Wednesday, March 11, 2026

आहोपुरुषिका

आहोपुरुषिका- वह पात्र, अपने पुरुष होने का भान हो, जिसके होने से।

‘आइने की आँख ही कुछ कम न थी मेरे लिए।
जाने अब क्या-क्या दिखाएगा तुम्हारा देखना।।‘ और फिर
‘तुम निहारती रहीं मुझमें अपने को ... ... और फिर सामने से हट गयीँ शायद तुम्हारा सिँगार पूरा हो गया।।‘
सरसरी तौर पर विधुर-वियोग के विषाद का संगीत जान पड़ने वाली वागीश शुक्ल की किताब ‘आहोपुरुषिका‘, देख रहा हूं। नागरी लिपि में छपी, हिंदी! की किताब। कविताएं, व्याख्या सहित फिर भी दुरूह, संदर्भमय व्याख्या भी कविता की तरह और कभी कविता व्याख्या जैसी। 

मेरे लिए किताबें अक्सर दुश्मन की तरह होती हैं, अकर्मण्य बनाने वाली, समय और व्यय साध्य। मगर ऐसे दुश्मन से भिड़ने का उत्साह अब तक बना हुआ है। शुरु करता हूं, उसे खारिज करने के इरादे से। किताब लुभाती नहीं, बल्कि जूझने के लिए उकसाती है और पढ़ ली जा सकी तो धीरे-धीरे असर करने लगती है। अंततः, यह मेरे लिए, मेरी दुश्मन-किताबों के खिलाफ खड़ी किताब है, क्योंकि इसमें लेखन और किताबीकरण का फर्क बताया गया है- ‘वाचिकता का टंकण नहीँ, उसका जडीभवन‘(131)। अब्राहमीय मजहब को किताबी मजहब कहा गया है(132)। हमारे यहाँ श्रुति - वेद - अपौरुषेय वाक् ग्रन्थ नहीँ है, चेतन है - ग्रन्थ पौरुषेय वाक् का लिपीकरण है(183)। रामायण और महाभारत में वाल्मीकि और व्यास स्वयं पात्र हैं, क्योंकि भारतीय काव्य-वास्तु में कविता कवि मेँ आयत्त है किन्तु कवि भी कविता मेँ आयत्त है(218)। ... ये गहने-कपड़े, ये आवाज़ेँ, उस वाणी का लिपीकरण हैँ ... असूझ-अबूझ वाक् के सूझ-बूझ में बदलने का यही राज रहस्य है(220-221)। वाणी लिपितनु, अर्थात् लिपि वाणी का शरीर है(222) 

/यहां और आगे भी ( )- ऐसे कोष्ठक के अंदर आई संख्या पुस्तक के पेज का क्रमांक है/ 

किताब में प्रवेश आसान नहीं है, ऐसा क्यों? देखिए- पत्नी इन्दुमती के साथ सत्ता-त्यत्ता, जन्म-मृत्यु?, शरीर का अस्तित्व में आना और शरीर त्याग? मानों किताब पढ़ते चौकन्ना बने रहने का सुझाव है। पुस्तक शुरू ही होती है ‘बक रहा हूँ जुनूँ में क्या कुछ के साथ, मानों पाठक को मन कड़ा रखने को तैयार किया जा रहा है। लेखक के शब्दों में ‘जिसे एक झंझा-लेख कहा जा सकता है। और फिर आगे- ‘कुछ न समझे, खुदा करे, कोई‘ मगर इसके भी पहले है- ‘समागम मेँ (में नहीं) प्रेक्षण‘ का एक शीर्षक है- ‘तेरे बेडरूम में देवता का क्या काम है?‘ तक पहुंचती है, तो लगता है यहां बतर्ज ‘मेरे अंगने में ... के आगे की कोई बात है। 

प्रवेश के लिए किताब-परिचय के दो उद्धरण- अशोक वाजपेयी ने ‘प्रियाहीन पुरुष‘ शीर्षक भूमिका का आरंभ पुस्तक के एक अंश-कविता ‘प्रियाहीन डरपते-बिलखते-फफकते-कलपते-बिलपते-तड़पते...(58-59) से किया है, बताते हैं कि किताब का ‘आरंभिक अंश वागीश जी द्वारा लिखी गई कविताओं उनकी संदर्भ-व्याख्या का है। ... ... दूसरा बड़ा हिस्सा विवाह-सूक्तों के अनुवाद, उनकी पृष्ठभूमि का विवेचन आदि है।‘ उन्होंने इसे अनोखी और अद्वितीय पुस्तक कहा है, इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती और इसके लिए कम से कम इतना तो हर कोई भी कहेगा। यों किताब में सनातन की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया गया है कि अनूठा तो वही हुआ, जो निष्प्रतियोगी है, (जो अवधारणा ही हो सकती है।) ‘कोई दूसरा ‘धर्म‘ नहीं है जिसे दिखा कर आप समझ सकें कि सनातन धर्म इस धर्म से भिन्न है।(140- 141) पहला खंड उनकी 44 कविताएं, व्याख्या सहित हैं। दूसरा खंड विवाह-सूक्त है, जिसके पांच बिंदुओं में 4 ऋग्वेद दशम मण्डल, सूक्त 85 और 5 अथर्व-वेद, काण्ड 14 का प्रथम और द्वितीय अनुवाक है। 

मृदुला गर्ग ने फ्लैप पर लिखा है- ‘आहोपुरुषिका की विषाद की झंझा उसका एक तिहाई हिस्सा है। बाकी दो तिहाई में, विवाह सूक्त का शास्त्र सम्मत और अत्यंत विद्वत्तापूर्ण विवेचन है।‘ इस परिचय का अंतिम वाक्य है- ‘शायद इसीलिए परम स्थिति वह है जब पति पत्नी में अभेद हो।‘ यह पुस्तक के मर्म का संकेत है।

किताब की बेतरतीब सी लगने वाली बातों में तारतम्य-सूत्र आसानी से नहीं पकड़ सका, मगर किताब उलटते-पलटते सूत्र बना- कन्या‘दान‘(141-44), जिस दान के आशय को कभी ‘दान-व‘ से समझने का प्रयास किया था। ऋग्वेद दशम मंडल के एक ऋषि भिक्षु हैं, धन-अन्न दान को भिक्षा के साथ जोड़ते यह भी कहते हैं- ‘एक उदार मन वाला पुरुष, धन कम होने पर भी अधिक दान दे सकता है, क्योंकि दान का संबंध हृदय की विशालता से है‘, आदि। इसी तरह अन्यत्र यद्यपि शास्त्रों में दान की विस्तृत चर्चा है, मगर पी.वी काणे के ‘धर्मशास्त्र का इतिहास‘ में कन्यादान का उल्लेख नहीं है। वहां ‘प्रतिग्रह‘ शब्द के विशिष्ट अर्थ की चर्चा है, साथ ही ‘याग‘ और ‘होम‘ को दान से अलग बताते हुए कहा गया है कि- ‘स्वस्वत्वनिवृत्तिः परस्वत्वापादनं...‘, ‘दान में किसी दूसरे को अपनी वस्तु का स्वामी बना दिया जाता है।‘ श्रीमद्भगवद्गीता 4/24 ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविः में या ज्यों 17/22 की स्वामी अपूर्वानन्द टीका में व्याख्या में कहते हैं- ‘दान के पात्र ब्रह्म हैं और दाता भी ब्रह्मस्वरूप या भगवान का अंश है।‘ गीता 17/20 में दान को ‘अनुपकारिणे‘ यानि बदले में कुछ पाने की अपेक्षारहित, बताया गया है। जैसा कि कविता-33 की व्याख्या में कन्यादान के लिए आया है- ‘देनेवाला और लेनेवाला दोनोँ ही नर नहीँ हैँ ... इस नाते देनेवाले का दाता होने का दर्प और लेनेवाले का प्रतिग्रहदोष, दोनोँ ही नहीँ रहते। तब कविता-38 का अर्थ खुलने में मदद होती है- ... ‘खाली मेँ खाली भर दो तो/खाली ही होता है भरपूर/जैसे/पूर्ण में से पूर्ण निकालो तो पूर्ण ही रहता है बाक़ी।।

यहां कन्यादान का रामकथा का एक प्रसंग स्मरणीय है। डोंगरे महाराज की कथा में- पाणिग्रहण पर राम को ‘प्रतिगृह्णामि‘ कहने को कहा जाता है, राम वैसा ही कहते हैं किंतु लक्ष्मण को ‘प्रतिगृह्णामि‘ बोलने को कहा जाता है तो उन्हें मौज सूझती है, वे सोचते हैं कि मंगलाष्टक हो गया है, कन्या का हाथ मेरे हाथ में आ गया है, क्यों न थोड़ा हठ करूं, और कहते हैं कि प्रतिगृह्णामि तो ब्राह्मण बोलते हैं, जो दान लिया करते हैं, हम क्षत्रिय दान लेते नहीं, दान दिया करते हैं ‘प्रतिगृह्यताम‘ बोला करते हैं। उन्हें समझाया जाता है कि तुम्हारे बड़े भाई ने भी तो प्रतिगृह्णामि कहा है। इस पर लक्ष्मण कहते हैं कि वे तो भोले हैं, उन्हें जैसा कहा गया उन्होंने किया। बात अड़ गई वशिष्ठ के मनाने पर भी लक्ष्मण राजी नहीं हुए। तब विश्वामित्र ने उन्हें समझाया कि चाहे मंगलाष्टक हो गया हो, प्रतिगृह्णामि नहीं बोलोगे तब तक लग्न पक्की नहीं मानी जाएगी, तब कहीं जा कर लक्ष्मण मानते हैं।

प्यासे राहगीर को पानी पिलाने के लिए गर्मियों में प्याऊ बनाए जाते हैं। छोटा सा घेरा, जिसमें पानी के घड़ों के साथ व्यक्ति होता है, छोटी सी खिड़की से पनाली निकली होती है, इससे पानी पीने वाला, पिलाने वाले को और पिलाने वाला, पीने वाले को नहीं देख-पहचान पाता। माना जाता है, तभी पानी पिलाना ‘दान‘ का पुण्य-लाभ होगा, आदि। नाम-रूप का लोप। 

एक और सूत्र मिला, जहां ईशावास्योपनिषद् का नवें मंत्र का उल्लेख है- ‘जो अविद्या की उपासना करते हैँ वे अँधेरे मे पड़ते हैँ, जो विद्या की उपासना करते हैँ, वे और भी गहरे अँधेरे मे पड़ते हैँ‘(87)। परा-अपरा में झूलते हुए कभी ऐसा ही मंत्र-दर्शन मुझे हुआ था, तब (6 जुलाई 2021 को) मैंने लिख कर सार्वजनिक किया था कि ‘मेरा अज्ञान असीम है, आपका सारा ‘ज्ञान‘ इसमें समाहित हो सकता है। खुली आंखों देखी और कानों सुनी जानकारी, आंख मूंदकर गुनी जाकर सार्थक होती है। कान केी पलकें नहीं हैं, परदे हैं, ये परदे छुपाने के नहीं, उघारने के हैं।‘

और किताब में आया ‘बृगल‘ एकाकी से दूसरा और फिर बहुल। (एक अन्य सूत्र यह कि कुछ समय पहले मेरी भी अर्द्धांगिनी का लोप हुआ।)

कविताई मुझसे होती नहीं, मगर मार्च 2022 में मैंने अर्द्धबृगल शीर्षक से चार कविताएं लिखी थीं- 

अर्द्धबृगल*: चार कविताएं
(एकाकी रमता नहीं, प्रजापति भी रमा नहीं, दूसरे की इच्छा की- बृहदारण्यकोपनिषद) 

तुम 

तुम 
भूला सा पाठ 
और खोई पुस्तक, 
वह जिसे बार-बार दुहराने का मन करे। 
तब परीक्षा पास कर, 
जाने कहां रख गई किताब,
स्मृति में फड़फड़ा रहे पन्ने अब।

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तुम-मैं

तुम मेरे लिए अपवाद की तरह जरूरी। 
अपवाद, नई संभावना। 
आपका, आप से अब तुम हो जाना,
तुम का मैं हो लेना। 
तुम की जगह मैं,
मेरे के बदले तुम्हारे,
अपवाद या सिद्धांत, 
जरूरी या गैरजरूरी।
दो नायिका, एक नायक अथवा
एक नायिका दो नायक के त्रिकोण 
और कोणों पर बारी-बारी खड़े हो 
समग्र समेट लेने की आतुर व्यथा। 

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तेरा होना 

तेरा होना
तेरे ‘न होने‘ में
न ही तेरे ‘होने‘ में
तेरा होना, तेरे हो जाने में। 
तेरा होना तेरे आने में,
तेरे आने से पहले।
तेरा होना तेरे जाने में,
तेरे जाने के बाद भी।
भूत और भविष्य के रिक्त में
वर्तमान के आभास में।
तेरा होना, हर हाल में होना है।
हो जाने या न जाने
तू माने या न माने
तेरा आना, तेरा जाना 
हमने माना,
तेरा होना।

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तेरा साथ

साथ चलना है तो- 
मैं तुम्हारी बात मान लूं, 
या तुम्हें समझा कर सहमति बना सकूं, 
यदि नहीं तो-
तुम मेरी बात मान लो,
या मुझे अपनी बात समझाओ।
हम यह भी तय कर सकते हैं कि
जो तुम में है, मुझ में नहीं
और मुझ में है, वो तुम में नहीं। 
फिर चलो, एक दूसरे के पूरक बनते,
साथ चलना यूं ही सही।

*अर्द्धबृगल-द्विदल अन्न का एक दल। 

और इसके साथ एक ‘चतुष्पदी‘

एक साधे सब,
सधता है तब, 
वह एक जब, 
निराकार, शून्य।

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पहले खंड की अपनी 44 कविताओं में से कविता-9 के साथ कृष्णार्जुन-संवाद को ‘शब्दच्छल‘, आँखेाँ मेँ कजरारेपन और सफ़ेदी के बीच चलने वाला संवाद‘ समझाते हैं(18)। कविता-16 में भोर का तारा, शाम का तारा को शुक्र या वीनस, स्त्री या पुरुष से आगे बढ़ कर बृहस्पति तक पहुंचते हैं और संस्कृत, अंग्रेजी या बोलियों में सहज कह दिये जाने वाले चूतड़ और पाद जैसे भदेस माने जाने वाले शब्द का बेहिचक प्रयोग करते हैं(30)। कविता-23 की उपमाएं, क्या कहने, जिनमें से एक- ‘कितना कालापन है तुममेँ/यह तब पता चलता है/जब तुम्हारे गाल का तिल/दृष्टि की आँखो में सुरमा आँजता है(48)। कविता-33 में पान खाने के लिए पत्नी से मिले नोट पर लिखे ‘दस रुपये‘ की भाषाओं (न कि लिपि!) को सामर्थ्य से बाहर (अबूझ?) बताना(71-72)। 

इस तरह सूत्र पकड़ कर मैं पहुंचा कि यह किताब- आत्मा में परमात्मा है तो को-अहं, प्रश्न में अपने को खोजने का प्रयत्न प्रकारांतर से और अंततः परमात्मा की खोज है। इसका संकेत जगह-जगह पर आता है, ज्यों प्राथमिकी में- सनातन धर्म को दो ही तरीक़ोँ से पहचानने की कोशिश की जा सकती है- एक, अ-पौरुषेय वेद से और दो, पौरुषेय लोकव्यवहार से।

भामती प्रसंग (186-187), भामती-पति (वाचस्पति मिश्र) ने जीव की भ्रान्ति को जगत् का कारण बताया। मजेदार कि वाचस्पति मिश्र, ब्रह्मसूत्र के भाष्य की टीका ‘भामती‘ तैयार करते यों एकाग्र-मशगूल रहे कि दाम्पत्य के पचास वर्ष बाद पत्नी भामति से पूछ लिया कि देवी आप कौन हैं? 

पुलोमा प्रसंग(148), महर्षि भृगु की पत्नी का नाम पुलोमा है। भृगुपत्नी पुलोमा को देख कर पुलोमा (इन्द्र के श्वसुर) नामक दैत्य काम पीड़ित हुआ ...। महाभारत में एक सदृश नाम वाला ‘चित्रांगद‘ प्रसंग है, जिसमें कुरुवंशीय शांतनु (भांडारकर संहिता में स्वीकृत पाठ ‘शंतनु‘) के पुत्र चित्रांगद को गन्धर्व चित्रांगद युद्ध कर, यह कहते हुए कि मेरे नाम द्वारा व्यर्थ पुकारा जाने वाला मनुष्य मेरे सामने से सकुशल नहीं जा सकता, उसे मार डालता है। किताब में कहा गया है कि एक ही तत्व, भोक्ता या भोग्य- नाटक के पात्र, एक प्रस्तुति में राजा तो दूसरी में मन्त्री की तरह चोला बदल हो सकता है।(185-186) 

किताब में रामचरितमानस, बालकांड, दोहा 36 ‘सुठि सुंदर संबाद बर बिरचे बुद्धि बिचारि। तेइ एहि पावन सुभग सर घाट मनोहर चारि।।‘, जिसमें खास वैष्णवी परतदारी है, इन चार घाटों को स्पष्ट किया गया है- राम-कथा में याज्ञवल्क्य-भरद्वाज संवाद का घाट कर्म है। शिव-पार्वती संवाद का घाट ज्ञान है। काकभुशुण्डि गरुड संवाद का घाट भक्ति है। गोस्वामी जी सन्त-समाज को सम्बोधित करते हुए स्वयं कहते हैं तब इस सरोवर में उतरने का घाट प्रपत्ति है(105-106)। अब तक मन में घुली इस बात को शब्दों में पा कर दुहरा आनंद हुआ। 

अपने बेटे की बलि के लिए उद्यत हज़रत इब्राहीम प्रसंग(115) के साथ नचिकेता, शुनःशेप और मोरध्वज की कथा का स्मरण होता है। हजरत ईसा के ‘पड़ोसी‘ का तात्पर्य बताया गया है, ‘पड़ोसी वह है जो तुम्हारा हितैषी हो चाहे वह तुम्हारे मजहब को माने चाहे नहीँ‘(130)। महत्वपूर्ण तथ्यों की चर्चा है कि ‘अंजीर-पत्ता अभियान‘ के तहत वैटिकन संग्रहालय मेँ मौजूद मूर्तियाँ मेँ से बहुत सारी समय-समय पर अनेक अलग-अलग पोपोँ द्वारा खण्डित करवायी गयी हैँ। माइकेलएन्जिलो का ‘द लास्ट सपर‘ भी विरूपित अवस्था में ही प्राप्त है।‘ तथा ज्ञान-संपदा, परंपरा का उच्छेद ‘एकमात्र-ता‘ के हठ से प्रेरित रही हैँ... बाइबिल और र्कुआन का उपलब्ध स्वरूप उनके विविध पाठोँ को नष्ट करके ही प्राप्त किया गया है(136-37)। 

बताया गया है कि ‘सूत्र‘, वह जो अल्पाक्षर, असन्दिग्ध, सारवान, विश्वतोमुख, अस्तोभ हो और अनवद्य (निर्दोष) हो(196-197)। किताब के ऐसे ही कुछ सूत्रों का उल्लेख करना उपयुक्त होगा, जिनमें-
0 पत्नी, ‘विराट‘ है... दाम्पत्य... अव्यक्त से व्यक्त... भाषान्तर के रूप मेँ प्रस्तुत हैँ, भावान्तर नहीँ हैँ(145)। 
0 सनातन ‘सनातन धर्म अवधारणा पर आश्रित है, आचरण पर नहीँ(139) 
0 ‘आधुनिक क्रम प्रेम को जनक और विवाह को उसका जन्य मानता है जबकि सनातन विवाह को जनक और प्रेम को उसका जन्य मानता है‘(146) ... ‘प्रत्येक प्रकार के विवाह में अनुराग ही फल है‘(147), सीधे कहें तो प्रेम के बाद उसकी परिणिति विवाह नहीं बल्कि विवाह से/उसके बाद विकसित प्रेम।
0 निर्विकार ब्रह्म सत्य है, चेतन अतः ज्ञान और अनश्वर होने से अनन्त है(161) 
0 सनातनी आस्था और वैदिक व्याख्या के साथ पांडित्य-लक्षण, यह भी कहते हैं- ‘हम ऐसे किसी सोना-मढ़े या कालिख-पुते अतीत की तलाश में निकल पड़ने के लिए बाध्य नहीं हैं‘(163)।
0 ‘पुरुषार्ध आकाश (खालीपन) स्त्र्यर्ध से विवाह के बाद पूर्ण होता है, इन दो अर्द्धबृगलों का पुनः-सम्पुटीकरण ही विवाह है।(166)
0 ‘मैँ‘ ‘यह‘ ‘वह‘ ‘तुम‘, ... यह अभिनय है, श्रुति अभिनय द्वारा बताती है। ‘श्रुति - वेद - अपौरुषेय वाक्‘ ग्रन्थ नहीँ, चेतन है-ग्रन्थ पौरुषेय वाक् का लिपीकरण है(183)
0 ‘सूचनाकारी ग्रन्थ‘ के अर्थ में सूत्र, ‘धागा‘ आदि न हो कर, जो ‘अल्पाक्षर, असन्दिग्ध, सारवान्, विश्वतोमुख, अस्तोभ और अनवद्य हो(196)
0 ब्रह्मसूत्र के विविध व्याख्यान ही केवलाद्वैत, विशिष्टाद्वैत, शुद्धाद्वैत, द्वैताद्वैत, द्वैत, अचिन्त्यभेदाभेद जैसे सम्प्रदायों के मूलाधार हैं।(197) 

वस्तुतः गुणी, ज्ञानी पंडित वही, जो अपनी सीमा को जानता है और असीम का अनुमान कर पाता है। लेखक की पांडित्य विनम्रता, जहां वे कहते हैं- ना-समझी के कारण हुई किसी भी त्रुटि का उत्तरदायित्व मेरा है(175ं) यहां निष्कर्ष (फतवा) की अनिवार्यता नहीं है न ही बेताबी। सीमा-मर्यादा को बराबर महसूस किया जाता रहा है, कुछ उदाहरण- ‘सायण का भाष्य समझना कितना कठिन है‘(245), तात्पर्य स्पष्ट नहीं है, कुछ के अनुसार ... शायद यही अभिप्रेत हो(275), मैं यह नहीं बता सकता कि यह मुद्रण की भूल है या कुछ और(336), बल्बज मूंज है या कुश चमड़े के नीचे या ऊपर, चमड़ा मृगचर्म या गोचर्म (337), प्रतीत होता है और ऐसा लगता है(344) आदि।

दुनिया के सारे तथ्य समय के साथ अपनी पसंद के कथा-रूप में बदल जाते हैं और कथा-बीज। का क्षेपक-उपबृंहण। शाश्वत और सनातन की समयानुकूल व्याख्या की आवश्यता-पूर्ति के लिए कथा। शास्त्र के अनुशासन का बंधन न हो, उसका उपबृंहण हो, ऐसा रचना उससे ही संभव हो सकता है। जितना साहित्य है उतना शोध, ‘फिक्शन और नान फिक्शन‘ एक साथ। असल पंडित ही ऐसा अधिकारी हो सकता है, छूट ले सकता है, जिसे पाठक की परवाह या पसंदगी का दबाव न हो।

‘हिन्दुत्व‘ के संकरे इकहरेपन के लिए बुद्ध, जैन, चार्वाक, शंकराचार्य से लेकर गुरु नानक ... एक मुश्किल सवाल वेदपाठी आर्य-समाजी, दयानंद सरस्वती ने खड़ा किया, उनका वाराणसी शास्त्रार्थ ... गनीमत है कि वेद कोई पढ़ता नहीं, पढ़ता है तो शायद समझता नहीं और समझता है तो अपनी समझ पर खुद संदेह बनाए रखता है, शायद यही सच्चा सनातन हिन्दुत्व है, जिसकी परोक्ष वकालत की मद्धिम गूंज किताब में तानपूरे की तरह बजती रहती है।

सनातन चारों ओर से खुला रहे तभी तक वह सनातन रहेगा। लेकिन सनातन में पहले तो चारदीवारी बनाई गई, बीच में आने जाने के रास्ते खुले थे लेकिन फिर उसमें दरवाजे लगा दिए गए, एक तरफ खुलने वाले। जिसमें अंदर से बाहर तो जाया जा सकता है बाहर से अंदर नहीं।

महीनों बीत गया, इस किताब का साथ बना हुआ है, लगता है, बना रहेगा, समय-समय पर खुलती पंक्तियां, जो और जब थोड़ी भी खुली, दिन बीत जाता है, उसमें ऊभ-चुभ। इक्कीसवीं सदी में अपनी पढ़ी नई किताबों में किसी का नाम लेना हो तो मेरे लिए यह एक तो होगी ही। 

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‘पकड़ती है गला कुछ याद+ए+नाकूस य० क्यों आवाज बैठी है अजाँ मैँ।।‘ इसमें मुझ जैसे पाठक के लिए + और ०, अजनबी जान पड़े। इसी तरह में को मेँ, और लेखक के नाम के साथ ‘शुक्ल‘ मगर अन्यथा ‘शुल्क‘ की तरह छापा जाना। फांट भी खास तरह का इस्तेमाल हुआ है, इससे कई बार प्रूफ की भूल की तरह जान पड़ने वाली छपाई, सामान्य पाठक के लिए तय करना मुश्किल है कि यह गलती से हो गया है या सही है, इरादतन है। किताब में इस पर कोई स्पष्टीकरण नहीं है, जिसकी जरूरत ऐसे प्रयोग में अवश्य होनी चाहिए। कुछ शब्दों का शुद्ध-अशुद्ध स्पष्ट किया गया है, जैसे- नक़सान-नुक़सान(329)। प्रूफ-अशुद्धि या मेरी कम-समझी तय नहीं कर पाया, ऐसे कुछ उदाहरण- आभुषण(44)। आँखो(48)। बैसे(83)। बालकाण्ष(105)। ‘रंग‘मंच(188)/‘रङ्ग‘मण्डप(189)। बावुजूद(147)। नाजाइज(152)। मैत्रेयी/मैत्रेयि(155-156)। पदुमावत(90)। वसुल(127)। निशानदिही(138)। ता कि (179)। विना(43, 56, 71, 224, 242)। बेटों ‘बाली‘ तथा प्रवेश के ‘किए‘(325)। बहीॅं(349)। पं जी?(242)। चर्चा की ‘का‘ चुकी(248)। एक शब्द के भिन्न प्रयोग में मात्रा-वर्तनी का उदाहरण- औषध (89, 229), ओषधि(243, 324), औषधीय(244), ओषधियाँ(323, 328), ओषधियोँ(360)। या (53) पर हाशिये से बाहर छपे शब्द!। 

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फिलहाल यह पोस्ट यहीं तक, यह सोचकर कि कथा अनंता न हो जाय। पुस्तक के कुछ अन्य बिंदु भी गहराई से सोचने और विस्तार से कहने की राह सुझाते हैं, जिन्हें नीचे नोट कर रखा है- 

23- यम ने मृत्यु का वरण किया, ताकि वे मृत्यु को प्राप्त हुए लोगों की नगरी का शासन संभाल सकें। / 34- ऋत, अनृत/51- सत्व, रज, तम, इन्दीवर, कुवलय नीलकमल / 65- भेद, विजातीय, सजातीय और स्वगत / 80- गान्धर्व विवाह सबसे उत्तम / 82- खाली में खाली भर दो तो /105- भौगोलिक उपबृंहण। /120- शस्त्र की सहायता के लिए शास्त्र का निर्माण भी आवश्यक माना गया। / 123- पर हुरपेट /130- मानवीय गुणों पर किसका एकाधिकार /130-131 प्रक्षेप/ 135- एक पूज्यता, यहूदी धर्म शासन /137- एकमात्र-ता बनाम एक-बहुपूज्यता अस्तित्ववादी चिंतन /138- जेनेसिस से पुनः बात जोड़ते हैं .../ 147 ऊहा /148-इंटरनेट पर महाभारत /152- धर्षण से धर्षिता को कोई कलंक नहीं लगता /153- विवाहपूर्व के अनुराग नवीन अनुरागलेख / 154- अंजनी कुमार सिनहा /154-55 अनन्यममता /159-160-रूपकाभास / 162 नामरूप त्यत, अमूर्त/ 163- सोना मढ़े कालिख पुते अतीत / 164- अलगाव बाड़े में ब्राह्माण्डिकी वह रममाण नहीं हुआ। /171- चार पत्नियां /190- तौर्यत्रिकी देवविद्या, नट, अभिनेता और नर्तक /192- उपादान और निमित्त /194- आगम निगम भाषा /197- भाषा और बोली का अंतर /202- सेमिनार, पीएचडी-शोधपत्र का साधन/213- षड्कर्म को पूर्त करने वाला विप्र/221- परिष्वंग/ 223- बृहदारण्यक अध्याय 5 का द, इनमें से कोई द नहीं है। 224- विविदिषा जानने की इच्छा /225 क्वान्टम कुछ न कुछ बाहर रहेगा। प्रमेय और सत्य /228- यज्ञ-कर्म-धर्म समानार्थी शब्द, ऋत-अनृत/ 236- इंद्र तभी पधारते हैं / 245- वर बराती/ 263- नग्निका, गौरी, रोहिणी आदि /290 पर 40. सोमः प्रथमो विविदे... /293- 45$46 /307 पर 35$36 जुआरी /324-स्त्री वशीकरण /327- विवाहोत्तर प्रेम / 339- पति, श्वसुर, सास के लिए/ 353- बृहस्पति/ 315 नान्दश्राद्ध

0 छत्तीसगढ़ी - 170- भुॅइफोर, औद्भिज्ज, स्वयंभू, खिन्नमन पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने मौज ली है और कुटज के लिए पौरुष-व्यंजक नाम ‘धरतीधकेल‘ बनाया है। 41- बहिंगा, सुरहार, कंवरिहा, 83- हुंडरा हुंडार, हुंर्रा
0 भारतेन्दु ‘बालबोधिनी‘ के मुखपृष्ठ पर कविता की पंक्तियां- जो हरि सोई राधिका, जो शिव सोई शक्ति। जो नारी सो पुरुष यामैं कछु न विभिक्ति।। और वीरप्रसविनी बुध वधू होइ हीनता खोय। नारी नर अरधंग की सांचेहिं स्वामिनी होय।
0 अद्वैत, अर्द्धांगिनी, अर्द्धनारीश्वर भाषा, शोध, अद्वैत, अर्द्धांगिनी, अर्द्धनारीश्वर
0 महाउमग्ग जातक, समयानुकूल व्याख्या इसलिए कथा, इतिहास जानने के स्रोत भारतीय कविता या विश्व कविता, धार्मिक और पौरुषेय-अपौरुषेय की बहस तक सीमित रह जाता है।
0 मुझको कहां तू ढंूढे रे बंदे ... 
0 भाषा के लिए शब्दकोश से कहीं अधिक जरूरी कठोर व्याकरण नियम, शब्द व्युत्पत्ति आवश्यक 0 ‘यद्यपि वेदोँ के वाक्योँ का तात्पर्य ... अद्वैत मेँ ही है‘(195)
0 पर-आत्मा नहीं परम-आत्मा की तरह, आत्मा-परमात्मा से निराकार, जो आकार के विरुद्ध नहीं ब्रह्म- अंततः शून्य 0 ‘वीति‘ का अर्थ भक्ष्य भी है, घोड़ा भी। इसी तरह ‘बर्हि‘ कुश भी अग्नि भी। ‘गृणान‘, ‘स्तुति करने वाला‘ किंतु ‘जिसकी स्तुति की जा रही है‘ भी है।(42)
0 वैदिक साहित्य के अनुवाद की एक बहुत बड़ी कठिनाई दुर्निवार है-हमारे पास उस भाषा को समझने के साधन नहीँ बचे हैँ जिसमें वेद निबद्ध हैँ।(202) ... ‘हम वैदिक भाषा से दूर हो चुके हैँ और अब हम वेदोँ का तात्पर्य नहीं समझ सकते। आगे स्पष्ट किया गया है कि संस्कृत के उच्चारण में उदात्त, अनुदात्त और स्वरित, तीन स्वर होते हैं, स्वरांकन न हो तो अर्थ बदल सकता है, इससे ‘आत्मातत्त्वमसि‘ को ‘आत्मा तत्त्वमसि‘ या ‘आत्मा अतत्त्वमसि‘ दोनों पढ़ सकते हैं। ... वेद का तात्पर्य क्या है इसका निर्णय वर्तमान समय मेँ केवल युक्तियोँ के आधार पर होता है।(204-205) वेद, श्रुति कहे गए हैं ... वेद हमेशा सुने ही जाते हैं(207)
0 भारतीय ज्ञान पद्धति आइकेएस के दौर में ऋग्वेद और अथर्ववेद ही हमारे परस हैं, जिनका जो भी तात्पर्य हो, ‘प्राचीन भारत‘ में तकनीकी का परिचय देना नहीं है। 
209- वेद-वेदांग और शास्त्रीय ग्रंथों को इतिहास जानने के स्रोत माना जाता है, वह है भी, मगर वह वहीं तक सीमित रह जाता है, मान लिया जाता है कि उनकी इतनी ही उपयोगिता थी, इतना ही महत्व है...
208- कविता वेदार्थ का उपबृंहण। भारतीय कविता या विश्व कविता, धार्मिक और पौरुषेय-अपौरुषेय की बहस तक सीमित रह जाता है।
210- एकमात्र-ता, बेलनी सपाटीकरण का विरोध(210) 0 मेरा अनुरोध यहाँ केवल यह है कि इस अनुवाद को वेद-मन्त्रोँ का ‘अर्थ‘ न समझा जाय, ...‘ इसे अर्चना में चढ़ाया गया जवा पुष्प कहते हैं तो राम की शक्ति पूजा पर उनकी टीका...(226)
0 घर जाओ अपने पति के/ जो अब तुम्हारा है/ स्वामिनी बनो अब तुम उसकी/ उस घर मेँ जो आवे/ तुम्हारे बस मेँ रहे/ हुक्म चलाओ उन सब पर/ जो उस घर से पलते हैँ(272-73 ) 
0 ‘कुमारी‘ का एक अर्थ है ‘वह वधू जियका पति उससे विवाह के पहले तक कुँवारा रहा है‘(325) वर-बराती (245-246)
0 भूमिका में अक्षर योजना, वेद अपौरुषेय
0साहित्याचार्य्य पण्डित सीताराम चतुर्वेदी की पुस्तक 1940 में ‘भाषाकी शिक्षा’ में चंद्र बिंदु का प्रयोग

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