Thursday, June 18, 2026

छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता

कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय, रायपुर छत्तीसगढ़ के अंतर्गत स्थापित, माधवराव सप्रे राष्ट्रवादी पत्रकारिता शोध पीठ द्वारा (2011? में) ‘छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता‘, हमारे पुरोधा: खण्ड-2 का प्रकाशन किया गया था। पुस्तिका के संपादक परितोष चक्रवर्ती, अध्यक्ष, माधवराव सप्रे राष्ट्रवादी पत्रकारिता शोध पीठ हैं। इसके पहले खंड की जानकारी पुस्तिका के निम्नलिखित ‘प्रस्तावना‘ में है, जो यथावत यहां प्रस्तुत है। इसके पश्चात इस खंड की परिचयात्मक जानकारी दी जा रही है।

प्रस्तावना

छत्तीसगढ़ की पावन धरा आदिकाल से ही आध्यात्मिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक चेतना से परिपूर्ण रही है। इस धरा पर जन्में और पुष्पित पल्लवित हुए सामाजिक, सांस्कृतिक आंदोलन पूरे भारत वर्ष के लिए प्रेरणा के स्रोत बने और इसी से मार्गदर्शन प्राप्त कर देश के अन्य भागों में सामाजिक उन्नयन और सांस्कृतिक समुच्चयन के कार्य हुए। आधुनिक भारत के नवजागरण में भी छत्तीसगढ़ की रचनात्मक ऊर्जा एवं अस्मिता की महत्वपूर्ण भागीदारी रही है। यही कारण है कि छत्तीसगढ़ की पहचान सदा से ही अनोखी और निराली रही। अनादिकाल से छत्तीसगढ़ रचनात्मक ऊर्जा से परिपूर्ण एक ऐसे भूभाग के रूप में आलोकित रहा जिसका प्रकाश यत्र-तत्र सर्वत्र फैलता रहा।

छत्तीसगढ़ की इसी रचनात्मक ऊर्जा और सामाजिक उन्नयन का परिचय यहां की पत्रकारिता में भी देखने को मिलता है, जिसका अस्तित्व इसके प्रारब्ध से ही निराला रहा। छत्तीसगढ़ के पहले समाचार पत्र के रूप में ख्यात और सर्वज्ञात ‘छत्तीसगढ़ मित्र‘ सन् 1900 में पेंड्रा रोड से पं. माधवराव सप्रे द्वारा अपने दो अन्य मित्रों पं. रामराव चिंचोलकर और पं. वामनराव लाखे के सहयोग से निकाला गया। इस पत्र का नाम छत्तीसगढ़ मित्र होना ही इस राज्य की रचनात्मक मेधा और अस्मिता का परिचायक है। उसके बाट कबीर पंथी (रायपुर, 1913), कान्यकुब्ज नायक (रायपुर, 1919), विकास (बिलासपुर, 1925), ‘उत्थान‘ और ‘आलोक‘ (1925), ‘सरगुजा संदेश‘, ‘कांग्रेस पत्रिका‘ और ‘सचेत‘ (1937), अग्रदूत (1942), महाकौशल (1935) पत्रकारिता की अनवरत् श्रृंखला को रेखांकित करते दीप स्तंभ है। 

समाचार पत्रों की इस यात्रा के दौरान इस धरा पर कलम के अनेक योद्धा पैदा हुए जिन्होंने अपनी धारदार लेखनी के जरिये समाज में नई चेतना और ऊर्जा का संचार किया। वे ऐसे महामना थे जिन्होंने अपने निजी स्वार्थ और निजी विकास को परे रखकर देशहित और समाज हित के प्रति अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर दिया।

विश्वविद्यालय द्वारा विगत वर्ष पत्रकारिता के ऐसे पुरोधाओं का स्मरण करते हुए पहला मोनोग्राफ ‘हमारे पुरोधा‘ खण्ड-1 निकाला था, जिसमें पं. माधवराव सप्रे, पं. रविशंकर शुक्ल, बैरिस्टर ठाकुर छेदीलाल, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, कुलदीप सहाय, यदुनंदन प्रसाद श्रीवास्तव, केशव प्रसाद वर्मा, गजानन माधव मुक्तिबोध, पं. स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी, चंदूलाल चंद्राकर, मायाराम सुरजन और हरि ठाकुर का समावेश था। ऐसे ही कुछ और पुरोधाओं पर केन्द्रित दूसरा खण्ड अब सादर समर्पित है। हमारा प्रयास है कि और अधिक जानकारी एकत्रित कर हम ऐसे ही पुरोधाओं पर कुछ और खण्ड प्रकाशित करें। हमने यथासंभव अधिक से अधिक जानकारी एकत्रित करने का प्रयास किया है, फिर भी किसी महत्वपूर्ण जानकारी अथवा ऐसे कुछ महानुभावों का उल्लेख अवश्य छूट गया होगा, जिसका समावेश होना चाहिये था। इसके लिए सभी पुरोधाओं का श्रद्धापूर्वक स्मरण कर उनके प्रति हम क्षमा याचना अर्पित करते हैं।

यह मोनोग्राफ हमारी विनम्र श्रद्धांजलि हैं, रचनात्मकता के उन वीरों के नाम जिनके आशीर्वाद से आज छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता नई ऊंचाईयों को छू रही है और नवगठित राज्य की विकासयात्रा में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रही है।
सच्चिदानंद जोशी
कुलपति

हमारे पुरोधा: खण्ड-2 में 12 पुरोधाओं की संक्षिप्त जानकारी इस प्रकार है-
नाम - जन्म/मुख्य कर्मभूमि, जन्म-निधन तिथि

# बारीन्द्रनाथ बैनर्जी - /रायगढ़, 19.11.1916-20.09.2006 
# पं. रामाश्रय उपाध्याय ‘वक्रतुण्ड‘ - बिहार/रायपुर, 02.08.1917-05.02.2005
# पं. शिवनारायण द्विवेदी - उत्तरप्रदेश/रायपुर, 20.07.1920-20.01.1999
# मधुकर खेर - रायपुर, 21.02.1928-31.03.1996
# केशवलाल मेहता - /कोरबा, 01.02.1929-05.02.2009
# कुमार साहू - मध्यप्रदेश/रायपुर, 22.10.2029-22.05.2008
# श्रीकांत वर्मा - बिलासपुर/दिल्ली, 18.12.1931-1986(25 मई)
# डी.पी. चौबे - बिलासपुर, 05.02.1935-19.06.1988 
# रम्मू श्रीवास्तव - लोहारा, कवर्धा/रायपुर, 19.12.1936-09.02.2006
# किरीट दोशी - /जगदलपुर, 29.11.1939-17.11.2009
# बसंत अवस्थी - रायपुर, 05.08.1940-11.07.2008
# सत्येन्द्र गुमास्ता - महासमुंद/रायपुर, 05.12.1940-13.06.1997

टीप -
0 पुस्तिका में प्रकाशन वर्ष अंकित नहीं है, यहां कोष्ठक में दर्शाया गया वर्ष 2011, अंतिम पृष्ठ पर छपे छत्तीसगढ़ संवाद के विज्ञापन February 2011 के आधार पर है।
0 पुस्तिका संपादक परितोष चक्रवर्ती स्वयं बिलासपुर से करीब से जुड़े रहे, मगर पुस्तिका में श्रीकांत वर्मा के निधन का वर्ष दिया गया है, तारीख नहीं। यहां कोष्ठक में दी गई तारीख अन्य स्रोत से ली गई है।
0 स्वयं पत्रकार रहे, परितोष जी की पहचान वामपंथी रुझान के साहित्यकार की रही। स्वाभिमानी परितोष कुछ समय भिलाई इस्पात संयंत्र में जनसंपर्क अधिकारी रहे, बाद में लंबे समय तक बिलासपुर एसइसीएल में जनसंपर्क विभाग प्रमुख का दायित्व निर्वाह किया। इस विश्वविद्यालय में उस दौर में इनकी नियुक्ति, विचारधारा के स्तर पर मेल नहीं खाती थी, चर्चा का विषय थी।
0 इस श्रृंखला का खण्ड-1 उपलब्ध नहीं हुआ है। प्राप्त होने पर वहां शामिल पत्रकार पुरोधाओं की इसी प्रकार संक्षिप्त जानकारी जोड़ी जाएगी।

Thursday, June 11, 2026

कुबेर

आवेदन-पत्र में खाने बने होते हैं- पहला नाम, दूसरा नाम और तीसरा-अंतिम नाम। उपनाम, तखल्लुस या साहित्यिक नाम, इस सबके बाद जोड़ा जाता है और कई बार वही व्यक्ति का पर्याय बन जाता है। प्रसंग यह कि जिन्हें कुबेर सिंह साहू के नाम से जाना था और उनकी कुछ रचनाओं से परिचित और प्रभावित था। फोन पर संपर्क बना। उनकी कुछ किताबों के साथ उन्हें करीब से देख रहा हूं। इन किताबों पर उनका सिर्फ पहला नाम 'कुबेर' है। दो अन्य नाम- भोड़िया और ढोढ़िया, कुबेर के परिचय के साथ आता है जो क्रमशः उनके ग्राम और पोस्ट का नाम है। आपस में मिलते-जुलते लेकिन कुछ अलग से इन नामों पर बरबस ध्यान जाता है। आगे बढ़ने से पहले क्यों न कुछ देर इन पर ठहर लें।

ग्राम-भोड़िया, पोस्ट-ढोढ़िया। जाने क्यों गांवों के ऐसे अजीब नाम प्रचलन में आए होंगे। वैसे अजीब तो वही लगता है, जिससे अपनापा या कम से कम थोड़ा बहुत परिचय न हो। तो आइए, कुबेर के पहले इनसे थोड़ी भेंट-घांट, जान-पहचान का उद्यम करें। भोड़िया, शब्द को तोड़ें तो पहला हिस्सा होगा ‘भ‘ और ‘भो‘। भ में खालीपन का भाव है, ज्यों छत्तीसगढ़ी का भरभंगा या बर्तन के साथ प्रयुक्त ‘भंड़वा‘ हिंदी का बर्तन-भांडा या इसी तरह भंडार। और भो, संबोधन कारक है, ‘हे, ओ, अरे' की तरह। कोई अनाम हो या ईश्वर, जो निराकार शून्य है, उसके लिए संबोधन में प्रयोग होता है, भो! बस इतना करते ही वह छेद, ‘पीप होल‘, दरार बन जाएगी, जहां से भोड़िया का अर्थ खुलते देखा जा सकता है। 'बिटविन द लाइन्स' का सुख, दरार-फांक से, चोरी से देख लेने, जो और कोई, हर कोई नहीं देख-समझ पा रहा हो उसका एक्सक्लूसिव आनंद। भोड़िया, शब्द को तोड़ें तो पहला हिस्सा होगा भोड़, बस इतना करते ही वह छेद, ‘पीप होल‘, दरार बन जाएगी, जहां से भोड़िया का अर्थ खुलते देखा जा सकता है। याद करें छत्तीसगढ़ी का शब्द, भोंड़ा या भोंड़ू, यादि छिद्र। यही ‘भ‘, जो भोंकने-भोंगने यानी छेद करने में है, वह भुलका से भोंगरा हो जाता है। यहां तक पहुंचकर मुझे ‘ताला‘ उत्खनन के दिनों की याद आती है। हम बिल्हा ब्लाक के धौंराभांठा गांव हो कर गुजरते थे और नाम सुनते थे ‘भुलकहा‘। अनुमान किया कि तुर्री नाम वाले गांवों, तुरतुरा या तुरतुरिया की तरह यहां भी जल-सोते का प्रवाह होगा और मौके पर ऐसा ही पाया। इस छोटे से विराम में भटक कर ठहर सकते हैं कि भोड़िया, किसी जल-सोते से जुड़ा नाम होगा। यों भी ग्राम-नाम अधिकतर भू-संरचना, भौगोलिक विशिष्टता, जल, जीव-जंतु और वनस्पति से जुड़ कर बनते हैं।

अब ढोंढ़िया। इस नाम के के साथ सबसे पहले ध्यान जाता है ढोंढ़, ढोंड़ या दोंद पर, जिसका आशय मोटा पाइप है। छत्तीसगढ़ के कई इलाकों में पानी के प्राकृतिक सोते के लिए ढ़ोंढ़ी या झोड़ी शब्द प्रचलन में है, जिसे बांध कर छोटे कुएं का रूप दे दिया जाता है और ओवर-फ्लो पानी रिस कर बाहर बहता रहता है। इसी के पास का शब्द है डोंढ़िया या ढोंढ़िया, ‘पानी वाला सांप‘- ‘डुण्डुभ‘। डोंढ़िया है तो सांप, मगर सीध-साधा, शरीफ, बेचारा-सा। काटे नहीं, काट लिया तो जहरीला नहीं, मेरे बचपन के बड़े साथी कहते थे, ‘डोंढ़िया के चाबे, एक फूंक गांजा बरोबर‘। इसके साथ जिस दूसरे का नाम लिया जाता है, वह है पिटपिटी, नाम से ही पिटा-पिटाया सा।

बरास्ते कुबेर वापस आते हुए, भोड़िया-ढोंढ़िया ग्रामवासियों के समक्ष सादर आग्रह- अपने ग्राम नाम के पीछे आपलोगों की कोई मान्यता हो, बड़े-बुजुर्गों से कुछ सुना हो, आप लोगों ने कुछ सोचा हो तो अवगत कराइएगा, अन्यथा विनम्र प्रस्ताव कि अपने ग्राम नाम और पता-पोस्ट के नाम भोड़िया-ढोंढ़िया के लिए सुझाए उक्त अर्थ को मान्य करने पर विचार कीजिएगा, मेरे लिए आप सब की पहचान पानीदार इलाके के निवासी वाली है।


विश्व कथा-साहित्य में उनकी दिलचस्पी है। उनकी किताब ‘ढाई आखर प्रेम के‘ अंगरेजी की ग्यारह कहानियों का अनुवाद-उल्था है, जिसमें आस्कर वाइल्ड और ओ. हेनरी जैसे ख्यातनाम हैं, तो कम चर्चित कोलिन होवार्ड भी शामिल हैं, मगर न जाने क्यों, बिना परिचय के, जबकि अन्य सभी छह कहानीकारों के साथ उनका परिचय भी है। इनमें भारतीय अंगरेजी कहानीकार- खुशवंत सिंह, आर.के. नारायण, रस्किन बांड हैं, जिन्हें होना ही चाहिए फिर यहां भी आम पाठक के लिए एक कम जाना नाम- ‘चमन नहल‘, जिनकी कहानी शामिल है। वे अपने चेखव की कहानियों के छत्तीसगढ़ी अनुवाद संग्रह ‘चेखव की दुनिया‘ के कारण अधिक जाने गए हैं। मगर उनका अन्य अवदान भी उल्लेखनीय और महत्वपूर्ण है।

कुबेर ने छत्तीसगढ़ी में अनुवाद के अलावा, मौलिक कहानी लेखन किया है, छत्तीसगढ़ी लोक कथाओं का संग्रह, निबंध, आलेख और संस्मरण भी किया है। हिंदी में उनकी कविताओं, कहानी, व्यंग्य संग्रह भी प्रकाशित हैं। उनकी संपादित पुस्तक संगीतकार खुमान साव पर केंद्रित- ‘स्मृतियों के सुवासित पुष्प‘ है। खुमान साव की स्मृतियों को इस तरह संजोना छत्तीसगढ़ की लोक-संस्कृति और संगीत के लिए आवश्यक और महत्वपूर्ण कार्य है। इसी तरह पं सुंदरलाल शर्मा कृत ‘छत्तीसगढ़ी दानलीला‘ की टीका उनके द्वारा की गई है।

खुमान साव, रामचंद्र देशमुख वाले ‘चंदैनी गोंदा‘ के आधार-स्तंभों में से एक थे। देशमुख जी के न रहने पर इस नाम को उन्होंने पूरी गरिमा के साथ जीवन्त रखा। कला-संगीत में अनुशासन और मर्यादा का निर्वाह करते उसे छत्तीसगढ़ की सबसे लोकप्रिय कला-मंडली में से एक बनाए रखा। इसी तरह, पं सुंदरलाल शर्मा कृत ‘छत्तीसगढ़ी दानलीला‘ के कई संस्करण और अनुवाद-टीकाएं प्रकाशित हैं फिर भी इस कृति की टीका-संभावना बनी हुई है। इस बात का ध्यान रखते ‘छत्तीसगढ़ी दानलीला‘ की टीका की गई है। टीका में यथास्थान अलंकार का उल्लेख किया गया है किंतु पदों के अनुवाद या हिंदी अर्थ को भावार्थ कहे जाने का आग्रह-औचित्य, संभवतः यही है कि इसे हिंदी अनुवाद के बजाय टीका कहा गया है। यहां इस बिंदु की ओर ध्यानाकर्षण आवश्यक है, बेहतर होता इस कृति पर अब तक हुए प्रमुख कामों का उल्लेख कर दिया जाता। इसी तरह एक अन्य बिंदु का उल्लेख कि प्राक्कथन में इस खंडकाव्य का रचना काल 1907 ई. बताया गया है। जबकि टीका के अंत में स्पष्ट किया गया है कि द्वितीय संस्करण में 21 जून 1907 का हवाला है। इससे स्पष्ट है कि द्वितीय संस्करण इस तिथि के बाद छपा और प्रथम संस्करण इसके पहले। यह असावधानी अखरने वाली है।

उनके छत्तीसगढ़ी संग्रहों ‘कहा नहीं‘ और ‘भोलापुर के कहानी‘ की कहानियों में लोक-छत्तीसगढ़ की वही सुवास प्रस्फुटित है, जो लेखक के मन में रची-बसी है। इनसे गुजरते हुए उनके अन्य दो संग्रह ‘छत्तीसगढ़ी-कथाकंथली‘ और ‘सुरति अउ सुरता‘ के प्रति मेरी उत्कंठा और बढ़ गई है। उनकी कृतियों से जान पड़ता है कि वे भाषा और भाव में समरस होने वाले, उसे समरस कर देने के उद्यम वाले रचनाकार हैं। उन्हें अपने पठन-पाठन के दौरान रचनाओं से बने मनोभावों को कभी अपनी भाषा तो कभी अपनी भाषा को इतर भाषा में ले जाने का प्रयास होता है। ऐसा अक्सर तब होता है, जब पाठक भाषा की सघनता को तरल करते भाव के रूप में आत्मसात कर पाता है। इस तरह मेरी दृष्टि में कुबेर के रचनाकार में भाव-भाषा के द्वंद्व का समाहार है। 

चलते-चलते कुबेर और भोड़िया के रिश्ते पर एक नजर। इनका संयोजक शब्द बनेगा ‘कुम्भ‘ जिसमें ‘कु‘ है और ‘भ‘ भी। धनद देव कुबेर की निधि कुंभ में सहेजी जाती है। कुबेर के लिए एक समानार्थी शब्द कुदेह भी है। अपनी पढ़ाई के दौरान कुबेर का प्रतिमाशास्त्रीय लक्षण, इसे तुंदिल यानी पेटला, बौना, तीन टांग, आठ दांत और आंख के स्थान पर पीला चिह्न वाला- एकाक्षीपिंगल बताया गया था। कुबेर, कुबरा या कुबड़ा बनता ही है, जिसके एक पुत्र का नाम नलकूबर है। यों कुबेर में जितना भी ‘कु‘ हो वह है उत्तर दिशा का, यक्ष और किन्नरों का स्वामी और रुद्र का सखा। कुबेर के कु-बेर में बुरे समय का आशय भी निहित है, मगर यहां विवेच्य कुबेर को पढ़ते हुए आश्वस्त रहें, समय ‘सुबेर‘ बीतेगा।

अंत में उल्लेख कि ‘स्मृतियों के सुवासित पुष्प‘ और पं सुंदरलाल शर्मा कृत ‘छत्तीसगढ़ी दानलीला' की उनके द्वारा की गई टीका, इन दोनों पुस्तकों में उन्होंने मुझे भी शामिल करने योग्य माना, एतदर्थ उनके प्रति इस प्रकार अपना आभार भी व्यक्त कर रहा हूं।

Saturday, June 6, 2026

सौंदर्य का राज

‘पुष्पा हंस‘ नाम कभी बचपन में सुना था, माना लिया था कि काल्पनिक होगा, अब खोजबीन में पता लगा कि पिछली सदी के पांचवें-छठें दशक की गायिका-अदाकारा थीं। इतनी नामचीन, कि लक्स के विज्ञापन में भी आती थीं। 

जी हां, लगभग 35-40 साल का दौर ऐसा था कि अभिनेत्री, तब तक टॉप की नहीं मानी जाती थी, जब तक विज्ञापन कर वह यह खुलासा न कर दे कि उसके सौंदर्य का राज ‘लक्स‘ है, जो सौंदर्य और त्वचा की रक्षा करता है। इतने के बाद स्वाभाविक कि ‘लक्स‘ द्वारा खुद से खुद को, चित्र तारिकाओं का सौंदर्य साबुन कहा गया। पुराने जमाने में वे इससे ‘अपनी त्वचा की रक्षा करती‘ और उत्कृष्ट बताई जाती थीं, यह साबुन सौंदर्य रक्षक होता था, सुरैया जैसी गायिका-नायिका आभार व्यक्त करती थीं। लक्स विज्ञापन वाले हेमामालिनी और माधुरी दीक्षित तक के चित्र जेहन में अब भी हैं। हां, तब लक्स टॉयलेट साबुन होता था, यानि कपड़ा धोने से अलग, नहाने का साबुन। अब तो टॉयलेट ‘छिः छिः‘ हो गया है। 

बहरहाल, ‘आदमी वो है, जो मुसीबत से परेशां न हो‘, ‘चांद-सूरज को भी लग जाता है इक बार ग्रहण‘ और ‘ये है दुनिया, यहां दिन ढलता है शाम आती है, सुबह हर रोज नया नया ले के पयाम आती है‘ जैसी पंक्ति वाला, 1950 की सोहराब मोदी की फिल्म ‘शीश महल‘ में पुष्पा हंस का गाया गीत यू-टयूब पर जा कर सुन सकते हैं।