Friday, September 25, 2026

रजत छत्तीसगढ़

2025-26, छत्तीसगढ़ राज्य गठन का रजत जयंती वर्ष। सरकार के लिए जश्न का मौका। जोर-शोर से तैयारियां शुरू हुईं। कुछ आपसी लोग, जो सरकार से सीधे या परोक्ष रूप से जुड़े हैं, मुझसे संपर्क कर बताया कि इन वर्षों की (सरकारी) सांस्कृतिक यात्रा पर मुझे लिख कर देना है। लिखने का उत्साह न होने के बावजूद कर्तव्य निर्वाह और आपसी संबंधों के माध्यम से आई बात रखने के लिए एक नोट तैयार किया और इस शर्त के साथ भेज दिया कि उपयोगी हो तो इसे बिना नाम के या किसी अन्य के नाम से भी इस्तेमाल किया जा सकता है। यह किसी काम का हुआ हो, संभव है छपा हो। 

इस बीच पत्रकार श्री अमित चौहान ने इस विषय पर बात करना चाहा, मेरी उदासीनता पर उनका उत्साह भारी पड़ा, छत्तीसगढ़ी में हुई एक घंटे से भी अधिक की बातचीत उन्होंने रिकॉर्ड कर ली, जिसका एक अंश ‘स्वदेश‘ में छपा है, जो यहां दे रहा हूं। इसी क्रम में वह नोट भी याद आया, संयोगवश मिल गया, अब लगा वह भी प्रस्तुत किया जा सकता है। सो, पहले वह नोट, उसके बाद स्वदेश में प्रकाशित साक्षात्कार- 

छत्तीसगढ़ राज्य में संस्कृति विभाग के अंतर्गत संचालनालय बना, वह प्रशासकीय आसानी और स्थापना व्यय नियंत्रित करने वाला था। इस संचालनालय में संस्कृति, राजभाषा, पुरातत्व, संग्रहालय, अभिलेखागार, गजेटियर, पर्यटन सभी एक साथ थे। बंटवारे में एक खास बात यह थी कि मध्यप्रदेश के दौरान संस्कृति के लगभग सारे काम सीधे संस्कृति विभाग के बजाय विभिन्न परिषद और अकादमियों के माध्यम से होता था, यथा- साहित्य परिषद, कला परिषद, आदिवासी लोक कला परिषद, कालिदास अकादमी, चक्रधर कत्थक केंद्र, उर्दू अकादमी आदि। बंटवारे में तय हुआ कि विभाग का निर्धारित हिस्सा छत्तीसगढ़ में जाएगा, जैसा कि हुआ भी। मगर परिषद, अकादमियों आदि के लिए तय हुआ कि जो जहां स्थापित है, वहीं रहेगा। छत्तीसगढ़ के हिस्से में तब सिर्फ एक पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी सृजन पीठ था, जो पहले अध्यक्ष डॉ. प्रमोद वर्मा के बाद से बंद-सा पड़ा था, वही एक छत्तीसगढ़ के हिस्से में आया।

संस्कृति-पुरातत्व की गतिविधियां आरंभ हुई साथ ही विभागीय नीति तैयार करने पर भी काम शुरू हुआ। संस्कृति नीति 2001 घोषित की गई जिसके अंतर्गत विभागीय गतिविधियों को नया आयाम दिये जाने का प्रयास आरंभ हुआ। स्पष्ट किया गया कि राज्य की कोई विशेष या औपचारिक नीति के स्थान पर परम्पराओं एवं मान्यताओं का समावेश एवं उनका पोषण एवं संवर्धन करना है, इसलिए संस्कृति नीति में सांस्कृतिक उद्‌देश्यों की परिकल्पना पर ज्यादा जोर दिया गया। नीति, जिसे संकल्प भी कहा गया, में कहा गया कि राज्य अभिलेखीय एवं गैर अभिलेखीय परंपराओं के आधार पर संस्कृति को परिभाषित करेगा। राज्य समुदायों के अंतर्पारस्परिक संबंधो को बनाये रखने एवं उनके मध्य समन्वय स्थापित करने का प्रयास करेगा, इसे अतिरिक्त सीमावर्ती पडोसी राज्यों के, छत्तीसगढ़ राज्य के साथ सांस्कृतिक संबंधों की नये परिपेक्ष्य में व्याख्या की जायेगी। राज्य की बोलियों को प्रोत्साहन देने हेतु वाचिक परंपराओं और साहित्य का अभिलेखन, विश्व की दूसरी बोलियों, समुदायों के मध्य संबंधों को प्रोत्साहित किया जायेगा। संस्कृति के ज्ञान का संचयन एवं उसका उपयोग समग्र रूप से एक सतत प्रक्रिया के रूप में देखे जाने पर जोर दिया गया। 

विभागीय नीति-संकल्प के साथ विभाग ने अपने क्रियाकलाप में शामिल किया- साहित्य एवं कला का विकास, सांस्कृतिक परम्परा का संरक्षण, ललित कला तथा संगीत शिक्षा को प्रोत्साहन, पुराने अभिलेखों का संरक्षण, संवर्धन, ऐतिहासिक महत्व के स्मारकों का संरक्षण तथा संग्रहालयों का विकास, शासकीय कार्य में हिन्दी भाषा का प्रयोग तथा उसके विकास संबंधी कार्य, शैक्षणिक संस्थाओं में हिन्दी भाषा का प्रयोग तथा उसके विकास संबंधी कार्य, जिला/राज्य गजेटियर का उत्पादन और पुनर्मुद्रण, सिनेमा अधिनियम के तहत नये सिनेमागृहों को लायसेंस, अर्थाभावग्रस्त कलाकारों/साहित्यकारों को पेंशन व आर्थिक सहायता, अशासकीय सांस्कृतिक संस्थाओं को प्रोत्साहन व आर्थिक सहायता, चयनित कलाकारों/साहित्यकारों/विद्वानों को सम्मानित करने का कार्य, कला, संस्कृति एवं ऐतिहासिक विषयों के दुर्लभ एवं प्रामाणिक ग्रंथों, दस्तावेजों, स्मृति चिन्हों का संग्रह, प्रकाशन, प्रदर्शन तथा संबंधित व्याख्यान, संगोष्ठियों आदि का आयोजन और इनके साथ छत्तीसगढ़ राज्य की संस्कृति का समग्र विकास । 

पुरातत्व के क्षेत्र में स्मारकों का संरक्षण एवं पर्यटन को बढ़ावा देने को इस नई नीति का विशिष्ट अंग माना गया। समुदायों के जैव सांस्कृतिक तत्व तथा उनके मध्य परिवेशीय अंतःसंबंध को एक नया आयाम देते हुये यह प्रयास, संस्कृति को संपूर्ण रूप से एक तत्व मानकर, उसका संवर्धन एवं परिवर्धन, शोध संगोष्ठी एवं विभिन्न उत्सवों के माध्यम से संस्कृति के निरंतर प्रवाह को बनाये रखना ही नयी संस्कृति नीति का सार कहा गया। नीति के इस आरंभिक स्वरूप और गतिविधियों में आगे परिवर्धन होता रहा। 

राजकाज की शुरुआत का दौर था। संस्कृति और सांस्कृतिक आयोजन प्रकटतः अतएव प्राथमिकता के होते हैं, तब पूरे संचालनालय का अमला इन्हीं कामों में लग जाता था, जो कमोबेश स्थिति लंबे समय तक बनी रही। पर्यटन अलग हुआ और स्वतंत्र मंडल गठित हो कर काम करने लगा। गजेटियर के लिए प्रशासनिक अधिकारी अध्यक्ष बनाए गए, मगर स्वतंत्र रूप से गजेटियर के काम खास प्रगति नहीं हुई। इसका एक कारण, नये-नये जिलों का बनना था, दूसरी तरफ छोटे जिला इकाइयों के लिए आंकड़े तो पृथक हो सकते थे, इतिहास-भूगोल जैसे खंडों में जानकारी बांटना व्यावहारिक नहीं होता। इंटरनेट और सूचना तंत्र का विकास भी एक कारण बना। यह भी चर्चा रही कि अब ‘मानव विकास प्रतिवेदन‘ पर्याप्त होगा, पृथक-पृथक जिला गजेटियर अप्रासंगिक होंगे। 

सांस्कृतिक कार्यक्रमों की धूम रही। मध्यप्रदेश के दौरान संभागीय उत्सव और समय-समय पर प्रसंगों के आयोजन हुआ करते थे। छत्तीसगढ़ में रामगढ़-सरगुजा, चक्रधर-रायगढ़ और मल्हार महोत्सव प्रमुख थे। राज्य गठन के बाद विभिन्न मेलों, पर्व के अवसर पर उत्सव महोत्सव होने लगे, जिनमें सबसे प्रमुख राजिम मेला महोत्सव, कुंभ कल्प जैसे बदलते नामों के साथ आयोजित होता रहा। अब विभागीय सूची के अनुसार इन सांस्कृतिक उत्सव, महोत्सव, मेला-मड़ई की संख्या 89 हो गई है। इस क्रम में सर्वाधिक उल्लेखनीय राज्य स्थापना दिवस पर राज्योत्सव का आयोजन है। प्रतिवर्ष राज्योत्सव के आयोजन का स्वरूप व्यापार मेला जैसा भी होता है। राज्योत्सव में विभिन्न विभागों के पवेलियन, फन-फूड तो होता ही है। बड़े फिल्मी अभिनेताओं, गायक-संगीतकारों की प्रस्तुतियों का आकर्षण होता है। इसके साथ इस अवसर पर दिए जाने राज्य सम्मान, जिनकी संख्या आरंभिक वर्षों में दर्जन भर भी नहीं थी, अब तीन दर्जन है। 

अब संस्कृति विभाग के अंतर्गत ही पूरे दर्जन भर सम्मान हैं, जिनमें साहित्य/आंचलिक साहित्य के क्षेत्र में पं. सुन्दरलाल शर्मा सम्मान, कला/शिल्प कला के क्षेत्र में चक्रधर सम्मान सम्मान, लोक कला के क्षेत्र में दाऊ मंदराजी सम्मान, हिन्दी/छत्तीसगढ़ी सिनेमा में रचनात्मक लेखन, अभिनय, पटकथा निर्माण तथा हिन्दी/छत्तीसगढ़ी सिनेमा में सर्वश्रेष्ठ फिल्म निर्देशन के क्षेत्र में क्रमशःराज्य और राष्ट्रीय स्तर के किशोर साहू सम्मान/अलंकरण, प्रदर्शनकारी छत्तीसगढ़ी लोक कला के क्षेत्र में देवदास बंजारे स्मृति पुरस्कार, देश के बाहर उल्लेखनीय कार्य के क्षेत्र में छत्तीसगढ़ अप्रवासी भारतीय सम्मान, साहित्य/आंचलिक साहित्य के क्षेत्र में लाला जगदलपुरी पुरस्कार, लोक शैली पंथी नृत्य प्रदर्शनकारी कला के क्षेत्र में देवदास बंजारे पंथी नृत्य पुरस्कार, छत्तीसगढ़ी/हिन्दी/ अन्य भाषा नाटक, रूपंकर कलाएँ, रंगकर्म के क्षेत्र हबीब तनवीर सम्मान, छत्तीसगढ़ी लोक संगीत के क्षेत्र में खुमान साव सम्मान सम्मान राशि रू. 1.00 लाख तथा छत्तीसगढ़ी लोकगीत के क्षेत्र में लक्ष्मण मस्तुरिया सम्मान दिया जा रहा है। 

जैसाकि प्रत्येक सम्मान के साथ होता है, घोषणा के बाद प्रतिक्रियाएं आती हैं, लेकिन इसमें संदेह नहीं कि इन सम्मानों के कारण राज्य की प्रतिभाओं का सम्मान, प्रेरक और उत्साहवर्धक हुआ। उल्लेखनीय कि यह आयोजन नवंबर पहले सप्ताह में होता है और यही चुनावी सालों में आचार-संहिता का समय, इसलिए उन वर्षों में स्थगित होता है तथा किन्हीं अन्य वर्षों में उपचुनाव वाले क्षेत्रों के कारण प्रभावित होता है। राज्य निर्माण के बाद राष्ट्रीय पुरस्कार-सम्मान की दृष्टि से खासी उपलब्धियां छत्तीसगढ़ के हिस्से आईं। जिनमें पद्म पुरस्कार, संगीत नाटक अकादेमी तथा अन्य पुरस्कारों में भी राज्य की प्रतिभाओं का नाम दर्ज हुआ। 

राज्य में साहित्य, संगीत, नृत्य, रंगमंच, चित्रकला. मूर्तिकला, सिनेमा और आदिवासी एवं लोककलाओं की शासन की नीतियों के अनुरूप सम्मान, विस्तार, प्रोत्साहन और संरक्षण करने के उ‌द्देश्य से श्छत्तीसगढ़ संस्कृति परिषद् गठित है, जिसके अंतर्गत साहित्य अकादमी, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी सृजनपीठ, श्रीकांत वर्मा पीठ, गुरु घासीदास शोध पीठ, कला अकादमी (चक्रधर कत्थक केन्द्र रायगढ़), आदिवासी एवं लोक कला अकादमी (नाचा केन्द्र राजनांदगांव), छत्तीसगढ़ फिल्म विकास निगम, छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग, छत्तीसगढ़ सिंधी अकादमी ईकाइयां हैं। 

राज्य के बाहर आयोजित होने वाले समारोहों में कलाकारों की नियमित भागीदारी होने लगी वहीं देश की प्रतिष्ठित संस्थाओं, मंडलियों के आयोजनों के साथ-साथ संगीत नाटक अकादेमी और दक्षिण-मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र के विभिन्न आयोजन राज्य में होने लगे। ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत‘ के अंतर्गत गुजरात राज्य से सांस्कृतिक आदान-प्रदान हुआ। भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद, नई दिल्ली और उत्तरप्रदेश के संस्कृति विभाग के साथ सांस्कृतिक समझौता ज्ञापन हस्ताक्षर हुए। राजधानी दिल्ली के आयोजनों में समय-समय पर और अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेले में छत्तीसगढ़ राज्य दिवस का प्रतिष्ठापूर्ण आयोजन होने लगा, जिसमें छत्तीसगढ़ के दिल्लीवासी प्रतिष्ठित नागरिक, उच्चाधिकारी, विद्यार्थी और श्रमिक भी एकत्र होते हैं। केंद्र शासन के गीत नाटक प्रभाग तथा अन्य विभागों की योजनाओं के लाभ की स्थिति भी बेहतर हुई। इसके अतिरिक्त पावस प्रसंग, सफर मुक्ताकाश, शिल्प और कला प्रशिक्षण शिविर ‘आकार‘ जैसे विभागीय आयोजन और आइटीसी संगीत रिसर्च अकादमी के सहयोग से आयोजित सांगीतिक कार्यक्रम, ‘शतरूपा‘, ‘जाणता राजा‘ जैसे विभिन्न सफल और स्मरणीय हैं। ‘आजादी का अमृत महोत्सव’, ‘आदि परब‘, ‘जनजातीय गौरव दिवस‘, कुंभ मेलों में सांस्कृतिक भागीदारी जैसे उल्लेखनीय आयोजन हुए। सन 2006 गुरु घासीदास जी की 250 वीं वर्षगांठ के अवसर पर 18 से 31 दिसंबर तक पूरे राज्य में विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए गए साथ ही परिचयात्मक पुस्तिका प्रकाशित की गई थी। 

अन्य विभागों जैसे जन-संपर्क विभाग द्वारा आयोजित साहित्य महोत्सव, प्रतिवर्ष गणतंत्र दिवस पर झांकी और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों से राज्य कला-परंपरा के लिए नये अवसर बने। खेल-कूद युवक कल्याण विभाग तथा आदिम जाति तथा अनुसूचित जाति विकास विभाग द्वारा भी सांस्कृतिक आयोजन, प्रतियोगिताएं कराई जाने लगीं। कला-मंडलियों, कलाकारों, संस्थाओं आदि को वित्तीय सहायता और अनुदान दिया जा रहा है। 

पुरातत्व के क्षेत्र में अनुरक्षण, संरक्षण यानि प्राचीन स्थल-स्मारकों की मरम्मत और रख-रखाव, सर्वेक्षण और संग्रहालय संबंधी कार्य होते हैं, किंतु इनमें उत्खनन को पुरातत्व का पर्याय जैसा मान लिया जाता है। छत्तीसगढ़ में राज्य निर्माण के पहले पुरातात्विक खुदाई का काम सिरपुर, धनोरा, मल्हार, ताला, डीपाडीह, कलचा-भदवाही, गढ़धनोरा, भोंगापाल, करकाभाट जैसे स्थानों पर हुआ था। राज्य निर्माण के बाद इस दिशा में उल्लेखनीय महत्व के काम हुए, जिनमेे सिरपुर, सिसदेवरी, सिरकट्टी, अमलीडीह, पचराही, महेशपुर, मल्हार, मदकूदीप, तुरतुरिया, तरीघाट, राजिम, डमरू, देवरी, जमरांव, और रीवांगढ़ शामिल हैं। इन कामों के फलस्वरूप विभिन्न स्मारक और पुरावशेष प्रकाश में आए, जिनसे राज्य के प्राचीन इतिहास के गौरवशाली स्वर्णिम पृष्ठ उजागर हुए। विभिन्न तहसीलों का ग्रामवार सर्वेक्षण तथा नदी-घाटी संस्कृति, गढ़, गुरु घासीदास की रावटियां जैसे थीमेटिक सर्वेक्षण कराए गए। 

पुरातत्व की विभागीय शोध पत्रिका ‘कोसल‘ और संस्कृति, कला, साहित्य, परंपरा पर केंद्रित पत्रिका ‘बिहनिया‘ का निर्णय राज्य गठन के बाद आरंभ में ही ले लिया गया था। इन दोनों पत्रिकाओं के माध्यम से महत्वपूर्ण प्रकाशन हुए। साथ ही समय-समय पर विभागीय संगोष्ठी, प्रदर्शनी, आयोजनों, पुरातत्वीय स्थलों, संग्रहालय आदि से संबंधित प्रकाशन उपयोगी साबित हुए हैं। स्तरीय साहित्य और इतर लेखन को प्रोत्साहन देने के लिए वित्तीय सहायता का भी प्रावधान किया गया। छत्तीसगढ़ के प्राचीन इतिहास का सबसे विश्वसनीय स्रोत अभिलेख पर केंद्रित पुस्तक ’उत्कीर्ण लेख’ का पुनर्प्रकाशन किया गया था। 

रायपुर, बिलासपुर और जगदलपुर के विभागीय पुरातत्वीय संग्रहालयों के अलावा जिलों में पुरातत्व संघ के अधीन संग्रहालयों को विभागीय सहयोग से विकसित किया गया है साथ ही विभिन्न पुरातात्विक केंद्रों पर स्थल संग्रहालय भी स्थापित किए गए हैं। महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय परिसर में छत्तीसगढ़ के पारंपरिक व्यंजन और खान-पान का केंद्र ‘गढ़ कलेवा‘ बहुत लोकप्रिय हुआ है। संग्रहालय से संबद्ध ग्रंथागार शहीद स्मारक भवन में संचालित है, जो प्रतियोगी परीक्षार्थियों, शोधार्थियों, प्रबुद्ध और सामान्य पाठकों सभी के लिए उपयोगी है। बहुआयामी संस्कृति संस्थान की रूपरेखा बनी, विवेकानंद प्रबुद्ध संस्थान के निर्णय हुआ, इनके वांछित स्वरूप को आकार देने का प्रयास किया जा रहा है। स्वामी विवेकानंद के तरुण आयु में रायपुर प्रवास के बूढ़ापारा स्थित भवन को स्मारक विकसित किये जाने की योजना पर काम हो रहा है। 

एक महत्वाकांक्षी केंद्र ‘पुरखौती मुक्तांगन‘ विकसित हुआ। यह खुला संग्रहालय, राज्य की संस्कृति, परंपरा, पुरातत्व, पर्यावरण और जीव-सृष्टि की सन्निधि में विकास की कल्पना को साकार करने का केंद्र बनाने की योजना को मूर्त करने का उद्यम है। इसके महामहिम राष्ट्रपति महोदय द्वारा पुरखौती मुक्तांगन के प्रथम चरण का लोकार्पण किया गया, लोकार्पण समारोह में महामहिम राष्ट्रपति महोदय ने निर्माणाधीन इस योजना की सराहना की। लगभग 200 एकड़ परिक्षेत्र में फैला निरंतर विकासशील पुरखौती मुक्तांगन को ऐसे शैक्षणिक केन्द्र के रूप में विकसित करने का प्रयास है जिसमें राज्य की जनजातीय संस्कृति, कलाशिल्प, प्राकृतिक संरचना और भौगोलिक परिदृश्य, पर्यावरण और जैव विविधता को प्रदर्शित किया जाए। यहां भव्य प्रवेश द्वार, पर्यटन सूचना केन्द्र, पाथ-वे, माड़ियापथ, बैगा चौक, देवगुड़ी, छत्तीसगढ़ हाट, आभूषण पार्क, छत्तीस खम्भा चौक, जलपृष्ठीय रंगमंच, मनोरंजक उद्यानगृह, सरगुजा और बस्तर प्रखंड, राम वनगमन पथ, स्वतंत्रता सेनानियों की मूर्तियों का निर्माण, मुखौटे आदि हैं, जो जनरुचि का केंद्र बना हुआ है। 

विभाग द्वारा अभिनव योजनाओं के अंतर्गत छत्तीसगढ़ी पारंपरिक व्यंजनों के आस्वादन का अवसर सुलभ कराने का केंद्र ‘गढ़-कलेवा‘, छत्तीसगढ़ के पारंपरिक ज्ञान पद्धति से निर्मित उत्पादों के विक्रय हेतु विभिन्न संस्थाओं द्वारा अपने विक्रय पटल, छत्तीसगढ़ी पारंपरिक उत्पादों को देखने तथा स्मृतिचिन्ह के रूप में क्रय की सुविधा, गुजरात टूरिज्म बोर्ड, छत्तीसगढ़ पर्यटन मण्डल तथा दक्षिण मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र की छत्तीसगढ़ ईकाई के कार्यालय वाला ‘गढ़-हटरी‘ है। विभाग द्वारा राज्य के कलाकारों के महत्व को ध्यान देने के उद्देश्य से कलाकारों के पंजीयन हेतु वेबसाईट का निर्माण किया गया है. जिसके अंतर्गत चिन्हारी के माध्यम से ऑनलाईन पंजीयन की सुविधा दी जा रही है, जिससे राज्य के हर वर्ग के कलाकारों को विभाग से सीधे सम्पर्क करने का अवसर मिला है और विभाग के पंजीकृत कलाकारों को विभागीय कार्यक्रमों से लाभान्वित किया जा रहा है। अब तक कुल 13525 कलाकारों का ऑनलाईन पंजीयन प्राप्त हुए हैं। इसी प्रकार अनुदान पोर्टल विकसित किया गया है, जिसमें राज्य की अशासकीय पंजीकृत संस्थाएं जो कला विशेष में उच्चस्तरीय प्रशिक्षण एवं प्रदर्शन हेतु विशिष्ट स्तर के संगीत समारोह, नाट्य समारोह, कला प्रदर्शनियां, साहित्य समारोह, शिविर अथवा अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रम आदि के आयोजन करते हैं, उन्हें आर्थिक सहायता दिये जाने का प्रावधान है। 

राज्य के संस्कृति के विविध आयामों पर प्रलेखन हेतु सांस्कृतिक प्रलेखन के क्षेत्र में प्रतिष्ठित संस्था सहपीडिया के साथ अनुबंध किया गया है। इसके अंतर्गत 100 विषय वस्तुओं पर प्रलेखन माड्यूल तैयार कर बेबसाईट पर अपलोड किये जाने का कार्य किया जा रहा है। अब तक लगभग 60 माड्यूल तैयार कर लिये गये है। इस कार्य से सूचना क्रांति के वर्तमान युग में राज्य के समृद्ध संस्कृति पर यथेष्ठ सामग्री वेबसाईट के माध्यम से समूचे दुनिया के लोगों को सुलभता से उपलब्ध करायी जा रही है। 

सिंगल विंडो डेश बोर्ड साफ्टवेयर का निर्माण छत्तीसगढ़ में फिल्म निर्माण करने वाले निर्माता/निर्देशकों को अनापत्ति प्रमाण पत्र जारी करने हेतु किया गया है। इस साफ्टवेयर के माध्यम से छत्तीसगढ़ के समस्त विभाग से जिला दण्डाधिकारी के द्वारा अनापत्ति प्रमाणपत्र प्राप्तकर निर्माता / निर्देशक को फिल्म निर्माण हेतु अनापत्ति प्रमाणपत्र प्रदान करना है। अब तक छत्तीसगढ़ में 12 हिन्दी फिल्मों की शूटिंग की गई है। 

विभाग द्वारा संस्कृति का संरक्षण संवर्धन हेतु विभागीय लक्ष्यों में लोक कलाकारों की सूची तैयार करना, जिसमें चिन्हारी पोर्टल के माध्यम से ऑनलाईन पंजीयन की सुविधा विभागीय वेबसाईट पर उपलब्ध है। जिससे लोक कलाकारों का ऑनलाईन पंजीयन किया जाता है। 5029 कलाकार / संस्था तथा 6208 रामायण मंडलियों का पंजीयन किया गया है। वर्तमान कलासाधकों, अर्थाभावग्रस्त साहित्यकारों / कलाकारों को मासिक वित्तीय सहायता / मासिक पेंशन, ईलाज हेतु कलाकार कल्याण कोष, कलाकार / संस्था / जिला कलेक्टर को आयोजनों के लिए आर्थिक अनुदान की व्यवस्था की गई है। लोककलाओं को सोशल मिडिया के माध्यम से लोकप्रिय बनाने का प्रयास विभाग द्वारा आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रमों को फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम में 03 दिवस तथा यूट्यूब में 07 दिवस के अंदर अपलोड किया जा रहा है। उपलब्ध लिखित साहित्य सामग्री का संकलन उपलब्ध पांडुलिपियों एवं दस्तावेजों का संकलन कार्य किए जाने का निर्णय लिया गया है। साथ ही यह भी तय किया गया है कि छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध नाटक जैसे चंदैनी गोंदा, लोरिक चंदा इत्यादि के मंचन हेतु मुक्ताकाशी मंच महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय परिसर में प्रत्येक माह एक अर्थात वर्ष में 12 प्रसिद्ध नाटकों का मंचन किया जायेगा। 

अब तक की नियमित गतिविधियां और नवाचार उल्लेखनीय है, मगर कई ऐसे पक्ष हैं जिनका उल्लेख इस प्रसंग के अनुकूल नहीं है। संक्षेप में हमारा ध्यान इस ओर भी उतना ही होना आवश्यक है कि अब तक क्या नहीं हो पाया है और क्या करना आवश्यक है। 

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स्वदेश 

राहुल कुमार सिंह से विशेष बातचीत...

जुन्ना सामग्री संग नवा दस्तावेज, ऐतिहासिक रिकॉर्ड के घलो डिजिटलीकरन होय 

चक्रधर, मल्हार, भोरमदेव, सिरपुर महोत्सव सहित राज्योत्सव प्रदेश के पहचान बनिस 

स्वदेश समाचार रायपुर 

छत्तीसगढ़ राज्य अपन गठन के 25वां वर्ष म प्रवेश कर चुके हे। संस्कृति, लोककला, पुरातत्व अउ ऐतिहासिक धरोहर प्रदेश के पहचान के महत्वपूर्ण आधार ये। इही विषय म 500 से ज्यादा अइसने अध्ययन म शामिल राहुल कुमार सिंह, पुरा-संस्कृतिधर्मी धरोहर वार्ताकार एवं प्रमुख, परोहर परियोजना, बायोडायवर्सिटी एक्सप्लोरेशन एंड रिसर्च सेंटर ले अमित चौहान के बातचीत के प्रमुख संपादित अंश प्रस्तुत हे.... 

सवाल- 25 बछर म संस्कृति अउ पुरातत्व के क्षेत्र म का-का प्रमुख बड़े उपलब्धि आपमन के ध्यान म आथे? 
जवाब- राज्य गठन के बाद संस्कृति के क्षेत्र म सीधा काम करे के मौका मिलिस। डॉ. कल्याण कुमार चक्रवर्ती, डॉ. इंदिरा मिश्रा अउ श्री प्रदीप पंत जइसने अधिकारी मन के योगदान प्रमुख हे। राज्योत्सव, चक्रधर महोत्सव, रामगढ़ महोत्सव, मल्हार, भोरमदेव, तातापानी, चित्रकोट अउ सिरपुर जइसने आयोजन अऊ परंपरा प्रदेश के सांस्कृतिक पहचान के हिस्सा बनिस ये बड़े उपलब्धि ये। 

सवाल- प्रमुख पुरातात्विक धरोहर अउ सामग्री मन के संरक्षण अउ विकास बर आगू का प्रयास करे जा सकत हे? जवाब- नवा उत्खनन ला लेके उत्साह बने हावय, फेर ओकर ले घलो जादा जरूरी पहिली ले सामने आ चुके धरोहर मन के रखरखाव हवय। मल्हार, ताला, सिरपुर, भोरमदेव सहित प्रदेश के दूसर पुराना स्थल मन के मूल स्वरूप ला सुरक्षित रखे के जरूरत हवय। भोरमदेव जइसन कई ठन मंदिर के आसपास बढ़त व्यावसायिक गतिविधि मन ला नियंत्रित करना जरूरी हवय। जुन्ना अउ पुरातात्विक स्थल म अनावश्यक बदलाव के बजाय संरक्षण अउ मरम्मत ला प्राथमिकता मिलना चाहिए। 

सवाल- जम्मो पुरातात्विक धरोहर मन के जानकारी के डिजिटल रिकॉर्ड कइसे तियार करे जा सकत है? 
जवाब- संग्रहालय मन म नियमित संग्रहाध्यक्ष अउ क्यूरेटर के जरूरत हे। महंत घासीदास संग्रहालय के जुन्ना रिकार्ड अउ ओकर रखरखाव ला दुरुस्त करे जाय। जम्मो के डिजिटललाइज़ेशन होना ही चाहिए। जुन्ना सामग्री के संग वर्तमान के दस्तावेज, फोटो, रिकॉर्ड अउ ऐतिहासिक सामग्री घलो डिजिटल रूप म सुरक्षित होना चाहिए, ताकि भविष्य म ओला आंसानी ले देखे अउ उपयोग करे जा सके। 

सवाल- पुरातत्व ले जुड़े लेख, शोध, दस्तावेज के संग्रह अउ प्रकाशन बर अउ का जरूरी प्रयास के जरूरत हे? जवाब- राजपत्र अउ विभागीय वार्षिक प्रतिवेदन मन ला ऑनलाइन उपलब्ध कराए के जरूरत हे। शासन-प्रशासन द्वारा प्रकाशित सामग्री ला व्यवस्थित रूप ले डिजिटल प्लेटफॉर्म म रखे जाना चाहिए। हर प्रकाशन के संग उचित वर्गीकरण अउ मेटाडेटा होना चाहिए, ताकि शोधकर्ता अउ आम लोगन मन ला सामग्री आसानी ले मिल सके। केवल कुछ सामग्री उपलब्ध होना पर्याप्त नइ हे, बल्कि कम से कम जरूरी सामग्री घलो व्यवस्थित रूप ले उपलब्ध होना चाहिए। 

सवाल- अवोइया 25 बछर म आपमन छत्तीसगढ़ के संस्कृति अउपुरातत्व धरोहर आदि ला कइसन रूप म देखना चाहत हव? 
जवाब- सच कहों तो मैं आने वाला 25 नइ बल्कि 250 अउ कहों त 2500 साल तक येकर विस्तार अउ संरक्षण ल देखना चाहत हंव। आने वाला समय म डिजिटलीकरन प्रमुख जरूरत है। सामग्री ला मेटाडेटा के संग वर्गीकृत करके छत्तीसगढ़ सरकार के आर्काइव पोर्टल पर उपलब्ध कराए जा सकत हें। एखर ले प्रदेश के सांस्कृतिक, पुरातात्विक अउ ऐतिहासिक सामग्री भविष्य बर सुरक्षित रह सकही, अउ शोधकर्ता मन के संग आम जनता ला घलो आसानी ले उपलब्ध हो सकही। 

सवाल- नवा पीढ़ी ल अपन धरोहर ले जोड़े बर का कदम उठाए के जरूरत हे? 
जवाब- लोककला म बदलाव अउ प्रयोग के गुंजाइश होना चाहिए। कलाकार जब नवा प्रयोग करथें अउ जनता ओला स्वीकार करथे, त लोककला के नवा स्वरूप विकसित हो सकथे। लोककला ला केवल जुन्ना स्वरूप मा स्थिर रखे के बजाय प्रतिभाशाली कलाकार मन के प्रयोग अउ जनस्वीकृति ला घलो महत्व मिलना चाहिए। येकर से नवा लइका मन अपन मन के जुड़त जाही।

Tuesday, September 22, 2026

अपने अपने राम

रामकथा को आधार बना कर अभिव्यक्ति के कौन-कौन से अनूठे आयाम का संधान संभव है इसका उदाहरण है भगवान सिंह की यह पुस्तक ‘अपने अपने राम‘। राम का चरित्र वर्ण कुव्यवस्था के खिलाफ और समावेशी राजनय के व्याख्याकार के रूप में गढ़ा गया है। स्वाभाविक ही युवराज और राजा राम के चारों ओर राजनयिक षडयंत्र का वातावरण बना रहता है। उनके समक्ष (मुख्यतः कैकेयी और वशिष्ठ द्वारा) प्रतिकूल स्थितियां लगातार निर्मित होती हैं, मगर धैर्य, न्यायप्रियता, निष्ठा, सच-ईमान वाले व्यवहार व वाक्-कौशल, मानवीय संवेदना पर कायम रहते राम, मर्यादा पुरुषोत्तम स्थापित होते हैं।

राज-काज और राजघरानों के प्रसंग में कई बातें बड़े पते की आई हैं, जैसे- ‘राजघरानों में आधे संकट दुस्साहस से पैदा होते हैं, आधे भीरुता से‘ ... ‘रूढ़िग्रस्तता का भी अपना अर्थशास्त्र और मूर्खता का भी अपना तर्कशास्त्र होता है।‘ ... राजा अपने लिए राज्य नहीं करता। राष्ट्रहित के लिए ही वह शासन करता है। राष्ट्रहित से ही राजा मित्रों और शत्रुओं का निश्चय करता है और यह मैत्री और शत्रुता भी स्थायी नहीं होती, प्रासंगिक होती है। ... राज परिवारों में अभिधा से अधिक व्यंजना ही समझ में आती है। यदि कोई बात सहज ढंग से कही गई हो तो भी वे उसमें से व्यंजना की खोज करके ही दम लेते हैं। ... राजनय और व्यक्तिगत गुणों के संदर्भ में लक्ष्मण का विचार है कि अनन्यता और आत्मीयता स्थापित करना राम की शक्ति है। और राम कहते हैं- ‘यदि कोई व्यक्ति या प्राणी तुम्हारे मन में घृणा पैदा करने में सफल हो गया तो समझो, वह जीत गया, तुम हार गए।‘ ... 'अतः सुमित्रा ने अपने दोनों पुत्रों में से एक को राम के साथ लगा दिया था, दूसरे को भरत के साथ। स्वयं भी इन्हें दोनों भाइयों के प्रति अनन्य सेवा भाव का उपदेश देती रहती थीं। राजा कोई भी बने, उनका अपना जीवन और सम्मान तो निरापद रहे!'

प्रोपोगैंडा और आधुनिक ट्रोल के संदर्भ में इस अंश को पढ़ना रोचक होगा- ‘एक बार विकसित हो जाने पर इस पर उन जनों का अधिकार हो जाएगा जिनके विरुद्ध पण्डितों और पुरोहितों का प्रचारतन्त्र काम करता है। यह है कुशीलवों और गाथाकारों की परम्परा। नाटकों, गायनों और स्वांगों की परंपरा। कथावाचकों और कथाकारों की परंपरा। नर्तकों, विटों और भांड़ों और भाटों की परम्परा। इससे उन सभी सम्भावित दूषकों और दुष्प्रचारों को निरस्त किया जा सकेगा, लक्ष्मण।‘

विश्वामित्र जिनका कथन आता है- ‘राजा को अपने गुरु की छाया से, यथासम्भव, दूर ही रहना चाहिए। उसके परामर्श भी आदेशवत हो जाते हैं। इससे राजा को स्वतंत्र निर्णय लेने में बाधा पड़ती है।‘ पुस्तक में औचित्यहीन ब्राह्मणवादी यज्ञ-व्यवस्था के ‘इष्ट‘ के बजाय लोक हितकारी ‘पूर्त‘ प्रतिष्ठा की अंतर्धारा का मद्धिम मगर स्थायी और दृढ़ स्वर है। ऐसा लगता है कि विश्वामित्र का चरित्र स्वयं लेखक के चिंतन का स्वरूप है और राम के कथन, उसकी अभिव्यक्ति।

सनातन रूढ़ नहीं होता जीवंत होता है। वह सनातन, जो शास्त्रों में ‘एष धर्मः सनातनः‘ है और बुद्ध वचन में ‘एस धम्मो सनंतनो‘ है। यहां लेखक भी उसी सनातनता के पक्षधर है, जो तार्किक, विवेकपूर्ण और वास्तविक यानी सर्वकालिक अतएव युगानुकूल परिवर्तनशील है। वसिष्ठ से राम की असहमति में यह रेखांकित होता है- ‘राम ने हाथ जोड़ लिए थे, जो तर्क की आँच न सह सके उस शास्त्र के विधान से कम से कम राम को बचाए रहें, आचार्य।‘ ... और कहते हैं- ‘शास्त्र और धर्म तो युग के अनुरूप बदलते हैं आचार्य।‘ जिस पर प्रतिक्रिया आती है- ‘राम कुछ भी कर सकते हैं। वह न किसी शास्त्र को मानते हैं, न किसी व्यवस्था को। कहते हैं, मनुष्य को आत्म-प्रमाण होना चाहिए।‘ या यह अंश- ‘कृत्याकृत्य की कसौटी शास्त्र नहीं, मनुष्य का अपना विवेक है।‘ इस क्रम में वे देवताओं के आलोचक और मनुष्यत्व के पक्षधर भी दिखाए गए हैं, कुछ इस तरह- ‘देवता मनुष्य से निकृष्ट होता है और वह कपटी लोगों का मानस पुत्र होता है।‘

रुढ़ संस्कार के घटाटोप में सच से आंखें मिलाना, सच को कह सुन सकने से अधिक महत्व का होता है। कबीर की टेक है- ‘जो तू बाभन बाभनी जाया, तो आन बाट काहे नहीं आया।‘ इसी तरह यहां वर्ण-व्यवस्था की रूढ़ि पर बार-बार आघात है- ‘कितना व्यर्थ है जन्म और रक्त की श्रेष्ठता का दंभ! कितनी मूर्खतापूर्ण है वर्णों की यह सीमा।‘ ... ‘यदि श्रेष्ठता-कनिष्ठता का आधार अलग-अलग अंगों से जन्म लेना हो तो इन वर्णों के लोगों को आज भी उन्हीं-उन्हीं अंगों से जन्म लेना चाहिए।‘ ... 'अयोनिज जन्म की कल्पना तो किसी कसाई के मन में ही उपज लगती है' ... ‘आज तो सभी ब्राह्मण, क्षत्रिय उसी रीति से पदा होते हैं जैसे शूद्र। सभी का जन्म माँ के गर्भ से होता है अतः सभी जन्म से शूद्र ही पैदा होते हैं। जिन्हें उचित संस्कार मिल जाता है वे द्विज हो जाते हैं, ब्राह्मण और क्षत्रिय और वैश्य बन जाते हैं, जिन्हें यह सुलभ नहीं वे शूद्र रह जाते हैं। यदि उन्हें भी उचित संस्कार मिलें तो वे भी द्विज बन सकते हैं।‘ ... क्या उस वेद के महात्म्य को स्वीकार किया जा सकता है आचार्य, जो एक शूद्र को पवित्र नहीं कर सकता, पर उसके उच्चारण मात्र से स्वयं अपवित्र हो सकता है? तब तो मानना होगा कि शूद्र वेद से भी अधिक शक्तिशाली है। वेद उसे प्रभावित नहीं कर सकता, पर वह वेद को प्रभावित कर सकता है! यह कुछ अलग मगर उतना ही खरा-खरा, अष्टभुजा शुक्ल की कविता में आता है- ‘दूध सभी का उज्जर होगा, रक्त सभी का लाल। अष्टभुजा के मुँह मत लगना, अष्टभुजा चंडाल।‘

पुस्तक के ऐसे कई अंश, वस्तुतः तार्किक और शास्त्र-मर्यादित अभिव्यक्तियां, सतही तौर पर धर्म और आस्था विरुद्ध मानी जा कर उद्वेलित कर सकती हैं। मगर उद्भट विद्वान लेखक ने धर्मशास्त्रों का गहराई से अवगाहन किया है, स्पष्टता की चमक उनके लेखन की पहचान है। वैदिक, पौराणिक, महाकाव्यीय और लौकिक प्राचीन संदर्भों के सजग और प्रखर व्याख्याकार हैं, तभी ऐसी महत्वपूर्ण क्रांतिकारी कृति पाठकों को उपलब्ध हुई है।

Wednesday, September 2, 2026

विविध रामायण

आनंद नीलकंठन के जितने काम की सूची मिलती है, वह सारा काम नाम करने वाला है। उनका लक्ष्य और प्रयास दिखता है कि किस तरह धर्मग्रंथों को लोकप्रिय स्वरूप में लाया जा सकता है। वे अध्येता, संकलक-संयोजक हैं, अपने सारे उद्यम को किताब, फिल्म, टेलीविजन धारावाहिक, ऑडियो बुक में परिणत कर देने वाले। इसी क्रम में उनकी पुस्तक का अनुवाद ‘विविध रामायण विविध पाठ‘ आया है।

यह शीर्षक देखते ही पहले ए.के. रामानुजन के चर्चित लेख, वस्तुतः लंबे शोध-पत्र ‘थ्री हंड्रेड रामायण्स ...‘ की ओर ध्यान जाता है और दूसरा कामिल बुल्के की ओर। नीलकंठन, अपनी इस किताब के ‘कथोपरांत‘ में लिखते हैं- ‘ए.के. रामानुजन ने अपने विद्वत्तापूर्ण लेख में 300 रामायणें गिनाई हैं।‘ यह भी कहा जाता रहा कि तीन सौ की यह संख्या कामिल बुल्के से ली गई है, मगर मुझे उपलब्ध रामानुजन के किसी मूल या अनुवाद और संपादकीय टिप्पणी सहित प्रकाशित संस्करणों में अब तक ऐसी कोई गिनती नहीं गिनाई मिली। दूसरी तरफ बुल्के ने 600 ई.पू. से 1600-1700 तक की रामकथाओं की सूची दी है, जिसकी संख्या 300 नहीं है। ऐसा लगता है कि यह बात चल पड़ी, तो चल पड़ी वाली है। रामानुजन के लेख पर हुई उग्र प्रतिक्रिया के दौरान यह टिप्पणी होती थी कि विरोध करने वालों में शायद ही किसी ने वह लेख ठीक से पढ़ा है। यह उल्लेख इसलिए कि या तो इन्हें पढ़ा नहीं जाता या एजेंडा बनाने का इरादा नहीं किया जाता, वरना यह किताब, ऐसे विरोध का शिकार रामानुजन से अधिक हो सकती है। इतना ही क्यों मूल वाल्मीकि रामायण के कुछ ऐसे अंश है, जो आपत्तिजनक माने जा सकते हैं और गंभीर विवाद का कारण बन सकते हैं।

रामकथा की आधुनिक पुस्तकों में एक साहित्यिक वर्ग है, जिसमें नरेन्द्र कोहली की रामकथा श्रृंखला से आशुतोष राना की ‘रामराज्य‘ से शैलेन्द्र तिवारी की 'मेरे राम' तक है। चक्रवर्ती राजगोपालाचारी, प्रेमचंद और रस्किन बॉन्ड ने भी रामकथा प्रस्तुत की है। दूसरा फैंटेसी वाला अमीश त्रिपाठी वर्ग है। इसके अलावा गंभीर अध्येताओं- बलदेव प्रसाद मिश्र, राधावल्लभ त्रिपाठी, कुबेरनाथ राय, भगवान सिंह का काम है। ऐसा एक कम चर्चित मगर महत्वपूर्ण प्रकाशन डॉ. शोभा निगम का ‘वाल्मीकि-कथा‘ है। शास्त्रीय-गंभीर कामों में डोंगरे जी महराज और करपात्री जी के साथ ‘मानस पीयूष‘ जैसी टीका भी है। एक काम माताप्रसाद गुप्त के पाठालोचन का है तो दूसरी तरफ पं. रामकिंकर जी महराज जैसे कथावाचक हैं। नीलकंठन की इस किताब को देवदत्त पटनायक वाले समूह में रखा जा सकता है। वे स्वयं कहते हैं कि इस पुस्तक को अकादमिक तरीके से नहीं देखा जाना चाहिए।

नीलकंठन की कुछ टेक है, जिससे वे न सिर्फ रामायणों, बल्कि दूसरे महाकाव्य महाभारत और पुराण आदि अन्य ग्रंथों को देखते हैं, इस क्रम में भटके से सांख्य दर्शन पर गंभीरता से विचार करने लगते हैं, वहीं सवाल उठाते हैं कि अंतिम बार आपने बिना मोबाइल की ओर देखे या बिना किसी से बात किए या बिना कोई किताब पढ़े कब खाना खाया था। वे टिप्पणी करते चलते है- ‘जीवन दरअसल कर्म और नियति दोनों से मिलकर बना होता है ... परिस्थितियों को ही चयन करने के लिए छोड़ देना भी एक प्रकार का चयन है ... कोई भी चीज पूर्णतः अच्छी या बुरी नहीं होती ... परिस्थितियों के अनुसार धर्म की परिभाषा बदल जाती है ... किस जीवन शैली को हम गलत, पापपूर्ण मानते हैं और किसे सही, यह हमारे नजरिए पर निर्भर करता है ... स्वधर्म का अर्थ है- धर्म के बारे में आपकी अपनी व्याख्या और समझ ... नैतिकता और नियम दूसरों पर नियंत्रण करने के लिए बनाए जाते हैं ... न मैं अच्छा हूं, न बुरा। मैं रावण हूं। ... परम सत्य नाम की कोई चीज नहीं होती ... जीवन को समझना एक जटिल कार्य है। जीवन जीना सरल है। बस जीते रहिए। ...

कार्य-कारण और परिणाम। जिसमें परिणाम, पुनः कारण बन सकता है। यह तय करना भी आसान नहीं होता कि कौन सा कार्य है, कौन कारण और क्या परिणाम, क्योंकि परिणाम जान पड़ना एक अनंतिम सी दशा है। यह ऐसी धारा है, जिसे किसी भी जगह रोक कर देखें, अपने आगे-पीछे का प्रभाव दिखेगा। नीलकंठन जो बार-बार दुहराते हैं, वह है- विकल्पों का चयन और परिणाम, कर्म का फल, कर्मों के चयन के लिए मूल्य चुकाना, उन्हीं के शब्दों में- ‘प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्मों और उनके फल के लिए जिम्मेदार होता है और उसे विकल्पों के बीच चयन का मूल्य अदा करना होता है, यह भाव भारतीय मानस में रचा-बसा है। चाहे पवित्र धर्मग्रंथ हों या लोक कथाएँ, इस विचार को बार-बार दोहराया जाता है।‘

अध्याय 32- ‘राम के पाले में विभीषण‘ में रामेश्वरम शिवलिंग स्थापना का प्रसंग आया है, जिसमें बताया गया है कि इस अवसर पर रावण पुरोहित बनता है, जो कथा आनंद रामायण के अलावा और कहीं नहीं मिलती। मगर आनंद रामायण के गीता प्रेस वाले संस्करण में मुझे ऐसा कुछ नहीं मिला। इसी तरह अध्यात्म रामायण को हर बार आध्यात्म रामायण और बिरहोर रामायण को बिहोर रामायण लिखना, अखरने वाला है। कुछ शब्द सामान्य से भिन्न प्रयुक्त हुए हैं, दक्षिण भारतीय प्रचलन के कारण, या अंगरेजी-हिंदी के कारण, जैसे- आजीविक न कि आजीवक, अहिल्या न कि अहल्या, क्षीरध्वज-सीरध्वज, विभांतक-विभांडक, कार्तिवीरार्जुन-कार्तवीर्यार्जुन, द्वैवायन-द्वैपायन, अनारण्य-अनरण्य, कुंब-निकुंब न कि कुंभ-निकुंभ, मायन-मय।

सामान्य पाठक कुवेंपु का आशय शायद ही समझ सके, जो वस्तुतः कुप्पल्ली वेंकटप्पागौड़ा पुटप्पा हैं। इसी प्रकार कुछ शब्द, जिनमें कर आता है, को जोड़ कर- धारणकरते, अपहरणकरवाकर, निर्धारणकरेगा, लिखे जाने पर ध्यान अटकता है। कुछ मशीनी अनुवाद वाली चूक है, जैसे- ‘हनुमान घायल अवस्था में खून से लथपथ सुग्रीव को उसके छिपने की जगह पर ...‘ इसमें हनुमान के बाद विराम नहीं है, वैसे भी सीधा वाक्य होता- घायल अवस्था में खून से लथपथ सुग्रीव को हनुमान, उसके छिपने की जगह पर ...‘

पुस्तक के शीर्षक Lesson का यहां अनुवाद पाठ किया गया है। हिंदी का पाठ, पढ़ना तो है ही, वह एक ओर उच्चारण करते हुए दुहराने अर्थ देता है वहीं दूसरी ओर किसी रचना का दो व्यक्तियों का पाठ भिन्न हो सकता है, इतना ही नहीं एक व्यक्ति के अलग-अलग समय में पाठ/ पुनर्पाठ (समझा जाने वाला आशय)अलग हो सकते हैं। पाठ का एक विशिष्ट प्रयोग अपरिचित लिपि के लेख को पढ़ने के अर्थ में भी प्रयोग होता है, ज्यों किसी पुराने अभिलेख के लिप्यंतर को पाठ कहा जाता है। यों पाठ का आशय पाठ्य-पुस्तक का अध्याय, सीख, सबक, नसीहत, चेतावनी भी हो सकता है। मुझे लगता है हिंदी के पाठ का आशय, अंगरेजी के Lesson से अधिक व्यापक है, बेहतर भी माना जा सकता है।

नीलकंठन निष्कर्ष की तरह लिखते हैं- 'हालाँकि एक हद तक मैं कर्म और कर्मफल के सिद्धांत को समझता हूँ जो इस महाकाव्य के आधार हैं, लेकिन मैं यह भी जानता हूँ कि जीवन में घटने वाली हर घटना की व्याख्या कर्म के आधार पर करना संभव नहीं।' और यह भी- ‘मैंने एक लोक गायक के मुँह से इसकी बड़ी सटीक व्याख्या सुनी- जीवन का बहुत गहरा अर्थ होता है लेकिन जैसे ही हम उस अर्थ को समझ लेते हैं, यह अर्थहीन हो जाता है। जीवन के अर्थ की खोज ही इसकी विचित्रताओं को इतना सुंदर बनाती है।‘

यह किताब मेरे लिए विंडो शॉपिंग जैसी साबित हुई, मगर उपर उल्लेखित पुस्तकों से अच्छी तरह परिचित नहीं हैं और रामकथा की रोचक विविधता को फटाफट देख लेना चाहें, उनके लिए यह बहुत उपयोगी हो सकती है। इसकी एक खासियत यह भी कि लेखक ने लोकप्रिय पठनीयता के लिए गंभीरता से समझौता नहीं किया है। उनकी इस किताब के लिए एक वाक्य कहना हो तो मैं कहूंगा- ‘आनंद नीलकंठन अपनी इस पुस्तक में समूचे भारतीय चिंतन में ‘विकल्पों के चयन और उनके परिणाम, कर्म और उसके फल के बीच चलने वाले अनंत चक्र‘ को देखते हैं।‘