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Monday, August 19, 2019

साहित्य वार्षिकी

इंडिया टुडे साहित्य वार्षिकी के रचना उत्सव एवं सम्मान समारोह के इस आयोजन में आज प्रस्तुति देने वाले कलाकारों, सभा में पधारे गुणीजन और इंडिया टुडे परिवार के सदस्य, यों मेजबान लेकिन हमारे मेहमान, आप सभी का सादर अभिवादन।

हिंदी साहित्य और उसके प्रतिनिधि लेखकों को मुख्य धारा के पाठकों तक पहुंचाने में साहित्य वार्षिकी ने अहम् भूमिका निभाई है साथ ही हिंदी की अपनी जमीन के अलावा दूसरी भाषाओँ के प्रतिनिधि लेखकों तक भी पहुंच बनाई है। साहित्य वार्षिकी में रचनाओं की गुणवत्ता के साथ देश के प्रमुख चित्रकारों की भागीदारी, इसका उल्लेखनीय पक्ष है। 2002 में वार्षिकी का सिलसिला रुक जाने के बाद 2017 में यह फिर से शुरू हुआ। इस दौर में नई टेक्नोलॉजी के साथ पाठकों की रुचियां बदलीं, पर डेढ़ दशक के बाद प्रकाशित साहित्य वार्षिकी के अंक को दोबारा छापने की जरूरत हुई। वार्षिकी की यह सफलता, स्वयं अपना प्रतिमान है और आश्वस्त करती है कि साहित्य के पाठक उसी अनुपात में आज भी हैं।

इंडिया टुडे ने यहां आठ सौ बरस निर्विघ्न राज्य करने वाले कलचुरियों के वंशजों की खोज-खबर ली थी। संगीत-तीर्थ रायगढ़ की परंपरा और राज परिवार के हालात को टटोला। विश्वदाय स्मारक सूची की तैयारी वाले प्राचीन राजधानी-नगर सिरपुर की कहानी कही। मिसाल-बेमिसाल में छत्तीसगढ़ के अनूठे और अल्पज्ञात तथ्यों, चरित्रों को रेखांकित किया और कला-साहित्य की हलचल से हमेशा बाखबर रखा है। इस पत्रिका ने समाचार के दायरे को राजनीति, अपराध, भ्रष्टाचार, दुर्घटना से आगे विस्तृत कर सामाजार्थिक सरोकार को भी जोड़ा। स्वास्थ्य, शिक्षा, नवाचार और उद्यम की रोचक-प्रेरक कहानियों के साथ सोच-समझ को साफ और विकसित करने का मसौदा उपलब्ध कराया। पिछले साल यहां इंडिया टुडे का ‘कान्क्लेव छत्तीसगढ़‘ हुआ था और अब यह रचना उत्सव, इसकी कड़ियां हैं।

छत्तीसगढ़ के इतिहास में रचना का सतत उत्सव घटित होता रहा है। कालिदास के मेघदूत की रचना स्थली और प्राचीनतम नाट्यशाला की मान्यता वाले रामगढ़ में अजंता और बाघ से भी पुराने चित्र हैं, बाइस सौ साल पहले सुतनुका-देवदीन की प्रेम-अभिव्यक्ति गुफा की दीवार पर उत्कीर्ण है तो दूसरी तरफ हजारों साल से चली आ रही वाचिक परंपरा के मौखिक साहित्य का विपुल भंडार भी छत्तीसगढ़ में है। भरथरी और पंडवानी गायन में महिलाएं आगे हैं तो धनकुल जगार गाथा गायन पर ‘गुरुमाएं‘ महिलाओं का एकाधिकार है। गौर सींग, करमा, ददरिया, पंथी, सुआ, राउत, सैला महज नृत्य-गीत शैली और मंचीय प्रस्तुति तक सीमित नहीं, लोक जीवन का समवाय हैं। राजनांदगांव की सौगात, कोई डेढ़ सौ साल पहले, निजी पहल से देश का पहला संग्रहालय आरंभ हुआ तो सन 1956 में खैरागढ़ में एशिया का पहला संगीत विश्वविद्यालय स्थापित हुआ। रायगढ़ की सांगीतिक परंपरा ने कत्थक को विशिष्ट आयाम दिया। नाचा-गम्मत का लोक ‘नया थियेटर‘ के माध्यम से विश्व मंच पर थिरकता रहा।

सत्रहवीं सदी इस्वी में गोपाल मिश्र के ‘खूब तमाशा‘ से आरंभ परंपरा में यहां ठाकुर जगमोहन सिंह की फैंटेसी ‘श्यामा स्वप्न‘ उपन्यास में साकार हुई। जगन्नाथ प्रसाद ‘भानु‘ ने हिन्दी साहित्यशास्त्र की बुनियाद रखी। माधवराव सप्रे ने ‘छत्तीसगढ़ मित्र‘ पत्रिका और ‘एक टोकरी भर मिट्टी‘ कहानी से इतिहास गढ़ा। सरस्वती संपादन की परंपरा संवाहक पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी ने ‘क्या लिखूं‘, 'क्यों लिखूं' और 'मैं क्या पढ़ूं' जैसे शीर्षक निबंधों के साथ, क्या लिखें-पढ़ें का दस्तावेज रचा। मुकुटधर पांडेय के छायावादी मन ने प्रवासी कुररी की व्यथा सुनी और मेघदूत को छत्तीसगढ़ी में आत्मसात-अभिव्यक्त किया। मुक्तिबोध का यहां कभी ‘अंधेरे में‘ होना, अब भी प्रकाश-स्तंभ है।

हम धान का कटोरा, सिर्फ इसलिए नहीं हैं कि यहां धान अधिक उपजता है, इसलिए भी नहीं कि यहां का मुख्य भोजन चावल है, बल्कि इसलिए भी कि हमने साढ़े तेइस हजार धान-प्रकारों को इकट्ठा करने का जतन किया है, बचाया है और सिर्फ बचा कर नहीं रखा, उनके गुण-धर्म पर शोधपूर्ण जानकारी जुटाई है। इनके राम-लक्ष्मण जैसे स्थानीय नाम को भी सहेजा है। हम 44 प्रतिशत वन आच्छादित प्रदेश हैं, यह महज आंकड़ा नहीं, इसके पीछे वन संरक्षण और प्रबंधन की परंपरा, पवित्र वन खंड ‘सरना‘ हैं, प्रकृति और पर्यावरण के सम्मान के ‘पंडुम‘ हैं, वनों के व्यावसायिक दोहन के सामने आरे के निषेध को मोरध्वज की पौराणिक कथा से जोड़ कर अपनाया है, अपनी परंपरा का अंग बनाया है। बस्तर दशहरा का रथ आज भी बिना आरा के बनता है।

बस्तर का दशहरा पचहत्तर दिन का देवी का अनुष्ठान है न कि राम-रावण का उत्सव। उत्तर-पूर्वी छत्तीसगढ़ में गंगा दशहरा महत्वपूर्ण है। यह विजयादशमी तो है ही, कुछ इलाकों में गढ़ जीतने की परंपरा का त्यौहार है। यहां रावण भांठा और रावण की मूर्तियां हैं और अन्य ग्राम देवताओं के साथ रावण को समभाव से पूजा दी जाती है। जाति-जनजाति, धर्म-संप्रदाय पर प्रभावी सौहार्द की ऐसी समावेशी सतरंगी संस्कृति की भावभूमि है यह प्रदेश।

यहां ‘अरपा पैरी के धार...‘ है, महानदी, शिवनाथ, इंद्रावती, रेणु, मांद का प्रवाह है, तो जोड़ा तालाबों की संख्या भी कम नहीं। फिर ऐसे भी गांव हैं जहां सात आगर सात कोरी यानि 147 तालाब हैं, जल प्रबंधन की समझ, हमारी समष्टि चेतना में दर्ज है।

वन और धान की हरियाली हमारी समृद्धि है तो सोनाखान के स्वर्ण भंडार और उत्तरी छत्तीसगढ़ का काला कोयला, मध्य का सफेद चूना और दक्षिण का लाल लोहा इस राज्य की सुनहरी तकदीर रचते हैं, जिसके साथ टिन की चमक है और अलेक्जेंड्राइट के नगीने भी जड़े हैं। 

संस्कृति-समृद्ध छत्तीसगढ़ में इंडिया टुडे समूह के इस रचना उत्सव में कला-संस्कृति के विविध पक्षों को संयोजित किया गया है, मानों मार्कंडेय-वज्र के उस प्रसिद्ध पौराणिक संवाद को मूर्त किया जा रहा हो, जिसमें मूर्तिशिल्प-चित्रकला के साथ नृत्य, वाद्य, साहित्य और गीत को जरूरी बताते, कला की समग्रता प्रतिपादित है। इस आयोजन के उद्घाटन में आप सबके समक्ष अपनी माटी का गुणगान करते हुए बांटनवारे के रंग में रंगा हूं। पुनः अभिवादन और सादर आभार।

22 जून 2019 को रायपुर में इंडिया टुडे साहित्य वाषिकी का आयोजन हुआ। इसमें उद्घाटन वक्तव्य का जिम्मा मेरा था, वह प्रस्तुत आलेख के आधार पर था।


इसी कार्यक्रम में तीजनबाई, विनोद कुमार शुक्ल (चित्र में चि. शाश्वत), अरुण कुमार शर्मा, मिर्जा मसूद जैसे संतों के साथ संस्कृति सम्मान के लिए पांचवां नाम मेरा था।

Friday, July 5, 2019

खुमान साव


पचासेक साल पहले हम किशोर वय साथियों के लिए फिल्मी परदे के नायकों से कहीं बड़ी छवि मंच के, रामचन्द्र देशमुख, लक्ष्मण मस्तुरिया, केदार यादव, भैयाराम हेड़उ जैसे नामों की थी और चंदैनी गोंदा हमारे लिए एक पवित्र नाम रहा। इस सूची में एक अलग नाम खुमान साव का भी था, क्योंकि हम सिर्फ इस नाम से परिचित थे, न चेहरा पहचानते न ही उनके कद को जानते थे। यह नाम मेरी स्मृति में उतनी ही गहराई से दर्ज रहा और इस नाम का आकर्षण भी शायद अधिक ही रहा।

छत्तीसगढ़ राज्य गठन के पश्चात् राजिम मेला के अवसर पर सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन था, जिसमें चंदैनी गोंदा की प्रस्तुति को लेकर संवादहीनता की स्थिति बनी और खुमान साव जी से आमने-सामने पहली मुलाकात हुई। वे आम गंभीर से अधिक खिंचे हुए थे। मैं दुविधा में रहा, अपने विभागीय दायित्वों की सीमा और प्रशंसक होने के बीच तालमेल बिठाना था। वे तमतमाए रहे, लेकिन कार्यक्रम की प्रस्तुति शानदार रही। तब से बाद तक उनसे नरम-गरम, तीखी-मीठी होती रही।

वे लगभग हर महीने रायपुर आते और मुझसे मुलाकात होती, मेरे कक्ष में पहुंचते ही उनके बिना बोले चाय का ध्यान करना होता। इसके बाद धूम्रपान के लिए कमरे से बाहर निकल जाते। तबियत ठीक न होने पर अपनी गाड़ी में ही बैठे रहते, वहीं चाय पीते और हम सबसे मिल कर वापस लौटते।

छत्तीसगढ़ के लोक संगीत के लिए उनका एक प्रसंग मेरे लिए अविस्मरणीय है। मैंने किसी लोक कलाकार के धुन की आलोचना की, कि वह फिल्मी धुन की नकल है। इस पर उन्होंने डांटते हुए कहा- ए हमर पारंपरिक धुन आय, तैं का जानबे, फिलम वाला मन नकल करे हें, हमर धुन के। उनके पास पुराने समय में राजनांदगांव में आने वाले बंबइया कलाकारों के भी संस्मरणों का खजाना था।

सन 2005 में किन्हीं कारणों से मुझसे खफा हुए थे। मेरी तबियत खराब हुई और मैं लंबी छुट्टी पर रहा। वापस काम पर लौटा, मुझे पता नहीं था कि वे इस बीच मेरे स्वास्थ्य की जानकारी लेते रहे थे। पूछा- कहां गए रहे अतेक दिन ले, उनकी गंभीरता और उपरी सख्ती के बावजूद मैं उनसे ठिठोली की छूट ले लेता था। मैंने मजाकिया जवाब दिया- घूमे गए रहें। इस पर भावुक हो गए और नारियल का टुकड़ा दे कर बोले, परसाद झोंक, तोर बर नरियर बदे रहें। उनकी अस्वस्थता का समाचार पाकर उनके स्वास्थ्य की कामना मैंने भी की, लेकिन उन्हें वापस स्वस्थ पा कर प्रसाद नहीं खिला सका। उनकी इन स्मृतियों के साथ मेरे भाव वे महसूस कर पाए होंगे, मेरा अटल विश्वास है।

छत्तीसगढ़ी लोक संगीत के पुरोधा खुमान साव का जन्म 5 सितंबर 1929 को हुआ। छत्तीसगढ़ के पारंपरिक लोकधुनों को उन्होंने परिमार्जित किया साथ ही समकालीन छत्तीसगढ़ी काव्य को लोकधुनों में बांधा। छत्तीसगढ़ की सबसे प्रतिष्ठित लोकमंच संस्था ‘चंदैनी गोंदा‘ के वे एक आधार स्तंभ थे। सन 2016 में संगीत नाटक अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित हुए। 9 जून 2019 को उनके निधन के पश्चात् संस्कृति विभाग के सहयोग से स्मारिका ‘श्रद्धांजलि खुमान साव‘ 18 जून को प्रकाशित की गई, जिसमें मेरा यह संस्मरण भी शामिल है।

Monday, August 27, 2018

केदारनाथ सिंह के प्रति


‘‘शुरू करो खेला/पैसा न धेला/जाना अकेला।‘‘ कहने वाले केदारनाथ सिंह बलिया जनपद के तुक मिलाते से नाम वाले गांव चकिया में पैदा हुए। अब उनके न होने पर उन्हीं के शब्दों में- ‘‘मेरा होना/सबका होना है/पर मेरा न होना/सिर्फ होगा मेरा।‘‘ जो कहते हैं- ‘‘पर मृत्यु के सौन्दर्य पर/संसार की सर्वोत्तम कविता/अभी लिखी जानी है।‘‘ वे पाठक को संबोधित कहते हैं- ‘‘जा रहा हूं/लेकिन फिर आऊंगा/आज नहीं तो कल/कल नहीं तो परसों/परसों नहीं तो बरसों बाद/हो सकता है अगले जनम में ही‘‘ ऐसे स्मृतिशेष केदारनाथ पर, धतूरे का कांटेदार फल और फूल की अंजुरी अर्पित-

उनके न रहने पर उनकी एक कविता ‘हाथ‘- ‘‘उसका हाथ/अपने हाथ में लेते हुए मैंने सोचा/दुनिया को/हाथ की तरह गर्म और सुंदर होना चाहिए।‘‘ और दूसरी ‘जाना‘- ‘‘मैं जा रही हूँ- उसने कहा/जाओ- मैंने उत्तर दिया/यह जानते हुए कि जाना/हिंदी की सबसे खौफनाक क्रिया है।‘‘ सबसे अधिक उद्धृत हुईं। मुझे लगता है कि इन कविताओं में ऐसी कोई बात नहीं है, जो कवि का नाम हटा लेने के बाद भी खास या महत्वपूर्ण मानी जाय। यहां ‘धीरे धीरे हम‘ शीर्षक कविता को भी याद किया जा सकता है। घर उल्लेख वाली उनकी चर्चित कविता है- मंच और मचान। इस कविता के साथ '(उदय प्रकाश के लिए)' उल्लेख है, इसलिए बरबस ध्यान जाता है ‘विद्रोह‘ पर, जिसमें मूल की ओर लौटने, ‘वापस जाना चाहता हूं‘ का भाव है। ऐसा ही भाव ‘मातृभाषा‘ में हैं, जहां वे चींटियों, कठफोड़वा, वायुयान और भाषा के लौटने की बात करते हैं, लेकिन ये कविताएं वैसी असरदार नहीं जैसी उदय प्रकाश की ‘मैं लौट जाऊंगा‘।

अंतिम दो पड़ाव सन 2014 में प्रकाशित ’सृष्टि पर पहरा’ संग्रह और इंडिया टुडे, साहित्य वार्षिकी 2017-18 के आधार पर उनका कवि-मन की छवि कुछ इस तरह दिखती है- अजित राय से बात करते हुए उन्होंने बताया था कि- तोलस्तोय अपने गांव के लोगों से बहुत प्यार करते थे... गांव वालों के लिए तरसते थे। और फिर सवाल पर कि- क्या आपके चाचा या चकिया (बलिया जिले का उनका गांव) वालों को पता है कि आप देश के सबसे महत्वपूर्ण कवियों में से एक हैं? उन्होंने परेशान होकर टालने की गरज से कहा, ‘ए भाई, तू बहुत बदमाश हो गइल बाड़अ, पिटइबअ का हो? इसी बातचीत में उन्होंने ‘बनारस‘ कविता सुनकर रोने लगी महिला के बारे में बताया कि- ‘वह कविता के लिए नहीं बनारस के लिए रो रही है जहां वह कभी नहीं जा पाएगी। ... यह जादू बनारस का है मेरी कविता का नहीं।‘

’सृष्टि पर पहरा’ का ब्लर्ब विचारणीय है जहां कहा गया है कि- केदारनाथ सिंह का यह नया संग्रह कवि के इस विश्वास का ताजा साक्ष्य है कि अपने समय में प्रवेश करने का रास्ता अपने स्थान से होकर जाता है। यहां स्थान का सबसे विश्वसनीय भूगोल थोड़ा और विस्तृत हुआ है, जो अनुभव के कई सीमांत को छूता है। ... ये कविताएं कोई दावा नहीं करतीं। वे सिर्फ आपसे बोलना-बतियाना चाहती हैं- एक ऐसी भाषा में जो जितनी इनकी है उतनी ही आपकी भी। और दूसरी तरफ यह भी कि- कार्यक्षेत्र का प्रसार महानगर से ठेठ ग्रामांचल तक। इस संग्रह की कविता ‘घर में प्रवास‘ का अंश है- ‘अबकी गया तो भूल गया वह अनुबंध/जो मैंने कर रखा था उनके साथ/जब अन्दर प्रवेश किया/जरा पंख फड़फड़ाकर/उन्होंने दे दी मुझे अनुमति/कुछ दिन उस घर में रहा मैं उनके साथ/उनके मेहमान की तरह/यह एक आधुनिक का/आदिम प्रवास था/अपने ही घर में।‘

’सृष्टि पर पहरा’ का समर्पण भी गहरे अर्थ वाला है- “अपने गांववालों को, जिन तक यह किताब कभी नहीं पहुंचेगी।“ इसकी भूमिका उनकी कविता ‘चिट्ठी‘ में पहले ही बन गई थी कि- ‘‘मुझे याद आई/एक और भी चिट्ठी/जो बरसों पहले/मैंने दिल्ली में छोड़ी थी/पर आज तक/ पहुंची नहीं चकिया‘‘ या ‘गांव आने पर‘ कविता के इन शब्दों में- ‘‘जिनका मैं दम भरता हूं कविता में/और यही यही जो मुझे कभी नहीं पढ़ेंगे‘‘ केदार जी का आशय क्या है? उनके गांव वालों तक किताब-चिट्ठी पहुंचना, ऐसा कौन सा मुश्किल था, जो नहीं हो सकता था? फिर गांव वालों तक किताब न पहुंच पाने में कारक कौन? केदारजी, गांववाले या स्वयं किताब (उसमें कही गई बात)? दिवंगत केदार जी के प्रति पूरी श्रद्धा के बावजूद- क्या उन्हें लगने लगा था कि उनकी बात साहित्य प्रेमियों, समीक्षकों, साहित्य अकादमी, ज्ञानपीठ पुरस्कार देने वालों के समझ में तो आती है लेकिन इस भाषा-शैली में कही गई कविता की बातें उनके गांववालों तक पहुंच पाएगी? (उनकी कई बातें-कविताएं मुझे भी अबूझ लगीं तब सोचा कि क्या मैं भी उनके गांववालों की तरह हूं?) उनकी कविताई बातें अपने ही गांववालों के लिए बेगानी होती चली गई है? क्या इस समर्पण-कथन में उन्हें यही अफसोस साल रहा है? अपने पर इस तरह का भरोसेमंद संदेह, केदार जी जैसा कवि ही कर सकता है। साहित्य अकादमी पुरस्कार के अवसर पर उनके वक्तव्य में भी उल्लेख है कि अपने गांव के अनुभव में पके कर्मठ किसान के ‘कुछ सुनाओ‘ कहने पर वे अवाक रह गए थे और कहते हैं- ‘मैं जानता हूं कि यह आज की कविता की एक सीमा हो सकती है, पर कोई दोष नहीं कि वह बूढ़े किसान को सुनायी नहीं जा सकती।‘

मनोहर श्याम जोशी कहते थे- ‘हर व्यक्ति के वास्तविक संसार और काल्पनिक या आदर्श संसार में गहरा अंतर होता है। वह जो होता है, वही तो नहीं होता जो होना चाहता है या जो उसने चाहा था। जो उसने होना चाहा, उसकी कविताएं हो जाती हैं।‘ शायद ऐसी ही होने लगी थीं उनकी कविताएं। ‘बंटवारा‘ की पंक्तियां हैं- ‘‘कि यह जो कवि है मेरा भाई/जो बरसों ही रहता है मेरी सांस/मेरे ही नाम में/अच्छा हो, अगली बरसात से पहले/उसे दे दिया जाय/कोई अलग घर/कोई अलग नंबर।‘‘ स्वयं को निरस्त करने का दुर्लभ साहस लेकिन उनमें दिखता है, जब वे कहते हैं- ‘‘जो लिखकर फाड़ दी जाती हैं/कालजयी होती हैं/वही कविताएं।‘‘ या ‘‘कविताएं करा दी जाएं प्रवाहित/किसी नाले में‘‘ और मानों वसीयत लिख रहे हों- ‘‘और सबसे बड़ी बात मेरे बेटे/कि लिख चुकने के बाद/इन शब्दों को पोंछकर साफ कर देना‘‘ लेकिन उन्हें उम्मीद है कि- ‘‘पर मौसम/चाहे जितना खराब हो/उम्मीद नहीं छोड़ती कवितायें‘‘।

बहरहाल उनकी पुण्य स्मृति को समर्पित- ‘‘मेरे गांव की मतदाता सूची में/नहीं है आपका नाम/न था, न होगा/इसलिए/आपका राशन कार्ड भी/यहां नहीं है/न आधार कार्ड/इस मामले में आप वैसे ही हैं/जैसा किसी चकिया के लिए मैं/न रहने के बाद भी/मैं हूं कही न कहीं/और कुछ न कुछ/वहां भी/ठीक वैसे ही/जैसे न होने के बाद भी/आप अपनी कविताओं में हैं, वैसे के वैसे।‘‘ उन्हें समर्पित मेरी ये पंक्तियां, मात्र संयोग है कि उनके द्वारा तैयार की गई अंतिम पांडुलिपि, जो अब प्रकाशित है, का शीर्षक ‘मतदान केन्द्र पर झपकी‘ है। इसी शीर्षक वाली कविता की अंतिम पंक्तियां है- मैंने खुद से कहा/अब घर चलो केदार/और खोजो इस व्यर्थ में/नया कोई अर्थ।