Friday, July 1, 2022

नेताजी

2004 में श्याम बेनेगल की फिल्म ‘नेताजी सुभाष चंद्र बोस: द फारगाटेन हीरो‘ आई। फिल्म में नेताजी के विवाहित होने पा कुछ शोधकर्ताओं ने आपत्ति की थी। उनका कहना था कि 23 जनवरी 1939 में चीन जाने के लिए वीसा आवेदन में नेताजी ने अपनी वैवाहिक स्थिति ‘अविवाहित‘ दर्शाई है। नेताजी की हवाई दुर्घटना में मौत भी संदिग्ध मानी गई है। सितंबर 1985 में फैजाबाद के गुमनामी बाबा के मौत के बाद उनके सामानों में नेताजी संबंधी सामग्री से भी रहस्यों की उधेड़-बुन होती रही। इस सबके साथ नेताजी का चमत्कारी व्यक्तित्व किसी महाकाव्यीय नायक की तरह है, जिसकी निरंतर व्याख्या होती रहती है।

प्रभा खेतान फाउंडेशन के माध्यम से अन्य शहरों की तरह रायपुर में भी स्तरीय साहित्यिक-वैचारिक आयोजन होते रहे हैं, जिनमें ‘आखर‘ और ‘कलम‘ जैसा ही लेखक से मुलाकात और पाठक-श्रोताओं से रूबरू संवाद का कार्यक्रम ‘द राइट सर्किल‘ है, जिसका सुरुचिपूर्ण और व्यवस्थित संयोजन महिलाओं के समूह ‘अहसास‘, रायपुर द्वारा किया जाता है। इसी कड़ी में 30 जून को मिशन नेताजी वाले शोधार्थी-लेखक चंद्रचूड़ घोष आमंत्रित थे। ‘अहसास‘ समूह की सर्व सुश्री आंचल गरचा, सृष्टि त्रिवेदी, कीर्ति कृदत्त तथा उनके सहयोगियों ने इस महत्वपूर्ण सत्र को पूरी गरिमा के साथ अंजाम दिया। आमंत्रित लेखक के साथ बातचीत का जिम्मा समूह की वरिष्ठ सदस्य गांधीवादी शिक्षाविद विदुषी सुश्री कल्पना चौधरी का था।


पूरा सत्र, सुघड़, करीने से, कुशल समय-प्रबंधन और समय-सीमा में अधिकतम संभव निष्पत्तियों के कारण यादगार रहा। चंद्रचूड़ जी की विद्वता और नेताजी के तथ्यात्मक इतिहास को उजागर करने का उद्यम झलकता रहा। प्रश्नोत्तर सत्र के दौरान सुभाष चंद्र बोस की पुत्री अनीता से नेताजी संबंधी जानकारी पूछी जाने पर अनीता द्वारा प्रश्नों के प्रति उपेक्षा-उदासीनता के लिए चंद्रचूड़ जी का स्पष्टीकरण उल्लेखनीय था। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह वैसी ही बात होगी कि राहुल गांधी से राजीव गांधी या इंदिरा गांधी की मृत्यु से जुड़ी बातों की तहकीकात की जाए।

नेताजी संबंधी किसी भी जिज्ञासा, शंकाओं के समाधान के लिए डॉ. ब्रजकिशोर प्रसाद सिंह मुझे सदैव सहज उपलब्ध रहे हैं। नेताजी के प्रसंगों के साथ स्वाधीनता संग्राम, कांग्रेस, नौरोजी, गांधी, नेहरू, जिन्ना के न सिर्फ इतिहास, बल्कि उस दौरान की घटना और परिस्थितियों को संपूर्ण परिप्रेक्ष्य के साथ, उनसे जानना अनूठा अनुभव होता है। इसी क्रम में मध्यकालीन इतिहास के भी रोचक और कम चर्चित किंतु विशिष्ट पक्षों पर उनकी बातें पाठ्य पुस्तकों में मिलना संभव नहीं। फिल्म, हिंदी साहित्य और पौराणिक आख्यान भी उन्हें प्रिय हैं और संदर्भ, उदाहरण के लिए इस्तेमाल किए जाते रहते हैं। पिछले दिनों उत्तरप्रदेश चुनावों के पहले योगी आदित्यनाथ पर उनका लेख, समकालीन या निकट-भूत को वस्तुगत शोध दृष्टि से देखते हुए भविष्य की संभावनाओं को समझने का अनूठा नमूना है। बोस-गांधी मतभेद और मतांतर पर उनका एक लेख यहां है। डॉ. प्रसाद ने 1989 में प्रो. एस.पी. सिंह के निर्देशन में सुभाष चंद्र बोस पर शोध किया है। उनके शोध का शीर्षक ‘भारत के स्वाधीनता संग्राम में सुभाष चंद्र बोस की भूमिका‘ (मूल अंगरेजी में) था, इस कार्य में डॉ. प्रसाद को प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. बिपनचंद्र से भी मार्गदर्शन प्राप्त हुआ था। नेताजी, भारतीय इतिहास और क्षेत्रीय इतिहास के रोचक और महत्वपूर्ण पक्षों पर डॉ. प्रसाद यदा-कदा लिखते रहते हैं। पिछले दिनों गांधी पर लिखे उनके लेखों की श्रृंखला फेसबुक पर आई, जो संभवतः प्रकाशित भी होगी।

सुभाष चंद्र बोस पर डॉ. प्रसाद का एक लेख ‘सुभाष बोस, एमिली और अनिता‘ दैनिक हरिभूमि समाचार पत्र में 29 जनवरी 2006 को प्रकाशित हुआ था। वह लेख यहां यथावत प्रस्तुत-


सुभाष चन्द्र बोस आईसीएस से त्यागपत्र देने के उपरांत अपनी संपूर्ण ऊर्जा और समर्पण के साथ भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में शामिल हुये थे। गांधीवादी कांग्रेस की अहिंसात्मक जन आधारित राजनीति के बावजूद उनकी राजनीतिक विचारधारा तथा कार्यप्रणाली पर बंगाल की सशस्त्र क्रांतिकारी गतिविधियों का भरपूर प्रभाव पड़ा। इस परिवेश में उनके राजनैतिक विचार और कार्यों में राष्ट्रवाद की उग्रतम अभिव्यक्ति हुई। सविनय आंदोलन के दौरान कारावास की सजा भुगतते गंभीर तौर पर अस्वस्थ हुए तो चिकित्सा हेतु यूरोप जाना पड़ा। वियना और बैंडगेस्टीन में स्वास्थ्य लाभ करते हुए उन्होंने महसूस किया कि उनकी गतिविधियों पर खुफिया पुलिस के द्वारा निगरानी रखी जा रही है। आस्ट्रिया से बाहर अन्य देशों की यात्रा के दौरान भी उन पर निगरानी रखी जाती थी क्योंकि ब्रिटिश सरकार उन्हें अपना सर्वाधिक खतरनाक शत्रु मानती थी।

1934 में लंदन के प्रकाशक लॉरेंस विशार्ट ने उन्हें भारतीय राजनैतिक आंदोलन पर पुस्तक लिखने का प्रस्ताव दिया। करार के अनुसार पुस्तक उसी वर्ष पूर्ण की जानी थी। त्वरित लेखन हेतु सुभाष जी ने निजी सचिव रखने का फैसला किया। आस्ट्रिया में रह रहे डा. माथुर ने आस्ट्रिया परिवार की लड़की सुश्री एमिली शेंकल की अनुशंसा की। उनके पिता पशु चिकित्सक थे तथा दादा जी चमड़े के व्यवसाय से संबद्ध थे। उनका जन्म 26 दिसंबर 1910 को हुआ था। पूरा परिवार कैथोलिक मतावलंबी था। अंग्रेजी व्याकरण में एमिली ने प्रशंसा योग्य प्रवीणता प्राप्त की। शार्टहैंड में भी उन्होंने दक्षता हासिल की। 1930 में एमिली की स्कूली शिक्षा पूरी हो गयी तथा धर्म हेतु आजीवन व्रत का विचार छोड़ दिया। वे नौकरी की तलाश कर रही थीं। इसी समय डा. माथुर ने सुभाष चन्द्र बोस के निजी सचिव हेतु उनकी अनुशंसा की। सुभाष बोस को निजी सचिव इस प्रकार का चाहिये था, जो उनके विचार और कार्यों के बारे में सूचनाओं की गोपनीयता बनाये रख सके, क्योंकि ब्रिटिश खुफिया सेवा द्वारा उन पर सतत निगरानी रखी जा रही थी। एमिली इस मापदंड पर खरी उतर रही थीं।

पुस्तक लेखन में बोस स्वयं लिखते तो एमिली पांडुलिपि की टाइप प्रति तैयार करती या फिर बोस बोलते जाते और एमिली शार्टहैंड में नोट्स लेकर टाइप करतीं। सुभाष पहले तो होटल में रह रहे थे परन्तु जल्दी ही उन्होंने घर किराये पर ले लिया। सुभाष बोस के भतीजे अशोक नाथ बोस जर्मनी में पढ़ रहे थे। अवकाश होने पर वे भी आ जाते। चुनिंदा मौकों पर नेता जी स्वयं भोजन बनाते और अशोक के अनुसार वे भारतीय व्यंजन बहुत स्वादिष्ट बनाते थे। घर इस मामले में भी सुरक्षित था कि खुफिया विभाग के लोग होटल की तरह यहां निगरानी नहीं रख सकते थे। 1934 के अंत तक पुस्तक पूरी होने के उपरांत गाल ब्लैडर का आपरेशन होना था पुस्तक की प्रूफ चेकिंग करते-करते पिता को गंभीर रुग्णता की सूचना मिली तो तत्काल भारत लौटे। उन दिनों हवाई जहाज केवल दिन को ही उड़ा करते थे। यात्रा में समय अधिक लगता था करांची हवाई अड्डे पर पहुंचते ही मालूम हुआ कि उनके पिता का स्वर्गवास हो चुका है। कलकत्ते से श्राद्ध के बाद पुनः यूरोप लौटे। क्योंकि अभी उनके गाल ब्लैडर का आपरेशन होना था। उन्होंने एकमात्र नाम सुश्री एमिली शेंकल का लिखा था। संभवतः यह पुस्तक लेखन में की गयी सहायता के कारण कम और उस दौरान उनसे भावनात्मक लगाव का परिचायक अधिक था। 1935-36 के दौरान एमिली से उनकी घनिष्ठता बढ़ती गयी परंतु भारत की आजादी भी दृष्टि से ओझल नहीं हुई थी। बाद में गांधी नेहरू और कांग्रेस के दबाव में उन्हें रिहा किया गया। गांधी जी उन्हें 1938 के कांग्रेस सत्र के लिये अध्यक्ष नियुक्त किया तथा स्वास्थ्य लाभ के लिये यूरोप जाने की सलाह दी। क्योंकि कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर कार्य करने के लिये उन्हें अपने आप को फिट रखना था। इस संक्षिप्त यूरोपीय प्रवास में एमिली नेता जी के साथ रहीं। अब तक एमिली के साथ उनका स्नेह संबंध अत्यंत प्रगाढ़ हो चुका था।

1934 से 42 के आठ वर्षों की अवधि में दोनों के बीच उपजे अंतरंग तथा भावुक संबंधों का पता उनके बीच हुये पत्राचार से चलता है। आज कम से कम 180 पत्र उपलब्ध हैं जिनमें से अधिकांश सिगार के पुराने डब्बे में मिले थे। यह डब्बा 1980 में खोला गया था तथा 1993 में एमिली बोस ने इन पत्र को सार्वजनिक किये जाने की अनुमति दी। 1942 के उपरांत भी नेता जी ने एमिली को पत्र लिखना जारी रखा था। दक्षिण पूर्वी एशिया के विभिन्न हिस्सों से लिखे पत्र एमिली के वियना वाले घर में रखे थे। वियना पर मित्र राष्ट्रों की विजय के उपरांत ब्रिटिश अधिकारियों ने उनके घर की तलाशी ली और इस दौरान जब्त किये कागजातों में ये पत्र भी शामिल हो गये, आज ये पत्र अनुपलब्ध हैं। भारत से बर्लिन पहुंचने पर नेता जी ने एमिली के नाम पत्र लिखा तथा तार भी भेजा। एमिली के परिवार की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ नहीं थी। पिता की मृत्यु के उपरान्त परिवार में मां और बहन ही शेष बची थीं। आजीविका के लिये वे नौकरी कर रही थी। नेता जी ने उन्हें पुनः निजी सचिव के तौर पर रखने की अभिलाषा जाहिर की। पत्र में उन्होंने गुजारिश की थी कि व्यस्त और गोपनीय कार्यक्रम के कारण वे वियना आने में असमर्थ हैं सो एमिली हो बर्लिन आ जायें। जर्मन विदेश सेवा के अधिकारियों के मार्फत भी संदेश भेजा गया। एमिल मिलने आयी और इस बार दोनों ने विवाह कर लिया। 26 दिसंबर 1942 के दिन नवविवाहित दंपत्ति के घर पुत्री का जन्म हुआ। नेता जी इटालियन क्रांतिकारी गैरीबाल्डी को अपना आदर्श मानते थे और उनकी पुत्री एनीटा के नाम पर अपनी पुत्री का नामकरण अनीता किया। पत्नी और पुत्री के साथ वे अधिक समय नहीं बिता पाए क्योंकि दक्षिण पूर्वी एशिया में आजाद हिन्द फौज और सरकार के गठन हेतु उन्हें बर्लिन से जापान जाना पड़ा। एमिली और अनिता के प्रति पिता और पति के रूप में सुभाष बोस अपने आपको जिम्मेदारी से भागते महसूस कर रहे थे। अनिश्चितता की स्थिति में 8 फरवरी 1943 को अपने घनिष्ठ अग्रज और संरक्षक शरत बोस के नाम बंगला में पत्र लिखकर उन्होंने पत्नी को दिया जो जरूरत पड़ने पर उपयोग किया जाना था। पत्र इस प्रकार था,

मेरे प्रिय भाई, 

आज मैं फिर से एक बार खतरे की राह पर निकल रहा हूं घर की तरफ। मुझे शायद मंजिल नहीं भी मिल पाए। अगर मुझे किसी खतरे का सामना करना पड़ता है, तो मैं इस जीवन में आगे अपनी खबर नहीं दे पाऊंगा। इसीलिए मैं यह पत्र यहां छोड़ रहा है। जो सही समय पर आप को मिलेगा। मैंने यहां विवाह कर लिया है और मेरी एक बेटी है। मेरी अनुपस्थिति में मेरी पत्नी और पुत्री को वही प्यार दें जो आपने मुझे जीवनभर दिया है। मेरी अंतिम प्रार्थना है कि मेरी पत्नी और पुत्री मेरे अधूरे कार्य को पूरा करें।
-आपका सुभाष

सुभाष के इस पत्र को अपनी थाती बना कर एमिली वियना में रह रही थीं। 1945 के अगस्त महीने तक मित्र राष्ट्रों की जीत हो चुकी थी। शाम का समय था। लगभग तीन साल की हो रही अनिता बेडरूम में सोयी थी और एमिली रसोईघर में ऊन के गोले डब्बे में रख रही थीं। तभी रेडियो पर संध्याकालीन समाचार आया कि वायुयान दुर्घटना में सुभाष चंद्र बोस गई है। सुभाष बोस ने उन्हें पहले एक बार लिखा था,

‘हो सकता है मैं फिर कभी नहीं मिल पाऊं पर मेरा विश्वास करो कि तुम हमेशा मेरे हृदय में, विचारों में और स्वप्न में रहोगी। अगर भाग्य मुझे तुमसे इस जीवन में जुदा कर देता है तो मैं तुम्हें अगले जन्म में मिलूंगा... मेरे देवदूत, मुझे स्नेह करने के लिए और स्नेह करना सिखाने के लिए धन्यवाद‘ एमिली किचेन से चुपचाप निकलीं और बेडरूम गयीं जहां अनिता अनिष्ट से बेखबर सो रही थी। वे बिस्तर के बगल से फर्श पर धीमे से बैठीं और बरबस रुलाई फूट पड़ी। 
-डॉ. ब्रज किशोर प्र. सिंह

Wednesday, June 29, 2022

तद्भव

समसामयिक साहित्य/लेखन का नियमित पाठक कभी-कभार ही, संयोगवश रहा। इस दौर की पत्रिकाएं से भी ताल्लुक न के बराबर है। तब ‘तद्भव‘ का जनचरी 2022 अंक मिला। लगा कि ऐसी अच्छी चीज, बिना शोर-शराबे के, शांति से निभ रही है, जिसे अपना औचित्य और उस पर टिके रहना अच्छे से आता है। रचना चयन से संपादकीय कौशल का अनुमान करना चाहें तो संपादक की क्षमता, धीरज और दृढ़ता देखी जा सकती है। पत्रिका के अंत में लेखकों के मोबाइल नंबर दिए गए हैं, मगर संपादक का नंबर मुझे पत्रिका से नहीं, ‘हिंदी समय‘ से मिला। अंक की सारी सामग्री महत्वपूर्ण है, उनमें से कुछ पर मेरी पाठकीय प्रतिक्रिया-


विश्वनाथ त्रिपाठी जी ने ‘जलजोग‘ को दशाश्वमेध घाट की दुकान लिखा है। बनारस की मेरी यादें 1964-65 तक पुरानी हैं और मेरी याद में गोदौलिया की गिरजाघर चौमुहानी और जंगमबाड़ी वाली मुख्य चौमुहानी के आसपास ही कहीं यह दुकान होती थी। लक्सा से आगे बढ़ते मजदा टॉकीज पार कर शायद गिरजाघर चौमुहानी के पहले दायें हाथ की ओर यह दुकान थी। (इस पर बांग्ला में जलजोग लिखा होता था, यह पढ़ लेने पर मुझ जैसे नागरी पढ़ने वाले को भी लगता था कि बांग्ला पढ़ लेता हूं।) इसलिए जिज्ञासा कि क्या 1964-65 के पहले कभी यह दुकान दशाश्वमेध पर थी।

गीतांजलि श्री पर बातें होना शुरु हुईं, अर्पण कुमार ने उसके पहले उनसे बातचीत की थी, जो पत्रकारों वाला साक्षात्कार न हो कर सचमुच बातचीत है। अर्पण कुमार की ओर से बात का जो सूत्र पकड़ा जाता है, वह कितना औचित्यपूर्ण है यह गीतांजलि श्री के जवाब से रेखांकित होता है, उनका सहज लेखकीय व्यक्तित्व भी उस रूप में उभरकर आया है, जैसा संभवतः वे स्वयं चाहेंगी। एक जगह बात छिड़ती है- ‘अक्सरहां अपनी धुन में आप हमें रमी हुई दिखती हैं‘ तो वे कहीं ‘रेत समाधि‘ के लिए बताती हैं कि ‘बरसों लगे उस उपन्यास को पूरा करने में‘ ...। सोशल मीडिया पर बेताबों वाले इस दौर में रचे जा रहे साहित्य में धैर्य और ठहराव की गंभीरता, उसका महत्व, जिस तरह से इस पूरी बातचीत में उभरा है, वह किसी भी व्यक्ति/रचनाकार के लिए प्रेरक हो सकता है।

राहुल सिंह का लेख साहित्यकार का नहीं बल्कि तटस्थ इतिहासकार का लेखा है, शायद यह उनके आलोचक होने के कारण इस रूप में संभव हुआ है। ठेठ किस्म के साहित्यकार शायद ही कोई हों, जो इस सजगता से, स्रोतों के समुचित उपयोग और आधार पर बात स्थापित करें, जिसमें व्याख्या की वह दृष्टि हो, जो संभावनाओं के लिए जगह बचाए रखती है। वे जिस शोध परियोजना पर काम कर रहे हैं, निसंदेह वह गंभीर परिणाममूलक होगा। उन्होंने भूमि व्यवस्था को पूरे परिप्रेक्ष्य, यानि इतिहास, संस्कृति और तत्कालीन राजनैतिक-प्रशासनिक संदर्भों के साथ रख कर देखा है, इस पर आया निष्कर्ष आवश्यक नहीं कि सहमति योग्य हो, मगर स्पष्ट-तार्किक होने के कारण मील का पत्थर होगा।

अनुपम ओझा के फिर सियरा... में ऐसा सच्चा और ईमानदार लोक है, जहां न तो नैतिकता का आडंबरी आग्रह होता और न उसकी खास परवाह ही। चित्तू पंडित के साथ यह बात है और चूंकि वे नायक हैं, इसलिए उनमें घनीभूत है, मगर पूरा समाज भी बेपरवाह है, उनके या ऐसे किसी भी चरित्र के प्रति। मुखर और अधिक प्रकट यही प्रवृत्ति, स्थिति और घटनाएं, जहां बस आई-गई होती हैं, मगर शायद यही वजह है, समाज-लोक की गतिशीलता, जीवंतता का। आदर्शों को रेखांकित करने, उभारने का यह भी एक तरीका है कि उन गलित-पलित की बातें करें, वही हास्यास्पद, कुछ समय बात त्रासद का असर पैदा कर देता है। रेणु, राग दरबारी से लपूझन्ना तक के सफर के साथ और उसके बाद, ऐसा लेखन, अभिव्यक्ति की अपनी ताजगी सहित पठनीय तो है ही, महत्वपूर्ण भी कम नहीं।

हिलाल अहमद का लेख स्थायी महत्व का है। किसी के साथ आस्तिक-नास्तिक, धर्म-निरपेक्ष, अनास्थावादी, धर्मांध जैसे फिजूल विशेषण लगा देने में कितनी सनक और बेताबी होती है, यह इस लेख में बिना ढोल-ढमाके रेखांकित हुआ हैै। किसी धर्म का मानने वाला, कोई भी धर्मप्राण उनके इस लेखन में अपनी आवाज पा सकता है।

Friday, June 24, 2022

सीधी सी बात

पुराना फिल्मी गीत है, ‘सीधी सी बात न मिर्च मसाला, कह के रहेगा कहने वाला, दिल का हाल सुने दिलवाला।‘ यहां बात, हो सकता है सीधी न लगे, कुछ मसालेदार लग सकती है, मगर इरादा दिलवालों को दिल का हाल सुनाने का है। बात बस इतनी कि कविता और संगीत की मेरी समझ, आम फिल्मी गीतों के स्तर वाली, सीमित है।

हुआ कुछ यूं कि मधुसूदन ढाकी जी (बाद में पद्मभूषण सम्मानित) कभी बिलासपुर आए थे। भारतीय कला और चिंतन परंपरा के मूर्धन्य, अभ्यास से हिन्दुस्तानी और कर्नाटक संगीत में सिद्ध थे। मानते थे कि पारंपरिक कला की समझ के लिए संस्कृत और संगीत आना चाहिए। मैं यह अच्छी तरह जानता था कि मुझे संस्कृत नहीं आती और संगीत से भी कोई यों रिश्ता नहीं है। उन्होंने जोर दे कर पूछा, संगीत नहीं आता!, कुछ भी पसंद नहीं?, सुनते भी नहीं? संकोचवश, थोड़ी अपनी इस लाचारी पर स्वयं क्षुब्ध मैंने कहा, फिल्मी गीत सुनता हूं, पसंद भी हैं। उन्होंने पूछा, उसमें क्या, कौन? यों सहगल साहब और बेगम अख्तर पसंद आने लगे थे, पर अब पास-फेल की परवाह नहीं थी, सो पहला नाम जबान पर आया, कह दिया- किशोर कुमार। कुछ समय सोचते खामोश रहे, फिर उन्होंने पूछा- ‘जगमग जगमग करता निकला, चांद पूनम का प्यारा‘ सुना है?, मेरे इनकार पर बताया कि यह किशोर कुमार का गाया गीत उन्हें बेहद पसंद है और मुखड़ा गा कर भी सुना दिया।

घर में यदा-कदा फिल्मी चर्चा पर रोक-टोक नहीं थी। कमाल अमरोही, गुरुदत्त और राजकपूर की क्लासिक फिल्में और उनके गीतों की बातें सुनने को मिलतीं। फिल्मी गीत सुनते-गुनते अपनी काव्य-संगीत रुचि को इतना चलताउ मानता रहा कि उसे रुचि कहने में भी संकोच होता था। मगर इस तरह धीरे-धीरे, पता नहीं कब अपनी यह सोच बदली।

फिल्मी गीतों जैसी सीधी-सी बातें याद करते हुए कुछ पंक्तियां ध्यान आती है।

सरल, सपाट, संक्षिप्त-
सुनो, कहो, कहा, सुना, कुछ हुआ क्या।
अभी तो नही, कुछ भी नहीं।
चली हवा, झुकी घटा, कुछ हुआ क्या
अभी तो नही, कुछ भी नहीं।

और यही यहां कुछ औपचारिक सा-
सुनिए, कहिए, कहिए, सुनिए
कहते सुनते, बातों बातों में प्यार हो जाएगा।

एक कहा-सुनी ऐसी भी-
ये तूने क्या कहा, कहा होगा
ये मैंने क्या सुना, सुना होगा
अरे ये दिल गया, गया होगा।

इसी तरह गीत है-
‘बैठ जा, बैठ गई, खड़ी हो जा, खड़ी हो गई,
घूम जा, घूम गई, झूम जा, झूम गई, भूल जा, भूल गई‘।
गीत का पूरा मुखड़ा बस इतना सा।

ऐसे ही थोड़े से साफ-सीधे शब्दों का मुखड़ा है -
मैं जो बोलूं हां तो हां मैं जो बोलूं ना तो ना
मंज़ूर, मंज़ूर मुझे है मेरे सजना
तू जो बोले हां तो हां तू जो बोले ना तो ना।

दूसरी तरफ-
हम बोलेगा तो बोलोगे के बोलता है।
एक मेम शाब है, शाथ में शाब भी है।

कभी गाया गया था-
ओ बाबू साब, ओ मेम साब
क्या रखा इस तक़रार में
ज़रा तो आंखें देखो मिला के
बड़ा मज़ा है प्यार में।

और बातचीत की तरह -
अच्छा तो हम चलते हैं
फिर कब मिलोगे? जब तुम कहोगे
जुम्मे रात को, हां हां आधी रात को
कहां? वहीं जहाँ कोई आता-जाता नहीं
अच्छा तो हम चलते हैं।

फिर रोमांटिक होता सवाल-जवाब -
की गल है, कोई नहीं
तेरी आंखों से लगता है
कि तू कल रात को सोई नहीं
नींद है क्या है कौन सी चीज़
जो मैंने तेरे प्यार में खोई नहीं
की गल है, कोई नहीं।

थोड़े से शब्दों वाला एक मुखड़ा-
ज़िन्दगी, ज़िन्दगी मेरे घर आना, आना ज़िन्दगी
ज़िन्दगी मेरे घर आना, आना ज़िन्दगी
ज़िन्दगी, ओ, ज़िन्दगी मेरे घर आना, आना...

तब विरक्त गमगीनी के ऐसे बोल -
ये क्या हुआ, कैसे हुआ,
कब हुआ, क्यूं हुआ,
जब हुआ, तब हुआ
ओ छोड़ो, ये ना सोचो।

प्रेम, प्यार, इश्क, मुहब्बत की, जो इलु इलु तक पहुंची। न जाने कितने रंग दिखे-

प्यार किया तो डरना क्या/
खुल्लम खुल्ला प्यार करेंगे/
धीरे-धीरे प्यार को बढ़ाना है/
यदि आप हमें आदेश करें, तो प्यार का हम श्रीगणेश करें/
प्यार दीवाना होता है, मस्ताना होता है/
मैं तेरे प्यार में क्या क्या न बना दिलबर/
हम बने तुम बने इक दूजे के लिए/
दिल धड़के, नजर शरमाए तो समझो प्यार हो गया/
मिलो न तुम तो हम घबराएं/
क्या यही प्यार है, हां यही प्यार है/
क्या प्यार इसी को कहते हैं/
तू ये ना समझ लेना कि मैं तुझसे मुहब्बत करता हूं/
तुमको भी तो ऐसा ही कुछ होता होगा/
मेरे घर के आगे मोहब्बत लिखा है/
दिल एक मंदिर है, प्यार की जिसमें होती है पूजा/
छोटा सा फसाना है तेरे मेरे प्यार का/
वो जवानी जवानी नहीं, जिसकी कोई कहानी न हो/
चलो दिल में बिठा के तुम्हें, तुमसे ही प्यार किया जाय/
मैं प्यार का राही हूं/
आओगे जब तुम ओ साजना, अंगना फूल खिलेंगे/
कस्मे वादे प्यार वफा सब बात है बातों का/ 
आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे/
हंस मत पगली प्यार हो जाएगा...

इस सबके साथ ऐसा सबको लगता है, लगता रहेगा- ‘तेरे मेरे प्यार का अंदाज है निराला ...