‘पं. श्यामलाल चतुर्वेदी स्मृति ग्रंथ‘ में शामिल मेरा लेख, यहां आंशिक परिवर्धन के सहित प्रस्तुत-
उजले ‘श्याम‘
स्नेह-वात्सल्य को शब्दों में अभिव्यक्त कर पाना असंभव जैसा, मेरे बूते का नहीं, और इसे संभव बनाने का प्रयास भी दुष्कर होता। साथ ही यह भी समस्या थी कि पंडित श्यामलाल चतुर्वेदी जी के अभिनन्दन ग्रंथ सहित उन पर इतना कुछ लिखा-छपा है, उससे अलग क्या ही कुछ लिख सकूंगा। मगर भाई सूर्यकांत जी का आग्रह बना रहा, वही संबल बना। मैंने पहले अपनी यह सीमा बताई, बात न बनी तो फिर कुछ समय चाहा, उन्होंने समय दे दिया, समय-सीमा तक पहुंचने तक मन ही मन आदरणीय पंडित श्यामलाल चतुर्वेदी जी को लगभग प्रतिदिन स्मृति-श्रद्धा-सुमन अर्पित करता रहा, मगर कुछ भी न लिख पाया। फिर से समय-सीमा पूछा, जवाब चारों खाने चित्त कर देने वाला था, भाईजी ने कहा- आपके लिए कोई समय-सीमा नहीं है, हमारी समय-सीमा आपका लेख आ जाने तक है। इस पर मैंने पुनः उस दिवंगत पुण्य आत्मा का स्मरण किया कि ‘तुम्हीं ने दर्द दिया है, तुम्हीं दवा देना‘, और ‘तेरा तुझको सौंपता‘ भाव से यह जो टूटी-फूटी है, उसमें पंडितजी के प्रति मेरी भावना का अंश झलक सकेगा मानते, समर्पित है।
कुछ घर ऐसे होते हैं, जहां आप अकारण भी जाना चाहते हैं, जा सकते हैं, मगर लौटते हैं कुछ हासिल के साथ, समृद्ध हो कर। बिलासपुर का घसियापारा, जो अब राजेंद्र नगर था और बृहस्पति बाजार के बीच, तिलकनगर के पिछवाड़े का एक घर, जो कुटी या आश्रम सा जान पड़ता, यों नजरअंदाज हो जाए, मगर जो इससे परिचित, उसके लिए अगल-बगल ओझल रहे, इसी पर नजर टिके, इसी का आकर्षण हो, यही पंडित श्यामलाल चतुर्वेदी जी का निवास था। मेरे गृहग्राम अकलतरा के पड़ोसी कोटमी निवासी पंडितजी उन दिनों राजेन्द्रनगर स्थित हमारे दफ्तर के पड़ोसी थे। हमें जब भी अवसर होता, उनके सान्निध्य पाने इस ‘गुरुकुल‘ पहुंच जाते, और सदैव ‘बिन मांगे मोती‘ पा कर लौटते।
सच्चे राष्ट्रवादी पंडितजी को अक्सर लोग दलगत संकीर्णता में सीमित कर देखते हैं, जबकि आजादी की लड़ाई के दौरान चरखा, तकली चलाने वाले गांधीवादी आप कांग्रेस के सदस्य बनाने के लिए सक्रिय रहते थे। व्यक्तिगत सत्याग्रह में जेल जाने के लिए दरखास्त भी दिया था, मगर आवेदन उनके नाबालिग होने के कारण नापास कर दिया गया, यह बताते हुए मुस्कुरा कर कहते ‘सेनानी हो गए होते हम‘। गीत याद करते थे- ‘घर-बार छोड़ कर के जाएंगे जेलखाना, ये डर नहीं है हमको खाएंगे जेल खाना, जिस जेल में महाप्रभु श्रीकृष्णचंद्र जन्मे, मेरे लिए तो प्यारा मंदिर जेलखाना।‘ बाद में देश के विभाजन के दौरान संघ के संपर्क में आए औैर प्रचारकों का त्याग, समर्पण आपके लिए प्रेरक बना, उन तपस्वियों का संस्कार मिला। इसी तरह आजादी के बाद विनोबाजी के भूदान यज्ञ से जुड़ गए। गांव-गांव घूमते, पत्रकारिता के लिए समाचार भी इकट्ठा करते।
कर्मवीर के लिए पहला समाचार ही क्रांतिकारी सुर का था। वे बताते कि गांव के मालगुजार के लिए उन्होंने आवेदन लिखा, उसने प्रयत्न किया, उसे शक्कर मिट्टी तेल का लाइसेंस मिल गया। आपने उससे कहा कि अब इसमें अमीर-गरीब का भेद न करना सबको बराबरी का मानते सामान देना। उस मालगुजार का आतंकी बेटा मनमानी करने लगा, घटनाक्रम कुछ ऐसा हुआ कि आपका उसके खिलाफ लिखा समाचार छपा, उसका लाइसेंस निरस्त हो गया। वे याद करते थे कि बिलासपुर में रहते हुए उन्हीं के शब्दों में अपने ‘झगड़ालू गांव‘ के निर्विरोध सरपंच बन गए। गांव में असहयोग का माहौल बना कर ‘शराब भट्ठी‘ को हटवाया। अपने ही घर के सामने बने चबूतरे को हटवा कर गांव वालों से बेजा-कब्जा हटाने की अपील की। उनका ग्राम पंचायत, गांधी शताब्दी वर्ष 1969 में बिलासपुर संभाग का सर्वश्रेष्ठ पंचायत घोषित हुआ था। कोटमी सोनार अब क्रोकोडायल पार्क के लिए मशहूर है। गांव के जलाशयों में मगर पुराने समय से बसते रहे हैं। निस्तारी तालाबों में भी रहते थे, जहां लोग सहज नहाना-धोना करते थे। मगर गांव में किसी को इन जीवों से नुकसान दुर्लभ रहा है, इससे संबंधित घटनाएं वे रोचक ढंग से सुनाते थे कि किस तरह नहाते हुए व्यक्ति से लट्ठ की तरह बहता आया मगर टकरा जाता था और लोग उसे धक्का दे कर स्नान जारी रखते थे या गरमी में एक तालाब से दूसरे तालाब जाते हुए मगर को खातू वाले गड़हा, गाड़ा में डाल कर पानी वाले तालाब में छोड़ आते थे।
अकलतरा की रामलीला, शिवरीनारायण के नाटक और नरियरा की कृष्णलीला पर उनकी प्रेरणा और उनके द्वारा दी गई जानकारियों के आधार पर उन स्थानों में जा कर और लोगों से संपर्क कर मैंने ‘तीन रंगमंच‘ लेख तैयार किया और उसकी प्रति उन्हें ले जा कर दी, जिसे देखकर प्रसन्न हुए और आशीर्वाद दिया। नरियरा की कृष्णलीला नाटकों में ब्राह्मण को ही कृष्ण बनाते थे। वे बाल-कृष्ण का रूप धरते थे। उनकी मां तालाब में नहाने जाती थीं, तो गांव वाले कहते ‘भगवान के दाई आए हे‘। संभर-पखर जाने पर आखिर में मुकुट लगता। इसके बाद ‘प्राण प्रतिष्ठा‘ मान ली जाती थी, तब कृष्ण बने आपको, ईश्वर-स्वरूप मानते मंच पर आने के पहले जमीन पर पैर रखने नहीं दिया जाता था, कोई न कोई गोद में उठाए रहता था। ऐसे ही संस्कार उन्हें बचपन से मिलते रहे, और संभवतः उनके भीतर का आत्मबल, यही से आया धार्मिक-आध्यात्मिक भाव था। संत-महात्माओं का सत्संग का कोई अवसर नहीं चूकते। हमारे घर मां पूर्णप्रज्ञा का आगमन होता, तब उनकी नियमित उपस्थिति होती थी।
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| सन उन्नीस सौ तीसादि दशक का नरियरा लीला संबंधित चित्र |
फिल्म ‘थ्री ईडियट्स‘ के चतुर रामलिंगम के ‘चमत्कारी, धन‘ वाले भाषण के साथ मुझे आपसे जुड़ा एक प्रसंग याद आया था, जो साधूलाल गुप्ता बताते थे। बिलासपुर में होली के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में संभाग के कमिश्नर ‘संभागायुक्त‘ आमंत्रित थे। आपने अपनी बात शुरू करते हुए उन्हें संबोधित करते हुए ‘भा‘, ‘भो‘ हो गया। बस, फिर क्या, पूरा माहौल में होलियाना लहर में बहने लगी। एक प्रसंग बिलासपुर से खरौद-शिवरीनारायण जाते हुए, रास्ते में पामगढ़ बस स्टैंड पर का सुनाते थे। चाय पीने रुके, बेंच पर बैठे थे। एक युवा आया और उनसे उपहास करते कहा ‘नेताजी, थोड़ा सरको।‘ आपने उससे कहा कि भाई! तुमने मुझे नेताजी क्यों कहा?, उसने कहा ‘ड्रेस से तो तुम नेता दिख रहे हो, बस इतना सुनना था कि पंडितजी ने कहा और तुम अपने पहनावे से मुझे लफूट लग रहे हो, तो क्या मैं तुम्हें लफूट जी कहूं?
आपकी प्रसिद्ध कविता ‘बेटी के बिदा‘ के लिए मान लिया जाता है कि उनके मन में ये भाव अपनी बेटी को विदा करते हुए आए होंगे, जबकि जैसा वे बताते, अपनी शादी के बाद विदा होने के दौरान गांव-घरवालों की व्यथा को देख कर एकबारगी तो उन्हें ऐसा लगा कि पत्नी को छोड़कर ही वापस लौट जाएं और फिर वहीं इस कविता के भाव पैदा हुए थे। खुद मजे लेते बताते थे कि विवाह के समय पत्नी पांचवी पास थीं और आप पांचवी। धुन लगी और प्राइवेट परीक्षाएं पास करते हुए एम.ए. की परीक्षा तक पहुंचे। पाठ्यक्रम में आपकी ही कविता थी, जिस पर प्रश्न पूछा गया था, अपनी ही कविता पर पूछे गए प्रश्न का उत्तर लिख कर परीक्षा पास करने की संभवतः यह अकेली घटना है।
एक प्रसंग उन्होंने बताया था। लोचनप्रसाद पांडेय बिलासपुर से रायगढ़ जा रहे थे। रेलगाड़ी पर से रास्ते में उनका ध्यान विशिष्ट आकृति की ओर गया, उन्होंने किसी सहयात्री से गुजर रहे गांव का नाम पूछ लिया। रायगढ़ पहुंचकर उन्होंने एक पोस्टकार्ड लिखा, कि जयरामनगर और अकलतरा स्टेशन के बीच लीलागर नदी के पुल के बाद बायीं ओर मिट्टी का टीला दिखाई पड़ता है, इसके बारे जानकारी चाहिए। पत्र, श्री पटवारी जी (या सरपंच जी) संबोधित, पता लिखा था। उलझन भरे इस पते-संबोधन वाला पत्र, आपके पास ही पहुंचना था, पोस्टमैन पत्र उन तक छोड़ गया। पत्र का जवाब लिखने के बजाय आपने स्वयं लोचनप्रसाद जी से मुलाकात की और मिट्टी के परकोटे वाले गढ़ तथा गांव के पुरातात्विक अवशेषों की जानकारी से अवगत कराया। संभव है यह पोस्टकार्ड अब भी सुरक्षित हो।
आपने लोचनप्रसाद जी के निधन पर 1 दिसंबर 1957 को ‘नई दुनिया में श्रद्धांजलि-लेख लिखा था, जिसका अंश इस प्रकार है- ‘यदि श्रद्धेय पाण्यडेजी की अपूरणीय क्षति से हम धरोहर के समुचित सदुपयोग सीख सकें, अपनी सामाजिक जिम्मेदारी पूर्ण करने की दिशा में ईमानदारी से प्रयत्न कर सकें, अपनी अकर्मण्यता छिपाने के लिए कार्यक्षमता के कांधे पर न चढ़ें, साहित्यिक राजनीतिज्ञ से श्रेष्ठ होता है यह सही मायने में आचरण से कर दिखा सकें, तो यह विश्वास किया जा सकता है कि स्वर्गीय पाण्डेय के नेह-लोचन का कृपा-प्रसाद हम अदृष्ट से पाते रहेंगे।‘ अब हम यही बात पं. श्यामलाल जी के लिए भी लागू हो सकती हैं।
वे संपर्क में आए लोगों के संस्मरण और उसे अभिव्यक्त करने की उनकी शैली लाजवाब थी। ‘बड़े के संग म खावय बीरा पान‘ शीर्षक से, मेरे पितामह इंद्रजीत सिंह जी के लिए उन्होंने लिखा था, जिसका एक अंश इस प्रकार है- जिनके प्रति आदर का स्थायी भाव बरसों से हो और संयोगवश उसे अभिव्यक्त करने का अवसर यदि प्राप्त हो जाये तो हर्षित होकर उसका निर्वाह करना कौन नहीं चाहेगा ? ऐसा ही एक सुअवसर मुझे मिला है और मैं अकलतरा के राजा साहब स्वर्गीय मनमोहन सिंह जी के सुपुत्र डॉक्टर इन्द्रजीत सिंह जी की जन्म शताब्दी पर अपने खयालातों की खतौनी कर रहा हूँ।
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लाल साहब ख्याति के खैरख्वाह नहीं थे किन्तु अत्यन्त परिश्रम से छत्तीसगढ़ के वनाँचलों में जाकर समय और सम्पत्ति की आहुति देकर उन्होंने जो ‘गोड़ जनजाति के आर्थिक जीवन‘ को लेकर अंग्रेजी में ‘गोड़वाना एण्ड द गोंड्स‘ शीर्षक से शोध ग्रंथ का प्रणयन किया, वह लाल साहब की समाज को अनमोल देन है। विश्व के ख्यातनाम अर्थशस्त्री डॉ. राधा कमल मुखर्जी एवं डाँ. डी.एन. मजुमदार इनके मार्गदर्शक थे। यह ग्रंथ सन् 1944 में प्रकाशित हुआ था। पुस्तक का समापन कुछ इस तरह से है - ‘जनजातीय समुदाय के उत्थान और विकास के कार्य ऐसे लोगों के हाथों होना चाहिए जो उनके ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य और सामाजिक व्यवस्था को पूरी सहानुभूति सहित समझ सके।‘ बीसवीं सदी के (तीसरे-) चौथे दशक के बीच बस्तर अंचल मेएक छत्तीसगढ़ी राजकुमार का शोध कार्य अभूतपूर्व है।'
मीर अली मीर की प्रसिद्ध कविता है ‘नंदा जाही‘, संभवतः यह कविता पंडितजी के विचारों से प्रेरित है, वे बार-बार दुहराया करते थे कि ‘छत्तीसगढ़ी के शब्द नंदावत हे‘। मुझे हमेशा यह लगता था कि छत्तीसगढ़ी में बोली का लोच-लालित्य, लिखते हुए सीमित होने लगता है, उसके रस-प्राण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, ऐसी बात कह कर आलोचना का पात्र भी बन चुका हूं। मगर एक बार पंडितजी के विचार सुनने का अवसर मिला, जिसमें उन्होंने कहा कि ‘मोर एक अलग तरह के बिचार हे, छत्तीसगढ़ी हर लिखे के नोहय, बोले के, अतका लुदरू हे, लिखा-पढ़ी म आइस, तब ले खोखा म बंद होत जात हे।‘ इसके साथ उनका स्पष्ट मत होता था कि बोलचाल में छत्तीसगढ़ी बनी रहे, यह बहुत जरूरी है। वे जैसी छत्तीसगढ़ी बोलते थे, वह स्वयं में इसका सबसे प्रबल प्रमाण है। अब छत्तीसगढ़ी के मानकीकरण और विविधता पर विचार करते हुए यह ध्यान रखना चाहिए कि भाषा-बोली, अभिव्यक्ति का कोई माध्यम हो, बोली का लोच, उसका सौंदर्य होता है न कि सीमा। छत्तीसगढ़ी का बोलीपन बने रहने की कीमत पर ही उसका भाषा बन जाना मंजूर किया जा सकता है। किसी जबान का बोलीपन खो जाए तो यह भाषा, मानक भाषा, राजभाषा, आठवीं अनुसूची में शामिल होने की सार्थकता पर प्रश्न चिह्न होगा।
2004 में दैनिक हरिभूमि, बिलासपुर में जगन्नाथ प्रसाद ‘भानु‘ की पुण्यतिथि पर मेरा लेख छपा। मुलाकात होने पर उन्होंने पूछा कि भानु जी की छत्तीसगढ़ी रचना ‘खुसरा चिरई के बिहाव‘ के बारे में मुझे कहां से पता चला। आगे उन्होंने ध्यान आकृष्ट कराया कि इसी नाम की रचना खरौद निवासी पं. कपिलनाथ मिश्र की भी है। मुझे याद आया कि मैंने यह पुस्तक शिवरीनारायण के मेले में बिकते देखी थी, तब इसके रचनाकार की ओर मेरा ध्यान नहीं गया था। पंडितजी ने कहा कि भानु जी की इस रचना के बारे में उन्होंने भी सुना है, मगर देखा नहीं है और निर्देश दिया कि पता करने की कोशिश करना। बाद में कपिलनाथ जी वाली पुस्तक तो मिल गई, मगर भानु जी वाली अब तक नहीं मिली है।
छत्तीसगढ़ हिन्दी साहित्य सम्मेलन का त्रैमासिक पत्र ‘क्षितिज‘ के सम्पादक मण्डल में प्यारेलाल गुप्त, गजानन शर्मा, शिवनारायण जौहरी और द्वारिकाप्रसाद ‘विप्र‘ के साथ आप भी थे। इस त्रैमासिक पत्र का प्रथम अंक चैत्र-वैशाख-ज्येष्ठ सं. 2017 वि. (सन 1960) में उनकी यह छत्तीसगढ़ी कविता छपी थी।
कुटेमहा घटा सो
(असामयिक बादल के प्रति.)
- श्यामलाल चतुर्वेदी ‘श्याम‘
बादर! झनि आ झनि आ। अभी तैं झनि आरे! झनि आ।
हमर साल भर के मेहनत हर, बाहिर बगरे हावै।
तोर रंग के एक झलक म, पोटा हमर (माई पोटा) सुखावै।।
सावन भादों के हे देवता! झन रावन बन जा तैं।
हांथ जोर के पांव परत हन, हमला अभी बँचा तैं।।
बिजली कस तोर दांत दिखय, गरजना सहीं तोर हांसी।
आवा जाही देख सहीं, लगथे का बदे हे फांसी।।
छिन छिन हवै अमोल बखत ये, फुरसत (फुरसुत) नहीं मरे के।
पाल पोंस के तहीं बनाये (बढ़ोये), पांव परी मुंड़ टेंके।।
अपन हाँथ म बना के कुरिया, आगी झनिच (झन तो आगी) लगा।
बादर झनि आ झनि आ।।
तैं हमार जिवराखन देंवतन मा तैं ( ) बड़का भारी।
झन करबे मसखरी झींक के भात परोसे थारी।।
जाही जीव अजाहे सिरतोन करे कुँदे जर जाही।
जुड़ जुड़ पानी चिटको परही, करपा हर (ह) सर जाही।
तोर जुड़ास अगिन होही, तै चिटको तो पतिआ।
(तोर जुड़ास जिनगी जुड़वाही मर जाबो, पतिआ)
बादर झनि आ झनि आ।।
पन पिआस के प्यास बुतोइया (बुतोइय्या), पिरथी के रंगरेजवा।
नेवता देके ठग देइस का सोर तोर सो भेजवा।।
(धोखा देइस का? कोनो हर, सोर तोर सो भेजवा)
दगा कोनो के सगा नहीं, जा झटकुन सोर सुनादे।
(दगा कोनो के सगा नहीं, सोरिहा ल सफा सुनादे)
इहां ठाढ़ हो दुख झन दे, जा काम अपन निपटादे।।
(तरी उपर चल रहे साँस ला, तिरिआके, थिरिया दे।।)
नेवता ले असाढ़ सावन के, जा झन बेर पहा।।
(नेवता ले असाढ़ सावन के, जा तो झन गर्रा।।)
हूल बरोबर लगय सुनत तोर, थोर को हिही हहा।।
तोर गाना सुन प्रान सुखाथे, रोना के संग मरना।
सबले अच्छा होही अभी, ईंहां ले तोरेच टरना।।
(ऊपर की ये दो पंक्तियां नहीं हैं।)
तैं परमारथ करके अपने, हांथ ले लूट नंगा झन।
(परमारथ कर अपने हाँथे, झन तो लूट, नँगा झन)
अपने पोंसे लइकन मन बर फोक्कट अभी जंगा झन।।
(ऊपर की यह पंक्ति भी नहीं है।)
एक के करे अकाइस तेला झन तो (तैं) एक बना।।
बादर झनि आ झनि आ।
नोहन हम सिरि क्रिस्न के संगी न तो बिरिज रहवइया (रहवइय्या)।
इन्द्र रजा के हम असरोइया (असरोइय्या), गउ किरिया रे भइया (भइय्या)।
जियेन सगर दिन तुहर पुन्न मा (दया मा), तुंहर भरोसा जीबो।
तुंहरे पुन मा चिटिक मिटिक पा, पसिया पानी पीबो।।
(चिटिक मिटिक पा जाबो तब तौ, पसिया पानी पीबो।।)
कुछ कसूर करे हन तौ कह फोकटे झन डेरुआ।
(कुछू कसूर करे हन तौ कह थपरा दे घनि आ।)
बादर झनि आ झनि आ।
चार महीना के तोर मेहनत (मेहनत हर), छिन मा चरपट होही।
हमला अजम कसम से हावै, तै नोहस निरमोही।।
अतक (अतेक) बड़े पानी के राजा, आइस बिना बलाये।
सुनिहीं (सुनही) तउने छि छि (छि! छि!) करहीं, येमा मंजा का आये।।
टेम टेम म बने लागथे, गारी घलो ल गा (खा)।
(‘तैं लहुट लहुट घर जा‘ यह पंक्ति अतिरिक्त है।)
बादर झनि आ झनि आ।।
यही ‘कुटेमहा घटा सो‘ शीर्षक कविता 2007 में प्रकाशित उनके काव्य संग्रह ‘पर्रा भर लाई‘ के नवम् संस्करण में ‘बादर झनि आ झनि आ‘ शीर्षक से शामिल है। यहां इसके रचना काल या पूर्व प्रकाशन का संदर्भ नहीं है। बाद के प्रकाशन में कविता के कुछ शब्द बदल गए हैं, जो ऊपर कोष्ठक में इंगित हैं। इसीसे संबंधित कुछ अन्य बातें। ‘क्षितिज‘ के संपादक मंडल में होने की उल्लेख उन्होंने आलोक शुक्ल के साक्षात्कार में किया है, अन्यथा इसकी जानकारी सामान्यतः नहीं मिलती थी। संयोग कि मुझे डॉ. सुशील त्रिवेदी जी के संग्रह में यह अंक देखने को मिल गया। एक अन्य बात की ओर मेरा ध्यान गया, जिसकी चर्चा न के बराबर होती है कि ‘क्षितिज‘ में प्रकाशित इस कविता के साथ उनका उपनाम ‘श्याम‘ आया है।
इस कविता के लिए मुकुटधर पांडेय ने श्रीधर पाठक की पंक्ति ‘उलटि जाहु धन अबही बिनवत हे घनश्याम‘ को याद किया था। मुझे याद आया कि पुरानी फिल्म ‘शिकस्त‘ में लता मंगेशकर का गाया मधुर गीत है- कारे बदरा तू न जा, न जा। इसके विपरीत यहां कहा गया है बादर झनि आ, झनि आ। किसान के लिए ऐसे बेमौसम बादल को बरजता ही है, क्योंकि ‘कुंवरहा घाम अलकर, अउ कातिक के पानी‘। पकी पकाई फसल पर पानी फिरने का अंदेशा जो होता है। मेरे लिए उनकी यह कविता वैदिक देवता पर्जन्य की स्तुति का आभास देने वाली है। इस कविता में समय के साथ शब्दो-अंशों में परिवर्तन की विवेचना और कविता की व्याख्या, छत्तीसगढ़ी के लोक-मन के साथ पंडितजी के कवि-मन का उजागर कर सकती है, संभव है शोधार्थियों का ध्यान इस ओर गया हो।
छत्तीसगढ़ की संस्कृति नीति, विभागीय पत्रिका ‘बिहनिया‘ के नामकरण में आपकी प्रमुख भूमिका रही और छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के प्रथम अध्यक्ष नियुक्त हुए। आयोग के वर्तमान स्वरूप की नींव उन्होंने डाली थी। यद्यपि ‘सरकारी‘ कार्यप्रणाली और स्थितियों से खिन्न हो जाते थे। आपने आयोग के सचिव पद के लिए मुझसे कहा। मेरे यह कहने पर कि इस महत्वपूर्ण पद के लिए मुझसे अधिक योग्य और उपयुक्त लोग हैं, राजी नहीं हुए। इस पर मैंने फिर निवेदन किया कि सचिव पद का काम अन्य भी कर सकते हैं मगर पुरातत्व के क्षेत्र में काम करने वालों की कमी है, इस तर्क पर आसानी से सहमत हो गए। भाषा, संस्कृति और पुरातत्व से छत्तीसगढ़ का गौरव और महिमामंडन सदैव उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता में रहा।
- राहुल कुमार सिंह
प्रमुख, धरोहर परियोजना,
बायोडायवर्सिटी एक्सप्लोरेशन एंड रिसर्च सेंटर



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