Monday, August 17, 2026

रघु राय

दहाई साल बीतने को आया, यादें अब भी ताजा हैं। रघु राय और जतिन दास का रायपुर प्रवास। वे समय ले कर आए थे। अपने शिष्य नागपुर वाले शेखर सोनी के आग्रह पर उन्हें रामनामियों से फिर से मिलने जाना था। यात्रा में शिवरीनारायण और सिरपुर भी शामिल हुआ तो मैं भी जुड़ गया। गाड़ी रुकती तो उनका कैमरा ठहर जाता, चलती गाड़ी में शीशे के भीतर से भी बार-बार क्लिक करते रहते। शायद प्रभाव और संभावना का अनुमान लगाते। पूरी यात्रा में शास्त्रीय भजन और सूफी गीत बजते रहे, वे ताली पर ताल देते साथ गाते गुनगुनाते रहे। जतिन दास के साथ उनकी जोड़ी के क्या कहने। जतिन दा को छेड़ते, उनकी बातों का जवाब देते, जिनमें हर बार ऐसा गुदगुदी होती कि उसके भीतर का चुटीलापन अखरे नहीं था। 

 
शिवरीनारायण पहुंचने के पहले महानदी के पुल पर गाड़ी रुकवाई। अंधेरा घिरने को, अप्रैल का महीना मगर बिजली चमक रही थी, बूंदाबांदी हो रही थी। फोटोग्राफी के लिए एमदम प्रतिकूल और तभी उनका कैमरा निकला, फोटो लेते रहे। शिवरीनारायण रेस्ट हाउस पहुंचने पर बत्ती गुल मिली। जैसा आमतौर पर सरकारी रेस्ट हाउस में होता है, चौकीदार का ठिकाना नहीं। किसी तरह कमरा खुला, मगर खाने का कोई इंतजाम नहीं। जतिन दा, बेहिचक, बिना समय गंवाए, शेखर जी को लेकर खरीदी करने निकले। जैसे तैसे पकाने खाने की व्यवस्था बनी। तब पता चला कि जतिन दा आले दरजे के बावर्ची हैं। रघु जी बरसती अंधेरी रात में कैमरा लेकर बाहर घूमते रहे। बिजली चमकती, नदी रोशन होती और उनका कैमरा क्लिक होता। न जाने कितनी तस्वीरें उन्होंने ली होंगी।
 

फोटोग्राफी के बारे में शायद ही कोई बात करते, अक्सर शांत, चेहरे पर मुलायम सी मुस्कान, एक इंच से भी कम। मुस्कान, जो आंखों में और तनाव रहित चेहरे के कारण उभरती थी। साथ समय बिताते समझ में आता कि वे ऐसे नामचीन हैं, जो अपनी गरिमा और मर्यादा बनाए, सामने वाले को सहज रख सकते हैं। पत्रिकाओं में उनके लिए फोटो एडिटर पद का सृजन और समाचारों के लिए फोटोग्राफी पर बात करने पर उन्होंने अपने कैरियर के शुरुआती दिनों को याद करते हुए बताया कि अखबार के लिए फोटोग्राफी करते हुए, किसी बैठक की तस्वीर लेनी होती थी। यों यह सबसे आसान और फटाफट वाला काम होता था, लेकिन वे वे बैठक में हो रही बातचीत, मुद्दों, नरम-गरम को ध्यान से सुनते और कोशिश करते कि ऐसा क्षण क्लिक हो, जो बैठक की चर्चा की खबर से अधिक प्रभावी अभिव्यक्त हो। 

शिवरीनारायण, सिरपुर के मंदिरों के लिए उन्होंने कैमरा छुआ भी नहीं, बस देखते सराहते रहे। जतिन दा की कला-पारखी दृष्टि, जो स्मारक के काल-भेद को कला-शैली के आधार पर आसानी से बूझते गए, मगर रघु जी शांत भाव से मानों बस रस पीते रहे। हां, किसी तरह की हलचल हो, जीवन हो, गाय या कुत्ता बैठा हो, पूंछ हिला रहा हो, तब कैमरे पर उनकी उंगलियां तुरंत थिरकने लगती थीं। मुझे समझ में आया कि ऐसा कोई स्थिर दृश्य, जो कभी भी क्लिक किया जा सकता है, उन्हें दिलचस्पी नहीं होती थी, जहां गति हो स्पंदन हो या किसी स्थिर दृश्य पर क्षणिक कौंध हो, वे वही क्लिक करना चाहते हैं। ऐसा अनूठा, जिसे पकड़ना मुश्किल हो, भूतो न भविष्यति हो। जब यह बात मैंने उनसे साझा की, उनकी मुस्कान ने मुझे बता दिया कि वे मेरी कोई कैंडिड तस्वीर जरूर लेंगे और ऐसा हुआ भी। 

मैंने उनसे सत्यजित रे की चौंकी हुई फोटो, मदर टेरेसा, कलकत्ता पूजा, इंदिरा गांधी आदि की याद दिलाई, इस पर बस हां-हूं करते रहे। उनके लौटने के बाद मेरे पास एक लिफाफा आया, जिसमें उनकी प्रयाग कुंभ वाली किताब और शिवरीनारायण के केशवनारायण मंदिर के सामने जतिन दा के साथ बैठे हुए मेरी, उनकी ली हुई, हस्ताक्षरित तस्वीर थी। 
जाते जाते उन्होंने दिल्ली आने पर अपने फार्म हाउस पर रुक कर साथ समय बिताने का प्रस्ताव दिया था। कुछ ऐसे प्रस्ताव होते हैं, जिनका प्रबल आकर्षण होता है, मगर कहीं उसे बने रहने देना अधिक समझदारी होती है, मैंने इस प्रस्ताव पर वही समझदारी दिखाई और अब उनका यह प्रस्ताव (उनके न रहने पर पहला विश्व फोटोग्राफी दिवस) मेरे लिए अमर हो गया। 

यहां आई तस्वीरें रघु राय, शेखर सोनी और रूपेश यादव द्वारा ली हुई

Sunday, August 16, 2026

छत्तीसगढ़ी काव्य पर विहंगम दृष्टि

75 पार रामेश्वर शर्मा जी छत्तीसगढ़ी के मूर्धन्य साहित्य-सेवियों में हैं, उतने ही निष्ठावान सायकिल-साधक। पचासेक सालों से निरंतर सक्रिय। छत्तीसगढ़ी काव्य पर उनकी नजर लगातार बनी रहती है और उसका परिणाम है, यह पुस्तक- छत्तीसगढ़ी काव्य, एक विहंगम दृष्टि (छत्तीसगढ़ी काव्य विधा अद्यतन)। पुस्तक में छत्तीसगढ़ी के 300 से अधिक कवियों की रचनाओं को विभिन्न शीर्षकों के अंतर्गत वर्गीकृत किया गया है- यथा, बाल-साहित्य, वीर रस, हास्य रस, व्यंग्य, दोहा-चौपाई-कुण्डलियां, वार्णिक छंद, कविता, मुक्तक, ग़ज़ल, मुक्तछंद और गीत। संग्रह में क्षणिका का उल्लेख है किंतु कुछ प्रयोगधर्मियों ने छत्तीसगढ़ी में हायकू भी आजमाया है, उसे यहां जगह नहीं मिली है। इसी प्रकार इस दौर के लोकप्रिय और चर्चित मंचीय कवि मीर अली ‘मीर‘ यहां शामिल नहीं हैं। यों, मेरी जानकारी में छत्तीसगढ़ी काव्य को इस प्रकार वर्गीकृत करते, विभिन्न प्रमुख कवियों का उदाहरण लेते यह पहला प्रकाशन है। 

संग्रह के मुखपृष्ठ और अंदर के पृष्ठों पर भी रामेश्वर शर्मा नाम के साथ संपादक या संकलनकर्ता उल्लेख होना चाहिए था, जो नहीं है। पुस्तक के आरंभिक ‘स्वकथन‘ में उन्होंने जरूर स्पष्ट किया है कि ‘इसमें जो रचनाएं हैं, उन्हीं रचनाकारों की हैं। इसमें मेरा कोई हस्तक्षेप नहीं है, इन सभी रचनाकारों की रचना संकलित कर छत्तीसगढ़ी काव्य को एक विहंगम दृष्टि के लिए पाठकों को समर्पित है।‘ उन्होंने यह भी बताया है कि ‘जब इस पुस्तक में वरिष्ठ साहित्यकार की कमी लगी, तब ‘छत्तीसगढ़ के माटी चंदन‘ जिसका संपादन राकेश तिवारी ने किया है और ‘छत्तीसगढ़ी कविता के सौ साल‘ का संपादन डॉ. बलदेव किये थे। उसमें से रचनाकारों की रचना ली हैं।‘ 

पुस्तक के पहले अध्याय ‘छत्तीसगढ़ी काव्य के चितेरे‘ में जिन कवियों और उनकी पंक्तियों का उल्लेख है, वे इस प्रकार हैं- डॉ. हनुमंत नायडू, हरि ठाकुर, डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा, प्यारे लाल गुप्त, द्वारिका प्रसाद तिवारी ‘विप्र’, नारायण लाल परमार, कोदूराम ‘दलित‘, भगवती सेन, बद्री विशाल यदु ‘परमानंद‘, हेमनाथ यदु, पद्मश्री श्याम लाल चतुर्वेदी, रविशकर शुक्ल, पण्डित दानेश्वर शर्मा, डॉ. विमल कुमार पाठक, मेहतर राम साहू, रामेश्वर वैष्णव, डॉ. जीवन यदु ‘राही‘, मुकुन्द कैशल, लक्ष्मण मस्तुरिया, डॉ. देवधर दास महंत, डॉ. चितरंजन कर, श्रीमती डॉ. निरुपमा शर्मा, श्रीमती दीप दुर्गवी, बुधराम यादव, डॉ. पीसी लाल यादव, डॉ. सन्तराम देशमुख ‘विमल‘, सीताराम साहू ‘श्याम‘, सुशील यदु, बसंत यदु, शिव कुमार यदु ‘शिकुम‘, बंधु राजेश्वर खरे, रमेश विश्वहार, रूपेश तिवारी, हबीब समीर, किशोर तिवारी। 

इस क्रम के अंत में वे स्वयं इन शब्दों में हैं- ‘रामेश्वर शर्मा छत्तीसगढ़ी एवं हिंदी के कवि-गीतकार, ग़ज़लकार, अनुवादक, समीक्षक, स्तंभकार, पत्रकार के रूप में जाना जाता हूँ। दैनिक अमृत संदेश में लगभग पाँच वर्ष तक ‘जाती मिलाती‘ नाम से स्तंभ लिखा। इनके द्वारा लिखे गीत को गायक-गायिकाओं ने गाया है। आकाशवाणी और दूरदर्शन से भी गीत प्रसारित हुआ। छत्तीसगढ़ी फिल्म के लिए गीत लिखा। कवि सम्मेलनों में काव्य पाठ किया। एक गीत, जिसमें गाँव का वर्णन है। उसका मुखड़ा और अंतिम अंतरा प्रस्तुत है- 
नदिया नरवा ढोडगा बीच मा मोर गंवई गांव हे। 
बर पीपर आमा के संगी सरग अइसन छांव हे। 
मंदिर देवाला चारो खूंट मा तुलसी चौरा आंगन मा, 
बद्री, द्वारिका, जगनाथ, रामातार अंतस पावन मा, 
तीरथ धाम सबो ले भव्य दाई-दादा के पाँव हे। 

पुस्तक के कॉपीराइट, इंप्रिंट पेज पर द्वितीय संस्करण, 2024 (संशोधित एवं परिवर्धित) छपा है, किंतु प्रथम संस्करण की जानकारी नहीं है। पुस्तक के अंत में दिए गए लेखक के परिचय से पता चलता है कि इस पुस्तक का प्रथम संस्करण 2022 में हुआ। अच्छा होता कि पुस्तक में छत्तीसगढ़ी कविता के इतिहास पर परिचयात्मक संक्षिप्त जानकारी होती और इसमें शामिल कवियों की सूची-अनुक्रमणिका दे दी जाती। पुस्तक के आरंभ में ‘गोल्डन बुक आफ वर्ल्ड रिकार्ड्स‘ का प्रमाण-पत्र छपा है, इस पर बस यही कह सकते हैं कि गिनीज बुक के बाद लिम्का बुक और इस तरह के रिकार्ड्स वाली जाने कितनी संस्थाएं अपना काम कर रही हैं, मगर इस पुस्तक को ऐसे किसी प्रमाण-पत्र की जरूरत नहीं है। 

सुदीर्घ अनुभव से तैयार की गई पुस्तक में स्वाभाविक ही यह संभव है कि रुचि, पसंद और उपलब्धता सीमा रही हो, मगर संदेह नहीं कि छत्तीसगढ़ी साहित्य अध्ययन के क्षेत्र में यह पुस्तक मील का पत्थर है।

Friday, August 14, 2026

बरसों बरस बनारस

एक गेरुआ सबेरा। कुछ पुराने और आगे आने वाले दिन।
बरसों से बनारस जाता रहा हूं, अब की कुछ बरस बाद गया, किस बरस? महाकाल की नगरी, कालातीत!


सुबह-ए-बनारस
पौने सात बजे
लंका चौमुहानी
ट्रैफिक जाम
लोग सौहार्दपूर्ण, धीरज धरे
दो पुलिस वाले और तीन नागरिक
व्यवस्था बनाने में सक्रिय।

तुलसी घाट, कबीरचौरा और भारतेन्दु भवन के बाद 
सुंघनी साहू,           बाबा जी दांत वाले में सांप्रदायिक जोग

किसी साथी ने कहा था- ‘ऐसा नहीं लगता कि बनारस ओवर रेटेड है?‘
किसी ने कहा था, ‘बनारस का एक हिस्सा बदलाव को अपना कर मर रहा है और एक हिस्सा उसे न अपना कर।‘

मृत्यु की प्रतीक्षा में जीवन, बेखबर जीवंत। लोक और शास्त्र, शाश्वत और नश्वर की संधि पर स्थित सनातन आनंद कानन काशी। श्रद्धा और भय के बीच अनुशासित बाबा कीनाराम की गद्दी।

गोपालजी, प्रधानमंत्री वाला ऑटो चलाते हैं। उनके भाड़ा बताने पर बिना मोल-भाव हम तैयार हो गए, तो शायद उन्हें लगा कि 50 के बदले 60 कहना था, कहने लगे जो मुनासिब है वही कहेंगे, आगे आपकी मर्जी। हमने सोचा कि रिजर्व जा रहे हैं, 60 ही दे देंगे। लंका चौमुहानी पर पहलवान लस्सी की अब चार दुकानें हैं, सवारी से आपसदारी न हो तो क्या बनारस? उन्होंने लस्सी की रिपोर्ट ले ली। उनके पूछने पर हमने बताया कि दही कुछ खट्टी थी, अब सामने मथकर भी नहीं देते, रेडीमेड है, उन्होंने आटो मोड़ते हुए दुकान के सामने रोका और चलते-चलते हमारी तरफ से लस्सी वाले से शिकायत दर्ज कराई। हॉस्पिटल गेट वाले सीताराम को याद किया तो उन्होंने कहा कि आप तो सब जानते ही हैं, मिश्राम्बु, केसरिया, रामनगर, कचौड़ी गली की लस्सी अब भी वैसी ही है। फिर बताया खोजवां में रहते हैं, मेरी जिज्ञासा का पहला शब्द ‘खराद‘ सुनते ही वहां बनने वाले लकड़ी के खिलौने और खराद के इतिहास पर संक्षिप्त प्रकाश डाला। भाड़ा देते हुए मेरे पास 100 का नोट था, उनके पास फुटकर न था, इसलिए अपने पास फुटकर टटोला, चार 10 के नोट और एक 5 का सिक्का था, उन्होंने राजी-खुशी न सिर्फ स्वीकार किया, मुझे आश्वस्त भी किया कि बाकी के 5 फिर कभी।

दीक्षितजी टैक्सी वाले मिले। किसी को फोन पर समझाने लगे- मोड़वा पर, मनोजवा क दुकनिया... वा और या उपसर्ग-प्रत्यय के साथ अपनी बातों में लय रचते, पता लग जाता, समझाइश है, मार्गदर्शन या फटकार। अपनी बात उन्हें पांच बार दुहरानी पड़ी, मगर सुर में दुहराव नहीं, हर बार नयापन, ताजगी। उनसे संकटमोचन संगीत समारोह का सुझाव भी मिला। ट्रैफिक और भीड़ पर कहते हैं, दो-तीन कट्ठा जमीन यहां हर कोई लेना चाह रहा है, राजधानी बनेगा। और सब भीड़ टूरिस्ट की है, ये दर्शनार्थी थोड़े न हैं। मेरे लिए वाहन का इंतजाम करने बेताब, बाबतपुर रास्ते में दो किलो लाल पेड़ा दिलवाने का आग्रह। जब कभी आएं याद कीजिएगा का वादा लिया। 

गोदौलिया से दशाश्वमेध। सड़क, पर दुकानों, पैदल के लिए बचते-संभलते...पेनको और जहरलाल-पन्नालाल को कोई कैसे भूल सकता है। मोंगा अब रहा न होगा, मगर यह जान कर अच्छा नहीं लगेगा, इसलिए पता नहीं किया। काली-मंदिर, दशाश्वमेध से प्रवेश वाली गली ज्यों की त्यों मिली। मान लिया कि काली मंदिर के बगल वाली मिष्ठी दही और लकड़ी के ठप्पे से कपड़े पर छपाई काम वाली दुकान भी जस की तस होगी। गली की दुकान पर मैंने पूछा, चौड़ी मोहरी वाला पाजामा, कर्मचारी ने पाजामा दिखाया, समझ में आया कि उसके लिए चौड़ा यानी जो चूड़ीदार न हो, मैंने खड़े हो कर अपना पाजामा दिखाया, मुस्कुरा कर उसने बुजुर्ग दुकानदार की ओर इशारा कर के कहा, बाबूजी की तरह, लिफाफा! बस एक पीस ही रह गया है, देख लीजिए। बात आगे बढ़ी। दुकानदार से मैंने कहा, पहले एक बंगाली दादा होते थे, आपकी जगह बैठते थे। कहा, हमारे मामा, अब नहीं रहे। उनसे कहा, लखनऊ चिकन का कुरता दिखाइए, उन्हें बात पसंद नहीं आई, मैंने भांप कर कहा अच्छा, बनारसी सिल्क होगा, वे दिखाने लगे, मेरे ऐसा वैसा कहते, ठीक न बता पाने पर सुझाया कि जो बांस कागज वाले रंग का आता है, वो? मेरी हामी पर कहा, फिर ऐसे कहिए कि काशी सिल्क चाहिए। 

ज्ञानवापी (अब गेट नं 4) पर पांडेयजी मिले, मेहरबान थे, 1769 और 1777 का रानी अहिल्याबाई के साथ का बाबा विश्वनाथ का इतिहास बताया। दर्शन के लिए जाएं तो क्या देखें, ध्यान दें, समझाया। मस्जिद में 1990 के बाद जाने की मनाही हो गई, बताया। ड्यूटी पर बड़ी संख्या में तैनात पुलिस बल। एक युवा सिपाही के माथे पर संक्षिप्त त्रिपुंड, उस पर ऊँ छाप। सूने कोने पर तैनात वाले मोबाइल स्क्रीन पर व्यस्त। पांडेय, तिवारी, मिश्रा, चौबे, एकाध सिंह, सोनकर, यादव भी।

एक खास दुकान होती थी, टिकठी-गोटेदार चुनरी सजी। पहले-पहल ध्यान जाने पर कभी वहां ठिठका था। अंतिम संस्कार की सजी दुकान, बस एक मुरदे की कमी। ‘मौत और ग्राहक का कोई भरोसा नहीं, कब आ जाए’, लेकिन यहां तो ग्राहक आएगा किसी मौत के साथ, मौत का ही भरोसा। मेरे मन में ‘किं आश्चर्यम्।‘ इसमें नाम तो मजेदार है ही Pandit Readymade छपा है, जिसके वास्तविक आशय का अनुमान शायद ही कोई लगा सके।

Pandit Readymade का मतलब तो यही समझ में आता है, लेकिन है कुछ अलग. ऐसी एक पुरानी दुकान इसके बगल में है और यह पहले रेडीमेड वस्त्रों की दुकान हुआ करती थी, बगल की दुकान की बिक्री देख कर इस दुकानदार को एक और ऐसे दुकान की संभावना दिखी, तब रेडीमेड कपड़ों की दुकान इसमें बदल लिया। दुकान का पुराने नाम, प्रतिष्ठा से पहचान भी बनाए रखना था फिर दुकानदार ने माना कि यह भी तो रेडीमेड तन-आवरण की दुकान है, पहले जीते-जागते के लिए अब मुरदों के लिए, तो फिर क्यों न नाम यही चलने दिया जाय। फ्यूनरल पार्लर! अंतिम क्रिया/दाह संस्कार के साथ पार्लर शब्द का प्रयोग कोई फक्कड़ भारतीय चेतना ही कर सकती है।

प्रवास के दौरान दिल्ली के विपिन गर्ग जी मिले, बनारस असर श्रद्धा-सिक्त। बड़ा गणेश-लोहटिया की गली में व्योमेश के लिए भटकते, ठक-ठुक-ठन-भड़ाम की ताल सुनते निराला, नागरी प्रचारिणी और रूपवाणी के युवा साथी। व्योमेश को शायद नहीं जाना है, मगर आसन लगाए हैं, मैं बातें जल्दी समेटने की कोशिश में कि उनके निर्धारित कार्यक्रम का समय हो रहा है। मेरी बेचैनी भांप कर बताया कि तापस को रवाना कर चुके हैं, बस हो गया, बैठकी निर्विघ्न। पुरातत्व वाले अपने जात-सगा कौशाम्बी वाले जी.आर. शर्मा जी (के सुपुत्र के साथ उन) की स्मृतियां। पुरातत्व की नई पीढ़ी सुनीता, रूपनारायण, शंभू, नीलम मिले। दिवाकर, गायत्री जी, लक्ष्मण जी से मिलना, इस बीच कलापिनी जी यहां है, बात हुई, मगर उनको सुनना रह गया।

बनारस से लौटते, चाह कि बहुत कुछ छूटा रहे, अगली बार के लिए।

बनारस पर और भी-