Sunday, July 5, 2026

जिरह अजुधिया

अयोध्या नगरी जितनी राममय है, राकेश तिवारी उतने अयोध्यामय, जो उनके लिए अजुधियाजी है। अयोध्या उतनी ही मेरी भी है, जितनी किसी ‘हिन्दु‘स्तानी के लिए। बाबरी मस्जिद हो या राम जन्मभूमि, अयोध्या रामलला से ओरछा रामराजा और दिल्ली के रामराज्य कर्णधारों के बीच आवाजाही, आस्था के ढांचे को प्रभावित करता है, चूलें हिल जाती हैं। ऐसे मौकों पर तह तक जाने में पुरातत्व-इतिहास की अकादमिक वस्तुनिष्ठ भूमिका मददगार होती है, तथापि उसकी व्याख्या स्याह-सफेद कर सकती है और उसमें रंग भी भरती है। आस्था के रंगों से सराबोर, इतिहास की अंधेरी सुरंगों के बीच कुछ उजले, कुछ धुंधले ऐसे ही पन्ने हैं, पुरातत्वविद् राकेश तिवारी की कलम से निकली किताब ‘जिरह अजुधिया‘।

किताब, जिसके लिए आश्वस्त रहता हूं कि अच्छी होगी, पसंद आएगी, उसे पढ़ने के लिए बचा कर रखता हूं, भोजन के आखिरी कौर की तरह। जब तबीयत हो, लगातार पूरा समय मन लगाकर अलट-पलट कर, रस लेते, जुगाली करते पढ़ूंगा, उस दौरान और कुछ नहीं। इसके साथ भी यही बात थी, छपने के बाद से ही आ गई थी। हाथ में लेते ही अयोध्या पर कुछ और ही जिरह होने लगी। किताब के पन्नों के साथ मेरा मन अयोध्या-इतिहास की परतों और कण-कण में समाए राम में रमा रहा।

पता चला कि यह किताब ‘जिरह अजुधिया हमरी लेखी‘ है, शीर्षक में ‘जिरह अजुधिया’ रह गई है, गनीमत कि ‘ ... अयोध्या ...‘ नहीं हो गई। साहित्य में ऐसा होता रहा है। अज्ञेय ने अपनी किताब ‘लिखि कागद कोरे‘ की भूमिका ‘साँचि कहउँ‘ में बताया है कि ‘असल में मुझे शीर्षक देना चाहिए था ‘अध साँचि कहउँ मैं टाँकि- टाँकि कागद अध-कोरे‘ - पर साठोत्तरी उपन्यास के पाठोत्तरी पाठक भी महसूसते (उन्हीं की भाषा है) कि इतने लम्बे शीर्षक नहीं चलने के ...‘। यद्यपि कविता-संग्रह, मगर साठोत्तरी ही है, विनोद कुमार शुक्ल की - ‘वह आदमी चला गया नया गरम कोट पहिनकर विचार की तरह‘। खैर, आपसी चर्चा में कुछ ऐसे प्रसंग भी आए, जिन पर राकेश जी इतना ही कह कर रह गए- ‘रामजी की चिड़िया, रामजी का खेत ...‘। मुझे याद आया कि राम मंदिर निर्माण के दौरान कितने ही तरह की रसीद बुक लिए चंदार्थी ‘राम के नाम पर‘ टकराते थे।

किताब पढ़ते हुए, इसमें आई बातों के साथ अपनी ढपली है तो कही-कहीं अपना भी राग छेड़ने का इरादा बना, संभव है वह राग कहीं सुरीला न हो, मगर भरोसा रखें, बेमेल नहीं होगा।

तो किताब आरंभ होती है- ‘भगवान श्रीरामलला विराजमान श्रीराम जन्मभूमि आदि...‘ न्यायालयीन मामले में निदेशक, उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्व संगठन राकेश तिवारी का बयान लिखवाया गया- मूलतः बस्ती जिले का निवासी ... मेरे बाबा सेवानिवृत्त होने के बाद अयोध्या में भी रहते थे ... मुझे याद नहीं है कि मैं विवादित परिसर में कितनी बार गया था। लेखक के भोले बाल-मन पर अंकित राम-रहीम संकेत उल्लेखनीय है, वे लिखते हैं कि बचपन में रावण जलने पर उसकी एक लकड़ी तोड़ कर घर ले आते, क्योंकि सुन रखा था कि ऐसी लकड़ी और ताजिया की अबरक और चमकीली पन्नी खाट से बांध देने पर बुरी आत्माएं और अलाय-बलाय बराए रहते हैं। उनकी मनोभूमि में यह भी दर्ज है- ‘जब गंगा मइया लोगों के पापों से मैली हो जाती हैं तो वह स्त्री-वेश धारण कर सरयू जी में स्नान करके स्वयं को पुनः पवित्र कर लेती हैं।‘

लिखते हैं- ‘बचपन के दिनों में, ब्रह्ममुहूर्त में पितामही के सुमधुर स्वरों में श्रीरामचरितमानस का पाठ सुनने और कभी-कभी पितामह की अँगुरी थामकर सरजू मइया के आँचर में आचमन-नमन करके ‘अजुधिया जी‘ में स्थित ‘हनुमानगढ़ी-जन्मभूमि‘ के दर्शन-पूजन के संस्कार पाए। जन्म से मृत्युपर्यन्त हमारे जीवन के समस्त अनुष्ठान ‘सरजू मइया‘ और ‘अजुधिया जी‘ से जुड़े चले आ रहे हैं।‘ इसके साथ लेखक को किस तरह के संस्कार मिले, उनके पितामह के प्रसंग की बानगी- ‘हाकिम हैरान होकर पूछने लगते ‘बप्पा! आप किसकी पैरवी कर रहे हैं? मैनेजमेंट की या लेबर की?‘ पंडित जी तपाक से कहते- ‘दोनों की। ऐसा फैसला करो जिससे दोनों में से किसी का नुकसान न होने पाए।‘ हाकिम सुनकर हँसते रहते और इसी तरह मुकदमा चलता रहता। ... सबको पता चल जाता- ‘कउनो मुकदमा मा फइसला हुई गवा। को जीता को हारा। ईके बारे मा कोउ नहीं पूछत रहै। प्रसाद मिल गवा, इतनै भर समझें औ बोलें-जय अजुधिया जी की। जय हनुमान जी की। जय श्रीराम। जय जय सियाराम।‘

लेखक ने छत्तीस साल की उमर पार करने के पहले ही ‘उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्व का भार संभाल लिया था, लिखते हैं कि उस समय रत्ती भर अंदाजा नहीं लगा कि ‘मूंड़ मुड़ाते ही ओले पड़ने‘ वाले हैं। 10 जनवरी 1990 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय की खंडपीठ से पारित आदेश उन्हें मिला, लिखते हैं- ‘पढ़ कर समझ में आया कि अब तक दर्शक दीर्घा में टकटकी लगाए देख रहे रामलीला में अपना किरदार अदा करने का वक्त आ गया है।‘ ... ... ... ‘बहरहाल देख-परख कर तैयारी की पहली कवायद करके रामलला के दरबार में हमारी पहली पेशी पूरी हुई।

रामलला-राम जन्मभूमि वाले अयोध्या राम मंदिर की पृष्ठभूमि में, रामायण-महाभारत की हकीकत, ऐतिहासिकता, घटना काल, रचना काल, वेद-पुराण, शास्त्रीय-ग्रंथ और प्राचीन साहित्य आदि के उद्धरण-उद्धारण होता रहा। बात पुरातत्व-उत्खनन पर आनी ही थी, आई भी। पढ़े-लिखों के बीच भी मान लिया जाता है कि इससे चमत्कार होगा, जो भी मिला ‘कार्बन-डेटिंग हो जाएगी‘ से ले कर ‘रामजी की कुंडली, जन्म-प्रमाणपत्र‘ भी मिल जाएगा, जैसी उम्मीद के जुगनू चमकते रहे। इस बीच ग्राउंड पेनिट्रेटिंग सर्वे या ‘जिओ रडार सर्वे‘ का काम ऐसे कामों में नातजुर्बेकार निजी संस्था को भी आजमाने का प्रयास हुआ, जिसकी वजह से कुछ दिनों के लिए बात अली रही, लेकिन उलझी-सी उनकी रिपोर्ट से समाधान में कोई मदद नहीं मिली। शोध-संगोष्ठी, सेमिनार होते गए, शोध-पत्रिकाओं के वाल्युम्स और पुस्तकें आती गईं, बातें बढ़ती गईं। जबकि तुलसी बाबा कह गए हैं- ‘... को करि तर्क बढ़ावै शाखा‘।

आम तौर पर पुरातत्व से जुड़े शब्द, जो अधिकतर सुनाई पड़ते हैं, उनमें ‘कार्बन डेटिंग‘ मुख्य है। इसलिए यहां काल निर्धारण और इस ‘डेटिंग‘ पर बात कर ली जाए। ध्यान करें हाल के वर्षों में धार की भोजशाला के शिलालेखों और वाराणसी, ज्ञानवापी में महाकाल के काल-निर्धारण के लिए भी कार्बन डेटिंग खबरों में रहा था। पहले इस पुस्तक के हवाले से, जिसमें इसे स्पष्ट किया गया है-

1. सभी जीवित पदार्थ कार्बन पर आधारित होते हैं और जीवन प्रक्रिया के अन्तर्गत ताजा कार्बन समाहित करते हैं, पौधों द्वारा की जाने वाली ‘प्रकाश संश्लेषण‘ (फोटो सिंथेसिस) की क्रिया इसका एक उदाहरण है। इस प्रक्रिया में जीवित पदार्थ जीवनपर्यन्त सामान्य C-12 के साथ उसके रेडियो एक्टिव आइसोटोप C-14 को भी समाहित करते हैं। इन प्राणियों की मृत्यु के उपरान्त इनमें निहित C-14 का क्षय (decay) प्रारम्भ हो जाता है और 5730+/-40 वर्ष में उसकी रेडियो एक्टिविटी आधी रह जाती है। इस सिद्धान्त पर किया गया काल-निर्धारण रेडियो कार्बन डेटिंग कहलाता है। 
2. अतः यदि किसी इमारत/पुरावशेष के साथ सुनिश्चित रूप से उसके समकालिक ऐसे ऑर्गेनिक सैम्पल मिल सकें जिनमें C-14 उपलब्ध हो तो उसकी रेडियो एक्टिविटी को माप करके उक्त इमारत/पुरावशेष का काल-निर्धारण किया जा सकता है। 

संक्षेप में कार्बन डेटिंग जैविक अवशेषों की होती है, अकार्बनिक पदार्थों की नहीं। साथ ही जांच के नमूनों की भिन्नता से और अलग-अलग प्रयोगशालाओं की गणना में हजार साल तक का अंतर संभव होता है। इसलिए इस विधि की अपनी सीमा है। पुस्तक में पेज 291-292 पर रेडियो कार्बन डेटिंग के साथ कालक्रम की एक अन्य विधा का संक्षेप- टी.एल. डेटिंग (सरकारी महकमे में यह आद्याक्षर टाइम लिमिट बैठक के लिए प्रचलित है।) का संक्षिप्त उल्लेख है। यह विधि टी-थर्मो, एल-ल्यूमिनेसेंट यानी ताप-प्रतिदीप्त विधि है, जिसके द्वारा सामान्यतः मृण-वस्तुओं के आग में पकाए जाने की तिथि की गणना कर, मृदभांड जैसे अवशेषों का काल निर्धारण किया जाता है। यह भी ध्यान रहे कि पुरातत्व में सामान्यतः काल निर्धारण रूपाकार-प्रकार के आधार पर किया जाता है, जिसमें अभिलेखों के लिए पुरालिपि शास्त्र और मंदिर-मूर्तियों के लिए कला-शैली, अलंकरण, लय-ताल आदि आधार होता है। यह सभी रिलेटिव या कम्परेटिव विधियां हैं, जिसमें काल निर्धारण का आधार उसके पूर्वापर ज्ञात काल के पुरावशेषों के सापेक्ष पर किया जाता है। यदि किसी वस्तु-विशेष के आधार पर निरपेक्ष रूप से काल-निर्धारण हो तो यह एब्सोल्यूट, निरपेक्ष वैज्ञानिक विधि होगी। 

मुख्यतः 9 खंडों की बंटी पुस्तक की योजना में सात को सोपान कहा गया है, मगर पंचम और अष्टम को अध्याय। ऐसा संभवतः इसलिए कि ये दोनों अध्याय ठेठ पुरातात्विक प्रक्रिया- खुदाई, अभिलेखन आदि तथा उस पर तर्क-वितर्क के हैं। आप रामभक्त हों, इतिहास में गहरी रुचि हो, शोध कर रहे हों तो बात अलग है वरना किताब की मोटाई और फिर फुटनोट, संदर्भ, उद्धरण आदि देख कर पहले तो लगता है कि क्या ही कुछ लिख दिया होगा इतना सारा, मगर किताब खत्म करने पर लगता है कितना कुछ रह गया होगा अनलिखा-छपा। इसके साथ खास यह कि पूरा लेखन भाषा और विवरण की शैली के कारण तथ्यात्मकता के बावजूद बोझिल नहीं, सरस बना रहता है। लेखक औरों को बख्शता नहीं, मगर साथ ही खुद पर बेझिझक टिप्पणी, सवाल करते हुए भी सहज और आम बने रहना, इस लेखन को खास बनाता है। ‘सहज समाधि भली‘ और ‘कामन सेंस इज मोस्ट रेयर सेंस‘, इस में साधी-सधी दिखती है।

चतुर्थ सोपान, अयोध्या के कोरियाई-चीनी रिश्ते पर है, जिसके लिए पाकिस्तान, मंगोलिया, रूस में भी भटकना है। पहले लगता है कि बेवजह ‘दूर की कौड़ी है‘ लेकिन बात राम की हो तो देश-काल का व्यापक होना ‘किम् आश्चर्यम्‘! इस सोपान में ‘अनोखी रूमानी कहानी‘ है, जिसमें पात्र किम और हो के साथ उनके वंशजों के सूत्र-ओ-सुराग ‘जुड़वां मछलियों‘ में निहित हैं। बात आ जाती है, कोरिया के गिम्हे नगर में अयोध्या की राजकुमारी के स्मारक और अब अयेध्या में भी सरयू किनारे उनके स्मारक तक, साथ ही 30 जुलाई 2019 को भारत सरकार द्वारा जारी ‘महारानी हो‘ और ‘राजकुमारी सूरीरत्ना‘ के चित्र वाला भारत-कोरिया गणराज्य संयुक्त डाक टिकट भी जुड़ गया है।

राकेश जी ने निदेशक के पद पर चयन में अपनी मूंछों की भूमिका पर प्रकाश डाला है, फिर यहां जुड़वां मछलियों की बात पढ़ते हुए हमारे अर्न्तचक्षु में भी मछली-मूंछें दिखने लगीं। प्राचीन कला में अपनी सबसे यादगार ‘जुड़वां मछली‘, जो छत्तीसगढ़ में ताला की अति-मानवाकार अनूठी ‘रूद्र शिव‘ प्रतिमा के मूंछों पर है। चलिए, अभी ढपली हमारी तो क्यों न हम भी अपना राग छेड़ें- बांग्ला में छोटी मछली को ‘पुटी‘ या प्यार से ‘पुटिया‘ भी कहते हैं‘, ऐसा जान पड़ता है कि यह ‘पुट देना‘, पुड़िया, जैसे शब्दों के करीब है। इस शब्द की चर्चा प्रभात रंजन सरकार की पुस्तक वर्णविचित्रा में इस प्रकार है- ‘शफरी/सफरी - ‘शफरी‘ शब्द का अर्थ है पोंठी मछली। शफरी या पोंठी मछली की बंगाल में 11 प्रजातियां हैं ... वर्तमान में क्षुद्राकृति पोंठी को कोई कोई तीती पोंठी कहा करते हैं ... गंभीरजलसंवारी रोहितादि न विकारी। गण्डूषजलमात्रेण शफरी फरफरायते।। ... बंगला भाषा में ‘शफरी‘ शब्द का अपर अर्थ ‘विदेशागत‘ अर्थात् विदेश से सफर करके जो आया है।‘ मेरी जानकारी में यह शब्द संस्कृत के ‘प्रोष्ठी‘ से आया है और प्रोष्ठी के लिए अनुमान होता है कि प्र-ओष्ठ, ओंठ के ऊपरी भाग का आकार। ‘विधुर जातक‘ में ‘पाठीना पावुसा मच्छा बलजा मुंज रोहिता।‘ मछली का नाम ‘पाठीना‘ आया है। अमरकोष का उल्लेख है- ‘प्रोष्ठी तु शफरी द्वयोः‘ और हलायुध कोष में- ‘सहस्रदंष्ट्र पाठीनः प्रोष्ठी च शफरी स्मृता।‘ यों यहां पाठी और प्रोष्ठी अलग-अलग हैं। एक अन्य संदर्भ- वाल्मीकि रामायण बालकांड में दशरथ के चारों पुत्रों को ‘प्रोष्ठपदोपमा‘, भाद्रपदा के चार तारों के समान कहा गया है। भाद्रपदा नक्षत्र के दो भेद, पूर्व और उत्तर हैं, इसके दो-दो तारे मिल कर कुल चार होते हैं।

बात राम-रामायण की तो एक कदम और आगे बढ़ें। छत्तीसगढ़ दक्षिण कोसल है, माता कौसल्या का मायका और रामजी का ननिहाल, राम हमारे भांजे। भांजे-भांजियों को देव-तुल्य मान, मामा का पैलगी करना, छत्तीसगढ़ में अब भी अन्य अंचलों की तुलना में अधिक प्रचलित है। फिर राम वनवास का लगभग समय दंडकारण्य में बीता। और कितने ‘प्रमाण‘ चाहिए, इन सबके मद्देनजर छत्तीसगढ़वासी हम- कोरिया, चीन, अयोध्या, राम से कितने करीब जुड़ जाते हैं। किसी को यह दूर की कौड़ी लगती है तो लगती रहे, उसकी बला से। 

राकेश जी सारे दौर-दौरे का मूल्यांकन करते चलते हैं, ज्यों- 
‘... 31 अक्टूबर, 1984 को दिल्ली में मिलने का आह्वान किया गया। उस दिन के आन्दोलन और सभा ने हम पर गहरा असर डाला। सिंघल जी के उद्घोष के साथ वर्मा जी की अयोध्या वाली ‘श्रीराम विषयक‘ संगोष्ठी की लय-ताल साफ-साफ समझ में आने लगी। अब तक चल रही ‘अयोध्या जी‘ और ‘श्रीरामजी‘ की ऐतिहासिकता की अकादमिक बहस से आस्था और धार्मिक परिप्रेक्ष्य की तरफ बढ़ रही जिरह अब बड़े जोर-शोर से चल पड़ी ‘श्रीराम जन्मभूमि‘ और ‘रामलला‘ को मुक्त कराने की मुहिम की दिशा में।‘ ... ... ... ‘ताला खुलने के बाद पूरे देश का वातावरण ‘राममय‘ होने के साथ ‘अयोध्या जी‘ और ‘श्रीरामजी‘ की ऐतिहासिकता की जिरह किनारे रह गई। ‘राम जन्मभूमि-मुक्ति‘ का धार्मिक और राजनैतिक मुद्दा सर्वोपरि हो गया।‘ ... ... ... ‘उधर साझा बेड़े पर सवार महारथियों में से राम-रहीम एक ही मानने वाले ‘राजा नहीं फकीर‘ बाबू विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधानमंत्री के सिंहासन पर विराजे।‘ -(लेखक के शब्द चयन पर आपका भी ध्यान गया ही होगा- राजा मांडा विश्वनाथ प्रताप सिंह के लिए राजा नहीं फकीर और प्रधानमत्री की कुरसी पर बैठे, नहीं सिंहासन पर विराजे।) ... ... ... अगले आम चुनाव में राजीव गांधी की हत्या के बाद उपजी सहानुभूति की लहर में श्री पी.वी. नरसिम्हा राव देश के प्रधानमंत्री और कारसेवकों पर चली गोली के जवाब में भारतीय जनता पार्टी के श्री कल्याण सिंह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद पर आसीन हो गए। ... उपर्युक्त घटनाक्रम के बीच अध्यादेश में शामिल ‘विवादित परिसर‘ में कभी मन्दिर रहे होने के रहस्य ने हमें अपने सम्मोहन-पाश में बाँध लिया।‘

इस दौर के राजनैतिक घटनाक्रम, जिसमें शाहबानो प्रकरण भी है, जो प्रत्यक्ष परोक्षतः मामले को प्रभावित करते रहे, राकेश जी हवाला देते चलते हैं। ... ‘इस तरह ‘अजुधिया जी‘ और ‘रामजी‘ के सन्दर्भ में ‘बाबरी मस्जिद‘ से जुड़ी आस्था-धर्म-परम्परा के अतिरिक्त ‘महात्मा बुद्ध‘ के अनुयायियों की आस्था भी ‘राजनीतिक खिलाड़ियों‘ के चौसर की बिसात वाले पासों में तब्दील कर दी गई।‘

इसी तरह उल्लेख करते हैं कि फैजाबाद के जिला जज कृष्ण मोहन पांडेय ने अपनी आत्मकथा में लिखा है- ‘जिस रोज मैं ताला खोलने का आदेश लिख रहा था, मेरी अदालत की छत पर एक काला बन्दर पूरे दिन फ्लैग-पोस्ट को पकड़कर बैठा रहा। वे लोग जो फैसला सुनने के लिए अदालत आए थे, उस बन्दर को फल और मूँगफली देते रहे, पर बन्दर ने कुछ नहीं खाया। चुपचाप बैठा रहा। फैसले के बाद जब डी.एम. और एस.एस.पी. मुझे घर पहुँचाने गए तो मैंने उस बन्दर को अपने घर के बरामदे में बैठा पाया। मुझे आश्चर्य हुआ। मैंने उसे प्रणाम किया। वह कोई दैवीय ताकत थी।‘

किताब में आई लेखकीय टिप्पणियों के कुछ नमूने- ‘25 सितम्बर को श्री लालकृष्ण आडवाणी सोमनाथ से चलकर दस हजार किलोमीटर लम्बी रथयात्रा तय करके 30 अक्टूबर, 1990 को अयोध्या पहुँचने के इरादे से निकल पड़े। मतलब सत्ता कब्जियाने के अखाड़े में मंडल-कार्ड के मुकाबिल मन्दिर वाले कमंडल का दंगल शुरू हो गया।‘ ... ... ... ‘30 अक्टूबर से 2 नवम्बर, 1990 के बीच पूरे देश का ध्यान अयोध्या की गतिविधियों पर सधा रहा। इस बीच तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह द्वारा निर्गत विवादित स्थल के अधिग्रहण सम्बन्धी अध्यादेश में यह भी शामिल था- ... वहाँ कभी मन्दिर था-या नहीं- यह रहस्य सुलझाने का काम सुप्रीम कोर्ट को सौंपा जाएगा।‘

इसी तरह मामला राजनेताओं, हिंदू-मुस्लिम पक्षधरों से होते हुए न्यायालय तक फिर पुरातत्व विभाग पर आ जाता। पुरातत्व-इतिहास से जुड़े अध्येता यह अच्छी तरह समझते हैं कि वे साधन-उपकरण हैं, कंधे हैं। ऐसे में कुछ इसका लाभ उठाने के फिराक में रहते हैं, उनका अपना एजेंडा साथ-साथ दौड़ने लगता है और सफल भी होते हैं। कोई अपनी जिम्मेदारी निभाते खुद को पाक-साफ और सुरक्षित रख पाता है तो ऐसे भी हैं, जो लपेटे में आते हैं, और जैसा वे लिखते हैं- ‘... दोनों समुदायों के लोग बेचारे इतिहासकारों को उनकी तरफ से ऐतिहासिक सुबूत पेश करने को कहते हैं।‘

इस संदर्भ में लेखक की कुछ टिप्पणियां देखने लायक हैं- ‘जहां तक हमारी जानकारी है दुनिया भर में शायद ही कहीं किसी मसले को सुलझाने के लिए अदालत ने पुराविदी खुदाई का सहारा लिया होगा!‘ ... ‘थोड़ी ही देर के लिए सही हमें अपनी महत्ता पर फूले रहने का दुर्लभ अवसर मिला, वरना आम तौर पर टुटहे बर्तन बटोरने और खंडहरों में माथा फोड़ने वाले पुराविदों को इन महकमों के लोग भाव ही कहाँ देते हैं।‘ ... ‘रोशन होने लगे भू-खोदना पुराविद्‘ ... ‘मन्दिर-मस्जिद मसला गरमाते जाने के साथ पुराविदों-इतिहासकारों में छिड़े वाद-विवाद और प्रतिवादों के चलते सारे देश में पुरातात्विक शोध और ‘पुरातत्व विभाग‘ की अहमियत उन्मान चढ़ती गई।‘ ... इस संदर्भ में पुराविदों के योगदान के लिए उनकी पीठ ठोंकी गई।‘ ... कुल मिलाकर इस विवाद के चलते इतिहासकारों, पुराविदों, ‘भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण’ और सरकार की गर्दन फंस गई ‘भूत’ की रसरी में। 

'पुराविदी खुदाई' का जिक्र आने पर ‘उदयन दास हत्या कांड‘ प्रसंग को याद लेना चाहिए। जिसमें उदयन ने 2010 में अपने ही माता-पिता की हत्या कर, उन्हें रायपुर घर के लॉन में दफना दिया था, पुनः 2016 में अपनी प्रमिका की भोपाल में हत्या की और सीमेंट का चबूतरा बना कर दफन कर दिया था। 2017 में खुलासे के बाद 2020 में पश्चिम बंगाल की अदालत ने उम्र कैद की सजा सुनाई और 2023 में रायपुर की अदालत में उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। पुराने कब्रगाह, महाश्मीय सभ्यता के कबर-खोदू, यहां पुराविदी खुदाई के लिए तब ‘सीन‘ में आए, जब उदयन की निशानदेही पर उसके रायपुर वाले निवास के लॉन में हत्या कर दफनाए उसके मां-पिता के शव की बरामदगी के लिए सुबह-सुबह खुदाई शुरू हुई। खुदाई जेसीबी से हो रही थी, भीड़ जुटी थी, मीडिया चैनलों पर लाइव प्रसारण हो रहा था। यह सब कुछ देखते हुए रायपुर के तत्कालीन पुलिस महानिरीक्षक श्री प्रदीप गुप्ता को चिंता हुई कि डेड बॉडी के साथ सबूत सुरक्षित करने में समस्या आ सकती है। उन्होंने मुझसे फोन पर संपर्क किया और पूछा कि पुरातात्विक खुदाई के लिए कुछ प्रशिक्षित कामगर मिल सकते हैं, मेरा जवाब सकारात्मक था, मगर जब उन्होंने मामला बताया और कहा कि ऐसे लोग तुरंत चाहिए तो इस पर मैंने स्पष्ट किया कि कामगर कितना भी प्रशिक्षित हो ऐसे मामले में काम नहीं आएगा, तो रास्ता भी सुझाना पड़ा। छत्तीसगढ़ पुरातत्व संचालनालय के मेरे सहकर्मी और खुदाई के काम के सबसे अनुभवी प्रभात सिंह को इसके लिए कहा, इस निर्देश के साथ कि यदि इस काम में परेशानी महसूस हो तो बता दें, विनम्र असमर्थता प्रकट करने में मुझे तनिक हिचक न होगी। वे अपने सहयोगी प्रवीण तिर्की के साथ तैयार हुए। तब तक हुई खुदाई के स्ट्रेटा के आधार पर शव के दफन होने का ठीक-ठीक अनुमान किया, जो सटीक साबित हुआ। इस तरह इन दो खेदकों ने अपने अनुभव और तकनीकी योग्यता, कार्य-कुशलता के साथ काम संपन्न कराया और श्री गुप्ता से प्रशस्ति पत्र पाने के हकदार बने। बाद में प्रभात जी ने बताया कि संयोगवश कुछ दिनों से वे ‘burial excavation‘ पढ़ते हुए सोच रहे थे, न जाने इसका अवसर कब मिलेगा, मिलेगा भी कि नहीं, एतदर्थ उन्होंने मेरे प्रति आभार जताया। 

यहां ‘इतिहासकारों, पुराविदों, और ‘भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण’ की गर्दन फंस गई ‘भूत’ की रसरी‘ के दो प्रसंगों को भी याद कर लेना प्रासंगिक होगा। 2007 के रामसेतु विवाद में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के निदेशक श्री चन्द्रशेखर द्वारा सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दिया गया था, जिसमें रामसेतु के मानव-निर्मित होने को खारिज किया गया था। इसे धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाला माना गया। विवाद बढ़ने पर सरकार ने हलफनामा वापस ले लिया और सरकार के ‘निर्देशों का ठीक से पालन‘ नहीं किये जाने के परिणामस्वरूप, चन्द्रशेखर और सहायक निदेशक वी. बख्शी को निलंबित कर दिया गया था। लगभग तीन महीने बाद निलंबन वापस लेते हुए इन अधिकारियों की बहाली कर दी गई।

दूसरा मामला 2013 का है, जिसमें स्वामी विरक्तानंद उर्फ संत शोभन सरकार ने अपने सपने के आधार पर उन्नाव जिले के डौंडिया खेड़ा गांव के रामबक्स सिंह के ऐतिहासिक किले के नीचे भारी मात्रा में सोने का खजाना होने का दावा था। शोभन सरकार के सपने का सम्मान करते भारत सरकार ने पुरातत्व विभाग को काम पर लगा दिया। लगभग महीने भर की खुदाई के बाद ‘मिल जाए तो मिट्टी है, खो जाए तो ...‘ जैसी बात हुई। सपना संत का था, झूठा तो हो नहीं सकता, संभव है ‘अपात्रों‘ के हाथ लगने के पहले सोना मिट्टी हो गया हो। संयोगवश इस काम से संबद्ध अधिकारी श्री प्रवीण मिश्रा जी रायपुर से स्थानान्तरित हो कर गए, मेरे परिचित थे, इसलिए पूरे खुदाई अभियान की परत-दर-परत जानकारी मुझे व्यक्तिगत रूप से भी मिली। ‘सुनहरे‘ सपने के आधार पर खुदाई का यह विश्व का अनूठा मामला पुरातत्व के इतिहास में सदैव के लिए दर्ज हो गया।

आगे बढ़ते किताब से कुछ और अंश देखते चलें-
# फिर, भला बचपन से ही भगवा ध्वज को नमन करने वाले ‘नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे...‘ गाने और दंड-सलामी करने वाले ... 
# अपने वक्त के नामचीन दानिशमन्दों में शुमार सर्वपल्ली गोपाल और उनके सह-लेखकों ने हिन्दू पक्ष की अयोध्या, रामजी और जन्मस्थान से जुड़ी दलीलों को छिन्न-भिन्न करने के लिए स्वाध्याय और शोध के तपोबल से अर्जित अपने तरकश के दिव्य तीरों की बरसात करने में कोई कसर नहीं छोड़ी-
# गोली-कांड-अयोध्या और रामजी के नाम पर चल रहे सियासी नृत्य की ताल-बेताल नृत्य-पदी में ‘विवादित ढाँचे की जगह कभी मन्दिर रहे होने के सवाल‘ में उलझकर हम उस मसले से अपने सरोकारों के बारे में भूल ही गए।
# दूर-दूर तक खलबली मचा दी अयोध्या के विवादित-स्थल से प्राचीन मन्दिर अवशेष मिलने की खबरों ने। मन्दिर और मस्जिद के पैरोकारों के अखबारी-आग में दोनों तरफ से भर-भर मूठी लोबान झोंका जाने लगा। 
# देर से ही सही, पगहा तोड़ाकर उछलते बछेड़ों के पाँव किस तरह पगहों में छानकर चाकरी के संस्कारों में जकड़े जाते हैं सिस्टम में समाहित उसकी प्रक्रिया समझ में पैठने लगी।
# हमारी कल्पनाओं की लटाई पर ढील पाई कनकइया खुले आसमान में लहराने लगी।

इस ‘लटई-कनकइया‘ पर मेरी टिप्पणी कि खासकर पूर्वी उत्तर प्रदेश की ‘खिचड़ी-मकर संक्रांति‘ के पेंच लड़ाने से अच्छी तरह परिचित न हों, शायद उन्हें इसका आनंद न मिल सके। यह लटई समानार्थी है परेता, लपेटा या चकरी का और कनकइया यानी गुड़डी-पतंग। इसका रस सिर्फ शब्दों के समानार्थी में नहीं, यादों में है, जिसमें कभी आपने पतंग को ढील दी हो और उसे मौज में लहराते देखा हो। 

प्राचीन इतिहास के उद्भट पंडित, डॉ. विश्वम्भर शरण पाठक (अधिकतर इनका नाम विशम्भर लिखने की भूल होती है।) के हवाले से महत्वपूर्ण भाषाशास्त्रीय विमर्श पुस्तक में शामिल है, इस तरह- ‘यह सुनकर उन्होंने कहा-‘अच्छा! एक सूत्र मैं बताता हूँ। भाषा-शास्त्रीय दृष्टि से इस क्षेत्र में कुछ ऐसे शब्द बोले जाते हैं जिनकी व्युत्पत्ति न तो वैदिक व्याकरण के नियमों से और न ही शास्त्रीय व्याकरण की सहायता से सिद्ध होती है।‘ उदाहरण के लिए यहाँ दो शब्द लिये जा सकते हैं- ‘साकेत‘ और ‘श्रावस्ती‘। पुराणों के अनुसार ‘श्रावस्ती‘ की स्थापना ‘श्रावस्त‘ ने की थी किन्तु ‘श्रावस्त‘ के अर्थ क्या हैं? पूर्व इंडो-यूरोपियन भाषा में पाँच मूल स्वर थे-अ, इ, उ, अय, अव। कालान्तर में पाणिनि का सूत्र बन गया- ऐचोऽयवायावः, अर्थात अऽइ = अय, और अऽव = अव। यह बाद का विकास है।‘ ... पाठक जी जैसे मूर्धन्य भाषा-शास्त्रीय विशेषज्ञ से ‘वैदिक संस्कृत‘ से भी पहले की भाषा रहे होने के अनुमान का ज्ञान हुआ।‘

इसके साथ भाषा संबंधी एक अन्य उल्लेख, 1.2.2003 को जारी सम्मन का है- ‘इस सम्मन में इस्तेमाल किये गए इन लफ्जों के मायने हमारे दफ्तर में कोई नहीं बता पाया-‘मुद्दालेह, हरगाह, मिन जामिन, मजकूरावाला, असालतन, बतारीख, इरसाल, जादराह, उज्र, मजमुआ, मरकूल, सहादत, मुतसव्वर, मजकूर, मरकूम वाल्दा, मजकूरा मुबलिग‘। ... सोचने लगा- ‘आम लोगों को तलब करने के लिए अदालतों से जारी होने वाले हुक्मनामों (सम्मनों) की इबारत इतनी मुश्किल क्यों होती है। इसमें इतने कठिन लफ्ज क्यों इस्तेमाल किये जाते हैं! जिसके सही-सही मायने समझने के लिए भी किसी आलिम मौलवी साहब की मदद लेनी पड़े। पता नहीं कब से सँजोयी जा रही है यह रवायती जबान! क्यों नहीं इसे सुधारकर सबके समझने लायक सरल बना दिया जाता। कहाँ तो गोहार लगती है अंग्रेजी की जगह हिन्दी की और कहाँ तो यहाँ देवनागरी लिपि में जारी हो रहे हुक्मनाओं की यह भाषा!‘

राकेश जी लिखते हैं- ‘अच्छे शोधकर्ता और अच्छे वकील प्राइमरी सोर्स (मूल स्रोत) की तसदीक किये बिना पूरी तरह से मुतमईन नहीं हो पाते।‘

उनकी इस बात को कुछ आगे बढ़ा कर देखें। यह बात ‘प्रमाण विचार‘ की तरह है, चाहे वह कानून हो शोध हो या दर्शन। कानून में बतौर सबूत-आधार फौजदारी हो तो प्राथमिकी, चश्मदीद, परिस्थितिजन्य, अन्य सहायक परिपार्श्विक तथ्य। दीवानी में यही मूल दस्तावेज, अन्य संबंधित कागजात और उसके बाद प्रकरण से जुड़े व्यक्तियों के बयान होते हैं। संक्षेप में मौखिक, दस्तावेजी और भौतिक। अकादमिक शोध-प्रविधि में यही क्रम होता है। इसलिए उत्खनन में कई बार दैनंदिनी, प्राथमिक प्रविष्टि पंजी की जांच-खोज की जाती है, संक्षेप में प्राथमिक और द्वितीयक, जो यथाआवश्यक मात्रात्मक और गुणात्मक होते हैं। दर्शन के क्षेत्र में, विशेष कर न्याय, चार्वाक में कहा जाता है- ‘प्रत्यक्षं किं प्रमाणं‘ या अद्वैत का ‘हस्तामलक‘। पद्मभूषण से सम्मानित हमारे गुरुजी मधुसूदन ए ढाकी जी, विचारों में खुले, व्यवहार में गंभीर-से, कठोर श्वेताम्बर जैन-व्रती, संभवतः जैन चिंतन परंपरा के आधार पर कहते थे ‘प्रमाणं स्वपरभासी, सत्यं वाद विवर्ज्यते‘। बहरहाल, इस क्रम में प्रत्यक्ष के आगे अनुमान, उपमान, शब्द, अर्थापत्ति और अनुपलब्धि निर्धारित है। अयोध्या राम जन्मभूमि और राम मंदिर के संदर्भ में प्रमाण अनुपलब्धता के लिए Absence of evidence is not evidence of absence कहावत, प्रासंगिक है। इसी तरह कहा जाता है- देर ही अंधेर का कारण है और इसके विपरीत यह भी कि जल्दी का काम शैतान का, धीरे-धीरे रे मना ...। अयोध्या प्रकरण से जुड़े रहे ए.के. शर्मा जी ने अपनी पुस्तक AYODHYA CASE Archaeological Evidences में उल्लेख किया है- Justice delayed is justice denied.

इस पूरे प्रकरण का महत्वपूर्ण दुर्लभ स्रोत, पुस्तक के षष्टम सोपान के 11. ‘परिशिष्ट-क‘ पर ‘अयोध्या का विष्णुहरि मन्दिर शिलालेख‘ भावानुवाद सहित प्रकाशित है। इस अभिलेख के पाठ में थोड़ा-बहुत अन्तर होने के बाद भी इसके मिलने से बारहवीं शताब्दी में अयोध्या में ‘विष्णुहरि‘ का भव्य प्रस्तर मन्दिर निर्मित कराया जाना सुनिश्चित रूप से सिद्ध हो गया। 

इन सबके बावजूद अयोध्या और राम की प्राचीनता के लिए निष्कर्ष पर पहुंचते हुए लिखते हैं- ‘कुल मिलाकर भूगर्भीय, पर्यावरणीय और पुरातात्त्विक शोधों तथा प्राचीन साहित्य से मिले समेकित तथ्यों के प्रकाश में ‘शतपथ ब्राह्मण उपाख्यान‘ के बल पर फुलाया गया गहन वनों वाला गुब्बारा अब तक पूरी तरह से फूट-फाट चुका है। और अब, गंगा घाटी का प्राचीन कालीन नजारा निरखने के लिए चाहिए नया नजरिया। इस सिलसिले में संगत शोध-प्रकाशनों के सन्दर्भ देखे जा सकते हैं। ... थोड़े में कहें तो पिछले पाँच दशकों की खोजों से गंगा-घाटी की प्राचीन मानव-सभ्यताओं की तसवीर पूरी तरह बदल चुकी है। इसलिए ‘रामजी की अजुधिया‘ की बसावट और प्राचीनता पर भी इस बदली हुई अद्यतन स्थिति की पृष्ठभूमि में विचार करना अधिक युक्तिसंगत होगा।‘

वे लिखते हैं- इस या उस पार्टी या स्वतंत्र या निरपेक्ष विचारधारा से जुड़ा होना कोई बुरी बात नहीं, किन्तु किसी विशेष विचारधारा के राजनीतिक प्रयोग के लिए दोषपूर्ण तर्कों के बल पर उलटी-सीधी ‘दलीलें‘ देना किसी भी तरह से ठीक नहीं ठहराया जा सकता। ... राजनीतिक या अन्य किन्हीं भी कारणों से ऐसा करने वालों को न तो अवांक्षित और अतिरिक्त प्रशंसा-अनुशंसा मिलनी चाहिए, और न निन्दा, न प्रताड़ना। ऐसी उपलब्धियों के माध्यम से मन्दिर-पक्ष को मजबूत करने का श्रेय लेना या देना किसी तरह श्रेयस्कर नहीं। ... उपर्युक्त सन्दर्भ में ‘रामजी‘ की कृपा से अपने राम बहुत भाग्यशाली रहे। बारह वर्ष से कुछ अधिक लम्बे समय तक किसी भी सरकार ने अयोध्या-विवाद के पक्ष या प्रतिपक्ष में कुछ भी लिखने के लिए न तो कभी कोई दबाव डाला और न प्रोत्साहित ही किया। संस्थाओं और उनमें कार्यरत व्यक्तियों की विश्वसनीय बनाए रखने के लिए ऐसा ही करना समुचित भी है। साथ ही यह भी कि- ‘अपने लाभ‘ के लिए मौके के हिसाब से तोल-मोल कर बोलना छोटे-बड़े किसी के भी लिए शोभनीय नहीं। यदि ऐसा किसी पद के दायित्वों का निर्वहन करते हुए किया जाए तब तो बिलकुल भी नहीं। कोर्ट या सरकार के आदेश से वैसा ही करना चाहिए जैसा किया जाना तकनीकी और अकादमिक दृष्टि से तथ्यात्मक और निष्पक्ष हो। ऐसा करके कोई किसी पर तनिक सा भी ‘उपकार‘ नहीं करता, वैसा तो उन्हें करना ही चाहिए। उसके लिए अतिरिक्त लाभ की लालसा, जतन या अनुकम्पा पाना या देना पद-भ्रष्ट होने का द्योतक है।'

निष्कर्ष पर पहुंचते हुए पुस्तक के और कुछ अंश, जिनसे लेखक-पुस्तक के नजरिए को साफ समझा जा सकता है- # कुछ को छोड़ कर दोनों तरफ के अकादमिक सूरमा साफ तौर पर दुराग्रह की सीमा लांघकर राजनीति के रावण दरबार में अंगद के पांव अड़ाने का प्रहसन करते हुए अपने-अपने तर्कों-कुतर्कों के साथ लामबन्द दिखने लगे।
# विभिन्न उद्धरण-प्रसंगों में आए कुछ महत्वपूर्ण उल्लेख- ‘अयोध्या मुद्दा ‘आस्था‘ से संबंधित है ‘तथ्यों से नहीं‘ जो कि इस पूरे प्रयास की उपयोगिता पर सवालिया निशान लगा सकता है।‘ और ‘पुरातत्व एक सामाजिक विज्ञान है न कि प्राकृतिक विज्ञान। पुरातात्विक खोजें व्याख्याओं की एक विस्तृत श्रृंखला के अधीन होती हैं।‘
# पुनः ‘अयोध्या का मसला इतिहास द्वारा अन्तिम रूप से तय नहीं किया जा सकता। इसे पुरातत्व द्वारा भी तय नहीं किया जा सकेगा। खुदाई से केवल और अधिक भ्रम उत्पन्न हो सकता है।‘
# इसी तरह ‘ए.एस.आई. जैसी संस्था जिस पर एक वक्त में मुल्क को जायज नाज रहा है कि कारगुजारी के बारे में ऐसा कहने के लिए मजबूर होना तकलीफदेह है।
# उन्होंने ऐसा केवल निरपेक्ष मूल्यों के प्रति निष्ठा के कारण किया।
# अब जबकि खुदाई निराशजनक साबित हो चुकी है अचानक फिर से सुलह की माँग सुनाई पड़ने लगी है। वक्त और परिस्थितियाँ दोनों ही इस माँग को सन्दिग्ध बना देते हैं। अब जबकि सब कुछ खोदकर नष्ट कर दिया गया है, क्यों न कोर्ट के आदेश का इन्तजार किया जाए और उसका पालन किया जाए?‘
# जैसा कि पहले ही उल्लेख किया गया है उनकी सामाजिक संरचना, पारिवारिक मूल्यों, जीवन दर्शन, भाषा-बोली आदि के बारे में केवल अनुमान लगाने के यत्न ही किये जा सकते हैं।

हर सफर का अपना रोमांच होता है, वह देश का हो या काल का। छत्तीसगढ़ के लोग लंबी यात्राओं और प्रवास पर जाते, अपने अनुभव से कहते हैं- परदेस जाए अउ रुख चढ़े एक बरोबर‘, परदेश जाएं या पेड़ पर चढ़े हो, अनिश्चितता के अधर में होते हैं। लेकिन इसी अनिश्चितता के रोमांच में सफर का रस होता है। ‘जिरह अजुधिया‘ के इस सफर में बेपरवाह-से जान पड़ते, घुमक्कड़ी करने वाले राकेश तिवारी का साथ है, फिर सफर कितना भी अनजाना, लंबा और दुर्गम हो, उलझाव, भटकाव और थकान में भी मौज बनी रहती है। अंततः समझ में आता है कि राकेश जी की ओर से यह आना सबसे जरूरी था, जिन्होंने अपने अंचल और संस्कारों के साथ पुरातत्व इतिहासकार के रूप में कर्मभूमि के प्रति सजग-जिम्मेदारी सहित न्याय किया है, और इसमें अपनी प्रामाणिकता और विश्वसनीयता को सर्वोपरि रखा है। यह उनकी कलम-तोड़ जैसी रचना है, मगर वे लगातार सक्रिय हैं, सक्रिय बने रहें, कलम टूट-छूट जाए तो की-बोर्ड पर या अपने ‘गुरु‘ नागर जी की तरह बोल-बोल कर लिखते-लिखाते।

‘पक्का पक गए होंगे आप अब तक के वाद-प्रतिवाद-विवाद और तोहमतों वाली अदालती कारगुजारी से। मगर इतने उलझे हुए झमेलों की तह में उतरने के लिए इतना तो झेलना ही पड़ेगा।‘ पुस्तक में आए न्यायालयीन बयानों, वकीलों, पुराविदों के तर्क-वितर्क, खंडन-मंडन, शुष्क विवरण से बोझिल होते मसौदे का ध्यान रखते हुए राकेश जी ऐसा स्वयं लिखते हैं पर नायाब कहन, लय रवानी के लिए शब्दों का चयन, जिसमें आंचलिकता का पुट है, के माध्यम से, अधिकारी खुद को इसानी नजरिए से देखता है और लेखकीय नजरिए से कलमबद्ध करते हुए नान फिक्शन को फिक्शन की रवानी दे देता है, यह कहते हुए कि- ‘... देश का नागरिक होने के नाते अपने उद्गारों के बारे में भी दो बातें कर लेने की प्रासंगिकता के लिए।‘

हमने बारीकी से पढ़ा, यों ही तारीफ का हवाई पुल, कहे तो फ्लाईओवर नहीं बांध दिया है। इस दौर में छपाई सुगम हो गई है, लेकिन शुद्धि-पत्र का प्रचलन नहीं रहा, जबकि प्रूफ की अशुद्धियां आम हो गई हैं। ऐसे में इस पुस्तक लगभग अशुद्धि-प्रूफ है ही और पाया कि कॉपी एडिटिंग, पेज-सेटिंग, ले-आउट भी बढ़िया है। यह उल्लेख आवश्यक जान पड़ता है कि अब, जबकि ‘पुरातत्त्व‘ को ‘पुरातत्व‘ लिखा जाना सामान्य प्रचलन में है, यहां वह पुरातत्त्व ही रखा गया है। (लगभग कहना इसलिए वांछित कि पेज 358, पंक्ति 24 पर ‘अवांक्षित‘ संभवतः अवांछित होगा। दो अन्य बिंदु- पेज 134 पर ‘संस्थान के प्रशिक्षुओं में...‘ कुछ नामों के साथ स्व. जुड़ा है, यह स्व., स्वर्गीय है तो आशय यही होगा कि कुछ स्वर्गीय भी प्रशिक्षु थे। इसी तरह पेज 141 पर आया नाम ‘डॉ. गएन्द्र, जो शायद गजेन्द्र या ज्ञानेन्द्र हो और पेज 274 पर ऐक्ट, न कि एक्ट, ध्यान देने पर स्पष्ट हो गया कि पेज 134, 141 और 274 की ‘अशुद्धियां‘ उद्धृत किए जाने के कारण हो सकती है, जिसे यथावत रखा गया है।)

इस किताब पर कुछ और उद्धरण/अच्छी बातें लिखना चाहा, मगर आभार में अपना नाम देख कर संकोचवश ठिठक गया कि जवाबी आभार न मान लिया जाए। मगर मुरव्वत नहीं, पकने की बात तो खुद लेखक कहता है और ‘एक बार दुहरा देना प्रासंगिक होगा‘ कहते हुए, प्रसंगवश ही सही कुछ अंशों में दुहराव-तिहराव है। पेज 135 फेसबुक पर- ‘इस जिरह की पिछली पोस्ट ...‘ का उल्लेख पा कर किताब का पाठक, प्रसंग का जोड़ नहीं बिठा पाता और अनजान पाठक के लिए बात तब खुलती है, जब अंत में ‘आभार‘ में पाता है कि इसे किस्तों में फेसबुक पर लिखा जाता रहा है। अब अधिकतर प्रकाशन, सोशल मीडिया की सामग्री को अपनाने लगे हैं, दूसरी तरफ अभी भी कुछ प्रकाशन समूह हैं जो ऐसे किसी प्लेटफार्म पर आ चुकी सामग्री को पूर्व-प्रकाशित मानते, अछूत वाला व्यवहार करते हैं। ऐसे में फेसबुक पर लिखी गई इस श्रृंखला का पुस्तक रूप में प्रकाशन, उल्लेखनीय है।

प्रसंगवश,
ऊपर श्री ए.के. शर्मा (अरुण कुमार शर्मा) की किताब AYODHYA CASE Archaeological Evidences का जिक्र है। श्री शर्मा, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के उत्खनन शाखा के अधिकारी रहे हैं। सेवानिवृत्ति के पश्चात विभिन्न उत्खनन परियोजनाओं का संचालन किया। छत्तीसगढ़ सरकार में पुरातत्व के मानद सलाहकार रहते हुए मुख्यतः सिरपुर तथा अन्य स्थलों की सर्वेक्षण, खुदाई, अनुरक्षण आदि कार्य कराया और इसी दौरान 2017 में पद्मश्री से सम्मानित हुए। राम जन्मभूमि उत्खनन और न्यायालयीन प्रक्रिया के उनके अनुभव-संस्मरण मुझे प्रत्यक्ष सुनने का मौका मिला, जिसमें वे मुझे वकीलों की तरह प्रति-परीक्षण का अवसर देते थे। उनसे जिरह के लिए मुझे स्वयं घटनाक्रम, मत-मतांतर की जानकारी के लिए मुझे लगातार सजग रहना होता। उनकी पुस्तक प्रकाशित होने पर उन्होंने सत्पात्र मानते उन्होंने कृपापूर्वक पुस्तक की सौजन्य प्रति मुझे दी थी। ‘जिरह अजुधिया‘ पढ़ने की तैयारी में, इस पुस्तक का पढ़ा होना, बहुत काम का साबित हुआ। इस पुस्तक की संक्षिप्त चर्चा यहां आवश्यक मानते- 

श्री शर्मा, पुस्तक के आरंभ में लिखते हैं कि- अयोध्या के मामले में, नियमित प्रक्रिया के बजाय माननीय उच्च न्यायालय ने पहली बार जल्दबाजी दिखाई, हालांकि यह मामला 1949 से अदालतों में लंबित था। फलस्वरूप भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के महानिदेशक को अपनी विशेष शक्तियों का प्रयोग करते हुए, निर्णय लेने का अवसर दिया। साथ ही माननीय न्यायालय का दूसरा अभूतपूर्व आदेश था कि ‘खुदाई पूरी होने की तारीख से एक सप्ताह के भीतर रिपोर्ट प्रस्तुत की जाए‘। किसी भी बड़े पैमाने की खुदाई की रिपोर्ट लिखने में, जिसमें हड्डियों की जांच, मिट्टी और मोर्टार के नमूनों की रासायनिक जांच आदि सहित सभी पहलुओं को शामिल किया जाता है, सामान्यतः कम से कम बारह से सोलह महीने लगते हैं। तीसरा, अभूतपूर्व आदेश खुदाई के अंतिम चरण में टीम लीडर को बदलने का था, जबकि माननीय न्यायालय को यह पूरी तरह से पता था कि मूल टीम लीडर के नेतृत्व में ही पूरी खुदाई की गई थी और वही क्षेत्र के सभी तकनीकी विवरणों से अवगत है। यह न्यायालय के अनुरूप रवैया नहीं था। यह खेदजनक है कि तत्कालीन भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के महानिदेशक ने इसका विरोध नहीं किया, क्योंकि टीम लीडर की नियुक्ति उन्होंने की थी, न कि माननीय न्यायालय ने। यह गलत धारणा कि न्यायपालिका कुछ भी कर सकती है, और वह भी तकनीकी मामलों में, न्याय के हित में दूर की जानी चाहिए, क्योंकि वे सभी विषयों के ज्ञाता नहीं हैं। माननीय उच्च न्यायालय के आदेशों के तहत, श्रम संरचना में भी, धार्मिक (मुस्लिम श्रमिक) कोटा पहली बार दुनिया भर में किसी भी पुरातात्विक उत्खनन में लागू किया गया था।

श्री शर्मा यह भी बताते हैं कि 3 अगस्त 2003 को, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण में मेरे पूर्व सहकर्मी डॉ. एस.पी. गुप्ता और श्री के.एन. दीक्षित ने नई दिल्ली में मुझसे संपर्क किया और पूछा कि क्या मैं अयोध्या में खुदाई स्थल पर जाकर, खुदाई से प्राप्त अवशेषों का निरीक्षण कर सकता हूँ और अपनी राय दे सकता हूँ। मैंने तुरंत सहमति दे दी क्योंकि यह मेरे जीवन का अवसर था, जिसमें बहुत समय से लंबित जटिल समस्या के समाधान के लिए अपना ज्ञान और बुद्धिमत्ता साझा करना चाहा।

इस सचित्र पुस्तक में अन्य ढेरों संदर्भों के साथ न्यायालयीन प्रकरणों की क्रमवार जानकारी और उनमें उठाए गए मुद्दों की जानकारी है। इसमें 23 दिसंबर 1949 को अयोध्या पुलिस थाने में दर्ज FIR-प्राथमिकी से आरंभ क्रमशः 1950, 1959 के ‘suit-वाद‘, 30 जुलाई 1953 का आदेश, सिविल जज, फैजाबाद का आदेश, 18 दिसंबर 1961 का वाद, 6 जनवरी 1964, 23 अगस्त 1990 का आवेदन, अप्रैल 1993 में भारतीय जनता पार्टी द्वारा अयोध्या और राम मंदिर आंदोलन पर जारी श्वेत पत्र, उच्चतम न्यायालय का आदेश 24 अक्टूबर 1994 ... आदि का संक्षिप्त विवरण/उद्धरण है। इस पुस्तक का अन्य महत्वपूर्ण पक्ष भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण उत्खनन प्रतिवेदन की संक्षेपिका और उस पर अदालती फैसला है।

Friday, June 26, 2026

पुरा-शहडोल

बात की शुरुआत देश-काल से। 35-40 साल पुराने मध्यप्रदेश का समय। बिलासपुर में पुरातत्व विभाग के दो कार्यालय, रजिस्ट्रीकरण अधिकारी और संग्रहाध्यक्ष, हुआ करते थे। बिलासपुर कार्यालय का कार्यक्षेत्र तब सात जिलों वाले छत्तीसगढ़ के बिलासपुर, सरगुजा और रायगढ़ जिला वाला बिलासपुर संभाग। इसमें खास कि तब का शहडोल जिला, जिसमें उमरिया और अनूपपुर भी होते थे, बिलासपुर कार्यालय के अधीन होता था। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद शहडोल अलग हुआ, लेकिन कार्यक्षेत्र यही बना रहा। प्रसंगवश बिलासपुर जिला कार्यालय में किसी ने मुझे समझाइश दी कि कलेक्टर को नाराज मत कर लेना, आपका सीआर वही लिखेगा, इस समझाइश में धमकी की धमक मैंने सुन ली। बातों-बातों में हमारे संचालक रहे प्रदीप पंत जी से यह बताया, उन्होंने कहा, जिसने ऐसा कहा है उसे शायद पता नहीं कि कलेक्टर जिले का अधिकारी होता है और आपके अधीन पूरा संभाग है।

वापस बात पटरी पर, तो पुरातत्व के मामले में तब का शहडोल जिला, तब के बिलासपुर जिला कार्यालय के अधीन होता था, इसलिए हमलोगों का शहडोल से अपनापा था। शहडोल संग्रहालय की स्थापना, जिला पुरातत्व संघ की पहल पर हुई थी, अमलाई पेपर मिल के जनसंपर्क अधिकारी राजेन्द्र कुमार बंसल, इस संघ के सक्रिय सदस्य थे। संग्रहालय में विभागीय मुलाजिम लाल बहादुर सिंह की तैनाती हुई तो संग्र्रहालय के कामकाज में बंसल जी की दखल के चलते विवाद होने लगे। इसके बाद शहडोल संग्रहालय में सिंह जी के बाद डॉ. अशर्फीलाल पाठक पदस्थ हुए, उनसे शहडोल जिले के पुरातत्वीय समाचार मिलते रहते थे। फिर अप्रैल 1987 में शहडोल जिले के पुरातत्वीय स्थलों के सर्वेक्षण में वरिष्ठ अधिकारी जी.एल. रायकवार जी का साथ रहा। अप्रैल 1989 में वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी, पुराविद डॉ. कल्याण चक्रवर्ती जी के साथ सघन दौरा हुआ तथा मध्यप्रदेश में पुरातत्वीय सलाहकार रहे भारतेन्दु परिवार के, हार्वर्ड विश्वविद्यालय वाले डॉ. प्रमोदचन्द्र जी तथा उनकी पत्नी श्रीमती मैरी कार्मेन के साथ, जिले के स्थलों को और बांधवगढ़ में रुककर, विशेष अनुमति सहित वहां के पुरावशेषों, अभिलिखित गुफाओं को देखने-समझने का अवसर मिला। श्रीमती मैरी ने इस अंचल की कलचुरि कला पर शोध किया है।

डॉ. प्रमोदचन्द्र मानते हैं कि त्रिपुरी कलचुरियों की कला से उत्कृष्ट प्रमाण इस क्षेत्र में हैं। उल्लेखनीय है कि विदेशों में आयोजित होने वाले ‘फेस्टिवल आफ इंडिया‘ के लिए चयन का जिम्मा डॉ. प्रमोदचन्द्र का था, उन्होंने भारतीय कला के प्रतिनिधि उदाहरणों में शहडोल, सोहागपुर के कुंवर मृगेन्द्र सिंह के निजी संग्रह के ‘भैरव‘ को भी चुना था। उनकी सलाह पर हमने मेमायर्स आफ द आक्यालाजिकल सर्वे आफ इंडिया, नं. 23 का आर.डी. बैनर्जी का ‘द हैहयाज आफ त्रिपुरी एंड देअर मान्युमेंट्स-1922‘ उड़नछू बांच लिया था। डॉ. रमानाथ मिश्र की किताब से इस अंचल की प्राचीन कला को जानने-समझने में मदद मिली और डॉ. रहमान अली के इस अंचल के शोध की जानकारी प्रत्यक्ष उनसे सुनने को मिलती रहती थी। देवकुमार मिश्र की ‘सोन के पानी का रंग‘ का सहारा तो था ही, यों भी मेरी पढ़ी-जानी किताबों में यह नदियों पर लिखी हिंदी की पहले नंबर पर रखी जाने वाली किताब है। वेगड़ जी की ‘तीरे तीरे नर्मदा‘ के प्रति पूरे सम्मान के बावजूद ऐसी और किसी किताब की गिनती मेरे लिए पांच के बाद ही शुरू होगी।

तब न मोबइल फोन था न गूगल, तो ऐसे काम पर निकलते हुए तैयारी में एक जरूरी चीज होती ‘मजमुली नक्शा‘ और दूसरी जिले के कक्षा तीसरी की भूगोल किताब। जिले का संक्षिप्त गजेटियरनुमा, इस भूगोल पाठ्य पुस्तक के अध्याय होते थे- स्थिति और विस्तार, भू-रचना, जलवायु, वनस्पति तथा पशुधन, खनिज-संपत्ति, सिंचाई तथा विद्युत सुविधाएं, कृषि और उसकी उपजें, उद्योग-धंधे? परिवहन के साधन, जिले के प्रसिद्ध स्थान, जिले की प्रशासनिक इकाइयां और जिले के निवासी। इस पचास पेजी सचित्र किताब को अच्छी तरह बांच लेने के बाद सव्रेक्षण-दौरे की योजना बनाना तो आसान होता ही था, जरूरत पड़ने पर अपनी जानकारी का रौब या परिस्थिति अनुसार उस अंचल से अपनी निकटता जाहिर कर, बहुत सारे काम आसान हो जाते। सर्वेक्षण का काम पूरा हो जाने पर इस पुस्तिका की जानकारियां प्रतिवेदन बनाने में भी उपयोगी होती। (इस पुस्तिका की पीडीएफ प्रति मेरे पास अब भी सुरक्षित है, कोइ महानुभाव इच्छुक हों तो कमेंट में अपना वाट्सएप नंबर दे दें, प्रति भेज दी जाएगी, इस निवेदन सहित कि हो सके तो वे मेरे तब के जिले बिलासपुर की भूगोल पुस्तिका पीडीएफ उपलब्ध करा दें, जो अब मेरे पास नहीं रही।) इतनी तैयार के बाद चाक-चौबंद, आश्वस्त मैदान में उतर गए।

पुरानी बातों के कोर-कार दुरुस्त कर देता है समय। वह वैसी ही याद नहीं रह जाती जैसी वह होती है, इसलिए लिखने बैठें तो यादों की चकरघिन्नी। यों भी याददाश्त से कहीं अधिक भरोसा अपने भूलने पर है, सो भूल-चूक माफ। आगे अपनी डायरी के नोट्स, मगर उसके पहले कुछ भूला-कुछ याद किया, पेश-

जैसिंहनगर, तहसील आफिस के आसपास मंडराते जीव। तहसीलदार साहब सागर विश्वविद्यालय के पुरातत्व के विद्यार्थी रहे ज्योति सक्सेना जी। बाद में वे ही अनूपपुर में भी मिले। अपनी शासकीय सेवा में कभी उनका जुड़ाव पुरातत्व से होगा, उन्होंने शायद ही सोचा होगा। सर्वेक्षण का परवाना दिखाने की जरूरत बस इसलिए हुई कि ऐसा भी सरकारी काम होता है। वे सहयोग के लिए तत्पर। चाय-पानी के इंतजाम तक हम तहसील के दर्दी-फरियादियों से गुफ्तगू करते रहे। वे अपनी सारी परेशानी, गिला-शिकवा भूलकर, खुद आगे बढ़ कर पुराने ठौर-ठिकानों का पता देते रहे, किस्से सुनाते रहे। एक सयाने ने बताया कि जैसिंहनगर नाम, रीवां के राजा जयसिंह देव से आया है। राजा का सिक्का चलता था, सचमुच का, तांबे का टकसाली सिक्का। लोगों की जबान पर पुराना नाम ही बना रहता था। राजा का फरमान आया कि नमकहराम होगा, जो अपने गांव का पुराना नाम लेगा। पता लगता, जिस किसी ने गांव का पहले वाला नाम लिया है, उसकी जबान बदलने के लिए पूरी मुट्ठी भर नमक खिलाए जाने की सजा तजवीज कर दी गई। सयाने ने कहा मगर बाप-दादा से सुना नाम हमें अब भी याद है, चारों तरफ नजर घुमाई फिर गुम हुआ नाम धीरे से उचारा- ‘गुमगौर‘। बदले में हमने उसका मुंह मीठा कराया, चाय पिला कर।

सुन रखा था कि पुराने समय में कोरिया, छत्तीसगढ़ के चांगभखार यानी जनकपुर-भरतपुर जाने के लिए यहां से जाना होता था, तो कुछ दूर यह रास्ता भी नाप लिया। तब वहां बातों-बातों में मसीराघाट पर बन रहे पुल का जिक्र आता था, वहां तक भी हो आए। ठेकेदार के कारिन्दों ने अकारण आग्रहपूर्वक चाय पिलाई, उन्हें निर्देश रहा होगा कि सरकारी मुलाजिम आएं, किसी भी विभाग के, किसी भी काम से, बिना पूछ-परख न जाने दें। सरकारी आदमी, जाने कौन, कब, कैसी मुसीबत खड़ी कर दे।

एक वकील साहब भी मिले, पेशी और मुवक्किल से निपट चुके थे, बताने लगे- यहां क्या मिलेगा आपको, विराट मंदिर के दर्शन कर लीजिए बाकी तो बंजर, जंगल, खदानें, बेरोजगारी, आदिवासी। कोई उद्योग नहीं, विकास नहीं। तहसीलदार साहब ने पयासी जी को साथ कर दिया। वे मानों शहडोल के देसी आडियो गजेटियर। कथा बांच रहे हैं- सोन-जोहिला और नर्मदा के त्रिकोण की। मसीरा घाट और दशरथ घाट दिखा लाने का वादा, चाहे छुट्टी लेनी पड़े। सोन-जोहिला संगम पार करने लायक छिछला पानी, रायकवार जी की देखा-देखी, संगम में पैर डालने के पहले सिर पर पानी डाला, आचमन किया, दशरथ घाट के दर्शन कर लौटे।


वापसी में एक सूने कच्चे घर की बाहिरी दीवार पर चित्रकारी दिखी। चित्र के अनुसार यह ग्राम बरहा के सुखसेन बैगा की कृति है, जो अपने को अभी नौसिखुआ-आधा पेन्टर मानता है, लिखा है- आई यम पेन्टर अभी 1/2। चित्र में वनस्पति गमले में आ गई है, धनुष-बाण और मुकुटधारी राजा है, शायद सोन नद का मानवीकरण, जिसमें वह खुद को देख रहा है और साथ उसके सपनों की रानी? नर्मदा-जोहिला? आधुनिका- बॉब्ड। संभव है उसने मोहनजोदड़ो की नर्तकी कांस्य प्रतिका का चित्र देखा हो। कांस्य नर्तकी कमर पर हाथ टिकाए हुए है, मूर्तिकला की शब्दावली में ‘कट्यावलंबित‘। आ देखें जरा ... वाली चुनौतीपूर्ण देहभाषा (बॉडी लैंगुएज), जबकि, कल्पनाशील चित्रकार की नायिका ने दोनों हाथ कमर रखे हैं। स्त्रैण नजाकत वाली, कुछ-कुछ पीटी मुद्रा। ‘तिपतिया लॉकेट‘ ठीक उसकी नकल जैसा ही है। अंचल के बैगा युवक की आदिम चेतना में शायद इसी तरह की आधुनिकता के गणित की खिचड़ी पक रही है।

दियापीपर। शहडोल से जैसिंहनगर के रास्ते पर सोन का पुल पार करते ही बैरियर, बड़े लट्ठ-अड़गड़ वाला टोल नाका। सरकारी काम वाली गाड़ी का हवाला दिया, कुछ नरम-गरम। बात बन गई, बैरियर खुल गया। मगर इस बातचीत के दौरान नाका वालों को पता चला कि हम पुरानी जगहों की खोज कर रहे हैं, मंदिर-मूर्तियों की, तो वे भक्ति-भावना से भर कर बताने लगे कि हम आगे बढ़ कर दाएं मुड़ जाएं। ढेरों पुराने पत्थर, मूरत, देवी-देवता हैं। सीधे के बजाय हम दाहिने मुड़ कर आगे बढ़े। बड़ी तादाद में ढेरों पुरावशेष बिखरे हुए। लेकिन समस्या थी कि पूरे मैदान में ऊँची- ऊँची, सूखी घास थी। थोड़ी साफ-सफाई की और कुछ खुले में पड़ी कलाकृतियों की फोटोग्राफी, विवरण दर्ज करते रहे। तब तब न जाने कहां से कोई चिंगारी उठी और देखते-देखते सूखी घास में आग फैलने लगी, झाड़ू-बुहारू जैसे सब उपाय, जो भी संभव था, किया। बड़ी मुश्किल से बात बनी। चारों ओर सुनसान था, फिर भी मौके की नजाकत का अनुमान कर काम आगे बढ़ाए बिना बढ़ लिए। ड्राइवर से पूछा, तुमने सिगरेट के लिए तीली जलाई थी?, वह लगातार मना करता रहा और सफाई देने लगा कि गाड़ी के एक्जास्ट से चिंगारी निकली होगी, जिसके चलते ऐसा हुआ और नाम भी तो ऐसा है ‘दियापीपर। बहरहाल वापस लौटते फिर बेरियर पर रुके तो बताया गया- आपलोगों को मालूम, दियापीपर मैदान घास में आग लग गई थी। हमने कहा, सब हरिइच्छा, अब तो सारे देव प्रकट हो गए होंगे। फिर वहां जा कर, छूटा काम पूरा किया।

एक किस्सा कौड़िया का। चंदिया से दस-दस किलोमीटर बांयें-दायें दो पुरातत्वीय भंडार, कौड़िया और पथरहटा। सुराही वाले चंदिया रोड स्टेशन से परिचय पुराना रहा। अब चंदिया पहुंचे। इलाके से लगभग अपरिचित, तो पहले पहुंचे पुलिस थाना। थानेदार साहब का इंतजार करने लगे। हमें जाना था कौड़िया। देर हो रही थी, दुविधा में थे कि इंतजार करें या निकल चलें। समय बिताने के लिए थाने में लगी तख्तियां बांचने लगे। एक तख्ती लगी थी- ‘बदमाश गांवों की सूची‘, उस पर सबसे ऊपर पहला नाम था ‘कौड़िया‘। थानेदार साहब आए, हमलोगों को शुभकामनाएं देते विदा करते ताड़ लिया कि हमारी नजर तख्ती पर कहां जा रही है। मुंशीजी उसी इलाके के थे, हमलोगों के काम और साथ देने के प्रति उत्सुक। थानेदार साहब ने उन्हें हमारे साथ कर दिया। मुंशी जी पूरे इलाके का इतिहास-भूगोल बताते रहे, उनकी बातचीत में किसी अपराध, दीवानी-फौजदारी का भूले से भी जिक्र नहीं आया। कौड़िया के रास्ते में हमें कुछ ग्रामवासी कुछ आगे पास के गांव ‘बिलासपुर‘ जाने वाले मिले। बीच में हम माइक्रोलिथिक टूल्स मिलने की संभावना से रुके, तो हमारी देखा-देखी, इस काम में वे सबसे आगे रहे।

हमारा इरादा था कि दिन रहते कौड़िया-सलैया और पथरहटा कर, अंधेरा होते शहडोल वापस लौट जाएंगे। मगर कौड़िया-सलैया के कुछ हिस्से के नोट्स और फोटो लेते अंधेरा होने लगा। शहडोल वापस लौट कर अगले दिन फिर आना, कशमकश में थे। गांव में सरपंच जी से मिले अकड़े से युवा और देख कर ही समझ में आ गया हेठी न खाने वाले। बात होने लगी तो पता लगा कि गांव में दो-पार्टी वाली फूट है, जिसके कारण अपराध दर्ज होते रहते हैं। हमारे मामले में दोनों पार्टी के लोग तदर्थ रूप से सहयोगी बन गए। रात रुकने का इंतजाम और भोजन अपने निवास पर सरपंच जी ने कराया। गांव के इकट्ठे हुए लोग सहयोग की अपनी भूमिका के लिए तत्पर थे। उस इलाके में कुछ घटनाओं की जानकारी थी, जिसमें पुरातात्विक सामग्री की जानकारी और उसमें रुचि लेने वालों की गाड़ी में तोड़-फोड़ और पिटाई भी हो चुकी है। जबकि हम दूसरे दिन काम पूरा कर शहडोल संग्रहालय के लिए गांव वालों की मदद से एक सूर्य प्रतिमा, अपनी जीप में लदवा कर वापस लौटे।

रायकवार जी का 'पूर्वानुमान" कभी अनर्गल जान पड़ता है, मगर कई बार चौंकाता भी है। कौड़िया में घूमते हुए वे कभी पूछते और कहीं भी तो मूर्तियां नहीं रखी हैं, कुंए के पास, देवालय में, इस-उस दिशा में, हमें लगता तीर-तुक्का, लगभग सही ही बैठ रहा है। बात जुड़ी कि गांव वाले जो किस्सा सुना रहे थे- बहुत पहले दो लोग एक बड़ी गाड़ी ले कर आए थे, अपने को पुरातत्व विभाग का बताया और एक मूर्ति ‘चुरा‘ कर ले गए थे। वापस आते यह भेद रायकवार जी ने खोला कि उन्हें और वी.पी. नगायच जी को शहडोल संग्रहालय के लिए प्रतिमा संग्रह का आदेश हुआ था। तब, रायकवार जी सागर में और वे रीवां में पदस्थ थे। अजीत जोगी जी शहडोल कलेक्टर थे, और कुंवर अर्जुन सिंह के रिश्तेदार हरचरण सिंह जी, उमरिया एसडीएम, उन्होंने एमपीइबी की डग्गा गाड़ी दे दी, जिसमें उनके द्वारा शहडोल संग्रहालय के लिए कौड़िया से सूर्य प्रतिमा लाई गई थी। रायकवार जी ने अपनी शैली में यह किस्सा सुनाया। बाद में सविस्तार विवरण नगायच जी ने याद किया- सन 1978 की बात है। 

यह पढ़ कर नगायच जी की टिप्पणी आई है, शब्दशः- 16 जनवरी को कलेक्टर शहडोल श्री जोगी जी से मिला साथ में श्री राजेंद्र बंसल भी थे। उनके निर्देश पर 17 जनवरी को नायब तहसीलदार श्री कुबेर सिंह जी को लेकर अंतरा एवं पंचगाँव गए। अंतरा से कुछ मूर्तियां एकत्र की फिर चदनिया एवं जोधपुर गये। वापसी में जीप में आग लगा गई, बाल बाल बचे। 18 जनवरी को श्री जोगी जी से मिला। जीप से उमरिया गए एवं श्री हरचरण सिंह एसडीएम से मिले उन्होंने संकलन हेतु वाहन व्यवस्था कल करने को कहा वापस शहडोल आया, रात्रि श्री रायकवारजी सागर से आ गए। हम दोनों बंसल जी के खाली घर में रुके। 19 जनवरी को उमरिया गए सिंह साहब ने एक ट्रक की व्यवस्था कर दी। कौड़िया में कुएं के पास रखी एक सुंदर सी सूर्य प्रतिमा को गाँव वालों ने जिसे वह देवीदाई कहते थे बड़ी मुश्किल से ले जाने दी। अगले दिन पुनः एमपीइबी की पिकअप एवं पुलिस के 2 जवान लेकर गए तथा कौड़िया से करीब 8-10 मूर्तियां लाकर शहडोल संग्रहालय रखवाई गई। दोनों दिन इस पूरी प्रक्रिया में भूखे रहे। अंततः 2 शानदार मूर्तियां अर्धनारीश्वर मस्तक अंतरा से एवं कौड़िया से सूर्य प्रतिमा हमारी उपलब्धि रही। शासकीय डायरी जो अभी भी मेरे पास उपलब्ध है, उसी से ये जानकारी शेयर कर रहा हूँ।

इस दौरान धरहर, राजेन्द्रग्राम (तत्कालीन राष्ट्रपति जी के प्रवास के कारण रखा गया नाम) का विशाल वृक्ष ‘पपीता बाबा‘, मढ़ीबाग का सुनसान, रहस्यमय वातावरण, वीरसिंहपुर पाली की देवी प्रतिमा, अन्तरा की चामुण्डा, सिंहपुर का प्रवेश द्वार, राजाबाग का संग्रह अविस्मरणीय है।

अब डायरी के नोट्स - 

# चितरांव - जैसिंहनगर से जनकपुर मार्ग पर जाकर बायाँ व्यपवर्तन कुल दूरी 20 किमी. painted rock-shelter site, tools. 
# जोहिला नदी के नौरोजाबाद सड़‌क पुल के नीचे tools.
# चंदि‌या से पथरहटा मार्ग पर खेतों में tools
# (छोटी)महानदी-मछड़ार संगम (चंदि‌या-कौड़िया मार्ग) के निकट कारी पाथर unpainted shelters, tools. 
# बसोहरा - जैसिंहनगर से 12 किमी. shelter तथा tools. 
# निगाई - जैसिंहनगर से मानपुर जाने पर tools.
# नगरवाह - जैसिंहनगर से मुख्य मार्ग पर 6 कि.मी. कौवासरई से 4 किमी. shelter, tools.
# शह‌डोल - सोहागपुर का विराटेश्वर मंदिर, निकटवर्ती क्षेत्र के mounds में rich remains जैन मंदिर में प्रतिमाएं / कुँवर साहब, राजाबाग के यहाँ कृष्ण लीला के तीन पटल, भैरव, गजासुरवध, (outstanding), शिव, शेषशायी विष्णु, कुबेर, त्रिदेवी (वैष्णवी, ब्रह्माणी, माहेश्वरी), अन्य कई प्रतिमाएं 
# धरहर- राजेन्द्र‌ग्राम से अमरकंटक मार्ग पर 7 कि. मी. से दायें व्यपवर्तन पर 1 कि.मी. late 12th या 13th cent. का पूर्वाभिमुख कलचुरि (रतनपुर?) शैली का शैव मंदिर / प्रवेश द्वार के उपर (सामने), पत्थर गिरा हुआ, द्विशाख, ललाट-बिंब पर शिव - त्रिदेव तथा नवग्रह, द्वारशाख पर गंगा-यमुना, शैव द्वारपाल/उदुम्बर, कलशधारी उपासक / त्रिअंग (पंचरथ), दक्षिणी भित्ति की द्वितल जंघा पर- कार्तिकेय, गणेश (अन्तराल), दिक्पाल, मिथुन युगल, मध्य रथ पर ब्रह्मा, नटराज (सौम्य), दिक्पाल, पश्चिम भित्ति पर - मिथुन शेष ध्वस्त, उत्तर भित्ति पर - वीणाधर शिव, नटराज (उग्र-भैरव), अन्तराल में माहेश्वरी, चामुण्डा उत्सेध में - अधिष्ठान (वेदिबंध), खुर, कपोत, सूचिका, मुकुल, खुरछाद्य, गजथर - जंघा. तुल्य सरगाँव (बिलासपुर) का धूमनाथ मंदिर, इससे कुछ और परवर्ती. 
# सीतामढ़ी - सोहागपुर-मानपुर मार्ग पर चौरी से 3 किमी., कुल लगभग 25 किमी. 3 छोटे मंदिर 9th cent. (प्रतिहार शैली) 
# हर्रा- अन्तरा-केलमनिया मार्ग पर 22 किमी./ गोमेद-अंबिका, दो कृष्ण कथा फलक, नृवराह, विष्णु सिरदल, नवग्रह पटल, उमा- महेश द्यूत (जबलपुर संग्रहालय की प्रतिमा तुल्य)
# दुलहरा - हर्रा के निकट / विष्णु, गणेश, नायिकाएँ, small door frame, remains.
# केसवाही - बुढ़ार से जैतपुर मार्ग पर 27 किमी./ शाहपुर (8 किमी.) में विष्णु, ध्वस्त मंदिर के अवशेष, सांडामाल (8 किमी.) में ध्वस्त विशाल मंदिर एवं अवशेष / सगरा (7 किमी.), में remains. 
# मानपुर - मानपुर से ताला भार्ग पर 5 किमी. ज्वालामुखी मंदिर - विष्णु मंदिर, मंदिर में भूमिस्पर्श मुद्रा में बुद्ध प्रतिमा.
# मार्कण्डेय आश्रम- मानपुर-अमरपाटन मार्ग पर छोटी महानदी व सोन के संगम पर उमा-महेश, विष्णु, दिक्पालों की प्रतिमाएँ.
# आमडीह - अनूपपुर से कोतमा मार्ग पर 18-20 किमी. (फुनगा, पसला के निकट, बिजौड़ी ग्राम से लगा हुआ) /ब्रह्मा, तीन लक्ष्‌मीनारायण, दो उमा-महेश, हनुमान तथा अन्य अवशेष.
# छुलकारी - उपरोक्त स्थल के पास ही/ विष्णु, लक्ष्मीनारायण, योगियों की प्रतिमाएँ.
# सामतपुर - अनूपपुर में 13th cent. का मंदिर, कर्ण व अर्जुन का युद्ध दो स्तंभों पर अंकित (सूर्य व इन्द्र सहित), सिरदल, उत्तरंग पर पंक्ति में standing दशावतार, अलंकृत स्तंभ, नदी देवी, शैव द्वारपाल, बाहर उमा-महेश, लक्ष्मीनारायण.
# अन्तरा - केलमनिया मार्ग पर 9 किमी./ कंकाली मंदिर में unique चामुण्डा (cement retouching), विशाल, अति प्रभावशाली, उमा-महेश, विष्णु, आदिनाथ, योगिनी प्रतिमाएँ, temple mounds. 
# सिंहपुर - पतखई मार्ग पर 14 किमी. / परवर्ती संरचना, कथित पंचमठा या मान्य शिव मंदिर किन्तु शायद वस्तुतः मकबरा या समाधि में पंचशाख, अत्यंत विकसित और भव्य वैष्णव प्रवेश द्वार लगा है, यहीं विशाल वैष्णव प्रतिमा शीर्ष (capital), बौद्ध तारा, योगिनी, गरुड़ की एकाकी मुख्य प्रतिमा, सप्तमातृका पट्ट व pillars भी लगे हैं। दूसरे नवनिर्मित मंदिर में चामुण्डा (अन्तरा तुल्य आकार में छोटी पर अधिक सुरक्षित), गणेश प्रदक्षिणा में आदिनाथ, पार्श्वनाथ की कई प्रतिभाएँ.
# वीरसिंहपुर पाली- बिरासनी देवी मंदिर - मुख्य गर्भगृह में विशाल हरिहर, एक अन्य हरिहर, एक विष्णु, एक अन्य (संभवतः विष्णु), प्रतिमा तथा अन्य गर्भगृह में गणेश, महिषमर्दिनी बाहर प्रांगण में महिषमर्दिनी, अन्धक-गजासुर वध शिव, नटराज, तीन-चार उमा-महेश, सूर्य कुछ अन्य
# उमरिया - सगरा मंदिर के ancient door frame को paint कर दिया गया है।
# मढ़ीबाग - उमरिया से शहपुरा मार्ग पर 13th cent. का शैव मंदिर, मंडप पुनर्रचित, दिक्पाल, सूर्य, गजासुर वध, नृसिंह, चामुण्डा, सिरदल पर शिव, सरस्वती, गणेश
# बांधवगढ़- 2nd cent. के inscribed rock-cut chambers विस्तृत विवरण N.P. Chakravarti का paper, E.I. Vol. XXXI part IV, Oct. 1955 में top पर 5 मंदिर प्रतिहार शैली?, 8th से 10th cent. A.D. के / monolithic rock-cut वराह, मत्स्य, नृवराह (18‘), साथ में स्तंभ, शेषशायी विष्णु ( कथित चरणगंगा पर -11.75 मीटर), पैर की ओर ब्रह्मा, सिर की ओर शिवलिंग, विभिन्न स्थानों पर कलचुरि युवराजदेव के अभिलेख / राजा तालाब या बाबा तालाब के निकट मढ़िया में सूर्य, गजलक्ष्मी, विष्णु, शिव, गौरी, ब्रह्मा, कार्तिकेय, गंगा तथा पास ही रेवन्त प्रतिमा-सभी 12-13th cent. की / एक अन्य मंदिर व अवशेष, बड़ी शेषशायी पर building remains भी, 10th cent. का पश्चिमाभिमुख संभवतः शिव मंदिर, जाते हुए चढ़ाई में habbitational remains. यह स्थान तानसेन, सेन भगत व धर्मदास से संबंधित किया जाता है, प्रमाण के रूप में कुछ अवशेष भी विद्यमान हैं।
# अमरकंटक- कर्ण के मंदिर के नाम से ज्ञात मंदिर समूह, पातालेश्वर शिव मंदिर तथा नर्मदा उद्गम कुंड पर विभिन्न परवर्ती मंदिर, इनमें कलचुरि (संभवतः रत्नपुर के) राजा-रानी, दम्पति / अश्वारोही व गजारोही प्रतिमाएँ / पास ही जंगल में शिलोत्कीर्ण गणेश (त्रिकूट या कर्ण मंदिर से आगे 5 कि.मी.) की दो प्रतिमाएँ 8th cent A.D. स्थल सिद्ध विनायक या भृगुकमण्डल के नाम से जाना जाता है।
# जैसिंहनगर - पुराना नाम ‘गुमगौर‘। ग्राम के फूलमती व दुर्गा मंदिर में विष्णु, शिवलिंग, आमलक, नृसिंह, गजशार्दूल आदि प्रतिमाएँ
# अटरिया - जैसिंहनगर से मान‌पुर मार्ग में सोन के पूर्व दायाँ व्यपवर्तन कुल 25 किमी. सूर्य, विष्णु, हरिहर आदि प्रतिमाएँ
# बनचांचर - अटरिया के निकट घाटी डोंगरी नामक पहाड़ी पर स्थापत्य-प्रतिमा अवशेष सूर्य, विष्णु, दुर्गा, महिषमर्दिनी, उमा-महेश आदि
# मऊ - ब्यौहारी से 8 किमी./ भग्न मंदिरों के अवशेष, सूर्य, कार्तिकेय, विष्णु, गौरी, लक्ष्‌मीनारायण, योगिनी, एकमुख लिंग, गणेश, जैन प्रतिमाएँ.
# केल्हई- जैसिंहनगर से खन्नौधी से सन्ना होकर कुल 20 किमी. सोन-जोहिला संगम, दशरथ घाट पर कार्तिकिय.
# दियापीपर- शहडोल-जैसिंहनगर मार्ग पर 20 किमी. सोन पार कर दायां व्यपवर्तन विभिन्न मंदिरों के mounds, प्रतिमाएँ, स्थापत्य खंड.
# गोकरद - मसीराघाट, सोन पर नवनिर्मित सड़‌क पुल, मानपुर मार्ग पर विष्णु, सूर्य प्रतिमा.
# कोयलारी - अमरकंटक से राजेन्द्रग्राम आते दायाँ पुनः बायाँ व्यपवर्तन 32 किमी. पर- partially standing temple & remains.
# बुढ़ार के पास बम्हनी से प्राप्त मेकल पाण्डवंश का ताम्रपत्र
# ब्यौहारी तहसील से प्राप्त, रायपुर संग्रहालय में जमा कुषाण, गुप्त व मुगल, शताधिक सिक्के.
# बांधवगढ़? से प्राप्त माघ शासकों के सिक्के.
# पथरहटा - चंदिया से 10 किमी./ अवशेष, माहेश्वरी, नृसिंह, विष्णु, उमा-महेश, योगिनी, हनुमान, तीर्थकर चतुष्टिकाएँ, आदिनाथ, सूर्य, अम्बिका, मिथुन, नृत्य फलक, शिवलिंग, स्तंभ, सती प्रस्तर-अभिलेख आदि.
# कौड़िया-सलैया - बावली में द्वारशाख, सिरदल, आदित्य पट्ट, एकाधिक उमा-महेश, सूर्य, गणेश, जैन प्रतिमाएं / बावली के अतिरिक्त स्थल- गढ़ी व जात्रा, खेतों में भी remains.

(जिन विवरणों में dates नहीं है, वे सामान्यतः, क्षेत्र के अधिकांश remains और sites भी, late 9th early 10th cent. के हैं, और क्षेत्र में त्रिपुरी कलचुरि कला के श्रेष्ठ उदाहरण द्यिमान हैं।) 

चलते-चलते -
मौके पर पहुंच कर डाक बंगला यानि लोक निर्माण विभाग के रेस्ट हाउस में ठहरने के लिए कमरा मिले न मिले, जाते जरूर थे, क्योंकि वही मुख्यालय का शून्य मील का पत्थर होता था, दूरियों की सारी पैमाइश वहीं से शुरू होती थी और तब इसे नोट कर रखना जरूरी काम होता था। अपनी डायरी में दर्ज कर लिया था- शहडोल से दूरियां, किलोमीटर में - रीवां 161, इलाहाबाद 292, कटनी 132, उमरिया 70, सतना 211, बांधवगढ़ 107, अमरकंटक 108, डिंडौरी 193, जबलपुर 222, मण्डला 318, बिलासपुर 225, अंबिकापुर 247, अमलाई 30, चचाई 40।

Saturday, June 20, 2026

अनाम संगी साथियों के नाम

अबाल-युवाओं की संगत में पता चलता है कि ट्रेंड क्या चल रहा है, वे ‘खुद की, जग की‘ क्या सोच रहे हैं, अपडेट करने का अवसर मुझे अक्सर मिलता रहता है। मध्यम शहरों के उच्च-मध्यम और बड़े शहरों के मध्यम वर्ग के युवाओं के व्यक्तिगत जीवन में, जिसे वे अब आसानी से शेयर कर लेते हैं, फ्रेंड, ब्रेक-अप, लिव इन, एकल जीवन, शादी/बच्चे करें या न करें, जैसे सवाल अहम होते गए हैं। वे अपने सिस्टम पर बैठे ग्लोबल दुनिया के सदस्य है, जिन पर राजेन्द्र गौतम की पंक्तियां हैं-
"हमने शब्द लिखा था- ‘रिश्ते‘/ अर्थ हुआ बाज़ार 
‘कविता‘ के माने ख़बरें हैं/ ‘सम्वेदन‘ व्यापार
भटकन की उँगली थामे हम/ विश्वग्राम तक आए।" 
सोमवार से शुक्रवार की शाम तक ताबड़तोड़ काम, फिर वीक-एंड पर बस चिल, कहे तो वर्क-अल-कोहलिक डूड।

दूसरी तरफ मेरी नजर मुझसे बेहतर-युवा विकल्पों की ओर रहती है। मैंने पाया है कि आप अपनी जगह पर स्थापित रहें और सोचते रहें कि आगे क्या होगा?, आप सचमुच ऐसा सोच रहे हों तो अपनी जगह खाली कर दीजिए, देखिएगा कि उस खाली स्थान की पूर्ति के लिए जल्द ही एकाधिक विकल्प सामने आ जाएंगे, और इस बात की पूरी संभावना होगी कि समय के साथ वे आपसे बेहतर साबित होंगे। कहा-सुना और मान लिया जाता है कि युवा पीढ़ी एकदम डब्बा है, पढ़ती-लिखती नहीं। मुझे अधिकतर इससे विपरीत मिला। मैंने पाया कि युवाओं में बहुत अच्छी समझ के साथ पढ़ने वाले और शुरुआती दौर में ही स्तरीय लिखने वाले अनेक हैं। ऐसा लगता है कि सिर्फ अपना लिखा पढ़ाने को और अपनी बात सुनाने को व्यग्र हों तो आपके लिए पाठक-श्रोताओं का टोटा है मगर आप नई चीज सुनने और पढ़ने को तैयार, बल्कि उत्सुक हैं फिर देखिए, आप पाएंगे कि भविष्य की रचनात्मकता को ले कर आपकी सारी निराशा दूर हो जाएगी। ‘कल और आएंगे..., मुझसे बेहतर कहने वाले, तुमसे बेहतर सुनने वाले।‘ इस पर कुछ रुक कर ...

इन गरमी की छुट्टियों में या ‘टीनोन्मुखी‘, ‘टीन‘ और इसके मुहाने बाहर निकलने ‘टीनातुर‘ आयु, मुझ वानप्रस्थ आयु वाले के लिए, 'बाल'-मित्र मिले, बने। हॉबी क्लासेस, गायन-वादन, नृत्य, चित्रकारी, खेलकूद ... कला-कौशल निपुण। उनकी कुछ जिज्ञासा, कई प्रश्न मुखर होते, कुछ मौन। अब याद कर रहा हूं कि उनसे जो कुछ कहना रह गया, वह अब यहां-

... जो बात हो रही थी उसे इस तरह समझो- कलाएं दो तरह की होती है क्रिएटिव और परफार्मिंग। इसमें चित्रकारी आदि क्रिएटिव है और नृत्य, गायन, वादन परफार्मिंग। इन दोनों का फर्क स्पष्ट है क्रिएटिव अपनी साधना, जैसा है, जो लोगों के सामने पूरा हो जाने पर आता है और आपके बिना भी किसी के सामने रखा जा सकता है जबकि परफार्मिंग, उतने समय तक ही लोगों के सामने होता है, जब तक आप परफार्म करते रहते हैं। इस फर्क के साथ यह ध्यान रखना चाहिए कि आपका अभ्यास, रियाज, प्रैक्टिस मुख्यतः अपने लिए होता है, जबकि मंच या खेल के मैदान में प्रस्तुति, जो लोगों के सामने होती है वह मुख्यतः दूसरों के लिए होती है। इसलिए जरूरी होता है कि आप अपनी साधना, अभ्यास नियमित करते रहें, यह रोज कमाने, रोज खाने जैसा है, या कहें कि नियमित जीवन-चर्या रूटीन लाइफ स्टाइल में आ जाना चाहिए। और बीच-बीच में उपयुक्त अवसर मिलने पर प्रस्तुति भी देते रहें, प्रतियोगिता में भाग लेते रहें। 

आप समूह में बैठे हों, वहां अधिकतर आपसे बड़े लोग हैं और आपको लगता है कि जो बातें हो रही हैं, वे अनावश्यक निरर्थक हैं, छोटे होने के कारण आप बीच में बोल-टोक नहीं पाते और न चाहते हुए भी चुप रह कर सुनते रहते हैं, ऐसी स्थिति में बातों का सिलसिला आपके अनुसार हो (यह एक नेतृत्व-कौशल भी है) तो बातों के बीच, उससे जुड़ी अपनी जिज्ञासा, प्रश्न या विनम्र असहमति-आपत्ति रखें, इससे बड़ों को बुरा नहीं लगेगा, वे मानेंगे कि तुम्हें नहीं आता, तुम उनसे पूछ रहे हो, समझना चाहते हो और फिर उनकी बातचीत की दिशा उस ओर मुड़ जाती है, जैसा आप चाहते हैं। साथ ही यह भी याद करने की कोशिश करें कि जब बातचीत में मुख्य भूमिका आपकी होती है, बातचीत की कमान आपके हाथों होती है, तब हम किस तरह के विषयों पर क्या बात करते हैं। तब हमारी बातचीत का मुख्य विषय क्या होता है हम स्वयं, आसपास के लोग, (अपनी प्रशंसा, दूसरों की बुराई?) नई-पुरानी घटनाएं या कोई विचार। ध्यान रखें कि बातचीत, व्याख्यान-प्रवचन की तरह न हो। वाद-विवाद में आरोप-प्रत्यारोप भी हो, मगर स्वस्थ यानी, जिसमें व्यक्तिगत टिप्पणी न हो।

ध्यान देने की एक और बात है कि हमें किस काम में और कब उपकरणों, सहायक सामग्री, सहयोगी व्यक्ति की जरूरत होती है और कहां इसकी जरूरत नहीं होती। इसके लिए खेलों में ट्रेक एंड फील्ड है, जिसमें दूसरे प्रतिद्वंद्वी की भी जरूरत नहीं। इसी तरह गायन या नृत्य, जिसमें अभ्यास में किसी और सामग्री की जरूरत नहीं होती। इसीलिए इस संदर्भ में याद कर सकते हैं- न चौर्यहार्यं न राजहार्यं न भातृभाज्यं न च भारकारि। अपने शरीर और अपनी बुद्धि की कमाई और कौशल हमेशा सिर्फ आपके साथ रहता है, उस पर आपका पूरा अधिकार होता है, उसका उपयोग आप अपनी पसंद और आवश्यकता अनुसार कभी भी कर सकते हैं, इसलिए उसे श्रेष्ठ माना गया है।

ईश्वर या संयोग आप जिसे भी मानते हैं, जिसके चलते आपने खाते-पीते परिवार में जन्म लिया है, सभी अंग सामान्य हैं, फिर आपकी जिम्मेदारी है, आप पर निर्भर है कि आप क्या कर सकते हैं। सबसे पहले स्वयं अपने लिए, उसके बाद परिवार-मित्रों के लिए और फिर समाज के लिए क्या और कितना अच्छा कर सकते हैं, ध्यान रहे कि आपकी प्राथमिकता आप स्वयं हैं, यह स्वार्थी होना कतई नहीं, कहा गया है, ‘आप भला तो जग भला।‘ और यह भी कि ‘न वा अरे सर्वस्य कामाय सर्वं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति।‘ सबकी कामना के लिए सब प्रिय नहीं होते, अपने ही प्रयोजन के लिए सबसे प्रिय होते हैं।

अपनी परिस्थितियों के बावजूद भी जो हासिल कर ले, वही वास्तविक उपलब्धि है। सारी परिस्थितियां अनुकूल हों, तब तो कोई भी आगे बढ़ जाता है, जैसे ढाल पर बिना पैडल मारे सायकिल, मगर इसमें कोई आनंद, सुख नहीं। अपनी मेहनत और उद्यम से हासिल का ही असल आनंद होता है। दुनिया में जड़-चेतन, जो कुछ भी है, आपके भाव से अनुप्राणित ही साकार-सार्थक होता है- न देवो विद्यते काष्ठे न पाषाणे न मृण्मये। भावे तु विद्यते देवस्तस्माद् भावो हि कारणम्।। तात्पर्य कि देवता न काठ में रहते हैं, न पत्थर में, न मिट्टी में। वे तो भाव में रहते हैं। भाव ही किसी को देवता बनाने में कारण होता है।

टाल्सटाय ने कहा है- 'ल्योबुश्का, तुम पढ़ते बिल्कुल नहीं हो, यह बहुत बुरी बात है। यह इस बात का सबूत है कि तुम अहंकार के शिकार हो। तुम्हारे विपरीत गोर्की बहुत ज्यादा पढ़ता है, यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि इससे आद‌मी में आत्मविश्वास की कमी का पता चलता है। मैं लिखता बहुत ज्यादा हूं, यह भी अच्छी बात नहीं है, क्योंकि इससे लगता है कि एक बूढ़ा आद‌मी सभी को अपने विचारों से प्रभावित करना चाहता है।'

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वापस अबाल-युवाओं पर, जिनसे बातचीत में कुछ ऐसे भी होते हैं, जो जीवन का उद्देश्य, सृष्टि का रहस्य और स्वयं के अस्तित्व पर जिज्ञासु, चर्चा-उत्सुक होते हैं। ऐसे ही शाश्वत प्रश्न हैं, जिनका समाधान नहीं हो पाया है, मगर विचार-चिंतन सभी ने किया है तब यहीं से धर्म-अध्यात्म और दर्शन विकसित होता है। इन पर विचार करते-करते अधिकांश इससे भटक-भूल जाते हैं और कुछ विचारक-दार्शनिक हो जाते हैं, उनकी बातों ऐसा लगता है कि ‘चलो, कुछ तो मिला‘ या मन बहल जाता है कि इसे भी कुछ नहीं मिला, बस बात बनाई है। और कभी यह मान कर कि ‘मुझे भी कुछ-कुछ ऐसा ही लगता है‘, उसके अनुयायी से ले कर अंध-भक्त बनने वाले भी कम नहीं। यों कहा जाता है कि ‘दर्शन, अंधेरे कमरे में अंधे व्यक्ति द्वारा ऐसी काली बिल्ली को खोजने का प्रयास है, जो वहां नहीं है।

खलील जिब्रान ने मौज-सी लेते कहा है-
सभ्यता उस समय शुरु हुई, जब मनुष्य ने पहले पहल धरती को खोदा और उसमें बीज बोये,
धर्म उस समय शुरु हुआ, जब मनुष्य ने धरती में बोये हुए अपने बीजों पर सूर्य की दया दृष्टि देखी, 
कला उस समय शुरू हुई, जब मनुष्य ने सूरज के प्रति आभार प्रकट करते हुए स्तुति गान किया,
दर्शन शास्त्र उस समय शुरु हुआ, जब मनुष्य ने धरती की पैदावार खाई और बदहजमी की पीड़ा अनुभव की।

हजारी प्रसाद द्विवेदी, समस्त भारतीय धर्म-साधना के तीन पक्षों को रेखांकित करते हैं- उसके पीछे काम करनेवाली तत्त्व-मीमांसा (दर्शन), उसको सरस रूप में उपस्थित करनेवाला वाङ्मय (काव्य) और उसे जीवन के व्यवहार के क्षेत्र में ले आने के लिए तत्त्वानुयायी कर्मकाण्ड (क्रिया)। ये तीनों ज्ञान, इच्छा और क्रिया के प्रतिपादक होते हैं। धर्म-साधना में इन तीनों का अन्तर्भाव होता है।

फिर ऐसे साथियों को याद दिलाना होता है, उपनिषद-पुराणों में प्रश्न आए हैं, वे कुछ इस तरह हैं-
उत्पत्तिः यह संसार किससे उत्पन्न होता है?
लयः अंत में यह किसमें लीन हो जाता है?
आधारः यह संसार किसमें स्थित है (किसके सहारे टिका है)?
मायाः वह क्या है जो काले सर्प की भांति सभी प्राणियों को ग्रसता है?
जीव की गतिः आत्मा का अंतिम लक्ष्य क्या है?
कर्मः कर्मों का असली रहस्य क्या है?

वैसे ही अव्याकृत कहे जाने वाले प्रश्न, बुद्ध जिनका जवाब नहीं देते थे, मुस्कुरा देते थे, कुछ इसी तरह के हैं-
# जगत शाश्वत है या नहीं? या दोनों है? या दोनों नहीं?
# जगत नाशवान (सीमित) है या असीमित है? या दोनों है? या दोनों नहीं?
# आत्मा और शरीर एक ही हैं? या अलग-अलग?
# मृत्यु के बाद अस्तित्व रहता है या नहीं? या दोनों? या दोनों नहीं?
इसी का परवर्ती स्वरूप ज़ेन परंपरा का ‘मु‘ है, जिसका शाब्दिक अर्थ ‘नहीं‘, ‘कुछ नहीं‘, बल्कि ‘शून्यता‘ आशय का है। जो वैचारिक सीमाओं और प्रश्नाकुलता से परे निर्द्वंद्व अवस्था है।

टाल्स्टाय कहते हैं- ‘अगर जिंदगी का कोई मकसद नहीं, अगर जिंदगी खुद ही अपने में मकसद, तब तो जीने का कोई मतलब नहीं। अगर यह बात सच है तब शॉपनहावर, हार्तमान और बौद्धों के विचार भी बिल्कुल सही हैं। लेकिन अगर जिंदगी का कोई मकसद है तो यह जाहिर है कि जब वह मकसद पूरा हो जाए तभी जिंदगी को खत्म हो जाना चाहिए।‘

लाओत्से कहते हैं- ‘जीवन निरुद्देश्य है और सही आदमी सिर्फ वह है, जो जीवन को उसकी निरुद्देश्यता में जीने की कला को जान ले, जिसने भी जिंदगी में उद्देश्य खोजा, वह जिंदा रहने के रस से तो गया ही, उद्देश्य पाने के फितूर से भी मारा जाता है।‘

सालिम अली ने अपनी आत्मकथा में महमूद उज़ ज़फ़र खान को उद्धृत किया है- ‘जीवन न केवल विषय-वासनामय है और न केवल वैराग्यमय, परंतु बहुवर्णी और क्षणभंगुर। इसका आनंद लेने के लिए योग्य शरीर चाहिए, समझने के लिए सामान्य बोध। धर्म तथा दर्शन, अतएव, न तो आवश्यक हैं और न व्यावहारिकः तथापि विरोधाभास ही है कि, वे जमे हुए हैं।‘

बादल सरकार ने ‘एवम् इन्द्रजित्‘ नाटक में लिखा है- तीर्थ नहीं है केवल यात्रा। लक्ष्य नहीं, है केवल पथ ही। इसी तीर्थ पथ पर है चलना। इष्ट यही, गन्तव्य यही है।

महेश अनघ के ग़ज़ल की पंक्ति है-
जिंदगी जैसे बने जीना जीना हकीकत है। और बाकी सब किताबों की नसीहत है।

सुरेन्द्र मोहन पाठक सरलता से कह देते हैं- ‘जिंदगी को एक सिग्रेट की तरह एंजाय करो वरना सुलग तो रही ही है, एक दिन वैसे ही खत्म हो जानी है।‘

जिसे इस तरह भी कहा जाता है कि जीवन को रीझ कर स्वीकार करें या खीझ कर, उसे स्वीकार करना ही होगा।

जीवन की सार्थकता का सवाल- शांत और स्थिर का संतोष, उस समरस का अपना आनंद होता है। वह सार्थक और निरर्थक के द्वंद्व से ऊपर हो जाता है।