Friday, July 10, 2026

नकटी के क्लॉड

मुक्तिबोध की कहानी है ‘क्लॉड ईथरली‘। कहानी हिरोशिमा, नागासाकी पर परमाणु बम गिराने वाले पायलट की है। कर्तव्यनिष्ठ क्लॉड अपने काम को सफलतापूर्वक अंजाम देता है, मगर उसका जीवन आत्मग्लानि से नर्क बन जाता है। मोटी सी बात इतनी है, मुक्तिबोध इस वास्तविक पात्र को ले कर जो बुनते हैं, जादुई है। सभ्यता, विभीषिका और संवेदनाओं का विचलित कर देने वाला चित्रण। नकटी घटना के साथ ऐसी और भी बातें याद आती रहीं।

घटना 29 जून 2026 की है, जिस दिन सुबह-सुबह ‘प्रस्तावित? विधायक कालोनी‘ के लिए रायपुर विमान तल के पास स्थित इस गांव के पीएम आवास वाले घरों सहित लगभग 80 घर, सरकारी जमीन पर अतिक्रमण मान कर बुलडोजर-जेसीबी से ढहा दिए गए। ‘गांव‘ नकटी, जिसका नाम ‘सज्जनपुर‘ बदलने की बात आई, तब तक गांव-बस्ती के हालात ही बदल गए। शासन-प्रशासन द्वारा पुनर्वास हेतु नया रायपुर में फ्लैट आवंटन बताया गया, ग्रामवासियों द्वारा उसे अपर्याप्त और सुविधा रहित बताया गया।

भला करना किसे नहीं भाता। अनुमान होता है कि यहां भी भर-भर भलाई की जाती रही होगी, योजना, लक्ष्य की पूर्ति के आंकड़े सुधरे होंगे। अपना कुछ भला लोगों ने खुद से कर लिया होगा। बहती गंगा में हाथ भी धुले होंगे, नियमों-प्रावधानों पर जन-सेवा हावी-प्रभावी हुआ होगा। गेहूं में घुन पिसा होगा और कुछ घुन, गेहूं के आड़ में रख कर खुद को वाजिब साबित कर रहे होंगे। यह सारी ‘भलाई‘ इकट्ठे बुराई का फोड़ा बन कर अब फूटा है। प्रजातांत्रिक व्यवस्था की खासियत यही है कि कोई एक मनमाना निर्णय नहीं ले सकता। इसके चलते व्यवहार में श्रेय की होड़ लग जाती है और विपरीत स्थिति में संयुक्त जिम्मेदारी होने के कारण, जो चाहे मुंह बचा सकता है। भारतेन्दु के नाटक ‘अंधेर नगरी‘ की तरह। यह भी ध्यान रहे कि सरकार द्वारा समय-समय पर कब्जे को नियमित करना, पट्टा देना, कर्ज की माफी जैसे अनुग्रह किए जाते रहते हैं। ऐसे मौकों पर जिन्होंने नियम-विरुद्ध लाभ नहीं उठाया, कर्ज नहीं लिया, अफसोस करते हैं। उन्हें लगता है कि उन्होंने नासमझी कर दी। इसे दूसरे उदाहरण में देखें, किसी आयोजन में निर्धारित समय पर पहुंच जाने वाले को तब अफसोस होता है, जब कार्यक्रम समय से आरंभ नहीं होता, अतिथियों तथा अन्य आमंत्रितों, संभावितों के आ जाने की प्रतीक्षा की जाती है।

तोड़फोड़ की घटना के बाद प्रभावितों की पहली प्रतिक्रिया में जनप्रतिनिधियों विधायक और सांसद के प्रति रही, ध्यान देने पर समझ में आया कि उनके प्रति आक्रोश इसलिए नहीं है कि उन्होंने घर तुड़वाया, बल्कि इसलिए है कि आश्वासन के बावजूद भी बचा क्यों नहीं पाए? गुस्सा उचित पुनर्वास न होने के कारण भी था। इस जद में प्रशासन और अन्य जनप्रतिनिधि-मंत्री भी आ गए, जिन्हें घरों को तुड़वाने के लिए जिम्मेदार माना गया। दलगत के साथ अंदरूनी गुटीय राजनीति गरमाने लगी, परतें खुलने लगीं, गांव के सरपंच, पंचायत सचिव, चरागन, पट्टा, प्रधानमंत्री आवास, बेजा-कब्जा। फिर वित्त मंत्री, राजस्व मंत्री, आवास एवं पर्यावरण विभाग, छत्तीसगढ़ गृह निर्माण मंडल, नवा रायपुर अटल नगर विकास प्राधिकरण, जिला प्रशासन निशाने पर आते गए। घटना छोटी-मोटी नहीं थी, लेकिन यह भी ध्यान में आता रहा कि संवेदनशील क्षेत्र की और मीडिया के पहुंच के करीब की है। ऐसा भी नहीं कि पीड़ितों की व्यथा कमतर है, मगर धरना, आंदोलन-प्रदर्शन के लिए संगठन कौशल और क्षमता की आवश्यकता होती है, इस प्रकरण में मुझे पीड़ितों का नेत्त्व करने वाले चेहरे या नाम नहीं दिखाई पड़े। संभव है कि परोक्ष प्रभावित हित-साधन करने वाले वाह्य उत्प्रेरक रहे हों।

# मेरठ के पुश्तैनी जल्लाद पवन, जिन्हें फांसी देता है, उसको क्या लगता होगा, शायद अपने मन को समझा लेता हो कि भले ही उस अपराधी ने उसके लिए कुछ गलत न किया हो, दुर्दांत अपराधी है, जिसको मौत दी जा रही है। ज्यों ‘एनकाउंटर‘ में अपराधियों को मार गिराने वालों को लगता होगा।
# 2013 में बिहार में एक रेल की पटरी पार करते, बड़ी संख्या में तीर्थयात्री कट-मरे थे। घटना के बाद ट्रेन में आग लगा दी गई थी और ड्राइवर के साथ मरपीट की खबरें आई थीं। दशहरा 2018 के अमृतसर हादसे में रेल पटरी पर आए लोगों की कट कर मौत हुई थी। घटना में ड्राइवर पर आरोप था कि उसने न तो गति धीमी की, न ही हॉर्न बजाया, जबकि ड्राइवर ने आपात ब्रेक का प्रयास किया और हॉर्न भी बजाया था। बाद में यह बात सामने आई कि जलते रावण की ओर ध्यान होने, पटाखों के शोर और धुएं के कारण ऐसा हुआ। घटना में दशहरा आयोजकों, रेल प्रशासन और ड्राइवर को दोषी मानते कार्यवाही की मांग उठी थी। ऐसी मिलती-जुलती घटना-खबर की जानकारी आती रहती है। 
# दूसरी तरफ नानावटी का मुकदमा याद आता है या फिल्म ‘अचानक‘, जिसमें ऐसा फौजी जो सीमा पर जिन्हें मार गिराता है, जिनसे उसका सीधे कोई लेना-देना नहीं, उन्होंने फौजी का कुछ नहीं बिगाड़ा, फौजी उन्हें कतई नहीं जानता, व्यक्तिगत स्तर पर उसके प्रति जिन्होंने कुछ भी नहीं किया है, उन्हें मारने पर पदक मिलता है। वहीं दूसरी तरफ पत्नी के विश्वासघात के कारण स्वयं सीधे आहत होने के कारण की गई हत्या के अपराध में फांसी की सजा सुनाई गई है।
# वाल्मीकि की कथा में वाल्मीकि निरपराधों से लूट-मार करता है, यह मानते कि वह यह खुद के लिए नहीं, बल्कि अपने आश्रित परिवार-जन के लिए कर रहा है, जबकि उसका परिवार उसके कृत्य के फल में खुद को भागी मानने से इंकार करता है।

नकटी की घटना में मेरा कोई व्यक्तिगत फायदा-नुकसान नहीं हुआ है। घटना से जुड़ी खबरों को पढ़ते-देखते प्रभावितों के प्रति अन्य किसी नागरिक जैसी मानवीय संवेदना मेरे मन में भी है। घटना से जुड़े पक्षों से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रभावित नहीं हूं। शायद इसलिए तटस्थ उन पक्षों की ओर भी सोच पा रहा हूं, जो नजर-अंदाज हैं। इस सारी भूमिका के बाद स्पष्ट हो गया होगा कि मेरे मन में चल रहा है कि नकटी-क्लॉड यानी जेसीबी-बुलडोजर ऑपरेटरों द्वारा अपना काम करते और काम के बाद उसका प्रभाव देखते-सुनते कैसा महसूस होता होगा। एक तरफ उन्हें सौंपे हुए काम को कर्तव्य-निष्ठा, सारे कौशल के साथ तत्परता से पूरा करना होता है, वहीं ऐसे किसी का घर ढहाना, जिसे वे जानते भी नहीं, कैसा लगता होगा। किसी घटना में उपकरण, साधन या औजार इस्तेमाल हुआ तो किस-किस को और कितना-कितना जिम्मेदार माना जाए, औजार-अविष्कारक, उसे बनाने वाला, बेचने वाला, चलाने वाला, चलवाने वाला ... ?

देवदत्त के तीर से घायल हुए हंस और बचाने का प्रयास करने वाले सिद्धार्थ की कहानी के अंत में नीति वाक्य होता था- ‘मारने वाले से बचाने वाला बड़ा‘। किसी घटना पर सोचते हुए मन में आता है निमित्त कौन? कौन कर्ता, किसका कर्म, किस करण के द्वारा ... व्याकरण का कारक-पाठ याद आ जाता है- कर्ता-ने, कर्म-को, करण-से(के द्वारा) ... बात पाप-पुण्य की हो तो किसके खाते क्या आएगा!

Wednesday, July 8, 2026

तीजन - महाभारत की तीसरी परंपरा

8 अगस्त 1956 बुधवार, शुक्ल पक्ष की द्वितीया को सुबह 09 बज कर 41 मिनट के बाद तृतीया तिथि आरंभ हो गई थी, बच्ची जन्मी, नाम हुआ तीजन। घरों में रखे जाने के लिए ‘निषिद्ध‘ मान लिए गए महाभारत की दूसरी परंपरा पंडवानी हुई तो इसकी तीसरी परंपरा को यही तीजन जन्म देने वाली है, मानों नियति ने तय किया था। इस तीजन ने महाभारत के भजन-पंडवानी को अंगीकार कर लिया, घर-समाज से स्वयं निष्कासित होने का जोखिम उठाते। स्वयं तीजन का महाकाव्य जैसा जीवन, पंडवानी के लोक का शास्त्र बना। उन्होंने पंडवानी की प्रचलित शास्त्र-शब्दावली और व्याकरण की सीमा का अतिक्रमण कर, उसका नया शास्त्र रचा। (कुछ स्रोतों में उनकी जन्म तिथि 24 अप्रैल 1956 मिलती है, इस तारीख को तिथि चतुर्दशी थी, अतएव आसानी खारिज की जा सकती है।) श्रीमती तीजनबाई, छत्तीसगढ़ की अब तक की ऐसी अकेली विभूति हैं, जो पद्मविभूषण से सम्मानित हुईं। यह सम्मान उन्हें 2019 में दिया गया। इसके पहले उन्हें 1988 में पद्मश्री और 2003 में पद्मभूषण से सम्मानित किया गया। इस तरह वे तीनों पद्म से सम्मानित हुईं। उन्होंने इकतारे को तीन तार वाले तंबूरे में बदला और पूरे अट्ठारह दिन वाली महाभारत कथा-पंडवानी सुनाने का अवसर कुल तीन बार ही बना। तीजनबाई की नैसर्गिक प्रतिभा की इस यात्रा में भिलाई स्टील प्लांट के निकट स्थित ग्राम गनियारी में जन्म और मध्यप्रदेश आदिवासी लोककला परिषद (संस्कृति विभाग के सचिव रहे अशोक बाजपेयी का जन्मस्थान दुर्ग, छत्तीसगढ़ से लगाव) का संयोग उल्लेखनीय है, और यही दौर था जब हबीब तनवीर के नया थियेटर के माध्यम से छत्तीसगढ़ कलाकर-लोकमंच और छत्तीसगढ़ी धूम होने लगी थी।

तीजनबाई की पंडवानी, महाभारत के साथ कालजयी कथा ... श्रीमती तीजनबाई जब अपने बारे में कुछ कहने लगें, खास तौर पर तब जब माहौल आत्मीय हो (जब कोई साक्षात्कारकर्ता, अधिकारी या पत्रकारनुमा व्यक्ति न हो), कलात्मकता देखते बनती थी। पता नहीं उनकी जीवन-कथा महाकाव्यात्मक है या उनके सुनाने का ढंग ... अंवतरे, तहां ले कूकुर मो ल धर के लेग गये रहिसे ... किस तरह जन्म के बाद उन्हें कपड़े में लपेट कर सुलाया गया था। आसपास कोई नहीं था, तभी एक कुतिया आई और कपड़े में लिपटी शिशु-तीजन को दांतों में दबा, उनके घर से कुछ दूर ले गई थी। शास्त्र कहता है- ‘जन्मना जायते शूद्रः ...‘ पर छत्तीसगढ़ी में जन्म लेना, ‘अंवतरना‘, अवतार लेना है, किसी खास प्रयोजन को सिद्ध करने के लिए जन्म। तीजनबाई ने ‘अपनी पंडवानी‘ से यह सार्थक किया। मैंने टिप्पणी की- आपके साथ तो जन्म से ही महाकाव्यों के पात्र की तरह घटना होने लगी थीं, प्रतिक्रिया में उनकी मुस्कुराहट में बहुत कुछ बूझा-अनबूझा होता। फिर इतिहास के कालक्रम की तरह परत-दर-परत नहीं, बल्कि आत्मीय स्मृतियां अनुभूति में बन कर कपसीले ढेर की तरह हो जाती हैं। वे कहतीं- ‘वास्तव में मेरे मन में श्री कृष्ण जी और सरस्वती का वास था।‘

पंडवानी को परम्परा से कहीं अधिक संबल सबलसिंह चौहान कृत महाभारत से मिला, माना जा सकता है, जिसे आधार बनाकर गायन होता रहा और उसे सुनकर भी सिलसिला आगे बढ़ा। परम्परा में पंडवानी की गहरी जड़ें मंडला के परधानों के साथ जुड़ी हैं। परधान, गायक पुरोहित जाति मानी जाती है। मरवाही अंचल में प्रचलित पंडवानी, मंडला के परधानों की कथा गायकी के अधिक करीब है, जिसमें प्रदर्शन कम और कथा वाचन या गायकी अधिक है। छत्तीसगढ़ में पंडवानी गायक ‘भजनहा‘ कहे जाते थे और कथा ‘महाभारत‘। धीरे-धीरे ‘पंडवानी‘ नाम प्रचलित हुआ और इसमें तीजनबाई के पदार्पण से ‘वेदमती‘ और ‘कापालिक‘ शब्दावली की आवश्यकता प्रबल हुई। सामान्यतः पंडवानी-गायन की विधा को एक अलग शाखा ‘कापालिक‘ नामकरण की आवश्यकता के पीछे, तीजनबाई की गायकी-प्रस्तुति को मुख्य माना जा सकता है। दूसरी शैली ‘वेदमति‘ अर्थात् शास्त्रीय-पारंपरिक ढंग से गायन। ‘कापालिक‘, कपाल यानी अपनी बुद्धि-कल्पना का समावेश करते हुए दी जाने वाली प्रस्तुति। वेदमती और कापालिक को ले कर विभिन्न बातें कही गई हैं। एक व्याख्या में यह भी कहा गया कि बैठ कर प्रस्तुति ‘वेदमति‘ और खड़े हो कर ‘कापालिक‘। स्वयं तीजनबाई ने पवन कुमार सिंह से साक्षात्कार में कहा वेदमती शैली के अंतर्गत गायक केवल पाण्डवों की कथा को साधारण रूप से बताता है जबकि कापालिक शैली में कलाकार पाण्डवों की कथा को नाच-गाकर मुद्रा और अभिनय के माध्यम से बताता है। मेरी शैली कापालिक कहलाती है। कुछ इसी प्रकार का मंतव्य डॉ. बलदाऊ प्रसाद निर्मलकर का है। शास्त्र-सम्मत कथाओं के गायन को वेदमती और जनश्रुति पर आधारित दंतकथाओं का गायन कापालिक कहा जाता है।

वेदमति-कापालिक पर निरंजन महावर के अनुसार पंडवानी की दो शैलियां हैं- कापालिक, जिसका कोई पाठ नहीं है और महाभारत कथा, शास्त्र पर आधारित ‘वेदमती‘। वेदमती शैली की चर्चा करते हुए वे लिखते हैं कि ‘तीजनबाई ने उन्मुक्त होकर प्रभावशाली भाव-भंगिमा और अभिनय के द्वारा पंडवानी की प्रस्तुति में नये-नये प्रयोग किए हैं। ... वर्तमान में वेदमती शैली में अनेक नए पुरुष और महिला कलाकार सामने आए हैं।‘ इससे जान पड़ता है कि वे तीजनबाई को वेदमती में रखते हैं। आगे वे यह भी लिखते हैं कि ‘चूंकि पंडवानी की यह शैली अधिक पुरानी नहीं है अतः इसकी प्रस्तुति के अनेक पक्ष अभी पूर्णतः रूढ़ नहीं हुए हैं, इसलिए इस शैली के और विकास की संभावनाएं बनी हुई हैं।

रामहृदय तिवारी इसकी बारीकी में नहीं जाते, लिखते हैं- ‘ ‘वेदमती‘ और ‘कापालिक‘ शाखाओं के नाम से विभक्त इस पंडवानी के जिस स्वरूप से हम सब ज्यादा परिचित हैं वह ‘कापालिक शाखा‘ की विख्यात शैली है, जो शास्त्रीय कथा को लोकरंग के नए परिधान देकर पूरे आत्म विश्वास के साथ हमारे सामने लाती है। ऐसा कहा जाता है कि कापालिक शाखा का अभ्युदय ‘वेदमती‘ शाखा की पारंपरिकता के विरोध स्वरूप हुआ। कापालिक शाखा के गायकों ने समयानुकूल लोकरूचि के वाद्यों का समावेश अपनी प्रस्तुति में किया। गायकी की नई आक्रामक शैली का अविष्कार किया। गाथा को अंचल की प्रचलित लोक धुनों में बाँधा और पूरी सजधज के साथ प्रसंगानुकूल ‘एकल अभिनय‘ की शुरूआत हुई, जिसका चरमोत्कर्ष आज की विश्व विख्यात पंडवानी गायिका पद्मश्री तीजन बाई में देखा जा सकता है। 

रमाकांत श्रीवास्तव की टिप्पणी से ‘वेदमती-कापालिक‘ को समझना मददगार है, जिसमें वे लिखते हैं- ‘ ... रही सही कसर इस प्रचार ने पूरी कर दी कि सबल सिंह के महाभारत के आधार पर प्रस्तुत की जाने वाली पंडवानी वेदमती शैली है और पुरानी पंडवानी कापालिक शैली। इस विभाजन का न तो कोई आधार है और न ही इसके पीछे कोई तर्क है। ‘वेदमती‘ पद ‘कापालिक‘ शब्द से अधिक आदर के योग्य माना गया क्योंकि समाज में कापालिक परंपरा का स्थान नगण्य हो गया है। तार्किक दृष्टि से सोचें तो कापालिक एक भिन्न मत है और महाभारत की कथा से उसका सम्बन्ध दूर-दूर तक नहीं है। अपनी कथा गायन शैली को लोक मानस में उच्चासीन करने के लिये ये नाम प्रचारित किये गये है। न केवल जन सामान्य ने बल्कि लोक संस्कृति के कई शोधार्थियों ने इन नामों को जस का तस स्वीकार भी कर लिया है।‘

तीजनबाई ने पीसी लाल यादव को साक्षात्कार में बताया- ‘जो बैठकर गाते हैं एकतारा में गाते हैं और जो कापालिक शैली है उसमें तंमूरा में तीन तार लगाते हैं। कापालिक शैली में तंबूरा को झुनकी से बजाते हैं और वेदमती शैली के गायक नारद की तरह एक उंगली से बजाते हैं। लोगों ने अलग-अलग चीजें अपनाईं और अलग-अलग वाद्य बनाये। मैंने कापालिक शैली अपनाई तो अपने ढंग का वाद्य अपनाया। श्री नारायण ने पंडवानी गायन शुरू किया तो एक हाथ में करताल और दूसरे में तंबूरा लिया।‘ 

तीजनबाई की प्रस्तुतियों में कमाल का होता था ‘कीचक वध‘ प्रसंग। इसके साथ मुझे याद आ रहे बहुत सारे प्रसंगों में से एक ‘द्रौपदी चीरहरण‘, जिसमें दुःशासन के थक-हंफर‘ कर लस्त-पस्त हो जाने के लिए वे जोड़ती ‘दिन भर कमा के घर लहुटत, चढ़ाउ म सैकिल आंटत, हंकरत-हंफरत ...‘, वे उस दृश्य में डूब जातीं और उनकी कल्पना में भिलाई के थके-मांदे घर लौटते श्रमिक का रूपक बनता। तमूरा वह कितना बजाती पता नहीं लगता, मगर वही तमूरा, धनुष-तीर-तलवार बन जाता। उसे गदा की तरह कंधे पर ले कर, मर्दानी चाल में मंच पर दाएं-बाएं फिरती तो दर्शक के लिए भीम मानों साक्षात अवतरित हो जाते। किसी विदेशी प्रस्तुति, संभवतः पेरिस में, प्रस्तुति के लिए गई थीं, याद करतीं कि भारी भीड़ के बीच से निकल कर जाना था। उन्होंने गदा की तरह तमूरा उठाया और ‘दंगरस-दंगरस‘ चलने लगीं, पूरी भीड़ छंट गई और उनके पीछे-पीछे सारे कलाकार आ गए।

खुद पर और दूसरों के प्रति भी भरोसा बनाए रखना, उनका खास गुण था। शुरुआती दिनों में दिल्ली, रेल्वे स्टेशन के पास पहाड़गंज के जिस ‘नीलम‘ होटल में रुका करती थीं, अपनी प्रतिष्ठा और नाम-यश के बाद भी दिल्ली प्रवास पर उनकी प्राथमिकता वही होती। उनके रागी-संगतकार भी लगभग वे ही बने रहे। 2001-02 में दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय आडिटोरियम में उनकी प्रस्तुति थी। कार्यक्रम शुरु होते ही मैंने हॉल की बत्तियां बुझवा दीं। मगर कुछ ही देर में हॉल की बत्तियां फिर से जल गईं। मैंने जा कर पूछताछ की, पता चला कि उन्होंने ही बत्तियां जलाए रखने के लिए कहा है। प्रस्तुति के बाद उनसे जा कर मिला और पूछा कि हॉल की बत्तियां जलते रखने के लिए आपने कहा था, क्यों? उन्होंने बताया कि सामने दर्शकों के हाव-भाव न दिखें तो उन्हें अपनी प्रस्तुति का उत्साह नहीं होता। दर्शकों की मुख-मुद्रा देखते, अपनी प्रस्तुति को ‘इम्प्रोवाइज‘ करती चलती हैं। उस दिन उनके जवाब से मंचीय प्रस्तुतियों की फोर्थ वाल कही जाने वाली खासियत से परिचित हुआ। भरत मुनि के नाट्य शास्त्र, थियेटर के ब्रेख्तियन या शेक्सपियरियन प्रपंचों से उनका कोई रिश्ता न रहा हो, मगर ‘ब्रेकिग द फोर्थ वॉल‘, अकेली विभिन्न पात्रों को जीवंत कर, जताती कि यह अभिनय है, दर्शकों को भी प्रस्तुति के अभिन्न अंग की तरह जोड़ लेतीं। प्रस्तुति के बाद नेपथ्य में आ कर कुछ देर शांत बैठ जातीं, मानों मंच पर आह्वान किए, उनमें अवतरित पात्रों को एक-एक कर विदा कर रही हों, विसर्जन-विषाद के साथ आत्मस्थ होते भाव, लगता कि रघु राय होते तो इसी क्षण को कैद करते।प्रस्तुति के पहले की तैयारी हो या उसके बाद, उन्हें नेपथ्य में देखना, मंच पर देखने से कम सम्मोहक न होता।

एक तरफ पीटर ब्रुक्स का भारी ताम-झाम वाला ‘महाभारत‘ होता तो उसके बरअक्स अपने रागी-साजिंदों के साथ अकेली तीजनबाई की पंडवानी। गद्य-पद्यात्मक चम्पू शैली में वे सूत्रधार-कथावाचक भी होतीं और प्रसंगानुसार विभिन्न पात्र भी। एकल मंचीय प्रस्तुति देते कलाकार मात्र की तरह कभी रागी से संवाद भी कर लेतीं। छत्तीसगढ़ के लोकमंच के खड़े साज के साथ इसमें घोड़ा नाच यानी तारे-नारे की झलक मिलती, जिसमें कलाकार, बीच में उत्तम पुरुष बन कर, अन्य पुरुष (जिस पात्र का अभिनय कर रहा है) भी हो जाता है। यही कारण है कि श्याम बेनेगल ने बहुप्रशंसित टी.वी. धारावाहिक ‘भारत एक खोज‘ के महाभारत काल के लिए तीजनबाई को चुना, एक कमाल श्याम बेनेगल के चयन का तो दूसरा उनकी सोच से आगे, कहीं बेहतर उसे तीजनबाई ने साकार कर दिखाया।

एक प्रसंग, विश्व व्यापार मेला, प्रगति मैदान के ‘लाल चौक‘ एम्फी-थियेटर में ‘छत्तीसगढ़ दिवस‘ सांस्कृतिक संध्या प्रस्तुति के दौरान हुआ। बड़े मीडिया हाउस के एक नामचीन पत्रकार आए और ठाट से कहने लगे तीजनबाई को बुलाओ, हमें उनको कवर करना है। बॉडी लैंगुएज की समझ एक कलाकार से अधिक किसको हो सकती है और वह भी तीजनबाई जैसी कलाकार। उनकी विनम्रता में स्वाभिमान की गरिमा होती। प्रशंसा के जवाब में मासूम मुस्कुराहट, जिसमें संकोच और कही गई बात का सम्मान रखते, उसे स्वीकार कर लेने का भाव होता। पत्रकार महोदय का रवैया देख कर उन्होंने भोलेपन से कहा- साहब लोगों से पूछ लेती हूं और मेरे पास आ कर उन पत्रकार के रवैये के बारे में बताया। मैंने पूछा, आपको उनसे बात करना जम रहा है, जवाब में अपने चेहरे के भाव पर्याप्त थे। मैंने सलाहियत की तरह उनसे कहा, मुझे लगता है कि उन्हें आपकी जरूरत हो सकती है आपके लिए छपने-छपाने की चिंता करना उतना जरूरी नहीं लगता, वैसे आपको जैसा उचित लगे, हमलोगों को कोई आपत्ति नहीं है। इस पर पूरी अदा के कहा- हौ! फेर अब तो टेम भी हो गए हे, संभरे-पखरे म भी बेरा लागिही और अपने सहायक को भेज दिया। पत्रकार महोदय मुझसे लगभग झगड़ पड़े कि लोक-कलाकारों को इस तरह बंधन में रखने की ज्यादती कर रहे हैं आपलोग, आदि इत्यादि।

छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद आरंभिक तीन-चार साल संस्कृति विभाग को मजबूत आधार देने वाले थे। इसका श्रेय तत्कालीन मंत्री श्री धनेन्द्र साहू, वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी डॉ. के.के. चक्रवर्ती और डॉ. इंदिरा मिश्र तथा विभागाध्यक्ष श्री प्रदीप पंत को है। इसी दौर में पंडवानी की परंपरा और अगली पीढ़ी की चर्चा में पंडवानी के विभिन्न कलाकारों की प्रस्तुतियां और साथ ही तीजनबाई की पंडवानी प्रशिक्षण कार्यशाला रायपुर और बिलासपुर में कराई गई। इस दौरान उनके सत्रों के आगे-पीछे खाली समय में बातचीत के दौरान मैंने उनसे पूछा कि छत्तीसगढ़ी में पारंपरिक सोहर गीत नहीं हैं? इस पर उन्होंने छत्तीसगढ़ी सोहर गीत गाना शुरू किया। बातचीत के क्रम में पता लगा कि वे भरथरी, चंदैनी आदि अन्य लोकगीत गाथाओं की जानकार हैं। मैंने कहा इतने दिनों में आपसे यह तो कभी नहीं सुना था, आप सुनाती क्यों नहीं। इस पर उन्होंने कहा कि पंडवानी चलने लगी तो तीजनबाई पंडवानी वाली ही हो कर रह गई, अब हर कोई पंडवानी ही चाहता है।

मार्च 86 वाले दौर में तीजनबाई की भोपाल में प्रस्तुति पर रामचन्द्र शर्मा की टिप्पणी देखने लायक है- ‘इसमें दो मत नहीं हो सकते कि श्री झाड़ूराम देवांगन या श्री पुनाराम निषाद की तुलना में श्रीमती तीजनबाई की पण्डवानी आकर्षित नहीं करती। ... पण्डवानी के कई शौर्य-प्रसंग एक महिला-गायिका के लिए जटिल हो सकते हैं। खास तौर पर आंगिक हाव-भाव के माध्यम से कथा को संपूर्णता देने का प्रयास प्रायः महिला गायक से सफल हो पाना कठिन होता है। फिर भी तीजनबाई ने भरसक चेष्टा कर ...द्रौपदी प्रसंग में ...सीधी और सपाट छत्तीसगढ़ी में यह पद सुनाया ... कुल मिलाकर श्रीमती तीजनबाई की पण्डवानी सामान्य रही।’ 

जिस तीजनबाई की पंडवानी के लिए लोककला के गंभीर समीक्षक कहा करते थे कि यह दुबली-पतली लड़की है, इसका पंडवानी गाना नहीं जमता ... यह पंडवानी की परंपरा और उसकी गंभीरता को नहीं समझती ... बहुत प्रभावी नहीं है ... आदि। उन्हीं तीजनबाई ने पंडवानी के मानक तय किए। उनकी कथा समाप्त होती, जयकारे के साथ- ‘बोलो बृंदाबन बिहारीलाल की ...। (निधन 5 जुलाई 2026) 
जुलाई 2019, रायपुर में ‘इंडिया टुडे‘ के आयोजन में
सुश्री तीजनबाई और श्री विनोद कुमार शुक्ल (चित्र में उनके पुत्र श्री शाश्वत)
के साथ सम्मान ग्रहण करते उनके साथ का संयोग बना था।

स्वर्गीय श्रीमती तीजनबाई की स्मृति में शासकीय हाई स्कूल, गनियारी का नामकरण और राज्य अलंकरण की घोषणा हुई है। सभी जिलों में उनकी प्रतिमा स्थापना, जिला मुख्यालयों में चौक, भारत रत्न, पीठ की स्थापना जैसी चर्चा हो रही है। उनकी जन्मतिथि, पुण्यतिथि पर अवकाश की मांग भी की जा सकती है। मगर मैं मानता हूं कि इससे कहीं अधिक जरूरी है कि उनके जितने भी साक्षात्कार प्रिंट या इलेक्ट्रानिक मीडिया पर उपलब्ध हैं, एकत्र कर इंटरनेट पर उपलब्ध कराया जाए साथ ही उन पर प्रकाशित स्तरीय सामग्री, अभिनंदन-सम्मान और प्रशस्ति पत्र, साइटेशन्स को भी संग्रहित कर, उनकी अधिकृत जीवनी, जिसमें यथासंभव उनकी सभी प्रस्तुतियों के आयोजक, स्थान, दिनांक, अवधि, प्रसंग आदि की जानकारी इंटरनेट पर सर्वसुलभ कराया जाए। इसके अलावा ‘पंडवानी‘ जैसी पारंपरिक लोककलाओं के माध्यम से छत्तीसगढ़ की संस्कृति को जीवंत बनाए रखने के उपाय किए जाएं।

प्रसंगवश- 

पंडवानी कथा प्रचारक संस्थापक गायक झीपन निवासी नारायण प्रसाद वर्मा को माना जाता है, उनका जन्म 1884 में हुआ। 12 वर्ष की उम्र में पंडवानी गायन आरंभ कर दिया था। पंडवानी गायक गुरु की तरह उनकी पूजा-स्मरण करते हैं। उनके साथ रिश्ते के भाई, 1903 में जन्मे बोड़तरा के सूबेदार आडिल भी शामिल होते थे। बाद में दाउ सूबेदार भजनहा ने अपने भांजे किरीतराम और शालिगराम को साथ ले कर मंडली बनाई। 

1927 में जन्मे बासिन, भिलाई के झाड़ूराम देवांगन ने 1945 में पंडवानी गायन आरंभ किया, 1964 में पहली बार इनकी पंडवानी का प्रसारण भोपाल, आकाशवाणी से हुआ। झाड़ूराम जी एक साक्षात्कार में बताया कि तम्बूरा और खंझेरी के अलावा उन्होंने तबला, हारमोनियम और मंजीरे का प्रयोग शुरू किया तथा उनके कार्यक्रमों में श्रोताओं की भीड़ का कारण, नये वाद्यों का प्रयोग था। 

कुछ प्रमुख पंडवानी गायक- पूनाराम निषाद, रिंगनी, दुर्ग (1939), लक्ष्मीबाई बंजारे, कातुलबोड़, दुर्ग (1944), रेवाराम साहू, देवरी, दुर्ग (1946), तीजनबाई, गनियारी-अटारी (1956), चेतन देवांगन, पहन्दा, दुर्ग (1956), शांतिबाई चेलक, पिरदा, दुर्ग (1963), सामे शास्त्री देवी, जोगीपुर, दुर्ग (1963), मीना साहू, रनचिरई, दुर्ग (1964), प्रभा यादव, बंगोली, रायपुर (1970), ऋतु वर्मा, रुआबांधा, भिलाई (1979), उषा बारले, पावर हाउस, भिलाई (1989)। 

इसके अतिरिक्त- पंडरिया, गंडई के श्री बोधीराम यादव (1915), बिसौहादास, बहेरा, दुर्ग (1933), रामनाथ यादव, सेनभांठा, महासमुंद (1942), अघनूराम निषाद, छाटा, दुर्ग (1950), भागवत प्रसाद साहू, कुरलू, कवर्धा (1953), मनमोहन सिन्हा, डोंडकी, रायपुर (1954), खम्हन लाल अस्तुरे, झलमला, बेमेतरा (1955), दयाबाई ध्रुव, दुपचेरा, दुर्ग (1957), ईश्वरी प्रसाद चंद्राकर, कुरुद, रायपुर (1960), पुनीत राम साहू, नेवारी, रायपुर (1960), पुनीत राम साहू, नेवारी, रायपुर (1960), परसराम धीवर, ससहा, बलौदा बाजार (1961), परसराम धीवर, ससहा, बलौदा बाजार (1961), चैतीबाई साहू, कुरुद, दुर्ग (1967), सुशीला ठाकुर, रायपुर (1968), प्रहलाद निषाद, सिंघनगढ़, कवर्धा (1971), सावित्री ठाकुर, रुआबांधा, भिलाई (1981) ... यह सूची विस्तृत है, मगर और कलाकार-नामों के साथ, उनका स्थान और जन्म की जानकारी के बिना उल्लेख अधूरा होगा, और वह फिलहाल मुझे उपलब्ध नहीं है। कोष्ठक में दी गई संख्या (. . . .) उपलब्ध हुई जानकारी के आधार पर जन्म वर्ष है। 

उक्त जानकारी मुख्यतः डॉ. बलदाऊ प्रसाद निर्मलकर की पुस्तक ‘पांडव गाथा पंडवानी और महाभारत‘, डॉ पीसी लाल यादव की पुस्तक ‘पंडवानी परम्परा और प्रयोग, निरंजन महावर की पुस्तक ‘पंडवानी महाभारत की एक लोक नाट्य शैली‘, डॉ. रमाकान्त श्रीवास्तव की पुस्तक ‘छत्तीसगढ़ी कथा-गीत, सामाजिक-सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य‘, जमुना प्रसाद कसार संपादित ‘छत्तीसगढ़ी गीत लोक कंठ का कलकल निनाद', आदिवासी लोकला परिषद की पत्रिका ‘चौमासा‘, तथा मोनोग्राफ्स, श्री विमल पाठक, श्री परदेशीराम वर्मा, डॉ. सत्यभामा आडिल, श्री प्रकाशन, दुर्ग के महावीर अग्रवाल के प्रकाशन और उनसे हुई चर्चा, आदि के आधार पर तैयार की गई है।

Sunday, July 5, 2026

जिरह अजुधिया

अयोध्या नगरी जितनी राममय है, राकेश तिवारी उतने अयोध्यामय, जो उनके लिए अजुधियाजी है। अयोध्या उतनी ही मेरी भी है, जितनी किसी ‘हिन्दु‘स्तानी के लिए। बाबरी मस्जिद हो या राम जन्मभूमि, अयोध्या रामलला से ओरछा रामराजा और दिल्ली के रामराज्य कर्णधारों के बीच आवाजाही, आस्था के ढांचे को प्रभावित करता है, चूलें हिल जाती हैं। ऐसे मौकों पर तह तक जाने में पुरातत्व-इतिहास की अकादमिक वस्तुनिष्ठ भूमिका मददगार होती है, तथापि उसकी व्याख्या स्याह-सफेद कर सकती है और उसमें रंग भी भरती है। आस्था के रंगों से सराबोर, इतिहास की अंधेरी सुरंगों के बीच कुछ उजले, कुछ धुंधले ऐसे ही पन्ने हैं, पुरातत्वविद् राकेश तिवारी की कलम से निकली किताब ‘जिरह अजुधिया‘।

किताब, जिसके लिए आश्वस्त रहता हूं कि अच्छी होगी, पसंद आएगी, उसे पढ़ने के लिए बचा कर रखता हूं, भोजन के आखिरी कौर की तरह। जब तबीयत हो, लगातार पूरा समय मन लगाकर अलट-पलट कर, रस लेते, जुगाली करते पढ़ूंगा, उस दौरान और कुछ नहीं। इसके साथ भी यही बात थी, छपने के बाद से ही आ गई थी। हाथ में लेते ही अयोध्या पर कुछ और ही जिरह होने लगी। किताब के पन्नों के साथ मेरा मन अयोध्या-इतिहास की परतों और कण-कण में समाए राम में रमा रहा।

पता चला कि यह किताब ‘जिरह अजुधिया हमरी लेखी‘ है, शीर्षक में ‘जिरह अजुधिया’ रह गई है, गनीमत कि ‘ ... अयोध्या ...‘ नहीं हो गई। साहित्य में ऐसा होता रहा है। अज्ञेय ने अपनी किताब ‘लिखि कागद कोरे‘ की भूमिका ‘साँचि कहउँ‘ में बताया है कि ‘असल में मुझे शीर्षक देना चाहिए था ‘अध साँचि कहउँ मैं टाँकि- टाँकि कागद अध-कोरे‘ - पर साठोत्तरी उपन्यास के पाठोत्तरी पाठक भी महसूसते (उन्हीं की भाषा है) कि इतने लम्बे शीर्षक नहीं चलने के ...‘। यद्यपि कविता-संग्रह, मगर साठोत्तरी ही है, विनोद कुमार शुक्ल की - ‘वह आदमी चला गया नया गरम कोट पहिनकर विचार की तरह‘। खैर, आपसी चर्चा में कुछ ऐसे प्रसंग भी आए, जिन पर राकेश जी इतना ही कह कर रह गए- ‘रामजी की चिड़िया, रामजी का खेत ...‘। मुझे याद आया कि राम मंदिर निर्माण के दौरान कितने ही तरह की रसीद बुक लिए चंदार्थी ‘राम के नाम पर‘ टकराते थे।

किताब पढ़ते हुए, इसमें आई बातों के साथ अपनी ढपली है तो कही-कहीं अपना भी राग छेड़ने का इरादा बना, संभव है वह राग कहीं सुरीला न हो, मगर भरोसा रखें, बेमेल नहीं होगा।

तो किताब आरंभ होती है- ‘भगवान श्रीरामलला विराजमान श्रीराम जन्मभूमि आदि...‘ न्यायालयीन मामले में निदेशक, उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्व संगठन राकेश तिवारी का बयान लिखवाया गया- मूलतः बस्ती जिले का निवासी ... मेरे बाबा सेवानिवृत्त होने के बाद अयोध्या में भी रहते थे ... मुझे याद नहीं है कि मैं विवादित परिसर में कितनी बार गया था। लेखक के भोले बाल-मन पर अंकित राम-रहीम संकेत उल्लेखनीय है, वे लिखते हैं कि बचपन में रावण जलने पर उसकी एक लकड़ी तोड़ कर घर ले आते, क्योंकि सुन रखा था कि ऐसी लकड़ी और ताजिया की अबरक और चमकीली पन्नी खाट से बांध देने पर बुरी आत्माएं और अलाय-बलाय बराए रहते हैं। उनकी मनोभूमि में यह भी दर्ज है- ‘जब गंगा मइया लोगों के पापों से मैली हो जाती हैं तो वह स्त्री-वेश धारण कर सरयू जी में स्नान करके स्वयं को पुनः पवित्र कर लेती हैं।‘

लिखते हैं- ‘बचपन के दिनों में, ब्रह्ममुहूर्त में पितामही के सुमधुर स्वरों में श्रीरामचरितमानस का पाठ सुनने और कभी-कभी पितामह की अँगुरी थामकर सरजू मइया के आँचर में आचमन-नमन करके ‘अजुधिया जी‘ में स्थित ‘हनुमानगढ़ी-जन्मभूमि‘ के दर्शन-पूजन के संस्कार पाए। जन्म से मृत्युपर्यन्त हमारे जीवन के समस्त अनुष्ठान ‘सरजू मइया‘ और ‘अजुधिया जी‘ से जुड़े चले आ रहे हैं।‘ इसके साथ लेखक को किस तरह के संस्कार मिले, उनके पितामह के प्रसंग की बानगी- ‘हाकिम हैरान होकर पूछने लगते ‘बप्पा! आप किसकी पैरवी कर रहे हैं? मैनेजमेंट की या लेबर की?‘ पंडित जी तपाक से कहते- ‘दोनों की। ऐसा फैसला करो जिससे दोनों में से किसी का नुकसान न होने पाए।‘ हाकिम सुनकर हँसते रहते और इसी तरह मुकदमा चलता रहता। ... सबको पता चल जाता- ‘कउनो मुकदमा मा फइसला हुई गवा। को जीता को हारा। ईके बारे मा कोउ नहीं पूछत रहै। प्रसाद मिल गवा, इतनै भर समझें औ बोलें-जय अजुधिया जी की। जय हनुमान जी की। जय श्रीराम। जय जय सियाराम।‘

लेखक ने छत्तीस साल की उमर पार करने के पहले ही ‘उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्व का भार संभाल लिया था, लिखते हैं कि उस समय रत्ती भर अंदाजा नहीं लगा कि ‘मूंड़ मुड़ाते ही ओले पड़ने‘ वाले हैं। 10 जनवरी 1990 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय की खंडपीठ से पारित आदेश उन्हें मिला, लिखते हैं- ‘पढ़ कर समझ में आया कि अब तक दर्शक दीर्घा में टकटकी लगाए देख रहे रामलीला में अपना किरदार अदा करने का वक्त आ गया है।‘ ... ... ... ‘बहरहाल देख-परख कर तैयारी की पहली कवायद करके रामलला के दरबार में हमारी पहली पेशी पूरी हुई।

रामलला-राम जन्मभूमि वाले अयोध्या राम मंदिर की पृष्ठभूमि में, रामायण-महाभारत की हकीकत, ऐतिहासिकता, घटना काल, रचना काल, वेद-पुराण, शास्त्रीय-ग्रंथ और प्राचीन साहित्य आदि के उद्धरण-उद्धारण होता रहा। बात पुरातत्व-उत्खनन पर आनी ही थी, आई भी। पढ़े-लिखों के बीच भी मान लिया जाता है कि इससे चमत्कार होगा, जो भी मिला ‘कार्बन-डेटिंग हो जाएगी‘ से ले कर ‘रामजी की कुंडली, जन्म-प्रमाणपत्र‘ भी मिल जाएगा, जैसी उम्मीद के जुगनू चमकते रहे। इस बीच ग्राउंड पेनिट्रेटिंग सर्वे या ‘जिओ रडार सर्वे‘ का काम ऐसे कामों में नातजुर्बेकार निजी संस्था को भी आजमाने का प्रयास हुआ, जिसकी वजह से कुछ दिनों के लिए बात अली रही, लेकिन उलझी-सी उनकी रिपोर्ट से समाधान में कोई मदद नहीं मिली। शोध-संगोष्ठी, सेमिनार होते गए, शोध-पत्रिकाओं के वाल्युम्स और पुस्तकें आती गईं, बातें बढ़ती गईं। जबकि तुलसी बाबा कह गए हैं- ‘... को करि तर्क बढ़ावै शाखा‘।

आम तौर पर पुरातत्व से जुड़े शब्द, जो अधिकतर सुनाई पड़ते हैं, उनमें ‘कार्बन डेटिंग‘ मुख्य है। इसलिए यहां काल निर्धारण और इस ‘डेटिंग‘ पर बात कर ली जाए। ध्यान करें हाल के वर्षों में धार की भोजशाला के शिलालेखों और वाराणसी, ज्ञानवापी में महाकाल के काल-निर्धारण के लिए भी कार्बन डेटिंग खबरों में रहा था। पहले इस पुस्तक के हवाले से, जिसमें इसे स्पष्ट किया गया है-

1. सभी जीवित पदार्थ कार्बन पर आधारित होते हैं और जीवन प्रक्रिया के अन्तर्गत ताजा कार्बन समाहित करते हैं, पौधों द्वारा की जाने वाली ‘प्रकाश संश्लेषण‘ (फोटो सिंथेसिस) की क्रिया इसका एक उदाहरण है। इस प्रक्रिया में जीवित पदार्थ जीवनपर्यन्त सामान्य C-12 के साथ उसके रेडियो एक्टिव आइसोटोप C-14 को भी समाहित करते हैं। इन प्राणियों की मृत्यु के उपरान्त इनमें निहित C-14 का क्षय (decay) प्रारम्भ हो जाता है और 5730+/-40 वर्ष में उसकी रेडियो एक्टिविटी आधी रह जाती है। इस सिद्धान्त पर किया गया काल-निर्धारण रेडियो कार्बन डेटिंग कहलाता है। 
2. अतः यदि किसी इमारत/पुरावशेष के साथ सुनिश्चित रूप से उसके समकालिक ऐसे ऑर्गेनिक सैम्पल मिल सकें जिनमें C-14 उपलब्ध हो तो उसकी रेडियो एक्टिविटी को माप करके उक्त इमारत/पुरावशेष का काल-निर्धारण किया जा सकता है। 

संक्षेप में कार्बन डेटिंग जैविक अवशेषों की होती है, अकार्बनिक पदार्थों की नहीं। साथ ही जांच के नमूनों की भिन्नता से और अलग-अलग प्रयोगशालाओं की गणना में हजार साल तक का अंतर संभव होता है। इसलिए इस विधि की अपनी सीमा है। पुस्तक में पेज 291-292 पर रेडियो कार्बन डेटिंग के साथ कालक्रम की एक अन्य विधा का संक्षेप- टी.एल. डेटिंग (सरकारी महकमे में यह आद्याक्षर टाइम लिमिट बैठक के लिए प्रचलित है।) का संक्षिप्त उल्लेख है। यह विधि टी-थर्मो, एल-ल्यूमिनेसेंट यानी ताप-प्रतिदीप्त विधि है, जिसके द्वारा सामान्यतः मृण-वस्तुओं के आग में पकाए जाने की तिथि की गणना कर, मृदभांड जैसे अवशेषों का काल निर्धारण किया जाता है। यह भी ध्यान रहे कि पुरातत्व में सामान्यतः काल निर्धारण रूपाकार-प्रकार के आधार पर किया जाता है, जिसमें अभिलेखों के लिए पुरालिपि शास्त्र और मंदिर-मूर्तियों के लिए कला-शैली, अलंकरण, लय-ताल आदि आधार होता है। यह सभी रिलेटिव या कम्परेटिव विधियां हैं, जिसमें काल निर्धारण का आधार उसके पूर्वापर ज्ञात काल के पुरावशेषों के सापेक्ष पर किया जाता है। यदि किसी वस्तु-विशेष के आधार पर निरपेक्ष रूप से काल-निर्धारण हो तो यह एब्सोल्यूट, निरपेक्ष वैज्ञानिक विधि होगी। 

मुख्यतः 9 खंडों की बंटी पुस्तक की योजना में सात को सोपान कहा गया है, मगर पंचम और अष्टम को अध्याय। ऐसा संभवतः इसलिए कि ये दोनों अध्याय ठेठ पुरातात्विक प्रक्रिया- खुदाई, अभिलेखन आदि तथा उस पर तर्क-वितर्क के हैं। आप रामभक्त हों, इतिहास में गहरी रुचि हो, शोध कर रहे हों तो बात अलग है वरना किताब की मोटाई और फिर फुटनोट, संदर्भ, उद्धरण आदि देख कर पहले तो लगता है कि क्या ही कुछ लिख दिया होगा इतना सारा, मगर किताब खत्म करने पर लगता है कितना कुछ रह गया होगा अनलिखा-छपा। इसके साथ खास यह कि पूरा लेखन भाषा और विवरण की शैली के कारण तथ्यात्मकता के बावजूद बोझिल नहीं, सरस बना रहता है। लेखक औरों को बख्शता नहीं, मगर साथ ही खुद पर बेझिझक टिप्पणी, सवाल करते हुए भी सहज और आम बने रहना, इस लेखन को खास बनाता है। ‘सहज समाधि भली‘ और ‘कामन सेंस इज मोस्ट रेयर सेंस‘, इस में साधी-सधी दिखती है।

चतुर्थ सोपान, अयोध्या के कोरियाई-चीनी रिश्ते पर है, जिसके लिए पाकिस्तान, मंगोलिया, रूस में भी भटकना है। पहले लगता है कि बेवजह ‘दूर की कौड़ी है‘ लेकिन बात राम की हो तो देश-काल का व्यापक होना ‘किम् आश्चर्यम्‘! इस सोपान में ‘अनोखी रूमानी कहानी‘ है, जिसमें पात्र किम और हो के साथ उनके वंशजों के सूत्र-ओ-सुराग ‘जुड़वां मछलियों‘ में निहित हैं। बात आ जाती है, कोरिया के गिम्हे नगर में अयोध्या की राजकुमारी के स्मारक और अब अयेध्या में भी सरयू किनारे उनके स्मारक तक, साथ ही 30 जुलाई 2019 को भारत सरकार द्वारा जारी ‘महारानी हो‘ और ‘राजकुमारी सूरीरत्ना‘ के चित्र वाला भारत-कोरिया गणराज्य संयुक्त डाक टिकट भी जुड़ गया है।

राकेश जी ने निदेशक के पद पर चयन में अपनी मूंछों की भूमिका पर प्रकाश डाला है, फिर यहां जुड़वां मछलियों की बात पढ़ते हुए हमारे अर्न्तचक्षु में भी मछली-मूंछें दिखने लगीं। प्राचीन कला में अपनी सबसे यादगार ‘जुड़वां मछली‘, जो छत्तीसगढ़ में ताला की अति-मानवाकार अनूठी ‘रूद्र शिव‘ प्रतिमा के मूंछों पर है। चलिए, अभी ढपली हमारी तो क्यों न हम भी अपना राग छेड़ें- बांग्ला में छोटी मछली को ‘पुटी‘ या प्यार से ‘पुटिया‘ भी कहते हैं‘, ऐसा जान पड़ता है कि यह ‘पुट देना‘, पुड़िया, जैसे शब्दों के करीब है। इस शब्द की चर्चा प्रभात रंजन सरकार की पुस्तक वर्णविचित्रा में इस प्रकार है- ‘शफरी/सफरी - ‘शफरी‘ शब्द का अर्थ है पोंठी मछली। शफरी या पोंठी मछली की बंगाल में 11 प्रजातियां हैं ... वर्तमान में क्षुद्राकृति पोंठी को कोई कोई तीती पोंठी कहा करते हैं ... गंभीरजलसंवारी रोहितादि न विकारी। गण्डूषजलमात्रेण शफरी फरफरायते।। ... बंगला भाषा में ‘शफरी‘ शब्द का अपर अर्थ ‘विदेशागत‘ अर्थात् विदेश से सफर करके जो आया है।‘ मेरी जानकारी में यह शब्द संस्कृत के ‘प्रोष्ठी‘ से आया है और प्रोष्ठी के लिए अनुमान होता है कि प्र-ओष्ठ, ओंठ के ऊपरी भाग का आकार। ‘विधुर जातक‘ में ‘पाठीना पावुसा मच्छा बलजा मुंज रोहिता।‘ मछली का नाम ‘पाठीना‘ आया है। अमरकोष का उल्लेख है- ‘प्रोष्ठी तु शफरी द्वयोः‘ और हलायुध कोष में- ‘सहस्रदंष्ट्र पाठीनः प्रोष्ठी च शफरी स्मृता।‘ यों यहां पाठी और प्रोष्ठी अलग-अलग हैं। एक अन्य संदर्भ- वाल्मीकि रामायण बालकांड में दशरथ के चारों पुत्रों को ‘प्रोष्ठपदोपमा‘, भाद्रपदा के चार तारों के समान कहा गया है। भाद्रपदा नक्षत्र के दो भेद, पूर्व और उत्तर हैं, इसके दो-दो तारे मिल कर कुल चार होते हैं।
‘जुड़वा मछली‘
ताला के रूद्र शिव की मूछें और पुस्तक में दिए गए चित्रों में

बात राम-रामायण की तो एक कदम और आगे बढ़ें। छत्तीसगढ़ दक्षिण कोसल है, माता कौसल्या का मायका और रामजी का ननिहाल, राम हमारे भांजे। भांजे-भांजियों को देव-तुल्य मान, मामा का पैलगी करना, छत्तीसगढ़ में अब भी अन्य अंचलों की तुलना में अधिक प्रचलित है। फिर राम वनवास का लगभग समय दंडकारण्य में बीता। और कितने ‘प्रमाण‘ चाहिए, इन सबके मद्देनजर छत्तीसगढ़वासी हम- कोरिया, चीन, अयोध्या, राम से कितने करीब जुड़ जाते हैं। किसी को यह दूर की कौड़ी लगती है तो लगती रहे, उसकी बला से। 

राकेश जी सारे दौर-दौरे का मूल्यांकन करते चलते हैं, ज्यों- 
‘... 31 अक्टूबर, 1984 को दिल्ली में मिलने का आह्वान किया गया। उस दिन के आन्दोलन और सभा ने हम पर गहरा असर डाला। सिंघल जी के उद्घोष के साथ वर्मा जी की अयोध्या वाली ‘श्रीराम विषयक‘ संगोष्ठी की लय-ताल साफ-साफ समझ में आने लगी। अब तक चल रही ‘अयोध्या जी‘ और ‘श्रीरामजी‘ की ऐतिहासिकता की अकादमिक बहस से आस्था और धार्मिक परिप्रेक्ष्य की तरफ बढ़ रही जिरह अब बड़े जोर-शोर से चल पड़ी ‘श्रीराम जन्मभूमि‘ और ‘रामलला‘ को मुक्त कराने की मुहिम की दिशा में।‘ ... ... ... ‘ताला खुलने के बाद पूरे देश का वातावरण ‘राममय‘ होने के साथ ‘अयोध्या जी‘ और ‘श्रीरामजी‘ की ऐतिहासिकता की जिरह किनारे रह गई। ‘राम जन्मभूमि-मुक्ति‘ का धार्मिक और राजनैतिक मुद्दा सर्वोपरि हो गया।‘ ... ... ... ‘उधर साझा बेड़े पर सवार महारथियों में से राम-रहीम एक ही मानने वाले ‘राजा नहीं फकीर‘ बाबू विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधानमंत्री के सिंहासन पर विराजे।‘ -(लेखक के शब्द चयन पर आपका भी ध्यान गया ही होगा- राजा मांडा विश्वनाथ प्रताप सिंह के लिए राजा नहीं फकीर और प्रधानमत्री की कुरसी पर बैठे, नहीं सिंहासन पर विराजे।) ... ... ... अगले आम चुनाव में राजीव गांधी की हत्या के बाद उपजी सहानुभूति की लहर में श्री पी.वी. नरसिम्हा राव देश के प्रधानमंत्री और कारसेवकों पर चली गोली के जवाब में भारतीय जनता पार्टी के श्री कल्याण सिंह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद पर आसीन हो गए। ... उपर्युक्त घटनाक्रम के बीच अध्यादेश में शामिल ‘विवादित परिसर‘ में कभी मन्दिर रहे होने के रहस्य ने हमें अपने सम्मोहन-पाश में बाँध लिया।‘

इस दौर के राजनैतिक घटनाक्रम, जिसमें शाहबानो प्रकरण भी है, जो प्रत्यक्ष परोक्षतः मामले को प्रभावित करते रहे, राकेश जी हवाला देते चलते हैं। ... ‘इस तरह ‘अजुधिया जी‘ और ‘रामजी‘ के सन्दर्भ में ‘बाबरी मस्जिद‘ से जुड़ी आस्था-धर्म-परम्परा के अतिरिक्त ‘महात्मा बुद्ध‘ के अनुयायियों की आस्था भी ‘राजनीतिक खिलाड़ियों‘ के चौसर की बिसात वाले पासों में तब्दील कर दी गई।‘

इसी तरह उल्लेख करते हैं कि फैजाबाद के जिला जज कृष्ण मोहन पांडेय ने अपनी आत्मकथा में लिखा है- ‘जिस रोज मैं ताला खोलने का आदेश लिख रहा था, मेरी अदालत की छत पर एक काला बन्दर पूरे दिन फ्लैग-पोस्ट को पकड़कर बैठा रहा। वे लोग जो फैसला सुनने के लिए अदालत आए थे, उस बन्दर को फल और मूँगफली देते रहे, पर बन्दर ने कुछ नहीं खाया। चुपचाप बैठा रहा। फैसले के बाद जब डी.एम. और एस.एस.पी. मुझे घर पहुँचाने गए तो मैंने उस बन्दर को अपने घर के बरामदे में बैठा पाया। मुझे आश्चर्य हुआ। मैंने उसे प्रणाम किया। वह कोई दैवीय ताकत थी।‘

किताब में आई लेखकीय टिप्पणियों के कुछ नमूने- ‘25 सितम्बर को श्री लालकृष्ण आडवाणी सोमनाथ से चलकर दस हजार किलोमीटर लम्बी रथयात्रा तय करके 30 अक्टूबर, 1990 को अयोध्या पहुँचने के इरादे से निकल पड़े। मतलब सत्ता कब्जियाने के अखाड़े में मंडल-कार्ड के मुकाबिल मन्दिर वाले कमंडल का दंगल शुरू हो गया।‘ ... ... ... ‘30 अक्टूबर से 2 नवम्बर, 1990 के बीच पूरे देश का ध्यान अयोध्या की गतिविधियों पर सधा रहा। इस बीच तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह द्वारा निर्गत विवादित स्थल के अधिग्रहण सम्बन्धी अध्यादेश में यह भी शामिल था- ... वहाँ कभी मन्दिर था-या नहीं- यह रहस्य सुलझाने का काम सुप्रीम कोर्ट को सौंपा जाएगा।‘

इसी तरह मामला राजनेताओं, हिंदू-मुस्लिम पक्षधरों से होते हुए न्यायालय तक फिर पुरातत्व विभाग पर आ जाता। पुरातत्व-इतिहास से जुड़े अध्येता यह अच्छी तरह समझते हैं कि वे साधन-उपकरण हैं, कंधे हैं। ऐसे में कुछ इसका लाभ उठाने के फिराक में रहते हैं, उनका अपना एजेंडा साथ-साथ दौड़ने लगता है और सफल भी होते हैं। कोई अपनी जिम्मेदारी निभाते खुद को पाक-साफ और सुरक्षित रख पाता है तो ऐसे भी हैं, जो लपेटे में आते हैं, और जैसा वे लिखते हैं- ‘... दोनों समुदायों के लोग बेचारे इतिहासकारों को उनकी तरफ से ऐतिहासिक सुबूत पेश करने को कहते हैं।‘

इस संदर्भ में लेखक की कुछ टिप्पणियां देखने लायक हैं- ‘जहां तक हमारी जानकारी है दुनिया भर में शायद ही कहीं किसी मसले को सुलझाने के लिए अदालत ने पुराविदी खुदाई का सहारा लिया होगा!‘ ... ‘थोड़ी ही देर के लिए सही हमें अपनी महत्ता पर फूले रहने का दुर्लभ अवसर मिला, वरना आम तौर पर टुटहे बर्तन बटोरने और खंडहरों में माथा फोड़ने वाले पुराविदों को इन महकमों के लोग भाव ही कहाँ देते हैं।‘ ... ‘रोशन होने लगे भू-खोदना पुराविद्‘ ... ‘मन्दिर-मस्जिद मसला गरमाते जाने के साथ पुराविदों-इतिहासकारों में छिड़े वाद-विवाद और प्रतिवादों के चलते सारे देश में पुरातात्विक शोध और ‘पुरातत्व विभाग‘ की अहमियत उन्मान चढ़ती गई।‘ ... इस संदर्भ में पुराविदों के योगदान के लिए उनकी पीठ ठोंकी गई।‘ ... कुल मिलाकर इस विवाद के चलते इतिहासकारों, पुराविदों, ‘भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण’ और सरकार की गर्दन फंस गई ‘भूत’ की रसरी में। 

'पुराविदी खुदाई' का जिक्र आने पर ‘उदयन दास हत्या कांड‘ प्रसंग को याद लेना चाहिए। जिसमें उदयन ने 2010 में अपने ही माता-पिता की हत्या कर, उन्हें रायपुर घर के लॉन में दफना दिया था, पुनः 2016 में अपनी प्रमिका की भोपाल में हत्या की और सीमेंट का चबूतरा बना कर दफन कर दिया था। 2017 में खुलासे के बाद 2020 में पश्चिम बंगाल की अदालत ने उम्र कैद की सजा सुनाई और 2023 में रायपुर की अदालत में उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। पुराने कब्रगाह, महाश्मीय सभ्यता के कबर-खोदू, यहां पुराविदी खुदाई के लिए तब ‘सीन‘ में आए, जब उदयन की निशानदेही पर उसके रायपुर वाले निवास के लॉन में हत्या कर दफनाए उसके मां-पिता के शव की बरामदगी के लिए सुबह-सुबह खुदाई शुरू हुई। खुदाई जेसीबी से हो रही थी, भीड़ जुटी थी, मीडिया चैनलों पर लाइव प्रसारण हो रहा था। यह सब कुछ देखते हुए रायपुर के तत्कालीन पुलिस महानिरीक्षक श्री प्रदीप गुप्ता को चिंता हुई कि डेड बॉडी के साथ सबूत सुरक्षित करने में समस्या आ सकती है। उन्होंने मुझसे फोन पर संपर्क किया और पूछा कि पुरातात्विक खुदाई के लिए कुछ प्रशिक्षित कामगर मिल सकते हैं, मेरा जवाब सकारात्मक था, मगर जब उन्होंने मामला बताया और कहा कि ऐसे लोग तुरंत चाहिए तो इस पर मैंने स्पष्ट किया कि कामगर कितना भी प्रशिक्षित हो ऐसे मामले में काम नहीं आएगा, तो रास्ता भी सुझाना पड़ा। छत्तीसगढ़ पुरातत्व संचालनालय के मेरे सहकर्मी और खुदाई के काम के सबसे अनुभवी प्रभात सिंह को इसके लिए कहा, इस निर्देश के साथ कि यदि इस काम में परेशानी महसूस हो तो बता दें, विनम्र असमर्थता प्रकट करने में मुझे तनिक हिचक न होगी। वे अपने सहयोगी प्रवीण तिर्की के साथ तैयार हुए। तब तक हुई खुदाई के स्ट्रेटा के आधार पर शव के दफन होने का ठीक-ठीक अनुमान किया, जो सटीक साबित हुआ। इस तरह इन दो खेदकों ने अपने अनुभव और तकनीकी योग्यता, कार्य-कुशलता के साथ काम संपन्न कराया और श्री गुप्ता से प्रशस्ति पत्र पाने के हकदार बने। बाद में प्रभात जी ने बताया कि संयोगवश कुछ दिनों से वे ‘burial excavation‘ पढ़ते हुए सोच रहे थे, न जाने इसका अवसर कब मिलेगा, मिलेगा भी कि नहीं, एतदर्थ उन्होंने मेरे प्रति आभार जताया। 

यहां ‘इतिहासकारों, पुराविदों, और ‘भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण’ की गर्दन फंस गई ‘भूत’ की रसरी‘ के दो प्रसंगों को भी याद कर लेना प्रासंगिक होगा। 2007 के रामसेतु विवाद में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के निदेशक श्री चन्द्रशेखर द्वारा सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दिया गया था, जिसमें रामसेतु के मानव-निर्मित होने को खारिज किया गया था। इसे धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाला माना गया। विवाद बढ़ने पर सरकार ने हलफनामा वापस ले लिया और सरकार के ‘निर्देशों का ठीक से पालन‘ नहीं किये जाने के परिणामस्वरूप, चन्द्रशेखर और सहायक निदेशक वी. बख्शी को निलंबित कर दिया गया था। लगभग तीन महीने बाद निलंबन वापस लेते हुए इन अधिकारियों की बहाली कर दी गई।

दूसरा मामला 2013 का है, जिसमें स्वामी विरक्तानंद उर्फ संत शोभन सरकार ने अपने सपने के आधार पर उन्नाव जिले के डौंडिया खेड़ा गांव के रामबक्स सिंह के ऐतिहासिक किले के नीचे भारी मात्रा में सोने का खजाना होने का दावा था। शोभन सरकार के सपने का सम्मान करते भारत सरकार ने पुरातत्व विभाग को काम पर लगा दिया। लगभग महीने भर की खुदाई के बाद ‘मिल जाए तो मिट्टी है, खो जाए तो ...‘ जैसी बात हुई। सपना संत का था, झूठा तो हो नहीं सकता, संभव है ‘अपात्रों‘ के हाथ लगने के पहले सोना मिट्टी हो गया हो। संयोगवश इस काम से संबद्ध अधिकारी श्री प्रवीण मिश्रा जी रायपुर से स्थानान्तरित हो कर गए, मेरे परिचित थे, इसलिए पूरे खुदाई अभियान की परत-दर-परत जानकारी मुझे व्यक्तिगत रूप से भी मिली। ‘सुनहरे‘ सपने के आधार पर खुदाई का यह विश्व का अनूठा मामला पुरातत्व के इतिहास में सदैव के लिए दर्ज हो गया।

आगे बढ़ते किताब से कुछ और अंश देखते चलें-
# फिर, भला बचपन से ही भगवा ध्वज को नमन करने वाले ‘नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे...‘ गाने और दंड-सलामी करने वाले ... 
# अपने वक्त के नामचीन दानिशमन्दों में शुमार सर्वपल्ली गोपाल और उनके सह-लेखकों ने हिन्दू पक्ष की अयोध्या, रामजी और जन्मस्थान से जुड़ी दलीलों को छिन्न-भिन्न करने के लिए स्वाध्याय और शोध के तपोबल से अर्जित अपने तरकश के दिव्य तीरों की बरसात करने में कोई कसर नहीं छोड़ी-
# गोली-कांड-अयोध्या और रामजी के नाम पर चल रहे सियासी नृत्य की ताल-बेताल नृत्य-पदी में ‘विवादित ढाँचे की जगह कभी मन्दिर रहे होने के सवाल‘ में उलझकर हम उस मसले से अपने सरोकारों के बारे में भूल ही गए।
# दूर-दूर तक खलबली मचा दी अयोध्या के विवादित-स्थल से प्राचीन मन्दिर अवशेष मिलने की खबरों ने। मन्दिर और मस्जिद के पैरोकारों के अखबारी-आग में दोनों तरफ से भर-भर मूठी लोबान झोंका जाने लगा। 
# देर से ही सही, पगहा तोड़ाकर उछलते बछेड़ों के पाँव किस तरह पगहों में छानकर चाकरी के संस्कारों में जकड़े जाते हैं सिस्टम में समाहित उसकी प्रक्रिया समझ में पैठने लगी।
# हमारी कल्पनाओं की लटाई पर ढील पाई कनकइया खुले आसमान में लहराने लगी।

इस ‘लटई-कनकइया‘ पर मेरी टिप्पणी कि खासकर पूर्वी उत्तर प्रदेश की ‘खिचड़ी-मकर संक्रांति‘ के पेंच लड़ाने से अच्छी तरह परिचित न हों, शायद उन्हें इसका आनंद न मिल सके। यह लटई समानार्थी है परेता, लपेटा या चकरी का और कनकइया यानी गुड़डी-पतंग। इसका रस सिर्फ शब्दों के समानार्थी में नहीं, यादों में है, जिसमें कभी आपने पतंग को ढील दी हो और उसे मौज में लहराते देखा हो। 

प्राचीन इतिहास के उद्भट पंडित, डॉ. विश्वम्भर शरण पाठक (अधिकतर इनका नाम विशम्भर लिखने की भूल होती है।) के हवाले से महत्वपूर्ण भाषाशास्त्रीय विमर्श पुस्तक में शामिल है, इस तरह- ‘यह सुनकर उन्होंने कहा-‘अच्छा! एक सूत्र मैं बताता हूँ। भाषा-शास्त्रीय दृष्टि से इस क्षेत्र में कुछ ऐसे शब्द बोले जाते हैं जिनकी व्युत्पत्ति न तो वैदिक व्याकरण के नियमों से और न ही शास्त्रीय व्याकरण की सहायता से सिद्ध होती है।‘ उदाहरण के लिए यहाँ दो शब्द लिये जा सकते हैं- ‘साकेत‘ और ‘श्रावस्ती‘। पुराणों के अनुसार ‘श्रावस्ती‘ की स्थापना ‘श्रावस्त‘ ने की थी किन्तु ‘श्रावस्त‘ के अर्थ क्या हैं? पूर्व इंडो-यूरोपियन भाषा में पाँच मूल स्वर थे-अ, इ, उ, अय, अव। कालान्तर में पाणिनि का सूत्र बन गया- ऐचोऽयवायावः, अर्थात अऽइ = अय, और अऽव = अव। यह बाद का विकास है।‘ ... पाठक जी जैसे मूर्धन्य भाषा-शास्त्रीय विशेषज्ञ से ‘वैदिक संस्कृत‘ से भी पहले की भाषा रहे होने के अनुमान का ज्ञान हुआ।‘

इसके साथ भाषा संबंधी एक अन्य उल्लेख, 1.2.2003 को जारी सम्मन का है- ‘इस सम्मन में इस्तेमाल किये गए इन लफ्जों के मायने हमारे दफ्तर में कोई नहीं बता पाया-‘मुद्दालेह, हरगाह, मिन जामिन, मजकूरावाला, असालतन, बतारीख, इरसाल, जादराह, उज्र, मजमुआ, मरकूल, सहादत, मुतसव्वर, मजकूर, मरकूम वाल्दा, मजकूरा मुबलिग‘। ... सोचने लगा- ‘आम लोगों को तलब करने के लिए अदालतों से जारी होने वाले हुक्मनामों (सम्मनों) की इबारत इतनी मुश्किल क्यों होती है। इसमें इतने कठिन लफ्ज क्यों इस्तेमाल किये जाते हैं! जिसके सही-सही मायने समझने के लिए भी किसी आलिम मौलवी साहब की मदद लेनी पड़े। पता नहीं कब से सँजोयी जा रही है यह रवायती जबान! क्यों नहीं इसे सुधारकर सबके समझने लायक सरल बना दिया जाता। कहाँ तो गोहार लगती है अंग्रेजी की जगह हिन्दी की और कहाँ तो यहाँ देवनागरी लिपि में जारी हो रहे हुक्मनाओं की यह भाषा!‘

राकेश जी लिखते हैं- ‘अच्छे शोधकर्ता और अच्छे वकील प्राइमरी सोर्स (मूल स्रोत) की तसदीक किये बिना पूरी तरह से मुतमईन नहीं हो पाते।‘

उनकी इस बात को कुछ आगे बढ़ा कर देखें। यह बात ‘प्रमाण विचार‘ की तरह है, चाहे वह कानून हो शोध हो या दर्शन। कानून में बतौर सबूत-आधार फौजदारी हो तो प्राथमिकी, चश्मदीद, परिस्थितिजन्य, अन्य सहायक परिपार्श्विक तथ्य। दीवानी में यही मूल दस्तावेज, अन्य संबंधित कागजात और उसके बाद प्रकरण से जुड़े व्यक्तियों के बयान होते हैं। संक्षेप में मौखिक, दस्तावेजी और भौतिक। अकादमिक शोध-प्रविधि में यही क्रम होता है। इसलिए उत्खनन में कई बार दैनंदिनी, प्राथमिक प्रविष्टि पंजी की जांच-खोज की जाती है, संक्षेप में प्राथमिक और द्वितीयक, जो यथाआवश्यक मात्रात्मक और गुणात्मक होते हैं। दर्शन के क्षेत्र में, विशेष कर न्याय, चार्वाक में कहा जाता है- ‘प्रत्यक्षं किं प्रमाणं‘ या अद्वैत का ‘हस्तामलक‘। पद्मभूषण से सम्मानित हमारे गुरुजी मधुसूदन ए ढाकी जी, विचारों में खुले, व्यवहार में गंभीर-से, कठोर श्वेताम्बर जैन-व्रती, संभवतः जैन चिंतन परंपरा के आधार पर कहते थे ‘प्रमाणं स्वपरभासी, सत्यं वाद विवर्ज्यते‘। बहरहाल, इस क्रम में प्रत्यक्ष के आगे अनुमान, उपमान, शब्द, अर्थापत्ति और अनुपलब्धि निर्धारित है। अयोध्या राम जन्मभूमि और राम मंदिर के संदर्भ में प्रमाण अनुपलब्धता के लिए Absence of evidence is not evidence of absence कहावत, प्रासंगिक है। इसी तरह कहा जाता है- देर ही अंधेर का कारण है और इसके विपरीत यह भी कि जल्दी का काम शैतान का, धीरे-धीरे रे मना ...। अयोध्या प्रकरण से जुड़े रहे ए.के. शर्मा जी ने अपनी पुस्तक AYODHYA CASE Archaeological Evidences में उल्लेख किया है- Justice delayed is justice denied.

इस पूरे प्रकरण का महत्वपूर्ण दुर्लभ स्रोत, पुस्तक के षष्टम सोपान के 11. ‘परिशिष्ट-क‘ पर ‘अयोध्या का विष्णुहरि मन्दिर शिलालेख‘ भावानुवाद सहित प्रकाशित है। इस अभिलेख के पाठ में थोड़ा-बहुत अन्तर होने के बाद भी इसके मिलने से बारहवीं शताब्दी में अयोध्या में ‘विष्णुहरि‘ का भव्य प्रस्तर मन्दिर निर्मित कराया जाना सुनिश्चित रूप से सिद्ध हो गया। 

इन सबके बावजूद अयोध्या और राम की प्राचीनता के लिए निष्कर्ष पर पहुंचते हुए लिखते हैं- ‘कुल मिलाकर भूगर्भीय, पर्यावरणीय और पुरातात्त्विक शोधों तथा प्राचीन साहित्य से मिले समेकित तथ्यों के प्रकाश में ‘शतपथ ब्राह्मण उपाख्यान‘ के बल पर फुलाया गया गहन वनों वाला गुब्बारा अब तक पूरी तरह से फूट-फाट चुका है। और अब, गंगा घाटी का प्राचीन कालीन नजारा निरखने के लिए चाहिए नया नजरिया। इस सिलसिले में संगत शोध-प्रकाशनों के सन्दर्भ देखे जा सकते हैं। ... थोड़े में कहें तो पिछले पाँच दशकों की खोजों से गंगा-घाटी की प्राचीन मानव-सभ्यताओं की तसवीर पूरी तरह बदल चुकी है। इसलिए ‘रामजी की अजुधिया‘ की बसावट और प्राचीनता पर भी इस बदली हुई अद्यतन स्थिति की पृष्ठभूमि में विचार करना अधिक युक्तिसंगत होगा।‘

वे लिखते हैं- इस या उस पार्टी या स्वतंत्र या निरपेक्ष विचारधारा से जुड़ा होना कोई बुरी बात नहीं, किन्तु किसी विशेष विचारधारा के राजनीतिक प्रयोग के लिए दोषपूर्ण तर्कों के बल पर उलटी-सीधी ‘दलीलें‘ देना किसी भी तरह से ठीक नहीं ठहराया जा सकता। ... राजनीतिक या अन्य किन्हीं भी कारणों से ऐसा करने वालों को न तो अवांक्षित और अतिरिक्त प्रशंसा-अनुशंसा मिलनी चाहिए, और न निन्दा, न प्रताड़ना। ऐसी उपलब्धियों के माध्यम से मन्दिर-पक्ष को मजबूत करने का श्रेय लेना या देना किसी तरह श्रेयस्कर नहीं। ... उपर्युक्त सन्दर्भ में ‘रामजी‘ की कृपा से अपने राम बहुत भाग्यशाली रहे। बारह वर्ष से कुछ अधिक लम्बे समय तक किसी भी सरकार ने अयोध्या-विवाद के पक्ष या प्रतिपक्ष में कुछ भी लिखने के लिए न तो कभी कोई दबाव डाला और न प्रोत्साहित ही किया। संस्थाओं और उनमें कार्यरत व्यक्तियों की विश्वसनीय बनाए रखने के लिए ऐसा ही करना समुचित भी है। साथ ही यह भी कि- ‘अपने लाभ‘ के लिए मौके के हिसाब से तोल-मोल कर बोलना छोटे-बड़े किसी के भी लिए शोभनीय नहीं। यदि ऐसा किसी पद के दायित्वों का निर्वहन करते हुए किया जाए तब तो बिलकुल भी नहीं। कोर्ट या सरकार के आदेश से वैसा ही करना चाहिए जैसा किया जाना तकनीकी और अकादमिक दृष्टि से तथ्यात्मक और निष्पक्ष हो। ऐसा करके कोई किसी पर तनिक सा भी ‘उपकार‘ नहीं करता, वैसा तो उन्हें करना ही चाहिए। उसके लिए अतिरिक्त लाभ की लालसा, जतन या अनुकम्पा पाना या देना पद-भ्रष्ट होने का द्योतक है।'

निष्कर्ष पर पहुंचते हुए पुस्तक के और कुछ अंश, जिनसे लेखक-पुस्तक के नजरिए को साफ समझा जा सकता है- # कुछ को छोड़ कर दोनों तरफ के अकादमिक सूरमा साफ तौर पर दुराग्रह की सीमा लांघकर राजनीति के रावण दरबार में अंगद के पांव अड़ाने का प्रहसन करते हुए अपने-अपने तर्कों-कुतर्कों के साथ लामबन्द दिखने लगे।
# विभिन्न उद्धरण-प्रसंगों में आए कुछ महत्वपूर्ण उल्लेख- ‘अयोध्या मुद्दा ‘आस्था‘ से संबंधित है ‘तथ्यों से नहीं‘ जो कि इस पूरे प्रयास की उपयोगिता पर सवालिया निशान लगा सकता है।‘ और ‘पुरातत्व एक सामाजिक विज्ञान है न कि प्राकृतिक विज्ञान। पुरातात्विक खोजें व्याख्याओं की एक विस्तृत श्रृंखला के अधीन होती हैं।‘
# पुनः ‘अयोध्या का मसला इतिहास द्वारा अन्तिम रूप से तय नहीं किया जा सकता। इसे पुरातत्व द्वारा भी तय नहीं किया जा सकेगा। खुदाई से केवल और अधिक भ्रम उत्पन्न हो सकता है।‘
# इसी तरह ‘ए.एस.आई. जैसी संस्था जिस पर एक वक्त में मुल्क को जायज नाज रहा है कि कारगुजारी के बारे में ऐसा कहने के लिए मजबूर होना तकलीफदेह है।
# उन्होंने ऐसा केवल निरपेक्ष मूल्यों के प्रति निष्ठा के कारण किया।
# अब जबकि खुदाई निराशजनक साबित हो चुकी है अचानक फिर से सुलह की माँग सुनाई पड़ने लगी है। वक्त और परिस्थितियाँ दोनों ही इस माँग को सन्दिग्ध बना देते हैं। अब जबकि सब कुछ खोदकर नष्ट कर दिया गया है, क्यों न कोर्ट के आदेश का इन्तजार किया जाए और उसका पालन किया जाए?‘
# जैसा कि पहले ही उल्लेख किया गया है उनकी सामाजिक संरचना, पारिवारिक मूल्यों, जीवन दर्शन, भाषा-बोली आदि के बारे में केवल अनुमान लगाने के यत्न ही किये जा सकते हैं।

हर सफर का अपना रोमांच होता है, वह देश का हो या काल का। छत्तीसगढ़ के लोग लंबी यात्राओं और प्रवास पर जाते, अपने अनुभव से कहते हैं- परदेस जाए अउ रुख चढ़े एक बरोबर‘, परदेश जाएं या पेड़ पर चढ़े हो, अनिश्चितता के अधर में होते हैं। लेकिन इसी अनिश्चितता के रोमांच में सफर का रस होता है। ‘जिरह अजुधिया‘ के इस सफर में बेपरवाह-से जान पड़ते, घुमक्कड़ी करने वाले राकेश तिवारी का साथ है, फिर सफर कितना भी अनजाना, लंबा और दुर्गम हो, उलझाव, भटकाव और थकान में भी मौज बनी रहती है। अंततः समझ में आता है कि राकेश जी की ओर से यह आना सबसे जरूरी था, जिन्होंने अपने अंचल और संस्कारों के साथ पुरातत्व इतिहासकार के रूप में कर्मभूमि के प्रति सजग-जिम्मेदारी सहित न्याय किया है, और इसमें अपनी प्रामाणिकता और विश्वसनीयता को सर्वोपरि रखा है। यह उनकी कलम-तोड़ जैसी रचना है, मगर वे लगातार सक्रिय हैं, सक्रिय बने रहें, कलम टूट-छूट जाए तो की-बोर्ड पर या अपने ‘गुरु‘ नागर जी की तरह बोल-बोल कर लिखते-लिखाते।

‘पक्का पक गए होंगे आप अब तक के वाद-प्रतिवाद-विवाद और तोहमतों वाली अदालती कारगुजारी से। मगर इतने उलझे हुए झमेलों की तह में उतरने के लिए इतना तो झेलना ही पड़ेगा।‘ पुस्तक में आए न्यायालयीन बयानों, वकीलों, पुराविदों के तर्क-वितर्क, खंडन-मंडन, शुष्क विवरण से बोझिल होते मसौदे का ध्यान रखते हुए राकेश जी ऐसा स्वयं लिखते हैं पर नायाब कहन, लय रवानी के लिए शब्दों का चयन, जिसमें आंचलिकता का पुट है, के माध्यम से, अधिकारी खुद को इसानी नजरिए से देखता है और लेखकीय नजरिए से कलमबद्ध करते हुए नान फिक्शन को फिक्शन की रवानी दे देता है, यह कहते हुए कि- ‘... देश का नागरिक होने के नाते अपने उद्गारों के बारे में भी दो बातें कर लेने की प्रासंगिकता के लिए।‘

हमने बारीकी से पढ़ा, यों ही तारीफ का हवाई पुल, कहे तो फ्लाईओवर नहीं बांध दिया है। इस दौर में छपाई सुगम हो गई है, लेकिन शुद्धि-पत्र का प्रचलन नहीं रहा, जबकि प्रूफ की अशुद्धियां आम हो गई हैं। ऐसे में इस पुस्तक लगभग अशुद्धि-प्रूफ है ही और पाया कि कॉपी एडिटिंग, पेज-सेटिंग, ले-आउट भी बढ़िया है। यह उल्लेख आवश्यक जान पड़ता है कि अब, जबकि ‘पुरातत्त्व‘ को ‘पुरातत्व‘ लिखा जाना सामान्य प्रचलन में है, यहां वह पुरातत्त्व ही रखा गया है। (लगभग कहना इसलिए वांछित कि पेज 358, पंक्ति 24 पर ‘अवांक्षित‘ संभवतः अवांछित होगा। दो अन्य बिंदु- पेज 134 पर ‘संस्थान के प्रशिक्षुओं में...‘ कुछ नामों के साथ स्व. जुड़ा है, यह स्व., स्वर्गीय है तो आशय यही होगा कि कुछ स्वर्गीय भी प्रशिक्षु थे। इसी तरह पेज 141 पर आया नाम ‘डॉ. गएन्द्र, जो शायद गजेन्द्र या ज्ञानेन्द्र हो और पेज 274 पर ऐक्ट, न कि एक्ट, ध्यान देने पर स्पष्ट हो गया कि पेज 134, 141 और 274 की ‘अशुद्धियां‘ उद्धृत किए जाने के कारण हो सकती है, जिसे यथावत रखा गया है।)

इस किताब पर कुछ और उद्धरण/अच्छी बातें लिखना चाहा, मगर आभार में अपना नाम देख कर संकोचवश ठिठक गया कि जवाबी आभार न मान लिया जाए। मगर मुरव्वत नहीं, पकने की बात तो खुद लेखक कहता है और ‘एक बार दुहरा देना प्रासंगिक होगा‘ कहते हुए, प्रसंगवश ही सही कुछ अंशों में दुहराव-तिहराव है। पेज 135 फेसबुक पर- ‘इस जिरह की पिछली पोस्ट ...‘ का उल्लेख पा कर किताब का पाठक, प्रसंग का जोड़ नहीं बिठा पाता और अनजान पाठक के लिए बात तब खुलती है, जब अंत में ‘आभार‘ में पाता है कि इसे किस्तों में फेसबुक पर लिखा जाता रहा है। अब अधिकतर प्रकाशन, सोशल मीडिया की सामग्री को अपनाने लगे हैं, दूसरी तरफ अभी भी कुछ प्रकाशन समूह हैं जो ऐसे किसी प्लेटफार्म पर आ चुकी सामग्री को पूर्व-प्रकाशित मानते, अछूत वाला व्यवहार करते हैं। ऐसे में फेसबुक पर लिखी गई इस श्रृंखला का पुस्तक रूप में प्रकाशन, उल्लेखनीय है।

प्रसंगवश,
ऊपर श्री ए.के. शर्मा (अरुण कुमार शर्मा) की किताब AYODHYA CASE Archaeological Evidences का जिक्र है। श्री शर्मा, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के उत्खनन शाखा के अधिकारी रहे हैं। सेवानिवृत्ति के पश्चात विभिन्न उत्खनन परियोजनाओं का संचालन किया। छत्तीसगढ़ सरकार में पुरातत्व के मानद सलाहकार रहते हुए मुख्यतः सिरपुर तथा अन्य स्थलों की सर्वेक्षण, खुदाई, अनुरक्षण आदि कार्य कराया और इसी दौरान 2017 में पद्मश्री से सम्मानित हुए। राम जन्मभूमि उत्खनन और न्यायालयीन प्रक्रिया के उनके अनुभव-संस्मरण मुझे प्रत्यक्ष सुनने का मौका मिला, जिसमें वे मुझे वकीलों की तरह प्रति-परीक्षण का अवसर देते थे। उनसे जिरह के लिए मुझे स्वयं घटनाक्रम, मत-मतांतर की जानकारी के लिए मुझे लगातार सजग रहना होता। उनकी पुस्तक प्रकाशित होने पर उन्होंने सत्पात्र मानते उन्होंने कृपापूर्वक पुस्तक की सौजन्य प्रति मुझे दी थी। ‘जिरह अजुधिया‘ पढ़ने की तैयारी में, इस पुस्तक का पढ़ा होना, बहुत काम का साबित हुआ। इस पुस्तक की संक्षिप्त चर्चा यहां आवश्यक मानते- 

श्री शर्मा, पुस्तक के आरंभ में लिखते हैं कि- अयोध्या के मामले में, नियमित प्रक्रिया के बजाय माननीय उच्च न्यायालय ने पहली बार जल्दबाजी दिखाई, हालांकि यह मामला 1949 से अदालतों में लंबित था। फलस्वरूप भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के महानिदेशक को अपनी विशेष शक्तियों का प्रयोग करते हुए, निर्णय लेने का अवसर दिया। साथ ही माननीय न्यायालय का दूसरा अभूतपूर्व आदेश था कि ‘खुदाई पूरी होने की तारीख से एक सप्ताह के भीतर रिपोर्ट प्रस्तुत की जाए‘। किसी भी बड़े पैमाने की खुदाई की रिपोर्ट लिखने में, जिसमें हड्डियों की जांच, मिट्टी और मोर्टार के नमूनों की रासायनिक जांच आदि सहित सभी पहलुओं को शामिल किया जाता है, सामान्यतः कम से कम बारह से सोलह महीने लगते हैं। तीसरा, अभूतपूर्व आदेश खुदाई के अंतिम चरण में टीम लीडर को बदलने का था, जबकि माननीय न्यायालय को यह पूरी तरह से पता था कि मूल टीम लीडर के नेतृत्व में ही पूरी खुदाई की गई थी और वही क्षेत्र के सभी तकनीकी विवरणों से अवगत है। यह न्यायालय के अनुरूप रवैया नहीं था। यह खेदजनक है कि तत्कालीन भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के महानिदेशक ने इसका विरोध नहीं किया, क्योंकि टीम लीडर की नियुक्ति उन्होंने की थी, न कि माननीय न्यायालय ने। यह गलत धारणा कि न्यायपालिका कुछ भी कर सकती है, और वह भी तकनीकी मामलों में, न्याय के हित में दूर की जानी चाहिए, क्योंकि वे सभी विषयों के ज्ञाता नहीं हैं। माननीय उच्च न्यायालय के आदेशों के तहत, श्रम संरचना में भी, धार्मिक (मुस्लिम श्रमिक) कोटा पहली बार दुनिया भर में किसी भी पुरातात्विक उत्खनन में लागू किया गया था।

श्री शर्मा यह भी बताते हैं कि 3 अगस्त 2003 को, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण में मेरे पूर्व सहकर्मी डॉ. एस.पी. गुप्ता और श्री के.एन. दीक्षित ने नई दिल्ली में मुझसे संपर्क किया और पूछा कि क्या मैं अयोध्या में खुदाई स्थल पर जाकर, खुदाई से प्राप्त अवशेषों का निरीक्षण कर सकता हूँ और अपनी राय दे सकता हूँ। मैंने तुरंत सहमति दे दी क्योंकि यह मेरे जीवन का अवसर था, जिसमें बहुत समय से लंबित जटिल समस्या के समाधान के लिए अपना ज्ञान और बुद्धिमत्ता साझा करना चाहा।

इस सचित्र पुस्तक में अन्य ढेरों संदर्भों के साथ न्यायालयीन प्रकरणों की क्रमवार जानकारी और उनमें उठाए गए मुद्दों की जानकारी है। इसमें 23 दिसंबर 1949 को अयोध्या पुलिस थाने में दर्ज FIR-प्राथमिकी से आरंभ क्रमशः 1950, 1959 के ‘suit-वाद‘, 30 जुलाई 1953 का आदेश, सिविल जज, फैजाबाद का आदेश, 18 दिसंबर 1961 का वाद, 6 जनवरी 1964, 23 अगस्त 1990 का आवेदन, अप्रैल 1993 में भारतीय जनता पार्टी द्वारा अयोध्या और राम मंदिर आंदोलन पर जारी श्वेत पत्र, उच्चतम न्यायालय का आदेश 24 अक्टूबर 1994 ... आदि का संक्षिप्त विवरण/उद्धरण है। इस पुस्तक का अन्य महत्वपूर्ण पक्ष भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण उत्खनन प्रतिवेदन की संक्षेपिका और उस पर अदालती फैसला है।