सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक इतिहासक्रम की विश्रृंखलित कड़ियां भी जोड़ पाएंगे, इसमें सन्देह नहीं।‘ 

रायपुर, छत्तीसगढ़ में सन 2005 में ‘कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय की स्थापना हुई। जानकारी मिली है कि विश्वविद्यालय द्वारा माधवराव सप्रे के ‘छत्तीसगढ़ मित्र‘ के सभी 36 अंकों का पुनर्प्रकाशन किया गया है। इस क्रम में छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता का- बीसवीं सदी का पहला, दूसरा और तीसरा चतुर्थांश, यानी 1900 से 1925, 1926-1950, 1951-1975 तथा इसके पश्चात के लिए प्रत्येक दशक और फिर पृथक राज्य गठन के बाद प्रत्येक पंचवर्षीय कालखंड में अध्ययन, अभिलेखन हेतु प्रयास समीचीन होगा। इस अध्ययन में पत्र-पत्रिका, संपादक, प्रमुख संवाददाता-पत्रकार, उल्लेखनीय घटना, विकास और उपलब्धियां शामिल हों। साथ ही डिजिटल अभिलेखन, जिसमें पत्र-पत्रिकाएं, चित्र, संबंधित दस्तावेज तथा इसके पश्चात संभव हो तो महत्वपूर्ण आडियो-वीडियो फाइल्स भी हों। आशा है कि पत्रकारिता और जनसंचार का यह विश्वविद्यालय ऐसी सारी संभावनाओं की दिशा में अग्रसर होगा। 

(यह प्रस्तुति सामान्य जानकारी के लिए तैयार की गई है, किंतु शोध-संदर्भों के लिए मूल स्रोतों को देखना चाहिए।)

Wednesday, March 4, 2026

कुबेरनाथ राय

कुबेरनाथ राय रचनावली के 13 खंडों का प्रकाशन, दिसंबर 2024 में वाणी प्रकाशन द्वारा किया गया। इसके सम्पादक नर्मदा प्रसाद उपाध्याय और मुहम्मद हारून रशीद ख़ान हैं। उपाध्याय जी के काम और उनकी साहित्यिक प्रतिष्ठा से परिचित हूं। हारून जी से दूरभाष पर परिचय है, उन्होंने कुबेरनाथ जी से संबंधित कुछ जानकारियां मेरे अनुरोध पर उपलब्ध कराई थीं। कुबेरनाथ जी से उनकी पारिवारिक निकटता की जानकारी भी उनसे मिलती रही है।

इस बीच जानकारी मिली कि 12 खंडों में एक अन्य ‘कुबेरनाथ राय रचनावली‘ का प्रकाशन पिछले दिनों प्रतिश्रुति प्रकाशन, कोलकाता से हुआ है। वेबसाइट की जानकारी के अनुसार प्रथम संस्करण 2023 में तथा संशोधित-परिवर्धित संस्करण 2026 का (लक्ष्मण जी के फेसबुक पर की सूचना के अनुसार लोकार्पण 20 फरवरी! को, साथ की तस्वीरों पर 22 फरवरी 2026 अंकित) है। इसके संपादक द्वय अवधेश प्रधान तथा लक्ष्मण केडिया हैं। लक्ष्मण जी से प्रत्यक्ष परिचय रहा है इसलिए इस रचनावली की तैयारियों की जानकारी मुझे रही है। उन्होंने भी कुछ पठन-सामग्री, जो यों अनुपलब्ध-अप्रकाशित थी, मेरी रुचि जान कर, मुझे भेजी थी। हारून जी और लक्ष्मण जी का उदार-अनुग्रह रहा है।

इन दोनों रचनावलियों के खंडों को मैंने अभी तक नहीं देखा है, इसलिए विस्तृत टिप्पणी नहीं कर सकता, मगर इन दोनों की खंड योजना की जानकारी मिली है, जिसमें वाणी के पहले 10 खंडों में उनकी 20 प्रकाशित पुस्तकें तथा खंड 12 में 21 वीं प्रकाशित पुस्तक आगम(न?) की नाव शामिल है। प्रतिश्रुति के पहले 7 खंड उनकी सभी प्रकाशित 21 पुस्तकें हैं। इन दोनों में लगभग संग्रहों के प्रकाशन कालक्रम को मुख्य आधार बनाया गया जान पड़ता है, जो मेरी दृष्टि से कतई उपयुक्त नहीं है। इस संबंध में मेरी टिप्पणी आगे है।

पिछले लगभग पंद्रह वर्षों में जिन प्रकाशकों/प्रकाशन संस्थाओं के जिम्मेदारों से मेरी मुलाकात होती थी, उनसे कुबेरनाथ राय समग्र छापने की चर्चा अवश्य करता था। इस क्रम में मेरे द्वारा योजना भी बनाई गई थी, जिसे मेरे द्वारा उपयुक्त व्यक्तियों को अवगत कराते, प्रेषित भी किया गया था। साथ ही कंथा-मणि की जानकारी कम मिल पाती थी, इसलिए ललित कुमार जी से आग्रह कर मेरे द्वारा स्वयं फीड कर ‘कविता कोश‘ के लिए प्रेषित किया गया, जो वहां उपलब्ध है।

इस दौरान अवधेश प्रधान जी से फोन पर बात कर खंड योजना पर अपनी प्रतिक्रिया से उन्हें अवगत कराया, साथ ही अन्य बिंदुओं का संक्षिप्त उल्लेख कर, अपनी मंशा बताई कि यह मैं सार्वजनिक करना चाहता हूं, उन्होंने कृपापूर्वक इसे स्वागतेय कहा। इस तारतम्य में मेरे द्वारा बनाई गई योजना और टिप्पणी इस प्रकार रही है-

कुबेरनाथ राय की पुस्तकों की मेरी जानकारी के अनुसार सूची निम्नानुसार है, इसमें साहित्य अकादेमी द्वारा, भारतीय साहित्य के निर्माता श्रृंखला में उन पर प्रकाशित पुस्तक में दी गई सूची की मदद ली गई है। इस सूची के अनुसार उनकी कुल प्रकाशित पुस्तकों की संख्या 21 है। अपने संग्रह की इन 21 पुस्तकों की पृष्ठ संख्या का जोड़ कुल 3916 है। इस प्रकार समग्र प्रकाशन की योजना आठ या उससे अधिक खंडों की ही उपयुक्त होगी, क्योंकि इसमें पत्र, संपादकीय, परिचय, लेख सूची/अनुक्रमणिका तथा अन्य सामग्री शामिल होने पर पृष्ठ 4500 से कम न होंगे। नीचे सूची में पुस्तक का नाम-प्रकाशन वर्ष साहित्य अकादेमी के अनुसार है, आगे इन पुस्तकों के मेरे संग्रह में उपलब्ध संस्करण तथा उसके बाद पृष्ठ संख्या है।

क्र. पुस्तक-प्रकाशन वर्ष            मेरे संग्रह के संस्करण             पृष्ठ संख्या
 
01 प्रिया नीलकंठी-1969?             (1968, 1974) तृतीय-1978            172 
02 रस आखेटक-1971?               प्रथम-1970                                   292 
03 गंधमादन-1972                       (1972) द्वितीय-1974                     323 
04 निषाद बाँसुरी -1973?              प्रथम-1974                                  235 
05 विषाद योग-1974                    (0000) द्वितीय-1976                     250 
06 पर्ण मुकुट-1978                      प्रथम-1978                                  224 
07 महाकवि की तर्जनी-1979        प्रथम-1979                                   223 
08 पत्र मणिपुतुल के नाम-1980     (1980) द्वितीय-2004                     101 
09 मन पवन की नौका-1982         प्रथम-1982                                  170 
10 किरातनदी में चंद्रमधु-1983     प्रथम-1983                                   156 
11 दृष्टि अभिसार-1984                 प्रथम-1984                                  175 
12 त्रेता का वृहत्साम-1986            प्रथम-1986                                  206 
13 कामधेनु-1990                        प्रथम-1990                                   151 
14 मराल-1993                            प्रथम-1993                                   168 
15 उत्तरकुरु-1993                      प्रथम-1994?                                  132 
16 चिन्मय भारत-1996                (1996) द्वितीय-2006                       201 
17 वाणी का क्षीरसागर-1998        प्रथम-1998                                    116 
18 कंथामणि-1998                      प्रथम-1998                                    110 
19 अंधकार में अग्निशिखा-2001    प्रथम-1998                                   160 
20 रामायण महातीर्थम्-2002        तीसरा-2007                                  351
21 आगम की नाव-2005              प्रथम-2008                                    126
अन्य - 
#निवेदिता रजत जयंती अंक-1997 स्वामी सहजानंद स्नातकोत्तर महाविद्यालय, गाजीपुर
#साहित्य अकादेमी का प्रकाशन - कुबेरनाथ राय (2007) पुनर्मुद्रण 2014

खंड बनाते हुए प्रकाशन वर्ष को आधार बनाना उचित नहीं होगा, क्योंकि यह स्वयं स्पष्ट है कि महाकवि की तर्जनी-1979, त्रेता का वृहत्साम-1986 और रामायण महातीर्थम्-2002 को एक ही खंड में रखना होगा। राय साहब ने स्वयं निषाद बांसुरी -1973?, किरातनदी में चंद्रमधु-1983 और मन पवन की नौका-1982 को त्रिवर्ग (ट्रिओलोजी) बताया है। मेरे विचार से उत्तर कुरु भी इसमें शामिल होगा, इस प्रकार 4 पुस्तकें। इसी प्रकार उन्होंने स्वयं प्रिया नीलकंठी-1969?, गंधमादन-1972 और पर्ण मुकुट-1978 को एक ही रस परंपरा के अंतर्गत रखा है। इसमें रस आखेटक भी जुड़ जाएगा, (4 पुस्तकें) क्योंकि कामधेनु प्रथम संस्करण की भूमिका में कहा गया है कि प्रिया नीलकंठी, रस आखेटक और गंधमादन एक प्रकार की तो विषाद योग और कामधेनु (2 पुस्तकें) दूसरे प्रकार की। पत्र मणिपुतुल के नाम-1980 और कंथामणि-1998 उनकी अन्य सभी रचनाओं से अलग हैं।

संपादकीय दायित्व होगा कि निबंधों के प्रथम प्रकाशन का संदर्भ, पत्र-पत्रिका में हो तो नाम, वर्ष और अंक सहित दिया जाए। समग्र/ रचनावली में किस पुस्तक/संग्रह के अब तक कितने संस्करण आ चुके हैं, संस्करण में कुछ जोड़-घटाव हुआ हो, तो उसकी जानकारी सहित, ध्यान रखना होगा कि संस्करण और प्रकाशन वर्ष में विसंगतियां हो सकती है, जैसा कामधेनु के नेशनल पब्लिशिंग वाले संस्करण में है। इसमें यह भी उल्लेख है कि इस, द्वितीय संस्करण में पर्याप्त संशोधन और संवर्धन हुआ है और कुछ नये निबंध भी जोड़े गए हैं। इसी तरह ‘विषाद योग‘ संग्रह के ‘अन्त में, अपनी बात‘ में उन्होंने स्पष्ट किया है कि इस संग्रह के निबंध सात-आठ वर्षों में लिखे गए हैं, इनमें से अधिकांश का रचनाकाल 1970-71 है। तथा द्वितीय संस्करण में चार पुराने संस्करण के निबंध अनुपस्थित हैं। प्रथम संस्करण में रामायण-प्रसंग पर पांच ललित निबंध थे। उनमें दो को इसमें रखकर शेष तीन को निकाल दिया गया है। इन चार निबंधों के बदले में हम इसमें चार टिप्पणियां या लेख, चाहे जो कहें, जोड़ रहे हैं। वैसे ही काल के उल्लेख की आवश्यक पर उन्होंने स्वयं बल दिया है, ‘पर्ण-मुकुट‘ के एक निबंध ‘आभीरिका‘ के लिए ठोस उदाहरण दिया है कि यह निबंध सामयिक कालखंड 1977 की राजनीति, तो कुछ को ‘भारतीय लोकदल‘ का पोषक लग सकता है, जबकि यह निबंध 1974 में लिखा गया था और 1975 में ‘मधुमती‘ में छप चुका था।

उनके द्वारा अप्रचलित शब्दों के प्रयोग पर टीप या ऐसे सौ-एक शब्द, जो यों अप्रचलित है, लेकिन उनके लेखन में अक्सर आए हैं, की अर्थ-व्याख्या सहित सूची होनी चाहिए। अज्ञात, अल्पज्ञात शब्दों के बारे में उन्होंने स्वयं रामायण महातीर्थम के ‘अपने लेखन के बारे में‘ में बात की है। जैसे स्यंदन या वर्म (हथियारबंद, जिरह-बख्तर?), कुहक, ना-धर्मी और हां-धर्मी तथा अस्ति-भवति का भी प्रयोग उनके लेखन में अक्सर है, जो यों अन्यत्र सामान्यतः नहीं होता। भाषा के लिए उन्होंने ‘निषाद बांसुरी‘ में यह भी कहा है- 'परन्तु समग्र जीवनव्यापी भाषा बनने के लिए इसे ब्रज-अवधी-भोजपुरी-मगही-मैथिली-छत्तीसगढ़ी के "जानदार-पानीदार" शब्दों को लेना ही होगा, इसमें कोई विवाद ही नहीं, क्योंकि यह तो 'घर' की निधि है। मेरी धारणा है कि जरूरत पड़ने पर एक ओर पंजाबी-गुजराती और दूसरी ओर बांग्ला-असमीया-उड़िया की शब्दश्री से भी सहायता लेने में संकोच नहीं करना चाहिए। अवश्य ही जरूरत पड़ने पर ही । अन्यथा हिन्दी के रूप में एक नयी 'बदअमली' की सृष्टि होगी जो कदापि वांछनीय नहीं।"

इटैलिक पर, इन्वर्टेड पर, हलन्त पर, बिंदी और चंद्र बिन्दी का निर्णय लेना होगा, ङ ञ वाले शब्द संस्कृत उद्धरण में तो ठीक हैं, किंतु हिंदी (को हिन्दी लिखेंगे?) में अनुस्वार रखने पर विचार करना होगा। उसी तरह १-२ आदि के स्थान पर 1-2 का प्रयोग, जो भी निर्धारित हो उसका उल्लेख संपादकीय लेख-टीप में देना होगा और एकरूपता रहे इसका ध्यान रखना होगा। इसी तरह ‘आया‘ तो ठीक है किंतु- ‘आए‘ (न कि आये), आई (न कि आयी), तात्पर्य कि ऐसे शब्दों में जहां स्वर का प्रयोग हो सकता है, व्यंजन-मात्रा का प्रयोग न हो।

इस प्रकार के और ढेरों विचार मन में आ रहे हैं, यदि उपयोगी लगें तो अधिक समय दे कर ध्यान से करूंगा। यह काम मेरे लिए आनंद और आत्मसंतोष का होगा, बशर्ते कि यह आपके काम में मददगार और उपयोगी हो।

कुबेरनाथ जी को पढ़ना, पढ़ते रहना, मेरे लिए ‘माघे मेघे गतं वयः‘ जैसा ही है, मगर मुझे उनके पूरे लेखन में से एक अंश चुनना हो तो वह होगा, कामधेनु संग्रह के ‘दिवस का महाकाव्य‘ निबंध का आरंभ। इस लालित्य के आगे और कुछ भी फीका।

पुनश्च-

कुबेरनाथ राय जैसे जरूरी हिंदी-सेवक की रचनावली, जो बहुत आवश्यक थी, देर से छपी और छपी तो दो-दो। अब सुनने में आया है कि इस मुकदमेबाजी भी हो रही है। कुबेरनाथ जी होते तो इस पर शायद वही कहते, जो उन्होंने ‘उत्तरकुरु‘ की भूमिका में कहा है। पहले तो वे लिखते हैं- ‘... इसके बाद इस क्षेत्र की महाविद्या की शयन आरती!‘ और फिर भूमिका के अंत में- ‘अन्त में मैं प्रकाशक को धन्यवाद देना चाहूंगा। मेरी किताबें प्रकाशकों के पास दो-तीन वर्ष सड़कर के प्रकाशन का सौभाग्य पाती हैं। परन्तु बाल-बच्चेदार प्रकाशकों को इसका क्या दोष दूं? वे प्राथमिकता देते हैं उन प्रकाशनों को जिनकी आशुबिक्री संभव हो सके। इस हालत में साहित्य-प्रेम के नाम पर मेरे लिए वे जो कुछ कर रहे हैं, उसी से मैं संतुष्ट हूं।‘

Tuesday, March 3, 2026

धरा के अंक में

पांव-पांव जंगल नापकर वर्किंग प्लान वाले दिनों पर सेटेलाइट इमेजरी हावी है, या कहें, एक्चुअल पर वर्चुअल या जमीनी पर हवाई। अब फारेस्ट कवर के बजाय ग्रीन कवर प्रचलन में है और कहा जाता है कि इस ग्रीन कवर में बगीचे, लॉन तो हैं ही, एस्ट्रो टर्फ भी शामिल हो जाता है। आंकड़े बताते हैं कि पचासेक साल पहले देश में वनाच्छादित क्षेत्र का प्रतिशत 19.5 था, जो अब लगभग 21.71 हो गया है, इस पर क्या कहें! पर्यावरण पर कुछ अलग कहने का प्रयास किया है, श्वेता उपाध्याय ने अपने उपन्यास ‘धरा के अंक में‘, जिसमें ‘कान्हा‘ नेशनल पार्क है, वे अपने पात्रों से भावुक चिट्ठियां लिखवाती हैं, तो कान्हा नेशनल पार्क में पारिस्थितिकी तंत्र के लिए बाकायदा चरणबद्ध कार्य योजना भी वनवाती हैं। पढ़ते हुए यह भी याद आया कि कान्हा के मुक्की गेट से अंदर जाते हुए संग्रहालय-इंटरप्रेटेशन सेंटर का नामकरण ‘अनुभूति‘ है। कृति, आधुनिक जीवन, परिस्थितियों और प्रकृति की काव्यात्मक अनुभूति है, चिंतन के स्तर पर पहुंच कर गद्य में नियोजित करते हुए इसकी अभिव्यक्ति में लेखक के भाव, विचारों के साथ घुल-मिल जाते हैं।

कभी एक प्रशासनिक अधिकारी ने किसी ‘विशेषज्ञ‘ माने जाने वाले व्यक्ति से कहा कि मेरे क्षेत्र में एक बड़ा हिस्सा ‘बिगड़े वन‘ का है, हम उसमें वन विकसित करना चाहते हैं। आपके सुझाव के लिए इस क्षेत्र के भ्रमण-अवलोकन की व्यवस्था की जाएगी, मानदेय भी होगा और आप प्रोजेक्ट बना कर देंगे, तो उसकी फीस अलग होगी। ‘विशेषज्ञ‘, वस्तुतः ‘सामान्यज्ञ‘ थे, उन्होंने कहा कि इसके लिए उपाय की बात और काम बहुत छोटा सा है, बात फोन पर ही हो जाएगी, वह यह कि जंगल को अपने हाल पर छोड़ दे, उसके साथ किसी तरह की छेड़छाड़ न हो, उसकी अपनी मौज में कोई दखल न दे बस, मगर इसमें थोड़ा समय लग सकता है, संभव है तब तक आपका तबादला हो जाए और इस काम का श्रेय आपको न मिले, नाम का पत्थर और शिलान्यास आपका कोई उत्तराधिकारी कराए। प्रशासनिक अधिकारी को समझ में आ गया कि जिसे विशेषज्ञ बताया गया था, उसे तो कुछ भी नहीं आता, वह भी वही बात कह रहा है, जो उस इलाके के अनपढ़-गंवार कह रहे थे, वह तो किसी काम का नहीं है।

वन-पर्यावरण, मानवशास्त्र-जनजातीय समाज, प्रकृति-संस्कृति के मुद्दों पर क्या, क्यों, कैसे, कितना? का वैचारिक द्वंद्व शाश्चत किस्म का है। हम इनका अध्ययन क्यों करते हैं? इनके पास क्यों जाना चाहते हैं? प्राकृतिक, नैसर्गिक स्थितियों, गुड प्रैक्टिसेस को अपनाने के बजाय अपनी समझ के अनुसार उसमें संशोधन-परिवर्धन करने लगते हैं। अपने एकाकीपन और ऊब से भाग कर वहां शरण लेना चाहते हैं, अपना बेहतर या वैकल्पिक निर्वाह तलाशते? कुछ-कुछ आत्मज्ञान-सा होता है, इसके साथ मसीहाई भी जागती है। वैसा ही कोई काम करने की सोचने लगते हैं, जिसका हमें अभ्यास है। यह तब सार्थक होने की संभावना बनती है जब अपने अभ्यस्त तौर-तरीकों और रास्तों के भीतर विद्यमान को तलाश लें, पा लें। अन्यथा इस दौर में सारी आदिम चाहना कभी रूप बदल कर, कभी मौन तो कभी मुखर बलवती होने लगती है और वहीं ला पटकती हैं, जहां से शुरुआत हुई थी। श्वेता उपाध्याय का उपन्यास? ‘धरा के अंक में‘ इसी उहापोह की अभिव्यक्ति है, जो यों तो अंत आते रास्ता बनाते, हल सुझाते दिखती है मगर बीच में वे एक वाक्य ऐसा लिख गई हैं, जो मानों इस सारे उद्यम का हासिल हो, वह है- ‘जिसके पास जो है, वही उसका समाधान है...‘ क्या इसका आशय यह कि सारे परिवर्तन के बीच यथास्थिति या वृहत्तर हालात ज्यों के त्यों बने रहें, मगर उनमें उपेक्षणीय परिवर्तन की संभावना हो?

कहा जाता है कि प्रकृति अपने घाव खुद ही भरती है, मगर ऐसा मान कर सारी सभ्यता घाव करने में लग जाए तो प्रकृति अपने घाव भरने के लिए ऐसा उपाय भी कर सकती है, जिसमें उसके लिए मानव-जाति अप्रासंगिक हो जाए। ध्यान रहे कि जो हमारे लिए प्रलय जैसी भारी तबाही, वह प्रकृति का मामूली उलट-फेर हो, वह बस ताश की गड्डी फेंट रही हो।

राजा पृथु और वेणु की कहानी का संदेश, जैसा मुझे समझ में आता है कि धरती, वन या किसी भी संसाधन का दोहन आवश्यक है, मगर यह संतुलित और कुछ मायनों में देन-लेन वाला होना चाहिए और सारे झगड़े की जड़ यहीं समझ में आती है कि यह संतुलित- क्या, क्यों, कैसे, कितना हो?, तय नहीं। इसके जवाब में सोनल शर्मा की पुस्तक ‘कोशिशों की डायरी‘ के अंतिम पेज की, निष्कर्ष-सी कविता याद आती है-

अच्छा होगा
मैं उस बच्ची के बाल ही सुलझा दूं
गूंथ दूं उसकी चोंटी
उस छोटे लड़के की उधड़ी कमीज में
भर हूं चार टाकें सीवन
पता नहीं सब पूरी तरह कैसे ठीक होगा
और ठीक होकर ऐसा क्या होगा
जो ठीक ही रहेगा
ठीक करने वाले कौन होंगे
वे कहां से आएंगे
और फिर ये कैसे तय होगा
कि किसके लिए कब क्या ठीक है 
बैठ जाऊं और सोचती रहूं
भूल गलती खोजती रहूं
इससे तो अच्छा होगा
इंच-इंच चलती रहूं
जो कर सकती हूं
वह करती रहूं.