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Wednesday, November 6, 2024

नदी के द्वीप

अज्ञेय की ‘नदी के द्वीप‘ चालीसेक साल पहले पढ़ चुका हूं, यह याद आया जहां तथ्य-सत्य या आंख मूंद कर दाढ़ी बनाने वाले जैसे प्रसंग आए। तब भी यह त्याग-बलिदान वाली भावुकता और आदर्श रूमानियत की प्रेमकथा ही समझ में आई थी। अब दुहराने पर जिन बातों की ओर ध्यान गया, उनमें कुछ शब्द थे, जैसे- ‘मुकुर‘, जिसका प्रयोग हिंदी साहित्य में कम ही होता है। ‘असूर्यम्पश्या‘ का प्रयोग मैंने शायद ही कहीं और देखा हो, अनुमान हो गया कि आशय ओट या परदा जैसा है- अ, सूर्य और पश्य, मिलकर बना है, यानि जिस पर सूर्य की नजर न पड़े। स्वैरिणी और पुंश्चली, शब्द के साथ याद आए मनोहर श्याम जोशी, भला हो कुरु कुरु स्वाहा की मुख्य पात्र- पहुची हुई चीज, यानी ‘पहुंचेली‘ यानी पुंश्चली। फिर ऐसे और कई शब्द आते गए, जिनके लिए अपने अनुमान पर संदेह हुआ और शब्दकोश खोलना पड़ा- विभ्राट, पलातक, कबरी, प्रत्याख्याता, ब्रीडा, धृष्णु, शबीह, जिघांसु, सीमन्त, म्रियमाण, रौंस, सरु, मालंच, तितीर्षु, प्राणोद्रेक, गोप्ता, उद्भ्रांत, कलौंस, अनाद्यन्त, बनौकस। 

आवश्यकीय जैसे कुछ अलग-से प्रयोग मिले। स्प्रिंग के लिए लचकीला तार मिला। तिरस्करणीय का प्रयोग हुआ है, जो नाटकों में यदा-कदा होता है, वहां भी यवनिका से काम चल जाता है। कुछ विशिष्ट वाक्यांश, जहां ठिठक जाना होता है- ‘सम्वेदना की झिलमिल छायित-द्योतित पन-चादर‘ या ‘चीड़ की कुकड़ियों की हल्की चटपट और विस्फूर्जित वाष्पों की फुरफुराहट जैसे स्वर-पृष्ठिका बन‘ और ‘मदालस भाव प्रतिकर्षित भाव और विस्फूर्जित भाव‘ आदि। युयुत्सा, शुभाशंसा, अनझिप जैसे शब्द, संभवतः यहां प्रयोग के बाद अधिक अपनाए जाने लगे। बताया जाता है कि कुछ शब्द अज्ञेय ने दुरुस्त कराया, जैसे- ‘पूर्वग्रह‘ न कि पूर्वाग्रह और ‘लोकार्पण‘ न कि विमोचन। 

कहानी भुवन, रेखा और गौरा के प्रेम त्रिकोण, बल्कि त्रिभुज या शंकु की है, अज्ञेय के ही एक शीर्षक को लेकर कह सकते हैं- त्रिशंकु। इसके पात्र दोराहे पर खड़े होते हैं- भुवन रेखा के रास्ते चलकर गौरा की ओर जाता है। चन्द्रमाधव, हमसफर पत्नी से छिटककर रेखा-गौरा के रास्ते चलने की कोशिश करता है और चन्द्रलेखा की राह पकड़ लेता है। रेखा के हेमेन्द्र से होते रमेशचन्द्र तक पहुंचने का पड़ाव भुवन है और यही पूरी कहानी का सूत्र है। 

भुवन को आदर्श और पूजनीय पात्र बनाया गया है, इस पर रचनाकार की छाया दिखती है। रेखा और गौरा, दोनों पात्रों का भुवन और चन्द्रमाधव के प्रति व्यवहार लगभग एक जैसा होना, रचनाकार की कमजोरी लगता है। दोनों में एक तरफ नारीसुलभ व्यावहार-कुशलता है और वहीं दोनों संस्कार, स्वेच्छा और कर्तव्य-भाव से पुरुष के प्रति ससम्मान समर्पण करती हुई हैं। 

यों यह आज की भी सचाई हो, मगर इस दौर में कितना अजीब लग सकता है, जब बार-बार ऐसी बातें आती हैं, जिनमें नारी पात्र पुरुष के पैरों की धूल लेती है, मेरे मालिक कहती है, चरण गोद में लेकर माथे से लगाती है। कहती है- सचमुच तुम्हारे पैर चूम सकती हूं ... चाहती हूं, झुक कर एक बार तुम्हारे चरणों की धूल ले लूं ... आपके पैरों से लिपट जाना चाहती हूं ... अपने को उत्सर्ग कर के आप के ये घाव भर सकती-तो अपना जीवन सफल मानती। स्त्री का पुरुष के प्रति सहयोग ‘रामजी की गिलहरी‘ वाला कहलाया गया है। पत्नी पति के जूते-मोजे खोलती है, आदि। 

वैश्विक परिस्थितियां, युद्ध, मानवीय भावनाएं व चिंतन, कहानी के दौरान वैचारिक निबंध का आकार ले लेते हैं। बड़ा अंश पत्राचार और उसका मजमून देते हुए है, पात्र-नामों के अलावा पचासेक पेज का ‘अन्तराल‘ शीर्षक अध्याय पूरा ही पत्रों का है। इसे पत्र-निबंध शैली का रूमानी उपन्यास कहा जा सकता है, जो अपने समय के मनस को बारीकी और गहराई से दर्ज करता है।

Thursday, August 11, 2022

समय के सवाल

किस चक्की का पिसा आटा? वाला सवाल, समय के साथ अधिक प्रासंगिक होने लगा है, जब ‘शक्तिवर्धक‘ पैकेटबंद ने हर आम-खास की रसोई में अपनी जगह पक्की कर ली है। आटा, सब्जी, फल, दूध जैसे सभी खाद्य-पदार्थ को खराब होने से बचाए रखने के क्रम में वह कीड़ों के खाने लायक सुरक्षित नहीं रह जाता, हमें खुशी-खुशी अपने लिए उपयुक्त लगता है। जबकि रोजमर्रा के खाद्य पदार्थों में नमक के सिवा सभी कुछ जैविक या जैव-उत्पाद हैं, और इसलिए खाद्य होने की उसकी आयु और स्थिति की सीमा है, इसमें परिवर्तन-प्रासेस, जिसमें स्थानांतरण, हस्तांतरण, परिवहन शामिल, जितना सीमित हो, उतना बेहतर। यह खाने-पीने की शुद्ध-स्वास्थ्यकर सामग्री से ले कर स्वावलंबन तक के लिए सहायक है।

प्रसंगवश, ‘धर्मो रक्षति रक्षितः‘ के तर्ज पर ‘जीवो रक्षति रक्षितः’ कहा जाता है, जिसका सामान्य अर्थ होगा- अन्योन्याश्रय या जीवों की रक्षा करने पर, रक्षित जीव, रक्षक की रक्षा करते हैं। खाद्य के रूप में जीव भोजन बन कर हमारी जीव-रक्षा करते हैं मगर उन्हें भोज्य बनाने के लिए, हमेें अच्छी तरह अधिकतर उनका जीव हरना पड़ता है। साथ ही ध्यान रहे कि सिर्फ मानवता के लिए नहीं, बल्कि अपनी जीवन-रक्षा के लिए भी जीव-रक्षा आवश्यक है। 

भोजन के लिए, उगाना, संग्रहण-भंडारण, कूटना-पीसना और पकाने (सरलतम, भूनना, सेंकना, उबालना) में लगने वाला समय और तरीका स्वावलंबन और स्वास्थ्य के लिए उपयुक्त, पर्यावरण के अनुकूल था। अब चावल- पालिश्ड से फोर्टिफाइड होने लगा, दाल सुंदर चमकदार पालिश्ड मिलेगा, तेल रिफाइंड, दूध पाश्चराइज्ड, पानी प्यूरीफाइड फिल्टर्ड, और नमक आयोडाइज्ड। सभी, मूल्य और प्रक्रिया संवर्धित। फास्ट फूड दौर के बाद भविष्य कि ‘व्यस्त और सावधान‘ पीढ़ी को रोटी-चावल के बदले कैप्सूल का विकल्प मिल जाए, तो वह उसे राजी-खुशी स्वीकार करने को तैयार होगी।

पुस्तक ‘समय के सवाल‘ समाज के साफ माथे पर गहराती चिंता की लकीरें हैं। यहां भावुक पर्यावरणीय चिंता नहीं हैं, बल्कि तथ्यपूर्ण वैचारिक स्थितियों को रेखांकित किया गया है, जो हम सभी की नजरों के सामने, मगर नजरअंदाज-से हैं। समस्याओं के प्रकटन-विवेचन के साथ-साथ उसके व्यावहारिक निदान की ओर भी ध्यान दिलाया गया है। पुस्तक में हमारी सांस्कृतिक जीवन पद्धति में प्रकृति से सामंजस्य बनाते पर्यावरण के साथ दोस्ताना के बदलते जाने को जिस शिद्दत के साथ अनुपम मिश्र ने दर्ज किया था, माथे पर उभरी वे लकीरें लगातार गहराती जा रही हैं, और समाज ऐसी हर समस्या का तात्कालिक निदान पा कर निश्चिंत-सा है, जबकि सबको खबर है कि कहां, क्या और क्यों गड़बड़ हो रही है। बाजार ने उसे ‘मैं हूं ना‘ समझाते, ‘आश्वस्त‘ कर रखा है। ऐसी हर स्थिति पर सबसे सजग नजर और चुस्त तैयारी बाजार की है। ऐसे मुद्दों की यह पुस्तक, ‘पर्यावरण, धरती, शहरीकरण, खेती, जंगल और जल है तो कल है‘, शीर्षकों के छह भाग में 53 लेखों का संग्रह है।

भाग-1 ‘पर्यावरण‘ और भाग-2 ‘धरती‘ में कोयला बनाम परमाणु उर्जा तथा यूरेनियम के खनन, प्रसंस्करण और परीक्षण या विस्फोट से जुड़ी त्रासदी और जीव-जंतु और वनस्पतियों की तस्करी की ओर तथ्यों सहित ध्यान दिलाया है। साफ शब्दों में आगाह किया गया है- ‘ध्यान रहे, हर बात में अदालतों व कानून की दुहाई देने का अर्थ यह है कि हमारे सरकारी महकमे और सामाजिक व्यवस्था जीर्ण-शीर्ण होती जा रही है और अब हर बात डंडे के जोर से मनवाने का दौर आ गया है। इससे कानून तो बच सकता है, लेकिन पर्यावरण नहीं।‘

ग्लोबल वार्मिंग के तकनीकी पक्षों को आसान रूप में स्पष्ट किया गया है। पत्तों, खर-पतवार को जलाना, नष्ट करने की समस्या का भयावह रूप है वहीं पुस्तक में हिसाब निकाल कर दिखाया गया है कि रात्रिकालीन एक क्रिकेट मैच के आयोजन में लगने वाली बिजली की खपत, एक गांव के 200 दिन के बिजली खपत के बराबर होगा। खदान, बंजर-कृषि भूमि, मरुस्थल, ग्लेशियर, बर्फीले इलाकों को भी शामिल करते हुए बीहड़ में बदलती जमीन को आंकड़ों से स्पष्ट किया गया है कि गत 30 वर्षों के दौरान इसमें 36 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है।

भाग- 3 व 4 में ‘शहरीकरण‘ और ‘खेती‘ शीषकों के अंतर्गत दिखाया गया है कि एक तरफ महानगर हैं तो उसके साथ अनियोजित शहरी विकास भी। दिल्ली के भिखारियों के बारे में दिल्ली वालों को भी शायद ही पता हो, कि यहां ‘एक लाख से अधिक लोगों का ‘‘पेशा‘‘ भीख मांगना है। और कई अनधिकृत बस्तियों में बच्चों को भीख मांगने का बाकायदा प्रशिक्षण दिया जाता है। यहीं विकलांग, दुधमुंहे बच्चे, कुष्ठरोगी आदि विशेष मांग पर ‘सप्लाई‘ किए जाते हैं।‘ इसी तरह महानगरीय अपसंस्कृति की देन- अपराध की विवेचना है। जल-निकास, भराव और नदी-तालाबों की स्थिति के साथ एक तरफ जानलेवा जाम है तो दूसरी और फ्लाईओवर से उपजी समस्याएं हैं। सफाई के संकल्प और हकीकत में कचरे और उसके निपटान के चिंताजनक हालात का विवरण है। रेल लाइन के किनारे का कचरा, ई-कचरा और स्वच्छ भारत अभियान की भी विवेचना है। जैसा कि कहा गया है- ‘कचरे को कम करना, निबटान का प्रबंधन आदि के लिए दीर्घकालीन योजना और शिक्षा उतनी ही जरूरी है, जितनी बिजली, पानी और स्वास्थ्य के बारे में सोचना।‘

चाय बागानों से जूट, दाल, कपास की खेती की समस्याएं हैं वहीं भविष्य का सपना देखते, अपनी सुविधा का सामान जुटाते, प्लास्टिक, ई-कचरा, यूज एंड थ्रो, डिस्पोजेबल या नये-पुराने मॉडल का बदलाव, की सच्चाई कि यह कुछ और आगे के भविष्य का कचरा भी है, की ओर ध्यान शायद जाता है। सारा दोष प्लास्टिक-पॉलीथिन के सिर मढ़ते हुए, यह नजरअंदाज हो जाता है कि इससे इतर वस्तुएं भी उत्पादन की प्रक्रिया पूरी होते तक पर्यावरण के लिए कितनी प्रतिकूल हैं। पुस्तक में चौंकाने और चितिंत करने वाला आंकड़ा है कि बोतलबंद पानी का व्यापार करने वाली करीब 200 कंपनियां और 1200 बॉटलिंग प्लांट अवैध हैं। बोतलबंद पानी की खपत दो अरब लीटर पार कर गया है।

भाग-5, जंगल में वन और वन्य प्राणियों मुख्यतः असम में गैंडा, देश के विभिन्न राज्यों में हाथी, शुतुरमुर्ग के पालन और विक्रय, शिकार और संरक्षण की विसंगतियों का चित्रण है। कहा गया है- भूमंडलीकरण के दौर में पुरानी कहावत के जायज, ‘प्यार और जंग‘ में अब ‘व्यापार‘ भी जुड़ गया है। सरकारी कामकाज के तौर-तरीकों की हकीकत, ‘सफेद हाथी‘ बन गया सोन चिरैया प्रोजेक्ट, ग्वालियर के घाटीगांव और करेरा-शिवपुरी इलाके के गांवों को उजाड़ कर चिड़िया को बसाने का शिगूफा छोड़ा जा रहा है और वह भी तब, जब चिड़िया फुर्र हो चुकी है। सन 1993 में इस अभ्यारण्य क्षेत्र में 5 पक्षी देखे गए, उसके बाद कई साल संख्या शून्य रही, लेकिन सरकारी खर्च होता रहा।

अंतिम भाग-6 ‘जल है तो कल है‘ में जहरीला होते भूजल के विभिन्न मामले, फ्लोराइडग्रस्तता, जल स्रोतों नदी-नालों के प्रभावित होने के बाद ‘सभ्यता‘ की चपेट में आ रहा समुद्र, दिल्ली के पास यमुना में समाहित होने वाली नदी हिंडन, जो लालच और लापरवाही के चलते ‘हिडन‘ बन गई है, का विवरण है। बताया गया है केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मुताबिक भारत की कुल 445 नदियों में से आधी नदियों का पानी पीने योग्य नहीं है। प्रमुख नदियों गंगा, यमुना और कावेरी के प्रदूषण और अन्य समस्याओं का उल्लेख विशेष रूप से किया गया है।

प्रकृति निर्भर आखेटजीवी-खाद्य संग्राहक यायावर, समय के साथ आत्मनिर्भर, स्वावलंबी गोप-कृषक हुआ। सभ्यता की यह इकाई मानव, औद्योगिक विकास से गुजरते हुए एआई दौर में आ कर वह कर्ता-निमित्त के बाद मैन पावर या मानव-संसाधन, बेजान पुर्जा बनता जा रहा है। जैसा कहा जाता है कि ‘गुलामी की कसौटी कठिन श्रम नहीं या किसी की आज्ञा पालन नहीं। गुलामी की कसौटी है अपने को गैर के हाथों में मशीन बनाकर सिपुर्द कर देने में।‘ हरबर्ट मारक्यूज के जुमले के सहारे- ‘भौतिक समृद्धि के नर्क‘ में छलांग लगाने को उद्यत सभ्यता के वर्तमान में, उसके भविष्य की साफ तस्वीर झलक रही है।

समाज का बड़ा तबका, यहां तक सक्षम जिम्मेदार ओहदाधारियों की मानसिकता भी ‘रोज कमाओ, रोज खाओ’ जैसी गरीबी रेखा के नीचे वाली हो गई है। मानों पूरी सभ्यता ‘एक लालटेन के सहारे‘ सरक रही है, उसे बस अगला कदम दिखता है, लेकिन यह नहीं कि आगे खड्ड, जहां से लौटना संभव नहीं होगा, कितना करीब आ गया है। प्रकृति अपने घाव खुद भरती है, किंतु घाव जो उसके अपने नहीं, ‘सभ्यता‘ ने दिए हैं और बहुत गहरे हैं, शायद वह भी भर जाएं, मगर उसके लिए जितना समय लगेगा, तब तक बहुत देर हो चुकी रहेगी, यों सभ्यता ने इन घावों को अपने हाल पर भी नहीं छोड़ा है, किसी 'झोला छाप डाक्टर वाली समझ और योग्यता' के साथ उसे रोजाना छेड़ने को उत्सुक और जाने-अनजाने उद्यत है। भगवान सिंह के शब्दों में- ‘सचाई यह है कि हमने बहुत बड़ी कीमत देकर बहुत कम पाया है। जिन सुविधाओं पर हमें गर्व है, उनकी यह कीमत कि नदियॉं गंदी हो जाएँ, धरती के नीचे का जल जहरीला हो जाए, अंतरिक्ष कलुषित हो जाए, मोनो ऑक्साइड से ओजोन मंडल फट जाए, और अब तक के ज्ञात ब्रह्मांड की सबसे विलक्षण और सुंदर धरती नरकलोक में बदलती चली जाए।‘

सन 2018 में प्रकाशित इस पुस्तक के समर्पण में ‘जल-जंगल-जमीन‘ के साथ जन और जानवर को भी जोड़ा गया है। लेखक पंकज चतुर्वेदी अपने स्वाभाविक और स्थायी सत्यान्वेषी पत्रकार-तेवर के साथ हैं, मगर जिम्मेदार नागरिक की तरह उपायों की चर्चा भी करते चलते हैं। इस दौर में जब प्रत्येक सत्य-विचार और वक्तव्य, दलगत पक्ष-प्रतिपक्ष से अधिक, समर्थक-विरोधी, राजनीतिक-सापेक्ष होने लगा है, तब नेता, अफसर, व्यापारी और हरेक जिम्मेदार को कटघरे में खड़ा करना उल्लेखनीय है, खासकर इसलिए भी कि इसका प्रकाशन भारत सरकार के ‘वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग‘ और ‘मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रन्थ अकादमी‘ द्वारा किया गया है।

Saturday, July 16, 2022

लपका

मौका दिखा कि मन लपका। ‘खजुराहो का लपका‘ पढ़ते हुए सरसरी तौर पर तो यही लगता है कि इतनी सी बात को रंग-रोगन कर पेश किया गया है। मगर सहज प्रवाह वाली यह कहानी पाठक के मन में धीरे-धीरे उतरते हुए, खुलती और खिलती है।

नायिका का आग्रह, कुछ अलग नजरिए से खजुराहो देखने का है, उसका उद्देश्य भी सामान्य पर्यटक का नहीं है। इस बहाने सचमुच खजुराहो को कुछ अलग ढंग से देखा गया है। वार्तालाप, विवरण, कथा-कथन और घटना-क्रम सब कुछ सहज, मगर ताजगी भरा और कई मायनों में अलग-सा भी। स्केच-बुक ले कर चलने वाली नायिका कहानी में क्या रंग भर रही है, आसानी से समझा नहीं जा सकता।

खजुराहो ने उस पूरे अंचल की सोच को प्रभावित किया है। छोटी सी बस्ती में कैरियर की नई संभावनाएं और जीवन के अनूठे आयाम जोड़े हैं, मगर जीवन की मौलिकता बार-बार उभरती है। शास्त्र और लोक, देस-परदेस, जीवन-व्यापार और फक्कड़ी यहां आपस में गुंथे हुए हैं और उनका समानांतर निर्वाह होता चलता है। उदात्त प्रेम के गहरे भाव व मानवीय संवेदना को गोप-हेमवती, सजन-प्रभा की कथा से उभारा गया है और उसे जीवंत किया गया है, उपन्यास के पात्रों के चार-पांच प्रेम-प्रसंगों के माध्यम से।

खजुराहो पर ऐसा उपन्यास तभी संभव है, जब रचनाकार मौटे तौर पर ही सही, बहुत करीब से उस स्थल के भूगोल और इतिहास, शिल्प-स्थापत्य, शास्त्र-पुराण इन सभी से आत्मीय रूप से परिचित हो, जुड़ा रहा हो साथ ही उसे इस पूरे परिवेश के ऐसे तत्व और कारक दिख रहे हों, जिसे न कोई पर्यटक देख पाता, न अध्येता, न वहां का व्यवसायी और न बाशिन्दा। लेखक की सफलता कि जहां स्थानीय भाषा है, वहां परंपरा, भाव और सोच भी उसके अनुकूल है। इसके लिए आवश्यक है कि लेखक वहां के जीवन में घुल-मिल जाए और तटस्थ भी बना रहे।

समृद्ध खजुराहो वीरान रहा और अब विश्व विरासत के नक्शे में हैं। लेखक आगाह करता है कि वहां इसके बावजूद लपक कर पा जाने का सार्थक कुछ भी नहीं है, हजार साल का इतिहास, जिसमें कई हजार सालों की परंपरा मूर्त हुई है, जिसमें धर्म-अध्यात्म-दर्शन की गहनता है, मानों एक ठहरा हुआ घनीभूत समय। यों उघड़ा हुआ, साथ ही परत-दर-परत भी, पूरी कहानी बुनते लेखक ने किस सावधानी से इसका निर्वाह किया है, यह भी पढ़ते हुए या सिर्फ पढ़कर नहीं, बल्कि ठहर कर ही झलकना, झिलमिलाना शुरू होता है, मानों कोई पार्श्व संगीत देर तक मन में भीना-भीना गूंजता रहे। इसलिए यह खजुराहो ही नहीं, किसी पर्यटन स्थल या अन्य कहीं भी होने वाले आकस्मिक बदलाव से फास्ट फारवर्ड हुए जीवन का दस्तावेज है।

किसी पत्रकार के लिए अपने नियमित काम के दौरान समाज को ठहर कर देखने का अवसर कम ही होता है, अक्सर उसने सीमित समय में जितना कुछ देखा-समझा, उसे अधिकतम विश्वसनीय बना कर प्रस्तुत करने का दबाव उस पर होता है, यथातथ्य मगर असरदार। लेकिन इससे कम समय में अधिक भांप लेने का अभ्यास भी बन जाता है। इस पुस्तक का पत्रकार-लेखक, अपनी भू-जल जानकारियों को समाज के दैनंदिन संदर्भों से जोड़ कर सक्रिय हो, उसे समय की बाध्यता न हो और वह रचे, जिसमें उसका मन रमे, तब ऐसी कृति साकार होती है।

इस कृति पर फीचर फिल्म की तैयारी की सूचना पुस्तक पर दी गई है। कहानी में पूरी संभावना है, वार्तालाप और दृश्यों का विवरण सहज-विश्वसनीय है, जो फिल्मकार के लिए काम आसान करेगी, किंतु तरल प्रसंगें के बहाव और नजाकत को पकड़ना, सहेजना चुनौती होगी।

पुस्तक के लेखक सुनील चतुर्वेदी, सामाजिक संस्था ‘विभावरी‘ से जुड़े हैं। जल संवर्धन और संरक्षण पर उनकी पुस्तकें ‘पानी दे गुड़धानी दे‘ और ‘रुको बूंद‘ है। उपन्यास ‘कालीचाट‘, जिस पर इसी नाम से फीचर फिल्म बनी, के लेखक के रूप में अधिक जाने गए। इस पुस्तक की कमियों, जो मुख्यतः मामूली अशुद्धियां हैं, की ओर लेखक का ध्यान है और पढ़ने के प्रवाह में बाधा नहीं होती, इसलिए उनका उल्लेख यहां अनावश्यक होगा। पुस्तक के स्केच अवश्य उल्लेखनीय हैं।

प्रसंगवश -

‘विभावरी‘ के साथ सोनल की ‘कोशिशों की डायरी‘ पुस्तक का उल्लेख
प्रासंगिक ही नहीं, आवश्यक भी लगा। इसी प्रकाशक NeoLit से आई यह डायरी,
विभावरी के एक पक्ष का लेखा-जोखा है।
ऐसा संस्मरण, जिसमें समाया ‘मैं‘ हावी न हो, तब जब रचनाकार स्वयं पात्र भी हो।
ताजगी और सहज सच का सौंदर्य है इसमें।
साथ ही सामाजिक बदलाव के लिए समय-सापेक्ष काम करते हुए
सोच किस तरह उदात्त, समयातीत हो जाती है,
स्थायी प्रभाव डालने वाली, जिसका उदाहरण है यह कृति।


Monday, July 11, 2022

तद्भव से तत्सम

देखते हुए लगा कि संपादक अखिलेश के सजग सामग्री चयन से इस पत्रिका का जनवरी-2022 अंक ‘तद्भव‘ है, स्वयं उसके लेखक होने के तत्सम में कैसा है, देखने के लिए जैसा शायद अक्सर होता है- ‘चिट्ठी‘ और रचना प्रकिया पढ़ा। ‘एक सतत एंग्री मैन‘ और ‘भूगोल की कला‘ पढ़ कर लगा कि ‘वह जो यथार्थ था‘ भी पढ़नी होगी। पढ़ते हुए नोट्स लेता चला, ताकि अपनी सोच-समझ के साथ पच कर एकरूप न हो जाय, तब तय करना मुश्किल होने लगेगा कि क्या किताब में था, मेरी सोच में आया, कितना किताब की बातों की प्रतिक्रिया थी, घालमेल हुआ या... या... या...। जैसा किताब में आया है, शीर्षक यह भी उपयुक्त हो सकता था- ‘विस्मृति का स्मरण‘ (पहली आवृत्ति: 2015, पेज-99)

संस्मरण श्रेणी की यह पुस्तक कहानी है, जैसा कवर पर है- ‘अपने यथार्थ में बचपन की जीने रचने की एक अद्वितीय कहानी‘। पढ़ते हुए सवाल मन में आता है कि आखिर कोई संस्मरण लिखता ही क्यों है? यहां जितनी याद रही बातें दर्ज हैं, भूली हुई बातें उससे कुछ ही कम होंगी, और वे जितनी कम हैं, उनमें याद आती भूली या भूली को याद न कर पाने, भूली यादों की कैफियत को मिला दिया जाए तो शायद वे उतनी ही हो जाएंगी, जितनी याद रही और दर्ज की गई।

एक परिशिष्ट ‘मैं और मेरा समय‘ स्वतंत्र निबंध है और नौ खंडों में बंटी पुस्तक के ‘तीन‘ का काफी हिस्सा वैचारिक निबंध बन गया है। आगे और भी ऐसा होता गया है, समय-समय पर विचार-स्फुलिंग को सुरक्षित दर्ज रखने के लिए, लिए गए नोट्स को तरतीब देने जैसा लगता है। यह मनोवैज्ञानिक, किसी विशेषज्ञ का नहीं, एक सामान्य संवेदनशील मन, जिसके पास अभिव्यक्त करने के लिए भाषा है, का लेखा है, कुछ-कुछ ऐसा ही खंड ‘पांच‘ में कहा गया है। यथार्थ को पकड़ते, उसके द्वंद्व के साथ पूरा करने, समग्र में देखने का प्रयास, ऐसा बार-बार होता है, है और था के बीच, जैसे खंड ‘चार‘ में आनंद और मनोरंजन में भी। या उसके बाद रचना और स्वप्न में। इससे ‘इतिहास के अभाव में-स्मृति, और भविष्य के अभाव में कल्पना की भूमि बंजर होने लगती है।‘ जैसी महत्वपूर्ण निष्पत्ति आती है।

इसी तरह कुंडी और घंटी की अभिधा ऐसी रची गई है कि वही पाठक के लिए लक्षणा और व्यंजना की संभावना बना दे। साहित्य ने पाठकों की आदत ऐसी बिगाड़ रखी है कि उन्हें ध्यान कराते रहना पड़ता है कि जो पढ़ रहे हैं, अभिधा है, मगर इसीलिए यहां लेखक की सपनों में आवाजाही होती है, नींद वाले सपने, खुली आंखों के और बंद आंखों के जागते सपने। भ्रम और स्वप्न का द्वंद्व। बिगड़ैल पाठक मन तभी लक्षणा-व्यंजना के लिए भटकने लगता है। कवियों, चित्रकारों को याद करते, प्रकाश की बात करते भी वैचारिक अभिधा पर ठहरने का प्रयास है।

अभिधा-आग्रही लेखक इस तरह भी अभिव्यक्त होता है- ‘वकीलों के तख़्तों पर मक्खियों के मल के धब्बे हैं। वकीलों के काले कोट पर भी धब्बे होंगे लेकिन काले रंग में धब्बे छुप जाते हैं। काले कोट ख़ुद बड़े-बड़े धब्बे लगते हैं। तीस वर्षों में तहसील के पाँच धब्बे डेढ़ सौ धब्बों में बदल गए हैं। हमारे देश में धब्बों के पास जबर्दस्त प्रजनन शक्ति है। इसलिए बेतहाशा बढ़ती आबादी से बहुत ज़्यादा प्रतिशत वृद्धि धब्बों की है।‘ (पेज-110) 

खंड ‘चार‘ मनोरंजन का है। आरंभ होता है- ‘क़स्बे में मनोरंजन का कोई नियमित इंतज़ाम नहीं था। यदा-कदा मनोरंजन।‘ से और पूरा होता है- ‘बहरहाल क़स्बे में मनोरंजन की समस्या यथावत् बरक़रार थी।‘ पर। खेल और मनोरंजन, सहज-स्वाभाविक जीवन-चर्या से लगभग अभिन्न होता है। वह आयोजन, मंच पर, परदे पर पहुंच कर जीवन से अलग ‘मनोरंजन‘ होता है। यहां लेखक के लिए अच्छा अवसर था कि वह खाली समय-लेजर और मनोरंजन की द्विधा को टटोलते चलता। समाजार्थिक दृष्टि से माना जाता है कि सभ्यता और समृद्धि, या कहें आर्थिक सामर्थ्य, इसी से तय होता है कि व्यक्ति-समुदाय के जीवन का कितना हिस्सा ‘खाली समय-मनोरंजन‘ का है। मुझे बार-बार लगता है कि आज व्यक्ति गति-सुविधा के साथ टीवी पर खेल और खबरों के लिए समय बचाते व्यस्त है, जिस तरह गृहिणियां को चूल्हे-चौके के धूल-धुएं से मुक्त हो कर भी सीरियल और ओटीटी के लिए ‘टाइम मैनेजमेंट‘ करना होता है।

स्मृति और संस्मरण, सुर मेल बना लेता है आज की दशा से, जहां खंड ‘पांच‘ पूरा होता है। मानों संस्मरण खंड-खंड ‘चितामणि‘ से जुड़ा हो। खंड ‘सात‘ का ईश्वर। बचपन की सरलता को सुलझा हुआ कहना शायद ठीक न हो, क्योंकि सुलझा के लिए तो पहले उलझा हुआ होना होता है, इसलिए उलझने के पहले वाला ईश्वर से सीधा-सहज साक्षात्कार, कुछ अलग ही हो सकता है।

पुस्तक का एक अनूठा अंश, जिसे शब्दशः रखना होगा- ‘स्वप्न में संभव है कि साँप स्वप्नदर्शी को काटे और स्वप्नदर्शी देखे कि उसका शरीर स्याह पड़ने की जगह सोने का हो गया । वह मरने की जगह नैनीताल पहुँच गया और नैनीताल में लाल क़िला है और लाल क़िला का निर्माण मुग़लकाल में नहीं बल्कि चंद्रगुप्त मौर्य के ज़माने में हुआ था जिसकी रक्षा पाषाणकाल के लोग कर रहे हैं और लाल क़िला के भीतर व्हाइट हाउस का दफ़्तर लगा हुआ है जहाँ बाबा सहगल कथक कर रहे हैं और दर्शक कोक की बोतल से रक्त पी रहे हैं कि इतने में एक बड़ा भयानक बम का धमाका होता है। अब आप पाते कि न साँप है न आपका शरीर सोने का है, न व्हाइट हाउस है । आप झुमरी तलैया के एक पेड़ की डाल पर बैठे नीचे पैर लटकाए गन्ने की गँडेरी चूस रहे हैं...‘ (पेज-101)

‘दरअसल क़स्बा अब क़स्बा नहीं रहा, वह शहर का प्रहसन हो गया है।‘ कहते हुए लेखक ‘मैं और मेरा समय‘ में आ जाता है, जो पुस्तक का दूसरा हिस्सा, पहले हिस्से का विपर्यय-सा, या कुछ मायनों में पूरक है, यहां उसे लगता है कि ‘मेरे जीवन में ... न कला फ़िल्मों के दुख हैं, न मसाला फ़िल्मों के सुख।‘ (पेज-116) वह लेखक के जागते रहने को ओवर-रेट, अतिरंजित करता जान पड़ता है, जब कहा गया है कि ‘उसका रुदन-उसका अफ़सोस-उसके जागने के ही कारण है।‘ जबकि यह बस उसकी अभिव्यक्ति के सार्वजनिक हो जाने और साधन-सुविधा के चलते व्यापक हो जाने के कारण है, क्योंकि जो लेखक नहीं, उसकी अनुभूतियां भी ईमानदार, सांद्र और गहरी हैं, वह भी गला-फाड़ चिल्ला रहा है, अपने स्तर पर प्रभावी भी कम नहीं, संभव है कि उसकी बातें ठेठ हों, अनटेम्पर्ड, अनआर्टिकुलेटेड, वैसी अलंकारिक न हों, जैसा महिमामंडित ‘साहित्यिक लेखन‘, मगर ज्यों कहा जाता है, फर्क इतना कि ‘वह माइक से दूर है।‘ जैसा मुक्तिबोध कहते हैं- ‘असल में हमारे वाक्-सिद्ध-साहित्यिक अपने-आपको बहुत ‘प्रकट‘ करते हैं, इस तरह अपने-आपको बहुत छिपाते हैं।‘

इस खंड में देख सकते हैं कि तटस्थ दृष्टि और पूरी समझ के साथ विसंगतियों पर सिर्फ नजर नहीं रखी जा रही, इंगित तर्जनी है और उससे भी आगे बढ़ कर ऊंगली रख दी जाने में भी हिचक नहीं है। मगर ‘इस समय को मुझे जानना... से नया नारा तक नहीं गढ़ा‘ तक पैरा अंश, शायद उदाहरण सहित कहने को आवश्यक मानते हुए लिखा गया है। किंतु समाजिक परिवर्तन के बदलाव पर, पूरे कालखंड को देखते हुए, गंभीर वैचारिक चिंतन को, अल्पकाल सापेक्ष, कुछ संज्ञाओं में सीमित-संकीर्ण कर दिया जाना, उथला हो जाना है। यह भी लगता है कि जिस दल, नेता और विचारधारा का नाम छूट गया, क्या वह जान-बूझ कर छोड़ा जा रहा है, बक्श दिया गया है, वे बेदाग बाइज्जत बरी हैं? ‘तद्भव‘ संपादक के इस लेखन को संपादित करने का अवसर, मुझ पाठक के लिए हो, तो उक्त अंश, निसंदेह इस लेखक के समय का यथार्थ है, बावजूद इसके, हटा कर ‘तत्सम‘ बना रखना चाहूंगा।

‘यह कहना ग़लत नहीं होगा कि ऐसी रचनाएँ किसी भाषा में कभी-कभार ही संभव हो पाती हैं।‘ अच्छा हुआ कि पुस्तक के लिए लिखे, बैक कवर के इस वाक्य पर मेरी नजर, पुस्तक पढ़ने के बाद पड़ी। पुस्तक खरीदते हुए अलट-पलट कर देखने वाले के लिए ऐसे वाक्य, उसके ग्राहक बनने में सहायक होते हों, मगर मुझ जैसे पाठक के लिए आतंक रचते हैं और ऐसा कुछ किताब के पहले पढ़ लें तो पुस्तक से गुजरते दबाव बना रहता है। खासकर यदि ऐसी किसी बात के साथ कोई नाम न हो। नाम हो तो मान लिया जा सकता है कि यह उसकी राय है, मगर नाम न होने से लगता है कि यह तो इस पुस्तक के साथ स्थापित है, इससे दाएं-बाएं नहीं हुआ जा सकता।साथ ही पुस्तक पढ़ने के साथ नोट्स लेते और पूरी होने पर अपनी यह पाठकीय टिप्पणी लिखने के पहले अगर इस वाक्य को देख लिया होता तो शायद ही किसी प्रतिक्रिया का मन बना पाता।

राधाकृष्ण प्रकाशन की इस पुस्तक के बैक कवर पर उसके बजाय राजकमल प्रकाशन का नाम आया है, जिसे राधाकृष्ण और राजकमल के ‘भेद‘ का पता न हो, वह पुस्तक प्रकाशक तय करने में ठिठकेगा।

Sunday, July 4, 2021

कोरोना में किताबें

12 जून 2020 की वार्ता पर आधारित।

यश पब्लिकेशंस, दिल्ली के फेसबुक लाइव पर मैं राहुल सिंह, रायपुर, छत्तीसगढ़ से उपस्थित हूं। आप मुझे देख-सुन पा रहे होंगे। मुझे इस दौर में पढ़ी पुस्तकों पर बात करनी है। ऐसे लाइव में अक्सर कहा जाता है, थोड़ा इंतजार करें, कुछ लोग और आ जाएं, यह बात ठीक नहीं लगती, क्योंकि जो समय पर आ गए हैं उनका समय क्यों खराब हो। तो मैं अपनी बात शुरू कर रहा हूं।

थोड़ी सी पृष्ठभूमि रख देना चाहूंगा। याद कर रहा हूं पंडित माधवराव सप्रे को, उनकी ‘एक टोकरी भर मिट्टी‘ हिन्दी की पहली कहानी के रूप में जानी जाती है। पत्रकारिता और स्वतंत्रता संग्राम में भी उनका नाम है। सन 1905 में उनकी पुस्तक आई थी ‘स्वदेशी आंदोलन और बायकाट‘। यह छोटी सी, लेकिन बहुत महत्वपूर्ण पुस्तक है। यहां उनकी चर्चा एक अलग संदर्भ में कर रहा हूं। 1901 में उनके पास समीक्षा के लिए पुस्तक आई, ‘ढोरों का इलाज‘। नाम से स्पष्ट है कि पशु चिकित्सा की पुस्तक थी, किसी अंगरेजी पुस्तक का हिंदी अनुवाद। उन्होंने इस पर टिप्पणी की है कि- डॉक्टर, दवाइयां या इस तरह की पुस्तकें, समालोचना के लिए भेजी जाती हैं। जिस विषय की जानकारी नहीं, उसमें क्या समालोचना कर सकते हैं और संपादक महोदय भी हमको ऐसी पुस्तकें दे देते हैं। उन्होंने चुटकी लेते हुए आखिर में यह भी लिखा है कि- यह विषय मुझे आता नहीं तो आप मान सकते हैं कि एक तरह से इस पुस्तक का यहां विज्ञापन है। यह छपा तो संपादक की नजरों से गुजरा ही होगा।

इसी में एक शब्द आया है- सालोतरी। मेरे लिए यह नया शब्द था। संभव है, आपमें से भी कुछ के लिए यह नया हो। अंग्रेजी और हिंदी के आम शब्दकोशों में यह शब्द नहीं मिलता। गूगल करेंगे तो जरूर मिल जाएगा। यह, पशु चिकित्सक या घोड़ों का इलाज करने वाले डॉक्टरों के लिए इस्तेमाल होने वाला शब्द है। घोड़ों का सामरिक और सफर, यातायात के साधन के रूप में उपयोग था, इसलिए घोड़ों का इलाज करने वाले महत्वपूर्ण होते थे, और इस खास शब्द सालोतरी से जाने जाते थे। सालोतरी की तलाश करते हुए ध्यान, अश्विनी कुमारों की ओर गया। वहां से नकुल और सहदेव तक, जो माद्री के जुड़वा पुत्र थे। माद्री, अश्विनी कुमार का ध्यान करती हैं और नकुल-सहदेव पैदा होते हैं। महाभारत की कथा में पांडव, अज्ञातवास के लिए विराट देश में जाते हैं तो वहां नकुल-सहदेव अश्वशाला का काम देखते हैं, पशुओं के चिकित्सक होते हैं। उन्हें इसका ज्ञान, उनकी विशिष्टता होती है (नाम में ही अश्व है)। अश्विनी कुमार, वैदिक देवता हैं, उनकी भी प्रतिष्ठा इस रूप में रही है। उल्लेख मिलता है कि वे यौवन के लिए भी दवाएं दिया करते थे। आंखों का इलाज करते थे, और बनावटी हाथ-पैर का उल्लेख मिलता है, जिसमें उन्होंने किसी के लिए लोहे का पैर बनाया था।

कोरोना के दौर में लाइव आने लगे, वेबिनार होने लगे। बच्चों की ऑनलाइन क्लास होने लगी मैंने पता करने की कोशिश की, कुछ पैरेंट्स से, बच्चों से, कि यह कैसा अनुभव है। उनमें किसी की मजेदार किंतु तात्विक टिप्पणी थी कि बच्चे को क्लास की पढ़ाई में तो समझ में नहीं आता, मन नहीं लगता तो इस तरह में कितनी पढ़ाई कर पाएंगे। ठीक उसी तरह वेबिनार की बात है कि सेमिनार में, पोस्ट लंच सेशन में लोग झपकी लेते हुए दिख जाते हैं। फिर भी यह परिवर्तन का दौर है जब धीरे-धीरे हम उस काल की ओर बढ़ रहे हैं। जैसे परिवर्तन की संभावनाएं भविष्य में हैं, उसको इस कोरोना संकट ने कुछ करीब ला दिया है। इस माध्यम से अभ्यस्त होने में थोड़ा समय लगेगा, लेकिन यह भविष्य की झांकी है इससे कहीं, किसी को इंकार नहीं हो सकता।

अपनी पढ़ाई की बात पर आते हैं। यश, छत्तीसगढ से जुड़े साहित्य और लेखकों की किताबें छापते रहे हैं। मैं भी जुड़ा रहा, बात हुई तो शर्त रख कर बचना चाहा कि संभव है इसमें आपके द्वारा प्रकाशित किसी पुस्तक, अपनी भी पुस्तक का नाम न लूं, फिर भी वे तैयार हो गए। वार्ता के विषय की बातें होने लगी तो एक बात आई, कि अब पढ़ने के लिए अधिक समय है और इसमें क्या पढ़ रहा हूं। निसंदेह यह दौर अलग किस्म से बीत रहा है। दिनचर्या बदल गई है, यह फर्क समय दे रहा है, आपके पास समय होता है। अन्य दिनों की तुलना में मुझे भी खाली समय अधिक मिला, लेकिन कुछ न कुछ गतिविधियां दूसरे तरह की, कुछ कोरोना रिलीफ के कामों से जुड़ी, कुछ अपने छूटे और नियमित काम, यानि खालीपन नहीं रहा।

यह भी लगता है कि समय निकलना, मानसिक होता है। मैंने महसूस किया कि साढ़े चार-पांच सौ पेज वाली किताब शुरू नहीं कर पाता था, अब ऐसा मौका मिला, खाली समय को अपने ढंग से इस्तेमाल की अधिक संभावना बनी तो मनोहर श्याम जोशी की पुस्तक ‘कौन हूं मैं‘, हाथ में ली। ज्यादातर लोग परिचित होंगे, बहुत प्रसिद्ध केस था बंगाल का भवाल संन्यासी प्रकरण। ‘कौन हूं मैं‘ शीर्षक दिखता है कि सेल्फ एक्सप्लोरेशन, आत्म संधान है। पुस्तक का प्रारंभिक परिचय का हिस्सा देखते ही बनता है कि वे किस आध्यात्मिक, साहित्यिक ऊंचाई तक उसे ले गए हैं। कोऽअहं की बात हमारी परंपरा में, शास्त्रों में है, वह किस तरह यहां घट रही है। भवाल संन्यासी पर अलग-अलग, संन्यासी राजा, एक जे छिलो राजा, फिल्में भी बन चुकी हैं, बांग्ला में कई पुस्तकें लिखी गई हैं। फिर भी यह एक भारी भरकम किताब आई, जिसे शायद जोशी जी पूरी नहीं कर पाए थे। यह उनके अंतिम दिनों की, शायद छपकर निधन के बाद आई थी। लगता है कि उन्होंने ढेर सारे नोट लिए थे और इस स्वरूप के बजाए कुछ और काम करना चाहते, लेकिन स्वास्थ्यगत या जो भी परिस्थितियां रही हों, यह स्वरूप बना। बहरहाल, पुस्तक की पृष्ठभूमि का, उसी बीज का विस्तार, भवाल राजा का आधार ले कर किया गया है, वह अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण और अनूठा है।

इस बीच पढ़ी पुस्तकों को एक साथ मिला कर याद करता हूं तो इसमें दो तरह की किताबें हैं। एक सेल्फ एक्सप्लोरेशन की, स्वयं की तलाश वाली और दूसरी, यात्रा-वृत्तांत, खासकर नदियों के यात्रा-वृतांत। इस संयोग में देख सकते हैं कि घुमक्कड़ी में देश को एक्सप्लोर करते हुए, भूगोल को एक्सप्लोर करते हुए, अपनी तलाश भी होती है। अपने संदर्भों से अलग हो कर, यात्रा में, अनजान जगहों पर, अपने तलाश की बेहतर संभावना होती है। अपने संदर्भों में रहते हुए, हमारे संदर्भ ही हावी हो जाते हैं।

क्षेपक- इस दौर में खोजा-पाया करते हुए मियां की मस्जिद, गूगल है। इसलिए वास्तविक खोज तो वही है, जो गूगल से संभव न हो। गूगल करते हुए हम कितनी भी गहराई में उतर जाने की सोचें वह वस्तुतः सतही विस्तार ही होता है। पैरोडीनुमा बात कुछ यूं हो सकती है- जिन खोजा तिन पाइयां, गहरे पानी पैठ। मैं नादां देखूं इंटरनेट, लिए लैपटाप बैठ।। इसलिए लगता है कि अब कुछ खोजना-पाना रह गया है तो वह है, खोजी-जानी वस्तुओं और शब्दों का स्वयं अनुभूत बोध और इस रास्ते आत्मबोध।

इस क्रम में अमृतलाल बेगड़ को छिटपुट पढ़ता रहा था। बेगड़ जी ने नर्मदा पर किताब लिखी है, ज्यादातर लोग उससे परिचित हैं। अब एक जिल्द में आ गई है ‘तीरे तीरे नर्मदा‘, तो इस दौर में वह सिलसिलेवार पढ़ने का मौका मिला। इसका तो कहना ही क्या, बहुत सारी अनूठी और रोचक बातें हैं। नर्मदा की परिकम्मा, परिक्रमा करने वालों में एक ऐसा भी है, जो कहता है कि मैंने अपनी गाय के साथ परिक्रमा शुरू की थी। गाय का नाम नर्मदा है, रास्ते में उसकी बछिया पैदा होती है, उसका नाम रेवा है और वह बहुत भाव से बताता है कि परिक्रमा का संकल्प तो इस नर्मदा का, गाय का है। मैं इसके साथ परिक्रमा कर रहा हूं। हां! संकल्प जरूर इसके लिए मैंने किया था। नदी के साथ आस्था के रंग हैं, हमारा जीवन है और इस क्रम में आत्म-संधान है, नदी की जीवंत धारा के साथ बहते हुए जिस तरह खुद को देख पाते हैं, वह यों संभव नहीं होता।

एक तरफ इस तरह की आस्था है उससे कुछ अलग ढंग की पुस्तक अभय मिश्र और रामेंदु जी की गंगा यात्रा की है ‘दर दर गंगे‘। पूरी पुस्तक पत्रकार नजरिए से लिखी गई है। एक तरफ जहां तीरे तीरे नर्मदा में आस्था का भाव है, वहां भी यह बात तो बार-बार आती है कि समय बदल रहा है, परिस्थितियां बदल रही हैं, बांध बन रहे हैं, प्रोजेक्ट्स आ रहे हैं तो भविष्य किस तरह का होगा, लेकिन फिर भी उसमें बहुत मजबूत आस्था है। वही यहां टूटते हुए दिखती है, गंगा जैसी आस्था की नदी के साथ यात्रा करते हुए लिखी ‘दर-दर गंगे‘ का, एक तो स्वरुप बहुत अच्छा है। अलग-अलग जगहों की बातें हैं, वहां अलग-अलग पात्र हैं, और उन पात्रों के साथ जो कहानियां कही गई हैं वह मूलतः रिपोर्ताज है। पत्रकारिता का शब्द ‘स्टोरी फाइल करना‘, यानि जो खबरों से आगे की बात होती है, खबरों से ज्यादा गहरी बात, यहां उस तरह की कहानियां है।

नदी यात्रा संस्मरणों में बहुत पहले पढ़ी किताब है देव कुमार मिश्र की ‘सोन के पानी का रंग‘। नदियों पर लिखी गई किताबें और यात्रा संस्मरण में सोन, जो सिंधु या ब्रह्मपुत्र की तरह नद माना गया है, उसकी परिक्रमा उन्होंने की थी। परिक्रमा का हाल-अहवाल इस किताब में जिस तरह से वे कहते हैं, अपने आप में ऐसा सांस्कृतिक दस्तावेज है, मुझे लगता है कि नदियों पर और यात्राओं पर लिखी गई पुस्तकों में जिसकी भी रुचि है अगर वह इस पुस्तक को नहीं पढ़ पाया है तो वह बहुत अमूल्य रीडिंग से वंचित है। इस पुस्तक को जरूर देखना चाहिए।

नदी यात्रा की एक और पुस्तक हमेशा याद आती है। यह बाकी से एकदम अलग ढंग की, राकेश तिवारी जी की लिखी पुस्तक है। और पुस्तक, वह तो कहने ही क्या, नाम है ‘सफर एक डोंगी में डगमग‘। वे भी गंगा यात्रा करते हैं मगर नदी-नदी, धारों-धार और मजे की बात कि डोंगी, चप्पू खुद चलाते हुए यात्रा करते हैं, इस संकल्प के साथ कि वे पूरा सफर, सफर के दौरान रात्रि विश्राम, डोंगी में ही करेंगे। शायद 62 दिन की वह यात्रा है और किस तरह से यात्रा होती है, अनूठा विवरण है। इस किताब की, इसके लेखन की, अभिव्यक्ति की खास बात यह है कि यों पुराविद राकेश जी, उस तरह साहित्यकार नहीं है। कई बार स्थापित साहित्यकारों में ताजगी का अभाव होता है। राकेश जी को जब पढ़ें, भाषा की, भाव की, अभिव्यक्ति की, दृष्टि की ताजगी और कितना ज्यादा वह इन चीजों में इन्वॉल्व हैं, मगर जितने ज्यादा शामिल, उतने ही तटस्थ हैं। उनका ‘मैं‘ कहीं भी लेखन में हावी नहीं होता और इस कारण उनके लिखे से आत्मीय होने में पाठक को देर नहीं लगती।

‘पवन ऐसा डोलै‘ उनकी दूसरी किताब है वह भी मैंने इस बीच पढ़ी, काफी समय से मेरे पास रखी थी। भाषा को ले कर, लोक को, पुरातत्व को, विभिन्न प्रकार के ऐसे क्षेत्रों को ले कर, एक अलग तरह की पुस्तक और जितने विषयों को, जितने क्षेत्रों को एक साथ और जिस क्रम से पिरोया गया है वह पूरी सभ्यता का उद्भव, गुफावासी मानव, आदिमानव, वहां से लेकर सभ्यता के विकास की भी कहानी है, लोक जीवन की भी कहानी है, पुरातत्व के खोज, शोध और उसके विकास की कहानी है तो कहीं न कहीं, जो सबसे कम दिखाई पड़ती है, अंतर्निहित है, वह पूरी पुस्तक राकेश जी के स्वयं की जीवन यात्रा भी है। बहुत महत्वपूर्ण है।

इस सफरनामे की दो पुस्तकें मैंने और पढ़ीं। एक अजय सोडाणी की, वे पेशे से डॉक्टर हैं। घूमने के शौकीन, वह अपने रोजमर्रा से इतर जिन चीजों को देखते हैं, संस्कृति के जिन पक्षों और आयामों को देखते हैं, उन्हें उनकी देख पाने की, पकड़ पाने की और उसे डॉक्यूमेंट करने की, अभिव्यक्त करने की, जैसी उनकी शैली है और उनके पास अपना, अपने पढ़े का, परंपराओं को, लोक को, जीवन को देखने का, अपना नजरिया है, अपनी शैली है। उसके साथ जब ‘दऱकते हिमालय पर दरबदर’ में अपनी बात कहते हैं तो वह कुछ अलग ही, कुछ खास बन जाती है। ठीक वैसी ही एक किताब मनीषा कुलश्रेष्ठ की है। वे जिस प्रोजेक्ट पर काम कर रही हैं, उससे जुड़ी ‘होना अतिथि कैलाश का‘ पुस्तक लिखी है। मनीषा जी जैसी लेखिका है, जैसी साहित्यकार हैं, वैसी ही घुमक्कड़ भी। प्रोजेक्ट का प्रतिवेदन लिखते हुए यह वृतांत, कहां तथ्यात्मक विवरण और कब साहित्य, कब यात्रा संस्मरण, चीजें इतने सुंदर ढंग से एक दूसरे में शामिल होती जाती हैं और वह पूरा का पूरा कैलाश मानसरोवर की उनकी यात्रा में जो भाव उभरा है, उन्होंने गढ़ा है, पढ़ने में रोमांच होता है और रोचक तो है ही।

युवा लेखकों में कुछ मुझे बहुत प्रिय हैं। सिर्फ मुझे प्रिय नहीं है वे इस दौर के गंभीर, उम्र के चौथे दशक वाले, 40 साल से कम उम्र के लेखक हैं, उनमें आशुतोष भारद्वाज हैं। उनकी पुस्तक ‘पितृ-वध‘ आई, वह इस बीच मुझे पढ़ने का मौका मिला। पुस्तक में जितने गंभीर ढंग से हिंदी साहित्य के अलग-अलग लेखकों की, विचारों की विवेचना है, इसे खास बनाती है और जरूरी भी। पितृ-वध शीर्षक ही अपने आप में बहुत रोचक है, उसे रूपक के बतौर देखें तो दरअसल अपनी ऐसी परंपराओं से मुक्त होने का प्रयास, जिससे कुछ नया-ताजा सृजन संभव होता है। यह पितृ वध कंसेप्ट है, चाहे वह अस्तित्ववाद हो, यह आरंभिक काल से चला आता है। हमारे शास्त्रों में भी दिखता है, आधुनिक लेखन में भी है। उसे पीढ़ियां अपने ढंग से अपनाती हैं।

दूसरे युवा व्योमेश शुक्ल हैं। बनारस को लेकर उन्होंने जो बातें कहीं हैं, रंगमंच पर तो वे हैं ही, कवि हैं, ‘काजल लगाना भूलना‘ और ‘कठिन का अखाड़ेबाज‘ उनकी दो पुस्तकें आई हैं। बनारस वाला अंश दोनों पुस्तकों में है। काजल लगाना भूलना, अपने आप में वह कविता है, गद्य है, गद्य-कविता है या पद्य-गद्य है, कुछ इस तरह की है, लेकिन है पठनीय, गंभीरता की मांग करती। उसमें आपको सोचने की खुराक मिलेगी, उसमें दृष्टि है। और तीसरे युवा लेखक सुशोभित, जिनको इस बीच पढ़ता रहा हूं, उनके लिखे गांधी से बहुत प्रभावित हुआ हूं। यह तीन ऐसे युवा लेखक हैं जिनके किसी भी लिखने पर नजर रहती है, प्रयास करता हूं कि इसमें से कुछ ना छूटे।

दो अनुवाद की चर्चा करूंगा। आप मानें कि नसीहत दे सकने जितना बुजुर्ग हो गया हूं तो खासकर युवा साथी अगर यहां है, यह देख सुन रहे हैं तो कहूंगा कि कोई न कोई एक क्लासिक, किसी विदेशी लेखकों की रचना, अन्य भाषाओं की रचना, कुछ पुराना साहित्य, पारंपरिक और समकालीन, इनका काम्बिनेशन अपने पढ़ने में जरूर रखिए। रस्किन बॉन्ड को, अंग्रेजी में छिटपुट पढ़ता रहा था लेकिन इस बीच स्वाति अर्जुन जी वाले हिंदी अनुवाद से जो रस्किन बॉन्ड आए हैं, मूल की तरह स्वाभाविक। उनका हास्य, आपने देखा होगा, अलग तरह का, बड़ा निर्मल हास्य होता है। हमारे भारतीय हास्य से अलग, पाश्चात्य हास्य है, जो मार्क ट्वेन में, जेम्स थर्बर में देख सकते हैं। इस बीच मैंने फकीर मोहन सेनापति को पढ़ा। उन्हें भी छिटपुट ही पढ़ा था, उनके अनुवाद का एक संग्रह मिला। पढ़ कर लगता है कि उस युग में साहित्यकार, अपने को कितना जिम्मेदार मानता था और रोचकता के साथ, समाज सुधार की भावना के साथ, जो बुराइयां है समाज की उसके साथ, वह किस सुंदर ढंग से बातें कहते हैं।

पुराने क्लासिक है भारतेंदु हरिश्चंद्र, गुलेरी, हजारी प्रसाद द्विवेदी, कुबेरनाथ राय, यह कुछ ऐसे लेखक हैं जो हमेशा मेरे आस-पास अगल-बगल होते हैं और किसी भी संदर्भों के लिए मैं उन्हें देखता रहता हूं। अंत में युवा साथियों के लिए दुहरा कर कहूंगा कि पढ़ने में, अन्य भाषाओं की अनूदित चीज, अन्य भाषाओं का अभ्यास हो तो कोई विदेशी भाषा, देश की अन्य भाषा, कुछ क्लासिक, शास्त्रीय रचनाएं, पुराने लेखकों की रचनाएं, कुछ समकालीन, गद्य-पद्य, इस तरह काम्बिनेशन रखें। इस तरह पढ़ना मानसिक स्वास्थ्य के लिए मददगार होगा।

यह पढ़ाई, मैं कर इसलिए पाया क्योंकि मानसिक रूप से लगा कि इस बीच मेरे पास समय है, वरना जिंदगी तो इसी तरह होती है, बस लगता है कि समय नहीं है। आप सब, जो यहां देख रहे हैं, मुझे सुन रहे हैं, शुक्रिया और यश पब्लिकेशन, जिन्होंने मुझे अपने पेज पर जगह दी, उनका भी बहुत-बहुत आभार, धन्यवाद।

Tuesday, March 23, 2021

राग मारवा

‘राग मारवा‘ संग्रह की कहानियों का विराग-अनुराग अपनेपन से बांध लेता है। इन कहानियों की कमी या खूबी यही है कि यहां कुछ भी नया और अलग नहीं जान पड़ता। रचनाकार का अनुभव संसार उसका अपना निजी होते हुए भी, इतना आत्मीय और समावेशी है कि वह अगल-बगल घटते जान पड़ता है। खास यह कि भाव ऐसी न्यायपूर्ण संगति से शब्दों में बदलते हैं, वह रस-सृष्टि अपने साथ चलने के लिए रोक रखती है।

संग्रह की पहली दमदार कहानी ‘राग मारवा‘ और आगे भी पढ़ते हुए लगा कि बगल से गुजरती कोई जिंदगी, समानांतर अक्सर ओझल रह जाती है, लेकिन एक धीमी कराह पर ध्यान अटके, तो वह राग मारवा की तरह मन में झरने लगता है। मनोहर श्याम जोशी की कहानी, ’सिल्वर वेडिंग’ याद आती है। पता हो कि यह रचनाकार का पहला संग्रह है तब शायद पाठक का नये परिचित लेखन पर ध्यान अलग ढंग का होता है और बुक मार्क लगाते हुए दीख पड़ता है कि कहानियों में भाषा, भाव, अनुभव, सजग दृष्टि, अवलोकन, संवेदनशील मन और अभिव्यक्ति, यह सब किसी प्रौढ़ रचनाकार की कलम की तरह सधा हुआ है, जिसमें संतुलन ऐसा कि सहज प्रवाह बना रहे। पहला संग्रह है लेकिन अनगढ़ता कहीं नहीं। रचनाएं, अभ्यस्त लेखन की करीने से प्रस्तुति है।

कहानी में अरमानों का ‘गुलाबी दुपट्टा‘ इस तरह लहराता है कि त्रास का सपाटपन, बयां करते और भी त्रासद हो जाता है। कहानी में सुघड़ परिपक्वता है। ‘जनरल टिकट‘ में भाषा का बढ़िया इस्तेमाल, कहानी के मूड को संभाले हुए है। ‘फैमिली ट्री‘, बच्चे के मन में बच्चों-सा सहज हो कर उसमें उतरा-पढ़ा गया है। कहानी का शीर्षक जरूर मिसमैच लगता है। कहानी ‘आवाज में ...‘ तसल्ली से की गई महीन बुनावट, जिसके चलते इस प्रेम कहानी में दरार भी, तल्खी के साथ नहीं, स्वाभाविक आता दिखता है।

कहानी ‘धुँध‘, मन में बसा घर, समय के साथ टू बीएचके और फिर कम्पार्टमेंट होता जाता है। तीन अलग सेट के टुकड़ों वाला जिगसा पजल। बच्चों में बंटवारा तो करना ही होता है, लेकिन वह मां-पिता को कैसे मंजूर हो। बुकमार्क लगाते हुए ध्यान जाता है कि किस तरह अगल-बगल से गुजरती जिंदगी, नजर भर देखा, नब्ज टटोला कि अफसाना बन जाती है। कहानी ‘आसमानी कागज...‘ और ‘सुरमई‘ में कहे-अनकहे के बीच पनपते-मुरझाते रिश्ते हैं तो ’विदाई’ में भी सीमित पात्रों से बुना गया सघन समीकरण है। ‘पानी पे लिखा...‘ मन में फूटा-बहता यादों और भाव का सोता, न जाने क्या और कहां बहा ले जाए, कब किनारे टिका दे।

विविध भारती की रेडियो सखी ममता सिंह की कहानियां, महानगर, रेडियो, विविध भारती, गीत-संगीत से सराबोर हैं। राग मारवा में डूबते-उतराते कहानी ‘आखिरी कॉन्ट्रैक्ट‘ के आखिरी शब्दों के साथ, रुपहला ख्वाब मानों बदल जाता है सुनहरा सबेरा में- ‘...उसमें हम घोलेंगे प्यार का गुलाबी रंग... ।‘

Tuesday, June 23, 2020

पवन ऐसा डोलै


सन 2018 में छपी पुस्तक ‘पवन ऐसा डोलै...‘ 1953 में जन्मे राकेश तिवारी का संस्मरण है, जिसमें हिसाब-किताब उनके बीस बरस की उम्र से आरंभ होता है। पड़ाव दर पड़ाव आगे बढ़ते 2010 तक पहुंचता है। यों किस्सा, लेकिन तिथिवार है तो कह लें इतिहास, यानि किस्सानुमा इतिहास या इतिहासनुमा किस्सा। वे कहते हैं- ‘‘एक जिन्दगी में पैंतीस बरस कम नहीं होते।‘‘ फिर ‘‘डगर, कु-डगर, बे-डगर डोलने-भटकने ... क्या पाने चले, किस दिशा में, क्या पाये, कहाँ पहुँचेंगे, क्या चाहा, नियति कहाँ ले आयी, अब किधर ले जाएगी? हर्ष-राग-विषाद के एक गुम्फन से निकलते दूजे में उलझ जाते।‘‘ और आगे यह भी कि ‘‘मासूम उमर भटकते-सॅंभलते फिसल गई। रुपहली रातों में प्रणय और रोमांच के धागे बुनने, बिखरने, सरझने के किस्से साझा करने के दिन उड़ते गये।‘‘ उस हिन्दुस्तानी संस्कृति में सराबोर, मानते हैं कि जिसका हिसाब चित्रगुप्त महराज के पास भी नहीं मिलेगा।

पुरातत्ववेत्ता, पुरातत्वविद जैसे भारी पद-पहचानधारी का काम पुराविद से भी चल जाता है। पुराविद से करीबी देशज शब्द बैठेगा पुरानिक, और कुछ आत्मीय सांचे में ढले तो ‘पुरनिया‘ (पुस्तक में यह शब्द सयानी समझ वाले पुराने-बुजुर्गों के लिए आया है)। तो इस कहानी का लेखक-पात्र, ‘पुरनिया‘ एक स्तर पर अपने सहेजे पैंतीसेक बरस के तरतीबवार लेखे की कहानी कहता है। दूसरे स्तर पर बात क्रमशः सर्वेक्षण से आरंभ होती है, उसका विवरण तैयार किया जाता है, प्रस्ताव बनता है, खुदाई-विश्लेषण और फिर व्याख्या के साथ ज्ञात इतिहास में ‘नयी‘ बात जोड़ते हुए ‘इति‘। यहां एक और स्तर मानव सभ्यता के विकास का है, गुफावासी आदिमानव, खेती-बस्तियां और इन पैंतीस सालों में ही बदल गई दुनिया, मानों सभ्यता के हजारों साल का गुटका संस्करण, पावर प्वाइंट प्रेजेंटेशन में सिमट जाए। चुनांचे, इन तीनों स्तरों का ऐसा सधा और संतुलित गुम्फन कि कहीं उलझन नहीं होती। अध्याय और खंड का विभाजन सहज संयोजक बनकर प्रसंग-अंशों को आपस में जोड़ता चलता हैं। खुली निगाह से देखे, खुले मन से सुने को, पूरी तसल्ली से गुन पाता है वही इसे सहेजते, ऐसा दस्तावेज तैयार कर सकता है। यह पुस्तक बेयर ग्रिल्स के थ्रिल्स वाली, पुरनिया की आत्मकथा, सह यात्रा प्रतिवेदन, सह उत्खनन डायरी, सह उत्खनन प्रतिवेदन, और मौज की झूला-चकरी वाला आनंद भी। चित्रित शैलाश्रयों से बाहर आ कर, सभ्यता भी व्यतिक्रमित आगे बढ़ती है।

पुरातत्व वालों को पीठ पीछे और मौका देखकर सामने भी गड़े मुरदे उखाड़ने वाले, कबर खोदने वाले कहा जाता है और उन्हें भूत, जादू-टोना, रहस्य, गुफा, बीजक-खजाना, उत्खनन और कार्बन डेटिंग वाला जाना-माना जाता है। यह पुरनिया लेखक स्वयं को भू-सुंघवा कहता है। यों देखें तो सर्वेयर-एक्सप्लोरर, पुरातत्व के हों, भूगोल, भू-विज्ञान के या नक्शा बनाने वाले सर्वे के भू-सुंघवा ही होते हैं, सूंघते हैं, नाप-जोख कर, गंध पा कर ताड़ लेते हैं और ताड़े हुए तिल को फिर ताड़ बनाने में जुट जाते हैं। लेखक यहां घोड़ा, लोहा, मेगालिथ और आर्य, इन चार ‘आर्य प्रश्नों‘ के इर्दगिर्द घूमता है। साथ चलती है लोरिक चंदा, नल दमयंती, भरथरी और आल्हा उदल गाथाएं, आधुनिक गाथा चंद्रकांता का तो इलाका यह है ही। लोरिकायन मॉरिसस में भी मिल जाती है। फिर गाथाएं जतन से पिरो दी गई हैं, लोकगीत से बेगम अख्तर, कबीर और भिखारी ठाकुर से ग्रियर्सन तक। दंतकथा, लोककथा, पुराण कथाओं के साथ प्राचीन शिलालेख भी।

पूर्वाचार्यों राहुल सांकृत्यायन (वोल्गा से गंगा) और डा. भगवतशरण उपाध्याय (सवेरा-संघर्ष-गर्जन और पुरातत्व का रोमांस) को स्मरण-नमन करते हुए, पुराविदों के आत्मकथात्मक गद्य में ब्रजमोहन व्यास का ‘मेरा कच्चा चिठ्ठा‘, केके मोहम्मद का ‘मैं एक भारतीय‘ का अपना महत्व है। इसी तरह शरद कोकास की लंबी कविता ‘पुरातत्ववेत्ता‘ भी उल्लेखनीय है, लेकिन यह ‘पवन ...‘, निराली बयार है। यह उन पुस्तकों में से है, जिसे पढ़ कर, कुछ कहे बिना मन मचलता रहे, लगे कि कोई सुख चोरी-चोरी पा लिया है, जिसे न बांट पाए तो पाप के भागी। बांट कर पुण्य चाहे न मिले, बांटनवार रंगेगा ही। पुस्तक के बहुतेरे अंश ऐसे हैं, जिन्हें उद्धृत कर ही उसका रस संभव है, बानगी लेते चलें-

वनवासी 
पात्र है गुदरी, उसका हुलिया- ''लम्बी दाढ़ी, झुके बदन, गहरे काले वर्ण और मझोले कद-काठी वाले गुदरी की आवाज में शहद और आग्रह में गहराई, कोठरी छोटी लेकिन दिल बहुतै बड़ा। फटाफट बिछौना बिछाते, तो उनके बाँहों की मछलियाँ फिसलते दिखतीं।'' गुदरी खिस्सा सुनाता है- ''एक ठे कोल इहाँ बाघे से लड़ल रहल।'' और कोल के साहस का बखान इस छोटे से वाक्य में हो जाता है- ''जउने धरती-पानी-बतास पै बघवा पला रहा, ओही पर कोलवौ।'' नामकरण के साथ तथ्य और इतिहास आता है कि- ''एक समय एक बलवान अहीर यहीं टाँगी से एक ठे बाघ मरलस, एही से एके कहल गइल ‘अहिर मरवा‘। ओकरे बाद एक ठे बाघ कइयौ अहिरन के भख लेहलस तो ‘बघ मरवा‘ नाम चला।'' साथ ही परंपरा मजेदार ढंग से बताई गई है- ''कोलिन हारी, तो कोल के साथ गयी, कोल हारा तो कोलिन के गाँव चला।''

वनवासी सभ्यता के प्रति लेखक के भाव देखिए- ‘‘कैसा उल्टा खेल चल रहा है, एक असंतुष्ट, असभ्य व्यवस्था परम संतुष्ट वनवासियों को सभ्य बनाने चली है।‘‘ उनकी जीवन-शैली की खासियत रेखांकित हुआ है- ‘‘बनवासी टपते रह गये। रहे होंगे कभी जंगल-पहाड़ के बेताज बादशाह, उन पर उनका नाम तो लिखा नहीं था। उन्हें तो पता ही कब रहा कि जमीन किसी के नाम लिखी जाती है। जान भी जाते तो क्या करते, खेती-किसानी से ज्यादा वे जंगल-पहाड़ में मस्त विचरने में ही आनंद पाते।‘‘ मगर इसके साथ एक पात्र कह जाता है- ‘‘सामंती और बरतानवी दौर ने इन स्वतंत्र वनवासियों को पैंट-कमीज वालों के सामने जो ये झुकना सिखाया, वह आज के भारत में ज्यादा दिन चलै वाला नहीं।‘‘

लोक-वार्ता
भाषा-अभिव्यक्ति में लोकवार्ता और उसमें लेखक समाए-समोए हैं। जल कुंड की गहराई का नाप है- ‘‘सात माचा की डोरी, ओ सात बरातिन पगहा, ओ थाह नाहीं बा।‘‘ वहीं बनारसी बलम मिर्जापुर क्या गए, कचौड़ी गली सूनी कर गए, लेकिन शिकायत यह कि मिर्जापुर गुलजार किए हैं- ''कचौड़ी गली सून कइला, हो बलमू ऽऽऽ ओ ऽऽ, मिरजापुर गुलजार कइला ऽऽ, हो बलमू ऽऽऽ'' और प्रयोग कि ''बुलेट मोटर साइकिल’ से बढ़कर ‘रॉयल इन फील्ड‘ भला दूसरी कोई सवारी क्या होगी।'' वहीं ‘चउवन गली और बावन बज़ार‘ जैसे शीर्षक में ग्राम नाम व्युत्पत्ति का रोचक हवाला है।

सर्वे के दौरान प्राप्त सूचनाओं का आकर्षण और उनकी टोह लेने की चाहत की अभिव्यक्ति, 'दिल बहक गया' और टटोल आने' की बात, कुछ इस तरह- ''कउवा खोह से लौटानी में ‘गोछरा जंगल‘ में अटक गये कोटारों और नील-गायों को भागते देखकर। वहीं एक गयार के बताने पर दिल बहक गया दक्खिनी कगार की ‘कनछ तर‘ की बड़की मान तक टटोल आने को।'' मच्छरों की खून चूसने की क्रिया को काटना कहना लेखक को नहीं भाया है, वह लिखता है- ‘‘रात भर मच्छरों ने जी भर कर चोभा।‘‘ इसी तरह सजग-सूक्ष्म अवलोकन को समृद्ध भाषा के इस्तेमाल से पेश करने की बानगी- ‘‘पगुराते फेंचकुर फेंकते गाय-गोरू- ऊँट‘‘ और वहीं अगली पंक्तियों में ‘‘पगुराते ऊँटों के हिलते थूथन से झरते झाग।‘‘ और फिर से अनुप्रास सहित ‘‘हारे हुए हैरान कुत्तों की लाल-लाल लार चुआती जीभें बित्ता भर लटक गईं।‘‘ पुस्तक में सहयोगी-मित्रों और विशेषज्ञ-विद्वानों के नाम हैं, लेकिन जहां नाम आवश्यक नहीं, वहां किस अंदाज से बात कही गई है, देखिए- ‘‘किसका नाम लें और किसका छोड़ें- लाल, पाल, वर्मा, गोपाल, देव, जोशी, सिंह, मिश्रा, सिद्दीकी, श्रीवास्तव, बाजपेयी, त्रिपाठी, चतुर्वेदी, मिश्रा, पंत नामांतधारी एक से एक श्रीमंत।‘‘ और नाम से बचते-बचाते- ''तारणहार बनकर अवतरित हुए हमारे नये कैबिनेट मन्त्री जी।'' फिर मंत्री जी के प्रवास को जीवंत किया है, इस तरह- ‘‘और हवा में समायी वी.वी.आई.पी. विजिट की सरसराहट।‘‘

शब्द-सृष्टि
कुछ शब्दों पर चर्चा करते चलें- चारों ओर के लिए शब्द चलता है इर्द-गिर्द या कम प्रचलित है गिर्दागिर्द, लेकिन लेखक ने सहज-सार्थक शब्द गढ़ा है- 'चौगिर्द'। एक शब्द आया है डमरू बाघ, लेखक ने इसका अर्थ ‘बच्चों वाली बाघिन‘ बताया है, किन्तु छत्तीसगढ़ में डमरू या डमरुआ ‘बाघ के बच्चे‘ के लिए प्रयुक्त होता है। यहां एक पुरातात्विक स्थल का नाम डमरू है और यह मात्र संयोग नहीं होगा कि इस गांव के एक तालाब का नाम बघबुड़ा है। एक अभिव्यक्ति है- ‘अपनी कल्पना की ढीली लटाई‘, पतंग के साथ धागा लपेटने की चकरी के लिए के लिए शब्द चलता है, चरखी, घिरनी या परेता। पुस्तक में आया शब्द ‘लटाई‘ इसी का पर्यायवाची है, यहां प्रयोग भी कम मजेदार नहीं कि लटाई से कल्पना का धागा ढील दिया गया है। एक अंश है- ‘‘कुल बीझन अजवैं ना सरझ जाई। फीर, कल्हियाँ बदे का बची? ‘‘ अब इसे मिला कर देखें कृष्ण बलदेव वैद की कुकी और उसके एक प्रसंग से- ‘‘कभी कभी कुकी ऐसा आभास देती दिखाई देती है कि वे मेरी सारी साहित्यिक, मानसिक, सांसारिक आध्यात्मिक गुत्थियों को सुलझा सकती है लेकिन सुलझाती नहीं क्योंकि सोचती है अगर उसने यह कठिन काम कर दिया तो मैं क्या करूँगा।‘‘ अब पता नहीं कि इन दोनों लेखकों ने एक-दूसरे के इन अंशों को देखा या नहीं, मेरे देखने में आया, तो साथ रख दिया है।

एक बारीकी कि ‘‘फूल की थाली में पलाश के पत्ते पर खटाई‘‘। फूल यानि, फूल कांस, कांसे की थाली, जिसका प्रयोग भोजन के लिए प्रतिष्ठित है। (इसी तरह एक अन्य फूल, 'फूल पीतर' यानि पीतल, मुख्यतः अवध अंचल में प्रचलित है।) मिश्र-धातु कांसा, मिश्रण अनुपात के फर्क से ‘मस्केल‘ और ‘नेर‘ भी होता है, जो अन्य बर्तन या घंटी आदि बनाने के काम आता है। फूल कांस में सफेदी और चमक अधिक होती है। कांसे की थाली या बर्तन में दही-मही (मठा) की खटाई तो परोसी जाती है, लेकिन आम, इमली या नीबू की खटाई, कसाने-कसैली पड़ने लगती है, इसलिए फूल की थाली पर सीधे चटनी परोसने के बजाय पलाश का पत्ता इस्तेमाल होता है। इसी तरह 'विजयशाल' कहा गया है, बड़े ढोल जैसे वाद्य को। यह एक नया शब्द मिला। इसे समझने के लिए तुक्का लगाया कि यह बीजासार या बीजाशाल का सुधरा रूप हो। बीजा (छत्तीसगढ़ी एक उच्चारण बिजरा भी) मुख्यतः शाल वनों के बीच ही होता है, शायद इसलिए उसका नाम जोड़ा बना कर ‘बीजा-शाल‘ आता है। आगे, ढोल समूह के वाद्य, यानि ऐसे तालवाद्य, जिन्हें लकड़ी को खोखला कर बनाया जाता है, उनमें कटहल, आम, खम्हार-सिवना (कुरुसमरा), कदम्ब, भिर्रा, गोइंजा (गूंजा?) काठ भी प्रयुक्त होता है। कुछ लोगों की पसंद सिरीस है, किन्तु सबसे उपयुक्त लकड़ी यही यानि बीजा मानी जाती है। धान के भीतर डेढ़-दो महीना डाल देने पर उसकी गरमी से लकड़ी पक जाती है, फिर खोखला करते हुए इसमें दरार नहीं आता। इससे बने ढोल, तबला आदि की ध्वनि मधुर ठनकदार होती है। उसकी आवाज, रात के साथ गहराती, और-और ‘तान‘ होती जाती है।

पुस्तक में आए शब्द और उनकी इस तरह प्रवाहमयी, उन्मुक्त भाषा-अभिव्यक्ति तभी संभव हो सकती है, जब उसमें मन रचा-बसा हो, लिखने वाले को पाठकों की परवाह तो हो, लेकिन दबाव न हो। वही ऐसा ‘स्वान्तःसुखाय‘ रच पाता है जो हमखयाल ‘बहुजन रुचाय‘ हो सकता है। कला-साहित्य का कोई भी रूप हो, उसका अपना और सच्चा सुख तो सृजन-रियाज में ही निहित होता है, प्रदर्शन-आश्रित रचनाकार की संतुष्टि दूसरों, यानि श्रोता-दर्शक-पाठक (और आयोजक-प्रकाशक-वितरक) के पास गिरवी हो जाती है। यह पुस्तक, आत्मनिष्ठ साधक, खुद-मुख्तार रचना-सुखी, ‘सच्चे साहित्यकार‘ की कृति है। पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी के शब्दों में- ‘‘सच्चे साहित्यकारों के लिए जो बात सबसे अधिक मुख्य है वह है उनका अंतःसुख। उसी अंतःसुख के कारण वे साहित्य के क्षेत्र में यश और अपयश की चिंता न कर लिखते ही जाते हैं।’‘ संक्षेप में, अभिव्यक्ति के गरिष्ठ-बेमेल छौंक के छद्म को सहज उजागर करने वाली, निरस्त कर सकने वाली सुपाच्य ‘कोदो-कुटकी‘ भाषाभिव्यक्ति परोसी गई है इस लेखन में।

पुरनिया निगाह
ऐसी बातें, पुरनिया जिनसे लगातार दो-चार होते रहते हैं, लेखक अपने पेशे पर टिप्पणियों का स्वयं आनंद लेता है- ''हाँ तो गीबड़ों सुनो! क्या कहते हो तुम सब, उहै- क्या कहते हैं तोहरे सब आर्कोलॉजिस्ट बनने चला है। इहै ककरा-पथरा, नरिया-खपरा बीनने चला है। ई कुल कै के जिनगी में कुच्छौ नहीं कर सकत्या। भला माई-बाबू तोके एही बदे पढ़ै भेजले रहलैं। सब झूठ है, फ्राड है। वेस्टर्न कंट्रीज के देखा-देखी इंडोलोजी पढ़ाता है। का करब्या जन ई कुल पढ़-लिखि कै। बहुत बन जाब्या तो मास्टर। औ, मास्टरै बन के का कै लेब्या, मास्टर होए दो जून खाए, लड़िकन के ननियौरे छोड़े जाय।‘‘ पात्र श्रीवास्तव जी से कहलाया गया है- ‘‘भारत में आर्किओलॉजी आयी है अंग्रेजों के साथ, इसलिए उन्होंने यह टर्मिनोलॉजी अंग्रेजी में ईजाद की, जिसे सारी दुनिया में समझा जाता है। वैसे पुरातत्व वाला यही सब ‘जॉरगन‘ बोल कर तो एक्सपर्ट कहलाता है ना, जो अगर सोझै भाषा में बोलब्या तो तोके के भाव देई बबुआ!‘‘ फिर ‘‘पुरान-धुरान गुनने की मेरी चाकरी‘‘ मानते हुए लेखक बताता है कि- ‘‘एम.ए. करके नौकरी की तलाश पूरी होने तक हमारे साथ खाक फाँकने का तजुर्बा हासिल करने के इरादे से आए थे।‘‘ या शोधार्थी के लिए- ‘‘एक अरसे से जवानी खपा रहे‘‘ लेकिन इसके साथ- ‘‘पोथी पढ़ै से जितना नहीं सीखा जाय सकत है ऊ से कहूँ ज्यादा ज्ञान मिलत है घूमै-सुनै ते।‘‘ और फिर ‘‘एक ने मन की बात खुलकर बतायी- ‘गुरु जी। दरजा में बैठ के पढे में कउनौ मजा नहिनी। न कुच्छो देखाय, ना समझै में अमाय। खेते, बने-पहाड़े में घूम-घूम के अइसने पढ़ावल जाय, जैसे आप लोग पढ़ावत हवै, तब ना आयी समझ में।‘‘

सर्वेक्षण में अवलोकन खुली निगाह से होता रहे तो इतिहास का क्रम अपने-आप उजागर होते चलता है, जैसे आदिम शैलाश्रय-गुफाओं की चित्रकला को देखते-देखते लेखक मानों स्वयं उस दौर में पहुंच जाता है- ‘‘नृत्य मूलतः अंतर्मन के आनंद से उद्भूत हुआ। श्यामल मेघों का घिराव देख मयूरो का थिरकना, हरियाले वन-प्रांतर में उल्लसित मृग-छौनों की किल्लोलें, मृगया से छके सिंह-शावकों की मस्त कलाबाजियाँ, विशिष्ट अवसरों पर चिड़ियों की चहकन-फुदकन की तरह किन्हीं अवसरों पर अंदर से उपजे उमंग के ज्वार ने आदिम मानव के अंग-अंग में चपलता भरकर उन्हें बाँहें और पैर फैलाकर, गरदन, कमर और सिर लचका कर नाचने के लिए उद्यत किया होगा। आखेट खेलने चले, तो सफल मृगया की कामना से नाचे, कबीले भर की भूख मिटाने लायक बडा पशु गिरा लिया, तो सफलता की उमंग में नाचे, अलाव पर अहेर भुनने लगा, तो सुस्वाद माँस की लालसा में नाचे। पवन, वर्षा, वन, नदी, गाछ, सूरज और चाँद जो भी पारलौकिक लगता या जिससे हित सधता या जिससे भय खाते, उन सबकी उपासना में नाचते। कमर, कंधे और बाँह में बाँह डाल कर नाचते।‘‘

पुरातत्व
बातों-बातों में प्राचीन स्थापत्य का सहज विवरण आता है- ‘‘नीचे पड़े द्वार-स्तंभ पर अंकित यू जो ऊपर से नीचे तक लपटे नाग बने आंय ना, एहिका कहत हैं नाग-शाखा, इसके अगल-बगल ऊपर से नीचे तक फूलों से सज्जित पुष्प या फुल्ल शाखा, आदमी-औरत के जोड़े वाली मिथुन-शाखा, किंकिणिका-शाखा और पत्तों से ढॅंके घड़े वाली घट-पल्लव शाखा। शाखाओं के नीचे एक बगल मकर पर सवार गंगा जी और दुसरे बगल कछुआ पर सवार जमुना जी, उनके बगल शिव जी के द्वारपाल गण।‘‘ और फिर मंदिर स्थापत्य की चर्चा- ‘‘याकु भिट्टी वाली छ्वाट क्यार जगती-पीठ पर बने एहि मंदिर केरी तलछंद योजना मां चतुरस्र (चौकोर) द्विअंग गर्भगृह और याकु छ्वाट कपिली अथवा अंतराल क्यार प्राविधान आय। औ ऊर्द्धवच्छंद योजना मां सबसे नीचे आय खुर, कुंभ, कलश और कपोत मोल्डिंग वाला बेदीबंध। ओहिके ऊपर बीचो-बीच रथिका से सज्जित तनुक उभरा भवा जंघा भाग। रथिका क्यार स्तंभ सजे आंय घट-पल्लव, कीर्तिमुख, किंकड़िका-घंटी, औ, खल्व औ पत्र-शाखा नामक अभिप्राय सेने। बगल मां नीचे द्याखी, नान्हे-नान्हे शिवलिंग। नीचे-ऊपर जालक-पैटर्न से सजा पट्ट औ ओहिके ऊपर तुला-दंड। फिर, अंतरपत्र के ऊपर शिखर, मानो एक के ऊपर एक शहतीर जस खमसे मोल्ड, एहिका कहा जात है पीढ़ा शिखर, ढाकी साहब नया नाम दिहिन है- फाँसना शिखर।‘‘ और अवसर पा कर जुड़ता है- ‘‘चारों कोनों से अंदर की ओर मुड़ते शिखर वाले (रेखा शिखर) क्रमशः ऊपर की ओर छोटे होते हुए पीढ़ों वाले शिखर (फाँसणा शिखर) और हाथी की पीठ की तरह गोल गजपृष्ठ शिखर वाले (वलभी शिखर)।‘‘

मूर्तियों की चर्चा करते हुए प्रतिमाशास्त्रीय लक्षणों का उल्लेख आता है और ‘‘भाँति-भाँति के केश-विन्यास अलकावलि, भ्रमरक, हनी काम्ब, चूड़ा-पाश, लम्बकेश, वलिभृतवलयक, त्रिशिख आदि आदि।‘‘ विभिन्न आकार-प्रकार विशिष्टता वाले मृदभांड-पॉटरीज- ‘‘एन.बी.पी., ब्लैक-एंड-रेड वेयर, ब्लैक-स्लिप्ड वेयर, पेंटेड ब्लैक-स्लिप्ड‘‘ और मनके-गुरिया- ‘‘एगेट, कारनेलियन, क्वार्ट्ज, चालसीडोनी, क्रिस्टल, जैसपर वगैरह। फिर, हर ढेरी में एक-एक किस्म की गुरियों को सजाया- लॉन्ग बैरेल (लम्बे बेलनाकार), सर्कुलर (गोल), व्हील-शेप्ड (पहिये के आकार के), बाई-कोन (दोनों सिरों पर कोणाकार), तिकोन, हेक्सागोनल (षड्कोणीय), चैकोर, पोलिश्ड, अन-पॉलिश्ड, फिनिश्ड-अनफिनिश्ड (पूर्ण-अपूर्ण), ट्यूब्यूलर (नलीदार), काली-सफेद-भूरी-लाल लहरिया वाले, लाल, सफेद, नीले, भूरे, बहुरंगी। देखते-परखते आँखें जुड़ा जातीं।‘‘

पुरातत्व जैसे क्षेत्र में नई खोज के तकनीकी पक्ष, खबरों के ख्याल से, सामान्य पाठक के लिए किसी रुचि के नहीं माने जाते। सामान्यतः मीडिया ऐसे समाचारों में चौंकाने वाली कोई बात- चमत्कार, दुर्लभ, प्राचीनतम, पहली बार जैसे विशेषण के लिए व्यग्र होता है। ऐसे एक मामले की चर्चा यहां भी है- ‘‘ईस्वी सन और ईसा पूर्व की गफलत से बचाने के लिए हमने अपने प्रेस नोट में 1200 ईसा पूर्व जगह आज से 3200 बरस के आस-पास का लोहा मिलने का जिक्र किया, लेकिन कुछ एक सुधी संपादकों ने उसे संशोधित करके 3200 ईसा पूर्व कर दिया। कहाँ तो हम 1200 ईसा पूर्व बताने में ही झिझक रहे थे और कहाँ 3200 ईसा पूर्व? ऐसे में चरिहूँ लंग से हंगामा बरपने को कौन बरज पाता।‘‘

बदलता जमाना
इतिहास में विचरते को परिवर्तन जिस तरह दिखता है, उसके नमूने- ‘‘उस जमाने तक के आदमी आज यहाँ, कल वहाँ डेरा डालते, फंदा गोफना तीर-कमान से चिरई-अहेर मारते, फल-फूल बटोरते, भूँजते-खाते, नदी-नाला, खोह-कंदरा में घूमते परम स्वतंत्र रहे। इन्हें ‘हंटर-गैदरर स्टेज‘ की सभ्यता के आखिरी पायदान पर चल रहे परम निर्द्वंद्व होमोसेपियन (आधुनिक मानव) माना जाता है। फिर अनाज उपजाने और जानवर पालने की जानकारी पाने के बाद सालो-साल बीज बोने, उगाने, फसल रखाने-काटने-दंवाने, सिरज-संभाल कर रखने, गाय-गोरू चराने और गोठ बना कर रखने के गोरखधंधे में ऐसा उलझे कि अपनी सारी आजादी गँवा कर एक जगह खूंटा गाड़ कर गाँव बसा कर रहने लगे। इस तरह उनकी महीन तकनीकी कारीगरी और ज्ञान की बढ़ोतरी ने जहाँ उन्हें आगे बढ़ाया, वहीं उनके पैरों में बेड़ियाँ भी डाल दीं।‘‘ यह बता कर पात्र अभय के माध्यम से मजेदार निष्कर्ष निकालते हैं- ‘‘मतलब आदमी ने पौधों और पशुओं को पालतू बनाया और उसी प्रक्रिया में स्वयं भी पशुओं और पौधों का पालतू बन गया।‘‘ परिवर्तन को आंकने के लिए हाय तौबा के बजाय सपाटबयानी है कि- ‘‘पवन ऐसी डोलती रेलगाड़ी ने मुनरी, चुटकी, चुनरी, कड़ा और कपड़ा सब दाँव पर लगवा दिया।‘‘ और एक नमूना- ‘‘मसीही स्कूल, अस्पताल, गिरजाघरों का फैलाव- ‘मसीहं शरणं गच्छामि‘ के मंत्रोच्चार के साथ।‘‘

विनम्र दायित्व
लेखक अपनी विनम्रता के साथ, दायित्व और उसकी गरिमा में संतुलन बनाए रखता है, इस तरह ‘‘लोग-बाग बड़का मेटलर्जिस्ट मान कर भासन झारने का बुलउवा भेजने लगे। किसको-किसको बताते- हम चन्द्रगुप्त मौर्य वाला इतिहास-पुराण, पुरवा-पाथर पढ़ने वाले बहल्ला विद्यार्थी रहे, मेटलरजी से हमारा सूँघने भर का भी वास्ता नहीं रहा। लेकिन लाज बचाने के लिए मॅंगनी वाले परिधान पहिर-ओढ़ कर, साथियों की मदद से तैयार प्रेजेंटेशन दिखाने निकल पड़े।‘‘ लेखक अपनी पद-गरिमा के प्रति सजग है- ‘‘तब कितनी फजीहत होगी, अपनी तो खैर बिसात ही क्या, ओहदे की ज्यादा होगी।‘‘ (इस पुस्तक के लेखक श्री राकेश तिवारी, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के महानिदेशक यानि सर्वोच्च पद पर आसीन रहे हैं।) लेखक की जिम्मेदार संतुलित वैज्ञानिक दृष्टि प्रकट होती है- ‘‘किसी नई प्रविधि के ईजाद होने का इंतजार करना पड़ेगा, तब तक के लिए नपे-तुले तुक्के पर तुक्के ही चलेंगे।‘ और ''यह बताना भी कितना जरूरी है कि रिसर्च और न्याय के मसलों में सिक्के के दोनों पहलू ठीक से देख लिए जाएं।'' संरक्षण-विरूपण पर तटस्थ टिप्पणी का असर महसूस कर सकते हैं- ‘‘एक दृश्यांकन में... दूसरी ओर एक मगरमच्छ को घेर कर मारने का दृश्य। चित्रों के ऊपर कोलतार से लिखे चिरुई गाँव के रहने वाले ‘रामधनी‘ का नाम।‘‘ और मानों निचोड़ आता है- ‘‘इस मामले में एक बात ध्यान से सुनने और गॅंठिया लेने वाली भी है कि दर्शन-दिग्दर्शन की भावना के साथ यह सब किया जाय। अपनी धरती माँ, पुण्य पावन वन-प्रपात और सांस्कृतिक पहलुओं को बाजार का बिकाऊ माल समझ कर कतई नहीं। उनकी साफ-सफाई, रख-रखाव और अपनी जीविका-अर्जन में समुचित सन्तुलन बना रहना चाहिए वरना सोने का अण्डा देने वाली मुर्गी के सारे अण्डे एक ही बार में पा लेने का नतीजा तो सब केहू जनतै होब्या!‘‘ पुस्तक पर अंत की ओर आगे बढ़ते, साथ छूटने की धड़कन होने लगती है, तब आखिरी वाक्य आता है- ‘‘जिन्दगी रही तो फिर मिलेंगे।‘‘ इससे राहत होती है कि फिर मिलने, ऐसा कुछ और पढ़ने का रास्ता खुला हुआ है।

प्रसंगवश-पुस्तक पढ़ते हुए मन में हिन्दी भाषा-साहित्य और उसकी रवानी, बार-बार आती रही। पुस्तक के खंडों के शीर्षक ऐसे हैं, जिसे पढ़ते ही मुझ से देसी-गंवार का मन ललचा जाए। वैसे हिंदी के साथ कभी गॅंवारी बोली का विशेषण इतिहास-दर्ज है ही। यहां है, पूर्वी हिन्दी, अवधी, बैसवारी, भोजपुरी और उस पर बनारसी ठाट के साथ दृष्टि, अभिव्यक्ति और भाषा का संतुलित-समन्वय। पीछे मुड़कर परंपरा टोह लें तो इंशा अल्लाह खाँ और लखनवी सरशार जैसी यही ठाट-मौज भारतेन्दु और गुलेरी में दिखती है। हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कहा है- ''उन्नीसवीं शताब्दी के हिंदी लेखकों में एक विचित्र प्रकार की जिंदादिली थी'', (वे स्वयं अपने लेखन, खासकर निबंधों में सहज परिहास की आत्मीयता से लालित्य-पुट का अवसर बनाते रहे।) ‘हिन्दी का लोकवृत्त‘ पुस्तक के अनुवादक नीलाभ ने लिखा है- 1920-40 के बीच के काल में ... पत्रिकाएं भी भाषा और साहित्य को दिशा देने में जुटी हुई थीं। वैसी जीवन्तता फिर आगे के दशकों में देखने को नहीं आयी। बाद में हिन्दी साहित्य पर शुद्धता आग्रही अनुशासन-दंड के बहाने आंचलिक भाषा के विशिष्ट और तद्भव शब्दों से परहेज बरतते, छायावादी घनीभूत छाया का असर कि, परिनिष्ठ किताबी भाषा-शैली चल पड़ी और यही लिखने-पढ़ने की आदत बन गई। पिछले दिनों आई डॉ ओम निश्चल की आकर्षक शीर्षक वाली पुस्तक ‘भाषा की खादी‘, जिसमें सोंधी हिंदी-हिंदुस्तानी के बेधड़क देशज रूप को अब फिर सार्थक रेखांकित किया गया है।

भवानी प्रसाद मिश्र ने कवियों के लिए कहा है कि ‘‘लगभग सभी, कुछ बँधे-बँधाये ढंग से कुछ बँधी-बँधाई बातें कहते रहते थे। उन दिनों, उसे ‘छायावाद‘ कहा जाता था।‘‘ यह कमोबेश उस दौर के गद्य की भाषा-अभिव्यक्ति पर भी लागू होती है, जिसमें देसी ढब समानान्तर बना तो रहा, मगर हाशिये पर, बस हाजिर बतौर। रेणु और बिज्जी जैसे कुछेक इससे अलग दिखते रहे। ढर्रे वाली साहित्य-दृष्टि में भाषा, पाठ्यक्रम वाली और वृहत्तर लोक की अभिव्यक्ति दूरबीन से देखते, चलती गाड़ी की खिड़की से झांकते, ‘अहा! ग्राम्य जीवन भी क्या है‘ वाली हो गई। केदारनाथ सिंह के शब्दों में ‘यह एक आधुनिक का/ आदिम प्रवास था/ अपने ही घर में‘ की हालत हो गई। इस व्यथा को रेखांकित करने और उबरने जैसे प्रयास का उदाहरण विद्यानिवास मिश्र का ‘हिन्दी की शब्द-सम्पदा‘ है।

प्रसंगानुकूल, परीक्षण-प्रमाण है कि लगभग 20 साल बेहद लोकप्रिय रही ‘आधुनिक भावबोध, कला संचेतना और नवीनता का प्रतिनिधि मासिक‘ कही जाने वाली ‘ज्ञानोदय‘ जैसी पत्रिका का सन 1970 में अवसान हुआ, तब उसके संपादक लक्ष्मीचन्द्र जैन ने महसूस किया था कि ‘भारतीय जीवन एक नये दशक में, एक नये युग में, प्रवेश कर रहा है। इसके बाद का समय ‘नवनीत‘ और ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान‘ जैसी पत्रिकाओं और उनके समर्थ संपादकों नारायण दत्त और मनोहर श्याम जोशी का रहा, जो न केवल युगानुकूल सामग्री चयन के लिए सजग और प्रयासरत रहते थे, भाषा और अभिव्यक्ति के स्तर पर साहित्य को समृद्ध कर सकने वाली जानी-अनजानी लेखनी के प्रति भी उत्सुक रहते थे।

इसी क्रम में ‘धर्मयुग‘ वाले धर्मवीर भारती यहां सीधे प्रासंगिक हैं। रचना से अन्यथा किसी परिचय, संपर्क के बिना 'गांव-गंवई के लेखक', विवेकी राय छपते रहे, और उन्होंने यथाअवसर स्पष्ट किया कि ''भारती जी व्यक्ति नहीं, रचना को देखते हैं और 'धर्मयुग' नए-नए लेखकों को प्रकाश में लाने का बेजोड़ ऐतिहासिक कार्य कर रहा है।'' इसी तरह 40 साल पहले, जब इन राकेश तिवारी का लेख, अपनी तरह के मौजी-किस्सागो अमृतलाल नागर के माध्यम से भारती जी के पास पहुंचा, ‘खोहों में खोया अतीत‘ शीर्षक से ‘धर्मयुग‘ में छपा और उन्होंने नागर जी से जानना चाहा- ‘यह लड़का है कौन? उससे और लेख लिखाने हैं।‘

और एक बात, भाषा-परंपरा ग्रंथ रामचरितमानस की। तुलसीदास कृत रामचरितमानस, मूल रामकथा वाल्मीकि रामायण की भाषा-टीका है किन्तु आमजन में रामायण का पर्याय यही है। धार्मिक ग्रंथ के रूप में प्रतिष्ठित इस ग्रंथ का पाठ-पारायण अध्यात्म लक्षित होता है, लेकिन याद किया जाता है, उद्धृत होता है- प्रकृति, प्रवृत्ति, जीवन-मूल्य और सुभाषित के लिए। रामकथा, राम-रावण की युद्ध कथा है, लेकिन रामचरितमानस, तुलसी के शास्त्र और लोक-मन की मैत्री का भी दस्तावेज है, जिसमें भाव विष्णु, भाषा के उस गरुड़ पर गतिमान हैं, (कुबेरनाथ राय को आत्मसात करते हुए) ‘रथन्तर‘ और ‘वृहत्‘ यानि मार्गी और देशी, जिसके डैने हैं।

मानस-आस्था है कि पारायण के साथ राम शब्द उचार लेने से ही सारा काम बन जाता है, पाप धुल जाते हैं, मुक्ति मिल जाती है, ‘हरि नाम‘, ‘कलिजुग केवल हरि गुन गाहा‘ और ‘एक अधार राम गुन गाना‘ को मिलाते, सरल बनाते हुए ‘कलियुग केवल नाम अधारा‘ चल निकला। फिर भी मानस पाठ-पारायण, सुमिरन के साथ कहीं बसा रह जाता है, चिंतन-मनन में आ जाता है, खासकर तब, जब मिलता-जुलता शब्द-प्रसंग आ जाए। मानस की भाषा में तत्सम-तद्भव का और दृष्टि में लोक-शास्त्र का जैसा सहज समन्वय है, उसके चलते यह भाषा-साहित्य की पाठ्य पुस्तक की तरह चाहे न पढ़ा गया हो, प्रभाव वैसा ही छोड़ता है। विद्वानों ने कहा है कि तुलसी की भारतव्यापी सफलता का रहस्य उनकी भाषा में है। उनकी भाषा में जो ‘तद्भवता‘ है वह अपने पीछे ‘तत्सम‘ भाषिक संस्कृति का बल ले कर खड़ी है। सो, अपने भाषा संस्कारों और स्मृतियों को सहेज रखने की परवाह हो तो मानस पढ़ते रहना चाहिए। ‘इसलिए‘ रामचरितमानस के अभ्यास को लाभकारी मानते, हिंदी-प्रेमियों के लिए मनमौजी स्वच्छंद भाषाई प्रयोग वाली पुस्तकों के क्रम में यह ‘पवन ...‘ स्मृति डोलती रहेगी।

मुझ जैसे थोड़ा पढ़ने-लिखने वाले, अलेखकों के लिए लिखना वैसा ही मेहनत का काम है जैसे कसरत, जो करने की सोचें तो आलस हो, मन न करे, लेकिन करें तो आनंद भी आए। ऐसा आनंद इस पुस्तक के लिए महीने भर बना रहा। अक्सर 'साहित्य', सिद्धहस्तों के लिखे को ही माना जाता है, बोनाफाइड साहित्य-प्रेमी उसे पढ़ते हैं, आह-वाह करने के हकदार वही होते हैं। समीक्षक, उसकी समीक्षा करते हैं। वैसे तो यह टिप्पणी, समीक्षा के खाने में ही जाएगी, लेकिन है शुद्ध पाठकीय आनंद की अभिव्यक्ति के लिए। साहित्य-समाज में भी एक जनजातीय समुदाय है, मुख्य धारा उनके प्रति तटस्थ है और वे भी मुख्य धारा के प्रति उदासीन। यह पुस्तक ऐसे व्यक्ति की रचना है जो साहित्यकार होने के दबाव से मुक्त, बेपरवाह इसलिए उदासीन (न लिखने की व्य‍ग्रता, न छपाने की जल्दी) है, तो 'समीक्षा' की मर्यादा से मुक्त रहते, बस पाठक हो कर इसे लिख लेने के साथ, स्वयं को इस पुस्तक का सबसे उपयुक्त पाठक होने का दावा भी पेश है, इस नीयत से कि काश! मुझे कोई गलत साबित कर दे।

कैफियत, पहली कि पुस्तक के इतने उद्धरण यहां आ गए हैं, कोई चाहे तो बिना पुस्तक पढ़े, इसके बारे में साधिकार सविस्तार बता सकता है। दूसरी, जो पुस्तक न पढ़ पाएंगे, एकदम वंचित न रह जाएं, कम से कम इतना तो पढ़ रखें। तीसरी, जो न पढ़ पाएं हों, पूरी पुस्तक पढ़ने को मचल जाएं और चौथी, जिन्होंने पुस्तक पढ़ी है, उसका आनंद लिया है, उन्हें कुछ अलग, अतिरिक्त भी रस मिले।

इस पुस्तक का नाम पता चला तब एक शीर्षक याद आया था ‘मनपवन की नौका‘। कुबेरनाथ राय की ‘निषाद बांसुरी‘ इसके पहले आ चुकी थी। ‘मन पवन की नौका‘ पर सवार उन्होंने दक्षिण-पूर्व एशिया के दिक्-काल यात्रा की। इस ‘पवन ...‘ का लेखक, डगमग डोंगी में सशरीर, स्वहस्त चप्पू लेकर सफर कर चुका है। चंचल मन को यह भी याद आता है कि कभी ‘खैरा पीपर कबहुं न डोले‘, सुना तो सोचता था कि पीपर कैसे डोलेगा भैयाजी, अरे! डोलेगा तो पत्ता न डोलेगा, छत्तीसगढ़ी गीत के बोल हैं ‘पीपर पाना डोलत नइए, का हो गे टुरी ल बोलत नइए‘, लड़की का मन इतना कठुआ गया है। राम वनगमन प्रसंग में दशरथ का मन भी पीपर पात सरिस डोला था। पीपल के पत्ते का आकार और डंठल ऐसा होता है कि जब हवा न चल रही हो, अन्य सभी पेड़ के पत्ते थिर हों, तब भी डोलते-मचलते रहते हैं। इसीलिए पीपल को ‘चल-वृक्ष‘, ‘चल-दल‘ अथवा ‘चल-पत्र‘ कहा गया है। शास्त्र-वचनों की व्याख्या में मानव मन को कामना-कर्मरूपी वायु से प्रेरित, पीपल के पत्ते की तरह नित्य चंचल स्वभाव वाला भी कहा गया है। मेरे चलायमान मन को विराम देने के लिए सोचता हूं, कभी लेखक रूबरू हुए तो पूछूंगा कि महराज! पवन तो डोलाता है, खुद थोड़े डोलता है, आपने पवन को ‘ऐसा‘ कैसे डोला दिया।

Wednesday, May 20, 2020

अमृत नदी


‘तीरे तीरे नर्मदा‘ में सौन्दर्य है और अमृत भी। यानि अमृतलाल वेगड़ की शब्द-कृतियां, ‘सौन्दर्य की नदी नर्मदा‘, ‘अमृतस्य नर्मदा‘ और ‘तीरे-तीरे नर्मदा‘, और साथ में भूयसी भी। ऋतचक्र, सृष्टि और जीवन के वृहत्तर से सूक्ष्मतर में सतत है, शायद यही मानव में परिक्रमा-वृत्ति बन कर विद्यमान है। लेखक की नर्मदा परिक्रमा, जल-रेखा के समानांतर प्रवाहित निष्ठा और समर्पण की जीवन-धारा ही है। परिक्रमा का यह विवरण ऐसा स्वाभाविक, इतना सहज कि लगे, विषय नदी-परिक्रमा जैसा हो तो बस लिख लेना पर्याप्त है। आस्था भी संक्रामक होती है, इतनी आस्था से लिखा गया कि आप लाख ‘तटस्थ‘ रहना चाहें, डुबकी लग ही जाती है। नर्मदा, पास बुलाती है, अपनी ओर खींचने लगती है। यों भी छत्तीसगढ़ी में ‘तीर‘ शब्द निकट के अलावा, तीरना बन कर खींचना अर्थ भी देता है।

कैसी उलटबांसी कि नर्मदा उल्टी बहती है, उसकी तो वैसी चाल, जैसी ढाल। वह ‘उल्टी‘ बहती ही शायद इसलिए, कि नदियों के बहने का भी उल्टा-सीधा तय किया जाने लगा। परिक्रमा, रेखा को वृत्त-मंडल बना देती है, जितनी भी दूरी नाप लें, भौतिक विस्थापन शून्य रहेगा। नर्मदा परकम्मा, परिक्रमा है, उसमें खंड परिक्रमा है और जिलहरी परिक्रमा यानि समुद्र संगम को लांघे बिना दुहरी परिक्रमा भी। पुस्तक में ‘नर्मदा‘ नाम को रह जाती है, उद्दीपक, अन्यथा बस नदी और जीवन प्रवाह। यों तो धर्मशालाएं हैं और निरंतर सदावर्त भी, लेकिन एक ऐसे संन्यासी का उल्लेख है, जिसे कुछ न मिले ‘‘तो माँ का दूध।‘‘ यानि नर्मदा का पानी। नदी-तट की ऐसी यात्रा पराक्रम से कम नहीं, लेकिन परकम्मावासी की आस्था-दृष्टि सफर की अड़चनों को जिस तरह देखती है, उसका एक नमूना- ‘‘मैंने ढिबरी और मोमबत्ती के काकभगौड़े खड़े करके जाड़े को भगा दिया था!‘‘ लेकिन इनमें शायद सबसे सुंदर वह जिसमें किसी ने परकम्मा अमरकंटक से उठाई, बछिया साथ लेकर। गाय बनी और रेवा-सागर संगम पर बछिया को जन्म दिया। गाय का नाम नर्मदा, बछिया रेवा। बताता है- ‘‘सच तो यह है कि परकम्मावासी तो गाय है। मैं तो उसके साथ-साथ चल रहा हूँ। मालिक वो है, मैं उसका नौकर हूँ। हाँ उसकी ओर से संकल्प मैंने किया था।‘‘

लेखक, चित्रकार हैं और उनके कोलाज रेखाचित्रों के साथ इस मुखर चितेरे की यह शब्द-कृति पुस्तक बनी। परिचय में कहा भी गया है कि ‘‘अमृतलाल के शब्दचित्र और रेखाचित्र बहुत घनिष्ठ सजातीय हैं। स्वाभाविक ही इस चितेरे के मन में बार-बार उभरते बिंब, शब्दों में, कहीं कविता की तरह भी ढलते जाते हैं। वे कहते हैं- ‘‘सरसों के पीले खेत देखकर मुझे बार-बार बसोहली शैली के चित्र याद आ जाते।‘‘ या ‘‘अमूर्त शिल्पों की विशाल कला-वीथी है यहाँ।‘‘ और ‘‘सुन्दर घाट इस तट से और भी सुंदर लग रहे थे। मानो किसी बड़े तैलचित्र की तरह अंकित हों।‘‘ जोशीपुर से होशंगाबाद होते बान्दराभान पहुंच कर ‘‘बान्दराभान में सूर्योदय‘‘ का गंभीर काव्यात्मक चित्रण यह कहते हुए किया है कि पत्रकार होता तो रिपोर्टिंग कुछ इस तरह करता, फिर मजे-मजे में सम्पादक, अखबार की खबर लेते, खुद पर हंसने का मौका भी बना लेते हैं।

पुस्तक में सोन का उद्गम अमरकंटक कहा गया है, यह मान्यता है, लेकिन तथ्य नहीं। यहां लेखक न सिर्फ मान्यताओं के साथ है, बल्कि तथ्य का उल्लेख भी नहीं करता। इसी तरह बात आती है- ‘‘गरीबा ने कहा कि वह धामन साँप था जो बहुत जहरीला होता है।‘‘ धामन जहरीला कतई नहीं, बल्कि वह तो बेहद घरु किस्म का प्यारा, दुलारा मित्र-सर्प है। छत्तीसगढ़ी कहावत है- ‘कहां जाबे रे धमना, किन्दर बूल के एही अंगना‘। धामन, किसान के घरों में धान की कोठी में रहता है, कहीं जाता नहीं, घूम-फिर कर वहीं बना रहता है, मनुष्य को देखकर तेजी से भागता है और चूहों को आहार बना कर किसान की नुकसानी कम करता है। उजियारा और अंधियारा पाख की चर्चा करते लेखक ‘‘अँधियारा पाख व्यर्थ बदनाम है‘‘ कहता है, वहां लगता है कि उसने मानस की पंक्ति ‘सम प्रकास तम पाख दुहुँ ...‘ को आत्मसात किया है। इसके अलावा चांद के लिए कुछ और बेहतरीन बयान हैं, जैसे- ‘‘चाँद सर्जक नहीं, अनुवादक है। वह धूप का चाँदनी में अनुवाद करता है।‘‘ या ‘‘राहु एक चंचल बिलौटा है और पूनम का चाँद खीर का कटोरा।‘‘

यात्रा के बहुतेरे स्फुट प्रसंग हैं, यहां उनमें कुछ का उल्लेख। बैगा रोते हुए भूखे बच्चे को चुप नहीं कराता, खाना नहीं है, देने को तैयार भी नहीं, कहता है ‘‘उसे भूखा रहना सीखना होगा। उसे भूखा रहने की आदत डालनी होगी।‘‘ यहां बैगा का कथन दीन-हीन बेचारगी का नहीं है, बल्कि बच्चे को भूखा रखना वैसा ही है जैसा व्रत-उपवास। जनजातीय समुदाय में ऐसी कई परंपराएं हैं, जो प्रकृति और जीवन की विषम परिस्थितियों को बरदाश्त करने के अभ्यास की तरह होती हैं। वैसे आधुनिक शिशु-पोषण विज्ञानी भी अब सलाह देते हैं कि छोटे बच्चों को निश्चित समय पर आहार देने से उन्हें भूख का वैसा अहसास नहीं हो पाता, इसलिए थोड़ी अनियमितता, कुछ समय के लिए भूखा रखना जरुरी है। नवजात की सिंकाई की जाती है, उसे मालिश कर थकाया जाता है, यह किसी न किसी रूप में हर जगह प्रचलित है। कुसमी-सरगुजा अंचल के कुछ जनजातीय समुदाय में मानव-नवजात को अधपका माना जाता है और उसे ‘पकाने‘ के लिए धूप मिट्टी में खुले बदन छोड़ दिया जाता है। यह रूढ़ नासमझी नहीं, वस्तुतः सिंकाई, मालिश-एक्यूप्रेशर और मृदा-स्नान का आदिम-वैज्ञानिक तरीका है। एक अन्य जनजातीय परंपरा का उल्लेख आया है, जिसमें कहा गया है कि- ‘‘कन्यादान लड़की का पिता करता है, दाता वह है। दाता की शोभा इसी में है कि वह खुद जाकर दान करे, किसी को माँगने के लिए उसके घर न आना पड़े। इसीलिए वह बेटी की बारात लेकर लड़के वालों के घर जाता था। यह ब्रह्मर्षि विवाह है। जिसमें लड़का बारात लेकर लड़की के घर जाता है, यह राजर्षि विवाह है। लेकिन अब इसी का रिवाज है।‘‘

कलम का जादू है या जलधारा का, लेखक के ललित गद्य और कविता में अंतर नहीं रह जाता, लेकिन वे स्वयं अपने लेखन और कविताई की मौज लेते हैं। अपने तईं कविता करते हुए लिखते हैं- ‘‘बादल उड़ती नदी है, नदी बहता बादल है।‘‘ और बताते हैं कि नोटबुक में लिखी पंक्तियाँ, उनके कवि मित्र द्वारा इसे कविता न मानते हुए रद्द कर दी गई। यहां मुझ जैसा पाठक तो उनके कवि मित्र को ही रद्द कर देना चाहेगा। ऐसी ही एक सुरमयी पंक्ति है- ‘‘अगर चट्टानें न हों, तो नदी से गाते ही न बने।‘‘ या नर्मदा के साथ उसकी सहायक नदियों से अपना नाता जोड़ते हुए कहना कि ‘‘मौसी का प्रेम माँ के प्रेम से कम नहीं होता‘‘, (प्रसंगवश राही मासूम रजा ने कहा था- ‘मैं तीन माओं का बेटा हूँ। नफीसा बेगम, अलीगढ़ युनिवर्सिटी और गंगा।‘ इसी तरह ‘दर दर गंगे‘ पुस्तक का पात्र अयाज़ इससे भी एक कदम आगे की बात कहता है- ‘‘गंगा मैया, तेरे आगे मां भी मौसी लगती है।‘‘) न ही नर्मदा-महिमा गाते उनका मन भरता, ढाई-एक सौ पेज के यात्रा-संस्मरण को कहते हैं ‘‘चिड़ी का चोंच भर पानी‘‘ और नर्मदा की सहायक बुढ़नेर, बंजर, शक्कर नदियों की परिक्रमा कर उसका भी लेखा यहां जोड़ लेते हैं।

लेखक, नदी के साथ उसकी संस्कृति का दर्शन, सहज कराता चलता है- ‘‘पर्वत की देवी हैं- पार्वती, हिमालय की बेटी। मैदान की देवी हैं सीता जो राजा जनक को हल चलाते समय खेत में मिली थीं। और समुद्र की देवी हैं लक्ष्मी जो समुद्र मन्थन में से निकली थीं। मजे की बात यह है कि तीनों के ही भाई नहीं हैं। इनमें से किसी के भी माता-पिता ने बेटे के लिए मनौती मानने की आवश्यकता नहीं समझी।‘‘ नर्मदा महिमा-मंडन में संस्कृति-संगम का भाव आता है, इस तरह- ‘‘कहते हैं गंगा सप्तमी के दिन गंगा नर्मदा में स्नान करने आती है।‘‘ और इसी तरह के कहन को याद करते हैं- ‘‘नर्मदा की नहायी छोरी है, संस्कार अच्छे कैसे नहीं होंगे!‘‘ पुस्तक में यह भी अच्छी तरह रेखांकित हुआ है कि नदियां, यहां नर्मदा, भाषा-संस्कृति की टूट को, भेद को जोड़ती है। ‘‘मेहंदी ते बाबू मालवे नेनो रंग गयो गुजरात रे!‘‘ यानि मेंहदी तो मालवे में लगायी, पर उसका रंग गुजरात जा पहुँचा। लेखक, स्वयं के उदाहरण सहित अन्य निवासियों के प्रदेश अदला-बदली का भी उल्लेख करते हैं। छत्तीसगढ़ का उल्लेख आता है और सहयात्री बने हैं- रायपुरवासी (अब बैकुण्ठवासी) आचार्य सरयूकान्त झा। आचार्य झा नर्मदा यात्रा और इस यात्रा संस्मरण में ऐसे रमे कि छत्तीसगढ़ी अनुवाद ‘सुन्दरता के नदी नरबदा‘ और ‘अमृत के नरबदा‘ उनके जीवन की अंतिम इच्छा बन गई थी (अंतिम मुलाकात में जैसा उन्होंने मुझसे कहा था), जो अब प्रकाशित भी हो गई है।

पुस्तक के अंतिम पृष्ठों पर श्रीमती कान्ता वेगड़ का ‘मेरे पति‘ है, जिसे पढ़ते हुए लगता है कि यह भी अमृतलाल जी ने ही लिखा है, यहां वाक्य है- ‘‘उनके साथ रहते-रहते मैं भी उनके रंग में कितना रंग गयी हूँ ...‘‘, इसलिए ऐसा लगना स्वाभाविक ही है, साथ ही पुस्तक के अंत में प्रकाशित चित्र, दम्पती कितने एकरूप हो गए हैं, इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है।
गति-स्थिति का दर्शन है यह पूरा यात्रा-वृत्तांत। लेखक महसूस करता है कि ‘‘अमरकंटक से चलते समय उसमें प्रस्थान का जैसा उत्साह था, यहाँ मंजिल पर पहुँचने का वैसा ही संतोष है।‘‘ मगर नदी-यात्रा के प्रति लेखक का ‘अतृप्त‘ मन भी कुछ इस तरह है- ‘‘एक जीवने रे लाखो उपाधि, केम जीवे जीवनार रे! जीवन एक है और परेशानियाँ लाख-लाख, जीने वाला जीये तो कैसे जीये! और शायद इसीलिए वे कहते है- ‘‘अगर पचास या सौ साल बाद किसी को एक दम्पती नर्मदा परिक्रमा करता दिखाई दे ... तो समझ लीजिएगा कि वे हमीं हैं- कान्ता और मैं।‘‘ हर नर्मदे!

Monday, April 6, 2020

सार्थक यात्राएं


बात से बात पैदा कर पाने का हुनर हर किसी के पास वैसा नहीं होता, जैसा कृष्ण बलदेव वैद के ‘दूसरा न कोई‘ या ‘कुकी की मौत‘ में आता है। साहित्य रचना के लिए एक तरह की किस्सागोई, फर्राटेदार सफर ‘फसाना-ए-आज़ाद‘ जिसका अनुवाद ‘आजाद कथा‘ है तो दूसरे छोर पर वह, जिसका उदाहरण है- 'एक आदमी अपने जीवन का सबसे बड़ा सम्मान पाकर ट्रेन में चढ़ता है। ट्रेन चलते-चलते एक स्थान पर रुक जाती है। वह आदमी पूछता है कि ट्रेन कहाँ रुकी है। जवाब मिलता है- नो व्हेयर! जवाब सुनते ही वह उठता है और यह कहते हुए उतर जाता है कि यहीं तो उसे जाना था।' (प्रभात रंजन की ‘पालतू बोहेमियन‘ से) या स्वदेश दीपक की कहानीनुमा एक रचना का आरंभिक वाक्य- 'गाड़ी ने उस स्टेशन पर नहीं रुकना था। रुक गई, पता नहीं क्यों? उसने वहां नहीं उतरना था। उतर गया। पता नहीं क्यों?' गोया, जिंदगी का सफर, है ये कैसा सफर...

साहित्य में कवि-कविता की प्रतिष्ठा सर्वोपरि, फिर गिनती में गद्यकार, कहानी-उपन्यासकार, निबंधकार, लेखक (लेख लिखने वाले) आदि, तब कहीं नंबर लगाया जाता है, यात्रा वृत्तांत और हास्य-व्यंग्य का। बहरहाल, कुछ ‘लेखक‘ ऐसे होते हैं, जिन्हें किस्सागोई के लिए, बात बनाने और बढ़ाने के लिए, सफर का सहारा-आसरा होता है। दृश्य बदलता जाता है, उसके साथ भाव भी, वही रवानी, वही कहानी। इस करोना दौर में सारी चहलकदमी स्थगित हो तो यात्रा संस्मरणों की ओर मन दौड़ता है, राहुल सांकृत्यायन याद आते हैं और देवकुमार मिश्र की ‘सोन के पानी का रंग‘ को माथे से लगा लिया है। हाथ में हैं ऐसे सफरनामे, जिनका साहित्यिक दरजा तो पता नहीं, लेकिन हिन्दी के जिस पाठक से चूका हो... साहित्यिक समझ के चलते नहीं, बल्कि बहैसियत रसिक पाठक कहूंगा, कि अब तक जिससे यह चूका, वह मेरी निगाह में वंचित श्रेणी में होगा, जैसा कुछ समय पहले तक मैं था।

राकेश तिवारी की 'सफर एक डोंगी में डगमग' दुहरा ली। पहली बार इसे पढ़ने में शुरुआत यात्रा की तरह ही ठिठक कर चली, लेकिन एक बार धारा में लय बन जाने के बाद मुकाम तक पहुंचते देर न लगी। भाषा, लाजवाब। कहीं दुहराव नहीं। हिन्दी के साथ बोलियों का मिश्रण और प्रयोग, लगातार रस-वृद्धि करता है। धार में बहते-तिरते कैसी 'तटस्थता' होती है, होनी चाहिए, महसूस कर रोमांच होता है।

दिल्ली के ओखला हेड से यमुना, गंगा होते कलकत्ता की हुगली तक के 62 दिन के पूरे सफर में स्वयं प्रेक्षक हों और विवरण में खुद को शामिल करना हो, तो स्व का इतना ही स्व-रहित होना आवश्यक है। बीच-बीच में दो किताबें याद आती रहीं, देवकुमार मिश्र की 'सोन के पानी का रंग' और कुबेरनाथ राय की 'निषाद बांसुरी' (कहीं 'किरात नदी में चन्द्र मधु भी), और फिर बनारस के जिक्र के साथ शिव प्रसाद मिश्र ‘रूद्र‘ काशिकेय की 'बहती गंगा' की भी याद आई।

अभ्यस्त साहित्यकार और हिन्दी के विश्वविद्यालयीन उपाधिधारकों के लेखन की भाषा और बुनावट का सप्रयास सपाटपन अखरता है, उससे इस पूरी कृति की- भाषा, मुहावरे, रूपक, चित्रण- एक-एक पंक्ति मुक्त है। अध्याय-योजना और उसके अंतर्गत खंड, लेखन के मूड के अनुरूप हैं, इन्हीं टुकड़े में प्रस्तुत यह यात्रा-संस्मरण निरंतरता और प्रवाह बनाए रखने में सहायक हुआ है। इसके उद्यम और रोमांच के लिए तो बस औरों की तरह मेरा भी सैल्यूट। और सैल्यूट के उतने ही हकदार यात्रा के साथी भी।

अब 'पवन ऐसा डोलै...' के लाजवाब सफर पर हूं।

अजय सोडानी के ‘दरकते हिमालय पर दर-ब-दर‘ के आरंभ ‘आलाप‘ में लेखक की खास साफगोई कि- ‘मैं और मेरे सहयात्री गाहे-बगाहे औपन्यासिक पात्रों में तब्दील हों, भीतर के नाद को शब्दों में बांधते दिखाई दें तो क्या आश्चर्य!‘ न्यूरोलॉजिस्ट डॉक्टर-लेखक की पुस्तक आरंभ होती है- ‘‘आप चाहे न मानें पर ‘घुमक्कड़ी‘ को रोगों की फेहरिस्त में शुमार न कर विश्व स्वास्थ्य संगठन वालों से चूक तो हुई ही है।‘‘ कभी एक डॉक्टर मित्र ने कहा था कि मार्निंग वॉक ऐसा रोग है कि अगर लगा तो और किसी रोग को पास फटकने नहीं देता। ‘आलाप‘ में अपने वाले बिलासपुर के डॉ. रहालकर युगल (सुश्री अलका और चन्द्रशेखर जी, जो अजय जी की तरह अब तक मोबाइल फोन मुक्त हैं।) और जानकी पुल वाले प्रभात रंजन जी भी मिल गए। इंदौर वाले, कभी बिलासपुर रहे कवि- डॉक्टर शिरीष ढोबले की संगत याद आई।

पूरी किताब लोगों, नजारों और बतकही के साथ अनजाने रास्तों का ऐसा मोहक सफर, जो एक बार शुरू हो और पता न लगे कि कितने मुकाम और कब मंजिल। पुराली और पहाड़ी देवी-देवताओं की चर्चा में केसकाल, बस्तर की देवी भंगाराम से परम्पराओं की समानता, अनायास-अप्रत्याशित है। झाला का अध्याय अरुणोदय से थोड़ा पहले, पंछियों के साथ आरंभ होता है। आगे चलकर बात आती है- ‘‘ध्वनि है तो कारक हैं, कारक हैं तो कारण होंगे। अतः कारकविहीन निर्जन स्थलों पर अनपेक्षित ध्वनि हमें चौंकाती है। ... इस मामले में जंगलों में रहनेवाला कॉमन हॉक कुक्कू (केतकी, पपीहा) बहुत पाजी है। वह अंग्रेजी में पारंगत को ‘ब्रेन फिवर‘, महाराष्ट्रियनों को ‘पावस आला‘, आसामवासियों को ‘मोई केतकी‘ तथा मय के कद्रदानों को ‘वन मोर बॉटल‘ कहता सुनाई देता है।‘‘

'इरिणा लोक' का मेरा सफर शीघ्र आरंभ होगा।

दोनों पुस्तकें राजकमल प्रकाशन के उपक्रम ‘सार्थक‘ से प्रकाशित हुई हैं, पहले-पहल ‘सार्थक‘ से परिचय हुआ था, राकेश तिवारी की ‘सफर एक डोंगी...‘ पा कर। अब इससे ‘सार्थक‘ पर भरोसा मजबूत हुआ है।

Monday, March 30, 2020

कौन हूँ मैं

मनोहर श्याम जोशी का उपन्यास ‘कौन हूँ मैं‘, सन 2006 में उनके निधन के बाद आया। 450 से अधिक पेज, शायद उनकी सबसे भारी-भरकम कृति। कथा, प्रसिद्ध और चर्चित भवाल संन्यासी केस की है, जिस पर कई किस्से-कहानी हैं, फिल्में भी बनीं, जिनमें ताजी उल्लेखनीय और पुरस्कृत श्रेष्ठ बंगला फिल्म ‘एक जे छिलो राजा‘ है। जोशी जी अपनी इस कृति को अंतिम स्वरूप दे पाए थे अथवा नहीं? यों कमी कहीं नहीं फिर भी लगता है, विवरण देने का अनन्य धीरज, किस्सागोई पर हावी है। सो, बारीकी और विस्तार की सफाई, बावजूद कुछ अपवाद दुहराव के, लाजवाब है। पुस्तक का प्राक्कथन ‘के? आमि‘ खास जोशी जी वाली शैली में है और यहीं वे इस उपन्यास को लिखने के पीछे अपनी मंशा तरुण भट्टाचार्ज्या से कहलाते हैं कि ‘आपसे अनुमति लिए और परामर्श बगैर अनगिनत छोटी-मोटी पुस्तकें प्रकाशित होती रही हैं पिछले कुछ वर्षों से। मेरी इच्छा है कि आपकी सहायता से इस बार मैं कोई प्रामाणिक और साहित्यिक कृति तैयार करूँ।‘ अदालत में साबित होने वाले ‘सच-झूठ‘ के उल्लेख सहित कि ‘मेरे झूठ के साथ बिभा देबी का झूठ भी सुनते रहिएगा।‘ साथ ही पुस्तक का शीर्षक तय करते हुए योग वशिष्ठ का 'राम स्वात्मविचारोऽयं कोऽहं स्यामितिरूपकः। चित्तदुर्दुमबीजस्य दहते दहनः स्मृतः॥' अर्थात् हे राम! 'मैं कौन हूँ' इस प्रकार निजस्वरूप का अनुसन्धान वासनारूप चित्तबीज को दग्ध कर देता है। चित्त ही सब दुःखों का हेतु है। या 'किमिदं विश्वमखिलं किं' अर्थात् यह जगत् क्या है? मैं ही कौन हूँ ... या चर्पटपंजरिका का 'कस्त्वं कोऽहं कुत आयातः‘ संभवतः उनके ध्यान में रहा होगा।

हिन्दी साहित्य की इस उल्लेखनीय कृति में कुछ अलग-सी बात यह भी है कि पैराग्राफ, अधिकतर आधे-पौने पेज के हैं और कई तो भर पेज के। वाक्यों की लंबाई पर भी ध्यान जाता है, नमूना है यह एक असामान्य लंबा वाक्य- ‘इसलिए छोटोदी से सारा वृत्तान्त सुन लेने के बाद भी मेरे मन के लिए यह मान पाना कठिन हुआ कि स्वभाव से सर्वथा भीरु और अहिंसक साला बाबू ने प्रजाजन का रक्त चूसने वाले मुझ विलासी सामन्त की देह पर फूटते सिफलिस के घावों का अवलोकन करते हुए अपनी बहन को रोग की आशंका से मुक्ति दिलाने के लिए मुझे मृत्युदण्ड देने की बात न केवल सोची होगी बल्कि आशु डॉक्टर की सहायता से उसे मनसा के स्तर से कर्मणा के स्तर पर पहुँचाने का प्रयास भी किया होगा।‘

भवाल संन्यासी मामले का प्लाट उनके लिए एकदम मुआफिक था। एक व्यक्ति, दो किरदार, पहचान की समस्या, मैं कौन? जैसा विचार, इन सब पर सोचना और लिखना उन्हें बहुत भाता, दिखता है। जनवरी 1990 में उन्होंने अपने कॉलम में लिखा था- 'लगभग छह वर्षों से मैं मनोहर श्याम जोशी की नौकरी कर रहा हूं।' उनके रचे (और अक्सर बातों) में बेलाग निर्ममता 'शैतानियत' आती रही है, जिसके चलते अश्लील, घटिया और बकवास, जैसी प्रतिक्रियाओं को उन्होंने अपेक्षित ही माना, अप्रभावित रहे, शायद रस भी लेते रहे। उनके लेखन में आमतौर पर रेखांकित होते दिखता है, न इस पार, न उस पार, 'मज्झिम पटिपदा'। दुविधा की फांक में ही कहीं सच झलकता है। आशा-आकांक्षा से मुक्त, खारिज की आशंका से बेपरवाह, यों निरस्त हो कर भी जो कुछ बचा रहे, अमूर्त ही सही, वही हासिल है। लालसा की हम पुतलियों की हरकतें, आरोपित भूमिका का निर्वाह-मात्र होती है। इसलिए सारे संदेहों के बावजूद अविचलित, अपनी स्वीकृत, मान्य, धारित पहचान को खारिज करने का साहस ही सार्थक हो सकता है। उन्हें मानों ऐसे ही किसी पात्र की तलाश थी।

उनकी कृतियों में ‘कसप‘ का डीडी-देवीदत्त-डेव-देबिया कितना बदल जाता है और बेबी क्या से क्या हो जाती है। बेबी मैत्रेयी से आगे बढ़कर उसका प्रतिरूप, उसकी बेटी गायत्री भी आ जाती है, अबूझ बेबी-मैत्रेयी चरित्र का एक और फांक। हमजाद, कुरु कुरु स्वाहा, हरिया हरक्यूलिस और यहां भी, अलग अलग ढंग से यही बहुरूप या उसका भ्रम-अनिश्चय है। यहां वे लिखते हैं- ‘सृष्टि के आरंभ से लेकर आज तक दो जीवन सर्वथा एक-से नहीं हुए हैं. और इसीलिए किन्हीं दो जनों की स्मृतियाँ एक सी नहीं हो सकतीं।‘ लेकिन एक ही व्यक्ति की स्मृति अलग-अलग हो सकती है, व्यवहार और व्यक्तित्व इतना भिन्न हो सकता है कि वह अलग मान लिया जाए, इसे वह उस आध्यात्मिक स्तर तक ले जाते हैं, जहां उसे 'उत्तर-आधुनिक विमर्श' की तरह भी देखा जा सकता है। लिखते हैं- ’आप जिसे आप कहते हैं वह आपकी अब तक की राम कहानी की स्मृतियों का समग्र प्रभावभर होता है।‘ या ‘स्मृति माया है और स्मृतिहीनता मोक्ष।' या 'संन्यासी को न कब की चिन्ता होती है और न कहाँ की परवाह।‘ या ‘इस मुकदमे में सबका ही चरित्र-हनन किया जा रहा है। उसके अतिरिक्त क्या उपाय बचता है सांसारिक मामलों में।‘

जोशी जी को सच-झूठ का खेल सदा लुभाता है। याद कीजिए ‘कुरु-कुरु स्वाहा‘, जिसमें वे बताते हैं कि ‘स्व. हजारीप्रसाद द्विवेदी मौज में आकर ‘गप्प‘ को गल्प का पर्याय बता देते थे। उनकी इच्छा थी कभी सुविधा से कोई ‘मॉडर्न गप्प‘ लिखने की।‘ या ‘कसप‘ में कहते हैं कि ‘तुम्हें जो कुछ लग रहा है, ठीक इन शब्दों में नहीं। सच तो यह है कि वह तुम्हें शब्दों में लग ही नहीं रहा है। शब्द मैं तुम पर थोप रहा हूं। कथा-वाचक की मजबूरी है। मेरे शब्द ही तुम्हारी व्याख्या करते हैं पाठकों से और नितांत भ्रामक है यह व्यवस्था।‘ या ‘लोगों की बातों का मुझे कोई विश्वास नहीं रह गया है। कभी-कभी तो मुझे अपनी ही बात का विश्वास नहीं होता।‘ और यहां- ‘सच होना और युक्तियुक्त होना सदा पर्यायवाची नहीं होते‘ या ‘किसी एक का सच अनिवार्य रुप से किसी और के लिए झूठ ही होता है।‘ या ‘विश्वसनीय सच कौन-सा होता है जो सर्वथा तर्कसंगत हो अथवा वह जिसमें दाल में नमक बराबर विसंगतियाँ भी उपस्थित हों।‘ या ‘सत्य बहुधा गल्प से भी अधिक अद्भुत होता है।‘ या ‘इस कथा को मात्र इस आधार पर नहीं ठुकराया जा सकता कि यह अत्यंत विचित्र और अविश्वसनीय लगती है।‘

लंबे समय बाद कोरोना ने अवसर दिया इतना बड़ा उपन्यास हाथ में लूं और दो-तीन दिन में पढ़ लूं, खुद को अपने में तलाश करने के दिन हैं ये, और तलाश स्थगित हो जाने के भी। 7/8 मई 1909 को मर कर, जी उठने वाले भवाल संन्यासी की लंबी कहानी बिभा देबी को सुहाग-दुविधा से मुक्ति देते समाप्त हुई थी 3 अगस्त 1946 को, पर फिर-फिर कहानियों को जन्म दिया और इस पूरी-अधूरी कृति, बिना प्रश्नवाचक चिह्न के ‘कौन हूँ मैं‘ शीर्षक, के साथ बहुतेरे सवालों पर जवाब के पूर्ण विराम की तरह जोशी जी अमर हुए।

प्रसंगवश, सुभाषचंद्र बोस ने 29 अगस्त, 1936 को एमिली शेंक्ल को पत्र लिखा था, जिसमें इस भोवाल राजा वाले प्रकरण से संबंधित अखबारों की कटिंग्स, सार-संक्षेप और निर्देश सहित भेजा था। उन्होंने लिखा था कि ‘इसके तथ्य इतने मजेदार हैं कि हम कह सकते हैं कि वास्तविकता कहानी से भी अजीब हो सकती है।‘ और सुझाया था कि इससे उसे यानि एमिली को वहां के लिए लेख लिखने की सामग्री मिल जाएगी। यह कैसा संयोग कि नेताजी की मृत्यु पर रहस्य का परदा पड़ा रहा। फैजाबाद वाले गुमनामी बाबा, शाल्मरी आश्रम, कूच बिहार वाले शारदानंद, अमरावती के सुरेश पाध्ये का दावा, सीतापुर और बुंदेलखंड वाले बाबाओं के साथ नेताजी को जोड़ा जाता रहा। रूस, चीन, तिब्बत, विएतनाम में भी उनके होने की चर्चा रही।

(सन 1975 में हिन्द पॉकेट बुक्स से रामकुमार भ्रमर की पुस्तक ‘भुवाल संन्यासी‘ छपी थी)

30 मार्च, मनोहर श्याम जोशी की पुण्यतिथि है। यह टिप्पणी जानकीपुल पर भी है।

पुनश्चः

जोशी जी की पुस्तकों की सूची में 2008, पुनः आवृत्ति 2014 में प्रकाशित ‘बात ये है कि...‘ का नाम सामान्यतः नहीं होता, जबकि उनकी लेखन-छटा से परिचित होने के लिए यह जरूरी किताब साहित्य, फिल्म, व्यक्तित्व, फैशन, सेक्स-अश्लीलता यानि शब्दों, चित्रों और जीवन-शैली में अभिव्यक्त समाज के समष्टि मन के उलझाव-भटकाव का दस्तावेज भी हैं। यह ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान‘ के स्थायी स्तंभ ‘गपशप‘ में प्रकाशित लेखों का संग्रह है। स्तंभ लेखक में नाम जाता था- शी.ही., इसमें शी, जोशी जी थे और ही, बालस्वरूप राही। इन्हीं ‘ही‘ ने पुस्तक में ‘शी.ही. का मतलब...‘ शीर्षक से भूमिका लिखी है, जिसमें कुछ महत्वपूर्ण और रोचक उल्लेख हैं, जैसे- विज्ञापन आ जाने पर पाठ्य-सामग्री हटा दी जाने के लिए संकेत रूप में लिखा होता- ‘आएगा तो जाएगा‘। जोशी जी की ‘कूर्मांचली‘ छद्म नाम से कविताई की भी चर्चा है। एक अन्य कम चर्चित जोशी जी पर लिखी पुस्तक भूपेन्द्र अबोध की ‘सागर थे आप‘ का उल्लेख है। जोशी जी के पाठकों को याद होगा कि उन्होंने अपनी पुस्तक ‘कुरु कुरु स्वाहा‘ में हजारी प्रसाद द्विवेदी और ऋत्विक घटक की पुण्य स्मृति में निवेदन किया है, ‘सागर थे आप, घड़े में किन्तु घड़े-जितना ही समाया‘। राही जी ने बात समाप्त की है कि ‘इसमें पत्रकारिता के उस दौर की झलक पा सकेंगे जब पत्रकारिता ‘ग्राहक‘-सापेक्ष नहीं, ‘पाठक‘-सापेक्ष होती थी।

पुस्तक के लेखों पर कुछ बातें। वैसे तो तकरीबन सभी कुछ जोशी जी की गंभीर, जिम्मेदार लेकिन मौज के लेखन का नमूना है, लेकिन लगता है कि उन्हें इसमें से कुज्नेत्सोव के ए. आनातोल बन जाने में, उपन्यास लेखन को मूर्खता मानने वाले उपन्यासकार बोर्जे में, कहर ढा रहा था जहर देने वाला, जैसे में खास आनंद आया होगा, लेकिन शायद उनके लिए सबसे मजेदार रहा होगा, हावर्ड ह्यूजेस, क्लिफर्ड इरविंग और एलमर द होरी की अद्भुत कहानी लिखना, जो पुस्तक में ‘साढ़े छह लाख पेशगी पर प्राप्त यह आत्मचरित किस सिद्धात्मा का है? शीर्षक से है, क्योंकि इसमें भी कौन? की खोज और रहस्य, जो कभी न उद्घाटित हो, का किस्सा है। कमोबेश कौन हूं मैं, जैसी ही कहानी यहां ‘कौन था वो‘ के रूप में है।

इसी तरह ‘लखनऊ मेरा लखनऊ‘ में लेखक ‘मैं‘ जोशी जी, जिन्हें कभी मनोहर श्याम या कहीं मनोहर कहलाया गया है, के लखनऊ के दिनों को बयान कर रहे हैं और इसमें कहीं कहीं मैं और जोशी जी से मुखातिब भी होते हैं, जोशी जी ने ‘मैं‘ को बहुत कम संबोधित किया है। 

किताब पढ़ते हुए लगा, जैसा उनके लेखन में होता है- अपनी ऐसी कमजोरियां, जिसे लगता है कि हमारे अलावा कोई नहीं जानता न पकड़ सकता, उसे सार्वजनिक कर देना और अपनी ऐसी ‘खूबियां‘, जो अक्सर पीठ पीछे और कई बार मुह पर भी आपकी हंसी उड़ाने का आसानी से आधार बनती हैं। 

खुद की नजर में जीवन की निरर्थकता देख सकने वाला ही दूसरों की नजर में कुछ सार्थक कर पाता है। दुनिया है, जो अपनी गति से चल रही है, आपके प्रशंसक ही कहते हैं कि समाज पर, लोगों पर आपका बहुत असर है, आपने राह दिखाई है, बहुत कुछ सार्थक किया है। 

इसमें आया हास्यास्पद और त्रासद, कुरु कुरु स्वाहा वाला/डी.डी. द मूडी और मीनिंग सूँ, कसप वाला है? ‘हैरानी पर हैरानी‘ और रेसिंग साइकिल वाले बनाम हरिया? ट टा प्रोफेसर वाला नायक, लखनऊ? ‘घरेलू पालतू बोहेमियन‘ आदि।