Thursday, March 26, 2026

सालगिरह-वर्षगांठ

गांधी ने 1 अक्तूबर 1939 को रेल से दिल्ली जाते हुए लिखा था- ‘सर सर्वपल्ली राधाकृष्णन् ने मेरे इकहत्तरवें जन्म-दिन को खास महत्व दे डाला है। ... पर प्रशंसकों को एक चेतावनी मैं जरूर देना चाहूंगा। कुछ लोग सार्वजनिक स्थानों पर मेरी मूर्ति खड़ी करना चाहते हैं, कुछ तस्वीरें चाहते हैं, और कई हैं जो जन्म-दिन को आम छुट्टी का दिन बना देना चाहते हैं। पर श्री च. राजगोपालाचारी मुझे अच्छी तरह जानते हैं। सो उन्होंने दानिशमन्दी के साथ मेरे जन्म-दिन को आम छुट्टी का दिन बनाने की बात को रद कर दिया है।‘

2 अक्टूबर 1939 को महात्मा गांधी जन्म-दिन की भेंट के रूप में सर सर्वपल्ली राधाकृष्णन् द्वारा संकलित-संपादित ‘MAHATMA GANDHI ESSAYS AND REFLECTIONS ON HIS LIFE AND WORK‘ के सस्ता साहित्य मण्डल से प्रकाशित हिंदी संस्करण ‘गांधी-अभिनंदन-ग्रंथ‘ से उक्त उद्धरण लिया गया है।

सालगिरह-वर्षगांठ में साल के साथ गिरह या वर्ष के साथ गांठ का प्रचलित अभिप्राय जो हो, गिरह-गांठ बांधकर साल पूरा होने की गिनती और उसे याद रखने के तरीके से आया है। इस दौर में जन्मदिन और शादी की सालगिरह मनाने का प्रचलन, ‘सभ्य समाज‘ में अनिवार्यता की तरह शामिल है, तब यह जितना खुशी मनाने का, बधाई-धन्यवाद का मौका होता है, उतना ही मन में गांठ बांधने का, कि किसने विश नहीं किया। जन्मदिन छुपाने का मेरा अपना कारण है कि बधाई मिलने पर बारी-बारी से सबको धन्यवाद देना जरूरी लगता है, जो नहीं कर पाता। वैसे ही यह खुद को बचा लेने का प्रयास भी है कि दूसरों को बधाई दिए बिना काम चल जाए। न बधाई के लेन में न देन में। यह स्वीकार करते कि इस बहाने खैरियत और जीवित-प्रमाण की दृष्टि से इसे गैर-जरूरी नहीं माना जा सकता।

बहरहाल, तीन फिल्मी गीत याद आते हैं- बधाई हो बधाई जनमदिन की तुमको ... फिल्म का नाम ही ‘मेरा मुन्ना‘ है, सारा जोर लड्डू पर है, मेहनत से पढ़कर आगे बढ़ोगे, पास होगे तो हमें लड्डू मिलेंगे, बड़े हो के भाभी लाना, शादी होगी तुम्हारी और हमें लड्डू मिलेंगे, बुढ़ापे में बाल पकेंगे और पोते होंगे, तो फिर लड्डू मिलेंगे। यह जनमदिन, ‘हैप्पी बर्थ डे टू यू‘ हो जाता है, गीत ‘हम भी अगर बच्चे होते ...खाने को मिलते लड्डू‘ में। मगर इन दोनों गीतों में जन्मदिन बच्चे का ही है। संभव है कि यह फिल्म की कहानी के अनुरूप हो, मगर इससे यह भी अनुमान होता है कि जन्मदिन बच्चों का ही मनाया जाता है, और इस मौके पर लड्डू होते हैं, केक नहीं। हैप्पी बर्थ डे टू यू वाला एक अन्य ‘बार-बार दिन ये आए ...‘ रोमांटिक गीत, हसीना सुनीता के लिए है। और अब नया दौर है, जिसमें साथ रहने वाले परिवार के सदस्य, पति-पत्नी भी एक दूसरे को जन्मदिन, सालगिरह की बधाई फेसबुक पर देने लगे हैं।

वह पीढ़ी अभी भी है, जिनमें से अधिकतर का जन्मदिन 1 जुलाई या 1 जनवरी होता है। यह होता इसलिए है कि ऐसा भी दौर था, जिसमें जन्म की तारीख याद रखना आम नहीं था। इसकी जरूरत होती थी स्कूल में भरती के लिए, जिसे एडमिशन नहीं, नाम लिखाना कहा जाता था। दरअसल, अक्सर ऐसा होता था कि स्कूल में प्रवेश तक शिशु का घरू नाम चलता था, कई बार नामकरण भी शाला में प्रवेश दर्ज करने वाले गुरुजी ही करते थे। अधिकतर के साथ यही पहला मौका होता था जब नाम लेखी में आता था। और जन्मतिथि के लिए होता यह कि प्रवेश के लिए आए बच्चे को दाहिने हाथ को सिर के ऊपर से घुमाकर, बांयां कान छूने को कहा जाता। कान पर ठीक-ठीक हाथ पहुचे तो प्रवेश-वर्ष में छह वर्ष घटाकर, उस वर्ष की 1 जुलाई जन्मतिथि हो जाती और कुछ कम-अधिक यानि साढ़े पांच या साढ़े छह का अनुमान होने पर 1 जनवरी तारीख काम में आती। जन्मदिन न मनाने वाले एक परिचित कहा करते हैं कि जन्मदिन याद रखने की जरूरत ही क्या, मगर क्या करें कोई भी फार्म भरते हुए उसमें जन्मतिथि अंकित करना होता है।

एक गंभीर किंतु रोचक दस्तावेज देखने को मिला, जिसमें जनगणना-2001 के लिए बिलासपुर, जांजगीर-चांपा एवं कोरबा (पुराने बिलासपुर) जिले में सही आयु निर्धारण करने के लिए प्रमुख ऐतिहासिक घटनाओं का वर्ष बताया गया है। इसमें 13 प्रमुख ऐतिहासिक घटनाओं में पहले क्रम पर 1903 का अकाल है, स्वतंत्रता आंदोलन के वर्ष, इस अंचल के स्वतंत्र भारत के विकास के मील के पत्थर, जिनमें 1954 में हमारे स्कूल ‘अकलतरा शिक्षण ट्रस्ट‘ की स्थापना भी है, 13 वीं प्रविष्टि 1984-इंदिरा गांधी का निधन है। स्पष्ट है कि जनगणना में यह सहायक दस्तावेज, उनके लिए था, जिन्हें अपने जन्म की तिथि या वर्ष ठीक-ठीक नहीं मालूम, मगर इसे वे अंचल की किसी प्रमुख यादगार घटना के साथ जोड़ कर याद करते हैं। साथ ही माना गया है कि इस जनगणना में अधिकतम आयु का व्यक्ति 1903 के आसपास का होगा और 1984 के बाद जन्म लिए की जन्मतिथि, जन्म-प्रमाणपत्र होगा। इसके साथ निर्देश में स्पष्ट किया गया है कि ‘यदि कोई व्यक्ति सही आयु बताने में असमर्थ है तो इन घटनाओं की याद दिलाते हुए उसकी संही आयु ज्ञात कर सकते हैं मान लो कि परिवार का कोई सदस्य उम्र नहीं बता पाता है तो आप उससे पूछ सकते हैं कि देश की स्वतंत्रता के समय आपकी उम्र क्या थी। यदि सदस्य बताता है कि उस समय उसकी आयु 10 वर्ष थी ओप उसकी आयु 64 वर्ष (10$54= 64) दर्ज करें।

ऐसा नहीं कि वर्षगांठ को इस तरह याद रखना पुराने दौर में था, अब नहीं।

2017 में प्रकाशित अनु सिंह चौधरी की पुस्तक मम्मा की डायरी में आता है- मनीष और मैं 10 नवंबर को पहली बार मिले और ठीक तीन महीने बाद 16 फरवरी को हमारी शादी हो गई। मुझे आमतौर पर तारीखें याद नहीं रहती। मनीष से मिलने की तारीख़ इसलिए याद है क्योंकि हम जिस दिन मिले थे, उसके अगले दिन मॉर्निंग शिफ्ट में पूरे दिन हमने बुलेटिन में यासिर अराफात की मौत की ख़बर चलाई थी। ... उन दिनों न्यूजरूम का असर मुझपर इतना हावी रहता था कि अपनी सारी यादें बड़ी ख़बरों से जुड़ी हुई पाती हूँ। जिस दिन शादी का लहंगा ख़रीदने गई उस दिन सुनामी आया। जिस दिन हमारी शादी हुई उस दिन क्योटो प्रोटोकॉल प्रभाव में आया। जिस दिन अपने नए घर के लिए अपनी शादी के बाद की पहली दीवाली की ख़रीदारी करने निकले, उस दिन दिल्ली में तीन सीरियल धमाके हुए...‘

इस प्रसंग में एक और रोचक संदर्भ मिला- बनारस पर भानुशंकर मेहता के लिखे का अपना रस है, निबंध ‘हुस्ना की टीप‘ में लिखते हैं- ‘बुढ़वा मंगल‘ का कोई भी लेख हुस्ना की टीप की चर्चा के बिना अधूरा रहता है। मगर यह हुस्ना थी कौन? बस इसी प्रश्न का उत्तर ढूँढ़ते मैं जनाब अब्दुल कुद्दूस नैरंग साहब के दौलतखाने पर पहुँच गया। नैरंग साहब मशहूर नाटककार आगा हश्र काश्मीरी के भानजे हैं। ... नैरंग साहब से पूछा तो यादों की किताब खुल गई, धीमे से गुनगुनाये ‘फिर धुँआ उठने लगा दिल से‘। बोले। ‘साहब, मैं हुस्ना बाई को न जानूँगा?‘ चालीस साल पहले जब मेरी शादी हुई थी- वे रुके और बोले- ‘ठहरिये- मैं जरा दरियाफ्त कर लूँ‘ और तब घर के अन्दर जाकर बेगम साहिबा को आवाज दी और पूछा ‘क्यों भई, कितने साल हो गये होंगे हमारी शादी को?‘ और सीधा उत्तर मिला ‘अब मुझे याद है क्या‘? तुरंत ही नैरंग साहब लौट आये और बोले- ‘हाँ साहब करीब इतने ही साल हुए होंगे- नहीं साहब पचास साल हुए होंगे। तो वाकया यह है कि हमारी शादी हुई तो वे-हुस्ना बाई हमें दुआ देने आई थीं। बहुत ही बासलीका, तहजीबदार औरत थीं। उनकी उस्तादी गायकी, शास्त्रीय गाने का मिसाल नहीं। हर चीज़ पूरे इतमिनान से गाती थीं। और हाँ मैंने देखा है, उन्हें कान पर हाथ रखकर गाते हुए, बड़े उस्तादों की तरह। ... नैरंग साहब फिर से यादों के तूफान में खो गये। बोले- ‘गाना और ड्रामा, क्या-क्या दिन देखे थे बनारस ने। डा. समद साहब डाइरेक्टर थे, सन् 1886 की पैदाइश थी उनकी।‘ 

उक्त अंश में मजेदार कि जिन नैरंग साहब या उनकी बेगम को शादी की तारीख क्या, साल भी ठीक याद नहीं पड़ रहा, डा. समद की पैदाइश का सन बेहिचक याद कर पा रहे हैं।

अटल जी की पंक्तियों के साथ (काशी-)करवट लें- जन्म दिवस पर हम इठलाते, क्यों न मरण-त्यौहार मनाते ... यों कई समाज ऐसे हैं, जिनमें मृतक-संस्कार का उत्सव होता है। मारवाड़ी समाज में हिंदू परंपरा का ‘बैकुंठ‘ प्रचलित है। पूरी उम्र और सुखद जीवन पा कर दुनिया से विदा लेने वाले की बैकुंठी शवयात्रा, उत्सव की तरह, धूमधाम से होती है। इस तरह जन्म की बातें हो रही हो तो जीवन-मृत्यु की युति पर ध्यान जाता ही है। ज्यों, पेंशन और बीमा लाभार्थियों को जीवित प्रमाण पत्र देना होता है। जो जन्मा उसकी तो मृत्यु होगी ही, क्यों न वह अवतार रूप देवता हो, मगर क्या मृत्यु का जन्म भी होता है, क्यों नहीं मृत्यु है तो उसका जन्म भी तो होगा ...

धर्मराज युधिष्ठिर का जन्म यमराज से हुआ और महाभारत शांतिपर्व के मोक्षधर्म पर्व में मृत्यु के जन्म की कथा इस प्रकार है- ... सारी प्रजा पुनरावर्तनशील हो, मरकर पुनः जन्म धारण करे। नारदजी कहते हैं -राजन् ! महादेवजी की वह बात सुनकर भगवान् ब्रह्मा ने मन और वाणी का संयम किया तथा उस अग्निको पुनः अपनी अन्तरात्मा में ही लीन कर लिया। तब लोकपूजित भगवान् ब्रह्मा ने उस अग्नि का उपसंहार करके प्रजा के लिये जन्म और मृत्यु की व्यवस्था की। उस क्रोधाग्नि का उपसंहार करते समय महात्मा ब्रह्रा जी की सम्पूर्ण इन्द्रियों से एक मूर्तिमती नारी प्रकट हुई। ... भगवान् ब्रह्मा ने उसे ‘मृत्यु‘ कहकर पुकारा और निकट बुलाकर कहा-‘तुम इन प्रजाओं का समय-समय पर विनाश करती रहो। ‘मैंने प्रजा के संहार की भावना से रोष में भरकर तुम्हारा चिन्तन किया था; इसलिये तुम मूढ़ और विद्वानों सहित सम्पूर्ण प्रजाओं का संहार करो। कामिनि ! तुम मेरे आदेश से सामान्यतः सारी प्रजा का संहार करो । इससे तुम्हें परम कल्याण की प्राप्ति होगी’। ब्रह्माजी के ऐसा कहने पर कमलों की माला से अलंकृत नवयौवना मृत्यु देवी नेत्रों से ऑसू बहाती हुई दुखी हो बड़ी चिन्ता में पड़ गयी।‘

महाभारत, शातिपर्व के आपद्धर्म पर्व में कथा है, किसी ब्राह्मण के इकलौते पुत्र की अल्पायु में मृत्यु हो जाती है। परिजन द्वारा उसका शव श्मशान ले जाने पर वहां एक गिद्ध (गीध) और एक सियार प्रकट हो, जीवन-मृत्यु का उपदेश देने लगते हैं। दिन रहते शव-भक्षण लालायित गिद्ध समझाता है- मृत्यु अटल है और यहाँ रुकने से मृत बालक जीवित नहीं होगा, अब रोने-धोने से क्या होगा, परिजन अब शव को छोड़कर घर लौट जाएं। मृत शरीर के पास बैठने से केवल दुःख बढ़ता है। मोह को अज्ञानता बताते हुए लौट जाने और जीवितों के प्रति अपने कर्तव्य निभाने की सलाह देता है। सियार प्रेम और ममता की दुहाई देते अंधेरा होने तक उन्हें रुक जाने की सीख देने लगता है, ताकि रात होने पर वह शव को खा सके। सियार दुहाई देता है कि बड़े निर्दयी हो, जिससे प्रेम करते थे, उसके मृत देह के साथ थोड़ा वक्त नहीं बिता सकते। फिर कभी इसका मुख नहीं देख पाओगे। कम-से-कम संध्या तक रूककर जी भरके देख लो। इस तरह गिद्ध वैराग्य की तो सियार आशा और मोह की, बारी-बारी से शास्त्र और दर्शन (का आधार ले, अपने मतलब की) की बातें समझाते हैं। गिद्ध और गीदड़ के ‘अमृतरूपी वचनों‘ से प्रभावित हो वे मृतक के संबंधी कभी ठहर जाते और कभी आगे बढ़ते थे। ... ... ...

महाभारत, अनुशासन पर्व के आरंभ में गौतमी ब्राह्मणी के पुत्र की सर्पदंश से हुई मृत्यु की कथा भी उल्लेखनीय है। जिसमें मृत्यु का कारण बने सर्प को व्याध मार डालना चाहता है, जबकि मृतक की माता गौतमी इसके पक्ष में नहीं है। सांप कहता है कि मैं मृत्यु के अधीन हूं, मृत्यु सांप से कहता है मैंने काल की प्रेरणा से तुझे ऐसा करने के लिए प्रेरित किया। तब काल आ कर कहता है, प्राणियों की मृत्यु में मैं, मृत्यु तथा यह सर्प कोई अपराधी नहीं है। बालक की मृत्यु उसके कर्म से हुई है, उसके विनाश में उसका कर्म ही कारण है। संभव है भारतेंदु का ‘अंधेर नगरी‘ नाटक ऐसी ही किसी कथा से प्रभावित हो।

श्रीमद्भागवत, चौथे स्कंध के आठवें अध्याय के आरंभ में मृत्यु के जन्म का प्रसंग है- ‘मृषाधर्मस्य भार्यासीद्दंभं मायां च शत्रुहन् ...‘ अधर्म भी ब्रह्मा पुत्र था, उसकी पत्नी मृषा (झूठ), पुत्र ‘दंभ‘ और पुत्री ‘माया‘ हुई। दंभ और माया से लोभ और निकृति (शठता), का जन्म हुआ। उनसे क्रोध और हिंसा का, फ़िर उनसे कलह तथा दुरुक्ति (गाली) का जन्म हुआ, उन्होंने मृत्यु और भय को उत्पन्न किया तथा उनसे यातना और निरय (नर्क) का जन्म हुआ। ऐसी ही कथा अग्निपुराण के अध्याय 20, सृष्टि प्रकरण में है- ‘अधर्म की पत्नी हिंसा हुई; उन दोनों से अनृत नामक पुत्र और निकृति कन्या की उत्पत्ति हुई। इन दोनों से भय तथा नरक का जन्म हुआ। क्रमशः माया और वेदना इनकी पत्नियाँ हुई। इनमें से माया ने भय के सम्पर्क से समस्त प्राणियों के प्राण लेने वाले मृत्यु को जन्म दिया और वेदना ने नरक के संयोग से दुःख नामक पुत्र उत्पन्न किया। इसके पश्चात् मृत्यु से व्याधि, जरा, शोक, तृष्णा और क्रोध की उत्पत्ति हुई।

वैदिक साहित्य में यम, विवस्वान-सूर्य और सरण्यू-संज्ञा के पुत्र, प्रथम मर्त्य, समस्त प्राणियों का ‘नि-य-म-न‘ (यम-नियम, सामाजिक और व्यक्तिगत आचरण) करने वाले देवता हैं। यम के द्वारा स्वयं भी मृत्यु स्वीकार करने का उल्लेख वैदिक साहित्य में है। शाब्दिक दृष्टि से यम, यमज यानी जुड़वा से जुड़ा है। यम-यमी जुड़वा भाई-बहन हैं, इनका संवाद चर्चित है। यमी, अपने जुड़वा यम से संसर्ग प्रस्ताव करती है, इसमें रूपक दिखता है कि यम, मृत्यु है तो उसकी जुड़वा यमी, जीवन होगी। यमी-जीवन, यम-मृत्यु से संसर्ग-वरण प्रस्ताव रख रही है, मगर यम उससे असहमत है। इसी तरह कठोपनिषद के संवादी यम का नचिकेता जीवन-मृत्यु संवाद, बहुश्रुत है।

लगता है कि पुनर्जन्म के विचार में मूलतः, जीवन को मृत्यु से और मृत्यु को जीवन से जोड़ कर देखना है। 

जन्मदिन हो या शादी की सालगिरह, बधाई-शुभकामना हो न हो, मन में गांठ न बांध लें। दिल की गिरह खोल दो, चुप न बैठो, कोई गीत गाओ ...

Sunday, March 22, 2026

मौज बरास्ते भाषा

# का भाषा का संसकृत प्रेम चाहिए सांच -तुलसी
# संसकिरत है कूप जल, भाखा बहता नीर -कबीर
# देसिल बयना सब जन मिट्ठा -विद्यापति
# निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल -भारतेन्दु

इसमें कोई संदेह नहीं कि ऐसी बातें अपनी, देसी भाखा के पक्षधरों की हैं, मगर क्या संस्कृत के विरोध में हैं? कुबेरनाथ राय अपने निबंध ‘भाषा बहता नीर‘ में मानों इस सवाल का जवाब देते, स्पष्ट करते हैं- ‘संस्कृत भाषा कूप जल‘ का संबंध भाषा, साहित्य से है ही नहीं। यह वाक्यांश पुरोहित तंत्र के खिलाफ ढेलेबाजी भर है जिसका प्रतीक थी संस्कृत भाषा।‘ यही बात तुलसी के कथन पर भी लागू है, वही तुलसी मानस के सातो कांडों का आरंभ संस्कृत मंगलाचरण से होता है औैर सातवें-अंतिम उत्तरकांड का समापन ‘भाषाबद्धमिदं चकार तुलसीदासस्तथा मानसम्‘ जैसी बात सहित दो संस्कृत श्लोकों से होता है। मगर वहीं ‘मांग के खाइबो, मसीत में साइबो‘ कहते हैं तो यह स्पष्ट हो जाता है कि उनकी उपरोक्त बात संस्कृत का आड़ ले कर भ्रमित करने वालों के खिलाफ कही गई है न कि संस्कृत के लिए।

निरुक्त और पाणिनी के हवाले से बताया जाता है कि ‘भाषा‘ शब्द, वैदिक भाषा के विपरीत प्रचलित लोकभाषा का द्योतक है। अथर्ववेद के प्रसिद्ध पृथिवी सूक्त का अंश, जहां भाषा की विविधता में भेद-भाव नहीं है- जनं बिभ्रती बहुधा विवाचसं नानाधर्माणं पृथिवी यथौकसम्। सहस्रं धारा द्रविणस्य मे दुहां ध्रुवेव धेनुरनपस्फुरन्ती।। यानी ‘विविध भाषाएँ बोलने वाले और विविध धर्मों (संस्कृति, आचार-विचार) को मानने वाले लोगों को, एक घर (परिवार) की तरह, जो पृथ्वी धारण करती है (पोषण करती है), वह स्थिर और सहनशील गाय की तरह, हमें धन की हज़ारों धाराएँ (समृद्धि) प्रदान करे।‘

परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी वाणी में परा तो परे ही है, पश्यन्ती, वह जिसे ‘देखा‘ गया, ज्यों वैदिक ऋचाएं (श्रुति), अपरिवर्तनीय- सत्य, अहिंसा, तप, त्याग, दया, संतोष आदि जैसे मानवीय मूल्य, ‘सच बोलो, सच तोलो‘ जैसी, ज्यों गांधी के ‘हिंद स्वराज‘ में निहित भाव। इसके बाद मध्यमा, जहां विचार शब्दों में ढलने लगें (स्मृति), देश-काल-पात्र के साथ बदलने वाली, कब, कहां, कैसे के विचार वाली, ज्यों गांधी की आत्मकथा और फिर वैखरी, मुख से बोली और कान से सुनी जा सकने वाली सार्थक ध्वनि-शब्द (न्याय), ज्यों, गांधी के पत्र-भाषण आदि, जिसके लिए वे कहते कि उनमें विसंगति हो तो बाद में कही गई बात को मानें।

राजशेखर की काव्यमीमांसा का उद्धरण- ‘पुत्रात्पराजयो द्वितीयं पुत्रजन्म‘ सरस्वती अपने पुत्र काव्य पुरुष को गोद में लेकर कहती हैं- यद्यपि मैं संपूर्ण वांग्मय की जननी हूं, फिर भी तुमने संस्कृत में छन्दोमयी वाणी के प्रयोग द्वारा मुझे परास्त कर दिया है ... अपने पुत्र से परास्त होना द्यितीय पुत्र की उपलब्धि के समान आनंदकारक होता है। यहीं आगे आया है- ‘शब्दार्थौ ते शरीरं, संस्कृतं मुखं, प्राकृतं बाहू ...‘ शब्द और अर्थ तेरे शरीर है। संस्कृत-भाषा मुख है। प्राकृत भाषाएँ तेरी भुजाएँ है। अपभ्रंश भाषा जंघा है। पिशाच-भाषा चरण है और मिश्र-भाषाएँ वक्ष स्थल है। ... रस तेरी आत्मा है। छन्द तेरे रोम है। प्रश्नोत्तर, पहेली, समस्या आदि तेरे वाग्विनोद हैं और अनुप्रास, उपमा आदि तुझे अलंकृत करते हैं।

रहीम ने ‘खेटकौतुकम्‘ का पहला श्लोक संस्कृत में रचा है, इसके बाद के पदों के लिए, दूसरे पद में कहते हैं है- ‘फारसीयपदमिश्रतग्रन्थाः खलु पण्डितैः कृताः पूर्वैः। सम्प्राप्य तत्पदपथं करवाणि खेटकौतुकं पद्यैः।।‘ यानी पूर्वाचार्यों ने फारसी शब्दों से मिला हुआ संस्कृत पद्मों में विविध प्रकार के ग्रन्थों का निर्माण किया है। मैं (खानखाना नब्बाब) भी उन्हीं के चरणपथ का अवलम्बन करके उसी तरह फारसी से मिले हुए संस्कृत श्लोकों में ‘खेटकौतुक‘ नामक ग्रन्थ की रचना करता हूँ। दक्षिण भारतीय परंपरा में इसे मणिप्रवाल शैली (मोती और मूंगा) कहा जाता है। रहीम के ऐसे भाषा-कौतुक का एक उदाहरण है- ‘एकस्मिन् दिवसावसानसमये मैं था गया बाग में, काचित् तत्र कुरङ्गबालनयना गुल तोड़ती थी खड़ी। तां दृष्ट्वा नवयौवनां शशिमुखीं मैं मोह में जा पड़ा, तत्सीदामि सदैव मोहजलधौ हा दिल गुजारे शुकर।।

हजारी प्रसाद द्विवेदी कहते हैं- 'सहज भाषा पाने के लिए कठोर तप आवश्यक है। ... सहज मनुष्य ही सहज भाषा बोल सकता है।' और सुमित्रानन्दन पन्त बताते हैं- 'भाषा संसार का नादमय चित्र है, ध्वनिमय-स्वरूप है। यह विश्व के हृत्तन्त्री की झंकार है, जिसके स्वर में वह अभिव्यक्ति पाता है। विश्व की सभ्यता के विकास तथा ह्रास के साथ वाणी का भी युगपद् विकास तथा ह्रास होता है। भिन्न-भिन्न भाषाओं की विशेषताएँ, भिन्न भिन्न जातियों तथा देशों की सभ्यता की विशेषताएँ है। संस्कृत की देव-वीणा में जो आध्यात्मिका-संगीत की परिपूर्णता है यह संसार की अन्य शब्द-तन्त्रियों में नही, और पाश्चात्य साहित्य के विशदयन्त्रालय में जो विज्ञान के कल-पुर्जों की विचित्रता, बारीकी तथा सजधज है, वह हमारे भारती-भवन में नहीं।'

भाषा-बहुलता के संदर्भ में हिंदी के कुछ साहित्यकार, जिनकी बेहतर पकड़ अन्य भाषाओं पर रही है- भारतेन्दु, गुलेरी, प्रेमचंद, हजारी प्रसाद द्विवेदी, राहुल सांकृत्यायन, बच्चन, अज्ञेय, कृष्ण बलदेव वैद, कुबेरनाथ राय जैसे अनेक नाम हैं, बल्कि हिंदी साहित्य के महत्वपूर्ण लेखकों में शायद ही ऐसा कोई हो, जो दूसरी किसी एक या एकाधिक भाषा में निष्णात न हो। इस दौर के वागीश शुक्ल, गणित के प्राध्यापक रहे और जिनका संस्कृत, फारसी और अंग्रेजी पर अधिकार है। इस सिलसिले में रेणु, विद्यानिवास मिश्र, कुबेरनाथ राय या वासुदेव शरण अग्रवाल जैसे देशज लोकभाषाओं पर बल देने वाले भी हैं। हमारे एक गुरु हार्वर्डवासी, बनारसी-भोजपुरी प्रेमी भारतेन्दु खानदान के डॉ. प्रमोदचंद्र कहते थे कि अभिव्यक्ति में स्वाभाविक लोच और रस अधिक आ जाता है, अगर पहली जबान देशज हो। यों भी बोली-भाषा का लोक-शास्त्र, बृहत्साम-रथन्तर, विष्णु वाहन गरुड़ के दो डैने हैं।

बस्तर के अभिलेखों की चर्चा। रायबहादुर हीरालाल की टिप्पणी है कि ‘इन्द्रावती नदी के उत्तरी भाग से प्राप्त समस्त अभिलेख देवनागरी लिपि में हैं तथा दक्षिणी भाग में इसी समय के अभिलेख तेलुगु लिपि में हैं।‘ उनकी यह टिप्पणी विशेष संदर्भ में है, इसके अलावा बस्तर के अभिलेखों में उड़िया है और ‘भाषा‘ भी। दंतेवाड़ा शिलालेख अगल-बगल दो पत्थरों पर है, जिसमें कहा गया है- ‘देववाणी मह प्रशस्ति लिषाए पाथर है महाराजा दिकपालदेव के कलियुग मह संस्कृत के बचवैआ थोरहो हैं तै पांइ दूसर पाथर मह भाषा लिषे है।‘ पुनः अंत में कहा गया है कि- ‘ई अर्थ मैथिल भगवानमिश्र राजगुरु पंडित भाषा औ संस्कृत दोउ पाथर मह लिषाए।‘ यहां संस्कृत ‘देववाणी‘ है औैर पूर्वी किस्म की हिंदी ‘भाषा‘। यही भाषा ‘भाखा‘ है। इन्हीं दिक्पालदेव के पुत्र राजपालदेव का ताम्रपत्रलेख दो भाषाओं और दो लिपियों में है। हिन्दी भाषी राजा की प्रतिज्ञा उड़िया भाषा में और उड़िया भाषी ब्राम्हणों की प्रतिज्ञा हिन्दी भाषा में लिखी गई है ताकि उभय पक्ष समझौते की शर्तें पढ़-समझ सके। इन अभिलेखों का काल अठारहवीं सदी है।

अब थोड़ी मौज - सठियाए सालों पुरानी हमारी पढ़ाई शुरू होती थी ककहरा और गिनती से। गिनती की किताब में पहाड़ा भी आ जाता और फिर यह कहलाता भाषा और गणित। भाषा में इमला होता यानी शुद्ध लेखन, और पाठ-वाचन। गणित में जोड़-घटाव गुणा-भाग के साथ मनगणित और यांत्रिक गणित भी होता, जिसके लिए सूत्र रटाया जाता, ‘सहि अरु का को तोड़कर, भाग-गुणा कर मीत, ता पीछे धन-ऋण करै, यही भिन्न की रीत‘। तीसरी कक्षा में जिले का भूगोल होता, चौथी में प्रदेश का और पांचवीं में देश का। भूगोल, सामाजिकध्यान यानी सामाजिक अध्ययन का एक हिस्सा होता, इतिहास और राजनीति के साथ। मुझे याद नहीं आता कि प्राथमिक कक्षाओं में अर्थशास्त्र होता था या नहीं और होता था तो किस रूप में। आगे चल कर ‘नेकोसेकोसेकापरहे, बैनीआहपीनाला और यमाताराजभानसलगा, जैसे सूत्र सबको याद होते। सोचता रहा हूं, तुलसी भी किसी ऐसे ही दौर से गुजरे होंगे कि कहा- ‘अंक अगुन आखर सगुन समुझिअ उभय प्रकार‘। अंक- तथ्य, वस्तुगत और आखर- विषयगत!

हमारे एक परिचित कभी बंबई गए, पकी उम्र में पहली बार। बंबई पहुंचकर उनकी एक ही धुन थी, थाणे का पुलिस स्टेशन देखना है। फिल्मी दुनिया की चकाचौंध में ‘इ है बंबई नगरिया ...‘ गीत, कहीं ऐसी कोई बात नहीं, फिर यह कैसी धुन। बात पता लगी कि उन्होंने सुन रखा था कि मराठी में पुलिस थाना को पोलिस ठाणे कहा जाता है, वे देखना चाहते थे कि यह ठाणे के पुलिस थाने में किस तरह लिखा हुआ होगा और मन ही मन ‘ठाणे पुलिस ठाणे‘ सोच कर, मुख-सुख उचार कर आनंद लिया करते रहे। इसी तरह रायपुर से लगे बरौदा गांव, के बैंक आफ बड़ौदा की शाखा को अंग्रेजी में क्या लिखते हैं- Bank of Baroda, Branch- Baroda!

संयोग कि मुझे सिखाने-पढ़ाने वाले ऐसे गुरूजी मिले, जो छकाते भी थे। जिस पर कभी ध्यान नहीं गया था, ऐसी बात किसी ने कही कि जिस शब्द की परिभाषा हो, उसमें वह शब्द या उसका समानार्थी शब्द नहीं आना चाहिए, मैंने अपने गुरूजी से ‘शेयर‘ किया, इस पर उन्होंने सवाल किया कि क्या यह बात परिभाषा के परिभाषा जैसी मानी जा सकती है और नहीं तो परिभाषा की परिभाषा क्या होगी? फिर यह भी कि समानार्थी शब्द तो शब्दकोश में होते हैं, जिनमें शब्दों के अर्थ दिए होते हैं, फिर उसे अर्थकोश क्यों नहीं कहते!, सो ज्ञानमण्डल, बनारस का ‘बृहत् हिन्दी कोश‘ खोल लिया। सबसे पहले ध्यान गया, वाह बनारसी ... न शब्द न अर्थ, बस कोश। मगर ऐसा सिर्फ यहां नहीं, वामन शिवराम आप्टे का ‘संस्कृत-हिन्दी कोश‘ है और फादर कामिल बुल्के का नाम 'अँगरेजी हिन्दी कोश‘ मिला, हम ही हैं जो शब्दकोश अर्थककोश के चक्कर में पड़े हैं। बहरहाल, ‘बृहत् हिन्दी कोश‘ में भाषा शब्द पर पहुंचा तो पाया- ‘भावप्रकाशका साधन; किसी विशेष देश या जन-समाजमें प्रचलित शब्दावली और उसे बरतनेका ढंग, बोली; प्रादेशिक भाषा या बोली; हिंदी व्यक्ति विशेषके लिखने-बोलनेका ढंग; परिभाषा; शैली; सरस्वती; अर्जीदावा; एक रागिनी।‘ अब लगता है कि गुरुओं ने रट-घोंट लेने के साथ-साथ जुगाली करते रहने पर जोर दिया, तो जैसी गुरु-दीक्षा, शिरोधार्य।

Sunday, March 15, 2026

उजले ‘श्याम‘

संयोजक श्री शशिकांत चतुर्वेदी, श्री सूर्यकान्त चतुर्वेदी और संपादक श्री रूद्र अवस्थी के
‘पं. श्यामलाल चतुर्वेदी स्मृति ग्रंथ‘ में शामिल मेरा लेख, यहां आंशिक परिवर्धन सहित प्रस्तुत-


उजले ‘श्याम‘

स्नेह-वात्सल्य को शब्दों में अभिव्यक्त कर पाना असंभव जैसा, मेरे बूते का नहीं, और इसे संभव बनाने का प्रयास भी दुष्कर होता। साथ ही यह भी समस्या थी कि पंडित श्यामलाल चतुर्वेदी जी के अभिनन्दन ग्रंथ सहित उन पर इतना कुछ लिखा-छपा है, उससे अलग क्या ही कुछ लिख सकूंगा। मगर भाई सूर्यकांत जी का आग्रह बना रहा, वही संबल बना। मैंने पहले अपनी यह सीमा बताई, बात न बनी तो फिर कुछ समय चाहा, उन्होंने समय दे दिया, समय-सीमा तक पहुंचने तक मन ही मन आदरणीय पंडित श्यामलाल चतुर्वेदी जी को लगभग प्रतिदिन स्मृति-श्रद्धा-सुमन अर्पित करता रहा, मगर कुछ भी न लिख पाया। फिर से समय-सीमा पूछा, जवाब चारों खाने चित्त कर देने वाला था, भाईजी ने कहा- आपके लिए कोई समय-सीमा नहीं है, हमारी समय-सीमा आपका लेख आ जाने तक है। इस पर मैंने पुनः उस दिवंगत पुण्य आत्मा का स्मरण किया कि ‘तुम्हीं ने दर्द दिया है, तुम्हीं दवा देना‘, और ‘तेरा तुझको सौंपता‘ भाव से यह जो टूटी-फूटी है, उसमें पंडितजी के प्रति मेरी भावना का अंश झलक सकेगा मानते, समर्पित है।

कुछ घर ऐसे होते हैं, जहां आप अकारण भी जाना चाहते हैं, जा सकते हैं, मगर लौटते हैं कुछ हासिल के साथ, समृद्ध हो कर। बिलासपुर का घसियापारा, जो अब राजेंद्र नगर था और बृहस्पति बाजार के बीच, तिलकनगर के पिछवाड़े का एक घर, जो कुटी या आश्रम सा जान पड़ता, यों नजरअंदाज हो जाए, मगर जो इससे परिचित, उसके लिए अगल-बगल ओझल रहे, इसी पर नजर टिके, इसी का आकर्षण हो, यही पंडित श्यामलाल चतुर्वेदी जी का निवास था। मेरे गृहग्राम अकलतरा के पड़ोसी कोटमी निवासी पंडितजी उन दिनों राजेन्द्रनगर स्थित हमारे दफ्तर के पड़ोसी थे। हमें जब भी अवसर होता, उनके सान्निध्य पाने इस ‘गुरुकुल‘ पहुंच जाते, और सदैव ‘बिन मांगे मोती‘ पा कर लौटते। 

सच्चे राष्ट्रवादी पंडितजी को अक्सर लोग दलगत संकीर्णता में सीमित कर देखते हैं, जबकि आजादी की लड़ाई के दौरान चरखा, तकली चलाने वाले गांधीवादी आप कांग्रेस के सदस्य बनाने के लिए सक्रिय रहते थे। व्यक्तिगत सत्याग्रह में जेल जाने के लिए दरखास्त भी दिया था, मगर आवेदन उनके नाबालिग होने के कारण नापास कर दिया गया, यह बताते हुए मुस्कुरा कर कहते ‘सेनानी हो गए होते हम‘। गीत याद करते थे- ‘घर-बार छोड़ कर के जाएंगे जेलखाना, ये डर नहीं है हमको खाएंगे जेल खाना, जिस जेल में महाप्रभु श्रीकृष्णचंद्र जन्मे, मेरे लिए तो प्यारा मंदिर जेलखाना।‘ बाद में देश के विभाजन के दौरान संघ के संपर्क में आए औैर प्रचारकों का त्याग, समर्पण आपके लिए प्रेरक बना, उन तपस्वियों का संस्कार मिला। इसी तरह आजादी के बाद विनोबाजी के भूदान यज्ञ से जुड़ गए। गांव-गांव घूमते, पत्रकारिता के लिए समाचार भी इकट्ठा करते। 

कर्मवीर के लिए पहला समाचार ही क्रांतिकारी सुर का था। वे बताते कि गांव के मालगुजार के लिए उन्होंने आवेदन लिखा, उसने प्रयत्न किया, उसे शक्कर मिट्टी तेल का लाइसेंस मिल गया। आपने उससे कहा कि अब इसमें अमीर-गरीब का भेद न करना सबको बराबरी का मानते सामान देना। उस मालगुजार का आतंकी बेटा मनमानी करने लगा, घटनाक्रम कुछ ऐसा हुआ कि आपका उसके खिलाफ लिखा समाचार छपा, उसका लाइसेंस निरस्त हो गया। वे याद करते थे कि बिलासपुर में रहते हुए उन्हीं के शब्दों में अपने ‘झगड़ालू गांव‘ के निर्विरोध सरपंच बन गए। गांव में असहयोग का माहौल बना कर ‘शराब भट्ठी‘ को हटवाया। अपने ही घर के सामने बने चबूतरे को हटवा कर गांव वालों से बेजा-कब्जा हटाने की अपील की। उनका ग्राम पंचायत, गांधी शताब्दी वर्ष 1969 में बिलासपुर संभाग का सर्वश्रेष्ठ पंचायत घोषित हुआ था। कोटमी सोनार अब क्रोकोडायल पार्क के लिए मशहूर है। गांव के जलाशयों में मगर पुराने समय से बसते रहे हैं। निस्तारी तालाबों में भी रहते थे, जहां लोग सहज नहाना-धोना करते थे। मगर गांव में किसी को इन जीवों से नुकसान दुर्लभ रहा है, इससे संबंधित घटनाएं वे रोचक ढंग से सुनाते थे कि किस तरह नहाते हुए व्यक्ति से लट्ठ की तरह बहता आया मगर टकरा जाता था और लोग उसे धक्का दे कर स्नान जारी रखते थे या गरमी में एक तालाब से दूसरे तालाब जाते हुए मगर को खातू वाले गड़हा, गाड़ा में डाल कर पानी वाले तालाब में छोड़ आते थे। 

अकलतरा की रामलीला, शिवरीनारायण के नाटक और नरियरा की कृष्णलीला पर उनकी प्रेरणा और उनके द्वारा दी गई जानकारियों के आधार पर उन स्थानों में जा कर और लोगों से संपर्क कर मैंने ‘तीन रंगमंच‘ लेख तैयार किया और उसकी प्रति उन्हें ले जा कर दी, जिसे देखकर प्रसन्न हुए और आशीर्वाद दिया। नरियरा की कृष्णलीला नाटकों में ब्राह्मण को ही कृष्ण बनाते थे। वे बाल-कृष्ण का रूप धरते थे। उनकी मां तालाब में नहाने जाती थीं, तो गांव वाले कहते ‘भगवान के दाई आए हे‘। संभर-पखर जाने पर आखिर में मुकुट लगता। इसके बाद ‘प्राण प्रतिष्ठा‘ मान ली जाती थी, तब कृष्ण बने आपको, ईश्वर-स्वरूप मानते मंच पर आने के पहले जमीन पर पैर रखने नहीं दिया जाता था, कोई न कोई गोद में उठाए रहता था। ऐसे ही संस्कार उन्हें बचपन से मिलते रहे, और संभवतः उनके भीतर का आत्मबल, यही से आया धार्मिक-आध्यात्मिक भाव था। संत-महात्माओं का सत्संग का कोई अवसर नहीं चूकते। हमारे घर मां पूर्णप्रज्ञा का आगमन होता, तब उनकी नियमित उपस्थिति होती थी। 
सन उन्‍नीस सौ तीसादि दशक का नरियरा लीला संबंधित चित्र 

फिल्म ‘थ्री ईडियट्स‘ के चतुर रामलिंगम के ‘चमत्कारी, धन‘ वाले भाषण के साथ मुझे आपसे जुड़ा एक प्रसंग याद आया था, जो साधूलाल गुप्ता बताते थे। बिलासपुर में होली के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में संभाग के कमिश्नर ‘संभागायुक्त‘ आमंत्रित थे। आपने अपनी बात शुरू करते हुए उन्हें संबोधित करते हुए ‘भा‘, ‘भो‘ हो गया। बस, फिर क्या, पूरा माहौल में होलियाना लहर में बहने लगी। एक प्रसंग बिलासपुर से खरौद-शिवरीनारायण जाते हुए, रास्ते में पामगढ़ बस स्टैंड पर का सुनाते थे। चाय पीने रुके, बेंच पर बैठे थे। एक युवा आया और उनसे उपहास करते कहा ‘नेताजी, थोड़ा सरको।‘ आपने उससे कहा कि भाई! तुमने मुझे नेताजी क्यों कहा?, उसने कहा ‘ड्रेस से तो तुम नेता दिख रहे हो, बस इतना सुनना था कि पंडितजी ने कहा और तुम अपने पहनावे से मुझे लफूट लग रहे हो, तो क्या मैं तुम्हें लफूट जी कहूं? 

आपकी प्रसिद्ध कविता ‘बेटी के बिदा‘ के लिए मान लिया जाता है कि उनके मन में ये भाव अपनी बेटी को विदा करते हुए आए होंगे, जबकि जैसा वे बताते, अपनी शादी के बाद विदा होने के दौरान गांव-घरवालों की व्यथा को देख कर एकबारगी तो उन्हें ऐसा लगा कि पत्नी को छोड़कर ही वापस लौट जाएं और फिर वहीं इस कविता के भाव पैदा हुए थे। खुद मजे लेते बताते थे कि विवाह के समय पत्नी पांचवी पास थीं और आप पांचवी। धुन लगी और प्राइवेट परीक्षाएं पास करते हुए एम.ए. की परीक्षा तक पहुंचे। पाठ्यक्रम में आपकी ही कविता थी, जिस पर प्रश्न पूछा गया था, अपनी ही कविता पर पूछे गए प्रश्न का उत्तर लिख कर परीक्षा पास करने की संभवतः यह अकेली घटना है। 

एक प्रसंग उन्होंने बताया था। लोचनप्रसाद पांडेय बिलासपुर से रायगढ़ जा रहे थे। रेलगाड़ी पर से रास्ते में उनका ध्यान विशिष्ट आकृति की ओर गया, उन्होंने किसी सहयात्री से गुजर रहे गांव का नाम पूछ लिया। रायगढ़ पहुंचकर उन्होंने एक पोस्टकार्ड लिखा, कि जयरामनगर और अकलतरा स्टेशन के बीच लीलागर नदी के पुल के बाद बायीं ओर मिट्टी का टीला दिखाई पड़ता है, इसके बारे जानकारी चाहिए। पत्र, श्री पटवारी जी (या सरपंच जी) संबोधित, पता लिखा था। उलझन भरे इस पते-संबोधन वाला पत्र, आपके पास ही पहुंचना था, पोस्टमैन पत्र उन तक छोड़ गया। पत्र का जवाब लिखने के बजाय आपने स्वयं लोचनप्रसाद जी से मुलाकात की और मिट्टी के परकोटे वाले गढ़ तथा गांव के पुरातात्विक अवशेषों की जानकारी से अवगत कराया। संभव है यह पोस्टकार्ड अब भी सुरक्षित हो। 

आपने लोचनप्रसाद जी के निधन पर 1 दिसंबर 1957 को ‘नई दुनिया में श्रद्धांजलि-लेख लिखा था, जिसका अंश इस प्रकार है- ‘यदि श्रद्धेय पाण्यडेजी की अपूरणीय क्षति से हम धरोहर के समुचित सदुपयोग सीख सकें, अपनी सामाजिक जिम्मेदारी पूर्ण करने की दिशा में ईमानदारी से प्रयत्न कर सकें, अपनी अकर्मण्यता छिपाने के लिए कार्यक्षमता के कांधे पर न चढ़ें, साहित्यिक राजनीतिज्ञ से श्रेष्ठ होता है यह सही मायने में आचरण से कर दिखा सकें, तो यह विश्वास किया जा सकता है कि स्वर्गीय पाण्डेय के नेह-लोचन का कृपा-प्रसाद हम अदृष्ट से पाते रहेंगे।‘ अब हम यही बात पं. श्यामलाल जी के लिए भी लागू हो सकती हैं। 

वे संपर्क में आए लोगों के संस्मरण और उसे अभिव्यक्त करने की उनकी शैली लाजवाब थी। ‘बड़े के संग म खावय बीरा पान‘ शीर्षक से, मेरे पितामह इंद्रजीत सिंह जी के लिए उन्होंने लिखा था, जिसका एक अंश इस प्रकार है- जिनके प्रति आदर का स्थायी भाव बरसों से हो और संयोगवश उसे अभिव्यक्त करने का अवसर यदि प्राप्त हो जाये तो हर्षित होकर उसका निर्वाह करना कौन नहीं चाहेगा ? ऐसा ही एक सुअवसर मुझे मिला है और मैं अकलतरा के राजा साहब स्वर्गीय मनमोहन सिंह जी के सुपुत्र डॉक्टर इन्द्रजीत सिंह जी की जन्म शताब्दी पर अपने खयालातों की खतौनी कर रहा हूँ। 
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 लाल साहब ख्याति के खैरख्वाह नहीं थे किन्तु अत्यन्त परिश्रम से छत्तीसगढ़ के वनाँचलों में जाकर समय और सम्पत्ति की आहुति देकर उन्होंने जो ‘गोड़ जनजाति के आर्थिक जीवन‘ को लेकर अंग्रेजी में ‘गोड़वाना एण्ड द गोंड्स‘ शीर्षक से शोध ग्रंथ का प्रणयन किया, वह लाल साहब की समाज को अनमोल देन है। विश्व के ख्यातनाम अर्थशस्त्री डॉ. राधा कमल मुखर्जी एवं डाँ. डी.एन. मजुमदार इनके मार्गदर्शक थे। यह ग्रंथ सन् 1944 में प्रकाशित हुआ था। पुस्तक का समापन कुछ इस तरह से है - ‘जनजातीय समुदाय के उत्थान और विकास के कार्य ऐसे लोगों के हाथों होना चाहिए जो उनके ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य और सामाजिक व्यवस्था को पूरी सहानुभूति सहित समझ सके।‘ बीसवीं सदी के (तीसरे-) चौथे दशक के बीच बस्तर अंचल मेएक छत्तीसगढ़ी राजकुमार का शोध कार्य अभूतपूर्व है।' 

मीर अली मीर की प्रसिद्ध कविता है ‘नंदा जाही‘, संभवतः यह कविता पंडितजी के विचारों से प्रेरित है, वे बार-बार दुहराया करते थे कि ‘छत्तीसगढ़ी के शब्द नंदावत हे‘। मुझे हमेशा यह लगता था कि छत्तीसगढ़ी में बोली का लोच-लालित्य, लिखते हुए सीमित होने लगता है, उसके रस-प्राण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, ऐसी बात कह कर आलोचना का पात्र भी बन चुका हूं। मगर एक बार पंडितजी के विचार सुनने का अवसर मिला, जिसमें उन्होंने कहा कि ‘मोर एक अलग तरह के बिचार हे, छत्तीसगढ़ी हर लिखे के नोहय, बोले के, अतका लुदरू हे, लिखा-पढ़ी म आइस, तब ले खोखा म बंद होत जात हे।‘ इसके साथ उनका स्पष्ट मत होता था कि बोलचाल में छत्तीसगढ़ी बनी रहे, यह बहुत जरूरी है। वे जैसी छत्तीसगढ़ी बोलते थे, वह स्वयं में इसका सबसे प्रबल प्रमाण है। अब छत्तीसगढ़ी के मानकीकरण और विविधता पर विचार करते हुए यह ध्यान रखना चाहिए कि भाषा-बोली, अभिव्यक्ति का कोई माध्यम हो, बोली का लोच, उसका सौंदर्य होता है न कि सीमा। छत्तीसगढ़ी का बोलीपन बने रहने की कीमत पर ही उसका भाषा बन जाना मंजूर किया जा सकता है। किसी जबान का बोलीपन खो जाए तो यह भाषा, मानक भाषा, राजभाषा, आठवीं अनुसूची में शामिल होने की सार्थकता पर प्रश्न चिह्न होगा। 

2004 में दैनिक हरिभूमि, बिलासपुर में जगन्नाथ प्रसाद ‘भानु‘ की पुण्यतिथि पर मेरा लेख छपा। मुलाकात होने पर उन्होंने पूछा कि भानु जी की छत्तीसगढ़ी रचना ‘खुसरा चिरई के बिहाव‘ के बारे में मुझे कहां से पता चला। आगे उन्होंने ध्यान आकृष्ट कराया कि इसी नाम की रचना खरौद निवासी पं. कपिलनाथ मिश्र की भी है। मुझे याद आया कि मैंने यह पुस्तक शिवरीनारायण के मेले में बिकते देखी थी, तब इसके रचनाकार की ओर मेरा ध्यान नहीं गया था। पंडितजी ने कहा कि भानु जी की इस रचना के बारे में उन्होंने भी सुना है, मगर देखा नहीं है और निर्देश दिया कि पता करने की कोशिश करना। बाद में कपिलनाथ जी वाली पुस्तक तो मिल गई, मगर भानु जी वाली अब तक नहीं मिली है। 

छत्तीसगढ़ हिन्दी साहित्य सम्मेलन का त्रैमासिक पत्र ‘क्षितिज‘ के सम्पादक मण्डल में प्यारेलाल गुप्त, गजानन शर्मा, शिवनारायण जौहरी और द्वारिकाप्रसाद ‘विप्र‘ के साथ आप भी थे। इस त्रैमासिक पत्र का प्रथम अंक चैत्र-वैशाख-ज्येष्ठ सं. 2017 वि. (सन 1960) में उनकी यह छत्तीसगढ़ी कविता छपी थी। 

कुटेमहा घटा सो 
(असामयिक बादल के प्रति.) 
- श्यामलाल चतुर्वेदी ‘श्याम‘ 

बादर! झनि आ झनि आ। अभी तैं झनि आरे! झनि आ। 
हमर साल भर के मेहनत हर, बाहिर बगरे हावै। 
तोर रंग के एक झलक म, पोटा हमर (माई पोटा) सुखावै।। 
सावन भादों के हे देवता! झन रावन बन जा तैं। 
हांथ जोर के पांव परत हन, हमला अभी बँचा तैं।। 

बिजली कस तोर दांत दिखय, गरजना सहीं तोर हांसी। 
आवा जाही देख सहीं, लगथे का बदे हे फांसी।। 
छिन छिन हवै अमोल बखत ये, फुरसत (फुरसुत) नहीं मरे के। 
पाल पोंस के तहीं बनाये (बढ़ोये), पांव परी मुंड़ टेंके।। 
अपन हाँथ म बना के कुरिया, आगी झनिच (झन तो आगी) लगा। 
बादर झनि आ झनि आ।। 

तैं हमार जिवराखन देंवतन मा तैं ( ) बड़का भारी। 
झन करबे मसखरी झींक के भात परोसे थारी।। 
जाही जीव अजाहे सिरतोन करे कुँदे जर जाही। 
जुड़ जुड़ पानी चिटको परही, करपा हर (ह) सर जाही। 
तोर जुड़ास अगिन होही, तै चिटको तो पतिआ। 
(तोर जुड़ास जिनगी जुड़वाही मर जाबो, पतिआ) 
बादर झनि आ झनि आ।। 

पन पिआस के प्यास बुतोइया (बुतोइय्या), पिरथी के रंगरेजवा। 
नेवता देके ठग देइस का सोर तोर सो भेजवा।। 
(धोखा देइस का? कोनो हर, सोर तोर सो भेजवा) 
दगा कोनो के सगा नहीं, जा झटकुन सोर सुनादे। 
(दगा कोनो के सगा नहीं, सोरिहा ल सफा सुनादे) 
इहां ठाढ़ हो दुख झन दे, जा काम अपन निपटादे।। 
(तरी उपर चल रहे साँस ला, तिरिआके, थिरिया दे।।) 
नेवता ले असाढ़ सावन के, जा झन बेर पहा।। 
(नेवता ले असाढ़ सावन के, जा तो झन गर्रा।।) 
हूल बरोबर लगय सुनत तोर, थोर को हिही हहा।।
 
तोर गाना सुन प्रान सुखाथे, रोना के संग मरना। 
सबले अच्छा होही अभी, ईंहां ले तोरेच टरना।। 
(ऊपर की ये दो पंक्तियां नहीं हैं।) 
तैं परमारथ करके अपने, हांथ ले लूट नंगा झन। 
(परमारथ कर अपने हाँथे, झन तो लूट, नँगा झन) 
अपने पोंसे लइकन मन बर फोक्कट अभी जंगा झन।। 
(ऊपर की यह पंक्ति भी नहीं है।) 
एक के करे अकाइस तेला झन तो (तैं) एक बना।। 
बादर झनि आ झनि आ। 

नोहन हम सिरि क्रिस्न के संगी न तो बिरिज रहवइया (रहवइय्या)। 
इन्द्र रजा के हम असरोइया (असरोइय्या), गउ किरिया रे भइया (भइय्या)। 
जियेन सगर दिन तुहर पुन्न मा (दया मा), तुंहर भरोसा जीबो। 
तुंहरे पुन मा चिटिक मिटिक पा, पसिया पानी पीबो।। 
(चिटिक मिटिक पा जाबो तब तौ, पसिया पानी पीबो।।) 
कुछ कसूर करे हन तौ कह फोकटे झन डेरुआ। 
(कुछू कसूर करे हन तौ कह थपरा दे घनि आ।) 
बादर झनि आ झनि आ। 

चार महीना के तोर मेहनत (मेहनत हर), छिन मा चरपट होही। 
हमला अजम कसम से हावै, तै नोहस निरमोही।। 
अतक (अतेक) बड़े पानी के राजा, आइस बिना बलाये। 
सुनिहीं (सुनही) तउने छि छि (छि! छि!) करहीं, येमा मंजा का आये।। 
टेम टेम म बने लागथे, गारी घलो ल गा (खा)। 
(‘तैं लहुट लहुट घर जा‘ यह पंक्ति अतिरिक्त है।) 
बादर झनि आ झनि आ।। 

यही ‘कुटेमहा घटा सो‘ शीर्षक कविता 2007 में प्रकाशित उनके काव्य संग्रह ‘पर्रा भर लाई‘ के नवम् संस्करण में ‘बादर झनि आ झनि आ‘ शीर्षक से शामिल है। यहां इसके रचना काल या पूर्व प्रकाशन का संदर्भ नहीं है। बाद के प्रकाशन में कविता के कुछ शब्द बदल गए हैं, जो ऊपर कोष्ठक में इंगित हैं। इसीसे संबंधित कुछ अन्य बातें। ‘क्षितिज‘ के संपादक मंडल में होने की उल्लेख उन्होंने आलोक शुक्ल के साक्षात्कार में किया है, अन्यथा इसकी जानकारी सामान्यतः नहीं मिलती थी। संयोग कि मुझे डॉ. सुशील त्रिवेदी जी के संग्रह में यह अंक देखने को मिल गया। एक अन्य बात की ओर मेरा ध्यान गया, जिसकी चर्चा न के बराबर होती है कि ‘क्षितिज‘ में प्रकाशित इस कविता के साथ उनका उपनाम ‘श्याम‘ आया है।

इस कविता के लिए मुकुटधर पांडेय ने श्रीधर पाठक की पंक्ति ‘उलटि जाहु धन अबही बिनवत हे घनश्याम‘ को याद किया था। मुझे याद आया कि पुरानी फिल्म ‘शिकस्त‘ में लता मंगेशकर का गाया मधुर गीत है- कारे बदरा तू न जा, न जा। इसके विपरीत यहां कहा गया है बादर झनि आ, झनि आ। किसान ऐसे बेमौसम बादल को बरजता ही है, क्योंकि ‘कुंवरहा घाम अलकर, अउ कातिक के पानी‘। पकी पकाई फसल पर पानी फिरने का अंदेशा जो होता है। मेरे लिए उनकी यह कविता वैदिक देवता पर्जन्य की स्तुति का आभास देने वाली है। इस कविता में समय के साथ शब्दो-अंशों में परिवर्तन की विवेचना और कविता की व्याख्या, छत्तीसगढ़ी के लोक-मन के साथ पंडितजी के कवि-मन का उजागर कर सकती है, संभव है शोधार्थियों का ध्यान इस ओर गया हो।

छत्तीसगढ़ की संस्कृति नीति, विभागीय पत्रिका ‘बिहनिया‘ के नामकरण में आपकी प्रमुख भूमिका रही और छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के प्रथम अध्यक्ष नियुक्त हुए। आयोग के वर्तमान स्वरूप की नींव उन्होंने डाली थी। यद्यपि ‘सरकारी‘ कार्यप्रणाली और स्थितियों से खिन्न हो जाते थे। आपने आयोग के सचिव पद के लिए मुझसे कहा। मेरे यह कहने पर कि इस महत्वपूर्ण पद के लिए मुझसे अधिक योग्य और उपयुक्त लोग हैं, राजी नहीं हुए। इस पर मैंने फिर निवेदन किया कि सचिव पद का काम अन्य भी कर सकते हैं मगर पुरातत्व के क्षेत्र में काम करने वालों की कमी है, इस तर्क पर आसानी से सहमत हो गए। भाषा, संस्कृति और पुरातत्व से छत्तीसगढ़ का गौरव और महिमामंडन सदैव उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता में रहा।

- राहुल कुमार सिंह 
प्रमुख, धरोहर परियोजना, 
बायोडायवर्सिटी एक्सप्लोरेशन एंड रिसर्च सेंटर