अबाल-युवाओं की संगत में पता चलता है कि ट्रेंड क्या चल रहा है, वे ‘खुद की, जग की‘ क्या सोच रहे हैं, अपडेट करने का ऐसे अवसर मुझे अक्सर मिलता रहता है। यों भी मेरी नजर मुझसे बेहतर-युवा विकल्पों की ओर रहती है। मैंने पाया है कि आप अपनी जगह पर स्थापित रहें और सोचते रहें कि आगे क्या होगा?, आप सचमुच ऐसा सोच रहे हों तो अपनी जगह खाली कर दीजिए, देखिएगा कि उस खाली स्थान की पूर्ति के लिए जल्द ही एकाधिक विकल्प सामने आ जाएंगे, और इस बात की पूरी संभावना होगी कि समय के साथ वे आपसे बेहतर साबित होंगे। कहा-सुना और मान लिया जाता है कि युवा पीढ़ी एकदम डब्बा है, पढ़ती-लिखती नहीं। मुझे हमेशा इससे विपरीत मिला। मैंने पाया कि युवाओं में बहुत अच्छी समझ के साथ पढ़ने वाले और शुरुआती दौर में ही स्तरीय लिखने वाले अनेक हैं। ऐसा लगता है कि सिर्फ अपना लिखा पढ़ाने को और अपनी बात सुनाने को व्यग्र हों तो आपके लिए पाठक-श्रोताओं का टोटा हैै मगर आप नई चीज सुनने और पढ़ने को तैयार, बल्कि उत्सुक हैं फिर देखिए, आप पाएंगे कि भविष्य की रचनात्मकता को ले कर आपकी सारी निराशा दूर हो जाएगी। ‘कल और आएंगे..., मुझसे बेहतर कहने वाले, तुमसे बेहतर सुनने वाले।‘
इन गरमी की छुट्टियों में या ‘टीनोन्मुखी‘, ‘टीन‘ और इसके मुहाने बाहर निकलने ‘टीनातुर‘ आयु, मुझ वानप्रस्थ आयु वाले के लिए, 'बाल'-मित्र मिले, बने। हॉबी क्लासेस, गायन-वादन, नृत्य, चित्रकारी, खेलकूद ... कला-कौशल निपुण। उनकी कुछ जिज्ञासा, कई प्रश्न मुखर होते, कुछ मौन। अब याद कर रहा हूं कि उनसे जो कुछ कहना रह गया, वह अब यहां-
... जो बात हो रही थी उसे इस तरह समझो- कलाएं दो तरह की होती है क्रिएटिव और परफार्मिंग। इसमें चित्रकारी आदि क्रिएटिव है और नृत्य, गायन, वादन परफार्मिंग। इन दोनों का फर्क स्पष्ट है क्रिएटिव अपनी साधना, जैसा है, जो लोगों के सामने पूरा हो जाने पर आता है और आपके बिना भी किसी के सामने रखा जा सकता है जबकि परफार्मिंग, उतने समय तक ही लोगों के सामने होता है, जब तक आप परफार्म करते रहते हैं। इस फर्क के साथ यह ध्यान रखना चाहिए कि आपका अभ्यास, रियाज, प्रैक्टिस मुख्यतः अपने लिए होता है, जबकि मंच या खेल के मैदान में प्रस्तुति, जो लोगों के सामने होती है वह मुख्यतः दूसरों के लिए होती है। इसलिए जरूरी होता है कि आप अपनी साधना, अभ्यास नियमित करते रहें, यह रोज कमाने, रोज खाने जैसा है, या कहें कि नियमित जीवन-चर्या रूटीन लाइफ स्टाइल में आ जाना चाहिए। और बीच-बीच में उपयुक्त अवसर मिलने पर प्रस्तुति भी देते रहें, प्रतियोगिता में भाग लेते रहें।
आप समूह में बैठे हों, वहां अधिकतर आपसे बड़े लोग हैं और आपको लगता है कि जो बातें हो रही हैं, वे अनावश्यक निरर्थक हैं, छोटे होने के कारण आप बीच में बोल-टोक नहीं पाते और न चाहते हुए भी चुप रह कर सुनते रहते हैं, ऐसी स्थिति में बातों का सिलसिला आपके अनुसार हो (यह एक नेतृत्व-कौशल भी है) तो बातों के बीच, उससे जुड़ी अपनी जिज्ञासा, प्रश्न या विनम्र असहमति-आपत्ति रखें, इससे बड़ों को बुरा नहीं लगेगा, वे मानेंगे कि तुम्हें नहीं आता, तुम उनसे पूछ रहे हो, समझना चाहते हो और फिर उनकी बातचीत की दिशा उस ओर मुड़ जाती है, जैसा आप चाहते हैं। साथ ही यह भी याद करने की कोशिश करें कि जब बातचीत में मुख्य भूमिका आपकी होती है, बातचीत की कमान आपके हाथों होती है, तब हम किस तरह के विषयों पर क्या बात करते हैं। तब हमारी बातचीत का मुख्य विषय क्या होता है हम स्वयं, आसपास के लोग, (अपनी प्रशंसा, दूसरों की बुराई?) नई-पुरानी घटनाएं या कोई विचार। ध्यान रखें कि बातचीत, व्याख्यान-प्रवचन की तरह न हो। वाद-विवाद में आरोप-प्रत्यारोप भी हो, मगर स्वस्थ यानी, जिसमें व्यक्तिगत टिप्पणी न हो।
ध्यान देने की एक और बात है कि हमें किस काम में और कब उपकरणों, सहायक सामग्री, सहयोगी व्यक्ति की जरूरत होती है और कहां इसकी जरूरत नहीं होती। इसके लिए खेलों में ट्रेक एंड फील्ड है, जिसमें दूसरे प्रतिद्वंद्वी की भी जरूरत नहीं। इसी तरह गायन या नृत्य, जिसमें अभ्यास में किसी और सामग्री की जरूरत नहीं होती। इसीलिए इस संदर्भ में याद कर सकते हैं- न चौर्यहार्यं न राजहार्यं न भातृभाज्यं न च भारकारि। अपने शरीर और अपनी बुद्धि की कमाई और कौशल हमेशा सिर्फ आपके साथ रहता है, उस पर आपका पूरा अधिकार होता है, उसका उपयोग आप अपनी पसंद और आवश्यकता अनुसार कभी भी कर सकते हैं, इसलिए उसे श्रेष्ठ माना गया है।
ईश्वर या संयोग आप जिसे भी मानते हैं, जिसके चलते आपने खाते-पीते परिवार में जन्म लिया है, सभी अंग सामान्य हैं, फिर आपकी जिम्मेदारी है, आप पर निर्भर है कि आप क्या कर सकते हैं। सबसे पहले स्वयं अपने लिए, उसके बाद परिवार-मित्रों के लिए और फिर समाज के लिए क्या और कितना अच्छा कर सकते हैं, ध्यान रहे कि आपकी प्राथमिकता आप स्वयं हैं, यह स्वार्थी होना कतई नहीं, कहा गया है, ‘आप भला तो जग भला।‘ और यह भी कि ‘न वा अरे सर्वस्य कामाय सर्वं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति।‘ सबकी कामना के लिए सब प्रिय नहीं होते, अपने ही प्रयोजन के लिए सबसे प्रिय होते हैं।
अपनी परिस्थितियों के बावजूद भी जो हासिल कर ले, वही वास्तविक उपलब्धि है। सारी परिस्थितियां अनुकूल हों, तब तो कोई भी आगे बढ़ जाता है, जैसे ढाल पर बिना पैडल मारे सायकिल, मगर इसमें कोई आनंद, सुख नहीं। अपनी मेहनत और उद्यम से हासिल का ही असल आनंद होता है। दुनिया में जड़-चेतन, जो कुछ भी है, आपके भाव से अनुप्राणित ही साकार-सार्थक होता है- न देवो विद्यते काष्ठे न पाषाणे न मृण्मये। भावे तु विद्यते देवस्तस्माद् भावो हि कारणम्।। तात्पर्य कि देवता न काठ में रहते हैं, न पत्थर में, न मिट्टी में। वे तो भाव में रहते हैं। भाव ही किसी को देवता बनाने में कारण होता है।
टाल्सटाय ने कहा है-
'ल्योबुश्का, तुम पढ़ते बिल्कुल नहीं हो, यह बहुत बुरी बात है। यह इस बात का सबूत है कि तुम अहंकार के शिकार हो। तुम्हारे विपरीत गोर्की बहुत ज्यादा पढ़ता है, यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि इससे आदमी में आत्मविश्वास की कमी का पता चलता है। मैं लिखता बहुत ज्यादा हूं, यह भी अच्छी बात नहीं है, क्योंकि इससे लगता है कि एक बूढ़ा आदमी सभी को अपने विचारों से प्रभावित करना चाहता है।'
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अबाल-युवाओं से बातचीत में कुछ ऐसे भी होते हैं, जो जीवन का उद्देश्य, सृष्टि का रहस्य और स्वयं के अस्तित्व पर जिज्ञासु, चर्चा-उत्सुक होते हैं। ऐसे ही शाश्वत प्रश्न हैं, जिनका समाधान नहीं हो पाया है, मगर विचार-चिंतन सभी ने किया है तब यहीं से धर्म-अध्यात्म और दर्शन विकसित होता है। इन पर विचार करते-करते अक्सर इससे भटक-भूल जाना होता है और कुछ विचारक-दार्शनिक हो जाते हैं, उनकी बातों ऐसा लगता है कि ‘चलो, कुछ तो मिला‘ या मन बहल जाता है कि इसे भी कुछ नहीं मिला, बस बात बनाई है। और कभी यह मान कर कि ‘मुझे भी कुछ-कुछ ऐसा ही लगता है‘, उसके अनुयायी से ले कर अंध-भक्त बनने वाले भी कम नहीं। यों कहा जाता है कि ‘दर्शन, अंधेरे कमरे में अंधे व्यक्ति द्वारा ऐसी काली बिल्ली को खोजने का प्रयास है, जो वहां नहीं है।
खलील जिब्रान ने मौज-सी लेते कहा है-
सभ्यता उस समय शुरु हुई, जब मनुष्य ने पहले पहल धरती को खोदा और उसमें बीज बोये,
धर्म उस समय शुरु हुआ, जब मनुष्य ने धरती में बोये हुए अपने बीजों पर सूर्य की दया दृष्टि देखी,
कला उस समय शुरू हुई, जब मनुष्य ने सूरज के प्रति आभार प्रकट करते हुए स्तुति गान किया,
दर्शन शास्त्र उस समय शुरु हुआ, जब मनुष्य ने धरती की पैदावार खाई और बदहजमी की पीड़ा अनुभव की।
हजारी प्रसाद द्विवेदी, समस्त भारतीय धर्म-साधना के तीन पक्षों को रेखांकित करते हैं- उसके पीछे काम करनेवाली तत्त्व-मीमांसा (दर्शन), उसको सरस रूप में उपस्थित करनेवाला वाङ्मय (काव्य) और उसे जीवन के व्यवहार के क्षेत्र में ले आने के लिए तत्त्वानुयायी कर्मकाण्ड (क्रिया)। ये तीनों ज्ञान, इच्छा और क्रिया के प्रतिपादक होते हैं। धर्म-साधना में इन तीनों का अन्तर्भाव होता है।
फिर ऐसे साथियों को याद दिलाना होता है, उपनिषद-पुराणों में प्रश्न आए हैं, वे कुछ इस तरह हैं-
उत्पत्तिः यह संसार किससे उत्पन्न होता है?
लयः अंत में यह किसमें लीन हो जाता है?
आधारः यह संसार किसमें स्थित है (किसके सहारे टिका है)?
मायाः वह क्या है जो काले सर्प की भांति सभी प्राणियों को ग्रसता है?
जीव की गतिः आत्मा का अंतिम लक्ष्य क्या है?
कर्मः कर्मों का असली रहस्य क्या है?
टाल्स्टाय कहते हैं- ‘अगर जिंदगी का कोई मकसद नहीं, अगर जिंदगी खुद ही अपने में मकसद, तब तो जीने का कोई मतलब नहीं। अगर यह बात सच है तब शॉपनहावर, हार्तमान और बौद्धों के विचार भी बिल्कुल सही हैं। लेकिन अगर जिंदगी का कोई मकसद है तो यह जाहिर है कि जब वह मकसद पूरा हो जाए तभी जिंदगी को खत्म हो जाना चाहिए।‘
लाओत्से कहते हैं- ‘जीवन निरुद्देश्य है और सही आदमी सिर्फ वह है, जो जीवन को उसकी निरुद्देश्यता में जीने की कला को जान ले, जिसने भी जिंदगी में उद्देश्य खोजा, वह जिंदा रहने के रस से तो गया ही, उद्देश्य पाने के फितूर से भी मारा जाता है।‘
बादल सरकार ने ‘एवम् इन्द्रजित्‘ नाटक में लिखा है-
तीर्थ नहीं है केवल यात्रा। लक्ष्य नहीं, है केवल पथ ही।
इसी तीर्थ पथ पर है चलना। इष्ट यही, गन्तव्य यही है।
महेश अनघ के ग़ज़ल की पंक्ति है-
जिंदगी जैसे बने जीना जीना हकीकत है।
और बाकी सब किताबों की नसीहत है।
सुरेन्द्र मोहन पाठक सरलता से कह देते हैं- ‘जिंदगी को एक सिग्रेट की तरह एंजाय करो वरना सुलग तो रही ही है, एक दिन वैसे ही खत्म हो जानी है।‘
जिसे इस तरह भी कहा जाता है कि जीवन को रीझ कर स्वीकार करें या खीझ कर, उसे स्वीकार करना ही होगा।
जीवन की सार्थकता का सवाल- शांत और स्थिर का संतोष, उस समरस का अपना आनंद होता है। वह सार्थक और निरर्थक के द्वंद्व से ऊपर हो जाता है।


