Sunday, August 30, 2026

रस्किन बॉन्ड

जीवन को अक्सर अभिनय की तरह देखा जाता है तो कुछ इसे कथा की तरह देखते हैं। अभिनय में आप स्वयं होते हैं, कथा में आप और आपका इर्द-गिर्द, व्यक्ति और परिवेश कमोबेश एक सी भूमिका निभाने वाले पात्र हो जाते हैं। कथा या गल्प- मनोहर श्याम जोशी के हवाले से- ‘‘स्व. हजारी प्रसाद द्विवेदी मौज में आकर ‘गप्प‘ को गल्प का पर्याय बता देते थे। उनकी इच्छा थी कभी सुविधा से कोई ‘माडर्न गप्प‘ लिखने की।‘‘ रस्किन लिखते हैं- ‘‘फिर भी, मुझे लगता है कि किस्से सुनाने के बारे में आया से मैंने कुछ सीखा है, और उस्मान से भी, हालाँकि मुझे मालूम नहीं था कि किसी रोज मैं भी एक तरह का गपोड़ी बन जाऊँगा।‘‘ यह उनकी आत्मकथा के प्रभात सिंह द्वारा किए गए हिंदी अनुवाद ‘अपनी धुन में‘ पुस्तक का अंश है। पुस्तक में जब वे लिखते हैं- ‘‘अपने सारे किरदारों में सबसे काल्पनिक मैं खुद हूँ।‘‘ तब मनोहर श्याम जोशी फिर याद आते हैं, लिखते हैं- ‘कुरु-कुरु स्वाहा‘ दृश्य और संवाद प्रधान, गप्प-बायस्कोप है। अतिरिक्त आग्रह करता है कि पढ़ते हुए देखा-सुना जाये। गप्प है, बायस्कोप है, इसलिए इसमें वर्णित सभी स्थितियाँ, सभी पात्र सर्वथा कपोल-कल्पित हैं। और सबसे अधिक कल्पित है वह पात्र जिसका जिक्र इसमें मनोहर श्याम जोशी संज्ञा और ‘मैं‘ सर्वनाम से किया गया है।

रस्किन बॉन्ड, ऐसे ‘भारतीय‘ जो लिखते हैं- ‘‘भारत को किसी ने लैंड ऑफ रिग्रेट्स कहा था; लेकिन मेरे लिए यह स्वीकार्यता की धरती थी। और यह भी कि- ‘‘...। और इनसानी रिश्तों की घनिष्ठता और बेतकल्लुफ़ी-इंग्लैंड में जिसकी सबसे ज़्यादा कमी मैं महसूस करता रहा। व्यवस्थित जीवन, बढ़िया समझ और शिष्टाचार, यह सब तारीफ़ के क़ाबिल है, मगर आत्मा की ख़ातिर उन लोगों ने कुछ नहीं किया है।‘‘ एक अन्य अंश- उन सिख सज्जन ने मुझसे पूछा कि मेरी पैदाइश कहाँ हुई थी, और मैंने उन्हें बताया कि कसौली में, जो तब सिख स्टेट ऑफ़ पटियाला का हिस्सा था, और बाद में पूर्वी पंजाब और अब हिमाचल प्रदेश में है। ‘और आप कहाँ पैदा हुए थे?‘ मैंने पूछा। ‘बर्मिंघम,‘ उन्होंने बताया।

इस आत्मकथा के लिए वे लिखते हैं- ‘‘कोई जिंदगी किसी दूसरे के मुकाबले ज्यादा या कम महत्वपूर्ण या दिलचस्प नहीं होती ...(यह) गुजरे जमाने का दस्तावेज, कुछ दिलचस्प और गुमनाम लोगों का परिचय है, और एक तरह के लेखकीय जीवन की झाँकी है।‘‘ फिर एक जगह यह भी कहते हैं- ‘‘... पर कुछ के बारे में खामोश ही रहूँगा, क्योंकि कुछ अनुभूतियाँ बहुत निजी होती हैं, और उन्हें जाने बगैर दुनिया का कुछ बिगड़ नहीं जाएगा।‘‘ जीवन-संस्मरणों के किस्सागो रस्किन की आत्मकथा की खबर मिली तो जिज्ञासा हुई, पढ़ कर कहा जा सकता है कि उनका अन्य लगभग सारा लेखन-कहानियां, आत्मकथा जैसा है तो उनकी यह आत्मकथा, एक कहानी ही है। ऐसा लेखक जो की-बोर्ड से कागज-कलम पर आया- ‘‘ टाइपराइटर से मैंने छुटकारा पा लिया है, क्योंकि यह शोर बहुत करता है, और अब मैं बॉल-पॉइंट या रोलर-बॉल पेन से लिखता हूँ। क्रलम और काग़ज़, और क़लम, हाथ और मन के बीच छुअन का जो भौतिक रिश्ता या तालमेल होता है, वह मुझे पसन्द है।‘‘

इस किताब पर पेज-दर-पेज कुछ पाठकीय टिप्पणियां- जामनगर के रणजीत सिंह जी के भतीजे के नाम दुलीप छपा है, जो संभवतः प्रूफ की भूल नहीं अंग्रेजी में स्पेलिंग ‘डी यू ...‘ के कारण है। जैसे जयसिंह का नाम स्पेलिंग के कारण जयसिम्हा लिखा पढ़ा जाता है और पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंह राव, नरसिम्हा राव लिखे जाते रहे, दूसरी तरह ‘सिंह‘ एसआइएनजीएच‘ से सिंघ हो जाते हैं। ... उनकी वह शैली, अंदाजे-बयां जगह-जगह है, जो उनके लेखन की पहचान है- ‘‘महल का कोई माली तो मैंने कभी देखा नहीं, लेकिन अगर कोई था भी तो यकीनन वह प्रकृति को अपने ढर्रे पर चलने देने में विश्वास रखता था।‘‘ ... जूनागढ़ के नवाब साहब का जिक्र आया है, जो अपने प्रिय कुत्तों को ले कर पाकिस्तान भाग गया। इसके बारे में जैसा मैंने पढ़ा है कि हवाई जहाज में कुत्ते और उनकी रानियां खचाखच भर गए, मगर उनके कुछ और बहुत प्यारे कुत्ते छूट रहे थे, इसलिए कुछ रानियों को निकाल बाहर कर बनी जगह में कुत्तों को सवार कराया गया। ...

एक और अंदाजे-बयां- ‘‘लन्दन, दिल्ली और फिर देहरादून में भी और हर मौके पर मुझे उसके साथ अलग पति मिले। मर्द उसे अच्छे लगते थे, मगर लगता है कि वे ही कभी उसकी उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे।‘‘ चक्करदार सीढ़ियों से उतरते ठोकर लगने से हुमायूँ के मौत का जिक्र है, मगर मुझे जैसा ध्यान है सीढ़ियां चक्करदार नहीं हैं और वह अपने चौड़े पांयचे वाले पाजामे में पैर फंसने से गिरा था, बहरहाल। उनकी कहानी में उनसे दूर परिवेश भी उनके कितने पास होता- ‘‘ दूर कहीं पर कुत्ते भौंकते- किसी अजनबी पर नहीं, बस अपनी आदत के चलते। कभी-कभी गीदड़ों के चीखने या नीम के पेड़ पर बैठी रात की किसी चिड़िया की आवाज़ सुनाई देती। खिड़की पर जाली लगी हुई थी तो इसके पल्ले मैं खुले रख सकता था, कीट-पतंगे, मक्खी-मच्छर और दूसरे उड़नेवाले कीड़े जाली से टकराते और बाहर ज़मीन पर गिर पड़ते। मानसून की शुरुआत के दिन थे, और हज़ारों-हजार उड़नेवाली चींटियाँ और पतंगे सड़कों के किनारे लगे खम्भों के लैम्प पर मँडराते, ये ख़ुशी-खुशी आत्मघाती मिशन पर निकले प्राणी थे; और सबेरे गौरैया और दूसरे कीटभक्षी परिंदे जमीन पर गिरे हुए उन पतंगों की दावत उड़ाते।‘‘ एक और वाक्य- ‘‘और जब सारी जंगें अपने अंजाम को पहुँच जाएँगी,‘ मैंने कहा, ‘तितली तब भी इतनी ही खूबसूरत होगी।‘‘ ... गिलहरी के लिए लिखते हैं- ‘‘वह हर रोज यहाँ आती है। उसने मेरे हाथ से खाना सीख लिया है। मैं उसे मूँगफली, डबलरोटी के टुकड़े और मटर खिलाता हूँ। आज मूँगफली नहीं है। वह मेरी हथेली और कलाई सूँघती है, और जब उसे यक़ीन हो जाता है कि मूँगफली आज नहीं मिलनेवाली तो मटर खाने के लिए राजी हो जाती है। वह कुछ बैरागी क़िस्म की जीव है, शिकायत नहीं करती।‘‘ ... वे हिमालयी मेपल-किरमोली, गढ़वाली ‘तितली वृक्ष‘ का विवरण देते हैं तो साल वृक्षों से झरते हेलीकाप्टर फूल याद आते हैं।

एक मार्मिक प्रसंग, जो तटस्थ सबक की तरह आया है, बालक रस्किन के पिता की चिट्ठियां, मिस्टर प्रिसली ने हिफाजत से रखने के लिए ले लीं कि स्कूल बंद होने के पहले रस्किन उन्हें वापस ले सकता है। रस्किन चिट्ठियां लेने पहुंचा तो उन्हें अपने मेज की दराजों में कोई चिट्ठी नहीं मिली और उन्होंने कहा कि वह सीनियर मास्टर से पूछेंगे। इस पर वे लिखते हैं- ‘‘कुछ देर मैं वहीं खड़ा रहा, फिर मुड़ा और बिना कुछ बोले लौट आया। बड़े लोगों के वादे का अब मेरे लिए कोई मोल नहीं रह गया था।‘‘ ... एक जगह वे लिखते हैं- ‘‘धीरे-धीरे मुझे नाउम्मीदियों की आदत पड़ने लगी थी। ... ‘‘मैंने दूसरों से कोई उम्मीद न रखना सीख भी लिया, लेकिन यह सब सीखने में मुझे बहुत-बहुत साल लग गए।’’ ... इसी तरह- ‘‘व्यक्तिगत त्रासदी के इम्तिहान से गुजरनेवाले लोग अक्सर बहुत दयालु स्वभाव के होते हैं।‘‘ ... ‘‘मेरी अपनी जिंदगी नीरस होने की वजह से, इन लेखकों की गढ़ी हुई दुनिया में खुद को भुला देना मुझे भला लगता था।‘‘ ... ‘‘अतिशय विनम्रता, और दूसरों को खुश रखने के लिए जरूरत से ज्यादा उत्सुकता मेरी तमाम खामियों में से एक है, ...‘। ... ‘‘कुँवारे लोग और बिल्ली के बच्चे करुणा के मुनासिब हकदार होते हैं।‘‘

अपनी परिस्थितियों को इस तरह तटस्थ-बेबाक दर्ज करने वाला, अपने दोस्तों की मौत का जिक्र भी स्वाभाविक घटना की तरह करता है। दूसरी तरफ मौत के सर एडमंड गिब्सन के नजरिए को याद करते हैं- ‘‘ एक दिन उन्होंने मुझसे कहा, ‘मरने में मुझे कोई दिक्कत नहीं है, रस्किन, यह जरूर है कि जिन्दगी बहुत याद आएगी।‘ ज़िन्दगी के प्रति उनके नज़रिये का यह एक प्रभावशाली सारांश था।‘‘ सर एडमंड के गांधी संस्मरण-प्रसंग का भी उल्लेख रोचक है- ‘गांधी मुझे पसन्द थे,‘ वह कहते। ‘परिहास की प्रवृत्ति उनमें जबरदस्त थी। आज के दौर के नेताओं के मिज़ाज से तो हास्य सिरे से नदारद है। वे लोग खुद को ज़रूरत से ज्यादा गम्भीरता से लेते हैं। जब मैं जेल में गांधी से मिलने गया तो मैंने उनसे पूछा कि क्या आप आराम से हैं, और उन्होंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया था, ‘अगर मैं आराम से होता तो भी यह बात स्वीकार नहीं करूँगा!‘

वे हिंदी फिल्मों में दिलीप कुमार कामिनी कौशल वाली ‘नदिया के पार‘ का जिक्र करते हैं। हम छत्तीसगढ़ के लोग इसे छत्तीसगढ़िया किशोर साहू और फिल्म में कामिनी कोशल के एक छत्तीसगढ़ी संवाद के लिए याद करते हैं। बताया जाता है कि फिल्म की कहानी शिवनाथ नदी के नांदघाट के आसपास प्रचलित वास्तविक घटना की यादों पर आधारित थी। इसी तरह वे अपने हिंदी के शिक्षक मोहन राकेश को याद करते हैं कि एक बार जब मैंने उन्हें अपने हिंदी के ज्ञान से हैरान कर दिया तब से तो उन्होंने मुझे मेरे हाल पर छोड़ दिया।‘‘ फिल्म ‘किस्सा कुर्सी का‘ का उल्लेख है कि वह कभी रिलीज नहीं हुई, यह शायद लेखक के ध्यान से छूट गया कि अमृत नाहटा की यह फिल्म अंततः 1978 में रिलीज हो गई थी।

किताब को बारीकी से पढ़ने के प्रमाण स्वरूप कुछ उल्लेख- पेज 74- ‘‘लेकिन उस आदमी तो रिक्शा भी दिखाई देता था।‘‘ यहां आदमी और तो के बीच ‘का‘ छूटा जान पड़ता है। पेज 75 पर ‘निस्पाप‘ को ‘निष्पाप‘ होना चाहिए? पेज 129 पर होटल की तनख्वाह वाला वाक्य खटकता है, शायद इसलिए कि अंगरेजी में विराम लगा कर लिखने-पढ़ने का जितना चलन है, हिंदी में नहीं, तो यहां ‘एलन के लिए...‘ के पहले वह या जो लगना अच्छा होता। अंगरेजी-हिंदी अनुवाद की समस्या का एक उदाहरण पेज 130 पर है, जिसमें धैर्य और हमदर्दी के लिए थोड़े-थोड़े लिखा गया है, जबकि होना चाहिए थोड़े से धैर्य और थोड़ी हमदर्दी। ... पेज 177 पर ‘हिन्दुस्तानी‘ से बाँधकर के बजाय ‘बँधकर‘ उपयुक्त होता। पेज 187 का उत्तम-पुरुष, उत्तर पुरुष का आशय स्पष्ट नहीं होता। पेज 208 का वाक्य ठीक है, मगर अंगरेजी की वाक्य-रचना और विराम-प्रयोग के कारण गड़बड़ाया-सा लगता है- ‘‘मेरा ज्यादातर लेखन सबेरे अपनी डेस्क पर बैठकर ही होता था, खासतौर पर गर्मी के दिनों में, जब दोपहर को मैं सो जाता था।‘‘ पेज 230 का ‘नीलकंठ‘, वस्तुतः ‘किलकिला-वाइट थ्रोटेड किंगफिशर‘ होगा। पेज 254 पर का ‘सबाब‘, ‘शबाब‘ है? ... पेज 320 पर जितना पहला था, का पहला ‘पहले‘ होना चाहिए।
यों मूल जैसा आनंद देने वाले इसके अनुवादक प्रभात सिंह जी बरेलवी हैं। उर्दू पर उनका अधिकार जाना-माना है। अनुवाद में दो-चार ऐसे उर्दू शब्द आते हैं, निश्चय ही वे हिंदी के किसी शब्द से अधिक उपयुक्त अर्थ देने वाले होंगे, मगर मुझ जैसे पाठक को वहां ठिठकना होता है।

(किसी पत्रिका के प्रवेशांक में छपा था- ‘इस अंक में प्रूफ की कुछ गलतियां हैं, क्योंकि हमने हर तरह के पाठकों की रुचि का ध्यान रखा है और कुछ पाठकों की अधिक रुचि प्रूफ की गलतियों में होती है।) 

पुनश्च- 

मुझे ध्यान आता है कि मैंने रस्किन बॉन्ड को ध्यान से पहली बार पढ़ा ‘अजब-गजब मेरी दुनिया में‘, तब उसके लिए लिखा था- 

रस्किन बॉन्ड का सहज निर्मल हास्य; हिन्दी हास्य-व्यंग्य से कुछ अलग-सा, मार्क ट्वेन, जेम्स थर्बर की याद दिलाता है। अब हिन्दी में बढ़िया अनुवाद आ गया है।

यह संग्रह हाथ लगे तो फटाफट पढ़ जाइए, अंकल केन के तो कहने क्या? ‘बहुरूपिये नानाजी‘ का रूप जरूर मोहित करेगा।

वे लिखते हैं- ‘दुनिया के सबसे ईमानदार लोग भी किताबें और फूल चुराने से नहीं चूकते‘ एक पुरानी बात, जो हम सुनते आए थे- किसी को पुस्तक देना नासमझी है, लेकिन उससे बड़ी नासमझी मांगी हुई पुस्तक को वापस लौटाना होता है।

पुस्तक समाप्त होती है- ‘एक पुरातत्त्वेत्ता की तरह बड़ा नहीं हुआ। या किसी माली की तरह। या संग्रहालय के किसी संरक्षक की तरह। लेकिन मुझे हमेशा इतिहास दिलचस्प लगता रहा है। और जब मुझे कोई कहानी लिखनी होती है तो यह मेरी मदद करता है।‘

मैं खुद, संग्रहालय का संरक्षक रहा, पुरातत्ववेत्ताई अब भी करता हूं, लेकिन मेरे लिए यह कहानी बनाने में रोड़ा ही बनती है, मदद नहीं करती। 

इसी क्रम में रस्किन बॉन्ड के तीन अंश, जो मुझे बहुत पसंद हैं- 

चाँद अभी भी निकला नहीं था। अँधेरे में लालटेनें झूल रही थीं। अधिकांश लोग, यहाँ तक कि अंधा भी लालटेन साथ लेकर चलता है। और अगर आप उस अंधे से पूछते हैं कि तुम्हें लालटेन की क्या जरूरत है? तो वह कहता है, “जिससे मूर्ख अँधेरे में मुझसे टकरा न जाएँ।”

’मैं अपराध, रहस्य, रोमांच और जासूसी कहानियाँ पढ़कर बड़ा हुआ हूँ, लेकिन मुझ पर उनका प्रभाव साहित्यिक ही रहा; जिस प्रकार अधिकांश पाठक हत्या और मारकाट से दूर हैं, मैंने भी अब तक कोई बड़ा अपराध नहीं किया है। ईमानदारी से कहूँ तो ऐसी बात नहीं है कि मुझमें कभी अपराध करने की इच्छा ही नहीं जगी हो। हममें से ज्यादातर में यह प्रबल इच्छा होती है कि हम किसी अप्रिय व्यक्ति मसलन किसी धौंस जमानेवाले, सतानेवाले, धोखेबाज या लुटेरे को हमेशा के लिए ठिकाने लगा दें। लेकिन हमारी नीच प्रकृति पर व्यावहारिक ज्ञान और सभ्य समाज के मानदंड हावी हो जाते हैं और हम सबसे जघन्य और अस्वाभाविक अपराध अर्थात् आदमी की हत्या करने से पीछे हट जाते हैं।'

’मैंने कुछ बड़े पेड़ देखे हैं पर यह उन सबसे ज्यादा पुराना व विस्तृत है। मुझे खुशी है कि शंकराचार्य ने इसके नीचे ध्यान लगाया था और इस तरह उसके संरक्षण को सुनिश्चित कर दिया था। अन्यथा वह भी इस क्षेत्र में फलने-फूलनेवाले अन्य पेड़ों व जंगलों की तरह कट चुका होता। 
एक छोटे से बच्चे ने मुझे याद दिलाया कि यह इच्छापूर्ति पेड़ है इसलिए मैंने भी कामना की। मैंने कामना की कि अन्य पेड़ भी इसी तरह फलें- फूलें। 
‘क्या तुमने भी इस पेड़ से कुछ माँगा है?‘ मैंने लड़के से पूछा। 
‘मैंने कामना की है कि आप मुझे एक रुपया देंगे।‘ उसने कहा।
उसकी इच्छा तुरंत पूरी हो गई। मेरी इच्छा अनिश्चित भविष्य की किसी कंदरा में जाकर छिप गई। पर उसने इच्छा करने के संदर्भ में मुझे एक पाठ सिखाया।

Monday, August 17, 2026

रघु राय

दहाई साल बीतने को आया, यादें अब भी ताजा हैं। रघु राय और जतिन दास का रायपुर प्रवास। वे समय ले कर आए थे। अपने शिष्य नागपुर वाले शेखर सोनी के आग्रह पर उन्हें रामनामियों से फिर से मिलने जाना था। यात्रा में शिवरीनारायण और सिरपुर भी शामिल हुआ तो मैं भी जुड़ गया। गाड़ी रुकती तो उनका कैमरा ठहर जाता, चलती गाड़ी में शीशे के भीतर से भी बार-बार क्लिक करते रहते। शायद प्रभाव और संभावना का अनुमान लगाते। पूरी यात्रा में शास्त्रीय भजन और सूफी गीत बजते रहे, वे ताली पर ताल देते साथ गाते गुनगुनाते रहे। जतिन दास के साथ उनकी जोड़ी के क्या कहने। जतिन दा को छेड़ते, उनकी बातों का जवाब देते, जिनमें हर बार ऐसा गुदगुदी होती कि उसके भीतर का चुटीलापन अखरे नहीं था। 

 
शिवरीनारायण पहुंचने के पहले महानदी के पुल पर गाड़ी रुकवाई। अंधेरा घिरने को, अप्रैल का महीना मगर बिजली चमक रही थी, बूंदाबांदी हो रही थी। फोटोग्राफी के लिए एमदम प्रतिकूल और तभी उनका कैमरा निकला, फोटो लेते रहे। शिवरीनारायण रेस्ट हाउस पहुंचने पर बत्ती गुल मिली। जैसा आमतौर पर सरकारी रेस्ट हाउस में होता है, चौकीदार का ठिकाना नहीं। किसी तरह कमरा खुला, मगर खाने का कोई इंतजाम नहीं। जतिन दा, बेहिचक, बिना समय गंवाए, शेखर जी को लेकर खरीदी करने निकले। जैसे तैसे पकाने खाने की व्यवस्था बनी। तब पता चला कि जतिन दा आले दरजे के बावर्ची हैं। रघु जी बरसती अंधेरी रात में कैमरा लेकर बाहर घूमते रहे। बिजली चमकती, नदी रोशन होती और उनका कैमरा क्लिक होता। न जाने कितनी तस्वीरें उन्होंने ली होंगी।
 

फोटोग्राफी के बारे में शायद ही कोई बात करते, अक्सर शांत, चेहरे पर मुलायम सी मुस्कान, एक इंच से भी कम। मुस्कान, जो आंखों में और तनाव रहित चेहरे के कारण उभरती थी। साथ समय बिताते समझ में आता कि वे ऐसे नामचीन हैं, जो अपनी गरिमा और मर्यादा बनाए, सामने वाले को सहज रख सकते हैं। पत्रिकाओं में उनके लिए फोटो एडिटर पद का सृजन और समाचारों के लिए फोटोग्राफी पर बात करने पर उन्होंने अपने कैरियर के शुरुआती दिनों को याद करते हुए बताया कि अखबार के लिए फोटोग्राफी करते हुए, किसी बैठक की तस्वीर लेनी होती थी। यों यह सबसे आसान और फटाफट वाला काम होता था, लेकिन वे वे बैठक में हो रही बातचीत, मुद्दों, नरम-गरम को ध्यान से सुनते और कोशिश करते कि ऐसा क्षण क्लिक हो, जो बैठक की चर्चा की खबर से अधिक प्रभावी अभिव्यक्त हो। 

शिवरीनारायण, सिरपुर के मंदिरों के लिए उन्होंने कैमरा छुआ भी नहीं, बस देखते सराहते रहे। जतिन दा की कला-पारखी दृष्टि, जो स्मारक के काल-भेद को कला-शैली के आधार पर आसानी से बूझते गए, मगर रघु जी शांत भाव से मानों बस रस पीते रहे। हां, किसी तरह की हलचल हो, जीवन हो, गाय या कुत्ता बैठा हो, पूंछ हिला रहा हो, तब कैमरे पर उनकी उंगलियां तुरंत थिरकने लगती थीं। मुझे समझ में आया कि ऐसा कोई स्थिर दृश्य, जो कभी भी क्लिक किया जा सकता है, उन्हें दिलचस्पी नहीं होती थी, जहां गति हो स्पंदन हो या किसी स्थिर दृश्य पर क्षणिक कौंध हो, वे वही क्लिक करना चाहते हैं। ऐसा अनूठा, जिसे पकड़ना मुश्किल हो, भूतो न भविष्यति हो। जब यह बात मैंने उनसे साझा की, उनकी मुस्कान ने मुझे बता दिया कि वे मेरी कोई कैंडिड तस्वीर जरूर लेंगे और ऐसा हुआ भी। 

मैंने उनसे सत्यजित रे की चौंकी हुई फोटो, मदर टेरेसा, कलकत्ता पूजा, इंदिरा गांधी आदि की याद दिलाई, इस पर बस हां-हूं करते रहे। उनके लौटने के बाद मेरे पास एक लिफाफा आया, जिसमें उनकी प्रयाग कुंभ वाली किताब और शिवरीनारायण के केशवनारायण मंदिर के सामने जतिन दा के साथ बैठे हुए मेरी, उनकी ली हुई, हस्ताक्षरित तस्वीर थी। 
जाते जाते उन्होंने दिल्ली आने पर अपने फार्म हाउस पर रुक कर साथ समय बिताने का प्रस्ताव दिया था। कुछ ऐसे प्रस्ताव होते हैं, जिनका प्रबल आकर्षण होता है, मगर कहीं उसे बने रहने देना अधिक समझदारी होती है, मैंने इस प्रस्ताव पर वही समझदारी दिखाई और अब उनका यह प्रस्ताव (उनके न रहने पर पहला विश्व फोटोग्राफी दिवस) मेरे लिए अमर हो गया। 

यहां आई तस्वीरें रघु राय, शेखर सोनी और रूपेश यादव द्वारा ली हुई

Sunday, August 16, 2026

छत्तीसगढ़ी काव्य पर विहंगम दृष्टि

75 पार रामेश्वर शर्मा जी छत्तीसगढ़ी के मूर्धन्य साहित्य-सेवियों में हैं, उतने ही निष्ठावान सायकिल-साधक। पचासेक सालों से निरंतर सक्रिय। छत्तीसगढ़ी काव्य पर उनकी नजर लगातार बनी रहती है और उसका परिणाम है, यह पुस्तक- छत्तीसगढ़ी काव्य, एक विहंगम दृष्टि (छत्तीसगढ़ी काव्य विधा अद्यतन)। पुस्तक में छत्तीसगढ़ी के 300 से अधिक कवियों की रचनाओं को विभिन्न शीर्षकों के अंतर्गत वर्गीकृत किया गया है- यथा, बाल-साहित्य, वीर रस, हास्य रस, व्यंग्य, दोहा-चौपाई-कुण्डलियां, वार्णिक छंद, कविता, मुक्तक, ग़ज़ल, मुक्तछंद और गीत। संग्रह में क्षणिका का उल्लेख है किंतु कुछ प्रयोगधर्मियों ने छत्तीसगढ़ी में हायकू भी आजमाया है, उसे यहां जगह नहीं मिली है। इसी प्रकार इस दौर के लोकप्रिय और चर्चित मंचीय कवि मीर अली ‘मीर‘ यहां शामिल नहीं हैं। यों, मेरी जानकारी में छत्तीसगढ़ी काव्य को इस प्रकार वर्गीकृत करते, विभिन्न प्रमुख कवियों का उदाहरण लेते यह पहला प्रकाशन है। 

संग्रह के मुखपृष्ठ और अंदर के पृष्ठों पर भी रामेश्वर शर्मा नाम के साथ संपादक या संकलनकर्ता उल्लेख होना चाहिए था, जो नहीं है। पुस्तक के आरंभिक ‘स्वकथन‘ में उन्होंने जरूर स्पष्ट किया है कि ‘इसमें जो रचनाएं हैं, उन्हीं रचनाकारों की हैं। इसमें मेरा कोई हस्तक्षेप नहीं है, इन सभी रचनाकारों की रचना संकलित कर छत्तीसगढ़ी काव्य को एक विहंगम दृष्टि के लिए पाठकों को समर्पित है।‘ उन्होंने यह भी बताया है कि ‘जब इस पुस्तक में वरिष्ठ साहित्यकार की कमी लगी, तब ‘छत्तीसगढ़ के माटी चंदन‘ जिसका संपादन राकेश तिवारी ने किया है और ‘छत्तीसगढ़ी कविता के सौ साल‘ का संपादन डॉ. बलदेव किये थे। उसमें से रचनाकारों की रचना ली हैं।‘ 

पुस्तक के पहले अध्याय ‘छत्तीसगढ़ी काव्य के चितेरे‘ में जिन कवियों और उनकी पंक्तियों का उल्लेख है, वे इस प्रकार हैं- डॉ. हनुमंत नायडू, हरि ठाकुर, डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा, प्यारे लाल गुप्त, द्वारिका प्रसाद तिवारी ‘विप्र’, नारायण लाल परमार, कोदूराम ‘दलित‘, भगवती सेन, बद्री विशाल यदु ‘परमानंद‘, हेमनाथ यदु, पद्मश्री श्याम लाल चतुर्वेदी, रविशकर शुक्ल, पण्डित दानेश्वर शर्मा, डॉ. विमल कुमार पाठक, मेहतर राम साहू, रामेश्वर वैष्णव, डॉ. जीवन यदु ‘राही‘, मुकुन्द कैशल, लक्ष्मण मस्तुरिया, डॉ. देवधर दास महंत, डॉ. चितरंजन कर, श्रीमती डॉ. निरुपमा शर्मा, श्रीमती दीप दुर्गवी, बुधराम यादव, डॉ. पीसी लाल यादव, डॉ. सन्तराम देशमुख ‘विमल‘, सीताराम साहू ‘श्याम‘, सुशील यदु, बसंत यदु, शिव कुमार यदु ‘शिकुम‘, बंधु राजेश्वर खरे, रमेश विश्वहार, रूपेश तिवारी, हबीब समीर, किशोर तिवारी। 

इस क्रम के अंत में वे स्वयं इन शब्दों में हैं- ‘रामेश्वर शर्मा छत्तीसगढ़ी एवं हिंदी के कवि-गीतकार, ग़ज़लकार, अनुवादक, समीक्षक, स्तंभकार, पत्रकार के रूप में जाना जाता हूँ। दैनिक अमृत संदेश में लगभग पाँच वर्ष तक ‘जाती मिलाती‘ नाम से स्तंभ लिखा। इनके द्वारा लिखे गीत को गायक-गायिकाओं ने गाया है। आकाशवाणी और दूरदर्शन से भी गीत प्रसारित हुआ। छत्तीसगढ़ी फिल्म के लिए गीत लिखा। कवि सम्मेलनों में काव्य पाठ किया। एक गीत, जिसमें गाँव का वर्णन है। उसका मुखड़ा और अंतिम अंतरा प्रस्तुत है- 
नदिया नरवा ढोडगा बीच मा मोर गंवई गांव हे। 
बर पीपर आमा के संगी सरग अइसन छांव हे। 
मंदिर देवाला चारो खूंट मा तुलसी चौरा आंगन मा, 
बद्री, द्वारिका, जगनाथ, रामातार अंतस पावन मा, 
तीरथ धाम सबो ले भव्य दाई-दादा के पाँव हे। 

पुस्तक के कॉपीराइट, इंप्रिंट पेज पर द्वितीय संस्करण, 2024 (संशोधित एवं परिवर्धित) छपा है, किंतु प्रथम संस्करण की जानकारी नहीं है। पुस्तक के अंत में दिए गए लेखक के परिचय से पता चलता है कि इस पुस्तक का प्रथम संस्करण 2022 में हुआ। अच्छा होता कि पुस्तक में छत्तीसगढ़ी कविता के इतिहास पर परिचयात्मक संक्षिप्त जानकारी होती और इसमें शामिल कवियों की सूची-अनुक्रमणिका दे दी जाती। पुस्तक के आरंभ में ‘गोल्डन बुक आफ वर्ल्ड रिकार्ड्स‘ का प्रमाण-पत्र छपा है, इस पर बस यही कह सकते हैं कि गिनीज बुक के बाद लिम्का बुक और इस तरह के रिकार्ड्स वाली जाने कितनी संस्थाएं अपना काम कर रही हैं, मगर इस पुस्तक को ऐसे किसी प्रमाण-पत्र की जरूरत नहीं है। 

सुदीर्घ अनुभव से तैयार की गई पुस्तक में स्वाभाविक ही यह संभव है कि रुचि, पसंद और उपलब्धता सीमा रही हो, मगर संदेह नहीं कि छत्तीसगढ़ी साहित्य अध्ययन के क्षेत्र में यह पुस्तक मील का पत्थर है।