Saturday, January 29, 2022

देवरानी जेठानी मंदिर, ताला

पुरातात्विक स्थल ताला पर मुख्यतः 1986 से 1988 तक विभिन्न पुरातात्विक कार्य राज्य शासन के बिलासपुर कार्यालय के माध्यम से श्री जी.एल. रायकवार के उत्तरदायित्व पर कराए गए, इस पूरे दौर में मेरी सहभागिता रही। ताला के विभिन्न पक्षों पर लिखने के अवसर बने, इस क्रम में मेरे द्वारा तैयार किया गया एक संक्षिप्त नोट तथा उसके पश्चात वार्ता के लिए आलेख- 

देवरानी-जेठानी मंदिर, ताला (ग्राम अमेरीकांपा) बिलासपुर से लगभग 30 किलोमीटर दूर, बिलासपुर-रायपुर मार्ग बायें व्यपवर्तन पर तथा पुनः दगोरी मार्ग पर दायें व्यपवर्तन पर मनियारी नदी के बायें तट पर स्थित छठी सदी ईस्वी के दो भग्न शिव मंदिर है। निकट ही मनियारी-शिवनाथ संगम है, जबकि मंदिर के सन्निकट एक बरसाती नाला बसंती, मनियारी में मिलता है । 

इन मंदिरों के प्रथम उल्लेख की जानकारी आर्क्यालाजिक सर्वे ऑफ इंडिया रिपोर्ट, खंड- 7 पेज- 168 पर सन 1873-74 में डिप्टी कमिश्नर, रायपुर मि. फिशर के हवाले से जे.डी. बेग्लर ने किया। छठे दशक में अंचल के प्रसिद्ध पुरातत्वविद पं. लोचन प्रसाद पाण्डेय ने इन्हें देखकर, अपने व्यक्तिगत नोट्स में दर्ज किया। सातवें दशक में डा. विष्णु सिंह ठाकुर ने इन्हें देखकर मंदिरों की जानकारी सार्वजनिक कर, चर्चा में लाया । मल्हार उत्खनन (1974-78) के दौरान प्रो. के.डी. बाजपेयी तथा श्री एस.के. पांडे ने भी इनका अवलोकन किया। 

नवें दशक में (दिनांक 9.3.84) यह राज्य संरक्षित स्मारक घोषित किया गया, इसी बीच एक विदेशी शोध छात्र डोनाल्ड स्टेडनर ने आर्काइव्स आफ एशियन आर्ट में 1980 में छायाचित्र व रेखाचित्र सहित इसे प्रकाशित कराया। नवें दशक के आरंभ में राज्य शासन के कार्य आरंभ किया और 1985-86 से व्यवस्थित मलबा सफाई, अनुरक्षण, रसायनिकरण आदि कार्य हुए। वर्ष 87-88 में तत्कालीन संस्कृति सचिव के विशेष आग्रह पर श्री के.के. चक्रवर्ती की देखरेख में विभागीय कार्य हुए। नवें दशक में अत्यंत महत्वपूर्ण प्रकाशन श्री कृष्णदेव लिखित अध्याय, इनसाक्लोपीडिया आफ इण्डियन टेेम्पल आर्कटेक्चर का अमेरिकन इन्स्टीट्यूट आफ इंडियन स्टडीज द्वारा हुआ। 

स्थापत्य की दृष्टि से जेठानी मंदिर दक्षिणाभिमुख तथा पूर्व व पश्चिम से पार्श्व प्रवेश के लिए सोपान व्यवस्था वाला, विशिष्ट भू-योजना का मंदिर है, जिसमें शास्त्रीय योजना के विकास के स्थान पर शिलोत्खात वास्तु योजना की झलक है। देवरानी मंदिर गर्भगृह, अन्तराल व मुखमंडप वाला पूर्वाभिमुख मंदिर है, जिसका प्रवेश द्वार संरक्षण की अपेक्षाकृत अच्छी दशा में तथा अत्यंत आकर्षक है। कला के आधार पर मंदिरों को परवर्ती गुप्तकालीन माना गया है, किन्तु प्रतिमाशास्त्र व अलंकरण की दृष्टि से शास्त्रीय प्रतिमानों के साथ मौलिक प्रयोग भी परिलक्षित होता है। 

देवरानी मंदिर के परिसर से प्राप्त ‘रूद्र शिव’ की लगभग आठ फुट ऊंची और छह टन भारी प्रतिमा, भारतीय कला में अब तक प्राप्त उदाहरणों में विशिष्टतम है। प्रतिमा के पूरे शरीर तथा घुटनों, जंघाओं, उदर व वक्ष पर मानव मुख है तथा मुख व शरीर के अंगों को मोर, गोधा, मत्स्य, कर्क, कच्छप से समाकृत किया गया है। इसी प्रकार देवरानी द्वार शाखा पार्श्व पर कीर्ति मुखों में पत्र-पुष्पीय अभिकल्प का संयोजन है। 

स्थल से 12-13 सदी ई. के कलचुरी शासकों रत्नदेव व प्रतापमल्ल के ताम्र्र सिक्के तथा शरभुरीय प्रसन्नमात्र का छठी सदी ई. का रजत सिक्का प्राप्त हुआ है, जो सुुनिश्चित तौर पर ज्ञात प्रसन्नमात्र का एक रजत सिक्का है। 

इसी क्रम में ‘इतिहास के झरोखे से‘ शीर्षक वार्ता के लिए सन 1991 में तैयार यह आलेख- 

दक्षिण कोसल, ईसा की छठी सदी का आरंभ। शिवनाथ की सहायक नदी मनियारी के बायें तट पर विशाल अनुष्ठान जैसा दृश्य। हजारों कामगर हाथ व्यस्त थे। गुप्त वंश का स्वर्णकाल देखकर, स्थानीय शरभपुरीय राजवंश ने यह स्थान चुना था दो मंदिरों के निर्माण के लिए। वैष्णव धर्मावलम्बी राजवंश की यह शैव स्थापत्य, संरचना, इतिहास में उनकी धार्मिक सहिष्णुता और कलाप्रियता का प्रमाण साबित होने वाली थी। स्थल को मानो चिन्हांकित करने के लिए बसंती नाला और थोड़ी दूर पर ही मनियारी और शिवनाथ नदी का पवित्र संगम स्थल। नदी तट पर स्तरित चट्टानों का विपुल भंडार सहज उपलब्ध था। मंदिर निर्माण के लिए इससे उपयुक्त स्थान और क्या हो सकता था। इतिहास के पिछले पन्नों पर इसी भू-भाग में पाषाणयुगीन मानव की उपस्थिति भी दर्ज है, जिसके प्रमाण स्वरूप लघु पाषाण उपकरण ही अब मिलते हैं। 

बिलासपुर जिला मुख्यालय से 30 किलोमीटर दूर यह स्थल अब ‘ताला’ नाम से जाना जाता है, जो वस्तुतः ग्राम अमेरीकांपा का वीरान हिस्सा है, यहीं दो प्राचीन मंदिर भग्नप्राय स्थिति में, महत्ता के चिन्ह संजोये, विद्यमान हैं, जो स्थानीय लोगों में ‘देवरानी-जेठानी’ कहे जाते हैं। इन मंदिरों ने उपेक्षा का लम्बा दौर गुजारा है। शताधिक वर्षों में इक्का-दुक्का पुरातात्विक ही, इसकी खोज खबर लेने पहुंच सके थे। 

1873-74 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पहले महानिदेशक, सर अलेक्जेंडर कनिंघम के सहयोगी जे.डी. बेग्लर इस क्षेत्र में सर्वेक्षण के लिए आए। उन्हें रायपुर के तत्कालीन असिस्टेन्ट कमिश्नर मि. फिशर द्वारा इस स्थल की सूचना मिली। बेग्लर ने स्वयं इन मंदिरों को नहीं देखा, लेकिन भविष्य के लिए, रायपुर-बिलासपुर मार्ग के पुरातात्विक स्थलों में, ‘जेठानी-देवरानी’ मंदिर, नामोल्लेख मात्र प्रकाशित किया। वर्षों बीत गए। इन मंदिरों की खबर किसी ने नहीं ली। 

तकरीबन सौ साल बीतने को थे। शायद इन मंदिरों का आकर्षण प्रबल हुआ। सातवें दशक में दुर्गा महाविद्यालय, रायपुर के डॉ. विष्णु सिंह ठाकुर, अनुमान करते सरगांव से पैदल, अकेले, मनियारी के किनारे-किनारे बढ़ चले। रास्ते में उन्हें टीले और पुराने मिट्टी के खिलौने, पात्र खंड, मनके मिले। कदम तेजी से उठने लगे और वे मंजिल पर पहुंच ही गए। अजीब रोमांच था, स्तंभित रह गए डॉ ठाकुर, उन्हीं के शब्दों में -‘मैं गुप्तों के समकालिक स्मारकों की कला प्रत्यक्ष कर रहा था।’ वे पूरा दिन स्थल पर गुजारकर वापस आये और पुरातत्व में रूचि लेने वालों के लिए एक नयी राह खोज दी। 

आठवें दशक में मध्यप्रदेश शासन तथा एक अमरीकी शोधार्थी ने इस राह का अनुगमन किया और पुरातत्व के क्षेत्र में एक नयी सुगबुगाहट हुई। छत्तीसगढ़ में पहली बार गुप्तकालीन मंदिर अवशेषों की जानकारी उजागर हुई। कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय के छात्र डोनाल्ड, स्टेडनर ने देवरानी मंदिर को अत्यंत विशिष्ट संरचना माना और स्थल के गंभीर अध्ययन का पहला प्रयास किया। स्टेडनर के अध्ययन के आधार पर कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय की ही विदुषी प्रोफेसर जोना जी. विलियम्स ने इसे छत्तीसगढ़ का ऐसा एकमात्र महत्वपूर्ण स्थल माना, जो गुप्तकला के प्रभाव से जीवन्त है। 

इस दौरान राज्य पुरातत्व विभाग द्वारा स्थल संरक्षण आदि प्रक्रिया की पहल हुई। 1985 में पुरातत्व विभाग के तत्कालीन मानसेवी सलाहकार, हार्वर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ प्रमोदचन्द्र स्थल पर आए। उनकी सम्मति थी- ‘अद्भुत छठी सदी की भारतीय कला का चरम उत्कर्ष यहां घटित हुआ।’ ताला का महत्व पहचाना जाने लगा, किन्तु इसके बाद भी यह स्थल पुराविदों की चर्चा तक सीमित रहा। विदेशी शोधार्थी और विशेषज्ञ टिप्पणीकारों का कार्य-विवरण, जनसामान्य की बात तो दूर, क्षेत्रीय पुरातत्व में रूचि रखने वालों को भी सहज उपलब्ध नहीं हुआ, लेकिन राज्य शासन ने स्थल के महत्व के अनुरूप कार्य आरंभ कर दिया और एक-एक परत खुलती गई, एक बेतरतीब टीला खोदकर साफ किया गया और स्पष्ट हुआ जेठानी मंदिर का भव्य और अनूठा अभिकल्प, ढेरों प्रतिमाएं साथ ही सर्वाधिक चर्चा और महत्व की आठ फुट ऊंची, पांच टन से भी अधिक भारी अद्भुत प्रतिमा रूद्र शिव, देवरानी मंदिर के पास से प्राप्त हुई, जिसने पूरी दुनिया के समाचार जगत में स्थान पाया। 

आइये, देखें कि वस्तुतः इस स्थल में ऐसा क्या है, जो दर्शक को स्तब्ध कर देता है और पुरातत्वविदों के लिए भी पहेली है। कथित देवरानी और जेठानी मंदिर वस्तुतः शिवमंदिर है जिनमें, देवरानी अधिक सुरक्षित स्थित में है, लेकिन जेठानी लगभग ध्वस्त होकर टीला बन चुका था। दोनों मंदिरों के बीच सिर्फ 15 मीटर का फासला है। पुरातात्विक अध्ययनों से ये मंदिर, स्थापत्य व कला में छत्तीसगढ़ के एकमात्र और देश के विशिष्टतम गुप्तकालीन कला केन्द्र के रूप में मान्य हुए हैं। 

पुरातत्वीय कार्याें से जेठानी मंदिर का स्वरूप उजागर हुआ, यह मंदिर पश्चिम पार्श्ववर्ती नदी के समानान्तर, विलक्षण रूप से दक्षिणाभिमुख है, इस प्राचीन टीले की सफाई के फलस्वरूप जेठानी मंदिर की अनूठी स्थापत्य-योजना स्पष्ट हुई, पूर्व और पश्चिम से सोपानयुक्त पार्श्व प्रवेश, उत्तरी पृष्ठ में दो विशाल गजाकृतियों का अग्रभाग तथा सुदीर्घ स्तम्भों और प्रतिमाओं के पादपीठ सहित विभिन्न आकार की ईंटें व विशाल पाषाण खंडो से निर्मित संरचना स्पष्ट हुई। महत्वपूर्ण पुरावशेषों में, शरभपुरीय शासक प्रसन्नमात्र का चांदी का सिक्का मिला, कलचुरियों की रत्नपुर शाखा के शासकों रत्नदेव और प्रतापमल्ल के सिक्के भी मिले जो लगभग बारहवीं सदी ई. तक जनजीवन से इस क्षेत्र की संबद्धता प्रमाणित करते हैं। 

मूल मंदिर संरचना के भाग के रूप में अर्द्धनारीश्वर, उमा-महेश, गणेश, कार्तिकेय, नायिका, नागपुरूष आदि विभिन्न प्रतिमाएं एवं स्थापत्य खंड प्राप्त हुए हैं, इन प्रतिमाओं में शास्त्रीय विलक्षणता तो है ही इनका आकार भी उल्लेखनीय है। कुछ प्रतिमाएं तो 3 मीटर से भी अधिक लम्बी हैं। स्थापत्य और मूर्तिकला, तत्कालीन प्रचलित सामान्य प्रतिमानों के अनुरूप नहीं है। इसलिए इनका अध्ययन और शोध अधिक आवश्यक है। इनमें शास्त्रीय निर्देशों के साथ-साथ स्थानीय परम्परा और मौलिक चिन्तन को भी जोड़ने का प्रयास दिखता है। प्रतिमाओं में भव्यता, अलौकिक सौन्दर्य, आकर्षक अलंकरण तका कमनीयाता का संतुलित प्रदर्शन है। दो अन्य पाषाण प्रतिमाएं लघु फलक है, इनमें से एक विष्णु तथा दूसरी गौरी अंकित है। लघु फलक लगभग 8वीं सदी ईस्वी के हैं। इनका उपयोग प्रतिमा अनुकृति अथवा चल प्रतिमाओं के रूप में होता था। 

ताला में हुए विभिन्न चरणों के कार्यों ने देश के शीर्ष पुरातत्वविदों का ध्यान आकर्षित किया है। स्थल संबंधी खेज, अध्ययन, शोध तथा व्याख्या यद्यपि प्राथमिक स्तर पर है, किन्तु भविष्य की पुरातत्विक गतिविधियों के फलस्वरूप यह स्थल कला स्थापत्य के पहलू तो उजागर करेगा ही। शैव धर्मदर्शन के नए आयामों को उद्घाटित करते हुए यहां क्षेत्रीय कला परम्परा की पृष्ठभूमि भी उजागर होगी। आरंभिक अवलोकन मात्र से यह निःसंदेह है। 

देवरानी मंदिर की निर्माण योजना में आरंभिक चन्द्रशिला और सोपान के साथ अर्द्धमंडप, अन्तराल और गर्भगृह; तीन मुख्य भाग हैं। पूरी संरचना चबूतरे पर निर्मित है। मंदिर की बाहरी दीवार पर खुर और कुंभ के समानान्तर मकर मुख बने हैं और जंघा अर्द्धस्तंभों से विभक्त है। प्रवेश में दोनों ओर शिवगण है; अर्द्धमंडप के पार्श्वों में नदी देवी प्रतिमाएं हैं। 

मुख्य प्रवेश द्वार का सिरदल दो भागों में विभक्त है, ऊपरी हिस्से में गजाभिषिक्त लक्ष्मी, नदी-देवता, परिचारकों और गंधर्वों के अंकन की अभिकल्पना और गत्यात्मक चित्रण में कलाकार की समग्रकला साधना की गहराई दिखती है, निचले हिस्से में शिव-पार्वती विवाह का मंगल दृश्य है, सिरदल के भीतरी पार्श्व पर बीच में पन्द्रह ऋषियों को विशिष्ट मुद्रा में संयोजित कर वृत्त का आकार दिया गया है और दोनों पार्श्व अर्द्धपद्म से पूरित है। प्रवेश द्वार सम्मुख चार पुष्पीय लड़ियों के आकर्षण संयोजन अलंकृत है। प्रवेशद्वार के भीतरी पार्श्वों में उमा-महेश का लास्य, द्यूत प्रसंग में हारे शिव के वाहन नन्दी का पार्वती गणों के अधिकार में होना, भगीरथ अनुगामिनी गंगा स्पर्श से सगर वंशजों की मुक्ति, मौलिकता युक्त अनुभव सम्पन्न सृजन का परिणाम है, विशेष उल्लेखनीय कीतिमुख के रौद्रभाव संयोजन के लिए कोमल पत्र-पुष्प दलों का उपयोग, भारतीय कला का अद्वितीय प्रतिमान है। 

सर्वाधिक चर्चित और महत्वपूर्ण प्रतिमा रूद्रशिव है। इसे महाशिव परमशिव या पशुपतिनाथ नाम भी दिया गया है। सिर पर नागयुग्म की भारी पगड़ी है। पूरे शरीर पर मानव और सिंह मुख तथा विभिन्न अंगों का रूपान्तरण जीव-जन्तुओं में हुआ है। दाढ़ी पर केकड़ा, मंूछ के स्थान पर दो मछलियां तथा नाक व भौंह का रूप गृहगोधा का है। आंख की पलकें दानव का मुखविवर हैं कान के स्थान पर मोर और कंधे मकर मुख है। चूंकि शिव का पशुपतिरूप, स्वाधिष्ठित संयमी पुरूष का है, अतः कछुए के गर्दन और सिर को उर्द्धरेतस आकार दिया गया है। श्री के.के.चक्रवर्ती व्याख्या करते है कि ‘जो रूद्र है व शिव भी है, जो अशुभ दूर करते हैं वह शुभ भी लाते हैं, जो ध्वंस करते है वही सृजन करते हैं; इस तरह यह रूद्र और शिव का समाहार का चिन्तन है।‘

Friday, January 28, 2022

ताला की विलक्षण प्रतिमा

छत्तीसगढ़ राज्य गठन के अवसर पर मध्यप्रदेश शासन, उच्च शिक्षा विभाग एवं मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रन्थ अकादमी का समवेत उपक्रम, द्विमासिक ‘रचना‘ के अंक-27, नवंबर-दिसंबर 2000 में मुखपृष्ठ पर ताला, अमेरीकांपा, बिलासपुर की प्रसिद्ध प्राचीन प्रतिमा ‘रूद्र शिव‘ का चित्र प्रकाशित हुआ था। अंक के अतिथि संपादक डॉ. राजेन्द्र मिश्र थे। इस अंक के विभिन्न महत्वपूर्ण लेखों में एक लेख ‘ताला की विलक्षण प्रतिमा‘ मुखपृष्ठ के चित्र से संबंधित यानि ताला की इस प्रतिमा पर भी था। इसमें किसी एक मूर्ति पर एकाग्र पुस्तक ‘रिडिल ऑफ इण्डियन आइकनोग्राफी‘ का उल्लेख है, यहां प्रस्तुत लेख डॉ. लक्ष्मीशंकर निगम ने लिखा है साथ ही उक्त पुस्तक के संपादक के रूप में इस प्रतिमा का परिचय भी उन्होंने पुस्तक में दिया है, जो यहां अंत में प्रस्तुत है। चित्र में दोनों प्रकाशन दृष्टवय हैं। 


सभ्यता के विकास के साथ ही मानव में कलात्मक प्रवृत्तियों का विकास भी स्पष्टतः दृष्टिगत होता है। गायन, वादन, नृत्य, संगीत के साथ-साथ अभिनय, चित्रकला और मूर्तिकला को कलात्मक प्रवृत्तियों के रूप में स्वीकृत किया जाता है। कालान्तर में कला के अन्तर्गत अनेक विषयों को सम्मिलित कर दिया गया और साहित्य में सामान्यतः 64 कलाओं का उल्लेख होने लगा। वात्स्यायन के कामसूत्र में 66 कलाओं का विवरण मिलता है। इसके अन्तर्गत ललित अथवा शिल्प कला के साथ ही दैनिक जीवन, पारम्परिक व्यवसाय आदि से सम्बन्धित विषयों को भी समाहित किया गया है।

कला के विभिन्न रूपों में मूर्तिकला का एक विशिष्ट स्थान रहा है। शिल्प शास्त्रीय परम्परा में मूर्तियों अथवा प्रतिमाओं का उल्लेख मिलता है। सामान्यतः प्रतिमा और मूर्ति में कोई विशेष अन्तर नहीं माना जाता। ‘प्रतिमा‘ शब्द का अर्थ, ‘प्रतिरूप‘ होता है, अर्थात किसी आकृति की प्रतिकृति को प्रतिमा कहा जा सकता है, किन्तु शास्त्रीय परम्परा में प्रतिमा को ‘अर्चा‘ से जोड़ दिया गया है। इस प्रकार प्रतिमा को किसी धार्मिक अथवा दार्शनिक सम्प्रदाय से सम्बन्धित होना आवश्यक माना जाने लगा। मूर्ति के लिए इस प्रकार की बाध्यता नहीं रही। इसीलिए प्रतिमा निर्माण में निश्चित नियमों तथा लक्षणों का पालन आवश्यक होता है, जबकि मूर्ति निर्माण में शिल्पी को अधिक स्वतंत्रता होती है।

भारतीय शिल्प में मूर्ति तथा प्रतिमा निर्माण की दीर्घकालीन परम्परा रही है। कला इतिहास के विद्वानों ने इन प्रतिमाओं की उनके लक्षणों एवं शैलियों के आधार विवेचनाएँ प्रस्तुत की हैं किन्तु कभी-कभी ऐसी विलक्षण प्रतिमाएँ प्राप्त हो जाती हैं, जो पुरातत्ववेत्ताओं और कला-इतिहासज्ञों के लिए समस्या बन जाती हैं, ऐसी ही एक प्रतिमा लगभग ग्यारह वर्ष पूर्व मध्यप्रदेश के बिलासपुर जिले में प्राप्त हुई है।

बिलासपुर से लगभग 30 किलोमीटर की दूरी पर, मनियारी नदी के तट पर, अमेरी काँपा नामक ग्राम के निकट ‘ताला‘ नामक स्थल पर दो प्राचीन भग्न मंदिर स्थित हैं, जो देवरानी-जेठानी मंदिर के नाम से प्रख्यात हैं। रायपुर-बिलासपुर मार्ग पर भोजपुरी नामक ग्राम से इसकी दूरी लगभग छह किलोमीटर है। जेठानी मंदिर अत्यन्त ध्वस्त अवस्था में है, जबकि देवरानी मंदिर अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में है। देवरानी और जेठानी मंदिर अपनी विशिष्ट कला के कारण देश-विदेश के कला प्रेमियों के लिए आकर्षण का केन्द्र हैं, मध्यप्रदेश शासन के पुरातत्व विभाग ने यहाँ समय-समय पर मलबा सफाई तथा संरक्षण का कार्य कराया है। इसी क्रम में भारतीय में प्रशासनिक सेवा के एक वरिष्ठ अधिकारी डॉ. के.के. चक्रवर्ती के मार्गदर्शन में इस स्थल की मलबा सफाई का कार्य, उस समय बिलासपुर में पदस्थ पुरातत्व विभाग के अधिकारी द्वय सर्वश्री जी.एल. रायकवार तथा राहुल सिंह द्वारा कराया गया, जिससे 17 जनवरी 1988 को एक विलक्षण प्रतिमा यहाँ से प्रकाश में आई।

यह विशाल प्रतिमा लगभग 9 फीट ऊँची तथा 5 टन वजनी तथा शिल्प की दृष्टि से अद्भुत है। इसमें शिल्पी ने प्रतिमा के शारीरिक-विन्यास में विभिन्न पशु-पक्षियों का संयोजन किया है। प्रतिमा के शीर्ष भाग में पगड़ीनुमा सर्प-युग्म का अंकन मिलता है। नासिका और आँखों की भौंह का निर्माण उतरते हुए छिपकली सदृश्य प्राणी से किया गया है। मूछों के अंकन में मत्स्य-युग्म प्रयुक्त है, जबकि ठुड्डी का निर्माण कर्क (केकड़ा) से किया गया है। कानों को मयूर-आकृतियाँ सदृश्य चित्रित किया गया है। सिर के दोनों पार्श्वों में फणयुक्त सर्प का चित्रण है। कंधों को मकर-मुख सदृश्य बनाया गया है, जिससे दोनों भुजाएँ निकलती हुई दिखाई देती हैं। शरीर के विभिन्न आंगों में सात-मानव-मुखों का चित्रण मिलता है। वक्ष-स्थल के दोनों ओर दो छोटे मुखों को अंकित किया गया है। उदर का निर्माण एक बड़े मुख द्वारा किया गया है। यह तीनों मुख मूछों से युक्त हैं। जंघाओं में सामने की ओर अंजलिबद्ध दो मुख तथा दोनों पार्श्वों में दो अन्य मुख अंकित हैं। दो सिंह-मुख घुटनों में प्रदर्शित किए गए हैं। उर्ध्वाकर लिंग के निर्माण के लिए मुँह निकाले कच्छप (कछुए) का प्रयोग है। घण्टा की आकृति के अण्डकोष कछुवे के पिछले पैरों से बने हैं। सर्पाे का प्रयोग उदर-पट्ट तथा कटिसूत्र के लिए किया गया है। हाथों के नाखून सर्प-मुख जैसे हैं। बायें पैर के पास भी एक सर्प का अंकन मिलता है।

इस प्रकार की प्रतिमा देश के किसी भाग से नहीं मिली है और न ही शिल्प-शास्त्रों में इसका उल्लेख मिलता है। प्रतिमा के लक्षणों के आधार पर इस सम्बन्ध में निम्नलिखित अनुमान व्यक्त किया जा सकता है:

1. यह प्रतिमा शैव परम्परा से संबंधित प्रतीत होती है। विभिन्न पशु-पक्षियों का चित्रण इसके पशुपति रूप का परिचायक कहा जा सकता है, शिव प्रतिमा के लक्षणों, यथा डमरू, त्रिशूल, नंदी आदि का यद्यपि इसमें अभाव है फिर भी सर्पों की उपस्थिति एवं उर्ध्वाकार लिंग, इसे शैव-परम्परा से सम्बद्ध करता है। 
2. यह प्रतिमा देवरानी मंदिर के प्रवेश-द्वार के निकट से प्राप्त हुई है तथा आकार-प्रकार में द्वारपाल सदृश्य दिखाई पड़ती है, अतः इसके द्वारपाल परम्परा से सम्बन्धित होने का अनुमान किया जा सकता है,
3. विशालकाय शरीर, सिर पर पगड़ी तथा उन्नत उदर के आधार पर यह यक्ष मूर्तियों के सदृश्य दिखाई पड़ती है।

कला-इतिहासकारों ने इस प्रतिमा के विभिन्न पक्षों का अध्ययन करते हुए इसे लकुलीश, रूद्र-शिव, द्वादशमुख-शिव, यक्ष रूप में शिव आदि से समीकृत करने का प्रयास किया है। कुछ विद्वान इसमें तांत्रिक प्रभाव देखते हैं तथा कुछ इसमें अभिचारिक परम्परा का समावेश होने की सम्भावना व्यक्त करते हैं, इस प्रतिमा को लगभग छठवीं शताब्दी ई. के मध्य का माना जाता है। कलाशैली की दृष्टि से इस प्रतिमा की तुलना नागपुर के निकट मांडल से प्राप्त शिव प्रतिमाओं से की जा सकती है, मांडल से चतुर्मुखी, अष्टमुखी एवं द्वादशमुखी शिव प्रतिमाएँ प्राप्त हुई हैं किन्तु ताला की प्रतिमा शिल्पांकन एवं प्रतीक की दृष्टि से अद्भुत एवं मौलिक कही जा सकती है। ऐसा प्रतीत होता है कि विभिन्न प्राणियों यथा-जलचर (मछली, मकर आदि), थलचर (सिंह, छिपकली आदि), उभयचर (कछुवा, केकड़ा, सर्प आदि) तथा नभचर (मयूर) का अंकन समस्त चराचर जगत का परिचारक कहा जा सकता है। इसी आधार पर इस प्रतिमा को शिव के ‘विश्व-रूप‘ से अभिज्ञानित करने का प्रयास भी किया गया है।

इस प्रतिमा में अंकित विभिन्न पशु-पक्षियों का अंकन किस उद्देश्य से किया गया है? वर्तमान में निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता। इसमें अंकित विभिन्न प्रतीकों का अर्थ निकालने के लिए इतिहासकार एवं पुरातत्ववेत्ता प्रयत्नशील हैं। प्रसिद्ध कला-समालोचक एवं हार्वर्ड विश्वविद्यालय में भारतीय कला इतिहास के प्रोफेसर डॉ. प्रमोद चन्द्र, जो इस मूर्ति की खोज के समय ताला में उपस्थित थे, ने विचार व्यक्त किया है कि यह प्रतिमा कला-इतिहासकारों के लिए कम से कम एक शताब्दी तक समस्या बनी रहेगी। भारतीय कला के देश-विदेश के अध्येता इस प्रतिमा के रहस्य की खोज में लगे हुए हैं। इन पंक्तियों के लेखक के सम्पादन में एक पुस्तक ‘रिडिल ऑफ इण्डियन आइकनोग्राफी‘ का प्रकाशन हुआ है, जिसमें विश्व के पन्द्रह अध्येताओं ने अपने विचार व्यक्त किए हैं। किसी एक मूर्ति पर केन्द्रित एकाग्र प्रकाशन पहली बार किया गया है। यद्यपि इस अध्ययन से इस मूर्ति के अभिज्ञान की दिशा में नए आयाम मिले हैं तथापि अन्तिम निष्कर्ष अभी तक नहीं निकल पाया है।

प्रतिमा के अभिज्ञान तथा प्रतीकों के संबंध में भले ही मतभेद हों किन्तु इस तथ्य में कोई सन्देह नहीं है कि शिल्पी ने मूर्ति के संयोजन में अपनी मौलिक कल्पना का अद्भुत परिचय दिया है और साथ ही भारतीय परम्परा के विभिन्न आयामों को समेकित रूप में प्रदर्शित करने का अनोखा प्रयास भी किया है। 

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The image under discussion is 2.70 metre in height and approximately five tonnes in weight. This two-armed image standing in samapāda posture is massively built with emphasis on muscular strength. It has unusual iconographic features depicting various animals alongwith human and lion heads components. The description of the image is interesting enough. A turban made of a pair of snakes. The serpent is probably a favourite depiction of the artist. Therefore, the waist band and finger nails are also designed like snake. Apart from these, a pair of serpent-hood figures on either side of the head above the shoulders. A snake is also shown entwining the left leg. Among other animals, peacock is depicted ornamenting ears. Eyebrows and nose are made of a descending lizard. Eyelash are either in the pattern of an open mouth of a frog or the mouth of a roaring lion. Two figures of fish form moustaches of the image alongwith the upper lip, while the lower lip and the chin are shaped like a crab. Both the shoulders have depiction of makara (crocodile). Seven human heads as body are engraved in various parts of the body. Of these a pair of small heads may be seen on either side of the chest. A bigger face forms the abdomen. These three faces have moustaches. Each thigh consists of a pair of heads of which two smiling faces are carved on the front side in añjali-baddha posture, while the other two are carved on sides. Heads of lion are depicted on each knee. The ūrdhvamedhra (penis-erectus) is made of head and neck of a tortoise. Two bell-like testicles are designed as forelimbs of the same animal. The legs of the icon are formed in the shape of elephant's legs.

Wednesday, January 26, 2022

पद्म-2022

छत्तीसगढ़ में यह साल पद्म पुरस्कारों के नाम पर सूना रहा। बधाइयों का तांता लगने का अवसर नहीं बना तो स्वाभाविक ही अफसोस, उपेक्षा, पक्षपात, क्षोभ, पात्रता, काबिलियत, प्रतिभा, राजनीति पर बातें होने लगीं। यह मौका सयापे से अधिक इस ओर ध्यान देने का है कि चूक कहां हो जाती है, हम पिछड़ कहां जाते हैं। ऐसा भी होता आया है कि किसी को नहीं मिला का शोक करने वाले, पुरस्कृत की पात्रता पर भी सवाल उठाने में देर नहीं करते। जबकि राज्य से किसी का चयन हो खुशी की बात होनी चाहिए और नाम न होने पर अफसोस करने से जल्द उबर कर, अपने प्रयासों को प्रभावी बनाते अगले साल पर ध्यान देना सार्थक होगा।

इसमें कोई संदेह नहीं कि छत्तीसगढ़ में प्रतिभाओं की कमी नहीं, ऐसा भी नहीं कि पद्म पुरस्कारों के लिए प्रविष्टियां न गई हों, मगर संयोग कि इस वर्ष के पद्म पुरस्कारों की सूची में छत्तीसगढ़ का नाम नहीं आया। अब तक के पद्म पुरस्कारों पर नजर डालें तो छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद 2002 और 2003 में क्रमशः हबीब तनवीर और तीजनबाई को पद्मभूषण सम्मान मिला था। इसके बाद 2006 ऐसा वर्ष था, जब छत्तीसगढ़ से कोई नाम नहीं था। यहां उल्लेख आवश्यक है कि हबीब तनवीर को यह सम्मान छत्तीसगढ़ से नहीं, बल्कि मध्यप्रदेश कोटे से मिला था, उन्हें पद्मश्री सम्मान भी दिल्ली कोटे से मिला था। इसी तरह जगदलपुर वाली मेहरुन्निसा परवेज अब भोपालवासी, बिलासपुर वाले दिवंगत सत्यदेव दुबे, रायपुर वाले शेखर सेन अब पुणेवासी, स्वामी निरंजनानंद सरस्वती अब मुंगेर और भिलाई वाले बुधादित्य मुखर्जी अब कोलकातावासी, को भी अन्य राज्यों के कोटे से सम्मान मिला न कि छत्तीसगढ़ कोटे से।

याद करते चलें यद्यपि पश्चिम बंगाल कोटे से, किंतु 1965 में छत्तीसगढ़ के पद्म सम्मानित पहले व्यक्ति डॉ. द्विजेन्द्रनाथ मुखर्जी हैं। बैरन बाजार का मुखर्जी कम्पाउंड उन्हीं के नाम पर है। बताया जाता है कि बागवानी के शौकीन डॉ. मुखर्जी ने सेवानिवृत्ति के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ जेनेवा में नियुक्ति के प्रस्ताव को बगीचे के मोह में ठुकराया और रायपुर रह गए। डा. मुखर्जी को टेनिस, फोटोग्राफी, शिकार, चित्रकारी तथा वन और पशु-पक्षियों सहित कुत्तों का शौक रहा। कविता करने वाले डॉ. मुखर्जी ने बच्चों के लिए बांग्ला में पुस्तक ‘मोनेर कोथा’ - मन की कथा, भी लिखी। वहीं छत्तीसगढ़ राज्य गठन के पूर्व एकमात्र पद्म सम्मान 1976 में मुकुटधर पाण्डेय को मिला था।

पद्म सम्मान की कार्यवाही केंद्र सरकार में गृह विभाग के अधीन होती है। पिछले वर्षों से पद्म सम्मान के लिए प्रविष्टियां आनलाइन आमंत्रित की जाती हैं। सामान्यतः नामांकन की प्रक्रिया मई माह से आरंभ हो कर प्रविष्टि की अंतिम तिथि 15 सितंबर निर्धारित होती है और अक्टूबर से चयन प्रक्रिया आरंभ हो जाती है। गत वर्षों में सूचना का अधिकार के तहत ली गई जानकारी से पता चला कि आनलाइन प्रक्रिया के बाद प्रविष्टियों की संख्या दस हजार से भी अधिक होती है। जानकार बताते हैं कि प्रविष्टियों के आरंभिक परीक्षण के पश्चात नवंबर माह तक समिति सम्मान हेतु नामों का चयन कर लेती है और इसके पश्चात दिसंबर में नामों की पुष्टि और सत्यापन की कार्यवाही कर सूची को जनवरी के आरंभ तक अंतिम रूप दे दिया जाता है। प्रत्येक वर्ष 25 जनवरी इन सम्मानों के घोषणा के लिए नियत तारीख है।

अब नजर डालें छत्तीसगढ़ और सम्मान की प्रविष्टियों पर। आनलाइन के पहले ऐसे भी उदाहरण रहे हैं जब पद्म पुरस्कार के लिए प्रपत्र में प्रविष्टि तैयार कर भेजने के बजाय हस्ताक्षर अभियान चलाया गया, जैसे लाला जगदलपुरी के लिए। कई प्रविष्टियां ऐसी भी होतीं, जैसा बच्चों को स्कूल में अवकाश के लिए एक पेज का आवेदन पत्र लिखाया जाता है। निर्धारित प्रारूप और प्रक्रिया के प्रति आमतौर पर अनभिज्ञता होती थी। आनलाइन के दौर में भी ऐसे उदाहरण हैं, जिनमें आवेदनकर्ता प्रविष्टि जमा करने के लिए कलेक्टर, संस्कृति विभाग या मंत्रालय के चक्कर लगाते रहते हैं और उनकी शिकायत होती है कि उनका आवेदन नहीं लिया जा रहा था या उसे दिल्ली नहीं भेजा गया। फिर जोर-जुगाड़ की संभावना, आशा और आशंका। जबकि आनलाइन आवेदन प्रक्रिया स्वयं में पूरी तरह पारदर्शी और स्पष्ट है, जिसमें आवश्यकता इस बात की होती है कि निर्धारित प्रारूप में निर्देशों के अनुकूल शब्द संख्या में जानकारी और प्रपत्र तैयार कर निर्धारित समय-सीमा में अपलोड कर दिया जाए।

पद्म सम्मानों की पात्रता और उपयुक्तता को ले कर भी टिप्पणियां की जाती हैं। इस संबंध में डा. सुरेन्द्र दुबे, अनुज शर्मा और अनूप रंजन के नामों के साथ प्रतिकूल प्रतिक्रिया आती रही थी। उक्त तीनों से मेरा व्यक्तिगत परिचय है तथा कुछ मुद्दों पर इनसे मेरी गंभीर असहमतियां और मतभेद भी हैं किंतु इनके पद्म सम्मान पर मुझे हमेशा प्रसन्नता और गर्व महसूस हुआ है। जहां तक औचित्य और पात्रता का सवाल है डॉ. सुरेन्द्र दुबे की लोकप्रियता असंदिग्ध है और अमरीकी वाइट हाउस में कविता पढ़ने जैसी उपलब्धि उनके नाम है। इसी तरह अनुज शर्मा आंचलिक फिल्मों के ऐसे कलाकार हैं, जिनके नाम सफलता और उपलब्धियों के ढेरों रेकार्ड हैं, जिन तक न सिर्फ छत्तीसगढ़, बल्कि अन्य राज्यों में शायद ही कोई पहुंचा हो। अनूप रंजन पांडेय, कई दशकों से बस्तर के अंदरूनी इलाकों में बिना किसी संस्थागत मदद के कलाकारों से नियमित संपर्क में रह कर, बस्तर की सांगीतिक परंपरा को सामने ले कर आए, वह अपने में अनूठी मिसाल है। यों भी भावनात्मक रूप से छत्तीसगढ़ या राज्य से जुड़े किसी भी व्यक्ति का सम्मानित होना, सदैव स्वागतेय होना चाहिए।

इसी क्रम में 2021 के पद्म पुरस्कार में ध्यान देने की बात है कि भिलाई के राधेश्याम बारले को पद्मश्री सम्मान मिला, पंथी नर्तक के रूप में उनकी खासी प्रतिष्ठा है मगर रायपुर, दुर्ग, राजनांदगांव और बिलासपुर के ही दस से अधिक ऐसे पंथी दल हैं जो उनके दल से कम नहीं, फिर बारले ही क्यों? यहां रेखांकित करना आवश्यक है कि पंथी के अतिरिक्त अन्य गतिविधियों तथा उनसे जुड़ी अपनी उपलब्धियों के दस्तावेजों को जमा करते हुए उन्हें सुरक्षित व्यवस्थित रखने और उन्हें प्रस्तुत करने का उन जैसा कौशल सब में नहीं होता। तात्पर्य यह कि ऐसे किसी सम्मान के लिए आवश्यक प्रक्रिया और दस्तावेज, जानकारियों का अभाव हो तो पात्र भी सम्मान पाने से वंचित हो सकते हैं। याद कर लें कि देवदास बंजारे को पद्म सम्मान नहीं मिला था।

ध्यान देना होगा कि पुरस्कार समिति के सदस्य, विचार के लिए प्रस्तुत सभी प्रविष्टियों, व्यक्तियों एवं उनकी प्रतिभा से स्वयं परिचित हों, संभव नहीं। समिति के लिए न यह अवसर होता, न ही संभव होता कि वे किसी गायक या वादक को सुन कर निर्णय लें या किसी साहित्यकार की रचना को पढ़ें या किसी समाजसेवी के काम को मौके पर जा कर देखें। उनकी भूमिका किसी न्यायाधीश की तरह होती है, जिसे उपलब्ध प्रमाण और साक्ष्य के आधार निर्णय लेना होता है, बल्कि यहां तो साक्ष्य यानि गवाही लेना भी संभव नहीं है। ऐसी स्थिति में सारा निर्णय प्रविष्टि में प्रस्तुत जानकारी और उन जानकारियों की पुष्टि के लिए संलग्न दस्तावेज के आधार पर करना होता है। संक्षेप में, वस्तुपरक जानकारी के व्यक्तिपरक परीक्षण से निर्णय लिए जाते हैं। ऐसी स्थिति में पूरी संभावना होती है कि कम योग्य, बेहतर दस्तावेज वाली प्रविष्टि, प्रतिभाशाली किंतु मामूली दस्तावेजों वाली प्रविष्टि की तुलना में सम्मान की हकदार बन जाए।

कुछ अन्य बातें। एक ओर छत्तीसगढ़ के धरमपाल सैनी और दामोदर गणेश बापट पद्म सम्मानित हुए। वहीं पी.डी. खेड़ा, केयूर भूषण, पवन दीवान, गहिरा गुरु का नाम इस सूची में शामिल नहीं हुआ, इसका तात्पर्य यह नहीं कि इनमें से कोई नाम सम्मान के उपयुक्त नहीं था। इसी तरह साहित्य के क्षेत्र में विनोद कुमार शुक्ल और राजेश्वर दयाल सक्सेना को अब तक पद्म सम्मान नहीं मिला है। लाला जगदलपुरी, बिमलेंदु मुखर्जी, अरुण कुमार सेन, तुलसीराम देवांगन, गुणवंत व्यास, पीडी आशीर्वादम, बसंत तिमोथी, मनीष दत्त का नाम भी इस संदर्भ में याद किया जाना चाहिए, जिन्हें पद्म सम्मान नहीं मिला। पुरातत्व के क्षेत्र में डा. विष्णु सिंह ठाकुर के अवदान को भी नहीं भुलाया जा सकता। विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय ऐसे कई नाम निर्विवाद हैं, जिनकी पात्रता पर कोई सवाल नहीं हो सकता, जिनमें उदाहरणस्वरूप नाम डॉ. योगेश जैन, डॉ. ओमप्रकाश वर्मा, डॉ. आदित्य प्रताप देव हैं। इनमें ऐसे लोग भी हैं, जो किसी सम्मान, पुरस्कार के लिए उद्यत नहीं रहे, जबकि इसके लिए जागरूकता और पुरस्कार के लिए आवश्यक प्रक्रिया अनुकूल उद्यम आवश्यक होता है। इसलिए पुरस्कार को मात्र योग्यता और पात्रता से सीधे जोड़ कर देखना उचित नहीं होता।

सम्मान के निर्धारित विभिन्न क्षेत्र संक्षेप में यथा- कला, सामाजिक कार्य, सार्वजनिक क्षेत्र, विज्ञान-प्रौद्योगिकी, व्यापार-उद्योग, चिकित्सा, साहित्य-शिक्षा, लोक सेवा, खेल तथा अन्य, शासन की अधिकृत वेबसाइट पर स्पष्ट विस्तार से दर्शित होते हैं। आनलाइन नामांकन में सामान्यतः नामांकन विवरण, प्रशस्ति 800 शब्द, महत्वपूर्ण योगदान/ उपलब्धि 250 शब्द/ पुरस्कार-मान्यता राज्य, राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय 250-250 शब्द/ काम का प्रभाव-क्षेत्र में योगदान 250 शब्द/ समाज को योगदान 250 शब्द/ फोटो 1 एमबी/ दस्तावेज 5 एमबी की सीमा होती है, जिसके साथ स्पष्ट निर्देश भी होते हैं। सभी प्रविष्टियां समिति को प्रस्तुत की जाती हैं, जिसके प्रमुख कैबिनेट सचिव होते हैं। समिति में गृह सचिव, माननीय राष्ट्रपति के सचिव और चार से छह प्रख्यात व्यक्ति, सदस्य शामिल होते हैं। समिति की अनुशंसा प्रधानमंत्री जी को माननीय राष्ट्रपति के अनुमोदन हेतु प्रस्तुत की जाती है। पद्म सम्मान के लिए प्रक्रिया को मोटे तौर पर समझने के लिए यह जानकारी दी जा रही है, किंतु इसकी पुष्टि अधिकृत वेबसाइट से अवश्य कर लेवें।

इस वर्ष पद्म-सूनेपन के साथ तोहमत और सयापे से जितनी जल्दी हो सके उबरना श्रेयस्कर और इसके प्रति जागरूकता के साथ उपयुक्त प्रयास की ओर ध्यान देना आवश्यक, ताकि अगले वर्षों में राज्य में बधाइयों का संयोग लगातार बनता रहे।