78 आर.पी.एम. का तवा, जिस पर गीत बजता था- ओ वर्षा के पहले बादल, मेरा संदेसा ले जाना, अंसुवन की बूंदन बरसाकर, अलका नगरी में तुम जाकर, खबर मेरी पहुंचाना। मुझे याद है कि यह स्टैंडर्ड प्ले रिकार्ड हमने सुन-सुन कर घिस डाला था और तब सुई अटक जाती थी, ‘खबर मेरी पहुंचाना‘ पर। किसी फिल्मी गीत प्रेमी ने बताया कि यह तुम्हें इतना पसंद है, तो इसे भी सुन लो- ‘ओ आषाढ़ के पहले बादल, ओ नभ के काजल। विरही जनों के करुण अश्रु जल, रुक जा रे एक पल। दूर दूर मेरा देश, जहाँ बिखराए केश, विरहन का बनाये वेश। प्रिया मेरी विदेश, कैसे काटे कलेश, उसे देना मेरा ये संदेश रे।‘ मगर मन वहीं अटका रहा, जो पहले सुनता रहा था- 'ओ वर्षा के पहले बादल ... खबर मेरी पहुंचाना, खबर मेरी पहुंचाना'।
स्कूली शिक्षा के अलावा जितनी और जैसी भी दीक्षा मिली अधिकतर फिल्मों से ही मिली, या चालू, ऐयारी-जासूसी किताबों से, जानकारियों और जिज्ञासा का खजाना। तब कहां पता था कि यह मेघदूत है, महाकवि कालिदास की अमर कृति पर आधारित गीत। कहा गया है ‘माघे मेघे गतं वयः‘ और ‘काव्येषु माघः कवि कालिदासः‘। कालिदास के काल की चर्चा में कहीं पढ़ा था- संस्कृत परीक्षाएं जब से होती हैं, उनमें आज तक यह प्रश्न नहीं आया कि कालिदास कब हुए? अंगरेजी कोर्स के इम्तहान में इस प्रश्न से शायद ही कभी अपना छुटकारा कर सकें।
किताब हाथ में आई है, जिस पर बादल और घुंघरू वाले पैर हैं। मेघदूत की राह तो आकाशीय है और पथिक, धरातलीय, फिर यह कैसा शीर्षक हुआ ‘मेघदूत की राह के पथिक‘! किताब खोल कर कदम-दर-कदम आगे बढ़ें तो पन्ने-दर-पन्ने जमीनी हकीकत के संग-साथ ‘आज तो पांव जमीं पर नहीं पड़ते मेरे‘ जैसी ‘मध्यमा‘ धुन मन में होती है, आप किसी धुनी के साथ हों बिना धूनी रम सकते हैं। किसी जोगी की विरक्ति में आसक्ति, वियोग में ही संयोग-कामना प्रबल होती है और कवि मन ‘द्यावा-पृथिवी‘ में स्थित रचना-संभव होता है।
उमड़ते-घुमड़ते मेघ में आशा-आशंका दोनों है, वहीं जैसा विद्यानिवास मिश्र कहते हैं- ‘पर सुकुमार और परुष ये दोनों पक्ष बादल के पौरुष के प्रतीक हैं। वही धरित्री का कामरूप पुरुष है। उसके लिए धरित्री की पुकार प्रोषित पति के लिए प्रियतमा की पुकार है। आना जी बादल ज़रूर।‘ वही मानस के राम ‘प्रियाहीन डरपत मन मोरा‘ कहते हैं तो वाल्मीकि के राम शरद और वसंत में भी सीता-विरह से व्यथित हैं। वर्षा ऋतु आने पर उन्हें बिजलियां, सोने के कोड़े के समान, मेघों की गर्जना आर्तनाद के समान जान पड़ती है, और कहते हैं कि ये कुटज पुष्प मेरी प्रेमाग्नि को उद्दीप्त कर रहे हैं।
लेखक, हजारीप्रसाद द्विवेदी के ‘मेघदूत: एक पुरानी कहानी‘ से गुजरती हैं उनकी राह का पथिक बन मैं भटका पाठक द्विवेदी जी के ‘संदेशरासक‘ का भी रस लेने लगता हूं। ग्यारहवीं सदी का अपभ्रंश काव्य, जिसमें विरहिणी नायिका का संदेश वाहक पथिक मनुष्य है। द्विवेदी जी ने ‘मेघदूत‘ और ‘सन्देशरासक‘ की तुलना करते हुए मार्के की बात कही है- ‘संदेश कैसे दिया जाता है और क्या दिया जाता है, मुख्य बात यही है। वस्तुतः दोनों में कथावस्तु को बहाना बनाकर विरह-वर्णन का चित्रण करना ही कालिदास और अद्दहमाण का उद्देश्य है।
‘आषाढ़ का एक दिन‘ में मोहन राकेश इस सफर में अनंत तक पहुंच जाते हैं- ‘ये तो केवल कोरे पृष्ठ हैं। ... ... ...स्थान-स्थान पर इन पर पानी की बूंदें पड़ी हैं जो निःसंदेह वर्षा की बूंदें नहीं हैं। लगता है तुमने अपनी आंखों से इन कोरे पृष्ठों पर बहुत कुछ लिखा है। और आंखों से ही नहीं, स्थान-स्थान पर ये पृष्ठ स्वेद-कणों से मैले हुए हैं, स्थान-स्थान पर फूलों की सूखी पत्तियों पर अपने रंग इन पर छोड़ दिये हैं। कई स्थानों पर तुम्हारे नखों ने इन्हें छीला है, तुम्हारे दांतों ने इन्हें काटा है। और इसके अतिरिक्त ये ग्रीष्म की धूप के हल्के-गहरे रंग, हेमन्त की पत्रधूलि और इस घर की सीलन ... ये पृष्ठ अब कोरे कहां हैं मल्लिका? इन पर एक महाकाव्य की रचना हो चुकी है... अनन्त सर्गों के एक महाकाव्य की।‘
कवि बादल को तकता है और मानों बादल से परावर्तित एरियल व्यू वाले भूगोल को और इसी तरह इस राह की पथिक बनीं लेखक कैलास पहुंच जाती है। भटकता अतृप्त मेघ अपनी राह गहने वाले को वहां तक पहुंचा देता है, जहां-
‘इस धरा के रहस्यों पर चलता, आस्था के दीये की लौ की कोमल उष्णता में मोम-सा पिघलता, शिखरों के मध्य चमकता पवित्र नदियों का उद्गम यह कैलास मेरे समक्ष है। ओह! यह कौन-सा पल है-
तारीख-20 अगस्त, 2018, दिन- सोमवार, हिन्दी महीना-सावन, तिथि-शुक्ल पक्ष, दशमी, समय- रात्रि 2ः45, योग- ब्रह्म, करण- भद्रा, नक्षत्र- विशाखा।
मैं इस वक्त भीतर-बाहर से रिक्त थी। अब मैं ही दृष्टा और मैं ही दृश्य थी। अब मुझे सम्पूर्णता का आभास था।‘
(इस पुस्तक के पेज 225 का अंश)
पुनश्च- ब्रह्मपुत्र और सिंधु के साथ देश की तीसरी प्रमुख पुल्लिंग जलधारा ‘सोन नद‘ का स्मरण कि मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रन्थ अकादमी द्वारा 1983 में प्रकाशित देवकुमार मिश्र की ‘सोन के पानी का रंग‘, नदियों पर मेरी पढ़ी किताबों में अग्रगण्य है तथा मेघदूत और रामगिरि की चर्चा के संदर्भ में पुणे की सुजाता देवधर जी का आभारी हूं, जिन्होंने कालिदास संशोधन मंडल, पुणे से 1960 में प्रकाशित वामन कृष्ण परांजपे की पुस्तक ‘Fresh Light on Kalidasa's Meghduta‘ की जानकारी दी, जिसमें उदयपुर, सरगुजा के रामगढ़ को मेघदूत से संबद्ध माना गया है। इसी तरह ऋत्विक घटक, कहानी ‘एक्सटैसी‘ में मध्यप्रदेश के मध्यतम प्रदेश के साथ महुआ और पलाश के पेड़ का उल्लेख करते लिखते हैं- ‘यह वही कालिदास के मेघदूत का देश है। हमारा सुंदर देश। निर्विकार ग्राम वधुओं की याद आ जाती है।‘

अहा कितने अनूठे ढंग से आपने यह दर्ज किया है। आभार
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