Sunday, August 16, 2026

छत्तीसगढ़ी काव्य पर विहंगम दृष्टि

75 पार रामेश्वर शर्मा जी छत्तीसगढ़ी के मूर्धन्य साहित्य-सेवियों में हैं, उतने ही निष्ठावान सायकिल-साधक। पचासेक सालों से निरंतर सक्रिय। छत्तीसगढ़ी काव्य पर उनकी नजर लगातार बनी रहती है और उसका परिणाम है, यह पुस्तक- छत्तीसगढ़ी काव्य, एक विहंगम दृष्टि (छत्तीसगढ़ी काव्य विधा अद्यतन)। पुस्तक में छत्तीसगढ़ी के 300 से अधिक कवियों की रचनाओं को विभिन्न शीर्षकों के अंतर्गत वर्गीकृत किया गया है- यथा, बाल-साहित्य, वीर रस, हास्य रस, व्यंग्य, दोहा-चौपाई-कुण्डलियां, वार्णिक छंद, कविता, मुक्तक, ग़ज़ल, मुक्तछंद और गीत। संग्रह में क्षणिका का उल्लेख है किंतु कुछ प्रयोगधर्मियों ने छत्तीसगढ़ी में हायकू भी आजमाया है, उसे यहां जगह नहीं मिली है। इसी प्रकार इस दौर के लोकप्रिय और चर्चित मंचीय कवि मीर अली ‘मीर‘ यहां शामिल नहीं हैं। यों, मेरी जानकारी में छत्तीसगढ़ी काव्य को इस प्रकार वर्गीकृत करते, विभिन्न प्रमुख कवियों का उदाहरण लेते यह पहला प्रकाशन है। 

संग्रह के मुखपृष्ठ और अंदर के पृष्ठों पर भी रामेश्वर शर्मा नाम के साथ संपादक या संकलनकर्ता उल्लेख होना चाहिए था, जो नहीं है। पुस्तक के आरंभिक ‘स्वकथन‘ में उन्होंने जरूर स्पष्ट किया है कि ‘इसमें जो रचनाएं हैं, उन्हीं रचनाकारों की हैं। इसमें मेरा कोई हस्तक्षेप नहीं है, इन सभी रचनाकारों की रचना संकलित कर छत्तीसगढ़ी काव्य को एक विहंगम दृष्टि के लिए पाठकों को समर्पित है।‘ उन्होंने यह भी बताया है कि ‘जब इस पुस्तक में वरिष्ठ साहित्यकार की कमी लगी, तब ‘छत्तीसगढ़ के माटी चंदन‘ जिसका संपादन राकेश तिवारी ने किया है और ‘छत्तीसगढ़ी कविता के सौ साल‘ का संपादन डॉ. बलदेव किये थे। उसमें से रचनाकारों की रचना ली हैं।‘ 

पुस्तक के पहले अध्याय ‘छत्तीसगढ़ी काव्य के चितेरे‘ में जिन कवियों और उनकी पंक्तियों का उल्लेख है, वे इस प्रकार हैं- डॉ. हनुमंत नायडू, हरि ठाकुर, डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा, प्यारे लाल गुप्त, द्वारिका प्रसाद तिवारी ‘विप्र’, नारायण लाल परमार, कोदूराम ‘दलित‘, भगवती सेन, बद्री विशाल यदु ‘परमानंद‘, हेमनाथ यदु, पद्मश्री श्याम लाल चतुर्वेदी, रविशकर शुक्ल, पण्डित दानेश्वर शर्मा, डॉ. विमल कुमार पाठक, मेहतर राम साहू, रामेश्वर वैष्णव, डॉ. जीवन यदु ‘राही‘, मुकुन्द कैशल, लक्ष्मण मस्तुरिया, डॉ. देवधर दास महंत, डॉ. चितरंजन कर, श्रीमती डॉ. निरुपमा शर्मा, श्रीमती दीप दुर्गवी, बुधराम यादव, डॉ. पीसी लाल यादव, डॉ. सन्तराम देशमुख ‘विमल‘, सीताराम साहू ‘श्याम‘, सुशील यदु, बसंत यदु, शिव कुमार यदु ‘शिकुम‘, बंधु राजेश्वर खरे, रमेश विश्वहार, रूपेश तिवारी, हबीब समीर, किशोर तिवारी। 

इस क्रम के अंत में वे स्वयं इन शब्दों में हैं- ‘रामेश्वर शर्मा छत्तीसगढ़ी एवं हिंदी के कवि-गीतकार, ग़ज़लकार, अनुवादक, समीक्षक, स्तंभकार, पत्रकार के रूप में जाना जाता हूँ। दैनिक अमृत संदेश में लगभग पाँच वर्ष तक ‘जाती मिलाती‘ नाम से स्तंभ लिखा। इनके द्वारा लिखे गीत को गायक-गायिकाओं ने गाया है। आकाशवाणी और दूरदर्शन से भी गीत प्रसारित हुआ। छत्तीसगढ़ी फिल्म के लिए गीत लिखा। कवि सम्मेलनों में काव्य पाठ किया। एक गीत, जिसमें गाँव का वर्णन है। उसका मुखड़ा और अंतिम अंतरा प्रस्तुत है- 
नदिया नरवा ढोडगा बीच मा मोर गंवई गांव हे। 
बर पीपर आमा के संगी सरग अइसन छांव हे। 
मंदिर देवाला चारो खूंट मा तुलसी चौरा आंगन मा, 
बद्री, द्वारिका, जगनाथ, रामातार अंतस पावन मा, 
तीरथ धाम सबो ले भव्य दाई-दादा के पाँव हे। 

पुस्तक के कॉपीराइट, इंप्रिंट पेज पर द्वितीय संस्करण, 2024 (संशोधित एवं परिवर्धित) छपा है, किंतु प्रथम संस्करण की जानकारी नहीं है। पुस्तक के अंत में दिए गए लेखक के परिचय से पता चलता है कि इस पुस्तक का प्रथम संस्करण 2022 में हुआ। अच्छा होता कि पुस्तक में छत्तीसगढ़ी कविता के इतिहास पर परिचयात्मक संक्षिप्त जानकारी होती और इसमें शामिल कवियों की सूची-अनुक्रमणिका दे दी जाती। पुस्तक के आरंभ में ‘गोल्डन बुक आफ वर्ल्ड रिकार्ड्स‘ का प्रमाण-पत्र छपा है, इस पर बस यही कह सकते हैं कि गिनीज बुक के बाद लिम्का बुक और इस तरह के रिकार्ड्स वाली जाने कितनी संस्थाएं अपना काम कर रही हैं, मगर इस पुस्तक को ऐसे किसी प्रमाण-पत्र की जरूरत नहीं है। 

सुदीर्घ अनुभव से तैयार की गई पुस्तक में स्वाभाविक ही यह संभव है कि रुचि, पसंद और उपलब्धता सीमा रही हो, मगर संदेह नहीं कि छत्तीसगढ़ी साहित्य अध्ययन के क्षेत्र में यह पुस्तक मील का पत्थर है।

Friday, August 14, 2026

बरसों बरस बनारस

एक गेरुआ सबेरा। कुछ पुराने और आगे आने वाले दिन।
बरसों से बनारस जाता रहा हूं, अब की कुछ बरस बाद गया, किस बरस? महाकाल की नगरी, कालातीत!


सुबह-ए-बनारस
पौने सात बजे
लंका चौमुहानी
ट्रैफिक जाम
लोग सौहार्दपूर्ण, धीरज धरे
दो पुलिस वाले और तीन नागरिक
व्यवस्था बनाने में सक्रिय।

तुलसी घाट, कबीरचौरा और भारतेन्दु भवन के बाद 
सुंघनी साहू,           बाबा जी दांत वाले में सांप्रदायिक जोग

किसी साथी ने कहा था- ‘ऐसा नहीं लगता कि बनारस ओवर रेटेड है?‘
किसी ने कहा था, ‘बनारस का एक हिस्सा बदलाव को अपना कर मर रहा है और एक हिस्सा उसे न अपना कर।‘

मृत्यु की प्रतीक्षा में जीवन, बेखबर जीवंत। लोक और शास्त्र, शाश्वत और नश्वर की संधि पर स्थित सनातन आनंद कानन काशी। श्रद्धा और भय के बीच अनुशासित बाबा कीनाराम की गद्दी।

गोपालजी, प्रधानमंत्री वाला ऑटो चलाते हैं। उनके भाड़ा बताने पर बिना मोल-भाव हम तैयार हो गए, तो शायद उन्हें लगा कि 50 के बदले 60 कहना था, कहने लगे जो मुनासिब है वही कहेंगे, आगे आपकी मर्जी। हमने सोचा कि रिजर्व जा रहे हैं, 60 ही दे देंगे। लंका चौमुहानी पर पहलवान लस्सी की अब चार दुकानें हैं, सवारी से आपसदारी न हो तो क्या बनारस? उन्होंने लस्सी की रिपोर्ट ले ली। उनके पूछने पर हमने बताया कि दही कुछ खट्टी थी, अब सामने मथकर भी नहीं देते, रेडीमेड है, उन्होंने आटो मोड़ते हुए दुकान के सामने रोका और चलते-चलते हमारी तरफ से लस्सी वाले से शिकायत दर्ज कराई। हॉस्पिटल गेट वाले सीताराम को याद किया तो उन्होंने कहा कि आप तो सब जानते ही हैं, मिश्राम्बु, केसरिया, रामनगर, कचौड़ी गली की लस्सी अब भी वैसी ही है। फिर बताया खोजवां में रहते हैं, मेरी जिज्ञासा का पहला शब्द ‘खराद‘ सुनते ही वहां बनने वाले लकड़ी के खिलौने और खराद के इतिहास पर संक्षिप्त प्रकाश डाला। भाड़ा देते हुए मेरे पास 100 का नोट था, उनके पास फुटकर न था, इसलिए अपने पास फुटकर टटोला, चार 10 के नोट और एक 5 का सिक्का था, उन्होंने राजी-खुशी न सिर्फ स्वीकार किया, मुझे आश्वस्त भी किया कि बाकी के 5 फिर कभी।

दीक्षितजी टैक्सी वाले मिले। किसी को फोन पर समझाने लगे- मोड़वा पर, मनोजवा क दुकनिया... वा और या उपसर्ग-प्रत्यय के साथ अपनी बातों में लय रचते, पता लग जाता, समझाइश है, मार्गदर्शन या फटकार। अपनी बात उन्हें पांच बार दुहरानी पड़ी, मगर सुर में दुहराव नहीं, हर बार नयापन, ताजगी। उनसे संकटमोचन संगीत समारोह का सुझाव भी मिला। ट्रैफिक और भीड़ पर कहते हैं, दो-तीन कट्ठा जमीन यहां हर कोई लेना चाह रहा है, राजधानी बनेगा। और सब भीड़ टूरिस्ट की है, ये दर्शनार्थी थोड़े न हैं। मेरे लिए वाहन का इंतजाम करने बेताब, बाबतपुर रास्ते में दो किलो लाल पेड़ा दिलवाने का आग्रह। जब कभी आएं याद कीजिएगा का वादा लिया। 

गोदौलिया से दशाश्वमेध। सड़क, पर दुकानों, पैदल के लिए बचते-संभलते...पेनको और जहरलाल-पन्नालाल को कोई कैसे भूल सकता है। मोंगा अब रहा न होगा, मगर यह जान कर अच्छा नहीं लगेगा, इसलिए पता नहीं किया। काली-मंदिर, दशाश्वमेध से प्रवेश वाली गली ज्यों की त्यों मिली। मान लिया कि काली मंदिर के बगल वाली मिष्ठी दही और लकड़ी के ठप्पे से कपड़े पर छपाई काम वाली दुकान भी जस की तस होगी। गली की दुकान पर मैंने पूछा, चौड़ी मोहरी वाला पाजामा, कर्मचारी ने पाजामा दिखाया, समझ में आया कि उसके लिए चौड़ा यानी जो चूड़ीदार न हो, मैंने खड़े हो कर अपना पाजामा दिखाया, मुस्कुरा कर उसने बुजुर्ग दुकानदार की ओर इशारा कर के कहा, बाबूजी की तरह, लिफाफा! बस एक पीस ही रह गया है, देख लीजिए। बात आगे बढ़ी। दुकानदार से मैंने कहा, पहले एक बंगाली दादा होते थे, आपकी जगह बैठते थे। कहा, हमारे मामा, अब नहीं रहे। उनसे कहा, लखनऊ चिकन का कुरता दिखाइए, उन्हें बात पसंद नहीं आई, मैंने भांप कर कहा अच्छा, बनारसी सिल्क होगा, वे दिखाने लगे, मेरे ऐसा वैसा कहते, ठीक न बता पाने पर सुझाया कि जो बांस कागज वाले रंग का आता है, वो? मेरी हामी पर कहा, फिर ऐसे कहिए कि काशी सिल्क चाहिए। 

ज्ञानवापी (अब गेट नं 4) पर पांडेयजी मिले, मेहरबान थे, 1769 और 1777 का रानी अहिल्याबाई के साथ का बाबा विश्वनाथ का इतिहास बताया। दर्शन के लिए जाएं तो क्या देखें, ध्यान दें, समझाया। मस्जिद में 1990 के बाद जाने की मनाही हो गई, बताया। ड्यूटी पर बड़ी संख्या में तैनात पुलिस बल। एक युवा सिपाही के माथे पर संक्षिप्त त्रिपुंड, उस पर ऊँ छाप। सूने कोने पर तैनात वाले मोबाइल स्क्रीन पर व्यस्त। पांडेय, तिवारी, मिश्रा, चौबे, एकाध सिंह, सोनकर, यादव भी।

एक खास दुकान होती थी, टिकठी-गोटेदार चुनरी सजी। पहले-पहल ध्यान जाने पर कभी वहां ठिठका था। अंतिम संस्कार की सजी दुकान, बस एक मुरदे की कमी। ‘मौत और ग्राहक का कोई भरोसा नहीं, कब आ जाए’, लेकिन यहां तो ग्राहक आएगा किसी मौत के साथ, मौत का ही भरोसा। मेरे मन में ‘किं आश्चर्यम्।‘ इसमें नाम तो मजेदार है ही Pandit Readymade छपा है, जिसके वास्तविक आशय का अनुमान शायद ही कोई लगा सके।

Pandit Readymade का मतलब तो यही समझ में आता है, लेकिन है कुछ अलग. ऐसी एक पुरानी दुकान इसके बगल में है और यह पहले रेडीमेड वस्त्रों की दुकान हुआ करती थी, बगल की दुकान की बिक्री देख कर इस दुकानदार को एक और ऐसे दुकान की संभावना दिखी, तब रेडीमेड कपड़ों की दुकान इसमें बदल लिया। दुकान का पुराने नाम, प्रतिष्ठा से पहचान भी बनाए रखना था फिर दुकानदार ने माना कि यह भी तो रेडीमेड तन-आवरण की दुकान है, पहले जीते-जागते के लिए अब मुरदों के लिए, तो फिर क्यों न नाम यही चलने दिया जाय। फ्यूनरल पार्लर! अंतिम क्रिया/दाह संस्कार के साथ पार्लर शब्द का प्रयोग कोई फक्कड़ भारतीय चेतना ही कर सकती है।

प्रवास के दौरान दिल्ली के विपिन गर्ग जी मिले, बनारस असर श्रद्धा-सिक्त। बड़ा गणेश-लोहटिया की गली में व्योमेश के लिए भटकते, ठक-ठुक-ठन-भड़ाम की ताल सुनते निराला, नागरी प्रचारिणी और रूपवाणी के युवा साथी। व्योमेश को शायद नहीं जाना है, मगर आसन लगाए हैं, मैं बातें जल्दी समेटने की कोशिश में कि उनके निर्धारित कार्यक्रम का समय हो रहा है। मेरी बेचैनी भांप कर बताया कि तापस को रवाना कर चुके हैं, बस हो गया, बैठकी निर्विघ्न। पुरातत्व वाले अपने जात-सगा कौशाम्बी वाले जी.आर. शर्मा जी (के सुपुत्र के साथ उन) की स्मृतियां। पुरातत्व की नई पीढ़ी सुनीता, रूपनारायण, शंभू, नीलम मिले। दिवाकर, गायत्री जी, लक्ष्मण जी से मिलना, इस बीच कलापिनी जी यहां है, बात हुई, मगर उनको सुनना रह गया।

बनारस से लौटते, चाह कि बहुत कुछ छूटा रहे, अगली बार के लिए।

बनारस पर और भी- 


Wednesday, August 12, 2026

लोककला का दफ्तरी-लेखा

कला-संस्कृति में कोई दखल न होने के बावजूद रुचि होना काम आने लगा, जब छत्तीसगढ़ राज्य गठन हुआ, हम पुरातत्व के लोग संचालनालय संस्कृति और पुरातत्व का हिस्सा बन गए। पुरातत्व की पूछ-परख कम होती और संस्कृति की चमक और आकर्षण सबका ध्यान आकर्षित करती। संस्कृति से जुड़े आयोजन और लिखना-पढ़ना, शासकीय कर्तव्य-निर्वाह का मुख्य हिस्सा बन गया। 

सरकारी कामकाज के दौरान आज शाम तक की प्राथमिकता, कल सुबह कार्यालय पहुंचने पर पता लगता कि कल शाम तक जो टॉप प्रियारिटी है, वह अब ‘उसे छोड़ो, बेकार की बात है, यह कर के लाइए, उच्च स्तरीय बैठक है‘ घंटे भर का समय होता, आप काम पर बैठें, शुरू कर पाएं, बुलावा आने लगता, ‘हुआ, हो गया ... और कितना समय लगेगा‘ आपलोग किसी काम की प्राथमिकता नहीं समझते, मंत्रालय से फोन आ रहा है। जब तक कहें कि आप बैठने दें, तब तो काम कर पाएं, फिर से मंत्रालय से आने वाले फोन की घंटी बज जाती ...। ‘आफिस-आफिस‘ खेल इसी तरह चलता रहता। 

ऐसी ही नौबत आई, जब कहा गया कि राज्य की संस्कृति पर संकट है, लोक-कलाएं विलुप्त और नष्ट हो रही हैं। इनका संरक्षण-संवर्धन आवश्यक है, इस पर तुरंत एक नोट तैयार करना है। पुरातत्व-प्रशिक्षित का स्वभाव कुछ-कुछ बोदा-सा माना जा सकता है, वह जाने कितनों को बनते-बिगड़ते को देखा-समझा होता है, और ऐसी सभी बातों, वस्तुओं को दशकों में नहीं सदियों में सोचता है। बहरहाल, हासिल यह कि कभी ऐसा काम भी करना होता, जो शायद दबाव में ही संभव हो। आज यह नौबत आए तो तुरंत एआइ की मदद याद आएगी, तब यह स्थिति नहीं थी, और सहयोगियों की मदद से जो नोट बना, समझ नहीं पाता कि वह कितना सार्थक है, फिर भी ... वह इस प्रकार था- 

लोक कलाओं का संरक्षण एवं संवर्धन 

परिचय - 
छत्तीसगढ़ कला और संस्कृति की दृष्टि से समृद्ध भूभाग है। यह विविधतापूर्ण पारंपरिक लोक संस्कृति से अनुप्राणित है। लोक संस्कृति की यह सम्पन्नता इस अंचल के विशिष्ट भौगोलिक स्थिति की वजह से भी है। यह चारो ओर से विभिन्न भाषा-भाषी राज्यों से जुड़ा हुआ है। यहाँ की स्थानीय जनजातीय और मैदानी लोकसांस्कृतिक तत्त्वों में उत्तर में सरगुजा अंतर्गत उत्तरप्रदेश और झारखण्ड, पूर्व में ओडिशा, दक्षिण में आंध्रप्रदेश और तेलंगाना तथा पश्चिमी भाग में महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश के लोक सांस्कृतिक विशेषताओं का प्रभाव व समन्वय देखा जा सकता है। छत्तीसगढ़ में इस सांस्कृतिक आदान-प्रदान का मुख्य आधार इसका भूगोल ही है। 

कला रूप -
छत्तीसगढ़ में लोक कलाओं के विविध रूप विद्यमान हैं, जिन्हें यहाँ इस प्रकार वर्गीकृत कर प्रस्तुत किया गया है- 

1. लोकगाथा, लोकगीत एवं पारंपरिक वाद्य यन्त्र- यहाँ के अधिकांश लोकगीतों में किसी न किसी रूप में लोकगाथा का समावेश है। ये वस्तुतः गेय कहानियां होती हैं। इसके अंतर्गत पंडवानी, आल्हा-ऊदल, ढोलामारू, लोरिक चंदा और सरवन कुमार आदि उल्लेखनीय हैं। 

स्थानीय/आंचलिक लोक सांस्कृतिक परम्पराओं का संवहन लोकगीतों के माध्यम से होता है। यहाँ के अनेक लोकगीत और लोकनृत्य आपस में संबद्ध हैं। सुआ, भोजली, ददरिया, सधौरी, बिहाव गीत, गौरा-गौरी, डण्डा, करमा, मड़ई, बांस, जंवारा, देवार, रहस आदि यहाँ के प्रमुख लोकगीत हैं। 

लोकगीतों, लोकगाथाओं और लोकनृत्य/नाट्य इन सभी गेय अथवा प्रदर्शनकारी लोककलाओं में पारम्परिक वाद्यों की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण होती है। ये दर्शकों के मनोभाव को तरंगित करते और विधा को प्रभावोत्पादक बनाते हैं। छत्तीसगढ़ में भांति-भांति के पारंपरिक वाद्य यन्त्रों का प्रयोग यथा अवसर किया जाता है। ये वाद्य यन्त्र उस अवसर के अनुकूल मानवीय संवेदना को प्रगाढ़ करते हैं। यहाँ प्रचलित वाद्यों में ढोल, नगाड़ा, ढोलक, बांसुरी, हारमोनियम, बैंजो, तबला, मंजीरा, दफडा, निशान, चिकारा, सरांगी, इसराज, ढूगरू, राऊत बांसुरी, नमडेवन, खंझेरी, खल्हर, मंदरी, अलगोजा, चांग या डफ, ताशा, करताल, झांझ, मोहरी, बांस बाजा, सींग बाजा, मोहरी, धनकुल आदि हैं. 

2. लोकनृत्य- विभिन्न समुदायों के अपने-अपने पारंपरिक नृत्य हैं जो किसी खास अवसर पर कियो जाते हैं। इस अंचल में सरगुजा से लेकर बस्तर तक लोकनृत्यों की एक श्रृंखला दिखाई पड़ती है जो इस प्रकार हैं- करमा, डण्डा/शैला, सरहुल, सुआ, पंथी, रावत, डोमकच, गेंडी, ककसार आदि। इन लोकनृत्यों की भी अनेक स्थानीय शैलियाँ हैं। 

3. पारंपरिक नाट्य/मंचीय प्रस्तुतिकारी विधाएं- यहाँ की अनेक पारम्परिक लोकगाथाएं और लोकगीत जैसे पण्डवानी और रहस विधा का नाट्य शैली में प्रदर्शन प्रचलित है। इनके साथ ही नाचा, गम्मत, भतरा नाट, माओपाटा आदि प्रसिद्ध प्रस्तुतिकारी लोकनाट्य प्रचलित हैं। 

वर्तमान परिदृश्य - 
वर्तमान में छत्तीसगढ़ के प्रायः सभी कलारूपों के स्वरूप में समय के साथ हुये परिवर्तन को देखा जा सकता है। गांव के गुड़ी-चौपाल में होने वाली विभिन्न प्रदर्शनकारी कलाओं का मंचन अब राज्यस्तरीय/राष्ट्रीय लोक मंचों पर होने लगा है जिसके कारण इनके स्वरूप में धीरे-धीरे परिवर्तन आने लगा है। जैसे पंडवानी की शास्त्रीय वेदमती शैली को पद्मविभूषण तीजनबाई एवं अन्य कलाकारों द्वारा एक नई शैली कापालिक के रूप में विकसित किया गया। इसी तरह ख्यात पंथी कलाकार स्व. श्री देवदास बंजारे द्वारा एक्रोबैटिक प्रदर्शन के प्रभाव से पंथी नृत्य कला के स्वरूप में उल्लेखनीय परिवर्तन आया है। इन लोककलाओं को विशेष ख्याति प्राप्त हुई। 

इस क्रम में कतिपय ऐसी लोककलाएं भी हैं जिनका प्रचलन अलग-अलग कारणों से समय के साथ कम होता गया और इनमें से कुछ तो विलुप्ति के कगार पर हैं। जैसे रहंस (रास) और जगार कई दिनों तक चलने वाले विशाल अनुष्ठानिक व्यय साध्य आयोजनों के कारण अब इनका सीमित आयोजन ही होता है। कुछ लोककला विधाएं, उनके साथ जुड़ी विचित्र मान्यताओं के कारण उनका प्रचलन कम हो गया है। तारे-नारे/घोड़ा नाच जैसे लोकप्रिय विधाओं का प्रचलन ऐसी ही मान्यताओं के कारण कम हो गया है। ऐसा माना जाता है कि इसमें भूमिका का निर्वाह करने वाले पात्र/चरित्र के साथ अनिष्ट हो जाता है। 

कार्य योजना - 
कम प्रचलित/विलुप्त होती लोककला शैलियों की पहचान कर सूची तैयार करना लोक संस्कृति हमारी अस्मिता और पहचान हैं, इसलिये इनका संरक्षण-संवर्धन अत्यावश्यक है। इसलिए ऐसी विधाएं जिनका प्रचलन कम हो गया/रहा है अथवा जो विलुप्ति के कगार पर हैं, उनके संरक्षण-संवर्धन के लिए दीर्घकालिक कार्य योजना बनाकर उनका क्रियान्वयन जरूरी है। 

ऐसी लोककला विधाएं जिनका प्रचलन कम होता जा रहा है अथवा विलुप्त होते जा रहे हैं, मुख्य रूप से इन 03 क्षेत्रों से संबंधित हैं- 

1. गायन- लोकगीत/लोकगाथा जैसे बांसगीत, चंदैनी, डोलामारू, भरथरी, गोपीचंदा, रतनपुरिहा भजन आदि. 
2. वादन- विविध वाद्य जैसे चिकारा, सरांगी, इसराज, हिरकी, ढुंगरू, राऊत बांसुरी, बांस, टामोक, तुड़बुड़ी, खंझेरी, हिरनांग, रोंजो, डांहक, टमड़िया, खल्हर, मंदरी, अलगोजा, चांग, दफड़ा, निसान, करताल, झांझ, मोहरी, सींग बाजा, धनकुल, तमूरा, आदि. 
3. नृत्य- कोरवा, बायर, छैला नाच आदि. 
4. नाट्य रूप- तारे-नारे, नाचा, गम्मत, नाटक, भतरा नाट, आनुष्ठानिक प्रस्तुतियाँ जैसे रहस, लक्ष्मी जगार, तीजा जगार आदि. 

कम प्रचलित/विलुप्त होती लोककला शैलियों की सूची का अद्यतनीकरण - 
1/ इन क्षेत्रों के विभिन्न लोककला शैलियों की पहचान कर सूची को अद्यतन करने के लिए यह आवश्यक होगा कि इस संबंध में जानकारी इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़, लोक कला के क्षेत्र में राष्ट्रीय/राज्य स्तरीय सम्मान/पुरस्कार प्राप्त तथा अन्य प्रतिष्ठित विशेषज्ञों, संभागायुक्तों के माध्यम से जिला स्तर पर, पंचायत विभाग, आदिम जाति कल्याण विभाग, उच्च शिक्षा एवं स्कूल शिक्षा विभाग तथा स्थानीय विशेषज्ञों कलाकारों के माध्यम से जानकारी एकत्र कराई जाए। 
2/ इसके लिए तीन दिवसीय राज्यस्तरीय कार्यशाला का आयोजन किया जाए जिसमें लोककला विशेषज्ञ और कलाकार सहभागिता करेंगे और वे लोककलाओं के प्रचलन कम होने/विलुप्त होने के कारणों पर विमर्श कर उनके संरक्षण-संवर्धन के लिये ठोस नीति तैयार करने हेतु सुझाव देंगे। 
3/ विलुप्त होती विधाओं जैसे लोक गायन और लोक वाद्य पर पांच दिवसीय कार्यक्रम जिसमें दिन में डिमान्सट्रेशन लेक्चर और सायंकालीन प्रस्तुतियों का आयोजन किया जाए। 
4/ तदन्तर संरक्षण-संवर्धन के लिए योजना तैयार कर उसका मैदानी स्तर पर क्रियान्वयन की कार्यवाही की जाए। 

मान्य होने पर बजट प्रस्ताव तैयार कर प्रस्तुत किया जा सकेगा।