Wednesday, August 12, 2026

लोककला का दफ्तरी-लेखा

कला-संस्कृति में कोई दखल न होने के बावजूद रुचि होना काम आने लगा, जब छत्तीसगढ़ राज्य गठन हुआ, हम पुरातत्व के लोग संचालनालय संस्कृति और पुरातत्व का हिस्सा बन गए। पुरातत्व की पूछ-परख कम होती और संस्कृति की चमक और आकर्षण सबका ध्यान आकर्षित करती। संस्कृति से जुड़े आयोजन और लिखना-पढ़ना, शासकीय कर्तव्य-निर्वाह का मुख्य हिस्सा बन गया। 

सरकारी कामकाज के दौरान आज शाम तक की प्राथमिकता, कल सुबह कार्यालय पहुंचने पर पता लगता कि कल शाम तक जो टॉप प्रियारिटी है, वह अब ‘उसे छोड़ो, बेकार की बात है, यह कर के लाइए, उच्च स्तरीय बैठक है‘ घंटे भर का समय होता, आप काम पर बैठें, शुरू कर पाएं, बुलावा आने लगता, ‘हुआ, हो गया ... और कितना समय लगेगा‘ आपलोग किसी काम की प्राथमिकता नहीं समझते, मंत्रालय से फोन आ रहा है। जब तक कहें कि आप बैठने दें, तब तो काम कर पाएं, फिर से मंत्रालय से आने वाले फोन की घंटी बज जाती ...। ‘आफिस-आफिस‘ खेल इसी तरह चलता रहता। 

ऐसी ही नौबत आई, जब कहा गया कि राज्य की संस्कृति पर संकट है, लोक-कलाएं विलुप्त और नष्ट हो रही हैं। इनका संरक्षण-संवर्धन आवश्यक है, इस पर तुरंत एक नोट तैयार करना है। पुरातत्व-प्रशिक्षित का स्वभाव कुछ-कुछ बोदा-सा माना जा सकता है, वह जाने कितनों को बनते-बिगड़ते को देखा-समझा होता है, और ऐसी सभी बातों, वस्तुओं को दशकों में नहीं सदियों में सोचता है। बहरहाल, हासिल यह कि कभी ऐसा काम भी करना होता, जो शायद दबाव में ही संभव हो। आज यह नौबत आए तो तुरंत एआइ की मदद याद आएगी, तब यह स्थिति नहीं थी, और सहयोगियों की मदद से जो नोट बना, समझ नहीं पाता कि वह कितना सार्थक है, फिर भी ... वह इस प्रकार था- 

लोक कलाओं का संरक्षण एवं संवर्धन 

परिचय - 
छत्तीसगढ़ कला और संस्कृति की दृष्टि से समृद्ध भूभाग है। यह विविधतापूर्ण पारंपरिक लोक संस्कृति से अनुप्राणित है। लोक संस्कृति की यह सम्पन्नता इस अंचल के विशिष्ट भौगोलिक स्थिति की वजह से भी है। यह चारो ओर से विभिन्न भाषा-भाषी राज्यों से जुड़ा हुआ है। यहाँ की स्थानीय जनजातीय और मैदानी लोकसांस्कृतिक तत्त्वों में उत्तर में सरगुजा अंतर्गत उत्तरप्रदेश और झारखण्ड, पूर्व में ओडिशा, दक्षिण में आंध्रप्रदेश और तेलंगाना तथा पश्चिमी भाग में महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश के लोक सांस्कृतिक विशेषताओं का प्रभाव व समन्वय देखा जा सकता है। छत्तीसगढ़ में इस सांस्कृतिक आदान-प्रदान का मुख्य आधार इसका भूगोल ही है। 

कला रूप -
छत्तीसगढ़ में लोक कलाओं के विविध रूप विद्यमान हैं, जिन्हें यहाँ इस प्रकार वर्गीकृत कर प्रस्तुत किया गया है- 

1. लोकगाथा, लोकगीत एवं पारंपरिक वाद्य यन्त्र- यहाँ के अधिकांश लोकगीतों में किसी न किसी रूप में लोकगाथा का समावेश है। ये वस्तुतः गेय कहानियां होती हैं। इसके अंतर्गत पंडवानी, आल्हा-ऊदल, ढोलामारू, लोरिक चंदा और सरवन कुमार आदि उल्लेखनीय हैं। 

स्थानीय/आंचलिक लोक सांस्कृतिक परम्पराओं का संवहन लोकगीतों के माध्यम से होता है। यहाँ के अनेक लोकगीत और लोकनृत्य आपस में संबद्ध हैं। सुआ, भोजली, ददरिया, सधौरी, बिहाव गीत, गौरा-गौरी, डण्डा, करमा, मड़ई, बांस, जंवारा, देवार, रहस आदि यहाँ के प्रमुख लोकगीत हैं। 

लोकगीतों, लोकगाथाओं और लोकनृत्य/नाट्य इन सभी गेय अथवा प्रदर्शनकारी लोककलाओं में पारम्परिक वाद्यों की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण होती है। ये दर्शकों के मनोभाव को तरंगित करते और विधा को प्रभावोत्पादक बनाते हैं। छत्तीसगढ़ में भांति-भांति के पारंपरिक वाद्य यन्त्रों का प्रयोग यथा अवसर किया जाता है। ये वाद्य यन्त्र उस अवसर के अनुकूल मानवीय संवेदना को प्रगाढ़ करते हैं। यहाँ प्रचलित वाद्यों में ढोल, नगाड़ा, ढोलक, बांसुरी, हारमोनियम, बैंजो, तबला, मंजीरा, दफडा, निशान, चिकारा, सरांगी, इसराज, ढूगरू, राऊत बांसुरी, नमडेवन, खंझेरी, खल्हर, मंदरी, अलगोजा, चांग या डफ, ताशा, करताल, झांझ, मोहरी, बांस बाजा, सींग बाजा, मोहरी, धनकुल आदि हैं. 

2. लोकनृत्य- विभिन्न समुदायों के अपने-अपने पारंपरिक नृत्य हैं जो किसी खास अवसर पर कियो जाते हैं। इस अंचल में सरगुजा से लेकर बस्तर तक लोकनृत्यों की एक श्रृंखला दिखाई पड़ती है जो इस प्रकार हैं- करमा, डण्डा/शैला, सरहुल, सुआ, पंथी, रावत, डोमकच, गेंडी, ककसार आदि। इन लोकनृत्यों की भी अनेक स्थानीय शैलियाँ हैं। 

3. पारंपरिक नाट्य/मंचीय प्रस्तुतिकारी विधाएं- यहाँ की अनेक पारम्परिक लोकगाथाएं और लोकगीत जैसे पण्डवानी और रहस विधा का नाट्य शैली में प्रदर्शन प्रचलित है। इनके साथ ही नाचा, गम्मत, भतरा नाट, माओपाटा आदि प्रसिद्ध प्रस्तुतिकारी लोकनाट्य प्रचलित हैं। 

वर्तमान परिदृश्य - 
वर्तमान में छत्तीसगढ़ के प्रायः सभी कलारूपों के स्वरूप में समय के साथ हुये परिवर्तन को देखा जा सकता है। गांव के गुड़ी-चौपाल में होने वाली विभिन्न प्रदर्शनकारी कलाओं का मंचन अब राज्यस्तरीय/राष्ट्रीय लोक मंचों पर होने लगा है जिसके कारण इनके स्वरूप में धीरे-धीरे परिवर्तन आने लगा है। जैसे पंडवानी की शास्त्रीय वेदमती शैली को पद्मविभूषण तीजनबाई एवं अन्य कलाकारों द्वारा एक नई शैली कापालिक के रूप में विकसित किया गया। इसी तरह ख्यात पंथी कलाकार स्व. श्री देवदास बंजारे द्वारा एक्रोबैटिक प्रदर्शन के प्रभाव से पंथी नृत्य कला के स्वरूप में उल्लेखनीय परिवर्तन आया है। इन लोककलाओं को विशेष ख्याति प्राप्त हुई। 

इस क्रम में कतिपय ऐसी लोककलाएं भी हैं जिनका प्रचलन अलग-अलग कारणों से समय के साथ कम होता गया और इनमें से कुछ तो विलुप्ति के कगार पर हैं। जैसे रहंस (रास) और जगार कई दिनों तक चलने वाले विशाल अनुष्ठानिक व्यय साध्य आयोजनों के कारण अब इनका सीमित आयोजन ही होता है। कुछ लोककला विधाएं, उनके साथ जुड़ी विचित्र मान्यताओं के कारण उनका प्रचलन कम हो गया है। तारे-नारे/घोड़ा नाच जैसे लोकप्रिय विधाओं का प्रचलन ऐसी ही मान्यताओं के कारण कम हो गया है। ऐसा माना जाता है कि इसमें भूमिका का निर्वाह करने वाले पात्र/चरित्र के साथ अनिष्ट हो जाता है। 

कार्य योजना - 
कम प्रचलित/विलुप्त होती लोककला शैलियों की पहचान कर सूची तैयार करना लोक संस्कृति हमारी अस्मिता और पहचान हैं, इसलिये इनका संरक्षण-संवर्धन अत्यावश्यक है। इसलिए ऐसी विधाएं जिनका प्रचलन कम हो गया/रहा है अथवा जो विलुप्ति के कगार पर हैं, उनके संरक्षण-संवर्धन के लिए दीर्घकालिक कार्य योजना बनाकर उनका क्रियान्वयन जरूरी है। 

ऐसी लोककला विधाएं जिनका प्रचलन कम होता जा रहा है अथवा विलुप्त होते जा रहे हैं, मुख्य रूप से इन 03 क्षेत्रों से संबंधित हैं- 

1. गायन- लोकगीत/लोकगाथा जैसे बांसगीत, चंदैनी, डोलामारू, भरथरी, गोपीचंदा, रतनपुरिहा भजन आदि. 
2. वादन- विविध वाद्य जैसे चिकारा, सरांगी, इसराज, हिरकी, ढुंगरू, राऊत बांसुरी, बांस, टामोक, तुड़बुड़ी, खंझेरी, हिरनांग, रोंजो, डांहक, टमड़िया, खल्हर, मंदरी, अलगोजा, चांग, दफड़ा, निसान, करताल, झांझ, मोहरी, सींग बाजा, धनकुल, तमूरा, आदि. 
3. नृत्य- कोरवा, बायर, छैला नाच आदि. 
4. नाट्य रूप- तारे-नारे, नाचा, गम्मत, नाटक, भतरा नाट, आनुष्ठानिक प्रस्तुतियाँ जैसे रहस, लक्ष्मी जगार, तीजा जगार आदि. 

कम प्रचलित/विलुप्त होती लोककला शैलियों की सूची का अद्यतनीकरण - 
1/ इन क्षेत्रों के विभिन्न लोककला शैलियों की पहचान कर सूची को अद्यतन करने के लिए यह आवश्यक होगा कि इस संबंध में जानकारी इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़, लोक कला के क्षेत्र में राष्ट्रीय/राज्य स्तरीय सम्मान/पुरस्कार प्राप्त तथा अन्य प्रतिष्ठित विशेषज्ञों, संभागायुक्तों के माध्यम से जिला स्तर पर, पंचायत विभाग, आदिम जाति कल्याण विभाग, उच्च शिक्षा एवं स्कूल शिक्षा विभाग तथा स्थानीय विशेषज्ञों कलाकारों के माध्यम से जानकारी एकत्र कराई जाए। 
2/ इसके लिए तीन दिवसीय राज्यस्तरीय कार्यशाला का आयोजन किया जाए जिसमें लोककला विशेषज्ञ और कलाकार सहभागिता करेंगे और वे लोककलाओं के प्रचलन कम होने/विलुप्त होने के कारणों पर विमर्श कर उनके संरक्षण-संवर्धन के लिये ठोस नीति तैयार करने हेतु सुझाव देंगे। 
3/ विलुप्त होती विधाओं जैसे लोक गायन और लोक वाद्य पर पांच दिवसीय कार्यक्रम जिसमें दिन में डिमान्सट्रेशन लेक्चर और सायंकालीन प्रस्तुतियों का आयोजन किया जाए। 
4/ तदन्तर संरक्षण-संवर्धन के लिए योजना तैयार कर उसका मैदानी स्तर पर क्रियान्वयन की कार्यवाही की जाए। 

मान्य होने पर बजट प्रस्ताव तैयार कर प्रस्तुत किया जा सकेगा।

Wednesday, July 29, 2026

गणितगिरी

10 वर्ष का बालक साथ है, टैब पर समय बिता रहा है। सीधे मना करना ठीक नहीं लगता। मुझे पता है, अंकों में उसे रुचि है। मैं कुछ खेल याद करता हूं, जिनसे मैं उस उम्र से ले कर आज तक भी आनंदित होता हूं। गणित वाले अधिकतर इस संख्या- ‘6174‘ (दत्तात्रेय रामचंद्र) कापरेकर स्थिरांक से परिचित होते हैं। उन्होंने सन 1955 में इसे ‘खोजा‘ था। चार अंकों का कोई समूह, उच्चतम से न्यूनतम (अवरोही से आरोही) को घटाते हुए प्राप्त होने वाली संख्या सदैव 6174 होगी। उसे उदाहरण से समझाया- संख्या लिया- 1234। इसे घटते क्रम में लिखें- 4321 फिर इसे बढ़ते क्रम वाली इन्हीं संख्याओं- 1234 से घटा दें, बचेगा- 3087। इसे दोहराएं, यानी 3087, इन चार संख्याओं को उच्चतम क्रम में जमा कर, निम्नतम से घटाएं, इस तरह- 8730-0378 मान आएगा- 8352। पुनः यही क्रम दोहराते जाएं- 8532-2358 बचा 6174।

पहला सवाल आया कि क्या ऐसा 6174 के साथ भी होगा, मैंने कहा देख लेते हैं। 7641-1467, यह तो पहली बार में ही 6174 आ गया। बालक ने सोच कर कहा क्या ऐसा 6174 से बड़ी/छोटी संख्या लेने पर भी होगा, जवाब हां मिलते तक उसने अपनी अगली आपत्ति सोच ली थी। उसकी आपत्ति वही थी, जो मेरे कहने में चूक हुई थी। वह यह कि सभी चार अंक एक ही न हों, उसने मुझे फिर सुधारा, (एक को संख्या 1 समझा जा सकता है, इसलिए) ‘एक‘ ही नहीं, बल्कि 'सभी' चारों अंक ‘समान‘ न हों।

उस बालक ने इसमें दिलचस्पी ली, टैब बगल में रखा रह गया और बात पूरी होने पर उसका ध्यान टैब की ओर नहीं गया, बल्कि प्रतीक्षा करता रहा कि क्या मैं और आगे भी कुछ कहने वाला हूं। मैंने हमेशा पाया है कि गणित में रुचि हो तो हल, उत्तर ला कर संतोष नहीं होता। बातें सूझने लगीं। यह खेल और भी सवाल खड़े करता है, जैसे- इस अंक में ऐसा क्या खास है, ऐसा क्यों होता है? क्या ऐसा दो अंकों वाली, तीन अंकों वाली, पांच अंकों वाली संख्या के साथ भी होगा। और होगा तो क्या इसका कोई सूत्र-फार्मूला बन सकता है। इसी तरह दो संख्या पर सोचें तो हल तुरंत मिल गया कि 21-12 बचेगा 9। 31-13 बचेगा 18, 32-23 बचेगा 9। 98-89 बचेगा 9, 91-19 बचेगा 72, आगे बढ़ने पर 72-27 बचेगा 45, इसे 54-45 करें तो बचेगा 9।

इसे करते समझ में आया कि दो संख्या का खेल 99 जैसा चक्कर है यानि घूम-फिर कर 9 ही आएगा। तब ध्यान गया कि हम स्कूली दिनों में 9 का पहाड़ा लिखते थे, जिसमें इकाई 1 से 9 तक और उसके सामने 8 से 0 तक यानि 18, 27, 36 आदि और इन सभी संख्याओं का जोड़ 9 ही होता था। 6174 का जोड़ भी पहले 18 फिर 1+8=9 होता है। तब लगा कि 9 के आगे तो सब गोल चक्कर है शून्य, यहीं से शुरू और इसी पे कहानी खत्म भी हो। तीन और पांच पर सोचना शुरू करें, एआइ की मदद ले लिया तो सोचने के रस से वंचित रह जाएंगे। आनंद, हल में नहीं, सोचते हुए उस या उन रास्तों में है, जिनसे गुजरना होता है।

तीन अंकों के लिए मैंने 123 और 998 को लिया। 123 लेने पर पांचवें चरण में- 321-123 बराबर 198 होते हुए, 792, 693, 594 के बाद 495 आ गया। इसी तरह 998 लेने पर 998-899 बराबर 099 होते हुए 891, 792, 693, 594 के बाद 495 आ गया। इस तरह तीन अंकों की संख्या के लिए स्थिरांक 495 मिला। ध्यान गया, कि चरणों में आने वाली संख्याएं समान हैं और सभी में पहली और तीसरी संख्या का योग 9 तथा बीच वाली दूसरी संख्या स्वयं 9 है। स्थिरांक 495 में भी 4, 9 और 5 का योग 18, पुनः 1 और 8 का योग 9 होता है। अब मैंने एआइ की मदद ली, पूछा कि क्या तीन अंकों वाली किसी संख्या को इस विधि से स्थिरांक तक पहुंचने में 5 ही चरण लगते हैं? जवाब मिला नहीं 36 (वस्तुतः 51) ऐसी संख्याएं हैं (जैसे 100, 110), जिन्हें 495 पहुंचने में 6 चरण लगते हैं। एआइ मेरे अगले सवाल के लिए मानों तैयार था और बताने लगा कि 1 से 6 चरण वाली संख्याएं कुल 480 हैं।

एआइ से सवाल-जवाब

मैंने मन ही मन हिसाब लगा लिया- 100 से 999 के बीच 900 संख्याएं होंगी, जिनमें इस प्रयोजन के लिए 111, 222, 333 ... आदि 9 संख्याओं तथा दसवीं संख्या स्वयं 495 को छोड़ दें तो बच गईं 890 संख्याएं। एआइ पर पूरा भरोसा मुझे कभी नहीं होता, मैंने उसी से यह पूछ लिया, कि ऐसा सिर्फ 480 क्योंकर होगा, वह तो इससे अधिक ही होगा। उसने तुरंत गलती मान ली और सुधार कर, अपने हिसाब में 495 को भी शामिल करते, सही जवाब दे दिया- 891।

कापरेकर विधि में तीन अंकों के हिसाब में अवरोही क्रम की संख्या को पहली बार आरोही क्रम की संख्या से घटाने में अंतिम अंक 1 या 0 नहीं आएगा। तीन अंकों की उच्चतम संख्या को न्यूनतम संख्या से पहली घटाने पर अंतिम अंक-
6 आए तो अगले दो चरण में अंतिम अंक क्रमशः 4 और 5 आएंगे,
इस तरह कुल तीन चरणों में स्थिरांक 495 आ जाएगा।
7 आए तो अगले तीन चरणों में 3, 4 और 5, इस तरह चौथे चरण में
8 आए तो अगले चार चरणों में 2, 3, 4 और 5, इस तरह पांचवें चरण में
9 आए तो अगले पांच चरणों में 1, 2, 3, 4 और 5, इस तरह छठवें चरण में
2 आए तो 7 की तरह अगले तीन चरणों में 3, 4 और 5 इस तरह चौथे चरण में
3 आए तो 6 की तरह अगले दो चरणों में 4 और 5 इस तरह तीसरे चरण में
4 आए तो दूसरे चरण में 5 आ जाएगा और
5 आए तो पहले चरण में ही 495 आ जाएगा।

इसमें मजेदार यह कि विभिन्न चरणों में आने वाली संख्या में बीच वाली संख्या सदैव 9 होगी और पहली-तीसरी संख्या का योग 9 होगा यानी किसी भी अंक का पहला चरण उच्चतम से न्यूनतम घटाने पर 198, 297, 396, 495, 594, 693, 792 891 या 099 आएगा। राम दुहाई, तुलसी बाबा याद आए, जिन्होंने कह रखा है- ‘जैसे घटत न अंक नव, नव के लिखत पहार‘। इसमें मजेदार यह कि विभिन्न चरणों में आने वाली संख्या में बीच वाली संख्या सदैव 9 होगी और पहली-तीसरी संख्या का योग 9 होगा यानी किसी भी अंक का पहला चरण उच्चतम से न्यूनतम घटाने पर 198, 297, 396, 495, 594, 693, 792, 891 या 099 आएगा। राम दुहाई, तुलसी बाबा याद आए, जिन्होंने कह रखा है- ‘जैसे घटत न अंक नव, नव के लिखत पहार‘। पता नहीं कि कापरेकर ने यह सोचा या नहीं, लेकिन मुझे मिला कि इस तरह की तीन अंकों की संख्या को सैकड़ा-इकाई दहाई-दहाई, इकाई-सैकड़ा वाले यानी घटते से उन्हीं अंकों के बढ़ते क्रम वाली संख्या से अंतर निकाल लें, और इस अंतर को सीधे-सीधे (न कि बढ़ते क्रम में) उलटकर उसमें जोड़ लें, योगफल सदैव 1089 होगा।

टैब-विरत और जिज्ञासु होने के कारण अपने बचपन में खेला दूसरा खेल शुरू की स्थिति थी। मुझे पता है कि इस बालक ‘ख‘ की उम्र में लगभग तीन साल बड़ी बहन ‘क‘ है। सवाल बना- बहन और भाई, जिनकी उम्र का योग 21 और अंतर 3 वर्ष है, क्या सिर्फ इतना बता देने पर बहन और भाई की उम्र अलग-अलग निकाली जा सकती है। हां, क्यों नहीं। जवाब होगा 12 और 9। अब हम साथ-साथ सोचने लगे कि इस उत्तर तक किस तरह या कितने तरह से पहुंचा जा सकता है। पहला तो यह हुआ कि अनुमान कर लें कि दोनों की उम्र का योग 21 और अंतर 3 वर्ष का है तो उम्र 10-10 के आसपास होगी, लेकिन इसका योग 20 है और इसमें अंतर भी नहीं है तो आगे बढ़ें, ख-9 और क-11 करें तो अंतर 2 का और योग अभी भी 20 होगा। 8 और 12 करने पर अंतर 4 का और योग 20 का होगा, अब स्थिति स्पष्ट है कि उत्तर 9-11 और 8-12 के आसपास ही कहीं है। 3 का अंतर बनाने के लिए 8-11 करने पर योग 19 होगा तो 9-12 किया जाए, हल निकल आएगा। एक रास्ता यह भी हो सकता है कि पहले ही 21 में 3 घटा दिया जाए, इससे बचे 18 को क और ख में आधा-आधा, 9-9 बंट जाए, फिर घटाए गए 3 को बड़ी बहन ‘क‘ के 9 में जोड़ दिया जाए, हल 12 और 9 आ जाएगा। यही 5 साल, 7 साल के अंतर में देखा जा सकता है। फिर सोचें के दोनों की उम्र का अंतर सम संख्या में हो तो क्या होगा।

इस सीधे, मगर लंबे रास्ते पर भी विचार हुआ कि 1 और 21 से शुरू करें, आयु तो इसके बीच की ही होगी। तो, 2-20, 3-19, 4-18, 5-17, 6-16, 7-15, 8-14, 9-13 इस तरह जोड़ा बनाते हुए दोनों अंकों का जोड़ भी करते चले, जो यह 22 आता गया अंतर घटता गया 18, 16, 14, 12, 10, 8, 6, 4। 4 आ जाने पर रुके 9 और 13 को लिया, हल पर पहुंचते देर नहीं लगी कि 13 को 12 कर दिए जाने पर बात बन जाएगी यानी जोड़ा बनेगा 9-12, जिसका अंतर तीन और योग 21 होगा। इस तरह से भी सोचा गया कि जोड़ी 1-21 के बजाय 0-21 क्यों न हो 1-20, 2-19 ... इस तरह आगे बढ़ने पर अधिक आसान होगा, जोड़ा आ जाएगा 9-12, जो सीधे उत्तर पर आ जाएगा।

इसे हल करने का और क्या तरीका हो सकता है? क+ख=21 और क-ख=3 का समीकरण बना लें। 2क=24 आएगा तो क=12 आ जाएगा, इस तरह क-12 होगा और ख, कुल आयु 21 में - क की आयु 12=3 आ जाएगा। एक समीकरण ख को ले कर बन सकता है, जिसमें 2ख का मान 18 आएगा, इसलिए ख का मान 9 हो जाएगा, तो कुल 21-ख का मान 9=क का मान 12 आ जाएगा। इस तरह हल निकल आएगा, बहन ‘क‘ की उम्र 12 वर्ष और भाई ‘ख‘ की उम्र 9 वर्ष। इसे हल करने के सारे आसान तरीके अब मिल गए हैं, मानते यही सवाल एक बालक से पूछने पर उसने जल्द ही उत्तर दे दिया, संदेह हुआ कि उसे उत्तर पहले से पता था। पूछने पर कि कैसे हल किया, उसने एक अलग ही और आसान तरीका बताया। कहा कि 3 का अंतर और 21 में 3 सत्ते 21 है, इसलिए 3 का पहाड़ा पढ़ने पर 3 तिया 9 आया और 3 चौके 12। 12 और 9, 21 हो रहा था, सो उत्तर आ गया।

बातों में पता चला कि बालक रूबिक क्यूब मास्टर है। क्यूब के छह पहल से शुरू हुई बात घन यानी छह पहल वाले पासे-डाइस से आगे बढ़ी और पहुंची 1 से 100 तक की संभी संख्याओं के कुल योग तक। हमने बात उल्टी तरफ से शुरू की यानी इसके हल 5050 से। सोचने लगे कि इस हल तक पहुंचने के कौन-कौन से रास्ते हो सकते हैं। क्या इसे एक-एक जोड़ करने के लिए कागज-कलम और इसमें समय गंवाना जरूरी है या कोई आसान रास्ता हो सकता है, मनगणित वाला। एक से अधिक तरीके भी हो सकते हैं? कोई फार्मूला-सूत्र हो सकता है? निरंतर संख्याओं के कुल जोड़ के लिए सूत्र कैसे बनाया जा सकता है?

बचपन के साथियों ने रास्ता निकाला था कि 1 से 10, 11 से 20, 21 से 30 का जोड़ निकालते चलें और उन सभी का योग कर लें उत्तर निकल आएगा। इस पर बात गणित से तर्कशास्त्र पर आ गई। मोटे तौर पर गणित भी तो तर्क ही है और तर्क, गणित। तर्क आया कि फिर एक तरीका यह क्यों नहीं हो सकता कि 1-11-21 से 91 तक, इसी तरह 2-12-23 से 92 तक होते हुए 10-20-30 से 100 तक का जोड़ निकाल लें, फिर उस सबको जोड़ लें उत्तर आ जाएगा। कुतर्क आया कि कि तिरछी चाल चल कर भी हल आ सकता है यानी 1-12-23 ...100 या 10-19-28...91 तक। बात कान को सीधे के बजाय घुमा कर पकड़ने की होने लगी, पर लगा कि इसमें भी कुछ रोचक क्रम-विन्यास दिखेगा। बहरहाल, यह तय पाया गया कि इसके लिए कागज-कलम की जरूरत होगी। मन में मौखिक जोड़ करने में कठिनाई होगी और गलती भी संभावना रहेगी।

जबकि बालक ने सवाल सुनते ही तत्काल कहा कि दो-दो संख्याओं के जोड़े बना लें, जिसका योग 100 हो यानी 99+1, 98+2, 97+3 इस तरह ऐसे 49 जोड़े बनेंगे, क्योंकि 100 छूटा रहेगा और 50 छूट जाएगा। 100 के 49 जोड़े होंगे 4900, इसमें 100 जुड़ेगा तो 5000 और फिर 50 जोड़ देने पर उत्तर निकल आएगा 5050। उसका यह त्वरित जवाब चकित कर देने वाला था। मैंने छेड़ा, हम 100 को क्यों छोड़े। जोड़ा 100+1, 99+2, 98+3 इस तरह 101 के 50 जोड़े बनेंगे, जिसका गुणनफल सीधे 5050 आ जाएगा। बालक ने बात समझी, मगर एक और पैंतरा तलाश लिया, कहा कि 100 के जोड़े बनाना आसान है, क्योंकि पहला जोड़ा 99+1 नहीं, 100+0 बनेगा, ऐसे पचास जोड़े होंगे, 5000, बचा 50 वह इसमें जुड़ जाएगा, हो जाएगा 5050। इस तरह वह हार मानने को तैयार नहीं और मैं उसकी प्रत्युत्पन्न मति, तर्क-बुद्धि और गणितीय सोच पर चकित के साथ-साथ कि ऐसा मैं क्यों कभी नहीं सोच पाया था।

अब बात आगे छह पहल-घन और सूत्र पर। पासे के छह पहलों पर तीन जोड़ी बनती है, जिसमें सामान्यतः 6 वाले पहल के पीछे 1, 5 के पीछे 2 और 4 के पीछे 3 होता है। यह सूत्र की दिशा में एक संकेतक कदम है, यानि 6-1, 5-2 और 4-3 को जोड़ते चलें तो 7 के तीन जोड़े यानि कुल 21। इस तरह पहुंचे कि 1 से 6 तक निरंतर सभी छह संख्याओं का योग 21 होगा। 1 से 4 तक की संख्या का योग 10 मौखिक जोड़ सकते हैं 1+4=5 और 2+3=5, दोनों 5 मिला कर 10। कुछ आगे बढ़ कर 1 से 10 को लें। 1+9, 2+8, 3+7, 4+6, ये सभी 10 चार बार यानी 40। बचा एक 5 और 10, इस तरह 40+5+10=55। यहां भी यदि 10 का जोड़ा 0 के साथ बना कर 50 और बचा 5 जोड़ कर 55 आएगा या 10 के साथ 1 का जोड़ा बनाने के क्रम में 5 का जोड़ा 6 के साथ बन कर 11 हो जाएगा, इस तरह 11 के पांच जोड़े बन कर 55 आ जाएगा। अलग-अलग तरह से जोड़-घटाव करते निकल आता है कि 1 से शुरू होने वाली संख्या के साथ 10 हो 100 हो 25 हो या कोई अन्य संख्या, उदाहरणार्थ- 78, सूत्र होगा, अंतिम संख्या में पहली संख्या यानी 1 जोड़ का अंतिम संख्या से गुणा कर दें और उसे दो से भाग दे दें। इसे जांचने के लिए छोटी संख्या के उदाहरण में आसानी होगी। जांच के लिए उदाहरण में घन वाली संख्या 6 को लें, 6 में 1 जोड़ कर 6 से गुणा करें, जो 7 गुणा 6=42 होगा, इसे 2 से भाग देने पर आ जाएगा 21। इसी तरह 10 को लें तो 10+1 गुणा 10=110, इसमें 2 का भाग देने पर 55। इसमें इसी तरह का और भी कुछ सोचा, खोजा जा सकता है।

इस बातचीत से बालक कुछ देर टैब से दूर रहा। हां! उसके अभ्यास की भाषा अंगरेजी थी, मेरी हिंदी, हम दोनों को बातचीत में जोड़ रहा था गणित। शुरुआत हुई मेरे द्वारा उसे गणित में चुनौती देने से और पहुंची कि मैं गणित में उसके बराबर किस तरह टिका रह सकूं, खेल बराबरी पर छूटे। बहरहाल, उसे कुछ हासिल हुआ या नहीं, पता नही, शायद मुझे एक सीमा तक मित्र स्वीकार किया, कुछ इस तरह कि चलो, ठीक है, तुम्हें गणित आती हो या नहीं, रुचि तो है। याद करने लगा, जब इस बालक वाली उम्र में मुझे बताया गया था, सम और विषम संख्या। सम संख्या, जो दो से पूरी कट जाए। दो से कटने वाली संख्या, जिसके अंत में 2, 4, 6, 8 या 0 हो। तीन से कटने वाली संख्या, जिसका अंतिम योग 3 हो, 5 से कटने वाली संख्या जिसके अंत में 5 या शून्य हो।

इसी तरह प्राथमिक कक्षाओं में हमने घड़ी में समय देखना सीख लिया था, जोड़-घटाव के साथ गुणा-भाग भी। तब पिताजी ने 12 घंटे और 60 मिनट की जिज्ञासा पर बताया था कि 12 वह संख्या है, जो 2, 3, 4 और 6 सभी से पूरी कट जाती है और ज्योही मैंने 60 के लिए सवाल किया, उन्होंने जवाब खुद ढूंढने को कहा। मुझे समझते देर नहीं लगी कि 60 वह संख्या है जो 2, 3, 4 और 6 के बीच छूटे 5 से भी पूरी-पूरी कट जाती है। बाद में कभी मैंने अनुमान किया था कि वृत्त का 360 अंश भी 60 का ही गुणक है और उसका संबंध 360 दिनों के साल और 12 महीने में हमारी गोलाकार पृथ्वी-वृत्त से जुड़ा हो सकता है। ऐसा हो, न हो, कभी जांचा नहीं, ऐसा होने का कोई तार्किक आधार मेरे पास नहीं है, मेरी गति खगोल में नहीं है और न ही गणित में इतने से आगे। हो सकता है मेरी सोच गलत हो, अकारण संयोग बिठाने का प्रयास हो, फिर क्या यह संभव नहीं कि भविष्य की खोजों से यही सही साबित हो या खगोल-गणित भी साबित कर चुका हो कि यह ऐसा इन्हीं कारणों से है। बहरहाल, 12, 60 और 360 का हिसाब बता कर मैंने एक बालक को चौंकाया था, दो-तीन दिन बाद मिलने पर उसने मुझसे पूछ लिया कि 360 में और क्या खास बात है? मैंने क्लू मांगा। उसने कहा 12 और 60 के साथ कटने वाली संख्या आपने बताई है, 360 की क्यों नही, और इससे अधिक क्लू नहीं दूंगा। मैंने समय चाहा। उसने कहा- मगर आपने यह पहले क्यों नहीं सोचा था, आपको मुश्किल में क्यों डालूं, चलिए बताए देता हूं। 360 वह संख्या है जो 7 के अलावा 1 से 10 तक की सभी संख्याओं से पूरी कट जाती है।

ऐसी और भी कई तरकीबों से हम चमत्कृत होते थे, जिनमें से दो याद आ रही हैं। पहली- तीन अंकों की कोई संख्या सोच लें (456), इन्हीं तीन संख्याओं को उसके आगे दुहरा कर लिख लें (456456)। इसे क्रमशः विभाजित करें 7, 11 और 13 से। ऐसा करने से वही संख्या निकल आएगी, जो सोची गई थी- 456456/7 = 65208/11 = 5928/13 = 456। ऐसा इसलिए, क्योंकि 7x11x13= गुणनफल 1001 होता है यानी तीन अंकों की किसी संख्या के आगे उसे दुबारा लिख कर छह अंकों की बनाने में वह उस संख्या में 1001 के गुणा करने के बराबर होती है। देखें, क्या यह दो अंकों की सख्या में किस तरह होगा। इसके लिए दो अंकों की संख्या को दो बार लिख लें। तीन अंकों वाली संख्या के लिए भाग 1001 से होता है, तो क्या यहां 101 से होगा, ऐसा अनुमान करना सही साबित होता है। फिर इसकी पहेली क्यों नहीं बनाई जाती? तुरंत अनुमान लगा सकते हैं कि 101 अभाज्य संख्या है इसलिए यह 1 और स्वयं 101 के अलावा किन्हीं अन्य दो संख्याओं का गुणनफल नहीं हो सकता, इसलिए तीन अंकों की पहेली के गुणकों 7, 11 और 13 जैसा किया जाना संभव नहीं है। 101 का 101 ही रहेगा, इसलिए पहेली नहीं बन पाता। इसी तरह दूसरी- सोची गई तीन अंकों की संख्या (357) का योग (15), उससे घटा दें (357-15=342), इसमें कोई एक अंक हटा कर बचे दो अंक बताएं (34), बताई गई संख्या 9 के निकटतम गुणक से जितनी कम होगी, (34- 36 से 2 कम) वही हटाई गई संख्या (2) होगी। 342 के इस उदाहरण में 3 हटाएं तो वह 42 यानी 45 से 3 कम और 4 हटाएं तो 32 यानी 36 से 4 कम होगी। संख्या पूरी कटे तो हटाई गई संख्या 0 या 9 हो सकती है।

एक दौर दैनिक लॉटरी टिकट का आया, उसमें अंतिम अंक के लिए जोड़ घटाव होता रहता था, जैसा बंबई का सट्टा बाजार ‘वरली मटका‘, और हमारे छत्तीसगढ़ का वरली-भाटापारा। अखबार में इसे ‘तबाही के आंकड़े‘ शीर्षक से बॉक्स में छापा जाता था। लोग अखबार के कामिक्स स्ट्रिप में आतिशी शीशा ले कर आंखें गड़ाए रहते थे। माना जाता था कि कल खुलने वाला नंबर, कहीं बारीक चोरी से इसमें कहीं छपा होता है। मुझे हमारे गांव के एक गणितज्ञ लावनिया जी ने एक छोटी सी हैंडबुक दी थी, जिसमें रैंडम नंबर और नंबर जनरेटर का गणित समझाया गया था, शायद 0 और 5 को पुअर जनरेटर कहा गया था। यह पढ़ कर लॉटरी में आने वाले नंबरों को समझने का प्रयास किया, उसमें मुझे उतनी ही सफलता मिली, जितनी उन्हें, जिन्होंने न यह किताब पढ़ी थी, न बहुत अधिक जोड़-घटाव आता था। तो अब मेरा हासिल कि मैंने उसके साथ अपना बचपन याद कर लिया और गणितबाजी की रुचि के साथ जो यह समय बीता, जुगाली के लिए उसमें मेरे लिए फिर से रस भर गया।

Friday, July 10, 2026

नकटी के क्लॉड

मुक्तिबोध की कहानी है ‘क्लॉड ईथरली‘। कहानी हिरोशिमा, नागासाकी पर परमाणु बम गिराने वाले पायलट की है। कर्तव्यनिष्ठ क्लॉड अपने काम को सफलतापूर्वक अंजाम देता है, मगर उसका जीवन आत्मग्लानि से नर्क बन जाता है। मोटी सी बात इतनी है, मुक्तिबोध इस वास्तविक पात्र को ले कर जो बुनते हैं, जादुई है। सभ्यता, विभीषिका और संवेदनाओं का विचलित कर देने वाला चित्रण। नकटी घटना के साथ ऐसी और भी बातें याद आती रहीं।

घटना 29 जून 2026 की है, जिस दिन सुबह-सुबह ‘प्रस्तावित? विधायक कालोनी‘ के लिए रायपुर विमान तल के पास स्थित इस गांव के पीएम आवास वाले घरों सहित लगभग 80 घर, सरकारी जमीन पर अतिक्रमण मान कर बुलडोजर-जेसीबी से ढहा दिए गए। ‘गांव‘ नकटी, जिसका नाम ‘सज्जनपुर‘ बदलने की बात आई, तब तक गांव-बस्ती के हालात ही बदल गए। शासन-प्रशासन द्वारा पुनर्वास हेतु नया रायपुर में फ्लैट आवंटन बताया गया, ग्रामवासियों द्वारा उसे अपर्याप्त और सुविधा रहित बताया गया।

भला करना किसे नहीं भाता। अनुमान होता है कि यहां भी भर-भर भलाई की जाती रही होगी, योजना, लक्ष्य की पूर्ति के आंकड़े सुधरे होंगे। अपना कुछ भला लोगों ने खुद से कर लिया होगा। बहती गंगा में हाथ भी धुले होंगे, नियमों-प्रावधानों पर जन-सेवा हावी-प्रभावी हुआ होगा। गेहूं में घुन पिसा होगा और कुछ घुन, गेहूं के आड़ में रख कर खुद को वाजिब साबित कर रहे होंगे। यह सारी ‘भलाई‘ इकट्ठे बुराई का फोड़ा बन कर अब फूटा है। प्रजातांत्रिक व्यवस्था की खासियत यही है कि कोई एक मनमाना निर्णय नहीं ले सकता। इसके चलते व्यवहार में श्रेय की होड़ लग जाती है और विपरीत स्थिति में संयुक्त जिम्मेदारी होने के कारण, जो चाहे मुंह बचा सकता है। भारतेन्दु के नाटक ‘अंधेर नगरी‘ की तरह। यह भी ध्यान रहे कि सरकार द्वारा समय-समय पर कब्जे को नियमित करना, पट्टा देना, कर्ज की माफी जैसे अनुग्रह किए जाते रहते हैं। ऐसे मौकों पर जिन्होंने नियम-विरुद्ध लाभ नहीं उठाया, कर्ज नहीं लिया, अफसोस करते हैं। उन्हें लगता है कि उन्होंने नासमझी कर दी। इसे दूसरे उदाहरण में देखें, किसी आयोजन में निर्धारित समय पर पहुंच जाने वाले को तब अफसोस होता है, जब कार्यक्रम समय से आरंभ नहीं होता, अतिथियों तथा अन्य आमंत्रितों, संभावितों के आ जाने की प्रतीक्षा की जाती है।

तोड़फोड़ की घटना के बाद प्रभावितों की पहली प्रतिक्रिया में जनप्रतिनिधियों विधायक और सांसद के प्रति रही, ध्यान देने पर समझ में आया कि उनके प्रति आक्रोश इसलिए नहीं है कि उन्होंने घर तुड़वाया, बल्कि इसलिए है कि आश्वासन के बावजूद भी बचा क्यों नहीं पाए? गुस्सा उचित पुनर्वास न होने के कारण भी था। इस जद में प्रशासन और अन्य जनप्रतिनिधि-मंत्री भी आ गए, जिन्हें घरों को तुड़वाने के लिए जिम्मेदार माना गया। दलगत के साथ अंदरूनी गुटीय राजनीति गरमाने लगी, परतें खुलने लगीं, गांव के सरपंच, पंचायत सचिव, चरागन, पट्टा, प्रधानमंत्री आवास, बेजा-कब्जा। फिर वित्त मंत्री, राजस्व मंत्री, आवास एवं पर्यावरण विभाग, छत्तीसगढ़ गृह निर्माण मंडल, नवा रायपुर अटल नगर विकास प्राधिकरण, जिला प्रशासन निशाने पर आते गए। घटना छोटी-मोटी नहीं थी, लेकिन यह भी ध्यान में आता रहा कि संवेदनशील क्षेत्र की और मीडिया के पहुंच के करीब की है। ऐसा भी नहीं कि पीड़ितों की व्यथा कमतर है, मगर धरना, आंदोलन-प्रदर्शन के लिए संगठन कौशल और क्षमता की आवश्यकता होती है, इस प्रकरण में मुझे पीड़ितों का नेतृत्त्व करने वाले चेहरे या नाम नहीं दिखाई पड़े। संभव है कि परोक्ष प्रभावित हित-साधन करने वाले वाह्य उत्प्रेरक रहे हों।

# मेरठ के पुश्तैनी जल्लाद पवन, जिन्हें फांसी देता है, उसको क्या लगता होगा, शायद अपने मन को समझा लेता हो कि भले ही उस अपराधी ने उसके लिए कुछ गलत न किया हो, दुर्दांत अपराधी है, जिसको मौत दी जा रही है। ज्यों ‘एनकाउंटर‘ में अपराधियों को मार गिराने वालों को लगता होगा।
# 2013 में बिहार में एक रेल की पटरी पार करते, बड़ी संख्या में तीर्थयात्री कट-मरे थे। घटना के बाद ट्रेन में आग लगा दी गई थी और ड्राइवर के साथ मरपीट की खबरें आई थीं। दशहरा 2018 के अमृतसर हादसे में रेल पटरी पर आए लोगों की कट कर मौत हुई थी। घटना में ड्राइवर पर आरोप था कि उसने न तो गति धीमी की, न ही हॉर्न बजाया, जबकि ड्राइवर ने आपात ब्रेक का प्रयास किया और हॉर्न भी बजाया था। बाद में यह बात सामने आई कि जलते रावण की ओर ध्यान होने, पटाखों के शोर और धुएं के कारण ऐसा हुआ। घटना में दशहरा आयोजकों, रेल प्रशासन और ड्राइवर को दोषी मानते कार्यवाही की मांग उठी थी। ऐसी मिलती-जुलती घटना-खबर की जानकारी आती रहती है। 
# दूसरी तरफ नानावटी का मुकदमा याद आता है या फिल्म ‘अचानक‘, जिसमें ऐसा फौजी जो सीमा पर जिन्हें मार गिराता है, जिनसे उसका सीधे कोई लेना-देना नहीं, उन्होंने फौजी का कुछ नहीं बिगाड़ा, फौजी उन्हें कतई नहीं जानता, व्यक्तिगत स्तर पर उसके प्रति जिन्होंने कुछ भी नहीं किया है, उन्हें मारने पर पदक मिलता है। वहीं दूसरी तरफ पत्नी के विश्वासघात के कारण स्वयं सीधे आहत होने के कारण की गई हत्या के अपराध में फांसी की सजा सुनाई गई है।
# वाल्मीकि की कथा में वाल्मीकि निरपराधों से लूट-मार करता है, यह मानते कि वह यह खुद के लिए नहीं, बल्कि अपने आश्रित परिवार-जन के लिए कर रहा है, जबकि उसका परिवार उसके कृत्य के फल में खुद को भागी मानने से इंकार करता है।

नकटी की घटना में मेरा कोई व्यक्तिगत फायदा-नुकसान नहीं हुआ है। घटना से जुड़ी खबरों को पढ़ते-देखते प्रभावितों के प्रति अन्य किसी नागरिक जैसी मानवीय संवेदना मेरे मन में भी है। घटना से जुड़े पक्षों से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रभावित नहीं हूं। शायद इसलिए तटस्थ उन पक्षों की ओर भी सोच पा रहा हूं, जो नजर-अंदाज हैं। इस सारी भूमिका के बाद स्पष्ट हो गया होगा कि मेरे मन में चल रहा है कि नकटी-क्लॉड यानी जेसीबी-बुलडोजर ऑपरेटरों द्वारा अपना काम करते और काम के बाद उसका प्रभाव देखते-सुनते कैसा महसूस होता होगा। एक तरफ उन्हें सौंपे हुए काम को कर्तव्य-निष्ठा, सारे कौशल के साथ तत्परता से पूरा करना होता है, वहीं ऐसे किसी का घर ढहाना, जिसे वे जानते भी नहीं, कैसा लगता होगा। किसी घटना में उपकरण, साधन या औजार इस्तेमाल हुआ तो किस-किस को और कितना-कितना जिम्मेदार माना जाए, औजार-अविष्कारक, उसे बनाने वाला, बेचने वाला, चलाने वाला, चलवाने वाला ... ?

देवदत्त के तीर से घायल हुए हंस और बचाने का प्रयास करने वाले सिद्धार्थ की कहानी के अंत में नीति वाक्य होता था- ‘मारने वाले से बचाने वाला बड़ा‘। किसी घटना पर सोचते हुए मन में आता है निमित्त कौन? कौन कर्ता, किसका कर्म, किस करण के द्वारा ... व्याकरण का कारक-पाठ याद आ जाता है- कर्ता-ने, कर्म-को, करण-से(के द्वारा) ... बात पाप-पुण्य की हो तो किसके खाते क्या आएगा!