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Sunday, March 15, 2026

उजले ‘श्याम‘

संयोजक श्री शशिकांत चतुर्वेदी, श्री सूर्यकान्त चतुर्वेदी और संपादक श्री रूद्र अवस्थी के
‘पं. श्यामलाल चतुर्वेदी स्मृति ग्रंथ‘ में शामिल मेरा लेख, यहां आंशिक परिवर्धन सहित प्रस्तुत-


उजले ‘श्याम‘

स्नेह-वात्सल्य को शब्दों में अभिव्यक्त कर पाना असंभव जैसा, मेरे बूते का नहीं, और इसे संभव बनाने का प्रयास भी दुष्कर होता। साथ ही यह भी समस्या थी कि पंडित श्यामलाल चतुर्वेदी जी के अभिनन्दन ग्रंथ सहित उन पर इतना कुछ लिखा-छपा है, उससे अलग क्या ही कुछ लिख सकूंगा। मगर भाई सूर्यकांत जी का आग्रह बना रहा, वही संबल बना। मैंने पहले अपनी यह सीमा बताई, बात न बनी तो फिर कुछ समय चाहा, उन्होंने समय दे दिया, समय-सीमा तक पहुंचने तक मन ही मन आदरणीय पंडित श्यामलाल चतुर्वेदी जी को लगभग प्रतिदिन स्मृति-श्रद्धा-सुमन अर्पित करता रहा, मगर कुछ भी न लिख पाया। फिर से समय-सीमा पूछा, जवाब चारों खाने चित्त कर देने वाला था, भाईजी ने कहा- आपके लिए कोई समय-सीमा नहीं है, हमारी समय-सीमा आपका लेख आ जाने तक है। इस पर मैंने पुनः उस दिवंगत पुण्य आत्मा का स्मरण किया कि ‘तुम्हीं ने दर्द दिया है, तुम्हीं दवा देना‘, और ‘तेरा तुझको सौंपता‘ भाव से यह जो टूटी-फूटी है, उसमें पंडितजी के प्रति मेरी भावना का अंश झलक सकेगा मानते, समर्पित है।

कुछ घर ऐसे होते हैं, जहां आप अकारण भी जाना चाहते हैं, जा सकते हैं, मगर लौटते हैं कुछ हासिल के साथ, समृद्ध हो कर। बिलासपुर का घसियापारा, जो अब राजेंद्र नगर था और बृहस्पति बाजार के बीच, तिलकनगर के पिछवाड़े का एक घर, जो कुटी या आश्रम सा जान पड़ता, यों नजरअंदाज हो जाए, मगर जो इससे परिचित, उसके लिए अगल-बगल ओझल रहे, इसी पर नजर टिके, इसी का आकर्षण हो, यही पंडित श्यामलाल चतुर्वेदी जी का निवास था। मेरे गृहग्राम अकलतरा के पड़ोसी कोटमी निवासी पंडितजी उन दिनों राजेन्द्रनगर स्थित हमारे दफ्तर के पड़ोसी थे। हमें जब भी अवसर होता, उनके सान्निध्य पाने इस ‘गुरुकुल‘ पहुंच जाते, और सदैव ‘बिन मांगे मोती‘ पा कर लौटते। 

सच्चे राष्ट्रवादी पंडितजी को अक्सर लोग दलगत संकीर्णता में सीमित कर देखते हैं, जबकि आजादी की लड़ाई के दौरान चरखा, तकली चलाने वाले गांधीवादी आप कांग्रेस के सदस्य बनाने के लिए सक्रिय रहते थे। व्यक्तिगत सत्याग्रह में जेल जाने के लिए दरखास्त भी दिया था, मगर आवेदन उनके नाबालिग होने के कारण नापास कर दिया गया, यह बताते हुए मुस्कुरा कर कहते ‘सेनानी हो गए होते हम‘। गीत याद करते थे- ‘घर-बार छोड़ कर के जाएंगे जेलखाना, ये डर नहीं है हमको खाएंगे जेल खाना, जिस जेल में महाप्रभु श्रीकृष्णचंद्र जन्मे, मेरे लिए तो प्यारा मंदिर जेलखाना।‘ बाद में देश के विभाजन के दौरान संघ के संपर्क में आए औैर प्रचारकों का त्याग, समर्पण आपके लिए प्रेरक बना, उन तपस्वियों का संस्कार मिला। इसी तरह आजादी के बाद विनोबाजी के भूदान यज्ञ से जुड़ गए। गांव-गांव घूमते, पत्रकारिता के लिए समाचार भी इकट्ठा करते। 

कर्मवीर के लिए पहला समाचार ही क्रांतिकारी सुर का था। वे बताते कि गांव के मालगुजार के लिए उन्होंने आवेदन लिखा, उसने प्रयत्न किया, उसे शक्कर मिट्टी तेल का लाइसेंस मिल गया। आपने उससे कहा कि अब इसमें अमीर-गरीब का भेद न करना सबको बराबरी का मानते सामान देना। उस मालगुजार का आतंकी बेटा मनमानी करने लगा, घटनाक्रम कुछ ऐसा हुआ कि आपका उसके खिलाफ लिखा समाचार छपा, उसका लाइसेंस निरस्त हो गया। वे याद करते थे कि बिलासपुर में रहते हुए उन्हीं के शब्दों में अपने ‘झगड़ालू गांव‘ के निर्विरोध सरपंच बन गए। गांव में असहयोग का माहौल बना कर ‘शराब भट्ठी‘ को हटवाया। अपने ही घर के सामने बने चबूतरे को हटवा कर गांव वालों से बेजा-कब्जा हटाने की अपील की। उनका ग्राम पंचायत, गांधी शताब्दी वर्ष 1969 में बिलासपुर संभाग का सर्वश्रेष्ठ पंचायत घोषित हुआ था। कोटमी सोनार अब क्रोकोडायल पार्क के लिए मशहूर है। गांव के जलाशयों में मगर पुराने समय से बसते रहे हैं। निस्तारी तालाबों में भी रहते थे, जहां लोग सहज नहाना-धोना करते थे। मगर गांव में किसी को इन जीवों से नुकसान दुर्लभ रहा है, इससे संबंधित घटनाएं वे रोचक ढंग से सुनाते थे कि किस तरह नहाते हुए व्यक्ति से लट्ठ की तरह बहता आया मगर टकरा जाता था और लोग उसे धक्का दे कर स्नान जारी रखते थे या गरमी में एक तालाब से दूसरे तालाब जाते हुए मगर को खातू वाले गड़हा, गाड़ा में डाल कर पानी वाले तालाब में छोड़ आते थे। 

अकलतरा की रामलीला, शिवरीनारायण के नाटक और नरियरा की कृष्णलीला पर उनकी प्रेरणा और उनके द्वारा दी गई जानकारियों के आधार पर उन स्थानों में जा कर और लोगों से संपर्क कर मैंने ‘तीन रंगमंच‘ लेख तैयार किया और उसकी प्रति उन्हें ले जा कर दी, जिसे देखकर प्रसन्न हुए और आशीर्वाद दिया। नरियरा की कृष्णलीला नाटकों में ब्राह्मण को ही कृष्ण बनाते थे। वे बाल-कृष्ण का रूप धरते थे। उनकी मां तालाब में नहाने जाती थीं, तो गांव वाले कहते ‘भगवान के दाई आए हे‘। संभर-पखर जाने पर आखिर में मुकुट लगता। इसके बाद ‘प्राण प्रतिष्ठा‘ मान ली जाती थी, तब कृष्ण बने आपको, ईश्वर-स्वरूप मानते मंच पर आने के पहले जमीन पर पैर रखने नहीं दिया जाता था, कोई न कोई गोद में उठाए रहता था। ऐसे ही संस्कार उन्हें बचपन से मिलते रहे, और संभवतः उनके भीतर का आत्मबल, यही से आया धार्मिक-आध्यात्मिक भाव था। संत-महात्माओं का सत्संग का कोई अवसर नहीं चूकते। हमारे घर मां पूर्णप्रज्ञा का आगमन होता, तब उनकी नियमित उपस्थिति होती थी। 
सन उन्‍नीस सौ तीसादि दशक का नरियरा लीला संबंधित चित्र 

फिल्म ‘थ्री ईडियट्स‘ के चतुर रामलिंगम के ‘चमत्कारी, धन‘ वाले भाषण के साथ मुझे आपसे जुड़ा एक प्रसंग याद आया था, जो साधूलाल गुप्ता बताते थे। बिलासपुर में होली के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में संभाग के कमिश्नर ‘संभागायुक्त‘ आमंत्रित थे। आपने अपनी बात शुरू करते हुए उन्हें संबोधित करते हुए ‘भा‘, ‘भो‘ हो गया। बस, फिर क्या, पूरा माहौल में होलियाना लहर में बहने लगी। एक प्रसंग बिलासपुर से खरौद-शिवरीनारायण जाते हुए, रास्ते में पामगढ़ बस स्टैंड पर का सुनाते थे। चाय पीने रुके, बेंच पर बैठे थे। एक युवा आया और उनसे उपहास करते कहा ‘नेताजी, थोड़ा सरको।‘ आपने उससे कहा कि भाई! तुमने मुझे नेताजी क्यों कहा?, उसने कहा ‘ड्रेस से तो तुम नेता दिख रहे हो, बस इतना सुनना था कि पंडितजी ने कहा और तुम अपने पहनावे से मुझे लफूट लग रहे हो, तो क्या मैं तुम्हें लफूट जी कहूं? 

आपकी प्रसिद्ध कविता ‘बेटी के बिदा‘ के लिए मान लिया जाता है कि उनके मन में ये भाव अपनी बेटी को विदा करते हुए आए होंगे, जबकि जैसा वे बताते, अपनी शादी के बाद विदा होने के दौरान गांव-घरवालों की व्यथा को देख कर एकबारगी तो उन्हें ऐसा लगा कि पत्नी को छोड़कर ही वापस लौट जाएं और फिर वहीं इस कविता के भाव पैदा हुए थे। खुद मजे लेते बताते थे कि विवाह के समय पत्नी पांचवी पास थीं और आप पांचवी। धुन लगी और प्राइवेट परीक्षाएं पास करते हुए एम.ए. की परीक्षा तक पहुंचे। पाठ्यक्रम में आपकी ही कविता थी, जिस पर प्रश्न पूछा गया था, अपनी ही कविता पर पूछे गए प्रश्न का उत्तर लिख कर परीक्षा पास करने की संभवतः यह अकेली घटना है। 

एक प्रसंग उन्होंने बताया था। लोचनप्रसाद पांडेय बिलासपुर से रायगढ़ जा रहे थे। रेलगाड़ी पर से रास्ते में उनका ध्यान विशिष्ट आकृति की ओर गया, उन्होंने किसी सहयात्री से गुजर रहे गांव का नाम पूछ लिया। रायगढ़ पहुंचकर उन्होंने एक पोस्टकार्ड लिखा, कि जयरामनगर और अकलतरा स्टेशन के बीच लीलागर नदी के पुल के बाद बायीं ओर मिट्टी का टीला दिखाई पड़ता है, इसके बारे जानकारी चाहिए। पत्र, श्री पटवारी जी (या सरपंच जी) संबोधित, पता लिखा था। उलझन भरे इस पते-संबोधन वाला पत्र, आपके पास ही पहुंचना था, पोस्टमैन पत्र उन तक छोड़ गया। पत्र का जवाब लिखने के बजाय आपने स्वयं लोचनप्रसाद जी से मुलाकात की और मिट्टी के परकोटे वाले गढ़ तथा गांव के पुरातात्विक अवशेषों की जानकारी से अवगत कराया। संभव है यह पोस्टकार्ड अब भी सुरक्षित हो। 

आपने लोचनप्रसाद जी के निधन पर 1 दिसंबर 1957 को ‘नई दुनिया में श्रद्धांजलि-लेख लिखा था, जिसका अंश इस प्रकार है- ‘यदि श्रद्धेय पाण्यडेजी की अपूरणीय क्षति से हम धरोहर के समुचित सदुपयोग सीख सकें, अपनी सामाजिक जिम्मेदारी पूर्ण करने की दिशा में ईमानदारी से प्रयत्न कर सकें, अपनी अकर्मण्यता छिपाने के लिए कार्यक्षमता के कांधे पर न चढ़ें, साहित्यिक राजनीतिज्ञ से श्रेष्ठ होता है यह सही मायने में आचरण से कर दिखा सकें, तो यह विश्वास किया जा सकता है कि स्वर्गीय पाण्डेय के नेह-लोचन का कृपा-प्रसाद हम अदृष्ट से पाते रहेंगे।‘ अब हम यही बात पं. श्यामलाल जी के लिए भी लागू हो सकती हैं। 

वे संपर्क में आए लोगों के संस्मरण और उसे अभिव्यक्त करने की उनकी शैली लाजवाब थी। ‘बड़े के संग म खावय बीरा पान‘ शीर्षक से, मेरे पितामह इंद्रजीत सिंह जी के लिए उन्होंने लिखा था, जिसका एक अंश इस प्रकार है- जिनके प्रति आदर का स्थायी भाव बरसों से हो और संयोगवश उसे अभिव्यक्त करने का अवसर यदि प्राप्त हो जाये तो हर्षित होकर उसका निर्वाह करना कौन नहीं चाहेगा ? ऐसा ही एक सुअवसर मुझे मिला है और मैं अकलतरा के राजा साहब स्वर्गीय मनमोहन सिंह जी के सुपुत्र डॉक्टर इन्द्रजीत सिंह जी की जन्म शताब्दी पर अपने खयालातों की खतौनी कर रहा हूँ। 
 ... 
 लाल साहब ख्याति के खैरख्वाह नहीं थे किन्तु अत्यन्त परिश्रम से छत्तीसगढ़ के वनाँचलों में जाकर समय और सम्पत्ति की आहुति देकर उन्होंने जो ‘गोड़ जनजाति के आर्थिक जीवन‘ को लेकर अंग्रेजी में ‘गोड़वाना एण्ड द गोंड्स‘ शीर्षक से शोध ग्रंथ का प्रणयन किया, वह लाल साहब की समाज को अनमोल देन है। विश्व के ख्यातनाम अर्थशस्त्री डॉ. राधा कमल मुखर्जी एवं डाँ. डी.एन. मजुमदार इनके मार्गदर्शक थे। यह ग्रंथ सन् 1944 में प्रकाशित हुआ था। पुस्तक का समापन कुछ इस तरह से है - ‘जनजातीय समुदाय के उत्थान और विकास के कार्य ऐसे लोगों के हाथों होना चाहिए जो उनके ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य और सामाजिक व्यवस्था को पूरी सहानुभूति सहित समझ सके।‘ बीसवीं सदी के (तीसरे-) चौथे दशक के बीच बस्तर अंचल मेएक छत्तीसगढ़ी राजकुमार का शोध कार्य अभूतपूर्व है।' 

मीर अली मीर की प्रसिद्ध कविता है ‘नंदा जाही‘, संभवतः यह कविता पंडितजी के विचारों से प्रेरित है, वे बार-बार दुहराया करते थे कि ‘छत्तीसगढ़ी के शब्द नंदावत हे‘। मुझे हमेशा यह लगता था कि छत्तीसगढ़ी में बोली का लोच-लालित्य, लिखते हुए सीमित होने लगता है, उसके रस-प्राण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, ऐसी बात कह कर आलोचना का पात्र भी बन चुका हूं। मगर एक बार पंडितजी के विचार सुनने का अवसर मिला, जिसमें उन्होंने कहा कि ‘मोर एक अलग तरह के बिचार हे, छत्तीसगढ़ी हर लिखे के नोहय, बोले के, अतका लुदरू हे, लिखा-पढ़ी म आइस, तब ले खोखा म बंद होत जात हे।‘ इसके साथ उनका स्पष्ट मत होता था कि बोलचाल में छत्तीसगढ़ी बनी रहे, यह बहुत जरूरी है। वे जैसी छत्तीसगढ़ी बोलते थे, वह स्वयं में इसका सबसे प्रबल प्रमाण है। अब छत्तीसगढ़ी के मानकीकरण और विविधता पर विचार करते हुए यह ध्यान रखना चाहिए कि भाषा-बोली, अभिव्यक्ति का कोई माध्यम हो, बोली का लोच, उसका सौंदर्य होता है न कि सीमा। छत्तीसगढ़ी का बोलीपन बने रहने की कीमत पर ही उसका भाषा बन जाना मंजूर किया जा सकता है। किसी जबान का बोलीपन खो जाए तो यह भाषा, मानक भाषा, राजभाषा, आठवीं अनुसूची में शामिल होने की सार्थकता पर प्रश्न चिह्न होगा। 

2004 में दैनिक हरिभूमि, बिलासपुर में जगन्नाथ प्रसाद ‘भानु‘ की पुण्यतिथि पर मेरा लेख छपा। मुलाकात होने पर उन्होंने पूछा कि भानु जी की छत्तीसगढ़ी रचना ‘खुसरा चिरई के बिहाव‘ के बारे में मुझे कहां से पता चला। आगे उन्होंने ध्यान आकृष्ट कराया कि इसी नाम की रचना खरौद निवासी पं. कपिलनाथ मिश्र की भी है। मुझे याद आया कि मैंने यह पुस्तक शिवरीनारायण के मेले में बिकते देखी थी, तब इसके रचनाकार की ओर मेरा ध्यान नहीं गया था। पंडितजी ने कहा कि भानु जी की इस रचना के बारे में उन्होंने भी सुना है, मगर देखा नहीं है और निर्देश दिया कि पता करने की कोशिश करना। बाद में कपिलनाथ जी वाली पुस्तक तो मिल गई, मगर भानु जी वाली अब तक नहीं मिली है। 

छत्तीसगढ़ हिन्दी साहित्य सम्मेलन का त्रैमासिक पत्र ‘क्षितिज‘ के सम्पादक मण्डल में प्यारेलाल गुप्त, गजानन शर्मा, शिवनारायण जौहरी और द्वारिकाप्रसाद ‘विप्र‘ के साथ आप भी थे। इस त्रैमासिक पत्र का प्रथम अंक चैत्र-वैशाख-ज्येष्ठ सं. 2017 वि. (सन 1960) में उनकी यह छत्तीसगढ़ी कविता छपी थी। 

कुटेमहा घटा सो 
(असामयिक बादल के प्रति.) 
- श्यामलाल चतुर्वेदी ‘श्याम‘ 

बादर! झनि आ झनि आ। अभी तैं झनि आरे! झनि आ। 
हमर साल भर के मेहनत हर, बाहिर बगरे हावै। 
तोर रंग के एक झलक म, पोटा हमर (माई पोटा) सुखावै।। 
सावन भादों के हे देवता! झन रावन बन जा तैं। 
हांथ जोर के पांव परत हन, हमला अभी बँचा तैं।। 

बिजली कस तोर दांत दिखय, गरजना सहीं तोर हांसी। 
आवा जाही देख सहीं, लगथे का बदे हे फांसी।। 
छिन छिन हवै अमोल बखत ये, फुरसत (फुरसुत) नहीं मरे के। 
पाल पोंस के तहीं बनाये (बढ़ोये), पांव परी मुंड़ टेंके।। 
अपन हाँथ म बना के कुरिया, आगी झनिच (झन तो आगी) लगा। 
बादर झनि आ झनि आ।। 

तैं हमार जिवराखन देंवतन मा तैं ( ) बड़का भारी। 
झन करबे मसखरी झींक के भात परोसे थारी।। 
जाही जीव अजाहे सिरतोन करे कुँदे जर जाही। 
जुड़ जुड़ पानी चिटको परही, करपा हर (ह) सर जाही। 
तोर जुड़ास अगिन होही, तै चिटको तो पतिआ। 
(तोर जुड़ास जिनगी जुड़वाही मर जाबो, पतिआ) 
बादर झनि आ झनि आ।। 

पन पिआस के प्यास बुतोइया (बुतोइय्या), पिरथी के रंगरेजवा। 
नेवता देके ठग देइस का सोर तोर सो भेजवा।। 
(धोखा देइस का? कोनो हर, सोर तोर सो भेजवा) 
दगा कोनो के सगा नहीं, जा झटकुन सोर सुनादे। 
(दगा कोनो के सगा नहीं, सोरिहा ल सफा सुनादे) 
इहां ठाढ़ हो दुख झन दे, जा काम अपन निपटादे।। 
(तरी उपर चल रहे साँस ला, तिरिआके, थिरिया दे।।) 
नेवता ले असाढ़ सावन के, जा झन बेर पहा।। 
(नेवता ले असाढ़ सावन के, जा तो झन गर्रा।।) 
हूल बरोबर लगय सुनत तोर, थोर को हिही हहा।।
 
तोर गाना सुन प्रान सुखाथे, रोना के संग मरना। 
सबले अच्छा होही अभी, ईंहां ले तोरेच टरना।। 
(ऊपर की ये दो पंक्तियां नहीं हैं।) 
तैं परमारथ करके अपने, हांथ ले लूट नंगा झन। 
(परमारथ कर अपने हाँथे, झन तो लूट, नँगा झन) 
अपने पोंसे लइकन मन बर फोक्कट अभी जंगा झन।। 
(ऊपर की यह पंक्ति भी नहीं है।) 
एक के करे अकाइस तेला झन तो (तैं) एक बना।। 
बादर झनि आ झनि आ। 

नोहन हम सिरि क्रिस्न के संगी न तो बिरिज रहवइया (रहवइय्या)। 
इन्द्र रजा के हम असरोइया (असरोइय्या), गउ किरिया रे भइया (भइय्या)। 
जियेन सगर दिन तुहर पुन्न मा (दया मा), तुंहर भरोसा जीबो। 
तुंहरे पुन मा चिटिक मिटिक पा, पसिया पानी पीबो।। 
(चिटिक मिटिक पा जाबो तब तौ, पसिया पानी पीबो।।) 
कुछ कसूर करे हन तौ कह फोकटे झन डेरुआ। 
(कुछू कसूर करे हन तौ कह थपरा दे घनि आ।) 
बादर झनि आ झनि आ। 

चार महीना के तोर मेहनत (मेहनत हर), छिन मा चरपट होही। 
हमला अजम कसम से हावै, तै नोहस निरमोही।। 
अतक (अतेक) बड़े पानी के राजा, आइस बिना बलाये। 
सुनिहीं (सुनही) तउने छि छि (छि! छि!) करहीं, येमा मंजा का आये।। 
टेम टेम म बने लागथे, गारी घलो ल गा (खा)। 
(‘तैं लहुट लहुट घर जा‘ यह पंक्ति अतिरिक्त है।) 
बादर झनि आ झनि आ।। 

यही ‘कुटेमहा घटा सो‘ शीर्षक कविता 2007 में प्रकाशित उनके काव्य संग्रह ‘पर्रा भर लाई‘ के नवम् संस्करण में ‘बादर झनि आ झनि आ‘ शीर्षक से शामिल है। यहां इसके रचना काल या पूर्व प्रकाशन का संदर्भ नहीं है। बाद के प्रकाशन में कविता के कुछ शब्द बदल गए हैं, जो ऊपर कोष्ठक में इंगित हैं। इसीसे संबंधित कुछ अन्य बातें। ‘क्षितिज‘ के संपादक मंडल में होने की उल्लेख उन्होंने आलोक शुक्ल के साक्षात्कार में किया है, अन्यथा इसकी जानकारी सामान्यतः नहीं मिलती थी। संयोग कि मुझे डॉ. सुशील त्रिवेदी जी के संग्रह में यह अंक देखने को मिल गया। एक अन्य बात की ओर मेरा ध्यान गया, जिसकी चर्चा न के बराबर होती है कि ‘क्षितिज‘ में प्रकाशित इस कविता के साथ उनका उपनाम ‘श्याम‘ आया है।

इस कविता के लिए मुकुटधर पांडेय ने श्रीधर पाठक की पंक्ति ‘उलटि जाहु धन अबही बिनवत हे घनश्याम‘ को याद किया था। मुझे याद आया कि पुरानी फिल्म ‘शिकस्त‘ में लता मंगेशकर का गाया मधुर गीत है- कारे बदरा तू न जा, न जा। इसके विपरीत यहां कहा गया है बादर झनि आ, झनि आ। किसान ऐसे बेमौसम बादल को बरजता ही है, क्योंकि ‘कुंवरहा घाम अलकर, अउ कातिक के पानी‘। पकी पकाई फसल पर पानी फिरने का अंदेशा जो होता है। मेरे लिए उनकी यह कविता वैदिक देवता पर्जन्य की स्तुति का आभास देने वाली है। इस कविता में समय के साथ शब्दो-अंशों में परिवर्तन की विवेचना और कविता की व्याख्या, छत्तीसगढ़ी के लोक-मन के साथ पंडितजी के कवि-मन का उजागर कर सकती है, संभव है शोधार्थियों का ध्यान इस ओर गया हो।

छत्तीसगढ़ की संस्कृति नीति, विभागीय पत्रिका ‘बिहनिया‘ के नामकरण में आपकी प्रमुख भूमिका रही और छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के प्रथम अध्यक्ष नियुक्त हुए। आयोग के वर्तमान स्वरूप की नींव उन्होंने डाली थी। यद्यपि ‘सरकारी‘ कार्यप्रणाली और स्थितियों से खिन्न हो जाते थे। आपने आयोग के सचिव पद के लिए मुझसे कहा। मेरे यह कहने पर कि इस महत्वपूर्ण पद के लिए मुझसे अधिक योग्य और उपयुक्त लोग हैं, राजी नहीं हुए। इस पर मैंने फिर निवेदन किया कि सचिव पद का काम अन्य भी कर सकते हैं मगर पुरातत्व के क्षेत्र में काम करने वालों की कमी है, इस तर्क पर आसानी से सहमत हो गए। भाषा, संस्कृति और पुरातत्व से छत्तीसगढ़ का गौरव और महिमामंडन सदैव उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता में रहा।

- राहुल कुमार सिंह 
प्रमुख, धरोहर परियोजना, 
बायोडायवर्सिटी एक्सप्लोरेशन एंड रिसर्च सेंटर

Saturday, May 31, 2025

माँ दंतेश्वरी

ओमप्रकाश सोनी, सुकमा, बस्तर में इतिहास के प्राध्यापक हैं, उनके माध्यम से माँ दंतेश्वरी से जुड़ी कुछ बातें कहने का अवसर बना। अब वह उनकी पुस्तक ‘बस्तर साम्राज्ञी माँ दंतेश्वरी (इतिहास और पुरातत्व)‘ में 'भूमिका' के रूप में प्रकाशित है-

भूमिका 

अयोध्या, मथुरा, माया (हरिद्वार), काशी, कांची, अवन्तिका (उज्जयिनी) एवं द्वारका, सात अति पवित्र तीर्थ प्रसिद्ध हैं। चार धाम और द्वादश ज्योतिर्लिंग के अलावा बार्हस्पत्यसूत्र में आठ-आठ शैव, वैष्णव और शाक्त सिद्धिदायक तीर्थों की सूची मिलती है। सात नगरियों की तरह गंगा, यमुना, सरस्वती, सिंधु, नर्मदा, गोदावरी और कावेरी- सात नदियां अति पवित्र मानी गई हैं। वैदिक सप्त सिंधु का आशय संभवतः इन सात नदियों से नहीं है, मगर प्रसंगवश ‘हिंदु‘ (हप्त हिन्दु) शब्द सिंधु नदी से संबंधित भौगोलिक क्षेत्र के रूप में पांचवीं सदी इस्वी पूर्व से प्रचलित रहा है, जिससे इंडोई और इंडिया शब्द आया। पाणिनी ने भी सिन्धु शब्द का प्रयोग देश के अर्थ में किया है। 

ऐसी कई सूचियां और उनके माहात्म्य मिलते हैं। सती की कथा और उसके अंगों के गिरने के स्थान पर बने शक्तिपीठों की संख्या ‘तन्त्रचूडामणि‘ में बावन, ‘शिवचरित्र‘ में इक्यावन, ‘देवीभागवत‘ में एक सौ आठ दी गई है और ‘कालिकापुराण‘ में छब्बीस उपपीठों का वर्णन है पर साधारणतया पीठों की संख्या इक्यावन स्वीकृत है। दंतेवाड़ा, बस्तर की दंतेश्वरी, सती के दांत गिरने का स्थान और उस पर स्थापित शक्तिपीठ के रूप में मानी जाती हैं। 
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स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद छत्तीसगढ़ की 14 देशी रियासतों में से कांकेर को जोड़ कर बस्तर जिला बना। यहां से अतीत की ओर लौटें तो नागयुग में ‘मासुनिदेश‘, ‘चक्रकोट‘ तथा ‘भ्रमरकोट‘, नलयुग में ‘निषधदेश‘, गुप्तकाल ‘महाकान्तार‘, महामेघ-शक-सातवाहन काल में ‘विद्याधराधिवास‘, ‘मलयमहेन्द्रचकोरक्षेत्र‘, ‘महावन‘, मौर्यकाल में आटविक राज्य, इससे और पहले ‘अश्मक‘, ‘स्त्रीराज्य‘ या उसका हिस्सा रहा। सबसे पुराना नाम दण्डकारण्य पता लगता है। 

मिथक-कथाएं, अक्सर बेहतर हकीकत बयां करती हैं, कभी सच बोलने के लिए मददगार बनती हैं, सच के पहलुओं को खोलने में सहायक तो सदैव होती हैं। इस क्रम में अध्येताओं ने रामवनगमन पथ के साथ दण्डकारण्य-बस्तर में लंका की खोज का प्रयास किया है। रामकथा का शूर्पणखा और सीताहरण प्रसंग दण्डकारण्य से जुड़ा है। मगर ध्यान रहे कि केशकाल-बाराभांवर की भंगाराम-तेलीन सत्ती मां (अब प्रचलित भंगाराम को बंगाराम या वारंगल-ओरंगाल से आई मानते भोरंगाल-भंगाराम भी कहा गया है।) हैं और सुकमा की रामाराम, चिटमटिन देवी हैं। पौराणिक दण्डकारण्य या दण्डक वन, सामान्यतः दक्षिणापथ का विस्तृत भूभाग प्रतीत होता है, इसी के अंतर्गत ऐतिहासिक महाकांतार-बस्तर भी है। यह रोचक है कि ‘दण्ड‘ को राजाओं द्वारा व्यवहार में लाई जाने वाली लौकिक शक्ति के प्रतीक के रूप में देखा गया है। राम के धनुष का नाम ही कोदण्ड है तथा वह दण्ड ही है जो प्रतीक रूप ध्वज (यथा- मयूरध्वज, सीरध्वज-जनक, कपिध्वज-अर्जुन) को धारण करता है। 

प्रथम राजा पृथु के दण्डकारण्य में अभिषेक का उल्लेख मिलता है। कहा गया है- 
दण्डः शास्ति प्रजाः सर्वा दण्ड एवाभिरक्षति। दण्डः सुप्तेषु जागर्ति दण्डं धर्मं विदुर्बुधाः।। 
अर्थात दण्ड ही शासन करता है। दण्ड ही रक्षा करता है। जब सब सोते रहते हैं तो दण्ड ही जागता है। बुद्धिमानों ने दण्ड को ही धर्म कहा है। 

कथा में पृथु ने भूमि को कन्या मानकर उसका पोषण (दोहन) किया, इसी से हमारे ग्रह का नाम पृथ्वी हुआ। वह भूमि को समतल करने वाला पहला व्यक्ति था, उसने कृषि, अन्नादि उपजाने की शुरूआत करा कर संस्कृति और सभ्यता के नये युग का सूत्रपात किया। भागवत की कथा में पृथु ने पृथ्वी के गर्भ में छिपी हुई सकल औषधि, धान्य, रस, रत्न सहित स्वर्णादि धातु प्राप्त करने की कला का भी बोध कराया। 

इस अंचल की परंपरा में मयूरध्वज की कथा के सूत्र विद्यमान हैं। जैमिनी अश्वमेध के अलावा अन्य ग्रंथों में भी यह कथा थोड़े फेरबदल से आई है, जिसमें ब्राह्मण को दान देने के लिए राजा-रानी अपने पुत्र को आरे से चीरने लगते हैं। इस कथा का असर बंदोबस्त अधिकारी मि. चीजम (1861-1868) ने दर्ज किया है कि अंचल में लगभग निषिद्ध आरे का प्रचलन मराठा शासक बिम्बाजी भोंसले के काल से हुआ और तब तक की पुरानी इमारतों में लकड़ी की धरन, बसूले से चौपहल कर इस्तेमाल हुई है। बस्तर का प्रसिद्ध दशहरा, देवी द्वारा महिषासुर के वध का अर्थात पाशविक वृत्तियों पर विजय का उत्सव है, जिसके प्रतीक रूप में भैंसों की बलि दी जाती थी। दशहरा के लिए फूलरथ और रैनीरथ निर्माण में केवल बसूले के प्रयोग की परंपरा रही है। 

कपोल-कल्पना लगने वाली कथा में संभवतः यह दृष्टि है कि आरे का निषेध वन-पर्यावरण की रक्षा का सर्वप्रमुख कारण होता है। टंगिया और बसूले से दैनंदिन आवश्ययकता-पूर्ति हो जाती है, लेकिन आरा वनों के असंतुलित दोहन और अक्सर अंधाधुंध कटाई का साधन बनने लगता है। यह कथा छत्तीसगढ़ में पर्यावरण चेतना के बीज के रूप में भी देखी जा सकती है। बस्तर के जनजातीय असंतोष के इतिहास में ..1859 का संघर्ष ‘कोई विद्रोह‘ नाम से जाना जाता है, जिसमें फोतकेल, कोतापल्ली, भेज्जी और भोपालपट्टनम के जमींदारों ने जंगल काटने का विरोध किया। आंदोलन का नारा- ‘एक साल पेड़ के पीछे एक आदमी का सिर‘ से इसकी उग्रता का अनुमान किया जा सकता है। ऐसा ही एक अन्य उल्लेख ‘ताड़-झोंकनी‘ (1775), दरियावदेव-हलबा योद्धाओं का मिलता है, जिसमें काटे गए ताड़ वृक्षों को हाथ से झेलते, वृक्ष के नीचे दब कर हलबा वीरों की मृत्यु हो गई थी। 

महाभारत के नलोपाख्यान कथा में कलि-वास वाले पक्षी-रूपी पांसे, नल का एकमात्र वस्त्र ले कर उड़ जाते हैं तब अनावृत्त नल, दमयंती को ऋक्षवान पर्वत को लांघकर अवंती देश जाने वाला मार्ग, विंध्य पर्वत, पयोष्णी नदी, महर्षियों के आश्रम, दक्षिणापथ, विदर्भ और कोसल जाने का मार्ग बताते हैं। 

इस भौगोलिक विवरण से पड़ोसी विदर्भ की राजकुमारी दमयंती और निषध देश के साथ बस्तर का कुछ-कुछ रिश्ता बनता है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के महानिदेशक रहे राकेश तिवारी अपनी पुस्तक ‘पवन ऐसा डोलै...‘ (2018) में इसका परीक्षण करते हुए लिखते हैं- अनुमान लगता है कि निषध राज्य जबलपुर के पूरब में आज के छत्तीसगढ़ राज्य अथवा प्राचीन दक्षिण कोसल और उसके आस-पास रहा होना चाहिए। प्रख्यात पाश्चात्य विद्वान मोनियर विलियम ने पहले ही मोटे तौर पर इससे मिलता-जुलता अनुमान लगाया है। मगर पांचवीं सदी इस्वी के नल राजवंश के अभिलेख, सोने के सिक्के और गढ़धनोरा, भोंगापाल जैसे कला केंद्रों से उनका सीधा जुड़ाव इस भूभाग से प्रमाणित होता है। आर्यावर्त और दक्षिणापथ के बीच की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी महाकांतार-बस्तर है ही। समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति के दक्षिणापथ विजय अभियान में कोसल के महेन्द्र के बाद महाकांतार के व्याघ्रराज का उल्लेख है। 
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कहा गया है कि विधाता ने इन्द्र, मरुत, यम, सूर्य, अग्नि, वरुण, चंद्र एवं कुबेर के प्रमुख अंशों से युक्त राजा की रचना की। अन्य देवता अलक्ष्य हैं, मगर राजा को हम देख सकते हैं ... राजा में विष्णु का अंश होगा। शतपथ ब्राह्मण में कहा गया है- राज्याभिषेक के बाद मनुष्य देवत्व को प्राप्त कर लेता है। पुराने नाटकों में राजा को देव संबोधित किया गया है, कुषाण राजाओं ने स्वयं को देवपुत्र कहा है। मगर दूसरी तरफ राजनीतिप्रकाश में कहा गया है कि ‘स्वयं प्रजा विष्णु है।‘ राजा और सम्राट शब्द पर विचार करें- राजा-राजन् शब्द राज् अर्थात ‘चमकना‘ से आया माना जाता है और कहीं इसे रंज अर्थात (प्रजा को) ‘प्रसन्न करना‘ के अर्थ में देखा गया है। सम्राट शब्द का आशय है, क्षेत्र-विशेष, जिसके पूर्णतः अधीन हो। इसी प्रकार एक मत है कि राजन शब्द के मूल में ‘राट‘ है, जिससे राष्ट्र और सम्राट बनता है। 

काछिनमाता, माणिक्येश्वरी, सती आदि का समाहार स्वरूप दंतेश्वरी देवी बस्तर सामाज्ञी भी हैं। ज्यों ओरछा के दशरथनंदन राम‘राजा‘ हैं। अंग्रेजी में ‘ट्यूटरली डेइटी‘ यानि ऐसा देवता या आत्मा है जो किसी विशिष्ट स्थान, भौगोलिक विशेषता, व्यक्ति, वंश, राष्ट्र, संस्कृति या व्यवसाय का संरक्षक हो। शास्त्रीय ग्रंथों में राज्य की दैवी उत्पत्ति का सिद्धांत और राजा के देवत्व का उल्लेख आता है। ठाकुरदेव, बड़ादेव, बुढ़ादेव गांव के मालिक-देवता और दुल्हादेव, गृहस्वामी माने जाते हैं। इस तरह राजा और देव अभिन्न हो जाते हैं। 

राजा के दैवी उत्पत्ति में, बस्तर के राजा आदिवासी-देवसमूह की अधिष्ठात्री देवी दन्तेश्वरी के प्रमुख-पुजारी होने के नाते ईश्वर का अवतार माने जाते थे। प्रवीरचंद्र भंजदेव इसके साथ ‘माटी पुजारी‘ अर्थात बस्तर के सभी छोटे-बड़े देवी-देवताओं के सबसे मुख्य पुजारी माने जाते थे। स्वाभाविक ही वे अपनी पुस्तिका का शीर्षक ‘आइ प्रवीर द आदिवासी गॉड‘ (1966) रखते हैं, वहीं कांकेर के ‘राजा‘ डॉ.आदित्य प्रताप देव अपनी पुस्तक ‘किग्स, स्पिरिट्स एंड मेमोरी इन सेंट्रल इंडिया‘ (2022) के पहले अध्याय के लिए ‘द किंग एज ‘‘आइ’’ शीर्षक रखते हैं और मड़ई-दशहरा जैसे उत्सव-परंपराओं के दर्शक, सहभागी होते केंद्रीय पात्र बनते, मानों खुद की तलाश करने विवश होते हैं, राजा में देवत्व आरोपण पर कुछ यूं लिखते हैं- ‘‘राजा के आंगा देव होने के नाते पुराने राजमहल के ‘छोटे पाट‘, पूरे राज्य के आंगा देवों और राजा, जिन्हें बहुधा स्वयं देव (भगवान) रूप माना जाता था, उनकी शक्ति को समस्या निवारण के लिए, अपने में समा लेने में सक्षम थे।‘‘ (बड़े पाट, स्थानीय शीतला माता मंदिर में स्थापित हैं।) 

11 वीं सदी इस्वी के मधुरान्तकदेव के ताम्रपत्र में मेडिपोट (मेरिया-नरबलि) का उल्लेख है। बस्तर के जनजातीय असंतोष के इतिहास में 1842-63 का मेरिया विद्रोह भी दर्ज है। देवता को बलि दिए जाने के संदर्भ में दंतेश्वरी मंदिर, दंतेवाड़ा के द्विभाषी शिलालेख देखा जा सकता है, 18 वीं सदी इस्वी के आरंभिक वर्षों के दो पाषाण खंडों पर खुदा लेख दिकपालदेव से संबंधित है, जिसमें कहा गया है कि दंतावली देवी के मंदिर में संपन्न कुटुम्ब यात्रा अनुष्ठान में कई हजार भैंसे और बकरों की बलि दी गई, जिससे शंखिनी नदी का पानी पांच दिनों तक लाल कुसुम वर्ण हो गया। 

प्रवीरचंद्र भंजदेव परंपरा-आग्रही थे तो बलि जैसे मानवीय मसलों पर आधुनिक सुधारवादी भी थे। ऐसे एक प्रसंग का उल्लेख मिलता है, जिसमें बताया जाता है कि सन् 1960 के आसपास उन्होंने दशहरे के अवसर पर बकरा-महिष की बलि का निषेध कर नारियल चढ़ाने की परिपाटी चालू की। इसे चुनौती सी देते हुए बलराम नामक एक व्यक्ति ने, आदिवासी मुखियों के साथ प्रवीर से कहा- ‘महाराज पुराने जमाने में तो राजा लोग फूल रथ के सामने नर-बलि देते थे। आप कम से कम बकरे की बलि तो देने दीजिए। नारियल-वारियल से काम कैसे चलेगा महाराज। कुछ तो विचारिये।‘ इस पर प्रवीर ने कहा, ‘तो ठीक है, जाकर फूल रथ के सामने बलराम को काट दो। 
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धर्मक्षेत्र-पवित्र नगरियों का माहात्म्य प्राचीन ग्रथों में कहा जाता रहा है। इस दिशा में आधुनिक गंभीर अध्ययनों में भारत रत्न महामहोपाध्याय डॉ. पाण्डुरंग वामन काणे विशेष उल्लेखनीय है। अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘धर्मशास्त्र का इतिहास‘ के तृतीय भाग में तीर्थप्रकरण के अंतर्गत गंगा, नर्मदा, गोदावरी के साथ प्रयाग, काशी, गया, कुरुक्षेत्र, मथुरा, जगन्नथ, कांची, पंढरपुर की विस्तार से चर्चा की है साथ ही दो हजार से अधिक नामों की परिचयात्मक तीर्थसूची दी है। काणे कहते हैं- ‘तीर्थयात्रा को नये रंग में ढालना होगा।‘ 

माहात्म्य कहने का आधुनिक समाज-मानवशास्त्रीय स्वरूप ‘सेक्रेड काम्प्लेक्स‘ (पावन या पुनीत प्रखंड/पवित्र संकुल-परिसर) के रूप में स्थल-विशेष का अध्ययन है। पिछली सदी के पचास-साठादि दशक में गया निवासी भूगोल विषय के स्नातक एल पी विद्यार्थी ने गयावालों का अध्ययन कर ‘द सेक्रेड काम्प्लेक्स इन हिंदू गया’ (1961) के रूप में आगे बढ़ाया, जो मानवशास्त्रियों के पारंपरिक अध्ययन तरीकों से अलग पद्धतिगत अभिविन्यास निर्धारित करता, अपने तरह का आरंभिक अध्ययन है। इस क्रम में उन्होंने बनारस, भुवनेश्वर, देवघर और पुरी के अलावा अन्य मंदिरों और घाटों का भी अध्ययन किया। 

प्रसिद्ध मानवशास्त्री डीएन मजुमदार ने भी काणे की तरह वस्तुस्थिति पर चिंता जाहिर करते हुए परंपरा के साथ समय की आवश्यकता के अनुकूल समझौते पर बल दिया है साथ ही विद्यार्थी के अध्ययन को रेखांकित करते हुए कहा है- ‘‘हमारे मंदिर और धार्मिक तीर्थस्थल हमारी विरासत हैं और भारत की पहचान को आकार देते हैं। उनसे जुड़ी लोक मान्यताएं, रीति-रिवाज और शिक्षा को अलग करना या पहचानना मुश्किल है। कहानी केवल शास्त्रों में और मंदिर कला और वास्तुकला में ही नहीं है, बल्कि लोक और रीति-रिवाजों में भी है जो शहरों और मंदिरों के ‘पवित्र परिसर‘ में अभिन्न रूप से बुने हुए हैं। डॉ. विद्यार्थी ने मंदिरों के सामाजिक संगठन का वर्णन करने के लिए पवित्र केंद्र, पवित्र खंड, पवित्र समूह, पवित्र क्षेत्र, पवित्र भूमि, पवित्र भूगोल जैसे शब्दों का उपयोग किया है। वह तीर्थस्थल के पवित्र परिसर का वर्णन करते मानते हैं कि ऐसी अवधारणा भारत में आदिवासी धर्मों पर भी लागू होती है, जिसमें उनके पवित्र उपवन, पवित्र प्रदर्शन और पवित्र अनुष्ठान शामिल हैं।‘‘ 

सेक्रेड काम्प्लेक्स के अध्ययन का क्रम डॉ. माखन झा ने आगे बढ़ाया तथा ‘काम्प्लेक्स सोसायटीज एंड अदर एंथ्रोपोलॉजिकल एसेज‘ (1991) आदि कई प्रकाशन सामने आए। डॉ. माखन झा का छत्तीसगढ़ से रिश्ता बना, उन्होंने 1969-70 में रतनपुर और आसपास के क्षेत्र का व्यापक-गहन सर्वेक्षण किया और अपने विभिन्न प्रकाशनों में उसे शामिल किया। डी.एन. मजुमदार की बस्तर आवाजाही अकलतरा निवासी इंद्रजीत सिंह के माध्यम से हुई। डॉ. इंद्रजीत सिंह का शोधग्रंथ ‘‘द गोंडवाना एंड द गोंड्स‘ (1944), किसी भारतीय द्वारा बस्तर पर किया गया पहला शोधकार्य है। 

धार्मिक-तीर्थस्थल, पर्यटन स्थलों से कई मायनों में अलग होते हैं। मंदिर के साथ इतिहास, आस्था और परंपरा की महीन परतें होती हैं, ये परतें न सिर्फ महीन होतीं, बल्कि आपस में घुली-मिली भी होती हैं। इन्हें परखने के लिए उसका अंग बन जाना, आत्मीयता से अवलोकन कर तटस्थ अभिलेखन संभव होता सकता है। प्राचीन मंदिर, धार्मिक आस्था के साथ-साथ शिक्षा, चिकित्सा, लोक-कल्याण और संस्कृति के केंद्र होते थे, जहां जन-समुदाय एकत्र हो घुलता-मिलता था। अतएव वहां भाषा-संस्कृति के ऐसे बहुतेरे ऐतिहासिक तथ्य होते हैं जिनका महत्व समय-सापेक्ष और काल-स्वीकृत हो कर परंपरा में बदल जाने के कारण होता है। ऐसी आस्था, जिसका आधार मात्र धार्मिक नहीं, जो समष्टि से विकसित है, सभ्यतागत ढांचे के भाग के रूप में समय के साथ पुष्ट होती है। इस क्रम में नवाचार भी जुड़ता जाता है, ज्यों इस वर्ष 2025 में दंतेवाड़ा की फागुन मड़ई में पहुंचे 994 देव-विग्रहों का परिचय पत्र बनाया गया, जिसमें उनका नाम-पता, पुजारी का नाम और मोबाइल नंबर के साथ सिरहा, वादक-वृंद और झंडा पकड़ने वाले का नाम दर्ज किए जाने का समाचार है। 

केदारनाथ ठाकुर बस्तर भूषण 1908 में राजबाड़ा के अंदर स्थित दंतेश्वरी मंदिर के साथ दंतेवाड़ा के दंतंश्वरी मंदिर का विवरण मिलता है, उन्होंने ‘दन्तेश्वरी मंदिर के तेवहार‘ शीर्षक के अंतर्गत चैत्र से फालगुन तक सभी बारह माह की गतिविधियों का लेखा दिया है। यही इस पुस्तक की पीठिका या प्रस्थान बिंदु है, इस उद्यम में तीर्थयात्री के साथ पर्यटक और अध्येता की भूमिका का सम्यक निर्वाह हुआ है, इसलिए यह माहात्म्य, सेक्रेड काम्प्लेक्स के शोध के साथ वस्तुतः स्थल-पुराण है, जिसमें स्थान-विशेष की संस्कृति, रीति-रिवाज, प्रथाओं, जातीय परंपराओं और वहां के समाज का भी वर्णन है। 
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डॉ. हीरालाल शुक्ल मानते हैं कि शाक्त केंद्र दंतेवाड़ा का मंदिर नाग युग में ‘दत्तवाड़ा‘ नाम से विकसित हो चुका था। उन्होंने ‘आदिवासी बस्तर का बृहद् इतिहास‘-चतुर्थ खण्ड (2007) में नाटककार अर्जुन होता रचित उड़िया कृति ‘बस्तर विजय‘ (1941 में प्रकाशित), डॉ. चित्तरंजन कर द्वारा अनुदित, को शामिल किया है। नाटक का अंतिम अंश इस प्रकार है- महाराजा- हाँ, और एक बात। मंत्री महाशय! बस्तर की अधिष्ठात्री दंतेश्वरी देवी की कृपा ही बस्तर-विजय का मूल है। गाँव-गाँव में, घर-घर में उनकी पूजा का आयोजन करो। राज्य में प्रचार करो, सभी उनकी ‘बस्तरेन‘ नाम से पूजा करेंगे ... ... ... 
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‘जय माँ बस्तरेन् की जय‘ 

-राहुल कुमार सिंह 
प्रमुख, धरोहर परियोजना 
बायोडायवर्सिटी एक्सप्लोरेशन एंड रिसर्च सेंटर

Sunday, December 1, 2024

बैरागी मनमीत

यही कोई आधी सदी पहले। मंचीय कवि-सम्मेलन के दौर में काका हाथरसी और नीरज के बाद नाम आता था, बालकवि बैरागी का, मगर यह भी कोई नाम हुआ, खैर। मालवी बैरागी जी कवि के अलावे मध्यप्रदेश में मंत्री भी रहे, 1969 में। उनकी आत्म-कथा ‘मंगते से मिनिस्टर‘ शायद अब भी अप्रकाशित है और दूसरा खंड, जिसकी योजना थी और शीर्षक तय था, मगर यह शायद लिखी ही नहीं गई- ‘मंत्री से मनुष्य‘। उनकी आत्म-कथा का एक अंश याद आता है- ‘मेरी माँ ने मुझे सबसे पहला खिलौना दिया, वह था- भीख मांगने का कटोरा, जो हमारे परिवार की आजीविका का साधन था।‘ ‘ईदगाह‘ का चिमटा बरबस याद आता है। उनके भाई विष्णु बैरागी रतलाम निवासी हैं, अपना घर बनाने के लिए बेहिचक मित्रों से आर्थिक सहयोग के आग्रह का पत्र लिखा, आशा से अधिक सहयोग मिला, अधिक को लौटा दिया और घर बन गया तो नाम रखा- ‘मित्र-धन‘।

1973, अकलतरा। गणेशोत्सव पर स्कूल में आयोजित कवि-सम्मेलन में शैल चतुर्वेदी आए थे, अकलतरा के अपने सहपाठी प्रताप सिंह जी को याद किया, गले मिले। संदर्भ पता लगा कि आजादी के दौर में बिलासपुर शासकीय विद्यालय छात्रावास के अलावा एक निजी-संचालित छात्रावास भी था, वर्तमान पीजीबीटी कालेज और भूत बंगला यानि मेसानिक हाल के बीच में, जिसका संचालन शैल चतुर्वेदी के मामा करते थे, मथुरा से आए थे, इस बोर्डिंग में भोजन ठीक-ठाक होता और अनुशासन में भी वैसी कड़ाई नहीं होती थी। शैल चतुर्वेदी अपने स्कूली जीवन के कुछ बरस इसी के चलते बिलासपुर में रहे थे। माणिक वर्मा थे, सुनाया- ‘जिस शाम को तुम मिलती हो वो शाम हरी हो जाती है, जिस ठूंठ को छू देती हो, वो ठूंठ हरी हो जाती है‘, आदि। परंपरा थी कि मंच पर एक-दो स्थानीय कवियों से भी कविता पढ़वाई जाए। ऐसे एक कवि ने कविता पढ़ना शुरू किया, लोग बार-बार वही कविता सुनते रहे थे, हूटिंग होने लगी। बालकवि माइक पर आए और कहा कि जो घर-आंगन की तुलसी को नहीं पूज सकता वह वट-पीपल को क्या पूजेगा, बस सन्नाटा खिंच गया।

आज मैंने सूर्य से बस यूँ कहा, 
आपके साम्राज्य में इतना अँधेरा क्यूँ रहा?
तमतमाकर वो दहाड़ा, मैं अकेला क्या करूँ?
तुम-निकम्मों के लिए मैं ही भला कब तक मरूँ? 
आकाश की आराधना के चक्करों में मत पड़ो।
संग्राम ये घनघोर है, कुछ मैं लड़ूँ, कुछ तुम लड़ो।
उनकी ऐसी रचनाओं के साथ ‘तू चंदा मैं चांदनी...‘ लोकप्रिय हुआ था। तब बांग्लादेश युद्ध की स्मृति तब एकदम ताजा थी, बैरागी जी ने ‘लगे हाथ निपटा ही देते पिंडी और लाहौर को‘ सुनाया। बाद में उनकी ‘पनिहारी‘ की बारी आई। इसके पहले वे कुछ पंक्तियों से माहौल बनाते, जैसे- ‘मैं मरूंगा नहीं, क्योंकि ऐसा कोई काम करूंगा नहीं‘ और ‘मुझे सपने नहीं आते, क्योंकि मैं बुझकर नहीं थककर सोता हूं- ताली वाली ऐसी बातें। फिर पनिहारी, मगर उसके पहले चार पंक्तियां सुनाते, डिस्क्लेमर सहित कि नोट मत कर लेना, कुछ कर-करा लिया तो जिम्मेदार ठहराया जाऊंगा, वह पंक्तियां थीं- 

आज भले ही पत्थर बनकर तू मुझको ठुकराएगी,
मुझे छोड़कर किसी और के नैनों में बस जाएगी, 
तुझसे जितना हो तू कर ले लेकिन ये भी सुन लेना, 
मैं तो पनघट तक आया था तू मरघट तक आएगी।
हमने बैरागी जी की बात मानी, नोट नहीं किया, मगर दूसरी सुबह मिल जुलकर याद कर लिया, याद भी रखा, और संदेश की तरह नहीं, कविता की तरह यहां-वहां अपने काव्य-प्रेम और रसिकता के बतौर प्रमाण कहते-सुनाते रहे। फिर शुरू हुआ, पनिहारी। नवी उमारिया नवी डगरिया नवा पिया की नवी प्यारी (राम) नवी नगरी मैं नवी गगरी ले पनघट जईरी ओ पनिहारी। मालवी शब्दों को बीच-बीच में समझाते चलते, मगर रसिक श्रोता शब्दों के पार जा चुके होते, आह-वाह होता रहता।

बैरागी जी के इस राग-विराग, नींद और सपने पर अर्ली टु बेड ... के साथ कुछ अपनी बात। जल्दी नींद तभी आ सकती है, जब संतोष हो कि आज भर के लिए कुछ कमाई कर ली है और जल्दी नींद तभी खुलती है, जब फिर से नया कुछ करने का उत्साह हो, और कुछ नहीं तो सुबह जल्दी उठकर घंटे भर का योग-ध्यान, व्यायाम, पैदल-कसरत जैसा कुछ कर लिया जाए, लगे कि इतनी तो कमाई कर ही ली। जहां तक सपनों की बात है, सपने तो मन की चुगली हैं। मन से दोस्ती रखें, कुछ उसकी मान लें, कभी अपनी के लिए उसे मना लें। हर बार मनाही-मना ही न हो, न ही हमेशा मनमानी। यानि मन का और मन भर कर सकने की हसरत हो तो उसका हौसला और हिम्मत हो, उसका असर बर्दाश्त करने के लिए तैयार रहें, इतनी हैसियत भी हो। 

कहा गया है, मन ही संसार को रचता है ‘मनो हि जगतां कर्तृ मनो हि पुरुषः परः। मनःकृतं कृतं लोके न शरीरकृतं कृतम्।। आशय संभवतः यह कि इस पार्थिव जगत के प्रति गुण-दोष, चेतन मन ही रचता और आरोपित काता है, द्रष्टा ही स्रष्टा है, दृष्टि ही सृष्टि है, ज्यों ‘मैं सोचता हूं, अतः मैं हूं‘।

चंचल मन दुश्मन नहीं बच्चा है, जिद करता है, शैतान है, मगर उसका साथ मौज है, वह आड़े-टेढ़े वक्त पर आपको बहलाता भी है। मन के गुलाम न हों, न ही लगाम कसे रहें। उससे दोस्ती करें, मन से अच्छा मीत और कोई नहीं। भगवद्गीता बताती है- उद्धरेदात्मनात्मानं... आत्मनो बन्धु..., शुद्ध मन ही जीवत्वाभिमानी बुद्धि का उपकारक मित्र है, आदि। और धम्मपद पहली ही पंक्ति में कहता है- मनोसेट्ठा मनोमया... यानि मन श्रेष्ठ है, स्वच्छ मन के वचन-कर्म का सुख कभी साथ न छोड़ने वाली छाया की तरह अनुगमन करता है।

Sunday, July 2, 2023

लाल साहब डॉ. इन्द्रजीत सिंह

04 फरवरी 2007 को लाल साहब डॉ. इन्द्रजीत सिंह की 101 वीं जयंती समारोह के अवसर पर डॉ. इन्द्रजीत सिंह स्मृति न्यास, अकलतरा, जिला-जांजगीर-चांपा, छत्तीसगढ़ द्वारा फोल्डर वितरित किया गया, जिसका लेख उदय प्रताप सिंह जी चंदेल ने तैयार किया था। अकलतरा उच्चतर माध्यमिक शाला, जो अब राजेन्द्र कुमार सिंह उच्चतर माध्यमिक शाला है, के प्राचार्य होने के नाते उस दौर में ‘प्रिसिपल साहब‘ उनके नाम का पर्याय था। शालेय पत्रिका ‘सलिला‘ में प्रतिवर्ष उनकी ‘प्राचार्य की लेखनी से - उ. सि. चंदेल‘ हम सबकी प्रेरणा का स्रोत होता था। स्कूल के बाद वे हमारे कोसा वाले कक्का थे।

बहुमुखी प्रतिभा और प्रभावशाली व्यक्तित्व के धनी इन्द्रजीत सिंह जी का जन्म अकलतरा के सुप्रसिद्ध सिसौदिया परिवार में 5 फरवरी 1906 को हुआ। आपकी प्रारंभिक शिक्षा और बाल्यकाल पिता राजा मनमोहन सिंह और माता श्रीमती कीर्तिबाई की स्नेह छाया में अकलतरा में हुई। माता-पिता के प्यार-दुलार में पले-बढ़े इकलौते पुत्र होने के कारण किशोर वय में ही आप परिणय सूत्र में बंध गए। 15 जनवरी 1920 को आपका विवाह ग्राम ठठारी के प्रतिष्ठित परिवार के श्री जबर सिंह की पुत्री शान्ती देवी से हो गया। आपकी ऊंचाई 6 फीट से अधिक, काया चुस्त और सुदर्शन थी।

1924 में आपने बिलासपुर से मैट्रिक की परीक्षा पास की। आगे की शिक्षा के लिए इलाहाबाद गए और फिर कलकत्ता जाकर प्रतिष्ठित रिपन कॉलेज में प्रवेश लिया। बंगाल हॉस्टल में रहते हुए 1931-32 में छात्रावास के अध्यक्ष रहे। स्नातक परीक्षा 1934 में पास की। कलकत्ता रहते हुए आपने बांग्ला के साथ संस्कृत और लैटिन भाषाएं सीखीं। इन शास्त्रीय भाषाओं पर आपको अच्छा अधिकार था, जो आपके शोध-लेखन में परिलक्षित होता है। छत्तीसगढ़ जनजातीय-लोक संस्कृति और आर्थिक व्यवस्थापन, आपकी विशेष रुचि का क्षेत्र था। कलकत्ता और फिर लखनऊ में अध्ययन करते हुए आपकी रुचि को मानों दिशा मिल गई। यही क्षेत्र आपकी उच्च शिक्षा का विषय बना।

लखनऊ विश्वविद्यालय से आपने अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त की और 1936 में वकालत की परीक्षा पास की। आगे पढ़ाई जारी रखते हुए ‘गोंड़ जनजाति के आर्थिक जीवन‘ को अपने शोध का विषय और गोंड़वाना पट्टी को, जिसके केन्द्र में ‘बस्तर’ था, अध्ययन क्षेत्र बनाया। आपका यह शोध कार्य देश के प्रसिद्ध अर्थशास्त्री डॉ. राधाकमल मुकर्जी व भारतीय मानव विज्ञान के पितामह डॉ. डी. एन. मजूमदार के मार्गदर्शन और सहयोग से पूर्ण हुआ तथा आपका शोध ‘द गोंडवाना एण्ड द गोंड्स‘ 1944 में प्रकाशित हुआ। गहरे और व्यापक शोध के निष्कर्ष अनुसार ‘जनजातीय समुदाय के उत्थान और विकास का कार्य ऐसे लोगों के हाथों होना चाहिए, जो उनके ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य और सामाजिक व्यवस्था को पूरी सहानुभूति सहित समझ सकें।‘

अपने प्रकाशन के समय से ही यह पुस्तक दक्षिण एशियाई मानविकी संदर्भ ग्रंथों में बस्तर-छत्तीसगढ़ तथा जनजातीय समाज के अध्ययन की दृष्टि से अत्यावश्यक महत्वपूर्ण ग्रंथ के रूप में प्रतिष्ठित है। शोध कार्य के दौरान क्षेत्र भ्रमण में अधिकतर फोटोग्राफी भी स्वयं करते थे। ‘इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ इंडिया‘ पत्रिका में इस ग्रन्थ की समीक्षा पूरे महत्व के साथ प्रकाशित हुई थी। चालीस के दशक में बस्तर अंचल में किया गया क्षेत्रीय कार्य न सिर्फ किसी छत्तीसगढ़ी, बल्कि किसी भारतीय द्वारा किया गया सबसे व्यापक कार्य माना गया है। इस दुरूह और महत्वपूर्ण कार्य के लिए आपको इग्लैण्ड की ‘रॉयल सोसाइटी‘ ने इकॉनॉमिक्स में ‘फेलोशिप‘ प्रदान किया।

वॉलीबाल, फुटबाल, हॉकी व टेनिस आपके पसंदीदा खेल थे। अवकाश के दिनों में अकलतरा में रहने के दौरान आप नियमित खेलों का अभ्यास करते थे, यही कारण था कि उस जमाने से अकलतरा जैसे कस्बे में खेल का माहौल रहा। आपका निशाना अचूक था और वन तथा वन्य प्राणियों के व्यवहार की सूक्ष्म समझ थी। हिंसक जंगली जानवरों के आतंक से छुटकारा पाने के लिए पीड़ित ग्रामवासी शिकार के लिए आपको आमंत्रित करते रहते। आपने दर्जनों बाघ, तेन्दुआ, भालू, मगर जैसे खूंखार जानवरों का शिकार किया।

राजनैतिक क्षेत्र में भी आप छात्र जीवन से ही सक्रिय थे। श्री रफी अहमद किदवई, श्री उमाशंकर दीक्षित आदि आपके सहपाठी थे। 1931 में लोकल काउंसिल के चुनाव में प्रत्याशी पिता राजा मनमोहन सिंह मुख्य संचालक रहे, इस चुनाव में राजा साहब लैण्ड होल्डर्स चुनाव क्षेत्र से विजयी हुए। चुनाव के दौरान दाऊ कल्याण सिंह से सहयोग मिला और यह आपसी सौहार्द सदैव बना रहा। कांग्रेस की तत्कालीन युवा पीढ़ी के संपर्क में आए और कांग्रेस सदस्यता ग्रहण की। 1936 के लखनऊ अधिवेशन में आप तथा श्री भुवन भास्कर सिंह, युवा सदस्य के रूप में शामिल हुए और 28 मार्च 1936 को पं. नेहरू ने महात्मा गांधी से आपकी 15 मिनट की अंतरंग मुलाकात कराई, यही वह पल था जहां वे गांधी जी से गहरे रूप से प्रभावित हुए फलस्वरूप सविनय अवज्ञा आंदोलन में विदेशी कपड़ा जलवा कर खादी का वितरण कराया। सक्रिय राजनीति में भाग लेते हुए आप डॉ. ज्वालाप्रसाद, ठाकुर प्यारेलाल सिंह व डॉ. खूबचन्द बघेल के सम्पर्क में आए। आप राजनीतिक और निजी संबंधों में सदैव तालमेल रखते थे। ‘हमारे छेदीलाल बैरिस्टर‘ पुस्तक में उल्लेख है कि- रिश्ते में बैरिस्टर साहब के भतीजे लाल साहब 1937 के चुनाव में उनके प्रतिद्वन्द्वी थे, लेकिन बैरिस्टर साहब जब जेल में थे, तब वे बराबर घर आते, सबका कुशल-क्षेम पूछते, वक्त-बेवक्त दवा आदि देकर सहायता करते।

आपके शोध के दौरान ही पिता राजा मनमोहन सिंह का देहावसान 1942 में हो गया। पैतृक सम्पत्ति की देखरेख के साथ ही सार्वजनिक जीवन में आपकी गतिविधियां बढ़ती गईं। मालगुजारी के वन क्षेत्र का व्यवस्थापन में आपकी विशेष रुचि थी। 1943 में एस. बी. आर. कॉलेज, बिलासपुर के संस्थापक उपाध्यक्ष बने। आगे चलकर अकलतरा में हाई स्कूल और बिलासपुर में क्षत्रिय छात्रावास की स्थापना के लिए सक्रिय रहे। आपके प्रयासों से 1950 में छत्तीसगढ़ अंचल में प्रथम विशाल क्षत्रिय महासभा का आयोजन हुआ। छत्तीसगढ़ के सहकारिता आंदोलन में आपका योगदान अविस्मरणीय है। आप बिलासपुर ‘सेन्ट्रल को-ऑपरेटिव बैंक‘ के आजीवन संचालक रहे। आपकी प्रेरणा और मार्गदर्शन से अकलतरा में बैंक की शाखा खुली, जिसके आप आजीवन अध्यक्ष रहे। ‘मल्टी-परपज सोसाइटी‘, अनंत आश्रम, मुलमुला के संस्थापक सचिव रहे। उच्च प्रतिष्ठा, कानून की डिग्री और न्यायप्रियता के कारण ‘ऑनरेरी मजिस्ट्रेट‘ मनोनीत होकर, कार्य करते हुए आपने पद की गरिमा बढ़ाई।

1947-48 में आपने इंग्लैण्ड सहित कई यूरोपीय देशों की यात्रा कर अनुभव का विशाल भण्डार साथ लाये। आपकी प्रतिभा और अनुभव को देखते हुए श्री द्वारिका प्रसाद मिश्रा ने आपको जांजगीर जनपद सभा का अध्यक्ष मनोनीत किया, इस पद पर आप आजीवन निर्विवाद बने रहे। यह कुशल प्रबंधन का परिणाम था कि आपकी मृत्यु के समय लोक कल्याणकारी कार्यों में अग्रणी रहने के बावजूद जनपद सभा, जांजगीर की जमा राशि लगभग दो लाख रूपये थी और यह मध्यप्रान्त की सुदृढ़ सभा थी। कृषि संबंधी जानकारी और प्रशासनिक योग्यता को देखते हुए 1949 में प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक डॉक्टर खानखोजे की अध्यक्षता में गठित ‘एग्रीकल्चरल पॉलिसी कमेटी‘ के आप सदस्य मनोनीत हुए और इसे सार्थक बनाया। आल इण्डिया रेडियो, नागपुर से कृषि, आंचलिक और जनजातीय विषयों पर आपकी वार्ताएं प्रसारित होती थीं।

छत्तीसगढ़ की पहचान, दिशा और अस्मिता के प्रति अपनी जिम्मेदारी सदैव महसूस करते रहे। कलकत्ता और लखनऊ प्रवास के दौरान अंग्रेजी अखबार ‘हितवाद‘ का नागपुर संस्करण डाक से मंगाकर पढ़ते तथा समकालीन, आंचलिक घटनाक्रम पर बराबर नजर रखते। छत्तीसगढ़ी में बातचीत करने में आप गर्व अनुभव करते थे। आपने सहृदयतावश छात्र जीवन में भी गुप्त रूप से छात्रों की पढ़ाई के लिए आर्थिक मदद पहुंचाई। जिसे आश्वासन दिया, उसे सदैव पूरा ही किया। स्पष्टवादी किन्तु सौम्य और संतुलित व्यवहार का ही प्रभाव था कि आपके निकट आये व्यक्ति सदैव आपके होकर रहे। आपके पुत्रों ने 1954 से आपकी स्मृति में लखनऊ विश्वविद्यालय में प्रतिवर्ष मानव शास्त्र में सर्वाधिक अंक पाने वाले छात्र के लिए स्वर्ण पदक की व्यवस्था की है।

आपके पुत्र राजेन्द्र कुमार सिंह, सत्येन्द्र कुमार सिंह तथा डॉ. बसंत कुमार सिंह ने अपने-अपने कार्य क्षेत्र में सक्रिय रह कर ख्याति अर्जित की। वर्तमान में पुत्री बीना देवी का निवास नरियरा में है और कनिष्ठ पुत्र धीरेन्द्र कुमार सिंह सामाजिक, शैक्षिक और राजनीतिक क्षेत्र में सक्रिय हैं।

धार्मिक और सामाजिक गतिविधियां आपके जीवन और कर्म के प्रमुख बिन्दु थे। प्रत्येक मंगलवार को व्रत और बरगवां के हनुमान जी की पूजा, आपका अटूट नियम रहा। अंचल के अनुष्ठानों में आपका योगदान अपूर्व रहता था। सांकर, कुटीघाट आदि स्थानों में आयोजित यज्ञों के प्रमुख व्यवस्थापक रहे। विक्रम संवत् 2000 समाप्त होने के उपलक्ष्य में रतनपुर में नियोजित श्री विष्णु महायज्ञ की स्थायी में समिति के आप उपाध्यक्ष थे। आपके साथ अन्य उपाध्यक्ष पं. सखाराम पंत, सेठ मोतीचंद, पं. सदाशिव रामकृष्ण शेंडे, श्री होरीलाल गुप्त तथा पं. बापूसाहब शास्त्री थे। शिवरीनारायण मंदिर और मठ से आपका सम्पर्क बराबर बना रहा, जिसका आधार मंदिर परिसर में स्थित पारिवारिक राम-जानकी मंदिर था। मठ के लिए परिवार द्वारा धर्मशाला बनवाकर अर्पित की गई। महंत लालदास जी और व्यवस्थापक श्री कौशल प्रसाद तिवारी को मठ-मंदिर की सभी गतिविधियों के लिए उदार और सक्रिय सहयोग दिया करते थे।

कार्य की व्यस्तता और लोक दायित्वों के प्रति गहरे समर्पण ने आपको शरीर के प्रति विरक्त बना दिया, इससे 1950 में हृदय रोग से पीड़ित हो गए। डाक्टरों द्वारा में विश्राम की सलाह के बावजूद निरन्तर जनकल्याण कार्यों में लगे रहे और प्रथम आम चुनाव के समय जिले का व्यापक दौरा किया। आपका स्वास्थ्य लगातार गिरता गया और 26 जनवरी 1952 को बिलासपुर ‘ऑफिसर्स क्लब‘ में अंतिम सांस ली। लाल साहब की पुण्य स्मृति को सादर नमन्।

पुनश्च-

इस लेख के साथ ‘पूरक जानकारी‘ के रूप में हस्तलिखित मसौदा ‘अतिरिक्त जानकारी जिसे उक्त लेख यथास्थान समाहित किया जावे’ टीप सहित मिला है, जो इस प्रकार है-

वे जितने लोकप्रिय- किसान, मजदूर, छोटे व्यापारी आदि में थे, उतने ही लोकप्रिय अधिकारियों और व्यवसायियों के बीच भी थे। जिले के कलेक्टर, पुलिस कप्तान और अन्य बड़े अफसरों से भी उनके नजदीकी संबंध थे। उस समय के जिलाधीश श्री एम. एस. चौधरी (जो आगे चल पुराने म.प्र. के मुख्य सचिव हो कर अवकाश ग्रहण किये) श्री पी.जी. घाटे, पुलिस कप्तान (जो आगे चल कर महाराष्ट्र से आइ. जी., पुलिस हो कर अवकाश ग्रहण किये), बिलासपुर थे। प्रसिद्ध ठेकेदार श्री चुन्नीलाल मेहता, नगर के प्रसिद्ध व्यवसायी सेठ बच्छराज बजाजआदि से उनके पारिवारिक संबंध रहे। सक्ती के राजा बहादुर लीलाधर सिंह और सारंगढ़ नरेश राजा जवाहिर सिंह तथा रायगढ़ नरेश राजा चक्रधर सिंह आदि, कई जमींदार (पंडरिया, कन्तेली, कोरबा आदि) उनके अभिन्न मित्रों में थे।

उनके इसी प्रतिभा, योग्यता और मिलनसारिता के कारण उन्हें बिलासपुर ऑफिसर्स क्लब की आजीवन सदस्यता प्रदान की गई थी, जो उस समय एक दुर्लभ और प्रतिष्ठापूर्ण बात थी। बिलासपुर शहर और जिले के इने गिने लोगों को यह गौरवपूर्ण सदस्यता प्राप्त थी।

वे बहुत अच्छे शिकारी भी थे। उनका निशाना अचूक हुआ करता था। परंतु यह उनका शौक था। उसे व्यवसाय नहीं बनाया वरन इसे लोक सेवा का माध्यम माना। उस समय बलौदा के आसपास घने जंगल हुआ करते थे। यहां सरकारी रिजर्व फारेस्ट हुआ करते थे। जैसे दल्हा, पहरिया, सोंठी, कटरा और आसपास की पहाड़ियां की पहाड़ियां भी जंगलों से आच्छादित रहते थे, जहां जंगली जानवर, शेर तेंदुआ, चीता, भालू, सुअर, हिरण आदि आदि काफी संख्या में रहते थे। ये जानवर कई बार जंगल के बीच के गांव आकर जान माल का नुकसान करते थे। पालतू जानवर और फसल का नुकसान आम करते या कभी-कभी ये खूंखार जानवर शेर, चीता, भालू आदि जन-धन की हानि उतारू हो जाते थे। ऐसे अवसर पर गांव वाले सम्मानपूर्वक उन्हें आमंत्रित कर ले जाते थे और वे वहां कैम्प कर खूंखार जानवरों के भय से उन्हें मुक्ति दिलाते थे। उनके रहते आसपास के जंगली गांव के लोग अपने को सुरक्षित पाते थे। कई बार सरकार की ओर से भी इन्हें खूंखार जानवरों के शिकार के लिए भेजा जाता था। इसी कारण बलौदा इलाके के अधिकांश बड़े गांवों के प्रमुख लोगों से मित्रता थी और कई लोगों से पारिवारिक संबंध थे।
(इसी तारतम्य में वैन इंजेन एंड वैन इंजेन का हवाला, जिसने घर में रखे जानवरों को सुरक्षित रखने के लिए तैयार किया है।)

उच्च शिक्षा और संस्कारित शिक्षा उनकी प्रथम प्राथमिकता थी और यही कारण रहा जब उनके ज्येष्ठ पुत्र राजेन्द्र कुमार सिंह (आगे चल कर कुमार साहब के नाम से प्रसिद्ध हुये) बिलासपुर के प्रसिद्ध गव्हर्नमेंट हाई स्कूल से मेट्रिक पास किए तो उन्हें एनी बेसेंट कॉलेज, बनारस भेजा गया। उच्च शिक्षा के लिए साथ ही साथ उन्होंने इलाके के शिक्षानुरागी लोगों को अपने परिचितों को भी उच्च शिक्षा के लिए बनारस भेजने के लिए प्रेरित किया। तदनुसार अकलतरा के कई प्रतिष्ठित परिवारों के लड़के तो गए ही, जिले के प्रसिद्ध मालगुजार श्री सुधाराम जी साव ने भी अपने पुत्रों को उच्च शिक्षा के लिये बनारस भेजा। यही नहीं सारंगढ़ के राजा जवाहिर सिंह ने भी इनकी प्रेरणा से अपने कई नजदीकी लोगों को इनके माध्यम से बनारस पढ़ने के लिये भेजा।

वे सही मायने में अर्थशास्त्री थे। वे केवल एम.ए. अर्थशास्त्र कर अर्थशास्त्र के शास्त्रीय ज्ञाता मात्र नहीं थे वरन उस ज्ञान को आपने व्यावहारिक जामा भी पहनाया था। वे अपने घरू आर्थिक स्थिति को चुस्त दुरुस्त तो किये ही, कई परिवारों को आर्थिक स्थिति सुधारने में मदद और मार्गदर्शन दिया। क्षेत्र के अच्छे अच्छे व्यापारी, ठेकेदार, बड़े किसान इनके मार्गदर्शन से लाभान्वित हुये थे। बम्बई, कलकत्ता की कई व्यावसायिक घरानों में इनकी अच्छी पकड़ थी।

जनपद सभा, जांजगीर के प्रथम अध्यक्ष तो थे ही। जनपद सभा वित्त समिति के अध्यक्ष भी थे। इन दोनों जिम्मेदारियों का निर्वहन आपने इतने लगन, निष्ठा और ईमानदारी से निर्वहन किया कि उस समय पूरे मध्यप्रदेश में जांजगीर जनपद सभा सबसे व्यवस्थित और मालदार, धनी संस्था थी। उनके निधन (1952) के समय जनपद सभा के खाते में 2 लाख रुपए जमा थे।

जीवन के अंतिम दिन तक भी वे समाज हित की सोचते रहे थे जिस दिन निधन हुआ उसी दिन सुबह की गाड़ी से सक्ती गये थे। उद्देश्य था राजा साहब सक्ती लीलाधर सिंह से मिल कर प्रेस खोलना, जहां से जन साधारण के लिये अखबार निकाला जा सके। हमेशा की भांति अकलतरा से डॉ. ज्वाला प्रसाद मिश्र, खास मित्र उनके साथ हो लिये थे। उन्हें शाम की गाड़ी से बिलासपुर लौटना था। जैसे इनकी सक्ती यात्रा और लौटने की जानकारी शहर (अकलतरा) में मिली, शाम को ट्रेन के समय अकलतरा रेल्वे स्टेशन में सैकड़ों कार्यकर्ता और शुभचिंतकों की भीड़ लग गई। जैसे गाड़ी सक्ती से आ कर प्लेटफार्म में रुकी, नारों से पूरा स्टेशन गूंज गया। लोगों की भीड़ देख कर उन्हें गाड़ी से उतरना पड़ा, सब लोगों से मिले। श्री सम्मत सिंह और ज्येष्ठ पुत्र राजेन्द्र कुमार सिंह से अलग अलग कुछ मंत्रणा की और अगले दिन बिलासपुर से लौटने की बात कह फिर गाड़ी में सवार हो गये। इन्हीं सब कारणों से उस दिन पैसिंजर गाड़ी भी करीब 10 मिनट प्लेटफार्म में खड़ी रही। उस दिन की भीड़ में लेखक लेखक भी वहीं मौजूद था, परंतु वहां उपस्थित लोगों को क्या मालूम था कि यह उनका अंतिम दर्शन था।

रात्रि के करीब 8-9 बजे बिलासपुर से टेलीफोन पर डाकखाने में (क्योंकि उस समय घरों में टेलीफोन की व्यवस्था नहीं थी) सूचना आई कि आफिसर्स क्लब में उन्हें दिल का दौरा आया। उस समय सिविल सर्जन डॉ. काले? भी उपस्थित थे पर उन्हें बचाया नहीं जा सका, उनका पार्थिव शरीर ठा. छेदीलाल बैरिस्टर के बिलासपुर स्थित बंगले में लाया जा रहा है। यह समाचार जंगल की आग की तरह पूरे अकलतरा शहर में फैल गया। जैसे ही मध्य रात्रि के बाद उनके मृत शरीर को अकलतरा लाया गया, सैकड़ों की संख्या में महिला पुरुष बच्चे उनके घर और उसके आसपास जमा थे। तिल रखने की जगह नहीं थी। जैसे तैसे उनके निष्प्राण शरीर को मोटर से उतारा गया। इसी दिन अंतिम विदा तथा क्षेत्र के सारे लोग अंतिम दर्शन व विदाई के लिए एकत्र हुये। और मृतक आत्मा को अंतिम श्रद्धांजलि अर्पित की। 

एक अन्य महत्वपूर्ण उल्लेख- श्री मुनि कान्तिसागर की पुस्तक ‘खण्डहरोंका वैभव‘ जून 1953 में प्रकाशित हुई। पुस्तक के पेज 345... से छत्तीसगढ़ का उल्लेख आरंभ होता है। इसमें उल्लेख है कि यहां आदि मानव व लोक शिल्प एवं ग्रामीण रुचि के प्राकृतिक-प्रतीक बहुत से मिलते हैं। इनमें पुरातत्व का इतिहास और मूर्तिकाल के बीज खोजे जा सकते हैं। इनके रहन-सहन और त्योहारों में जो सांस्कृतिक तत्व पाये जाते हैं उनका वैज्ञानिक अध्ययन अपेक्षित है। फादर एल्विन, व स्व. डा. इन्द्रजीत सिंह ने इस दिशा में कुछ प्रयत्न किया है। नृतत्व शास्त्रीय दृष्टि से भी इनकी उपयोगिता कम नहीं।

यहां आई जानकारियों और तथ्यों के मिलान के लिए पोस्ट अकलतरा के सितारे, लाल साहब और लाल साहब पुनः भी देख लेना चाहिए।

Tuesday, May 30, 2023

लाल साहब पुनः

शब्दों के अर्थ की ठीक समझ के लिए शब्दकोश से बाहर, आगे जाना होता है। भौतिक जगत के लिए जीव-वस्तुओं के साथ शब्दों का मेल-जोड़ बिठाना होता है तो मानवीय गुणों के लिए उसे व्यक्तियों के साथ जोड़ कर समझ बनती है। अपने बचपन की याद करते हुए मुझे लगता है कि पांडित्य, सदाचार और अनुशासन जैसे शब्द, पं. रामभरोसे शुक्ल जी और उनके परिवार के गोरेलाल जी, मुरारीलाल जी, मदनलाल जी, वेंकटेश जी के साथ मेरे लिए सार्थक होते हैं। डॉ. मदनलाल शुक्ला जी के साथ अन्यान्य कारणों से मेरा संपर्क उनके जीवन काल में बना रहा, उनका पिछला लेख और यह, उनके लिए मेरी श्रद्धांजलि भी है।
पं. रामभरोसे शुक्ल जी परिवार


अकलतरा वाले ठाकुर डॉ. इंद्रजीत सिंह (लाल साहब) का शतीय जन्म दिवस आज 

डॉ. इंद्रजीत सिंह: अद्भुत व्यक्ति, अद्वितीय व्यक्तित्व

■डॉ. मदनलाल शुक्ला 

स्वर्गीय ठाकुर डा. इंद्रजीत सिंह का जन्म 5 फरवरी 1906 बिलासपुर जिले के जांजगीर तहसील में स्थित ग्राम अकलतरा में हुआ था. उनके स्वर्गीय पिताजी राजा मनमोहन सिंह पच्चीस गांव के मालगुजार थे. उन दिनों मालगुजारों के निवास स्थान को ‘बखरी‘ कहते थे. गांव में दो बखरी थे- बड़ी बखरी, छोटी बखरी. ये दोनों परिवार इलाके में अपने जनकल्याण कार्यों के लिये प्रसिद्ध थे. उनकी ‘बखरी‘ बड़ी बखरी कहलाती थी. डा. इंद्रजीत सिंह की शिक्षा कलकत्ता विश्वविद्यालय में हुयी थी. विश्वविद्यालय से स्नातक की डिग्री लेने के उपरान्त इंद्रजीत सिंह लखनऊ विश्वविद्यालय चले गये. वहां एन्थ्रोपालाजी के विभागाध्यक्ष डा. मजूमदार के मार्गदर्शन में इनने तत्कालीन छत्तीसगढ़ के बैगाओं, आदिवासियों की जीवन शैली, रहन सहन को अपना विषय बनाकर पी एच डी. की उपाधि प्राप्त की. 
दैनिक ‘नवभारत‘, 5 दिसंबर 2006, मंगलवार, संपादकीय पृष्ठ की कतरन 

उनके व्यक्तित्व कृतित्व तथा उपलब्धियों का वर्णन निम्नानुसार है. 

उनका दैहिक व्यक्तित्व आकर्षक था. मृदुभाषी एवं सहृदयता के धनी ठाकुर साहेब पूरे क्षेत्र में अत्यंत लोकप्रिय थे. वे लाल साहेब के नाम से अपने परिवार जनों तथा जरुरतमंदों में जाने जाते थे. वे सहायता करने में इतने प्रवीण थे कि आम लोग उन्हें गरीबों का मसीहा कहते थे. स्वभाव से शालीन संवेदनशील तथा अहंकार विहीन व्यक्ति थे. उनकी व्यवहार कुशलता प्रसिद्ध थी. उनके चार पुत्र रत्न राजेंद्र कुमार (बड़े बाबू), संत कुमार, बसंत कुमार तथा धीरेंद्र कुमार एवं एक बहन बीना सिंह. इन चार भाइयों में से पहले तीन की मृत्यु हो चुकी है. अभी धीरेंद्र कुमार पूरे परिवार का भार सम्हाले हुए हैं. स्वर्गीय राजेंद्र कुमार के सुपुत्र भूतपूर्व डा. राकेश सिंह भूतपूर्व विधायक थे. अब वे अकलतरा में प्रेक्टिस करते हैं. लाल साहिब के मृदुभाषी होने का पारिवारिक गुण सब भाईयों में था. डा. राकेश भी सगाजसेवा और जन कल्याण के काम में लगे रहते हैं. धीरेंद्र कुमार सिंह बिलासपुर में रहते हैं तथा अपने स्व. पिता के नाम से ‘ठाकुर इंद्रजीत सिंह काम्पलेक्स‘ उच्च न्यायालय के सामने बनवाया है. उसमें शहर के वरिष्ठ अधिवक्तागण रह रहे है. स्व. संत कुमार सिंह के सुपुत्र राहुल सिंह उम्र 45 वर्ष स्थानीय पुरातत्व विभाग उप संचालक के पद पर कार्यरत है. 

मदनलाल शुक्ल जी के सुपुत्र
विनय शुक्ला जी
हमारे विभागीय संचालक रहे,
उनके हस्ताक्षर से जारी
मेरे परिचय पत्र की तस्वीर
स्व. लाल साहेब की आज भी उनके तीन प्रमुख उपलब्धियों के लिये स्मरण किया जाता है. प्रसिद्ध शिकारी, प्रथम श्रेणी के स्पोर्ट्समेन, तथा पर्यटन प्रेमी. अकलतरा गांव से तीन मील पर ‘कटघरी‘ गांव में उनके द्वारा एक बहुत बड़ा बगीचा बनवाया था. जिसमें देश के सभी प्रसिद्ध प्रकार के आम के वृक्ष लगे हुये हैं, दशहरी, चौसा, लंगड़ा आदि. अपने समय में लाल साहब उस बगीचे में ही अतिथिजनों का स्वागत करते थे. मनोरंजन के तौर पर कार-मिकेनिजम में वे माहिर थे, उस समय जर्मनी से मंगाया गया ‘हंसा‘ कार वे रखते थे तथा लोगों को उसमें बैठाकर क्षेत्र के रमणीय स्थानों पर ले जाते थे. पच्चीस गांव के मालगुजार होने के नाते वे ग्रामीण भाईयों को प्रेम करते थे, न्यायप्रिय थे तथा उनके पूरे इलाके में संतोष व्याप्त था. अकलतरा शहर के प्रसिद्ध हरिकीर्तनकर्ता पं. स्वर्गीय रामभरोसे शुक्ल से अत्यंत प्रभावित थे. उनके हरिकीर्तन सुनने के लिये हर जगह पहुंच जाते थे. श्रद्धा आस्था और निष्ठा के प्रेमी लाल साहिब सदैव स्मरण किये जायेंगे. 

लाल साहिब के गुण ग्राह्यता भी अपने किस्म की एक ही थी. स्व. पं. गोरेलाल शुक्ल पुत्र रामभरोसे शुक्ल ने सन् 1941 में नागपुर विश्वविद्यालय से बी.ए. आनर्स (अंग्रेजी) की डिग्री प्रथम श्रेणी में ली तथा उनकी प्रतिभा कितनी तीक्ष्ण थी कि एक वर्ष के ही अंदर वे असिस्टेंट प्रोफेसर अंग्रेजी हो गये. स्व. लाल साहिब इस अपूर्व सफलता से प्रभावित होकर गोरेलाल जी को स्वयं शाबासी देने आये थे तथा उनके सम्मान में उन्होंने एक भोज का भी आयोजन किया. हमारा शुक्ल परिवार सदैव उनका आभार मानेगा तथा शहर के पुराने लोग भी उनकी विशेषता को बताते रहते हैं. वैभव और शालीनता का अदभुत समन्वय. 

स्व. लाल साहिब राजनीति से दूर ही रहते थे. लेकिन संयोग की बात है कि सन् 1947 में हमारा देश स्वतंत्र हुआ. सन् 1950-51 में संविधान पारित हुआ और सन् 1952 में विधायिका के लिये प्रथम चुनाव ठा. लाल साहिब अकलतरा क्षेत्र के विधायक का चुनाव लड़े किंतु दुर्भाग्यवश वे उस चुनाव में पराजित हुये. इस पराजय को लाल साहिब बर्दाश्त नहीं कर पाये और सन् 52 में उनका 46 वर्ष में निधन हो गया. विनम्र श्रद्धांजलि. से.नि. सिविल 

सर्जन, पी- 38 क्रांति नगर, बिलासपुर.

Monday, May 29, 2023

लाल साहब

इंद्रजीत सिंह मेमोरियल ट्रस्ट, अकलतरा, जिला-जांजगीर चांपा की ‘स्मारिका‘ में प्रकाशित डॉ. मदन लाल शुक्ल का लेख यहां प्रस्तुत है, उनका एक अन्य लेख नवभारत समाचार पत्र में भी प्रकाशित हुआ था। 


लाल साहब को विनम्र श्रद्धांजली 

पाँच दिसम्बर 2006 को अकलतरा में रा. कु. सिंह उ.मा.शाला के सभाभवन में लाल साहब के जन्म शती समारोह का आयोजन हुआ। डॉ. इन्द्रजीत सिंह के कनिष्ठ पुत्र धीरेन्द्र कुमार के प्रयास स्वरुप यह आयोजन अत्यंत सफल रहा। आपस में सबका मेल जोल हुआ। अकलतरा गांव के सभी पुराने प्रबुद्ध वर्ग के लोग तथा डॉ. साहब के परिवार के उनके सभी बंधु बांधव उपस्थित हुये। समारोह की विशेषता यह थी कि छत्तीसगढ़ समाज के समस्त महिलाएँ भी उत्साह पूर्वक वहां पधारी तथा अनेक महिलाओं ने स्व. डॉ. साहब के व्यक्तित्व की प्रशंसा भी की तथा उन्हें उस जमाने के श्रेष्ठ मालगुजारों में गिनाया। मैं सन् 1933 में क्षेत्रीय मेरिट छात्रवृत्ति पाकर हाईस्कूल बिलासपुर चला गया था, सन् 1940 में प्रथम श्रेणी में मेट्रीकुलेशन की परीक्षा पास की। मेरी उम्र 18 वर्ष थी तब तक लाल साहब कलकत्ता विश्वविद्यालय से स्नातक होकर आ गये थे तथा उन्हें पी.एच.डी. की उपाधि भी मिल चुकी थी। समारोह के दिन उनके जीवन की उपलब्धियों को लेकर एक संक्षिप्त विवरणिका भी वितरित की गयी थी, जिसमें उनके जीवन की समस्त सफलताओं का उल्लेख है। वह छोटी पुस्तक स्वयं में सम्पूर्ण है। 


मेरी मान्यता के अनुसार लाल साहब एक बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी थे। वे अपने जमाने के प्रसिद्ध फुटबाल तथा टेनिस, व्हालीबाल के खिलाड़ी थे। इसीलिए अच्छे खिलाड़ियों से मिलकर वे बहुत प्रसन्न रहते थे। अक्सर ग्रीष्मकालीन अवकाश में जब हम सब सायंकाल खेल के मैदान में मिलते थे तो वे कहा करते थे कि मदनलाल न केवल प्रथम श्रेणी के विद्यार्थी है परन्तु अच्छे खिलाड़ी भी है, जो प्रायः नही होता। उनकी गुणग्राह्यता के कई उदाहरण है - सन् 1936 में मेरे अग्रज स्व. प्रोफेसर गोरेलाल शुक्ल ने मैट्रिक में पूरे प्रांत भर में हिन्दी विषय में विशिष्ट योग्यता प्राप्त थी। तत्कालीन कामता प्रसाद गुरु व्याकरणाचार्य ने गोरेलाल को पत्र लिखकर उन्हें शुभकामनाएं दी थी। लाल साहब को जब हमारे पिता जी ने यह पत्र दिखाया वे प्रसन्न हो गये और कहा कि गोरेलाल जी का भविष्य उज्जवल है। 1941 में गोरेलाल जी नागपुर विश्वविद्यालय के बी.ए. आनर्स अंग्रेजी प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुए। एक वर्ष के अंदर प्रोफेसर आफ अंग्रेजी नियुक्त हुये। इस समाचार को सुनते ही लाल साहब हमारे घर पधारे तथा हमारे पिता जी से कहा कि गोरेलाल जी ने पूरे गांव को गौरवान्वित किया है। लाल साहब ने हम सबों को भोज भी दिया। लाल साहब जितने वैभवशाली थे उतने ही सहृदय तथा संवेदनशील भी थे। वे करुणा व दया के कायल थे। लाल साहब हमारे पिता जी पंडित रामभरोसे शुक्ल से भी प्रभावित थे। उनका हरिकीर्तन सुनने वे प्रायः पहुँच जाते थे। कहा करते थे कि शुक्ल जी का परिवार अनुकरणीय है। बड़ा लड़का प्रोफेसर है तथा दूसरा शीघ्र डॉ. होने वाला है। हम सब लोगों के लिये दुःख का विषय यह रहा कि मात्र 46 वर्ष की उम्र में सन् 51 में उनका निधन हुआ। वे एक व्यक्ति नही थे वरन स्वयं में संस्था स्वरुप थे। उनके द्वारा संचालित कई जनकल्याण के कार्य अभी भी उस इलाके में चल रहे है। बड़ी श्रद्धा से उन्हें याद किया जाता है। 

लाल साहब शिकार के बहुत शौकीन थे। बड़े शिकार करने में उन्हें बहुत आनंद मिलता था। उनकी बैठक कमरा शेर, चीता, हिरण के खाल तथा सींग से सुसज्जित है। 

पर्यटन प्रेमी इतने थे कि पूरे देश एवं विदेश का भ्रमण उन्होंने कर लिया था। एक बार शिमला में ग्रीष्म ऋतु व्यतीत करने के बाद जब वे आये तो उनने वहां के फूलों के बगीचे की तारीफ की। तत्कालीन वायसराय ने अपने भवन के सामने वह अद्भुत बगीचा बनवाया था देश विदेश के सभी प्रकार के फूलों के पौधे वहां अभी भी देखे जा सकते है। वहीं से लौटने के बाद उनके अपने गांव ‘कटघरी‘ में फलों का बगीचा लगाया जिसमें सब तरह के आम, केला, संतरा पाइनेपल तथा बीज रहित खरवानी के पपीते के वृक्ष भी लगे थे। उनके यहां जो भी अतिथि आते थे- उन्हें वे फलों का बगीचा दिखाने जरुर ले जाया करते थे। वह एक बहुत ही आकर्षक ‘पिकनिक स्पॉट‘ था। 

उनकी दिनचर्या में प्रमुख हिस्सा था शाम को डॉ. ज्वाला प्रसाद मिश्रा के यहां बैठक जिसमें पं. रामभरोसे शुक्ल, श्री गजानंद प्रसाद गौरहा, मेऊ वाले तथा श्री कौशल प्रसाद तिवारी, शिवरीनारायण वाले रहते थे। उस बैठक में कभी कभी श्री पं. राधेश्याम वकील, लिमहा वाले भी आया करते थे। श्री राधेश्याम जी, विशेषर सिंह जी आदि कभी कभी संगीत की गोष्ठी किया करते थे। 

कहा जाता है कि जिसे तलवार नही जीत सकती उसे मधुर वाणी जीत लेती है। लाल साहब इस कथन की पुष्टि के प्रतीक थे। मीठी बोली, सरल, शालीन स्वभाव तथा विनम्रता उनके व्यक्तित्व के विशेष आकर्षण थे। 

ब्राम्हणों के प्रति श्रद्धा, धर्म में आस्था और निष्ठा के प्रेमी लाल साहब सदैव सबके हृदय में विराजित रहेंगे। विशेषकर अपने वृहद परिवार के सदस्यों के बीच। उनके इलाके में जितने भी किसान थे वे सदैव उनका गुणगान करते थे। उनकी निष्पक्षता, निर्भयता तथा न्यायप्रियता के सभी कायल थे। 

ईश्वर से प्रार्थना है कि उनके कनिष्ठ पुत्र धीरेन्द्र कुमार भी अपने पूज्य पिताजी के पद चिन्ह पर चलते हुए अपने पूज्य पिताजी का पितृ ऋण चुकाते रहेंगे। 

डॉ. मदन लाल शुक्ल, 
एम.बी.बी.एस., एम.एस. 
सेवा निवृत्त सिविल सर्जन 
क्रांतिनगर, बिलासपुर

Tuesday, October 11, 2022

संत बाबू - जाज्वल्या 2008

आंचलिक प्रकाशनों का अपना खास महत्व होता है, यथा- स्कूल-कॉलेज की वार्षिक पत्रिकाएं, कस्बा-नगर, व्यक्ति अथवा अवसर/आयोजन-विशेष पर संयोजित अंक। एक खासियत, इनकी कुछ-कुछ अनगढ़ता होती है। समय और संसाधनों की सीमा के साथ (अक्सर भारी-भरकम) संपादकीय टीम की समझ, रुचि और पक्षधरता का असर होता है। इन सबके बावजूद ऐसे प्रकाशन उन तथ्यों, जानकारियों, सूचनाओं, भावनाओं और अभिव्यक्ति का अमूल्य दस्तावेज होते हैं जो अन्यथा दुर्लभ हैं। इस क्रम में जिला- जांजगीर-चांपा से प्रति वर्ष आयोजित ‘जाज्वल्यदेव लोक महोत्सव एवं एग्रीटेक कृषि मेला‘ की स्मारिका ‘जाज्वल्या‘ का विशेष महत्व है।

जनगणना और गजेटियर के अंतराल में कई बार ऐसे प्रकाशन ही काम आते हैं। स्मारिका ‘जाज्वल्या‘, संभवतः छत्तीसगढ़ के किसी भी जिले से लंबे समय (2002) से प्रतिवर्ष प्रकाशित होने वाली एकमात्र स्मारिका है। ऐसी सामग्री को डिजिटाइज कर, वेब पर अपलोड किया जाना आवश्यक है। इस उद्देश्य की आंशिक पूर्ति की दृष्टि से यहां अर्थात इस ब्लॉग ‘सिंहावलोकन‘ पर, समय-समय पर ‘जाज्वल्या‘ के चयनित लेखों को प्रस्तुत करने की तैयारी है, इसी क्रम में मेरे पिता सत्येन्द्र कुमार सिंह जी पर रविन्द्र कुमार सिंह बैस का लेख। 

लेखक रविन्द्र जी, स्थानीय विभूतियों के महत्व को पहचानने और उनके अभिलेखन के लिए सदैव प्रयासरत रहते हैं। बुजुर्गों की सोहबत की मानों धुन है, उन्हें। अभिलेखन का उद्यम उन्होंने विकसित किया है, मगर संस्मरण की अनमोल वाचिक परंपरा उन्हें अपने पिता भद्दर डाक्टर के नाम से ख्यात, बलभद्र सिंह जी से मिली है। मैं याद कर पाता हूं कि इस लेख की तैयारी में रवि, लंबे समय तक घंटों, पिताजी के साथ, उनकी बातें सुनते बैठा करते थे। तब शायद ही उनके मन में कभी संस्मरण लिखने की बात रही हो, क्योंकि बुजुर्गों की बातों में डूबे रहना, मानों उनका शगल है और उनके संस्मरण सुनकर मैंने जाना है कि बुजुर्ग, खुलकर अपने अंतरंग प्रसंग उनसे कह-बोल लेते हैं, जैसे अपने अभिन्न मित्रों के साथ। यह रवि गुरु जी की शालीन गंभीरता है कि वे इन संस्मरणों को सुनाते हुए कुछ प्रसंगों को हल्के-फुल्के ढंग से बता दिया करते हैं, लेकिन लिखते हुए किसी कठोर संपादक की तरह अनुशासित रहते, जानकारी और सूचनाओं का सजग-सावधान चयन मर्यादापूर्वक करते हैं। रविन्द्र जी की सहमति से छपाई की कुछ अशुद्धियों को ठीक करते, आगे यह लेख-

व्यक्तित्व

निष्काम कर्मयोगी स्व. सत्येन्द्र कुमार सिंह (संत बाबू)

दूर हजारों की भीड़ में अलग एवं विशेष दिखने वाले, जिनकी ऊँचाई 6 3, गौरवर्ण, जिनकी भव्य एवं आकर्षक शारीरिक बनावट जो एकदम सरल, सहज, एवं निर्विवाद ‘जीनियस‘ हो। हम बातें कर रहे हैं, अकलतरा के प्रतिष्ठित एवं सुशिक्षित सिसोदिया परिवार में 17 फरवरी 1927 को पिता डॉ. इन्द्रजीत सिंह (लाल साहब) एवं माता शांति देवी के कोख से अवतरित हुये सत्येन्द्र कुमार सिंह जी। जिन्हें घर में संत, बाहर में संत महाराज एवं मित्रों के बीच सत्येंद्र, नाम से पुकारने थे। उनके अग्रज राजेन्द्र कुमार सिंह, अनुज डॉ. बसंत कुमार सिंह, श्री धीरेन्द्र कुमार सिंह (पूर्व विधायक एवं साडा अध्यक्ष, कोरबा) एवं बहन श्रीमती बीना देवी हैं। उनके पिता डॉ. इन्द्रजीत सिंह सी.पी. एंड बरार के पहले डॉक्टरेट मानवशास्त्री हुये, जिन्होंने बीहड़ बस्तर, अबूझमाड़ एवं सरगुजा में जाकर जनजातियों के जीवन पर, लखनऊ विश्वविद्यालय से शोध कार्य ‘द गोंड एंड द गोड़वाना‘ की रचना कर समूचे छत्तीसगढ़ का नाम रोशन किया।

नागपुर स्कूल से रिटायर्ड मास्टर शेख सुल्तान एवं नूर मोहम्मद से घर में ही शिक्षा पाये, पं. गुनाराम एवं अयोध्या दीक्षित के सानिध्य में उनकी प्रारंभिक शिक्षा उनके जन्म स्थान अकलतरा में सम्पन्न होने के पश्चात् आगे अध्ययन के लिये बिलासपुर रेलवे कालोनी स्थित यूरोपियन स्कूल में दाखिला लिया, तब यूरोपियन स्कूल केवल एंग्लो इंडियन बच्चों की पढ़ाई के लिये खुला था। उसमें भारतीय बच्चों के लिये भर्ती होना आसाधारण घटना थी। वहॉं बालक सत्येन्द्र कुमार सिंह को पढ़ने का अवसर मिला।

जहाँ अंग्रेजी, विज्ञान में विशेष दक्षता हासिल कर क्रिश्चियन शिक्षक स्टीफन टीडू के प्रिय पात्र बने रहे। हालांकि उनके कथनानुसार बाल्यकाल में उन्हें पढ़ने-लिखने की रुचि बिल्कुल नहीं थी। यूरोपियन स्कूल के बाद बिलासपुर नगर की सुप्रसिद्ध ‘मल्टीपरपस गौरमेंट हाईस्कूल‘ में इन्होने सन् 1947 में मैट्रिक की परीक्षा पास की। अध्ययन के दौरान बी.एन. डे एवं प्रख्यात शिक्षाविद् लाला दीनानाथ के कुशल एवं प्रभावी अध्यापन कौशल के वे कायल हो गये। सक्रिय खेलकूद गतिविधियों में हिस्सा लेकर वालीबाल के उदीयमान खिलाड़ी साबित हुये। गुजरे जमाने के बिलासपुर जिले में इनकी टीम का मुकाबला सिर्फ पुलिस टीम ही कर पाती थी। इनके बैच में प्रतिभाशाली सहपाठियों की भरमार थी। जबलपुर के ख्यातिप्राप्त अधिवक्ता श्री सतीशचंद्र दत्त, पूर्व कलेक्टर स्वरूपसिंह पोर्ते, पुरातत्वविद् डॉ. शंकर तिवारी, नेत्ररोग विशेषज्ञ, डॉ. आर.के. मिश्रा के अलावा अनेक विद्वान एवं बुद्धिजीवी इनके मित्र रहे हैं।

बिलासपुर से मेट्रिक उत्तीर्ण कर नागपुर के ख्यातिप्राप्त ‘विक्टोरिया कॉलेज आफ साइन्स‘ में प्रवेश लेकर, उच्च शिक्षा हेतु आगरा प्रस्थान हुए, जहाँ 1952 में बी. ए. और 1955 में अंग्रेजी साहित्य में एम.ए. की डिग्री ‘हीवेट हॉस्टल‘ में रहकर हासिल की। यहाँ अकलतरा के प्रख्यात जनप्रिय चिकित्सक डॉ. सी. बी. सिंह का उन्हें मार्गदर्शन मिला, पारिवारिक पृष्ठभूमि, शारीरिक आकर्षण, खेल, व्यवहार एवं कार्यशैली से प्राध्यापकों एवं सहपाठियों में वे काफी लोकप्रिय हुये।

1952 में पिता डॉ. इन्द्रजीत सिंह के निधन के बाद उनका अकलतरा में स्थायी रूप से रहना हुआ। 1953 में आशा देवी से इनका विवाह बनारस में हुआ, जो शादी के बाद फाइन आर्टस् एवं पेंटिंग्स में स्नातक हुई। 1956 में प्रथम पुत्र रत्न राजेश एवं तीन वर्ष पश्चात् द्वितीय पुत्र रत्न राहुल का जन्म, मिशन अस्पताल बिलासपुर में ऑपरेशन के फलस्वरूप हुआ। श्री राजेश सिंह चिंतक, विचारक एवं सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में सक्रिय हैं। श्री राहुल सिंह, छ.ग. शासन के संस्कृति विभाग में उपसंचालक (पुरातत्व) के पद पर रायपुर मुख्यालय में पदस्थ हैं।

सत्येन्द्र कुमार सिंह, अकलतरा एजुकेशन ट्रस्ट की रूपरेखा, सी.सी.आई. कारखाना के लिये पत्र व्यवहार एवं अन्य बौद्धिक विकास कार्य हेतु उनके हमउम्र राणा चितरंजन सिंह का मार्गदर्शन लेकर अनेक लोकहित के चुनौतीपूर्ण कार्य को अंजाम देकर आधुनिक अकलतरा की बुनियाद रखी। ट्रस्ट द्वारा स्थापित हाईस्कूल संयुक्त बिलासपुर जिले का ही नहीं वरन् समूचे छत्तीसगढ़ के अग्रणी शिक्षा केन्द्र के रूप में विख्यात हुआ।

वैसे तो वे सक्रिय राजनीति से दूर रहते थे, किन्तु जनता की मांग पर जरूरत पड़ने पर ग्राम पंचायत अकलतरा (1976) एवं जनपद पंचायत अकलतरा के अध्यक्ष (1978) निर्वाचित हुये। जिसे उन्होंने चुनौती के रूप में स्वीकार कर आदर्श स्थापित किये। उनके कार्यकाल का स्कूल भवन ग्राम अमलीपानी व कटघरी में देखने योग्य है। आज के पंचायत प्रतिनिधियों को उक्त दोनों ग्रामों क भवनों का अवलोकन कर उन्हें आत्मसात करने का प्रयत्न करना चाहिए। 

अकलतरा में बंगलादेशी शरणार्थियों के लिये भोजन, कपड़ा, स्नान, साबुन, सिंदूर, कुमकुम, चूड़ी यहॉ तक की कफन के लिये कपड़े, बच्चों के लिये फल एवं दूध की व्यवस्था अकलतरा के संवेदनशील नागरिकों ने राजेन्द्र कुमार सिंह एवं सत्येन्द्र कुमार सिंह के सहयोग से यह अद्भुत एवं अपूर्व मानवीय कार्यों को अंजाम दिया।

मानव सेवा सुश्रुषा को स्थायित्व प्रदान करने के लिये सत्येन्द्र कुमार सिंह ने ‘मानव कल्याण समिति‘ की स्थापना की थी। इस संस्था के माध्यम से लगभग 500 नेत्ररोग निदान एवं महिला रोग निदान शिविर आयोजित किया गया था। वे लायंस क्लब अकलतरा के संस्थापक थे। उनकी रुचि भ्रमण, ललितकला, पुरातत्व, ऐतिहासिक स्थलों, छत्तीसगढ़ के लोकजीवन एवं संस्कृति से उनका निकट का जीवंत संपर्क रहा। मशीनों से उनका विशेष अनुराग जग-जाहिर था। मोटर, प्रोजेक्टर, ग्रामोफोन, रेड़ियो, सायकल, गैसबत्ती, कैमरा अन्य इलेक्ट्रानिक उपकरणों में विशेष दक्षता हासिल थी। फोटोग्राफी एवं पत्रकरिता में उनकी दिलचस्पी सर्वविदित थी। सामयिकी ंएवं पशु-पक्षियों के बारे में उनकी लेखनी खूब धारदार थी जो जनजीवन को प्रभावित किये बिना नहीं रहती थी। उन्होंने बिलासपुर टाइम्स के स्थायी स्तंभ ‘तिराहे से‘ के लिये काफी कलम चलाई, वे दैनिक नवभारत एवं भास्कर में भी छपते रहे हैं।

सत्येन्द्र कुमार सिंह का निधन बिलासपुर में 13.07.1999 में हुआ था। अद्भुत स्मरणशक्ति के स्वामी महान चिंतक एवं विचारक सत्येन्द्र कुमार सिंह, गीता के निष्काम कर्मयोग के सिद्धांत को जिये, नेपथ्य में रहकर नींव का पत्थर बनकर कर्तव्य के पथ पर चलने वालों के लिये उनका सारा जीवन अनुकरणीय है।

रविन्द्र कुमार सिंह बैस
पोस्ट - अकलतरा (आजाद चौक)
जिला - जॉजगीर चांपा

Wednesday, December 22, 2021

रामः मूर्त और अमूर्त

‘छत्तीसगढ़ में रामः मूर्त और अमूर्त स्वरूप‘ राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन संस्कृति विभाग, छत्तीसगढ़ शासन द्वारा 5 से 7 फरवरी 2021 को किया गया था। संगोष्ठी के साथ श्रीराम यात्रा स्थलों की छायाचित्र प्रदर्शनी, रामनामी भजन तथा रामकथा के प्रसंगों की सांस्कृतिक प्रस्तुति के साथ स्थल भ्रमण का कार्यक्रम हुआ। शनिवार, 6 फरवरी के एक अकादमिक सत्र का दायित्व मुझे सौंपा गया, उस अवसर पर अध्यक्षीय वक्तव्य के रूप में कही गई बातें, मुख्यतः रिकार्डिंग तथा अपने नोट्स और स्मृति के आधार पर संशोधित कर यहां प्रस्तुत है-

राम-राम, जय जोहार। आप सबसे दुआ सलाम होती रही है, लेकिन औपचारिक तौर पर माइक्रोफोन पर आकर अब फिर से एक बार राम-राम। ‘राम वन-गमन पथ’ जिसकी बात आज यहां हो रही थी, राज्य में हो रही है, हम यहां प्रदर्शनी में देख रहे हैं और संगोष्ठी का विषय भी है- राम: मूर्त और अमूर्त। यहीं से अपनी बात शुरू करता हूं। दरअसल राम के मूर्त और अमूर्त दोनों पक्षों के बीच अगर हम कोई समन्वय देख पाते हैं, उसे देख पाने का, समन्वय का, महसूस कर पाने का ही, यह आयोजन है। कई शोध-पत्रों में, और उनमें आई बहुत सारी जानकारियों से स्पष्ट हो रहा है कि यह राम के नाम का ही प्रभाव है कि यहां पढ़े जा रहे परचों में शोध तो है ही लेकिन साथ-साथ उसमें अपनी अमूर्त-आस्था की बात भी कही गई है।

इस सत्र के संयोजक डॉ. ब्रजकिशोर प्रसाद, तथा प्रतिवेदक डॉ. रामकिंकर पाण्डेय का अभिवादन करते हुए, शैलेश कुमार मिश्रा जी का अंगरेजी परचा, जिसमें छत्तीसगढ़ की संस्कृति में भगवान श्री राम और रामकोठी की चर्चा हो रही थी, रामकोठी के बारे में बहुत सारी जानकारियां आई हैं और यह हमारे लिए गौरव का विषय है कि यह सामुदायिक सहकारिता की व्यवस्था है, बैंकिंग की, ऋण की व्यवस्था है, वह राम के नाम पर पारंपरिक रूप में छत्तीसगढ़ में अभी भी विभिन्न स्थानों में है। ललित शर्मा जी ने शुभ्रा रजक जी के साथ, छत्तीसगढ़ के रामनामी पंथ को रामभक्ति की पराकाष्ठा निरूपित करते हुए बहुत विस्तार से बातें रखीं। उनके परचे पर एक दो बात कहना चाहूंगा कि रामनामियों पर बहुत गंभीर शोध हुए हैं, जिनमें खासकर, एक शोध हुआ था, अमेरिकी शोधार्थी थे, डॉ. लैम्ब, उन्होंने अपना नाम बदलकर रामदास कर लिया था डॉ. रामदास लैम्ब। ‘रैप्ट इन द नेम: द रामनामीज, रामनाम एण्ड अनटचेबल रिलीजन इन सेन्ट्रल इंडिया‘ नामक उनकी पुस्तक है। दूसरी शोधार्थी दक्षिण भारतीय महिला हैं, जो भोपाल में रहती थी और अब इंग्लैंड में हैं सुन्दरी अनीथा, उनका भी रामनामियों पर शोधकार्य है- डॉमिनेंट टेक्स्ट्स, सबआल्टर्न परफारमेंसेजः टू टेलिंग्स आफ द रामायण इन सेंट्रल इंडिया। रामनामियों पर ये दो पुराने काम बहुत महत्वपूर्ण हैं और अब भी अध्ययन-प्रलेखन हो रहा है, फिल्म्स डिवीजन ने वृत्त-चित्र तैयार कराया है, इस विशिष्ट परंपरा का, हमारी धरोहर का, इस तरह सम्मान, यह सब आवश्यक और बहुत महत्वपूर्ण है।

पीयूष कुमार पाण्डेय जी ने छत्तीसगढ़ में राम और जनजातीय समाज की चर्चा, सरगुजा के संदर्भ में की है। आज ही मैं याद कर रहा था, समरबहादुर सिंह जी की बहुत प्रसिद्ध पुस्तक है ‘सरगुजा एक अध्ययन’, उन्होंने सरगुजिया रामायण पर भी गंभीर काम किया है। रामकथा पर सरगुजा में और भी काम इस तरह के हुए हैं। चंद्रशेखर शर्मा जी ने छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति में राम के व्यापक संदर्भों को रेखांकित किया। अयोध्या शोध संस्थान के निदेशक आदरणीय योगेन्द्र प्रताप सिंह जी, तथा संजीब कुमार सिंह जी, डा. रामवतार शर्मा जी यहां हैं, जिनकी सार्थक भागीदारी से इस आयोजन की गरिमा बढ़ी है।

कुछ बातें संक्षेप में कहूंगा। राम के नाम पर जितनी बातें होती हैं, ‘बौद्धिक विमर्श‘ होते हैं, राम की सत्ता, वन-गमन पथ, उसकी ऐतिहासिकता आदि के संबंध में, उसके लिए एक बात याद आती है कि, यूं बड़े हल्केपन से कहा जाता था उस चुटकुले का मर्म मुझे बहुत बाद में समझ में आया। एक मरीज आपरेशन थियेटर में है, आपरेशन होता है और डाक्टर कहता है ‘ओह गॉड, सारी, ही इज नो मोर‘ और अपना छुरा, चाकू, कैंची, छोड़़कर, दस्ताने उतार कर, बाहर जाने लगता है। सिस्टर सब सामान इकट्ठा करने लगती है, मरीज कहता है कि सिस्टर मैं अभी जिंदा हूं। सिस्टर उससे कहती है ‘चुप रहो तुम डाक्टर से ज्यादा जानते हो क्या?‘ दरअसल हम उस युग में जी रहे हैं। ‘उस युग में जी रहे हैं‘ का आशय था कि, मैं किसी का नाम नहीं लूंगा, संदर्भ बार-बार आपके सामने आते होंगे, जाति प्रमाण-पत्र, जन्म प्रमाण-पत्र, मृत्यु प्रमाण-पत्र के अभाव में किसी तरह से किसी व्यक्ति के होने का अस्तित्व नकार या स्वीकार करने की स्थिति बन जाती है और वह विवादित हो जाता है। हमारे अब के समकालीन साथ के लोगों में जिनको हम जन्मना जान रहे हैं, उनकी जाति उनका जन्म, विवादित हो जाता है। फिर यह, यानि राम वन-गमन पथ, राम की ऐतिहासिकता, तो सदियों पुरानी बात है, उसका कभी मूर्त होना अब हमारी सामूहिक चेतना में अमूर्त सुरक्षित है। हमारी आस्था, हमारी परंपरा और हमारे विश्वास से संपृक्त।

मेरे सामने एक अवसर आया पासपोर्ट बनाने का, आवश्यक दस्तावेजों की सूची मिली, उसमें जन्म प्रमाण-पत्र भी था, मेरा जन्म प्रमाण-पत्र था नहीं, मैं घबरा गया, अब क्या करूंगा, मेरा अस्तित्त्व ही नहीं, ऐसी पासपोर्ट वाली दुनिया में। फिर ध्यान गया, कोई ‘कट आफ डेट‘ थी कि अगर अमुक सन के पहले पैदा हुए हों तो स्कूल के प्रमाण-पत्र में दर्ज जन्मतिथि से काम हो जाएगा, तब जाकर राहत हुई। हम इस युग में जी रहे हैं, जब राम की बात करते हैं तब वह बीती हुई, भूतकाल की बात है और भूतकाल की बात अनुमान होती है, वहां सिर्फ दस्तावेज और इतिहास के भरोसे नहीं, बहुत कुछ आस्था से चलता है। आप यहां जिस आधार पर आमंत्रित किये गये उस नस्ती पर जिसने दस्तखत किए, जिसके कारण आदेश जारी हुआ, वे इस विभाग के संचालक हैं। जब आपको आमंत्रण पहुंचा, हो सकता है कि आप नाम से परिचित हों, लेकिन शायद ही जानते हों, कि हस्ताक्षरकर्ता पदाधिकारी वास्तव में कौन है? और सोचिए उस अनजान के दस्तखत के भरोसे आप यहां पधारे। दुनिया इसी तरह चलती है। एक दूसरे के विश्वास के आधार पर। पूरा का पूरा एक नक्शा बन जाता है, कागज पर, एक प्लान, एलिवेशन बन जाता है, और वही मूर्त रूप लेता है, किसी भवन का, किसी मंदिर का। मूर्त और अमूर्त की आवाजाही, अभेद।

राम के बारे में एक प्रसंग रोचक लगता है। डा. के.पी. वर्मा जी के परचे का संदर्भ ले रहा हूं, शंभू यादव जी ने भी प्रकाश डाला था। विष्णु के दशावतार प्रतिमाओं की चर्चा थी। दशावतारों में, सातवें राम हैं। मूर्ति शिल्प में कई बार बलराम एक लिंक-संयोजक पात्र हैं। वे देवकी और रोहिणी के भी संयोजक हैं। एक में गर्भ, जन्म कहीं और। एक जगह वो सहोदर हैं एक जगह सयोनिज हैं। वे जिस तरह दो मांओं को आपस में जोड़ते हैं, उसी तरह कृष्ण और राम को भी जोड़ते हैं। विकास क्रम की बात ध्यान करा रहा हूँ, कहा जाता है परशुराम, सभ्यता के उस चरण के हैं जो आखेट का, आखेटजीवी युग था, परशु ले कर चलते हैं, शिकारी मानव के प्रतिनिधि हैं, जो गुफावासी मानव था। जब मानव सभ्यता मुख्यतः शिकार पर आश्रित थी। उसके बाद धनुर्धारी राम आते हैं, शिकार वे भी कर रहे हैं, लेकिन परशु वाला आदिम शिकार नहीं, धनुष-बाण से शिकार कर रहे हैं। वे कृष्ण से जुड़ते हैं, कृष्ण गो-पालक हैं, राम और कृष्ण, दोनों के बीच हलधारी, हलधर बलराम हैं। इस तरह परशुराम, राम और बलराम तीनों के नाम में राम तो हैं ही लेकिन कृष्ण और राम के बीच यानि धनुर्धारी शिकारी, और गोपालक के बीच, हलधारी कृषक बलराम इनमें संयोज्य, देखा जा सकता है। यों लक्ष्मण और बलराम दोनों, शेषावतार ही हैं।

एक और बात। हास्यास्पद लगने वाला विवाद होता है, कोई कथा ऐसी आई जो प्रचलित स्थापनाओं से कुछ अलग है, तो कहा जाता है कि बदमाशी है उस जर्मन मैक्समूलर की, आकर उसने सब वेद-शास्त्रों की तबाही कर दी, सब सत्व निकाल लिया। हमारे धर्म-ग्रंथ फिरंगियों के हाथ में पड़े, और उन लोगों ने गड़बड़ कर दी। लेकिन कथाओं का भिन्न पाठ गीता प्रेस के संस्करण में भी हो, तब बात बनाई जाती है, वह तो क्षेपक है। हम अपनी उदार परंपरा के विपरीत, अपनी मान्यता, अपनी धारणा से अलग किसी बात को स्वीकार करने में कई बार बहुत संकीर्ण होने लगते हैं। ए. के. रामानुजन बड़े अध्येता हैं शास्त्रों के, उनकी प्रसिद्ध पुस्तक, वस्तुतः एक छोटा सा शोध-पत्र है ‘थ्री हंड्रेड रामायणाज ...’। इसी तरह फादर कामिल बुल्के, यानि बाबा बुल्के का रामकथा पर शोध है, उस काम के आधार पर 300 रामायणों की बात कही जाती है, वैसे रामायण और रामकथा उससे भी अधिक हैं,‘रामायन सत कोटि अपारा‘। इनमें अलग-अलग कथा-क्रम और कथा का विन्यास, विकास है, अलग-अलग मान्यताएं हैं, जो क्षेपक मान ली जाती हैं वह भी कम रोचक, कम महत्वपूर्ण नहीं है, कम आस्था पैदा करने वाली नहीं है, वह भी कम रसमय नहीं हैं, इसलिए राम को कोई भी मन, उसे उतनी ही आसानी से स्वीकार कर सकता है, रम सकता है, अड़चन रूढ़िग्रस्त को ही हो सकती है, उदारचेता को नहीं।

दूसरी छोटी सी बात, हम पंचक्रोशी यात्रा की बात करते हैं। आज सुबह राकेश चतुर्वेदी जी ने की, वे ‘राम वन-गमन पथ‘ के चप्पे-चप्पे से परिचित हैं। उन्होंने सिल्क रूट की चर्चा की है, उस मार्ग पर की जाने वाली यात्रा या पंचक्रोशी यात्रा है, ठीक उसी तरह ‘राम वन-गमन पथ‘ है, वह भी वैसी ही यात्रा है। मराठी मित्र बताते हैं कि शिवाजी ने जो पन्हालगढ़ यात्रा की थी, उस विशाल गढ़ की यात्रा पर आज भी अनुकरण करते हुए लोग जातेे हैं और उस काल का स्मरण कर रोमांचित होते हैं, गौरव-बोध होता है, आनंद लेते हैं। पंचक्रोशी या ‘राम वन-गमन पथ‘ जैसे निर्धारित पथों पर चलना, ठीक वैसे ही उस पावन जातीय-स्मृति को जीना है।

राम वनगमन पथ, शिवरीनारायण
के राम-जानकी मंदिर में लगा शिलालेख

एक आखरी बात जो इस तरह के विवादों, कथाओं और काल निर्धारण को ले कर, वर्मा जी के परचे के संदर्भ में कहना चाहूंगा कि सीतामढ़ी गुफा में माना जाता है कि सीता ने विश्राम किया था, तो फिर इतिहास वालों को थोड़ी परेशानी होती है। आस्था है कि ऐसा हुआ था, फिर इसमें काल का विवाद अनावश्यक है। सीतामढ़ी का निर्माण काल 8वीं शताब्दी है, और उसी गुफा में सीता आई थीं, मतलब 8वीं शताब्दी के बाद? फिर तो इतिहास कालक्रम सीता का काल 8वीं सदी के बाद का हुआ। मगर कहें कि सीता किसी काल में यहां आई थीं, उनकी स्मृति में यह गुफा बनाई गई, तब तो कोई समस्या नहीं होगी, अन्यथा इतिहास की बात आती है और तब आस्था के साथ उसका घालमेल नासमझी होगी। कई बार ऐसा संकीर्ण दृष्टि के कारण होता है। उसके निराकरण के लिए, जो कुछ मैंने पढ़ाई की है, उसमें वासुदेव शरण अग्रवाल का उल्लेख करते अपनी बात पूरी करता हूँ। वासुदेव शरण अग्रवाल ने कहा है- ‘पुराण-निर्माता सुधी जनों ने भी वैदिक तत्वों को ही लोकोपकार के लिए अनेक तरह से कथा और गल्पों का आश्रय लेकर वर्णित किया है, . . . कितनी ही कथाएं श्रुतिवर्णित रहस्यों के विस्तार-मात्र हैं‘ मुख्य बात अब यहां आती है ‘साधारण लोग कथा में ही भटके रहते हैं, एक वे हैं, जो कथाओं को सत्य मानते हुये भी अनेक तत्व को नहीं जानते, दूसरे वे हैं जो तत्व को न देखते हुए कथाओं को असत्य मानते हैं, दोनों की बात एक सी है। ज्ञानी जन कथा से ऊपर उठकर इसके रहस्य को समझते हैं, और अनेक भांति से मूल सिद्धांत को ही पल्लवित देख आनंदित होते हैं।

मैं मानता हूं कि आप सभी के मन में वही आनंद, रस-संचार हो, धन्यवाद।