Sunday, April 5, 2026

अहिंसक मजबूती

‘चम्पारण सत्याग्रह शताब्दी: गांधी दर्शन की प्रासंगिकता‘ शीर्षक व्याख्यान, रायपुर में दिनांक 2 जुलाई 2017 को ‘अखिल भारतीय शांति एवं एकजुटता संगठन: छत्तीसगढ़‘ (रायपुर जिला इकाई, अध्यक्ष-डॉ. राकेश गुप्ता) द्वारा आयोजित किया गया। मुख्य वक्ता श्री पुरुषोत्तम अग्रवाल थे। पुरुषोत्तम जी ने व्याख्यान में बताया कि वे ‘मजबूती का नाम महात्मा गांधी‘ पुस्तिका साथ लाना चाहते थे, नहीं ला सके। कार्यक्रम के बाद मैंने निवेदन किया कि वे पुस्तिका की प्रति भिजवा सकें तो कृपा होगी। पुरुषोत्तम जी ने दिल्ली लौटते ही मेरे 3 जुलाई 2017 के मेल का उसी दिन जवाब दिया फिर अगले हफ्ते उन्होंने मेरे डाक पता के लिए लिखा और और पुस्तिका मेरे पते पर भिजवा दी, जिसकी अनेक फोटोकॉपी प्रतियां तथा पीडीएफ तैयार करा कर मैंने परिचितों को दीं।

उनकी यह पुस्तिका 2 अक्टूबर 2005 को श्री अनुपम मिश्र के आग्रह पर गांधी शांति प्रतिष्ठान नई दिल्ली में दिए गए व्याख्यान पर आधारित है, जिसका प्रथम मुद्रणः अगस्त 2006 में हुआ था। बिहार सरकार द्वारा ‘चम्पारण सत्याग्रह शताब्दी समारोह-2017‘ पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय विमर्श 10-11 अप्रैल, 2017 पटना के अवसर पर आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर द्वारा इसे पुनर्मुद्रित किया गया। पिछले दिनों इसी शीर्षक से पुस्तक प्रकाशन की जानकारी मिली और इसके विमोचन अवसर का वीडियो यू-ट्यूब पर देखने को मिल गया।

इस पृष्ठभूमि में यह और जोड़ना है कि रायपुर का व्याख्यान प्रभावशली था, गांधी के प्रति आकर्षण है ही इसके साथ 1977-78 के अपने विद्यार्थी जीवन में विवेकानंद आश्रम में रहते हुए टेप-रिकार्डर पर रामकिंकर महाराज और स्वामी आत्मानंद जी के प्रवचन सुन-सुन कर टेक्स्ट बनाने का मुझे पुराना अभ्यास रहा है, फिर अब तो इयरफोन, पॉज आदि सभी सुविधाएं हैं, तो मैंने इस छूटे अभ्यास को जांचते हुए इस व्याख्यान का टेक्स्ट बना डाला। इसके बाद 10 जुलाई 2017 को उन्हें मेल किया- ‘इस बीच आपके व्याख्यान की तीन तरह की रिकॉर्डिंग मिल गई। एक तो ललित जी के फेसबुक पर है वीडिओ वाली, लेकिन उसे साफ सुन और समझ पाना मुश्किल है। दूसरी आकाशवाणी वाली मुझे मिल गई, वह बहुत साफ, लेकिन सिर्फ लगभग 40 मिनट की है। और बाद में तीसरी आयोजकों से भी मिल गई। ... यह सब मिलकर पिछले दो दिनों की छुट्टी का सदुपयोग कर इसे फीड कर लिया, एक बार दुहरा कर सुना और देर न हो, इसलिए छूटे अंशों को पूरा किये बिना अटैच कर भेज रहा हूं। पूरा व्याख्यान 1 घंटा 17 मिनट और 17 सेकंड का लगभग 11100 शब्दों का है। ... वैसे मेरे अनुसार यह 95 प्रतिशत तक ठीक हो गया है। कहीं रिकॉर्डिंग के कारण और बाकी मेरी नासमझी और कुछ जल्दबाजी के कारण (विराम आदि) रह गया है, जिसके लिए फिर से बैठूंगा।‘ इस मेल का भी जवाब उसी दिन आ गया।

मैं चाहता था कि पुरुषोत्तम जी, रिकार्डिंग के आधार पर मेरे द्वारा तैयार किए गए टेक्स्ट में यथा-आवश्यक संशोधन कर दें तो इसे प्रकाशित-सार्वजनिक करा दिया जाए। मेल के इस क्रम के बाद 24 नवंबर 2017 को उनके दिल्ली निवास पर प्रत्यक्ष मुलाकात हुई। उनकी व्यस्तता का अनुमान करते कुछ समय बाद 20 सितंबर 2019 को मैंने उनसे निवेदन किया- ‘मजबूती का नाम महात्मा गांधी‘ आपने उपलब्ध कराई थी इसकी प्रतियां उस समय फोटो कॉपी करा कर मैंने वितरित की थी। अभी कुछ शिक्षण संस्थानों और मित्र यह पढ़ना चाह रहे हैं। आपकी अनुमति हो तो उन्हें भी इस की छायाप्रति उपलब्ध करा दूंगा। ... आपका रायपुर वाला व्याख्यान मैंने रिकॉर्डिंग से सुनकर टेक्स्ट बनाया था, आपको तब मेल किया था। मुझे लगता है कि मुश्किल से 1 घंटे का समय आपको देना होगा यदि आप उसे संपादित कर दें तो वह भी प्रकाशन योग्य सामग्री तैयार हो सकती है। प्रकाशन न हो तो उसकी प्रतियां कराकर इस दौरान वितरित किया जा सकता है। इस पर उसी दिन उनकी स्वीकृति मिल गई- ‘मज़बूती.... की प्रतियाँ ज़रूर वितरित करें। और वह रायपुर वाला व्याख्यान एक बार फिर से मेल कर दें प्लीज‘। अनुमान कर सकता हूं कि उनकी व्यस्तता लगातार बनी रही इसके साथ ही ‘मजबूती ...‘ के नये संस्करण की तैयारी में इस रायपुर व्याख्यान को अंतिम रूप देना संभव न हुआ होगा। रायपुर के उक्त व्याख्यान का टेक्स्ट, सार्वजनिक रुचि और महत्व का मानते यहां दिया जा रहा है-

इस सभा के अध्यक्ष राकेश जी, आराधना जी, डॉक्टर दल्ला, ललित जी और सभागार में उपस्थित अन्य मित्र ... हमलोग अपने कार्यक्रम से लगभग पच्चीस मिनट लेट चल रहे हैं तो अब अध्यक्ष जी मुझे बताइये कि मेरे पास कितना समय है, (आप जो बोलना चाहें बोलें, ... नहीं, नहीं, जो बोलना चाहूं का सवाल नहीं है, कितना समय है ... ) इस तरह के कार्यक्रमों में आने में आजकल मुझे संकोच होता है मैं स्पष्ट कहूं आपसे एक तो कारण यह है कि लगभग, लगभग क्या पूरे साठ साल का हो गया और दुर्भाग्य से मेरी ख्याति एक अच्छे वक्ता की है और लोग बुलाते हैं और जाहिर है कि अपनी आवाज किसको बुरी लगती है तो मैं चला जाता हूं, चला जाता था, लेकिन अब मुझे यह अहसास होने लगा है कि जिस तरह की खानपान की मेरी आदतें हैं और जिस तरह की जीवन पद्धति है उसके चलते दस साल से अधिक का समय मेरे पास है नहीं अब और उस समय का उपयोग कुछ लिखने में करना ज्यादा बेहतर होगा बनिस्बत भाषण देने के, और इसलिए आजकल मैं भाषण देने से कतराता हूं, मना कर देता हूं अपनों से, लेकिन हर व्यक्ति के जीवन में ऐसे कुछ लोग होते हैं, जिनके सामने आपके संकल्प और आपकी प्रतिज्ञाएं धरी रह जाती हैं, सौभाग्य से या दुर्भाग्य से मेरे जीवन में भी ऐसे लोग हैं और ललित जी ऐसे लोगों में से हैं तो यह संभव नहीं था कि मैं उनकी बात टाल दूं, लेकिन मैं सच कहूं आपसे बड़े बेमन से, भैया ललित कह रहे हैं तो कैसे मना कर दूं मैं इस तरह आया कल जब मुझे लेने राकेश जी और तिवारी जी गए हुए थे और आप लोगों से जो मेरी बातचीत हुई और उसके बाद रात को ललित के साथ बैठे हम और उनसे बातचीत हुई और फिर सुबह नौजवान मित्र मुझे लेने पहुंचे मैंने उनसे पूछ लिया आमतौर से ये सवाल सभ्य लोग कहते हैं कि स्त्रियों से नहीं पूछना चाहिए मैं पुरुषों से भी नहीं पूछता, कि आपकी उम्र क्या है लेकिन जयवर्द्धन जी से मैंने पूछ लिया और जानकर मुझे थोड़ा आश्चर्य और ईर्ष्या अधिक हुई कि छब्बीस साल का ये नौजवान और इतनी गतिशीलता, इतना डाइनेमिज्म, इतनी सोच, हालांकि जो टाउन प्लानिंग को ले कर उनकी जो समझ है उससे मैं फंडामेंटली असहमत हूं, वो अलग बात है, लेकिन ये जो तीन चार लोगों से बातचीत हुई मेरी पिछले करीब बारह-... घंटे में तो मुझे लगा कि डॉक्टर दल्ला जैसा कह रहे थे कि अच्छे लोग निष्क्रिय हैं तो मैं ये बहुत प्रसन्नता के साथ नोट कर रहा हूं कि कम से कम रायपुर में अच्छे लोग निष्क्रिय नहीं हैं और इसलिए मुझे अब यहां आने का एक अलग तरह का संतोष और एक तरह का आनंद भी है और अब मैं यहां जो हूं और यहां जो भी कुछ अच्छा-बुरा कहने जा रहा हूं उसका सारा श्रेय ललित को अब नहीं जाता अगर ये बातें इस तरह की न हुई होंतीं तो उन्हीं को जाता।

मित्रों! अभी डॉक्टर दल्ला ने एक बहुत अच्छी बात की ओर संकेत किया और उनके पहले आराधना जी ने भी कि हम आज किस स्थिति में जी रहे हैं, गांधीजी की सबसे बड़ी उपलब्धि और जो उनकी राजनीति से असहमत हैं वो लोग भी मानते हैं और मानते थे गांधीजी की सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि उन्होंने ब्रिटिश राज का इकबाल खत्म कर दिया, ब्रिटिश राज का डर खत्म कर दिया जब वो इस फिल्म के दृश्य में और इस इसके बाद आप जानते हैं ब्लूमफील्ड का प्रसिद्ध दृश्य अहमदाबाद का यहां जज उनके सम्मान में उठ कर खड़े हो गए थे मिस्टर ब्लूमफील्ड गांधीजी ने डर खत्म कर दिया मुझे इस बात पर एक बहुत रोचक चुटकुला याद आता है एक मजिस्ट्रेट की अदालत में एक दरोगा जी ने एक चोर को पेश किया दरोगा जी का आकार प्रकार मेरे जैसा था और चोर एकदम छरहरा पतला-दुबला एकदम फुर्तीला नौजवान तो दरोगा जी ने जज से कहा कि हुजूर इसको मैंने पकड़ा है तो जज को हंसी आ गई उसने कहा कि ये पल भर में हवा से बातें करेगा, आप कदम गिन गिन कर रखते हैं, आपने कैसे पकड़ लिया इसको, आपसे दौड़ते नहीं बनता, चलते नहीं बनता आप कह रहे हैं कि आपने पकड़ लिया तो दरोगा जी बोले हुजूर हुकूमत दौड़ से नहीं चलती, हुकूमत इकबाल से चलती है मैंने इसे दस कदम दूर से देखा और कहा खबरदार, हिलना मत, ये खड़ा रहा और मैं आराम आराम से गया और हथकड़ी लगा के आपके सामने ले आया गांधीजी की सबसे बड़ी उपलब्धि ये थी कि उसके बाद गांधीजी के आंदोलन के दौरान और उसके बाद ब्रिटिश सरकार अपने इकबाल को ले कर आश्वस्त नहीं रह सकी।

गांधीजी बहुत चमत्कारी पुरुष माने जाते हैं और उनका सबसे बड़े चमत्कारों में से एक चमत्कार यह है कि जब वहां फ्रंटियर में आंदोलन हुआ और पठानों ने जुलूस निकाले और ब्रिटिश आर्मी ने गोलियां चलाईं एक के बाद एक पठान गिरते गए मरते गए रेड शर्ट खुदाई खिदमतगार वो पठान जो तू कहने पर लिटररी तलवार निकाल लेते थे उन्होंने हाथ नहीं उठाया और एक अद्भुत घटना का वर्णन कुछ डिस्क्रिप्शपन्स में मिलता है कि खान अब्दुल गफ्फार खान, सीमांत गांधी नौजवानों ने शायद उन्हें न देखा हो, मुझे, मैं उनलोगों में से हूं जिन्हें उन्हें दूर से ही सही प्रत्यक्ष रूप से देखने का सौभाग्य मिला है उनकी कद-काठी का अंदाज आप इससे लगा सकते हैं कि जब वे बीमार पड़े और एम्स में लाए गए एक बार तो उनके लिए स्पेशल बेड बनवाना पड़ा था, क्योंकि खान साहब का कद साढ़े छः फुट था और इतना बड़ा कोई बेड नहीं था कि जिस पर खान साहब को लिटाया जा सके तो खान साहब को पकड़ कर बंद कर दिया थाने में और जो अंग्रेज अफसर था वो काफी उनकी खिल्ली उड़ा रहा था कि तुम पठान लोग बड़े बहादुर माने जाते हो, बड़े वीर माने जाते हो ताकतवर माने जाते हो एक दिन में एक बकरा खा जाते हो ये सब क्या है। तुम्हें लाकर चूहे की तरह लाकर बंद कर दिया तो पठान साहब ने कहा, खान साहब ने कहा कि देखो चुप रहो ये सब गांधीजी का कमाल है, अगर मैं गांधीजी का भक्त न होता तो थानेदार ने चैलेज किया कि भक्त न होते तो क्या कर लेते अगर गांधी जी के भक्त न होते तो, तो जो वर्णन जिस व्यक्ति ने लिखा है उसने यह लिखा है वह वहां मौजूद था एक वालंटियर के तौर पर उसने कहा कि खान साहब ने कोठरी के दरवाजे की जो सींखचे थे लोहे के वो हाथ से खींच कर टेढ़े किए बाहर निकल कर उसके सर पर आ कर खड़े हो गए बोले कि ये कर देता, अगर गांधीजी का चेला न होता तो।

तो गांधीजी ने बहुत से चमत्कार किए और उनके चमत्कारों पर आज की तारीख में जब हम बात करें चम्पारण के हवाले से या किसी भी हवाले से फ्रीडम और डर की बात कर रहे थे, डर की बात कर रहे थे डॉक्टर साहब एरिक फ्राम्म की एक पुस्तक है एरिक फ्राम्म एक बहुत जाने माने मनोविश्लेषणवेत्ता थे और उनकी एक पुस्तक का शीर्षक बहुत ही व्यंजक और चिंताजनक है लेकिन वो बहुत महत्वपूर्ण पुस्तक है। मैं आपसे अनुरोध करुंगा कि पढ़ें और ध्यान दीजिएगा वो पुस्तक 1934 में लिखी गई थी ड्यूरिंग द राइज आफ हिटलर इन यूरोप और पुस्तक का शीर्षक है द फियर आफ फ्रीडम, एरिक फ्रॉम्म ने उसमें प्रतिपादित किया कि लोग आजादी से डरते हैं और इसलिए लोग तलाश में रहते हैं ऐसे नायक की जो उनकी आजादी का हरण कर ले, उन्हें सोचने-समझने की जिम्मेवारी से मुक्त कर दे और उन्हें आश्वस्त कर दे कि बस अब अच्छे दिन आ गए और कभी नहीं गए। उस पुस्तक का शीर्षक है फियर आफ फ्रीडम।

मित्रों! मैंने पिछले दिनों अपने फेसबुक पर एक वाक्य लिखा था उसे दोहराना चाहता हूं आपके सामने मनोविज्ञान जानने वाले, मनोविश्लेषण जानने वाले जानते हैं एक वृत्ति होती है मैसोकिज्म जिसमें मनुष्य अपने आपको दुख दे कर अपने आपको कष्ट दे कर आनंद की अनुभूति करता है दूसरों को दुख दे कर ही आनंद की अनुभूति नहीं होती। मनुष्य बड़ी विचित्र चीज है अपने आपको दुख दे कर भी लोग आनंद की अनुभूति प्राप्त करते हैं। मुझे लगता है कि पिछले कुछ वर्षों से भारतीय जनता एक तरह की आत्मपीड़क मनोविकृति से गुजर रही है हमलोग अपने आपको दुख दे कर उसके गुण गा रहे हैं, जो दुख दे रहा है ये अद्भुत स्थिति है। मैं कोई राजनैतिक व्यक्तव्य नहीं दे रहा हूं मैं केवल एक सांस्कृतिक व्यक्तव्य दे रहा हूं। तो ये जो स्थिति है इस पर ईमानदारी से विचार करने की जरूरत है और ईमानदारी का मतलब होता है थोड़ी सी तटस्थता, थोड़ी सी निर्ममता, एक कठोर आत्मनिरीक्षण जिस भी विचार परम्परा में आप अपने को स्थित मानते हो, उसके बारे में, अपने स्वभाव के बारे में, अपने निजी और सामाजिक चित्त और कर्मों के बारे में ईमानदारी से विचार करने की जरूरत है। 

ये जो फिल्म, जिसकी क्लिप हमने देखी, ये उन्नीस सौ बयासी में आई थी और मैं नाम नहीं लेना चाहता, लेकिन हिन्दी के प्रसिद्ध वामपंथी लेखक ने अपनी पत्रिका में, वे एक पत्रिका के संपादक भी थे, एक संपादकीय लिखा था और उस में उन्होंने सविस्तार बताया था कि ये फिल्म अमेरिकन साम्राज्यवादियों ने और ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने दुनिया भर में चल रही, खास कर लैटिन अमेरिका में चल रही क्रांति को निस्तेज करने के लिए बनवाई, ये उन्नीस सौ बयासी की बात है, सोवियत संघ का विघटन अभी दस साल दूर था और उन मार्क्सवादी लेखक को ये लग रहा था कि फिल्म गांधी, एक तो आप जानते हैं कि मार्क्सवादियों में और जनसंघियों में, आई एम सॉरी, मार्क्सवादियों में और कुछ लोगों में एक आम विशेषता होती है, वे हर जगह कांसपिरेसी सूंघ लेते हैं और आजकल इस कांसपिरेसी में एक और मजेदार एंगल हमारे समाज में जुड़ गया है वो है जाति का, मुझे आज तक तो पता नहीं है कि सुरजन जी बनिया हैं या नहीं लेकिन हो सकता है कोई कह सकता है कि मुझे इसीलिए बुलाया कि बनिया है वरना नहीं बुलाते तो कांसपिरेसी हर जगह नजर आती है तो क्या यह कांसपिरेसी है साहब कि जो एटिनबरो की फिल्म है ये गांधी के अहिंसा के व्यर्थ के सिद्धांत को इस्तेेमाल कर के क्रांति की धार को कुंद करने के लिए की गई कांसपिरेसी है वो लेखक मित्र अभी जीवित हैं, मेरे मित्र तो उतने नहीं हैं लेकिन परिचय तो है ही मैं उनका नाम नहीं लेना चाहता हिंदी साहित्यं में थोड़ी गहरी दिलचस्पीे रखने वाले समझ गए होंगे कि मैं किसकी ओर इशारा कर रहा हूं लेकिन वो अकेले नहीं हैं ऐसे बहुत से लोग थे और ऐसे बहुत से लोग हैं। 

और अभी भी दो हजार पांच में ये हुआ आपलोग जानते हैं कि गांधी शांति प्रतिष्ठान एक वार्षिक व्याख्यान का आयोजन करता है और उस साल वो व्याख्यान देने का सौभाग्य मुझे मिला अनुपम जी ने मुझे निमंत्रित किया वो व्याख्यान देने के लिए और विषय उन्होंने मेरे ऊपर छोड़ दिया कि आप चुनिए, तो विषय मैंने चुना मजबूती का नाम महात्मा गांधी, आमतौर से कहा जाता है मजबूरी का नाम महात्मा गांधी, मैंने विषय चुना मजबूती का नाम महात्मा गांधी, और ये व्याख्यान दिया मैंने बहुत पसंद आया लोगों को व्याख्यान, मैंने काफी तैयारी के साथ दिया था और फिर उसकी पुस्तिकाएं उन्होंने बना के छापीं, बांग्ला में, गुजराती में और नेपाली में उसके अनुवाद हुए अभी-अभी पंजाबी में हुआ है उसका रिपिं्रट आइटीएम युनिवर्सिटी, ग्वालियर ने किया है और मुझे खेद है कि वो मैंने सोच लिया था कि मैं ले कर आऊंगा, मैंने तय कर लिया था लेकिन अभी कहा गया प्रबुद्ध या विद्वान मेरे बारे में विद्वानों की एक विशेषता भुलक्कड़पन भी मानी जाती है तो वो पुस्तिका लाना मैं भूल गया लेकिन मैं भेज दूंगा और मैं चाहूंगा कि उस पुस्तिका को आपलोग पढ़ें उसकी फोटोकॉपी वितरित करें, आपस में बातचीत करें उस पर और उसकी आलोचना से मुझे लाभान्वित करें।

बहरहाल तो वहां जब मुझे निमंत्रण दिया गया भाषण देने के लिए तो जैसे मंच पर बुलाते हैं बुलाया और जो उस कार्यक्रम के उस गोष्ठी के अध्यक्ष थे उन्होंने कहा कि हमलोग बहुत प्रसन्न हैं पुरुषोत्तम जी आएं, बोलें, वामपंथी होने के बावजूद हमने इन्हें बुलाया है मुझे यह टुकड़ा बहुत रोचक लगा, वामपंथी होने के बावजूद हमने इन्हें बुलाया है तो मैंने कहा कि हां वामपंथी तो मैं हूं, लेकिन वैसा वामपंथी नहीं हूं जिसका वामपंथ गांधीजी का नाम लेने से अपवित्र हो जाता हो ऐसा वामपंथी मैं नहीं हूं और तब से यह बात बार-बार मुझसे पूछी जाती है कई लोग पूछते हैं प्रत्यक्ष रूप से अप्रत्यक्ष रूप से कि साहब एक तरफ आप अपने को वामपंथी और फलाना-ढिमका, दूसरी तरफ गांधी और नेहरू दुनिया भर का आप करते रहते हैं, मामला क्या है? 

मित्रों मैं एक बात आपसे कहना चाहता हूं उस पर गौर कीजिएगा कम से कम मैं ये मानता हूं अगर हमें मानव के इतिहास को सामाजिक इतिहास को समझना है तो मार्क्स द्वारा प्रतिपादित ऐतिहासिक भौतिकवाद की पद्धति का कम से कम मेरी जानकारी में आज तक कोई भी विकल्प नहीं है। मैं यह कैटेगरीकली कहना चाहता हूं इतिहास को अगर समझना है, मैं वाकिफ हूं आधुनिकतावाद से उत्तर आधुनिकतावाद से अस्मितावाद से मार्क्स और आधुनिक सोच की सारी उत्तर आधुनिक आलोचनाओं से वाकिफ हूं बखूबी वाकिफ हूं। सारी नारीवादी आलोचनाओं से मैं वाकिफ हूं। और उस वाक्फियत के साथ मैं यह कहना चाहता हूं कि इतिहास की हर परिघटना का अंततः एक भौतिक आाधार होता है। किसी भी समाज के बनने बिगड़ने की अंततः एक भौतिक और आर्थिक आधार... होती है उसे समझे बिना आप किसी समाज के या मनुष्यमात्र के इतिहास को नहीं समझ सकते। इस बात को समझने की जरूरत है। और इसके उदाहरण हमारे आसपास फैले हुए हैं, स्थूल से लेकर सूक्ष्म तक।

इन्फरमेशन टेक्नाकलाजी के विस्फोट ने मानवीय संबंधों को कितना प्रभावित किया है इस पर अब चिन्ता प्रकट की जाने लगी है। आयरनिकली फेसबुक पर ऐसे विज्ञापन जारी किए जाने लगे हैं जिसमें हम देखते हैं कि पूरा परिवार डाइनिंग टेबल पर बैठा है और हरेक का ध्यान अपने-अपने स्मार्ट फोन पर है। मानवीय संबंधों में आ रहे इस अकेलेपन का एक गहरा ऐतिहासिक भौतिक आधार है और वह भौतिक आधार है ये टेक्नालाजी का ये इनोवेशन तो पहली बात तो मैं यह कहना चाहता हूं कि अगर हम किसी सामाजिक परिघटना को इतिहास को समझना चाहते हैं तो ऐतिहासिक भौतिकवाद का कोई विकल्प नहीं है, नम्बर एक। अगर हम मनुष्य के भविष्य के बारे में सोचना चाहते हैं और अगर हम मनुष्य के लगभग सुनिश्चित सर्वनाश से बचना चाहते हैं तो गांधी दृष्टि का कोई विकल्प नहीं है। ये दोनों बाते मैं एक साथ कहना चाहूंगा। अब आप चाहे तो मुझे मार्क्सवादी गांधीवादी कह लीजिए गांधीपंथी मार्क्सवादी कह लीजिए मैं इस मामले में गांधीजी को ज्यादा सही मानता हूं कलकत्ते में उनके खिलाफ नारे लग रहे थे कि गांधीवाद ...बाद गांधीवाद मुर्दाबाद तो गांधीजी तो गांधीजी थे, बहुत कम लोग इस बात को रियलाइज करते है कि काफी विटी थे। काफी शरारती थे बहुत गंभीर वंभीर दिखते थे लेकिन मन ही मन बहुत शरारती व्यक्ति थे। वो खट से बाहर आये हैदरी हाउस की बालकानी में बोले ये नारा आपका बिल्कुल सही है। अगर गांधीवाद जैसी कोई चींज है तो उसे मुर्दाबाद हो ही जाना चाहिए। मैं बिल्कुल नहीं चाहता कि मेरे नाम से कोई वाद चले पूरा उनका उस पर भाषण है जो उपलब्ध है पढ़ा जा सकता है तो वाद वगैरह अपनी जगह लेकिन इस बात को हम लोग अपने ध्यान में रखे कि ऐतिहासिक भौतिकवाद और भविष्य के उसके लिए भविष्य के निराकरण के लिए या भविष्य के बारे में सोचने के लिए गांधी दृष्टि का सचमुच कोई विकल्प नहीं है। यह हमे समझना चाहिए।

गांधीजी के बारे में एक अजीब सी धारणा ये भी है कि वो साहित्य वगैरह के बारे में बड़ा चलताउ रवैया रखते थे। बहुत से लोगों को लगता है कि जैसे कि पोलिटिकल लीडर या सोशियल एक्टिविस्ट होता है जिसको लगता है कि वही कविता काम की है जो तत्काल क्रांति कर दे। गांधीजी का रवैया इतना स्थूल नहीं था साहित्य के बारे में और यह ध्यान रखना चाहिए आपको खास करके आज के जमाने में जबकि हमारे स्कूल से लेकर के यूनिवर्सिटी तक के कैरिकुलम में साहित्य और कला हाशिये के हाशिये पर भी नहीं बची है। किसी को परवाह नहीं है साहित्य और कला की। तब ये याद रखना चाहिए कि एक बार काका कालेलकर ने गांधीजी से पूछा था कि आप सार्वजनिक जीवन में आ गए कुछ आपको कसकता है कुछ लगता है कि कुछ बलिदान जैसा आपने किया तो कालेलकर ने उम्मीद की थी कि उन्होंने लिखा है कि उम्मीद की थी कि गांधीजी कहेंगे कि अपने परिवार के साथ समय नहीं बिता पाता परिवार के साथ जो संबंध है उनका बलिदान मुझे करना पड़ा। गांधी ने कहा कि नहीं बलिदान फलिदान क्या बस एक चींज जरूर है अगर आप चाहे तो उसे बलिदान कह ले कि मुझे नाटक देखने और साहित्य पढ़ने का समय नहीं मिल पाता, दिस इज गांधीजी। और तब कालेलकर ने आगे प्रोब किया तो मालूम पड़ा कि जब इंग्लैण्ड में रहते थे उस समय के सारे लोकप्रिय अभिनेता-अभिनेत्री गांधी जी को याद थे और उनका बड़े लगाव के साथ जिक्र कर रहे थे कि फलाना एक्टर बहुत अच्छा रोल करता था, फलानी एक्ट्रेस कमाल का वो करती थी और उसके हेमलेट का तो जवाब ही नहीं एण्ड आल दैट।

और इसलिए यह बहुत स्वाभाविक है कि गांधीजी ने भगवतगीता पर टिप्पणी करते हुए एक बात कहीं थी टिप्पणी करते हुए नहीं भगवतगीता के प्रसंग में एक बात कही थी और ये बात भी जब मैंने अपने फेसबुक पर कोट कर दी तो बहुत सारे लोग मैं कल्पना कर सकता था कि उनका मुंह आश्चर्य से खुले का खुला रह गया कि गांधीजी ये बात कहेंगे ये तो ठेठ लिटररी थ्योरी की बात है। गांधीजी बहुत पढ़ते थे, उन्हें मजा आता था एक तरह से अपनी इमेज बनाने कि ज्यादा नहीं पढ़ते बहुत पढ़ाकू व्यक्ति थे गांधीजी ये धारणा जिसके भी मन मे हो वो इसको दूर कर दे कि गांधीजी का पढ़ने लिखने से कोई खास वास्ता नहीं था या साहित्य के बारे में उनका चलताउ रवैया था। ये ध्यान रखिए कि पांडेय बेचन शर्मा उग्र की कृति घासलेट उनके सामने अश्लील कहकर प्रस्तुत की गई थी ताकि कुछ निंदा उस कृति की हो सके और इसी लिहाज से उन्हें मधुशाला सुनाई गई थी कि उनकी निंदा हो सके। गांधीजी ने दोनों कृतियों के बारे में कहा कि ये तो बड़ी सुन्दर कृतियां हैं इनमें मुझे कुछ आपत्तिजनक नहीं लगा और शिकायत करने वाले दुखी हुए कि लीजिए साहब ऐसी ऐसी किताबों की गांधीजी ने तारीफ कर दी क्योंकि गांधीजी जानते थे कि साहित्य साहित्य होता है पैम्फलेट नहीं होता।

गांधीजी ने भगवतगीता के प्रसंग में लिखा है कवि जब किसी ग्रंथ की रचना करता है तो वो उसके सभी अर्थों की कल्पना नहीं कर लेता, कवि जब किसी ग्रंथ की रचना करता है तो वो उसके सभी अर्थों की कल्पना नहीं कर लेता, काव्य की खूबी यही है कि वो कवि से भी आगे बढ़ जाता है। इसीलिए अपने नितांत निजी पलों में अपने सामाजिक और राजनैतिक संकट के पलों में हमें ऐसी ऐसी पंक्तियां कोट करते हैं जिनके बारे में कवि ने कल्पना भी नहीं की होगी कि वह ऐसे भी कोट की जा सकती है। यही साहित्य की अद्वितीय विशेषता है। साहित्य अपने देश और काल को पार सकता है गालिब को हुए कितने दिन हो गए हो सकता है बहुत से लोगों को गालिब का पूरा नाम तक ना मालूम हो लेकिन गालिब के मिसरे उत्तर भारत में बहुत से लोगों की जुबान पर सहज रूप से चलते हैं। तुलसीदासजी की पंक्तियां उत्तर भारत की पूरी सामाजिक संस्कृति में मुहावरे की हैसियत रखती है और इसलिए जयवर्धन जी भक्ति वेदान्त गोस्वांमी को पढ़ रहे हैं, बहुत अच्छा कर रहे हैं गीता पढ़नी है तो अनासक्तियोग पढ़ियेगा अनासक्तियोग गीता पर गांधीजी की टीका का नाम है। उसे पढ़कर आपको अधिक लाभ होगा ऐसा मेरा मानना है बाकी आप तय कीजिएगा। ये उसी में से कोट कर रहा हूं मैं कि कवि जब किसी ग्रंथ की रचना करता है तो उसके सभी अर्थों की कल्पना नहीं कर लेता काव्य की खूबी यही है कि वह कवि से भी आगे बढ़ जाता है।

मित्रों! गांधीजी का जीवन स्वयं एक काव्य था। और ऐसा काव्य था, जो कवि से भी आगे बढ़ गया जिसकी अर्थछवियों की कल्पना संभवतः स्वयं कवि अर्थात् गांधीजी भी नहीं कर सकते थे और प्रमाणस्वरूप मैं हो-ची-मिन्ह को उद्धृत करना चाहता हूं के. दामोदरन की भेंट हुई थी हो-ची-मिन्ह से 1960 में और के. दामोदरन आपलोग जानते हैं कम्युनिस्ट पार्टी के बहुत बड़े महत्वपूर्ण नेता थे, आइडिया ... थे उनकी किताब ‘इंडियन थॉट ऑफ क्रिटिकल सर्वे‘ फिलासफी के विद्यार्थियों द्वारा गंभीरता से पढ़ी जाती है तो के. दामोदरन हो-ची-मिन्ह से मिले 1960 में और उन्होंने पूछा कि 1925 में वियतनाम में कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना हुई 1925 में भारत में कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना हुई आप यहां फ्रेंच इम्पीयरियलिज्म का प्रतिरोध करते आज कम से कम आधे वियतनाम पर आपका शासन है और हमलोग ठीक है हमारी स्थिति है लेकिन क्रांति तो हमें भारत में अभी दूर दूर तक नजर नहीं आती इसका क्या कारण आपको लगता है हो-ची-मिन्ह ने उत्तर दिया कि भारत में आप कम्युनिस्ट, गांधी को समझ नहीं सके। वियतनाम में गांधी मैं हूं अंतर ये है, ये हो-ची-मिन्ह का उत्तर है, रिकार्डेड है, और उसमें आगे उन्होंने कहा, जाहिर है कि दामोदरन चकित हुए कि आप कहना क्या चाहते हैं तो उन्होंने एक्स्प्लेन किया कि जाहिर है कि गांधीजी नान वायलेंस में विश्वास करते थे मैं रिवाल्यूशनरी हूं और उसी में एक चुटकी भी ली हो-ची-मिन्हि ने जैसे आप जिनसे प्रेम करते हैं उनसे ली जाती है कि गांधीजी का पाला अगर फ्रेंचों से पड़ा होता तो शायद उतने अहिंसक न रह पाते अंग्रेजों के साथ अहिंसा चल गई फ्रेंच लोगों के साथ शायद अहिंसा उतनी न चलती लेकिन बहरहाल वे अहिंसक थे हम तो क्रांतिकारी हैं हमारी रणनीति अलग तरह की है लेकिन फिर भी मैं आपसे यह कहना चाहता हूं कि न केवल मैं बल्कि दुनिया भर में कहीं भी स्वाधीनता और बदलाव के लिए लड़ रहा कोई भी व्यक्ति महात्मा गांधी की संतति है वी आल आर प्रोजोनीज ऑफ महात्मा गांधी ये होती है, हम सब उनकी संतान हैं सहमत असहमत अपनी जगह है रणनीति कुछ और हो सकती है। जो भी हो सकता है। ठेठ अहिंसक रणनीति पर चलते हुए मार्टिन लूथर किंग ने अमेरिका में रंगभेदी कानूनों को खत्म करने का आंदोलन चलाया। ठेठ अहिंसक रणनीति पर चल कर और अहिंसा पर उठाए जाने वाले संदेहों का सब से मार्मिक उत्तर मेरी दृष्टि में मार्टिन लूथर किंग ने ही दिया है जब उन्होंने कहा कि द च्वाइस इज नॉट एनी मोर बिटविन वायलेंस एंड नॉन-वायलेंस, द च्वाइस इज बिटविन नॉन वायलेंस आर नान एक्जिस्टेंट या तो अहिंसा और या सर्वनाश, हिंसा और अहिंसा के बीच चुनाव की स्थिति नहीं है क्यों कि न्यूक्लीयर बम बन चुका है, हाइड्रोजन बम बन चुका है और अब तो इन्फर्मेशन टेक्नालॉजी के जमाने में आप जानते ही हैं कि बम बनाना और आत्महत्या करना इसके तरीके भी ऑनलाइन सिखाए जाते हैं।

तो इसलिए मित्रों! आज के विषय में जो आज आप लोगों ने टॉपिक तय किया प्रासंगिकता मैं विनम्रतापूर्वक कहना चाहता हूं कि आज की दुनिया में गांधी की प्रासंगिकता मेरे लिए विचार का विषय नहीं है वह स्वयंसिद्ध है एक्सयिम जैसे गणित में आप रोजाना नहीं सिखा सकते बच्चेे को कि दो और दो चार होते हैं अगर मैं बी ए मैथमेटिक्स की क्लास में मास्टर से कहूं कि आप सिद्ध कर के दिखाइए कि दो और दो चार होते हैं तो वो सिद्ध तो करेंगे लेकिन संभवतः वो एक और योगदान कर दें मेरे गाल पर क्योंकि आप रोज रोज एक्सयिम को नहीं सिद्ध करते हैं ‘एक्सयिम्स आर बिकाज दे आर एक्सयिम्स‘ तो मेरे लिए गांधीजी की प्रासगिकता आज की दुनिया में स्वयंसिद्ध है मैं इस पर कोई विवाद और विमर्श की गुंजाइश ही नहीं देखता और क्यों ऐसा मैं कह रहा हूं अगर आप आज की दुनिया की विविध समस्याओं विविध चुनौतियों को दो तीन मुद्दो में दो तीन हेड्स में कन्साइज करें तो मेरा ख्याल है कि आपलोग सहमत होंगे अगर ये कहा जाय कि एक समस्या है पर्यावरण को ले कर के हमने विकास का जो मॉडल अपनाया है। 

आपके बस्तर में कलेक्टर रहे हैं डॉक्टर ब्रह्मदेव शर्मा पुराने लोग जानते होंगे और उन्होंने जिस तरह की कलेक्टरी की वो अपने आप में एक ऐतिहासिक चीज है उन्होंने एक बहुत महत्वपूर्ण पुस्तक भी लिखी और चूंकि वो अपने उस तरह के एकैडमिक नहीं थे और अपने जिसको कहते हैं कि आत्मप्रचार से दूर रहने वाले व्यक्ति थे उस पुस्तक पर लोगों ने ध्यान नहीं दिया, लेकिन मैं आपसे निवेदन करूंगा कि उस पुस्तक को प्राप्त कर के अवश्य पढ़ें द वेब ऑफ पावर्टी, गरीबी का मकड़जाल, अद्भुत किताब और उस पुस्तक में डॉक्टर शर्मा ने मैथमेटिक्स के थे डॉक्टर शर्मा मूल रूप से तो उन्होंने दुनिया भर के पृथ्वी भर के उपलब्ध रिसोर्सेज का एक तरह से गणितीय आकलन कर के उस पुस्तक में सिद्ध किया है कि अगर सारी दुनिया अमरीकी और पश्चिमी यूरोप के तथाकथित स्टैंडर्ड ऑफ लिविंग को अपनाना चाहे तो एक पृथ्वी पर्याप्त नहीं है आपको कम से कम छः और पृथ्वियों की जरूरत है क्योंकि पृथ्वी के पास उतने रिसोर्सेस हैं नहीं कि आप उस तरह का तथाकथित स्टैंेडर्ड ऑफ लिविंग आपके चालीस मंजिला हाई राइज सारी दुनिया में बना सकें उसके लिए छः पृथ्वियों की जरूरत पड़ेगी आप जिस तरह के विकास की परिकल्पना हमारे सामने है आप पर्यावरण की चिंता कितनी भी कर लें लेकिन बात वही है कि गुड़ खायेंगे, गुलगुलों से परहेज करेंगे जिस तरह का क्यों नहीं साहब उस नौजवान की चिंता और उस नौजवान की एक तरह से मैं कहूंगा ईप्सा जाहिर जायज है क्यों केवल अमेरिका में ही सौ मंजिल की इमारत होनी चाहिए क्यों केवल दिल्ली में ही साठ मंजिल की इमारत होनी चाहिए क्यों केवल दिल्ली को ही ये गौरव प्राप्त हो। 

आपलोग जानते होंगे मैं उस महान नगर का वासी हूं जिसमें इस समय अधिक नहीं केवल एक करोड़ पचास लाख कारें पाई जाती हैं यही स्थिति रायपुर में कल मुझे लग रहा था कि जल्दी यहां भी होने वाली है तो विकास का अगर यही मॉडल है तो फिर एक पृथ्वी से काम नहीं चलना है आपका ये तय है पृथ्वी लेकिन दुर्भाग्य से एक ही है साइंस फिक्शन में आप मंगल वंगल पर जा कर रह लेते हो आपने भी पढ़े हैं ऐसे साइंस फिक्श्न मैंने भी पढ़े हैं लेकिन वह अगले सौ दो सौ साल तो संभव नहीं है तो एक तो ये पर्यावरण की चुनौती दूसरी संरचनागत अन्याय के अनेक रूप और मैं व्यक्तिगत अन्याय की बात नहीं कर रहा हूं वह एक अलग मसला है वह इसी में शामिल है संरचनागत अन्याय आपकी व्यवस्था ऐसी है कि उसमें अन्याय अंतर्निहित है वो अन्याय वर्ग के आधार पर हो सकता है वो अन्याय आपके स्किन कलर या रेस के आधार पर हो सकता है जाति के आधार पर हो सकता है लिंग के आधार पर हो सकता है मजहब के आधार पर हो सकता है लेकिन दुनिया भर में स्ट्रक्चरल इनजस्टिस के कई रूप अभी तक वर्तमान हैं कई दूर हो गए लेकिन कई अभी तक वर्तमान हैं दासता गैरकानूनी है लेकिन दासता के कानूनी रूप अभी तक वर्तमान हैं। 

हम और आप सब जानते हैं हम आप यह भी जानते हैं कि मनरेगा को ले कर के कुछ लोगों की चिंता यह थी और अभी भी है कि अगर ग्रामीण इलाकों से डिस्ट्रेस माइग्रेशन नहीं होगा तो उद्योगों को सस्ते मजदूर कैसे मिलेंगे याने महानगरों का विकास कैसे होगा जब तक गांवों में भुखमरी के कारण किसान छत्तीसगढ़ और आंध्र छोड़कर दिल्लीे और मुंबई में मारा-मारा न फिरे तो हमें सस्ती हाउस मेट कैसे मिलेगी हमें अपनी डोमेस्टिक हेल्पर के निहोरे करने पड़ते हैं, नाराज हो जाती है तो मनाना पड़ता है उसे दिल्ली में, क्योंकि जो मार्केट है वो उसके फेवर में है। उसे दूसरा घर मिलने में एक दिन लगेगा, मुझे दूसरी हाउस मेट ढूंढने में दस दिन लग जाएंगे तो ये तो अन्याय हो गया न भई अब कैलाश कॉलोनी संभ्रांत कालोनी दिल्लीे की उसके एक संभ्रांत सम्पन्न लोगों की कालोनी उसमें निवासी एक परिवार उसको एक हाउस मेट आंख दिखाएगी ये कैसे हो चलेगा इसलिए ये मनरेगा गड़बड़ चीज है डिस्ट्रेस माइग्रेशन की स्थितियां बनी रहनी चाहिए ताकि मजूर सस्ता और मजबूर हासिल हो, दिस इज वन फार्म आफ स्ट्रक्चरल इनजस्टिस एंड देअर आर मेनी। 

तीसरी जो चीज है संवेदना का घोर अभाव और नित नये अन्यों की रचना अगर वह मेरे जैसा नहीं है मित्रों मुझे बहुत अटपटा लगता है मैं शाकाहारी हूं लेकिन मेरे लिए यह अकल्पनीय है कि किसी व्यक्ति की देशभक्ति पर या उसकी इंसानियत पर या जीने के हक पर इसलिए सवाल उठा दिया जाय कि वह मांसाहार करता है मैं व्यक्तिगत रूप से शाकाहारी हूं जब आप यह कहते हैं कि हम आपको सारे अधिकार देंगे बशर्ते आप हमारे जैसे हो जांय तो आप समता और लोकतंत्र की जड़ पर कुठाराघात कर रहे हैं क्योंकि सब मेरे जैसे हो जांय तभी अधिकार मिलेंगे ये कोई बात नहीं होती इसका कोई मतलब नहीं होता ये न्या्य की बात नहीं है ये तानाशाही है मैं ऐसी व्यवस्था की कल्पना नहीं कर सकता और ऐसी व्यवस्था को खुलेआम तानाशाही व्यवस्था कहूंगा जो मुझसे कहे कि रमजान के दिनों में आप भोजन नहीं करेंगे आप मत कीजिए आपको नहीं करना है तो मैं तो करूंगा या जो मुझसे ये कहे हम अपने घरों में देखते हैं घरों में बच्चे, कम से कम मेरे घर में बच्चे इस बात को ले कर विद्रोह करते हैं और किया है मैंने खुद किया है मेरी इच्छा होगी तो एकादशी का व्रत रखूंगा वरना नहीं रखूंगा अगर मुझे इस बात के लिए मेरे पिताजी अपना बेटा मानने से इनकार कर दें कि मैं एकादशी का व्रत नहीं रखता हूं या कोई राज्य मुझे अपनी नागरिकता से वंचित कर दे कि मैं ये व्रत नहीं रखता या वो व्रत नही रखता या ऐसा कपड़ा नहीं पहनता वैसा कपड़ा नहीं पहनता ये नहीं चलेगा। ये जो हिंसकता हिंसा मित्रों मैंने कल्पना भी नहीं की थी। 

जब हम नौजवान थे हम भी बहुत गुस्सैल थे, जोशीले थे अभी भी गुस्से का न होना मेरे गुणों में नहीं गिना जाता मैं अपने आपको यह कह कर खुश होता रहता हूं कि मेरा गुस्सा खत्म हो गया है पत्नी या बच्चे या मित्र धीरे से बताते हैं कि भाई साहब हकीकत कुछ और है आप थोड़े कम हो गए हैं बाकी वैसे आप थोड़ा सा डिग्री का अंतर आया है ऐसा कुछ नहीं है कि आपका गुस्सा-वुस्सा खत्म हो गया है लेकिन रोडवेज आप मेरी गाड़ी को साइड नहीं देंगे मैं अपनी गाड़ी से उतरूंगा ग्लोव कंपार्टमेंट से पिस्टल निकालूंगा और आपको शूट कर दूंगा आप मेरे घर के सामने वाली पार्किंग जहां मैं करता हूं गाड़ी की वहां संयोग से आपने अपना स्कूटर लगा दिया है तो मैं आपको बारंबार अपनी गाड़ी से कुचलूंगा तब तक जब तक कि आप एक पल्प में तब्दील न हो जांय इतनी घृणा, इतना गुस्सा, इतना आक्रामक स्वभाव हमलोगों का बना हुआ है ये कैसे हुआ है और क्यों हुआ है हिंसा ...। 

मैंने इस समाज में कभी कल्पना नहीं की थी कि एक बात आपसे स्पष्ट कहूं किसी को बुरा लगे तो मैं माफी चाहता हूं दंगे की स्थिति में होने वाली हत्याएं बहुत बुरी होती हैं लेकिन वो फिर भी समझी जा सकती हैं क्योंकि एक मॉब मेन्टिलिटी या दो मॉब्स आपस में टकरा रहे हैं राइटर्स के दो समूह आपस में टकरा रहे हैं दो चार लोग इधर के मारे गए दो चार लोग उधर के मारे गए ये मैं समझ सकता हूं, समझ सकता हूं याने एक आब्जर्वर के तौर पर आप मैंने कल्पना नहीं की थी दोस्तों कि मैं भारत में लिंचिंग को वास्तविकता बनते देखूंगा। पचीस पचास लोग इकट्ठे होते हैं किसी आदमी को गाड़ी से या ट्रेन से या बस से या सायकिल से खींच कर पब्लिकली पीट-पीट कर मार डालते हैं और इस समाज के टेलीविजन को उस दिन भी सबसे महत्वपूर्ण खबर ये लगती है कि इंद्राणी मुखर्जी के साथ जेल में क्या हो रहा है इट इज द लेवल ऑफ इनसेंसिटिविटी और ये सारी दुनिया की हालत है। 

दोस्तों! ये केवल भारत की स्थिति नहीं है सारी दुनिया की स्थिति है अपनी अपनी आइडेंटिटी के नाम पर जिस तरह के तमाशे दुनिया भर में हो रहे हैं आज उनमें से कुछ हास्यास्पद हैं अस्मिता विमर्श के नाम पर अस्मिताओं के संरक्षण के नाम पर जिस तरह की स्थितियां यूएसए और पश्चिमी यूरोप में बन रही हैं वहां आलम ये है कि अगर एक एप्रोप्रिएशन एक शब्द चल गया है अगर किसी कल्चरल फंक्शन में किसी फैंसी ड्रेस इवेंट में या ऐसे किसी उसमें किसी गोरे ने भारतीय परिधान पहन लिया तो वो पॉलिटिकली इनकरेक्ट हरकत है क्यों्कि आप उनको एप्रोप्रिएट कर रहे हैं मेरी बेटी कुछ दिन पहले ऑक्सफोर्ड गई हुई थी अपनी किसी दोस्त के साथ छुट्टियां मनाने तो वो जो लड़की है जिसके साथ ये गई थी मेरी बेटी उसके कॉलेज का फंक्शन था तो वहां एक गोरी लड़की को उनलोगों ने साड़ी पहना दी और उन दोनों लड़कियों ने और उस लड़की को ले गए उस फंक्शन में तो उसकी और इन तीनों की जो क्लास उन पोलिटिकली करेक्ट़ लोगों ने ली कि गोरे होकर आप साड़ी पहनते हैं यू आर ट्राइंग टु एप्रोप्रिएट इंडियन कल्चर मुझसे खुद यूएसए में एक बहुत बड़ी विदुषी जो ज्ञाता हैं कबीर की, उन्होंने मुझसे काफी अपोलॉजिक ढंग से कहा कि सी बीइंग अ वइट वूमन आइ कुड नॉट से अबाउट कबीर व्हेन यू आर प्रेजेंट तो मैंने कहा कि ये आप मेरी प्रशंसा में कह रही हैं ये मुझे निंदा जैसा लग रहा है क्योंकि मेरा दिमाग थोड़ा दूर तक चलता है, थोड़ा शरारती दिमाग है मैंने कहा कि इस लॉजिक से हम हिन्दुस्तान में शेक्सपियर से ले कर के जेन ऑस्टिन तक को नहीं पढ़ा सकते क्योंकि कहां से इतने अंग्रेज लाएंगे पढ़ाने के लिए अगर ब्रिटिश लेखकों को केवल ब्रिटिश ही पढ़ा सकते हैं अगर कबीर के बारे में एक भारतीय या केवल हिन्दीभाषी ही बात कर सकता है क्या किस दुनिया की बात हम कर रहे हैं अगला कदम ये होगा कि गांधी के बारे में केवल गुजराती बात करे या केवल अखिल भारतीय बनिया सभा वाले बात करें चतुर-वतुर तो उन्हें कहा ही जा चुका है ये जो आत्म का संकुचन है ये बहुत बड़ी समस्या है दुनिया के सामने अन्य का अनवरत विस्तार और आत्म का अनवरत संकुचन ये तीन समस्याएं मैं मानता हूं।

मित्रों! विकास की भ्रष्ट अवधारणा के कारण उत्पन्न हुआ पर्यावरण संकट, संरचनागत अन्याय के अनेक रूप और आत्म का संकुचन और अन्यता का अनवरत विस्तार इन्हीं चीजों से हिंसा उत्पन्न होती है चाहे व्यक्ति की चाहे राज्य की राज्य हिंसा क्यों करता है राज्य हिंसा तब करता है जब जानता है कि उसे प्रजाति या जनता की सहमति और भागीदारी सहज रूप से उपलब्ध नहीं है लोग हिंसा क्यों करते हैं लोग हिंसा तब करते हैं जब उन्हें यह यकीन दिला दिया जाता है कि अहिंसक ढंग से कही गई उनकी बातों को कोई सुनेगा नहीं तो ये जो सारी स्थिति है इसमें कैसे, ये दावा मैंने क्यों किया कि गांधी की प्रासंगिकता स्वयंसिद्ध है ये दावा मैंने क्यों किया मित्रों गांधीजी हम सब जानते हैं कि गांधीजी के लिए अहिंसा एक केन्द्रीय बिंदु था और यहां मैं दो बातों की ओर आप सबका ध्यान खींचना चाहता हूं...

और यहां दो बातों की ओर मैं आपका ध्यान खींचना चाहता हूं। गांधीजी ये कहते थे बार-बार उन्होंने कहा अंग्रेजी में मुहावरा है सत्य अहिंसा, ... एंड नान-वायलेंस आर एज ओल्ड एज ... मैं कोई नई बात नहीं कह रहा हूं सत्य और अहिंसा तो शाश्वत सच्चाई है मैं कोई नई बात नहीं कह रहा हूं मैं सत्य के बारे में तो नहीं कह सकता उस पर सोच रहा हूं काम कर रहा हूं आगे कुछ कहूंगा अहिंसा के बारे में मैं महात्मा गांधी से विनम्रतापूर्वक असहमत हूं। अहिंसा इज सर्टेनली एज ओल्ड एज ... लेकिन गांधीजी की अहिंसा की अवधारणा केवल पारंपरिक अहिंसा का विस्तार नहीं है वो उनकी मौलिक सोच का प्रमाण है पारंपरिक अहिंसा में और ... हिंसा में आप देखेंगे दो तरह की हिंसा होती है एक होती है पवित्र हिंसा एक होती है अपवित्र हिंसा आप निजी स्वार्थ के लिए हिंसा करते हैं तो वो बड़ी हिंसा या पवित्र हिंसा है आप देश के लिए समुदाय के लिए धर्म के लिए हिंसा करते हैं तो वो सही हिंसा है आर्थर कोएस्लर ने एक बहुत भयावह कैलकुलेशन दिया था और वो कैलकुलेशन ये था जितने भी अभिलेख उन्हें उपलब्ध हुए जितने भी रिकाडर््स उन्हें उपलब्ध हुए उन्होंने ये निष्कर्ष उससे निकाला कि दुनिया भर की सभ्यता के ज्ञात इतिहास में व्यक्तिगत उद्देश्यों से किए गए हत्या और बलात्कारों की संख्या, महान उद्देश्यों के लिए की गई हत्या और बलात्कारों की तुलना में पासंग भी नहीं है, नाट इवन वन परसेंट मर्डर्स एंड रेप्स ... ... ... फार इंडिविजुअल मोटिव्स आफ दि एंटायर नंबर आफ रेप एंड मर्डर।

गांधी जिस लिहाज से विलक्षण दार्शनिक थे इस दुनिया के इतिहास में मैं ये विनम्रतापूर्वक कहना चाहता हूं पहले व्यक्ति हैं जो अपवित्र ही नहीं, बल्कि पवित्र हिंसा को भी ... ... वो किसी हिंसा को इसलिए जायज नहीं ठहरा देते कि वो किसी हिन्दुस्तानी के द्वारा किसी अंग्रेज के खिलाफ की गई हिंसा है ये उनकी मौलिकता है क्योंकि बाद में चलकर जैसे आना एंट ने कहा गांधीजी इस बात को जानते थे अपने अनुभव से अपनी अंतर्दृष्टि से कि हिंसा से बदलाव तो जरूर आता है यहां है अहिंसा वाले हिंसा से दुनिया बदलती है लेकिन बेहतर नहीं बल्कि बदतर दुनिया की तरफ आप देख रहे हैं कि जो हिंसा के प्रति उदासीनता और अवहेलना और हिंसा को सहज मानने का काम हम लोग पिछले तीस पैंतीस साल से करते चले आए हैं होम्योपैथी डोज में उसको लेते चले आए हैं उसी का नतीजा है कि आज वो एक भयानक महामारी की तरह फूट रही है फैल रही है और अब स्थिति ये हो गई है मुझे आज तक याद है सन सरसठ में प्रदेश भर में छात्र आंदोलन हुआ था, मैं ग्वालियर में रहता था उम्र मेरी बाइस साल थी ग्वालियर में पुलिस ने गोली चलाई थी एक लड़का मर गया सारे शहर में कर्फ्यू लग गया था एक लड़के के मरने पर और अगले दिन हमने दिल्ली के अखबारों में देखा बैनर हेड लाइन थी ग्वालियर में गोली चली एक मरा आज बैनर हेड लाइन के लिए कम से कम सौ को मरना पड़ेगा वरना वो खबर पांचवें पन्ने पर एक कालम में छपेगी इतनी सी वी हैज ... ... वाइलेंस ... दिस वी हैड ... ... अदर फेस ... ... जो घृणा और हिंसा के विरुद्ध आवाज उठाते हैं उनसे सवाल पूछना मैं राजनीति की बात नहीं कर रहा हूं मैं सचमुच नहीं कर रहा हूं मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता कि ये राजनीति इस तरफ की है या उस तरफ की ये वाम की है ये दक्षिण की है मेरी चिंता एक इंसान की चिंता है मेरी चिंता एक नागरिक की चिंता है कि मीडिया को या राजनेता को या किसी भी एथारिटी को सवाल उनसे पूछने चाहिए जो हिंसा और घृणा कर रहे हैं आप सवाल उनसे पूछ रहे हैं आप नीयत उनकी संदिग्ध बता रहे हैं जो हिंसा ... ... कि जैसे कहते हैं समथिंग इज ... ... कहीं कुछ गहरी गड़बड़ है समथिंग इज रियली रॉटन इन ...

मित्रों! दूसरी बात जो मैं हिंसा के प्रसंग में मैं कहना चाहता हूं गांधीजी की अहिंसा मौलिक है लेकिन हम ये न भूलें अगर मैं गलत हूं तो .... बैठे हैं वो करेक्ट करें जो थोड़ी बहुत जानकारी दुनिया भर की सोच और इतिहास की मुझे है उसके आधार पर मैं ये निवेदन कर रहा हूं गांधीजी एक ऐसी परंपरा में अवस्थित थे गांधीजी एक ऐसी चिंतक प्रस्थित व्यक्ति थे जो कम से कम पिछले ढाई हजार साल से हिंसा और अहिंसा पर विचार करती रही है ग्रीक फिलासफी का सेंट्रल कन्सर्न वायलेंस नहीं था चाइनीज फिलासफी का सेंट््ल कन्सर्न वायलेंस नहीं था महात्मा बुद्ध और महात्मा महावीर को उत्पन्न करने वाली इंडियन फिलासफी का सेंट््रल कन्सर्न वायलेंस था और ये गांधीजी से ... ... हम सब जानते हैं महाभारत के युद्ध के बारे में भयानक युद्ध के बारे में मैं इन दिनों महाभारत पर काम कर रहा हूं, आपलोगों के आशीर्वाद से जल्दी ही पुस्तक आएगी महाभारत पर इसलिए भी कतरा रहा था यहां आने से कि काम छोड़ के यहां ... तो महाभारत आरंभ होता है अहिंसा परमो धर्मः से और महाभारत समाप्त होता है अहिंसा परमो धर्मः से महाभारत के आरंभ में कथा दी जाती है दी गई है कि रुरु नाम के सज्जन थे उनका कुछ क्रोध आ गया उन्हें किसी पर और उस प्रजाति से जुड़े हुए हर व्यक्ति को मारने पर उतारू हो गए जैसे आजकल भी बहुत से लोग करते हैं आप जानते हैं कि कोई फलानी जाति फलाने मजहब के आदमी ने मेरे पिताजी के पिताजी के साथ अन्याय किया था तो आज मैं सबसे बदला ले के रहूंगा रुरु के साथ तो खुद के साथ अन्याय हुआ था तो वो सबको मारने पर तुले थे तो उनसे किसी ने कहा कि तुम मनुष्यों में श्रेष्ठ हो क्योंकि ब्राह्मण हो प्राणियों में श्रेष्ठ हो क्योंकि मनुष्य हो तुम्हें ये बात समझनी चाहिए कि सबसे बड़ा धर्म अहिंसा है तो रुरु ने कहा कि ये आप कैसे कह रहे हैं किस आधार पर कह रहे हैं सबसे बड़ा धर्म अहिंसा है तो वो जो कहने वाले थे उनको, उन्होंने कहा कि जाओ अपने पिताजी से पूछना वे तुम्हें समझाएंगे मेरे लिए तो सबसे बड़ा धर्म अहिसा है रुरु आए अपने पिता प्रत्यीच उन्होंने पूछा और उसके जवाब में प्रत्यीच ने उन्हें महाभारत की कथा सुनाई हमलोग जानते हैं कि महाभारत की कथा के कई श्रोता हैं कई वक्ता हैं तो एक श्रोता रुरु हैं और एक वक्ता प्रत्यीच हैं और वो ये सिद्ध करने के लिए दृष्टांत के तौर पर महाभारत की कथा सुना रहे हैं कि ... अगर रवैया ये हो बिना तलवार से गुजरे सुई की नोक के बराबर भूमि नहीं दूंगा तो नतीजा महाभारत है इसलिए उन्होंने तुमसे कहा कि अहिंसा परमो धर्मः महाभारत के अंत में अनुशासन पर्व तक पहुंचते पहुंचते हम देखते हैं कि कृष्णजी एक उपदेश देते हैं अणुगीता का और ये अणुगीता युधिष्ठिर को सुनाई गई थी एक साथ में श्रोता अर्जुन भी थे जो आपने युद्ध के दौरान उपदेश दिया था थोड़ा मिस कर रहा हूं मैं भूल-भाल गया हूं तो कृष्ण ने डांटा कि खराब स्टूडेंट हो कहा कि चलो बैठो अच्छा चलो दुबारा तुम भी सुन लो तो वो अणुगीता और उसमें एक अद्भुत प्रसंग है उस प्रसंग में स्वयं ब्रह्मा के मुंह से कहलवा ... महाभारत के कवि ... अहिंसा सबसे बड़ा धर्म है और हिंसा सबसे बड़ा अधर्म है जिस तरह देवता ... से पहचाने जाते हैं उसी तरह मनुष्य अहिंसा से पहचाने जाते हैं अहिंसा मनुष्य होने का लक्षण है अहिंसा मनुष्य होने की डेफिनीशन है दिस इज महाभारत और महाभारत का रचनाकाल आपलोग जानते हैं कि मौखिक परंपरा में महाभारत कम से कम ढाई हजार साल पुरानी रचना है और उसका वर्तमान लिखित रूप अधिकतम दूसरी सदी ईस्वी में संपन्न हो चुका था आप कल्पना कीजिए कि भगवान बुद्ध और भगवान महावीर से ले कर के महाभारत के अनेक रचनाकार या कहिए कि एक एपोनिमस रचनाकार व्यास ने देअर सेंट्रल कन्सर्न इज वायलेंस इन नान वायलेंस क्योंकि ... केन्द्रीय चिन्ता अहिंसा थी।

मैंने एक उपन्यास लिखा पिछले दिनों दो साल पहले उसके पहले वो किताब जिसकी काफी चर्चा होती है ‘अकथ कहानी प्रेम की‘ तो अकथ कहानी प्रेम की किताब लिखी तो मगन हो गया कि क्या किताब लिख दी, मस्त हो गया मैं मुझे पता था कि किताब लोगों को पसंद आए न आए मैं जानता था कि किताब अच्छी लिख दी है लोगों को पसंद भी आई चर्चा-वर्चा भी हुई तो जब भी प्रसन्नता होती है ... उपन्यास भी बड़ा हिट हो गया अंग्रेजी में अनुवाद हो गया, मराठी में हो रहा है महाभारत जैसी रचना अगर हम में से किसी ने की होती तो अंत में उसे कैसा लगता वो नाचता खुशी के मारे क्योंकि स्कालरली दुनिया भर के स्कालर्स कि ऐसा महाकाव्य किसी भी सभ्यता में नहीं है इतना विशाल अपने कन्सर्न्स में इतना विराट और उसका ये दावा सही है वो कहते हैं ये दावा सही है कि जो इस ग्रंथ भारत में नहीं है वो इस देश भारत में नहीं है यद ना भारते तद ना भारते ... एंथ्रोपोलाजिकल सर्वे ऑफ इंडिया पढ़िए उन्होंने लिखा है कि बहुत सारे ऐसे ट्राइब जिनका उल्लेख महाभारत में है आज तक झारखंड में पाई जाती है ऐसी पुस्तक की रचना करने के बाद कवि को तो पागल हो जाना चाहिए लोग एक उपन्यास एक किताब एक कविता संग्रह पर नाचते फिरते हैं और किसी मित्र के मुंह से निकल जाए कि आपका कविता संग्रह नहीं देखा तो भौतिक रूप से न कर पाएं मन ही मन तो उसका ... कर ही देते हैं आपमें से कह दें कि पता नहीं कि आपकी किताब अकथ कहानी प्रेम की है आप देखेंगे मेरा चेहरा बिगड़ जाएगा मैं आपसे मिलाने के लिए बढ़ाया हुआ हाथ समेट कर किसी और से मिलाने चल दूंगा हमलोगों का तो ये आलम ... महाभारत का रचनाकार क्या कहता है ... आप पूरा पढ़ पाए न पढ़ पाएं आजकल इंटरनेट की मेहरबानी से सब ऑनलाइन उपलब्ध है उन आठ लोगों को जिनको भारत-सावित्री कहा जाता है जरूर पढ़िए और उस भारत सावित्री का पांचवां या छठां श्लोक है मित्रों कि मैं सारी उम्र हाथ उठा कर लोगों से ये कहता रहा कि धर्म का पालन करो अर्थ और काम अपने आप चले आएंगे मेरी कोई सुनता नहीं सारा महाभारत ... वेदव्यास ... कि वे सारे जीवन ये कहते रहे कि धर्म का पालन करो लेकिन किसी ने सुनी नहीं महाभारत इज ए पोयम ऑफ ग्रेट पोयम आफ ग्रेट डिसएप्वाइंटमेंट और उस डिसएप्वाइंटमेंट में ही आप देखेंगे कि इस जैसे हम भारतीय दर्शन या भारतीय संस्कृति कहते हैं उसकी परंपरा में हिंसा और अहिंसा का सवाल केन्द्रीय सवाल है और गांधी इस अर्थ में सही कह रहे थे कि वो इस परंपरा में स्थित हैं जिसमें महाभारत से आरंभ कर के बुद्ध और महावीर से लेते हुए अभिनवगुप्त तक।

अभिनवगुप्त आपलोग जानते होंगे ... दार्शनिक ... उद्भट विद्वान थे एव्री वन इज कन्सर्न विद वायलेंस एंड नानवायलेंस इसलिए मित्रों अहिंसा एक पारंपरिक दृष्टि हो सकती है लेकिन गांधी की अहिंसा की विलक्षणता इस बात में है कि पवित्र हिंसा अच्छी नहीं है हिंसा मात्र प्राब्लमेटिक लोगों को लग सकता है बहुत से लोगों को लगता है कि क्या सब हवाई बातें हैं गांधीजी तो बहुत ही इम्प्रैक्टिल आदमी थे हवा में रहते थे ऐसा है नहीं मैं खास कर के नौजवानों से निवेदन करूंगा गांधीजी की आत्मकथा पढ़ें मालूम पड़ जाएगा कि वो हवाई दिखने वाला व्यक्ति बहुत से प्रैक्टिल दिखने वाले लोगों से कितना ज्यादा घनघोर व्यक्ति था और उनके हर काम में एक बात और आप ध्यान दीजिए गांधी गजब के कम्युनिकेटर थे कम्युनिकेशन का कोई माध्यम नहीं था उपलब्ध जिसका उपयोग करने की अद्भुत दक्षता उनमें न हो और मेरा ये दावा है आज गूगल वालों ने एक विज्ञापन निकाला था बहुत पहले कुछ लोगों को आपत्तिजनक लगा था मुझे वह विज्ञापन बहुत सही लगा और वो विज्ञापन था कि गांधीजी एक लैपटाप पे ... ... पे सही है अगर गांधीजी आज होते तो सोशल मीडिया पर जो गंद फैल रहा है वो नहीं फैल पाता वो अकेले संभाल लेते दिन भर लगे रहते वो जानते थे कि पब्लिकेशन कैसे होता है अभी जिस दृश्य की चर्चा हुई और हमलोगों ने देखा हिन्दुस्तानी किसान के वस्त्र धारण करना वो केवल यह नहीं था वो थोड़ा सिम्प्लीफाई करती है उस बात को कई चीजों को सिम्प्लीफाई करती है एटिनबरो की फिल्म लेकिन ठीक है वो फिल्में सिम्प्लीफिकेशन तो स्वाभाविक है वो सिर्फ ये नहीं था कि मुझे इनके बीच रहना है इसलिए मैं ऐसे कपड़े पहनूंगा गांधी ने अपने कपड़ों के जरिये भी कुछ कम्युनिकेट किया उन्होंने एक स्टेटमेंट दिया और उनके अपने शब्द थे कि लज्जा निवारण और देह की रक्षा के लिए जितने जरूरी हैं उससे अधिक वस्त्र पहनने की ... जरूरत नहीं समझता दि इज द रियल मारल स्पिरिट और वो जब चर्चिल ने अधनंगा फकीर कहा, अधनंगा फकीर सम्राट से मिलेगा तो चर्चिल कुछ भी कहते रहें सम्राट ने तो बुलाया था नंगे फकीर को और फकीर मतलब वैसे ही गए जैसे जाते थे चादर जरूर ओढ़ ली थी उन्होंने कृपा कर के, तो प्रेस वालों ने पूछा कि आप इन्हीं कपड़ों में सम्राट से मिलने चले गए आपको ऑड नहीं लगा गांधीजी का उत्तर ध्यान से सुनिए, उसमें जो विट और जो व्यंग्य निहित है उसे एप्रीशिएट कीजिए द किंग हैज इनफ फार बोथ आफ अस, हिज मैजेस्टी हैज इनफ फार बोथ आफ अस ... ... ... ... न जाने कितने लोगों के लिए काफी है से ज्यादे की जरूरत नहीं है ये स्टेटमेंट गांधीजी ने अपने ... ग्रेट कम्युनिकेटर वेरी वेरी ...।

तो मित्रों! गांधीजी ने आत्मकथा में ... अहिंसा ... और जाहिर है कि उनलोगों को ध्यान में रख कर ... किया है जो अहिंसा को इम्प्रैक्टिल बताते हैं उन्होंने लिखा है कि इतना मैं भी जानता हूं कि मनुष्य होने के नाते हमलोग हिंसा से चारों तरफ भरे हुए हैं गांधीजी लिखते हैं कि ‘जीवहीं जीव आधारा‘ की बात गलत नहीं है हिंसा तो जीवन में है ही अनिवार्यतः निहित है लेकिन मेरी कामना ये है कि मनुष्य में करुणा हो छोटे से छोटे जीवधारी का वो जान बूझ कर नुकसान न ... करना चाहिए और उसमें संयम की वृत्ति हो तो वो अहिंसा का पुजारी कहलाएगा। गांधीजी परिभाषित करते हैं अहिंसा को संयम और करुणा से मैंने जिन तीन चुनौतियों का जिक्र आपके सामने किया उनमें से किसी भी चुनौती को स्थायी और मानवीय ढंग से संयम और करुणा के बिना डील नहीं किया जा सकता संयम के अलावा कोई चारा नहीं है पर्यावरण को बचाने का ये संभव नहीं है आपलोगों में से पता नहीं कितने लोग गए हैं मैं गया हूं कई बार गया हूं कई बार रहा हूं पांच कमरे का मकान है सारे कमरों में बत्तियां जल रही हैं ... रुम हीटर जल रहे हैं एक .. कमरे की बत्ती बंद करना वो जरूरी नहीं समझते चल देते हैं अकेले हैं चार गाड़ियां हैं एक से ... जाएंगे एक से ... कॉटेज बना रखा है वहां जाएंगे और एक में कभी डीप फारेस्ट में जाने का मन हो तो एक्स यू वी उसके लिए होनी चाहिए संयम के बिना धरती नहीं बचेगी और करुणा के बिना मानव समुदाय नहीं बचेगा। करुणा का अर्थ है वैष्णव जन तो तेने कहिए जे पीर पराई जाने रे और गांधीजी और उनके साथी जिस तरह ... करते थे दक्षिण अफ्रीका में उनके साथी थे ... नाम के इसाई थे उन्होंने एक बार कहा कि क्यों नहीं हम इसमें वैष्णव की जगह क्रिस्तान डाल दें भजन का एक रूप यह भी बन गया क्रिस्तान जन तो तेने कहिए जे पीर पराई जाने रे, मुस्लिम जन तो तेने कहिए जे पीर पराई जाने रे यानी आप किसी भी धर्म परंपरा से आते हों और आपके मन में करुणा नहीं है तो आपकी धार्मिकता के दावे निस्सार हैं।

मित्रों! हमें ये बात ध्यान रखनी चाहिए कि गांधीजी के लिए अहिंसा वो हवाई चीज नहीं थी और वो अहिंसा की व्यावहारिक सीमाओं से वाकिफ थे मर्यादाओं ... वो इस बात से भी वाकिफ थे कि राज्य सत्ता हिंसा के बिना नहीं चल सकती मेरा आप सब से खासकर नौजवानों से निवेदन है कि मेहरबानी कर के मैं किसी की आलोचना या खिल्ली नहीं उड़ा रहा हूं मैं खुद बहुत पसंद करता हूं गांधी को मेहरबानी कर के राजकुमार हिरानी से आगे जा कर समझने की कोशिश कीजिए। गांधीजी केवल ‘गेट वेल सून‘ वाली चीज नहीं थे वो बहुत मौलिक चिंतक थे, बहुत मौलिक दार्शनिक थे उसके साथ साथ घनघोर रूप से व्यावहारिक राजनेता थे गांधी ने लिखा है कि राज्य सत्ता एक ऐसी मशीन है जिसकी आत्मा नहीं होती उसका तो काम हिंसा के बिना चल ही नहीं सकता और इसीलिए राज्य सत्ता की ताकत बढ़ती है तो मुझे चिंता होती है और इसीलिए हमारे वामपंथी मित्रों को कष्ट हो सकता है इसीलिए आइ व्यू द सोवियत एक्सपेरिमेंट का फंडामेंटल ...गांधीजी ने रोमा रोलां से कहा है. कि जिस तरह राज्य सत्ता की ताकत बढ़ती चली जाएगी सोवियत और जो पूरी फिलासफी है राज्य सत्ता और वायलेंस को ले कर कम्युनिस्टों की उसके चलते आई व्यू द सोवियत एक्सपेरिमेंट इज फंडामेंटल ... और ये बात उस समय जवाहरलालजी ने डिसमिस कर दी थी दस साल बाद जवाहरलालजी ने उन्नीस सौ तैंतीस में लिखा उन्नीस सौ पैंतीस आपको याद करें स्तालिन द्वारा चलाए जा रहे शुद्धिकरण अभियान ... जब लेनिन तक के साथियों को साफ कर दिया गया और तब जवाहरलालजी ने लिखा कि सोवियत यूनियन गलत दिशा में जा रही है तो बुनियादी बात हमलोग कर रहे थे बुनियादी बात हम ये कर रहे थे राज्य सत्ता का काम हिंसा के बिना नहीं चल सकता ये सिद्ध है इसलिए राज्य सत्ता की ताकत अनियंत्रित नहीं होनी चाहिए और राज्य सत्ता जब अपनी ताकत बढ़ाती चली जाए तो गांधी दृष्टि से सोचने वाले व्यक्ति के लिए ये चिंताजनक बात है लेकिन इसके साथ ये भी सच है कि जब दुनिया नेशनल स्टेट में बंटी हुई है गांधीजी तो बहुत रेडिकल थिंकर थे।

गांधीजी तो ओद्योगिक सभ्यता के बहुत ही फंडामेंटल आलोचक थे हिन्द स्वराज केवल पश्चिमी सभ्यता की आलोचना नहीं है हिन्द स्वराज औद्योगिक सभ्यता मात्र की आलोचना है लेकिन इस बात पर ध्यान देने की जरूरत है कि गांधीजी ने अपने राजनैतिक आंदोलनों में एजेन्डा हिन्द स्वराज को नहीं बनाया वो जानते थे कि उनकी उन बातों से उनके निकटतम सहयोगी भी सहमत नहीं हैं उनके वरिष्ठ सहयोगी बल्कि एक तरह से उनके मेन्ट्योर गोपाल कृष्ण गोखले ने तो कहा था कि गांधीजी इस किताब को एक साल में खारिज कर देंगे गांधीजी जैसे जिद्दी थे उनकी जिद हम सब जानते हैं उन्होंने सन बयालिस में केवल एक ही परिवर्तन उस किताब में किया था केवल एक बल्कि दो एक महत्वपूर्ण परिवर्तन ये था कि एक जगह कॉमा गलत लगा था उसको ठीक कर दिया और दूसरा महत्वपूर्ण परिवर्तन ये था कि ब्रिटिश पार्लियामेंट को प्रास्टीट्यूट कहा गया था उस शब्द को काट दिया बाकी इसके अलावा कोई परिवर्तन उन्होंने नहीं किया लेकिन हिन्द स्वराज एक रेडिकल व्यक्ति का सिविलिजेशन है।

गांधीजी का तात्कालिक एजेंडा जिस ओर जा रहा था वो एक नेशनल स्टेट की स्थापना थी। गांधीजी स्टेट की ताकत को ले कर सशंकित थे गांधीजी विलेज पब्लिक की धारणा में विश्वास करते थे जिससे व्यक्तिगत रूप से रेखांकित करता हूं कि मैं कतई सहमत नहीं हूं लेकिन ... इसके बावजूद गांधीजी ने अपने आंदोलन को उस तरह से डायलेट नहीं किया कि नेशनल स्टेट या नेशनल इंडिपेंन्डेंस की ओर नहीं चाहिए बल्कि ... उसी तरह ... और इसलिए मित्रों बात जब गांधी की होती है ... मुझे बेहद जरूरी लगता है नेहरू की बात पिछले कुछ दिनों से मैं ये प्रवृत्ति नोट कर रहा हूं कि गांधी की बात तो बहुत दिनों से हो रही है पिछले तीस सालों से नेहरू के बारे में मान लिया गया है कि ... ऐसा नहीं है औैर नेहरू को .. च्वाइस बताने वाले ये भूल जाते हैं कि जैसा मैंने कहा कि गांधीजी काफी जिद्दी व्यक्ति थे जिद्दी इस अर्थ में जब किसी फैसले को कर लेते थे तो अडिग रहते थे बदलते नहीं थे और पिछले दिनों एक महान चिंता ..यह भी कह चुके हैं .....कि किसी के बहकावे में आ कर उन्होंने कह दिया कि ये पी एम होने के लायक हैं और न ही गांधी इस बात से नावाकिफ थे कि नेहरू उनकी बहुत सारी चीजों से घोर असहमति है ... गांधी और नेहरू संबंध पर उनके संवाद और विवाद पर अर्थवत्ता पर विचार किए बिना हम गांधीजी पर समग्रता में विचार नहीं कर सकते हम गांधीजी पर समग्रता से विचार तब भी नहीं कर सकते जब हम ये भूल जाएं जो हम भूल चुके हैं मैं पर पत्थर रख कर ये बात कहता हूं कि आप हिन्दुस्तान ये भूल चुके हैं कि यह आंदोलन केवल स्वाधीनता आंदोलन नहीं था हमारा आंदोलन सारे समाज के नैतिक पुनर्निमाण का था और इसीलिए स्थिति ये थी।

चंपारण में गांधीजी की चिंता ये थी कि ये जो वकील लोग आप पढ़िए उस समय के विवरण राजेन्द्र बाबू की पुस्तक पढ़िए चंपारण में महात्मा गांधी राजेन्द्र बाबू के के साथ सात नौकर गए थे एक धोती धोता था एक पांव दबाता था और ऐ कपड़े संभालता था ... गांधीजी ने आगे चल कर मजाक में लिखा कि ऐसे लोग हैं जो बाबू साहब चलते हैं आगे आगे उनसे बात करते हुए तौ नौकर चलता है उनका कुरता ठीक करते हुए ... ये गांधीजी ने लिखा है और ऐसे लोग चंपारण में रहने के बाद और आप कल्पना कीजिए ... मित्रों सोचिए सन 1917 में राजेन्द्र प्रसाद देश के अंदर में ... दस हजार रुपए जस्ट इमेजिन, दस हजार रुपए इस समय भी ... और दो तीन दिन बाद पता लगा कि सब खाना बना रहे हैं डांट खा रहे हैं और बैठ कर क्लर्कों की तरह किसानों के बयान ....मोतीलाल ..... और जिन्होंने अपने बेटे को किसी हिन्दुस्तानी स्कूल का मुंह देखने नहीं दिया वा ... और उनकी पत्नी ... लाठी खातीं गांधीजी से जब वे सवाल पूछते कि आप क्रांतिकारियों का विरोध क्यों करते हो तो गांधीजी ... उनकी ... चतली थी क्रांतिकारियों के साथ ... दो महत्वपूर्ण नेताओं के बीच विचारों की टकराहट हमें सीखने का मौका देती है दोनों ... ...गांधीजी ने उसमें एक बात लिखी थी बाकी सब मैं मानती हूं लेकिन आपलोगों की क्रांतिकारी आंदोलन में दंगा शामिल हो सके साबरमती आश्रम में ... क्रांतिकारी आंदोलन में भीड़ और पराक्रमी हिस्सा ले सकते थे अहिंसक आंदोलन में हिस्सा लेते लेते आप पराक्रमी बन जाते हैं ... ... ... ...अंतिम दिनों में जब वे संस्मरण लिख रहे थे ... ... गंगा में छापा था कमलेश्वर ने उसमें परसाई जी ने लिखा है कि हम तो छोटे थे हमने देखा कि हमारे घर में मां, दादी, बुआ सब अच्छी खासी साड़िया छोड़ कर के खद्दर की मोटी मोटी ... धोतियां पहनने लगीं ... हमने कहा कि ये सब क्या हो रहा है तो दूर दराज मध्यप्रदेश या छत्तीसगढ़ के किसी गांव की वो स्त्रियां कहती हैं उस बच्चे से ... परसाई से हमें नहीं लेकिन सुना है कि ऐसे कपड़े पहनने से ... तो गांधीजी को अच्छा लगता है ... कि जब तक कि स्त्रियां ... हिन्दू और मुसलमान की लड़ाई के साथ ... ... अनटचैबिलिटी के कलंक के साथ हमें स्वराज मिलता है तो मुझे उस स्वराज से कोई ... और ये अकेले काम की नहीं ...।

जवाहरलाल नेहरू ने 1921 में ये बात लिखी थी कि ये हम अंग्रेजी पढ़े लिखे लोगों की समस्या है कि हमें हिंसा बहुत आकर्षित करती है हिन्दुस्तान की आम जनता अहिंसा की ताकत जानती है आप इस पर ध्यान दें कि इस नैतिक पुनर्निमाण के आंदोलन के बाद स्वाधीनता आंदोलन में आपको एक नेशनल स्टेट कल्पना कीजिए कि जवाहरलाल नेहरू के सामने जो चुनौती थी वो ये थी कि बहुत ही प्राचीन सभ्यता को एक बहुत ही जटिल सभ्यता को एक आधुनिक राष्ट््र राज्य में तब्दील करना .. हमलोग जानते हैं कि .. अब बहुत कुछ कर सकते हैं लेकिन कुछ विमर्श होते हैं उनके बाहर कुछ नहीं कर सकते मुझे अगर दिल्ली जाना है तो वैदिक विज्ञान में कितना भी विश्वास कर लूं ... कर नहीं जा सकता या तो ट््रेन से जाउंगा या हवाई जहाज से ... ये गोष्ठी कम से कम आज के दिन खुले में नहीं हो सकती थी ... आप भी भाग गए होते मैं भी भाग गया होता ... ... ट्रीटी के बाद 1648 में तीस साल के युद्ध के बाद सारा यूरोप साम्राज्यों के बजाय ... स्टेट में बदल गया ... साम्राज्य टूटा ... साम्राज्य टूटा... साम्राज्य टूटा और नेशनल स्टेट्स विकसित हुए और चूंकि सारे यूरोप ने यूरोप में सारी दुनिया को ... किया उन्होंने सारी दुनिया को नेशनल स्टैट ... अब उन्नीस सौ सैंतालिस में भारत की जनता स्वाधीनता हासिल करती है तो ... जवाहरलाल नेहरू ... नेशनल स्टेट ... या क्या करते और भी कोई नेता चाहे पाकिस्तान के हों ... श्रीलंका के ... नेशनल स्टेट का कोई विकल्प नहीं था नेशनल स्टैट किस तरह का हो सवाल ये था और आप अब जरा कल्पना कीजिए जवाहरलाल नेहरू की बहुत आलोचना हुई कि सीधे सीधे अमेरिकन अम्ब्रेला के नीचे क्यों नहीं चले गए जवाहरलाल नेहरू की बहुत आलोचना हुई कि सोवियत संघ के साथ पूरी तरह क्यों नहीं आ गए आज हमारे पास अंग्रेजी मुहावरे में जिसे कहते हैं बेनीफिट ऑफ राइट साइड है। जवाहरलाल अमरीका और सोवियत संघ दोनों से दूर रहने की कोशिश करते थे सही किया या गलत किया गुटनिरपेक्ष आंदोलन की शुरुआत कर उन्होंने सही किया या गलत किया।

बहुत से लोग कहते थे कि साहब खेती किसानी पर ध्यान दीजिए कहां ये टेक्नालॉजी .. समय बरबाद कर रहे हैं सारा फोकस आपका एग्रीकल्चर पर होना चाहिए आज 2017 में सोचिए कि आइआइटी की स्थापना कर के .. ... न्यूक्लीयर टेक्नालाजी और स्पेस टेक्नालाजी के अलग डिपार्टमेंट बना कर सही किया या गलत किया। गांधी और नेहरू के बीच संबंधों की परिकल्पना इस तरह की जाती है कि जैसे नेहरूजी ने किसी छल से सत्ता हथिया ली जैसे गांधीजी कोई मुगल बादशाह थे और नेहरू उनके शहजादे ऐसा कुछ नहीं हमें इस बात पर गौर करना होगा दोस्तों कि आखिरकार जवाहरलाल नेहरू लगातार कहते थे कि धर्म और राजनीति का घालमेल मुझे अच्छा नहीं लगता और ... जाहिर है कि गांधीजी कहते थे कि बिना धर्म के राजनीति की कल्पना नहीं हो सकती और इस बात को बहुत उड़ाया जाता है इस बात को सुविधापूर्वक भुलाते हुए कि गांधीजी के लिए धर्म का मतलब ... ... या रिलीजन नहीं बल्कि एथिक्स होगा लेकिन उस अर्थ में भी अगर मान लिया जाय तो इस बात पर ध्यान दीजिए कि जनवरी 1948 में गांधीजी ने ये बात दसियों बार कही अपनी मृत्यु वाले महीने में कि जितने मनुष्य हैं उतने ईश्वर हो सकते हैं जिसका मतलब ये हुआ कि ... की जरूरत ही एक तरह से नहीं थी और ये गांधीजी का नेहरू की तरफ से ... और किसी को ये गलतफहमी भी नहीं होनी चाहिए कि नेहरू धर्म से कोरे थे या विरोधी थे या धर्म के प्रति अज्ञानी थे मैं फिर से निवेदन करूंगा कि मेहरबानी कर के डिस्कवरी ऑफ इंडिया पढ़िए।

एक तो दुर्भाग्य से पिछले पंद्रह बीस सालों में एक बड़ा भारी संकट आया है मैं इसका विरोध करता था अब मैं धीरे धीरे रियलाइज कर रहा हूं कि जब ये पचास सन पचास सन साठ में अमेरिकन और कनाडा के सोशियालाजिस्ट इसको इडियट बाक्स कहते थे अब मुझे समझ में आ रहा है किस तरह सुबह से शाम तक इडियट बनाने की कई ... चलती हैं और न जाने कितने ... मैं लोगों से मिलता हूं और हो सकता है आपलोगों में से किसी का तर्जुबा हुआ हो मुझे अच्छा नहीं लगता जब कोई मुझसे ये कहता है कि मैंने आपको टेलीविजन पर देखा है मुझे बहुत अच्छा लगेगा कि मुझसे कोई ये कहे कि साहब आपका फलाना लेख पढ़ा था या आपकी फलानी किताब देखी थी हमारे रेफरेन्स प्वाइंट चेन्ज हो गए हैं पढ़ने और सोचने की वृत्ति पढ़ने और सोचने की परंपरा ... और इसीलिए मैं तो मानता हूं कि सब से ज्यादा सबसे बड़ी कोई युनिवर्सिटी कोई है तो ... ... सुबह से शाम तक उस पर ज्ञान छितरा रहा है वो डाक्टर साहब कह रहे हैं सबको कामना कर रहे हैं कि सबको भगवान आपको सुखी रखे डॉक्टर साहब ये वाट्सएप नहीं रख पाएगा भगवान ही सुखी रख सकता है।

तो मित्र्रों! ... कि सभ्यता को एक राष्ट्र राज्य में बदलने के लिए जो ... की है और आप इस बात का ध्यान दें कि नेहरू के प्रयत्नों के भीतर भी एक ... स्टैटमेंट था .. और वो स्टेटमेंट कि भारतीय सभ्यता भारतीय चिंतन का स्वाभाविक विकास है और वो बहुत सिम्पल है बीच का रास्ता क्रांतिकारी कहते हैं कि बीच का रास्ता नहीं होता सड़क पर वाकई नहीं होता लेकिन जिंदगी में तो भइया रास्ता बीच का ही होता है और ये कोई बहुत नई बात मैं नहीं कह रहा हूं भगवान बुद्ध कह गए हैं मध्य मार्ग की .. ये किसी गांधीवादी का कथन नहीं भगवान बुद्ध का प्रतिपादन है कि अति हर चीज की बुरी होती है त्याग की भी और भोग की भी।

अंत करूंगा ... समाप्त करूंगा ... अभिनवगुप्त जैसा मैंने आपसे कहा भारती के रचयिता महान दार्शनिक और साहित्यशास्त्री वेदांतशास्त्री उनका एक वाक्य उन्होंने साहित्य के प्रसंग में कहा है .. ... लेकिन वो वाक्य जीवन के हर प्रसंग में लागू होता है और हमारा राष्ट्रीय आंदोलन इस बात को जानता था और गांधीजी के राजेन्द्र प्रसाद जी के नेहरू के और आजाद के नेतृत्व में उस राष्ट््रीय आंदोलन को जीवन में व्यवहार में उतारने की कोशिश करें और अभिनवगुप्त की बात ये है वो बात जो मैं याद करना चाहता हूं नारी एक ही ... एक ही विधि से हां एक ही पद््धति से सम्यक निर्वणनं सम्यक डिस्क्रिप्शन एक ही रास्ते से नहीं किया जा सकता यानि जो कुछ मैं कह रहा हूं केवल वही सही नहीं है जो आपके मन में आप में से किसी के मन में मेरी बाते सुन कर के .. का भाव ... उससे मुझे बात करनी चाहिए .. क्योंकि एक ही तरीके से एक ही दृष्टि से ना ही एक हि दृष्ट्या सम्यके निर्वणनं एक ही दृष्टि से किसी भी वस्तु का किसी भी परिस्थिति का सम्यक वर्णन नहीं किया जा सकता ये जो प्यूरलिटी है इसको एक .. ... में बदलना बहुत बड़ी चुनौती थी जीवन में तो हो सकता है लेकिन एक देश एक भूखंड जिसमें दुनिया से सभी ज्ञात धर्मों के मानने वाले रहते हैं पारसी रहते हैं कन्फ्यूशियस को मानने वाले रहते हैं ... मैं पढ़ कर चकित रह गया कबीर के जमाने में काशी में यहूदी कल्ट था पुराने दस्तावेज और रेफरेंसेज ... कि ये अद्भुत .. है अद्भुत देश है और इस देश में ये स्वाभाविक है कि अभिनवगुप्त ये चेतावनी देते हैं कि एक ही दृष्टि से सम्यक निवर्णन नहीं हो सकता और चेतावनी से राष्ट्र राज्य में बदलना ये हमारे राष्ट्रीय आंदोलन की चुनौती थी और उसको हमने बड़ी हद तक निभाया और बदकिस्मती से अब हम से भूल गए हैं कि हमारा राष्ट्रीय आंदोलन केवल राजनैतिक स्वाधीनता का नहीं बल्कि नैतिक और सामाजिक पुनर्निर्माण का .. तो सवाल गांधी की प्रासंगिकता का नहीं है वो तो स्वयंसिद्ध है सवाल ये है कि ... कि हमलोग कितने प्रासंगिक रह गए हैं। धन्यवाद।

इस व्याख्यान के बाद लगभग पौन घंटा प्रश्न-जिज्ञासा समाधान होता रहा, जिसमें हुई एक चर्चा का उल्लेख 17 अक्टूबर 2024 को उनसे किया था- पुरानी बात है, रायपुर में गांधी पर आपके व्याख्यान के बाद एक युवक ने मनुस्मृति पर सवाल किया आपने कुछ ऐसा जवाब दिया था कि, उसे न कबीर याद करते न तुलसी, उसे आप जैसे ही पकड़े बैठे हैं। उस समय मेरे ध्यान में ऐसा कुछ पढ़ा ध्यान आ रहा था, यास्क के निस्क्त का वह संदर्भ आज मिला- भारतीय (हिंदू या सनातन) परंपरा में यास्क वैदिक युग के अंतिम चरण के ऋषि माने गए हैं, निरुक्त में कहते हैं- ‘मंत्रो वा एते अस्मिन् काले न संति तर्काेऽस्मि। अभ्यूहो वा उहापोहो वा ऋषिरस्मि।।‘ आशय कि जब मंत्र (द्रष्टा) नहीं होते, मंत्रों का प्रभाव कम हो जाता है, तो तर्क ही ऋषि है, ज्ञान का स्रोत बनता है। तर्क के दो रूप- निश्चय (अभ्यूह) और संदेह (उहापोह) होते हैं। उहापोह, संदेह पैदा कर विचार को बढ़ावा देता है। उहापोह, शब्द उह और अपोह से बना है, जिसका आशय- परीक्षणपूर्वक त्याज्य को छोड़ते हुए विशेष ज्ञान प्राप्त करना है।

Thursday, March 26, 2026

सालगिरह-वर्षगांठ

गांधी ने 1 अक्तूबर 1939 को रेल से दिल्ली जाते हुए लिखा था- ‘सर सर्वपल्ली राधाकृष्णन् ने मेरे इकहत्तरवें जन्म-दिन को खास महत्व दे डाला है। ... पर प्रशंसकों को एक चेतावनी मैं जरूर देना चाहूंगा। कुछ लोग सार्वजनिक स्थानों पर मेरी मूर्ति खड़ी करना चाहते हैं, कुछ तस्वीरें चाहते हैं, और कई हैं जो जन्म-दिन को आम छुट्टी का दिन बना देना चाहते हैं। पर श्री च. राजगोपालाचारी मुझे अच्छी तरह जानते हैं। सो उन्होंने दानिशमन्दी के साथ मेरे जन्म-दिन को आम छुट्टी का दिन बनाने की बात को रद कर दिया है।‘

2 अक्टूबर 1939 को महात्मा गांधी जन्म-दिन की भेंट के रूप में सर सर्वपल्ली राधाकृष्णन् द्वारा संकलित-संपादित ‘MAHATMA GANDHI ESSAYS AND REFLECTIONS ON HIS LIFE AND WORK‘ के सस्ता साहित्य मण्डल से प्रकाशित हिंदी संस्करण ‘गांधी-अभिनंदन-ग्रंथ‘ से उक्त उद्धरण लिया गया है।

सालगिरह-वर्षगांठ में साल के साथ गिरह या वर्ष के साथ गांठ का प्रचलित अभिप्राय जो हो, गिरह-गांठ बांधकर साल पूरा होने की गिनती और उसे याद रखने के तरीके से आया है। इस दौर में जन्मदिन और शादी की सालगिरह मनाने का प्रचलन, ‘सभ्य समाज‘ में अनिवार्यता की तरह शामिल है, तब यह जितना खुशी मनाने का, बधाई-धन्यवाद का मौका होता है, उतना ही मन में गांठ बांधने का, कि किसने विश नहीं किया। जन्मदिन छुपाने का मेरा अपना कारण है कि बधाई मिलने पर बारी-बारी से सबको धन्यवाद देना जरूरी लगता है, जो नहीं कर पाता। वैसे ही यह खुद को बचा लेने का प्रयास भी है कि दूसरों को बधाई दिए बिना काम चल जाए। न बधाई के लेन में न देन में। यह स्वीकार करते कि इस बहाने खैरियत और जीवित-प्रमाण की दृष्टि से इसे गैर-जरूरी नहीं माना जा सकता।

बहरहाल, तीन फिल्मी गीत याद आते हैं- बधाई हो बधाई जनमदिन की तुमको ... फिल्म का नाम ही ‘मेरा मुन्ना‘ है, सारा जोर लड्डू पर है, मेहनत से पढ़कर आगे बढ़ोगे, पास होगे तो हमें लड्डू मिलेंगे, बड़े हो के भाभी लाना, शादी होगी तुम्हारी और हमें लड्डू मिलेंगे, बुढ़ापे में बाल पकेंगे और पोते होंगे, तो फिर लड्डू मिलेंगे। यह जनमदिन, ‘हैप्पी बर्थ डे टू यू‘ हो जाता है, गीत ‘हम भी अगर बच्चे होते ...खाने को मिलते लड्डू‘ में। मगर इन दोनों गीतों में जन्मदिन बच्चे का ही है। संभव है कि यह फिल्म की कहानी के अनुरूप हो, मगर इससे यह भी अनुमान होता है कि जन्मदिन बच्चों का ही मनाया जाता है, और इस मौके पर लड्डू होते हैं, केक नहीं। हैप्पी बर्थ डे टू यू वाला एक अन्य ‘बार-बार दिन ये आए ...‘ रोमांटिक गीत, हसीना सुनीता के लिए है। और अब नया दौर है, जिसमें साथ रहने वाले परिवार के सदस्य, पति-पत्नी भी एक दूसरे को जन्मदिन, सालगिरह की बधाई फेसबुक पर देने लगे हैं।

वह पीढ़ी अभी भी है, जिनमें से अधिकतर का जन्मदिन 1 जुलाई या 1 जनवरी होता है। यह होता इसलिए है कि ऐसा भी दौर था, जिसमें जन्म की तारीख याद रखना आम नहीं था। इसकी जरूरत होती थी स्कूल में भरती के लिए, जिसे एडमिशन नहीं, नाम लिखाना कहा जाता था। दरअसल, अक्सर ऐसा होता था कि स्कूल में प्रवेश तक शिशु का घरू नाम चलता था, कई बार नामकरण भी शाला में प्रवेश दर्ज करने वाले गुरुजी ही करते थे। अधिकतर के साथ यही पहला मौका होता था जब नाम लेखी में आता था। और जन्मतिथि के लिए होता यह कि प्रवेश के लिए आए बच्चे को दाहिने हाथ को सिर के ऊपर से घुमाकर, बांया कान छूने को कहा जाता। कान पर ठीक-ठीक हाथ पहुचे तो प्रवेश-वर्ष में छह वर्ष घटाकर, उस वर्ष की 1 जुलाई जन्मतिथि हो जाती और कुछ कम-अधिक यानि साढ़े पांच या साढ़े छह का अनुमान होने पर 1 जनवरी तारीख काम में आती। हिंदी के लब्ध प्रतिष्ठित साहित्यकार विनोद कुमार शुक्ल का जन्मदिन 1 जनवरी को मनाया जाता।

'समालोचन' में विनोद कुमार शुक्ल से पीयूष दईया का संवाद है। इस संवाद में वे कहते हैं- ‘नांदगाँव में मेरे घर के ठीक सामने कृष्णा टाकिज था। कृष्णा टाकिज तो अभी भी है पर घर नहीं है। अम्मा कहतीं थीं कि जिस दिन कृष्णा टाकिज का उद्घाटन हुआ, उसी दिन मेरा जन्म हुआ था। स्कूल में मेरे जन्म की तारीख 1 जनवरी 37 है। कृष्णा टाकिज में फरवरी 37 की कोई तारीख उकेरी हुई है। ठीक से दिखती नहीं। स्कूल की तारीख पर मुझे विश्वास नहीं है। बीबीसी हिंदी पर उनके निधन की तिथि 23 दिसंबर 2025 को आलोक पुतुल अपने लेख में लिखते हैं कि- ‘छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव में जिस दिन कृष्णा टॉकिज की शुरुआत हुई थी, उसी दिन विनोद कुमार शुक्ल का जन्म हुआ था. लेकिन पुरानी परंपरा की तरह, उनकी जन्मतिथि 1 जनवरी दर्ज कर दी गई।‘ जन्मदिन न मनाने वाले एक परिचित कहा करते हैं कि जन्मदिन याद रखने की जरूरत ही क्या, मगर कोई भी फार्म भरते हुए उसमें जन्मतिथि अंकित जो करना होता है।

एक गंभीर किंतु रोचक दस्तावेज देखने को मिला, जिसमें जनगणना-2001 के लिए बिलासपुर, जांजगीर-चांपा एवं कोरबा (पुराने बिलासपुर) जिले में सही आयु निर्धारण करने के लिए प्रमुख ऐतिहासिक घटनाओं का वर्ष बताया गया है। इसमें 13 प्रमुख ऐतिहासिक घटनाओं में पहले क्रम पर 1903 का अकाल है, स्वतंत्रता आंदोलन के वर्ष, इस अंचल के स्वतंत्र भारत के विकास के मील के पत्थर, जिनमें 1954 में हमारे स्कूल ‘अकलतरा शिक्षण ट्रस्ट‘ की स्थापना भी है, 13 वीं प्रविष्टि 1984-इंदिरा गांधी का निधन है। स्पष्ट है कि जनगणना में यह सहायक दस्तावेज, उनके लिए था, जिन्हें अपने जन्म की तिथि या वर्ष ठीक-ठीक नहीं मालूम, मगर इसे वे अंचल की किसी प्रमुख यादगार घटना के साथ जोड़ कर याद करते हैं। साथ ही माना गया है कि इस जनगणना में अधिकतम आयु का व्यक्ति 1903 के आसपास का होगा और 1984 के बाद जन्म लिए की जन्मतिथि, जन्म-प्रमाणपत्र होगा। इसके साथ निर्देश में स्पष्ट किया गया है कि ‘यदि कोई व्यक्ति सही आयु बताने में असमर्थ है तो इन घटनाओं की याद दिलाते हुए उसकी संही आयु ज्ञात कर सकते हैं मान लो कि परिवार का कोई सदस्य उम्र नहीं बता पाता है तो आप उससे पूछ सकते हैं कि देश की स्वतंत्रता के समय आपकी उम्र क्या थी। यदि सदस्य बताता है कि उस समय उसकी आयु 10 वर्ष थी ओप उसकी आयु 64 वर्ष (10+54= 64) दर्ज करें।

ऐसा नहीं कि वर्षगांठ को इस तरह याद रखना पुराने दौर में था, अब नहीं।

2017 में प्रकाशित अनु सिंह चौधरी की पुस्तक मम्मा की डायरी में आता है- मनीष और मैं 10 नवंबर को पहली बार मिले और ठीक तीन महीने बाद 16 फरवरी को हमारी शादी हो गई। मुझे आमतौर पर तारीखें याद नहीं रहती। मनीष से मिलने की तारीख़ इसलिए याद है क्योंकि हम जिस दिन मिले थे, उसके अगले दिन मॉर्निंग शिफ्ट में पूरे दिन हमने बुलेटिन में यासिर अराफात की मौत की ख़बर चलाई थी। ... उन दिनों न्यूजरूम का असर मुझपर इतना हावी रहता था कि अपनी सारी यादें बड़ी ख़बरों से जुड़ी हुई पाती हूँ। जिस दिन शादी का लहंगा ख़रीदने गई उस दिन सुनामी आया। जिस दिन हमारी शादी हुई उस दिन क्योटो प्रोटोकॉल प्रभाव में आया। जिस दिन अपने नए घर के लिए अपनी शादी के बाद की पहली दीवाली की ख़रीदारी करने निकले, उस दिन दिल्ली में तीन सीरियल धमाके हुए...‘

इस प्रसंग में एक और रोचक संदर्भ मिला- बनारस पर भानुशंकर मेहता के लिखे का अपना रस है, निबंध ‘हुस्ना की टीप‘ में लिखते हैं- ‘बुढ़वा मंगल‘ का कोई भी लेख हुस्ना की टीप की चर्चा के बिना अधूरा रहता है। मगर यह हुस्ना थी कौन? बस इसी प्रश्न का उत्तर ढूँढ़ते मैं जनाब अब्दुल कुद्दूस नैरंग साहब के दौलतखाने पर पहुँच गया। नैरंग साहब मशहूर नाटककार आगा हश्र काश्मीरी के भानजे हैं। ... नैरंग साहब से पूछा तो यादों की किताब खुल गई, धीमे से गुनगुनाये ‘फिर धुँआ उठने लगा दिल से‘। बोले। ‘साहब, मैं हुस्ना बाई को न जानूँगा?‘ चालीस साल पहले जब मेरी शादी हुई थी- वे रुके और बोले- ‘ठहरिये- मैं जरा दरियाफ्त कर लूँ‘ और तब घर के अन्दर जाकर बेगम साहिबा को आवाज दी और पूछा ‘क्यों भई, कितने साल हो गये होंगे हमारी शादी को?‘ और सीधा उत्तर मिला ‘अब मुझे याद है क्या‘? तुरंत ही नैरंग साहब लौट आये और बोले- ‘हाँ साहब करीब इतने ही साल हुए होंगे- नहीं साहब पचास साल हुए होंगे। तो वाकया यह है कि हमारी शादी हुई तो वे-हुस्ना बाई हमें दुआ देने आई थीं। बहुत ही बासलीका, तहजीबदार औरत थीं। उनकी उस्तादी गायकी, शास्त्रीय गाने का मिसाल नहीं। हर चीज़ पूरे इतमिनान से गाती थीं। और हाँ मैंने देखा है, उन्हें कान पर हाथ रखकर गाते हुए, बड़े उस्तादों की तरह। ... नैरंग साहब फिर से यादों के तूफान में खो गये। बोले- ‘गाना और ड्रामा, क्या-क्या दिन देखे थे बनारस ने। डा. समद साहब डाइरेक्टर थे, सन् 1886 की पैदाइश थी उनकी।‘

उक्त अंश में मजेदार कि जिन नैरंग साहब या उनकी बेगम को शादी की तारीख क्या, साल भी ठीक याद नहीं पड़ रहा, डा. समद की पैदाइश का सन बेहिचक याद कर पा रहे हैं। 

इस ओर ध्यान जाने पर लगता है कि जन्म, विवाह आदि को प्रकृति, समाज की किसी घटना या प्रमुख व्यक्ति से जोड़ कर देखना लापरवाह अज्ञानता के कारण नहीं, बल्कि स्वयं/किसी व्यक्ति/घटना को वृहत्तर परिवेश के साथ जोड़ कर देखना, उसकी प्रासंगिकता माना जाता रहा। मान सकते हैं कि वह अस्तित्ववादी एकाकीपन के आतंक से मुक्त दौर था। यों भी हमारी परंपरा का बहुल-एकाकीपन वह है, जैसा कबीर कहते हैं- ‘अवधूता ... हम सब में, सब हैं हम में, हम हैं बहुरि अकेला।‘

अटल जी की पंक्तियों के साथ (काशी-)करवट लें- जन्म दिवस पर हम इठलाते, क्यों न मरण-त्यौहार मनाते ... यों कई समाज ऐसे हैं, जिनमें मृतक-संस्कार का उत्सव होता है। मारवाड़ी समाज में हिंदू परंपरा का ‘बैकुंठ‘ प्रचलित है। पूरी उम्र और सुखद जीवन पा कर दुनिया से विदा लेने वाले की बैकुंठी शवयात्रा, उत्सव की तरह, धूमधाम से होती है। इस तरह जन्म की बातें हो रही हो तो जीवन-मृत्यु की युति पर ध्यान जाता ही है। ज्यों, पेंशन और बीमा लाभार्थियों को जीवित प्रमाण पत्र देना होता है। जो जन्मा उसकी तो मृत्यु होगी ही, क्यों न वह अवतार रूप देवता हो, मगर क्या मृत्यु का जन्म भी होता है, क्यों नहीं मृत्यु है तो उसका जन्म भी तो होगा ...

धर्मराज युधिष्ठिर का जन्म यमराज से हुआ और महाभारत शांतिपर्व के मोक्षधर्म पर्व में मृत्यु के जन्म की कथा इस प्रकार है- ... सारी प्रजा पुनरावर्तनशील हो, मरकर पुनः जन्म धारण करे। नारदजी कहते हैं -राजन् ! महादेवजी की वह बात सुनकर भगवान् ब्रह्मा ने मन और वाणी का संयम किया तथा उस अग्निको पुनः अपनी अन्तरात्मा में ही लीन कर लिया। तब लोकपूजित भगवान् ब्रह्मा ने उस अग्नि का उपसंहार करके प्रजा के लिये जन्म और मृत्यु की व्यवस्था की। उस क्रोधाग्नि का उपसंहार करते समय महात्मा ब्रह्रा जी की सम्पूर्ण इन्द्रियों से एक मूर्तिमती नारी प्रकट हुई। ... भगवान् ब्रह्मा ने उसे ‘मृत्यु‘ कहकर पुकारा और निकट बुलाकर कहा-‘तुम इन प्रजाओं का समय-समय पर विनाश करती रहो। ‘मैंने प्रजा के संहार की भावना से रोष में भरकर तुम्हारा चिन्तन किया था; इसलिये तुम मूढ़ और विद्वानों सहित सम्पूर्ण प्रजाओं का संहार करो। कामिनि ! तुम मेरे आदेश से सामान्यतः सारी प्रजा का संहार करो । इससे तुम्हें परम कल्याण की प्राप्ति होगी’। ब्रह्माजी के ऐसा कहने पर कमलों की माला से अलंकृत नवयौवना मृत्यु देवी नेत्रों से आँसू बहाती हुई दुखी हो बड़ी चिन्ता में पड़ गयी।‘

महाभारत, शातिपर्व के आपद्धर्म पर्व में कथा है, किसी ब्राह्मण के इकलौते पुत्र की अल्पायु में मृत्यु हो जाती है। परिजन द्वारा उसका शव श्मशान ले जाने पर वहां एक गिद्ध (गीध) और एक सियार प्रकट हो, जीवन-मृत्यु का उपदेश देने लगते हैं। दिन रहते शव-भक्षण लालायित गिद्ध समझाता है- मृत्यु अटल है और यहाँ रुकने से मृत बालक जीवित नहीं होगा, अब रोने-धोने से क्या होगा, परिजन अब शव को छोड़कर घर लौट जाएं। मृत शरीर के पास बैठने से केवल दुःख बढ़ता है। मोह को अज्ञानता बताते हुए लौट जाने और जीवितों के प्रति अपने कर्तव्य निभाने की सलाह देता है। सियार प्रेम और ममता की दुहाई देते अंधेरा होने तक उन्हें रुक जाने की सीख देने लगता है, ताकि रात होने पर वह शव को खा सके। सियार दुहाई देता है कि बड़े निर्दयी हो, जिससे प्रेम करते थे, उसके मृत देह के साथ थोड़ा वक्त नहीं बिता सकते। फिर कभी इसका मुख नहीं देख पाओगे। कम-से-कम संध्या तक रूककर जी भरके देख लो। इस तरह गिद्ध वैराग्य की तो सियार आशा और मोह की, बारी-बारी से शास्त्र और दर्शन (का आधार ले, अपने मतलब की) की बातें समझाते हैं। गिद्ध और गीदड़ के ‘अमृतरूपी वचनों‘ से प्रभावित हो वे मृतक के संबंधी कभी ठहर जाते और कभी आगे बढ़ते थे। ... कथा के अंत में भगवान शंकर मृतक को जीवित कर उसे सौ वर्ष की आयु देते हैं ... जीवन-मरण का चक्र।

महाभारत, अनुशासन पर्व के आरंभ में गौतमी ब्राह्मणी के पुत्र की सर्पदंश से हुई मृत्यु की कथा भी उल्लेखनीय है। जिसमें मृत्यु का कारण बने सर्प को व्याध मार डालना चाहता है, जबकि मृतक की माता गौतमी इसके पक्ष में नहीं है। सांप कहता है कि मैं मृत्यु के अधीन हूं, मृत्यु सांप से कहता है मैंने काल की प्रेरणा से तुझे ऐसा करने के लिए प्रेरित किया। तब काल आ कर कहता है, प्राणियों की मृत्यु में मैं, मृत्यु तथा यह सर्प कोई अपराधी नहीं है। बालक की मृत्यु उसके कर्म से हुई है, उसके विनाश में उसका कर्म ही कारण है। संभव है भारतेंदु का ‘अंधेर नगरी‘ नाटक ऐसी ही किसी कथा से प्रभावित हो।

श्रीमद्भागवत, चौथे स्कंध के आठवें अध्याय के आरंभ में मृत्यु के जन्म का प्रसंग है- ‘मृषाधर्मस्य भार्याऽऽसीद्दम्भं मायां च शत्रुहन् ...‘ अधर्म भी ब्रह्मा पुत्र था, उसकी पत्नी मृषा (झूठ), पुत्र ‘दंभ‘ और पुत्री ‘माया‘ हुई। दंभ और माया से लोभ और निकृति (शठता), का जन्म हुआ। उनसे क्रोध और हिंसा का, फ़िर उनसे कलि (कलह) तथा दुरुक्ति (गाली) का जन्म हुआ, उन्होंने मृत्यु और भय को उत्पन्न किया तथा उनसे यातना और निरय (नर्क) का जन्म हुआ। ऐसी ही कथा अग्निपुराण के अध्याय 20, सृष्टि प्रकरण में है- ‘अधर्म की पत्नी हिंसा हुई; उन दोनों से अनृत नामक पुत्र और निकृति कन्या की उत्पत्ति हुई। इन दोनों से भय तथा नरक का जन्म हुआ। क्रमशः माया और वेदना इनकी पत्नियाँ हुई। इनमें से माया ने भय के सम्पर्क से समस्त प्राणियों के प्राण लेने वाले मृत्यु को जन्म दिया और वेदना ने नरक के संयोग से दुःख नामक पुत्र उत्पन्न किया। इसके पश्चात् मृत्यु से व्याधि, जरा, शोक, तृष्णा और क्रोध की उत्पत्ति हुई।

वैदिक साहित्य में यम, विवस्वान-सूर्य और सरण्यू-संज्ञा के पुत्र, प्रथम मर्त्य, समस्त प्राणियों का ‘नि-य-म-न‘ (यम-नियम, सामाजिक और व्यक्तिगत आचरण) करने वाले देवता हैं। यम के द्वारा स्वयं भी मृत्यु स्वीकार करने का उल्लेख वैदिक साहित्य में है। शाब्दिक दृष्टि से यम, यमज यानी जुड़वा से जुड़ा है। यम-यमी जुड़वा भाई-बहन हैं, इनका संवाद चर्चित है। यमी, अपने जुड़वा यम से संसर्ग प्रस्ताव करती है, इसमें रूपक दिखता है कि यम, मृत्यु है तो उसकी जुड़वा यमी, जीवन होगी। यमी-जीवन, यम-मृत्यु से संसर्ग-वरण प्रस्ताव रख रही है, मगर यम उससे असहमत है। इसी तरह कठोपनिषद के संवादी यम का नचिकेता जीवन-मृत्यु संवाद, बहुश्रुत है।

लगता है कि पुनर्जन्म के विचार में मूलतः, जीवन को मृत्यु से और मृत्यु को जीवन से जोड़ कर देखना है। 

जन्मदिन हो या शादी की सालगिरह, बधाई-शुभकामना हो न हो, मन में गांठ न बांध लें। दिल की गिरह खोल दो, चुप न बैठो, कोई गीत गाओ ...

Sunday, March 22, 2026

मौज बरास्ते भाषा

# का भाषा का संसकृत प्रेम चाहिए सांच -तुलसी
# संसकिरत है कूप जल, भाखा बहता नीर -कबीर
# देसिल बयना सब जन मिट्ठा -विद्यापति
# निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल -भारतेन्दु

इसमें कोई संदेह नहीं कि ऐसी बातें अपनी, देसी भाखा के पक्षधरों की हैं, मगर क्या संस्कृत के विरोध में हैं? कुबेरनाथ राय अपने निबंध ‘भाषा बहता नीर‘ में मानों इस सवाल का जवाब देते, स्पष्ट करते हैं- ‘संस्कृत भाषा कूप जल‘ का संबंध भाषा, साहित्य से है ही नहीं। यह वाक्यांश पुरोहित तंत्र के खिलाफ ढेलेबाजी भर है जिसका प्रतीक थी संस्कृत भाषा।‘ यही बात तुलसी के कथन पर भी लागू है, वही तुलसी मानस के सातो कांडों का आरंभ संस्कृत मंगलाचरण से होता है औैर सातवें-अंतिम उत्तरकांड का समापन ‘भाषाबद्धमिदं चकार तुलसीदासस्तथा मानसम्‘ जैसी बात सहित दो संस्कृत श्लोकों से होता है। मगर वहीं ‘मांग के खाइबो, मसीत में साइबो‘ कहते हैं तो यह स्पष्ट हो जाता है कि उनकी उपरोक्त बात संस्कृत का आड़ ले कर भ्रमित करने वालों के खिलाफ कही गई है न कि संस्कृत के लिए।

निरुक्त और पाणिनी के हवाले से बताया जाता है कि ‘भाषा‘ शब्द, वैदिक भाषा के विपरीत प्रचलित लोकभाषा का द्योतक है। अथर्ववेद के प्रसिद्ध पृथिवी सूक्त का अंश, जहां भाषा की विविधता में भेद-भाव नहीं है- जनं बिभ्रती बहुधा विवाचसं नानाधर्माणं पृथिवी यथौकसम्। सहस्रं धारा द्रविणस्य मे दुहां ध्रुवेव धेनुरनपस्फुरन्ती।। यानी ‘विविध भाषाएँ बोलने वाले और विविध धर्मों (संस्कृति, आचार-विचार) को मानने वाले लोगों को, एक घर (परिवार) की तरह, जो पृथ्वी धारण करती है (पोषण करती है), वह स्थिर और सहनशील गाय की तरह, हमें धन की हज़ारों धाराएँ (समृद्धि) प्रदान करे।‘ विनय पिटक के चुल्लवग्ग में कहा गया है- ‘अनुजानामि भिक्खवे सकाय निरुत्तिया बुद्धवचनं परियापुणितुं‘ यानी बुद्धवचन को रटने के बजाय अर्थ को सकाय निरुत्तिया - स्थानीय बोलियों (पाली-मागधी?) में सीखना-समझना चाहिए।

परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी वाणी में परा को आत्मा की शक्ति बताया गया है। पश्यंती, जहां शब्द और अर्थ एक रूप हों। मध्यमा-शब्द और अर्थ का भेद, मगर मन में, और वैखरी- उपांशु (बुदबुदाना, होंठ और जीभ में गति हो, मगर स्वयं को भी कोई शब्द सुनार्ह न दे) और उच्चैःस्वर (सस्वर या ऊँचे स्वर में)। फिर कहा गया है कि जिन्होंने साक्षात्कार किया- ऋषि हैं, और जिन्होंने पढ़ कर ज्ञान प्राप्त किया वे मुनि। दूसरे शब्दों में परा तो परे ही है, पश्यन्ती, वह जिसे ‘देखा‘ गया, ज्यों वैदिक ऋचाएं (श्रुति), अपरिवर्तनीय- सत्य, अहिंसा, तप, त्याग, दया, संतोष आदि जैसे मानवीय मूल्य, ‘सच बोलो, सच तोलो‘ जैसी, ज्यों गांधी के ‘हिंद स्वराज‘ में निहित भाव। इसके बाद मध्यमा, जहां विचार शब्दों में ढलने लगें (स्मृति), देश-काल-पात्र के साथ बदलने वाली, कब, कहां, कैसे के विचार वाली, ज्यों गांधी की आत्मकथा और फिर वैखरी, मुख से बोली और कान से सुनी जा सकने वाली सार्थक ध्वनि-शब्द (न्याय), गांधी के पत्र-भाषण आदि, जिसके लिए वे कहते कि उनके दो लेखों में विरोध जैसा लगे, तो बाद के लेख को प्रमाणभूत मानें।

राजशेखर की काव्यमीमांसा का उद्धरण- ‘पुत्रात्पराजयो द्वितीयं पुत्रजन्म‘ सरस्वती अपने पुत्र काव्य पुरुष को गोद में लेकर कहती हैं- यद्यपि मैं संपूर्ण वांग्मय की जननी हूं, फिर भी तुमने संस्कृत में छन्दोमयी वाणी के प्रयोग द्वारा मुझे परास्त कर दिया है ... अपने पुत्र से परास्त होना द्यितीय पुत्र की उपलब्धि के समान आनंदकारक होता है। यहीं आगे आया है- ‘शब्दार्थौ ते शरीरं, संस्कृतं मुखं, प्राकृतं बाहू ...‘ शब्द और अर्थ तेरे शरीर है। संस्कृत-भाषा मुख है। प्राकृत भाषाएँ तेरी भुजाएँ है। अपभ्रंश भाषा जंघा है। पिशाच-भाषा चरण है और मिश्र-भाषाएँ वक्ष स्थल है। ... रस तेरी आत्मा है। छन्द तेरे रोम है। प्रश्नोत्तर, पहेली, समस्या आदि तेरे वाग्विनोद हैं और अनुप्रास, उपमा आदि तुझे अलंकृत करते हैं।

रहीम ने ‘खेटकौतुकम्‘ का पहला श्लोक संस्कृत में रचा है, इसके बाद के पदों के लिए, दूसरे पद में कहते हैं है- ‘फारसीयपदमिश्रतग्रन्थाः खलु पण्डितैः कृताः पूर्वैः। सम्प्राप्य तत्पदपथं करवाणि खेटकौतुकं पद्यैः।।‘ यानी पूर्वाचार्यों ने फारसी शब्दों से मिला हुआ संस्कृत पद्मों में विविध प्रकार के ग्रन्थों का निर्माण किया है। मैं (खानखाना नब्बाब) भी उन्हीं के चरणपथ का अवलम्बन करके उसी तरह फारसी से मिले हुए संस्कृत श्लोकों में ‘खेटकौतुक‘ नामक ग्रन्थ की रचना करता हूँ। दक्षिण भारतीय परंपरा में इसे मणिप्रवाल शैली (मोती और मूंगा) कहा जाता है। रहीम के ऐसे भाषा-कौतुक का एक उदाहरण है- ‘एकस्मिन् दिवसावसानसमये मैं था गया बाग में, काचित् तत्र कुरङ्गबालनयना गुल तोड़ती थी खड़ी। तां दृष्ट्वा नवयौवनां शशिमुखीं मैं मोह में जा पड़ा, तत्सीदामि सदैव मोहजलधौ हा दिल गुजारे शुकर।।

हजारी प्रसाद द्विवेदी कहते हैं- 'सहज भाषा पाने के लिए कठोर तप आवश्यक है। ... सहज मनुष्य ही सहज भाषा बोल सकता है।' और सुमित्रानन्दन पन्त बताते हैं- 'भाषा संसार का नादमय चित्र है, ध्वनिमय-स्वरूप है। यह विश्व के हृत्तन्त्री की झंकार है, जिसके स्वर में वह अभिव्यक्ति पाता है। विश्व की सभ्यता के विकास तथा ह्रास के साथ वाणी का भी युगपद् विकास तथा ह्रास होता है। भिन्न-भिन्न भाषाओं की विशेषताएँ, भिन्न भिन्न जातियों तथा देशों की सभ्यता की विशेषताएँ है। संस्कृत की देव-वीणा में जो आध्यात्मिका-संगीत की परिपूर्णता है यह संसार की अन्य शब्द-तन्त्रियों में नही, और पाश्चात्य साहित्य के विशदयन्त्रालय में जो विज्ञान के कल-पुर्जों की विचित्रता, बारीकी तथा सजधज है, वह हमारे भारती-भवन में नहीं।'

भाषा-बहुलता के संदर्भ में हिंदी के कुछ साहित्यकार, जिनकी बेहतर पकड़ अन्य भाषाओं पर रही है- भारतेन्दु, गुलेरी, प्रेमचंद, हजारी प्रसाद द्विवेदी, राहुल सांकृत्यायन, बच्चन, अज्ञेय, कृष्ण बलदेव वैद, कुबेरनाथ राय जैसे अनेक नाम हैं, बल्कि हिंदी साहित्य के महत्वपूर्ण लेखकों में शायद ही ऐसा कोई हो, जो दूसरी किसी एक या एकाधिक भाषा में निष्णात न हो। इस दौर के वागीश शुक्ल, गणित के प्राध्यापक रहे और जिनका संस्कृत, फारसी और अंग्रेजी पर अधिकार है। इस सिलसिले में रेणु, विद्यानिवास मिश्र, कुबेरनाथ राय या वासुदेव शरण अग्रवाल जैसे देशज लोकभाषाओं पर बल देने वाले भी हैं। हमारे एक गुरु हार्वर्डवासी, बनारसी-भोजपुरी प्रेमी भारतेन्दु खानदान के डॉ. प्रमोदचंद्र कहते थे कि अभिव्यक्ति में स्वाभाविक लोच और रस अधिक आ जाता है, अगर पहली जबान देशज हो। यों भी बोली-भाषा का लोक-शास्त्र, बृहत्साम-रथन्तर, विष्णु वाहन गरुड़ के दो डैने हैं।

बस्तर के अभिलेखों की चर्चा। रायबहादुर हीरालाल की टिप्पणी है कि ‘इन्द्रावती नदी के उत्तरी भाग से प्राप्त समस्त अभिलेख देवनागरी लिपि में हैं तथा दक्षिणी भाग में इसी समय के अभिलेख तेलुगु लिपि में हैं।‘ उनकी यह टिप्पणी विशेष संदर्भ में है, इसके अलावा बस्तर के अभिलेखों में उड़िया है और ‘भाषा‘ भी। दंतेवाड़ा शिलालेख अगल-बगल दो पत्थरों पर है, जिसमें कहा गया है- ‘देववाणी मह प्रशस्ति लिषाए पाथर है महाराजा दिकपालदेव के कलियुग मह संस्कृत के बचवैआ थोरहो हैं तै पांइ दूसर पाथर मह भाषा लिषे है।‘ पुनः अंत में कहा गया है कि- ‘ई अर्थ मैथिल भगवानमिश्र राजगुरु पंडित भाषा औ संस्कृत दोउ पाथर मह लिषाए।‘ यहां संस्कृत ‘देववाणी‘ है औैर पूर्वी किस्म की हिंदी ‘भाषा‘। यही भाषा ‘भाखा‘ है। इन्हीं दिक्पालदेव के पुत्र राजपालदेव का ताम्रपत्रलेख दो भाषाओं और दो लिपियों में है। हिन्दी भाषी राजा की प्रतिज्ञा उड़िया भाषा में और उड़िया भाषी ब्राम्हणों की प्रतिज्ञा हिन्दी भाषा में लिखी गई है ताकि उभय पक्ष समझौते की शर्तें पढ़-समझ सके। इन अभिलेखों का काल अठारहवीं सदी है।

अब थोड़ी मौज - सठियाए सालों पुरानी हमारी पढ़ाई शुरू होती थी ककहरा और गिनती से। गिनती की किताब में पहाड़ा भी आ जाता और फिर यह कहलाता भाषा और गणित। भाषा में इमला होता यानी शुद्ध लेखन, और पाठ-वाचन। गणित यानी अंकगणित, जिसे पाटीगणित या व्यक्तगणित भी कहते, उसमें जोड़-घटाव गुणा-भाग के साथ मनगणित और यांत्रिक-गणित भी होता, जिसके लिए सूत्र रटाया जाता, ‘सहि अरु का को तोड़कर, भाग-गुणा कर मीत, ता पीछे धन-ऋण करै, यही भिन्न की रीत‘। तीसरी कक्षा में जिले का भूगोल होता, चौथी में प्रदेश का और पांचवीं में देश का। भूगोल, सामाजिकध्यान यानी सामाजिक अध्ययन का एक हिस्सा होता, इतिहास और राजनीति के साथ। मुझे याद नहीं आता कि प्राथमिक कक्षाओं में अर्थशास्त्र होता था या नहीं और होता था तो किस रूप में। आगे चल कर ‘नेकोसेकोसेकापरहे, बैनीआहपीनाला और यमाताराजभानसलगा, जैसे सूत्र सबको याद होते। सोचता रहा हूं, तुलसी भी किसी ऐसे ही दौर से गुजरे होंगे कि कहा- ‘अंक अगुन आखर सगुन समुझिअ उभय प्रकार‘। अंक- तथ्य, वस्तुगत और आखर- विषयगत!

हमारे एक परिचित कभी बंबई गए, पकी उम्र में पहली बार।बंबई पहुंचकर उनकी एक ही धुन थी, थाणे का पुलिस स्टेशन देखना है। फिल्मी दुनिया की चकाचौंध में ‘इ है बंबई नगरिया ...‘ गीत, कहीं ऐसी कोई बात नहीं, फिर यह कैसी धुन। बात पता लगी कि उन्होंने सुन रखा था कि मराठी में पुलिस थाना को पोलिस ठाणे कहा जाता है, वे देखना चाहते थे कि यह ठाणे के पुलिस थाने में किस तरह लिखा हुआ होगा और मन ही मन ‘ठाणे पुलिस ठाणे‘ सोच कर, मुख-सुख उचार कर आनंद लिया करते रहे। इसी तरह रायपुर से लगे बरौदा गांव, के बैंक आफ बड़ौदा की शाखा को अंग्रेजी में क्या लिखते हैं- Bank of Baroda, Branch- Baroda!

संयोग कि मुझे सिखाने-पढ़ाने वाले ऐसे गुरूजी मिले, जो छकाते भी थे। जिस पर कभी ध्यान नहीं गया था, ऐसी बात किसी ने कही कि जिस शब्द की परिभाषा हो, उसमें वह शब्द या उसका समानार्थी शब्द नहीं आना चाहिए, मैंने अपने गुरूजी से ‘शेयर‘ किया, इस पर उन्होंने सवाल किया कि क्या यह बात परिभाषा के परिभाषा जैसी मानी जा सकती है और नहीं तो परिभाषा की परिभाषा क्या होगी? फिर यह भी कि समानार्थी शब्द तो शब्दकोश में होते हैं, जिनमें शब्दों के अर्थ दिए होते हैं, फिर उसे अर्थकोश क्यों नहीं कहते!, सो ज्ञानमण्डल, बनारस का ‘बृहत् हिन्दी कोश‘ खोल लिया। सबसे पहले ध्यान गया, वाह बनारसी ... न शब्द न अर्थ, बस कोश। मगर ऐसा सिर्फ यहां नहीं, वामन शिवराम आप्टे का ‘संस्कृत-हिन्दी कोश‘ है और फादर कामिल बुल्के का नाम 'अँगरेजी हिन्दी कोश‘ मिला, हम ही हैं जो शब्दकोश-अर्थकोश के चक्कर में पड़े हैं। बहरहाल, ‘बृहत् हिन्दी कोश‘ में भाषा शब्द पर पहुंचा तो पाया- ‘भावप्रकाशका साधन; किसी विशेष देश या जन-समाजमें प्रचलित शब्दावली और उसे बरतनेका ढंग, बोली; प्रादेशिक भाषा या बोली; हिंदी व्यक्ति विशेषके लिखने-बोलनेका ढंग; परिभाषा; शैली; सरस्वती; अर्जीदावा; एक रागिनी।‘ अब लगता है कि गुरुओं ने रट-घोंट लेने के साथ-साथ जुगाली करते रहने पर जोर दिया, तो जैसी गुरु-दीक्षा, शिरोधार्य।