Sunday, May 31, 2026

पुरातत्व-प्रजागर

0 हमारे लिए यह गौरव का विषय है कि 1875 में स्थापित रायपुर का महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय, देश के सबसे पुराने दस संग्रहालयों में से एक है। साथ ही यह निजी भागीदारी से बना देश का पहला संग्रहालय है। अब इसकी स्थापना का डेढ़ सौ वर्ष पूरा हो गया है। मगर संग्रहालय का मूल ‘अष्टकोणीय भवन‘ निजी आधिपत्य में फंसा है।

0 इस संग्रहालय में पंद्रह हजार से भी अधिक पुरावशेष संग्रहित हैं, जिनमें बड़ी संख्या में सोने, चांदी और विभिन्न धातुओं के सिक्के हैं। प्राचीन प्रतिमाओं के साथ-साथ, प्राचीन ताम्रपत्रों, शिलालेखों और सिरपुर से प्राप्त विश्वप्रसिद्ध कांस्य प्रतिमाओं का उल्लेखनीय संग्रह है। डेढ़ सौ वर्षें पूरे होने के बावजूद यह संग्रहालय अब तक ‘इंटरनेशनल काउंसिल आफ म्यूजियम्स’ या ‘म्यूजियम एसोसिएशन आफ इंडिया‘ का भी सदस्य नहीं बन पाया है।

0 अप्रैल-मई 2026 में राष्ट्रीय समाचार पत्रों में खबर छपी कि- अमेरिका ने लौटाई छत्तीसगढ़, रायपुर से चुराई गई कुल कीमत 20 लाख डालर की बेशकीमती ‘अवलोकितेश्वर‘ कांस्य प्रतिमा। ... 20 लाख डॉलर मूल्य की अवलोकितेश्वर की कांस्य प्रतिमा 1939 में लक्ष्मण मंदिर के पास मिले कांस्य की विशाल धरोहरों में से एक इस प्रतिमा को रायपुर के महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय में रखा गया था। यह प्रतिमा संग्रहालय से चोरी हो गई और 1982 तक अमेरिका में तस्करी करके ले जाई गई, और अंततः 2014 तक न्यूयॉर्क में एक निजी संग्रह में पहुंच गई।

0 जरूरी प्राथमिक काम, प्रभारी अधिकारी द्वारा पुरावशेषों का भौतिक सत्यापन और पुरावशेषों के चार्ज आदान-प्रदान होना अत्यावश्यक है। जबकि इन कामों से जुड़े अधिकारी की सेवानिवृत्त हो चुके हैं, या निकट भविष्य में होने वाले हैं। पुरावशेषों का प्रभार पिछले बीस साल से एक ही अधिकारी के पास है। मगर पुरावशेषों का मिलान-जांच उनके द्वारा नहीं किया गया है। 06 मई 2026 को प्रभारी अधिकारी द्वारा बताया गया कि संग्रहालय के पुरावशेषों के रिकार्ड पांच अवाप्ति पंजी को दीमक खा गए।

संक्षेप में-
0 राष्ट्रीय स्तर का यह संग्रहालय राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय संगठनों की सदस्यता लेगा?
0 संग्रहालय का मूल शासकीय अष्टकोणीय भवन बेजा-कब्जा मुक्त होगा?
0 अलोकितेश्वर प्रतिमा पर दावा के लिए हमारे पास क्या रिकार्ड है?
0 संग्रहालय के पुरावशेषों का मिलान-सत्यापन पिछले वर्षों में क्यों नहीं किया गया, जबकि पुरावशेषों के प्रभारी अधिकारी स्वयं लिखते रहे हैं कि पुरावशेष लापता हुए हैं और अब उनकी ओर से लिखा गया कि रिकार्ड्स को दीमक खा गया, यह किसकी लापरवाही/जिम्मेदारी है? किसी पर कोई कार्यवाही अब तक हुई है? और अब ऐसी स्थिति में पुरावशेषों को किस तरह बचाया जा सकता है।

उपरोक्त अद्यतन स्थिति की पृष्ठभूमि के लिए नीचे एक टीप दी जा रही है, इस टीप का आधार उल्लिखित बैठक में मेरे द्वारा कही गई बातें हैं, ऐसी बैठकों में कही गई बातें आई-गई हो जाती हैं, मिनिट्स नहीं आते या आते भी हैं तो आयोजकों की अनुकूलता अनुरूप। इसलिए अपनी बात मैंने रिकार्ड की और उसके आधार पर वस्तुस्थिति, समस्या, सुझाव लिखित रूप में प्रेषित किया, वही टीप यहां प्रस्तुत है, जिसका आशय-विवरण स्वयं स्पष्ट है, इस टीप के साथ आडियो का लिंक यहां है, जिसमें मेरे साथ श्री विनोद वर्मा और श्री विवेक आचार्य की आवाज है-

‘कला, पर्यटन, पुरातत्व और संस्कृति संवर्धन‘ टास्क फोर्स के लिए टीप 

विषय-‘कला, पर्यटन, पुरातत्व और संस्कृति संवर्धन‘ टास्क फोर्स की बैठक श्री विनोद वर्मा की अध्यक्षता तथा विभागाध्यक्ष संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग श्री विवेक आचार्य के संयोजकत्व में दिनांक 14 जुलाई 2021 को आयोजित हुई। बैठक में मेरे द्वारा दिए गए सुझाव तथा संबंधित बिंदुओं पर टास्क फोर्स के प्रतिवेदन के लिए टीप। 

प्रस्तावना- राज्य योजना आयोग के अंतर्गत ‘कला, पर्यटन, पुरातत्व और संस्कृति संवर्धन‘ के संबंध में गठित टास्क फोर्स के आदेश दिनांक 01.06.2021 तथा टास्क फोर्स की आंतरिक बैठक दिनांक 28 जून 2021 के प्रपत्र में पुरातत्व संबंधी बिंदु मुख्यतः इस प्रकार हैं- 

छत्तीसगढ़ के पुरातत्व व संस्कृति के संरक्षण, परिरक्षण एवं विकास हेतु सुझाव। पुरातात्विक महत्व के स्थलों एवं वस्तुओं/मूर्तियों आदि की सूची तैयार करना। प्रत्येक जिले के वैशिष्ट्य को दर्शाने वाले संग्रहालय। संग्रहालय से लोगों को जोड़े जाने के उपाय आदि। 

वर्तमान स्थिति- छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के 21 वर्ष हो गए हैं। राज्य की ‘कला, पर्यटन, पुरातत्व और संस्कृति संवर्धन‘ का पुनरीक्षण करते हुए भविष्य की योजनाएं, जिनका क्रियान्वयन आसानी से हो सके, पर विचार किया जाना आवश्यक है। वर्तमान में संस्कृति एवं पुरातत्व संबंधी कार्यों का संपादन विभागीय स्तर पर मुख्यतः एक संचालनालय / मुख्यालय तथा जगदलपुर एवं बिलासपुर संग्रहाध्यक्ष कार्यालय के माध्यम से होता है। 

पृष्ठभूमि- अविभाजित मध्यप्रदेश में संस्कृति से संबंधित कार्य-गतिविधियां संस्कृति विभाग के अंतर्गत स्थापित विभिन्न परिषद, अकादमियों, केंद्र/पीठ के माध्यम से होती थीं। विभाजन में इसमें से छत्तीसगढ़, भिलाई में स्थापित पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी सृजन पीठ तथा संस्कृति-गजेटियर का सीमित स्टाफ, छत्तीसगढ़ के हिस्से आया। छत्तीसगढ़ में संस्कृति और पुरातत्व (आरंभ में पर्यटन भी) का एक ही संचालनालय गठित हुआ और इस संबंधी समस्त कार्यों-गतिविधियों का संपादन संस्कृति के सीमित स्टाफ और पुरातत्व के मूलतः संग्रहाध्यक्ष, पुनः उपसंचालक कार्यालय, जो महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय में स्थापित था, तदर्थ रूप से संचालनालय, विभागाध्यक्ष कार्यालय बना कर किया जाने लगा। इस क्रम मंे पुरातत्व के स्टाफ पर भी अधिकतर संस्कृति के कार्यों की जिम्मेदारी बनी रही। राज्य गठन के पश्चात संस्कृति और पुरातत्व के क्षेत्र में उपलब्धियों के समानांतर यह तदर्थ व्यवस्था अब भी है।

कार्य-योजना- दीर्घकालीन योजनाओं, नीतिगत निर्णय, विशाल निर्माण की प्रतीक्षा के बजाय उपलब्ध संसाधनों की सीमा के अनुरूप ही कार्य-गतिविधियां शीघ्र आरंभ किया जाना आवश्यक है। 

0 देश के सबसे पुराने संग्रहालयों में से एक रायपुर के महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय के लिए इंटरनेशनल कौंसिल आफ म्यूजियम्स, इंडिया ‘आइकाम‘ की सदस्यता ली जाय। इससे राज्य के पुरातत्व और प्राचीन कला-संस्कृति के अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नियमित उपस्थिति प्रभावी होगी। तथा जिसके अभाव में अत्यंत महत्वपूर्ण और पुरानी संस्था होने के बावजूद भी यह संग्रहालय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान में पिछड़ जाता है। आइकाम, इंडिया की सदस्यता, संक्षिप्त कागजी औपचारिक कार्यवाही से ली जा सकती है।

0 रायपुर संग्रहालय के पुरावशेषों का पिछले कई वर्षों से लंबित वार्षिक भौतिक सत्यापन, पंजियों-नस्तियों के आधार पर कराया जाना अत्यावश्यक है, जो संग्रहालय प्रबंधन की बुनियादी आवश्यकता है। राज्य के 150 वर्ष पुराने इस संग्रहालय से वस्तुएं गुम होने की शिकायत हुई है, इसके बावजूद भी भौतिक सत्यापन नहीं कराया जा सका है। उल्लेखनीय है कि संग्रहालयों की अवाप्ति पंजी सबसे महत्वपूर्ण अभिलेख होता है, जिसकी दो प्रतियों में से एक प्रति संग्रहालय कार्यालय में और दूसरी प्रति विभागाध्यक्ष कार्यालय में रखी जाती है, इसमंे किसी भी प्रविष्टि की जानकारी शासन को भी दी जानी चाहिए, अथवा वार्षिक भौतिक सत्यापन प्रमाण-पत्र शासन को प्रेषित किया जाना चाहिए।

0 विभागीय संग्रहालय बिलासपुर और जगदलपुर के संग्रहाध्यक्षों द्वारा गत 5 वर्षों में किए गए कार्यों की जानकारी लेते हुए नियमानुसार भौतिक सत्यापन प्रतिवर्ष कराया जाना सुनिश्चित किया जाए। यह व्यवस्था जिला पुरातत्व संघ के संग्रहालयों के लिए भी हो। उल्लेखनीय है कि लगभग 40 वर्ष पुराने बिलासपुर संग्रहालय का अब तक कोई विभागीय भवन नहीं है।

0 सक्षम-सक्रिय क्षेत्रीय पुरातत्व कार्यालय विकसित किया जाना आवश्यक है। वर्तमान रायपुर मुख्यालय और बिलासपुर, जगदलपुर कार्यालय के साथ अंबिकापुर, रायगढ़ और राजनांदगांव में सक्षम कार्यालय स्थापित-विकसित करना प्राथमिक आवश्यकता है। इन तीनों स्थानों में वर्तमान में विभाग/जिला पुरातत्व संघ के भवन उपलब्ध हैं।

0 राज्य में लगभग डेढ़-पौने दो हजार पुरावशेष निजी आधिपत्य में तथा विभाग द्वारा पंजीकृत हैं। इनसे संबंधित दस्तावेज व्यवस्थित, सुरक्षित रखना, सार्वजनिक करना तथा पुरावशेषों का भौतिक सत्यापन आवश्यक है। 

0 अध्येताओं, शोधार्थियों, विशेषज्ञों के लिए उनकी वरिष्ठता, प्रतिष्ठा और परियोजना के अनुरूप संग्रहालय के पुरावशेषों के अवलोकन की व्यवस्था, पुरावशेषों से संबंधित जानकारी, फोटोग्राफ आदि उपलब्ध कराया जाना सुनिश्चित किया जाय। (परिशिष्ट ‘अ‘ एवं ‘ब‘) 

0 संग्रहालय में पुरातत्व संबंधी विशेष व्याख्यान का आयोजन साथ ही इस माह के प्रादर्श जैसे शीर्षक से प्रति माह/त्रैमासिक विशेष प्रदर्शनी का आयोजन किया जाय, जिसमें सिरपुर कांस्य प्रतिमाएं, सिक्के, अभिलेख, अन्य विशिष्ट पुरावशेष आदि का प्रदर्शन विशेष गाइड सुविधा सहित हो। इसका कैलेंडर बनाकर उसका प्रचार-प्रसार राष्ट््रीय स्तर पर किया जाए, जो छत्तीसगढ़ के पुरातात्विक कलात्मक वैभव की छवि स्थापित करने, निखारने में सहायक होगा। पुरातत्व संबंधी वृत्तचित्र प्रदर्शन, संगोष्ठी का आयोजन तथा विभागीय उत्खनन-सर्वेक्षण के नियमित कार्यों और उनके स्वतंत्र प्रकाशन के साथ-साथ विभागीय शोध पत्रिका ‘कोसल‘ का नियमित प्रकाशन एवं विभागीय वेबसाइट पर शोध, उपयुक्त सूचनाओं का उपलब्ध कराया जाना। उल्लेखनीय है कि ‘कोसल‘ के कुशल-सक्षम संपादन और प्रयासों से वह यूजीसी केयर सूची में शामिल था, जो निरंतर नहीं रह पाया, और अब यह स्थिति है कि इसका प्रकाशन समय से नहीं हो पा रहा है।

0 संरक्षित स्मारकों पर अनिवार्यतः पर्यटकों की जानकारी दर्ज की जाए, किंतु स्मारक के महत्व का आंकलन पर्यटकों की संख्या के आधार पर नहीं, बल्कि उसकी प्रावीनता, कला-इतिहास में उसके महत्व के आधार पर निर्धारित किया जाय। पर्यटक-सुविधाओं की आवश्यकता और उससे संबंधित कार्य, अनिवार्यतः पुरातत्वीय मानकों के अनुरूप हो। 

0 संरक्षित स्मारकों और उसके आसपास के आधुनिकीकरण, सौंदर्यीकरण, पर्यटक सुविधा जैसे कार्यों की अपेक्षा स्मारकों की सुरक्षा और संरक्षण प्राथमिकता है। अन्य सभी कार्य पुरातत्चीय मानकों के अनुरूप किया जाना चाहिए। कार्य बैठक में हुई चर्चा अनुरूप, स्मारकों पर व्यय राशि का उक्त दृष्टिकोण से आनुपातिक संतुलन रखा जाना अत्यावश्यक है। यह ध्यान रहे कि पुरातत्व का क्षेत्र मूलतः विकास-निर्माण का नहीं मुख्यतः खोज, शोध, सहेजने-संभालने वाला होता है। स्मारक और पुरावशेष अपनी आवश्यकता खुद नहीं बता सकते, न ही शिकायत कर सकते इसलिए इस क्षेत्र में विचार और कार्य के लिए अतिरिक्त संवेदनशीलता आवश्यक होती है। संरक्षित स्मारक परिसर की स्मारक से पृथक पुरावशेषों की सूची और उनका नियमित प्रतिवेदन- सत्यापन भी आवश्यक है।

0 ऐसे प्राचीन स्मारक, स्थल, जो संरक्षित घोषित नहीं है, किंतु संरक्षण हेतु विचाराधीन हैं अथवा उल्लेखनीय हैं, उनकी देखरेख के लिए जिला पुरातत्व संघ और संबंधित ग्राम पंचायत को उत्तरदायित्व दिया जाना चाहिए। वन क्षेत्रों में स्थित स्मारक-स्थलों के लिए वन विभाग का सहयोग लिया जाना चाहिए। संरक्षित/उल्लेखनीय स्मारक-स्थलों की सूची जिले के पुलिस अधिकारी के पास होनी चाहिए तथा संबंधित थाने में प्रदर्शित होनी चाहिए। 

0 पुरावशेष, स्मारक आदि से संबंधित पाक्षिक, मासिक, त्रैमासिक और वार्षिक प्रतिवेदन अनिवार्यतः मंगाए जाने चाहिए ताकि मुख्यालय में अद्यतन जानकारी हो और प्रशासनिक नियंत्रण, अनुशासन बना रहे। लोकहित और जन-सामान्य से संबंधित जानकारियां, जो सूचना के अधिकार अधिनियम के अंतर्गत दी जा सकती है, वेबसाइट पर सार्वजनिक की जानी चाहिए।

0 पुरातत्व को संस्कृति से अभिन्न देखने के लिए ग्रामवार, लोक में प्रचलित वाचिक परंपरा, मौखिक इतिहास, ग्राम गौरव, ग्राम धरोहर को महत्व दिया जाना आवश्यक है। ध्यातव्य है कि प्रत्येक ग्राम की भौगोलिक, जीवशास्त्रीय विशिष्टता (जंगल, पहाड़, नदी, नाला, तालाब, पेड़-पौधे, जीव-जंतु, खनिज), ग्राम के बसाहट का इतिहास होता है। ग्राम के देवस्थलों के साथ आस्था-परंपराएं संबद्ध होती हैं। अधिकतर देवस्थानों पर ही प्राचीन अवशेष एकत्र कर रखे जाते हैं। साथ ही स्थानीय, क्षेत्रीय ऐतिहासिक महत्व के व्यक्ति ग्राम से संबद्ध होते हैं, विभिन्न क्षेत्रों में विशिष्ट प्रतिभा, योग्यता के धनी लोग निवास करते हैं। वर्तमान में प्रचलित परंपराएं, उत्सव, पारंपरिेक आयोजन भी होते हैं। इन्हें स्थानीय ग्राम-अस्मिता के रूप में रेखांकित कराया जाना चाहिए। यह कार्य स्वयं ग्रामवासियों द्वारा किया जा सकता है तथा इसे ग्राम पंचायत विकास योजना (जीपीडीपी) के अंतर्गत शामिल करने की संभावना देखी जा सकती है। स्कूल और महाविद्यालयों को इस दिशा में सक्रिय किया जा सकता है। 

निष्कर्ष- संदर्भित आदेश के अन्य शर्तों में अतिरिक्त विशेषज्ञ, छोटे-छोटे वर्किंग सलाहकार का उल्लेख किया गया है। इस संबंध में टीप कि ऐसा किया जाना, समय और शासकीय राशि का अपव्यय हो सकता है। शासन-विभाग द्वारा उक्तानुसार बिंदुओं पर कार्य आरंभ करने के लिए, अमले की कमी को देखते हुए वरिष्ठ अनुभवी अधिकारियों और पुरातत्व विशेषज्ञों की सेवा ली जानी चाहिए। विषय विशेषज्ञ, तकनीकी अधिकारियों को यथासंभव नियमित विभागीय कार्यों जैसे- विधानसभा, निर्वाचन, न्यायालयीन प्रकरण, सूचना का अधिकार आदि से मुक्त रखा जाना होगा। इसी प्रकार जिलों में पुरातत्वीय कार्यालय न होने के बावजूद पुरातत्वीय कार्य अबाधित रहें इस दृष्टि से प्रत्येक जिले में कलेक्टर की अध्यक्षता में जिला पुरातत्व संघ गठन का प्रावधान है, इसे सक्रिय कर मजबूत करना आवश्यक है।

सबले बढ़िया छत्तीसगढ़िया, सोचते-कहते खुद को काव्यात्मक भुलावे में रखने के बजाय गढ़बो नवा छत्तीसगढ़ की महत्वाकांक्षी मंजिल के लिए, छोटे कदमों से ही सही, अविलंब कार्यवाही आवश्यक है। 

(संलग्न परिशिष्ट ‘अ‘ एवं ‘ब‘ उपरोक्त यथास्थान उल्लेख अनुरूप तथा ‘स‘ पर पर्यटन ‘द‘ पर कला-संस्कृति के साथ ‘इ‘ पर ‘छत्तीसगढ़ समग्र वेब‘ संबंधी टीप दृष्टव्य)

(राहुल कुमार सिंह) 
पुरातत्व एवं संस्कृति अध्येता, रायपुर 
सदस्य, ‘कला, पर्यटन, पुरातत्व और संस्कृति संवर्धन‘ टास्क फोर्स 

परिशिष्ट-/b>

(अ) उल्लेखनीय है कि बस्तर अंचल के एक दुर्लभ और महत्वपूर्ण अभिलेख के अध्ययन के लिए मेरे द्वारा लिखित आवेदन तथा व्यक्तिगत स्तर पर निवेदन किया (जो बस्तर की छवि सुधारने में मददगार हो सकती है), जिसकी चर्चा बैठक के दौरान भी की गई, किंतु अनुमति अथवा इस संबंध में कोई जानकारी प्राप्त नहीं हुई है। संग्रहालय में संग्रहित धरोहर के महत्व को उजागर करने और प्रसारित-प्रतिष्ठित करने की दिशा में यह एक गंभीर बाधा है, जिसका निराकरण सामान्य से प्रशासनिक निर्णय से किया जा सकता है। 

(ब) रायपुर संग्रहालय की सिरपुर से प्राप्त मंजुश्री कांस्य प्रतिमा अन्य देशों में आयोजित भारत महोत्सव में प्रदर्शित की जा चुकी है, इसी प्रकार सिरपुर से प्राप्त अन्य कांस्य प्रतिमाओं और स्वर्ण एवं अन्य धातुओं के सिक्कों का अमूल्य संग्रह संग्रहालय में है, किंतु इस दिशा में उदासीनता चिंताजनक है। ऐसे पुरावशेष जन-सामान्य तो क्या, विशेषज्ञों और राज्य की कला-संस्कृति-पुरातत्व से जुड़े गणमान्य इससे लगभग अनभिज्ञ हैं, तथा उनके लिए भी सहज उपलब्ध नहीं है। उल्लेखनीय है कि हार्वर्ड विश्वविद्यालय के भारतीय कला के मर्मज्ञ प्रोफेसर प्रमोदचंद्र ने मंजुश्री प्रतिमा को छत्तीसगढ़ की प्राचीन कला का सक्षम प्रतिनिधि उदाहरण माना था। इसके पश्चात 1987 में देश के महान कलाविद और संग्रहालय विज्ञानी राय कृष्णदास के पुत्र आनंद कृष्ण रायपुर पधारे और तत्कालीन प्रभारी श्री वी.पी. नगायच से विनम्रतापूर्वक सिरपुर की कांस्य प्रतिमाओं को देखने का यह कहते हुए आग्रह किया कि उनके बारे में बस पढ़ा है, चित्र देखे हैं। इन प्रतिमाओं को एक-एक कर हाथ में लेते हुए भावुक हो गए, नजर भर कर देखते और माथे से लगाते गए।

(स) पर्यटन के क्षेत्र में ’चित्रकूट, डोंगरगढ़, सिरपुर, रतनपुर, चंपारण, रामगढ़-डीपाडीह जैसे केन्द्रों के साथ मार्ग के अन्य स्थलों को जोड़ कर एक/दो/तीन दिवसीय पर्यटन परिपथ तथा सरगुजा दर्शन, बस्तर दर्शन, छत्तीसगढ़ दर्शन जैसे परिपथ की योजना पर विचार किया जाना चाहिए। छत्तीसगढ़ में विदेश और अन्य राज्यों, मुख्यतः गुजरात से चंपारण आने वाले पर्यटक सीमावर्ती उड़ीसा के पर्यटन केंद्रों पर जाते हैं वैसे ही सीमावर्ती अमरकंटक, कान्हा जैसे पर्यटन केंद्रों के साथ छत्तीसगढ़ के स्थलों को जोड़ने का प्रयास किया जाना चाहिए। राज्य के भिलाई और कोरबा जैसे औद्योगिक केंद्रों पर विभिन्न राज्यों के व्यक्ति निवास करते हैं तथा अन्य राज्यों से लोगों का आवागमन होता रहता है, इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए ऐसे केंद्रों पर पर्यटन, संस्कृति विकास की संभावना के अनुरूप कार्य किया जाना उपयुक्त होगा, इसके लिए इन नगरों के औद्योगिक संस्थानों को प्रोत्साहित किया जा सकता है। पर्यटन मंडल के वर्तमान में लंबे समय से अनुपयोगी जर्जर हो रहे मोटल, अनुपयोगी छूटे रहने के बजाय उन्हें उपयोग हेतु ग्राम पंचायतो/अन्य शासकीय, अर्द्धशासकीय संस्थाओं को सौंप देना चाहिए। प्राकृतिक सौंदर्य के स्थलों, पुरातत्वीय स्थलों आदि पर अनियंित्रत निर्माण पर रोक लगाया जाना आवश्यक है।

(द) कला-संस्कृति के क्षेत्र में मध्यप्रदेश के सफल आयोजन और गतिविधियों का अनुकरण किया जाना चाहिए, जिनमें से उल्लेखनीय संभागीय उत्सव, दुर्लभ वाद्ययंत्र, विधाओं आदि का आयोजन है। कला-प्रदर्शनियों और कार्यशालाओं के आयोजन, प्रोत्साहन के लिए इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ का सहयोग लिया जा सकता है। शिल्प, चित्र, फोटोग्राफ, दस्तावेज आदि के प्रदर्शन हेतु महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय में स्थित कलादीर्घा को सक्रिय किया जा सकता है। कला-संस्कृति संबंधी प्रकाशन पुनर्प्रकाशन, उसे इंटरनेट पर सार्वजनिक उपलब्ध कराया जाना चाहिए। भोपाल के मध्यप्रदेश माध्यम, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय जैसे अन्य केद्रों तथा देश में अन्यत्र उपलब्ध छत्तीसगढ़ की सामग्री/प्रतिलिपि प्राप्त करना चाहिए। सांस्कृतिक प्रस्तुतियां जीवन-चर्या का अभिन्न हिस्सा हैं यह ध्यान रखते हुए सांस्कृतिक कार्यक्रम को मात्र मनोरंजन, मंचीय प्रस्तुति, शोकेस किया जाना, लोकप्रियता से अलग देखना आवश्यक है। स्वस्फूर्त और पारंपरिक आयोजन, गतिविधियों, प्रचलित विधाओं के संरक्षण और प्रोत्साहन को प्राथमिकता होनी चाहिए। यह ध्यान रखना आवश्यक है कि सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन में होने वाले व्यय में कलाकारों को दिये जाने वाले मानदेय की राशि तथा ध्वनि-प्रकाश-टेंट आदि व्यवस्था संबंधी व्यय का अनुपात संतुलित हो।

(इ) ‘छत्तीसगढ़ समग्र वेब‘, सामान्य प्रशासन विभाग के अंतर्गत विकसित किया जाना चाहिए, जिसमें अभिलेखागार के नियमित दस्तावेजों के अलावा, राजपत्र, छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण संबंधी कागजात का चयन-वर्गीकरण और अपलोडिंग प्राथमिकता से शीघ्र आरंभ किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त जिला कार्यालयों के दस्तावेज, समकालीन दस्तावेजों को भी संयोजित किया जाना चाहिए। राज्य में निजी संस्थाओं, विशेषज्ञों द्वारा विभिन्न शोध-सर्वेक्षण के कार्य जिला-प्रशासन, जनसंपर्क, पंचायत, शिक्षा, स्वास्थ्य, संस्कृति, आदिम जाति जनजाति आदि विभागों के अंतर्गत अथवा सहयोग से होते हैं उनकी जानकारी भी इसी प्लेटफार्म पर संयोजित किया जाना आवश्यक है। योजना, सांख्यिकी व अन्य विभागों के वार्षिक सर्वेक्षण, प्रशासकीय प्रतिवेदन, शासकीय विभागों के अन्य प्रकाशन, संवाद द्वारा प्रकाशित सामग्री, विश्वविद्यालयों में हो रहे शोध आदि का भी संयोजन आवश्यक है।

(राहुल कुमार सिंह)

Thursday, May 21, 2026

जन-नागर गीता

हरिवंशराय बच्चन की ‘भगवद्गीता‘, काव्यमय भावानुवाद मूल संस्कृत श्लोकों सहित, के 2013 संस्करण में उल्लेख है कि इस पुस्तक का पहला संस्करण ‘नागर गीता‘ नाम से 1966 में प्रकाशित हुआ था। इसके भी पहले 1958 में ‘जन गीता‘ प्रकाशित हुई थी। अप्रैल 1966 में ‘सम्बोधन‘ शीर्षक, भूमिका इस 2013 संस्करण में भी है, जिसमें बच्चन ने लिखा है कि इसे देखकर उनके एक अन्य अनुवाद ‘जन गीता‘ की याद आना स्वाभाविक है। वह अवधी में था, यह खड़ी बाली में है। ‘जन गीता‘ में वे अपने को ‘प्रतिध्वनिकार‘ और यहां ‘नागर गीता‘ में ‘रूपांतरकार‘ कहते हैं। उसके आमुख को ‘मंगलाचरण‘ कहा था, इसे ‘सम्बोधन‘। इस सम्बोधन का यह अंश उल्लेखनीय है- ‘मुझ साधारण का ‘स्व‘ ऐसा नहीं हो सकता कि किसी भी ‘पर‘ से मेल न खाए। फिर भी आपके स्वागत, उपेक्षा दोनों के लिए ये तैयार है; यानी, दोनों के प्रति उदासीन।‘ इससे लगता है कि कृतिकार गीतामय है, उसने कर्म किया है, कर्मफल के प्रति तटस्थ-अनासक्त है, निरपेक्ष है। 

‘सम्बोधन‘ में यह भी लिखते हैं- 'जन और नागर' शब्दों के समाज पक्ष की ओर भी आपका ध्यान जाना स्वाभाविक है। ग्राम और नगरों में बँटा यह महादेश क्या हृदय और बुद्धि में ही बँटा नहीं है? शायद मेरी अवचेतना ने सकारण ही जनगण और नागरिकों के लिए दो विभिन्न माध्यमों से एक ही कृति प्रस्तुत की है। बुद्धि और हृदय का ऐसा विभाजन स्वस्थ और हितकर नहीं। स्वस्थ और हितकर तो यह होगा कि नागरिकों के पास ग्रामीणों का थोड़ा हृदय आए, ग्रामीणों के पास नागरिकों की थोड़ी बुद्धि जाए। प्रतीक रूप से 'जन गीता' नगरों में भी प्रतिध्वनित हो; 'नागर गीता' के दर्शन ग्रामों में भी हों। हृदय और बुद्धि में संतुलन रखना गीता के समत्व योग के अंतर्गत ही आएगा।

जन गीता के ‘मंगलाचरण‘ पर नई दिल्ली, 12-5-58 दर्शित है। यह मंगलाचरण, काष्ठमौनी स्वामीजी महाराज के प्रति विनय भी है। पुस्तक में बताया गया है कि ‘जन गीता का सर्वप्रथम सस्वर संपूर्ण पाठ श्री स्वामी जी महाराज के समक्ष अठारह मई उन्नीस सौ अट्ठावन को किया गया।‘ अन्यत्र जानकारी मिलती है कि काष्ठमौनी स्वामीजी महाराज, राधा बाबा - चक्रधर मिश्र (1913-1992) हैं, स्वाधीनता संग्राम में जेल भी गए। 1936 में संन्यास ले लिया और 1956 की शरद पूर्णिमा पर काष्ठमौन व्रत लिया।

यहां गीता के अपनी पसंद के कुछ श्लोक चुने गए हैं, जिसमें इस बात का ध्यान रखा गया है कि आमतौर पर लोगों की जुबान पर आने वाले पद शामिल हों। आरंभ में अध्याय/श्लोक संख्या, मूल संस्कृत श्लोक, बच्चन जी की उक्त कृतियों में किया गया खड़ी बोली अनुवाद और फिर अवधी अनुवाद है- 

1/1 - धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः। मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय।।
# संजय से धृतराष्ट्र ने कहा, धर्मक्षेत्र में, कुरुक्षेत्र में, समरेच्छा से हुए इकट्ठे, मेरे और पांडुपुत्रों ने जो कुछ किया, बताओ, संजय। 
# धर्मखेत, कुरुखेत, कहावा, जहँ कौरव-पांडव-दलु आवा; काह करहिं तहँ दोउ समुदाई? संजय, मोहिं कहहु समुझाई।

1/47 - एवमुक्त्वार्जुनः संख्ये रथोपस्थ उपाविशत्। विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः।
# ऐसा कहकर, धनुष-बाण तज, रण-स्यंदन के पृष्ठ भाग में शोक-विकल अर्जुन जा बैठे।
# अरजुन कहि अस कृष्न सन, सोक-बिकल, धुनि माथ, सर-धनु तजि, रथ-पृष्ठ महुँ बैठेउ, कुरु-कुल-नाथ।

2/22-23 - वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि। तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही।। नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः। न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः।। 
# जीर्ण वसन तज कर जैसे नए वस्त्र धारण करता है, जीर्ण देह तज कर वैसे ही देही नव तन धारण करता। शस्त्र नहीं छेदन कर सकते इस देही का, पावक इसको जला न सकता, पानी इसको भिगा न सकता, मारुत इसको सुखा न सकता।
# नर, परिहरि जिमि जून पट, पहिरहिं नव परिधान, जीव धरइ तिमि नवल तन, त्यागि सरीर पुरान। जीव न पावक जारि सक, भेइ सकइ नहिं नीर, सोखि न सकइ समीर तेहि, छेदि सकइ नहिं तीर।

2/47 - कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।।
# कर्मों पर अधिकार तुझे है, कभी न फल पर; तू न कर्मफल अनुरागी बन, और न कर्मों से विरक्त हो।
# करमहि पर बस तोर बसाऊ, फल पर तोहि अधिकार न काऊ; छोरु कर्म-फल-मोह, सुकर्मा, छोरु न कर्म, न छोरु स्वधर्मा।

4/7-8 - यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।। परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे।।
# भारत, जब-जब ग्लानि धर्म की औ‘ अधर्म का अभ्युत्थान हुआ करता है, कगार तब-तब मैं अपने को सृजता। साधुजनों के परित्राण के औ‘ असाधुओं के विनाश के और धर्म संस्थापन के हित युग-युग, भारत, मैं अवतार लिया करता हूँ।
# जब जब धर्म रसातल जाई, रहइ अधर्म धरा पर छाई, तब-तब, मोर नियम, कपिकेतू, देह धरउँ जग मंगल हेतू। करउँ कुकर्मिन्ह कर संघारा, करउँ सुकर्मिन्ह कर उद्धारा; नीति मोरि जुग जुग चलि आई, थापउँ धर्म, अधर्म हटाई।

9/22 - अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते। तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्।
# जो अनन्य-मन हो मेरा चिन्तन करते, मुझको भजते हैं, नित्ययुक्त उन भक्तजनों का योगक्षेम वहन करता मैं 
# जे अनन्य मन सुमिरहिं मोहीं, जे मोहि सन छन दूरि न होहीं, जे नित निज चित मोसन बाँधे, तिल्हकर जोग-छेम मम काँधे।

10/35 - बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम्। मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः।।
# बृहत्साम सामों में, गायत्री छन्दों में, मार्गशीर्ष मासों में, ऋतुओं में वसन्त मैं।। 
# बृहत्साम मोहि, मंत्रन्ह माहीं, गायत्री मोहि, छंदन्ह माहीं। माघ समुझु मोहि मासन्ह माझा; समुझु रितुन्ह महुँ मोहि रितुराजा;

15/1 - ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्यं प्राहुरव्ययम्। छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्।। 
# कहा कृष्ण ने, ‘ऊर्ध्व मूल औ‘ अधः डाल का जो अव्यय अश्वत्थ, वेद के पत्तों वाला, कहा गया है, जो उसको जानता वही वेदों का ज्ञाता। 
# अच्छय बिरिछ जाइ एक भाषा, जो उर्ध्वग-जरि, निम्नग-साखा; जामहुँ बेद लगहिं जिमि पाता; जो जानइ तेहि, सो बड़ ग्याता।

18/66 - सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।
# सब धर्मों का परित्याग कर, मेरी एक शरण में आ तू, शोक न कर, मैं तुझे, परंतप, सब पापों से मुक्त करूँगा।
# कुंति-सुवन सब धर्म बिहाई, गहु मम एक सरन, सिरु नाई; मैं तोहि, सब अघ-ओघ नसाई, देहउ मुकुति परम सुखदाई।

18/78 - यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः। तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्भुवा नीतिर्मतिर्मम।।
# जहाँ कृष्ण योगेश्वर, पार्थ धनुर्धर, नरवर, वहाँ विजय है, श्री, विभूति है, अडिग नीति है, मेरा मत है। 
# जहँ कृष्न जोगेस्वर, जहाँ धनु साजि अरजुन राजहीं, तहँ रहइ श्री, बैभव, बिजय, ध्रुव नीति, मम संमति सही।

गीता-भाव के लिए उक्त दोनों के अतिरिक्त,
गीता-पठन में अद्वैत आश्रम वाली ‘सरल गीता‘,
स्वामी अपूर्वानन्द की रामकृष्ण मठ वाली और
गीता प्रेस वाला संक्षिप्त संस्करण,
के साथ शुरूआत आसान होता है।

टीप-
‘जन गीता‘ की प्रति हमारे स्कूल के पुस्तकालय से मिली। पुस्तक के साथ सहेजे कार्ड में दर्ज है कि 1963 से 1968 के बीच इस पुस्तक को कक्षा 7 से कक्षा 11 तक के 12 विद्यार्थियों ने जारी कराया था।

Wednesday, May 13, 2026

गुरुदेव काश्यप

छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता पर ‘छत्तीसगढ़‘ सांध्य दैनिक के सुनील कुमार से मुलाकात में बात चली, तृप्ति सोनी की किताब ‘छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता, चार पीढ़ियों की स्याही की विरासत‘ की और पहुंची, गुरुदेव काश्यप तक। मैं उनसे और उनके पत्रकार-संपादक होने से परिचित रहा हूं, मगर उनकी कविताई से बहुत कम। सुनील कुमार जी ने उनकी किताब ‘धूप का एक दिन‘ (1972) पढ़ने को दे दी। यह जानकारी न होने से अपनी चिढ़ का बदला खुद से लेने के लिए आते ही काम में लगा, पूरे संग्रह की वर्ड फाइल तैयार कर ली और ललित कुमार के ‘कविता कोश‘ में भेज दिया।

गुरुदेव काश्यप जी के साथ रायगढ़ के उन दिनों से ले कर अब तक को याद करता रहा जब सर्व माननीय किशोरी मोहन त्रिपाठी, बारेन दा, अनुपम दासगुुप्ता, प्रभात त्रिपाठी, देवेंद्र प्रताप सिंह, हरिहर सिंह, अतुल श्रीवास्तव, हरकिशोर दास, रवि मिश्रा, विनोद पांडेय, रमेश शर्मा, स्वराज करुण, शिव राजपूत, राजू और हेमचंद्र पांडेय, बिहारीलाल साहू, डॉ. बल्देव, बसंत राघव, अशोक अग्रवाल, अनिल रतेरिया, प्रमोद ब्रह्मभट्ट, गोपाल पटेल, राकेश शर्मा, अजय अटापट्टू, चंडीप्रसाद गुप्ता, अंबिका वर्मा, राजेश डेनियल, अबरार हुसैन ..., बहरहाल वापस गुरुदेव काश्यप की कविता। उनकी कविताएं पढ़ते हुए तात्कालिक पाठकीय प्रतिक्रिया बनी-

वे रविशंकर विश्वविद्यालय के मानवशास्त्र के संभवतः पहले बैच के विद्यार्थी थे छुईखदान वाले राघवेंद्र त्रिपाठी, बाद में इसी विभाग में सेवाएं देने वाले सरोज बाजपेयी भी संभवतः इस बैच में थे। उन्होंने भाषा की भी पढ़ाई की। यायावरी- गुरुदेव काश्यप की कविताओं में झलकती है मगर उनके संग्रह ‘धूप का एक दिन‘ का लगभग सारा लेखन अखबार-समाचार के बीच पनपा है, जिसमें शहर का माहौल-पर्यावरण, देश की दशा और संविधान तथा वैश्विक परिस्थितियां, अमरीका हावी है। देखा जा सकता है कि समाचार-सूचना के संवेदनशील प्रस्तोता को उस माध्यम की सीमा बेचैन करती है, तथ्यों के साथ विचार और भावनाओं के बिंब-प्रतिबिंब के लिए वहां जगह नहीं होती, वह समाचार-गद्य में लिख-चुक जाता है लेकिन शुष्क, असम्बद्ध-सी घटना और परिस्थिति के समाचारों के पीछे मानवीय रिश्ता तो महसूस होता ही है। इसलिए ऐसे गद्य-अभिलेखन समाचारों के अंदर सहज कविता प्रवाहित होती रहती है, संवेदनशील मन उसे महसूस करता सुन लेता है और भाषा-कलम पर अधिकार हो तो अभिव्यक्त कर पाता है, ऐसी ही है इस पुस्तक की कविताएं, जिसकी पहली कविता का शीर्षक है ‘भूमिका: हम ऋग्वेदपदी‘, जिससे समझा जा सकता है कि यह कवि समष्टि से एकाकार हो कर रचना कर रहा है। उनकी कुछ कविताएं-


भूमिका: हम ऋग्वेदपदी 

आहुति दो पितरों, देवताओं को। 
हे पवित्राप्रद अग्नियो, 
स्तवन करो 

हम ऋग्वेदपदी सौ हेमन्तों को लांघते 
बांहों में समेट आत्मजों को 
ऋषि-आयु भोगेंगे। 

वरणीय पृथिवी का आलिंगन करें 
स्वागत करें 
अंतरिक्ष से उभरते सूर्य का 
यह सोमधारी 
प्रजाओं के लिये 
अमृत किरणें उछालता आया है। 

आयुष्मान् बंधु, 
दाब दो किसी पत्थर के नीचे 
अपनी अकारथ मृत्यु को 

धूप का एक दिन 

धूप है-सीपी है 
सूरज एक मोती है 
कानों के रिंग में बड़ा भला लगता है 
(क्या करें, कीमती है) 

धूप है-लहरें हैं 
दिन एक समुन्दर है 
नारियल की छांव में 
नाव बने लेटे हैं 
(पाल है, मछलियां हैं, लंगर है) 

धूप है-चुम्बन है 
फेनदार किरने हैं 
लथपथ हैं ओंठ 
पैर डगमग हैं 
(शाम के कंधे हैं, शिथिल-शिथिल झरने हैं) 

सुबह की बौछार 

सुबह-सुबह 
मुक्तक-सा बरस गया पानी। 

भीग गए अधजागे फूल-पत्र 
भीग गए छत-छज्जे, गलियारे 
बिजली की कुमकुम, 
तांबे के तार, नरम अंधियारे 

पुल की वह रेलिंग भी भीग गई 
भीग गई नहर, मुरम भीग गई 
खिड़की का कासनी परदा कुछ सिमट गया 
सन्नाटा चौक के पास कहीं ठिठक गया। 

सुगबुग दरवाजे की 
कड़ी-कड़ी जगती है 
टिक कर दीवारों से 
धूप खड़ी होती है 
धुले-धुले गागर में 
सूर्य समा जाता है 
ईंधन के बोझ लिए 
दिवस चला आता है 

रात का अनबोला आंगन में सोया है 
पास का गजरा भी दबे-दबे रोया है 
दुखा गया जी को यह ऐसा अभिमानी है 
सुबह-सुबह मुक्तक-सा बरसा जो पानी है। 

दिन 

नंगे पांव फुटपाथ पर दौड़ता 
मूंगफली के छिलके बटोरता 
आहिस्ता कुछ सोच कर 
पार्क के चकेदार दरवाजे पर झूलता 
म्यूजियम की मुंडेर से झाँकता 
सिनेमा घर के सामने 
कागज के रंगीन टुकड़े बटोरता 
कभी किसी रंगीन बोर्ड को खुरचता 
फव्वारे पर 
पानी के छींटे बिखेरता 

दोपहर- 
किसी बबूल की टहनी से 
धूप की उलझी हुई पतंग को निकालता 
फेरी वालों के पीछे भागता 
रेल की पाँतों को पार करता 
नदी की रेत को रौंदता 
किसी हरवाहे की पगड़ी उछालता 
कभी दो बूढ़े बैलों को पुचकारता 

शाम- 
किसी खोमचे के नजदीक 
उदास मुंह लिये 
खाली जेबें टटोलता 
सूरज डूबे 
इसी गली की मोड़ पर 
हर रोज घेर कर 
मुझे आखरी सलाम करता 

बस यूं ही हाथ पीछे बाँधे 
अकेले किसी कोने में 
दुबक कर बैठ जाता 
उदास मन, खिन्न: 
सोचता हूं- 
किस विधवा का बेटा है 
आवारा-आवारा सा 
नाबालिग दिन। 

शाम 

जी चाहता है- 
बादलों की ऐंठी हुई पगड़ी में 
सूरज का एक दूध-मोंगरा 
खोंप दूं। 

धरती के भरे-भरे गालों से 
छाछ सी धूप छितर जाती है 
घूंघट में छांव नई ब्याही-सी 
आंगन के बाहर जो 
नजर नहीं आती है। 

पिंजड़े में सुग्गे सी 
शाम फुदक जाती है 
नई-नई बछिया सी 
हवा बिदक जाती है। 

रात की मचिया पर 
चांद बैठ जाता है 
बूंद-बूंद अमरस-सी 
चांदनी टपक गई 
कांस की कटोरी-सा 
पोखर भर जाता है 
भरे-भरे महुए से 
तारे टपका किए 
पगडंडी बैठी है 
खाली डलिया लिए। 

पुस्तक के फ्लैप पर परिचय, जो संभवतः स्वयं उन्होंने लिखा है, इस प्रकार है- 

जीवन को प्रथम तिथि पंक्ति, रायगढ़ दिनांक 15 अगस्त 1935। एक निम्न मध्यमवर्गीय संयुक्त परिवार के सारे अभिशापों को वर्षों तक झेलने की विवशता। वह त्रासदायी परिवेश जो शैशव में हो रीढ़ की हड्डियों को प्रौढ़ बना जाता है। शिक्षा- एम. ए., मानव शास्त्र और भाषा विज्ञान में डिप्लोमा। व्यवसाय- पत्रकारिता। विगत 20 वर्षों में अनेक क्षेत्रीय पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन एव सम्पादन। पिछले कुछ वर्षों में दैनिक ‘महाकोशल‘ रायपुर के संपादक। अभिरुचि क्रमांक 1- यायावरीः डोनापाल से डीफू तक। ‘भटक चुके आगे और भटकेगे।‘ क्र. 2- असफल प्रकाशनों के लिए सफल योजनायें तैयार कर उन्हें क्षेत्रीय प्रतिभाओं के बीच खपाना। सन 1958 से 1966 के बीच अनेक पुस्तकों का प्रकाशन, संपादन। सहयोगी काव्य संग्रह नये स्वर-3, छत्तीसगढ़ का प्रथम कहानी संग्रह, ‘मीठे कनेर का दरख्त‘, काव्य संग्रह ‘नैवेद्य‘, ब्लादीमीर नाबोकोव के चर्चित उपन्यास ‘लोलिता‘ का अनुवाद और हिन्दी मे वियतनाम संबंधी प्रथम काव्य संग्रह ‘आहत सूर्य देश में‘। उपलब्धि- मित्रों का स्नेह, नवागतुकों की श्रद्धा और यह अटूट विश्वास कि समूचे भविष्य पर अधिकार हमारा है। मध्यप्रदेश में नई कविता का सूत्रपात करने वाले प्रथम सहयोगी काव्य संकलन नये स्वर-1 (1956) के सहयोगी कवि। प्रचार प्रसार के मंच पर उपस्थित होने से सदैव भयभीत। 22 वर्षों के रचना-काल में अंततः यह प्रथम व्यक्तिगत काव्य संग्रह ‘धूप का एक दिन‘। आगामी अभिशप्त उत्कल।