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Monday, July 9, 2012

ग्राम-देवता

आस्था के आदिम बिन्दुओं पर सभ्यता का आवरण और संस्कृति का श्रृंगार

मैदानी छत्तीसगढ़ में ग्राम देवताओं की वैविध्यपूर्ण मान्यता, मुख्‍यतः द्रविड़ और निषाद प्रजाति-कुलों की थाती मानी जा सकती है। ग्राम देवता के वर्गीकरण, उपासना-पूजा की पद्धति व संबंधित भाषा-विशिष्टता में हमारी वर्तमान समेकित संस्कृति के मूल घटकों-उपादानों की पहचान हो सकती है। चूंकि ग्राम देवता परंपरागत ढंग से मूलतः जनजातीय समाज और उनके धार्मिक अनुष्ठानों से सम्बद्ध हैं, इसलिये यह सांस्कृतिक बिन्दु अपेक्षाकृत कम मिलावटी है।

आगम स्मृतिसार का कथन है- ''ब्राह्मणानां शिवो देवाः क्षत्रियाणां तु माधवः। वैश्याणां तु भवेद ब्रह्मा, शूद्राणां ग्राम देवताः॥'' यह ग्राम देवताओं के अनार्य परंपरा से जुड़े होने का संकेत मात्र है, किन्तु हमारी संस्कृति की समन्वयात्मक प्रकृति के फलस्वरूप आर्य-अनार्य, लोक-शास्त्र घुल-मिल कर समरस हो गये और ग्राम देवता, संस्कृति संवाहक बनकर, जाति-प्रजाति भेद लांघकर, समष्टि चेतना के अविभाज्य अंग बन गए।

ग्राम देवताओं की मान्यता का स्वरूप स्वाभाविक ही सुसंगठित नहीं होता, क्योंकि आदिम-धर्मों में भी आध्यात्मिकता का बीज अवश्य रहा होगा किन्तु उसमें सुविचारित दार्शनिक पृष्ठभूमि या मोक्ष जैसे उच्चतर विचार शास्त्रजन्य संभावनाएं हैं। धर्म का मूल रूप आस्था और विश्वास का है, परिवर्तन के क्रम में धर्म के मूल घटक तो विद्यमान रहे, किन्तु अपेक्षाकृत जटिल होकर गौण होते गए लेकिन इन आदिम श्रद्धा केन्द्रों- ग्राम देवताओं का स्वरूप परंपरागत मान्यता पर आधारित, सहज और सरल बना रहा। हेनरी वाइटहेड (1921) के अनुसार- ''ग्राम देवताओं का कार्य महामारी और अनिष्ट से गांव की रक्षा करना है, ये ग्राम्य-जीवन के मौलिक तथ्यों के प्रतीक हैं और विश्व के निर्माण-संहार जैसी महत्तर शक्तियों से नहीं जुड़े होते।''

आशुतोष भट्‌टाचार्य (1955) कहते हैं- ''ग्राम देवताओं में व्यक्तिगत उपासना के बजाय सामुदायिक जनजीवन और उपासना में तत्व निहित हैं।'' डॉ. ओपर्ट, डाल्टन और हैविट ने भी इन्हीं विशिष्टताओं का उल्लेख विस्तार से किया है कि ''ग्राम देवताओं की पूजा से गांव माता-महमारी, पशुरोग, अकाल, अग्नि-दुर्घटना, बाढ़, असमय मृत्यु, सर्पदंश, वन्य-पशु आक्रमण की आशंका से मुक्त होकर सम्पन्नता और खुशहाली का जीवन व्यतीत करता है।'' ग्राम देवता खोई हुई वस्तु की प्राप्ति और पशु चोरी का पता करने जैसे दैनंदिन जीवन के तात्कालिक तथा स्पष्ट और सहज लक्ष्य के लिये व्यक्तिगत स्तर पर पूजे जाते हैं।
ग्राम देवता पहाड़, नदी-नाला, तालाब, जंगल, वृक्ष के अतिरिक्त सीमा पर, मार्ग में अथवा ग्राम के मध्य में स्थापित होते हैं। कोल समुदाय के वन्य ग्रामों में वन देवताओं की स्थापना ग्राम से संलग्न वन-खण्ड या अधिकतर शाल वृक्ष समूह में 'सरना' के रूप में की जाती है। सरना अत्यंत पवित्र व जागृत क्षेत्र माना जाता है। ग्राम व क्षेत्र की सामान्य बैठकें, मनोरंजन और पंचायत-निर्णय, देव साक्ष्य की उपस्थिति में, सरना में होता है साथ ही सरना राहगीरों को रात्रि विश्राम के लिए 'शरण' भी देता है।

इस अंचल के प्रत्येक मैदानी गांव का महत्वपूर्ण स्थल ठकुरदिया होता है, जहां गांव के मालिक-देवता, ठाकुरदेव अपने बाहुकों जराही-बराही और कहीं-कहीं परऊ बैगा व अन्य देवों के साथ विराजते हैं। ठाकुरदेव के ही मान्यता-साम्य बड़ादेव या बूढ़ा देव भी है। बूढ़ादेव के साथ बढ़ावन की मान्यता होती है, जो पत्थर की गोल गाटियां है, त्यौहार 'बार' के अवसर पर देव के साथ-साथ 'बढ़ावन' की पूजा होती है, और इसी प्रकार की मान्यता, ठाकुरदेव की स्थापना, शोधन और पुनर्स्थापना के लिए बैगा (ओझा-गुनिया) द्वारा पूर्ण कराई जाती है।

पुरानी बस्ती पर, विशेषकर नदी-नालों के किनारे बसे गांवों में अथवा गांव से संलग्न उजाड़-वीरान टीला, सरना या ठकुरदिया जैसा महत्वपूर्ण, 'डीह' क्षेत्र होता है, जहां देवकुल विद्यमान मानकर उन्हें पूजा जाता है। डीह, डिहवार या डिहारिन देव के रूप में मान्य पवित्रता के कारण, इस क्षेत्र के आसपास शुद्धता, पेड़ काटने की मनाही तथा यहां से गुरजते हुए पागा (पगड़ी) और पनही (जूता) उतार लेने की सावधानी बरती जाती है।
इस अंचल के प्रत्येक गांव में मातृ शक्ति, माताचौरा अथवा महामाया के रूप में विभिन्न नाम-विग्रहों से पूजी जाती है, इनमें शास्त्रीय सप्तमातृकाओं का मूल स्वरूप संभवतः 'सतबहिनियां' है, साथ ही अक्काइसों बहिनी की भी पूजा की जाती है। अन्य क्षेत्रों में जयलाला, बिलासिनी, कनकुद केवदी, जसोदा, कजियाम, वासुली, चण्डी का नामोल्लेख सतबहिनियों के रूप मिलता है। इस अंचल में सतबहिनियां को चेचक या सात माता बूढ़ी मां, मटारा, लोहाझार, कथरिया, सिंदुरिया, कोदइया, आलस के नाम से भी पूजा जाता है। सतबहिनियां का स्थान गांव के बाहर अधिकतर नाले, जल स्रोत या जल-प्रवाह के निकट होता है। नदी घाट पर घाटादेई पूजित होती है। महामाया की पूजा नवरात्रि पर जंवारा के रूप में होती है। गौरा की पूजा वार्षिक अनुष्ठान होता है जो जनजातीय समाज में प्रचलित है। गौरा, जंवारा, बार, मड़ई, जगार, जतरा आदि प्राचीन मह या वार्षिक मेले के रूप हैं जो मनौती या विशाल धार्मिक सामूहिक आयोजन है।
परा-शक्ति और ग्रामीणों के बीच की कड़ी बैगा (गुनिया, देवार, सिरहा) है। मान्यता है कि ग्राम देवता, बैगा के माध्यम से संदेश देते हैं। इन्हीं बैगाओं के पूर्व-पुरुष परऊ बैगा, देवता के रूप में पूजे जाते हैं, परऊ बैगा की स्थापना अंचल के अधिकतर मैदानी ग्रामों में अवश्य है। कुछ क्षेत्रों में बैगा की एक अन्य श्रेणी होमदेवा है जैसा कि नाम से स्पष्ट है- होमदेवा, मात्र होम दे सकते हैं, लेकिन देव आह्वान का अधिकार बैगा को ही होता है। बैगाओं में परऊ बैगा और गुरुओं में देगन गुरु जैसी प्रतिष्ठा अन्‍य की नहीं, लेकिन राउतराय, धेनु भगत, बिरतिया बाबा, बीर सुनइता, बीर बयताल, लाला साहब, राय मुण्डादेव, संवरादेव, सौंराइन दाई आदि की भी मान्‍यता है। देव प्रतिष्ठा अर्जित अन्य गुरु हैं- सेत गुरु, सोनू गुरु, संवत गुरु, भुरहा गुरु, बिद गुरु, ढुरु गुरु, अगिया गुरु, जोगिया गुरु, बंधू गुरु, देवा गुरु, बेन्दरवा गुरु, सइजात गुरु, सुंदर गुरु, अकबर गुरु, रहमत गुरु, मांधो गुरु, गुरु धनित्तर। शबर जनजाति (संवरा या सौंरा) इस अंचल में झाड़-फूंक मंत्रों के विशेषज्ञ माने जाते हैं। धनुहार और बिरहोर आदि जनजातियों में भी मंत्रों का विशेष प्रचलन है। कुछ स्थानों पर इन मंत्रों की विधिवत ज्ञान के लिए प्रशिक्षण केन्द्र होते हैं, जहां प्रत्येक नागपंचमी को दीक्षान्त समारोह होता है, दीक्षित शिष्य ही मंत्र-प्रयोग कर सकने का अधिकारी होता है।
गोंड़ जनजाति के परगनिहा और कुमर्रा देव भी, उनके धर्मगुरू हैं जिन्हें देवता की श्रेणी प्राप्त हैं, और ये समान रूप से ग्राम देवताओं के साथ पूजित होते हैं। नांगा बैगा-बैगिन जैसे प्रचलित देवताओं के अतिरिक्त भिन्न-भिन्न ग्रामों में विभिन्न बैगा देवताओं की स्थापना ज्ञात होती है, उदाहरणतया- सुनहर, बिसाल, बोधी, राजाराम, तिजऊ, लतेल, ठंडा बैगा आदि। इसी प्रकार मुनि बाबा, पांडे देव, धुरुआ देव आदि की भी प्रतिष्ठा है। इनमें से कुछ स्थापनाओं के साथ मान्यता है कि इन देवों के चबूतरे पर सर्पदंश पीड़ित व्यक्ति को लिटा देने से या चबूतरे की मिट्‌टी खिलाने से लाभ होता है। सामान्यतया बैगा, जनजातीय समाज अथवा निषाद या कहीं-कहीं यादव जैसी पिछड़ी जाति के होते हैं, किन्तु कहीं सतनामी बैगा भी हैं।

अंचल में पूजित अन्य मुख्‍य देवों में विभिन्न बाबा, यथा- सिद्ध या सीतबावा, बरमबावा, भैरोबावा, मुड़ियाबावा, अघोरीबावा, कलुआबावा आदि हैं। पाट या पाठ देवता अधिकतर वृक्ष देव हैं, जिनमें कुर्रूपाठ, बासिनपाठ, कंवलापाठ, कोइलरपाठ, होइलरपाठ, मोहरिलपाठ, लोढ़िनपाठ, कोहारिनपाठ, सुरसापाठ, सेतरपाठ, लखेसरपाठ, करबा-करबिनपाठ, निरासीपाठ, पठरियापाठ, डूंगरपाठ, बइहारपाठ, सिंहासनपाठ, भंवरपाठ, अंधियारीपाठ, अंजोरीपाठ, बघर्रापाठ, डोंगापाठ, कोटरापाठ, नंगनच्चापाठ आदि हैं। देवियों में बमलई, समलई, महलई, खमदेई कोसगई, सरंगढ़िन, विशेसरी, सत्तीदाई, चण्डीदाई, मावली, कालिका, कंकालिन, सरपिन या पानी गोसाइन आदि भी पूजित होती हैं। कुछ अन्य देवी-देवता हरदेलाल, घोड़ाधार, सांहड़ादेव, सांढ़-सांढ़िन, परातिन, हाड़ादेव, नांगरदेव, चिरकुटी, खूंटदेव, खरकखाम्ह, अखराडांड, धूमनाथ, चितावरी, ठंगहादेव, जैसी विस्तृत सूची है। इनमें कुकुरदेव और बंजारी देवी को बंजारा-नायकों से संबंधित किया जाता है।

ग्राम देवताओं में सभी प्रकार की शुभंकर-अनिष्ट शक्तियां, मृत पूर्व पुरूषों की स्मृति, पुरानी व्यवस्था में ग्राम के प्रभारी दाऊ साहब का प्रतीक स्थान, परगनों अथवा जमींदारियां, रिसायतों के संबंध जैसे- सरंगढ़िन और मार्ग सूचक चिन्ह स्थान ओंगन पाठ, चिथरी दाई, ढेला देव सभी का आत्मीय साहचर्य महसूस किया जाता है। जिला मुख्‍यालय धमतरी के पास करेठा को कुआरी गांव माना जाता है, यहां होलिका दहन नहीं किया जाता और लोग कहते हैं कि यहां ग्राम देवी-देवताओं की शादी नहीं हुई है और इस गांव को कुंआरीडीह भी कहा जाता है। कनिंघम (1882) ने अपने विस्तृत निबंध में इसे दानव या असुर पूजा मान लिया है, किन्तु देवताओं से भयभीत होकर उन्हें सम्मान देने वाला जनमानस, वर्षा के लिए देवता से सहज आत्मीयता के पर्याप्त उदाहरण के रूप में, गोबर या मिट्‌टी लीप-पोत कर, धूप में बाहर निकालकर उसे दण्ड (सजा) भी देता है।

वस्तुतः यही वह बिन्दु है जहां मनुज जाति की व्यापकता से उपजी संस्कृति के सूत्रों का अनुमान होता है। इस बिन्दु पर हम सृष्टि की कोख से उत्पन्न प्रकृति- नदी, पहाड़, जीव-जन्तु, वनस्पति, परा-अपरा से एकाकार, अपने जनजातीय सम्पर्कों में सर्वबंधुत्व का आभास पाते हैं अतः ग्राम देवताओं के माध्यम से जनजातीय संस्कृति की पहचान के लिए विस्तृत और गहन शोध-सर्वेक्षण की आवश्यकता है, जिसमें ग्राम देवता की नामोत्पत्ति, स्थापना का इतिहास, अवस्थिति, भौतिक स्वरूप ज्ञान-मान्य रूप, पूजा का प्रयोजन उद्‌देश्य व अवसर, अन्य देवों से सम्बद्धता, पूजा में प्रयुक्त/निषिद्ध वस्तु के साथ-साथ बैगा-गुनिया परंपरा का समावेश हो ताकि सृष्टि में अपने मूल की तलाश करते हुए, सहोदर प्रकृति से स्वयं तक की सांस्कृतिक अनेकता में एकता का सूत्र पिरोया जा सके। यह ऐसी खोज है, जिसमें लक्ष्य तक न पहुंचने, परिणाम हासिल न होने के बावजूद भी जो मिलता है, वह कम नहीं।
यह लगभग इसी रूप में रावत नाच महोत्सव समिति, बिलासपुर की
वार्षिक पत्रिका 'मड़ई' सन 1999 में प्रकाशित हुआ है।
अपनी पिछली पोस्ट 'ठाकुरदेव' में जैसा उल्लेख किया है, छत्तीसगढ़ के ग्राम-देवताओं की जानकारी, शौकिया व अनियमित तौर पर पिछले लगभग 30 वर्षों से जुटा रहा हूं। इसकी शुरुआत सहज जिज्ञासा से हुई और यह हरि अनंत ... साबित हुआ है, लेकिन एक स्थिति में कुछ अन्‍य बातों सहित यह स्‍पष्‍ट हुआ कि आदिम समाज में बैगा, व्‍यक्ति और पूरे समाज के कायिक-मानसिक विकास के लिए उत्‍तरदायी रहे हैं, जो कार्य ब्राह्मणों के जिम्‍मे बंटा या जैसा प्रयास इसाई मशिनरियों ने किया। कायिक-मानसिक का तात्‍पर्य, स्‍वास्‍थ्‍य और शिक्षा से है। बैगा, झाड़-फूंक से 'कायिक' रोग-व्‍याधि दूर करते रहे हैं वहीं मंत्रों और देव स्‍थानों की पूजा-अनुष्‍ठान से अपनी परम्‍परा में 'मानसिक' शिक्षित-दीक्षित करते रहे हैं।
यहां मुख्‍यतः मध्य-मैदानी छत्तीसगढ़ में प्रचलित मान्यताओं के आधार पर चर्चा है। इसमें उत्तरी छत्तीसगढ़-सरगुजा और दक्षिणी छत्तीसगढ़-बस्तर के संदर्भ न के बराबर हैं। इसी तरह महाराष्ट्र से लगे पश्चिम सीमावर्ती छत्तीसगढ़ और उड़ीसा सीमा के पूर्वी छत्तीसगढ़ के हवाले यहां कम ही हैं।
ग्राम-देवता स्‍थलों के चित्र अकलतरा के हैं।



  • यह पोस्‍ट रायपुर से प्रकाशित पत्रिका 'इतवारी अखबार' के 19 अगस्‍त 2012 के अंक में प्रकाशित।

Tuesday, July 3, 2012

ठाकुरदेव

ग्राम देवताओं के थान पर माथा टेकने निकला तो सबसे पहले सुमिरन किया देवाधिदेव ठाकुरदेव का। ग्राम देवताओं में सर्वाधिक शक्तिशाली-प्रभावशाली माने गये हैं, ठाकुरदेव। बस्ती के एक सिरे पर इनकी स्थापना है, लक्खी तालाब के किनारे। गांव पर आने वाली विपत्तियों, विघ्न-बाधाओं का रास्ता रोके, ठाकुरदेव बस्ती की सीमा पर घोड़ाधार व हरदेलाल, दो अन्य देवताओं के साथ एक चबूतरे में माने-पूजे जाते हैं। पहले कोई भी यहां से जूता पहने या वाहन पर सवार होकर नहीं गुजरता था और किसी प्रकार से इस थान का परोक्ष अपमान करने से भी प्रत्येक ग्रामवासी या ग्राम में प्रवेश करने वाला बचता था।
ग्राम देवताओं में प्रमुख, गांव के मालिक-देवता, ठाकुरदेव का बड़ा-सा सफेद बकरा दिखाई पड़ता है, भोले बाबा के गंभीर लेकिन अलमस्‍त नंदी की तरह। ठाकुरदेव पर बलि नहीं दी जाती बल्कि उनकी पूजा कर, सफेद बकरा यूं ही छोड़ दिया जाता है। बकरे व अन्य सभी सामान्य पूजा की व्यवस्था गांव के गौंटिया/प्रमुख करते हैं और बैगा के माध्यम से पूजा सम्पन्न होती है। सामने ही ठाकुराइन दाई स्थित है जो अपेक्षाकृत नयी स्थापना है। पहले किसी घर में इनका वास था, किन्तु बैगा ने पूजा-पाठ कर इन्हें यहां उपयुक्त स्थान में स्थापित कर दिया है।

पर्री तालाब के पार में चबूतरे पर पत्थर का एक स्थापत्य खंड और त्रिशूल गड़ा है यहां अघोरी बाबा और कालिका देवी की स्थापना हैं, जाति और प्रयोजन-विशेष के ये देवता आमजन द्वारा पूजित नहीं हैं, किन्तु अन्य देवताओं की भांति होली, छेरछेरा, हरेली में इनकी पूजा बैगा करता है, दशहरा के दिन विशेसरी या विश्वेश्वरी देवी का ध्वज-स्तंभ यहां लाकर गाड़ा जाता है, ये देवता पूजा में होम, फूल, दूब के साथ शराब व बकरा भी लेते हैं।

बस्ती के बीच तीन देवी-देवता पास-पास ही स्थापित है- सत्ती दाई, परऊ बैगा और मुड़िया बाबा। इनमें सत्ती दाई, पुराने समय की सती हुई कोई स्त्री का स्थान है, जहां पत्थर मिट्‌टी का चबूतरा है। परऊ बैगा को प्राचीन, अत्यंत शक्तिशाली और प्रसिद्ध बैगा बताया जाता है, जो ईंटों के छोटे से चबूतरे पर किसी प्राचीन मूर्ति-खंड व अन्य अनगढ़ पत्थर के टुकड़े के रूप में हैं। मुड़िया बाबा के रूप में पीपल के वृक्ष के नीचे चबूतरे पर रखा कलश के आकार का पाषाण खंड और लकड़ी की गदा हैं। विवाह के अवसर पर महिलाएं देवतल्ला में ठाकुरेदव, घोड़ाधार, हरदेलाल, ठकुराइन दाई, विशेसरी के साथ इन तीनों पर भी हल्दी चढ़ाती हैं; बाकी ठौर पर बैगा जाया करता है।
अन्य देवताओं में मुख्‍यतः रामसागर तालाब के पार की महामाई है, जहां अब मंदिर बन गया है। होली जलने के दिन और चैत की नवरात्रि में इनकी विशेष पूजा होती है। यहां पूजा में बकरे के अलावा रेशमी चूड़ी, सिन्दूर आदि भी चढ़ाया जाता है। इसी के पीछे कुर्रूपाठ देवता है, जिनका अस्तित्व अब लगभग लुप्त हो चुका है। पालतू मवेशियों को रोग-बीमारी हो तो बघर्रा पाठ की पूजा की जाती है। चेचक होने पर शीतला माता की और हैजा के समय चण्डी दाई की पूजा होती है।
गांव के एक छोर पर गोपिया तालाब के किनारे अधियारी पाठ है। ठाकुरदेव आपत-विपत पड़ने पर अपने सफेद घोड़े पर सवार हो, यहां तक आया करते हैं और ग्राम-प्रमुख, बैगा आदि को भी सूचना दिया करते हैं। इनके घोड़े की टाप सुनने की बात कितने ही ग्रामवासी विश्वासपूर्वक बताते हैं। अंधियारी पाठ भी ग्राम सीमा के देवता है। अर्थात गांव में किसी भी प्रकार के अशुभ को प्रवेश नहीं करने देते।
दाऊ साहब को गोंड़ों-नायकों का देवता बताया जाता है। सीवाने के दो अन्य देवता हैं- डंगरादाई और ओंगनपाठ। डंगरादाई को सबसे पहले विशेष रूप से तब पूजा जाता है, जब कोई व्यक्ति मवेशी खरीदकर यहां से गुजरता है। वैसे डंगरदाई की मूर्ति किसी प्राचीन मंदिर के द्वारपाल की है जिस पर सिन्दूर लगा है और उसे परिधान से ढक दिया गया है। ओंगनपाठ देवता का अस्तित्व सामान्यतः सीवाने पर ही हुआ करता है और यहां से जो भी वाहन वाला- गड़हा निकलता है, देवता पर थोड़ा सा ओंगन तेल चढ़ा देता है, ताकि उसकी यात्रा निर्विघ्‍न हो।

लगभग पूरे गांव का चक्कर लगाकर मैं वापस आता हूं, और पुनः नमन करता हूं उस सहज-सरल, आदिम-आस्था को और आस्था के केन्द्र बिन्दु व सांस्कृतिक-धार्मिक समन्वय के प्रतीक ग्राम देवताओं को।

छत्तीसगढ़ के ग्राम-देवताओं की जानकारी, शौकिया व अनियमित तौर पर, जुटाने का सिलसिला तीसेक साल पुराना है। अकलतरा के तीन निखाद बइगा- मेरे लिए गुरुतुल्य बहादुर, भगोली और मुड़पटका (ऐसे ही नाम पुकारे जाते और इसी तरह याद है) और नंदू मुनीमजी कहे जाने वाले गंवई-गूगल जैसे श्री नंदकुमार सिंह से पूछताछ करते इसकी शुरुआत हुई, तब अपने गांव के 25 से भी अधिक ग्राम-देवताओं और उनसे जुड़ी परम्पराओं के बारे में कुछ जान पाया, और यही आरंभिक जानकारी बाद में अन्य इलाकों में पूछताछ के लिए, संवाद स्थापित करने में सहायक होती रही।

(यहां इस्‍तेमाल कुछ तस्‍वीरें, श्री यशोदा ने भेजी हैं।)

Friday, December 23, 2011

देवारी मंत्र

मंत्रः अवलोकन-विवरण

सरगुजा जिले के कुसमी अंचल में देवारी (ओझा, बइगा, गुनिया, सिरहा) यानि इलाज, झाड़-फूंक सिखाने के पारम्परिक केन्द्र हैं। इन केन्द्रों के प्रति आस्था और सम्मान किसी वेदपाठशाला जैसा ही होता है। ऐसा एक केन्द्र डीपाडीह ग्राम के उरांव टोली में संचालित था, जिससे जुड़े लोग बताते कि प्रशिक्षण लगभग छः माह में पूरा किया जा सकता है, किन्तु आमतौर पर एक वर्ष का समय लगता है। मंत्रों को अच्छी तरह समझ लेने, फिर ध्यान लगा कर सीखने में प्रशिक्षण का प्रारंभिक ज्ञान कम समय में भी कराया जा सकता है।

प्रशिक्षण पूरा होने पर नागपंचमी/अमावस्‍या को दीक्षान्त होता है और फिर गुरु की अनुमति पाकर ही मंत्रों का उपयोग किया जा सकता है। जर-बुखार ठीक करने के लिए किसी का बुलावा आने पर प्रशिक्षित व्यक्ति को अनिवार्यतः फूंकने जाना होता है, और इसलिए बुलावा देने के पहले पास-पड़ोस से पता कर लिया जाता है कि देवार को/उसके घर कोई अड़चन-समस्‍या तो नहीं है। दूसरी तरफ, पहल पीडि़त पक्ष की ओर से होना चाहिए, यानि बिना औपचारिक बुलावा के पहुंचकर मंत्रों का प्रयोग असरदार नहीं होता। गुरुओं की सहमति से उनके शिष्यों ने प्रशिक्षण और मंत्रों के बारे में बताया, उन्होंने सचेत किया कि बिना गुरु के इन मंत्रों का अभ्यास, गंभीर परेशानी में डाल सकता है (आगे पढ़ने वाले भी इस बात का ध्यान रखें)-

प्रशिक्षण का आरंभ धाम बांधने से होता है। इसके लिए बेंत की छड़ी, लोहड़गी यानि लोहे की छड़ी, आंकुस यानि अंकुश, त्रिशूल, शंख, कुल्हाड़ी, लोहे का हथियार- गुरुद, सिंगी आदि की जरुरत होती है। प्रशिक्षण के दौरान बगई का कोड़ा बनाया जाता है, जिससे गुरु प्रतिदिन चेले को एक-एक कोड़ा मारते हैं और धाम बांधने के मंत्रों से अभ्यास आरंभ कराते हैं।

धाम बांधनी का मंत्र-
पूरब के पूरब बांधौं, पच्छिम के पच्छिम बांधौं, उत्तर के उत्तर बांधौं, दक्खिन के दक्खिन बांधौं, पिरथी चलै पिरथी बांधौं, अकास चलै अकास बांधौं, पताल चलै पताल बांधौं, दाहिना चलै दाहिना बांधौं, बायां चलै बायां बांधौं, आगे चलै आगे बांधौं, पीछे चलै पीछे बांधौं, माये धीये डाइन चलै, डाइन बांधौं, बाप बेटा ओझा चलै, ओझा बांधौं, हमर बांधल गुरु क बचन, हमर बांधल, बारहों बरस, तेरहो जुग रहि जाय।

बांधनी के बाद गुरु मंत्र का अभ्यास किया जाता है-
गुरु मंत्र- गुरु गुरु बूढ़ा गुरु, जन्तर गुरु, माधो गुरु, दइगन गुरु, सीधा गुरु, अंधा गुरु, आइद गुरु, बइद गुरु, औलाद गुरु, मवलाद गुरु, केंवटा गुरु, महला गुरु, डोमा गुरु, बछरवा गुरु, चनरमा, सुरुज नराएन के लागे दुहाई।
गुरु क मान, गुरु क तान, गुरु क पांव, पंयरी, जहां बइठे, गुरु-गुरुआइन, तार-तरवाईर, छांई करे, गुरु देयाल, उदुरमा, पान-फूल, पगास, नया पाठ, करो मसान, केकर बले, गुरु क बले, गुरु के साधल, तीन सौ साइठ, जतन के लगे दोहाई।

इसके पश्चात्‌ मुख्‍यतः दो प्रकार के मंत्रों का अभ्यास किया जाता है। मंत्रविद्ध करने के अर्थ में बांधनी के मंत्र और बुरी शक्तियों को दूर करने के लिए हांकनी के मंत्र। इन दोनों प्रकार के मंत्रों के उदाहरण निम्न हैं-

बांधनी मंत्र- घोट-घोट, बज्जर घोट, फुलकारी, लागे तारी, ससान लय, मसान गेलय, देखे गेलय, भैरव पाठ, नाइनी काठ, दूर भैल, लई इवों, बज्जर खेलों। भाज-भाज, भाजत पुर, दूत-भूत करो कपास, साइठ सरसों, सोरों धान, हथे गुन, मसान छई, देखे गेलें, भैरो पाठ, नाइनी काठ, दूर भयल।
बज्जर बज्जर, बज्जर बांधौं, रिंगी-चिंगी, सात क्यारी, चंडी चेला, सेकर पीछे लाप लीता, देखाल भूत, बंधाल हावै, कौन-कौन बैमान, चकरल, लिलोरी, ठिठौरी, मानुस देवा, बाल पुकरिया, पोको दरहा, करो मसान, केकर बले, गुरु क बले, गुरु के साधल, तीन सौ साइठ जतन के लगे दोहाई।
छोट मोट भेरवा, जमीन जाय, जगहा जाय, असामुनी जाय, इन्द्रन बेटी, गोहारी जाय, इन्द्रन बेटी, मयर पूत, फोरो गाल, ढउरा ढेड़ी, उड़ि जाबे डैना तोड़ों, रिंग जाबे गोड़ तोड़ों, उलट देखबे आइंख फोरों, पलट देखबे कपार फोरों, केकर बले, गुरु क बले, गुरु के साधल, तीन सौ साइठ जतन के लगे दोहाई। पुरुब के पुरुबइया, पच्छिम के सोंखा, नौ सौ कोरवा, दस सौ बिरहर के लागे हांक।

हांकनी मंत्र- कलकत्ता के काली मांई, लोहरदग्गा के लोहरा-लोहराइन, बदला के मुड़ा-मुड़ाइन, कसमार के घींरू टांगर, पांच पूत, पांचो पंडा के लागे दोहाई।
ठुनुक-ठुनुक करे बीर, हथ कटारी हाथे काटी, टूटे एरंडी, बादी भूत के टूटे हाड़, जै मुठ मारौं तोर गुरु लवा-तीतर, मोर गुरु छेरछा बादी, उड़ि जाबे डैना तोड़ों, बइठ जाबे डांडा तोड़ों, रिंग जाबे गोड़ तोड़ों, केकर बले, गुरु क बले, गुरु के साधल, तीन सौ साइठ जतन के लगे दोहाई।
ओटोम दरहा, पोटोम दरहा, ठूठा दरहा, लंगडा दरहा, अंधा दरहा, खोरा दरहा, रूप दरहा के लागे परनाम।
उसुम तुसुम, भास मुद्‌दुम, तोन झोन तोर नोन, गरहाई लागल ठाढ़, चैंतिस बांधे के बन्धे, गुरु बन्धे, गुरु क बचन हम बांधे, बारहों चेला, हमर बांधल, बारों बीस, तेरों जुग रहि जाय, कभी हमर बचन न छूटे, भगत गुरु के लागे दोहाई।

गुन काटौं, काटौं गुन के रेखा, चढ़ल खाटी, उतरल जाय, पानी पथ बिलास करै, धर लाएं, लुटु-पुटु, धर लाएं, अपन कान, छड़न बादी, उड़लही बान, सायगुन बान, खैरा अपन गुन बान, राइख के का करै, तार काटे, तरगुन काटे, राम काटे, लखन काटे, धरम काटे, धरमात काटे, बानी चक्कर बान काटे।
झम-झम झमलई, सात समुंदर, सोरो धार, हाड़ खाए, मांस गलाए, नहीं माने, पाप-दोख, भूत-बैताल, धारा झौंटा, पीठ में लाठी, डंडे रस्सी, गल्ला फांसी, गोड़ में बेड़ी, हाथ में जंजीर, मुंह में तब्बा लगाइके, मनाइ के, समझाइ के, बुझाइ के, सुझाइ के, ए भूत के लइ बाहर कर, संकर गुरु के लागे परनाम।

परा-परा ठुठी पीपर, आवथीक, जाथीक, जम जाल, हिरा जाल, रेंगा जाल, केंवटा बीरा, जाले मारी, ले चली, ओकासी, ढेंकासी, आलो सुनी, पालो सुनी, डगर भुला, कंपनी, जंपनी, दे तो हरदी गुन्डा, धोआ चाउर, हमर चिन्ता, आवथीक, जाथीक, ठाढ़ कर देथव, सिद्ध गुरु के लागे परनाम।
जाय फार दादी बाजे, जाग डुमुर बाजथीक, लीली घुरी कारी नाचै, आप को बंडा ठेठेर, बिरजा धर लोचनी सम्पताल गेलाएं, डाकिन डुबाइतो, भंवरा बतास, नगफिन्नी, मछिन्दर गुरु के लागे परनाम।
उल्टा सरसों, पंदरों राई, मारौं सरसों टूटे बान, काली देबी कलकल करे, रकत मांस भोजन करे, नहीं माने पाप-दोख धारा झौंटा, पीठे लाठी, डंडे रस्सी, गल्ला फांसी, गोड़ में बेड़ी हाथ में धारा जंजीर लगाई के ए भूत बाहर कर।
छोट काली, बड़ काली हांक जाय, डांक जाय, कंवरू जाय, पटना जाय, असाम जाय, नहीं माने पाप-दोख, मनइ के, बुझइ के, लइ बाहर कर। पेराउ के झलक डाइर, मलक डाइर, सेन्धो रानी, बेन्धो रानी, दिया रानी, भुकु रानी, कजर रानी, चरक रानी, डिंडा रानी लागे परनाम।

इसी प्रकार के ढेरों मंत्रों के साथ सुमरनी गीत भी होते हैं। वाचिक परम्परा के मंत्र ज्यादातर साफ उचारे नहीं जाते, मन में दुहराए जाते हैं या बुदबुदाए जाते हैं, इन्हें शब्दशः लिखने के प्रयास में उच्चारण फर्क के कारण अशुद्धि स्वाभाविक है, इसलिए सब देव-गुरुओं से माफी-बिनती, दोहाई-परनाम।

देवारी बिद्‌या के गुरु जिरकू बबा, नगमतिया गुरु घन्नू बबा और बइदकी बिद्‌या वाले बइजनाथ बबा, इन तीनों का संरक्षण हम सबको 1988 से 1990 के दौरान सरगुजा प्रवास में मिलता रहा। डीपाडीह के ही लाली सेठ, कासी-दुधनाथ साव, रामबिरिछ, प्रेमसाय, करमी के सुखन पटेल, जसवंतपुर के जगत मुन्नी भगत मुन्नी (यानि स्वयं को भक्त और मुनि कहने वाले जगतराम कंवर) और इसी गांव के निवासी सांसद, प्रखर नेता लरंग साय जी, अंबिकापुर के टीएस बाबा जी,... सब के सब न सिर्फ हमारे काम में दिलचस्पी लेते, बल्कि संबल होते। उरांव टोली और बस्ती तो पूरी लगभग साथ ही होती दिन भर। पुराने टीलों में सांपों का डेरा होता, दिन में हाथियों का, शाम ढलने पर भालुओं का आतंक अक्सर बना रहता और इस देवस्थान के चारों ओर भटकती दृश्य-अदृश्य शक्तियां (जैसा लोग बताते) हमें सदा घेरे रहतीं, लेकिन हम इस पर्यावरण से लाभान्वित, स्वस्थ्य और बेहतर (निसंदेह सुरक्षित) वापस लौटते।

टीलों को खोदते हुए पुराने मंदिर अनावृत्त हुए, मूर्तियां जैसी हजार-हजार साल पहले तब रही होंगी हमें वैसी की वैसी भी मिलीं। मुझे हमेशा लगता है कि उन मंदिर-मूर्तियों की तरह ही ऊपर लिए नाम और कई चेहरे जो अब गड्‌ड-मड्‌ड हैं, आज भी वैसे ही होंगे, काल-निरपेक्ष। ज्यादातर चेहरे अब साफ याद नहीं, इसलिए जानता हूं कि मेरे विश्वास की रक्षा हो जाएगी और सारे लोग मुझे जस के तस मिलेंगे, हमलोगों के लिए अपना अकारण स्नेह-संरक्षण यथावत्‌ परोसते।

मंत्रः विश्‍लेषण-व्‍याख्‍या

तथ्य, आंकड़े और सूचना जुटाना, वैज्ञानिक अध्ययन प्रक्रिया की आरंभिक आवश्यकता होती है, जिन्हें छांट कर, वर्गीकृत कर, क्रमवार जमाने के प्रयास में निष्कर्ष स्वतः उभरने लगते हैं। गणित जैसे प्राकृतिक विज्ञानों में भी निष्कर्षों में संशोधन-परिवर्धन संभव होता है, अपवाद भी निष्कर्ष-नियम का हिस्सा बन जाता है बल्कि यह तक कहा जाता है कि अपवाद ही नियमों को पुष्ट करते हैं। सामाजिक विज्ञानों में प्राथमिक निष्कर्षों के साथ अन्य कारक/दृष्टिकोण से और कभी समय के साथ, नई जानकारियों से यानि निवेश, और प्रक्रिया में फर्क आने से निर्गत परिमार्जित होता रहता है और कई बार फैसले उलट भी जाते हैं।

यह जानकारी इसी दृष्टि से संकलित और यहां प्रस्तुत है। प्राथमिक निष्कर्ष बस इतना कि वैदिक ऋचाओं जैसे ही प्रतिष्ठित इन मंत्रों में प्रकृति, परिवेश, आस्था के आलंबन और केन्द्र व्यापक रूप में शामिल हैं। स्वाभाविक ही ऐसा प्रयोग मात्र अनुकरण कर किया जाना, जोखिम का हो सकता है। इनके पाठ-अभ्यास-प्रयोग में शायद इसीलिए वैदिक मंत्रों की तरह निषेध भी हैं। यह उस परिवेश की जीवन पद्धति का अनिवार्य हिस्सा माना जा सकता है और अपने अंचल की परम्पराओं को जानने और उनमें संस्कारित होने के लिए उक्त मंत्रों के साथ प्रशिक्षित-दीक्षित होना उपयोगी जान पड़ता है। (श्री सतीश कुमार सिंह ने अपने लेख 'नागपंचमी के दिन गुरु मंत्र सिद्ध करने वाले नगमतिहा' में बताते हैं कि- 'नागपंचमी पर मेरे शहर जांजगीर की पुरानी बस्ती के कहरापारा में "नगमत" का आयोजन प्रतिवर्ष किया जाता है। यह परंपरा छत्तीसगढ़ के बहुत से गांवों और कस्बों में अब भी जीवित है। इस दिन "सपहर" मंत्र की दीक्षा नए शिष्यों को नगमत गुरू प्रदान करते हैं। पीढ़े पर नाग नागिन और गुरू के चित्र को वर्तमान पीढ़ा गुरू लेकर बैठता है। यहाँ पीढ़ी या पीढ़ा से आशय पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही परिपाटी से भी है इसलिए इसे पीढ़ा-पाठ कहा जाता है।')

पिछड़े कहे जाने वाले क्षेत्र से जादू-टोना, तंत्र-मंत्र से जुड़ी आकस्मिक घटनाओं की खबरें मिलती हैं, लेकिन कथित उन्‍नत-सभ्‍य समाज में व्याप्त कर्मकाण्ड और दुर्घटनाओं की तुलना में, गंभीरता और संख्‍या दोनों दृष्टि से यह नगण्य है। समाज को गायत्री मंत्र, हनुमान चालीसा, सुंदरकांड का पाठ, सत्‍यनारायण की कथा और महामृत्‍युंजय जाप से जैसा संबल मिलता है, दूरस्थ और अंदरूनी हिस्सों में संभवतः इन आदिम मंत्रों का वैसा ही प्रयोग दैनंदिन समस्याओं की उपचार विधि (काउंसिलिंग-हीलिंग सिस्टम) के रूप में होता है, जिसमें सार्वजनिक स्तर पर अव्याख्‍यायित तौर-तरीकों के अनुभव-सिद्ध परामर्श और जड़ी-बूटी, औषधियां भी हैं। स्वाभाविक है कि दीर्घ संचित इस ज्ञान को बिना समझे अंधविश्वास मान कर, संदिग्ध/खारिज करना स्वयं एक तरह का अंधविश्वास होगा। इंदिरा गांधी राष्‍ट्रीय मानव संग्रहालय, भोपाल और केरल इंस्टीट्‌यूट फार रिसर्च, ट्रेनिंग एंड डेवलपमेंट आफ शेड्‌यूल्ड कास्ट्‌स एंड शेड्‌यूल्ड ट्राइब्स, कोझीकोड़ (कालीकट) जैसी संस्थाएं, इसे उपयुक्त सम्मान दिया जाना आवश्यक मान कर, इस दिशा में सक्रिय हैं।

पांच-एक साल पहले कहीं सुना- ''नम म्‍योहो रेन्‍गे क्‍यो''। साल भर से यह रायपुर में भी सुनाई पड़ने लगा है। इस बीच सुपर माडल मिरांडा केर, निचिरेन बौद्ध धर्म अपना कर खबर बनीं। पता चला कि यह बौद्ध धर्म के जापानी गुरु निचिरेन दैशोनिन द्वारा प्रवर्तित स्‍वरूप वाली प्रार्थना है और अब सोका गक्‍कई या सोका गाकी संगठन के माध्‍यम से क्रियाशील है। यह मंत्र मूल भारतीय बौद्ध धर्म के सद्धर्मपुण्डरीकसूत्र (अंग्रेजी में प्रचलित लोटस सूत्र) से आया कहा जाता है। संभवतः मूल प्राकृत भाषा (मागधी-पाली प्रभावयुक्‍त) के संस्‍कृत रूप को चीनी में अनुवाद किया गया, जो बरास्‍ते जापान वापस यहां आया है। इतनी भाषाओं, लिपियों, लोगों और समय से गुजरने के बाद भी यह मंत्र असर दिखा रहा है, जबकि इसके ठीक उच्‍चारण के लिए भी पर्याप्‍त अभ्‍यास जरूरी है और मंत्र का अर्थ पूछने पर तो मंत्र-साधकों की परीक्षा ही हो जाती है।

मैं सोच में पड़ा कि असरदार-प्रभावी क्‍या होता है? शब्‍द, शब्‍दों के अर्थ और उनसे बनने वाले भाव? उनका उच्‍चारण, उच्‍चारण से उत्‍पन्‍न होने वाली ध्‍वनि? मंत्र-द्रष्‍टा और साधक की परस्‍परता, समूह/समष्टि-बोध या और कुछ?... असर होता भी है या नहीं? यदि नहीं तो ऐसे मंत्र कायम क्‍यों हैं? क्‍या प्रभावी, मंत्र नहीं हमारी आस्‍था है? 'अनमिल आखर अरथ न जापू...', शायद अपरा से परा हो जाने की प्‍लुति में छुपा है यह रहस्‍य? ऐसे प्रश्‍नों का उत्‍तर बारम्‍बार तलाशा गया होगा, लेकिन यह ऐसी राह है जिसकी तलाश ''मंत्रः व्‍याख्‍या/निष्‍कर्ष'' स्‍वयं के जिम्‍मे ही संभव हो सकती है।

उदय प्रकाश की पंक्तियां याद आती हैं-
इतिहास जिस तरह विलीन हो जाता है किसी समुदाय की मिथक-गाथा में
विज्ञान किसी ओझा के टोने में
तमाम औषधियाँ आदमी के असंख्य रोगों से हार कर अंत में
जैसे लौट जाती हैं किसी आदिम-स्पर्श या मंत्र में।

संबंधित पोस्‍ट - डीपाडीह और टांगीनाथ