Thursday, May 21, 2026

जन-नागर गीता

हरिवंशराय बच्चन की ‘भगवद्गीता‘, काव्यमय भावानुवाद मूल संस्कृत श्लोकों सहित, के 2013 संस्करण में उल्लेख है कि इस पुस्तक का पहला संस्करण ‘नागर गीता‘ नाम से 1966 में प्रकाशित हुआ था। इसके भी पहले 1958 में ‘जन गीता‘ प्रकाशित हुई थी। अप्रैल 1966 में ‘सम्बोधन‘ शीर्षक, भूमिका इस 2013 संस्करण में भी है, जिसमें बच्चन ने लिखा है कि इसे देखकर उनके एक अन्य अनुवाद ‘जन गीता‘ की याद आना स्वाभाविक है। वह अवधी में था, यह खड़ी बाली में है। ‘जन गीता‘ में वे अपने को ‘प्रतिध्वनिकार‘ और यहां ‘नागर गीता‘ में ‘रूपांतरकार‘ कहते हैं। उसके आमुख को ‘मंगलाचरण‘ कहा था, इसे ‘सम्बोधन‘। इस सम्बोधन का यह अंश उल्लेखनीय है- ‘मुझ साधारण का ‘स्व‘ ऐसा नहीं हो सकता कि किसी भी ‘पर‘ से मेल न खाए। फिर भी आपके स्वागत, उपेक्षा दोनों के लिए ये तैयार है; यानी, दोनों के प्रति उदासीन।‘ इससे लगता है कि कृतिकार गीतामय है, उसने कर्म किया है, कर्मफल के प्रति तटस्थ-अनासक्त है, निरपेक्ष है।

जन गीता के ‘मंगलाचरण‘ पर नई दिल्ली, 12-5-58 दर्शित है। यह मंगलाचरण, काष्ठमौनी स्वामीजी महाराज के प्रति विनय भी है। पुस्तक में बताया गया है कि ‘जन गीता का सर्वप्रथम सस्वर संपूर्ण पाठ श्री स्वामी जी महाराज के समक्ष अठारह मई उन्नीस सौ अट्ठावन को किया गया।‘ अन्यत्र जानकारी मिलती है कि काष्ठमौनी स्वामीजी महाराज, राधा बाबा - चक्रधर मिश्र (1913-1992) हैं, स्वाधीनता संग्राम में जेल भी गए। 1936 में संन्यास ले लिया और 1956 की शरद पूर्णिमा पर काष्ठमौन व्रत लिया।

यहां गीता के अपनी पसंद के कुछ श्लोक चुने गए हैं। अपनी पसंद के साथ इस बात का भी ध्यान रखा गया है कि आमतौर पर लोगों की जुबान पर आने वाले पद शामिल हों। आरंभ में अध्याय/श्लोक संख्या, मूल संस्कृत श्लोक, बच्चन जी की उक्त कृतियों में किया गया खड़ी बोली अनुवाद और फिर अवधी अनुवाद है- 

1/1 - धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः। मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय।।
# संजय से धृतराष्ट्र ने कहा, धर्मक्षेत्र में, कुरुक्षेत्र में, समरेच्छा से हुए इकट्ठे, मेरे और पांडुपुत्रों ने जो कुछ किया, बताओ, संजय। 
# धर्मखेत, कुरुखेत, कहावा, जहँ कौरव-पांडव-दलु आवा; काह करहिं तहँ दोउ समुदाई? संजय, मोहिं कहहु समुझाई।

1/47 - एवमुक्त्वार्जुनः संख्ये रथोपस्थ उपाविशत्। विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः।
# ऐसा कहकर, धनुष-बाण तज, रण-स्यंदन के पृष्ठ भाग में शोक-विकल अर्जुन जा बैठे।
# अरजुन कहि अस कृष्न सन, सोक-बिकल, धुनि माथ, सर-धनु तजि, रथ-पृष्ठ महुँ बैठेउ, कुरु-कुल-नाथ।

2/22-23 - वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि। तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही।। नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः। न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः।। 
# जीर्ण वसन तज कर जैसे नए वस्त्र धारण करता है, जीर्ण देह तज कर वैसे ही देही नव तन धारण करता। शस्त्र नहीं छेदन कर सकते इस देही का, पावक इसको जला न सकता, पानी इसको भिगा न सकता, मारुत इसको सुखा न सकता।
# नर, परिहरि जिमि जून पट, पहिरहिं नव परिधान, जीव धरइ तिमि नवल तन, त्यागि सरीर पुरान। जीव न पावक जारि सक, भेइ सकइ नहिं नीर, सोखि न सकइ समीर तेहि, छेदि सकइ नहिं तीर।

2/47 - कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।।
# कर्मों पर अधिकार तुझे है, कभी न फल पर; तू न कर्मफल अनुरागी बन, और न कर्मों से विरक्त हो।
# करमहि पर बस तोर बसाऊ, फल पर तोहि अधिकार न काऊ; छोरु कर्म-फल-मोह, सुकर्मा, छोरु न कर्म, न छोरु स्वधर्मा।

4/7-8 - यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।। परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे।।
# भारत, जब-जब ग्लानि धर्म की औ‘ अधर्म का अभ्युत्थान हुआ करता है, कगार तब-तब मैं अपने को सृजता। साधुजनों के परित्राण के औ‘ असाधुओं के विनाश के और धर्म संस्थापन के हित युग-युग, भारत, मैं अवतार लिया करता हूँ।
# जब जब धर्म रसातल जाई, रहइ अधर्म धरा पर छाई, तब-तब, मोर नियम, कपिकेतू, देह धरउँ जग मंगल हेतू। करउँ कुकर्मिन्ह कर संघारा, करउँ सुकर्मिन्ह कर उद्धारा; नीति मोरि जुग जुग चलि आई, थापउँ धर्म, अधर्म हटाई।

9/22 - अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते। तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्।
# जो अनन्य-मन हो मेरा चिन्तन करते, मुझको भजते हैं, नित्ययुक्त उन भक्तजनों का योगक्षेम वहन करता मैं 
# जे अनन्य मन सुमिरहिं मोहीं, जे मोहि सन छन दूरि न होहीं, जे नित निज चित मोसन बाँधे, तिल्हकर जोग-छेम मम काँधे।

10/35 - बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम्। मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः।।
# बृहत्साम सामों में, गायत्री छन्दों में, मार्गशीर्ष मासों में, ऋतुओं में वसन्त मैं।। 
# बृहत्साम मोहि, मंत्रन्ह माहीं, गायत्री मोहि, छंदन्ह माहीं। माघ समुझु मोहि मासन्ह माझा; समुझु रितुन्ह महुँ मोहि रितुराजा;

15/1 - ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्यं प्राहुरव्ययम्। छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्।। 
# कहा कृष्ण ने, ‘ऊर्ध्व मूल औ‘ अधः डाल का जो अव्यय अश्वत्थ, वेद के पत्तों वाला, कहा गया है, जो उसको जानता वही वेदों का ज्ञाता। 
# अच्छय बिरिछ जाइ एक भाषा, जो उर्ध्वग-जरि, निम्नग-साखा; जामहुँ बेद लगहिं जिमि पाता; जो जानइ तेहि, सो बड़ ग्याता।

18/66 - सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।
# सब धर्मों का परित्याग कर, मेरी एक शरण में आ तू, शोक न कर, मैं तुझे, परंतप, सब पापों से मुक्त करूँगा।
# कुंति-सुवन सब धर्म बिहाई, गहु मम एक सरन, सिरु नाई; मैं तोहि, सब अघ-ओघ नसाई, देहउ मुकुति परम सुखदाई।

18/78 - यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः। तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्भुवा नीतिर्मतिर्मम।।
# जहाँ कृष्ण योगेश्वर, पार्थ धनुर्धर, नरवर, वहाँ विजय है, श्री, विभूति है, अडिग नीति है, मेरा मत है। 
# जहँ कृष्न जोगेस्वर, जहाँ धनु साजि अरजुन राजहीं, तहँ रहइ श्री, बैभव, बिजय, ध्रुव नीति, मम संमति सही।

गीता-भाव के लिए उक्त दोनों के अतिरिक्त,
गीता-पठन में अद्वैत आश्रम वाली ‘सरल गीता‘,
स्वामी अपूर्वानन्द की रामकृष्ण मठ वाली और
गीता प्रेस वाला संक्षिप्त संस्करण,
के साथ शुरूआत आसान होता है।

टीप-
‘जन गीता‘ की प्रति हमारे स्कूल के पुस्तकालय से मिली। पुस्तक के साथ सहेजे कार्ड में दर्ज है कि 1963 से 1968 के बीच इस पुस्तक को कक्षा 7 से कक्षा 11 तक के 12 विद्यार्थियों ने जारी कराया था।

Wednesday, May 13, 2026

गुरुदेव काश्यप

छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता पर ‘छत्तीसगढ़‘ सांध्य दैनिक के सुनील कुमार से मुलाकात में बातें निकलीं तृप्ति सोनी की किताब ‘छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता, चार पीढ़ियों की स्याही की विरासत‘ की और पहुंची, गुरुदेव काश्यप तक। मैं उनसे और उनके पत्रकार-संपादक होने से परिचित रहा हूं, मगर उनकी कविताई से बहुत कम। सुनील कुमार जी ने उनकी किताब ‘धूप का एक दिन‘ (1972) पढ़ने को दे दी। यह जानकारी न होने से अपनी चिढ़ का बदला खुद से लेने के लिए आते ही काम में लगा, पूरे संग्रह की वर्ड फाइल तैयार कर ली और ललित कुमार के ‘कविता कोश‘ में भेज दिया। 

गुरुदेव काश्यप जी के साथ रायगढ़ के उन दिनों से ले कर अब तक को याद करता रहा जब सर्व माननीय किशोरी मोहन त्रिपाठी, बारेन दा, अनुपम दासगुुप्ता, प्रभात त्रिपाठी, देवेंद्र प्रताप सिंह, हरिहर सिंह, अतुल श्रीवास्तव, हरकिशोर दास, रवि मिश्रा, विनोद पांडेय, रमेश शर्मा, स्वराज करुण, शिव राजपूत, राजू और हेमचंद्र पांडेय, बिहारीलाल साहू, डॉ. बल्देव, बसंत राघव, अशोक अग्रवाल, अनिल रतेरिया, प्रमोद ब्रह्मभट्ट, गोपाल पटेल, राकेश शर्मा, अजय अटापट्टू, चंडीप्रसाद गुप्ता, अंबिका वर्मा, राजेश डेनियल, अबरार हुसैन ..., बहरहाल वापस गुरुदेव काश्यप की कविता। उनकी कविताएं पढ़ते हुए तात्कालिक पाठकीय प्रतिक्रिया बनी- 

वे रविशंकर विश्वविद्यालय के मानवशास्त्र के संभवतः पहले बैच के विद्यार्थी थे छुईखदान वाले राघवेंद्र त्रिपाठी, सरोज बाजपेयी भी संभवतः इसी बैच में थे। उन्होंने भाषा की भी पढ़ाई की। यायावरी- गुरुदेव काश्यप की कविताओं में झलकती है मगर उनके संग्रह ‘धूप का एक दिन‘ की लगभग सारा लेखन अखबार-समाचार के बीच पनपी रचना की तरह है, जिसमें शहर का माहौल-पर्यावरण, देश की दशा और संविधान तथा वैश्विक परिस्थितियां, अमरीका हावी है। देखा जा सकता है कि समाचार-सूचना के संवेदनशील प्रस्तोता को उस माध्यम की सीमा बेचैन करती है, तथ्यों के साथ विचार और भावनाओं के बिंब-प्रतिबिंब के लिए वहां जगह नहीं होती, वह समाचार-गद्य में लिखी जा चुकी होती है लेकिन ऐसे शुष्क, असम्बद्ध-से घटना और परिस्थिति के समाचारों के पीछे मानवीय रिश्ता तो महसूस होता ही है। इसलिए ऐसे गद्य-अभिलेखन समाचारों के अंदर सहज कविता प्रवाहित होती रहती है, संवेदनशील मन उसे महसूस करता सुन लेता है और भाषा-कलम पर अधिकार हो तो अभिव्यक्त कर पाता है, ऐसी ही है इस पुस्तक की कविताएं, जिसकी पहली कविता का शीर्षक है ‘भूमिका: हम ऋग्वेदपदी‘, जिससे समझा जा सकता है कि यह कवि समष्टि से एकाकार हो कर रचना कर रहा है। उनकी कुछ कविताएं- 


भूमिका: हम ऋग्वेदपदी 

आहुति दो पितरों, देवताओं को। 
हे पवित्राप्रद अग्नियो, 
स्तवन करो 

हम ऋग्वेदपदी सौ हेमन्तों को लांघते 
बांहों में समेट आत्मजों को 
ऋषि-आयु भोगेंगे। 

वरणीय पृथिवी का आलिंगन करें 
स्वागत करें 
अंतरिक्ष से उभरते सूर्य का 
यह सोमधारी 
प्रजाओं के लिये 
अमृत किरणें उछालता आया है। 

आयुष्मान् बंधु, 
दाब दो किसी पत्थर के नीचे 
अपनी अकारथ मृत्यु को 

धूप का एक दिन 

धूप है-सीपी है 
सूरज एक मोती है 
कानों के रिंग में बड़ा भला लगता है 
(क्या करें, कीमती है) 

धूप है-लहरें हैं 
दिन एक समुन्दर है 
नारियल की छांव में 
नाव बने लेटे हैं 
(पाल है, मछलियां हैं, लंगर है) 

धूप है-चुम्बन है 
फेनदार किरने हैं 
लथपथ हैं ओंठ 
पैर डगमग हैं 
(शाम के कंधे हैं, शिथिल-शिथिल झरने हैं) 

सुबह की बौछार 

सुबह-सुबह 
मुक्तक-सा बरस गया पानी। 

भीग गए अधजागे फूल-पत्र 
भीग गए छत-छज्जे, गलियारे 
बिजली की कुमकुम, 
तांबे के तार, नरम अंधियारे 

पुल की वह रेलिंग भी भीग गई 
भीग गई नहर, मुरम भीग गई 
खिड़की का कासनी परदा कुछ सिमट गया 
सन्नाटा चौक के पास कहीं ठिठक गया। 

सुगबुग दरवाजे की 
कड़ी-कड़ी जगती है 
टिक कर दीवारों से 
धूप खड़ी होती है 
धुले-धुले गागर में 
सूर्य समा जाता है 
ईंधन के बोझ लिए 
दिवस चला आता है 

रात का अनबोला आंगन में सोया है 
पास का गजरा भी दबे-दबे रोया है 
दुखा गया जी को यह ऐसा अभिमानी है 
सुबह-सुबह मुक्तक-सा बरसा जो पानी है। 

दिन 

नंगे पांव फुटपाथ पर दौड़ता 
मूंगफली के छिलके बटोरता 
आहिस्ता कुछ सोच कर 
पार्क के चकेदार दरवाजे पर झूलता 
म्यूजियम की मुंडेर से झाँकता 
सिनेमा घर के सामने 
कागज के रंगीन टुकड़े बटोरता 
कभी किसी रंगीन बोर्ड को खुरचता 
फव्वारे पर 
पानी के छींटे बिखेरता 

दोपहर- 
किसी बबूल की टहनी से 
धूप की उलझी हुई पतंग को निकालता 
फेरी वालों के पीछे भागता 
रेल की पाँतों को पार करता 
नदी की रेत को रौंदता 
किसी हरवाहे की पगड़ी उछालता 
कभी दो बूढ़े बैलों को पुचकारता 

शाम- 
किसी खोमचे के नजदीक 
उदास मुंह लिये 
खाली जेबें टटोलता 
सूरज डूबे 
इसी गली की मोड़ पर 
हर रोज घेर कर 
मुझे आखरी सलाम करता 

बस यूं ही हाथ पीछे बाँधे 
अकेले किसी कोने में 
दुबक कर बैठ जाता 
उदास मन, खिन्न: 
सोचता हूं- 
किस विधवा का बेटा है 
आवारा-आवारा सा 
नाबालिग दिन। 

शाम 

जी चाहता है- 
बादलों की ऐंठी हुई पगड़ी में 
सूरज का एक दूध-मोंगरा 
खोंप दूं। 

धरती के भरे-भरे गालों से 
छाछ सी धूप छितर जाती है 
घूंघट में छांव नई ब्याही-सी 
आंगन के बाहर जो 
नजर नहीं आती है। 

पिंजड़े में सुग्गे सी 
शाम फुदक जाती है 
नई-नई बछिया सी 
हवा बिदक जाती है। 

रात की मचिया पर 
चांद बैठ जाता है 
बूंद-बूंद अमरस-सी 
चांदनी टपक गई 
कांस की कटोरी-सा 
पोखर भर जाता है 
भरे-भरे महुए से 
तारे टपका किए 
पगडंडी बैठी है 
खाली डलिया लिए। 

पुस्तक के फ्लैप पर परिचय, जो संभवतः स्वयं उन्होंने लिखा है, इस प्रकार है- 

जीवन को प्रथम तिथि पंक्ति, रायगढ़ दिनांक 15 अगस्त 1935। एक निम्न मध्यमवर्गीय संयुक्त परिवार के सारे अभिशापों को वर्षों तक झेलने की विवशता। वह त्रासदायी परिवेश जो शैशव में हो रीढ़ की हड्डियों को प्रौढ़ बना जाता है। शिक्षा- एम. ए., मानव शास्त्र और भाषा विज्ञान में डिप्लोमा। व्यवसाय- पत्रकारिता। विगत 20 वर्षों में अनेक क्षेत्रीय पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन एव सम्पादन। पिछले कुछ वर्षों में दैनिक ‘महाकोशल‘ रायपुर के संपादक। अभिरुचि क्रमांक 1- यायावरीः डोनापाल से डीफू तक। ‘भटक चुके आगे और भटकेगे।‘ क्र. 2- असफल प्रकाशनों के लिए सफल योजनायें तैयार कर उन्हें क्षेत्रीय प्रतिभाओं के बीच खपाना। सन 1958 से 1966 के बीच अनेक पुस्तकों का प्रकाशन, संपादन। सहयोगी काव्य संग्रह नये स्वर-3, छत्तीसगढ़ का प्रथम कहानी संग्रह, ‘मीठे कनेर का दरख्त‘, काव्य संग्रह ‘नैवेद्य‘, ब्लादीमीर नाबोकोव के चर्चित उपन्यास ‘लोलिता‘ का अनुवाद और हिन्दी मे वियतनाम संबंधी प्रथम काव्य संग्रह ‘आहत सूर्य देश में‘। उपलब्धि- मित्रों का स्नेह, नवागतुकों की श्रद्धा और यह अटूट विश्वास कि समूचे भविष्य पर अधिकार हमारा है। मध्यप्रदेश में नई कविता का सूत्रपात करने वाले प्रथम सहयोगी काव्य संकलन नये स्वर-1 (1956) के सहयोगी कवि। प्रचार प्रसार के मंच पर उपस्थित होने से सदैव भयभीत। 22 वर्षों के रचना-काल में अंततः यह प्रथम व्यक्तिगत काव्य संग्रह ‘धूप का एक दिन‘। आगामी अभिशप्त उत्कल।

Wednesday, May 6, 2026

हमारा छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद कक्षा 3 से कक्षा 8 तक के ‘सहायक वाचन‘ के लिए 'हमारा छत्तीसगढ़' पुस्तके तैयार कराई गई थीं। इन पुस्तकों में पाठ-विषय का चयन-निर्धारण स्तरीय था किंतु इन पुस्तकों के प्रकाशन होने पर तथ्यों और प्रस्तुति संबंधी विभिन्न आपत्तियां और विवाद उभरने लगे। इस पर शासन के स्कूल शिक्षा विभाग अंतर्गत तत्कालीन प्रभारी अधिकारी श्री सुनील कुजूर, आइएएस द्वारा बैठक आहूत हुई। सामान्यतः ऐसी बैठकों में चर्चा आई-गई हो जाती है, यह ध्यान रखते हुए समिति के सदस्य के रूप में डॉ. लक्ष्मी शंकर निगम और राहुल कुमार सिंह द्वारा संयुक्त रूप से लिखित प्रतिवेदन सहित विभिन्न बिंदुओं पर चर्चा-टिप्पणी की गई थी। उन पुस्तकों और बैठक का परिणाम क्या हुआ, अवगत नहीं कराया गया, न ही उसका कोई परिणाम जानने को मिला। अब उन पुस्तकों की भी जानकारी नहीं मिलती, किंतु यह एक सार्थक प्रयास था, इस दृष्टि से हमारा उक्त प्रतिवेदन यहां प्रस्तुत है-

हमारा छत्तीसगढ़ 
प्रतिवेदन - एल.एस. निगम एवं राहुल कुमार सिंह 

संबंधित पाठ- 
कक्षा-3         1, 3 एवं 7 
कक्षा-4         1, 3 एवं 7 
कक्षा-5         1, 2 एवं 3 
कक्षा-6         1, 3, 8 एवं (10) 
कक्षा-7         1 एवं 8 
कक्षा-8         1, 11 एवं 15 

सामान्य अभ्युक्ति- 
1. ‘हमारा छत्तीसगढ़’ पुस्तकमाला की सामान्य अवधारणा, विषय-वस्तु और सामग्री-चयन, सामान्यतः प्रशंसनीय और स्वागतेय है। 
2. प्राथमिक और पूर्व-माध्यमिक कक्षाओं के पाठ्यक्रम में बच्चों की पीठ पर बढ़ते बस्ते के बोझ की चिन्ता सदैव की जाती है। इस दृष्टि से अत्यावश्यक माने जाने वाले क्षेत्रों के लिए पृथक-पृथक पाठ्य-पुस्तकों के बजाय नियमित पाठ्यक्रम के ‘भाषा’, ‘सामाजिक अध्ययन’ और ‘विज्ञान’ विषयों के साथ क्रमशः सहायक-वाचन (आंचलिक विशिष्टता और गौरव), पर्यावरण तथा सूचना-प्रौद्योगिकी के पाठ जोड़ा जाना उपयुक्त होगा। इससे बस्ते के बोझ के साथ-साथ अभिभावकों पर पड़ने वाला आर्थिक बोझ भी कम होगा। 
3. पाठ तैयार करने में यह ध्यान रखना अत्यावश्यक है कि पाठ्य-सामग्री का गहन और सूक्ष्म निरीक्षण, विषय-विशेषज्ञों, भाषा-विशेषज्ञों तथा बाल-शिक्षा मनोविज्ञानियों द्वारा किया जाए। 
4. हमारा छत्तीसगढ़ पुस्तकमाला के अधिकतर पाठों के लेखक और सम्पादक डा. श्याम सुंदर त्रिपाठी यदि एक ही व्यक्ति हैं, तो यह स्थिति उचित नहीं है, क्योंकि इससे पाठों में आवश्यक संशोधन प्रभावित होने की संभावना बनी रहती है। 
5. पाठ को ‘किरण’ कहने पर पुनर्विचार किया जा सकता है। 

कक्षा और पाठवार टिप्पणी/संशोधन सुझाव 
कक्षा-3 पाठ 1, 3 एवं 7 
पृष्ठ-2 नक्शे में सभी जिले दर्शित हैं, अतः प्रमुख शब्द अनावश्यक है। 
पृष्ठ-4 प्राचीनता के क्रम में ‘है’ के स्थान पर ‘माना जाता है’, उपयुक्त होगा। 
पृष्ठ-10 ‘देवलदेव’ के स्थान पर ‘भांडदेवल’ होना चाहिए। 
पृष्ठ-11 ‘शिवरीनारायण’ के बाद जांजगीर-चांपा जिले के चन्द्रपुर की चन्द्रहासिनी देवी का तत्पश्चात्, रायगढ़ जिले का उल्लेख, उचित होगा। 
पृष्ठ-12 कविता की पंक्तियों का पुनः मिलान उचित होगा। 
पृष्ठ-33 दूरी, वृक्षों के नाम, पुनः मिलान करना उचित होगा। सतयुग के साथ शायद शब्द का प्रयोग उपयुक्त नहीं है। 
पृष्ठ-34 ‘पागल जैसे हो गए’ को अन्य प्रकार से लिखा जाना उचित होगा। 
पृष्ठ-37 वाद्यों के नामों को पुनः जांच लेना आवश्यक है। 

कक्षा-4 पाठ 1, 3 व 7 
पृष्ठ-1 ‘कौशल’ और ‘विनताश्व’ शब्दों की वर्तनी जांचना आवश्यक है। 
पृष्ठ-2 ‘दहेज में उत्तर कौशल’ वाक्य की जांच आवश्यक है। ‘वाल्मिकी’ और ‘राम’ के साथ ‘श्री’ आवश्यक नहीं है। ‘वृह्दबल’ की वर्तनी जांचना आवश्यक है। ‘बुन्देलखण्ड के शहडोल’ के औचित्य पर विचार करना उचित होगा। 
पृष्ठ-3 ‘कान्तर’ के स्थान पर ‘कान्तार’ होना चाहिए और विदर्भ के साथ बरार का उल्लेख भी उचित होगा। पैरा 2 व 3 का पुनर्लेखन उपयुक्त होगा, जिसमें विद्वानों के मतभेद के बजाय अधिकतर मान्य तथ्य उल्लिखित होे। 
पृष्ठ-4/5 गढ़ स्थान नामों को पुनः जांचना आवश्यक है। 
पृष्ठ-6 गढ़ों का प्रशासनिक केन्द्र होना और भौतिक स्वरूप वाले गढ़ का अन्तर स्पष्ट करना चाहिए। ‘राष्ट्रगीत’ और ‘राष्ट्रगान’ 
पृष्ठ-14 कोशला ग्राम का उल्लेख भ्रामक है। ‘श्री’ अनावश्यक है। ‘रानकावति’ वर्तनी की जांच आवश्यक है। पृष्ठ-17 राजिम तेलिन, जगतपाल, भगवान विष्णु, चौदहवीं शताब्दी- इन उल्लेखों में तथ्य और मान्यता का घालमेल है। ‘बड़े मंदिर’ शब्द उपयुक्त नहीं है। 
पृष्ठ-18 ‘स्कन्ध’ के स्थान पर ‘स्कन्द’ शब्द होना चाहिए। 
पृष्ठ-19 ‘धौम्य’ की वर्तनी जांचनी है। ‘ऋषियों के आश्रम आज भी’ उपयुक्त नहीं है। मन्दिरों की संख्या ‘बाइस’ की जांच आवश्यक है। 
पृष्ठ-37 ‘मन्दाकिनी’ नाम के समीकरण की जांच आवश्यक है। 
पृष्ठ-39 श्लोक का पुनः मिलान उचित होगा। ‘थुआमाल’ की वर्तनी की जांच आवश्यक है। ‘मील’, ‘किमी’ के बजाय ‘किलोमीटर’ लिखना व माप का उल्लेख उपयुक्त होगा। ‘चन्द्रमा की आकृति’ अथवा ‘अर्द्धचन्द्राकार’ जांच आवश्यक है। 
पृष्ठ-40 ‘कालीदास’ अथवा ‘कालिदास’ वर्तनी के साथ संदर्भ की जांच आवश्यक है। ‘रावा घाट’ वर्तनी/उच्चारण की जांच आवश्यक है। 
पृष्ठ-41 ‘मैय्या’ के बजाय ‘मैया’ होना चाहिए। ‘पुस्तक माला के भाग एक’ उल्लेख उचित नहीं है। 
पृष्ठ-42 जगदलपुर के दंतेश्वरी मंदिर का दन्तेवाड़ा से अलग होना, स्पष्ट करना चाहिए। ‘नारायण पाल’ और ‘नाग कालीन’ मिलाकर लिखना उपयुक्त होगा। 

कक्षा-5 पाठ 1, 2 व 3 
पृष्ठ-1 ‘छत्तीसगढ़ की काशी’ रतनपुर के लिए पूर्व प्रचलित है। 
पृष्ठ-5 ‘सूर्य वर्मा’ के बजाय ‘सूर्यवर्मा’ उचित होगा। ‘स्वास्तिक’ के बजाय ‘स्वस्तिक’ होना चाहिए, जो बौद्ध विहार है। अन्य बौद्ध विहार का नाम आनन्दप्रभ कुटी विहार है। 
पृष्ठ-6 ‘महात्मा बुद्ध के प्रिय शिष्य’ उल्लेख उचित नहीं है। ‘आनन्द प्रभु’ की वर्तनी उपरोक्तानुसार होगी। 
पृष्ठ-8 पाठ ‘कथा श्रृंगी ऋषि की’ के औचित्य पर पुनर्विचार आवश्यक है। 
पृष्ठ-15 ‘मध्यप्रदेश’ के स्थान पर ‘मध्यप्रान्त’ होना चाहिए। ‘चौहान वंशीय’ के स्थान पर ‘चौहानवंशी’ होना चाहिए। पृष्ठ-17 ‘हजारी बाग’ के स्थान पर ‘हजारीबाग’ होना चाहिए। 

कक्षा-6 पाठ 1, 3, 8 व (10), 
कक्षा-7 पाठ 1, व 8, 
कक्षा-8 पाठ 1, 11, व 15 
पर चर्चा के दौरान प्रतिवेदकों द्वारा टिप्पणियां की गईं।