Saturday, June 6, 2026

सौंदर्य का राज

‘पुष्पा हंस‘ नाम कभी बचपन में सुना था, माना लिया था कि काल्पनिक होगा, अब खोजबीन में पता लगा कि पिछली सदी के पांचवें-छठें दशक की गायिका-अदाकारा थीं। इतनी नामचीन, कि लक्स के विज्ञापन में भी आती थीं। 

जी हां, लगभग 35-40 साल का दौर ऐसा था कि अभिनेत्री, तब तक टॉप की नहीं मानी जाती थी, जब तक विज्ञापन कर वह यह खुलासा न कर दे कि उसके सौंदर्य का राज ‘लक्स‘ है, जो सौंदर्य और त्वचा की रक्षा करता है। इतने के बाद स्वाभाविक कि ‘लक्स‘ द्वारा खुद से खुद को, चित्र तारिकाओं का सौंदर्य साबुन कहा गया। पुराने जमाने में वे इससे ‘अपनी त्वचा की रक्षा करती‘ और उत्कृष्ट बताई जाती थीं, यह साबुन सौंदर्य रक्षक होता था, सुरैया जैसी गायिका-नायिका आभार व्यक्त करती थीं। लक्स विज्ञापन वाले हेमामालिनी और माधुरी दीक्षित तक के चित्र जेहन में अब भी हैं। हां, तब लक्स टॉयलेट साबुन होता था, यानि कपड़ा धोने से अलग, नहाने का साबुन। अब तो टॉयलेट ‘छिः छिः‘ हो गया है। 

बहरहाल, ‘आदमी वो है, जो मुसीबत से परेशां न हो‘, ‘चांद-सूरज को भी लग जाता है इक बार ग्रहण‘ और ‘ये है दुनिया, यहां दिन ढलता है शाम आती है, सुबह हर रोज नया नया ले के पयाम आती है‘ जैसी पंक्ति वाला, 1950 की सोहराब मोदी की फिल्म ‘शीश महल‘ में पुष्पा हंस का गाया गीत यू-टयूब पर जा कर सुन सकते हैं।

Thursday, June 4, 2026

मन की बात - मल्हार

माननीय प्रधानमंत्री जी ने 31 मई 2026 को मल्हार का नाम लेकर, मानों हम सबके मन की बात कह दी। मल्हार, सदियों-पीढ़ियों से हम छत्तीसगढ़ियों के मन में जो बसा है। माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने कहा- ‘‘हमारी सरकार भारत की ऐसी अमूल्य धरोहरों के संरक्षण के लिए लगातार प्रयास कर रही है। इसी क्रम में ‘ज्ञान भारतम् अभियान‘ के तहत छत्तीसगढ़ के मल्हार में भी एक महत्वपूर्ण खोज हुई है। यहां तीन दुर्लभ ताम्र पट्टिकाएं मिली हैं। ये पांडुवंशी राजवंश के महर्षि बालार्जुन के शासनकाल से जुड़ी मानी जा रही हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि ये inscriptions छठी-सातवीं सदी के हैं यानि चौदह-सौ, पंद्रह-सौ साल पुराने ये ताम्र पट्टिकाएं प्राचीन ब्राह्मी लिपि और पाली भाषा में लिखी गई हैं। इनसे उस समय की शासन-व्यवस्था, धर्म और संस्कृति के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है।‘‘ निसंदेह ‘ज्ञान भारतम्‘ अभियान अमूल्य धरोहरों के संरक्षण की अहम् योजना है। इसी प्रकार इसमें भी कोई संदेह नहीं कि मल्हार के पुरावशेष-ताम्रपत्रों से प्राचीन शासन-व्यवस्था, धर्म और संस्कृति के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है।

इस संदर्भ में मेरा ध्यान इससे मेल खाते उस ताम्रलेख की ओर गया, जो मध्यप्रदेश शासन के आयुक्त, पुरातत्व एवं संग्रहालय की शोध-पत्रिका ‘पुरातन‘ अंक-9, 1994, ‘Art of Chhattisgarh, Spacial Issue‘ में प्रकाशित हुआ है। इसका अध्ययन-प्रकाशन जी.एल. रायकवार तथा राहुल कुमार सिंह यानी मेरे द्वारा किया गया है, अतः स्वाभाविक ही हम उत्साहित हैं, और यह शोधपत्र-लेख प्रस्तुत किया जा रहा है-

महाशिवगुप्त बालार्जुन का 57 वें राज्य वर्ष का जुनवानी (मल्हार) ताम्रलेख
जी.एल. रायकवार 
राहुल कुमार सिंह 

बिलासपुर जिले के प्रसिद्ध पुरातत्वीय स्थल मल्हार ग्राम सीमा के निकट जुनवानी ग्राम स्थित है। प्राचीनता और पुरावशेषों की दृष्टि से जुनवानी मल्हार से अभिन्न ही है। प्राचीनकाल में निश्चय ही निकटवर्ती अन्य ग्रामों बूढ़ीखार, जैतपुर, चकरबेड़ा आदि की भांति जुनवानी भी मल्हार की सीमा में सन्निहित था। ‘जुनवानी‘ शब्द से प्राचीन बसावट का अर्थ ध्वनित होता है। अरपा तथा लीलागर नदी के तटवर्ती भू भाग में स्थित मल्हार ग्राम तथा चतुर्दिक क्षेत्र अत्यंत उर्वर है। इतिहास के आरंभिक काल के अवशेष, यथा- आवासीय संरचना, मृण्मयी सामग्री तथा कलाकृतियाँ इस क्षेत्र से प्राप्त हुई हैं और ईस्वी पूर्व लगभग दूसरी-तीसरी सदी से यह निरंतर राजनैतिक, धार्मिक तथा व्यापारिक गतिविधियों का केन्द्र रहा है। 11-12वीं सदी ई. में कलचुरियों की राजधानी रतनपुर में स्थापित हो जाने के बाद भी मल्हार में तत्कालीन सक्रियता और गतिशीलता के प्रचुर प्रमाण उपलब्ध हैं मल्हार क्षेत्र में मिट्टी का परकोटा युक्त गढ़, अभिलेख, सिक्के, मृण्मयी सामग्री, पात्र व खिलौने, मुहर, लघु फलक, पाषाण प्रतिमाओं तथा मंदिर आदि स्थापत्य संरचनाओं के विविध अवशेष मुख्य हैं। इन प्राचीन अवशेषों में धर्म सहिष्णु स्थिति का बोध, शैव, वैष्णव, बौद्ध जैन, शाक्त धर्म से संबंधित पुरावशेषों से प्रकाशित होता है।

मल्हार क्षेत्र से प्राप्त आरंभिक अभिलेख ब्राह्मी लिपि का प्रतिमा लेख है, जो विष्णु प्रतिमा पर दान के उल्लेख युक्त उत्कीर्ण है, इस काल के अन्य लेख स्मृतिपरक हैं। परवर्ती काल के मेकल के सोमवंशी, शरभपुरीय, कलचुरी आदि राजवंशों के अभिलेख भी यहाँ प्राप्त हुए हैं। श्रीपुर के सोम-पाण्डुवंशी शासकों के अभिलेख तथा महाशिवगुप्त बालार्जुन के ताम्रलेख व शिलालेख भी प्रकाश में आए हैं इस प्रकार यह प्राचीन स्थल पुरावशेषों की प्रप्ति की दृष्टि से अग्रगण्य हैं।

विवरणाधीन यह ताम्रलेख राजमुद्रा व छल्ले में गुंथे तीन पत्र, सन् 1987 के अंत में ग्राम जुनवानी अथवा मल्हार सीमा में कृषकों को प्राप्त हुआ था। जुनवानी के डा. अहमद हसन खान ने इसे कृषकों से प्राप्त कर 18 जनवरी 1988 को मल्हार निवासी, राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित शिक्षक श्री रघुनंदन प्रसाद पाण्डेय को दिया, इसके पश्चात् श्री पाण्डेय द्वारा यह ताम्रलेख रजिस्ट्रीकरण अधिकारी कार्यालय, बिलासपुर में पंजीयन हेतु प्रस्तुत किया गया। स्थानीय पुरातत्व विभाग के अधिकारियों द्वारा आरंभिक उपचार व अध्ययन कर लेख का प्रथम वाचन श्री पाण्डेय को सौंपा गया। यह ताम्रपत्र लेख अब उनकी सहमति से प्रथमतः पूर्ण पाठ सहित सम्पादित किया जाकर प्रकाशित हो रहा है। 

तीन ताम्रपत्रों पर उत्कीर्ण यह लेख राज मुद्रांकित छल्ले में गुँथा है। समान आकार के तीनों पत्रों में प्रत्येक की चौड़ाई 21 से. मी. और ऊँचाई 14.5 से. मी. है। राजमुद्रा का व्यास 9 से. मी. तथा संपूर्ण ताम्रपत्र का मुद्रा सहित भार 2900 ग्राम है। ताम्रपात्र के दायें हाशिये में छिद्र है, जिसमें गुँथे छल्ले के दोनों छोर मुद्रा से जुड़े हैं। मुद्रा के उपरी भाग में त्रिशूल और कमण्डलु के मध्य बैठे हुए नन्दी की आकृति है, इसके नीचे दो पंक्तियों का लेख है। सबसे नीचे पूर्ण विकसित पद्म है।

तीन पत्रों वाले इस लेख में कुल 41 पंक्तियाँ उत्कीर्ण हैं। प्रथम पत्र के बाह्य पार्श्व के मध्य में मात्र एक पंक्ति में तिथि अंकित है। शेष पाँच पृष्ठों पर आठ-आठ पंक्तियाँ उत्कीर्ण हैं, इस दृष्टि से यह लेख महाशिवगुप्त बालार्जुन के अब तक ज्ञात ताम्रपत्र लेखों में सर्वाधिक लम्बा है, साथ ही 57वें राज्य वर्ष के फाल्गुन मास का होने के कारण अद्यतन ज्ञात अंतिम लेख भी है। पेटिकाशीर्ष ब्राह्मी लिपि वाले लेख की भाषा संस्कृत है। अक्षर सुडौल तथा गहराई से खुदे हैं। श्लोकों तथा मुद्रालेख के अतिरिक्त शेष लेख गद्य में हैं। लिपि और अक्षर उत्कीर्णन की परिपाटी महाशिवगुप्त के पूर्व में प्राप्त ताम्रलेखों की भाँति है। लेख का उद्देश्य धार्मिक दान है। इस लेख के स्थान तथा व्यक्ति नाम एवं दान में दी गई भूमि की माप विशिष्ट एवं महत्वपूर्ण है।

लेख में आए स्थान नामों में उणिभोग, शिवगुप्त के पूर्व ताम्रपत्रों में ज्ञात है। कुरपद्रक का अभिज्ञान भी पूर्व के निकट स्थित ग्राम को कोलपदर से किया गया है। पाशिपद्र, सिरपुर के निकट स्थित पासिद है। सकुरपद्रक, इस क्षेत्र (सिरपुर के चतुर्दिक) के सांकरा आदि ग्राम नाम साम्य के आधार पर अनुमानित हैं। बालेश्वर भट्टारक तपोवन, सिरपुर के ही निकट स्थित भालेसर पहाड़ अथवा भालेसर ग्राम है। तुलपद्रक अनिश्चित है।

लेख में शैव धर्म की सोम परंपरा के गुरु-शिष्यों की श्रृंखला पर प्रकाश पड़ता है, जो अत्यंत महत्वपूर्ण है, संभवतः इस राजवंश का ‘पाण्डुकुल‘ नाम सोम दीक्षित होने के पश्चात् ही ‘सोमवंश‘ हुआ होगा। 

ऐसा प्रतीत होता है कि इस लेख द्वारा दान में दी गई भूमि तत्कालीन व्यस्त क्षेत्र में रही होगी, अतः विवाद की संभावना होने से भूमि का माप स्पष्ट किया गया है, जिसके अनुसार पूर्व में नदी (महानदी) के आधे भाग से उत्तर-दक्षिण 7350 हाथ, दक्षिण में पूर्व-पश्चिम 6150 हाथ, पश्चिम में दक्षिण-उत्तर 7000 हाथ, तथा उत्तर में पश्चिम-पूर्व 6350 हाथ भूमि दान दी गई, जिसमें हाथ का मान 24 अंगुल के बराबर स्पष्ट किया गया है, इस प्रकार के उल्लेख के कारण यह लेख अत्धिक महत्वपूर्ण है।
 
दान की तिथि, सम्वत् 57 (राज्यवर्ष) के फाल्गुन मास, कृष्ण पक्ष का द्वादश दिन है। 

मूल पाठ 
           

टीप -

0 इस ताम्रपत्र की जानकारी संस्कृति विभाग, छत्तीसगढ़ शासन द्वारा 2005 में प्रकाशित परिवर्धित ‘उत्कीर्ण लेख‘ में भी शामिल है। साथ ही इन ताम्रपत्रों पर अन्य पुराविदों ने भी अपने महत्वपूर्ण शोध-लेख प्रकाशित किए हैं। जिनमें मुख्य डॉ. सुस्मिता बोस मजुमदार का शोधपत्र है, जो 'KALHAR' (White Water-Lily) STUDIES IN ART, ICONOGRAPHY, ARCHITECTURE AND ARCHAEOLOGY OF INDIA AND BANGLADESH (Professor Enamul Haque Felicitation Volume - 2007) में 'Re-editing the Junwani Copper Plate Inscription of Mahasivagupta Balarjuna, Regnal Year 57' शीर्षक से प्रकाशित हुआ है। इस लेख में हमारे पाठ में कुछ संशोधन सुझाए गए हैं, जो हमें स्वीकार हैं, यद्यपि इस लेख में उनके द्वारा सिरपुर लक्ष्मण मंदिर शिलालेख को Sirpur plates लिखा जाना त्रुटिपूर्ण है। इस लेख में विवेच्य ताम्रपत्र पर पुरालेखों के मूर्धन्य विद्वान डॉ. अजय मित्र शास्त्री के शोधपत्र का हवाला देते यथास्थान उनके द्वारा की गई टिप्पणियां भी महत्वपूर्ण हैं।

0 माननीय प्रधानमंत्री जी के ‘मन की बात‘ के कुछ तथ्य भिन्न हैं, इस संबंध में पुष्टि नहीं हो सकी है कि क्या वहां किसी अन्य ताम्रपत्रलेख की चर्चा है, मगर स्थानीय समाचार-पत्रों में प्रकाशित खबरों के आधार पर अनुमान होता है कि आंशिक भिन्नता के बावजूद ‘मन की बात‘ का ताम्रपत्र, जुनवानी (मल्हार) का उक्त ताम्रपत्र ही है।

0 आवश्यक संदर्भ की दृष्टि से उक्त ताम्रपत्र के पाठ का चित्र ‘उत्कीर्ण लेख‘ के संबंधित पेज से लिया गया है। ध्यातव्य कि प्राचीन अभिलेखों का पाठ, संपादन तथा उसका प्रकाशन दुरूह कार्य है और इसमें पाठ-भेद, अशुद्धियां संभव होती हैं।

0 उक्त ताम्रपत्रों के वर्तमान संधारक श्री संजीव पांडेय (श्री रघुनंदन प्रसाद पाण्डेय के पुत्र) के संग्रह में एक अन्य प्राचीन ताम्रपत्र भी है, जो अन्य प्राप्तियों के आधार पर मेकल के पाण्डुवंशी शासकों के तीन पत्रों के सेट का बिचला पत्र अनुमानित है। नवभारत समाचार पत्र के चित्र में श्री संजीव के साथ बांयें हाथ में विवेच्य ताम्रपत्र और पीछे दाहिने हाथ में वह अकड़ा ताम्रपत्र, जिसका चित्र इस समाचार के साथ अलग से भी है, दिखाई दे रहा है। यह इस आधार पर कह सकता हूं कि ये वही ताम्रपत्र हैं, जिनका अवलोकन श्री रघुनंदन प्रसाद जी ने हमें कराया था।

0 प्रसंगवश सामान्यतः प्राचीन अभिलेखों में शिलालेख निर्माण आदि की सूचना-प्रशस्तियां होते हैं और ताम्रपत्रलेख, जिन्हें ताम्र-शासन भी कहा जाता है, दान के अधिकार पत्र होते हैं। छत्तीसगढ़ में अधिकतर ताम्रपत्रों का काल पांचवीं-छठीं सदी से बारहवीं-तेरहवीं सदी तक का है। इनमें सामान्यतः आरंभिक काल के ताम्र-शासन, शरभपुरीय और पांडु-सोमवंशी शासकों के हैं, तीन पत्रों का सेट होता है, जिसके पहले और तीसरे पत्र का बाहिरी हिस्सा बिना लिखावट का होता है। बीच के प्लेट के दोनों ओर तथा पहले और तीसरे पत्र के भीतरी पार्श्व में लिखावट उत्कीर्णन होता है। परवर्ती काल के कलचुरि ताम्रपत्र, दो पत्रों का सेट होता है, जिसके भीतरी भाग पर लिखावट होती है, ऐसा उत्कीर्ण किए गए अक्षरों को घिसने से बचाने के लिए होता है। ये ताम्रपत्र राजकीय मुद्रा वाले छल्ले से बंधे होते हैं। 

0 ‘ज्ञान भारतम्‘ अभियान के दायरे में मेरी जानकारी में सामान्यतः प्राचीन इस जैसी पुरा-सामग्री, ताम्र-शासन शामिल नही की जाती है। इस ताम्रपत्र की प्रविष्टि सत्यापित है अथवा अस्वीकृत, इसकी जानकारी अब तक के प्रयास में मुझे नहीं मिल सकी है।

0 ‘मन की बात‘ पर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री जी का ‘X‘ पर संदेश 


0 आंचलिक समाचार-पत्र दैनिक भास्कर के संबंधित क्लिप

0 उल्लेखनीय है कि मल्हार पूर्व में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के हैदराबाद सर्किल, विशाखापट्टनम सब-सर्किल में था। सारा कारोबार अंग्रेजी में होता था। तब श्री रघुनंदन प्रसाद पाण्डेय के पिता श्री छेदीलाल पाण्डेय, शिक्षक उस अंचल में ऐसे व्यक्ति थे, जिन्हें अंग्रेजी का अच्छा अभ्यास था। विभागीय अधिकारी-कर्मचारियों के मल्हार आने पर अधिकतर वे ही उनसे वार्तालाप करते थे और मल्हार के पुरावशेषों की सुरक्षा, संरक्षण आदि के लिए संबंधित विभागों, अधिकारियों को अंग्रेजी में लिखा पोस्टकार्ड भेजा करते थे, इस अवसर पर उनके स्तुत्य प्रयास स्मरणीय हैं। जैसा वे बताया करते थे, उन्हीं के प्रयासों से लगभग सन 1936 में पं. लोचन प्रसाद पांडेय जी ने मल्हार मुकाम किया था। तब पातालेश्वर मंदिर टीले में दबा था, मंदिर के प्रवेश-द्वार की नदी-देवियों की पूजा महामाया के रूप में की जाती थी। ग्रामवासियों के श्रमदान से टीले की खुदाई लोचन प्रसाद जी के मार्गदर्शन में कराई गई, जिसके फलस्वरूप वर्तमान पातालेश्वर मंदिर उजागर हुआ। फिर यही परिसर अन्य प्रतिमाओं से संग्रह का स्थल बना। इसी तरह पुरातत्व के लिए ठाकुर गुलाब सिंह, नगर विकास की दृष्टि से ‘मल्हार महोत्सव‘ के आयोजक पं. शंकर चौबे और संगीत-साहित्य के क्षेत्र में रामप्रताप सिंह ‘विमल‘ गुरुजी को नहीं भुलाया जा सकता।

Monday, June 1, 2026

सिरपुर अवलोकितेश्वर

पिछले दिनों ‘हिन्दुस्तान टाइम्स‘ के पेज पर 30 अप्रैल 2026 को शुभम पांडे के अंग्रेजी समाचार का आशय है कि- 20 लाख डॉलर मूल्य की अवलोकितेश्वर की कांस्य प्रतिमा 1939 में लक्ष्मण मंदिर के पास मिले कांस्य की विशाल धरोहरों में से एक इस प्रतिमा को रायपुर के महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय में रखा गया था। यह प्रतिमा संग्रहालय से चोरी हो गई और 1982 तक अमेरिका में तस्करी करके ले जाई गई, और अंततः 2014 तक न्यूयॉर्क में एक निजी संग्रह में पहुंच गई। यही समाचार ‘अमर उजाला‘ के पेज पर ललित कुमार सिंह ने 01 मई 2026 को लिखा कि- अमेरिका ने लौटाई छत्तीसगढ़, रायपुर से चुराई गई कुल कीमत 20 लाख डालर की बेशकीमती ‘अवलोकितेश्वर‘ कांस्य प्रतिमा।

इसी दौरान मई पहले-दूसरे सप्ताह में संग्रहालय के पुरावशेषों के मूल दस्तावेज ‘अवाप्ति पंजियों‘ का दीमक के कारण नष्ट हो जाने की जानकारी भी आई। ऐसी स्थिति में संग्रहालय के पुरावशेषों के मिलान के लिए अवाप्ति पंजी की अन्य प्रति, पुराविदों द्वारा इस संग्रहालय के पुरावशेषों संबंधी शोधपत्र, संग्रहालय के पूर्व प्रकाशनों, लेख, समाचार तथा अन्य संबंधित कार्यालयीन अभिलेख सहायक हो सकते हैं। उक्त अवलोकितेश्वर प्रतिमा, जो रायपुर से चुराई गई बताई जा रही है, के संबंध में जानकारी कि वह कब चोरी हुई थी? चोरी की रिपोर्ट लिखाई गई थी? खोज-बीन के क्या प्रयास हुए थे आदि की जानकारी मुझे अब तक नहीं मिली है। मगर एक स्रोत जिसका हवाला नीचे दिया जा रहा है, सिरपुर की ‘अवलोकितेश्वर पद्मपाणि‘ का उल्लेख तथा चित्र उपलब्ध हुआ है, यदि यह वही प्रतिमा है तो इसका अवाप्ति पंजी क्रमांक-17, दर्शाया गया है।

महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय, रायपुर के पुरावशेषों संबंधी आधारभूत काम यहां सहायक संग्रहाध्यक्ष रहे बालचन्द्र जैन जी ने किया है। उन्होंने 1960 में संग्रहालय के पुरातत्व उपविभाग में संग्रहीत वस्तुओं का सूचीपत्र प्रकाशित कराया था, जिसका भाग 3, धातु-प्रतिमाएं हैं। 

उक्त सूचीपत्र-पुस्तिका में बताया गया है कि रायपुर स्थित महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय में संग्रहीत पुरातत्त्व सामग्री के विवरणात्मक सूचीपत्र प्रकाशित करने की योजना के अनुसार (१) प्रागैतिहासिक वस्तुओं, (२) पाषाण प्रतिमाओं, (३) धातु प्रतिमाओं, (४) मृण्मूतियों, (५) सिक्कों, (६) उत्कीर्ण लेखों, (७) हस्तलिखित पोथियों और (८) शस्त्रास्त्र तथा अन्य फुटकर सामग्री के अलग अलग सूचीपत्र तैयार किये जा रहे हैं जिन में यथोक्त प्रकार की कला सामग्री के विषय में विस्तार से विवरण दिये जायंगे। प्रस्तुत सूचीपत्र इस माला का तीसरा ग्रन्थ है। इस में संग्रहालय के संग्रह की समस्त धातु प्रतिमाओं को सम्मिलित किया गया है। माला का दूसरा ग्रन्थ जिस में पाषाण प्रतिमाओं का विवरण है, इसके साथ ही अलग से प्रकाशित हो रहा है। अन्य सूचीपत्र यथासमय प्रकाशित होंगे। 

पुस्तिका की विषय सूची क्रम में- 

एक - बौद्ध प्रतिमाएं, जिसके अंतर्गत सभी 11 सिरपुर से प्राप्त 1. तथा 2. भूमिस्पर्शमुद्रा में बुद्ध 3. वरदमुद्रा में बुद्ध 4. अवलोकितेश्वर पद्मपाणि 5., 6. तथा 7. पद्मपाणि 8. वज्रपाणि 9. तथा 10. मंजुश्री 11. तारा का विवरण, प्रकाशन संदर्भ सहित दिया गया है।
दो - वैष्णव प्रतिमाएं, जिसके अंतर्गत 12. स्थानक विष्णु, फुसेरा। 
तीन - शैव प्रतिमाएं, जिसके अंतर्गत 13. गौरी, सलखन 14. गणेश नन्दौर खुर्द। 
चार - विविध, जिसके अंतर्गत 15. घण्टा का विवरण है। 
परिशिष्ट - 
(क) सिरपुर से प्राप्त अन्य धातु प्रतिमाएं अंतर्गत जानकारी दी गई है। 
(ख) सलखन से प्राप्त अन्य धातु प्रतिमाएं अंतर्गत जानकारी दी गई है। 
(ग) सिरपुर की धातु प्रतिमाओं की प्रदर्शिनी अंतर्गत 1952 में जबलपुर, 1954 तथा 1956 में नागपुर, 1956-57 में दिल्ली, पटना, वाराणसी, मद्रास, बैंगलोर, बम्बई, बौद्ध कला प्रदर्शिनी, 1957 में इन्दौर, 1958 में रायपुर तथा 1959 में विल्ला ह्यूगेल और जूरिच, सूचीबद्ध है। 

साथ ही निर्देश ग्रंथ, शीर्षक के अंतर्गत कला-प्रतिमाशास्त्र के दस प्रमुख ग्रंथों की सूची है। 

पुस्तिका में दस चित्र फलक भी प्रकाशित हैं। 

इस संदर्भ के साथ विचारणीय, अवलोकितेश्वर प्रतिमा की अमरीका से वापसी की खबरों में- 

# जारी किया जा रहा अवलोकितेश्वर का चित्र, इस सूत्रीपत्र के ‘अवलोकितेश्वर पद्मपाणि‘ चित्र से मेल नहीं खाता! 

# प्रतिमा का मूल्य 19 या 20 करोड़ डालर बताया जा रहा है, इस मूल्यांकन का आधार क्या है? क्या सह मूल्य किसी अधिकृत स्रोत की जानकारी के आधार पर बताया जा रहा है, स्पष्ट नहीं है! 

# रायपुर के महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय से प्रतिमा की चोरी का वर्ष 1982 बताया जा रहा है, जबकि 1982 के दौरान ऐसी कोई घटना, पुरातत्व विभाग में इस अंचल में पदस्थ अधिकारियों अथवा पुराविदों की स्मृति में नहीं हुई थी, यह भी उल्लेखनीय है कि गत माह संग्रहालय की अवाप्ति पंजी के दीमक द्वारा नष्ट किए जाने की जानकारी भी सार्वजनिक हुई है, क्या संग्रहालय के अभिलेखों में इस चोरी-गुमशुदगी का विवरण है? क्या तब कोई प्राथमिकी, आपराधिक प्रकरण बना था, उप पर किसी प्रकार की कार्यवाही की जानकारी मिलती है?

इस प्रकार अवलोकितेश्वर प्रतिमा की वापसी अपने साथ ऐसे कई अनुत्तरित प्रश्न भी साथ ला रही है।

पुनश्च-

# श्री मुनि कान्तिसागर की 1953 में प्रकाशित पुस्तक ‘खण्डहरोंका वैभव‘ में सिरपुर के कांस्य प्रतिमाओं की प्राप्ति तथा 16 सितंबर 1945 को इन्हें देखने का उल्लेख किया है।

# मोरेश्वर जी. दीक्षित ने ‘बुलेटिन आफ द प्रिंस आफ वेल्स म्यूजियम आफ वेस्टर्न इंडिया‘ नं.-5, 1955-57 में ‘सम बुद्धिस्ट ब्रांजेस फ्राम सिरपुर, मध्यप्रदेश‘ लेख में चार अवलोकितेश्वर का उल्लेख करते हुए नीचे दिखाए गए चित्र प्रकाशित कराया, जिसमें 3ए कुमारदेव अभिलिखित, रायपुर संग्रहालय की, 3बी को उत्कृष्ट, 4ए द्रोणादित्य अभिलिखित तथा 4बी को भी रायपुर संग्रहालय की बताया है।


# महेशचन्द्र श्रीवास्तव, रायपुर संग्रहालय के प्रभारी रहे हैं, उन्होंने एम.जी. दीक्षित द्वारा कराए गए सिरपुर उत्खनन प्रतिवेदन के आधार पर पुस्तक ‘सिरपुर‘ लिखी, जो 1984 में मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रन्थ अकादमी से प्रकाशित हुई है। सिरपुर की धातु प्रतिमाओं और इनका संग्रहालय के लिए अवाप्त किया जाना के साथ चोरी की जानकारी वाला इस पुस्तक अंश नीचे दिया जा रहा है-

ऐसा कहा जाता है कि 1939 में लक्ष्मण मन्दिर के समीप पत्थर खोदते समय श्रमिकों को अचानक इन मूतियों का एक विशाल संग्रह प्राप्त हो गया। ये मूर्तियाँ लगभग 60 थीं और लगभग 6 वर्ष तक ये भीखम बाबा नामक पुजारी के पास पड़ी रही और तत्पश्चात् वे 1945 में स्थानीय मालगुजार श्री श्याम सुन्दरलाल के अधिकार में आ गई। उनमें से जो मूर्तियाँ गन्धेश्वर मन्दिर के तत्कालीन पुजारी श्री मंगल गिरि गोस्वामी को दे दी जो बाद में मुनि कान्ति सागर को प्राप्त हो गई। इन मूर्तियों संबंधी विवरण श्री मुनि कान्ति सागर ने अपनी पुस्तक "खंडहरों का वैभव" में प्रकाशित करवाया है। इन मूर्तियों में से तीन मूर्तियां श्री मुनि कान्ति सागर को प्राप्त हुयी थीं जिसमें से एक उन्होंने भारतीय विद्याभवन बम्बई भेज दी थी।

इसके पश्चात् दो मूर्तियाँ नागपुर के संग्रहालय में तथा और चार रायपुर संग्रहालय में अवाप्त हुयीं। सिरपुर में प्राप्त उक्त विशाल संग्रह की प्रतिमायें अन्य व्यक्तियों के अधिकार में चली गई। 1956 में डा. एम. जी. दीक्षित ने पुनः कुछ व्यक्तियों से पाँच प्रतिमायें प्राप्त की जो रायपुर संग्रहालय में भेज दी गई। कुछ प्रतिमायें डा. दीक्षित को सिरपुर के उत्खनन में भी प्राप्त हुयीं।
,,, ... ...

इन मूर्तियों में से निम्नलिखित ग्यारह मूर्तियां रायपुर संग्रहालय की हैं।

1-2. भूमि स्पर्श मुद्रा में बुद्ध, 3. वरद मुद्रा में बुद्ध, 4. अवलोकितेश्वर पद्मपाणि, 5-6-7. पद्मपाणि, 8. वज्रपाणि, 9-10. मंजुश्री, 11. तारा

इसके अतिरिक्त स्थानक विष्णु, जो कि सिरपुर के समीप जंगल से प्राप्त हुए हैं, भी रायपुर संग्रहालय में संग्रहीत हैं। परन्तु खेद का विषय है कि इन प्रतिमाओं में से पाँच प्रतिमायें संग्रहालय से चोरी चली गई हैं।

निष्कर्ष-

‘बुलेटिन आफ द प्रिंस आफ वेल्स म्यूजियम आफ वेस्टर्न इंडिया‘ में आई जानकारी के आधार पर स्पष्ट होता है कि उक्त में से चित्र 4ए द्रोणादित्य अभिलिखित कांस्य प्रतिमा, इसके प्रकाशन 1955-57 तक रायपुर संग्रहालय में रही है। 1960 में प्रकाशित सूचीपत्र में सिरपुर की 11 धातु प्रतिमाओं की जानकारी है, इसका तात्पर्य कि वे सभी इस समय तक भी संग्रहालय में थीं। 1984 में प्रकाशित ‘सिरपुर‘ की जानकारी के अनुसार इन 11 में से पांच प्रतिमाएं चोरी चली गईं, अर्थात् विवेच्य प्रतिमा की चोरी 1960 से 1984 के बीच हुई होगी और इसके पश्चाात संग्रहालय में सिरपुर कांस्य प्रतिमाओं में से शेष 6 सुरक्षित होंगी। अब जो चित्र समाचारों के साथ आए हैं, वे 1960 में प्रकाशित सूचीपत्र के सरल क्रमांक ६ पद्मपाणि, चित्र फलक - चार (क)(अवाप्ति पंजी क्रमांक 3768) से मेल खाते हैं, इससे प्रतीत होता है कि संख्या और नामकरण में एकाधिक- अवलोकितेश्वर/अवलोकितेश्वर पद्मपाणि/पद्मपाणि के कारण विवेच्य प्रतिमा के साथ भ्रम की स्थिति बन रही है।